अपनी युवावस्था से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता रहे असीमानन्द का यह कबूलनामा, जिसके अन्तर्गत उसने अपने तमाम अपराधों को कबूला है और संघ के शीर्षस्थ नेताओं की सहभागिता के बारे में भी बताया है। पिछले दिनों पंचकुला की अदालत में असीमानन्द ने यह भी बताया कि गुजरात के मोडासा बम धमाके को भी संघ के कार्यकर्ताओं ने अंजाम दिया था।
ध्यान रहे कि मालेगाँव के 2008 के बम धमाके के दिन और लगभग उसी वक्त मोडासा के मुस्लिमबहुल इलाके में बम फटा था जिसमें दो निरपराध मारे गए थे। नांदेड़ बम धमाका, मालेगाँव बम ब्लास्ट, अजमेर, मक्का मस्जिद बम धमाका, समझौता एक्सप्रेस में बम रखना आदि तमाम आतंकी काण्डों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की संलिप्तता के पुख्ता प्रमाण अब जाँच एजेंसियों के पास हैं और अगर मुल्क की कानूनी मशीनरी ने ठीक से काम किया तो अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि संघ के तमाम शीर्षस्थ नेता सलाखों के पीछे पहुँच सकते हैं।
अपने कबूलनामे में भारत के राष्ट्रपति एवं पाकिस्तान के राष्ट्रपति को भेजे गए एक ही किस्म के पत्रों में असीमानन्द ने बताया है कि किस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने योजना बना कर मालेगाँव के 2006 एवं 2008 के बम धमाकों को, अजमेर शरीफ एवम् मक्का मस्जिद के बम विस्फोटों को तथा समझौता एक्सप्रेस के बम विस्फोट को अंजाम दिया। दरअसल असीमानन्द के इस बयान को नेट पर भी पढ़ा जा सकता है (www.tehelka.com)जो उसने दिल्ली की अदालत में हिन्दी में लिख कर दिया है। इन तथ्यों को जानना इसलिए जरूरी है कि संघ परिवार के लोग इस मसले को लेकर घर-घर जाकर प्रचार कर रहे है। उनका कहना यह होता है कि यह सब किसी साजिश का हिस्सा है।
अगर संघ के कार्यकर्ताओं से साबिका पड़े तो उनसे पहला सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर अहिल्याबाई होलकर के कार्यों एवं बलिदानों से इन्दौर-मालवा का जो इलाका रौशन रहा है, जिनके सामाजिक कार्यों की आज भी लोग तारीफ करते हैं, वह इलाका अचानक हिन्दुत्व आतंक की नर्सरी क्यों बन गया? इसी से जुड़ा मसला है कि ऐसा क्यों हो रहा है कि भारत में आतंकी घटनाओं में जहाँ हिन्दुत्ववादी संगठनों के शामिल होने की बात सामने आती है, उसके अधिकतर सूत्र इसी इलाके से जुड़े दिखते हैं। सोचने की बात है कि इन दिनों फरार चल रहा बम विशेषज्ञ रामजी कलासांगरा या संदीप डांगे हों, जिनके लिए 10 लाख का इनाम सरकार ने घोषित किया है या 2002 से अलग-अलग आतंकी घटनाओं में रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक सुनील जोशी हो, या सुनील जोशी की हत्या में शामिल रहे संघ के कार्यकर्ता हों, या देश में अलग-अलग स्थानों पर आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए इस इलाके के विभिन्न स्थानों पर आयोजित की गई मीटिंग्स हों, आखिर इस इलाके का यह रूपान्तरण क्यों हुआ? यह अकारण नहीं कि असीमानन्द के कबूलनामे में इस इलाके का और यहाँ के संघ के कई कार्यकर्ताओं का जिक्र बार-बार आता है।
इस बात पर भी कम लोगों ने गौर किया है कि संघ के सुप्रीमो मोहन भागवत ने खुद कुछ दिन पहले यह स्वीकृति दी थी कि कुछ अतिवादी हमारे यहाँ पल रहे थे, जिन्हें हमने निकाल दिया है? लोगों से यह जाना जा सकता है कि क्या इसकी कोई फेहरिस्त संघ ने जारी की। तीसरा अहम सवाल उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि जिस तरह असीमानन्द ने अपने
अपराधों की स्वीकृति दी, उस किस्म की स्वीकृति देने का नैतिक साहस कितने संघ कार्यकर्ताओं के पास आज है या वे भी इन्द्रेश कुमार की तरह बच-बच कर फिरने में ही यकीन रखते हैं?
जाहिर सी बात है कि दिल्ली की अदालत में पिछले दिनों असीमानन्द नामक इस शख्स ने जो लिखित इकबालिया बयान दिया, उससे संघ परिवार का जो आतंकी चेहरा सामने आया है, उससे वे सभी लोग भी स्तब्ध हैं, जो हिन्दुत्व के विचारों के हिमायती बताए जाते हैं।
साफ है कि अजमेर बम धमाके में राजस्थान आतंकवाद निरोधी दस्ते द्वारा दाखिल चार्जशीट में संघ के वरिष्ठ नेता इन्द्रेश कुमार का नाम आने के बाद उभरी परिस्थिति से निपटने में मुब्तिला संघ परिवारजनों ने शायद यह सपने में भी नहीं सोचा था कि संघ का अन्य पूर्णकालिक कार्यकर्ता नव कुमार सरकार जिसे ‘स्वामी असीमानन्द’ के नाम से गुजरात के आदिवासी बहुल डाँग जिले में काम करने के लिए भेजा गया था, वह देश के कई अहम बम
धमाकों में संघ परिवार से जुड़े राष्ट्रव्यापी आतंकी माॅड्यूल की जानकारी सार्वजनिक करेगा और उन अपराधों में अपनी संलिप्तता को भी कबूल करेगा। मालूम हो कि नवम्बर माह के मध्य में असीमानन्द को हरिद्वार से गिरफ्तार किया गया था, जहाँ वह एक आश्रम में नाम बदल कर रह रहा था।
दिल्ली के मेट्रोपाॅलिटन मैजिस्टेªट की अदालत में भारत के दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दिए गए इस ‘कन्फेशन’ (अपराधस्वीकृति) को देने के पहले पदासीन मजिस्टेªट दीपक डबास ने यह सुनिश्चित किया कि अभियुक्त किसी दबाव के तहत तो बयान नहीं दे रहा है। इसलिए 16 दिसम्बर को जब कन्फेशन देने का उसका इरादा जाँच अधिकारी के मार्फत पता चला, तब मैजिस्टेªट ने असीमानन्द को दो दिन का समय विचार करने के लिए देकर भेजा ताकि वह ठीक से सोच कर आए। कन्फेशन देने के पहले असीमानन्द को यह स्पष्ट बताया गया कि अदालत में जब मुकदमा चलेगा तो इस बयान का उसके खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है।
असीमानन्द की अपराधस्वीकृति और इसमें संघ परिवार के वरिष्ठ नेताओं की सहभागिता के बारे में दिए गए बयान के बाद संघ परिवार में जबरदस्त हड़बड़ी मची है। चन्द रोज पहले ही संघ सुप्रीमो मोहन भागवत ने सफाई के अन्दाज में यह बयान भी दे दिया कि संघ के कुछ कार्यकर्ता अतिवादी हरकतों में शामिल थे, जिन्हें निकाल दिया गया है। दूसरी तरफ संघ परिवार ने 26 जनवरी से पूरे देश में एक अभियान चलाने का निर्णय लिया है, जो बजट सत्र तक चलेगा। इस अभियान में संघ कार्यकर्ता घर-घर जाकर यह बताने की कोशिश करेंगे कि यह सब ‘कांग्रेस का षड्यंत्र है तथा हिन्दू समाज को बदनाम करने की कोशिश है।’ वैसे बयान में स्वीकृति और कार्रवाई के स्तर पर विरोध, यह विरोधाभास संघ के उसी अन्तद्र्वंद्व को उजागर करता है, जिसमें वह आतंकवाद के मसले पर खुद को फँसा पा रहा है।
- सुभाष गाताडे
क्रमश:
बृहस्पतिवार, 31 मार्च 2011
बुधवार, 30 मार्च 2011
हिन्दुत्व का ‘असीम’ आतंक भाग 1

किसी ने छब्बीस साला उम्र के सुधाकरराव मराठा उर्फ सुधाकरराव प्रभुणे के बारे में सुना है? एक कट्टर दक्षिणपंथी अपराधी जिसे पिछले दिनों मध्यप्रदेश पुलिस ने झाँसी में गिरफ्तार किया और उसके कब्जे से एक कार, एक रिवाॅल्वर और पाँच जिन्दा कारतूस बरामद किए। सुधाकर की गिरफ्तारी के पहले ही मध्यप्रदेश पुलिस उसके साथी शिवम् धाकड को उज्जैन में गिरफ्तार कर चुकी थी। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के मुताबिक सुधाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक-आतंकवादी सुनील जोशी के सम्पर्क में रह चुका था, जिसकी 2007 में रहस्यमय परिस्थितियों में हत्या कर दी गई थी। सुधाकर के बारे में जानकारी यह भी है कि उसने अपराध की दुनिया में तब प्रवेश किया जब वह उन्नीस साल का था।
गौरतलब है कि न पुलिस, न ही मीडिया में इस कुख्यात अपराधी की गिरफ्तारी पर उत्तेजना दिखाई दी। आम तौर पर छोटे मोटे अपराधियों को पकड़ने पर प्रेस कान्फ्रेन्स करने वाली पुलिस भी लगभग खामोश ही रही और मीडिया ने भी मौन बरतना जरुरी समझा। गिने-चुने अख़बारों को छोड़ दें तो मध्यप्रदेश के प्रिन्ट मीडिया ने भी यह ख़बर देना जरूरी नहीं समझा और इसके बावजूद कि उसकी गिरफ्तारी में उत्तर प्रदेश की पुलिस ने अहम भूमिका अदा की थी, परन्तु इस अपराधी को मध्य प्रदेश पुलिस को ‘सौंप’ दिया था। हिन्दी साप्ताहिक ‘लोक लहर’ द्वारा किए गए इस खुलासे पर भी हंगामा नहीं मचा कि अपनी गिरफ्तारी के वक्त सुधाकर के साथ संघ का कोई नेता था और जब सुधाकर को औपचारिक तौर पर गिरफ्तार किया गया तब संघ के इस नेता ने भोपाल में किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से बात की थी, जिसके चलते उसे वहीं छोड़ दिया गया।
यह अकारण नहीं था कि अपनी गिरफ्तारी के तत्काल बाद दिए अपने पहले औपचारिक वक्तव्य में सुधाकरराव मराठा ने साफ कहा कि फरारी के इस कालखण्ड में वह लगातार संघ/भाजपा नेताओं के सम्पर्क में रहा, जो उसकी लगातार मदद करते रहे। सुधाकर ने किसी तपन भौमिक के नाम का भी उल्लेख किया जो संघ एवम् भाजपा के बीच सेतु का काम करता है। एक बात जिसका उल्लेख जरूरी है वह यह कि सुधाकर मध्यप्रदेश के मालवा इलाके का रहने वाला था जिसे हिन्दुत्ववादी शक्तियों का गढ़ समझा जाता है और देश के अलग अलग हिस्सों में हिन्दुत्व आतंकवाद की जो घटनाएँ सामने आई हैं, उसमें यहाँ के कई लोग शामिल रहे हैं।
निश्चित ही इस मामले से जुड़े तमाम रोचक तथ्यों को देखते हुए पूरे मामले की उच्चस्तरीय जाँच की जरूरत दिखती है ताकि यह जाना जा सके कि आखिर अल्पसंख्यक समुदाय के कई अग्रणियों की हत्या करने वाले, या अन्तरधर्मीय शादी करने वाले जोड़ों को प्रताडि़त करने वाले इस अपराधी के साथ स्पेशल व्यवहार क्यों हुआ?
सुधाकर द्वारा अंजाम दिए गए पाँच हत्याओं के बारे में विवरण इस प्रकार हैं:-
-चित्तौड़गढ़ के जफर खान की हत्या जिसने सुधाकर की बहन ज्योति से शादी की थी।
-हनीफ शाह नामक गायक की हत्या जिसने हेमा भटनागर नामक युवती से विवाह किया था।
-मन्दसौर के गबरु पठान की हत्या जिसके भतीजे ने मन्दसौर के एक हिन्दू व्यापारी को मार डाला था।
-हिन्दुत्व एजेण्डा के तहत रतलाम के रमजानी शेरानी की हत्या।
-आर0आर0 खान नामक कांग्रेसी नेता की हत्या।
सुधाकरराव मराठा की गिरफ्तारी दरअसल संघ परिवार के अन्दर मौजूद श्रम विभाजन की नीति को उजागर करती है, जहाँ कुछ लोग शाखाओं में कवायद करते हैं और बाकियों को क्षमता एवं रुचि के अनुसार ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना हेतु अध्यापन से लेकर अतिवाद के कामों में तैनात किया जाता है। फिर अतिवाद की शक्ल
आपराधिक गतिविधियों में प्रगट हो या आतंकी घटनाओं में परिणत हो।
हर राज्य, हर शहर, हर कस्बे में ऐसे लोग मिल सकते हैं जो खुद अपराध की दुनिया में संलग्न हों मगर साथ ही साथ किसी दक्षिणपंथी संगठन के लिए भी काम करते हों। अपने तईं वे हमेशा ही इस बात से इन्कार करेंगे कि वे किसी संगठन से औपचारिक तौर पर जुड़े हुए हैं, और वे संगठन भी इस बात से हमेशा ही इन्कार करेंगे कि इन अपराधियों की वे सेवाएँ लेते हैं। यह अलग बात है कि बिना किसी औपचारिक जुड़ाव के इन दक्षिणपंथी संगठनों की तरफ से कई सारे ‘गन्दे’ काम उन्हें ‘सौंपे (आउटसोर्स किए) जाते रहते हैं। फिर चाहे वह कर्नाटक में सक्रिय प्रसाद अट्टवार हो या हुबली बम धमाके में मुब्तिला अपराधी नागराज जाम्बागी हो, कंधमाल जिले के दंगों में सक्रिय अपराधी मनोज प्रधान हो या ग्राहम स्टीन्स की हत्या में आजीवन कैद की सज़ा काट रहा दारा सिंह हो।
संवैधानिक एवं असंवैधानिक के बीच की धूमिल रेखा को मद्देनज़र रखते हुए तथा हिन्दुत्ववादी संगठनों द्वारा कायम किए गए आनुषंगिक संगठनों के विशाल ताने-बाने को देखते हुए -जहाँ एक सिरा बिल्कुल संसदीय काम में संलिप्त दिखता है तो दूसरा सिरा विशुद्ध अतिवादी हरकतों में मुब्तिला दिखता है। इसका ताजा प्रमाण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता असीमानन्द की वह अपराधस्वीकृति है जो उसने मजिस्टेट के सामने दी।
- सुभाष गाताडे
क्रमश:
गौरतलब है कि न पुलिस, न ही मीडिया में इस कुख्यात अपराधी की गिरफ्तारी पर उत्तेजना दिखाई दी। आम तौर पर छोटे मोटे अपराधियों को पकड़ने पर प्रेस कान्फ्रेन्स करने वाली पुलिस भी लगभग खामोश ही रही और मीडिया ने भी मौन बरतना जरुरी समझा। गिने-चुने अख़बारों को छोड़ दें तो मध्यप्रदेश के प्रिन्ट मीडिया ने भी यह ख़बर देना जरूरी नहीं समझा और इसके बावजूद कि उसकी गिरफ्तारी में उत्तर प्रदेश की पुलिस ने अहम भूमिका अदा की थी, परन्तु इस अपराधी को मध्य प्रदेश पुलिस को ‘सौंप’ दिया था। हिन्दी साप्ताहिक ‘लोक लहर’ द्वारा किए गए इस खुलासे पर भी हंगामा नहीं मचा कि अपनी गिरफ्तारी के वक्त सुधाकर के साथ संघ का कोई नेता था और जब सुधाकर को औपचारिक तौर पर गिरफ्तार किया गया तब संघ के इस नेता ने भोपाल में किसी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से बात की थी, जिसके चलते उसे वहीं छोड़ दिया गया।
यह अकारण नहीं था कि अपनी गिरफ्तारी के तत्काल बाद दिए अपने पहले औपचारिक वक्तव्य में सुधाकरराव मराठा ने साफ कहा कि फरारी के इस कालखण्ड में वह लगातार संघ/भाजपा नेताओं के सम्पर्क में रहा, जो उसकी लगातार मदद करते रहे। सुधाकर ने किसी तपन भौमिक के नाम का भी उल्लेख किया जो संघ एवम् भाजपा के बीच सेतु का काम करता है। एक बात जिसका उल्लेख जरूरी है वह यह कि सुधाकर मध्यप्रदेश के मालवा इलाके का रहने वाला था जिसे हिन्दुत्ववादी शक्तियों का गढ़ समझा जाता है और देश के अलग अलग हिस्सों में हिन्दुत्व आतंकवाद की जो घटनाएँ सामने आई हैं, उसमें यहाँ के कई लोग शामिल रहे हैं।
निश्चित ही इस मामले से जुड़े तमाम रोचक तथ्यों को देखते हुए पूरे मामले की उच्चस्तरीय जाँच की जरूरत दिखती है ताकि यह जाना जा सके कि आखिर अल्पसंख्यक समुदाय के कई अग्रणियों की हत्या करने वाले, या अन्तरधर्मीय शादी करने वाले जोड़ों को प्रताडि़त करने वाले इस अपराधी के साथ स्पेशल व्यवहार क्यों हुआ?
