बृहस्पतिवार, 30 सितम्बर 2010

माननीय उच्च न्यायलय के फैसले का सम्मान करें

(हिंसा करने से पहले हमारी तरफ देखें, हम आपके हैं )
बाबरी मस्जिद प्रकरण पर माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ ने अपना फैसला दे दिया। भारत एक लोकतान्त्रिक देश है। सहमति और असहमति प्रत्येक नागरिक का अधिकार है। असहमति वाले लोगों के लिए द्वार माननीय उच्चतम न्यायलय के लिए खुले हैं लेकिन जब किसी भी विवादस्पद मामले में न्याय पाने के लिए जब हम न्यायलय पहुँचते हैं तो उसके फैसले का सम्मान करना हम सभी नागरिको का कर्तव्य है लेकिन कुछ वर्षों से शरारती व अलोकतांत्रिक तरीकों का उपयोग करके हिंसा फ़ैलाने का काम भी जारी रहा है। जब हम हिंसा का प्रयोग करने लगते हैं, तब देश की एकता और अखंडता को निश्चित रूप से चाहे अनचाहे चोट पहुंचाते हैं।
हमारे देश में भाषा, जाति, प्रान्त, धर्म, सम्प्रदाय के सवाल उठा कर देश को कमजोर करने का कार्य सदियों से जारी रहा है। इसी प्रकरण के सवाल पर सैकड़ों करोडो रुपये फैसला सुनाने के नाम पर व कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिए खर्च किये जा चुके हैं, जब इस खर्चे का फ़ाइनल हिसाब-किताब आएगा तो उसमें भी घोटाले नजर आयेंगे लेकिन हमारे आपके बीच में अब यह फैसला होना है कि हम कितनी मजबूती से अपनी सांप्रदायिक एकता व सद्भाव को बचाए व बनाये रखते हें।
आइये हम आप मिलकर फैसले का सम्मान करें -

चाहे अल्लाहू कहो , चाहे जय श्री राम !
प्यार फैलना चाहिए , जब लें रब का नाम !!

मस्जिद - मंदिर तो हुए , पत्थर से ता'मीर !
इंसां का दिल : राम की , अल्लाह् की जागीर !!

- राजेन्द्र स्वर्णकार

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 29 सितम्बर 2010

सांप सांप्रदायिक भी नहीं होता प्रभात- और हम धर्म के नाम पर नीले हो गए हैं - रवीन्द्र प्रभात

परिंदों में फिरकापरस्ती क्यों नहीं होती-
कभी मंदिर पर जा बैठे कभी मस्जिद पर जा बैठे
माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ का फैसला बाबरी मस्जिद प्रकरण पर आगामी 30 सितम्बर को आने जा रहा है। समाज में कुछ तत्वों द्वारा तरह-तरह की अफवाहें उड़ा कर धर्म के नाम पर जहर फैलाया जा रहा है। कोई भी धर्म हिंसा करने की बात नहीं करता है किन्तु उसके प्रचारकगण तरह-तरह से अपने बाहुबल प्रदर्शन करने का प्रयोग धर्म के नाम पर करने लगते हैं। माननीय उच्च न्यायलय का फैसला अन्य फैसलों की तरह एक फैसला ही है, लेकिन जिस तरह से तैयारियां की जा रही हैं। उससे यह लगता है कि न्यायलय का यह फैसला सामान्य प्रक्रिया का अंग नहीं है। दोनों पक्षों को चाहिए की न्यायलय के फैसले का सम्मान करें। असहमत होने पर न्यायिक प्रक्रिया को अपनाये अन्यथा जरा सा भी हो-हंगामा धर्म को बदनाम ही करेगा।
धर्म का अर्थ है धारण करने योग्य। काल और परिस्तिथियों के अनुसार जो भी चीजें मानव जाति या सम्पूर्ण जगत को बचाए बनाये रखने में सहायक होती हैं, वही धर्म है। धर्म के प्रचारकों ने अगर धर्म के आधार पर लोगों के मन में घृणा, राग, द्वेष पैदा करते हैं, वह धर्म नहीं हो सकता है। हमने जाति, लिंग, नस्ल, धर्म के आधार पर इंसानी रिश्तों को मानवीय संवेदनाओ को कलंकित करने का कार्य करते हैं तो वहीँ से हम पूरी मानव सभ्यता के साथ खिलवाड़ करते हैं।
आइये हम सब मिलकर और उन्नति शील भारत के निर्माण के लिए सभी जातियों, सभी धर्मों को एकता के सूत्र में बाँधते हुए माननीय उच्च न्यायलय के फैसले का स्वागत करें, सम्मान करें
आज जरूरत इस बात की है कि रवीन्द्र प्रभात जी की इन पंक्तियों को सार्थक होने दें


सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 28 सितम्बर 2010

उत्तर प्रदेश में पंचायती चुनाव ने प्रत्याशियों की हत्याओं का दौर शुरू

प्रदेश में पंचायत चुनाव प्रारंभ होते ही हिंसा का दौर शुरू हो गयाबाराबंकी शहर से सटी हुई ग्राम पंचायत बडेल में क्षेत्र पंचायत सदस्य के प्रत्याशी जयवीर भदौरिया तथा प्रधान पद के प्रत्याशी जितेन्द्र मिश्रा की गोली मार कर हत्या कर दी गयीपुलिस ने इन पदों पर लड़ रहे प्रत्याशी सरोज सिंह राजेश उर्फ़ राजू प्रधान की नामजदगी आने के पश्चात आनन-फानन में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया
इस घटना का विवरण इस प्रकार है कि दोनों मृतक प्रत्याशी सदस्य क्षेत्र पंचायत के प्रत्याशी सरोज सिंह के घर रात को 11 बजे बातचीत के लिए गए थे लगभग रात्रि 12 बजे के बाद घर से निकलते ही प्रत्याशियों की ताबड़तोड़ गोलियां चला कर हत्या कर दी जाती हैइस हत्याकांड के चलते एक पक्ष की मृत्यु हो गयी और दूसरा पक्ष कारागार पहुँच गयासरोज सिंह क्षेत्र समीति बंकी के भी प्रमुख पद के दावेदार थे और इस हत्याकांड से प्रमुख पद के कई प्रत्याशियों को भी लाभ था जिसकी तरफ पुलिस ने ध्यान देने की जरूरत नहीं महसूस कीअपराधिक मनोविज्ञान के हिसाब से कोई भी आदमी अपने घर के सामने हत्या जैसे जघन्य अपराध को करने से बचता है जबकि वह चुनाव में प्रत्याशी हो
इसके पूर्व भी जिला पंचायत के चुनाव में हरदेव रावत पूर्व विधायक की हत्या कर दी गयी थी और हत्या का उद्देश्य भी राजनीतिक थाचुनाव में सरकारी तंत्र निष्पक्ष चुनाव करने के नाम पर विभिन्न प्रकार से भय का वातावरण पैदा करता है और आदेश इस तरह से जारी होते हैं कि मतदान के समय यदि किसी ने हिंसा करने की कोशिश की तो देखते ही गोली मार देने का आदेश, वाहन चेकिंग के नाम पर विरोधी प्रत्याशियों के वाहन को बंद करना भी मुख्य कार्य होता हैप्रशाशन के कृपापात्र प्रत्याशी चाहे जो कुछ करें उनके लिए कोई चुनाव आयोग के नियम कानून लागू नहीं होते हैं लेकिन कुछ प्रत्याशियों को हराने के लिए सभी नियम कानून पालन कराये जाते हैं जिससे मजबूर होकर भी हिंसा पनपती है
जिला पंचायतों के चुनाव में सत्तारूढ़ दल का ही मुख्य मामला होता है उसी के इशारे पर प्रत्याशियों की हार और जीत होती हैसमाजवादी पार्टी के समय में हारे हुए प्रत्याशी को जिला पंचायत सदस्य के जीतने का प्रमाण पत्र जारी किया गया थाप्रमुख जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में पकड़-धकड़, खरीद-फरोख्त का बाजार लगता ही रहता हैलोकतंत्र में इसको रोकने की कोई व्यवस्था नहीं है
जनपद में चुनाव चल रहे हैं वहीँ पर जिला पंचायत अध्यक्ष के निर्वाचन क्षेत्र में जगह-जगह निर्माण कार्य जिला पंचायत द्वारा कराये जा रहे हैंउत्तर प्रदेश निर्वाचन आयोग (पंचायत) तथा जिले के अधिकारीयों में यह दम नहीं है कि जिला पंचायत द्वारा चुनाव के दौरान कराये जा रहे कार्यों को रोक सके अधिकारी और विशेष कर पुलिस विभाग सत्तारूढ़ दल के प्रत्याशियों को तरह-तरह के हथकंडे अपना कर लाभ पहुंचता हैजनपद में राम नगर के कुछ प्रत्याशियों को सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं के इशारे पर अज्ञात चोरी के मुकदमें में गिरफ्तार कर पिटाई की जाती है और फिर मैनेजमेंट के अनुसार जब उनका चालान न्यायलय आता है तो उनको मार डालने के लिए अधिवक्ताओं का एक उग्र समूह न्यायलय परिसर में जमकर पुन: पिटाई की जाती है। एक खास बात यह भी है पंचायत चुनाव में कोई भी राजनीतिक दल खुल कर हिस्सा भी नहीं ले रहा है लेकिन सत्ता रूढ़ दल द्वारा गाँव-गाँव चयनित प्रत्याशियों को शासन-प्रशासन मदद कर रहा है मुख्य समस्या यह भी है कि निष्पक्ष चुनाव कैसे हों और हिंसा पक्षपातपूर्ण रवैये के कारण ही पैदा होती है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 27 सितम्बर 2010

