रविवार, 31 अक्तूबर 2010

एतद् देश प्रसूतस्य शकासाद् अग्रजन्मन : , स्वं-स्वं चरित्रं शिक्षरेन् पृथ्वियां सर्व मानव :

भावार्थ- जो लोग भारत में पैदा हुए तथा यहाँ के ब्राहमणों ने अपने-अपने चरित्र से पृथ्वी के समस्त मानव-प्राणी को शिक्षा दी
उपर्युक्त श्लोक को तकरीबन 25 वर्षों एक सद्ग्रंथ में पढ़ा तो मेरा मन बाग़-बाग़ हो उठा, मन-मयूर नृत्य करने लगामुझे इस बात का गर्व था कि हमारे पूर्वज दुनिया में सबसे अच्छे थेवे चरित्रवान थे, मानवीय मूल्यों से परिपूर्ण थेज्यादा समय नहीं बीता, मैं निराश होने लगा, मेरा मनका ढह गयाअब विश्वास ही नहीं होता कि हम बहुत अच्छे थेयदि हम बड़े मानवीय मूल्यों से युक्त थे, इंसानियत पसंद थे, तो आज क्या हो गया हैसन् 1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्तियाँ रख दी गयीं, 6 दिसम्बर 1992 में यह मस्जिद नारा लगते हुए सरेशाम तोड़ दी गयीइंदिरा गाँधी की हत्या के पश्चात सिखों का संहार, गुजरात में गोधरा-कांड के पश्चात मुस्लिमो का संहार तथा महिलाओं के गर्भ में पल रहे बच्चे को धारदार हथियार से पेट चीर मार देना, उड़ीसा के कंधमाल में दलित ईसाईयों का संहार तथा उनके घर-झोपड़ियों को आग के हवाले कर देना आदि घटनाएं क्या यही दर्शाती हें कि हम बड़े कुलीन हैं, हम अच्छे हैं, चरित्रवान हें, सभी हैं ?
इस देश में फसिस्टवादियों की संख्या 20 प्रतिशत से भी कम हैआज भी हम अपने कर्तव्यों से पूरी दुनिया को शिक्षा देने में सक्षम हैं, परन्तु हमारी अच्छाइयों को कट्टरपंथियों ने गहरे धुंध में धकेल दिया हैदुर्योधन द्वारा भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया जा रहा था, उनको नग्न करने का प्रयास चल रहा थाउस समय भीष्म पितामह मौन थेयुधिष्ठिर धर्मराज कहे जाते थे, इन्होने भी प्रतिकार नहीं कियाआज हम उन्ही लोगों जैसे धर्मधुरंधर हो गए हैंसांप्रदायिक ताकतें नंगा नृत्य करती रहती हैं, मानवीय मूल्यों का गला घोटती रहती हैंइंसानों को मौत के घाट उतारती रहती हैं, फिर भी हम चुप बैठे रहते हैं

युगलकिशोर शरण शास्त्री
निकट बाबरी मस्जिद
अयोध्या
फैजाबाद

शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

मिली है ज़िंदगी मुझको किसी सौग़ात की तरह














कभी
बादल कभी बिजली कभी बरसात की तरह
मिली है ज़िंदगी मुझको किसी सौग़ात की तरह,

मैं जिसके साथ होती हूँ उसी के साथ होती हूँ
जुदाई में भी होती हूँ मिलन की रात की तरह'

समझ पाती नहीं हूँ मैं किसी की बात का मतलब
सभी की बात लगती है उसी की बात की तरह,

किसी की याद के जुगनू कभी जब जगमगाते हैं
तभी अल्फ़ाज़ सजते हैं किसी बारात की तरह''

जिसे देखा किया 'मीत' बिना देखे भी हर लम्हा
बिना उसके भी सुनाती हूँ उसे नग़्मात की तरह....!

-मीत

शुक्रवार, 29 अक्तूबर 2010

नौसेना की भूमि पर सफ़ेदपोश अपराधियों ने बहुमंजिला ईमारत बना डाली

मुंबई के कोलाबा में नौसेना की भूमि को सफेदपोश अपराधियों ने नेताओं और अपराधियों की साठ-गाँठ से आदर्श कोपरेटिव हाउसिंग सोसाइटी के नाम करा ली और उस पर 31 मंजिला ईमारत नियमो और उपनियमो को धता बताकर बना दीरक्षा विभाग सहित पूरे देश में सरकारी जमीनों पर बिल्डर्स, नौकरशाहों, और राजनेताओं की मिलीभगत से कब्जे हो गए हैं और उन पर निर्माण कार्य भी हो गए हैंदूसरी तरफ समाज में कमजोर तबकों की अपनी व्यक्तिगत प्रोपर्टी इन्ही तत्वों के कारण बचनी मुश्किल हो गयी हैउनकी जमीनों के फर्जी बैनामे हो जाते हैं और फिर अधिकारीयों और गुंडा तत्वों की मदद से निर्माण कार्य भी हो जाते हैंकमजोर व्यक्तियों की सुनवाई नहीं हो पाती हैजब रक्षा विभाग अपनी जमीनें नहीं बचा पा रहा है तो गरीब आदमियों की संपत्ति कैसे बचेगी
कोलाबा स्तिथ रक्षा विभाग की भूमि में बहुमंजिला ईमारत बन जाने के कारण नौसेना का हेलिपैड अन्य मिलिट्री संसथान नहीं बनाये जा सकते हैंइस मामले में रक्षा विभाग की आपत्तियों के बावजूद भी महाराष्ट्र सरकार ने हाउसिंग सोसाइटी वालों की ही मदद की हैऐसा लगता है कि देश में विधि का शासन नहीं हैसंविधान के तहत कार्य करने वाली संस्थाओं पर सफ़ेदपोश अपराधियों का कब्ज़ा हो गया हैसंविधान के तहत प्रत्येक नागरिक को संपत्ति रखने का अधिकार है और अब इस अधिकार का हनन तेजी से हो रहा है

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बृहस्पतिवार, 28 अक्तूबर 2010

अमेरिकन न्याय, शांति, सुरक्षा, स्वतंत्रता, लोकतंत्र का यह अनोखा रूप

मेरा क्या कर लोगे
दुनिया में शांति, सुरक्षा, लोकतंत्र, न्याय, स्वतंत्रता, समानता आदि का मानवीय चेहरा लगाये हुए अमेरिकन ब्रिटिश सैनिकों ने ईराक के अन्दर ६६ हजार से अधिक ईराकियों को भयंकर प्रताड़ना देकर उनकी हत्या कर दी है। अमेरिका के गुप्त सैन्य दस्तावेजों के अनुसार इराक में मारे गए एक लाख नौ हजार बत्तीस लोगों का ब्यौरा है। इसमें ६६ हजार ८१ नागरिक, २३ हजार ९८४ विद्रोही, १५ हजार १९६ इराकी सर्कार के सैनिक और गटबंधन सेना के हजार ७७१ सैनिक शामिल हें। १५ हजार आम लोगों की मौतों का कोई अता पता नहीं है। इराकी नागरिकों को पकड़ कर पिटाई करने जलाने और कोड़े बरसाने के साथ साथ महिलाओं के साथ बलात्कार करना भी शामिल है।
पत्रकारों को मारने के लिए हेलीकाप्टर गनशिप का भी इस्तेमाल किया गया है। पकडे गए नागरिकों के साथ अमानवीय व्यवहार किया जा रहा है। लोहे की पीपे और जंजीरों से पीटा जाता है। खाने के नाम अखाद्य चीजों को भी खाने के लिए मजबूर किया जाता है।
विक्लिक्स वेबसाइट ने ईराक के अन्दर अमेरिका द्वारा किये जा रहे युद्ध अपराधों का गोपनीय ब्यौरा अपनी वेबसाइट पर जारी किया है। वेबसाइट के मुख्य संपादक जूलियन असांजे ने कहा है कि यह दस्तावेज युद्ध के दौरान किये गए अपराधों के ठोस सबूत हें यह अपराध अमेरिका की अगुवाई करने वाली गठबंधन सेनाओं और इराकी सरकार द्वारा किये गए हें
साम्राज्यवाद का असली चेहरा यही है चाहे अमेरिकन साम्राज्यवाद हो या ब्रिटिश साम्राज्यवाद हमारे देश में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई लड़ी है किन्तु हमारे देश के वर्तमान नेतागण अमेरिकन साम्राज्यवाद के जबरदस्त प्रशंसक हैं और उनके द्वारा किये जा रहे कृत्यों के ऊपर सिर्फ मानवीय चेहरा लगा हुआ है।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

