सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

भ्रष्टाचार विरोध का प्रहसन पटाक्षोप की ओर-1


निकसत राग हजूरे का
जिस तरह बा़ के बाद उतरती गंगा/तट पर तज आती विकृत शव अध्खाया/वैसे ही तट पर तज अश्वत्थामा को/इतिहासों ने खुद नया मोड़ अपनाया।’ ;धर्मवीर भारती, अंध युग’
भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, मीडिया और टीम अन्ना के भरसक प्रयासों के बावजूद, अब समाप्ती की ओर है। आंदोलन का बहुरूपिया और मिश्रित चरित्रा भी स्वयमेव उद्घाटित हो चुका है। लोगों को भ्रमित करने के लिए जबानी जमाखर्च का दौर अलबत्ता अभी चल रहा है। लेकिन कब तक? किसी व्यक्ति अथवा संगठन के प्राध्किरवादी और भ्रष्ट आचरण को हमेशा के लिए लोकतंत्रा और सदाचार नहीं बताए रहा जा सकता। अगर कोई बेहतर सपना और उसे पफलीभूत करने की सच्ची निष्ठा न हो, भ्रष्ट राजनीति और सरकार की भत्र्सना ज्यादा दिन ाल बनी नहीं रह सकती। यह सही है कि ज्यादातर चैनलों और अखबारों ने अन्ना हजारे और उनके आंदोलन की ॔विश्वसनीयता’ बनाए रखने के लिए अभी भी कमर कसी हुई है। लेकिन ॔काली करतूत’ करने वाली कांग्रेस सरकार को आगे करके अन्ना हजारे और उनकी टीम के सदस्यों को सापफसपफेद दिखाने की कवायद ज्यादा दिन चलने वाली नहीं है। आंदोलन के अंतर्विरोधें और समस्याओं को ंकने के लिए सरकार और कांग्रेस को कोसने का ॔मंत्रा’ असर खोता जा रहा है।
इस आंदोलन को खड़ा करने और चलाने में यह सच्चाई कि ॔जनता भ्रष्टाचार से परेशान है’ कापफी काम आई है। लेकिन सच्चाई झूठ का कितने दिन साथ दे सकती है! मीडिया की कितनी ही ताकत और समर्थन हो, मानव विवेक बहुत दिनों तक कुंद करके नहीं रखा जा सकता। वर्गविशेष के स्वाथोर्ं की पूर्ति करने वाली व्यवस्था देर तक चल सकती है, उसके समर्थन का आंदोलन नहीं। क्योंकि आंदोलन के साथ जुड़ा व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। शासक वर्ग के साथ नाभिनाल ब( नागरिक समाज और सरकार के बीच के आपसी संघर्ष में दोनों की स्वार्थसि( भले ही होती हो, उसे जनता और सरकार के बीच का संघर्ष देर तक बताए नहीं रखा जा सकता।
आंदोलन में उत्साह से शामिल होने वाले नागरिकों में बहुतों का मोहभंग होने लगा है। टीम के प्रमुख सदस्यों में आपसी झगड़े ब़ गए हैं। कुछ प्रमुख सदस्य टीम से बाहर निकल गए हैं। पिछले छहसात महीनों से टीम में प्रमुखता पाने के अभिलाषी कुछ प्रमुख समर्थक अपने ठिकानों पर वापस लौटने लगे हैं। उनमें कई के ठिकाने कांग्रेस में या कांग्रेसियों के साथ हैं। उनमें कई कहने लगे हैं कि उनका आंदोलन को अंध समर्थन कभी नहीं था। राजनीति को कोसने और ॔लोकशक्ति’ के जाग उठने के कोरस में शामिल होने वाले अब खुद राजनेताओं की तरह पैंतरे ले रहे हैं। आंदोलन के अवसान पर जो बहस और बयानबाजी हो रही, उसे दयनीय ही कहा जा सकता है।
अन्ना हजारे के कुछ उग्र समर्थकों यानी उग्र राष्ट्रवादियों ने टीम के प्रमुख सदस्य प्रशांत भूषण पर उनके चैंबर में घुस कर शारीरिक हमला कर दिया। उनका यह कृत्य नितांत निंदनीय है। हालांकि यह भी देखना चाहिए कि छोटी पिटाई, मसलन शराबियों को पेड़ से बांध कर सबक सिखाने वाली, स्वीकृत होगी तो बड़ी पिटाई का रास्ता भी खुला रहेगा। यह रास्ता अंततः उन हथियारों तक जाता है, जिनके प्रहार से मानवता ही खत्म हो जा सकती है। अरविंद केजरीवाल को कुछ अन्ना समर्थक गद्दार बता रहे हैं, जो अन्ना और आंदोलन पर अपना कब्जा जमाना चाहता है। उन्हें कौन समझाए कि जो ध्न और दिमाग लगाएगा, आंदोलन पर कब्जा भी उसी का रहेगा। अन्ना हजारे कई बार कह चुके हैं कि वे प्रशांत भूषण और केजरीवाल के बीच अहम के टकराव को जल्दी ही ठीक कर देंगे। लेकिन ठीक होने के बजाय हालात बेहूदा होते गए हैं।
आंदोलन के मापर्फत होने वाली कारपोरेट क्रांति की सच्चाई जल्दी ही सामने आने लगी थी। उसका प्राध्किरवादी और सांप्रदायिक चरित्रा जंतरमंतर पर ही अच्छी तरह प्रकट हो चुका था। लेकिन उसके साथ जुटे अनुभवी जनांदोलनकारियों, पत्राकारों और सरोकारध्र्मी सिविल सोसायटी एक्टिविश्टों ने अपने आंखें, कान और मुंह बंद कर लिए। शायद यह सोच कर कि मीडिया उनके साथ है तो आंदोलन के चरित्रा की सच्चाई जनता तक नहीं पहुंच पाएगी। उससे पहले ही मीडिया की लहरों पर सवार टीम अन्ना और उसके साथ लटक कर वे खुद जनता तक जा पहुंचेंगे और उसे आंदोलन के पक्ष में लामबंद कर लेंगे। इस प्रकल्पना में इतना और जोड़ दें ... जो कसर बाकी रहेगी, उसे संघ संप्रदाय अपने नेटवर्क और अडवाणी अपनी रथयात्रा से पूरा कर देंगे। अंतिम परिणति में आंदोलन का बेनेट भाजपा के हाथ में होगा। ... वही हुआ है। अगर जनता लामबंद हो भी जाती या आगे हो जाए, जैसा कि अरविंद केजरीवाल का दावा है कि कांग्रेस उनके खिलापफ कीचड़ उछालने का गंदा खेल बंद नहीं करती तो अगली बार आंदोलन को दस गुना समर्थन होगा, तब भी जनता को कुछ नहीं मिलना है।