दलित उत्पीड़न-झज्जर, गोहाना और अब मिर्चपुर भाग 1

उत्पीड़न और मानवाधिकार हनन के मामले में उत्तर भारत के राज्यों में होड़ सी लगी हुई है। मानवाधिकार हनन के मामले में उत्तर प्रदेश पहले स्थान पर है, तो दलितों के सामूहिक उत्पीड़न के मामलों में हरियाणा सबसे आगे खड़ा दिखाई देता है। हालाँकि हरियाणा में दलितों के सामूहिक उत्पीड़न की घटनाओं का इतिहास पुराना है। जो विकास के तमाम पैमाने छूने के बावजूद कहीं से भी धीमा नहीं पड़ा है। हाल में सामूहिक उत्पीड़न की घटना 21 अप्रैल को हिसार के नारनौंद के समीपवर्ती गाँव मिर्चपुर में सामने आईं। जहाँ वाल्मीकि समुदाय के घरों को जाट समुदाय के दबंगों ने मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी। जिसमें 12 वीं की छात्रा सहित और उसके पिता की मौत हो गई।
गौरतलब है कि यह घटना 21वीं सदी के भारत के उस राज्य में हुई है, जिसने विकास के कथित पैमानों को छुआ है। जिसने हरितक्रांति के जरिए देश की उत्पादकता बढ़ाने में हिस्सेदारी निभाई है। लेकिन अफसोस की बात है कि हरित क्रांति जातीय दुराग्रह को तोड़ने की क्रांति नहीं कर पाई है। आर्थिक विकास के पैमाने में हरियाणा दूसरे राज्यों के मुकाबले ऊपरी क्रम में आता है, बावजूद इसके सामाजिक अपराधों के मामले में कहीं भी कोई सकारात्मक बदलाव नजर नहीं आता है। चाहे मामला खाप पंचायतों के जरिए गैर-तार्किक और मध्ययुगीन फरमान सुनाने का हो या दलितों के साथ जातीय दुराग्रह का, हरियाणा की हालत चिंताजनक है। अगर हरियाणा में दलित उत्पीडन की बड़ी घटनाओं पर गौर करें तो मिर्चपुर में दलित बस्ती पर सामूहिक हमलाकर घर जलाने की घटना कोई अकेली घटना नहीं है। बल्कि महज बीते दस साल का रिकॉर्ड देखें तो 21 वीं सदी के पहले दशक में ही इतनी घटनाएँ सामने आईं हैं, कि लोकतंत्र और सामाजिक न्याय दोनों शर्मसार हो जाएँ। 15 अक्टूबर साल 2002 में झज्जर जिले के दुलीना में पाँच दलितों को मार दिया गया। 15 फरवरी 2003 को कैथल जिले के हरसौला गाँव में 50 दलित घरों को आग के हवाले कर दिया गया। 31 अगस्त 2005 को गोहाना में 14 दलित घरों को आग लगा दी गई। 12 मार्च 2007 को करनाल के सालवाल गाँव में 16 दलित परिवारों को निशाना बनाया गया और उनके घरों को आग लगा दी गई। इसके अलावा रोहतक में राकेश लारा नामक दलित युवक की निर्मम हत्या हरियाणा में दलित उत्पीड़न की बड़ी-बड़ी घटनाएँ हैं। जबकि दलित उत्पीड़न की सैकड़ों वारदातें जो रोज-ब-रोज सामने आती हैं, उनकी गणना ही मुश्किल है।
हरियाणा के मिर्चपुर की घटना के पीछे के कारणों पर गौर करें तो जातीय वैमनस्य ही सबसे बड़ा कारण रहा। पालतू कुतिया को ईंट मारने जैसे मामूली विवाद को लेकर जाट समुदाय के दबंगों ने बाल्मीकि गाँव को घेर कर उसमें आग लगा दी। जिसमें 25 घर खाक हो गए और दो लोगों की जानें चली गईं। दबंगई ने मानवता के सामने सवाल पैदा कर दिया। शारीरिक रूप से अक्षम सुमन 12वीं की छात्रा थी। आग में घिर गई और उसकी जलने से दर्दनाक मौत हो गई। उसकी जली हुई तिपहिया साइकिल दबंगों के अपराध की भीषणता को उजागर करने के लिए काफी है। सुमन को बचाने गए उसके पिता ताराचंद भी आग की चपेट में आ गए। जिनकी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई। हालाँकि अधिकारी इस बारे में अलग बयान देते हैं। उनका कहना है कि मामला नहर में नहाने को लेकर शुरू हुआ, जिसे बाद में कुछ असामाजिक तत्वों ने तूल दे दिया। हिसार जिला प्रशासन उत्पीड़न की इस जघन्य घटना को असामाजिक तत्वों के सिर मढ़ने की कोशिश कर रहा है। जबकि गाँव को सामूहिक रूप से निशाना बनाया गया। लेकिन पूरे घटनाक्रम में और उसके बाद की कार्रवाइयों में प्रशासन का चरित्र संदिग्ध बना रहा। पीड़ित दलित परिवारों ने प्रशासन पर दबंगों का साथ देने का आरोप लगाया। हालाँकि पूरी घटना को मुआवजे से रफा-दफा करने की राजनीति भी की गई। संसदीय सचिव जयबीर वाल्मीकि ने मृतकों के परिजनों में से एक-एक को सरकारी नौकरी और सभी पीड़ित परिवारों को दो-दो क्विंटल गेहँू देने की घोषणा की। जबकि पीड़ित दलित परिवारों ने अपनी लड़ाई को विस्तार दे दिया था। परिवारों ने लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज कराने की माँग को लेकर सुमन और ताराचंद के शवों को रखकर प्रदर्शन किया। इस माँग से बन रहे चैतरफा दबाव में पुलिस ने नारनौंद के थाना प्रभारी तथा हाँसी के तहसीलदार के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। साथ में नारनौंद के थाना प्रभारी विनोद काजल को निलंबित कर दिया गया। थाना प्रभारी तथा तहसीलदार के खिलाफ दर्ज किए गए मुकदमे की एफ0आई0आर0 की प्रति की माँग को लेकर पुलिस तथा पीड़ितों के बीच झड़प भी हुई। पीड़ित परिवारों के दबाव के चलते दोनों को गिरफ्तार भी किया गया।
प्रशासन की लापरवाही और पक्षपातपूर्ण रवैय्ये की पोल खुलकर उस समय फिर सामने आ गई, जब आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट का जायजा लेने के लिए राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह और मानवाधिकार आयोग की टीम मिर्चपुर गाँव के दौरे पर पहुँची। जब मानवाधिकार आयोग की टीम गाँव में मौजूद थी, तभी दबंगों के समर्थन में एक महापंचायत वहाँ पर चल रही थी। इस महापंचायत पर एतराज जताते हुए मानवाधिकार की टीम ने जिलाधिकारी ओ0पी0 श्योराण से जवाब तलब किया तो जिलाधिकारी का जवाब भी कम आश्चर्य प्रकट करने वाला नहीं था। उन्होंने टीम को बताया कि महापंचायत केवल इसी बात पर हो रही है कि पुलिस किसी को गिरफ्तार नहीं करे, बल्कि महापंचायत के लोग आरोपियों को पुलिस के यहाँ हाजिर कर देंगे। मिर्चपुर का दौरा करने के बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष बूटा सिंह ने हिसार जिला प्रशासन के कामकाज से असंतोष जाहिर किया। उन्होंने कहा कि घटना के समय नारनौंद के थाना प्रभारी और तहसीलदार गाँव में मौके पर मौजूद थे और दलित बस्ती पर जाट दबंगों के धावे के समय दोनों अधिकारियों ने दलितों की सुरक्षा को लेकर कोई कदम नहीं उठाया, जिसकी वजह से इतनी बड़ी घटना हुई, इसलिए इस घटना में दोनों बराबर के जिम्मेदार हैं। साथ में उन्होंने प्रशासन पर असंवेदनशील होने का भी आरोप लगाया। गौरतलब है कि घटना के बाद मिर्चपुर गाँव पुलिस छावनी में तब्दील कर दिया गया था, लेकिन गाँव में जाटों की महापंचायत चल रही थी। पीड़ित परिवारों का अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित होना स्वाभाविक था। मिर्चपुर गाँव से 40 परिवार पलायन कर हिसार लघु सचिवालय में सुरक्षा और दूसरी जगह बसाने की माँग को लेकर लोकासंघर्ष पर बैठ गए। हालात के गंभीर होने का अंदाजा लगते ही हरियाणा के मुख्यमंत्री ने मिर्चपुर गाँव का दौरा कर मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रूपये का मुआवजा और एक परिजन को नौकरी देने की घोषणा की। कहा गया कि गाँव में पुलिस बटालियन 24 घंटे तैनात रहेगी, जब तक ग्रामीण अपनी सुरक्षा को लेकर संतुष्ट न हो जाएँ। कुल मिलाकर जिला प्रशासन जिस मामले को रोकने में विफल रहा, उसे मुआवजे और लुभावनी घोषणाओं के सहारे भरने की राजनीति होने लगी।

-ऋषि कुमार सिंह
संपर्कः 09313129941
लोकसंघर्ष पत्रिका के सितम्बर अंक में प्रकाशित

रविवार, 26 सितम्बर 2010

कामनवेल्थ गेम्स : कह रहीम कैसे निभे, बेर केर का संग

कामनवेल्थ गेम्स और केंद्र सरकार पर काबिज भ्रष्टाचारी लोगों का समूह में आपसी सम्बन्ध बेर और केर का ही है। कामनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति के चेयरमैन सुरेश कलमाड़ी ने स्पष्ट तरीके से कहा कि गड़बड़ी के लिए आयोजन समिति जिम्मेदार नहीं है वहीँ पर माइक फेनेल प्रमुख राष्ट्रमंडल खेल महासंघ ने कहा कि पूरे प्रकरण से भारत की छवि बहुत ख़राब हुई लेकिन इसे सबक के तौर पर लेना चाहिए हमारे देश में कुछ लोगों का मत यह है कि राष्ट्रमंडल खेलों में हुए भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में कुछ भी लिखा पढ़ा नहीं जाना चाहिएइससे देश की छवि ख़राब होती है इस मत से सहमत होने पर इन भ्रष्टाचारियों को बल मिलता है और मुख्य स्टेडियम में हॉल सीलिंग , फ्लाई ओवर गिरने से देश की छवि पूरी दुनिया में उज्जवल तो नहीं हो रही है इस राष्ट्रमंडल खेलों के लिए मंत्री समूह और प्रधानमंत्री सीधे-सीधे जिम्मेदार हैं मजबूर होकर बहुत सारे निर्माण कार्यों को भारतीय सेना से करवाना पड़ रहा है अफ्रीकी दल ने कहा कि खेल गाँव काफी गन्दा है इससे भी केंद्र में सत्ता रूढ़ दल को जरा सा भी शर्म नहीं रही है भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उप महासचिव एस सुधाकर रेड्डी ने बहुत अच्छी बात कही कि खेल यदि सफल होते तो सारा श्रेय यू.पी. लेता इसलिए इन गड़बड़ियों की जिम्मेदारी भी यू.पी. नेतृत्व को लेनी चाहिए लेकिन यू.पी. के मंत्रीगणों से कोई अच्छा कार्य होना संभव ही नहीं रेल मंत्री से लेकर खेल मंत्री तक अपने-अपने विभागों में अव्यवस्था मंत्री के रूप में काम कर रहे हैं
जिस तरह से अच्छे कार्य और यू.पी.ए के मंत्री एक साथ नहीं हो सकते हैं इसीलिए रहीम ने बहुत पहले ही लिख दिया था -