संघ के हिन्दुवत्व का असली चेहरा

हम हैं हिन्दुस्तानी
अजमेर के ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर 2007 में हुए विस्फोट में संघ के सह प्रचारक इन्द्रेश कुमार, अभिनव भारत संगठन के मुखिया स्वामी असीमानंद, जय वन्देमातरम की मुखिया साध्वी प्रज्ञा सिंह, सुनील जोशी, संदीप डांगे, राम चन्द्र कलसंगारा उर्फ़ राम जी, शिवम् धाकड़, लोकेश शर्मा, समंदर और देवेन्द्र गुप्ता सहित कई हिन्दुवत्व वादी संगठनो के नेताओं के नाम आये हैं
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जो देश में अपने को बहुसंख्यक हिन्दुओं का संगठन मानता है, उसकी स्थापना 1925 में हुई थी। लेकिन आज तक यह संगठन इस देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी का प्रतिनिधित्व नहीं कर पाया है इसलिए इसने अपने प्रचार तंत्र के माध्यम से दूसरे धर्मों के अनुयायियों के प्रति घ्रणा का उग्र प्रचार किया है और इससे अपने अनुवांशिक संगठनो के माध्यम से दंगे-फसाद करने का कार्य पूरे देश में नियोजित तरीके से किया है।
अपने स्थापना काल से ही 1947 तक ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ चले आन्दोलन में संघ परिवार का कोई भी व्यक्ति जेल नहीं गया था और ब्रिटिश साम्राज्यवाद की समय-समय संघ परिवार मदद करता रहा है।
संघ ने राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या से लेकर उड़ीसा, गुजरात, दिल्ली, यू.पी, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, आन्ध्र प्रदेश में नरमेध कार्यक्रम जारी रखा है। जब इतने प्रयासों के बाद भी इस संगठन को बहुसंख्यक हिन्दू जनता का प्रतिनिधित्व नहीं मिला तो इसने आतंकवाद का ही सहारा लिया, महाराष्ट्र के नांदेड कस्बे में इसके कार्यकर्ता खतरनाक आयुध बनाते समय विस्फोट हो जाने से मारे गए। दूसरी तरफ यू.पी के कानपूर में भी बजरंग दल के कार्यकर्ता बम बनाते समय मारे गए।
6 अप्रैल 2006 में नांदेड में हुए बम विस्फोट में 5 लोग पकडे भी गए जब पुलिस ने आर.एस.एस के लोगों के घरों पर छपे डाले तो छपे में मुसलमानों जैसी ड्रेस, नकली दाढ़ी, बरामद हुई जिसका उपयोग वे मस्जिद पर हमले करने की योजना बनाते समय करते थे। जिससे साम्प्रदायिक दंगे भड़के। नांदेड बम कांड के आरोपियों ने यह भी खुलासा किया था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिसद, बजरंग दल, दक्षिण भारत में आतंकी नेटवर्क बनाकर आतंकवाद का सहारा ले रहा है।
हिन्दुवाहिन्दुवत्वत्व आतंकवाद ने देश को गृह युद्ध में झोकने के लिए आर.एस.एस के इन्द्रेश ने मोहन राव भागवत की हत्या का षड्यंत्र रचकर पूरे देश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ जारी दुष्प्रचार के तहत ( यदि षड्यंत्र कामयाब हो जाता ) पूरे देश में अल्पसंख्यकों के विनाश की तैयारी कर ली गयी थी। मालेगांव बम विस्फोट के आरोपितों के बयानों में यह भी आया है कि आर.एस.एस के उच्च पदस्थ अधिकारी इन्द्रेश ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई.एस.आई से तीन करोड़ रुपये लिए थे। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेसी आई.एस.आई को एक समय में भारत विरोधी कार्यों के लिए सी.आई. ने उन्हें बाकायदा प्रशिक्षण देने के साथ आर्थिक मदद की थी। सन 1947 में भारत ब्रिटिश साम्राज्यवाद से मुक्त हुआ था और दुनिया में ब्रिटिश साम्राज्यवाद कमजोर होने की वजह से अमेरिकन साम्राज्यवाद का उदय हुआ था।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखने की प्रथम सूचना रिपोर्ट 23 दिसंबर 1949


२३ दिसम्बर 1949 की ऍफ़..आर
नक़ल रिपोर्ट एस.. बतारिख 23-12-49 जेरे दफा 147/295/448 ताजिराते हिंद रेक्स के जरिये, पंडित श्री राम देव दुबे एस.एस इंस्पेक्टर इन्चार्ज थाना अयोध्या फैजाबाद अभय राम के खिलाफ () राम सुकुल दस () सुदर्शन दस, साकिन अयोध्या, फैजाबाद 50-60 अफराद नाम पता नामालूम, थाना अयोध्या (मिसिल - स्टेट बनाम जन्म भूमि/बाबरी मस्जिद जेरे दफा 145 सी.आर.पी.सी) केस नंबर 3/49, आखिरी हुक्म 3-9-1953,
जबानी
बा इत्तिला माता प्रसाद कान्सटेबल नंबर-7 तकरीबन 7 बजे सुबह के, जब मैं जन्मभूमि पहुंचा, तो मालूम हुआ कि तखमीनन 50-60 अफराद का मजमा कुफुल, जो बाबरी मस्जिद के कम्पाउन्ड में लगे हुए थे, तोड़ कर नीज दीवार के जरिये सीढ़ी फांद कर अन्दर मस्जिद मदाखिलत कर के मूर्ती श्री भगवान की स्थापित ( कायम) कर दी और दीवारों पर अन्दर बहार सीता राम जी वगैरा गेरू से पीले रंगे से लिख दिया, कान्सटेबल नंबर 7 बंस राज मामूर ड्यूटी मना किया, नहीं माने, पी.एस.सी की गारद, जो वहां मौजूद थी, इमदाद के लिए बुलाई, लेकिन उस वक्त तक लोग अन्दर तक मस्जिद में दाखिल हो चुके थे, अफसरान वाला, जिला, मौके पर तशरीफ़ लाये और मसरुफे-इंतजाम रहे बादहू मजमा तख्मिनन 5-6 हजार इकठ्ठा होकर मजहबी नारे कीर्तन लगा कर, अन्दर जाना चाहते थे, लेकिन माकूल इंतजाम होने की वजह से, राम सुकुल दस, सुदर्शन दस पचास साठ अफराद मालूम ने बलवा कर के मस्जिद में मदाखिलत कर के मूर्ति स्थापित करके, मस्जिद नापाक की है, मुलाजिमीन मामूरह ड्यूटी के बहुत से अफराद ने इसको देखा है लिहाजा चेक की गयी, सही है
नोट- मैं हेड मुहर्रिर तसदीक करता हूँ कि हस्ब बयान एस. इत्तलाती रिपोर्ट में लफ्ज नाकाबिले तहरीर लिखा गया..........पढ़ा सही है