सुधाकर द्वारा अंजाम दिए गए पाँच हत्याओं के बारे में विवरण इस प्रकार हैं:-
-चित्तौड़गढ़ के जफर खान की हत्या जिसने सुधाकर की बहन ज्योति से शादी की थी।
-हनीफ शाह नामक गायक की हत्या जिसने हेमा भटनागर नामक युवती से विवाह किया था।
-मन्दसौर के गबरु पठान की हत्या जिसके भतीजे ने मन्दसौर के एक हिन्दू व्यापारी को मार डाला था।
-हिन्दुत्व एजेण्डा के तहत रतलाम के रमजानी शेरानी की हत्या।
-आर0आर0 खान नामक कांग्रेसी नेता की हत्या।
सुधाकरराव मराठा की गिरफ्तारी दरअसल संघ परिवार के अन्दर मौजूद श्रम विभाजन की नीति को उजागर करती है, जहाँ कुछ लोग शाखाओं में कवायद करते हैं और बाकियों को क्षमता एवं रुचि के अनुसार ‘हिन्दू राष्ट्र’ की स्थापना हेतु अध्यापन से लेकर अतिवाद के कामों में तैनात किया जाता है। फिर अतिवाद की शक्ल
आपराधिक गतिविधियों में प्रगट हो या आतंकी घटनाओं में परिणत हो।
हर राज्य, हर शहर, हर कस्बे में ऐसे लोग मिल सकते हैं जो खुद अपराध की दुनिया में संलग्न हों मगर साथ ही साथ किसी दक्षिणपंथी संगठन के लिए भी काम करते हों। अपने तईं वे हमेशा ही इस बात से इन्कार करेंगे कि वे किसी संगठन से औपचारिक तौर पर जुड़े हुए हैं, और वे संगठन भी इस बात से हमेशा ही इन्कार करेंगे कि इन अपराधियों की वे सेवाएँ लेते हैं। यह अलग बात है कि बिना किसी औपचारिक जुड़ाव के इन दक्षिणपंथी संगठनों की तरफ से कई सारे ‘गन्दे’ काम उन्हें ‘सौंपे (आउटसोर्स किए) जाते रहते हैं। फिर चाहे वह कर्नाटक में सक्रिय प्रसाद अट्टवार हो या हुबली बम धमाके में मुब्तिला अपराधी नागराज जाम्बागी हो, कंधमाल जिले के दंगों में सक्रिय अपराधी मनोज प्रधान हो या ग्राहम स्टीन्स की हत्या में आजीवन कैद की सज़ा काट रहा दारा सिंह हो।
संवैधानिक एवं असंवैधानिक के बीच की धूमिल रेखा को मद्देनज़र रखते हुए तथा हिन्दुत्ववादी संगठनों द्वारा कायम किए गए आनुषंगिक संगठनों के विशाल ताने-बाने को देखते हुए -जहाँ एक सिरा बिल्कुल संसदीय काम में संलिप्त दिखता है तो दूसरा सिरा विशुद्ध अतिवादी हरकतों में मुब्तिला दिखता है। इसका ताजा प्रमाण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता असीमानन्द की वह अपराधस्वीकृति है जो उसने मजिस्टेट के सामने दी।
- सुभाष गाताडे
क्रमश:
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मंगलवार, 29 मार्च 2011
वाइब्रेंट गुजरात के निहितार्थ

गुजरात में देशी-विदेशी पूँजी निवेश आकर्षित करने के लिए मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा चलाए जा रहे ‘वाइब्रेंट गुजरात’ का पाँचवा संस्करण पिछले दिनों पूरा हो गया। खबरों के मुताबिक इसमें रिकॉर्ड 7936 सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर हुए जिससे लगभग 20-83 लाख करोड़ से ज्यादा के पँूजी निवेश की संभावना है। निजीकरण को विकास का पर्याय बताने वाली अंग्रेजी मीडिया से लेकर अपनी भाषा से हिंदुत्व की सेवा करने वाले हिंदी अखबारों ने इसे मोदी के विकास के गुजरात माडल की उपलब्धि बताते हुए उन्हें 21वीं सदी में भारत को महाशक्ति बनाने के लिए सबसे उपयुक्त रहनुमा घोषित कर दिया।
गौरतलब है कि ‘वाइब्रेंट गुजरात’ का अभियान भाजपा ने यू0पी0ए0-प्रथम के शासनकाल के मध्य में मोदी के मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक छवि को बदल कर उन्हें विकासवादी चेहरा देने के लिए शुरू किया था ताकि भाजपा यू0पी0ए0 के कथित विकासवादी नारों से उसी के हथियार से मुकाबला कर सके। इस लिहाज से ‘वाइब्रेंट गुजरात’ को किसी आर्थिक आयोजन के बजाए आजाद भारत के सबसे वीभत्स राज्य प्रायोजित साम्प्रदायिक जनसंहार के खलनायक, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय तक ने ‘रोम के जलने के दौरान बाँसुरी बजाने वाले नीरो’ की संज्ञा दी हो, के मेकओवर की कोशिशों के पाँच साल पूरे होने के बतौर देखना होगा। इस पूरी परिघटना को राजनैतिक नजरिए से इसलिए भी समझना जरूरी है कि मोदी के ‘गुजरात माॅडल’ को विकास के मानक और प्रतीक के बतौर स्थापित किए जाने का मतलब भारतीय लोकतंत्र को टिकाए रखने वाले सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भ धर्मनिरपेक्षता से समझौता कर के राज्य को अल्पसंख्यकों के जान-माल के रक्षक के बजाए उनके नस्लीय सफाए के औजार में तब्दील कर देने और इस मानवताविरोधी अपराध को, आवारा पँूजी के निवेश से बनने वाले विशेष आर्थिक क्षेत्रों जैसे ढाँचे खडे़ कर के, जायज ठहराने के तर्क को वैधता मिलना है।
इसलिए नरेंद्र मोदी के इस मेकओवर के प्रयास को सिर्फ एक बदनाम राजनीतिज्ञ को एक अच्छी छवि में ढालने के उपक्रम के बतौर ही नहीं देखा जा सकता, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की बुनियादी
अवधारणाओं के साथ उसके कर्णधारों द्वारा रोज-रोज किए जाने वाले विश्वासघातों के इस दौर में नरेंद्र मोदी, शासकवर्ग द्वारा पूरी राज्य व्यवस्था को अपने अनुकूल मेकओवर करने की कोशिशों के प्रतीक बन जाते हैं।
इसीलिए हम देखते हैं कि मोदी के ‘गुजरात माॅडल’ की प्रशंसक सिर्फ भाजपा शासित राज्यों की सरकारें ही नहीं हैं, बल्कि कांग्रेसी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की
अध्यक्षता वाले योजना आयोग के उपाध्यक्ष और उदारीकरण आधारित विकास के पैरोकार मोंटेक सिंह अहलुवालिया से लेकर उड़ीसा के आदिवासियों को विस्थापित कर के बेशकीमती खनिजों को काओर्पोरेट निगमों को कौडि़यों के दाम बेचने पर उतारू बीजद सरकार तथा विदर्भ को किसानों की मृत्युभूमि बना देने वाली एन0सी0पी0 सरकार तक में इसके समर्थक दिखते हैं, जो गाहे-बगाहे सार्वजनिक तौर पर इसे जाहिर भी करते रहे हैं। जिसमें ताजा नाम हरियाणा की कांग्रेस सरकार के वित्त मंत्री अजय सिंह यादव का है जिन्होंने पिछले दिनों बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस में ‘गुजरात मॅाडल’ को हरियाणा के लिए अनुकरणीय बताया।
दरअसल नरेंद्र मोदी के विकास का ‘गुजरात मॅाडल’ इस वैचारिकी से संचालित है कि विकास सिर्फ और सिर्फ फासीवादी निजाम में ही सम्भव है। यानी अगर आपको विकास चाहिए तो फिर राज्य से सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की माँग मत करिए, किसी सोहराबुद्दीन या इशरत जहाँ के फर्जी एंकाउंटर पर सवाल मत उठाइए और अगर आपको इन मुद्दों पर न्याय चाहिए तो हमारे राज्य से बाहर के किसी न्यायालय मंे शरण लीजिए। अब चूँकि राज्य से सुरक्षा और न्याय की गारंटी की सबसे ज्यादा जरूरत स्वाभाविक तौर पर अल्पसंख्यकों, आदिवासियों और दलितों को ही होती है, इसलिए विकास के इस मॅाडल में एक छुपा हुआ निहितार्थ यह भी है कि ये सारे कमजोर तबके विकास में रुकावट हैं। इसलिए, विकास करना है तो इनका सफाया सबसे पहली शर्त है, जिसे राज्य खुद अपनी मशीनरी से अंजाम दे सकता है। नरेंद्र मोदी के विकास के ‘गुजरात माॅडल’ का यही निहितार्थ गैर भाजपा दलों और सरकारों को उसका उपासक बनाता है। आखिर उड़ीसा, महाराष्ट्र, झारखण्ड और आंध्र प्रदेश की गैर भाजपाई राज्य मशीनरियाँ विकास के नाम पर किसका और कैसे सफाया कर रही हैं, यह किससे छिपा हुआ है।
दरअसल विकास का ‘गुजरात माडल’ किसी स्त्री विरोधी अश्लील भोजपुरी गाने जैसा एक द्विअर्थी हथियार है, जिससे आप किसी स्त्री का शाब्दिक बलात्कार भी कर सकते हैं और सवाल उठने पर उसकी कोई दूसरी व्याख्या दे कर अपने को पाक-साफ भी घोषित कर सकते हैं। भगवा ब्रिगेड इस हथियार का अपने सबसे उन्नत प्रयोगशाला गुजरात से सैकडों मील दूर पूर्वोत्तर के नेपाल से सटे तराई इलाकों में कैसे इस्तेमाल करता है, इसका सटीक उदाहरण है। जहाँ भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ के संगठन हिंदू युवा वाहिनी के कार्यकर्ता जुलूसों के दौरान मुस्लिम मुहल्लों से गुजरते वक्त त्रिशूल लहराते हुए ‘यू0पी0 अब गुजरात बनेगा-पूर्वांचल शुरुआत करेगा’ के नारे लगा कर लोगों को दहशतजदा करते हैं, और जब कोई उनसे इसका मतलब पूछता है तब उनका जवाब होता है कि वे पूर्वांचल में गुजरात की तरह विकास करना चाहते हैं।
-शाहनवाज आलम
लेबल:
गुजरात,
दंगे,
शाहनवाज आलम
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सोमवार, 28 मार्च 2011
अमरीका, भारत का विश्वसनीय मित्र नहीं हो सकता: विकीलीक्स भाग 2
केबल के अनुसार अहमदीनेजाद के दौरे के बारे में मेनन ने बताया कि वे हवाई अड्डे पर 16ः30 पर उतरे, भारतीय राष्ट्रपति से जाकर 45 मिनट तक बात की, फिर प्रधानमंत्री के साथ डिनर एवं मीटिंग में सम्मिलित हुए जिसमें मेनन भी थें। इस मीटिंग में मेनन ने भी हालात बताए। फिर अहमदीनेजाद ने ऐसी दुनिया की बात की जो ईरानी दृष्टिकोण से विकसित हुई है और यह ईरान के पक्ष में बढ़ती रहेगी। मेनन ने स्वीकार किया कि ‘‘मैं नहीं जानता था कि अहमदीनेजाद काफ़ी आदर्शवादी हैं’’ मेनन ने यह बात भी नोट की कि वे अमेरिका पर स्पष्ट रूप से आक्रामक नहीं हुए, उन्होंने विचार ज़ाहिर किया कि अमरीका ने ईराक को अस्थिर किया है और वह वहाँ से जल्दी ही हटेगा। जब स्पष्ट करने को कहा गया तो मेनन के अनुसार वे कुछ नर्म पड़े। अफ़ग़ानिस्तान के संबंध में उन्होंने कहा कि वहाँ हामिद करज़ई का कोई विकल्प नहीं है ओर कहा कि काबुल की सरकार को मज़बूत किया जाना चाहिए। ईराक़ में ज़्यादा कानून व्यवस्था पर ज़ोर दिया और मालिकी सरकार को अच्छा बताया। मेनन ने यह भी बताया कि उनकी बातों मे गर्मी और गंध नहीं थी।
मेनन को उनकी आत्म प्रशंसा एवं आत्म संदर्भ का तरीक़ा देखकर थोड़ी घबराहट हुई, मुख्य रूप से उस समय जब तेल मूल्य पर बात हुई और उन्होंने डींग मारने के अंदाज़ में कहा कि ये मूल्य तो ऊँचे बने रहेंगे। अहमदीनेजाद ने चीन सहित दूसरे देशों को सख़्त सुस्त कहा, चीन के बारे में कहा कि उसने अपना तमाम धन अमरीकी डालरों के रूप में रख छोड़ा है, कुछ भी बाक़ी नहीं बचाया। इससे मेनन ने नतीज़ा निकाला कि वे दूसरे देशों से हमारे बारे में भी बुरा बोलते होंगे। मेनन ने यह भी ध्यान दिया कि उन्होंने इस्राईल के बारे में प्रत्यक्ष आक्रामकता नहीं दिखाई। न तो उन्होंने इस्राईली ‘सेटलाइट’ के भारतीय ‘लाँच’ का जिक्र किया, न ही भारत अमरीकी संबंधों का। मेनन का यह आँकलन था कि कुल मिलाकर दिल्ली में वे अपने गृहदेश के लोगों को दिखाने का कार्य कर रहे थे, और वोटरों को यह प्रदर्शित कर रहे थे कि वे दौरे कर के दूसरे देशों से सम्पर्क साधने में सक्ष्म हैं। केबल के अनुसार मेनन ने अमरीका को सतर्क किया कि वह खुले रूप से यह निर्देश न दे कि वह क्या करे क्या नहीं। इस सरकार को ऐसा दिखना चाहिए कि वह स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण कर रही है और अमरीका से निर्देश नहीं लेती।
विकीलीक्स के वेबसाइट के एक और विस्फोटक रहस्योद्घाटन में, जो 2005 मंे एक अमरीकी राजनयिक द्वारा भेजा गया, रेडक्रास को यह कहते हुए दिखाया गया कि कश्मीरी जेलों में बन्द कै़दियों पर ज़ुल्म करने वालों को भारतीय सरकार ने माफ़ कर दिया। एक अन्य केबल में भारत में अमरीकी राजूदत रोमर द्वारा कांग्रेस लीडर राहुल गांधी को यह कहते हुए दिखाया गया कि हिन्दू चरमपंथ, लश्कर लड़ाकों से ज़्यादा बड़ा खतरा है।
3 अगस्त 2009 के केबल में रोमर के अनुसार राहुल गांधी एक लंच मीटिंग में यह कहते हुए दिखाए गए हैं कि ‘‘यद्यपि इसके साक्ष्य है कि मुस्लिमों के कुछ तत्व लश्करे तैय्यबा को सहयोग देते हैं, परन्तु उभरते हुए हिन्दू कट्टरवादियों से बड़ा खतरा है, जो मुस्लिमों से धार्मिक तनाव और राजनैतिक टकराव पैदा करतेे हैं’’ केबल ने बताया कि गांधी ने यह जवाब उस समय दिया जब राजदूत ने उनसे क्षेत्र में लश्कर की गतिविधियों पर प्रश्न किया और खतरे के बारे में पूछा। रोमर के अनुसार राहुल ने कहा ‘‘पाकिस्तान की ओर से या भारत के इस्लामी ग्रुप द्वारा जो आतंकी आक्रमण हो रहे हैं उनकी प्रतिक्रिया में देशी चरमपंथी फ्ऱन्टों की तरफ़ से बढ़ रहा खतरा चिंता का विषय है जिस पर बराबर ध्यान रखने की आवश्कयता है। केबल के अनुसार कांग्रेस लीडर ने रोमर से अनेक राजनैतिक विषयों, सामाजिक चैलेंज, और अगले पाँच साल मंे कांग्रेस के सामने आने वाले चुनावी बिन्दुओं पर भी विचार विर्मश किया, तथा गांधी ने गुजरात के भाजपाई मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा धु्रवीकरण करके तनाव पैदा करने के मामलों को भी सदंर्भित किया। विकीलीक्स द्वारा जारी किए गए चैथाई मिलियन अमरीकी केबलों मंे इस बात का भी पर्दा फ़ाश किया गया कि बहुत से मामले किस प्रकार गुप्त ढंग से अमरीका ने अंजाम दिए, इनमंे यह भी था कि टर्की मंे अफ़ग़ानिस्तान के मामले पर एक महत्वपूर्ण बैठक की गई परन्तु भारत को इससे दूर रखा गया।
विकीलीक्स द्वारा सूचनाओं की लाई गई मौजूदा लहर ने भारत अमरीकी संबंधों को ख़तरे में डाल दिया है, इसमें अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी किलिंटन को यह कहते हुए दिखाया गया कि भारत ‘स्व-नियुक्त’ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अग्रिम धावक बन रहा है जिससे वह इसका स्थायी सदस्य बन सके। इस संबंध में हिलेरी ने गुप्त सूचनाएँ एकत्र करने के निर्देश दिए। वर्तमान लीक की गई सूचनाओं से अमरीकी हितों तथा मित्रों से संबंधों में दरार पड़ने के दृष्टिगत उसने भारत को पहले ही चेतावनी दी है, तथा बताया कि 2006-10 के मध्य की सूचनाओं में दोनांे देशों के बीच हुई परमाणु डील के संबंध में विप्लवकारी प्रभाव वाली बातें हो सकती हैं। एक अन्य अभिलेख में अमीरात के क्राउन पिं्रस मोहम्मद बिन ज़ायद के संदर्भ से एम0बी0 जेड केबल ने बताया कि उन्होंने पाकिस्तान को एफ0 16 फाइटर जेट की आपूर्ति के अमरीकी निर्णय का यह तर्क देकर समर्थन किया कि इससे शक्ति संतुलन पर असर नहीं पड़ेगा क्योंकि भारत शक्तिशाली स्थायित्व का लोकतंत्र है, अतः पाकिस्तान तो ख़तरे में पड़ सकता है, परन्तु भारत को कोई खतरा नहीं है।
भारत-अमरीका के बीच असैनिक परमाणु सहयोग के मामले में परमाणु आपूर्ति ग्रुप की पूर्ण मीटिंग में सदस्यों की क्या योजना थी, इस सम्बन्ध में भी केबल ने जानने का प्रयास किया तथा यह भी कि सी0टी0बी0टी0 में सम्मिलित किए जाने या इसके पुष्टीकरण हेतु मेम्बरों के क्या विचार भारत के बारे में हैं।
एक केबल के अनुसार अपने विदेशों में तैनात ओवरसीज आफीसर्स से इस प्रकार की सूचनाएँ एकत्र करके भेजने हेतु कहा गया- आफिस और संगठनों के पदनाम, नाम, बिजनेस कार्ड पर दर्ज सूचनाएँ, टेलीफोन, सेलफोन, पेज़र तथा फैक्स के नम्बर, इन्टरनेट, इन्ट्रानेट हैंडिल, इन्टरनेट ई-मेल के पते, वेबसाइट पहचान यू.आर.एल., क्रेडिट कार्ड एकाउण्ट नम्बर आदि, वर्क शेड्यूल और अन्य जरूरी जीवन वृत्त
सम्बंधी सूचनाएँ।
इनमें ये सूचनाएँ भी हैं कि शिवसेना एवं आर.एस.एस. के बीच खींचातानी है जो आर.एस.एस. का मातृ संगठन तथा भाजपा का सहमित्र है, यह खींचातानी प्रवासी उत्तर भारतीयों के मुम्बई में प्रवास के अधिकार को लेकर है। शिवसेना ने खुलकर बिहार एवं उत्तर प्रदेश के प्रवासियों पर आक्रामक रुख अपना रखा है।
बिहार के एक दौरे के समय प्रेस से बात करते हुए राहुल गांधी ने उत्तर भारतीयों के पक्ष में, जो मुम्बई में कार्यरत हैं, कहा कि सेना अप्रासंागिक है तथा सभी भारतीयों को भारत भर में आजादी से निवास करने का अधिकार है।
आतंकी घटनाओं पर केबल द्वारा राय प्रकट करते हुए भारतीय अधिकारियों की इस सम्बन्ध में तैयारी की कमी पर फोकस किया गया। भारत सरकार के इस आश्वासन पर कि वह दोहरे आतंकवाद से मुकाबला करने में सक्षम है, अविश्वसनीय करार दिया गया।
-सी0 आदिकेशवन
अनुवादक-डा।एस0एम0 हैदर
समाप्त
मेनन को उनकी आत्म प्रशंसा एवं आत्म संदर्भ का तरीक़ा देखकर थोड़ी घबराहट हुई, मुख्य रूप से उस समय जब तेल मूल्य पर बात हुई और उन्होंने डींग मारने के अंदाज़ में कहा कि ये मूल्य तो ऊँचे बने रहेंगे। अहमदीनेजाद ने चीन सहित दूसरे देशों को सख़्त सुस्त कहा, चीन के बारे में कहा कि उसने अपना तमाम धन अमरीकी डालरों के रूप में रख छोड़ा है, कुछ भी बाक़ी नहीं बचाया। इससे मेनन ने नतीज़ा निकाला कि वे दूसरे देशों से हमारे बारे में भी बुरा बोलते होंगे। मेनन ने यह भी ध्यान दिया कि उन्होंने इस्राईल के बारे में प्रत्यक्ष आक्रामकता नहीं दिखाई। न तो उन्होंने इस्राईली ‘सेटलाइट’ के भारतीय ‘लाँच’ का जिक्र किया, न ही भारत अमरीकी संबंधों का। मेनन का यह आँकलन था कि कुल मिलाकर दिल्ली में वे अपने गृहदेश के लोगों को दिखाने का कार्य कर रहे थे, और वोटरों को यह प्रदर्शित कर रहे थे कि वे दौरे कर के दूसरे देशों से सम्पर्क साधने में सक्ष्म हैं। केबल के अनुसार मेनन ने अमरीका को सतर्क किया कि वह खुले रूप से यह निर्देश न दे कि वह क्या करे क्या नहीं। इस सरकार को ऐसा दिखना चाहिए कि वह स्वतंत्र विदेश नीति का अनुसरण कर रही है और अमरीका से निर्देश नहीं लेती।