कह रहीम कैसे निभेए बेर केर का संग ।
यै डोलत रस आपनेए उनके फाटत अंग ।।

राष्ट्रमंडल खेल जब आयोजन समिति बन रही थी तभी से भ्रष्टाचारियों के काकस ने जकड लिया था जिसका परिणाम अब दिखाई दे रहा हैकोई आलोचना करे तो ठीक और करे तो भी ठीक, भ्रष्टाचारियों के स्वास्थ्य के ऊपर कोई असर नहीं होना है और ही उनके खिलाफ इस देश में कोई कार्यवाई संभव ही है

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 25 सितम्बर 2010

ईराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी नरसंहार के आगे वर्ल्ड ट्रेड की घटना नगण्य है


संयुक्त राष्ट्र महासभा को ईरान के राष्ट्रपति अहमदीनेजाद ने संबधित करते हुए कहा कि 9/11 की घटना अमेरिकी साजिश का परिणाम है। अमेरिका ने अपनी अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने के लिए और एशियाई मुल्कों के ऊपर अपना शिकंजा कसने के लिए किया था। इस घटना में 2700 से ज्यादा लोग मारे गए थे।
अहमदीनेजाद ने आरोप लगाया कि इजराइली यहूदी शासन को बरकरार रखने और मध्य-पूर्व के मुद्दे को भटकाने के लिए अमरीका ने ये साजिश रची। अहमदीनेजाद ने यहां तक कहा कि आत्मघाती हमलावरों को अमरीकी प्रशासन की ओर से मदद दी गई। उन्होंने कहा कि जिस वर्ल्ड ट्रेड सेंटर को आत्मघाती हमलावरों ने विमान से टकरा कर जमीदोंज कर दिया उसके मलबे से अमरीकी पासपोर्ट मिले जबकि हमलावरों का कोई सुराग नहीं मिला।
अहमदीनेजाद ने कहा कि ईराक और अफगानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व में हुए अभियानों में मारे गए हजारों लोगों के सामने यह आंकड़ा नगण्य है।
अहमदीनेजाद के भाषण के दौरान ही अमेरिका के 33 समर्थक देश उठ कर चले गए। गौरतलब बात यह है कि ईराक के ऊपर हमला करने से पूर्व अमेरिकन साम्राज्यवाद ने तरह-तरह के दावे किये थे कि ईराक में परमाणु हथियार और रासायनिक हथियार बनाये जा रहे हैं और उनका भण्डारण किया जा रहा है लेकिन आज जब अमेरिकन सेनाओ की वापसी तक हो गयी लेकिन अमेरिकन दावों की पुष्टि आज तक नहीं हुई।
अमेरिकन या अन्य साम्राज्यवादी देशों की बातें उस मिलावटखोर, मुनाफाखोर बनिये की तरह होती हैं जो हर वक्त ईश्वर की सौगंध खा कर अपने माल को बेचने के लिए तरह-तरह की झूठी कसमें खाता रहता है, अमेरिकन या साम्राज्यवादी तत्व अर्धविकसित व विकसित देशों को गुलाम बनाये रखने के लिए उनके ऊपर तरह-तरह के आरोप लगाये रखते हैं और अपनी लूट आधारित व्यवस्था को बनाये रखना चाहते हैं। इससे पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने पूरी दुनिया में जितने नरसंहार किये हैं वह भले ही इतिहास की बात हो गयी है लेकिन मानवता साम्राज्यवादियों के आगे हमेशा कराहती ही रही है। वियतनाम, ईराक, अफगानिस्तान, फिलिस्तीन सहित कितने ही मुल्कों अमेरिकन साम्राज्यवाद ने तबाह व बर्बाद कर डाला है। इससे लगता है कि अहमदीनेजाद की बातों में कहीं न कहीं दम जरूर है।

इसके पूर्व फरवरी 2010 में अहमदीनेजाद ने कहा था कि

The West’s ultimate goal is not Iran, but India and China, Iran’s President Mahmoud Ahmadinejad was quoted as saying by Irinn.

He named the wish to undermine China’s and India’s rapidly growing economies as the causes of the West’s interest.

He named the recent concentration of NATO forces around India and unrests in Pakistan as an argument.

Presently, the West experiences a rapid downturn in the economy and the leaders of the Western countries have decided to conceal reality from their peoples, he said at today’s news conference.

Ahmadinejad said that NATO almost completely surrounded Russia and once Russia will understand this.

“Russia should respond to the deployment of NATO forces along its borders,” he said।

thepepoleofpakistan

यह भी यथार्थ के नजदीक उनका बयान था।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 24 सितम्बर 2010

कर दिया चुप वाक़्याते-दह्र नें, भी कभी हम में भी गोयाई बहुत।

एक रिर्पोट देख कर सांसदों के बारे में मुझे अपनी पहले की धारण को लगता है परिवर्तित करना पड़ेगा। पहले हम ही क्या, सभी यह विचार करते होंगे कि सांसद बड़ा बवाली, बहुत उत्तेजक, हंगामें बाज़ नारेबाज़, कुर्सियाँ, माइक भंजक, फ़ाइले फाड़ने वाला, राष्ट्रपति को अभिभाषण न पढ़ने देने वाला, काग़ज के गोले फेकने वाला, ‘वेल‘ मे जाकर अक्खाड़े बाज़ी करने वाला होता है। अब मालूम हुआ कि इनमें से 35 फ़ीसदी शन्ति स्वभाव के हैं। बेचारे कुछ बोलते ही नहीं, न कबूतर बाज़ हैं, न ही प्रश्न पूछने के लिए रक़म पैदा करते हैं। वोट देने के लिए ‘बिकते‘ हैं या नहीं? यह नहीं कह सकता। सरकार बनाने या गिराने के मौक़ों पर यह ‘चांस‘ मिलता है।
स्वतंत्र संस्था पी0आर0एस0 लेजिस्लेटिव रिर्सच नें हाल ही में ख़त्म हुए मानसून सत्र की समीक्षा की, इसके मुताबिक, दोनो सदनों में ‘शान्त‘ बैठे रहने वाले सदस्यों की संख्या औसतन 35 फ़ीसदी है। मुद्दे उठाना, सवाल पूछना तो दूर की बात हैं, किसी चर्चा-परिचर्चा में भी यह हिस्सा नहीं लेते एक मतदाता यह सोचकर इन्हें भेजता है कि सांसद जी वहाँ जाकर क्षेत्रीय समस्याओं का समाधान कराएँगे, मगर यहाँ आकर बस यह मूक-दर्शक बन जाते हैं, अगर बोलते भी हैं तो अपने वेतन-भत्ते बढ़वाने के मुद्दे पर। लगता है कि इन पर ‘परमानन्द माधवम‘ की कृपा भी नहीं होती, जिस से ‘मूकम् करोति वाचालम‘ वाली स्थिति वैदा हो जाती।
अब मैं एक बात और सोचता हूँ, इस आदत में अच्छे पहलू भी हैं- पुरानी मसल है कि "TALK IS SILVER BUT SILENCE IS GOLD" इस हिसाब से तो यह ‘सेाने‘ वाले हुए। रिर्पोट ने यह नहीं बताया कि यह ‘सोने‘ के कितने माहिर हैं।
यहाँ पर ‘हाली‘ का एक शेर याद आ गया, इसमें ‘वाक़याते दह्र‘ का अर्थ ‘दुनिया की घटनायें‘, और ‘गोयाई‘ का अर्थ है बोलने की आदत-
कर दिया चुप वाक़्याते-दह्र नें,
भी कभी हम में भी गोयाई बहुत।
अब देखना ये पड़ेगा कि यह सांसद चुप क्यों रहते हैं? क्या पहले कभी बोलते भी थे? या जब से चुने गये तब से अब तक इनकी यही स्थिति बनी रही? इस मामले में एक मध्य मार्ग भी है, वह यह कि जो ज़्यादा बोलते है, कम बोलें जो नहीं बोलते हैं, वह कुछ बोलें ज़रुर। हिन्दी कवि नें यही सीख दी है-
अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप
अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप।
डा. एस.एम. हैदर
लो क सं घ र्ष !

बृहस्पतिवार, 23 सितम्बर 2010

फैसला है या युद्ध ! सरकार अब 28 को युद्ध लड़ेगी

बाबरी मस्जिद प्रकरण पर माननीय उच्च न्यायलय इलाहबाद खंडपीठ लखनऊ को अब अपना निर्णय 28 सितम्बर को उद्घोषित करना होगा। ऐसे आदेश माननीय उच्चतम न्यायलय ने जारी किये हैं। उत्तर प्रदेश की सरकार ने कस्बों, शहरों से लेकर दूर-दराज तक के इलाकों में बैरिकेटिंग कर दी हैजगह-जगह फ्लैग मार्च युद्धाभ्यास हो रहा है। सांप्रदायिक राजनीतिक दल तरह-तरह की अफवाहें फैलाने में लगे हुए हैं उसके बाद भी प्रदेश में सांप्रदायिक सद्भाव एकता चट्टान की तरह खड़ी हुई है। प्रदेश सरकार या तो बुरी तरह से डरी हुई हैइस प्रकरण से या समाज को कोई अद्भुद सन्देश देना चाहती है। इस प्रकरण पर इसके पहले भी निर्णय आए हैं। पूरे देश में कोई भी झगडा-झंझट नहीं हुआ है लेकिन झगडा-झंझट तब हुआ है, जब राज्य सरकार केंद्र सरकार की मशीनरी दंगाइयों के साथ कंधे से कंधा मिला रहे थे। बाबरी मस्जिद के ध्वंस के पश्चात बहुत सारे अधिकारी- कर्मचारी दंगाइयों से हाथ मिला रहे थे। कुछ ऐसी ही स्तिथि पैदा करने की कोशिश की जा रही है। इस तरह की हरकतों से देश की एकता और अखंडता कमजोर होती है। माननीय उच्च न्यायलय को फैसला देना हैदोनों पक्ष कह चुके हैं कि सद्भाव मुख्य है। हमारी एकता को बनाए रखना ही प्रमुख है लेकिन वोटों के सौदागर इसमें अफवाहें फैला कर राजनीति कर रहे हैं और सरकार की भी स्तिथि साफ़ नहीं है। तैयारियों से ऐसा लगता है कि सरकार अब 28 को युद्ध लड़ेगी।

अयोध्या में सद्भाव का एक द्रश्य यह भी है : -

(फोटो साभार: हिन्दुस्तान)

