शिखर पर हूँ'' ........
घाटियों में खोजिए मत
मैं शिखर पर हूँ'
धुएँ की
पगडंडियों को
बहुत पीछे छोड़ आयी हूँ
रोशनी के राजपथ पर
गीत का रथ मोड़
आयी हूँ,
मैं नहीं भटकी
रही चलती निरंतर हूँ।
लाल-
पीली उठीं लपटें
लग रही है आग जंगल में
आरियाँ उगने लगी हैं
आम, बरगद, और
पीपल में
मैं झुलसती रेत पर
रसवंत निर्झर हूँ....
साँझ ढलते
पश्चिमी नभ के
जलधि में डूब जाऊँगी,
सूर्य हूँ मैं जुगनुओं की'
चित्र----लिपि----में
जगमगावुगी,
अनकही अभिव्यक्ति का मैं
स्वर अनश्वर हूँ''!
meet
उम्दा अभिव्यक्ति.
जवाब देंहटाएंस्वर अनश्वर हूँ''!
जवाब देंहटाएंaaj aise hi swar ki to aavashayakta hai...
aapki aawaaz aur buland ho...
http://kavyalok.com
जवाब देंहटाएंशिखर हूँ ...सदैव ऐसा ही आत्मविश्वास रहे !!
जवाब देंहटाएंबहुत अच्छी रचना।
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