पूरे आंदोलन में आरएसएस की जो भी भूमिका रही हो, खास समाजवादियों ने टीम अन्ना का अड़ कर साथ दिया है। मजेदारी देखिए, अन्ना हजारे का कभी समाजवादी विचारकों, विचारधरा, किसी आंदोलन अथवा कार्यक्रम से दूर का भी संबंध नहीं रहा है। लेकिन खास समाजवादियों ने उन्हें अपना आदमी और उनके रास्ते को अपना रास्ता बताते हुए आंदोलन में अंधी छलांग लगा दी। जब सरकार ने अन्ना और उनकी टीम के ॔गड़े मुर्दे उखाड़ने’ का ॔घटिया’ अभियान चलाया तो सरकार को सबसे ज्यादा इन समाजवादियों ने ही ध्कि्कारा। उन्होंने टीम अन्ना की सेवा और बचाव में यह कहते हुए मोर्चा सम्हाल लिया कि आंदोलन उनकी विरासत का हिस्सा और उसे आगे ब़ाने वाला है। जेपी की वृ( विध्वाएं अन्ना की चूड़ियां पहन कर नवविवाहिताओं के से उमांह में आ गइरं। नएनए देवर, ननद और भौजाइयों का भरापूरा कुनबा मिला तो भाग्य पर बलिहारी जाने लगीं। गांधीवादियों का भी उनके साथ सहज घरोपा हो गया। लोहिया देर तक बचे रहे, लेकिन उन्हें भी खींच लिया गया और कहा गया कि अन्नावादी ही असली लोहियावादी हैं। पटाक्षेप की तरपफ ब़ता यह आंदोलन खास समाजवादियों की दयनीय परिणति को भी दर्शा गया है।
भ्रष्टाचार की खिलापफत और सख्त लोकपाल कानून बनाने की वकालत माक्र्सवादियों ने भी की, लेकिन वे जल्दी सम्हल गए और गांधीवादियों और समाजवादियों की तरह आंदोलन के बहाव में नहीं आए। भ्रष्टाचार और मंहगाई के खिलापफ उन्होंने टीम अन्ना और भाजपा से अलग अपने कार्यक्रम आयोजित किए। हमने पहले लेख की शुरुआत लोहिया के एक कथन से की थी कि भारत में राजनीतिक मानस का निर्माण नहीं हो पाया है। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से कई सबक निकलते हैं। उनमें एक है, असहमति के जो भी बिंदु हों, भारत में राजनीतिक मानस का निर्माण सबसे से ज्यादा माक्र्सवादी समूहों में हुआ है।
अब इस आंदोलन पर कुछ कहने के लिए बचा नहीं है। लेकिन पिछले तीन लेख पॄने वाले कई पाठकों का कहना है कि उन्हें आंदोलन की समीक्षा की समापन किश्त का इंतजार है। उनके आग्रह पर हम यह लेख लिख रहे हैं। हम अपने कुछ मित्राों और अग्रजों के आभारी हैं जिन्होंने पहले लेख से हमारी समीक्षा को पॄा और मिल कर बातचीत में या पफोन पर अपनी राय व्यक्त की। यह जिक्र हम इसलिए कर रहे हैं कि जैसा माहौल था, उसमें प्रोपफेसर अनिल सदगोपाल, प्रोपफेसर रणधीर सिंह, प्रोपफेसर रूपरेखा वर्मा, आनंद स्वरूप वर्मा, विनोद अग्निहोत्राी, प्रोपफेसर हरीश शर्मा, कामरेड बलदेव सिहाग सरीखे साथियों का साथ संबल की तरह था। वरना ज्यादातर साथी हमारी ॔अतिवादी’ और ॔शु(तावादी’ समीक्षा पर खपफा हो गए। उन्होंने अप्रत्यक्ष वार भी किए। यह जताते हुए कि आंदोलन का हमारा विश्लेषण जल्दी ही गलत सि( होगा और बड़े आंदोलन से बड़ा मकसद अपने आप सामने निकल कर आ जाएगा।
आम तौर पर नेताओं पर ॔निकटदर्शी’ होने का आरोप लगाया जाता है। लेकिन नेताओं के निंदक भी दूरदर्शिता का परिचय नहीं दे पाए। अश्वत्थामा युध्षि्ठिर के अ(र्सत्य का शिकार होता है। अगर अश्वत्थामा को अनेक अ(र्सत्यों से छली जाने वाली भारतीय जनता का प्रतीक मानें तो आंदोलन के उतार के बाद वह विकृत अध्खाए शव की तरह पड़ी नजर आएगी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनकारी ॔दूसरी आजादी’ और ॔क्रांति’ की घोषणा ऊंचे स्वर में कर रहे थे ॔अश्वत्थामा हतोहता’, और ॔नवउदारवादी’ केवल मन में बोल कर रह जाते थे ॔नरो वा कुंजरो वा’! यह प्रतीकार्थ चाहें तो पूंजीवादी व्यवस्था के पूरी दुनिया में पफैले जाल और कारनामों पर भी लागू कर सकते हैं।
स्पष्ट है कि यह प्रतिक्रांति है, जिसमें मेहनतकश जनता के साथ विश्वासघात करने में शासक वर्ग, मीडिया और नागरिक समाज एक टीम बन गए हैं। टीम अन्ना आंदोलन की परिकल्पना और संचालन करने वाली बीज हस्तियों और इंडिया अगेंस्ट करप्शन ;आईएसीद्ध में शामिल महानुभावों तक सीमित नहीं है। सभी समर्थक मनमोहन से लेकर अडवाणी तक टीम अन्ना में शामिल हैं। मनमोहन सिंह का यह कहना स्वाभाविक है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने अपना उद्देश्य पूरा कर दिया है। यानी, जैसा कि मनमोहन सिंह खुद चाहते हैं, देश में भ्रष्टाचार रहित नवउदारवादी व्यवस्था चलानी है तो लोकपाल कानून बनाना होगा। अडवाणी भी वही काम करने निकले हैं। एक साक्षात्कार में अन्ना से पूछा गया कि उनकी टीम के प्रमुख सदस्य प्रशांत भूषण नवउदारवाद के और अरविंद केजरीवाल कांग्रेस के विरोधी हैं। अन्ना ने सवाल करने वाले को कहा कि वे दोनों को इस बाबत समझाएंगे। हमने पहले लेख में बताया था कि अन्ना हजारे विश्व बैंक का ईनाम पा चुके हैं। मनमोहन सिंह विश्व बैंक के आदमी हैं। दोनों नवउदारवादी हैं। पफर्क के तौर पर यही कहा जा सकता है कि मनमोहन सिंह जहां औपचारिक रूप से नवउदारवादी हैं, अन्ना हजारे की हैसियत अनौपचारिक है। बहरहाल, इस साज का कोई भी तार कहीं से खींच लीजिए, कोई भी खूंटी मरोड़ लीजिए राग एक ही निकलना है। आप चाहें तो इसे राग हजारे भी कह सकते हैं।