बुधवार, 22 सितम्बर 2010

आजादी ! आजादी ! आजादी ! और जम्मू एंड कश्मीर

जम्मू एंड कश्मीर हालात पिछले कुछ दिनों से अत्यधिक बिगड़े हुए हैंजिसका राजनीतिक समाधान होना अतिआवश्यक हैसर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से एक नेता ने कहा कि हमको आजादी चाहिएयह बात पिछले कुछ वर्षों में साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा इस प्रदेश की जनता में कूट-कूट कर भरा गया है लेकिन ऐसे तत्वों के साथ सामान्य जन नहीं हैहमारी व्यवस्था की असफलताएं ऐसे तत्वों को पल्लवित होने में मदद करती हैंइन अलगावादी तत्वों से यह पूछने की आवश्यकता है कि वह किसके गुलाम हैं जब पाकिस्तान का निर्माण हुआ था और उसके बाद पकिस्तान पूरी तरह से अमेरिकन साम्राज्यवादियो के साथ रहा और आज उसकी राजनीतिक, आर्थिक स्तिथि अत्यधिक ख़राब हैजम्मू एंड कश्मीर का भी अर्थ तंत्र काफी अच्छा नहीं हैकाफी हिस्सा बर्फीला होने के कारण रोजगार के अवसर काम हैंपर्यटन से ही मुख्य आय होती है जो सीमा पार की गतिविधियों से कम होती जा रही हैदूसरी तरफ गुलाम कश्मीर जिसके हालात जम्मू एंड कश्मीर से भी बदतर हैं
अमेरिकन साम्राज्यवाद का पुराना सपना है कि जम्मू एंड कश्मीर को भारत और पकिस्तान से अलग कर वहां पर सैनिक समुच्चय स्थापित करने का किन्तु उसका सपना पूरा नहीं हो पा रहा हैभारतीय नागरिको की उदारतावादी नीति के कारण कश्मीर के उच्च इलाकों पर अमेरिकन सैनिको की तैनाती से वह भारत, चाइना सहित कई मुल्कों के ऊपर अपना अघोषित नियंत्रण कर सकता हैआज जब भारत की विदेश नीति से लेकर सभी नीतियों में परिवर्तन हुए हैं तो उसका लाभ साम्राज्यवादी शक्तियों को भी हो रहा है जिसका प्रतिबिम्ब मुख्य रूप से जम्मू एंड कश्मीर में दिखाई देता है
जरूरत इस बात की है कि यह एक राजनीतिक समस्या है वहां की जनता से सद्भावपूर्ण तरीके से एक अच्छी व्यवस्था देकर संवाद कायम करने की हैसंवाद से ही अच्छा रास्ता निकलेगासेना, कर्फ्यू, फायरिंग कोई विकल्प नहीं होते हैंइससे कुछ समय के लिए शांति तो कायम की जा सकती है लेकिन स्थायी शांति नहीं
साम्राज्यवादी शक्तियों के भारतीय सन्देश वाहक इस समस्या को हिन्दू और मुसलमान के चश्मे से ही देखते हैं और उनको देखना भी चाहिए पहले वह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए हिन्दू और मुसलमान, हिंदी और उर्दू का विवाद उठाते रहे हैं और आज भी वह कश्मीर के सवाल को साम्राज्यवादी शक्तियों को फ्रायदा देने के लिए तरह-तरह के राग अलाप रहे हैंमैं नहीं समझता कि संविधान के अनुच्छेद 370 के प्राविधानो से भारतीय संघ के अन्य नागरिको का कोई नुकसान होता है

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 21 सितम्बर 2010

कच्ची दारु, कच्चा वोट - पक्की दारु, पक्का वोट - दारु, मुर्गा, औरत खुल्ला वोट

उत्तर प्रदेश में देश के सबसे बड़े त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव का बिगुल बज चुका हैसदस्य ग्राम पंचायत से लेकर जिला पंचायत तक के सदस्यों का चुनाव होना हैगाँव-गाँव में सूबे से ही कच्ची दारु, देशी दारु अंग्रेजी शराब की मांग मतदाताओं द्वारा आम तौर पर की जा रही हैजिसकी पूर्ति प्रत्याशी कर रहे हैंचुनाव के पूर्व से ही प्रत्याशियों ने लोगों के खेत जोतने से लेकर फसल कटाई तक निशुल्क की हैबरसात के इस मौसम में हो रहे चुनाव में दारु, मुर्गा, पैसा जम कर खर्च किया जा रहा हैछोटे-छोटे बच्चे नारा भी लगा रहे हैंजो इस पोस्ट की हेडिंग है, प्रत्याशी भी आपूर्ति करने में पीछे नहीं हैंवहीँ मतदाता पीने और खाने में कमजोर नहीं हैंकुछ बस्तियों में एक प्रत्याशी खिला-पिला कर जाता हैउसके जाते ही दूसरा प्रत्याशी जाता है और मतदाता उसकी दारु पीने लगते हैं और खाने लगते हैं
इस चुनाव में देवर-भौजाई, पिता-पुत्र, भाई-भाई, देवरानी-जेठानी सहित सभी रिश्तों को भूल कर एक दूसरे के मुकाबले प्रत्याशी खड़े हुए हैंइस चुनाव में एक बात यह भी उभर कर रही है कि 24 सितम्बर को आने वाले फैसले का ज्यादा प्रभाव ग्रामीण क्षेत्रों पर नहीं पड़ेगामत प्राप्त करने के लिए दोनों धर्मों के लोग एक दूसरे के प्रति अत्यधिक उदार हैं जिसकी कोई सीमा नहीं है
वहीँ भ्रष्टाचार के गंगा स्नान में पंचायत चुनाव से जुड़े हुए सरकारी कर्मचारी भी जम कर स्नान कर रहे हैंजिला पंचायत नोडुस प्रमाण पत्र लेने के लिए 150 रुपये की रसीद दी जाती है और प्रत्याशी से 200 रुपये लिए जाते हैं और इस तरह से पंचायत क्षेत्र पंचायत तहसील नोडुस प्रमाण पत्र की अलग-अलग फीस हैं और सहयोग राशि अलग-अलग हैनामांकन फार्म भी ब्लैक में बेचा जा रहा हैवहीँ नोटरी अधिवक्ताओं को भी लाभ हो रहा है वह भी मनमाने तरीके से अपनी-अपनी फीस वसूल रहे हैं
यह उत्तर प्रदेश में चल रहे पंचायत चुनाव की एक तस्वीर हैआगे और भी तस्वीरें आएँगी

सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 20 सितम्बर 2010

यमराज मंत्री हैं या रेल मंत्री

शिवपुरी के भदरवास रेलवे स्टेशन पर खड़ी इंटरसिटी यात्री ट्रेन को सामने से रही मालगाड़ी ने जोरदार टक्कर मारी जिससे 15 यात्रियों की मृत्यु हो गयी, 50 यात्री गंभीर रूप से घायल हैंदोनों ट्रेनों के ड्राईवर घटनास्थल से भाग गए हैंरेलवे उच्च अधिकारीयों का कहना है कि मालगाड़ी के ड्राईवर ने सिग्नल की अनदेखी की है या सिग्नल फ़ेल हो जाने के कारण उक्त दुर्घटना घटी है
रेल विभाग ने ड्राईवर गार्ड से 24-24 घंटे लगातार कार्य लिया जा रहा हैरेलवे को संचालित करने में ट्राफिक स्टाफ की महत्वपूर्ण भूमिका होती है उसकी अत्यधिक कमी हैरेलवे की संरक्षा नहीं की जा रही है जिससे आये-दिन सिग्नल आदि फ़ेल हो जाते हैं
रेल मंत्री ममता बनर्जी के पास रेल विभाग के कार्य को देखने के लिए समय नहीं हैउनका सारा ध्यान अपने गृह प्रदेश पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चा की सरकार को हटाने में लगा रहता हैकेंद्र सरकार राजनीतिक रूप से मजबूरियों की सरकार हैवह ममता बनर्जी को रेल मंत्री पद से हटा भी नहीं सकता हैममता बनर्जी के क्रियाकलापों से यह महसूस होता है कि वह रेलमंत्री की बजाए यात्रियों के लिए यमराज मंत्री हैं

सुमन
लो क सं घ र्ष !