दस्तखत
परमेश्वर सिंह, हेड मुहर्रिर
23-12-49
मुहर

सोमवार, 25 अक्तूबर 2010

एक थे पंडित हरि किशन

बाबरी मस्जिद से सम्बंधित मुसलमानों की तरफ से पहला मुकदमा 1961 में दाखिल किया गया ये मुकदमा उत्तर प्रदेश सुन्नी सेन्ट्रल बोर्ड आफ वक्फ ने किया ये एक कार्पोरेट संस्था है जिसकी रचना उत्तर प्रदेश मुस्लिम वक्फ एक्ट के अंतर्गत किया गया वक्फ बोर्ड पर जिम्मेदारी थी कि वक्फ की तमाम जायदादों की निगरानी और हर तरह से इसकी रक्षा करेगी 1960 के वक्फ एक्ट से पूर्व भी वक्फ बोर्ड था और उत्तर प्रदेश मुस्लिम वक्फ एक्ट 1936 के तहत काम करता था और इसलिए फैजाबाद जिले के परगना हवेली अवध के नगर अयोध्या में 1528 में बनी एक मस्जिद, जिसे बाबरी मस्जिद के नाम से प्रसिद्धि मिली, इस मस्जिद की हिफाजत की बात आई तो वह मुक़दमे में शामिल हो गया अब चूंकि बाबरी मस्जिद की जगह मिट्टी का ढेर है इसलिए ये बताना बेवजह नहीं होगा कि मस्जिद की मुख्य ईमारत के बाहर एक चबूतरा हुआ करता था, जो उत्तर दक्खिन 17, और पूरब पश्चिम 21 फीट था, जो राम चन्द्र जी के जन्म स्थान के तौर पर सौ साल से ज्यादा अरसे से जाना जाता था पहली बार 1885 में महंत रघुबर दास ने अपने आप को जन्म-स्थान का महंत बताया और एक मुकदमा (ओरिजिनल सूट नंबर 61/280, वर्ष 1883) दाखिल करके उल्लिखित चबूतरे पर ही मंदिर बनाने का मतालबा किया महंत ने सेक्रेटरी आफ स्टेट फॉर इंडिया इन काउन्सिल के अलावा बाबरी मस्जिद के मुतावल्ली मोहम्मद असगर को पार्टी बनाया
लेकिन फैजाबाद के सब-जज पंडित हरी किशन ने 24 दिसम्बर 1885 ई को यह मुकदमा ख़ारिज कर दिया गया, याद रहे, ये मुकदमा मुसलमानों के खिलाफ नहीं था। महंत रघुबर दस ने इस फैसले के खिलाफ एक दीवानी अपील नंबर 27/1885 दाखिल की, इस को जिला-जज ने मार्च 1886 ई में ख़ारिज कर दिया। अवध के जुडिशियल कमिश्नर के समक्ष दाखिल दूसरी अपील भी ख़ारिज हो गयी।
ये कहा जाता है कि 1934 ई में सांप्रदायिक फसाद के दौरान बाबरी मस्जिद का एक हिस्सा ध्वस्त हो गया, लेकिन इसकी मरम्मत करा दी गयी थी, सरकारी खर्च पर एक मुसलमान ठेकेदार के जरिये। 1936 ई में उत्तर प्रदेश मुस्लिम वक्फ एक्ट XII निर्मित करने के बाद, इसके कानून के अनुसार वक्फ कमिश्नर ने जांच की और यह बताते हुए कि बाबरी मस्जिद बादशाह बाबर ने निर्माण कराई थी जो एक सुन्नी मुसलमान था।
बाबरी मस्जिद को वक्फ आम करार दिया गया। वक्फ कमिश्नर रिपोर्ट की कापी हुकूमत ने सुन्नी सेन्ट्रल बोर्ड आफ वक्फ को भेजी। जिसे कमिश्नर आफ वक्फ की रिपोर्ट को 16 फरवरी 1944 को पूरी तरह से सरकारी गजट में प्रकाशित करा दिया गया। वक्फ बोर्ड का कहना कि किसी व्यक्ति ने भी इस रिपोर्ट के खिलाफ एतराज दाखिल करके यह दवा नहीं किया कि वह मुस्लिम वक्फ नहीं बल्कि मंदिर है। महंत रघुबर दस की अपील अदालत से थी कि चूँकि कोई ईमारत नहीं है , इसलिए चबूतरे पर रहने वालों को सर्दी, गर्मी व बरसात में काफी तकलीफें होती हें, इसलिए इस चबूतरे पर मंदिर निर्माण की इजाजत डी जाये।
फैजाबाद के सब जज पंडित हरी किशन ने छ: बिंदु बताये और अंतत: अपने फैसले में कहा कि हालाँकि चबूतरे पर ठाकुर जी की मूर्ति है, और पूजा होती है और बाबरी मस्जिद और चबूतरे के बीच में दीवार है। 1885 ई में हिन्दुवों मुसलमानों में हिंसा के बाद एक कनाती दीवार बनाई गयी थी, ताकि मुसलमान दीवार के अन्दर इबादत कर सकें और हिन्दू दीवार के अन्दर पूजा कर सकें और भविष्य में विवाद न हो, इस तरह चबूतरा और बाउन्डरी की जमीन, हिन्दुवों की मुद्दे की हुई। लेकिन मंदिर तामीर करने की इजाजत नहीं डी जा सकती। क्यों कि मंदिर के घंटे और संख की आवाज गूंजेगी और हिन्दू और मुसलमान दोनों एक ही रास्ते से आये या जायेंगे, जिससे आने वाले दिनों में फौजदारी मामलात में वृद्धि होगी। और फसाद में हजारों लोगो का खून बहेगा। मंदिर बनाने की इजाजत देने का मतलब होगा, फसाद और कत्ले आम की बुनियाद रखना। अंतत: मुद्दई की अर्जी ख़ारिज कर दी जाती है।

एक थी बाबरी मस्जिद से साभार

रविवार, 24 अक्तूबर 2010

एक शर्मनाक और चौंका देने वाला निर्णय

निवेदिता मेनन
(kafila.org से साभार)
इस फैसले के प्रभाव, लोकतंत्र के लिए इसके निहितार्थों, और आने वाले भविष्य के बारे में यह जो कुछ भी कहता है- इस सबने मुझे तोड़ कर रख दिया है.
मीडिया में एक के बाद एक आडम्बर प्रेमी महानुभावों द्वारा इस फैसले में किये गए समझौते की परिपक्वता के बारे दिए गए हर वक्तव्य के साथ मेरा आक्रोश बढ़ता जा रहा है.
उदाहरण के लिये- प्रतापभानु का आखिर इरादा क्या है जब वे अमन सेठी द्वारा उद्धृत लेख में कहते हैं कि इस उद्देश्य के लिये उस घटनास्थल को ही राम का जन्मस्थान मानने की स्वीकारोक्ति का एक ही अर्थ हो सकता है- धर्म के अराजनीतिकरण का प्रयास.
उसी स्थल को “इस उद्देश्य के लिये” राम का जन्मस्थान मान लेने से धर्म से राजनीति कैसे अलग हो जाती है? भूमि का स्वामित्व तय करने का उद्देश्य क्या है? संपत्ति के विवाद में आप खुद भगवान को शामिल करने जा रहे हैं और यही है “धर्म का अराजनीतिकरण”?
राम आस्था का विषय हैं या तर्क का,पौराणिक कथाओं का हिस्सा हैं या इतिहास का,समय से परे हैं या किसी विशेष कालखंड से बंधे हुए,यथार्थ हैं या कल्पना की उपज, ये सभी मुद्दे बहस का विषय हो सकते हैं.पर ऐसा लगता है कि अदालत ने यह मान लिया है कि से भारतीय समाज में व्याप्त अपनी पहचान के विभिन्न स्वरूपों से विचार-विमर्श के माध्यम छुटकारा नहीं ही मिल सकता.
प्रताप की और अदालत की भी समझ में ये “भारतीय अस्मिता” आखिर है क्या? क्या इसमें ब्रह्मह्म समाज को मानने वाले और मेरी माँ जैसे निष्ठावान सनातनी हिन्दू सम्मिलित हैं, जिन्हें यह विचार ही स्तब्ध कर देता है कि कोई हिन्दू ईश्वरीय अस्तित्व को भूमि के एक संकीर्ण, छोटे से टुकड़े तक सीमित मान सकता है? और गैर हिन्दुओं और दलितों के बारे में क्या विचार है? और नास्तिकों और धार्मिक संशयवादियों के बारे में ? और ये राम जन्मभूमि न्यास भी आखिर है क्या? मंदिर बनाने के एकमात्र उद्देश्य से अधिकतर उत्तर भारतीय साधुओं, संतों-महंतों, और विश्व हिन्दू परिषद् और भाजपा के सदस्यों द्वारा गठित एक न्यास. यही है “भारतीय” पहचान का प्रतीक?
ऐसा लगता है कि अदालत ने राज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को खतरे में डाले बगैर धार्मिक दावों को स्वीकार कर लिया है. इससे शुद्धतावादी तो संतुष्ट नहीं होंगे. पर धर्मनिरपेक्षता को मज़बूत करने का यह कोई अविश्वसनीय तरीका नहीं है.
पर अदालत ने धार्मिक दावों को यथावत स्वीकार नहीं किया है; किया है क्या? सुन्नियों के, या आम भाषा में कहें तो मुसलमानों के दावे स्वीकार नहीं किये गए हैं; किये गये हैं क्या? मैं आईने की दुनिया में भटकती किंकर्तव्यविमूढ़ एलिस की तरह महसूस कर रही हूं.
मैं उकता चुकी हूं टालमटोल करती सतर्कता से: शायद फैसले के तकनीकी बिन्दुओं पर हमने ध्यान ही नहीं दिया. ये भूमि के स्वामित्व का विवाद है, हमें इसके कानूनी निहितार्थों पर ध्यान देना चाहिए, क्या हम सभी कानूनी बारीकियों को समझ पा रहे हैं………..वगैरह वगैरह.
कानूनी बारीकियां? वैधता? फैसला न केवल बहुत गैर जिम्मेदाराना है बल्कि इसमें मनमाने तरीके से यह भी तय कर लिया गया है कि कब वैधता और बारीकियों पर जोर देना है और कब उन्हें नज़रंदाज़ करना है. जब भी कोई तर्क कमज़ोर लगने लगता है तो कई अन्य, बिलकुल विरोधाभासी तर्क भी जोड़ दिए गए हैं; सिर्फ अपने बचाव के उद्देश्य से. ये तो ऐसे ही हुआ जैसे कोई झूठा कहने लगे कि माफ़ करें मैं अपना वादा पूरा नहीं कर पाया क्योंकि मैं डेंगू से ग्रस्त होकर बिस्तर पर पडा था, और मैं अपनी बीमार मां की देखभाल भी कर रहा था जिनके पैर की हड्डी टूट गई थी, और फिर काफी तेज़ बारिश होने लगी और सड़कों पर पानी भर गया.
“आस्था” किसी भी आधुनिक विधिक न्यायालय में निर्णय का पर्याप्त आधार हो सकती है, यही नहीं, ए एस आई की रिपोर्ट दिखाती है कि मस्जिद बनाने के लिये मंदिर तोड़ा गया था, और सुन्नी वक्फ बोर्ड भी निर्णायक रूप से अपना अधिकार सिद्ध करने में असमर्थ रहा है.
फिर ये है क्या?
एएसआई की रिपोर्ट की वैज्ञानिकता? कमियों से भरी, अत्यधिक संदिग्ध, और तकनीकी तौर पर अरक्षणीय.
विधिक अभिलेख? राम जन्मभूमि न्यास के पास एक भी ऐसा साक्ष्‍य नहीं है जो विधिक परीक्षण में खरा उतर सके. २० मार्च, १९९२ के पट्टे के दस्तावेज़ से, जो ४३ एकड़ भूमि पर राम जन्मभूमि न्यास और विश्व हिन्दू परिषद् के दावे का आधार है, स्पष्ट हो जाता है कि वह भूमि उत्तर प्रदेश सरकार की थी और न्यास को विशिष्ट उद्देश्य मात्र के लिये दी गयी थी. यह सरकारी ज़मीन है जिसका उपयोग सार्वजनिक उद्देश्य के लिये ही किया जा सकता है. मंदिर का निर्माण ऐसे उद्देश्यों के विपरीत है. अतः भूमि पर न्यास का कोई कानूनी स्वामित्व नहीं है.
इस लिये आस्था का सहारा लिया गया. पर आपको एक बात पता है? आस्था तो सुन्नी वक्फ बोर्ड के पास भी बहुतेरी है.
प्रताप ये भी कहते हैं संपत्ति के मामले में “किसी भी पक्ष द्वारा अधिकतम की मांग करना एक भूल होगी.”"किसी भी पक्ष” का तात्पर्य सुन्नी वक्फ बोर्ड ही हो सकता है क्योंकि न तो न्यास, न ही अखाड़े द्वारा अदालत से मिली भूमि से अधिक की मांग करने की संभावना है. प्रताप चेतावनी देते हैं कि जितनी मिली है उससे अधिक भूमि की मांग करने का अर्थ होगा, वे लोग संपत्ति के लोभ में जिद्दी हो गये हैं. इसका अर्थ यही हुआ कि यदि न्यास भूमि पर दावा करता हो वह तो अनेक अमूर्त और ऊंचे सिद्धांतों और ईश्वर तक की प्रेरणा से ऐसा कर रहा है. पर यदि वक्फ बोर्ड अपनी कानूनी संपत्ति पर दावा करे तो वह लोभ और असभ्यता प्रदर्शित कर रहा है.
जब सारा तर्क ख़ामोश हो जाता है,तो हर ओर लोग बड़बड़ाने लगते हैं, पर कल्पना कीजिये कि फैसले में यह मान लिया गया होता कि “हिन्दुओं” के दावे का कोई भी कानूनी आधार नहीं है; तब क्या हुआ होता, तब होता रक्तपात और नरसंहार.
तो ये है असली मुद्दा. पर अगर ऐसा ही है, अगर सचमुच रक्तपात रोकने के लिये ये सब किया गया है, और अगर इसके लिये हत्यारों को संतुष्ट करना आवश्यक है तो अदालत जाने की आवश्यकता ही क्या थी? दोनों समुदायों के समझदार लोगों की एक उपयुक्त “पंचायत” में बातचीत द्वारा निपटारा क्यों न कर लिया जाय जिसमें कमज़ोर पक्ष पूरी तरह समझौता कर ले और उसके बाद हमेशा ख़ामोश रहे ?
महिला के साथ बलात्कार हुआ है, वह गर्भवती है, उसका कोई आसरा नहीं है, पंचायत बैठती है, बलात्कारी उससे विवाह करने को तैयार हो जाता है,सारा मामला सुलझ गया. अब बच्चा अवैध संतान नहीं होगा, स्त्री को एक पति मिल जायेगा. और जो भी हो, कल्पना करो कि वो उससे शादी करने को तैयार न होता, हम क्या करते, उस महिला को आत्महत्या करनी पड़ती. या फिर हमें ही उसे मारना पड़ता. उसके एक और पत्नी है. कोई बात नहीं. वो शराबी है और कई बलात्कार कर चुका है. कोई बात नहीं अगर उस लड़की की मांग भर जाये.
हमारा काम हो गया. हमने मामला सुलझा दिया, अब आगे बढ़ें. गड़े मुर्दे मत उखाड़ो. क्या फायदा?
बीती ताहि बिसार दे? ठीक है, पर मैं भ्रमित हूं. आपका मतलब है कि हम भूल जायें कि मस्जिद बनाने के लिये बाबर ने कोई मंदिर तोड़ा था या नहीं?
अरे नहीं, नहीं. बीती बात से हमारा मतलब था १८ वर्ष पहले १९९२ में मस्जिद तोड़ने से. उसे भूल जाओ. और वो अतीत जब बाबर ने मंदिर तोड़ा था? ५०० वर्ष पहले? वो अतीत तो हम हमेशा याद रखेंगे.
हम हैं वे बलात्कार की शिकार महिलाए जिनकी शादी उनके बलात्कारियों के साथ कर दी गई है ताकि गाँव पहले जैसा ही चलता रहे.
हम का अर्थ साफ़ है- मुस्लिम और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यक.
और वे हिन्दू भी जिनके लिये राम अप्रासंगिक हैं.
और हम बेचारे भोले लोग – अपने नामों में अपनी धार्मिक सामुदायिक पहचान संजोये, और उन निजी कानूनों में जो नियंत्रित करते हैं हमें, मगर जीते हुए इस भ्रम में कि हम नागरिक हैं एक आधुनिक लोकतंत्र के, और जीते हुए इस भरोसे के साथ कि किसी भी संघर्ष में हर समुदाय और समूह के साथ न्याय होना ही चाहिए. हम में से बहुतेरे उस समय गला फाड़ कर चिल्लाते थे – ये एक राजनीतिक मुद्दा है. ये अदालत में तय नहीं किया जा सकता. इस पर राजनीतिक विचार विमर्श होना चाहिये,हर स्तर पर लगातार काम करते हुए,भारतीय समाज के सभी तबकों की बात सुनी जानी चाहिए इस बहस में,इसे एक तरह का बड़ा, सार्वजनिक, राष्ट्रीय जनमत संग्रह बन जाने दो.
पर ये कहना कितना आसान है – “अदालत को तय करने दो.” मानो अदालतें समकालीन राजनीति से ऊपर होती हों.
सो अब अदालत ने तय कर दिया है.
और हमारी शादी हमारे बलात्कारियों के साथ कर दी गई है.हमें खामोश कर दिया गया है हिंसा की धमकी देकर. कम से कम हम ये दिखावा तो न करें कि ये वीभत्स परिस्थित बिलकुल सही और न्याय संगत है.