विकीलीक्स के वेबसाइट के एक और विस्फोटक रहस्योद्घाटन में, जो 2005 मंे एक अमरीकी राजनयिक द्वारा भेजा गया, रेडक्रास को यह कहते हुए दिखाया गया कि कश्मीरी जेलों में बन्द कै़दियों पर ज़ुल्म करने वालों को भारतीय सरकार ने माफ़ कर दिया। एक अन्य केबल में भारत में अमरीकी राजूदत रोमर द्वारा कांग्रेस लीडर राहुल गांधी को यह कहते हुए दिखाया गया कि हिन्दू चरमपंथ, लश्कर लड़ाकों से ज़्यादा बड़ा खतरा है।
3 अगस्त 2009 के केबल में रोमर के अनुसार राहुल गांधी एक लंच मीटिंग में यह कहते हुए दिखाए गए हैं कि ‘‘यद्यपि इसके साक्ष्य है कि मुस्लिमों के कुछ तत्व लश्करे तैय्यबा को सहयोग देते हैं, परन्तु उभरते हुए हिन्दू कट्टरवादियों से बड़ा खतरा है, जो मुस्लिमों से धार्मिक तनाव और राजनैतिक टकराव पैदा करतेे हैं’’ केबल ने बताया कि गांधी ने यह जवाब उस समय दिया जब राजदूत ने उनसे क्षेत्र में लश्कर की गतिविधियों पर प्रश्न किया और खतरे के बारे में पूछा। रोमर के अनुसार राहुल ने कहा ‘‘पाकिस्तान की ओर से या भारत के इस्लामी ग्रुप द्वारा जो आतंकी आक्रमण हो रहे हैं उनकी प्रतिक्रिया में देशी चरमपंथी फ्ऱन्टों की तरफ़ से बढ़ रहा खतरा चिंता का विषय है जिस पर बराबर ध्यान रखने की आवश्कयता है। केबल के अनुसार कांग्रेस लीडर ने रोमर से अनेक राजनैतिक विषयों, सामाजिक चैलेंज, और अगले पाँच साल मंे कांग्रेस के सामने आने वाले चुनावी बिन्दुओं पर भी विचार विर्मश किया, तथा गांधी ने गुजरात के भाजपाई मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा धु्रवीकरण करके तनाव पैदा करने के मामलों को भी सदंर्भित किया। विकीलीक्स द्वारा जारी किए गए चैथाई मिलियन अमरीकी केबलों मंे इस बात का भी पर्दा फ़ाश किया गया कि बहुत से मामले किस प्रकार गुप्त ढंग से अमरीका ने अंजाम दिए, इनमंे यह भी था कि टर्की मंे अफ़ग़ानिस्तान के मामले पर एक महत्वपूर्ण बैठक की गई परन्तु भारत को इससे दूर रखा गया।
विकीलीक्स द्वारा सूचनाओं की लाई गई मौजूदा लहर ने भारत अमरीकी संबंधों को ख़तरे में डाल दिया है, इसमें अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी किलिंटन को यह कहते हुए दिखाया गया कि भारत ‘स्व-नियुक्त’ संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अग्रिम धावक बन रहा है जिससे वह इसका स्थायी सदस्य बन सके। इस संबंध में हिलेरी ने गुप्त सूचनाएँ एकत्र करने के निर्देश दिए। वर्तमान लीक की गई सूचनाओं से अमरीकी हितों तथा मित्रों से संबंधों में दरार पड़ने के दृष्टिगत उसने भारत को पहले ही चेतावनी दी है, तथा बताया कि 2006-10 के मध्य की सूचनाओं में दोनांे देशों के बीच हुई परमाणु डील के संबंध में विप्लवकारी प्रभाव वाली बातें हो सकती हैं। एक अन्य अभिलेख में अमीरात के क्राउन पिं्रस मोहम्मद बिन ज़ायद के संदर्भ से एम0बी0 जेड केबल ने बताया कि उन्होंने पाकिस्तान को एफ0 16 फाइटर जेट की आपूर्ति के अमरीकी निर्णय का यह तर्क देकर समर्थन किया कि इससे शक्ति संतुलन पर असर नहीं पड़ेगा क्योंकि भारत शक्तिशाली स्थायित्व का लोकतंत्र है, अतः पाकिस्तान तो ख़तरे में पड़ सकता है, परन्तु भारत को कोई खतरा नहीं है।
भारत-अमरीका के बीच असैनिक परमाणु सहयोग के मामले में परमाणु आपूर्ति ग्रुप की पूर्ण मीटिंग में सदस्यों की क्या योजना थी, इस सम्बन्ध में भी केबल ने जानने का प्रयास किया तथा यह भी कि सी0टी0बी0टी0 में सम्मिलित किए जाने या इसके पुष्टीकरण हेतु मेम्बरों के क्या विचार भारत के बारे में हैं।
एक केबल के अनुसार अपने विदेशों में तैनात ओवरसीज आफीसर्स से इस प्रकार की सूचनाएँ एकत्र करके भेजने हेतु कहा गया- आफिस और संगठनों के पदनाम, नाम, बिजनेस कार्ड पर दर्ज सूचनाएँ, टेलीफोन, सेलफोन, पेज़र तथा फैक्स के नम्बर, इन्टरनेट, इन्ट्रानेट हैंडिल, इन्टरनेट ई-मेल के पते, वेबसाइट पहचान यू.आर.एल., क्रेडिट कार्ड एकाउण्ट नम्बर आदि, वर्क शेड्यूल और अन्य जरूरी जीवन वृत्त
सम्बंधी सूचनाएँ।
इनमें ये सूचनाएँ भी हैं कि शिवसेना एवं आर.एस.एस. के बीच खींचातानी है जो आर.एस.एस. का मातृ संगठन तथा भाजपा का सहमित्र है, यह खींचातानी प्रवासी उत्तर भारतीयों के मुम्बई में प्रवास के अधिकार को लेकर है। शिवसेना ने खुलकर बिहार एवं उत्तर प्रदेश के प्रवासियों पर आक्रामक रुख अपना रखा है।
बिहार के एक दौरे के समय प्रेस से बात करते हुए राहुल गांधी ने उत्तर भारतीयों के पक्ष में, जो मुम्बई में कार्यरत हैं, कहा कि सेना अप्रासंागिक है तथा सभी भारतीयों को भारत भर में आजादी से निवास करने का अधिकार है।
आतंकी घटनाओं पर केबल द्वारा राय प्रकट करते हुए भारतीय अधिकारियों की इस सम्बन्ध में तैयारी की कमी पर फोकस किया गया। भारत सरकार के इस आश्वासन पर कि वह दोहरे आतंकवाद से मुकाबला करने में सक्षम है, अविश्वसनीय करार दिया गया।
-सी0 आदिकेशवन
अनुवादक-डा।एस0एम0 हैदर
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रविवार, 27 मार्च 2011
अमरीका, भारत का विश्वसनीय मित्र नहीं हो सकता: विकीलीक्स भाग १
विकीलीक्स के अभिलेख यह रहस्योद्घाटन करते हैं कि यू0एस0 भारतीय हितों के विरुद्ध कार्य करता आ रहा है। सच्चाई यही है कि वह भारत का विश्वसनीय मित्र नहीं है। भारत की वर्तमान सरकार के लिए सतर्क होने का यह उचित समय है। अमरीका के समीप हो जाने से रूस ने हमसे और दूरी बना ली है और चीन अब भारत का विरोधी बन गया है जो हमारे देश के लिए खतरनाक बात है।
मौजूदा समय मंे विकीलीक्स अमरीकी हितों के खि़लाफ़ खतरे की घंटी बन गई है। 77000 अभिलेखों की जो पहली खेप है वह अफ़ग़ानिस्तान मे अमरीका के सैनिक अभियान से संबधित है। यह अभिलेख देखकर लोग आश्चर्य चकित हुए कि अमरीका के नेतृत्व वाली सैन्य शक्तियों ने अफ़ग़ानिस्तान में कितनी क्रूरताएँ कीं। 400,000 अभिलेखों की दूसरी कि़स्त इराक में अमरीकी सेना की मौजूदगी से सबंधित है। इसमें फिर इराकी जनता के साथ अमानवीय व्यवहार की सत्यता सामने आ गई। तीसरी खेप में बहुत अधिक अभिलेख थे। इन वर्गीकृत अमरीकी राजनयिक केबलों द्वारा यह राज़ सामने आया कि विदेशी सरकारों और इनके नेतृत्व करने वालों के विरोध में क्या भ्रष्ट आचरण किए गए? भ्रष्टाचार के इन आरोपों के कारण ये विदेशी सरकारें और राजनीतिज्ञ गम्भीर झंझावतोें में घिर गए। इन स्पष्ट सूचनाओं ने अमरीकी प्रशासन व उसकी विदेश नीति को भी कठिनाइयों में डाल दिया।
इन रिपोर्टों में जो देश और उनके राजनीतिज्ञ सामने आए, वे हैं- रूस, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के पूर्व सोवियत गणराज्य, कुछ दूसरे क्षेत्र जैसे पूर्वी एशिया जिसमें भारत भी शामिल है। यूरोप में तैनात अमरीकी राजनयिकों ने वहाँ से वाशिंगटन को कुछ ऐसी सारगर्मित आरोपों की विस्तृत रिपोर्टें भेजीं जिनसे बड़ी किरकिरी हुई। शुरू में पाकिस्तान के अमरीका से संबंध ही विकीलीक्स के केन्द्र बिन्दु थे, अब भारत-अमरीका संबंध भी इसके अन्तर्गत आ गए। भारत से सबंधित जो अभिलेख विकीलीक्स के हाथ लगे उनमंे केवल भारतीय महानुभावों के भ्रष्टाचार में संलिप्त होने की बात ही नहीं, बल्कि यह भी ज्ञात हुआ कि भारत की अफ़ग़ानिस्तान, इराक तथा ईरान के संबंध में क्या अन्दुरूनी नीति थी।
विकीलीक्स के अभिलेखांे की खेप में भारत का विश्व में भरोसेमन्द तथा सम्मानित शक्ति होने का चापलूसी पूर्ण नक्शा खींचा गया जो अपने पड़ोसी पाकिस्तान के सताने से परेशान रहता है। इन पंक्तियों के लिखते समय तक विकीलीक्स द्वारा जारी 243 अभिलेखों मंे भारत का संक्षिप्त विवरण दिया गया। इनमें से कोई भी दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास से नहीं आया। (परन्तु विकीलीक्स का कथन है कि उक्त दूतावास से जारी 3000 से
अधिक केबल उसके पास हैंै) मध्य पूर्व के दो केबल इस क्षेत्र में भारत के पक्ष मंे हैं।
अनेक घटनाओं में भारतीय दृष्टिकोण से चार ऐसी हैं जो सनसनी पूर्ण हैं। पहली यह कि बुश प्रशासन की ओर से अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर इराक में भारतीय सेना भेजने हेतु दबाव डाला गया। जुलाई 2003 मंे सरकार ने इससे इन्कार कर दिया। परन्तु दिल्ली में अनेक आवाजे़ं ऐसी थीं जो अमरीकी अनुरोध को स्वीकार करने पर बल दे रही थीं। भारतीय राजनैतिक नेतृत्व, नौकरशाहों तथा नीति निर्धारण के जो मामले दिल्ली के अमरीकी दूतावास तथा वाशिंगटन बीच के थे, इनसे संबधित राजनयिक केबलों पर भी विकीलीक्स नें अपनी पकड़ बना ली थी।
हेडली जो शिकागो में था या उसकी पत्नी तक पहुँच हेतु चिदम्बरम ने अनुरोध किया हालाँकि इससे कुछ नतीजा नहीं निकला। चिदम्बरम का कहना था कि क्या जी0ओ0आई0 आॅफीसर समय के अन्दर प्रश्नावली के अनुसार पूछताछ कर सकता है? चिदम्बरम का यह भी कहना था कि उनके मन में यह भावना थी कि अकेला हेडली ऐसा नही कर सकता, लेकिन यह भी स्वीकारा कि इस हेतु उनके पास कोई साक्ष्य नहीं था कि यहाँ उसके ‘स्लीपिंग सेल्स’ हैं, सम्भवतः इन्हीं में से 13 फरवरी के पूना बम काण्ड में किसी का हाथ रहा होगा। मालूम ही है कि शिकागो आधारित पाकिस्तानी-अमरीकी डैविड कोलमैन हेडली, 2008 के मुंबई काण्ड में लश्करे तैय्यबा एवं पाकिस्तानी जासूसी एजेंसियों के साथ साजि़श रचकर हमले का आरोपी है।
विकीलीक्स विसिल ब्लोअर वेबसाइट के चैथाई मिलियन अमरीकी दस्तावेज़ों की गुप्त सूचनाओं में से 3038 वे वर्गीकृत केबल हैं जो नई दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास की हैं। ‘लीक’ हुए दस्तावेज़ों के 5087 केबल भारत से संबंधित हैं।
1966 से इस वर्ष के फरवरी तक संसार के देशों के 274 दूतावासों एवं वाशिंगटन के स्टेट डिपार्टमेन्ट के मध्य गुप्त सूचनाओं के आदान प्रदान में 15652 ऐसे गुप्त केबल हैं जो वर्गीकृत हैं। विकीलीक्स द्वारा जारी कूटनीतिक केबलों के अनुसार संसार में फैलाने से पूर्व भारत में जैव-रासायनिक आक्रमण द्वारा भंयकर बीमारियाँ जैसे ‘एन्थ्रेक्स’ के फैला देने का लक्ष्य है।
भारत मंे सामाजिक सद्भावना एवं आर्थिक समृद्धि को बर्बाद करने हेतु आतंकवादी अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए अब ‘बायोटेक प्रगति’ का सहारा लेते हुए जैव-रासायनिक अस्त्रों का प्रयोग करके विकराल संहार कर सकते हैं, यह चेतावनी भी इन्हीं केबलों ने दी हैं। 26/11/2008 का जो आक्रमण मुंबई मंे पाकिस्तान स्थित लश्करे तैय्यबा द्वारा हुआ उससे पूर्व एवं बाद दिल्ली के राजनयिकों द्वारा भेजे गए संदेश, इसकी भयावहता एवं भारतीय मुसलमानों का कट्टरता की ओर अग्रसर होने के वर्णन पर केन्द्रित हैं।
एक संदेश आशावादी है- यह कि भारत की 150 मिलियन मुस्लिम आबादी का चरमपंथ के प्रति कोई आकर्षण नहीं है। यहाँ के जागृत लोकतंत्र, प्रगतिशील अर्थ व्यवस्था तथा समावेशी संस्कृति में मुस्लिमों को मुख्य धारा में शामिल होने तथा उन्नति के रास्तों पर जाने हेतु बल प्रदान किया है तथा अलग-अलग रहने की मानसिकता को कम किया है।
केबल यह भी कहता है- यद्यपि मुस्लिम समाज यहाँ अन्य वर्गों की अपेक्षा उच्च दर की गरीबी से ग्रस्त है तथा भेदभाव का शिकार बन गया है फिर भी बड़ी संख्या में वे भारतीय तंत्र के प्रति वफ़ादार हैं और राजनैतिक एवं आर्थिक मामलांे में भागीदार बन कर मुख्य धारा में रहते हैं। यह भी पता चला है कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमले के परवर्ती काल में अमरीका व भारत के बीच जो बातचीत का दौर चला वह आसान नहीं था। दिल्ली से भेजे गए 3038 राजनयिक केबलों में विदेश सचिव शिवशंकर मेनन के भी संदेश थे जो वेबसाइट द्वारा लीक हुए। विकीलीक्स द्वारा जारी चैथाई मिलियन गुप्त अमरीकी अभिलेखों में 5087 भारत से
सबंधित हैं।
-सी0 आदिकेशवन
अनुवादक-डा.एस0एम0 हैदर
क्रमश:
इन रिपोर्टों में जो देश और उनके राजनीतिज्ञ सामने आए, वे हैं- रूस, अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के पूर्व सोवियत गणराज्य, कुछ दूसरे क्षेत्र जैसे पूर्वी एशिया जिसमें भारत भी शामिल है। यूरोप में तैनात अमरीकी राजनयिकों ने वहाँ से वाशिंगटन को कुछ ऐसी सारगर्मित आरोपों की विस्तृत रिपोर्टें भेजीं जिनसे बड़ी किरकिरी हुई। शुरू में पाकिस्तान के अमरीका से संबंध ही विकीलीक्स के केन्द्र बिन्दु थे, अब भारत-अमरीका संबंध भी इसके अन्तर्गत आ गए। भारत से सबंधित जो अभिलेख विकीलीक्स के हाथ लगे उनमंे केवल भारतीय महानुभावों के भ्रष्टाचार में संलिप्त होने की बात ही नहीं, बल्कि यह भी ज्ञात हुआ कि भारत की अफ़ग़ानिस्तान, इराक तथा ईरान के संबंध में क्या अन्दुरूनी नीति थी।
विकीलीक्स के अभिलेखांे की खेप में भारत का विश्व में भरोसेमन्द तथा सम्मानित शक्ति होने का चापलूसी पूर्ण नक्शा खींचा गया जो अपने पड़ोसी पाकिस्तान के सताने से परेशान रहता है। इन पंक्तियों के लिखते समय तक विकीलीक्स द्वारा जारी 243 अभिलेखों मंे भारत का संक्षिप्त विवरण दिया गया। इनमें से कोई भी दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास से नहीं आया। (परन्तु विकीलीक्स का कथन है कि उक्त दूतावास से जारी 3000 से
अधिक केबल उसके पास हैंै) मध्य पूर्व के दो केबल इस क्षेत्र में भारत के पक्ष मंे हैं।
अनेक घटनाओं में भारतीय दृष्टिकोण से चार ऐसी हैं जो सनसनी पूर्ण हैं। पहली यह कि बुश प्रशासन की ओर से अटल बिहारी वाजपेयी सरकार पर इराक में भारतीय सेना भेजने हेतु दबाव डाला गया। जुलाई 2003 मंे सरकार ने इससे इन्कार कर दिया। परन्तु दिल्ली में अनेक आवाजे़ं ऐसी थीं जो अमरीकी अनुरोध को स्वीकार करने पर बल दे रही थीं। भारतीय राजनैतिक नेतृत्व, नौकरशाहों तथा नीति निर्धारण के जो मामले दिल्ली के अमरीकी दूतावास तथा वाशिंगटन बीच के थे, इनसे संबधित राजनयिक केबलों पर भी विकीलीक्स नें अपनी पकड़ बना ली थी।
हेडली जो शिकागो में था या उसकी पत्नी तक पहुँच हेतु चिदम्बरम ने अनुरोध किया हालाँकि इससे कुछ नतीजा नहीं निकला। चिदम्बरम का कहना था कि क्या जी0ओ0आई0 आॅफीसर समय के अन्दर प्रश्नावली के अनुसार पूछताछ कर सकता है? चिदम्बरम का यह भी कहना था कि उनके मन में यह भावना थी कि अकेला हेडली ऐसा नही कर सकता, लेकिन यह भी स्वीकारा कि इस हेतु उनके पास कोई साक्ष्य नहीं था कि यहाँ उसके ‘स्लीपिंग सेल्स’ हैं, सम्भवतः इन्हीं में से 13 फरवरी के पूना बम काण्ड में किसी का हाथ रहा होगा। मालूम ही है कि शिकागो आधारित पाकिस्तानी-अमरीकी डैविड कोलमैन हेडली, 2008 के मुंबई काण्ड में लश्करे तैय्यबा एवं पाकिस्तानी जासूसी एजेंसियों के साथ साजि़श रचकर हमले का आरोपी है।
विकीलीक्स विसिल ब्लोअर वेबसाइट के चैथाई मिलियन अमरीकी दस्तावेज़ों की गुप्त सूचनाओं में से 3038 वे वर्गीकृत केबल हैं जो नई दिल्ली स्थित अमरीकी दूतावास की हैं। ‘लीक’ हुए दस्तावेज़ों के 5087 केबल भारत से संबंधित हैं।
1966 से इस वर्ष के फरवरी तक संसार के देशों के 274 दूतावासों एवं वाशिंगटन के स्टेट डिपार्टमेन्ट के मध्य गुप्त सूचनाओं के आदान प्रदान में 15652 ऐसे गुप्त केबल हैं जो वर्गीकृत हैं। विकीलीक्स द्वारा जारी कूटनीतिक केबलों के अनुसार संसार में फैलाने से पूर्व भारत में जैव-रासायनिक आक्रमण द्वारा भंयकर बीमारियाँ जैसे ‘एन्थ्रेक्स’ के फैला देने का लक्ष्य है।
भारत मंे सामाजिक सद्भावना एवं आर्थिक समृद्धि को बर्बाद करने हेतु आतंकवादी अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए अब ‘बायोटेक प्रगति’ का सहारा लेते हुए जैव-रासायनिक अस्त्रों का प्रयोग करके विकराल संहार कर सकते हैं, यह चेतावनी भी इन्हीं केबलों ने दी हैं। 26/11/2008 का जो आक्रमण मुंबई मंे पाकिस्तान स्थित लश्करे तैय्यबा द्वारा हुआ उससे पूर्व एवं बाद दिल्ली के राजनयिकों द्वारा भेजे गए संदेश, इसकी भयावहता एवं भारतीय मुसलमानों का कट्टरता की ओर अग्रसर होने के वर्णन पर केन्द्रित हैं।
एक संदेश आशावादी है- यह कि भारत की 150 मिलियन मुस्लिम आबादी का चरमपंथ के प्रति कोई आकर्षण नहीं है। यहाँ के जागृत लोकतंत्र, प्रगतिशील अर्थ व्यवस्था तथा समावेशी संस्कृति में मुस्लिमों को मुख्य धारा में शामिल होने तथा उन्नति के रास्तों पर जाने हेतु बल प्रदान किया है तथा अलग-अलग रहने की मानसिकता को कम किया है।
केबल यह भी कहता है- यद्यपि मुस्लिम समाज यहाँ अन्य वर्गों की अपेक्षा उच्च दर की गरीबी से ग्रस्त है तथा भेदभाव का शिकार बन गया है फिर भी बड़ी संख्या में वे भारतीय तंत्र के प्रति वफ़ादार हैं और राजनैतिक एवं आर्थिक मामलांे में भागीदार बन कर मुख्य धारा में रहते हैं। यह भी पता चला है कि 26/11 के मुंबई आतंकी हमले के परवर्ती काल में अमरीका व भारत के बीच जो बातचीत का दौर चला वह आसान नहीं था। दिल्ली से भेजे गए 3038 राजनयिक केबलों में विदेश सचिव शिवशंकर मेनन के भी संदेश थे जो वेबसाइट द्वारा लीक हुए। विकीलीक्स द्वारा जारी चैथाई मिलियन गुप्त अमरीकी अभिलेखों में 5087 भारत से
सबंधित हैं।
-सी0 आदिकेशवन
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शनिवार, 26 मार्च 2011
उपनिवेशवाद और नस्लवाद मुख्य समस्याएँ

विशेष - फै़ज़ अहमद फै़ज़