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, अंतिम भाग

यह बात बहुतों को नही मालूम है कि गांधी जी को प्रथम समाजवादी क्रान्ति से, जो 1917 में हुई, पूरी हमदर्दी थी, इस क्रान्ति ने सभी राष्ट्र-मुक्ति आन्दोलनों को अपना सहयोग दिया। गांधी की मुख्य सोच केवल यही नहीं थी कि उन्हें औपनिवेशिक शासन से मुक्ति मिल जाए, यह तो उनके अनेक उद्देश्यों को प्राप्त करने का पहला चरण था, अन्य उद्देश्य थे- भूख, बेरोजगारी तथा विकराल अभावग्रस्तता का उन्मूलन। वास्तविकता तो यह है कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था ही बेरोज़गारी और मानवीय पतन का कारण है। गांधी का इस पर विश्वास था कि सामन्तवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था को बदल कर इसका दूसरा रास्ता खोजा जाए, यदि मानव जाति को डूबने से बचाना है, शोषण, असमानता, बेरोजगारी, हिंसा और युद्ध से मुक्ति दिलाना है। गांधी जी राजनैतिक सन्धि हेतु जब लंदन गए और वहाँ की एक श्रमिक बस्ती में जाकर रहे तब उन्होंने खुले आम यह कहा कि भारत में ब्रिटिश सामानों का जो बहिष्कार हो रहा है उसके निहितार्थ इंग्लैंड के श्रमिक समझने की क्षमता रखते हैं।
डा0 एम0एस0 स्वीमीनाथन जो एक बड़े कृषि वैज्ञानिक हैं और जिनकी पहचान भारत में हरित क्रान्ति से जुड़ी है (उन हलकों में विवादास्पद हैं जो उस आर्गैनिक फारमिंग का समर्थन करते जो केमिकल तथा कीट नाशक दवाओं से मुक्त हों, उनका मत है कि उस भार से किसान पस्त हैं और उनके कर्जे बढ़ रहे हैं तथा ज़मीन व जल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं) उन्होंने ब्लूूम वर्ग यू0टी0वी0 पर अपने एक साक्षात्कार में जो 20 जनवरी 2010 को रिले किया गया उसमें गांधी जी की राजनैतिक प्राथमिकताओं को याद किया, इस बात पर भी दुःख प्रकट किया कि पिछले दशक में संयुक्त राष्ट्र ने खाद्य उपलब्धता व पोषकों हेतु जो लक्ष्य निर्धारित किए थे भारत उनकी आधी उपलब्धि भी नहीं प्राप्त कर सका, जबकि वियतनाम और चीन ने उन्हें प्राप्त कर लिया। यह भी चेतावनी दी कि खाद्य वस्तुओं की असुरक्षा तथा उनके दामों में बेतहाशा बृद्धि आम-जनता के लिए असंतोष का कारण बनेगी।
इस बढ़ी हुई आयु में किसी अन्य राजनैतिक नेता को नहीं, केवल महात्मा गांधी को फासीवादी और दक्षिण पंथियों ने अपना निशाना बनाया तथा उनकी हत्या कर दी, इसलिए कि वे उनकी राजनैतिक गतिविधियों एवं कार्यक्रमों को भारत में अपने साम्राज्यवादी भविष्य के एजेण्डे के लिए एक बड़ा खतरा मान रहे थे। अब हत्यारे या उनके वैचारिक सहायक इसकी जो भी व्याख्या करें। बहरहाल बँटवारे के तौर पर भारतीय उपमहाद्वीप की पुनर्संरचना को, जाते हुए साम्राज्यवादी थोप रहे थे तथा इसमें दोनो धार्मिक समूहों की राजनैतिक शक्तियों का सहारा ले रहे थे और धार्मिक हत्याओं हेतु उनको प्रशिक्षित किया जा रहा था। बिल्कुल उसी तरह जैसे कि आज के क़ब्ज़े वाले देशों तथा कल के लक्षित देशों में किया जा रहा है।
गांधी के सहयोग से संविधान सभा में प्रतिनिधित्व करने वाले, ग्रामीण व नगरीय कामगारों, दलितों के मसीहा, भारत के
संविधान के निर्माता डा0 बी0आर0 अम्बेडकर जिन्होंने संयुक्त राज्य की कोलम्बियाँ यूनीवर्सिटी में शिक्षा ग्रहण की थी, जब
गांधी जी की हत्या की गई तो असीमित पीड़ा के साथ अपनी भावनाओं को उन्होंने इन शब्दों में प्रकट किया ‘‘महात्मा गांधी हम से सब से ज्यादा क़रीब थे‘‘ इस श्रद्धांजलि ने इस शरीफ़ लेकिन समझौता न करने वाले क्रान्तिकारी के जीवन का निचोड़ पेश कर दिया। 20वीं सदी के अनेक नेतृत्व करने वालों के साथ-साथ गांधी ने केवल भारतीय जन-मानस को ही राजनैतिक प्रेरणा नहीं दी वरन् वह, संसार के विभिन्न भागों में होने वाले आन्दोलनों के भी प्रणेता बने ताकि उस राजनैतिक साम्राज्यवादी व्यवस्था का विरोध किया जाए जिसकी संरचना ही इसलिए की गई थी ताकि श्रमिकों व कामगारों के राजनैतिक आर्थिक एवं सामाजिक न्याय का हनन किया जाय।

-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
( समाप्त )

रविवार, 19 सितम्बर 2010

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, भाग 2

एक क्रान्तिकारी की पहचान इस बात से भी होती है कि उसके शिष्य कैसे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका में मार्टिन लूथर किंग उभरे एवं वह महात्मा गांधी के पद चिन्हों पर चले। अमेरिकी इतिहास के एक बहुत बड़े आन्दोलन का उन्होंने नेतृत्व किया। उन्होंने यू0एस0 के मिलिट्रीवाद का विरोध तथा अमेरिका के अफ्रीकी लोगों की मुक्ति का आन्दोलन चलाया। उनका मत था कि सेना का अन्याय वहाँ के कामकाजी लोगों के खिलाफ हैं, यह मानवता के विरुद्ध है तथा नस्लवाद एवं शोषण को बढ़ावा देता है। महात्मा गांधी का मत था कि एक ऐसे देश में जहाँ लाखों भूखे हांे, खाना ही प्रथम आवश्यकता है। वे कहते थे कि धार्मिक-दर्शन पूरी मानवता के सम्मान का उपदेश देता है, इसमें संस्कृतियों के आधार पर कोई भेद-भाव नहीं है। मार्टिन लूथर किंग इस बात पर जोर देते हैं ‘‘कोई भी धर्म जो मनुष्य की आत्मा की तो चिंता करे और उस गंदी बस्ती की चिंता न करे जिसमें आत्मा पैदा हुई और जहाँ की आर्थिक दशाओं ने उसे लँगड़ा कर रखा है, वह धर्म बीमार है उसे खून देने की जरूरत है’’ राजनैतिक प्रशिक्षण के आलोक में गांधी ने राजनैतिक रणनीति के तौर पर सविनय अवज्ञा, असहयोग, आन्दोलन तथा सत्याग्रह को चुना। भारतीय आन्दोेलन पर भी इस का यह प्रभाव पड़ा कि यहाँ लाखों लोग इस जनसंघर्ष में कूद पड़े जिससे ब्रिटिश साम्राज्यवाद को अपना शासन चलाना मुश्किल हो गया। वर्तमान में बोलोविया की स्थिति पर अगर ग़ौर करें तो वहाँ के देशी लोगों ने एक बड़ा असहयोग आंदोलन चलाकर, राजनैतिक और आर्थिक न्याय को हासिल करने के लिए वहाँ का तख़्ता पलट दिया था।
अब देखिए, दूसरी ओर भारत में मुख्य धारा की राजनैतिक पार्टियों ने ‘आपरेशन ग्रीन हन्ट‘ का कोई विरोध नहीं किया। बहुत बड़ा ‘पैरा मिलिट्री‘ अभियान मध्य एवं पूर्वी भारत के देशी आदिवासियों एवं किसानो के ख़िलाफ़ छेड़ दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी ‘सल्वा जुडुम‘ को बन्द करने के निर्देश दिए थे। जिसकी वित्तीय सहायता मध्य एवं पूर्वी भारत में भारतीय एवं विदेशी मल्टीनेशनल कार्पोरेट खान उत्खनन जगत करता था, जिनका उद्देश्य था उस जमीन को खाली करा लेना जो मिनरल पदार्थों से परिपूर्ण है तथा यह हज़ारों एकड़ जमीन वहाँ के आदिवासियों और किसानो के क़ब्ज़े में पुराने ज़माने से रही है तथा उस पर वह खेती करते चले आ रहे हैं। औद्योगिक स्वार्थों के तहत उस ज़मीन पर बड़े पैमाने पर क़ब्ज़े किए गए तथा गरीब बस्तियों को उजाड़ा गया। कुछ लोगों ने इस ज़्यादती को ‘आन्तरिक उपनिवेशवाद‘ की संज्ञा दी है। कृषि एवं उद्योग के बीच ‘बैलेंस‘ बनाने हेतु अगर गांधी होते तो क्या करते? आज का हाल तो यह है कि कुछ गंाधीवादी जो यहाँ के आदिवासियों एवं कृषकों के हित में काम कर रहे थे वे निशाना बनाए गए तथा जेलों में डाल दिए गए।
गांधी जी की ग़लत तस्वीर पेश की गई, उन्होंने औद्यीगीकरण तथा आर्थिक विकास का कभी विरोध नहीं किया। उनका नज़रिया यह था कि जो भी बड़ी या छोटी इन्डस्ट्री हो उसका मुुख्य उद्देश्य देहातों व शहरों में बेरोज़गारी का ख़त्म करना, होना चाहिए। उनका दृष्टिकोण था कि भारी उद्योगों पर सामाजिक कन्ट्रोल हो, प्रबंधन के सभी सेक्टरों में श्रमिकों की भागीदारी हो और उन्नत कृषि तकनीक हेतु भारी प्रयास किए जाएँ। उनका इस बात पर ज़ोर था कि ग्रामीण ढाँचागत विकास के तहत साफ़ पानी, सफ़ाई, स्वास्थ्य, साक्षरता, शिक्षा, तथा आधारभूत निवास को त्वरित प्राथमिकता दी जानी चाहिए। महात्मा गांधी और माओत्सेतुंग के प्रोग्रामों में बहुत सी समानताएँ हैं। ख़ास तौर से उन देशों में जो उपनिवेशवाद के कारण ऐतिहासिक रूप से तबाह हुए, जहाँ खेतियाँ बर्बाद हुईं, वहाँ आर्थिक उत्थान का आरम्भ कैसे किया जाए, हालाँकि दोनों के तरीक़ों में अन्तर था। माओ एक ऐसे राष्ट्रवादी थे जिनकी चिंताएँ चीन-वासियों हेतु थीं। महात्मा गांधी हालाँकि भारतीय समाज के विशिष्ट हालात को बखूबी समझते थे फिर भी उनकी चिंताएँ समस्त मानवता के लिए थीं। 20वीं सदी के राजनैतिक आन्दोलनों की पूरी समझ रखते थे तथा वे एक राजनैतिक यर्थाथवादी भी थे। महात्मा गांधी ने ‘सेलेक्टेड वकर््स‘ तीसरे खण्ड में ‘रिकान्सट्रकशन प्रोग्राम‘ के अन्तर्गत, जो 1941 में, फिर संशोघित 1945 में प्रकाशित हुआ ‘इकोनामिक इक्वैलिटी‘ के शीर्षक से पैरा 13 में यह कह कर सावधान किया, ‘‘जब तक धनवानों एवं लाखों भूूखों के बीच एक बड़ी खाई बनी रहेगी, एक हिंसा रहित सरकारी-तंत्र का स्थापित होना असंभव है। जब तक नई दिल्ली के बड़े-बड़े महलों एवं गरीब श्रमिक वर्ग की दुखदायी झोपड़ पट्टियों का अन्तर बाकी रहेगा एक न एक दिन हिंसक और खूनी क्रान्ति निश्चित है। जब तक कि धनी वर्ग स्वेच्छा से अपनी सम्पदा और शक्ति को आम भलाई के कामों मंे न लगा दे।
गांधी आज कल के भारतीय एवं अन्य स्थानों के राजनैतिक वर्ग के स्तर तथा व्यक्तिगत स्तर पर स्व-चरित्र के उदाहरण पेश करने पर ज़ोर देते थे। विलासिता पूर्ण, अविवेकी, निर्लज्ज जीवन बिताने हेतु, जीवन भर के लिए ज़रूरत से अधिक सामान एवं धन-सम्पदा एकत्र करना तथा दूसरी ओर एक बड़े समूह का इन सब से वचिंत होना, गांधी जी के विचार में अत्यंत घातक था। वे चाहते थे कि देशवासी सादा, सरल, नैतिक जीवन का ढंग अपनाएँ क्योंकि आज के भारतीय राजनैतिक वर्ग अथवा अन्य का आचरण इसके विपरीत है। अनेक देशों के सरकारी तंत्र भी क़र्ज लेते-लेते इसी चक्रव्यूह में फँसते हैं जिससे उनमें रहने वाले समाज पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।
यह बात निर्विवाद है कि महात्मा गांधी के राजनैतिक संघर्ष का एक मानवीय पहलू भी था, जिसके कारण उन्हें पिछाड़ पाना कठिन था। उन्हों ने व्यक्ति के बजाय समाज की नाइंसाफियों तथा उस राजनैतिक प्रणाली पर अपना ध्यान केन्द्रित रखा जो मानव को दासता की ओर ले जाता है। उनके पास आगे बढ़ने और पीछे पिछड़ने का राजनैतिक कौशल तथा राजनैतिक अनुभवों की गहरी समझ थी। उपनिवेशवाद के खिलाफ़ किसी भी आन्दोलन को इतना अधिक सहयोग एवं विभिन्न विचार धाराओं के लोगों का समर्थन नहीं मिला जितना उनके आन्दोलन को।