शनिवार, 23 अक्तूबर 2010

उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनाव में जारी हिंसा का मुख्य कारण मंत्री और मंत्रियों, अधिकारीयों के रिश्तेदारों का प्रत्याशी होना है

उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव चल रहे हैंतीन चरणों में मतदान पूरा हो चुका हैचौथे चरण का मतदान 25 अक्टूबर को होना हैइन चुनावों की मुख्य विशेषता यह है कि मंत्रियों के पूरे के पूरे परिवार चुनाव मैदान में हैंचुनाव से जुड़े हुए अधिकारीयों कर्मचारियों के परिवार के लोग चुनाव मैदान में होने के कारण चुनाव आचार संहिता का कोई अर्थ नहीं रह गया हैचुनाव आचार संहिता का उपयोग विपक्षी प्रत्याशियों के उत्पीडन के लिए किया जा रहा हैप्रशासनिक गुंडागर्दी का यह आलम है कि लोगों की मोटरसाइकिलों तक पंचर कर दी जा रही हैंमतदाताओं की जबरदस्त पिटाई की जा रही हैउसके बावजूद भी चुनावी हिंसा रुकने का नाम नहीं ले रही हैवहीँ प्रत्याशी मतदाताओं को दारु-मुर्गा, साड़ी, सहित तमाम तरह की घूस मतदाताओं को दे रहे हैं
लोकतान्त्रिक व्यवस्था के पतन की तस्वीर इन चुनावों में दिखाई दे रही हैयदि सरकारी चुनाव मशीनरी निष्पक्ष तरीके से कार्य करे तो काफी हद तक लोकतान्त्रिक व्यवस्थित तरीके से चुनाव संपन्न कराया जा सकता हैअन्यथा इस तरह से चुने गए उमीदवार सिर्फ घोटाला करने के अतिरिक्त कुछ करते नहीं हैं

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2010

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों की समस्याओं का तुरंत निराकरण करो



२१ अक्टूबर 2010 को नयी दुनिया में प्रकाशित खबर
दिल्ली में छात्रों को डी.टी.सी बसों से यात्रा करने के लिए आन्दोलन का सहारा लेना पड़ रहा है जबकि दिल्ली सरकार को अविलम्ब छात्रों की सुविधा के लिए बसों की व्यवस्था करनी चाहिएदिल्ली में पूरे देश के नौजवान अध्ययन हेतु जाते हेंसरकार की पहली प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि उन छात्रों को अध्ययन हेतु समस्त सुविधाएं उपलब्ध कराएं लेकिन दिल्ली परिवहन के अधिकारी श्री कसाना ने हिटलरी अंदाज में बसें चलाने के लिए मना कर दिया जबकि केंद्र सरकार दिल्ली राज्य सरकार ने लगभग 70 हजार करोड़ रुपये से अधिक रुपया राष्ट्रमंडल खेलों के लिए खर्च कियाउसमें हजारों हजार करोड़ रुपये नेताओं और अधिकारियों की जेब में लूट खसोट कर के चला गया लेकिन छात्रों को सुविधा देने में भ्रष्टाचार या आर्थिक मुनाफा कम होना है इसलिए ऐसे जवाब अधिकारियों द्वारा दिए जा रहे हेंदिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति की नैतिक जिम्मेदारी है कि वह अविलम्ब दिल्ली परिवहन के अधिकारियों से बातचीत कर परिवहन सुविधाएं उपलब्ध कराएंदिल्ली में जाकर अध्ययन करने वाले छात्रों में काफी छात्र सामान्य माध्यम वर्गीय घरों के होते हें जो अपनी भूख और प्यास पर काबू कर अध्ययन कार्य करते हैंइन्ही छात्रों की प्रतिभों से नए भारत का निर्माण होना हैभ्रष्टाचारियों लूट-खसोट मचाने वाले लोगों से नहींलोकसंघर्ष परिवार को पूर्ण विश्वास है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति महोदय अविलम्ब इस समस्या का निदान कराएँगे

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बृहस्पतिवार, 21 अक्तूबर 2010

देश सुरक्षा एजेंसियों की कैद में होता जा रहा है ?