अविकसित देश के नाते भारत के सामने आज अनेक समस्याएँ हैं। समाज में विघटनकारी और साम्प्रदायिक ताकतें आक्रामक मुद्रा में हैं, देश का समूचासांस्कृतिक तानाबाना टूट गया है। दूसरी ओर अमरीकी साम्राज्यवाद के अनुयायी के रूप में हमारे शासकों ने काम करना आरंभ कर दिया है। ऐसी अवस्था में फ़ैज़ का नजरिया हमारे लिए रोशनी का काम दे सकता है। फैज के व्यक्तित्व में जो बाग़ीपन है उसका आधार है दुनिया की गुलामी, गरीबी, लोकतंत्र का अभाव और साम्राज्यवाद का वर्चस्वशाली चरित्र।
आज के संदर्भ में हमें 1983 के एफ्रो-एशियाई लेखक संघ की रजत जयंती के मौके पर उनके द्वारा दिए गए भाषण की याद आ रही है, यह भाषण बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिन समस्याओं की ओर इस भाषण में ध्यान खींचा गया था वे आज भी राजनीति से लेकर संस्कृति तक प्रधान समस्याएँ बनी हुई हैं। फैज ने कहा था इस युग की दोप्रधान समस्याएँ हैं-उपनिवेशवाद और नस्लवाद। फैज ने कहा था ‘हमारा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है, क्योंकि स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं है, उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश, साहित्य की सृजनात्मकता के संपूर्ण विकास के लिए बेहद जरुरी है।’ फैज ने इन समस्याओं पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रोशनी डालते हुए लिखा ‘‘तमाम युद्धों के अंत की तरह, लड़े गए पहले महायुद्ध के बाद सामाजिक, नैतिक और साहित्यिक बुर्जुआ मान्यताओं और वर्जनाओं के टूटने और समृद्धि के एक संक्षिप्त दौर में विजेताओं के दिमाग में अहं का उन्माद उफनने लगा था। खुदा आसमान पर था और धरती पर सब कुछ मजे में चल रहा था। नतीजतन ज्यादातर पश्चिमी और कुछ उपनिवेशों के साहित्य ने उसे आदर्श के रूप में अपना लिया। बड़े पैमाने पर शुद्ध रूपवाद के आनंद का सम्मोहन, अहं केन्द्रित चेतना की रहस्यात्मकता से लगाव, रूमानी मिथकों और कल्पित आख्यानों के बहकावों के साथ ‘कला के लिए कला’ के उद्बोधक सौंदर्यशास्त्रियों द्वारा अभिकल्पित गजदंती मीनारों का निर्माण होने लगा।’’ हिन्दी में भी नई कविता के दौर में यही सब दिखाई देता है और रूपवादी शिल्प और कला के लिए कला का नारा भी दिया गया था। यह जमाना था 1951-52 का। साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की मीमांसा करते हुए फैज ने लिखा कि प्रगतिशील साहित्यांदोलन की प्रेरणा के दो बड़े कारक हैं, ‘पहली तो वह राजनैतिक प्रेरणा है जो इन्हें सोवियत समाजवादी क्रांति से मिली और दूसरे माक्र्सवादी विचारों से मिला विचारधारात्मक दिशा-निर्देश।’ आज भी अनेक बुद्धिजीवी हैं जो परमाणु हथियारों की दौड़ के घातक परिणामों से अनभिज्ञ हैं। इस दौड़ ने सोवियत संघ के समाजवादी ढाँचे को तबाह किया और शांति के बारे में जो ख़याल थे उन्हें नुकसान पहुँचाया। फैज इस फिनोमिना की परिणतियों पर नजर टिकाए हुए थे। द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर के बारे में उन्होंने लिखा, ‘युद्ध के बाद का हमारा समय, विराट अंतर्विरोधों से ग्रस्त हमारा युग, विजयोल्लास और त्रासदियों से भरा युग, उत्सवों से भरा और हृदयविदारक युग, बड़े सपनों और उनसे बड़ी कुण्ठाओं का जमाना।
तीसरी दुनिया की जनता के लिए, एशियाई, अफ्रीकी और लातीनी अमरीकी लोगों के लिए, कम से कम इनकी एक बड़ी आबादी के लिए, किसी को तत्काल डिकेंस के शब्द याद आ जाएँगे-‘वह बेहतरीन वक्त था, वह बदतरीन वक्त था।’ अपने दो-दो विश्वयुद्धों से थके हुए साम्राज्यवाद का कमजोर पड़ते जाना, सोवियत सीमाओं का विस्तार लेता और एकजुट होता समाजवादी खेमा, संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्म, राष्ट्रीय स्वतंत्रता और सामाजिक मुक्ति के आंदोलनों का उदय और उनकी सफलताएँ, सभी कुछ एक साहसी नई दुनिया का वादा कर रहे थे जहाँ स्वतंत्रता, शांति और न्याय उपलब्ध हो सकता था, पर हमारी बदकिस्मती से ऐसा नहीं था।’
परमाणु हथियारों की दौड़ पर लिखा- ‘आणविक हथियारों के जिन्न को बंद बोतल से आजाद करते हुए अमरीका ने समाजवादी खेमे को भी ऐसा ही करने का आमंत्रण दे दिया। उस दिन से आज तक हमारी दुनिया की समूची सतह पर विनाश के डरावने साए की एक मोमी परत चढ़ी है और आज जितने खतरनाक तरीके से हमारे सामने दुनिया झूल रही है, उतनी पहले कभी न थी।’ राजनीति में इस जमाने को शीतयुद्ध के नाम से जानते हैं। इस जमाने में मुक्त विश्व का नारा दिया गया। मुक्त विश्व के साथ मुक्त बाजार और मुक्त सूचना प्रवाह को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसी के अगले चरण के रूप में नव्य उदारतावाद आया। मुक्त विश्व की धारणाओं का मीडिया से जमकर प्रचार किया गया। इसके पक्षधर हमारे बीच में अभी भी हैं और अहर्निश मुक्त विश्व और मुक्त बाजार की हिमायत करते रहते हैं। इसके बारे में फैज ने लिखा- ‘स्वतंत्र विश्व के नाम पर संभवतः हमारे इतिहास के घोर अयथार्थ ढोल नगाड़ों के शोर के साथ अमरीकी शासन तंत्र ने यहाँ वहाँ ढेर सारे निरंकुश राजाओं, सुल्तानों, खून के प्यासे अधिनायक, तानाशाहों, बेदिमाग दुस्साहसी सेनापतियों और हवा-हवाई किस्म के राजनीतिज्ञों, जिस पर भी हाथ रख सकें, को सत्ता के सिंहासन पर बैठाने की कोशिशें की हैं और बैठाया भी है। यह कार्रवाई वियतनाम से बड़ी बदनामी के बाद हुई अमरीकी विदाई के साथ कुछ वक्त के लिए रुक सी गई थी।
फिर रोनाल्ड रीगन के जमाने से हम अमरीकियों और उनके नस्लवादी साथियों को यहाँ-वहाँ भौंकते शिकारी कुत्तों की तरह इन तीन महाद्वीपों में बिखरे बारूद के ढेरों के आसपास देख रहे हैं।’ अमरीका द्वारा संचालित शीतयुद्ध और तीसरी दुनिया में स्वतंत्र सत्ताओं के उदय के साथ पैदा हुई परिस्थितियों ने समाज, साहित्य, संस्कृति और संस्कृतिकर्मियों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए फैज ने लिखा है- ‘नए शोषक वर्ग और निरंकुश तानाशाही के उदय और वैयक्तिक और सामाजिक मुक्ति के सपनों के ढह जाने से युवापीढ़ी मोहभंग, सनकीपन और अविश्वास की विषाक्त चपेट में आ गई है। नतीजतन बहुत से युवा लेखक पश्चिमी विचारकों द्वारा प्रतिपादित किए जा रहे जीवित यथार्थ से रिश्ता तोड़ने, उसके मानवीय और शैक्षणिक पक्ष को अस्वीकार करने और लेखक की तमाम सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने जैसे प्रतिक्रियावादी विचारों और सिद्धान्तों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। इन वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद, संरचनावाद, अभिव्यक्तिवाद और अब ‘लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वकालत की जा रही है। इसका जाहिर उद्देश्य लेखक को अपनी सामाजिक, राजनैतिक, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से दूर करना है। इस सारे विभ्रम को विचारपूर्ण तरीकों से हटाने की जरूरत है। एक अन्य निबंध ‘अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याएँ’ में फैज ने भारत जैसे अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याओं पर रोशनी डालते हुए लिखा है कि इन देशों की बुनियादी समस्या है सांस्कृतिक एकीकरण की। इस प्रसंग में लिखा सांस्कृतिक एकीकरण, का अर्थ है-नीचे से ऊपर तक एकीकरण, जिसका अर्थ है विविध राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिरूपों को साझा वैचारिक और राष्ट्रीय आधार प्रदान करना और क्षैतिज एकीकरण जिसका अर्थ है अपने समूचे जनसमूह को एक से सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर तक ऊपर उठाना और शिक्षित करना। इसका मतलब यह है कि उपनिवेशवाद से आजादी तक के गुणात्मक परिवर्तन के पीछे-पीछे वैसा ही गुणात्मक परिवर्तन उस सामाजिक संरचना में होना चाहिए जिसे उपनिवेशवाद अपने पीछे छोड़ गया है।
फ़ैज के अनुसार अविकसित देशों की पहली सांस्कृतिक समस्या है अपनी विध्वस्त राष्ट्रीय संस्कृतियों के मलबे से उन तत्वों को बचा कर निकालने की जो उनकी राष्ट्रीय पहचान का मूलाधार हैं, जिनका अधिक विकसित सामाजिक संरचनाओं की आवश्यकताओं के अनुसार समायोजन और अनुकूलन किया जा सके, और जो प्रगतिशील सामाजिक मूल्यों और प्रवृत्तियों को मजबूत बनाने और उन्हें बढ़ावा देने में मदद करें।
दूसरी समस्या है उन तत्वों को नकारने और तजने की जो पिछड़ी और पुरातन सामाजिक संरचनाओं का मूलाधार हैं, जो या तो सामाजिक संबंधों की और विकसित व्यवस्था से असंगत हैं या उसके विरुद्ध हैं, और जो अधिक विवेकवान, बुद्धिपूर्ण और मानवीय मूल्यों और प्रवृत्तियों की प्रगति में बाधा बनते हैं।
तीसरी समस्या है, आयातित विदेशी और पश्चिमी संस्कृतियों से उन तत्वों को स्वीकार और आत्मसात करने की जो राष्ट्रीय संस्कृति को उच्चतर तकनीकी, सौंदर्यशास्त्रीय और वैज्ञानिक मानकों तक ले जाने में सहायक हों, और चौथी समस्या है उन तत्वों का परित्याग करने की जो अधः पतन, अवनति और सामाजिक प्रतिक्रिया को सोद्देश्य बढ़ावा देने का काम करते हैं। ’फैज ने इन्हें नवीन’ सांस्कृतिक अनुकूलन, सम्मिलन और मुक्ति की समस्याओं के रूप में देखा।-
-जगदीश्वर चतुर्वेदी
अविकसित देश के नाते भारत के सामने आज अनेक समस्याएँ हैं। समाज में विघटनकारी और साम्प्रदायिक ताकतें आक्रामक मुद्रा में हैं, देश का समूचासांस्कृतिक तानाबाना टूट गया है। दूसरी ओर अमरीकी साम्राज्यवाद के अनुयायी के रूप में हमारे शासकों ने काम करना आरंभ कर दिया है। ऐसी अवस्था में फ़ैज़ का नजरिया हमारे लिए रोशनी का काम दे सकता है। फैज के व्यक्तित्व में जो बाग़ीपन है उसका आधार है दुनिया की गुलामी, गरीबी, लोकतंत्र का अभाव और साम्राज्यवाद का वर्चस्वशाली चरित्र।
आज के संदर्भ में हमें 1983 के एफ्रो-एशियाई लेखक संघ की रजत जयंती के मौके पर उनके द्वारा दिए गए भाषण की याद आ रही है, यह भाषण बहुत ही महत्वपूर्ण है। जिन समस्याओं की ओर इस भाषण में ध्यान खींचा गया था वे आज भी राजनीति से लेकर संस्कृति तक प्रधान समस्याएँ बनी हुई हैं। फैज ने कहा था इस युग की दोप्रधान समस्याएँ हैं-उपनिवेशवाद और नस्लवाद। फैज ने कहा था ‘हमारा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है, क्योंकि स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं है, उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश, साहित्य की सृजनात्मकता के संपूर्ण विकास के लिए बेहद जरुरी है।’ फैज ने इन समस्याओं पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रोशनी डालते हुए लिखा ‘‘तमाम युद्धों के अंत की तरह, लड़े गए पहले महायुद्ध के बाद सामाजिक, नैतिक और साहित्यिक बुर्जुआ मान्यताओं और वर्जनाओं के टूटने और समृद्धि के एक संक्षिप्त दौर में विजेताओं के दिमाग में अहं का उन्माद उफनने लगा था। खुदा आसमान पर था और धरती पर सब कुछ मजे में चल रहा था। नतीजतन ज्यादातर पश्चिमी और कुछ उपनिवेशों के साहित्य ने उसे आदर्श के रूप में अपना लिया। बड़े पैमाने पर शुद्ध रूपवाद के आनंद का सम्मोहन, अहं केन्द्रित चेतना की रहस्यात्मकता से लगाव, रूमानी मिथकों और कल्पित आख्यानों के बहकावों के साथ ‘कला के लिए कला’ के उद्बोधक सौंदर्यशास्त्रियों द्वारा अभिकल्पित गजदंती मीनारों का निर्माण होने लगा।’’ हिन्दी में भी नई कविता के दौर में यही सब दिखाई देता है और रूपवादी शिल्प और कला के लिए कला का नारा भी दिया गया था। यह जमाना था 1951-52 का। साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन की मीमांसा करते हुए फैज ने लिखा कि प्रगतिशील साहित्यांदोलन की प्रेरणा के दो बड़े कारक हैं, ‘पहली तो वह राजनैतिक प्रेरणा है जो इन्हें सोवियत समाजवादी क्रांति से मिली और दूसरे माक्र्सवादी विचारों से मिला विचारधारात्मक दिशा-निर्देश।’ आज भी अनेक बुद्धिजीवी हैं जो परमाणु हथियारों की दौड़ के घातक परिणामों से अनभिज्ञ हैं। इस दौड़ ने सोवियत संघ के समाजवादी ढाँचे को तबाह किया और शांति के बारे में जो ख़याल थे उन्हें नुकसान पहुँचाया। फैज इस फिनोमिना की परिणतियों पर नजर टिकाए हुए थे। द्वितीय विश्वयुद्धोत्तर दौर के बारे में उन्होंने लिखा, ‘युद्ध के बाद का हमारा समय, विराट अंतर्विरोधों से ग्रस्त हमारा युग, विजयोल्लास और त्रासदियों से भरा युग, उत्सवों से भरा और हृदयविदारक युग, बड़े सपनों और उनसे बड़ी कुण्ठाओं का जमाना।
तीसरी दुनिया की जनता के लिए, एशियाई, अफ्रीकी और लातीनी अमरीकी लोगों के लिए, कम से कम इनकी एक बड़ी आबादी के लिए, किसी को तत्काल डिकेंस के शब्द याद आ जाएँगे-‘वह बेहतरीन वक्त था, वह बदतरीन वक्त था।’ अपने दो-दो विश्वयुद्धों से थके हुए साम्राज्यवाद का कमजोर पड़ते जाना, सोवियत सीमाओं का विस्तार लेता और एकजुट होता समाजवादी खेमा, संयुक्त राष्ट्र संघ का जन्म, राष्ट्रीय स्वतंत्रता और सामाजिक मुक्ति के आंदोलनों का उदय और उनकी सफलताएँ, सभी कुछ एक साहसी नई दुनिया का वादा कर रहे थे जहाँ स्वतंत्रता, शांति और न्याय उपलब्ध हो सकता था, पर हमारी बदकिस्मती से ऐसा नहीं था।’
परमाणु हथियारों की दौड़ पर लिखा- ‘आणविक हथियारों के जिन्न को बंद बोतल से आजाद करते हुए अमरीका ने समाजवादी खेमे को भी ऐसा ही करने का आमंत्रण दे दिया। उस दिन से आज तक हमारी दुनिया की समूची सतह पर विनाश के डरावने साए की एक मोमी परत चढ़ी है और आज जितने खतरनाक तरीके से हमारे सामने दुनिया झूल रही है, उतनी पहले कभी न थी।’ राजनीति में इस जमाने को शीतयुद्ध के नाम से जानते हैं। इस जमाने में मुक्त विश्व का नारा दिया गया। मुक्त विश्व के साथ मुक्त बाजार और मुक्त सूचना प्रवाह को हथियार के रूप में इस्तेमाल किया गया। इसी के अगले चरण के रूप में नव्य उदारतावाद आया। मुक्त विश्व की धारणाओं का मीडिया से जमकर प्रचार किया गया। इसके पक्षधर हमारे बीच में अभी भी हैं और अहर्निश मुक्त विश्व और मुक्त बाजार की हिमायत करते रहते हैं। इसके बारे में फैज ने लिखा- ‘स्वतंत्र विश्व के नाम पर संभवतः हमारे इतिहास के घोर अयथार्थ ढोल नगाड़ों के शोर के साथ अमरीकी शासन तंत्र ने यहाँ वहाँ ढेर सारे निरंकुश राजाओं, सुल्तानों, खून के प्यासे अधिनायक, तानाशाहों, बेदिमाग दुस्साहसी सेनापतियों और हवा-हवाई किस्म के राजनीतिज्ञों, जिस पर भी हाथ रख सकें, को सत्ता के सिंहासन पर बैठाने की कोशिशें की हैं और बैठाया भी है। यह कार्रवाई वियतनाम से बड़ी बदनामी के बाद हुई अमरीकी विदाई के साथ कुछ वक्त के लिए रुक सी गई थी।
फिर रोनाल्ड रीगन के जमाने से हम अमरीकियों और उनके नस्लवादी साथियों को यहाँ-वहाँ भौंकते शिकारी कुत्तों की तरह इन तीन महाद्वीपों में बिखरे बारूद के ढेरों के आसपास देख रहे हैं।’ अमरीका द्वारा संचालित शीतयुद्ध और तीसरी दुनिया में स्वतंत्र सत्ताओं के उदय के साथ पैदा हुई परिस्थितियों ने समाज, साहित्य, संस्कृति और संस्कृतिकर्मियों को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। इसके कारणों पर प्रकाश डालते हुए फैज ने लिखा है- ‘नए शोषक वर्ग और निरंकुश तानाशाही के उदय और वैयक्तिक और सामाजिक मुक्ति के सपनों के ढह जाने से युवापीढ़ी मोहभंग, सनकीपन और अविश्वास की विषाक्त चपेट में आ गई है। नतीजतन बहुत से युवा लेखक पश्चिमी विचारकों द्वारा प्रतिपादित किए जा रहे जीवित यथार्थ से रिश्ता तोड़ने, उसके मानवीय और शैक्षणिक पक्ष को अस्वीकार करने और लेखक की तमाम सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने जैसे प्रतिक्रियावादी विचारों और सिद्धान्तों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। इन वैचारिक मठों और गढ़ों से रूपवाद, संरचनावाद, अभिव्यक्तिवाद और अब ‘लेखक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे ऊपर से अत्यंत आकर्षक लगने वाले नारे की लगातार वकालत की जा रही है। इसका जाहिर उद्देश्य लेखक को अपनी सामाजिक, राजनैतिक, विचारधारात्मक प्रतिबद्धता से दूर करना है। इस सारे विभ्रम को विचारपूर्ण तरीकों से हटाने की जरूरत है। एक अन्य निबंध ‘अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याएँ’ में फैज ने भारत जैसे अविकसित देशों की सांस्कृतिक समस्याओं पर रोशनी डालते हुए लिखा है कि इन देशों की बुनियादी समस्या है सांस्कृतिक एकीकरण की। इस प्रसंग में लिखा सांस्कृतिक एकीकरण, का अर्थ है-नीचे से ऊपर तक एकीकरण, जिसका अर्थ है विविध राष्ट्रीय सांस्कृतिक प्रतिरूपों को साझा वैचारिक और राष्ट्रीय आधार प्रदान करना और क्षैतिज एकीकरण जिसका अर्थ है अपने समूचे जनसमूह को एक से सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर तक ऊपर उठाना और शिक्षित करना। इसका मतलब यह है कि उपनिवेशवाद से आजादी तक के गुणात्मक परिवर्तन के पीछे-पीछे वैसा ही गुणात्मक परिवर्तन उस सामाजिक संरचना में होना चाहिए जिसे उपनिवेशवाद अपने पीछे छोड़ गया है।
फ़ैज के अनुसार अविकसित देशों की पहली सांस्कृतिक समस्या है अपनी विध्वस्त राष्ट्रीय संस्कृतियों के मलबे से उन तत्वों को बचा कर निकालने की जो उनकी राष्ट्रीय पहचान का मूलाधार हैं, जिनका अधिक विकसित सामाजिक संरचनाओं की आवश्यकताओं के अनुसार समायोजन और अनुकूलन किया जा सके, और जो प्रगतिशील सामाजिक मूल्यों और प्रवृत्तियों को मजबूत बनाने और उन्हें बढ़ावा देने में मदद करें।