-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
(क्रमश:)

शनिवार, 18 सितम्बर 2010

महात्मा गांधी की राजनैतिक सार्थकता, भाग 1

समस्त संसार में ये पूर्वानुमानों के दौर हैं। अनेक क्षेत्रों में हम आर्थिक और वित्तीय गिरावट देख रहे हैं जिसकी बहुत कुछ जिम्मेदारी साम्राज्यवाद के ऐतिहासिक विकास में निहित है। साथ ही साथ मानवीय इतिहास में वह महायुद्ध भी हैं, जिनका उद्देश्य था सभी महाद्वीपों के स्वतंत्र राष्ट्रों को नव उपनिवेश बनाना और बरबाद करना, देशों के बजट, उनके आर्थिक क्षेत्रों व बाजारों को छीनना, प्रत्यक्ष रूप से उस नागरिक आबादी के खात्मे को लक्ष्य बनाना जिसे वे उपभोग और प्राकृतिक संसाधनों के प्रयोग में अपना प्रतिद्वंदी मानते हैं।
अनेक देशों पर सैनिक आक्रमण हुए तथा कब्जे भी हुए जैसे फिलिस्तीन, कांगो, पूर्व योगोस्लाविया, अफगानिस्तान, इराक, सोमालिया, यमन, हैती और वे देश भी जिनको धमकियाँ दी जा रही हैं या आगे जिन पर कार्यवाही होना है जैसे ईरान, रूस, चीन। इन बातों के बावजूद आज तक विस्तारवाद, साम्राज्यवाद, फासिस्टवाद की समस्या के हल के लिए कोई गंभीर राजनैतिक प्रयास नहीं हुए, हालाँकि राजनैतिक आंदोलनों तथा जमीनी मुठभेड़ों के साहस जोर पकड़ते रहे हैं। बहरहाल नतीजा यह निकला कि एक के बाद एक देश सैनिक हमलों से या तो बर्बाद कर दिए गए या फिर आन्तरिक फासिस्टों के आगे नत-मस्तक हुए। इस प्रकार से सैनिक आक्रमण के साथ-साथ घातक प्रोपोगण्डा जो इस समय विश्व स्तर पर हो रहा है उसके खिलाफ नागरिकों को शिक्षित करने में हमारी वैचारिक विफलता जिम्मेदार है और नागरिकों तथा समाज के दीर्घ कालिक राजनैतिक स्वतंत्रता के लिए यह बात घातक भी है। यही बात उन सरकारों के लिए भी है जो ऐतिहासिक क्रांतियों के बाद स्थापित हुईं और जिनके सामथ्र्य को कमजोर कर दिया गया।
अन्य समाजों या संघों के साथ-साथ भारत एवं इसमें रहने वाले एक बार फिर वैश्विक तथा भारतीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के लिए आर्थिक एवं वित्तीय वरदान बन गए हैं। भारत सरकार की तीन कमेटियों ने भी यह रिपोर्ट दी है कि भारत की तिहाई आबादी से अधिक लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं और असंगठित कार्य क्षेत्र के लगभग 700 मिलियन श्रमिक प्रतिदिन एक डालर से कम पर और अनेक ऐसे भी हैं जो लगभग बीस रूपये रोज पर जो आधे डालर से कम हैं, जिन्दगी गुजारते हैं। इन हालात के तहत एक चैथी कमेटी ‘‘कृषि सुधार और भूमि सुधार के अधूरे कार्य‘‘ ने भूमि अधिग्रहण की राज्य की नीतियों की आलोचना की है और कहा है यह सब विदेशी तथा भारतीय बहुराष्ट्रीय निगमों को लाभ पहुँचाने के लिए है। यह भी कहा कि वैधानिक अनुशासनहीनता, गरीबी और हिंसा की जो साइकिल है उसका कारण है राज्य का नव उदारवाद का आर्थिक एजेन्डा और उन कानूनों का संशोधन जिनके द्वारा देशी जनजातियों तथा कृषकों के लिए बहुत समय से उन जमीनों को सुरक्षित कर दिया गया था। जिनमें वे खेती करते थे और जिन्हें उनसे छीना नहीं जाता था। व्यापारिक वस्तुओं की अनुमान आधारित फारवर्ड टेªडिंग जो स्वतंत्रता के बाद दशकों तक निषिद्ध थी अब सरकारों ने महज राजनैतिक रंगों के दिखावे के लिए उनकी इजाजत दे दी ताकि फ्री-मार्केट एवं अंधाधुंध विदेशी निवेश को बढ़ावा दिया जाए। यहाँ तक कि कृषि-व्यापार कम्पनियों के फायदे के लिए खाद्य-पदार्थों के दामों में बेतहाशा वृद्धि भारत को बरबाद करने के लिए की गई। जबकि यह देश हजारों वर्षों से एक कृषि क्षेत्र के रूप में जाना जाता था अनेक प्रकार से खाद्यान्न पैदा किए जाते थे। जहाँ ‘सरप्लस’ की स्थिति होती थी। अब ‘इस्लामी आतंक’ को भी इन्हीं बातों से जोड़ा गया। अनेक क्रूरताओं का जिक्र करें तो देखते हैं कि तमाम बेकुसूर मार डाले जाते हैं बाद में पता चलता हैं कि इनके लिए झूठी कहानियाँ गढ़ी गई थीं तमाम लोगों को बेवजह फाँसा जाता है, इन बातों को अक्सर बचाव पक्ष के वकीलों ने खोला।
मानव जाति को इन तमाम क्रूरताओं से मुक्ति दिलाने हेतु जब हम रणनीति तलाश करते हैं तो 20वीं सदी के तमाम आन्दोलनों में से, इस समय हम को महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले राजनैतिक संघर्ष को याद करना चाहिए। उन्होंने भारतीय आर्थिक क्षेत्र में विदेशी कम्पनियों के दखल का सख्ती से विरोध किया था। विश्व स्तर पर उनकी चिंताएँ इस बात से जाहिर होती हंै कि जब ब्रिटिश सरकार ने यूरोपीय यहूदीवाद से साठ-गाँठ के तहत ‘बालफोर डिक्लेरेशन’ फिलिस्तीन को उपनिवेश बनाने हेतु लागू करना चाहा तो गांधी जी ने उसका विरोध किया। मानव जाति की बरबादी के खिलाफ उनकी आलोचनाएँ जो उपनिवेशवाद व साम्राज्यवाद के कारण र्हुइं तथा अन्यायी राजनैतिक व्यवस्था को उखाड़ फेकने के लिए राजनैतिक प्रशिक्षण हेतु उनकी रणनीति, बहुलवादी संघर्ष, सविनय अवज्ञा एवं असहयोग आदि सभी बातें उन लोगों के लिए अब भी उपयुक्त हैं जो इस, 21वीं सदी में मानव समाज की नई संरचना के उपायों की तलाश में लगे हैं।
1857 के भारतीय स्वतंत्रता के महान युद्ध की विफलता के बाद जिसमें 10 मिलियन भारतीयों की हत्या ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेना ने की थी, उपनिवेश वाद की विरोधी ताकतें भी कुछ न कर सकी थीं, महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि छिटकी हुई उग्र घटनाएँ ब्रिटिश शासन को नहीं हरा सकतीं। इसके लिए सतत राजनैतिक जागरूकता की शिक्षा,तथा मुख्य मुद्दों पर बहुजन संघर्ष की जरूरत है और यह भी जरूरी बताया कि प्रशासन के प्रत्येक क्षेत्र में इतना अधिक असहयोग हो कि नाइंसाफी का शासन पंगु हो जाए। इस प्रकार असहयोग आंदोलन ने विदेशी राजनैतिक एवं आर्थिक ढाँचे को
ध्वस्त कर दिया, जिससे हम ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ों आन्दोलन’ तक पहुँच गए।


-नीलोफर भागवत
उपाध्यक्ष-इण्डियन एसोसिएशन आॅफ लायर्स
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
फोन-05248-220866
(क्रमश:)

शुक्रवार, 17 सितम्बर 2010

हिन्दू भगवा ब्रिगेड का हिन्दू योद्धा भर्ती अभियान


बाबरी मस्जिद प्रकरण पर 24 सितम्बर को माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ का फैसला आना हैअमेरिकन साम्राज्यवादियों के एजेंट इस देश की एकता और अखंडता को खंडित करने हेतु तरह-तरह के अभियान चला रहे हैंएस.एम.एस द्वारा एक धर्म विशेष मतावलंबियों के खिलाफ जहर उगला जा रहा हैहद तो यहाँ तक हो गयी कि मध्य प्रदेश के जबलपुर में जगह-जगह हिन्दू योद्धा भर्ती अभियान के पोस्टर लगे हुए हैंबेशर्मी की भी एक हद होती है, इन पोस्टरों में शहीद भगत सिंह, अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद, डॉक्टर भीम राव अम्बेडकर तथा महान स्वप्नदर्शी विवेकानंद आदि के भी फोटो छपे हैं यदि इन महापुरुषों के विचारों को देखें तो इनकी विचारधारा भगवा ब्रिगेड के विपरीत रही हैकेंद्र सरकार को चाहिए कि अविलम्ब इन अराजक तत्वों के खिलाफ कठोर कार्यवाई करें । जो देश की एकता और अखंडता को अक्षुण बनाये रखने तथा विधि का शासन स्थापित करने के लिए आवश्यक है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बृहस्पतिवार, 16 सितम्बर 2010