भारत के प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह को संसद भवन से सुरक्षा के नाम पर वापस लौटना पड़ावहीँ गृहमंत्री पी.चिदंबरम को राष्ट्रमंडल खेलों की सुरक्षा तैयारी के सम्बन्ध में खेल स्थल पर पहुँचने के लिए 500 मीटर पैदल जाना पड़ा और ड्राईवर अन्य स्टाफ को बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ादोनों घटनाओ में सुरक्षा एजेंसियों में तालमेल होना मुख्य कारण बताया गयाइस सम्बन्ध में मेरे एक मित्र मोस्को से लौटने के बाद बताया था कि साधारण सी मीटिंग में उनको 500 मीटर ले जाने के लिए काले शीशे की बंद गाडी में 10 किलोमीटर का चक्कर लगाकर ले जाया जाता थाबैठक समाप्त हो जाने के बाद मेरे मित्र महोदय पैदल टहलते हुए अपने होटल जाते थेउन्होंने सुरक्षा व्यवस्था का विश्लेषण करते हुए बताया कि जनता और नेताओं के बीच में एक इस्पात की मजबूत दीवाल खड़ी की जा रही हैजिससे नेता और जनता के बीच में संपर्क में रहे और पूरे देश में खुफिया एजेंसियों के अधिकारीयों का वास्तविक राज कायम हो जाता हैखुफिया अधिकारी तरह-तरह के किस्से और कहानियां गढ़ कर राजनेताओं को भयभीत करने का भी कार्य करते हैंयह स्तिथि किसी भी देश के लिए खतरनाक होती है
साधारणतय: चुनाव के दरमियान सुरक्षा शांतिपूर्वक चुनाव के नाम पर जो गुंडागर्दी प्रशासनिक होती है वह अद्भुद हैदूर-दराज के इलाकों में मतदान करने जाने का मतलब है कि सरकारी मशीनरी द्वारा बेइज्जत होना और पिटना हैप्रशासनिक अधिकारी चुनाव के समय जब निकलता है तो उसके साथ चल रही फ़ौज हटो और बचो के बीच जनता को जबरदस्त तरीके से पीटने का ही कार्य करती है। उच्च न्यायलय द्वारा बाबरी मस्जिद प्रकरण पर फैसला सुनाये जाने से पहले दो बार पूरे प्रदेश में कर्फ्यू जैसी स्तिथि पैदा की गयी। अब यह स्तिथि आम हो गयी है कि सुरक्षा के नाम पर नग्न तांडव होने लगता है और अगर इन सभी प्रकरणों में वित्तीय चीजों की जांच की जाये तो पता चलेगा की करोड़ो रुपयों की हेरा-फेरी भी हो रही है। आज बड़ी जरूरत है कि सुरक्षा के नाम पर हो रहे उत्पीडन को रोका जाए।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस व भाजपा - मौसेरे भाई हैं

राष्ट्रमंडल खेलों में जहाँ आयोजन समिति से जुड़े हुए कांग्रेस के नेताओं ने जमकर लूट खसोट की है वहीँ भारतीय जनता पार्टी के नेतागण उसमें हिस्सेदारी करने से चुके नहीं हैं भाजपा उसे जुड़े संघ के नेता हर समय सामाजिक शुचिता आदर्शों की बात करते हैं लेकिन जब-जब मौका मिला हैभ्रष्टाचार की गंगोत्री में जमकर स्नान किया है भाजपा के नेता सुधांशु मित्तल की कंपनी राष्ट्रमंडल खेलों में सात सौ करोड़ रुपयों से अधिक का कार्य कियाउसमें भ्रष्टाचार की जांच के लिए आयकर विभाग ने लगभग 30 ठिकानो पर छापे डाले हैं
राष्ट्रमंडल खेलों में बैडमिंटन स्टेडियम के होवा कोर्ट खरीद में डेढ़ करोड़ रुपये का गबन ही है। केन्द्रीय सतर्कता आयोग ने प्रारंभिक जांच में ही लगभग 8 हजार करोड़ रुपये की धांधली पकड़ी है। ज्ञातव्य है की आयोजन समाप्ति के बाद तुरंत पूरे देश में एक साथ छापेमारे जाने की तैयारी केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने की थी किन्तु सत्तारूढ़ दल के बड़े नेताओं के हस्ताक्षेप के बाद उक्त कार्यवाई स्थगित कर दी गयी थी। संसद के अन्दर सत्तारूढ़ दल और मुख्य विपक्षी दल भाजपा नूराकुश्ती लड़ कर इन घोटालों के ऊपर पर्दा डालने का काम करेगी। देश के अन्दर जिस क्षेत्र में आप नजर डालेंगे वहां पर आर्थिक घोटालेबाजों की फ़ौज ही नजर आएगी। इस तरह से भाजपा कांग्रेस या अन्य पूंजीवादी दल हमेशा भ्रष्टाचार की प्राण वायु से ही जिन्दा हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2010

पुलिस थानों में क्या-क्या होता है, उसकी जानकारी प्रधानमंत्री से लेकर सबको होती है

अभी हाल में उत्तर प्रदेश ने पत्रकारों से सम्बंधित दो घटनाएं हुई हैं। एक में कानपुर से प्रकाशित हिंदुस्तान अखबार के प्रेस को पुलिस वालों द्वारा चारो तरफ से घेर कर वहां चेकिंग के नाम पर गाड़ियों को सीज किया गया और प्रेस के अन्दर घुस कर वहां कार्यरत लोगों की मां का डाकन किया गया। दूसरी घटना में में यशवंत सिंह की बूढी माँ व अन्य औरतों को गाजीपुर जनपद के नंदगांव थाने में बिना किसी अपराधिक कारण के निरुद्ध रखा गया।
मुख्य प्रश्न यह है कि यह सब क्या देश के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की जानकारी में नहीं है। उसका एक ही उत्तर है कि यह सब उनकी जानकारी में होता है। थानों के अन्दर दस बीस लात मार देना, चूतडों पर पट्टे चला देना, गुप्तांगो में मिर्च पाऊडर डाल देना, पेट्रोल लगाना, करंट लगाना 15-15 दिन तक थाने में बंद कर मारपीट करना आम बात है और यह सब कार्य मासूम से लगने वाले पुलिस के उच्च अधिकारीयों की जानकारी में होता है। बड़े-बड़े न्यायविद्, न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े हुए लोग की जानकारी में होता है। इलेक्ट्रोनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया, साइबर मीडिया यह सब लोग इन अमानवीय कुकृत्यों के ऊपर पर्दा डालने का काम करते हैं। जब देश का राष्ट्रपति किसी को पुलिस पदक दे रहा होता है तो हम आप गौरवन्वित महसूस करते हैं कि उसने ऊपर लिखे कार्य भी किये होंगे यह भूल जाते हैं।
आजकल कोई घटना होने पर दस बीस लोगों को पकड़ कर थाने ले आया जाता है और फिर तमाम तरह की अमानुषिक यातनाओ का दौर शुरू होता है और फिर घटना का राज खुल जाता है। पिटे हुए लोगों को पुलिस अधिकारी पत्रकारों के समक्ष पेश करता है। पीटा हुआ व्यक्ति अपने सारे अपराधों को तोते की तरह कबूल करता दिखाई देता है। तब प्रिंट मीडिया के पत्रकार, इलेक्ट्रोनिक मीडिया का एनाउंसर पुलिस अधिकारी भोपू बनकर कहानियां गाने का काम करने लगता है तब इन पत्रकार बन्धुवों को अमानुषिक यातनाओ को करने का अविधिक कार्य दिखाई नहीं देता है। अगर हमारी मीडिया के लोग अधिकारीयों को चप्पल पहनाने का कार्य छोड़ कर वस्तुस्तिथि को लिखना प्रारंभ कर दें तो निश्चित रूप से सुधार आयेगा। इस लोकतान्त्रिक व्यवस्था में यह कार्य अबाध्य रूप से जारी है और राजनेताओं से लेकर सभी की जानकारी में होता है। जब जिसके मत्थे पर यह बातें आती हैं तो वही दर्द से रोता और चीखता नजर आता है। चाहे वह बिरला जी का हिन्दुस्तान अखबार हो, चाहे साइबर पत्रकार यशवंत सिंह।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 18 अक्तूबर 2010

परम आदरणीय सर्वश्री पं.डी.के.शर्मा"वत्स, Anupam कर्ण, पद्म सिंह, सुमित प्रताप सिंह

बाबरी मस्जिद से पहले भी वहां मस्जिद ही थी - डा। सूरजभान

के आलेख पर आई हुई टिप्पणियां
ब्लॉगर"> पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

सुमन जी, अब तो आपको अपना नाम बदल ही लेना चाहिए....वैसे नमाज वगैरह पढना तो अब तक सीख ही चुके होंगें :)

१७ अक्तूबर २०१० ७:५९ अपराह्न


<span title=ब्लॉगर"> Anupam karn ने कहा…

. Mr. Surajbhan , May be you right in your logic but ever thought that whether god lives in logic or not , sure the judgement is based more on faith less logical ....that's how They (judges) could be wise Because God lives in our faith our perception , That's all they could think about the termination of the problem but now ...why are we fueling it more saying it unwiseful .It's not that they didn't leave the land for Masjid May be it support the demolition May be it hurt a few muslim . but same time it's with the sentiments of crores of hindus(which can't be neglected) and we will have to think what the mass want (they want peace) everybody can't be satisfied on this issue . I'll will urge all the people to accept it to terminate it as we all know God don't live in mandir/masjids but in something else . plz don't be logical but be thoughtful here as they did ..... it's now because of media that they (Muslim) are going to SC just nothing except promoting the problem more .

