बुधवार, 30 जून 2010

पायल के ग़मों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं

समस्त प्राणियों में केवल मानव ही अकेला वह प्राणी है जिसमें ऊपर जाने और नीचे गिरने की असीमित संभावनायें छुपी हैं, वही देवता भी है और दानव भी।
हम यहाँ महिलाओं बात करेंगे- अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जिनमें वे पुरूषों से बहुत आगे हैं- उन्हों नें प्रगति के प्रकाश-स्तम्भ स्थापित किये हैं, परन्तु गिरावट में भी वे किसी से पीछे नहीं।
इस सबंध में जिनेवा के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान की एक रिर्पोट यह बताती है कि अपराध की अंधेरी दुनिया में भी महिलाओं का दबदबा बढ़ रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के मुताबिक़ दुनिया भर में महिला गैंगस्टर की संख्या बढ़ कर छः लाख साठ हजार हो गई है। ब्रिटेन और अमेरिका में होने वाले सगंठित अपराधों में तो महिलाओं की हिस्सेदारी 25 से 50 फीसदी तक है।
हम महिला शकिृकरण की बातें करते हैं- देखिये यहाँ पर भी उसने शक्ति का प्रर्दशन किया है, यह और बात है कि परमाणु-बम बनाने के मामले में जैसे एक वैज्ञानिक नें अपनी बुद्धि का दुरूपयोग किया था, वैसे ही यहाँ शक्ति की दुरूपयोग हुआ है।
कहते हैं महिलाओं के आगे बढ़ाने और नीचे गिराने में पुरूषों का अकसर प्रत्यक्ष या परोक्ष हाथ होता है। इस हेतु रिपोर्ट के आगे के शब्दों पर ध्यान दीजियें- अध्ययन में न्यूयार्क के लैटिन क्वींस गिरोह का उदाहरण देते हुए बताया गया है कि कैसे पारिवारिक और यौन हिंसा क वजह से महिलाएं अपराध की दुनिया में घुसी ?
उक्त के आधार पर अब दो बातों पर ग़ौर कीजिये- पहली यह कि पूरी दुनिया में पाश्चात्य देश यह ढ़िंढ़ोरा पीटते हैं कि उनके यहाँ की महिलाओं को अन्य देशों की अपेक्षा अधिक स्वंतत्रता और अधिकार प्राप्त हैं- अब ऐसी स्वतंत्रता से क्या हासिल जिससे वे अपराधी बनें ?
दूसरी बात यह है कि उनके अपराध पुरूषों की क्रूरता की प्रतिक्रियाये हैं। प्रतिक्रिया में भी दुख छिपा होता है।
वहाँ का पुरूष अपने स्वार्थ में महिला को स्वतंत्रता का रंगीन स्वप्न दिखा कर क्लबों तक खींच लाता है, वह उसे खेल-वस्तु समझता है तथा कपड़ो की तरह बदलता है- अन्यथा वह उसे इतना मजबूर बना देता है कि या तो वह अपराधी बनती है या अपने को बाज़ार में बेचने पर विवश हो जाती है। जब वह एक पुरूष से पीछा छुड़ाती है तो दूसरा पुरूष हमदर्दी का मुखौटा लगा कर शोषण हेतु उसके द्वार पर जाकर खड़ा हो जाता है- महिला के अंर्तमन की टीस और दर्द को कोई नहीं समझता। पुरूष एवँ महिला की मानसिकता को ‘शकील‘ ने चित्रित किया है:-
यह इश्को-हवस के दीवाने बेकार की बातें करते हैं
पायल के ग़मों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं।

डॉक्टर एस.एम हैदर
फ़ोन : 05248-220866

मंगलवार, 29 जून 2010

अपने पिता की खोज कीजिये

कम्पनियाँ हमेशा ग्राहक की जेब पर नज़र रखती है तथा नये-नये शिगूफ़े खिलाती हैं। खास तौर से युवा वर्ग की भावनाओं को भुनाती हैं। ‘वैलेनटाइन डे‘ के बाद अब ‘फादर्स डे‘ का क्रेज पैदा कर रहीं हैं। विज्ञान को आधार बना कर यह उकसावां दे रही हैं कि यदि असली पिता को पहचानना है तो डी0एन0ए0 टेस्ट कराइये।
दिल्ली स्थित कम्पनी ‘इडियन बायोसेंसेस‘ तथा एक अन्य कम्पनी ‘पेटेरनिटी टेस्ट इंडिया‘ ने पितृत्व-परीक्षण के लिये 25 प्रतिशत तक डिस्काउंट देने की घोषणा की है। यह बाज़ार अब तेज़ी से बढ़ रहा है।
विज्ञान के कुछ आविष्कार और खोजें ऐसी है जिनसे समाज को नुकसान ज़रूर पहुँचा है, इसी कारण इन्हें अभिशाप कहा गया। वास्तव इनका दुरूपयोग करे (नादानी से या जान बूझ कर) तो यह प्रयोगकर्ता की ग़लती है। विज्ञान का कोई दोष नहीं है।
हिरोशिमा-नागासकी का बंम काण्ड हो, चेर्नेबल का रैडियेशन, भोपाल गैस काण्ड, अल्ट्रासाउन्ड द्वारा गर्भस्थ कन्या भ्रूण का पता लगा कर उसकी हत्या करके समाज के लिंग अनुपात को बिगाड़ देना, इन सब बातों में विज्ञान का क्या दोष है ?
ग़ौर कीजिये भरे-पूरे परिवार में विश्वास के साथ सभी सुख शान्ति से रह रहे है। एक युवा पुत्र को माता-पिता का आर्शीवाद प्राप्त है। एक दम से लड़के में डी0एन0ए0 टेस्ट का जुनून पैदा होता है। मान लीजिये दाल में कुछ काला है, टेस्ट इसे सत्यापित करता है। घर परिवार, समाज में हड़बोंग मचा, दादिहाली सभी रिश्ते धाराशायी हुए। उत्तराधिकारी के झगड़े पड़े- बाप से ज़्यादा ख़ता माँ की निकली। वह मुँह दिखाने लायक़ नहीं रही। माँ पर अत्याचार हुआ तो कभी तो असली बाप मिल गया, कभी भीड़ में गुम हो गया, ढूढे न मिला।
अनेक टेस्ट भी अविश्वसनीय होते हैं- कुछ तकनीकी खराबी से और कुछ प्रायोजित होते हैं। इसी लिये नार्को टेस्ट एवँ ब्रेन-मैपिंग को केस का आधार नहीं बनाया जाता। हत्या सबंधी या खाद्य अपमिश्रण के टेस्टों को अपने स्वार्थ में कुछ का कुछ करवा दिया जाता है, तो क्या यही खेल डी0एन0ए0 टेस्ट में नहीं खेला जा सकता?
आग के ऐसे खेल न खेलिये, जिसमें हाथ झुलस जाय। ऐेसा न हो आप का घर बिगड़ जाय और कोई हंस हंस कर यह पढ़ रहा हो।
इस घर को आग लग गई, घर के चिराग़ से।

डॉक्टर एस.एम हैदर
फ़ोन : 05248-220866

सोमवार, 28 जून 2010

भोपाल मामले से कुछ सीख - सेवानिवृत्त न्यायधीश उच्चतम न्यायालय


इस सम्बंध में कोर्ट के निर्णय से ऐसा लगता है कि भारत अब भी विक्टोरियन साम्राज्यवादी, सामन्ती दौर में है, और जो सोशलिस्ट सपनों से बहुत दूर है।
उन वर्षों में जिन राजनैतिक दलों के हाथों में सत्ता थी, वे इस भारी अपराधिक लापरवाही के लिये दोषी है। इस घटना से सम्बंधित असाधारण बात तो यह है कि यूनियन कारबाइड में संलिप्त सब से बड़ा अधिकारी वारेन एंडरसन तो पिक्चर में लाया ही नहीं गया।
2 दिसम्बर 1984 को भोपाल में जो बड़े पैमाने पर हत्याकाण्ड हुआ वह एक अमरीकी बहुराष्ट्रीय कार्पोरेशन की भारी गलती का परिणाम था। जिसने भारतीयों की जिन्दगियों को अश्वारोही क्रूर योद्धाओं के समान रौंदा। इसमें लगभग 20,000 लोगों की गैस हत्या हुई फिर भी 26 वर्षों की मुकदमें बाजी के बाद अपराधियों को केवल 2 वर्ष की सश्रम कारावास की सजा दी गई। ऐसा तो केवल अफरातफरी वाले देश भारत ही में घटित हो सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति एवं श्वेत संसार तथा श्यामल भारतीय, प्रधानमंत्री, तालिबान एवं माओवादी नक्सलवाद पर कर्कश आवाजे उठाते हैं। मगर यह नहीं देखते कि इस जन संहार पर जो, भारत के एक पिछड़े इलाके में अमेरिकन ने किया, अदालती फैसला आने में 26 वर्ष लग गये।
चूँकि भारत एक डालर प्रभावित देश है, इसीलिये गैसजन संहार को एक मामूली अपराध जाना गया। लगता है कि भारत पर मैकाले की विक्टोरियन न्याय व्यवस्था अब भी लागू है। हमारी संसद और कार्यपालिका को उनके जीवन और उस नुकसान से लगता है कोई वास्ता ही नहीं है। न्यायपालिका का भी यही हाल है, वह भी अहम मामलों में तुरन्त फैसला देने के अपने मूल कर्तव्य के प्रति लापरवाह है। संसद को भला इतना समय कहां कि वह अपने नागरिकों के जीवन को सुरक्षित करने के कानून बनाये। वह तो कोलाहल में ही बहुत व्यस्त हैं। इस प्रकार के अपराध के लिये जो तफ़तीशी न्यायिक विलम्ब हुआ वह अक्षम्य है।
अगर कार्यपालिका के पास जरूरी आजादी, तत्परता एवं निष्ठा हो, अगर सही जज नियुक्त हो और सही प्रक्रिया में अपनाई जाये तो भारतीय न्यायालय भी सही न्याय करने में सक्षम होंगे।

विश्वास भंग हुआ
यह भी हुआ कि आम आदमी के लिये यह समाजवादी लोकतंत्र बराबर एक निराशा का कारण बना रहा। यह विरोधाभास समाप्त होना चाहिये। हमारे पास असीमित मानव संसाधन हैं, जिससे हम अपने राष्ट्रपिता की प्रतिज्ञा की पुर्नस्थापना कर सकते हैं, उनकी यह प्रबल इच्छा थी कि हर आंख के आंसू को पोछा जाये। परन्तु भारतीय प्रभु सत्ता के इस विश्वास को भोपाल ने हास्यास्पद ढंग से भंग कर दिया गया। एक समय था जब हर वह गरीब आदमी जो भूखा और परेशान था और ब्रिटिश सामा्रज्य का विरोध कर रहा था, वह कांग्रेसी कहा जाता था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जब कांग्रेसी सत्ता में आये, फिर प्रत्येक भूखा लड़ाकू कम्युनिस्ट कहा गया। जब अनेक राज्यों में कम्युनिस्ट सत्ता में आये, और वहां बहुत से भूखे थे, वह भूखे गरीब नक्सलवादी कहे गये। क्या भारत का कुछ भविष्य भी है? हां जरूर है। शर्त यह है कि यहां के गौरवपूर्ण संविधान और अद्भुत सांस्कृति परम्पराओं में कार्ल माक्र्स एवँ महात्मा गाँधी के दष्टिकोण को शमिल करने की समझ पैदा की जाय। क्या हमारे पास इतना विचार-बोध हैं ? क्या न्यायाधीश ऐसी लालसा रखते हैं? भोपाल पर दिया निर्णय तो यही ज़ाहिर करता है कि भारत अब भी साम्राज्यवादी सामंती विकटोरियन युग मे है, और समाजवादी स्वप्नों से कोसों दूर है।
इस परिणाम की असाधारण बात यही है कि युनियन कारबाइड में संलिप्त सब से बड़ा अफ़सर वारेन एनडरसन को मामलो से बाहर रक्खा गया। यह तो इन्साफ का मज़ाक बनाया गया। मुख्य अपराधी को तो व्युह रचना से अलग हीं रक्खा गया। अब जो छोटों को अभियुक्त बनाया तो इससे यही प्रतीत हुआ कि उन लाखों का मज़ाक बना जिन लोगों को भुगतान पड़ा। अपराध क्षेत्र से शक्तिशालियों को मुक्त कर देने का अर्थ क़ानून को लंगड़ा कर देना। क्या एक अमेरिकी अपराधी की भारतीय कोर्ट के आर्डर के अन्र्तगत जांच नहींे की जा सकती ? इस प्रकार के भेद-भाव से न्याय हास्यास्पद बनता है। जब मूल अधिकारों का हनन हो तो जजों के कार्यक्षेत्र कें ऐसे केसों की सुनवाई निहित है, 26वर्ष बीत गये, इतने जज होते हुए भी सुप्रीम कोर्ट नें अब तक क्या किया ? तुरन्त सुनवाई हेतु भारत-सरकार भी कोर्ट तक नहीं गई ? अब क़ानून मंत्री कहते है कि जो दो वर्ष की सश्रम करावास की सज़ा दी गई है, उससे वह प्रसन्न नहीं है। इस 26 वर्ष की अवधि में भारतीय दण्ड विधान की धारा 300 से 304 में कोई संशोधन न प्रस्तावित किया गया न ही किया गया और न सख्त दण्ड का प्रावधान किया गया। यह बात भी संसद एवँ कार्यपालिका की अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाही की द्योतक है। उन दिनों में जो भी राजनैतिक दल सत्ता में रहे वह भी इस अपराधिक चूक के लिये दोषी हैं। क्योंकि भारतीय मानव पर अपराधिक कृत्य हुआ और वे सोते रहे। भुक्त भोगियों को मुनासिब मुआवज़ा तक नहीं दिया गया। यूनियन कारबाइड द्वारा वित्त-पोषित एक बड़े अस्पताल का निर्माण भोपाल में जरूर करवाया गया, लेकिन यह भी गरीबों के लिये नहीं अमीरों के लिए था। यह समझने कि अस्पताल लशों पर बना फिर भी वंचितो की पहुँच वहाँ तक नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट बजाय इसके कि निचले कोर्ट से मुकदमा मंगा कर तुरन्त निर्णय देता, वह अपने ही भत्ते और सुविधायें बढ़ाने में तल्लीन रहा।
यू0एस0 के लिये वारेन एंनडरसन एक बन्द अध्याय है। इस अत्यंत शक्तिशाली परमाणु राष्ट्र की न्याय अध्याय करने की अलग सोच है। इस बात से भारतीय जन मानस में इतना साहस होना चाहिये कि वह ‘डालर-उपनिवेशवाद‘ का कड़ा विरोध करे। अमेरिकन विधि के शासन से मुक्त हैं ? जब बहुं राष्ट्रीय निगम अधिनायकों के दोष की बात आ जाए तब श्यामल भारत को श्वेत-न्याय से संतुष्ट होना ही हैं ? हालांकि वाशिंगटन हमेशा व्यापक मानवाधिकार घोषणा-पत्र के प्रति वफ़ादारी की क़समें खाता है, परन्तु पब परमाणु-सन्धि की बात आती है तो उसकी डंडी अपने हितों की तरफ़ झुका देता है। भारत में यह साहस भी नहीं होता कि वह धोके के विरोध में कोई आवाज़ उठाये। हमारे पास बहुराष्ट्रीय निगम है जिसका वैश्विक अधिकार क्षेत्र है। एंडरसन एक अमेरिकी है और यूनियन कारबाइड थी ?
इसके आज्ञापत्र एशियाई ईधन के लिए ही हैं, भारतीय न्याय व्यवस्था लगता है कि केवल नगर पालिकाओं एवँ पंचायतों के लिये ही है, इससे आगे नहीं।