पत्रकारों की हत्या का लोकतंत्र, भाग : 2

जब 26 जनवरी 1950 को लिखी गई एक मोटी पोथी का 19वाँ अनुच्छेद धुंधला पड़ने लगे और लोकतंत्र की एक संरचना में इतना कम लोकतंत्र बचे कि आँखों पर चढ़े चश्में का काँच सरकारी तस्वीर के अलावा कुछ भी देखने से मना कर दे तो जेहन के पत्थर पर अपनी भाषा और कलम की धार कुछ लोग तेज करते ही हैं जबकि यही एक स्थिर और जड़ संरचना का अतिवाद होता है, लोकतंत्र को पूरा का पूरा माँगना। छोटी-बड़ी कमियों को न तलाशने के बजाय पूरी संरचना का मूल्यांकन करना और उसके खिलाफ खड़े होना।
दुनिया में जब लोकतंत्र की बहस चल रही थी तो कई ऐसे विचारक थे जिन्होंने लोकतंत्र की व्यापकता के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अहम माना। 17वीं सदी में फ्रांस के विचारक वाल्तेयर की जुबान को भी हम जमीन पर नहीं उतार सके जिसमें उन्होंने कहा था कि “मैं जानता हूँ कि वह झूठ बोल रहा है, पर वह अपनी बात कह सके इसके लिए मैं अपनी जान दे दूँगा” वरना आज की स्थितियाँ इसके उलट पत्रकारों को यह चेतावनी दे रही हैं और सत्ता हेमचन्द्र की हत्या के साथ यह एलान कर रही है कि तुम अगर इतना सच बोलोगे तो वह तुम्हारी जान ले लेगी। जबकि हमारे समय में एक सच को स्थापित करने के लिए हजार बार बोले जा रहे झूठों को खण्डित कर, हजार बार, हजारों तरीके से सच बोलने की जरूरत है कितना मुश्किल है यह सब कुछ, मौत से बेपरवाह होकर ऐसा करना, किसी हत्या में मारा जाना और वर्तमान के इतिहास में दर्ज तक न होना।
एक पत्रकार के माओवादी या माओवाद समर्थक होने का मसला यहीं से जुड़ा है. 1828 में जब ब्रिटिश राजनैतिक एडमण्ड बर्क ने मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ कहा था तो वह इस रूप में कतई नहीं था कि मीडिया को लोकतंत्र की किसी एक संरचना का जनसम्पर्क माध्यम हो जाना चाहिए बल्कि उसे लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए लगातार व्यापक आजादी के संघर्ष का सहयोगी बनना चाहिए और सत्ता तंत्र द्वारा प्रतिस्थापित किए जाने वाले लोकतंत्र से आगे जाकर सोचना चाहिए। ऐसी स्थिति में एक पत्रकार का आज के समय में यह अन्तद्र्वन्द्व है जब वह व्यक्ति की व्यापक आजादी के लिए संसदीय संरचना को नाकाफी पाता है तो उस जनपक्षधरता के साथ खड़ा होता है जो इस ढाँचे से संघर्ष कर रहे हैं, फिर तो माओवादी शक्तियाँ ही आज देश के फलक पर जुझारूपन के साथ सत्ता से लड़ती हुई दिखती हैं, भले ही इनमे कई खामियाँ हों और इनके क्षेत्र अभी सीमित हों, एक बौद्धिक तबका इन सीमित क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों का आलोचनात्मक विश्लेषण करता है और उन्हें मजबूत बनाता है, किसी समय में चल रहे संघर्ष की यह एक भूमिका है, अपने लिए उचित स्थान की तलाश करना जबकि सरकार द्वारा हत्या किए जाने की सम्भावनाएँ जंगलों और शहरों में कम-ओ-बेस बराबर हो चुकी हैं और लोकतंत्र व आजादी के स्वप्न हमारे प्रतिलोम में खड़े हैं।
ऐसे में यदि कोई पत्रकार उस आजादी को माँगेगा जिससे चंद लोगों या एक वर्ग की स्वछन्दता को खतरा हो तो वर्ग संघर्ष की लड़ाइयाँ और तीखी ही होंगी, तब हत्याओं के लिए मुठभेड़ का नाम नहीं दिया जाएगा, आफ्सपा जैसे कानून बनाकर हत्याएँ वैध कर दी जाएँगी, छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम जैसे कानून कई लोगों के जिन्दगी के उस हिस्से को सलाखों के पीछे धकेलने में काफी होंगे जिसमें सच बोलने का साहस जिंदा बचा रहता है।

चन्द्रिका
मो0: 09890987458
(समाप्त)
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
मो0: 09890987458

बुधवार, 15 सितम्बर 2010

पत्रकारों की हत्या का लोकतंत्र, भाग : 1

हमारे समय के पत्रकार हो जाओ सरकारी रोशनाई में कलम डुबोकर सरकार के चेहरे की शिकन लिखो...2020 तक सरकार के मिशन लिखो, इतना काफी न हो तो हाथों में दस्ताने बाँधकर समय के मुँह पर कालिख लगा दो और पोंछ लो अपने हाँथ किसी सरकारी गमछे में.... जरूरत पड़े तो थोड़ा मुस्कुराओ, आँखे भी नम कर लो...... और इस अदब के साथ हाथ मिलाओ कि लोकतंत्र जैसी कोई चीज आस-पास की हवा में घुल-मिल रही है। अखबारों में छपी खबरों की स्याही के रंग जैसा कुछ इतना गाढ़ा लिखो कि सरकार की आँखों में मुहब्बत की तरह उतर जाओ और एक दिन ढेर सारे पदकों के साथ अपने घर लौटो दिल्ली से.... या दिल्ली जैसे किसी शहर से, या फिर दिल्ली को अपना घर और उस सरकार को अपना परिवार मान लो जो पाँच सालों में अदला-बदली करके वापस लौट आती है। विपक्ष में रहो पर उतना जितना मनमोहन सिंह-आडवानी के, मुलायम सिंह-मायावती के, ममता बनर्जी-बुद्धदेव के या कोई भी पार्टी, संसद के इर्द गिर्द किसी पार्टी के। इतने विपक्षी मत बनों की सरकार के लिए माओवादी हो जाओ....कि बेगुनाही के बावजूद सलाखों के पीछे भेजने का लोकतंत्र है...इतने विपक्षी होना प्रशांत राही होना है, लिखने की इतनी आजादी मत माँगो कि सीमा आजाद या लक्ष्मण चैधरी जैसा बर्ताव करना पड़े सरकार को, इतने भी नहीं कि लिखने और लड़ने की कीमत हेमचन्द्र पाण्डेय जितना अदा करनी पड़े सरकार द्वारा की गई हत्या के रूप में, पत्रकारिता के ये उसूल जिन्दगी को सुकून और भविष्य में लोकतंत्र को फुर्सत देंगे। लोकतंत्र के बुढ़ापे का समय है, मौत धीरे-धीरे इसी तरह आएगी।
जंगलों में आदिवासी अपने विस्थापन, प्रताड़ना, असंतुष्टि के खिलाफ लड़ रहे हैं और उनकी लड़ाई को माओवादियों ने सशस्त्र बना दिया है और एक राजनैतिक व सांगठनिक स्वरूप में वे ज्यादा मजबूती के साथ उभर कर आए हैं इतनी मजबूती कि सरकार नहीं बल्कि संसदीय संरचना अपने को असुरक्षित मान रही है, स्थानीयता के लिहाज से अपनी समस्याओं के खिलाफ और एक बड़े फलक पर तंत्र के खिलाफ इस उभार को देखा जा सकता है, अभी हाल के दिनों में जबकि यह बहस जारी ही है कि माओवादी जंगलों तक ही क्यों सीमित हैं? इस बीच पिछले कुछ सालों में कई ऐसे पत्रकारों को सलाखों के पीछे भेजा गया है, प्रताड़ित किया गया है या फिर उनकी हत्याएँ की गईं हैं, जिन्हें सरकार ने माओवादी के रूप में चिह्नित किया है या माओवादी गतिविधियों में शामिल पाया है। वरिष्ठ माओवादी नेता आजाद के साथ हेमचन्द्र पाण्डेय की हाल में की गई हत्या या पुलिस हिरासत में पीपुल्स मार्च के बंगला संस्करण के सम्पादक स्वप्न दास गुप्ता की मौत बहस में कुछ नए पन्ने जोड़ती है, मसलन, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हेमचन्द्र एक पत्रकार थे बावजूद इसके यदि माओवादी भी थे तो वह कौन सी चीज थी जिसने एक पत्रकार को माओवादी बना दिया और सरकार को उनकी हत्या करनी पड़ी, वे न तो उन जंगलों से थे जहाँ जमीनों को छीना जा रहा है और लोगों को विस्थापित किया जा रहा है और न ही वे लालगढ़, सिंगूर, बस्तर, गड़चिरौलि से थे, सलवा जुड़ुम का दमन उनके घरों तक नहीं पहुँचा था बावजूद इसके एक पत्रकार माओवादी क्यों हो गया। आदिवासियों के असंतुष्टि के आधार पर माओवादी होने की प्रक्रिया को समझना थोड़ा आसान है क्योंकि रोज-बरोज हो रही मौत और गाँवों में सुबह मिल रही किसी पड़ोसी की लाश, चुप-चाप मौत से पहले लड़ने का एक साहस तो देती ही है। पर पत्रकारिता को जारी रखते हुए, सुकून की जिंदगी जीते हुए और शायद सरकारी लोकतंत्र का समर्थन करते हुए हेमचन्द्र, प्रशांत राही, सीमा आजाद, स्वप्न दास गुप्त के अलावा कई ऐसे पत्रकार थे और हैं जो अपनी जिंदगियाँ वैसी ही गुजार सकते थे जैसी ठीक-ठाक जिन्दगी के बारे में आप सोच सकते हैं, पर नाम बदल कर, गुमनामी और बगैर किसी पहचान के जीना महज जुनून नहीं होता बल्कि यह माओवाद की जंगल से जेहन तक की यात्रा है। दरअसल माओवाद का सैद्धांतिक और बौद्धिक पक्ष वहीं मजबूत होता है जहाँ सत्ता को कार्यवाहियों और संस्थानों के टूटने का भय ही नहीं बल्कि एक ऐसी संरचना के बेनकाब होने का खतरा है जो अपने चरम व्यवस्थित स्थिति में क्रूरता और तानाशाहियों के साथ चंद लोगों के वर्चस्व को ही चरम पर पहुँचाती है। शायद ऐसी व्यवस्था के खिलाफ उग्र होने की कवायद ही एक पत्रकार को उग्रवादी या उग्रवाद समर्थक बना देती है, जो मणिपुर, असम से लेकर देश के किसी भी शहर में मिल सकते हैं अपने नाम या किसी और नामों के साथ, अपनी कलम को हथियार बनाते हुए।

चन्द्रिका
मो0: 09890987458
क्रमश:
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