दूसरी समस्या है उन तत्वों को नकारने और तजने की जो पिछड़ी और पुरातन सामाजिक संरचनाओं का मूलाधार हैं, जो या तो सामाजिक संबंधों की और विकसित व्यवस्था से असंगत हैं या उसके विरुद्ध हैं, और जो अधिक विवेकवान, बुद्धिपूर्ण और मानवीय मूल्यों और प्रवृत्तियों की प्रगति में बाधा बनते हैं।
तीसरी समस्या है, आयातित विदेशी और पश्चिमी संस्कृतियों से उन तत्वों को स्वीकार और आत्मसात करने की जो राष्ट्रीय संस्कृति को उच्चतर तकनीकी, सौंदर्यशास्त्रीय और वैज्ञानिक मानकों तक ले जाने में सहायक हों, और चौथी समस्या है उन तत्वों का परित्याग करने की जो अधः पतन, अवनति और सामाजिक प्रतिक्रिया को सोद्देश्य बढ़ावा देने का काम करते हैं। ’फैज ने इन्हें नवीन’ सांस्कृतिक अनुकूलन, सम्मिलन और मुक्ति की समस्याओं के रूप में देखा।-
-जगदीश्वर चतुर्वेदी
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शुक्रवार, 25 मार्च 2011
संघ के विचारों को ही स्वर दे रहे थे सुदर्शन
सार्वजनिक जीवन में हम कई बार ऐसी बातें सुनते हैं जो अशिष्ट, गरिमाहीन व मुँह का स्वाद कसैला कर देने वाली होती हैं। आर0एस0एस0 के पूर्व सरसंघचालक के0 सुदर्शन का बयान (नवंबर 2010) इसी श्रेणी में आता है। सुदर्शन ने कहा कि श्रीमती सोनिया गांधी विदेशी एजेन्ट हैं, उनकी अपनी सास व पति की हत्याओं में भूमिका थी व यह भी कि राजीव गांधी उनसे संबंध विच्छेद करना चाहते थे। मीडिया के बड़े हिस्से ने सुदर्शन के गैर-जिम्मेदाराना वक्तव्यों को कोई अहमियत नहीं दी और केवल चंद स्तंभकारों ने उन्हें टिप्पणी करने के लायक समझा। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने विरोध प्रदर्शन किए। कुछ लोगों ने अदालतों में मामले भी दायर किए। आर0एस0एस0 ने सुदर्शन के इन वक्तव्यों से स्वयं को दूर कर लिया। संघी पृष्ठभूमि वाले भाजपा नेता तरुण विजय ने यह घोषणा की कि सुदर्शन के आरोपों से भाजपा का कोई लेना-देना नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि उनके वक्तव्यों से भाजपा को अलग करते हुए भी, तरुण विजय, सुदर्शन की बुद्धिमत्ता व विद्वता की तारीफ करना नहीं भूले। कुल मिलाकर, संघ परिवार के लगभग सभी सदस्यों ने सुदर्शन के वक्तव्यों से स्वयं को अलग तो कर लिया परंतु अपने पूर्व प्रमुख व संघ के सबसे पुराने नेताओं में से एक की उन्होंने आलोचना भी नहीं की। और तो और, सुदर्शन की विद्वता की शान में कसीदे भी काढ़े गए।
संघ परिवार द्वारा सुदर्शन की आलोचना न करने में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। सुदर्शन की जुबान नहीं फिसली थी। उन्होंने जो कुछ कहा, संघ उसमें विश्वास करता है, उसे सही मानता है और इसीलिए, संघ ने सुदर्शन की निंदा नहीं की।
कुछ लोग सुदर्शन के वक्तव्यों को एक कुंठित बूढे़ की बकवास भले ही मानें परंतु सच यह है कि सुदर्शन के उद्गार, दरअसल, आर0एस0एस0 की सोच को प्रतिबिंबित करते हैं। ये संघ के ही विचार हैं।
समाज को सांप्रदायिक चश्मे से देखना, आर0एस0एस0 की मूल विचारधारा का महत्वपूर्ण अंग है। सांप्रदायिक चश्मे से झाँकने पर लोगों की भौतिक व अन्य आवश्यकताएँ केवल और केवल धर्म के दृष्टिकोण से दिखलाई देती हैं। इस विचारधारा के अनुसार, सभी हिन्दुओं के हित एक से हैं व इसी तरह, सभी मुसलमानों व ईसाइयों के भी एक से हित हैं। चूँकि हर समुदाय के हित एक से हैं अतः जाहिर तौर पर, अलग-अलग समुदायों के हित अलग-अलग हैं। यह विचारधारा कहती है कि अलग-अलग समुदायों के हित न केवल एक दूसरे से अलग हैं वरन् एक-दूसरे के विरोधाभाषी व विपरीत भी हैं।
इस विचारधारा के अनुसार, एक हिन्दू उद्योगपति व हिन्दू भिखारी के हित समान हैं! मुस्लिम जमींदारों और मुस्लिम सफाई कर्मियों के हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसी तरह, अगर हम इस
विचारधारा के पैरोकारों की मानें तो पुराने समय में हिन्दू राजा और हिन्दू गरीब, शूद्र, किसान एक ही नाव में सवार थे। प्राचीन व मध्यकालीन भारत में पूरा हिन्दू समुदाय एक था और अन्य समुदायों से सतत संघर्षरत था। सारे हिन्दू राजा एक दूसरे से अतिशय पे्रम करते थे और शूद्रों और हिन्दू गरीब किसानों को अक्सर अपने महलों में खाने पर निमंत्रित करते रहते थे।
सांप्रदायिक विचारधारा- चाहे वह किसी भी धर्म से संबद्ध हो- समाज को ऊपर से नीचे की ओर विभाजक रेखाएँ खींचकर, हिस्सों में बाँटती है। वह समाज के विभिन्न आर्थिक स्तरों- धनी, मध्यम, निम्न व अति दरिद्र- को मान्यता नहीं देती। उसके अनुसार महत्व केवल धर्म-आधारित लंबवत् विभाजन का है, आर्थिक स्थिति पर आधारित क्षैतिज विभाजन का नहीं। यह विचारधारा पहचान से जुड़े मुद्दों पर जोर देती है और दुनियावी समस्याओं को नजरअंदाज करती है। सामाजिक व आर्थिक कारकों से जन्मी अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था से इस विचारधारा को कोई लेना-देना नहीं है। धर्म के नाम पर, जन्म-आधारित विशेषाधिकारों का संरक्षण इस विचारधारा का लक्ष्य है। चूँकि धर्म, आस्था और विश्वास पर आधारित होता है इसलिए एक शक्तिशाली शस्त्र के रूप में उसका इस्तेमाल करना आसान होता है। यह उपयोग सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। सांप्रदायिक संगठन, धर्म का दुरुपयोग जनोन्माद भड़काने के लिए करते हैं ताकि वे अपने राजनैतिक हित सिद्ध कर सकें।
धर्म-आधारित राजनीति के सभी खिलाड़ी यही खेल खेलते हैं।
भारत में मुस्लिम व हिन्दू - दोनांे सांप्रदायिक धाराएँ - उस प्रजातांत्रिक धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के विरोध स्वरूप उभरीं, जो सभी भारतीयों को एक निगाह से देखती थी। सांप्रदायिक राजनीति को समर्थन मिला श्रेष्ठि वर्ग से, जमींदारों से, राजाओं-नवाबों व उनसे जुड़े पुरोहित वर्ग से और शहरी
मध्यम वर्ग से। सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि विभिन्न सांप्रदायिक
विचारधाराएँ परस्पर विरोधी हैं परंतु सच यह है कि उन सभी की जडे़ं एक हंै, उनके मूल्य समान हैं, वे एक से तर्कों व सोच से संचालित होती हैं। इन विचारधाराओं के पोषक व प्रणेता अक्सर उच्च सामाजिक हैसियत वाले लोग होते हैं जो केवल पहचान से जुडे़ मुद्दों की बात करते हैं। इसके विपरीत, दो जून की रोटी कमाने के लिए संघर्षरत वर्ग, अपनी दुनियावी समस्याओं में उलझा रहता है।
इस वैचारिक भिन्नता की झलक हम गौतम बुद्ध की शिक्षाओं में देख सकते हैं। गौतम बुद्ध ने जाति प्रथा की मुख़ालिफत की। वे समाज के दुख-दर्द, वंचित वर्गों की तकलीफों की बात करते थे। उनके प्रभाव को कम करने के लिए, योजनाबद्ध ढंग से दुनिया को माया बताने का अभियान चलाया गया (जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्यम्)। बौद्ध धर्म पर हमला, आर्थिक शोषण पर आधारित जातिप्रथा के मजबूत होने का प्रतीक भी था। मध्यकाल में अधिकांश शासकों ने- चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न रहे हों- पुरोहित वर्ग को संरक्षण दिया (हिन्दू राजाओं के मामले में राजगुरू, मुस्लिम बादशाहों के दरबारों के शाही इमाम और यूरोप में राजाओं व पोप के बीच संधियाँ)। पुरोहित वर्ग, हमेशा से यथास्थितिवादी व कर्मकांडी रहा है।
इसके विपरीत, सभी धर्मों के संतांे ने धर्मों में निहित नैतिक मूल्यों पर जोर दिया और इन नैतिक मूल्यों से सभी धर्मों के लोगों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की। संतों को इहलोक की समस्याओं की ज्यादा चिंता थी, परलोक की कम। कबीर कहते हैं “पाहन पूजे हरि मिलंे, तो मैं पूजूँ पहाड़“। कबीर के अनुसार, भगवान की मूर्ति से चक्की ज्यादा महत्वपूर्ण है। वे मुल्ला को भी नहीं बख्शते, शोषकों व शोषितों के हितों का विरोधाभास, पुरोहित वर्ग व संतों की शिक्षाओं में अंतर से साफ हो जाता है।
हमारे देश की आजादी की लड़ाई के दौरान, हिन्दू व मुस्लिम सांप्रदायिक संगठनों ने एकसा दृष्टिकोण अपनाया। दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया और दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन के साथ हो रहे सामाजिक परिवर्तन का विरोध किया। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा व आर.एस.एस. स्वाधीनता आंदोलन से इसलिए दूर रहे क्योंकि इस आंदोलन का उद्देश्य केवल अंग्रेजी राज से छुटकारा पाना नहीं था। इसका लक्ष्य देश में सामाजिक, आर्थिक व लैंगिक न्याय का सूत्रपात करना भी था।
इस पृष्ठभूमि में सोनिया गांधी के प्रति आर0एस0एस0 के बैरभाव को समझा जा सकता है। अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी के शीर्ष पर विराजमान सोनिया गांधी में संघ एक भारतीय नागरिक को नहीं देखता, वह एक ईसाई महिला को देखता है। संघ की विचारधारा में रचे-बसे सुदर्शन की सोनिया गांधी के बारे में टिप्पणियाँ, आर0एस0एस0 की सोच का प्रकटीकरण मात्र हैं। सुदर्शन लगभग पाँच दशकों से संघ से जुड़े हुए हैं और दस वर्ष तक संघ के प्रमुख रहे हैं। भला संघ की सोच को उनसे बेहतर कौन जान सकता है?
उन साम्प्रदायिक संगठनों, जिनका लक्ष्य धर्म-आधारित राज्य की स्थापना है, की असली सोच और उसके प्रकटीकरण के बीच अंतर होना अवश्यंभावी है। आर0एस0एस0 का लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना है और अपने इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वह भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त प्रजातंत्र का इस्तेमाल करना चाहता है। स्पष्टतः ऐसा करने के लिए उसे अत्यंत सावधानी व धूर्तता से काम लेना पड़ता है। संघ के स्वयंसेवक वही और केवल वही कहते हैं जो संघ चाहता है, परंतु संघ उनके वक्तव्यों का खुलकर अनुमोदन नहीं कर सकता क्योंकि इससे प्रजातात्रिक मान्यताओं का हनन होगा। गांधी हत्या (नाथूराम गोड्से), पास्टर स्टेन्स की हत्या (दारासिंह), मंगलौर पब कांड (श्रीराम सेना) आदि जैसे मामलों में भी ठीक यही हुआ था। आर0एस0एस0 प्रजातंत्र को खत्म करना चाहता है परंतु वह ऐसा कह नहीं सकता। इस समस्या से निपटने के लिए संघ की रणनीति यह है कि उसके समर्थक व कार्यकर्ता जब भी कोई विवादास्पद बात कहते हैं या कोई गैर-कानूनी हरकत करते हैं तो संघ ऊपरी तौर पर स्वयं को उनसे अलग कर लेता है परंतु उनके प्रति पूरे सम्मान के साथ!
-राम पुनियानी
दिलचस्प बात यह है कि उनके वक्तव्यों से भाजपा को अलग करते हुए भी, तरुण विजय, सुदर्शन की बुद्धिमत्ता व विद्वता की तारीफ करना नहीं भूले। कुल मिलाकर, संघ परिवार के लगभग सभी सदस्यों ने सुदर्शन के वक्तव्यों से स्वयं को अलग तो कर लिया परंतु अपने पूर्व प्रमुख व संघ के सबसे पुराने नेताओं में से एक की उन्होंने आलोचना भी नहीं की। और तो और, सुदर्शन की विद्वता की शान में कसीदे भी काढ़े गए।
संघ परिवार द्वारा सुदर्शन की आलोचना न करने में कुछ भी आश्चर्यजनक नहीं है। सुदर्शन की जुबान नहीं फिसली थी। उन्होंने जो कुछ कहा, संघ उसमें विश्वास करता है, उसे सही मानता है और इसीलिए, संघ ने सुदर्शन की निंदा नहीं की।
कुछ लोग सुदर्शन के वक्तव्यों को एक कुंठित बूढे़ की बकवास भले ही मानें परंतु सच यह है कि सुदर्शन के उद्गार, दरअसल, आर0एस0एस0 की सोच को प्रतिबिंबित करते हैं। ये संघ के ही विचार हैं।
समाज को सांप्रदायिक चश्मे से देखना, आर0एस0एस0 की मूल विचारधारा का महत्वपूर्ण अंग है। सांप्रदायिक चश्मे से झाँकने पर लोगों की भौतिक व अन्य आवश्यकताएँ केवल और केवल धर्म के दृष्टिकोण से दिखलाई देती हैं। इस विचारधारा के अनुसार, सभी हिन्दुओं के हित एक से हैं व इसी तरह, सभी मुसलमानों व ईसाइयों के भी एक से हित हैं। चूँकि हर समुदाय के हित एक से हैं अतः जाहिर तौर पर, अलग-अलग समुदायों के हित अलग-अलग हैं। यह विचारधारा कहती है कि अलग-अलग समुदायों के हित न केवल एक दूसरे से अलग हैं वरन् एक-दूसरे के विरोधाभाषी व विपरीत भी हैं।
इस विचारधारा के अनुसार, एक हिन्दू उद्योगपति व हिन्दू भिखारी के हित समान हैं! मुस्लिम जमींदारों और मुस्लिम सफाई कर्मियों के हित एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसी तरह, अगर हम इस
विचारधारा के पैरोकारों की मानें तो पुराने समय में हिन्दू राजा और हिन्दू गरीब, शूद्र, किसान एक ही नाव में सवार थे। प्राचीन व मध्यकालीन भारत में पूरा हिन्दू समुदाय एक था और अन्य समुदायों से सतत संघर्षरत था। सारे हिन्दू राजा एक दूसरे से अतिशय पे्रम करते थे और शूद्रों और हिन्दू गरीब किसानों को अक्सर अपने महलों में खाने पर निमंत्रित करते रहते थे।
सांप्रदायिक विचारधारा- चाहे वह किसी भी धर्म से संबद्ध हो- समाज को ऊपर से नीचे की ओर विभाजक रेखाएँ खींचकर, हिस्सों में बाँटती है। वह समाज के विभिन्न आर्थिक स्तरों- धनी, मध्यम, निम्न व अति दरिद्र- को मान्यता नहीं देती। उसके अनुसार महत्व केवल धर्म-आधारित लंबवत् विभाजन का है, आर्थिक स्थिति पर आधारित क्षैतिज विभाजन का नहीं। यह विचारधारा पहचान से जुड़े मुद्दों पर जोर देती है और दुनियावी समस्याओं को नजरअंदाज करती है। सामाजिक व आर्थिक कारकों से जन्मी अन्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था से इस विचारधारा को कोई लेना-देना नहीं है। धर्म के नाम पर, जन्म-आधारित विशेषाधिकारों का संरक्षण इस विचारधारा का लक्ष्य है। चूँकि धर्म, आस्था और विश्वास पर आधारित होता है इसलिए एक शक्तिशाली शस्त्र के रूप में उसका इस्तेमाल करना आसान होता है। यह उपयोग सकारात्मक भी हो सकता है और नकारात्मक भी। सांप्रदायिक संगठन, धर्म का दुरुपयोग जनोन्माद भड़काने के लिए करते हैं ताकि वे अपने राजनैतिक हित सिद्ध कर सकें।
धर्म-आधारित राजनीति के सभी खिलाड़ी यही खेल खेलते हैं।
भारत में मुस्लिम व हिन्दू - दोनांे सांप्रदायिक धाराएँ - उस प्रजातांत्रिक धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के विरोध स्वरूप उभरीं, जो सभी भारतीयों को एक निगाह से देखती थी। सांप्रदायिक राजनीति को समर्थन मिला श्रेष्ठि वर्ग से, जमींदारों से, राजाओं-नवाबों व उनसे जुड़े पुरोहित वर्ग से और शहरी
मध्यम वर्ग से। सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि विभिन्न सांप्रदायिक
विचारधाराएँ परस्पर विरोधी हैं परंतु सच यह है कि उन सभी की जडे़ं एक हंै, उनके मूल्य समान हैं, वे एक से तर्कों व सोच से संचालित होती हैं। इन विचारधाराओं के पोषक व प्रणेता अक्सर उच्च सामाजिक हैसियत वाले लोग होते हैं जो केवल पहचान से जुडे़ मुद्दों की बात करते हैं। इसके विपरीत, दो जून की रोटी कमाने के लिए संघर्षरत वर्ग, अपनी दुनियावी समस्याओं में उलझा रहता है।
इस वैचारिक भिन्नता की झलक हम गौतम बुद्ध की शिक्षाओं में देख सकते हैं। गौतम बुद्ध ने जाति प्रथा की मुख़ालिफत की। वे समाज के दुख-दर्द, वंचित वर्गों की तकलीफों की बात करते थे। उनके प्रभाव को कम करने के लिए, योजनाबद्ध ढंग से दुनिया को माया बताने का अभियान चलाया गया (जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्यम्)। बौद्ध धर्म पर हमला, आर्थिक शोषण पर आधारित जातिप्रथा के मजबूत होने का प्रतीक भी था। मध्यकाल में अधिकांश शासकों ने- चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न रहे हों- पुरोहित वर्ग को संरक्षण दिया (हिन्दू राजाओं के मामले में राजगुरू, मुस्लिम बादशाहों के दरबारों के शाही इमाम और यूरोप में राजाओं व पोप के बीच संधियाँ)। पुरोहित वर्ग, हमेशा से यथास्थितिवादी व कर्मकांडी रहा है।
इसके विपरीत, सभी धर्मों के संतांे ने धर्मों में निहित नैतिक मूल्यों पर जोर दिया और इन नैतिक मूल्यों से सभी धर्मों के लोगों को एक सूत्र में पिरोने की कोशिश की। संतों को इहलोक की समस्याओं की ज्यादा चिंता थी, परलोक की कम। कबीर कहते हैं “पाहन पूजे हरि मिलंे, तो मैं पूजूँ पहाड़“। कबीर के अनुसार, भगवान की मूर्ति से चक्की ज्यादा महत्वपूर्ण है। वे मुल्ला को भी नहीं बख्शते, शोषकों व शोषितों के हितों का विरोधाभास, पुरोहित वर्ग व संतों की शिक्षाओं में अंतर से साफ हो जाता है।
हमारे देश की आजादी की लड़ाई के दौरान, हिन्दू व मुस्लिम सांप्रदायिक संगठनों ने एकसा दृष्टिकोण अपनाया। दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग नहीं लिया और दोनों ने स्वतंत्रता आंदोलन के साथ हो रहे सामाजिक परिवर्तन का विरोध किया। मुस्लिम लीग, हिन्दू महासभा व आर.एस.एस. स्वाधीनता आंदोलन से इसलिए दूर रहे क्योंकि इस आंदोलन का उद्देश्य केवल अंग्रेजी राज से छुटकारा पाना नहीं था। इसका लक्ष्य देश में सामाजिक, आर्थिक व लैंगिक न्याय का सूत्रपात करना भी था।
इस पृष्ठभूमि में सोनिया गांधी के प्रति आर0एस0एस0 के बैरभाव को समझा जा सकता है। अपनी मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी के शीर्ष पर विराजमान सोनिया गांधी में संघ एक भारतीय नागरिक को नहीं देखता, वह एक ईसाई महिला को देखता है। संघ की विचारधारा में रचे-बसे सुदर्शन की सोनिया गांधी के बारे में टिप्पणियाँ, आर0एस0एस0 की सोच का प्रकटीकरण मात्र हैं। सुदर्शन लगभग पाँच दशकों से संघ से जुड़े हुए हैं और दस वर्ष तक संघ के प्रमुख रहे हैं। भला संघ की सोच को उनसे बेहतर कौन जान सकता है?