१७ अक्तूबर २०१० १०:३१ अपराह्न


<span title=बेनामी"> पद्म सिंह ने कहा…

हाईकोर्ट का फैसला आर एस एस या विश्व हिंदू परिषद द्वारा प्रायोजित पुरातत्वविदों की रिपोर्ट के आधार पर किया गया ... कमी ये रही कि आप या सूरजभान पिछले साठ वर्षों से जाने कहाँ खोये रहे ... वरना जजों को कुछ तो अक्ल आ जाती ...
कृपया यह बताएँगे कि ये पोस्ट किस के द्वारा प्रायोजित है ?

१८ अक्तूबर २०१० ५:३८ पूर्वाह्न


<span title=बेनामी"> पद्म सिंह ने कहा…

कृपया एक पोस्ट मथुरा, वाराणसी के मंदिरों के बारे में लिखें कि वहाँ की मस्जिदों से पहले वहाँ क्या था ?
दिल्ली की कुतुबमीनार के बारे में भी लिखें कि इसे कैसे बनाया गया है ... क्या ये आपके एजेंडे में नहीं है ?

१८ अक्तूबर २०१० ५:४१ पूर्वाह्न


सुमित प्रताप सिंह ने कहा…

आप अपनी पत्रिका का नाम "लोकसंघर्ष पत्रिका" की बजाय "मुस्लिम संघर्ष पत्रिका" रख तो ज्यादा बेहतर रहेगा...


परम आदरणीय सर्वश्री पं.डी.के.शर्मा"वत्स, Anupam कर्ण, पद्म सिंह, सुमित प्रताप सिंह
सादर नमस्कार
लोकसंघर्ष ब्लॉग व लोकसंघर्ष पत्रिका हम सभी साथियों का सामूहिक ब्लॉग है व पत्रिका है। इस पत्रिका में हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई व भाषा आदि से अलग हटकर समाज के विभिन्न तबकों की सोच को प्रकाशित किया जाता है। जिसमें तथ्यों को तोडा व मरोड़ा नहीं जाता है। हम सब पहले भारतवासी हैं। उसके पश्चात अन्य चीजें यह देश जितना हमारा है उतना ही आपका है और हमारी आपकी एकता इस देश की एकता को मजबूत करती है। विभिन्न मत मतान्तर के बगैर जीवन चलना संभव नहीं है। विविधता में एकता हमारी ताकत है लेकिन आज कल कुछ लोगों ने राष्ट्रीयता या देश भक्ति का प्रमाणपत्र दूसरे की तरफ ऊँगली उठा कर मांगने की एक प्रथा चल चुकी है। जिससे स्तिथि यह है कि राष्ट्रीयता का झुनझुना बजाते हुए इस देश को चाहे जितना कमजोर करो सब जायज है। देश के असली दुश्मन हमारी आपकी आस्तीनों में छुपे बैठे हैं जो मिलावटखोर, भ्रष्टाचारी, मुनाफाखोर व आर्थिक अपराधी हैं जो देश की अर्थ व्यवस्था को कमजोर करके क्या देश की एकता और अखंडता को कमजोर नहीं करते हैं लेकिन हमारी आपकी दृष्टि में उनका कोई अपराध दिखाई नहीं देता है। बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ टैक्स चोरी के नए नए आयाम कायम करती हैं हम उनकी तरफ ऊँगली नहीं उठाते हैं। धार्मिक विवाद, भाषाई विवाद, जातीय विवाद में अपना समाये नष्ट कर हम देश की एकता और अखंडता को कमजोर करते हैं। लोकसंघर्ष पत्रिका इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया से तमाम सारे विषय छूट जाते हैं उनको प्रकाशित करती है। हम आपके विचारों का हमेशा स्वागत करते हैं।
आपका
सुमन
loksangharsha

बाबरी मस्जिद से पहले भी वहां मस्जिद ही थी - डा. सूरजभान


रामजन्मभूमि -बाबरी मस्जिद विवाद, काफी समय से इलाहाबाद उच्च न्यायालय (लखनऊ पीठ) के सामने विचाराधीन है। उच्च न्यायालय फिलहाल इस प्रश्न पर साक्ष्यों की सुनवाई कर रहा है कि 1528 में बाबरी मस्जिद के बनाए जाने से पहले, वहां कोई हिंदू मंदिर था या नहीं? हालांकि दोनों पक्षों के गवाहों से काफी मात्रा में साक्ष्य दर्ज कराए जा चुके थे, उच्च न्यायालय ने यह तय किया कि विवादित स्थल पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से खुदाई कराई जाए। इस खुदाई के लिए आदेश जारी करने से पहले अदालत ने, संबंधित स्थल का भू-भौतिकी सर्वेक्षण भी कराया था। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के ही आमंत्रण पर, तोजो विकास इंटरनेशनल प्राइवेट लि. नामक कंपनी ने, जिसका कार्यालय नई दिल्ली में कालकाजी में है, रिमोट सेसिंग की पद्धति से भूगर्भ सर्वेक्षण किया था। उक्त सर्वेक्षण की रिपोर्ट में संबंधित स्थल पर सतह के नीचे भूमिगत असंगतियां दर्ज की गयीं थीं। इस रिपोर्ट के ही अंशों में से असंगंतियां, ``प्राचीन या समकालीन निर्माणों जैसे खंभों, नींव की दीवारों, संबंधित स्थल के बड़े हिस्स् में फैले पत्थर के फर्श से संबंद्ध`` हो सकती थीं।
इस तरह, तोजो विकास कंपनी के भूगर्भ सर्वेक्षण की रिपोर्ट के ही आधार पर, उच्च न्यायालय ने 5 मार्च 2003 के अपने आदेश जारी किए थे, जिनमें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण से कहा गया था कि विवादित स्थल पर खुदाई करे और इसका पता लगाए कि वहां कोई मंदिर बना हुआ था या नहीं? भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के दल ने 12 मार्च 2003 से वहां खुदाई का काम शुरू किया। मैं 10 से 12 जून तक खुदाई स्थल पर था। टीले के एक छोटे से हिस्से को छोड़कर जिस पर रामलला का अस्थायी मंदिर बना हुआ है, 80 मीटर गुणा 60 मीटर के विवादित क्षेत्र में भारतीय पुरातत्व सर्वे के विशेषज्ञों ने विस्तृत रूप से खुदाई की है। जे-3 खाई में 10 मीटर से भी ज्यादा गहराई तक गहरी खुदाई की गई है। इससे पहले 1969-70 में ए. के. नारायण (बनारस हिंदू विश्वविद्यालय) द्वारा और बी. बी. लाल (इंडियन इंस्टिट्यूट आफ एडवांस्ट स्टडीज़, शिमला) तथा के. वी. सुंदरराजन (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) द्वारा की गई खुदाइयों में उजागर किए गए स्स्कृतियों के क्रम की ही, मौजूदा खुदाई ने पुष्टि है। इसके हिसाब से अयोध्या में रामजन्मभूमि कहलाने वाले स्थल को सबसे पहले 600 ईस्वीपूर्व आबाद किया गया था। लेकिन, इसके बाद, कुषाण काल के आखिरी दौर में या गुप्त काल में, पांचवी सदी ईस्वी तक यह इलाका उजड़ चुका था। आरंभिक मध्य काल में आबादी के साक्ष्य नहीं मौजूदा खुदाई में आरंभिक मध्यकाल (600 ईस्वीपूर्व से 1200 ईस्वी) से संबद्ध बसावट का कोई संस्तर नहीं मिला है। मस्जिद की बाउंड्री वाल के नजदीक खुदाई में बी. बी. लाल ने जो चूने के फर्श ताथा `स्तंभ आधार` खोजे थे (इंडियन आर्कियोलजी - एक रिव्यू, 1976-77) और ग्यारहवीं सदी के बिताए थे, अब स्पष्ट हो गया है कि सल्तनत काल (13 वीं सदी ईस्वी) पहले के नहीं हो सकते हैं। जो भी नक्काशीदार काले पत्थर के खंभों, दरवाजे के कब्जे व अन्य नक्काशीदार पत्थर, विवादित स्थल पर या उसके निकट मिले थे, जिसके संबंध में हिस्टोरियन्स फोरम ने न्यू आर्कियोलोजिकल डिस्कवरीज (1992) में बताया था या जिनके मस्जिद के मलबे से मिलने के बारे में बताया गया था, उनका बाबरी मस्जिद के नीचे के संस्तरों से कोई भूसंस्तरीय संबंध नहीं बनता है। मौजूदा खुदाई में एफ-3 खाई में मिला काले पत्थर का खंभा, मस्जिद के मलबे से आया है। जे-3 खाई में मिला आलेखदार पत्थर, गढ़े के भरत में कंकड़ियों के साथ औंधा पड़ा पाया गया है। उसकी लिपि भी उन्नीसवीं सदी से पुरानी नहीं है। खुदाई में सामने आए सबसे महत्वपूर्ण मध्ययुगीन निर्माण, वास्तव में विभिन्न कालखंडों की दो मस्जिदों के अवशेष हैं। ये अवशेष टीले के तो उपरले संस्तरों पर हैं, लेकिन बाबरी मस्जिद के मलबे के नीचे हैं, जबकि मलबे के ऊपर अस्थायी मंदिर खड़ा हुआ है। सल्तनत काल की मस्जिद बाबरी मस्जिद से पहले की मस्जिद के सबसे अच्छे साक्ष्य खाई संख्याः डी-6, ई-6, एफ-6 तथा उत्तर व दक्षिण की कुछ और खाइयों में मिले हैं। उसकी पश्चिमी दीवार, बाहरी दीवार (बाउंड्री वाल) का भी काम करती होंगी। उसकी नींव में कुछ नक्काशीदार पत्थर लगे थे, जो कहीं अन्य पुराने निर्माणों से रहे होंगे। इसकी ऊपर की दीवारें सांचे की (मोल्टेड) ईंटों से बनी हैं, जो आस-पास में किन्हीं पुराने मध्यकालीन निर्माणों के मलबे से आयी होंगी। उपरोक्त खाइयों में एक हाल की दक्षिणी, पूर्वी तथा उत्तरी दीवारें देखी जा सकती हैं। दीवारों की अंदरूनी सतह पर चूने का पलस्तर है और ये दीवारें चूने और सुर्खी के फर्श से जुड़ती हैं, जो उत्खनन के करीब-करीब पूरे ही क्षेत्र में फैला हुआ है। इस फर्श के नीचे मिट्टी का भरत किया हुआ है, ताकि मस्जिद के फर्श को ऊपर उठाया जा सके। फर्श बनाने में चूने और सुर्खी के प्रयोग, दीवारों पर पलास्तर किया जाना और इन दीवारों पर बाबरी मस्जिद (निर्माण 1528 ईस्वी) की दीवारों का बनाया जाना, यह सब बाबरी मस्जिद से पहले के इस निर्माण के सल्तनत काल का होने को साबित करता है। बाबरी मस्जिद संबंधित मस्जिद पर जिस दूसरी मस्जिद के साक्ष्य मिले हैं, निर्विवाद रूप से बाबरी मस्जिद थी, जो पत्थरों से बनायी गई थी। इसेक दक्षिणी गुंबद की दीवारें, सत्लतनत काल की मस्जिद की ही निर्माण योजना का अनुसरण करती हैं। बाबरी मस्जिद की दीवारें, जहां-कहीं भी बची रह गयी हैं, चूने के पलस्तर के साक्ष्य पेश करती हैं। इस मस्जिद का फर्श भी, चूने तथा सुर्खी का बना है। पहले वाला यानी सल्तनत काल की मस्जिद का फर्श, अब मिट्टी के भराव के नीचे दब गया है, जो शायद मुगलकालीन मस्जिद को ऊपर उठाने के लिए किया गया होगा। मुगलकालीन मस्जिद का फर्श भी खूब लंबा-चौड़ा है, करीब-करीब सल्तनत काल की मस्जिद जितना ही। बाबरी मस्जिद से जुड़ा एक ओर महत्वपूर्ण निर्माण है, मस्जिद के दक्षिण-पूर्व में बना कंकड़-पत्थर का (पानी का) हौज। नौ-दस फुट की ऊंचाई तक, पत्थर के हरेक रद्दे पर चूने तथा सुर्खी का गारा फैलाया गया था। हौज की तली और दीवारों पर भी खूब मोटा पलस्तर किया गया है ताकि उससे पानी का रिसाव न हो। हौज की ऊपरी सतह के बाबरी मस्जिद के फर्श से जुड़े होने से, बाबरी मस्जिद (प्रथम चरण) के साथ इसके संबद्ध होने का पता चलता है। राम चबूतरा अट्ठारहवीं-उन्नीसवीं सदियों से जुड़ा एक विचित्र साक्ष्य सामने आया है। हौज को कंकड़-पत्थर से और चूने के मसाले से भर दिया जाता है। उसके ऊपर उसी सामग्री से छोटा सा चबूतरा बना दिया जाता है। चबूतरा पौने पांच मीटर गुणा पौने पांच मीटर का है। पहले चबूतर को घेरते हुए और बड़ा चबूतरा बनता है। अब चबूतरा 22 मीटर गुणा 22 मीटर का हो जाता है। इसी के ऊपर राम चबूतरा बनाया गया था। राम चबूतरा बाबरी मस्जिद के पहले फर्श में धंसा हुआ था, जिससे यह संकेत मिलता है कि चबूतरों का निर्माण बाबरी मस्जिद के निर्माण के काफी बाद का होगा। एक और निर्माण भी बाबरी मस्जिद के परिसर में धंसता नजर आता है। इसमें `स्तंभ आधार` शामिल हैं। ये स्तंभ आधार, जो गोल से या चौकोर से हैं, बीच में ईंट के टुकड़ों के बने हैं, जिनके बीच में कंकड़-पत्थर लगा है और इनमें मिट्टी के गारे की चिनाई है। ये सभी निर्माण किसी एक ही बड़े निर्माण के हिस्से नहीं हैं, जैसाकि बी. बी. लाल तथा एस. पी. गुप्ता मान बैठे थे। ऐसा लगता है कि ऐसे स्तंभ आधारों के समूह हैं और ये स्वतंत्र, साधारण छप्परों, छाजनों के हिस्से होंगे, जिनका अयोध्या में और उसके आस-पास दूकानों, झोंपड़ियों आदि के लिए उपयोग आम है। मस्जिद के उत्तर की ओर कुछ स्तंभ आधार सेंट स्टोन के भी बने हैं। ईंट के टुकड़ों के बने स्तंभ आधारों की रचना, बी. बी. लाल को इससे पहले की अपनी खुदाई में मिले स्तंभ आधारों से भिन्न नहीं है। उन्होंने इनका समय 11वीं सदी आंकने में गलती की है। बाबरी मस्जद परिसर में मिला तीसरा निर्माण, बहुत सारी कब्रें हैं जो बाबरी मस्जिद के उत्तर में भी पायी गई हैं और दक्षिण में भी। ये कब्रें बाबरी मस्जिद के पहले वाले फर्श में धंसी हैं। इससे पता चलता है कि ये कब्रें बाबरी मस्जिद के अपेक्षाक़त बाद के दौर में बनी होंगी। कब्रें उत्तर-दक्षिण दिशा में हैं। कब्रों में अस्थि-पिंजरों का चेहरा पश्चिम की ओर मुड़ा हुआ है, जैसाकि मुसलमानों में रिवाज है। इस खुदाई में बारी मस्जिद के बाद वाले चरण के साक्ष्य दूसरा फर्श फैलाये जाने के रूप में मिलते हैं। यह फर्श स्तंभ आधारों, कब्रों तथा चबूतरों को ढ़ांपने के बाद, यह फर्श चूना और सुर्खी का बना है। यह मस्जिद के आखिरी ढ़ांचागत चरण का संकेतक है। चूंकि 18वीं सदी के मध्य भाग से पहले राम चबूतरों की मौजूदगी का कोई साहित्यिक या ऐतिहासिक साक्ष्य नहीं है, चबूतरों स्तंभ आधारों तथा कब्रों का फर्श में धंसता हुआ निर्माण, 18वीं-19वीं सदियों का माना जा सकता है। यह ज्ञात ही है कि 1857 से पहले अयोध्या में दंगे हुए थे और इनमें कुछ खून-खराबा हुआ था। बहरहाल, अवध के नवाब के हस्तक्षेप से, दोनों समुदायों के बीच के टकराव को हल कर लिया गया था। इसके बाद सद्भाव बहाल हो गया था और इसके कुछ ही समय बाद, 1857 में हिदुओं और मुसलमानों ने मिलकर सामराजी सत्ता के खिलाफ मोर्चा लिया था। आगे चलकर, 1948 में बाबरी मस्जिद पर जबरन कब्जा किए जाने के बावजूद, 6 दिसंबर 1992 को संघ परिवार की उपद्रवी भीड़ों द्वारा ध्वस्त किए जाने तक, मस्जिद वहां कायम थी। अंत में हम निष्कर्ष के तौर पर कह सकते हैं: 1. रामजन्मभूमि कहलाने वाली जगह पर ताजा खुदाई से यह पता चलता है कि भगवान राम के अयोध्या में जन्मा होने के परंपरागत विश्वास को इतिहास में अनंतकाल तक पीछे नहीं ले जाया जा सकता है क्योंकि यहां तो पहली बार आबादी ही 600 ईस्वीपूर्व में आयी थी। 2. ताजा खुदाई से इसकी और पुष्टि होती है कि बाबरी मस्जिद के नीचे कोई हिंदू मंदिर नहीं था। वास्तव में इसके नीचे (यानी उसी स्थान पर इससे पहले) सल्तनत काल की एक मस्जिद थी। इसलिए, 1528 में मस्जिद बनाने के लिए बाबर के ऐसे किसी कल्पित मंदिर को तोड़े जाने का सवाल ही नहीं उठता है। 3. खुदाई में यह भी पता चला है कि बाबरी मस्जिद से जुड़े पानी के हौज के ऊपर राम चबूतरा बनाया गया था। इसके साथ ही ईंट के टुकड़ों तथा सेंड स्टोन के स्तंभ आधारों का निर्माण और बाबरी मस्जिद परिसर में बनी कब्रें, सभी बाद में जोड़े गए निर्माण हैं और ये 18वीं-19वीं सदियों से पहले के नहीं लगते। उन्नीसवीं सदी में बाबरी मस्जिद का जीर्णोद्धार हुआ था और उसका दूसरा फर्श सभी बाद के निर्माणों को ढ़ांपे हुए था। यह विचित्र बात है कि विश्व हिंदू परिषद ने, संघ परिवार तथा भाजपा के समर्थन से, अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाफ घृणा तथा हिंसा का आंदोलन छेड़ा है। इसमें न तो मुस्लिम अल्पसंख्यकों का कोई कसूर है और न ही इसके पीछे कोई जायज कारण है। यह मुहिम मानवता, जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता तथा सामाजिक न्याय के उन सभी मूल्यों की धज्जियां उड़ाते हुए छेड़ी गयी है, जिनकी सभी आधुनिक सभ्य समाज इतनी कद्र करते हैं।
जाने-माने पुरातत्वविद, इतिहासकार और सोशल एक्टिविस्ट डॉ. सूरजभान का 14 जुलाई 2010 को रोहतक (हरियाणा) में निधन हुआ। उनका जन्म 1 मार्च 1931 को मिंटगुमरी (फ़िलहाल पाकिस्तान में) हुआ था। वे इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस, अर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के केन्द्रीय सलाहकार मंडल और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् की कार्यकारिणी केसदस्य रहे। 1992 में बाबरी मस्जिद गिरा दिए जाने के बाद उसके मलबे में से मंदिर के तथाकथित अवशेष ढूंढ़ने का दावा कर रहे आरएसएस प्रायोजित कथित पुरातात्विकों से उन्होंने लोहा लिया और वे इस मसले में लखनऊ की अदालत में बतौर विशेषज्ञ गवाह के रूप में पेश होते रहे। यह बात दीगर है कि अयोध्या पर आए यूपी हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के विवादास्पद फैसले में एक न्यायाधीश ने यहां तक कहा कि चूंकि वे इतिहासकार नहीं है इसलिए उन्होंने ऐतिहासिक पहलू की छानबीन नहीं की पर उन्होंने यह भी कह दिया कि इन मुकदमों पर फैसला देने के लिए इतिहास और पुरातत्वशास्त्र अत्यावश्यक नहीं थे! डा. सूरजभान का यह लेख सहमत मुक्तनाद, अप्रैल-जून 2003 अंक में छपा था
(एक ज़ि‍द्दी धुन से साभार)