मंगलवार, 14 सितम्बर 2010

विशेष साक्षात्कार: पूंजीवादी व्यवस्था बेहद चालाक है: अजीज पाशा, भाग 2

1945 को जन्में सैयद अजीज पाशा अपने छात्र जीवन से ही राजनीति और जनांदोलनों में सक्रिय रहे हैं। 1974 से 1979 तक एआईएसएफ के महासचिव रहे तत्पश्चात सैयद अजीज पाशा आंध्रा प्रदेश से राज्यसभा सदस्य हैं। 27 फरवरी ए0आई0वाई0एफ0 के सचिव एवं आंध्रा प्रदेश विशेषतौर पर हैदराबाद की हाशिये पर पड़ी गरीब जनता के संघर्षो की आवाज बनकर रहे हैं। देश की वाम राजनीति से जुड़े होने के पश्चात भी वर्तमान वाम राजनीति की दशा और दिशा पर बेहद बेबाकी से अपनी राय जाहिर की। उनसे लोकसंघर्ष के लिए बातचीत की दिल्ली के युवा पत्रकार महेश राठी ने।

प्र0 देश में अल्पसंख्यकों विशेषतौर पर मुस्लिमों के सवाल क्या हैं?
अजीज पाशा- गरीबी मुस्लिम अल्पसंख्यकों की सबसे बड़ी समस्या है। यदि गरीबी के आँकडो को ही लें तो इससे भी देश के मुसलमानों की स्थिति का पता चलता है। जहाँ देश में गरीबी रेखा के नीचे आबादी का प्रतिशत 22 है वहीं मुसलमानों में यह 31 प्रतिशत है। इसके अलावा अशिक्षा और अवसरों की उपलब्धता में भेदभाव भी मुस्लिमों की गरीबी का मुख्य कारण है। नौकरशाही जरूरतमंदों तक संसाधनों को नहीं पहुँचने देती है। अवसरों के बँटवारे का यह भेद अल्पसंख्यकों के भीतर भी है मसलन कि जो अल्पसंख्यक देश की आबादी का महज एक प्रतिशत हैं उनकी फौज में भागीदारी 12 प्रतिशत हैं वहीं वे मुस्लिम जो देश में अल्पसंख्यकों की बहुमत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं उनकी संख्या फौज में बेहद कम है। बैंक कर्जों में भी ऐसा भेदभाव दिखाई देता है। इसके अलावा मुसलमानों में जागरूकता की कमी भी उनकी गरीबी का मुख्य कारण है। उन्हें मालूम ही नही है कि उनके लिए क्या सहूलियतें हैं?
प्र0 देश में मौलिक धर्मनिरपेक्ष के तौर पर स्थापित वाम शासित प्रदेशों विशेषतौर पर पं0 बंगाल में भी मुसलमानों की स्थिति कोई खास बेहतर नहीं है। क्या कारण है कि वामपंथ भी अल्पसंख्यकों की बेहतरी का कोई माॅडल पेश नही कर पाया?
अजीज पाशा- हमें अपनी नाकामी को मान कर चलना चाहिए। सच्चर कमेटी के आँकड़े देखें तो उसमें सरकार की विफलता जान पड़ती है। यह ठीक है कि गलतियाँ हुई हैं, परन्तु अब हम उन गलतियों को ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं। पं0 बंगाल में वक्फ की जमीन को बचाने के लिए विशेष कानून बनाया गया है जिसमें वक्फ की जमीन को कब्जा करने के खिलाफ कडे़ दण्ड एवं तुरन्त कार्यवाही का प्रावधान है। ऐसा कानून बनाने वाला पं0 बंगाल एकमात्र राज्य है। आपरेशन बरगा भी ऐसा कार्यक्रम था जिसमें बिना किसी भेदभाव के जमीनों का बँटवारा किया गया था। गलतियों को ठीक करने के लिए विशेष कदम उठाए जा रहे हैं।
प्र0 आपकी निगाह में मुस्लिम अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाने चााहिए?
अजीज पाशा-रंगनाथ मिश्रा कमेटी और सच्चर कमेटी की रिपोर्ट पर ईमानदारी से अमल करते हुए उन रिपोर्टो की संस्तुतियों को लागू करने से मुसलमानों की स्थिति बेहतर हो सकती है।

मोबाइल: 09891535484
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
(समाप्त)

सोमवार, 13 सितम्बर 2010

विशेष साक्षात्कार: पूंजीवादी व्यवस्था बेहद चालाक है: अजीज पाशा, भाग 1

1945 को जन्में सैयद अजीज पाशा अपने छात्र जीवन से ही राजनीति और जनांदोलनों में सक्रिय रहे हैं। 1974 से 1979 तक एआईएसएफ के महासचिव रहे तत्पश्चात सैयद अजीज पाशा आन्ध््रा प्रदेश से राज्यसभा सदस्य हैं। 27 फरवरी ए0आई0वाई0एफ0 के सचिव एवं आंध्रा प्रदेश विशेषतौर पर हैदराबाद की हाशिये पर पड़ी गरीब जनता के संघर्षो की आवाज बनकर रहे हैं। देश की वाम राजनीति से जुड़े होने के पश्चात भी वर्तमान वाम राजनीति की दशा और दिशा पर बेहद बेबाकी से अपनी राय जाहिर की। उनसे लोकसंघर्ष के लिए बातचीत की दिल्ली के युवा पत्रकार महेश राठी ने।
प्र0 लगातार मँहगाई बढ़ते जाने और सरकार की जन विरोधी नीतियों के बावजूद जनता आंदोलित नही हो रही है। मँहगाई विरोधी विपक्षी अभियान केवल राजनैतिक विरोध प्रदर्शन भर बनकर रह गया है। इस पर आप क्या सोचते हैं?
अजीज पाशा- जुल्म फिर जुल्म है, बढ़ता है तो मिट जाता है।
दरअसल पूंँजीवादी व्यवस्था बेहद चालाक है और आम आदमी के लिए इसकी कार्य प्रणाली व चालाकी को समझना बेहद कठिन काम है। यह व्यवस्था लोगो से ऐसे हरे भरे वादे करती है जिसमें आम आदमी फँसकर रह जाता है। इसके अलावा भारतीय समाज में लोकप्रिय कर्म का सिद्धान्त भी आदमी को संतोषी बनाता है। फिर भी यह पूरे राजनैतिक तंत्र की विफलता है और कहीं न कहीं जनपक्षीय वामपंथ की विफलता भी कही जाएगी कि उसका राजनैतिक संदेश भी आम आदमी तक नही पहँुच रहा है।
प्र0 एन0डी0ए0 से लेकर यू0पी0ए0 तक सभी द्वारा जन विरोधी नीतियाँ जारी रखने के बावजूद भी क्या कारण है कि देश में वामपंथ का जनाधार लगातार घटता जा रहा है?
अजीज पाशा- देखिए पिछले दो दशकों से देश की राजनीति वास्तविक नहीं बल्कि भावनात्मक मुद्दों पर ही केन्द्रित है, जिसके कारण जातिवाद और साम्प्रदायिकता के सवालों पर लोगो के धुव्रीकरण की प्रक्रिया में तेजी आई है। कभी-कभी वाम राजनीति के गलत निर्णय भी उसके जनाधार के घटने का कारण बनते हैं। मसलन कि यूपीए-1 से परमाणु करार के सवाल पर समर्थन वापसी। यदि वामपंथ ने सरकार से मँहगाई के सवाल पर समर्थन वापस लिया होता तो उसके लिए इसके नतीजे कहीं बेहतर होते।
प्र0 आपकी निगाह में वर्तमान राजनीति के एक जनपक्षीय विकल्प का क्या रास्ता होना चाहिए?
अजीज पाशा-जनवादी धर्मनिरपेक्ष शक्तियों का एक व्यापक एवं उचित प्लेटफार्म ही देश को सही विकल्प दे सकता है। इसके अलावा मँहगाई के सवाल पर जमीनी स्तर से शुरू करके संसद तक निरन्तरता वाला एक जनांदोलन होना चाहिए। साथ ही इस सरकार की नीतियों का पर्दाफाश भी होना जरूरी है। बैंको के विनिवेश और निजीकरण की मुहिम के खिलाफ भी सतत् अभियान चलाते हुए आम जन को जागरूक किए जाने की जरूरत है क्योंकि निजीकरण से देश में सर्वहारा के हितों को लगातार नुकसान पहँुच रहा है।
प्र0 अपने छात्र जीवन में आपने राष्ट्रीय छात्र आंदोलन का नेतृत्व किया है, मगर वर्तमान समय में वाम छात्र राजनीति देश के छात्रों और नौजवानों को अपनी ओर आकर्षित करने में नाकाम है। आप इसका क्या कारण सोचते हैं?
अजीज पाशा- इसमें संगठन की कमजोरियाँ भी हैं। हमारे पास छात्र नौजवानों को आकर्षित करने के लिए कोई निश्चित कार्यक्रम भी नही है। पहले छात्र संगठन हर मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रियाँ देते थे उन सवालों पर आंदोलन चलाते थे, आज उसका सरासर अभाव है। जनता के मुद्दों पर गली कूँचों से लेकर संसद तक लड़ाई होती थी जिसमें छात्र नौजवान अगुवा लड़ाकू दस्ते के रूप में रहते थे। इसके अलावा संगठन रिचुअलिजम का भी शिकार हैं। हमें रिचुअलिस्ट मैथड को छोड़कर नई पीढ़ी के मूड और उमंगों को समझते हुए भी आगे बढ़ना होगा। ऐसा नही है कि संभावनाएँ नही हैं अर्थिक विषमताएँ बढ़ी हैं, लोगो की तकलीफंे बढ़ी हैं। मगर लोगो की जरूरतों को समझना पडे़गा। लोग आज भी कई तरह की समस्याएँ लेकर आते हैं, आज भी लेफ्ट के लिए मैदान है।
प्र0 जनवाद में संवाद की भूमिका बेहद अहम है। परन्तु वर्तमान समय में संसद में चुने हुए प्रतिनिधियों का व्यवहार संसदीय बहस को अवरुद्ध करते हुए बहस और संवाद को खत्म कर रहा है। इसे आप कहाँ तक उचित समझते हैं?
अजीज पाशा- बार-बार संसद के कार्य को अवरुद्ध करना ठीक नही है। पिछले दिनों मँहगाई के सवाल पर भी हमने प्रमुख राजनैतिक दलों से कह दिया है कि हम इस पंरपरा के खिलाफ हैं कि संसद न चलने दी जाए। हमने कहा है कि काम रोकने के बजाए संवाद के जरिए से समस्याओं को हल करने की तरफ बढ़ना चाहिए।

मोबाइल: 09891535484
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित