मंगलवार, 27 जुलाई 2010

खुशबू .......महकते विचारों की


खुशबू तुम दिखती तो नहीं हो ...

पर तुम्हे महसूस करती हूँ हर पल ...!!

फूल तुम्हे मैं कैसे भूलूं ?

डाली पर उगते हो जब तुम ,

काँटों कि चुभन को सहते हुए भी ,

आँखों को यूं मूंदकर .......


वो खुशबू को जहन में भर लेते है हम ,

क्योंकि तुम पौधे पर ही खूबसूरत हो लगते ....



पहली बरसात में तपती धरती पर ,

पड़ती है बारिश की पहली बूंदें ...

धरती से उठती वो सौंधी सी खुशबू ,

होती है पहले प्यार के अहसास सी .....



खुशबू ....रिश्तों में बंधे प्यार की,

खुशबू ...वो मुस्कानों की,

खुशबू ...दोस्ती के अटूट बन्धनकी ,

खुशबू .......महकते विचारों की .......!!!!

- मीत

5 टिप्‍पणियां:

  1. सच्चाई से लिखी गयी रचना को नमन, बधाई

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  2. आप बहुत सुन्दर लिखते हैं। आप बहुत बार मेरे ब्लॉग पर आये लेकिन मैं न आ सका। कुछ कारण हैं जिन्हें किसी और समय बताया जाये तो बेहतर है। आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।

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  3. खुशबू ....रिश्तों में बंधे प्यार की,

    खुशबू ...वो मुस्कानों की,

    खुशबू ...दोस्ती के अटूट बन्धनकी ,

    खुशबू .......महकते विचारों की ......
    मीत जी की कलम की खुशबू मुझे इस ब्लाग तक खींच लाई वर्ना आज कल नेट प्क़र कम ही आ पा रही हूँ। बहुत सुन्दर कविता है बधाई।

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आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद भविष्य में भी उत्साह बढाते रहिएगा.... ..

सुमन
लोकसंघर्ष