-वी0आर0 कृष्णा अय्यर
सेवानिवृत्त न्यायधीश
उच्चतम न्यायलय

the hindu से साभार
अनुवादक: डॉक्टर एस.एम हैदर

रविवार, 27 जून 2010

छोटी-बड़ी बातों का कामरेड - कामरेड राजेन्द्र केसरी

(फोटो कैप्शन: तीन साल पहले जब हमने इंग्लैण्ड की एक शोध छात्रा क्लेर हेस को बीड़ी उद्योग पर अध्ययन करने का काम सौंपा था तो उसने राजेन्द्र केसरी का इस विषय पर लंबा इंटरव्यू लिया था। ये फोटो उसी वक्त उसने इन्दौर में शहीद भवन में लिया था जो उसने कामरेड राजू के प्रति अपनी श्रृद्धांजलि के साथ भेजा है।)

लोहे की हरी अल्मारी के भीतर एक पुराना सा टाइपराइटर इंतजार कर रहा है कि कोई उसे बाहर निकालेगा। कोई दरख्वास्त, कोई नोटिस, कोई सर्कुलर, कोई परचा - कुछ तो होगा जिसे टाइप होना होगा। टाइपराइटर के साथ ही वे सारी दरख्वास्तें, नोटिस, सर्कुलर और परचे भी इन्तजार कर रहे हैं कि कोई उन्हें टाइप करेगा, आॅफिस पहुँचाएगा, कोर्ट ले जाएगा, नोटिस बोर्ड पर लगाएगा। 27 मई को गुजरे आज महीना होने को आया, इंतजार खत्म ही नहीं होता।
एक बूढ़ी अम्मा है। साँवेर के नजदीक एक गाँव में रहती है। मांगल्या के पास की एक गुटखा फैक्टरी में काम करती थी। वहाँ राजू ने यूनियन बनायी हुई है। वहीं से वो राजू केसरी काॅमरेड को जानती है। बस में सत्रह रुपये खर्च करके इन्दौर में पार्टी के आॅफिस शहीद भवन तक आती है। वो शहीद भवन आकर राजू केसरी से मिलना चाहती है कि वो उसके देवर के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखवाये। उसे पुलिस के पास जाकर रिपोर्ट लिखवानी है कि उसके देवर ने उस पर बहुत बड़ा पत्थर उठाकर फेंका। वो शहीद भवन में आकर राजू का कई बार तो घंटों इंतजार करती है। काॅमरेड राजू आते हैं, अम्मा से हँसी-मजाक करते हैं, अपना काम करते हैं लेकिन अम्मा के साथ रिपोर्ट लिखवाने नहीं जाते। बूढ़ी अम्मा खूब गुस्सा हो जाती है। काॅमरेड राजू हँसकर उसका गुस्सा और कोसना सुनते रहते हैं। अम्मा अपने सत्रह रुपये बेकार जाने का हवाला देती है। काॅमरेड राजू हँसते-हँसते उससे कहते हैं कि अम्मा मेरे घर चलकर सो जाना। मैं खाना भी खिला दूँगा और 17 रुपये भी दे दूँगा।
मैं उस दिन वहीं शहीद भवन में ही थी। सब काॅमरेड राजू और बूढ़ी अम्मा की बातचीत सुनकर हँस रहे थे। मैंने राजू केसरी से कहा, ’’काॅमरेड, क्यों बूढ़ी अम्मा को सताते हो? उसकी रिपोर्ट क्यों नहीं लिखवा देते?’’ राजू बोला, ’’काॅमरेड आप जानती नहीं हो। मैं खुद अम्मा के गाँव उसके घर जाकर आया, वो पत्थर भी देखकर आया जो ये बोलती है कि इसके देवर ने इस पर फेंका था, लेकिन इसे लगा नहीं। अब मैं पुलिस को जाके क्या बोलूँ कि इसके देवर ने इसको पत्थर मारा जो इसको लगा नहीं इसलिए उसको गिरफ्तार कर लो? फिर जब इसको इसका देवर कल सचमुच में पत्थर मारेगा तो फिर अम्मा को कौन बचाएगा?’’ अम्मा बड़बड़ाती रही, राजू टाइप करते-करते मुस्कुराते रहे, मैं अम्मा को समझाने की कोशिश करके निकल आयी।
जाॅब कार्ड बनवाना है, राशन कार्ड बनवाना है, लेबर कमिश्नर के पास जाना है, पेंशन दिलवानी है, ऐसे ढेर छोटे-बड़े कामों को काॅमरेड राजू केसरी को करते देखने की यादें हैं। यादें और भी हैं। विनीत ने बताया कि राजू केसरी की पहली याद वो है जब काॅमरेड रोशनी दाजी हमें छोड़ चली गयी थी। रोशनी की अंतिम यात्रा निकलने के पहले राजू केसरी सैकड़ों मजदूरनियों का जुलूस लेकर नारे लगाते हुए पहुँचा था। बेशक राजू सहित सभी रो रहे थे लेकिन सबकी आवाज बुलंद थी - ’काॅमरेड रोशनी दाजी को लाल सलाम’।
बीड़ी मजदूरिनों को संगठित करने, रेलवे हम्मालों की यूनियन बनाने, गुटखा फैक्टरियों में काम करने वाली औरतों का संगठन खड़ा करने जैसे अनेक कामों से राजू केसरी पार्टी का काम आगे बढ़ा रहे थे। बीड़ी के बारे में तो वे बताते भी थे कि इन्दौर की बीड़ी बनाने वाली बाइयाँ दूसरी जगहों की बीड़ी मजदूरों से कितनी अच्छी स्थिति में हैं। इन्दौर में सभी बीड़ी कारखानों के मजदूरों में राजू का काम फैला था और 3 हजार से ज्यादा बीड़ी मजदूर एटक के सदस्य बने थे। हाल में मुंबई में हुए बीड़ी-सिगार मजदूरों के राष्ट्रीय सम्मेलन में राजू को बीड़ी-सिगार फेडरेशन के मध्य प्रदेश के संयोजक की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गयी थी।
लड़ने में काॅमरेड राजू केसरी नंबर एक थे। मुझे खुद बताते थे कि कामरेड, आज फलाने की धुलाई कर दी। आज किसी को धक्का मारकर बाहर कर दिया। कामरेड बसन्त मुझे एक दिन बोले, ’’ये राजू हर चीज में झगड़ा डालता है। अड़ जाता है तो किसी की सुनता ही नहीं।’’ उनके साथ लगभग हर वक्त रहने वाले कामरेड सत्यनारायण बोले कि हम दोनों हर रोज लड़ते थे। आज शहीद भवन में सब कामरेड्स आँखें नम किये इंतजार करते हैं कि राजू आये और लड़ाई करे।
जब से इन्दौर में महिला फेडरेशन का काम शुरू किया, तभी से कामरेड मोहन निमजे और काॅमरेड राजू केसरी अपनी यूनियन की महिलाओं को महिला फेडरेशन की गतिविधियों में हमेशा भेजते रहे। अभी 8 मार्च 2010 को महिला दिवस के लिए मैंने काॅमरेड राजू से बात की तो वो प्रोमेड लैबोरेटरीज की कर्मचारी महिलाओं से बात करने के लिए हमारे साथ गये, गेट मीटिंग ली और बोले, ’’मैं मैनेजर से बात करूँगा कि 8 मार्च के दिन वो तुम लोगों की जल्दी छुट्टी कर दे ताकि तुम लोग महिला दिवस के जुलूस में शामिल हो जाओ, लेकिन अगर वो न माना तो तुम लोग आधे दिन की तनख्वाह कटवा कर आ जाना। छुट्टी मिले या नहीं लेकिन आना जरूर।’’ सारी महिलाएँ जोर से सिर हिलाकर बोलीं कि बिल्कुल आएँगे और 8 मार्च को आधे दिन की छुट्टी लेकर महिलाएँ आयीं और जुलूस में शामिल हुईं।
27 मई को जब राजू हमें छोड़कर चले गये तो बीड़ी मजदूरनियाँ, रेलवे हम्माल, प्रोमेड लैबोरेटरीज और तमाम कारखानों के मजदूर फिर छुट्टी लेकर आये अपने लड़ाकू काॅमरेड को आखिरी सलाम कहने। सबकी आँखों में आँसू थे लेकिन उन्होंने राजू से सीख लिया था कि आँखों में आँसू भले हों लेकिन किसी भी काॅमरेड को लाल सलाम कहते वक्त आवाज नहीं काँपनी चाहिए।
मिल मजदूर के लड़के थे राजू केसरी। एक दिन अपने बारे में बता रहे थे कि जब सिर्फ 14 बरस की उम्र थी तब उनके पिता दुर्घटना की वजह से काम करने लायक नहीं रह गये थे। सन 1975 में राजू ने पार्टी आॅफिस में पोस्टर चिपकाने की नौकरी 40 रुपये महीने पर की थी। काॅमरेड पेरीन दाजी कहती हैं कि ’’राजू पार्टी आॅफिस में झाड़ू लगाता था। उसका रंग काला था, तो शुरू में तो हम सब उसे कालू ही कहते थे। राजू तो वो बाद में बना।’’ झाड़ू लगाते-लगाते और पोस्टर चिपकाते-चिपकाते काॅमरेड राजू ने दसवीं पास की और टाइपिंग भी सीख ली। पार्टी के तमाम नोटिस और तमाम कागज टाइप करने की जिम्मेदारी तब से राजू ने ही संभाली हुई थी।
एक दिन मैंने उनसे पूछा कि जब आप पार्टी से जुड़े तो कम्युनिज्म से क्या समझते थे? तो बोले कि ’’काॅमरेड, 14 बरस की उम्र में मैं कुछ नहीं समझता था। सिर्फ इतना जानता था कि लाल झण्डा पकड़ना सम्मान की बात है। उस वक्त लाल झण्डे की लोग बहुत इज्जत करते थे। उन दिनों इन्दौर की कपड़ा मिलों में 30-35 हजार मजदूर काम करते थे और मजदूरों की आवाज केवल मिल क्षेत्र में ही नहीं बल्कि पूरे शहर में सुनी जाती थी।’’
सन् 1975 में ही मेरी माँ कामरेड इन्दु मेहता ने भी पार्टी की सदस्यता ली थी। उन्हीं दिनों मुझे एक चिट्ठी में मेरी माँ ने लिखा था कि ’’तुम लोगों के लिए एक बेहतर दुनिया छोड़कर जाना चाहती हूँ। इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिए समाजवाद कायम करने का संघर्ष जरूरी है।’’ उस वक्त मेरी माँ की उम्र 53 वर्ष थी। वो काॅलेज में राजनीतिशास्त्र पढ़ाती थीं, उन्होंने समाजवाद और माक्र्सवाद के बारे में कई किताबें पढ़ी थीं। लेकिन राजू केसरी जैसे काॅमरेड्स उतनी किताबें नहीं पढ़ते। माक्र्सवाद के बारे में उनकी समझ पार्टी स्कूल से बनती है। वो मानवता की जरूरत और मानवता के लिए संघर्ष के माक्र्सवादी पाठ वहीं सीखते हैं। राजू केसरी मुझे कहा करते थे कि हमने तो माक्र्सवाद काॅमरेड इन्दु मेहता से ही सीखा।
ट्रेड यूनियन की राजनीति भी राजू केसरी ने काम करते-करते और अपने वरिष्ठ साथियों के काम करने के तरीकों को देखकर सीखी। पिछले 35 बरसों में पार्टी और कम्युनिस्ट विचारधारा से राजू ने गहरा संबंध बना लिया था। सही-गलत के बारे में और नये तरीकों की जरूरत के बारे में भी वो सोचते थे और बात करते थे। एक दिन शहीद भवन में बोले, ’’काॅमरेड, मैं ट्रेड यूनियन के काम से संतुष्ट नहीं हूँ। मजदूर हमारे पास आते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनके हकों की लड़ाई लाल झण्डे वाली यूनियन ही लड़ सकती है। हम उनका संगठन बनाते हैं। उनके हक की लड़ाई लड़ते हैं। मैनेजमेंट को मजदूरों के हक में झुकाते हैं, लेकिन जब उनकी माँग पूरी हो जाती है तो उन्हें यूनियन की जरूरत नहीं महसूस होती। वो सब छोड़-छाड़कर चले जाते हैं। बताइए काॅमरेड, अगर हम मजदूरों को उनके स्वार्थों से ऊपर उठाकर उनकी राजनीतिक समझ नहीं बना पाये तो ट्रेड यूनियन का क्या काम किया?’’ इन जायज सवालों का सामना करते हुए भी राजू को इस बात में कभी संदेह नहीं रहा कि रास्ते तभी निकलते हैं जब संघर्ष और कोशिशें जारी रखी जाती हैं। इसीलिए उसने लगातार मजदूरों, कर्मचारियों के नये-नये संगठन बनाना जारी रखा। हाल में आपूर्ति निगम के हम्मालों का संगठन और प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों व कर्मचारियों का संगठन बनाने में राजू ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। अपनी तरह से वो कोशिश भी करते थे कि यूनियन में शामिल मजदूर भत्ते-तनख्वाहों तक ही न रुकें बल्कि उनका सही राजनीतिक विचार भी बने। एक बार 15 अगस्त को हम्माल यूनियन के मजदूरों के बीच झण्डा फहराते हुए राजू केसरी मजदूरों से बोले कि ’’भगतसिंह ने हिन्दुस्तान की ऐसी आजादी के लिए कुर्बानी तो नहीं दी थी जहाँ हमारे बच्चों को दूध न मिले, काॅपी-किताब न मिले, उल्टे हम धर्म के नाम पर लड़ें और सब तरह की बेईमानियाँ करें। ये तो भगतसिंह और आजादी के उन सब दीवानों के साथ नाइन्साफी है।’’
असंगठित क्षेत्र में यूनियन को फैलाने का जो काम काॅमरेड राजू केसरी और उनके साथी काॅमरेडों ने किया, उसका महत्त्व इसलिए और भी बढ़ जाता है कि वो ऐसे वक्त में किया गया काम है जब असंगठित तो दूर, संगठित क्षेत्रों की ट्रेड यूनियनों में भी हताशा का माहौल है।
उदारीकरण के मजदूर विरोधी माहौल में ट्रेड यूनियन की राजनीति कितनी कठिन है, राजू जैसे काॅमरेड्स इस किताब को अपने अनुभव की रोशनी में रोज पढ़ते हैं। मैंने उनसे पूछा था कि, ’’काॅमरेड, फिर आप पार्टी के साथ अभी तक क्यों जुड़े हैं?’’ वो बोले, ’’काॅमरेड मैंने आशा नहीं छोड़ी है कि एक वैकल्पिक समाज, शोषणरहित समाज व्यवस्था एक दिन जरूर आएगी। लोग समाजवाद के महत्त्व को एक दिन जरूर समझेंगे। हमें एक अच्छा नेतृत्व चाहिए बस, एक दिन हम समाजवाद के सपने को जरूर सच कर लेंगे।’’
रात को दस-साढ़े दस बजे तक राजू पार्टी का काम करते रहे और फिर आधी रात अचानक अपने अधूरे काम, अधूरी लड़ाइयाँ और अधूरे सपने छोड़कर वो चले गए। मैं उनके घर गयी तो पूरा मोहल्ला भीगी आँखों के साथ बैठा था। उनकी 17 बरस की लड़की शानो मुझसे बात करने लगी अपने पापा के बारे में। मुझसे बोली, ’’आपकी पार्टी कितनी अच्छी है। मेरा भाई भी पार्टी ज्वाइन कर सकता है क्या? अभी वो सिर्फ 13 साल का है। पापा उसे इन्जीनीयर बनाना चाहते थे।’’
उसकी बात सुनकर मुझे लगा कि इतिहास अपने आपको इस शक्ल में दोहराये, ऐसा नहीं होना चाहिए। ऐसा नहीं होना चाहिए कि जैसे कम उम्र में राजू को पार्टी ज्वाइन करने की जरूरत पड़ी, वैसे ही उसके बेटे को पड़े। हम सब जो बचे हैं, पार्टी में राजू केसरी की खाली जगहों को देर-सबेर भर ही लेंगे। लेकिन राजू के बच्चों को इन्जीनीयर, डाॅक्टर, कलाकार या जो भी बनना हो, वो बनने का उन्हें अवसर मिलना चाहिए। हम सभी को मिलकर राजू के बच्चों की अच्छी पढ़ाई की पूरी व्यवस्था करनी चाहिए। बच्चे जब बड़े हों तो सोच-समझकर पार्टी से जुड़ें, वैसी दुनिया बनाने की कोशिशों में अपना हिस्सा बँटाएँ जिसका सपना उनके पापा देखते थे और जिन्दगी की आखिरी साँस तक उसको सच करने की खातिर वे हर छोटा-बड़ा काम करते रहे।
कामरेड राजू केसरी को लाल सलाम।
जया मेहता,
संदर्भ केन्द्र, 26, महावीर नगर, इन्दौर -452018