शनिवार, 16 अक्तूबर 2010

बहुराष्ट्रीय कंपनिया मुनाफे के लिए नारकोटिक्स ड्रग्स स्मगलिंग में लिप्त हें

विश्व की बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में मानी जाने वाली इलेक्ट्रोनिक क्षेत्र की दक्षिण कोरियाई कंपनी सैमसंग है इसके कर्मचारियों अधिकारीयों के लिए इसकी अपनी जेट हवाई सेवा भी है जून 2010 में अमेरिका के कैलिफोर्निया से कोलंबस नमक स्थान पर सैमसंग कंपनी का जहाज जाने की तैयारी में था कैलिफोर्निया हवाई अड्डे के कर्मचारियों को उसमें रखे गए सामान पर शक हो गया तलाशी लेने पर 230 किलोग्राम मारिजुआना- नमक एक नशीला पदार्थ बरामद हुआ जिसको मौत के सौदागरों के हाथ बेचने पर लगभग 15 करोड़ का मुनाफा होगा
सैमसंग कंपनी की व्यावसायिक हैसियत को देखने के हिसाब से 15 करोड़ रुपये का कोई अर्थ नहीं है लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मुनाफे से मतलब होता है और मुनाफे के लिए वह कुछ भी कर सकती हैं मानवता, इंसानियत इनके शब्दकोष में नहीं है भारतीय बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ की भी अगर जांच की जाए तो कर चोरी के अलावा मानव विरोधी बहुत से कार्यों में इनके संलिप्तता पायी जाएगी बहुराष्ट्रीय कंपनी रिलायंस तमाम तरह के घोटालों में लिप्त होने के बाद भी भारत सरकार उनके विरुद्ध कार्यवाई करने में हमेशा अपने को असमर्थ पाया है भारतीय बहुराष्ट्रीय निगम अपने मुनाफे में वृद्धि करने के लिए सरकार के नियमो और उपनियमो को भी अपने पक्ष में करने के लिए सभी हथकंडे अपनाती है

सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

अधिवक्ताओं के वेश में अपराधियों की लम्बी फ़ौज है

उत्तर प्रदेश में आये दिन न्यायलय परिसरों में मारपीट की घटनाएं हो रही हैं कहने के लिए यह न्याय का मंदिर है लेकिन जब न्याय के मंदिर में प्रवेश करते ही पिटाई शुरू हो जाए तो उस व्यक्ति को न्याय क्या मिलेगा राजधानी लखनऊ में एक भारी संख्या में साइकिल स्टैंड, स्कूटर स्टैंड, चाय आदि की दुकान चलवाने वाले, प्रापर्टी डीलर्स, बिल्डर्स संगीन अपराधी काला कोट धारण कर अपने हितों की रक्षा के लिए घंटा दो घंटा न्यायलय परिसरों में देखे जाते हैंयह लोग अब इतने ताकतवर हो गए हैं कि वास्तविक प्रैक्टिसिंग अधिवक्ता को भी डराने धमकाने लगे हैं कि कौन सा केस करना है और कौन सा नहीं करना है अधिवक्ता समाज की इज्जत को यह इस्तेमाल करते हैं। अपनी अपराधिक गतिविधियों में, मकान दुकान खाली करने से लेकर जमीनों के ऊपर कब्ज़ा करने का कार्य करने लगे हैं कथित आतंकियों की गिरफ्तारी के सवाल पर एस.टी.एफ के उकसावे पर भी न्यायलय परिसरों में अधिवक्ताओं की पिटाई हो चुकी है किन्तु अब बाराबंकी जनपद जैसे छोटे शहरों में उसी तर्ज पर न्यायलय परिसर में वादकारियों की पिटाई होने लगी है तहसील रामनगर से लेकर बाराबंकी तक अधिवक्ताओं का एक गिरोह जमीन कब्ज़ा करने से लेकर हत्या करने की भी सुपारी लेने लगा है वोट के चक्कर में जिला बार एसोशीएसन ऐसे अपराधी तत्वों के समर्थन में कार्य बहिस्कार करने लगती है जिनसे ऐसे अपराधी तत्वों को मदद मिलती है जिला प्रशासन भी अपराधी वकीलों के खिलाफ कार्यवाई करने में अपने को असहाय महसूस करता है
माननीय उच्च न्यायलय इलाहाबाद खंडपीठ लखनऊ में अधिवक्ता प्रशांत गौड़ ने प्रार्थना पात्र देकर न्यायलय से गुहार की ऐसे तत्वों से न्यायपालिका को बचने की जरूरत है जिस पर माननीय न्यायलय ने ऐसे काली कमाई करने वाले अपराधी अधिवक्ताओं के खिलाफ आयकर अधिकारीयों केन्द्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को जांच के आदेश दिए और एक टीम बनाकर संपत्ति की जब्ती की कार्यवाई का भी आदेश दिया है माननीय उच्च न्यायलय ने इंटेलीजेंस ब्यूरो के संयुक्त निदेशक को भी आदेश दिया की मामले की जांच कर रिपोर्ट को एक बंद लिफ़ाफ़े में देने को कहा है। सी.बी.आई के निदेशक को भी आदेशित किया है कि संयुक्त निदेशक स्तर का अधिकारी अगली सुनवाई 25 अक्टूबर के दिन उपस्थित रहे

सुमन
लो क सं घ र्ष !