उन साम्प्रदायिक संगठनों, जिनका लक्ष्य धर्म-आधारित राज्य की स्थापना है, की असली सोच और उसके प्रकटीकरण के बीच अंतर होना अवश्यंभावी है। आर0एस0एस0 का लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र की स्थापना है और अपने इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वह भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त प्रजातंत्र का इस्तेमाल करना चाहता है। स्पष्टतः ऐसा करने के लिए उसे अत्यंत सावधानी व धूर्तता से काम लेना पड़ता है। संघ के स्वयंसेवक वही और केवल वही कहते हैं जो संघ चाहता है, परंतु संघ उनके वक्तव्यों का खुलकर अनुमोदन नहीं कर सकता क्योंकि इससे प्रजातात्रिक मान्यताओं का हनन होगा। गांधी हत्या (नाथूराम गोड्से), पास्टर स्टेन्स की हत्या (दारासिंह), मंगलौर पब कांड (श्रीराम सेना) आदि जैसे मामलों में भी ठीक यही हुआ था। आर0एस0एस0 प्रजातंत्र को खत्म करना चाहता है परंतु वह ऐसा कह नहीं सकता। इस समस्या से निपटने के लिए संघ की रणनीति यह है कि उसके समर्थक व कार्यकर्ता जब भी कोई विवादास्पद बात कहते हैं या कोई गैर-कानूनी हरकत करते हैं तो संघ ऊपरी तौर पर स्वयं को उनसे अलग कर लेता है परंतु उनके प्रति पूरे सम्मान के साथ!
-राम पुनियानी
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बृहस्पतिवार, 24 मार्च 2011
मायावती की पुलिस ने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव को भी नहीं बक्शा
प्रदेश में मायावती की सरकार समाज के हर तबकों का इलाज लाठी और गोली से कर रही है। उसके पीछे उसका तर्क यह होता है कि कानून और व्यवस्था हर हालत में बनाये रखा जायेगा किन्तु उसी कानून और व्यवस्था को बनांये रखने में उसका दोहरा चरित्र भी दिखाई देता है। जाट आन्दोलन को मुख्यमंत्री मायावती का समर्थन प्राप्त होने से कानून और व्यवस्था कि कोई समस्या नहीं थी और दिल्ली जाने वाली रेलवे लाईनो को प्रदेश सरकार के कुशल नेतृत्व में जाटों ने बंद कर रखा था। माननीय उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद प्रदेश सरकार ने कोई हस्ताक्षेप नहीं किया।
वहीँ 23 मार्च को शहीद दिवस भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की स्मृति में आजमगढ़ में आयोजित हुआ जिसको मायावती की सरकार के दरोगा ने आयोजनकर्ताओं को गन्दी-गन्दी गालियाँ दी व लातों से मारा। इप्टा के सदस्य जब कलेक्ट्रेट चौक पर पहुंचे और वहां पर जब साथी लोग अपना कार्यक्रम देने लगे तो इतने में सिविल लाइन चौकी के दरोगा ने आकर शहादत दिवस के क्रायक्रम में वाद्य बजा रहे साथी को अपने पैर से मारा और कहा कि यहाँ पर कुछ नही करना है इसके साथ ही मोती एवं एनी सत्यो के साथ अभद्र व्यवहार किया ।परन्तु इसके बावजूद इप्टा के साथी वहां पर कार्यक्रम कर के गये |
भगत सिंह तुम जिन्दा हो हम सबके अरमानो में ,भगत तुम हमारे दोस्त हो ,इन्कलाब जिन्दा बाद ,साम्राज्यवाद मुर्दाबाद के नारों से भारतीय जन नाट्य संघ आजमगढ़ द्वारा भगतसिंह के शहादत दिवस पर नुक्कड़ गीतों और नाटको के जरिये अपनी श्रद्धांजली अर्पित किया, इसके उपरान्त इप्टा द्वारा नुक्कड़ नाटको और गीतों का कार्यक्रम किया गया।
कार्यक्रम में सभा को सम्बोधित करते हुए पत्रकार सुनील दत्ता ने कहा कि भगतसिंह को पूर्वाग्रहों से नही ,तर्क से जानना होगा -वे क्रन्तिकारी थे, आतंकवादी नही - तभी उन्होंने सांडर्स -वध को ग्लोरिफाई नही किया और असेम्बली में बम फोड़ते समय यह सावधानी भी रखी कि किसी की जान न जाये ,गुलामी के शासन में जो अंग्रेज करते थे वो आज की सरकारों की पुलिस कर रही है , मोती ने कहा कि क्रांति शब्द का अर्थ प्रगति के लिए परिवर्तन की भावना एवं आकांक्षा है |
सुमन
लो क सं घ र्ष !
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बुधवार, 23 मार्च 2011
शहीद दिवस विशेष : क्रांति और जीवन भगत सिंह



क्रांति हौव्वा नही ; भगत सिंह को दो तरह का हौव्वा बनाकर पेश किया जाता रहा है |एक तो व्यहारिकता का कि भगत सिंह पड़ोसी के घर ही अच्छा लगता है -अपने घर में उसका होना आज कि परिस्थितियों में वांछित नही |दूसरा आदर्श का कि विचारो -कार्यशालाओ से भगत सिंह को नही अपनाया जा सकता -उसके लिए जेल और मृत्यु की कामना करने की जरूरत होती हैं |इन दोनों पूर्वाग्रहों के पीछे भगतसिंह की वह छवि काम कर रही होती है जो उनके दो बेहद प्रचलित प्रकरणों -साड्स -वध और असेम्बली -बम धमाका -को एकान्तिक रूप से देकने से बनी हैं | क्योंकि येही प्रकरण उनकी लोकप्रिय छवि का आधार भी बनाए जाते है ,लिहाज़ा उपरोक्त पूर्वाग्रहों को सार्वजनिक रूप से मीन-मेख का सामना प्राय ; नही करना पड़ता |
पर भगतसिंह को पुरवाग्रहो से नही ,तर्क से जानना होगा -एकान्तिक रूप से नही परिपेक्ष में देखना होगा | वे क्रन्तिकारी थे, आतंकवादी नही -तभी उन्होंने कभी भी सांडर्स -वध को ग्लोरिफाई नही किया और असेम्बली में बम फोड़ते समय यह सावधानी भी रखी कि किसी की जान न जाये |वे हाड -मांस के ऐसे मनुष्य थे जिसके प्रेम ,स्वप्न ,जीवन ,राजनीत ,देश -प्रेम गुलामी और धर्म जैसे विषयों पर बेहद लौकिक विचार थे |तभी उन्होंने मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के हर स्वरूप -साम्राज्यवाद ,साम्प्रदायिकता ,जातिवाद ,असमानता ,भाषा वाद ,भेदभाव इत्यादि का पुरजोर विरोध किया |फांसी से एक दिन पूर्व साथियों को अंतिम पत्र में उन्होंने लिखा -स्वाभाविक है कि जीने कि इच्छा मुझमे भी होनी चाहिए ,मैं इसे छिपाना नही चाहता |जब उन्होंने मृत्यु को चुना तब भी लौकिकता और तार्किकता के दम पर ही |अगर वे सिर पर कफन बांधे मृत्यु के आलिंगन को आतुर कोई अलौकिक सिरफिरे मात्र होते तो सांडर्स -वध के समय ही फांसी का वरण कर लेते |सांडर्स -वध के बाद फरारी और असेम्बली बम कांड के बाद ,जब वे भाग सकते थे ,समपर्ण उनकी अदम्य तार्किकता का ही परिचायक है |भगतसिंह से दोस्ती का मतलब उनकी इसी लौकिकता और तार्किकता को आत्मसात करना भी है |इन अर्थो में यह कठिन रास्ता है -न कि जेल ,पुलिस ,मौत जैसे सन्दर्भ में | क्या हम ईमानदारी ,सच्चाई ,साहस ,भाईचारा ,बराबरी और देशप्रेम को अपने जीवन का अंग बनाना चाहते हैं ? क्या हम शोषण के तमाम रूपों को पहचानने और फिर उनसे लोहा लेने कि शुरुवात खुद से ,अपने परिवार से ,अपने परिवेश से कर सकते है ?
यदि हाँ ,तो घर -घर में भगत सिंह होंगे ही जो शोषण के तमाम पारिवारिक ,सामाजिक ,जातीय ,लैगिक ,राजनैतिक ,साम्राज्यवादी व आर्थिक रूपों कि पहचान करेंगे और उनसे लोहा लेंगे |जेल से भगत का कहा याद रखिए -'क्रन्तिकारी को निरर्थक आतंकवादी कारवाइयो और व्यकितगत आत्म -बलिदान के दूषित चर्क में न डाला जाये |सभी के लिए उत्साह वर्धक आदर्श ,उद्देश्य के लिए मरना न होकर उद्देश्य के लिए जीना -और वह भी लाभदायक तरीके से योग्य रूप में जीना -होना चाहिए |
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत ने २२ दिसम्बर १९२९ को जेल से लिखे 'माडर्न रिव्यू 'के सम्पादक को प्रति -उत्तर में इन्कलाब जिंदाबाद नारे को परिभाषित करते हुए क्रांति से जोड़ा -दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है ,जो सम्भव है भाषा के नियमो एवं कोष के आधार पर इसके शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाए ,परन्तु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारो को पृथक नही किया जा सकता ,जो इसके साथ जुड़े हुए हैं |ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ का घोतक हैं ,जो एक सीमा तक उनमे पैदा हो गये हैं तथा एक सीमा तक उनमे निहित है |क्रांति (इन्कलाब )का अर्थ अनिवार्य रूप में सशस्त्र आन्दोलन नही होता |बम और पिस्टल कभी कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते है |इसमें भी सन्देह नही है कि कुछ आंदोलनों में बम एवं पिस्टल एक महत्त्व पूर्ण साधन सिद्ध होते है ,परन्तु केवल इसी कारण से बम और पिस्टल क्रांति के पर्यायवाची नही हो जाते |विदोढ़ को क्रांति नही कहा जा सकता ,यद्धपि यह हो सकता है कि विदोढ़ का अंतिम परिणाम क्रांति हो |.........क्रांति शब्द का अर्थ 'प्रगति के लिए परिवर्तन कि भावना एवं आकाक्षा है |लोग साधारण तया जीवन कि परम्परा गत दशाओं के साथ चिपक जाते है और परिवर्तन के विचार से ही कापने लगते है |
यह एक अकर्मण्यता कि भावना है , जिसके स्थान पर क्रन्तिकारी भावना जागृत करने कि आवश्यकता हैं।
'क्रांति कि इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थाई तौर पर ओतप्रोत रहनी चाहिए ,जिससे की रुदिवादी शक्तिया मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिए संगठित न हो सके |यह आवश्यक है की पुराणी व्यवस्था सदैव न रहे वह नई व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे ,जिससे की एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके |यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको ह्रदय में रखकर हम इन्कलाब जिंदाबाद का नारा ऊँचा करते है |
साभार भगतसिंह से दोस्ती पुस्तक से
सुनील दत्ता
09415370672
पर भगतसिंह को पुरवाग्रहो से नही ,तर्क से जानना होगा -एकान्तिक रूप से नही परिपेक्ष में देखना होगा | वे क्रन्तिकारी थे, आतंकवादी नही -तभी उन्होंने कभी भी सांडर्स -वध को ग्लोरिफाई नही किया और असेम्बली में बम फोड़ते समय यह सावधानी भी रखी कि किसी की जान न जाये |वे हाड -मांस के ऐसे मनुष्य थे जिसके प्रेम ,स्वप्न ,जीवन ,राजनीत ,देश -प्रेम गुलामी और धर्म जैसे विषयों पर बेहद लौकिक विचार थे |तभी उन्होंने मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण के हर स्वरूप -साम्राज्यवाद ,साम्प्रदायिकता ,जातिवाद ,असमानता ,भाषा वाद ,भेदभाव इत्यादि का पुरजोर विरोध किया |फांसी से एक दिन पूर्व साथियों को अंतिम पत्र में उन्होंने लिखा -स्वाभाविक है कि जीने कि इच्छा मुझमे भी होनी चाहिए ,मैं इसे छिपाना नही चाहता |जब उन्होंने मृत्यु को चुना तब भी लौकिकता और तार्किकता के दम पर ही |अगर वे सिर पर कफन बांधे मृत्यु के आलिंगन को आतुर कोई अलौकिक सिरफिरे मात्र होते तो सांडर्स -वध के समय ही फांसी का वरण कर लेते |सांडर्स -वध के बाद फरारी और असेम्बली बम कांड के बाद ,जब वे भाग सकते थे ,समपर्ण उनकी अदम्य तार्किकता का ही परिचायक है |भगतसिंह से दोस्ती का मतलब उनकी इसी लौकिकता और तार्किकता को आत्मसात करना भी है |इन अर्थो में यह कठिन रास्ता है -न कि जेल ,पुलिस ,मौत जैसे सन्दर्भ में | क्या हम ईमानदारी ,सच्चाई ,साहस ,भाईचारा ,बराबरी और देशप्रेम को अपने जीवन का अंग बनाना चाहते हैं ? क्या हम शोषण के तमाम रूपों को पहचानने और फिर उनसे लोहा लेने कि शुरुवात खुद से ,अपने परिवार से ,अपने परिवेश से कर सकते है ?
यदि हाँ ,तो घर -घर में भगत सिंह होंगे ही जो शोषण के तमाम पारिवारिक ,सामाजिक ,जातीय ,लैगिक ,राजनैतिक ,साम्राज्यवादी व आर्थिक रूपों कि पहचान करेंगे और उनसे लोहा लेंगे |जेल से भगत का कहा याद रखिए -'क्रन्तिकारी को निरर्थक आतंकवादी कारवाइयो और व्यकितगत आत्म -बलिदान के दूषित चर्क में न डाला जाये |सभी के लिए उत्साह वर्धक आदर्श ,उद्देश्य के लिए मरना न होकर उद्देश्य के लिए जीना -और वह भी लाभदायक तरीके से योग्य रूप में जीना -होना चाहिए |
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत ने २२ दिसम्बर १९२९ को जेल से लिखे 'माडर्न रिव्यू 'के सम्पादक को प्रति -उत्तर में इन्कलाब जिंदाबाद नारे को परिभाषित करते हुए क्रांति से जोड़ा -दीर्घकाल से प्रयोग में आने के कारण इस नारे को एक ऐसी विशेष भावना प्राप्त हो चुकी है ,जो सम्भव है भाषा के नियमो एवं कोष के आधार पर इसके शब्दों से उचित तर्कसम्मत रूप में सिद्ध न हो पाए ,परन्तु इसके साथ ही इस नारे से उन विचारो को पृथक नही किया जा सकता ,जो इसके साथ जुड़े हुए हैं |ऐसे समस्त नारे एक ऐसे स्वीकृत अर्थ का घोतक हैं ,जो एक सीमा तक उनमे पैदा हो गये हैं तथा एक सीमा तक उनमे निहित है |क्रांति (इन्कलाब )का अर्थ अनिवार्य रूप में सशस्त्र आन्दोलन नही होता |बम और पिस्टल कभी कभी क्रांति को सफल बनाने के साधन मात्र हो सकते है |इसमें भी सन्देह नही है कि कुछ आंदोलनों में बम एवं पिस्टल एक महत्त्व पूर्ण साधन सिद्ध होते है ,परन्तु केवल इसी कारण से बम और पिस्टल क्रांति के पर्यायवाची नही हो जाते |विदोढ़ को क्रांति नही कहा जा सकता ,यद्धपि यह हो सकता है कि विदोढ़ का अंतिम परिणाम क्रांति हो |.........क्रांति शब्द का अर्थ 'प्रगति के लिए परिवर्तन कि भावना एवं आकाक्षा है |लोग साधारण तया जीवन कि परम्परा गत दशाओं के साथ चिपक जाते है और परिवर्तन के विचार से ही कापने लगते है |
यह एक अकर्मण्यता कि भावना है , जिसके स्थान पर क्रन्तिकारी भावना जागृत करने कि आवश्यकता हैं।
'क्रांति कि इस भावना से मनुष्य जाति की आत्मा स्थाई तौर पर ओतप्रोत रहनी चाहिए ,जिससे की रुदिवादी शक्तिया मानव समाज की प्रगति की दौड़ में बाधा डालने के लिए संगठित न हो सके |यह आवश्यक है की पुराणी व्यवस्था सदैव न रहे वह नई व्यवस्था के लिए स्थान रिक्त करती रहे ,जिससे की एक आदर्श व्यवस्था संसार को बिगड़ने से रोक सके |यह है हमारा वह अभिप्राय जिसको ह्रदय में रखकर हम इन्कलाब जिंदाबाद का नारा ऊँचा करते है |
साभार भगतसिंह से दोस्ती पुस्तक से
सुनील दत्ता
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मंगलवार, 22 मार्च 2011
नाटो भारत पर भी हमला करेगा.............?
विश्व में साम्राज्यवादी शक्तियां बड़ी बेशर्मी के साथ एशिया के मुल्कों को गुलाम बनाने का कार्य कर रही हैं। जब इनकी कठपुतली संयुक्त राष्ट्र संघ ने किसी देश के ऊपर हमला करने की बात होती है। तो भारत, चीन, रूस, ईरान सहित कई मुल्क संयुक्त राष्ट्र संघ में अनुपस्थित हो जाते हैं और जब नाटो की सेनायें कार्यवाई शुरू कर देती हैं तो यह घडियाली आंसू बहाने शुरू कर देते हैं। चीन लीबिया में जारी घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं और लीबिया में जो हो रहा है उसपर अफसोस जाहिर करता है। चीन ने अपने बयान में लीबिया में विद्रोहियों और गद्दाफी सेनाओं के बीच जारी संघर्ष के सीज फायर की मांग भी नहीं की है और कहा है कि चीन उत्तरी अफ्रीका के स्वतंत्र राष्ट्र लीबिया की स्वतंत्रता, स्वप्रभुता और एकता का सम्मान करता है। बयान में कहा गया है कि हम उम्मीद करते हैं कि जल्द ही लीबिया में जारी संघर्ष थम जाएगा और नागरिकों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। ईरान ने इन हमलों की निंदा करते हुए कहा है कि लीबिया के तेल पर कब्जा करने का पश्चिमी देशों का यह घिनौना अपराध है। हालांकि ईरान ने लीबिया में गद्दाफी के विरोध में हो रहे प्रदर्शन का समर्थन करते हुए कहा है कि यह गद्दाफी के खिलाफ इस्लामिक क्रांति है। ईरान ने यह भी कहा है कि लीबिया के लोगों को पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। वो अपने खास मकसदों को हल करने के लिए उनके साथ होने का दिखावा कर रहे हैं।
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,''लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.''
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है। विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।
सुमन
लो क सं घ र्ष !
रूस ने भी लीबिया पर हुए मिसाइल हमलों की निंदा करते हुए कहा दोनों ओर से तुरंत संघर्ष विराम होना चाहिए। रुस ने यह भी कहा कि संयुक्त राष्ट्र के बल प्रयोग के संकल्प को जल्दबाजी में अपनाया गया है। रूस के विदेश मंत्रालय ने द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि हम लीबिया और लीबिया पर हमला कर रहीं गठबंधन सेनाओं से अपील करते हैं कि वो शांति बहाली के लिए प्रयास करें।
भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा,''लीबिया में जारी संघर्ष की स्थिति को लेकर भारत चिंतित है. जैसा कि हमने पहले कहा था इस तरह के प्रयास स्थिति को नियंत्रण में लाने की कोशिश करें न कि आम नागरिकों के लिए मुश्किलें और बढ़ाएं.''
पूर्व में ईराक में कल्पित रासायनिक हथियारों की आड़ लेकर ईराक पर हमला किया गया। मीडिया ने नाटो सेनाओं को मित्र सेना की संज्ञा देकर ईराक पर कब्ज़ा करा दिया। अफगानिस्तान पर भी कब्ज़ा कर लिया गया। हजारो लाखो लोग मारे गए। घर-बेघर हो गए उस समय भी साम्राज्यवाद विरोधी तथाकथित शक्तियां घडियाली आंसू बहाती रहीं। आज लीबिया में कई दिनों से नाटो सेनायें कल्पित मानवीय आध्जारों को लेकर बम वर्षा कर रही हैं। मानवता की सबसे ज्यादा चिंता फ्रांस, इंग्लैंड, अमेरिका को है। जापान में दुनिया की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदी है उस त्रासदी में ये देश विशेष कुछ नागरिकों की मदद नहीं कर रहे हैं उसका मुख्य कारण है जापान उनका अघोषित गुलाम देश है। इन देशों को सबसे ज्यादा नागरिक अधिकारों की चिंता लीबिया में है क्योंकि लीबिया का तेल भंडार सबके लिये सुलभ है। उस पर कब्ज़ा करने के लिये नागरिक अधिकारों का बहाना लेकर हमला किया जा रहा है और फिर लीबिया पर कब्ज़ा कर लिया जाएगा। यमन, बहरीन, सौदी अरबिया जैसे मुल्कों में भी आन्दोलन चल रहे हैं उनमें दखालान्जादी इसलिए नहीं होती है क्योंकि वे साम्राज्यवादियों के पिट्ठू मुल्क हैं। फ्रांस से लेके यूरोप के बड़े-बड़े देशों में महंगाई, बेरोजगारी को लेकर बड़े-बड़े धरना प्रदर्शन हो रहे हैं और यदि आन्दोलन ही संप्रभुता दरकिनार कर हस्ताक्षेप का आधार है तो इन देशों में कौन हस्ताक्षेप करेगा।
भारत में कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर भारत तक सेना कमान संभाले हुए है। बराबर कोई न कोई प्रथक्तावादी आन्दोलन जारी है। भारत के उपभोक्ता बाजार तथा प्राकृतिक सम्पदा पर कब्ज़ा करने के लिये नाटो सेनाओ को अच्छा आधार मिल सकता है और संयुक्त राष्ट्र संघ इन प्रदेशों में लोकतंत्र मानव अधिकार स्थापित करने के लिये सैनिक हस्ताक्षेप की अनुमति भी दे सकता है ? हमारे देश में अमेरिकन व ब्रिटिश साम्राज्यवादी एजेंटो की कमी नहीं है वह शक्तियां सिर्फ वाह वाही में सब कुछ करने के लिये तैयार बैठी रहती हैं जो साम्राज्यवादी शक्तियां चाहती हैं। तभी तो भारत इंग्लैंड, फ्रांस, पुर्तगाल जैसे साम्राज्यवादी देशों का गुलाम रहा है। विश्व आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी मुल्कों की अर्थव्यवस्था मजबूत नहीं रह गयी है। आर्थिक संकट से उभरने के लिये यह साम्राज्यवादी शक्तियां कुछ भी कर सकती हैं। शांति इनकी मौत है युद्ध इनकी जिंदगी है। हमारे देश को चाहिए कि अपनी अस्मिता के लिये दुनिया के छोटे छोटे देशों की अस्मिता के लिये अपनी गुटनिरपेक्ष निति को जारी रखे। साम्राज्यवादी शक्तियों से दूरी आवश्यक है।
चाइना में अमेरिका और उसके साम्राज्यवादी मित्र बहुदलीय व्यवस्था लागू करने के नाम पर नोबेल पुरस्कार चाइना विरोधियों को देते रहते हैं। ईरान में अमेरिका व उसके पिट्ठू देशों द्वारा कई बार अपनी पिट्ठू सरकार बनाने की कोशिश की जा चुकी है।
सुमन
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सोमवार, 21 मार्च 2011
भगत सिंह का पिता के नाम पत्र
३० सितम्बर ,१९३० को भगत सिंह के पिता सरदार किशन सिंह ने ट्रिबुनल को एक अर्जी देकर बचाव पेश करने के लिए अवसर की मांग की |सरदार किशनसिंह स्वय देशभक्त थे और राष्ट्रीय आन्दोलन में जेल जाते रहते थे |
पिता द्वारा दी गयी अर्जी से भगत सिंह की भावनाओ को भी चोट लगी थी ,लेकिन अपनी भावनाओ को नियंत्रित कर अपने सिद्धांतो पर जोर देते हुए उन्होंने 4 अक्टूबर 1930 को यह पत्र लिखा जो उसके पिता को देर से मिला | ७ अक्टूबर ,1930 को मुकदमे का फैसला सुना दिया गया |
4 अक्टूबर 1930
पूज्य पिताजी ,
मुझे यह जानकर हैरानी हुई की आप ने मेरे बचाव -पक्ष के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल को एक आवेदन भेजा हैं |यह खबर इतनी यातनामय थी कि मैं इसे ख़ामोशी से बर्दाश्त नही कर सका |इस खबर ने मेरे भीतर कि शांति भंग कर उथल -पुथल मचा दी हैं |मैं यह नही समझ सकता कि वर्तमान इस्थितियो में और इस मामले पर आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं ?
आप का पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैतृक भावनाओ का पूरा सम्मान करता हूँ कि आप को साथ सलाह -मशविरा किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नही था |आप जानते हैं कि राजनैतिक क्षेत्र में मेरे विचार आप से काफी अलग हैं |में आप कि सहमती या असहमति का ख्याल किये बिना सदा स्व्तन्त्र्तापुर्वक काम करता रहा हूँ |
मुझे यकीन हैं कि आपको यह बात याद होगी कि आप आरम्भ से ही मुझसे यह बात मनवा लेने की कोशिश करते हैं कि में अपना मुकदमा संजीदगी से लडू और अपना बचाव ठीक से प्रस्तुत करू| लेकिन आपको यह भी मालूम है कि में सदा इसका विरोध करता रहा हूँ | मैंने कभी भी अपना बचाव करने की इच्छा प्रकट नही की और न ही मैंने कभी इस पर संजीदगी से गौर किया हैं |
मेरी जिन्दगी इतनी कीमती नही जितनी कि आप सोचते हैं |कम -से कम मेरे लिए तो इस जीवन की इतनी कीमत नही कि इसे सिद्धांतो को कुर्बान करके बचाया जाये |मेरे अलावा मेरे और साथी भी हैं जिनके मुकदमे इतने ही संगीन है जितना कि मेरा मुकदमा | हमने सयुक्त योजना पर हम अंतिम समय तक डटे रहेंगे | हमे इस बात कि कोई परवाह नही कि हमे व्यक्तिगत रूप में इस बात के लिए कितना मूल्य चुकाना पड़ेगा |
पिता जी मैं बहुत दुःख का अनुभव कर रहा हूँ |मुझे भय हैं ,आप पर दोषारोपण करते हुए या इससे बढ़कर आप के इस काम कि निन्दा करते हुए मैं कंही सभ्यता कि सीमाए न लाघ जाऊ और मेरे शब्द ज्यादा सख्त न हो जाये |लेकिन में स्पष्ट शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूँगा |यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता |लेकिन आप के सन्दर्भ में मैं इतना ही कहूँगा कि यह एक कमजोरी है -निचले स्तर कि कमजोरी |
यह एक ऐसा समय था जब हम सब का इम्तहान हो रहा था |में यह कहना चाहता हूँ कि आप इस इम्तहान में नाकाम रहे है |में जनता हूँ कि आप भी इतने ही देश प्रेमी है जितना कि कोई और व्यक्ति हो सकता हैं |में जनता हूँ कि आपने अपनी पूरी जिन्दगी भारत कि आज़ादी के लिए लगा दी हैं |लेकिन इस अहम मौड़ पर आपने ऐसी कमजोरी दिखाई ,यह बात में समझ नही सकता |
अन्त में मैं आपसे ,आपके अन्य मित्रो व मेरे मुकदमे में दिलचस्पी लेने वालो से यह कहना चाहता हूँ कि में आपके इस कदम को नापसंद करता हूँ |में आज भी अदालत अपना बचाव प्रस्तुत करने के पक्ष में नही हूँ |अगर अदालत हमारे कुछ साथियों की ओर से स्पष्टीकर्ण आदि के लिए प्रस्तुत किये गये आवेदन को मंजूर कर लेती , तो भी में कोई स्पष्टीकर्ण प्रस्तुत न करता |
मैं चाहूँगा की इस समबन्ध में जो उलझने पैदा हो गयी हैं ,उनके विषय में जनता को असलियत का पता चल जाये |इसलिए में आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप जल्द से जल्द यह चिठ्ठी प्रकाशित कर दें |
आपका आज्ञाकारी
भगत सिंह
पिता द्वारा दी गयी अर्जी से भगत सिंह की भावनाओ को भी चोट लगी थी ,लेकिन अपनी भावनाओ को नियंत्रित कर अपने सिद्धांतो पर जोर देते हुए उन्होंने 4 अक्टूबर 1930 को यह पत्र लिखा जो उसके पिता को देर से मिला | ७ अक्टूबर ,1930 को मुकदमे का फैसला सुना दिया गया |
4 अक्टूबर 1930
पूज्य पिताजी ,
मुझे यह जानकर हैरानी हुई की आप ने मेरे बचाव -पक्ष के लिए स्पेशल ट्रिब्यूनल को एक आवेदन भेजा हैं |यह खबर इतनी यातनामय थी कि मैं इसे ख़ामोशी से बर्दाश्त नही कर सका |इस खबर ने मेरे भीतर कि शांति भंग कर उथल -पुथल मचा दी हैं |मैं यह नही समझ सकता कि वर्तमान इस्थितियो में और इस मामले पर आप किस तरह का आवेदन दे सकते हैं ?
आप का पुत्र होने के नाते मैं आपकी पैतृक भावनाओ का पूरा सम्मान करता हूँ कि आप को साथ सलाह -मशविरा किये बिना ऐसे आवेदन देने का कोई अधिकार नही था |आप जानते हैं कि राजनैतिक क्षेत्र में मेरे विचार आप से काफी अलग हैं |में आप कि सहमती या असहमति का ख्याल किये बिना सदा स्व्तन्त्र्तापुर्वक काम करता रहा हूँ |
मुझे यकीन हैं कि आपको यह बात याद होगी कि आप आरम्भ से ही मुझसे यह बात मनवा लेने की कोशिश करते हैं कि में अपना मुकदमा संजीदगी से लडू और अपना बचाव ठीक से प्रस्तुत करू| लेकिन आपको यह भी मालूम है कि में सदा इसका विरोध करता रहा हूँ | मैंने कभी भी अपना बचाव करने की इच्छा प्रकट नही की और न ही मैंने कभी इस पर संजीदगी से गौर किया हैं |
मेरी जिन्दगी इतनी कीमती नही जितनी कि आप सोचते हैं |कम -से कम मेरे लिए तो इस जीवन की इतनी कीमत नही कि इसे सिद्धांतो को कुर्बान करके बचाया जाये |मेरे अलावा मेरे और साथी भी हैं जिनके मुकदमे इतने ही संगीन है जितना कि मेरा मुकदमा | हमने सयुक्त योजना पर हम अंतिम समय तक डटे रहेंगे | हमे इस बात कि कोई परवाह नही कि हमे व्यक्तिगत रूप में इस बात के लिए कितना मूल्य चुकाना पड़ेगा |
पिता जी मैं बहुत दुःख का अनुभव कर रहा हूँ |मुझे भय हैं ,आप पर दोषारोपण करते हुए या इससे बढ़कर आप के इस काम कि निन्दा करते हुए मैं कंही सभ्यता कि सीमाए न लाघ जाऊ और मेरे शब्द ज्यादा सख्त न हो जाये |लेकिन में स्पष्ट शब्दों में अपनी बात अवश्य कहूँगा |यदि कोई अन्य व्यक्ति मुझसे ऐसा व्यवहार करता तो मैं इसे गद्दारी से कम न मानता |लेकिन आप के सन्दर्भ में मैं इतना ही कहूँगा कि यह एक कमजोरी है -निचले स्तर कि कमजोरी |
यह एक ऐसा समय था जब हम सब का इम्तहान हो रहा था |में यह कहना चाहता हूँ कि आप इस इम्तहान में नाकाम रहे है |में जनता हूँ कि आप भी इतने ही देश प्रेमी है जितना कि कोई और व्यक्ति हो सकता हैं |में जनता हूँ कि आपने अपनी पूरी जिन्दगी भारत कि आज़ादी के लिए लगा दी हैं |लेकिन इस अहम मौड़ पर आपने ऐसी कमजोरी दिखाई ,यह बात में समझ नही सकता |
अन्त में मैं आपसे ,आपके अन्य मित्रो व मेरे मुकदमे में दिलचस्पी लेने वालो से यह कहना चाहता हूँ कि में आपके इस कदम को नापसंद करता हूँ |में आज भी अदालत अपना बचाव प्रस्तुत करने के पक्ष में नही हूँ |अगर अदालत हमारे कुछ साथियों की ओर से स्पष्टीकर्ण आदि के लिए प्रस्तुत किये गये आवेदन को मंजूर कर लेती , तो भी में कोई स्पष्टीकर्ण प्रस्तुत न करता |
मैं चाहूँगा की इस समबन्ध में जो उलझने पैदा हो गयी हैं ,उनके विषय में जनता को असलियत का पता चल जाये |इसलिए में आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप जल्द से जल्द यह चिठ्ठी प्रकाशित कर दें |
आपका आज्ञाकारी
भगत सिंह
सुनील दत्ता
9415370672
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भगत सिंह,
सुनील दत्ता
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रविवार, 20 मार्च 2011
रंगों की होली समाप्त-शांति के पुजारियों की खून की होली प्रारंभ
फ्रांस द्वारा लीबिया में खेली जा रही खून की होली का एक द्रश्य
भारत में बहुसंख्यक आबादी का रंगों का त्योहार होली। होली आपसी भाईचारे समाज में समृद्धि का प्रतीक है। भारतीय जनमानस एक दूसरे के ऊपर रंग व गुलाल, अबीर लगा कर आपसी भाईचारे को मजबूत बनाता है। हमारे समाज में यह भी मान्यता है कि इस त्योहार में विरोधियों से भी बैर भाव समाप्त कर लेना चाहिए।
शांति के पुजारियों के महानायक अमेरिका और उसके पिछलग्गू फ्रांस व इंग्लैंड ने शांति स्थापित करने के लिये लीबिया में टोमाहॉक मिसाइलें 112 रक्षा ठिकानो पर दागी हैं। वहीँ लीबिया ने फ्रांस के एक लड़ाकू विमान को मार गिराया है लेकिन फ्रांस ने उसका खंडन किया है। अमेरिकन साम्राज्यवादियों ने इसके पूर्व ईराक, अफगानिस्तान सहित पकिस्तान में भी शांति स्थापित कर रहे हैं। पाकिस्तान में ड्रोन हमलों में हजारो लोग मारे जा चुके हैं। शांति स्थापित नहीं हो पा रही है। मिस्र, ट्युनेसिया , बहरीन में अमेरिकन साम्राज्यवादी का पहले से कब्ज़ा है। उस परीक्षेत्र में लीबिया अमेरिकन साम्राज्यवाद का विरोध करता था। लीबिया को सबक सिखाने के लिये इन देशों ने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत पहले अलकायदा के माध्यम से अशांति फैलवायी। और जब पूर्वी लीबिया पर हथियारबंद विद्रोहियों का कब्ज़ा हो गया। लीबियाई सरकार ने विद्रोहियों से पुन: पूर्वी लीबिया को मुक्त करा लिया तो खिसियाये साम्राज्यवादी मुल्कों ने सैनिक कार्यवाई शुरू कर दी। साम्राज्यवादी हमलों में अब तक 50 लोग मारे जा चुके हैं व्यापक रूप से नुकसान हुआ है। इस युद्ध का मुख्य उद्देश्य लीबिया के तेल पर कब्ज़ा करना है। शांति लोकतंत्र न्याय विश्व बंधुत्व से इन शांति के पुजारियों का कोई लेना देना नहीं है। मानव रक्त से ही इनकी प्यास बुझती है। खून की होली खेलने का कार्य इन देशों का मुख्य शगल रहा है। हमारे देश को भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने जिस तरह से लूटा है उस इतिहास को पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों ने भी हमारे देश के कुछ हिस्से को काफी अरसे तक गुलाम बनाये रखा था। शांति के नाम पर खून की होली जारी है। दुनिया का कोई भी मुल्क इस होली को रोकने में समर्थ नहीं है और न ही किसी देश की संप्रभुता का कोई मतलब इन देशों की नजर में है। संयुक्त राष्ट्र संघ अपने निर्माण काल से ही इन देशो की कठपुतली रहा है और आज भी है।
सुमन
लो क सं घ र्ष !
भारत में बहुसंख्यक आबादी का रंगों का त्योहार होली। होली आपसी भाईचारे समाज में समृद्धि का प्रतीक है। भारतीय जनमानस एक दूसरे के ऊपर रंग व गुलाल, अबीर लगा कर आपसी भाईचारे को मजबूत बनाता है। हमारे समाज में यह भी मान्यता है कि इस त्योहार में विरोधियों से भी बैर भाव समाप्त कर लेना चाहिए।शांति के पुजारियों के महानायक अमेरिका और उसके पिछलग्गू फ्रांस व इंग्लैंड ने शांति स्थापित करने के लिये लीबिया में टोमाहॉक मिसाइलें 112 रक्षा ठिकानो पर दागी हैं। वहीँ लीबिया ने फ्रांस के एक लड़ाकू विमान को मार गिराया है लेकिन फ्रांस ने उसका खंडन किया है। अमेरिकन साम्राज्यवादियों ने इसके पूर्व ईराक, अफगानिस्तान सहित पकिस्तान में भी शांति स्थापित कर रहे हैं। पाकिस्तान में ड्रोन हमलों में हजारो लोग मारे जा चुके हैं। शांति स्थापित नहीं हो पा रही है। मिस्र, ट्युनेसिया , बहरीन में अमेरिकन साम्राज्यवादी का पहले से कब्ज़ा है। उस परीक्षेत्र में लीबिया अमेरिकन साम्राज्यवाद का विरोध करता था। लीबिया को सबक सिखाने के लिये इन देशों ने पूर्व नियोजित कार्यक्रम के तहत पहले अलकायदा के माध्यम से अशांति फैलवायी। और जब पूर्वी लीबिया पर हथियारबंद विद्रोहियों का कब्ज़ा हो गया। लीबियाई सरकार ने विद्रोहियों से पुन: पूर्वी लीबिया को मुक्त करा लिया तो खिसियाये साम्राज्यवादी मुल्कों ने सैनिक कार्यवाई शुरू कर दी। साम्राज्यवादी हमलों में अब तक 50 लोग मारे जा चुके हैं व्यापक रूप से नुकसान हुआ है। इस युद्ध का मुख्य उद्देश्य लीबिया के तेल पर कब्ज़ा करना है। शांति लोकतंत्र न्याय विश्व बंधुत्व से इन शांति के पुजारियों का कोई लेना देना नहीं है। मानव रक्त से ही इनकी प्यास बुझती है। खून की होली खेलने का कार्य इन देशों का मुख्य शगल रहा है। हमारे देश को भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने जिस तरह से लूटा है उस इतिहास को पढ़ कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों ने भी हमारे देश के कुछ हिस्से को काफी अरसे तक गुलाम बनाये रखा था। शांति के नाम पर खून की होली जारी है। दुनिया का कोई भी मुल्क इस होली को रोकने में समर्थ नहीं है और न ही किसी देश की संप्रभुता का कोई मतलब इन देशों की नजर में है। संयुक्त राष्ट्र संघ अपने निर्माण काल से ही इन देशो की कठपुतली रहा है और आज भी है।
सुमन
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शनिवार, 19 मार्च 2011
गाँधी जी के नाम खुली चिट्ठी
{ गाँधी जी के नाम सुखदेव की यह खुली चिट्ठी मार्च १९३१ में गाँधी जी और वायसराय इरविन के बीच हुए समझैते के बाद लिखी गई थी जो हिंदी नवजीवन 30 अप्रैल 1931 के अंक में प्रकाशित हुई थी }
परम कृपालु महात्मा जी ,
आजकल की ताज़ा खबरों से मालूम होता है कि{ ब्रिटिश सरकार से } समझौते की बातचीत कि सफलता के बाद आपने क्रन्तिकारी कार्यकर्ताओं को फिलहाल अपना आन्दोलन बन्द कर देने और आपको अपने अहिंसावाद को आजमा देखने का आखिरी मौका देने के लिए कई प्रकट प्राथनाए कई है |वस्तुत ; किसी आन्दोलन को बन्द करना केवल आदर्श या भावना में होने वाला काम नहीं हैं |भिन्न -भिन्न अवसरों कि आवश्यकता का विचार ही अगुआओं को उनकी युद्धनीति बदलने के लिए विवश करता हैं |
माना कि सुलह की बातचीत के दरम्यान , आपने इस ओर एक क्षण के लिए भी न तो दुर्लक्ष किया ,न इसे छिपा ही रखा की समझौता होगा |में मानता हूँ कि सब बुद्धिमान लोग बिलकुल आसानी के साथ यह समझ गये होंगे कि आप के द्वारा प्राप्त तमाम सुधारो का अम्ल होने लगने पर भी कोई यह न मानेगा कि हम मंजिले -मकसूद पर पहुच गये हैं | सम्पूर्ण स्वतन्त्रता जब तक न मिले ,तब तक बिना विराम के लड़ते रहने के लिए कांग्रेस महासभा लाहौर के प्रस्ताव से बंधी हुई हैं | उस प्रस्ताव को देखते हुए मौजूदा सुलह और समझैता सिर्फ काम चलाऊ युद्ध विराम हैं |जिसका अर्थ येही होता होता हैं कि अधिक बड़े पएमाने पर अधिक अच्छी सेना तैयार करने के लिए यह थोडा विश्राम हैं ........
किसी भी प्रकार का युद्ध -विराम करने का उचित अवसर और उसकी शर्ते ठहराने का काम तो उस आन्दोलन के अगुआवो का हैं | लाहौर वाले प्रस्ताव के रहते हुए भी आप ने फिलहाल सक्रिय आन्दोलन बन्द रखना उचित समझा हैं |इसके वावजूद भी वह प्रस्ताव तो कायम ही हैं |इसी तरह 'हिन्दुस्तानी सोसलिस्ट पार्टी ' के नाम से ही साफ़ पता चलता हैं कि क्रांतिवादियों का आदर्श समाजवादी प्रजातन्त्र कि स्थापना करना हैं |यह प्रजातन्त्र मध्य का विश्राम नही हैं |जब तक उनका ध्येय प्राप्त न हो और आदर्श सिद्ध न हो , तब तक वे लड़ाई जरी रखने के लिए बंधे हुए हैं |परन्तु बदलती हुई परिस्थितियों और वातावरण के अनुसार वे अपनी युद्ध .निति बदलने को तैयार अवश्य होंगे |क्रन्तिकारी युद्ध ,जुदा ,जुदा रूप धारण करता हैं |कभी गुप्त ,कभी केवल आन्दोलन -रूप होता हैं ,और कभी जीवन -मरण का भयानक सग्राम बन जाता हैं |ऐसी दशा में क्रांतिवादियों के सामने अपना आन्दोलन बन्द करने के लिए विशेष कारणहोने चाहिए |परन्तु आपने ऐसा कोई निश्चित विचार प्रकट नहीं किया |निरी भावपूर्ण अपीलों का क्रांतीवादी युद्ध में कोई विशेष महत्त्व नही होता ,हो भी नही सकता |
आप के समझौते के बाद आपने अपना आन्दोलन बन्द किया हैं ,और फलस्वरूप आप केसब कैदी रिहा हुए हैं |पर क्रन्तिकारी कैदियों का क्या हुआ ?1915 ई . से जेलों में पड़े हुए गदर - पक्ष के बीसो कैदी सज़ा कि मियाद पूरी हो जाने पर भी अब तक जेलों में सड़रहे हैं |मार्शल ला के बीसों कैदी आज भी जिन्दा कब्रों में दफनाये पड़े हैं |येही हाल बब्बर अकाली कैदियों का हैं |देवगढ , काकोरी ,मछुआ -बाज़ार और लाहौर षड़यंत्र के कैदी अब तक जेल कि चहारदीवारी में बन्द पड़े हुए बहुतेरे कैदियों में से कुछ हैं लाहौर ,दिल्ली चटगाँव बम्बई कलकत्ता और अन्य जगहों में कोई आधी दर्जन से ज्यादा षड़यंत्र के मामले चल रहे हैं |बहुसंख्य क्रांतिवादी भागते फिरते हैं ,और उनमे कई इस्त्रिया हैं \सचमुच आधी दर्जन से अधिक कैदी फांसी पर लटकने कि राहदेख रहे हैं | लाहौरषड़यंत्र केस के सजायाफ्ता तीन कैदी , जो सौभाग्य से मशहूर हो गये और जिन्होंने जनता क़ी बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की हैं ,वे कुछ क्रांतिवादी दल का एक बड़ा हिस्सा नही हैं |उनका भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न नही हैं |सच पूछा जाये तो उनकी सज़ा घटाने की अपेक्षा उनके फांसी पर चढ़ जाने से अधिक लाभ होने की आशा हैं |
यह सब होते हुए भी आप उन्हें अपना आन्दोलन बन्द करने की सलाह देते हैं |वे ऐसा क्यों करे ?आपने कोई निशचित वस्तु की ओर निर्देश नही किया हैं | ऐसी दशा में आपकी प्रथ्र्नाओ का येही मतलब होता है कि आप इस आन्दोलन को कुचल देने में नौकरशाही कि मदद कर रहे हैं ,और आपकी विनती का अर्थ उनके दल को रास्ट्रद्रोह पलायन और विश्वास घात का उपदेश करना हैं |यदि ऐसी बात नही है ,तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रांतिकारियों के पास जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते |अपना आन्दोलन बन्द करने के बारे में पहले आपको उनकी बुद्दी की प्रतीति कर लेने का प्रयत्न करना चाहिए था |में नही मानता किआप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं | में आप को कहता हूँ कि वस्तु इस्थिति ठीक इसकी उल्टी हैं सदैव कोई भी काम करने से पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं ,और इस प्रकार वे जो जिम्मेदारी अपने माथे लेते हैं ,उसका उन्हें पूरा -पूरा ख्याल होता है |और क्रांति के कार्य में दूसरे किसी भी अंग कि अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यन्त महत्व का मानते हैं |हालाकि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटेरहने के सिवाए और कोई चारा उनके लिए नही हैं |
उनके प्रति सरकार कि मौजूदा नीति यह है कि लोगो की ओरसे उन्हें अपने आन्दोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है ,उससे वंचित करके उन्हें कुचल डाला जाये |अकेले पड़ जाने पर उनका शिकार आसानी से किया जा सकता है |ऐसी दशा में उनके दल में बुद्धि -भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी भावपूर्ण अपील एकदम बुद्धिमानी से रहित और क्रांतिकारियों को कुचल डालने में सरकार की सीधी मदद करने वाली होगी | इसलिए हम आप से प्रार्थना करते है कि या तो आप कुछ क्रन्तिकारी नेताओ से बातचीत कीजिये -उनमे से कई जेलों में हैं -और उनके साथ सुलह कीजिये या सब प्रार्थना बन्द रखिये |कृपा कर हित कि दृष्टि से इन दो में से कोई एक रास्ता चुन लीजिये और सच्चे दिल से उस पर चलिए |अगर आप उनकी मदद न कर सके ,तो मेहरबानी करके उन पर रहम करे |उन्हें अलग रहने दें |वे अपनी हिफाजत आप अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं ...........
अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हो तो उनका दृष्टिकोण समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल कि पूरी तफसीलवार चर्चा कर लीजिये |आशा है ,आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार सर्व साधारण के सामने प्रगट करंगे |
सुनील दत्ता
आप के समझौते के बाद आपने अपना आन्दोलन बन्द किया हैं ,और फलस्वरूप आप केसब कैदी रिहा हुए हैं |पर क्रन्तिकारी कैदियों का क्या हुआ ?1915 ई . से जेलों में पड़े हुए गदर - पक्ष के बीसो कैदी सज़ा कि मियाद पूरी हो जाने पर भी अब तक जेलों में सड़रहे हैं |मार्शल ला के बीसों कैदी आज भी जिन्दा कब्रों में दफनाये पड़े हैं |येही हाल बब्बर अकाली कैदियों का हैं |देवगढ , काकोरी ,मछुआ -बाज़ार और लाहौर षड़यंत्र के कैदी अब तक जेल कि चहारदीवारी में बन्द पड़े हुए बहुतेरे कैदियों में से कुछ हैं लाहौर ,दिल्ली चटगाँव बम्बई कलकत्ता और अन्य जगहों में कोई आधी दर्जन से ज्यादा षड़यंत्र के मामले चल रहे हैं |बहुसंख्य क्रांतिवादी भागते फिरते हैं ,और उनमे कई इस्त्रिया हैं \सचमुच आधी दर्जन से अधिक कैदी फांसी पर लटकने कि राहदेख रहे हैं | लाहौरषड़यंत्र केस के सजायाफ्ता तीन कैदी , जो सौभाग्य से मशहूर हो गये और जिन्होंने जनता क़ी बहुत अधिक सहानुभूति प्राप्त की हैं ,वे कुछ क्रांतिवादी दल का एक बड़ा हिस्सा नही हैं |उनका भविष्य ही उस दल के सामने एकमात्र प्रश्न नही हैं |सच पूछा जाये तो उनकी सज़ा घटाने की अपेक्षा उनके फांसी पर चढ़ जाने से अधिक लाभ होने की आशा हैं |
यह सब होते हुए भी आप उन्हें अपना आन्दोलन बन्द करने की सलाह देते हैं |वे ऐसा क्यों करे ?आपने कोई निशचित वस्तु की ओर निर्देश नही किया हैं | ऐसी दशा में आपकी प्रथ्र्नाओ का येही मतलब होता है कि आप इस आन्दोलन को कुचल देने में नौकरशाही कि मदद कर रहे हैं ,और आपकी विनती का अर्थ उनके दल को रास्ट्रद्रोह पलायन और विश्वास घात का उपदेश करना हैं |यदि ऐसी बात नही है ,तो आपके लिए उत्तम तो यह था कि आप कुछ अग्रगण्य क्रांतिकारियों के पास जाकर उनसे सारे मामले के बारे में बातचीत कर लेते |अपना आन्दोलन बन्द करने के बारे में पहले आपको उनकी बुद्दी की प्रतीति कर लेने का प्रयत्न करना चाहिए था |में नही मानता किआप भी इस प्रचलित पुरानी कल्पना में विश्वास रखते हैं | में आप को कहता हूँ कि वस्तु इस्थिति ठीक इसकी उल्टी हैं सदैव कोई भी काम करने से पहले उसका खूब सूक्ष्म विचार कर लेते हैं ,और इस प्रकार वे जो जिम्मेदारी अपने माथे लेते हैं ,उसका उन्हें पूरा -पूरा ख्याल होता है |और क्रांति के कार्य में दूसरे किसी भी अंग कि अपेक्षा वे रचनात्मक अंग को अत्यन्त महत्व का मानते हैं |हालाकि मौजूदा हालत में अपने कार्यक्रम के संहारक अंग पर डटेरहने के सिवाए और कोई चारा उनके लिए नही हैं |
उनके प्रति सरकार कि मौजूदा नीति यह है कि लोगो की ओरसे उन्हें अपने आन्दोलन के लिए जो सहानुभूति और सहायता मिली है ,उससे वंचित करके उन्हें कुचल डाला जाये |अकेले पड़ जाने पर उनका शिकार आसानी से किया जा सकता है |ऐसी दशा में उनके दल में बुद्धि -भेद और शिथिलता पैदा करने वाली कोई भी भावपूर्ण अपील एकदम बुद्धिमानी से रहित और क्रांतिकारियों को कुचल डालने में सरकार की सीधी मदद करने वाली होगी | इसलिए हम आप से प्रार्थना करते है कि या तो आप कुछ क्रन्तिकारी नेताओ से बातचीत कीजिये -उनमे से कई जेलों में हैं -और उनके साथ सुलह कीजिये या सब प्रार्थना बन्द रखिये |कृपा कर हित कि दृष्टि से इन दो में से कोई एक रास्ता चुन लीजिये और सच्चे दिल से उस पर चलिए |अगर आप उनकी मदद न कर सके ,तो मेहरबानी करके उन पर रहम करे |उन्हें अलग रहने दें |वे अपनी हिफाजत आप अधिक अच्छी तरह कर सकते हैं ...........
अथवा अगर आप सचमुच ही उनकी सहायता करना चाहते हो तो उनका दृष्टिकोण समझ लेने के लिए उनके साथ बातचीत करके इस सवाल कि पूरी तफसीलवार चर्चा कर लीजिये |आशा है ,आप कृपा करके उक्त प्रार्थना पर विचार करेंगे और अपने विचार सर्व साधारण के सामने प्रगट करंगे |
आपका
अनेको में से एक सुखदेव
अनेको में से एक सुखदेव
सुनील दत्ता
9415370672
| प्रतिक्रियाएँ: |
शुक्रवार, 18 मार्च 2011
क्या सरकारी भूमि पूजन उचित है?
पुलिस स्टेशनों, बैंकों व अन्य शासकीय/अर्धशासकीय कार्यालयों व भवनों में हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरें, मूर्तियाँ आदि लगी होना आम बात है। सरकारी बसों व अन्य वाहनों में भी देवी-देवताओं की तस्वीरें अथवा हिन्दू धार्मिक प्रतीक लगे रहते हैं। सरकारी इमारतों, बाँधों व अन्य परियोजनाओं शिलान्यास व उद्घाटन के अवसर पर हिन्दू कर्मकांड किए जाते हैं। यह सब इतना आम हो गया है कि इस ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता।स्वतंत्रता के तुरंत बाद, इस मुद्दे पर कुछ प्रबुद्धजनों ने अपना विरोध दर्ज किया था व सरकार की धर्मनिरपेक्षता की नीति पर प्रश्नचिन्ह लगाए थे। पंडि़त नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल में केन्द्रीय कैबिनेट ने न केवल सोमनाथ मंदिर का जीर्णोंधार सरकारी खर्च पर कराए जाने के प्रस्ताव को अमान्य कर दिया था वरन् तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को यह सलाह भी दी थी कि वे राष्ट्रपति की हैसीयत से मंदिर का उद्घाटन न करें। उस समय, सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों की तीर्थस्थानों, मंदिरों आदि की यात्राएं नितांत निजी हुआ करती थीं और इन यात्राओं के दौरान वे मीडिया से दूरी बनाकर रखते थे।
धीरे-धीरे समय बदला। आज राजनेताओं के बीच भगवान का आर्शीवाद प्राप्त करने की प्रतियोगिता चल रही है। राजनेताओं की मंदिरों व बाबाओं के आश्रमों की यात्राओं का जमकर प्रचार होता है। सरकारी इमारतों के उद्घाटन के मौके पर ब्राम्हण पंडि़त उपस्थित रहते हैं। सरकारी परियोजनाओं के शिलान्यास के पहले भूमिपूजन किया जाता है और मंत्रोच्चारण कर ईश्वर से परियोजना का कार्य सुगमतापूर्वक संपन्न करवाने की प्रार्थना की जाती है।
अभी हाल में राजेश सोलंकी नामक एक दलित सामाजिक कार्यकर्ता ने गुजरात उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर कर, न्यायालय के नए भवन के शिलान्यास समारोह के दौरान भूमिपूजन और मंत्रोच्चारण किए जाने को चुनौती दी। इस कार्यक्रम में राज्य के राज्यपाल व उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश भी उपस्थित थे। सोलंकी का तर्क था कि चूंकि हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है अतः राजकीय कार्यक्रमों में किसी धर्मविशेष के कर्मकांड नहीं किए जा सकते। ऐसा करना भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों के विरूद्ध होगा। भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्ष है और धर्म और राज्य के बीच स्पष्ट विभाजक रेखा खींचता है। सोलंकी ने यह तर्क भी दिया कि अदालत के भवन के शिलान्यास के अवसर पर भूमिपूजन और ब्राम्हण पंडि़तों द्वारा मंत्रोच्चारण से न्यायपालिका की धर्मनिरेपक्ष छवि को आघात पहुंचा है।
सोलंकी की इस तार्किक और संवैधानिक याचिका को स्वीकार करने की बजाय न्यायालय ने उसे खारिज कर दिया। और तो और, याचिकाकर्ता पर बीस हजार रूपये का जुर्माना भी लगाया गया। अपने निर्णय में उच्च न्यायालय ने कहा कि धरती को इमारत के निर्माण के दौरान कष्ट होता है। भूमिपूजन के माध्यम से धरती से इस कष्ट के लिए क्षमा मांगी जाती है। भूमिपूजन के जरिए धरती से यह प्रार्थना भी की जाती है कि वह इमारत का भार सहर्ष वहन करे। भूमिपूजन करने से निर्माण कार्य सफलतापूर्वक संपन्न होता है। निर्णय में यह भी कहा गया है कि भूमिपूजन, वसुधैव कुटुम्बकम (पूरी धरती हमारा परिवार है) व सर्वे भवन्तु सुखिनः (सब सुखी हों) जैसे हिन्दू धर्म के मूल्यों के अनुरूप है। न्यायालय के ये सारे तर्क हास्यास्पद और बेबुनियाद हैं।
निर्माण कार्य शुरू करने के पहले धरती की पूजा करना शुद्ध हिन्दू अवधारणा है। दूसरे धर्मों के लोग यह नहीं करते जैसे, ईसाई धर्म में निर्माण शुरू करने के पहले पादरी द्वारा धरती पर पवित्र जल छिडका जाता है। जहां तक नास्तिकों का सवाल है, निर्माण के संदर्भ में उनकी मुख्य चिंता पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना होती है।
शासकीय कार्यक्रमों में किसी धर्म विशेष के कर्मकांडों किए जाने को उचित ठहराना भारतीय संविधान के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन है। भारतीय संविधान, राज्य से यह अपेक्षा करता है कि वह सभी धर्मों से दूरी बनाए रखेगा और उनके साथ बराबरी का व्यवहार करेगा। एस.आर.बोम्मई के मामले में उच्चतम न्यायालय का फैसला भी यही कहता है। इस फैसले के अनुसार धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है कि
1) राज्य का कोई धर्म नहीं होगा
2) राज्य सभी धर्मों से दूरी बनाए रखेगा व
3) राज्य किसी धर्म को बढ़ावा नहीं देगा और ना ही राज्य की कोई धार्मिक पहचान होगी।
यह सही है कि विभिन्न धर्मों द्वारा प्रतिपादित नैतिक मूल्न्यों को पूरा समाज व देश स्वीकार कर सकता है परंतु यह बात धार्मिक कर्मकांडों पर लागू नहीं होती। यद्यपि धर्मों की मूल आत्मा उनके नैतिक मूल्य है पंरतु आमजनों की दृष्टि में, कर्मकांड ही विभिन्न धर्मों के प्रतीक बन गए हैं। कर्मकांडों के मामले में तो धर्मों के भीतर भी अलग-अलग मत और विचार रहते हैं।
कबीर, निजामुद्दीन औलिया व महात्मा गाँधी जैसे संतो ने धर्मों के नैतिक पहलू पर जोर दिया। जहां तक धार्मिक कर्मकांडों, परंपराओं आदि का संबंध है, उनमें बहुत भिन्नताएं हैं। एक ही धर्म के अलग-अलग पंथों के कर्मकांडों, पूजा पद्धति आदि में भी अंतर रहता है।
उच्च न्यायालय का यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 51 (ए) के भी विरूद्ध है। यह अनुच्छेद राज्य पर वैज्ञानिक एवं तार्किक सोच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी डालता है। राज्य द्वारा किसी भी एक धर्म के कर्मकांडों, परंपराओं, रीतियों आदि को बढ़ावा देना संविधान के विरूद्ध है। वैसे भी, श्रद्धा और अंधश्रद्धा के बीच की विभाजाक रेखा बहुत सूक्ष्म होती है। श्रद्धा को अंधश्रद्धा का रूप लेते देर नहीं लगती और अंधश्रद्धा समाज को पिछडेपन व दकियानूसी सोच की ओर धकेलती है।
जहां तक किसी इमारत के निर्माण का प्रश्न है अगर संबंधित तकनीकी व भूगर्भीय मानको का पालन नहीं किया जावेगा तो दुर्घटनाएं होने की संभावना बनी रहेगी। यही कारण है कि इमारतों के निर्माण के पूर्व कई अलग-अलग एजेन्सियों से अनुमति लेने का प्रावधान किया गया है। अगर इन प्रावधानों का पालन किए बगैर इमारतें बनाई जाएगीं तो भूमिपूजन करने के बावजूद, दुर्घटनाएं होंगी ही।
हमारे न्यायालयों को इन संवैधानिक पहलुओं का ध्यान रखना चाहिए। अजीबोगरीब तर्क देकर यह साबित करने की कोशिश करना हमारे न्यायालयों को शोभा नहीं देता कि किसी धर्म के कर्मकांडों और रूढियों को राज्य द्वारा अपनाना उचित है।
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था, “उस भारत, जिसके निर्माण के लिए मैं जीवन भर काम करता रहा हॅू, में प्रत्येक नागरिक को बराबरी का दर्जा मिलेगा-चाहे उसका धर्म कोई भी हो। राज्य को पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष होना ही होगा“ (“हरिजन“ 31 अगस्त 1947) व “धर्म किसी व्यक्ति की देशभक्ति का मानक नहीं हो सकता। वह तो व्यक्ति और उसके ईश्वर के बीच का व्यक्तिगत मसला है“ व “धर्म हर व्यक्ति का व्यक्तिगत मसला है और उसका राजनीति या राज्य के मसलों से घालमेल नहीं होना चाहिए।“
पिछले कुछ दशकों से हिन्दू धार्मिक परंपराएं व रीतियां, राजकीय परंपराएं व रीतियां बनती जा रहीं है। इस प्रक्रिया पर तुरंत रोक लगाए जाने की जरूरत है।
-राम पुनियानी
(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे, और सन् 2007 के नेशनल कम्युनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)
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