शनिवार, 26 जून 2010

मेहनत रंग लायी एक पिता की

बरेली जनपद के सीबीगंज इलाके में तत्कालीन सहायक पुलिस अधीक्षक जे रविन्द्र गौड़ के दिशा निर्देशन में मुकुल गुप्ता नाम के नौजवान को पुलिस ने पकड़ कर हत्या कर दी थी। मुकुल गुप्ता के पिता ब्रजेन्द्र गुप्ता ने न्यायलय की शरण लेकर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई थी जिसकी विवेचना स्थानीय पुलिस को ही दी गयी थी जिसपर ब्रजेन्द्र गुप्ता ने माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद में याचिका दायर कर सी.बी.आई जांच कराने की मांग की थीकानूनी दांव पेच के बाद 20 फरवरी 2010 को न्यायलय ने सी.बी.आई जांच के आदेश दिए। जांच के उपरांत सी.बी.आई ने अब वर्तमान में पुलिस अधीक्षक बलरामपुर जे रविन्द्र गौड़ समेत 11 पुलिस कर्मियों के ऊपर हत्या हत्या के सबूत मिटाने का वाद दर्ज कराया है।
कानून के रक्षकों द्वारा वह-वाही इनाम प्राप्त करने के लिए नवजवानों को पकड़ कर हत्या का सिलसिला बहुत पुराना हो रहा है। पीड़ित पक्ष द्वारा आवाज उठाने पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती है यदि किसी तरह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज भी हो जाती है तो उसकी विवेचना उसी विभाग के निचले स्तर के अधिकारी करने लगते हैं। विवेचना के नाम पर विवेचना अधिकारी साक्ष्य मिटाने का ही काम करते हैं इसलिए आवश्यक यह है एनकाउन्टर में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर पुलिस विभाग से अतिरिक्त जांच एजेंसी से जांच करनी चाहिए जिससे जनता का विश्वास पैदा होगा और फर्जी तरीके से एनकाउन्टर के नाम पर हत्याएं रोकी जा सकती हैं।
बधाई के पात्र हैं श्री ब्रजेन्द्र गुप्ता जिन्होंने ने अपने पुत्र की हत्या के अपराधियों को सजा दिलाने के लिए एक लम्बी कानूनी लड़ाई लड़ी। एक अधिवक्ता होने के नाते मैं उनका कष्ट समझ सकता हूँ कि उन्होंने न्याय प्राप्त करने के लिए कितने कष्ट सहे होंगे। अभी उनको हत्यारों को सजा कराने के लिए काफी प्रयास करने होंगे

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 25 जून 2010

कितने मुनासिब हैं विशेष पुलिसिया दस्ते- अंतिम भाग

विशेष बलों के जरिए होने वाली फर्जी गिरफ्तारियों का सिलसिला उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल भी मनगढ़ंत कहानी पर फर्जी गिरफ्तारी करने के मामले में अदालत में मुँह की खा चुकी है। दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल की करतूत तब सामने आईं, जब अदालत ने मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार किए गए कथित आतंकियों को रिहा कर दिया। इन कथित आतंकियों को स्पेशल सेल ने 2005 में मुठभेड़ के बाद दिल्ली से गिरफ्तार किया था। इन पर भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून पर हमले की साजिश का आरोप था। जिसे स्पेशल सेल ने एक बड़ी कामयाबी के तौर पर प्रचारित किया था। जबकि गिरफ्तार किए गए सभी चारो लोग पुलिस की तरफ से पेश की गई चार्जशीट के विरोधाभासी ब्यौरों के आधार पर निचली अदालत द्वारा बरी कर दिए गए हैं। अदालत ने स्पेशल सेल के कामकाज से असंतोष व्यक्त करते हुए बार-बार टिप्पणी की है कि स्पेशल सेल ने अपने अधिकारों का बेजा इस्तेमाल किया है। दिल्ली पुलिस ने मार्च 2005 में जिन चार लोगों को आतंकी बताकर गिरफ्तार किया था, पाँच साल बाद जब वे छूटे तो उनके पास न तो वह उल्लास था और न वे सपने, जो उन्होंने पुलिसिया साजिश का शिकार होने से पहले सँजोये थे।
आउट ऑफ टर्न प्रमोशन लेकर फर्जी एनकाउंटर करके अपनी पीठ थपथपाने वाली पुलिस से जन्मे विशेष दस्ते अब आतंकवाद और नक्सलवाद के नाम पर लोगों को निशाना बना रहे हैं। ऐसे में ये सवाल करना सहज हो जाता है कि आखिर देश का संविधान जो आजादी, जो सहूलियतें देता है, उसको नुकसान पहुँचाने वाले पुलिसकर्मी निर्दोष कैसे हो सकते हैं? क्या इन दस्तों के कारनामों से संविधान की मूल भावना को चोट नहीं पहुँचती है? दरअसल राजनीति में दिनों-दिन बढ़ती जा रही गैर-जिम्मेदारी ऐसे सवालों से मुँह चुरा रही है। जबकि सत्ता अपने अपने अपराध को छिपाने के लिए खौफजदा समाज बनाने की कोशिश में है। एक ऐसा समाज जहाँ हर किसी को केवल अपने जान और माल की चिंता में ही व्यस्त रहने की मजबूरी हो और सत्ता के पक्षपाती कदमों के संगठित
प्रतिरोध की स्थितियाँ ही न बन पाएँ। यही कारण है कि अधिकारों का दुरुपयोग करने के तमाम आरोपों के बावजूद विशेष पुलिस दस्तों को बनाए रखा जा रहा है। सत्ता भययुक्त समाज बनाने के लिए
धीमी न्याय प्रक्रिया का फायदा उठाकर इन बलों का बखूबी इस्तेमाल कर रही है। यही कारण है कि किसी भी बड़ी वारदात के बाद चैबीस या अड़तालीस घंटे के भीतर एक साथ कई गुनाहगारों की गिरफ्तारी हो जाती है। साजिशकर्ता जानते हैं कि जब तक मामला निष्कर्ष पर पहुँचेगा और अदालत का फैसला आएगा, तब तक बात पुरानी हो चुकी होगी। इसके अलावा ये विशेष दस्ते फर्जी गिरफ्तारियों और मनगढंत कहानियों के जरिये अपने औचित्य का भी बचाव करते हैं। क्योंकि जब तक इस तरह के अपराध होते रहेंगे या होने की सम्भावनाएँ जताई जाती रहेंगी, तब तक इन विशेष दस्तों के बने रहने का तर्क मजबूत रहेगा। कुल मिलाकर विशेष दस्तों को मिलने वाली विशेष सुविधाएँ इस तरीके के भ्रष्टाचार के लिए मनोबल देती हैं।
कहने का साफ मतलब है कि जब देश का सामान्य कामकाज सामान्य नियमों से चल सकता है,तो विशेष कानून और विशेष कार्य बल कितने जरूरी हैं? अगर ऐसे बलों की आवश्यकता है तो यह तय करने की जिम्मेदारी किसकी है कि इन बलों से नैसर्गिक न्याय की अवधारणा को कोई चोट न पहुँचे। अगर कोई नागरिकों की गरिमा को नुकसान पहुँचाता है तो ऐसे लोगों को दंडित करने की जिम्मेदारी किसकी है ? वक्त रहते सामान्य विधि प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं को मजबूत किया जाना जरूरी है, ताकि किसी भी तरह के विशेषाधिकार के बल पर नागरिकों की अस्मिता पर चोट करने वाली कारगुजारियों को रोका जा सके। ऐसे में इन विशेष पुलिसिया दस्तों को भंग किया जाना मानवाधिकारों के संरक्षण में पहला कदम साबित होगा।

(समाप्त)