प्रेम सिंह
क्रमश:

रविवार, 30 अक्तूबर 2011

फुटकर दुकानदारी का बढ़ता अधिग्रहण , पर विरोध नदारत


फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में भी अधिग्रहण किया जा रहा है | बड़ी देशी और अब विदेशी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा करोड़ो की संख्या में फैले दुकानदारी के बिक्री बाजार का अधिग्रहण किया जा रहा है | इसके विरोध में संघर्ष करना उन तमाम फुटकर दुकानदारों तथा छोटे व औसत दर्जे के और मझोले स्तर के डीलरो , स्टाकिस्टो जैसे - थोक व्यापारियों के रोज़ी - रोजगार कि आवश्यकता है | उनके जीवन - अस्तित्व की शर्त है |
केन्द्रीय सचिवो कि समिति द्वारा फुटकर दुकानदारी के मल्टी ब्रांड कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को छूट की सिफारिश कर दी गयी है | अभी यह छूट 51 % निवेश के लिए की गयी है | विदेशी निवेश वाले इन रिटेलो स्टोरों को विभिन्न प्रान्तों में खोलने का अधिकार राज्य सरकारों को देने का प्रस्ताव किया गया है | फिर इस प्रस्ताव में मल्टी ब्रांड रिटेल के ताकतवर - माल , शाप से छोटे स्तर के उद्यमों एवं किराना स्टोरों के सुरक्षा के उपाय तय करने व उसे लागू करने का भी अधिकार राज्य सरकार के हाथो में देने का प्रस्ताव किया गया है | सचिव समिति के प्रस्ताव में अभी विदेशी निवेश के रिटेल स्टोरों को 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों में खुदरा व्यापार की छूट दी गयी है | इस आधार पर अभी देश के 35 शहरों को इसके लिए उपयुक्त बताया गया है | अभी सचिव समिति के इस निर्णय पर मंत्रीमंडल का निर्णय आना बाकी है | पर इस प्रस्ताव से फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में मल्टी ब्रांड रिटेल व्यापार में विदेशी निवेश को अब सुनिशिचत माना जा रहा है | सचिव समिति के इस प्रस्ताव का कही - कही स्थानीय फुटकर दुकानदारों द्वारा थोड़ा विरोध भी किया गया | पर वह एक - दो दिन में ही खत्म भी हो गया | जबकि देश की बड़ी औद्योगिक एवं वाणीजियक कम्पनियों के राष्ट्र स्तर के ' पिक्की ' व सी0 आई0 आई0 और रिटेल क्षेत्र में लगी बड़ी भारतीय कम्पनियों ने सचिव समिति के प्रस्ताव का स्वागत किया है | अभी दो - तीन साल पहले स्थानीय स्तर के फुटकर दुकानदारों के संगठनों द्वारा फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में विदेशी ही नही देशी बड़ी कम्पनियों को छूट देने का विरोध किया जा रहा था |फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में बड़ी कम्पनियों के आ जाने से फुटकर दुकानदारों के बिक्री बाज़ार में भारी कटौती के साथ उनकी बर्बादी की चर्चाये भी हो रही हैं | पर धीरे - धीरे यह विरोध मद्धिम पड़ गया | अब यही बाते फुटकर व्यापार में विदेशी निवेश के बारे में भी कही जा रही है और वह गलत भी नही है | इसके वावजूद इस बार उस प्रचार माध्यमो में चर्चा ही बहुत कम है | फिर उसका विरोध तो और भी कम है ऐसा लगता है , जैसे फुटकर दुकानदारों ने जाने या अनजाने में यह मान लिया है की उनके विरोध से कुछ नही होगा | जो सत्ता सरकार चाहेगी , वही होगा | यही असली हार है | संघर्ष में मिली हार बड़ी हार नही होती | क्योंकि उस हार से पराजितो को अपनी कमिया देखने व दूर करने एवं पुन: संघर्ष के जरिये उसे विजय में बदल देने के लिए प्रयास करने की हर सम्भावना मौजूद रहती है | लेकिन बिना संघर्ष के ही हार मान लेने पर तो विजय कदापि सम्भव नही है |किसान भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध निरन्तर संघर्ष में है |ज्यादातर जगहों पर थक - हारकर मुआवजा ले चुके है | जमीन छोड़ चुके हैं |पर उन्होंने अभी संघर्ष नही छोड़ा हैं | इसलिए अब कही - कही उनको जीत भी मिल रही है |उनकी भूमि का अधिग्रहण रदद भी हो रहा है | कल को यह जीत बढ़ सकती है | राष्ट्रव्यापी जीत में बदल सकती है | फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में भी अधिग्रहण किया जा रहा है | बड़ी देशी और अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा करोड़ो की संख्या में फैले दुकानदारी का अधिग्रहण किया जा रहा है | इनके बिक्री बाज़ार का अधिग्रहण भी अधिग्रहण किया जा रहा है | इसके विरोध में संघर्ष करना उन तमाम फुटकर दुकानदारों तथा छोटे व औसत दर्जे के और मझोले स्तर के डीलरो , स्टाकिस्टो जैसे - थोक व्यापारियों के रोजी - रोजगार की आवश्यकता है | उनके जीवन - अस्तित्व की शर्त है | उन्हें किसानो की तरह ही फुटकर दुकानदारी में बड़ी कम्पनियों का विरोध करना ही पड़ेगा | इसी के साथ उन्हें पिछले 20 सालो से लागू होती रही उन वैश्वीकरणवादी , उदारीकरणवादी नीतियों का भी विरोध करना होगा , जिसके अंतर्गत बड़ी कम्पनियों के छूटो , अधिकारों को हर क्षेत्र