-ऋषि कुमार सिंह
मोबाइल: 09313129941

बृहस्पतिवार, 24 जून 2010

कितने मुनासिब हैं विशेष पुलिसिया दस्ते

देश में उत्तर प्रदेश पुलिस प्रताड़ना से होने वाली मौतों में सबसे आगे है, तो मानवाधिकार हनन के भी मामले में किन्हीं दूसरे राज्यों से पीछे नहीं है। हाल के दिनों में विशेष पुलिसिया दस्तों के द्वारा किए गए कथित मुठभेड़ों पर लगातार सवाल उठते रहे हैं। जबकि इन विशेष पुलिसिया दस्तों का गठन संगठित अपराधों और आतंकी वारदातों से निपटने के नाम पर किया गया था, लेकिन वक्त बीतने के साथ ये विशेष दस्ते सवालों के घेरे में आ गए। ये विशेष दस्ते अपने कामकाज के तरीके में मानवाधिकार हनन का केंद्र बन गए हैं। गौरतलब है कि हरियाणा में अपराधियों से निपटने के लिए बनाई गई स्पेशल टास्क फोर्स ऐसे ही आरोपों के चलते भंग कर दी गई। हरियाणा एस0टी0एफ0 पर सर्राफा व्यापारियों से पैसे वसूलने का आरोप लगा। सी0सी0टी0वी0 कैमरे में कैद हुईं तस्वीरों के आधार पर एस0टी0एफ0 के सात जवानों समेत एस0टी0एफ0 के मुखिया अशोक श्योराण को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है। हरियाणा की घटना से यह बहस जरूरी हो गई है कि सामान्य पुलिस की तुलना में एस0टी0एफ0 जैसे विशेषाधिकार प्राप्त दस्ते कितने उपयुक्त होते हैं, क्योंकि अपराधियों पर नकेल कसने की लिए बनाए गए ये दस्ते कई संगीन आरोपों में घिरते जा रहे हैं। इन दस्तों पर न केवल बेगुनाहों को फँसाने का आरोप है, बल्कि जबरन उगाही, सरेआम हथियारों का प्रदर्शन, बिना नम्बर प्लेट की गाड़ी से चलने जैसे कई आरोप समय-समय पर लगते रहे हैं।
केवल उत्तर प्रदेश में इन विशेष पुलिसिया दस्तों के कामकाज को लेकर लगातार अँगुली उठती रही है। उत्तर प्रदेश पुलिस की एस0टी0एफ0 और ए0टी0एस0 पर दर्जनों फर्जी गिरफ्तारियाँ करने का आरोप है। इस बात को लेकर समय-समय पर मानवाधिकार संगठनों ने न केवल एस0टी0एफ0 व ए0टी0एस0 को भंग करने की, बल्कि फर्जी गिरफ्तारियों के मामले में ए0टी0एस0 अधिकारियों का नार्को टेस्ट कराने की माँग भी की है। फर्जी गिरफ्तारियों की असलियत तब सामने आई, जब अदालतों में साक्ष्यों के अभाव में या पकड़े गये लोगों के घटनास्थल पर मौजूद न होने के पुख्ता सबूतों के आधार पर अदालत ने फैसला सुनाया। पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार किया गया राजू बंगाली नामक युवक बेकसूर पाया गया, हालाँकि एस0टी0एफ0 ने उसे हूजी का कमांडर बताया था। ए0टी0एस0 और एस0टी0एफ0 ने राजू बंगाली की निशानदेही पर जिन लोगों को गिरफ्तार किया था, वे लोग अभी तक जेलों में रहने को मजबूर हैं। उत्तर प्रदेश में एस0टी0एफ0 की फर्जी गिरफ्तारियों का दूसरा साक्ष्य 19 नवम्बर 2009 को लखनऊ की अदालत में सामने आया, जब 23 जून 2007 को लखनऊ में विस्फोटक छुपाने के मामले की सुनवाई चल रही थी। उत्तर प्रदेश एस0टी0एफ0 ने अज़ीज़ुर्रहमान नाम के शख्स को पश्चिम बंगाल से गिरफ्तार करते हुए जो कहानी पेश की थी, उसके अनुसार 22/23 जून की रात अजीजुर्रहमान लखनऊ में मौजूद था। जबकि 22 जून को पश्चिम बंगाल की सी0आई0डी0 ने अजीजुर्रहमान को चोरी के आरोप में कोर्ट में पेश किया था। जहाँ अलीपुर कोर्ट के मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने उसे 6 दिन की रिमांड पर भेजा था, कोर्ट की तरफ से जारी की गई रिमांड की सर्टीफाइड कॉपी इस बात का सबूत है। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल का अदालती दस्तावेज यह साबित करता है कि अज़ीज़ुर्रहमान किसी भी सूरत में 22/23 जून 2007 को लखनऊ में नहीं हो सकता है। गौरतलब है कि एस0टी0एफ0 ने हूजी के कथित एरिया कमांडर जलालुद्दीन उर्फ बाबू की निशानदेही पर अज़ीज़ुर्रहमान को दो अन्य लोगों एस के मुख्तार और मोहम्मद अली अकबर के साथ गिरफ्तारी की थी। तीनों की निशानदेही पर 11 जुलाई 2007 को मोहनलालगंज के गढ़ी गाँव से विस्फोटक भी बरामद किया था। जबकि जलालुद्दीन उर्फ बाबू को 23 जून 2007 को लखनऊ के रेजीडेंसी के पास से गिरफ्तार किया गया था। एसटीएफ ने बाबू को संकट मोचन मंदिर और श्रमजीवी एक्सप्रेस में हुए बम धमाकों का मास्टरमाइंड बताया था।
सबसे अफसोसजनक हालत यह है कि अज़ीज़ुर्रहमान की फर्जी गिरफ्तारी के सबूत सामने आने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस, एटीएस और एसटीएफ तीनों एक दूसरे को जिम्मेदारे ठहराने लगे। एडीजी राजीव जैन ने ए0टी0एस0 को जिम्मेदार बताया, जबकि ए0टी0एस0 प्रमुख सब्बरवाल ने ए0टी0एस0 बनाये जाने से पहले का मामला बताकर बचने की कोशिश की। वहीं एस0टी0एफ0 प्रमुख व ए0डी0जी0 बृजलाल ने पूरे मामले पर ए0टी0एस0 को जिम्मेदार बताया और कारण दिया कि इस तरह के सारे मामले ए0टी0एस0 ही देख रही है। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश पुलिस, ए0टी0एस0 और एस0टी0एफ0 तीनों जिम्मेदारी लेने से बचते दिखाई दे रहे हैं। जबकि तत्कालीन डी0जी0पी0 विक्रम सिंह ने बाकायदा संवाददाता सम्मेलन बुलाकर यह घोषणा की थी कि 22/23 जून 2007 की रात तीनों यानी अजीजुर्रहमान, एस0के0 मुख्तार और अली अकबर लखनऊ में मौजूद थे। जलालुद्दीन उर्फ बाबू के गिरफ्तार होने की खबर टेलीविजन पर देखकर वे भाग गए थे। कुल मिलाकर अदालत में सामने आया पूरा वाक़िया यह साबित करने के लिए काफी है कि उत्तर प्रदेश में मानवाधिकारों के लिए ये विशेष अधिकार संगठन किस तरह का खतरा पैदा कर रहे हैं? गौरतलब है कि अज़ीज़ुर्रहमान की गिरफ्तारी फर्जी होने के ठोस सबूत के बावजूद अदालत ने अज़ीज़ुर्रहमान की जमानत याचिका खारिज कर दी। मुकदमें की पैरवी कर रहे एडवोकेट मोहम्मद शुऐब ने असंतोष व्यक्त करते हुए अपना वकालतनामा वापस ले लिया। चूँकि पूरी न्याय व्यवस्था साक्ष्यों के होने या न होने पर काम करती है, ऐसे में ठोस साक्ष्यों की अवहेलना अपने आप में कई सवाल खड़े करता है।

-ऋषि कुमार सिंह
मोबाइल: 09313129941

बुधवार, 23 जून 2010

अतिवाद की लड़ाई - 2

राजशाही जब खारिज की गयी जोकि एक समय तक ईश्वर प्रदत्त मानी जाती थी और यह तय हुआ कि अब राजाओं को जनता चुनेगी तो संसदीय लोकतंत्र की स्थापना, सैद्धांतिक तौर पर लोगों द्वारा ईश्वर के लिये खारिजनामा ही था, क्योंकि राजा उसके प्रतिनिधि होते थे और राजा को खा़रिज करना इश्वर को खारिज करने से कहीं कम न था बल्कि वह एक प्रत्यक्ष भय था. इस नयी व्यवस्था के बारे में प्रस्फुटित होने वाले विचार जरूरी नहीं कि वे केवल लिंकन के ही रहे हों पर ये विचार राजशाही के लिये अतिवादी ही थे. राजशाही के समय का यही अतिवाद आज हमारे समय के लोकतंत्र में परिणित हुआ. अतिवाद हमेशा समय सापेक्ष रहा है पर वह भविष्य की संरचना के निर्माण का भ्रूण विचार भी रहा जिसे ऐतिहासिक अवलोकन से समझा जा सकता है.
ज्योतिबाफुले, सावित्रीबाई फुले, राजाराम मोहनराय जैसे कितने नाम हैं जो लोग अपने समय के अतिवादी ही थे. इन्हें आज का माओवादी भी कह सकते हैं चूंकि ये संरचना प्रक्रिया में विद्रोह कर रहे थे एक दमनकारी व शोषणयुक्त प्रथा का अंत करने में जुटे थे. भविष्य में जब समाज के मूल्यबोध बदले तो इन्हें सम्मानित किया गया, क्या नेपाल में ऐसा नहीं हुआ. सत्तावर्ग ने इन शब्दों के मायने ही आरक्षित कर लिये हैं. किसी भी समय का अतिवाद, उस समय के सत्तावर्ग के लिये अपराधी और भविष्य के समाज का निर्माता होता है बशर्ते वह उन मूल्यों के लिये हो जो मानवीयता और आजादी के दायरे को व्यापक बनाये.
उन्हें उग्रवादी घोषित कर दिया जायेगा, आसानी से अराजक कह दिया जायेगा जो आवाज उठाते हैं कि घोषित करने वालों की बनी बनायी व्यवस्थायें, भले ही वह एक व्यापक समुदाय के लिये निर्मम और अमानवीय हो पर उनके लिये सुविधा भोगी है, के खिलाफ आवाज उठाना, उनकी व्यवस्थित जिंदगी व उनके जैसे भविष्य में आने वालों की जिंदगी में खलल पैदा करती है. मसलन आप असन्तुष्ट रहें पर इसे व्यक्त न करें, व्यक्त भी करें तो उसकी भी एक सीमा हो, उसके तौर-तरीके उन्होंने बना रखें हैं. इसके बाहर यदि आप उग्र हुए, गुस्सा आया तो यह उग्रवादी होना है. इस प्रवृत्ति को आपसी बात-चीत, छोटे संस्थानों से लेकर देश की बड़ी व्यवस्थाओं तक देखा जा सकता है जहाँ असंतुष्ट होना, असहमति उनके बने बनाये ढांचे से बाहर दर्ज करना, अराजक और उग्रवादी होना है और इन शब्दों के बोध जनमानस में अपराधिकृत कर दिये गये हैं.
अभिषेक मुखर्जी जिसकी बंगाल पुलिस द्वारा हाल में ही हत्या कर दी गयी क्या यह सोचने पर विवश नहीं करता कि आखिर वे क्या कारण हैं कि १३ भाषाओं का जानकार और जादवपुर विश्वविद्यालय का एक प्रखर छात्र देश की उच्च पदाधिकारी बनने की सीढ़ीयां चढ़ते-चढ़ते लौट आता है और लालगढ़ के जंगलों में आदिवासियों की लड़ाई लड़ने चला जाता है, क्या यह सचमुच युवाओं का भटकाव है जो गुमराह हो रहे हैं, जिसे सरकार बार-बार दोहराती रहती है या व्यवस्था की कमजोरी और सीमा की पहचान कर विकल्प की तलाश. अनुराधा गांधी, कोबाद गांधी, साकेत राजन, तपस चक्रवर्ती, शायद देश और दुनिया के बड़े नौकरसाह बन सकते थे, पर वर्षों बरस तक लगातार जंगलों की उस लड़ाई का हिस्सा बने रहे जिसे सरकार अतिवाद की लड़ाई मानती है और ये उसे अधिकार की. शायद समाज में जब तक अतिवाद और अतिवादि रहेंगे, स्वभाव में जब तक उग्रता बची रहेगी तमाम दुष्प्रचारों के बावजूद नये समाज निर्माण की उम्मीदें कायम रहेंगी.

( समाप्त )

-चन्द्रिका
स्वतंत्र लेखन व शोध
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2010 अंक में प्रकाशित

मंगलवार, 22 जून 2010

अतिवाद की लड़ाई - 1

कुछ दिन पहले ही हम सब दण्डकारण्य घूम कर लौटे हैं, अरुंधती रॉय के साथ, भूमकाल में कॉमरेडों के साथ-साथ घूमते हुए. दण्डकारण्य के ग्राम स्वराज्य को देखते हुए, आउटलुक, समयांतर और फिलहाल, पत्रिकाओं के पन्ने पलटते हुए. भारत सरकार के असुरक्षा की महसूसियत को खारिज होती जा रही थी, जंगलों में चलते हुए, पहाड़ों पर चढ़ते हुए. हमे ऐसा ही लग रहा था कि जमीन पर पेड़ों से टूटकर गिरे सूखे पत्ते हमारे ही पैरों के नीचे दब रहे हैं और उनकी चरमराहट हमारे कानों में किसी संगीत की तरह बज रही है. संगीत, जिसे भारत सरकार और उसकी दलाली करने वाली कार्पोरेट मीडिया भय के रूप में हमारे जेहन में भरते रहने का लगातार प्रयास करती रहती है. इंद्रावती नदी के पार जो “पाकिस्तान” है (पुलिस की भाषा में) वहाँ के किस्से सी.वेनेजा, रुचिरगर्ग और कई पत्रकार पहले भी ला चुके हैं. जब हम आजादी की बात करते हैं तो उसके क्या मायने होते हैं? अरुंधती इस अवधारणा को ही एक वाक्य में ही बताती हैं “वहाँ मुक्ति का मतलब असली आजादी था”, वे उसे छू सकते थे, चख सकते थे, इसका मतलब भारत की स्वतंत्रता से कहीं ज्यादा था. यह नकली आजादी को पेपर्द करने वाला वाक्य है और यह भी कि नकली आजादी जैसी चीज बहुतायत पायी जाती हैं, मसलन हमारी आजादी और हमारे देश की आजादी. सरकार और पूजीपतियों की आजादी से अलग. ये “जनताना सरकार” के क्षेत्र में रहने वाली महिलायें हैं जिन्हें रात और दिन का फर्क सिर्फ रोशनी का फर्क होता है, असुरक्षा और भय का नहीं, एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी को वे कभी भी पार कर सकती हैं. इसके लिये आखों में इतनी ही रोशनी की जरूरत है कि आप उससे रास्ता बना सकें. दिल्ली को भी भारत सरकार ऐसा नहीं बना पायी और शायद संसद भवन को भी. “ये लोग अपने सपनों के साथ जीते हैं, जबकि बाकी दुनिया अपने दुरूस्वप्नों के साथ” इस पूरे लेखन को यात्रा वृतांत कहें, कविता कहें, रिपोर्ताज कहें या इन विधाओं से अलग एक दस्तावेज, जहाँ भूमकाल साल में एक दिन मनाया जाता है और भूमकाल के विद्रोह की आवाजें दशकों से वहाँ की हवाओं में और वेग के साथ प्रवाहित होती जा रही हैं. इतिहास जरूरी नहीं कि सफेद पन्नों पर काली रोशनाई से लिखे जायें वे जंगलों की हलचल में रोज-रोज घटित होकर पीढ़ीयों के व्यवहारों में शामिल हो सकते हैं, उनके बच्चों की रगों में, उनके गाँवों के घरों की दीवारों पर. इस लेखन के बाद अरुंधती को अतिवादी घोषित करने की होड़ सी लगी रही, उनके तर्कों को ख़रिज करने की जहमत न उठाते हुए. जिसका खारिज किया जाना शायद मुमकिन भी नहीं था एक उग्रता और उन्माद में कुछ कह देने की व्यग्रता ही दिखी. आखिर यह अतिवाद ही तो था जो संसदीय लोकतंत्र के खतरे को इस तरह प्रस्तुत कर रहा था कि लोकतंत्र हमे घुटन की तरह लग रहा था और भूमकाल में शामिल न हो पाने का क्षोभ भी. फिर तो यह ऐसा अतिवाद है जो हमे व्यग्र कर देता है. एक “अतिवादी” की डायरी के विचार यदि हमे व्यग्र करते हैं, तो क्या सरकार के हर रोज के दमन से आदिवासीयों को उग्र नहीं होना चाहिये.
परिवर्तन सबसे पहले स्वप्न में आता है. रात की नींद के सपनों में नहीं, जीवन के बेहतरी की लालसा के स्वप्न में, और कहीं अपने भीतर एक बना बनाया ढांचा टूटता है, अपने समय के मूल्य ढहते हुए दिखते हैं. यह ढांचा पहले आदमी के विचार से टूटता है फिर व्यवहार से फिर वह आदमी के दायरे को ही तोड़कर, संरचना के दायरे को तोड़ने की प्रक्रिया में शामिल हो जाता है. वे हर बार आतिवादी ठहरा दिये गये होंगे जिन्होंने समय के मूल्यों को तोड़ा होगा क्योंकि किसी भी समय में व्यवस्था के संरचना की एक सीमा रही है, उसके एक मूल्य रहे हैं उसी के भीतर सोचने की इजाजत होती है, पर दुनिया में हर बार संरचना और सत्ता के बाहर की सोच पैदा हुई. यह परिस्थिति की देन मात्र नहीं थी बल्कि चिंतन की व्यापकता थी जो व्यापक आजादी के लिये हर समय विद्रोह करती रही और अपने समय में समय के आगे का विचार पैदा होते रहे. किसी भी समय का अतिवाद यही होता है जो समय की संरचना से विद्रोह करता है, एक नये संरचना की तलास करता है लिहाजा हर दौर में नये समाज बनाने के सपने रहे हैं और हर समय में वे लोग जो अपने समय की संरचना को नकारने का साहस रखते हों. जबकि इतिहास से वे नयी संरचना को बिम्बित करने में असफल भी होते हैं फिर भी उम्मीद और मूल्यों ने उनके विचारों को आगे बाढ़ाया और भविष्य के समाज उन्हीं के विचारों की निर्मिति रहे हैं. शायद दुनिया का अंत किसी प्रलय या दैवीय शक्ति से नहीं, बल्कि उस दिन होगा जब ये नकार के साहस खत्म हो जायेंगे. जो जैसा है उसी रूप में स्वीकार्य होगा तो बदलाव की प्रक्रियायें रुक जायेंगी और दुनिया की सारी घढ़ियां और कलेंडर अर्थ विहीन हो जायेंगे. समय का ठहराव यही होगा कि नये चिंतनकर्म समाप्त हो जायें और सब सत्ता के आगे नतमस्तक दिखेंगे, पर मानवीय प्रवृत्तियां इन्हें अस्वीकार करती रही हैं कि इंसान है तो सोचना जारी रहेगा.

(क्रमश: )

-चन्द्रिका
स्वतंत्र लेखन व शोध

सोमवार, 21 जून 2010

बटाला हाउस इन्काउन्टर - 2

मोहम्मद आतिफ अमीन को लगभग सारी गोलियाँ पीछे से लगी है। 8 गोलियाँ पीठ में लग कर सीने से निकली हैं। एक गोली दाहिने हाथ पर पीछे से बाहर की ओर से लगी है जबकि एक गोली बाँईं जाँघ पर लगी हैं और यह गोली हैरत अंगेज तौर पर ऊपर की ओर जाकर बाएँ कूल्हे के पास निकली है। पुलिस ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के सम्बंध में प्रकाशित समाचारों और उठाये जाने वाले प्रश्नों का उत्तर देते हुए यह तर्क दिया कि आतिफ गोलियाँ चलाते हुए भागने का प्रयास कर रहा था और उसे मालूम नहीं था कि फ्लैट में कुल कितने लोग हंै इसलिए क्रास फायरिंग में उसे पीछे से गोलियाँ लगीं लेकिन इन्काउन्टर या क्रास फायरिंग में कोई गोली जाँघ में लगकर कूल्हे की ओर कैसे निकल सकती है। आतिफ के दाहिने पैर के घुटने में 1.5 x 1 सेमी0 का जो घाव है उस के बारे में पुलिस का कहना है कि वह गोली चलाते हुए गिर गया था। पीठ में गोलियाँ लगने से घुटने के बल गिरना तो समझ में आ सकता है किन्तु विशेषज्ञ इस बात पर हैरान है कि फिर आतिफ के पीठ की खाल इतनी बुरी तर कैसे उधड़ गई? पोस्मार्टम रिपोर्ट के अनुसार आतिफ के दाहिने कूल्हे पर 6 से 7 सेमी0 के भीतर कई जगह रगड़ के निशानात भी पाए गए।
साजिद के बारे में भी पुलिस का कहना है कि साजिद एक गोली लगने के बाद गिर गया था और वह क्रास फायरिंग के बीच आ गया। इस तर्क को गुमराह करने के अलावा और क्या कहा जा सकता है साजिद को जो गोलियाँ लगी हैं उन में से तीन पेशानी (Fore head) से नीचे की ओर आती हैं। जिस में से एक गोली ठोढ़ी और गर्दन के बीच जबड़े से भी निकली है। साजिद के दाहिने कन्धे पर जो गोली मारी गई है वह बिल्कुल सीधे नीचे की ओर आई है। गोलियों के इन निशानात के बारे में पहले ही स्वतन्त्र फोरेन्सिक विशेषज्ञ का कहना था कि या तो साजिद को बैठने के लिए मजबूर किया गया या फिर गोली चलाने वाला ऊँचाई पर था। जाहिर है दूसरी सूरत उस फ्लैट में सम्भव नहीं है। दूसरे यह कि क्रास फायरिंग तो आमने सामने होती है ना कि ऊपर से नीचे की ओर।
साजिद के पैर के घाव के बारे में रिपोर्ट में यह कहा गया है कि यह किसी गैर धारदार वस्तु ;(Blunt Force By object or surface) से लगा है। पुलिस इसका कारण गोली लगने के बाद गिरना बता रही है। लेकिन 3.5 x 2 सेमी0 का गहरा घाव फर्श पर गिरने से कैसे आ सकता है पोस्टमार्टम रिपोर्ट से इस आरोप की पुष्टि होती है कि आतिफ व साजिद के साथ मारपीट की गई थी।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेशानुसार इस प्रकार के केस में पोस्टमार्टम की वीडियो ग्राफी को पोस्टमार्टम रिपोर्ट के साथ उसे भी आयोग के कार्यालय भेजा जाए। लेकिन एम0 सी0 शर्मा की रिपोर्ट में केवल यह लिखा है कि घावों की फोटो पर आधारित सी0 डी0 सम्बंधित जाँच अफसर के सुपुर्द की गई।
बटाला हाउस की घटना के बाद सरकार, कार्यपालिका और मीडिया ने जो रोल अदा किया है वह न कि तशवीश-नाक है बल्कि इससे देश के मुसलमानों व अन्य लेागों के मन में यह प्रश्न उठ रहा है कि आखिर सरकार इस मामले की न्यायिक जाँच से क्यों कतरा रही है? न्यायिक जाँच के लिए जज भी सरकार ही नियुक्त करेगी।
वर्ष 2008 में होने वाले सीरियल धमाकों के बारे में विभिन्न रायें पाई जाती हैं। कुछ लोग इन तमाम घटनाओं को हेडली की भारत यात्रा से जोड़ कर देखते हैं। जबकि भारतीय जनता पार्टी की नेता सुषमा स्वराज ने अहमदाबाद धमाकों के बाद संवाददाताओं से कहा था कि यह सब कांग्रेस करा रही है क्योंकि न्युकिलियर समझौता के मुद्दे पर लोकसभा में नोट की गड्डियों के पहुँचने से वह परेशान है और जनता के जेहन को मोड़ना चाहती है। समाजवादी पार्टी से निष्कासित सांसद अमर सिंह के अनुसार सोनिया गाँधी बटाला हाउस इन्काउन्टर की जाँच कराना चाहती थीं लेकिन किसी कारण वह ऐसा नहीं कर सकीं, लेकिन उन्होंने इसका खुलासा नहीं किया कि वह कारण क्या है?
बटाला हाउस इन्काउन्टर की न्यायिक जाँच की माँग केन्द्रीय सरकार के अलावा न्यायालय भी नकार चुके हैं। सब का यही तर्क है कि इससे पुलिस का मारल गिरेगा। केन्द्रीय सरकार और न्यायालय जब इस तर्क द्वारा जाँच की माँग ठुकरा रही थीं उसी समय देहरादून में रणवीर नाम के एक युवक की इन्काउन्टर में मौत की जाँच हो रही थी और अंत में पुलिस का अपराध सिद्ध हुआ। आखिर पुलिस के मारल का यह कौन सा आधार है जिस की रक्षा के लिए न्याय और पारदर्शिता के नियमों को त्याग दिया जा रहा है।

-अबू ज़फ़र आदिल आज़मी
मोबाइल: 09540147251

(समाप्त)

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून-2010 अंक में प्रकाशित

रविवार, 20 जून 2010

बटाला हाउस इन्काउन्टर - 1

फोटो सोर्स : hardnewsmedia.com
बटाला हाउस इन्काउन्टर के डेढ़ वर्ष बाद पोस्टमार्टम रिपोर्ट के सार्वजनिक होने से इन्काउन्टर के न्यायिक जाँच की माँग में फिर तेजी आ गई है। मानवाधिकार के विभिन्न संगठन और आम लोग इस इन्काउन्टर पर लगातार प्रश्न उठाते रहे हैं और अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने उनके सवालों को अधिक गंभीर बना दिया है।
जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्र अफरोज आलम साहिल ने इस तथाकथित इन्काउन्टर से सम्बंधित विभिन्न दस्तावेजों की प्राप्ति के लिए सूचना के अधिकार (RTI) के तहत लगातार विभिन्न सरकारी एवम् गैर सरकारी कार्यालयों का दरवाजा खटखटाया किन्तु पोस्टर्माटम रिपोर्ट की प्राप्ति में उन्हें डेढ़ वर्ष लग गए।
अफरोज आलम ने सूचना के अधिकार के अन्तर्गत राष्ट्रीय मानवाधिकर से उन दस्तावेजों की माँग की थी जिनके आधार पर जुलाई 2009 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट दी थी। ज्ञात रहे कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में दिल्ली पुलिस को क्लीन चिट देते हुए पुलिस का यह तर्क मान लिया था कि उसने गोलियाँ अपने बचाव में चलाई थीं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा भेजे गए दस्तावेजों में पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अलावा पुलिस द्वारा कमीशन और सरकार के समक्ष दाखिल किए गए विभिन्न कागजात के अलावा खुद आयोग की अपनी रिपोर्ट भी है।
पोस्मार्टम रिपोर्ट के अनुसार आतिफ अमीन (24 वर्ष) की मौत तेज दर्द (Shock & Hemorrhage) से हुई और मुहम्मद साजिद (17 वर्ष) की मौत सर में गोली लगने के कारण हुई है। जबकि इन्स्पेक्टर मोहन चन्द्र शर्मा की मृत्यु का कारण गोली से पेट में हुए घाव से खून का ज्यादा बहना बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार तीनों (आतिफ, साजिद और एम0 सी0 शर्मा) को जो घाव लगे हैं वे मृत्यु से पूर्व (Antemortem in Nature) के हैं।
रिपोर्ट के अनुसार मोहम्मद आतिफ अमीन के शरीर पर 21 घाव हैं जिसमें से 20 गोलियों के हैं। आतिफ को कुल 10 गोलियाँ लगी हैं और सारी गोलियाँ पीछे से मारी गई हैं। 8 गोलियाँ पीठ पर, एक दाएँ बाजू पर पीछे से और एक बाँई जाँघ पर नीचे से। 2 x 1 से0 मी0 का एक घाव आतिफ के दाएँ पैर के घुटनों पर है। रिपोर्ट के अनुसार यह घाव किसी धारदार चीज से या रगड़ लगने से हुआ है। इसके अलावा रिपोर्ट में आतिफ की पीठ और शरीर पर कई जगह छीलन है जबकि जख्म न0 20 जो बाएँ कूल्हे के पास है से धातु का एक 3 सेमी0 का टुकड़ा मिला है।
मोहम्मद साजिद के शरीर पर कुल 14 घाव हैं। साजिद को कुल 5 गोलियाँ लगी हैं और उनसे 12 घाव हुए हैं। जिसमें से 3 गोलियाँ दाहिनी पेशानी के ऊपर, एक गोली पीठ पर बाँई ओर और एक गोली दाहिने कन्धे पर लगी है। मोहम्मद साजिद को लगने वाली तमाम गोलियाँ नीचे की ओर निकली हैं जैसे एक गोली जबड़े के नीचे से (ठोड़ी और गर्दन के बीच) सर के पिछले हिस्से से और सीने से। साजिद के शरीर से 2 धातु के टुकड़े (Metalic Object) मिलने का रिपोर्ट में उल्लेख है जिस में से एक का साइज 8 x 1 सेमी0 है। जबकि दूसरा Metalic Object पीठ पर लगे घाव (GSW -7) से टीशर्ट से मिला है। इस घाव के पास 5ग1.5 सेमी0 लम्बा खाल छिलने का निशान है। पीठ पर बीच में लाल रंग की 4 x 2 सेमी0 की खराश है। इसके एलावा दाहिने पैर में सामने (घुटने से नीचे) की ओर 3.5 x 2 सेमी0 का गहरा घाव है। इन दोनों घावों के बारे में रिपोर्ट का कहना है यह घाव गोली के नहीं हैं। साजिद को लगे कुल 14 घावों में से रिपोर्ट में 7 घावों को बहुत गहरा (Cavity Deep) कहा गया है।
इनस्पेक्टर मोहन चन्द्र शर्मा के बारे में रिपोर्ट का कहना है कि बाएँ कन्धे से 10 सेमी0 नीचे घाव के बाहरी हिस्से की सफाई की गई थी। मोहन चन्द्र शर्मा को 19 सितम्बर 2008 को एल-18 में घायल होने के बाद निकटतम अस्पताल होली फैमली में भर्ती कराया गया था। उन्हें कन्धे के अलावा पेट में भी गोली लगी थी। रिपोर्ट के अनुसार पेट में गोली लगने से खून का ज्यादा स्राव हुआ और यही मौत का कारण बना। इन्काउन्टर के बाद यह प्रश्न उठाया गया था कि जब शर्मा को 10 मिनट के अन्दर चिकित्सकीय सहायता मिल गई थी और संवेदनशील जगह (Vital Part) पर गोली भी नहीं लगी थी तो फिर उनकी मौत कैसे हो गई? यह भी प्रश्न उठाया गया था कि शर्मा को गोली किस तरफ से लगी, आगे से या पीछे से? क्योंकि यह भी कहा जा रहा था कि शर्मा पुलिस की गोली का शिकार हुए हैं किन्तु पोस्टमाटम रिपोर्ट इसकी व्याख्या नहीं कर पा रही है क्योंकि होली फैमली अस्पताल जहाँ उन्हें पहले लाया गया था और बाद में वहीं उनकी मौत भी हुई, में उनके घावों की सफाई की गई, लिहाजा पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टर यह नहीं बता सके कि यह गोली के घुसने की जगह है या निकलने की। दूसरा कारण यह है कि शर्मा को एम्स (AIIMS) में सफेद सूती कपड़े में ले जाया गया था और उनके घाव यहीं (Adhesive Lecoplast) से ढके हुए थे। रिपोर्ट में लिखा है कि जाँच अफसर (IO) से निवेदन किया गया था कि वह शर्मा के कपड़े लैब में लाएँ। ज्ञात रहे कि शर्मा का पोस्टमार्टम 20 सितम्बर 2008 को 12 बजे दिन में किया गया था और उसी समय यह रिपोर्ट भी तैयार की गई थी।

(क्रमश: )

-अबू ज़फ़र आदिल आज़मी
मोबाइल: 09540147251

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून-2010 अंक में प्रकाशित

शनिवार, 19 जून 2010

अपसंस्कृति


दुनिया की आप़ा धापी में शामिल लोग
भूल चुके है अलाव की संस्कृति
नहीं रहा अब बुजुर्गों की मर्यादा का ख्याल
उलझे धागे की तरह नहीं सुलझाई जाती समस्याएं
संस्कृति , संस्कार ,परम्पराओं की मिठास को
मुंह चिढाने लगी हैं अपसंस्कृति की आधुनिक बालाएं
अब वसंत कहाँ ?
कहां ग़ुम हो गयीं खुशबू भरी जीवन की मादकता
उजड़ते गावं -दरकते शहर के बीच
उग आई हैं चौपालों की जगह चट्टियां
जहाँ की जाती ही व्यूह रचना
थिरकती हैं षड्यंत्रों की बारूद
फेकें जाते हैं सियासत के पासे
भभक उठती हैं दारू की गंध -और हवाओं में तैरने लगती हैं युवा पीढ़ी
गूँज उठती हैं पिस्टल और बम की डरावनी आवाज़
सहमी-सहमी उदासी पसर जाती हैं
गावं की गलियों ,खलिहानों और खेतों की छाती पर
यह अपसंस्कृति का समय हैं |

-सुनील दत्ता
मोबाइल- 09415370672

अमेरिकी साम्राज्यवाद का रूप व एशिया - (अंतिम भाग)

वास्तव में इन सबके पीछे अमेरिका की वह रणनीति है जिसके अन्तर्गत वह ईरान जैसे कई देशों के प्राकृतिक संसाधनों पर अपना प्रभुत्व कायम करना चाहता है ताकि वह विश्व में स्वयं को सिरमौर बना सके। ‘‘जिस तरह यह तथ्य सभी जानते हैं कि सारी दुनिया के ज्ञात प्राकृतिक तेल भण्डारों का 60 प्रतिशत पश्चिम एशिया में मौजूद हैं, अकेले सऊदी अरब में 20 प्रतिशत, बहरीन, कुवैत, ओमान, कतर और संयुक्त अरब अमीरात में मिलाकर 20 प्रतिशत और इराक व ईरान में 10-10 प्रतिशत तेल भण्डार हैं। ईरान के पास दुनिया की प्राकृतिक गैस का दूसरा सबसे बड़ा भण्डार है, उसी तरह लगभग सारी दुनिया में अमेरिका के कारनामों से परिचित लोग इसे एक तथ्य की तरह स्वीकारते हैं कि अमेरिका की दिलचस्पी न लोकतंत्र में है, न आतंकवाद खत्म करने में, न दुनिया को परमाणु हथियारों के खतरों से बचाने में, बल्कि उसकी दिलचस्पी तेल पर कब्जा करने और इसके जरिये बाकी दुनिया पर अपना वर्चस्व बढ़ाने में है। अमेरिका की फौजी मौजूदगी ने उसे दुनिया के करीब 50 फीसदी प्राकृतिक तेल के स्रोतों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कब्जा दिला दिया है और अब उसकी निगाह ईरान के 10 प्रतिशत पर काबिज होने की है। दरअसल मामला सिर्फ यह नहीं है कि अगर अमेरिका को 50 फीसदी तेल हासिल हो गया है तो वह ईरान को बख्श क्यों नहीं देता। सवाल यह है कि अगर 10 फीसदी तेल के साथ ईरान अमेरिका के विरोधी खेमे के साथ खड़ा होता है तो दुनिया में फिर अमेरिका के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत कोई न कोई करेगा।’’
इसी तरह क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति
फिदेल कास्त्रों का भी मानना है कि अमेरिका अपनी इन खतरनाक नीतियों के छद्म द्वारा विश्व के कई देशों की सार्थक शक्तियों व सुविधाओं का प्रयोग अपने हित हेतु कर रहा है। चाहे वह प्राकृतिक संसाधन हो अथवा मानव शक्ति। ‘‘उन्होंने सम्पूर्ण विश्व को लूटकर, उसका शोषण करके, बहुत सारा धन इकट्ठा किया है, जिससे वह पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों को, कारखानों को, पूरी की पूरी संचार व्यवस्थाओं व सेवाओं आदि को खरीद लेते हैं। .........अपने शानदार आर्थिक नियमों के चलते वह तीसरी दुनिया के देश के लोगों के साथ क्या कर रहे हैं? वह बहुत सारे लोगों को उनके अपने ही देशों में विदेशी बना रहे हैं। अपने देश में एक वैज्ञानिक, डाक्टर, इंजीनियर अथवा शिक्षक तैयार करने पर उनको बहुत भारी खर्च करना पड़ता है। इसलिए वह तीसरी दुनिया के देशों की जनता की खून पसीने की कमाई से तैयार किए गए वैज्ञानिकों, डाॅक्टरों, इंजीनियरों आदि को अपने यहाँ बुला लेते हैं। बात अपना खर्च बचा लेने व दूसरे देशों के संसाधन लूट लेने की ही नहीं है, बात यह है कि निरंतर नई तकनीक से निर्मित व्यापार को चलाने के लिए स्वयं उनमें योग्यता नहीं है।’’
अमेरिका की इस पूँजीवादी व्यवस्था ने वातावरण में ज़हर भर दिया है और वह उन प्राकृतिक संसाधनों को
धीरे-धीरे नष्ट कर रहा है, जो कि एक बार प्रयोग कर लेने के पश्चात पुनः पैदा नहीं किए जा सकते, जबकि भविष्य में उनकी आवश्यकता ज्यादा होगी। इन संसाधनों के प्रयोग से अमेरिका को कोई न रोके इसलिए वह भिन्न-भिन्न नीतियों का सहारा लेकर विश्व पटल पर ऐसा वातावरण सृजित कर रहा है कि सभी का ध्यान उसी ओर रहे और वह अपने उद्देश्य की पूर्ति बिना किसी अंकुश के कर सके।
भारत द्वारा अमेरिका के साथ किए गए समझौतों से हमारी संप्रभुता पर एक खतरा मण्डरा रहा है, जिससे बचाव के लिए हमें कोई न कोई ठोस कदम उठाना होगा। यह तो स्पष्ट ही है कि एशिया के प्राकृतिक संसाधनों व मानव शक्ति के उत्पादन पर अमेरिका नजर गड़ाए हुए है परन्तु जिस मनमानी से वह यह सब हासिल करना चाहता है वह इन देशों के लिए अत्यन्त हानिकारक साबित हो सकता है। अमेरिका की इन सभी साम्राज्यवादी नीतियों से दो-दो हाथ करने व उसका हल ढूँढने का सार्थक प्रयास यही हो सकता है कि उसके विरुद्ध खड़ी तमाम शक्तियों को एकत्र किया जाए। जैसा कि पिछले समय में बेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यगो चावेज के साथ मिलकर अहमदीनेजाद ने एक वैकल्पिक कोष का निर्माण कर लिया है इससे छोटे देशों को सार्थक सहयोग मिलेगा और वह भी अमेरिकी शक्तियों का विरोध करते हुए इनसे जुड़े रहेंगे। विश्व स्तर पर अमेरिका के डाॅलर को चुनौती देने के प्रयास भी इसी ओर संकेत करते हैं। इसी तरह एशिया के सभी देश आपसी खींच तान भुलाकर यदि एक मंच पर एकत्र हों तो वे सब अपनी संप्रभुता को कायम रखते हुए अमेरिका का विरोध बड़े तीव्र रूप में कर सकते हैं। कुछ अमेरिका परस्त देशों को यदि इस एकत्रता से निकाल भी दिया जाए तो भी एक सार्थक प्रयास किया जा सकता है। मैं तो कहूँगा कि भारत जैसे देश न केवल इसका विरोध करें बल्कि इस नये एकता सूत्र को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँ, वहीं चीन भी इसमें महत्वपूर्ण रोल अदा कर सकता है। जिस प्रकार आज भूमण्डलीय साम्राज्यवाद की बात की जा रही है उसी तरह भूमण्डलीय विरोध को भी पैदा किया जा सकता है बस जरूरत इन देशों की आपसी एकता की है।

-डा0 विकास कुमार
मोबाइल: 09888565040

शुक्रवार, 18 जून 2010

अमेरिकी साम्राज्यवाद का रूप व एशिया - 1

आज इस भूमण्डलीयकरण के युग में जहाँ विश्व को एक ग्राम के रूप में देखने की बात स्वीकारी जा रही है वहीं इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि विभिन्न देशों में सामाजिक स्थिरता, समरसता और अखण्डता को तोड़ने हेतु साम्राज्यवादी शक्तियाँ भिन्न-भिन्न हथकण्डों का प्रयोग कर रही हैं। जहाँ वे एक ओर जन कल्याण की नई-नई सुविधाओं और स्कीमों का प्रचार प्रसार कर रही हैं वहीं दूसरी ओर अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु इसी जन के शोषण को घिनौना रूप देती द्रष्टव्य होती हैं। हम इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि अमेरिका ही इन सब रणनीतियों व षडयंत्रों का सूत्रधार है। वस्तुतः आज विश्व धरातल पर अमेरिका की जो छवि बनी हुई है उसे सुधारने हेतु व अपने घिनौने कार्यों पर पर्दा डालने हेतु ही इन जन कल्याण की सुविधाओं का छद्म रचा जा रहा है। वास्तविकता यह है कि अमेरिका अपनी इन्हीं रणनीतियों की आड़ में अपने वर्चस्व को कायम रखने का जो षडयंत्र रच रहा है, वह आतंकवाद का असल जनक है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि उसके निशाने पर एशिया व अफ्रीका के देश ही प्रमुख रूप से हैं, जिसका प्रमुख कारण इन देशों के प्राकृतिक संसाधन व माल बेचने हेतु उपलब्ध बाजार का होना मान लिया जाए तो कदाचित् यह गलत न होगा।
बीसवीं सदी में बहुत ही नाटकीय ढंग से एशिया के कई देशों में घटनाएँ घटित हुईं हैं, जिसने न केवल एशिया बल्कि सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित किया है। जिसके अन्तर्गत विश्व सभ्यताओं के टकराव की बात को तूल देकर मुस्लिम समाज को आतंकी घोषित करने का प्रयास भी प्रमुख रूप से सम्मिलित है। वास्तव में अमेरिका अपनी निश्चित रणनीति के अन्तर्गत भिन्न-भिन्न देशों में वहाँ की सरकारों को अस्थिर करने के प्रयास करता है और इस प्रयास को सफल बनाने हेतु वह धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा, सम्प्रदाय व नस्ल आदि का सहारा लेकर कई प्रकार के दुष्प्रचारों को फैलाता है ताकि मनोवैज्ञानिक ढंग से उस देश के वातावरण में खण्डित होने की भावना को बढ़ावा दिया जा सके और उसकी अस्थिरता का लाभ उठाया जा सके। अमेरिका के साम्राज्यवादी नीतिकार पहले पहल इन देशों में आर्थिक, सामाजिक व पिछड़ेपन पर विशेष रूप से फोकस करते हैं, फिर उसमें छिपी संभावनाओं को एक हथियार की तरह प्रयोग करते हैं और इन्हीं देशों को धन, हथियार आदि देकर अपना काम निकलवाते हैं तथा फिर अपने ही प्रचार तंत्र द्वारा इन्हें बदनाम कर सुधारने का ठेका अपने जिम्मे ले लेते हैं। नोम चोमस्की के आलेख इस संबन्ध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध करवाते हैं। यह मात्र एक रणनीति है परन्तु ऐसी ही कई अन्य रणनीतियाँ भी हैं जो अमेरिका अपना हित साधने हेतु प्रयोग में लाता है।
आज यदि एशिया पटल पर दृष्टिपात किया जाए तो ज्ञात होता है कि अमेरिका के निशाने पर जो देश हैं उनमें मुस्लिम देशों की संख्या अधिक है। यह सत्य है कि इराक को तबाह करने के पश्चात् भी अमेरिका अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है परन्तु हाँ इस बात को कतई नहीं नकारा जा सकता कि इराक से युद्ध के बहाने अमेरिका ने एशिया के कई हिस्सों में अपनी सेना की संख्या कई गुना बढ़ा ली है। वहीं पश्चिम एशिया पर दृष्टिपात किया जाए तो ज्ञात होता है कि यहाँ के कुछ देशों में अमेरिका परस्त सरकारें ही कार्यरत हैं और ये देश अमेरिका की हर बुरी हरकत में बराबर के साझीदार हंै। ‘‘इज्राइल, कुवैत, जाॅर्डन और सऊदी अरब में पहले से ही अमेरिका परस्त सरकारें मौजूद थीं, लेबनान के प्रतिरोध को अमेरिकी शह पर इज्राइल ने बारूद के गुबारों से ढाँप दिया है और सीरिया, ओमान, जाॅर्जिया, यमन जैसे छोटे देशों की कोई परवाह अमेरिका को है नहीं, भले ही तुर्क जनता में अमेरिका द्वारा इराक पर छेड़ी गई जंग का विरोध बढ़ा है लेकिन अपनी राजनैतिक, व्यापारिक, व भौगोलिक स्थितियों की वजह से तुर्की की सरकार यूरोप और अमेरिका के खिलाफ ईरान के साथ खड़ी होगी, इसमें संदेह ही है। कुवैत में अमेरिकी पैट्रियट मिसाइलें तनी हुई हैं, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के पानी में अमेरिका नौसेना का पाँचवा बेड़ा डाले हुए है। कतर ने इराक और अफगानिस्तान पर हमलों के दौर में अमेरिकी वायुसेना के लिए अपनी जमीन और आसमान मुहैय्या कराये ही थे।’’
यदि एशिया की विगत कुछ दशकों की स्थितियों का मूल्यांकन किया जाए और भविष्य सम्बंधी अमेरिका की रणनीति की बात को उससे मिलाकर देखा जाए तो ज्ञात होता है कि इराक और फिलिस्तीन की साम्राज्यवाद विरोधी नीतियों को कुचलने के पश्चात अब अमेरिका के निशाने पर ईरान ही है। छद्म रूप में विश्व से आतंकवाद मिटाने का संकल्प लेने वाला अमेरिका अपनी सूची में ईरान और उत्तर कोरिया को प्रमुख रूप से शामिल किये हुए हैं। 9/11 के पश्चात अमेरिकी व पश्चिमी मीडिया ‘इस्लामी आतंकवाद’ का मिथ खड़ा कर, इन मुस्लिम देशों में नरसंहार को अपने मनमाने ढंग से क्रियान्वित करना चाहता है परन्तु ईराक को उसकी बेगुनाही के पश्चात भी लाशों के आवरण में ढकने का जो कार्य अमेरिका ने किया है वह विश्व पटल पर अमेरिका के झूठ, छद्म व उसकी खतरनाक नीतियों की कलई खोलकर रख देता है। उत्तरी कोरिया ने अमेरिकी रणनीतियों को पहचान लिया था, जिससे बचने हेतु उसने स्वयं को एक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया परन्तु ईरान ऐसा नहीं कर सका। अब अमेरिका का विशेष ध्यान ईरान पर है। इसी कारण पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब और इराक आदि में अमेरिकी सेना की उपस्थिति को बनाये रखा गया है।

-डा0 विकास कुमार
मोबाइल: 09888565040

हिंसा और उपभोक्तावाद के दौर में सूफियों की प्रासंगिकता (अंतिम भाग)

आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि में आमतौर पर रहस्यवादी दर्शन को सृजनात्मक नहीं माना जाता। उसे जीवन के यथार्थ को अनदेखा कर एक वायवी संसार में पलायन करने का रास्ता माना जाता है। लेकिन मनुष्य के मन को उदारता, प्रेम और समता की भावभूमि की ओर उन्मुख और प्रेरित करने के लिए रहस्यवादी प्रवृत्ति आधुनिक मनुष्य के काम की हो सकती है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने सूफियों के बारे में लिखा है: ‘‘हमारे देश के भक्तों और संतों की भाँति सूफी साधकों ने भी इसी अंतरतम के प्रेम पर आश्रित भाव-जगत की साधना को अपनाया है। यह साधना जितनी ही मनोरम है उतनी ही गंभीर भी। हमारे देश के अनेक सूफी कवियों ने इस प्रेम साधना को अपने काव्यों का प्रधान स्वर बनाया है। मलिक मुहम्मद जायसी का ‘पदमावत’ इस प्रेम साधना का एक अनुपम काव्य है। साधक के हृदय में जब प्रेम का उदय होता है तब सांसारिक वस्तुएँ उसके लिए तुच्छ हो जाती हैं, लेकिन संसार के जीवों के लिए उसका हृदय दया और प्रेम से परिपूर्ण रहता है। दूसरों के कष्ट का निवारण करने के लिए वह सब प्रकार से प्रयत्नशील रहता है और उसके लिए सभी प्रकार के कष्टों का स्वागत करता है। छोटे से छोटे से प्राणी लेकर बड़े से बड़े प्राणी तक उसकी दृष्टि में अपना महत्व रखते हैं। चूँकि सर्वत्र सभी प्राणियों में वे परमात्मा के दर्शन करते हैं अतः उन्हें सुख पहुँचा कर वे परम सुखी होते हैं। उनके लिए सब प्रकार का त्याग करने के लिए वे प्रस्तुत रहते हैं। बायजीद ने कहा है कि परमात्मा जिससे प्रेम करता है उसे तीन गुणों से विभूषित करता है - ‘‘उसमें समुद्र जैसी उदारता, सूर्य की तरह पर दुख का तरता और पृथ्वी की तरह विनम्रता पाई जाती है।’’
सूफी दार्शनिकों और साधकों के अलावा सूफी साहित्यकारों की भी कट्टरता के बरक्स उदारता के विस्तार में अहम भूमिका रही है। यूँ तो दुनिया का ज्यादातर श्रेष्ठ साहित्य मनुष्य के हृदय में निहित प्रेम, उदारता और परदुखकातरता की अनंत संभावनाओं के प्रकाशन का ही उद्यम है, लेकिन सूफियों का प्रेम काव्य इस मायने में अपनी अलग महत्ता और सार्थकता रखता है। अपनी लोकसंवेदना के चलते वह आम जीवन के ज्यादा नजदीक आता है। सूफी प्रेम काव्यों में लोक भाषा में लोक कथाओं को आधार बना कर लोकरंजन किया गया है। सांप्रदायिक और बाजारवादी कट्टरता दोनों मिल कर प्रेम और उदारता से संवलित सूफी साहित्य की संवेदना का अवमूल्यन करती हैं। आधुनिकतावादी और उसी की एक अभिव्यक्ति (मेनीफेस्टेशन) प्रगतिवादी बुद्धि की अपनी कट्टरताएँ जगजाहिर हैं। वह समस्त मध्ययुगीनता को अंधकार और बर्बरता का पर्याय मान कर चलती है। उसके मुताबिक आधुनिक युग से पूर्व मानव सभ्यता में कुछ भी ऐसा सारगर्भित नहीं हुआ है जिसे आज की विचारणा में केंद्रीय स्थान दिया जा सके। यह दरअसल बाजार की धुरी पर चढ़ी हुई बुद्धि है जो स्वतंत्रता के छद्म दावे में जीती है। मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पदमावत’ में एक प्रसंग काबिलेगौर है, जिसे हमने अन्यत्र भी उद्धृत किया है। चित्तौड़गढ़ के व्यापारियों का एक काफिला व्यापार करने के लिए सिंहलद्वीप की यात्रा पर निकलता है। उनके साथ थोड़ा-बहुत कर्ज लेकर एक गरीब ब्राह्मण भी व्यापार की लालसा में चल देता है। जायसी ने व्यापार स्थल पर लगे बाजार की विशालता और भव्यता का चित्रण किया है जहाँ लाखों-करोड़ों में वस्तुएँ बिकती हैं। व्यापारी अपना-अपना व्यापार करते हैं लेकिन थोड़ी-सी पूँजी लेकर आया ब्राह्मण उस बाजार में कुछ भी खरीद नहीं पाता। व्यापारी लौटने लगते हैं। ब्राह्मण निराशा से भर जाता है। तभी बाजार के एक कोने में उसकी नजर पिंजड़े में बंद एक तोते पर पड़ती है जिसे व्याध वहाँ बेचने के लिए ले आया है। ब्राह्मण तोते से वार्तालाप करता है। उससे पूछता है कि वह गुणी पंडित है या केवल छूँछा है। अगर पंडित है तो ज्ञान की बात बता। तोता पीड़ा से भर कर कहता है कि हे ब्राह्मण मैं तभी तक गुणी और ज्ञानी था जब तक इस पिंजड़े में कैद नहीं हुआ था। अब तो मैं पिंजड़े में कैद हूँ और बाजार में बिकने के लिए चढ़ा दिया गया हूँ। ऐसी स्थिति में अपना सारा ज्ञान भूल गया हूँ। जायसी तोते की मर्मांतक वेदना को इस तरह व्यक्त करते हैं: ‘‘पंडित होई सो हाट न चढ़ा। चहउँ बिकाई भूलि गा पढ़ा।।’’ अर्थात जो ज्ञानी होता है वह बाजार में नहीं चढ़ता। मैं तो बिक रहा हूँ लिहाजा सब पढ़ाई भूल गया हूँ।
बाजार और विचार का द्वंद्व हमेशा से चला आ रहा है। इस प्रसंग में जायसी ने मध्यकालीन बुद्धिजीवी की बाजार के हाथों बिकने की वेदना को अभिव्यक्ति दी है। यानी वे बताते हैं कि पंडित, ज्ञानी या बुद्धिजीवी वही है जो बाजार की ताकत से स्वतंत्र है। आज हम देखते हैं कि दुनिया का ज्यादातर बौद्धिक कर्म बाजारवाद की सेवा में लगा हुआ है और बुद्धिजीवियों को इसकी कोई पीड़ा नहीं है। बल्कि वे अपनी बुद्धि को बाजार की सेवा में लगाने को आतुर नजर आते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा बाजार लूटा जा सके। अध्यापक से लेकर आध्यात्मिक गुरु तक बाजारवाद की ताल पर नाचते नजर आते हैं। सिद्धांतकारों और साहित्यकारों-कलाकारों का भी वही हाल है। बुद्धिजीवियों के मार्फत दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने वाले बाजारवाद के प्रतिरोध की चेतना सूफी वाड्।मय में मिलती है। साहित्य के नित नए पाठ के आग्रहियों को इस तरफ भी थोड़ा ध्यान देना चाहिए।

-डॉक्टर प्रेम सिंह
(समाप्त)
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून २०१० अंक में प्रकाशित

बृहस्पतिवार, 17 जून 2010

हिंसा और उपभोक्तावाद के दौर में सूफियों की प्रासंगिकता

मौजूदा दौर में सहिष्णुता, उदारता और आपसी सौहार्द के ऊपर असहिष्णुता, कट्टरता और बदले की भावना का ज्यादा बोलबाला है। केवल कट्टरतावादी शक्तियों का ही वैसा बर्ताव नहीं है, उनके मुकाबले में उभरी प्रतिरोध की शक्तियाँ भी अक्सर असहिष्णुता, कट्टरता और वैमनस्य से परिचालित होती हैं। दुनिया और भारत दोनों के स्तर पर यह परिघटना देखी जा सकती है। आधुनिक सभ्यता के इस दौर में हृदय के प्रेम के लिए कोई स्थान नहीं छोड़ा गया है। यह मानते हुए कि वे सब सामंती युग की भाववादी धारणाएँ हैं। जबकि हृदय के प्रेम को भक्तिकालीन कवियों ने जीवन के केंद्र में स्थापित करने का अनूठा और अभूतपूर्व उद्यम किया था। या तो हम यह कहें कि भक्तिकालीन कवियों का वह उद्यम निरर्थक था या आज के युग की समस्याओं और चुनौतियों के लिए उसकी सार्थकता स्वीकार करें। हमें लगता है कि भक्तिकाल की एक धारा के वाहक सूफी कवियों और दार्शनिकों के प्रेम, त्याग, अपरिग्रह और भाईचारे के जीवन दर्शन का स्मरण करना प्रासंगिक है। समता, स्वतंत्रता और बंधुता के आधुनिक विचारों को मध्यकालीन सूफी साधकों, संतों और साहित्यकारों के दर्शन से काफी सहायता मिल सकती है। दरअसल अब हमें यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि मानव मुक्ति के मध्यकालीन रचनात्मक, साधनागत और दार्शनिक उद्यम से कट कर मानव मुक्ति की आधुनिक अवधारणाएँ और प्रयास सफल नहीं हो सकते। अब उस बुद्धि से निजात पाने का समय आ गया है जो मध्यकालीनता और आधुनिकता के बीच ‘वाटर टाइट’ विभेद करती है। उस बुद्धि पर भी पुनर्विचार की जरूरत है जिसके तहत माना जाता है कि विभिन्न धर्मों में पाई जाने वाली उदारता की धारा आधुनिक मनुष्य के लिए किसी काम की नहीं है। आखिर उसी उदारता की धारा के बूते आधुनिकता-पूर्व की मानव सभ्यता ने अपने को कट्टरता के आक्रमणों से बचाया है। बल्कि वह पैदा और विकसित ही कट्टरता के बरक्स हुई है और उसने मानव मुक्ति के नए क्षितिज उद्घाटित किए हैं। आधुनिक सेकुलरवादी विमर्श में धर्म की उदारतावादी धाराओं को समुचित जगह देने से न केवल संप्रदायवादी ताकतों के प्रभाव को काटा जा सकता है, उपभोक्तावादी-बाजारवादी ताकतों का मुकाबला करने के लिए भी वहाँ से पर्याप्त सामग्री पायी जा सकती है। ऐसा न करने पर धर्म और बाजार के नाम पर चलाया जा रहा कट्टरतावादी अभियान मानव सभ्यता के इतिहास में उपलब्ध उदारता की अंतर्वस्तु को या तो विनष्ट कर देगा या उसे कट्टरता की झोली में समेट लेगा।
दुनिया के सभी धर्मों में कमोबेश रहस्यवाद की प्रवृत्ति पाई जाती है। रहस्यवादी प्रवृत्ति धर्म से जुड़ी होकर भी धर्म के संस्थानीकृत रूप के विरोध में पैदा होती है। वह प्रत्येक व्यक्ति की आध्यात्मिक-दार्शनिक जिज्ञासा के स्वाभाविक एवं लोकतांत्रिक अधिकार को बनाए रखने की दृष्टि से जुड़ी होती है। वह धर्म और जीवन में पाखंड और भोगवाद की विरोधी प्रवृत्ति है। रहस्यवादी साधक अनुभव करता है कि संपूर्ण जागतिक व्यापार परम सत्ता से पैदा होकर उसी में विलीन होता रहता है। अव्यक्त परम सत्ता जो, प्रकृति के कण-कण में व्याप्त और व्यक्त है, रहस्यवादी उसे जानने की उत्कट जिज्ञासा और व्यग्रता से निरंतर भरा रहता है। वह मानता है कि परम सत्ता को जागतिक बुद्धि से नहीं, आंतरिक साधना से जाना जा सकता है। आंतरिक साधना में वह सबसे ज्यादा प्रेम की अनुभूति पर बल देता है। इस तरह प्रेम की साधना ही रहस्यवादी साधक की सच्ची साधना है। रहस्यवादी मानते हैं कि प्रेम की साधना का मार्ग आसान नहीं होता। उसमें अपने अहम् का पूर्ण विसर्जन करना होता है। इस तरह परमात्मा से जो अंतरंगता स्थापित होती है उसका प्रसार समस्त प्राणियों तक होता है। उसमें कोई भी अलग या पराया नहीं रह जाता। प्रेम की भावावस्था में स्थित हो, संपूर्ण सृष्टि से एकत्व ही रहस्यवादी साधक का चरम लक्ष्य होता है।
रहस्यवादी प्रवृत्ति के संदर्भ में इस्लाम धर्म भी अपवाद नहीं है। माना जाता है कि पैगंबर हजरत मोहम्मद के समय से ही इस्लाम में रहस्यवादी स्वर मुखरित होने लगे थे। इस्लाम धर्म के रहस्यवादी सूफी कहलाए। वे पैगंबर, कुरआन और हदीस के वचनों को मानते हैं लेकिन अपनी साधना में इस विश्वास से परिचालित होते हैं कि धर्म बाह्याचार का नहीं, आंतरिक अनुभूति का विषय होता है। आमतौर पर अपने सिद्धांतों को वे कुरआन और हदीस के हवाले से पुष्ट करते हैं लेकिन जहाँ तालमेल नहीं बैठ पाता वहाँ अपनी अलग व्याख्या भी देते हैं। अपने उदार दृष्टिकोण के चलते वे मानते हैं कि कुरआन की विभिन्न तरह से व्याख्या की जा सकती है। उन्होंने अपनी अंतःप्रेरणा से कई बार हदीसों की सृष्टि भी की है। उदार दृष्टिकोण के चलते कई बार सूफियों को कट्टरपंथियों के कोप का भाजन बनना पड़ा है और जान से भी हाथ धोना पड़ा है। परमात्मा को प्रेम स्वरूप मानते हुए हृदय से परमात्मा के प्रति प्रेम को ही वे धार्मिक आचरण की कसौटी मानते हैं। उनके मुताबिक हज करने का महत्व तभी है जब साधक पग-पग पर हृदय की उदात्तता और पवित्रता अर्जित करता चले; उसके हृदय में परमात्मा और उसकी सृष्टि के प्रति प्रेम का उद्रेक होता चले। सूफी साधक अल शिवली इस विषय में कहते हैं: ‘‘प्रेम प्रज्वलित अग्नि के समान है जो परम प्रियतम की इच्छा के सिवा हृदय की समस्त वस्तुओं को जला कर खाक कर डालता है।’’ अधिकांशतः सूफी, पैगंबर और इस्लाम धर्म के सिद्धांतों के प्रति आस्था प्रकट करते हैं और धार्मिक नियम-कायदों का पालन करते हैं। लेकिन अंतिम कसौटी अपने अंतर की प्रेरणा को ही स्वीकार करते हैं। धर्म में व्याप्त पाखंड और कट्टरता से आजिज आकर कभी-कभार कर्मकांड पर तीखा प्रहार भी करते हैं। सूफी साधकों की विद्रोही उक्तियों का आगे चल कर फारसी और उर्दू के शायरों पर खासा प्रभाव देखा जा सकता है। लेकिन सूफी साधकों की यह विशेषता है कि वे खंडन-मंडन में न लग कर अपने धार्मिक आचरण में प्रेम और उदारता की प्रतिष्ठा में ही संलग्न रहते हैं। यह अलग विषय है कि सूफी खुद कई संप्रदायों में विभक्त रहे हैं और सूफीवाद का पाखंड भी पर्याप्त प्रचलन में रहा है जो आज भी जारी है।

-प्रेम सिंह
(क्रमश:)

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून २०१० अंक में प्रकाशित

बुधवार, 16 जून 2010

हिंदी ब्लॉगिंग की दृष्टि से सार्थक रहा वर्ष-2009- अंतिम भाग

इसी प्रकार वर्ष-2009 में मेरी दृष्टि कई अजीबो-गरीब पोस्ट पर गई मसलन -एक हिंदुस्तानी की डायरी में 10 फरवरी को प्रकाशित पोस्ट -हिंदी में साहित्यकार बनते नहीं, बनाए जाते हैं। प्रत्यक्षा पर 26 मार्च को प्रकाशित पोस्ट -तैमूर तुम्हारा घोड़ा किधर है? विनय पत्रिका में 27 मार्च को प्रकाशित बहुत कठिन है अकेले रहना। निर्मल आनंद पर 05 फरवरी को प्रकाशित आदमी के पास आँत नहीं है क्या? छुट-पुट पर 02 जुलाई को प्रकाशित पोस्ट -इंटरनेट (अन्तरजाल) का प्रयोग मौलिक अधिकार है। सामयिकी पर 09 जनवरी को प्रकाशित आलेख, जमाना स्ट्राइसैंड प्रभाव का आदि।
ये सभी पोस्ट शीर्षक की दृष्टि से ही केवल अचंभित नहीं करते बल्कि विचारों की गहराई में डूबने को विवश भी करते हैं। कई आलेख तो ऐसे हैं जो गंभीर विमर्श को जन्म देने की गुंजाइश रखते हैं।
इस बात का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है, कि वर्ष -2007 में हिन्दी ब्लॉग की संख्या लगभग पौने चार हजार के आस-पास थी जबकि महज दो वर्षों के भीतर चिट्ठाजगत के आँकड़ों के अनुसार सक्रिय हिन्दी चिट्ठों की संख्या ग्यारह हजार के पार हो चुकी है। वर्ष- 2009 में कानपुर से टोरंटो तक इलाहाबाद से न्यू जर्सी तक मुम्बई से लन्दन तक और भोपाल से दुबई तक हिन्दी चिट्ठाकारी का धमाल छाया रहा। कहीं हिन्दी की अस्मिता का सवाल तो कहीं आता रहा हिन्दी के नाम पर भूचाल, इसमें शामिल रहे कहीं कवि, कहीं कवयित्री, कहीं गीतकार, कहीं कथाकार, कहीं पत्रकार तो कहीं शायर और शायरा और उनके माध्यम से होता रहा हिन्दी का व्यापक और विस्तृत दायरा।
कहीं चिटठा चर्चा करते दिखे अनूप शुक्ल तो कहीं उड़न तश्तरी पर सवार होकर ब्लॉग भ्रमण करते दिखे समीर लाल जैसे पुराने और चर्चित ब्लाॅगर। कहीं सादगी के साथ अलख जगाते दिखे ज्ञान दत्त पांडे तो कहीं शब्दों के माया जाल में उलझाते रहे अजित वाडनेकर तो कहीं हिन्दी के उत्थान के लिए सारथी का शंखनाद तो कहीं और मुहल्ला भड़ास का जिंदाबाद कारवाँ चलता रहा, लोग शामिल होते रहे और बढ़ता रहा दायरा हिन्दी का कदम-दर कदम।
इस कारवाँ में शामिल रहे उदय प्रकाश, विष्णु नागर, विरेन डंगवाल, लाल्टू, बोधिसत्व और सूरज प्रकाश जैसे वरिष्ठ साहित्यकार तो दूसरी तरफ पुण्य प्रसून बाजपेयी और रबिश कुमार जैसे वरिष्ठ पत्रकार। कहीं मजबूत स्तंभ की मानिंद खड़े दिखे मनोज बाजपेयी जैसे फिल्मकार तो कहीं आलोक पुराणिक जैसे अगड़म-बगड़म शैली के रचनाकार कहीं दीपक भारतदीप का प्रखर चिंतन दिखा तो कहीं सुरेश चिपलूनकर का महाजाल, कहीं रेडियो वाणी का गाना तो कहीं कबाड़खाना
तमाम समानताओं के बावजूद उड़न तश्तरी का पलड़ा भारी दिखा वह था मानसिक हलचल के मुकाबले उड़न तश्तरी पर ज्यादा टिप्पणी आना और मानसिक हलचल के मुकाबले उड़न तश्तरी के द्वारा सर्वाधिक चिट्ठों पर टिप्पणी देना । इस प्रकार सक्रियता में अग्रणी रहे श्री समीर लाल जी और सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी चिट्ठाकारी में अपनी उद्देश्यपूर्ण भागीदारी में अग्रणी दिखे श्री ज्ञान दत्त पांडे जी। रचनात्मक आन्दोलन के पुरोधा रहे श्री रवि रतलामी जी, जबकि सकारात्मक लेखन के साथ-साथ हिन्दी के प्रसार-प्रचार में अग्रणी दिखे श्री शास्त्री जे0सी0 फिलिप जी। विधि सलाह में अग्रणी रहे श्री दिनेश राय द्विवेदी जी और तकनीकी सलाह में अग्रणी रहे श्री उन्मुक्त जी। वहीं श्रद्धेय अनूप शुक्ल समकालीन चर्चा में अग्रणी दिखे और श्री दीपक भारतदीप गंभीर चिंतन में। इसीप्रकार श्री राकेश खंडेलवाल जी कविता-गीत-गज़ल में अग्रणी दिखे।
महिला चिट्ठाकारों के विश्लेषण के आधार पर हम जिन नतीजों पर पहुँचे हैं उसके अनुसार कविता में अग्रणी रहीं रंजना उर्फ रंजू भाटिया, वहीं कथा-कहानी में अग्रणी रहीं निर्मला कपिला, ज्योतिषीय परामर्श में अग्रणी रहीं संगीता पुरी, वहीं व्यावहारिक वार्तालाप में अग्रणी रहीं ममता। समकालीन सोच में घुघूती बासूती और गंभीर काव्य चिंतन में अग्रणी दिखी आशा जोगलेकर। सांस्कृतिक जागरूकता में अग्रणी दिखी अल्पना वर्मा, वहीं समकालीन सृजन में अग्रणी रहीं प्रत्यक्षा। इसी प्रकार कविता वाचकनवी, सांस्कृतिक दर्शन में अग्रणी रहीं।
हिन्दी ब्लाॅगिंग के सात आश्चर्य यानी वर्ष के सात अद्भुत चिट्ठे । इसमें कोई संदेह नहीं कि संगणित भूमंडल की अद्भुत सृष्टि हैं चिट्ठे। यदि हिन्दी चिट्ठों की बात की जाय तो आज का हिन्दी चिटठा अति संवेदनात्मक दौर में है, जहाँ नित नए प्रयोग भी जारी हैं। मसलन समूह ब्लाग का चलन ज्यादा हो गया है। ब्लाॅगिंग कमाई का जरिया भी बन गया है। लिखने की मर्यादा पर भी सवाल उठाए जाने लगे हैं। ब्लाॅग लेखन को एक समानान्तर मीडिया का दर्जा भी हासिल हो गया है। हिंदी साहित्य के अलावा विविध विषयों पर विशेषज्ञ की हैसियत से भी ब्लाॅग रचे जा रहे हैं। विज्ञान, सूचना तकनीक, स्वास्थ्य और राजनीति वगैरह कुछ भी अछूता नहीं है। समस्त प्रकार के विश्लेषणों के उपरांत वर्ष के सात अद्भुत चिट्ठों के चयन में केवल दो व्यक्तिगत चिट्ठे ही शामिल हो पा रहे थे जबकि पाँच कम्युनिटी ब्लॉग थे, ऐसे में उन पाँच कम्युनिटी ब्लॉग को अलग रखने के बाद वर्ष-2009 के सात अद्भुत हिन्दी चिट्ठों की स्थिति बनी हंै वे इस प्रकार हैं-ताऊ-डौंट-इन (रामपुरिया का हरयाणवी ताऊनामा), हिन्दी ब्लॉग टिप्स, रेडियो वाणी, शब्दों का सफर, सच्चा शरणम्, महाजाल पर सुरेश चिपलूनकर और कल्पतरु
अब आइए उन चिट्ठाकारों की बात करते हैं, जिनका अवदान हिन्दी चिट्ठाकारी में अहम् है और वर्ष -2009 में अपनी खास विशेषताओं के कारण लगातार चर्चा में रहे हैं। साहित्यिक-सांस्कृतिक -सामाजिक-विज्ञान-कला-अध्यात्म और सद्भावनात्मक लेखन में अपनी खास शैली के लिए प्रसिद्ध चिट्ठाकारों में लोकप्रिय एक-एक चिट्ठाकार का चयन किया गया है । इस विश्लेषण के अंतर्गत जिन सात चिट्ठाकारों का चयन किया गया है ,उसमें भाषा-कथ्य और शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट लेखन के लिए श्री प्रमोद सिंह (चिट्ठा-अजदक), व्यंग्य लेखन के लिए श्री अविनाश वाचस्पति (चिट्ठा-की बोर्ड का खटरागी), लोक-कला संस्कृति के लिए श्री विमल वर्मा ( चिटठा- ठुमरी), सामाजिक जागरूकता से संबंधित लेखन के लिए श्री प्रवीण त्रिवेदी (चिटठा- प्राइमरी का मास्टर), विज्ञान के लिए श्री अरविन्द मिश्र (चिटठा-साईं ब्लॉग), अभिकल्पना और वेब-अनुप्रयोगों के हिन्दीकरण के लिए श्री संजय बेगाणी (चिटठा-जोग लिखी) और सदभावनात्मक लेखन के लिए श्री महेंद्र मिश्रा ( चिट्ठा - समयचक्र) का उल्लेख किया जाना प्रासंगिक प्रतीत हो रहा है। उल्लेखनीय है कि ये सातों चिट्ठाकार केवल चिट्ठा से ही नहीं अपने-अपने क्षेत्र में सार्थक गतिविधियों के लिए भी जाने जाते हैं और कई मायनों में अनेक चिट्ठाकारों के लिए प्रेरक की भूमिका निभाते हैं । विदेशों में रहने वाले हिंदी चिट्ठाकार इस दृष्टि से अति महत्वपूर्ण है कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि हिन्दी ब्लागिंग के उन्नयन की दिशा में सार्थक रहा वर्ष 2009.

-रवीन्द्र प्रभात
(समाप्त)

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून-2010 अंक में प्रकाशित