में बढाया जा रहा है तथा विभिन्न क्षेत्रो में जनसाधारण हिस्सों के छूटो , अधिकारों को खुलेआम काटा - घटाया जा रहा है |इसमें उन्हें देशी बड़ी कम्पनियों को छूट देने के प्रति नर्म और विदेशी निवेश के प्रति ही विरोध में भी बहकने से भी बचना होगा | फुटकर व्यापार के संदर्भ में हम स्पष्ट देख सकते है कि इस क्षेत्र में विदेशी निवेश का अनुमोदन खुद इस देश के बड़े कम्पनियों के संगठन कर रहे है | इसका साफ़ मतलब है इस देश कि बड़ी कम्पनिया यहा के फुटकर दुकानदारों के साथ नही है | बल्कि उनके विरोध में विदेशियों के साथ खड़े है | आम फुटकर दुकानदारों तथा छोटे डीलरो , स्टाकिस्टो को देशी व विदेशी बड़ी कम्पनियों के अधिग्रहण के विरोध में खड़ा होना होगा | इसी तरह से उन्हें फुटकर व्यापार के बारे में बड़ी कम्पनियों के हिमायतियो तथा सरकारों द्वारा चलाए जा रहे तर्को - कुतर्को का भी संगठित रूप में जबाब देने के लिए स्वंय को तैयार करना होगा |
उदाहरण ----(1) उन्हें यह तथ्य जरुर जानना चाहिए कि इस देश में लगभग 4 करोड़ लोगो को इस क्षेत्र में रोजगार मिला हुआ है | ( 2) इस तरह देश के कुल रोजगार का 11% हिस्सा फुटकर दुकानदारी पर टिका हुआ है | इस मामले में यह कृषि के बाद स्वरोजगार का दुसरा बड़ा क्षेत्र है संभवत: 4 करोड़ लोगो के परिवारों कि 20 या 22 करोड़ कि आबादी का जीवन - यापन फुटकर दुकानदारी पर टिका हुआ है | ( 3) खुदरा व्यापार में देश की बड़ी कम्पनियों और अब विदेशी निवेश के लिए यह तर्क भी दिया जाता है कि ' फुटकर दुकानदारी के क्षेत्र में बिचौलियों की समाप्ति हो जायेगी | किसान व उत्पादन में लगी अन्य छोटी इकाइयों द्वारा अपना माल , सामान सीधे माल शापिंग माल को दिया जाएगा | जहा से वह सीधे उपभोक्ता के हाथ पहुच जाएगा |' कोई भी आदमी समझ सकता है कि फुटकर व्यापार अपने आप में बिचौलियागिरी का धंधा है | चाहे वह छोटी दुकानदारी के रूप में हो या फिर माल शाप के रूप में हो | फिर इन सबके साथ डीलरो , स्टाकिस्टो जैसे बिचौलियों का समूह भी खड़ा रहता है | अत: फुटकर दुकानदारी के जरिये बिचौलियागिरी को समाप्त करने का ब्यान भी एक धोखा है |(4)जहा तक किसानो को शापिंग माल में अपना माल बेहतर मूल्य पर बेचने और उपभोक्ता द्वारा सस्ता खरीदने की बात है तो दोनों ही बाते गलत है | फुटकर व्यापार में बड़ी कम्पनियों के आगमन से बहुतेरे फुटकर दुकादारो को अपना माल बेचने और उपभोक्ता द्वारा उन दुकानदारों से मोल भाव कर सौदा लेने की क्षमताओं में गिरावट आ जानी है | क्योंकि अब बाज़ार पर थोड़े से , पर विशालकाय माल शाप के मालिको का एकाधिकार बढ़ जाना है | और किसानो व अन्य उत्पादकों की तथा उपभोक्ताओं की यह मजबूरी बढती जायेगी कि वह बाज़ार पर अधिकार जमाए हुए बड़ी कपनियो के आगे समर्पण कर दे | उसी के निर्देशानुसार चले | ( 5) अभी तक कि बाज़ार व्यवस्था स्थानीय स्तर पर बाज़ार का संतुलन स्थानीय खरीद - बिक्री पर टिका हुआ है | क्योंकि हर आदमी स्थानीय स्तर पर खरीदने के लिए वहा के स्थानीय लोगो के साथ अपना शारीरिक व मानसिक श्रम या अपना माल , सामान बेचता रहा है | लेकिन फुटकर व्यापार में देशी व विदेशी धनाढ्य कम्पनियों के बढ़ते चढ़ते घुसपैठ से अपने स्थानीय लेन- देन के सम्बन्ध व संतुलन में दरकन टूटन का आना निश्चित है |क्योंकि फुटकर दुकानदार केवल स्थानीय स्तर का विक्रेता ही नही है , बल्कि वह स्थानीय स्तर पर उत्पादित मालो , सामानों का खरीदार होने के साथ - साथ शिक्षा , चिकित्सा , न्याय , कानून आदि कि सेवाओं का खरीदार भी होता है | बड़ी कम्पनियों द्वारा फुटकर बाज़ार व्यापार के अधिकाधिक अधिग्रहण के साथ स्थानीय स्तर के खरीद - बिक्री के आपसी संबंधो का भी अधिग्रहण हो जाता है | जिसका परिणाम अन्य क्षेत्र के लोगो के पेशे , धंधे के टूटन के रूप में ही आना निश्चित है |
इसलिए फुटकर दुकानदारी से टूटकर तथा स्थानीय , व्यापारिक , सामाजिक संबंधो से टूटकर स्थानीय फुटकर दुकानदारों में भी संकट का तेज़ी से बढना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है |
इसीलिए किसानो की तरह ही फुटकर दुकानदारों को भी अपना स्थानीय समितिया बनाकर देश की बड़ी कम्पनियों द्वारा फुटकर दुकानदारी का किए जा रहे अधिग्रहण के विरुद्ध ,फुटकर दुकानदारी में विदेशी निवेश के विरुद्ध केंद्र सरकार द्वारा बनाये जा रहे कानून के विरुद्ध तथा प्रांतीय व स्थानीय स्तर पर उन्हें दिए जा रहे छूट के विरुद्ध संघर्ष में उतर जाना चाहिए | इसी के साथ उन्हें किसानो , मजदूरों एवं अन्य कारोबारियों के साथ इस घुसपैठ को बढाने वाली वैश्वीकरणवादी नीतियों को खारिज किए जाने के लिए और अपने अस्तित्व कि रक्षा के लिए करो या मरो का नारा बुलंद करके आन्दोलन शुरू कर देना चाहिए |

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

शनिवार, 29 अक्तूबर 2011

आतंक का वास्ता राजनीति से है और धर्म का मानवता से-2

भारत में अंग्रेज शासकों की ‘फूट डालो और राज करो‘ की नीति व इतिहास को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देखने के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच पहले से ही आपसी शंका व घृणा का भाव था, इस्लाम के बारे में पश्चिमी दुष्प्रचार ने भारत में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को और गहरा किया। सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने हिन्दू धर्म के नाम पर जो तर्क दिए हैं वे अत्यंत बेहूदा और आधारहीन हैं। भारत में किए गए अधिकतर आतंकी हमले किसी एक समुदाय को निशाना बनाकर नहीं किए गए थे। इसके कुछ अपवाद हैं साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर और असीमानंद द्वारा मस्जिदों या ऐसे स्थानों पर किए गए बम विस्फोट, जहाँ मुसलमान बड़ी संख्या में इकट्ठा थे। दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा आतंकी हमला 11.9.2001 को न्यूयार्क में हुआ था और इसमें सभी धर्मों और देशों के नागरिक मारे गए थे। पाकिस्तान में अल्कायदा द्वारा मारे गए लोगों की संख्या हजारों नहीं तो कम से कम सैकड़ों में जरूर होगी। यह मान्यता मूखर्तापूर्ण है कि मुस्लिम शासकों ने भारत में इस्लाम का प्रचार करने के लिए देश पर कब्जा किया था। भारत में सम्राट अशोक को छोड़कर किसी राजा ने धर्मप्रचार नहीं किया। केवल अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार किया और वह भी शांतिपूर्ण तरीकों से। भारत में इस्लाम को फैलाया सूफी संतों ने और हिन्दू धर्म की निष्ठुर जाति प्रथा के चंगुल से निकलने के लिए दलितों ने बड़ी संख्या में इस्लाम को गले लगाया। इस तर्क में कोई दम नहीं है कि हिन्दुओं को मारकर और ढेर सारे बच्चे पैदा कर मुसलमान, भारत को दारुल इस्लाम बनाना चाहते हैं। पिछले साठ सालों में भारत की कुल आबादी में मुसलमानों के प्रतिशत में मात्र 0.8 की वृद्धि हुई है जबकि इसी अवधि में आदिवासियों का प्रतिशत 7.5 से बढ़कर 8.5 हो गया है। इन दोनों समुदायों की आबादी की अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि दर के पीछे गरीबी और अशिक्षा है न कि अपने समुदाय की आबादी बढ़ाने का कोई सोचा-समझा षड्यंत्र।
“सभ्यताओं के टकराव“ के सिद्धांत से ही जन्मी है यह मान्यता कि सभी आतंकी मुसलमान होते हैं। यह मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं हो सकता कि अमरीका द्वारा स्थापित किए गए मदरसों में मुस्लिम युवकों को निर्दयता से निर्दोष पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मारने के लिए प्रायोजित किया गया था परंतु हमें यह भी याद रखना चाहिए कि भारत में हुए आतंकी हमलों के बाद पकड़े गए अधिकांश मुस्लिम युवक, अंततः निर्दोष साबित हुए।
यह सोचना भी गलत है कि भारत में आतंकी हमलों में केवल हिन्दू मारे जाते हैं। 26.11.2008 के आतंकी हमले में मारे गए मुसलमानों का प्रतिशत, आबादी में उनके प्रतिशत से कहीं अधिक था। हालिया (13.7.11) हमले में भी दोनों समुदायों के लोग मारे गए। यह कहना कि आतंकवाद की समस्या का हल हिन्दुओं में एकता स्थापित करना और हिन्दू पार्टी को समर्थन देना है, राजनैतिक प्रचार के अतिरिक्त कुछ नहीं है। भारत ने अपनी इच्छा से धर्मनिरपेक्ष राज्य बने रहना स्वीकार किया था। हमारे
संविधान निर्माताओं ने बहुत सोच-समझकर इस्लामिक या हिन्दू राष्ट्र के सिद्धांत को खारिज किया था।
हम यह नहीं भूल सकते कि हेमन्त करकरे की सूक्ष्म जाँच के फलस्वरूप प्रज्ञा सिंह ठाकुर से लेकर असीमानंद तक तथा आर0एस0एस0 के एक प्रमुख नेता इन्द्रेश कुमार के आतंकवादी हमलों में शामिल होने के अकाट्य सुबूत सामने आए हैं। इस्लाम के नाम पर लोगों के दिमागों में ज़हर भरने का काम अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक महाशक्ति कर रही है, जिसका लक्ष्य अपने राजनैतिक उदेश्यों की पूर्ति है। हमारे देश में हिन्दुत्व की विचारधारा की पोषक वे शक्तियाँ हैं जो हमारे देश के बहुवादी एवं प्रजातांत्रिक चरित्र का गला घोंटना चाहती हैं। बहुवाद व प्रजातंत्र हमारे स्वतंत्रता संग्राम की थाती हैं। आतंकवादी हमलों का बदला लेने या पाकिस्तान पर हमला करने की बातें शुद्ध पागलपन हैं और ऐसा कोई भी कदम, भारतीय उपमहाद्वीप को बर्बादी के रास्ते पर ले जाएगा।
किसी एक समुदाय पर आतंकवाद का पोषक होने का आरोप लगाना गलत है। कुछ असीमानंदों या दयानंदों के कारण पूरा हिन्दू समुदाय आतंकवादी नहीं हो जाता।

-राम पुनियानी
समाप्त
मोबाइल: 09322254043

शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

आतंक का वास्ता राजनीति से है और धर्म का मानवता से-1

दिनांक 13 जुलाई 2011 को मुंबई में हुए आतंकी बम विस्फोटों के बाद से हमारे देश में घृणा फैलाने समाज को बाँटने वाली ताकतें एक बार फिर अपना सिर उठा रही हैं। धार्मिक राष्ट्रवाद के पैरोकार अपना पुराना राग एक बार फिर अलापने लगे हैं। वे धर्म, विशेषकर इस्लाम और मुसलमानों, को आतंकवाद से जोड़ रहे हैं और चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए हिन्दुओं को एक होना होगा, हिन्दू पार्टी को समर्थन देना होगा, मुसलमानों को नागरिकता से वंचित करना होगा और भारत को हिन्दू राष्ट्र घोषित करना होगा (सुब्रह्मण्यम् स्वामी, डीएनए, 16 जुलाई 2011)
स्वामी का कहना है कि आतंकवाद, दरअसल, हिन्दू धर्म पर इस्लामिक हमला है और इस्लाम, भारत पर काबिज होना चाहता है। अतः यह जरूरी है कि आम हिन्दुओं की मानसिकता हिन्दूवादी बनाई जाए, अयोध्या वाराणसी में भव्य मंदिरों का निर्माण हो, संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द किया जाए और हिन्दुओं द्वारा दूसरे धर्मों को अपनाने पर प्रतिबंध हो परंतु हिन्दू धर्म अपनाने के इच्छुक गैर-हिन्दुओं पर कोई रोक हो। भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाया जाना जरूरी है और उतना ही जरूरी है मुसलमानों को मताधिकार से वंचित किया जाना। यह लेख मूलतः आर0एस0एस0 के एजेन्डे को ही प्रतिबिंबित करता है, इसकी भाषा अत्यंत कटु आक्रामक है। अपने गठन से लेकर आज तक आर0एस0एस0 ने देश में केवल और केवल घृणा फैलाई है। लगभग पिछले एक सौ सालों से हिन्दू धर्म, संघ की राजनैतिक विचारधारा का मूलाधार रहा है। आर0एस0एस0 को अपने इस अभियान में अमरीकी दुष्प्रचार से भी मदद मिल रही है। 9/11 के बाद से अमरीका ने एक नए शब्दइस्लामिक आतंकवादको गढ़ा और पूरी दुनिया में मुसलमानों और इस्लाम को बदनाम करने का जबरदस्त अभियान चलाया।
आतंकवाद सैकड़ों साल पुराना है परंतु अल्कायदा के अस्तित्व में आने के बाद से यह वैश्विक स्तर पर चर्चा और बहस का विषय बन गया है। अल्कायदा और तालिबान के लड़ाकों को अमरीका द्वारा स्थापित किए गए मदरसों में प्रशिक्षण मिला। पिछली सदी के आखिरी तीन दशकों में, पश्चिम एशिया के तेल संसाधनों पर कब्जा, अमरीकी सामरिक रणनीति का महत्वपूर्ण अंग रहा है। अमरीकी सरकार ने पश्चिम एशिया के देशोंपर हमले करने के लिए कई बहाने गढ़े। सच तो यह है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमरीका ने इजराइल के निर्माण के बीज बोए ही इसलिए थे ताकि पश्चिम एशिया पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए उसे इस क्षेत्र में एक वफादार पिट्ठू उपलब्ध रहे। पश्चिम एशिया में मुसलमानों का बहुमत है। इन देशों में से कुछ के तानाशाहों और शेखों ने अमरीका से हाथ मिला लिया। कैसी विडंबना है कि दुनिया केसबसे बड़े प्रजातंत्रों में से एकके दोस्त, पश्चिम एशिया और दुनिया के अन्य हिस्सों पर राज कर रहे निर्दयी तानाशाह हैं।
अमरीका हमेशा से ऐसे मौकों की तलाश में रहा जिनका इस्तेमाल वह दुनिया के विभिन्न देशों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए कर सके। तेल-उत्पादक क्षेत्र में अपनी पैठ जमाने के लिए ही अमरीका ने ईरान की प्रजातांत्रिक मोसाडिक सरकार का तख्ता पलटा। मोसाडिक सरकार, तेल के कुओं का राष्ट्रीयकरण करना चाह रही थी और इससे अमरीका और इंग्लैंड की तेल कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ता। इसके कुछ वर्षों बाद, सोवियत सेनाओं ने अफगानिस्तान पर कब्जा कर लिया। रूस के विरुद्ध युद्ध में झोंकने के लिए जुनूनी मुस्लिम युवकों की जरूरत थी और इसके लिए पाकिस्तान में मदरसे स्थापित किए गए। इन मदरसों में मुस्लिम युवकों के दिमाग में यह भरा गया कि हर गैर-मुस्लिम काफिर है और काफिरों को मारना जेहाद है। जबकि सच यह है कि इस्लाम में काफिर का अर्थ होता है सच को छिपाने वाला और अपनी पूरी ताकत से किसी लक्ष्य को पाने का यत्न, जेहाद कहलाता है।
इसके साथ-साथ सेम्युल हटिंगटन केसभ्यताआंे के टकरावके सिद्धांत का जमकर प्रचार किया गया। इस सिद्धांत के अनुसार, सोवियत संघ के पतन के बाद, हमारी दुनिया में टकराव कम्युनिस्ट गुट अमरीकी गुट के बीच नहीं वरन् पिछड़ी हुई इस्लामिक सभ्यता और उन्नत पश्चिमी सभ्यता के बीच होगा।
इस सिद्धांत ने इस्लाम की छवि को गहरा आघात पहुँचाया। इस्लाम को एक पिछड़े हुए धर्म के रूप में देखा जाने लगा जिसके अनुयाई दकियानूस और हिंसक हैं। मदरसों से ऐसे नौजवानों की टोलियाँ तैयार होकर निकलने लगीं जो किसी की जान लेने में जरा भी संकोच नहीं करती थीं। अमरीका ने कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों को आर्थिक मदद दी और उन्हें असलहा भी उपलब्ध करवाया। ईरान में अयातुल्लाह खौमेनी के सत्ता सँभालने के बाद अमरीकी मीडिया ने इस्लाम को दुनिया के लिए नया खतरा बताना शुरू कर दिया। 9/11 के हमले के लिए ओसामा बिन लादेन अल्कायदा को जिम्मेदार ठहराए जाने के बाद से तो इस्लामिक आतंकवाद शब्द का प्रयोग जम कर होने लगा। कहने की जरूरत नहीं कि तो इस्लाम और ही कोई अन्य धर्म निर्दोष, निहत्थे लोगों की हत्या करने की इजाजत देता है। आई0आर00, लिट्टे, उल्फा और खालिस्तानियों ने अपने राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए निर्दोषों का खून बहाया परंतु उनकी गतिविधियों को कभी ईसाई, हिन्दू या सिक्ख धर्म नहीं जोड़ा गया। इस्लाम और मुसलमानों के दानवीकरण की प्रक्रिया का चरम था वह डेनिश कार्टून, जिसमें पैगम्बर मोहम्मद को अपनी पगड़ी में बम छिपाकर ले जाते हुए दर्शाया गया था।

क्रमश:
-राम पुनियानी

बृहस्पतिवार, 27 अक्तूबर 2011

जब तक चोरों, राहजनो का डर दुनिया पर ग़ालिब है


शेरों को आजादी है, आजादी के पाबंद रहे, जिसको चाहें चीरे-फाड़ें, खाए पियें आनंद रहे
सापों को आजादी है हर बसते घर में बसने की, उनके सर में जहर भी है और आदत भी है डसने की
शाही को आजादी है, आजादी से परवाज करे, नन्ही-मुन्नी चिड़ियों पर जब चाहे मश्के-नाज करें
पानी में आजादी है घडियालों और निहंगो को, जैसे चाहे पालें-पोसें अपनी तुंद उमंगो को
इंसा ने भी शोखी सीखी वहशत के इन रंगों से, शेरों, सापों, शाहीनो, घडियालों और निहंगो से
इंसा भी कुछ शेर है, बाकी भेड़ की आबादी है, भेडें सब पाबंद हैं लेकिन शेरों को आजादी है
शेर के आगे भेडें क्या हैं, इक मनभाता खाजा है, बाकी सारी दुनिया परजा, शेर अकेला राजा है
भेडें लातादाद हैं लेकिन सबकों जान के लाले हैं, उनको यह तालीम मिली है, भेडिए ताकत वाले हैं
मांस भी खाएं, खाल भी नोचें, हरदम लागू जानो के, भेडें काटें दौरे-गुलामी बल पर गल्लाबानो के
भेडियों ही से गोया कायम अमन है इस आजादी का, भेडें जब तक शेर बन ले, नाम ली आजादी का
इंसानों में सांप बहुत हैं, कातिल भी, जहरीले भी, उनसे बचना मुश्किल है, आजाद भी हैं, फुर्तीले भी
सरमाए का जिक्र करो, मजदूर की उनको फ़िक्र नही, मुख्तारी पर मरते हैं, मजबूर की उनको फ़िक्र नही
आज यह किसका मुंह ले आए, मुंह सरमायेदारों के, इनके मुंह में दांत नही, फल हैं खुनी तलवारों के
खा जाने का कौन सा गुर है को इन सबको याद नही, जब तक इनको आजादी है, कोई भी आजाद नही
उसकी आजादी की बातें सारी झूठी बातें हैं, मजदूरों को, मजबूरों को खा जाने की घातें हैं
जब तक चोरों, राहजनो का डर दुनिया पर ग़ालिब है, पहले मुझसे बात करे, जो आजादी का तालिब है

-हफीज जालंधरी

बुधवार, 26 अक्तूबर 2011

जनसाधारण के लिए अक्तूबर - क्रान्ति को न जानना या उपेक्षित करना आत्मघाती है


अक्तूबर क्रान्ति को महज कम्यूनिस्टो की क्रांति मानकर राष्ट्र व समाज के मेहनत कशो की अनन्य नियत्रण की सत्ता व्यवस्था की स्थापना वाली क्रांति के रूप में न देखना , जनसाधारण के लिए , मेहनत कश समुदाय के लिए आत्मघाती हो रहा है और आगे भी होगा

1917 में रूस में हुई अक्तूबर क्रांति को याद करने व मनाने की जगह उसे भुलाए जाने का सुनियोजित प्रयास किया जाता रहा है | खासकर पिछले 20 - 22 सालो से | 1989-90 के बाद बची खुची समाजवादी व जनवादी सत्ता व व्यवस्था को उखाड़े जाने के बाद से इसे इन देशो की कम्यूनिस्टो की सत्ता व्यवस्था के अपने आप उखड़ जाने या ढह जाने के रूप में प्रचारित किया गया था | वह प्रचार आज भी जारी है | यह प्रचार रूस और पूर्वी यूरोप की उन सत्ताओ व्यवस्थाओं के असली चरित्र को छिपाने के लिए भी किया जाता रहा है | इसी के अंतर्गत उसे मजदूरों किसानो की या कहिये समाज के मेहनत कशो की सत्ता व्यवस्था के रूप में बताने का काम पिछले 20 - 25 सालो से लगभग बन्द कर दिया गया है | प्रचार इस तरह से चलाया जाता रहा मानो वहा की कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं ने अपने सत्ता - स्वार्थ की पूर्ति के लिए ही उन सत्ताओ व्यवस्थाओं को स्थापित किया था |ऐसा इसलिए किया गया ताकि कम्यूनिस्टो के बारे में ' धर्म - विरोधी ' राष्ट्र - विरोधी ' परिवार -विरोधी ' जैसे प्रचारों के चलते गैर कम्युनिस्ट जनसाधारण इन सत्ताओ - व्यवस्थाओं की विरोधी बने रहे |उसे जनसाधारण की मजदूरों - किसानो की सत्ता व्यवस्था न समझ पाए | आम तौर पर यही होता भी रहा है |
जबकि सच्चाई यह है कि मजदूरों , मेहनतकशो के आम हितो से इतर कम्यूनिस्टो का कोई अपना अलग हित या स्वार्थ नही होता और न ही हो सकता है | ' कम्युनिस्ट घोषणा - पत्र ' में इसे स्पष्ट रूप से घोषित भी किया गया हैं | इसका व्यवहारिक सबूत यह भी है कि अक्तूबर क्रान्ति के उपरान्त कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्त्व में सोवियतो के रूप में संगठित मजदूरों , किसानो व अन्य मेहनतकश हिस्सों के अनन्य नियत्रण की सत्ता स्थापित हुई थी | वह सत्ता मजदूरों , किसानो के दशको तक चले संघर्ष के जरिये वहा की जारशाही सत्ता को और फिर धनाढ्य पूंजीपतियों एवं उच्च वर्गो के हितो - अधिकारों की सत्ता को बलपूर्वक तोडकर और हटाकर स्थापित हुयी थी | फिर यह निजी लाभ - मुनाफ़ा कमाने और निजी धन सम्पति खड़ी करने की सामाजिक व्यवस्था को तोड़ते और हटाते हुए आगे बढ़ी थी | साथ ही वह सामन्तो एवं देशी व विदेशी पूंजीवाद वर्गो की निजी सम्पत्तियों को छीनकर उसे मेहनतकश समाज की सामूहिक सम्पति बनाते हुए तथा उसके जरिये समाज की मानवीय आवश्यकताओ की अधिकाधिक पूर्ति करते हुए आगे बढ़ी थी | खासकर 1917 से लेकर 1956 तक के सुधारों , संशोधनों से पहले के पूरे दौर में | इस उद्देश्य से अक्तूबर -क्रांति द्वारा स्थापित सत्ता - व्यवस्था ने पूंजी वादी धनाढ्य वर्गो द्वारा दूसरो को मजदूर ( तथा दास या अर्द्ध दास ) बनाकर काम करवाने , और धन सम्पत्ति बढाने की सदियों से चली आ रही प्रणाली का अन्त कर दिया था | मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अंत कर दिया था |दुसरो को मजदूर रखने और स्वंय श्रम न करने को दंडनीय अपराध घोषित कर दिया था | इसीलिए मेहनतकशो के सामूहिक हितो की पूर्ति के लिए बनी इस क्रांतिकारी समाजवादी सत्ता व्यवस्था में शासक पार्टी के रूप में विद्यमान कम्युनिस्ट पार्टी के नेता न तो स्वंय निजी तौर पर धन - पैसा - पूंजी कमा सकते थे और न ही उसके लिए किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को करवाने की छूट दे सकते थे | इसीलिए कोई कम्युनिस्ट नेता निजी तौर पर न तो जमीन , जायदाद तथा कल - कारखाने आदि का मालिक बना औरं न ही बन सकता था |जबकि हम यह बात स्पष्ट तौर पर देख रहे है कि जनतांत्रिक सत्ता - व्यवस्था के संचालन नियंत्रण में लगी पार्टियों के लोग निजी हितो को हर तरह से बढाने में , उसके लिए हर तरह के भ्रष्टाचार करने में कही से पीछे नही रहते | कयोंकि वे जन्त्रंत्र के नाम से देश व समाज के धनाढ्य वर्गो के निजी लाभ व निजी मालिकाने को बढाने में लगे रहते है और उसका फल अपने निजी चढत -बढत के रूप में हासिल कर लेते है | इसीलिए और इसी के साथ धनाढ्य वर्गो के हितो कि पूर्ति के लिए मजदूरों , किसानो एवं अन्य साधारण मध्यम वर्गियो के नाम मात्र के अधिकारों व सम्पत्तियों को भी काटने घटाने का काम निरंतर करते रहते है |
इसका सबूत आप सभी जनतांत्रिक या गैर- जनतांत्रिक शेख शाही व सैन्य शाही शासन व्यवस्थाओं में देख सकते हैं | मध्य युगीन और आधुनिक काल के भारत में इसका सबूत हर जगह मौजूद है |देश की वर्तमान व्यवस्था में जनतंत्र का यही दोहरा और परस्पर विरोधी चेहरा एकदम प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने मौजूद है | अल्पसख्यक धनाढ्यो के खुशहाल भारत और बहुसख्यक मेहनतकशो की बदहाल भारत के रूप में |अक्तूबर क्रांति से पहले जारशाही रूस भी ऐसा ही था और अब 1989 -90 के बाद समाजवादी सत्ता व्यवस्था के उखाड़े जाने के बाद जनतांत्रिक कहा जाने वाला रूस भी अमीरों को रूस व गरीबो के रूस में , अमीरों को बढाने और गरीबो को दबाने वाले रूस में तथा राज व समाज में हर तरह के भ्रष्टाचार को बढावा देने वाले रूस में बदलता जा रहा है या कहिये की बदल गया है |
यह काम इस देश या वर्तमान रूस व अन्य देशो की कुनीतियो , कुशासनो , के चलते नही हो रहा है | बल्कि इस देशो के समाज में बहुसख्यक गरीब एवं मेहनतकश हिस्से के साथ अल्पसख्या में धनाढ्य एवं उच्च वर्गो की मौजूदगी के फलस्वरूप हो रहा है | देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो द्वारा अपने आधुनिक साधनों , पूंजियो तकनीको और उसे बढाने के छुट , अधिकारों के जरिये आम किसानो , मजदूरों व अन्य जनसाधारण की सम्पत्तियों को छीनते जाने तथा उन्हें मजदूर व मजबूर बनाये जाने के फलस्वरूप हो रहा है | देशो की जनतांत्रिक या किसी नाम की सत्ता सरकार की ताकत से देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो के शोषण , लूट व प्रभुत्व को संचालित करने के चलते हो रहा है | मालिको एवं मेहनतकशो में बटे समाज में यही होना भी हैं | यही होता आया है | क्योंकि साधन सम्पन्न मालिको और साधनहीन बनते जनसाधारण के हितो में , न हल किया जा सकने विरोध मौजूद हैं | इस विरोध का समाधान इतिहास में गुलाम मालिको , फिर राजाओं बादशाहों , जमीदारो को और उनके मालिकाने व प्रभुत्व की व्यवस्था को हटाकर किया गया था | वही समाधान वर्तमान दौर के पूंजिवान वर्गो और उनकी बाजारवादी सत्ता व्यवस्था के प्रति भी किया जाना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हैं | अत:इतिहास से सबक लेकर देश दुनिया की जनसाधारण के लिए , मेहनतकशो के लिए , धनाढ्य वर्गो के विरुद्ध तथा उनके मालिकाने व अधिकार के विरुद्ध निर्मम संघर्ष चलाने के अलावा कोई अन्य रास्ता नही बचता है |धनाढ्य वर्गो के लिए जनतांत्रिक पर मेहनतकशो के लिए आमतौर पर तानाशाही सत्ता व्यवस्था को हटाना अनिवार्य एवं अपरिहार्य है | मेहनतकशो के लिए जनतांत्रिक पर धनाढ्य एवं उच्च वर्गो पर तानाशाही लगाने वाली सत्ता व्यवस्था की स्थापना भी अनिवार्य एवं अपरिहार्य है | अक्टूबर क्रांति ने यही किया था | इसीलिए दुनिया के धनाढ्य वर्गो द्वारा खासकर अमेरिकी इंग्लैण्ड जैसे देशो के साम्राज्यी ताकतों द्वारा रूस और पूर्वी यूरोप के देशो में स्थापित मेहनतकशो के समाजवादी एवं जनवादी सत्ता व्यवस्था के बारे में हर तरह के कुप्रचार करते रहे हैं | उसे उखाड़ फेकने के हर हरबे - हथकंडे अपनाते रहे है | इसी के फलस्वरूप साम्राज्यी ताकतों द्वारा इन समाजवादी सत्ताओ व्यवस्थाओं को उखाड़ा भी गया है | लेकिन यह काम खुद इन देशो में शिक्षा - ज्ञान , शासन - प्रशासन में दक्ष और 1989 - 90 के दौर में मौजूद उच्चता प्राप्त तबको के साथ सहयोग से किया गया | ठीक ऐसे ही बौद्धिक शासकीय हिस्सों द्वारा लूटेरी साम्राज्यी कम्पनियों को उनकी पूंजी व तकनीक को छूट देते हुए देश के आम जनता के हितो को 1991 से खुलेआम काटा जाता रहा है | देश की स्वतंत्रता एवं आत्म निर्भरता का प्रचार भी चलता रहा और उसे विदेशी संबन्धो पे खुलेआम परनिर्भर व परतंत्र बनाने का काम भी होता रहा | समाजवादी एवं जनवादी सत्ताओ , व्यवस्थाओं को हटाने के बाद अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी ताकते पिछड़े देशो पर , , इन देशो के जनसाधारण लोगो के हिस्सों पर खुलेआम हमला कर रही है | इसलिए इस देश के जनसाधारण के लिए भी अपने वर्गीय हितो को जानना , समझना व उसे हासिल करने के लिए अक्तूबर - क्रांति के रास्ते पर चलना अनिवार्य एवं अपरिहार्य हो चुका है | अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसी साम्राज्यी ताकतों के शोषणकारी प्रभुत्वकारी संबंधो , नीतियों , प्रस्तावों आदि से राष्ट्र को पूरी तरह मुक्त कराए जाने का काम अब अनिवार्य हो चुका है |
इसी के साथ साम्राज्यी ताकतों के सहयोगी व हिमायती बने इस देश के धनाढ्य एवं उच्च वर्गो पर भी कठोरतम नियंत्रण लगाना भी अनिवार्य हो चुका है |
इसीलिए अक्तूबर क्रांति को महज कम्यूनिस्टो की क्रांति मानकर राष्ट्र व समाज के मेहनतकशो द्वारा मेहनतकशो के हित और मेहनतकशो की अनन्य नियंत्रण की सत्ता व्यवस्था की स्थापना वाली क्रांति के रूप में न देखना , जनसाधारण के लिए मेहनतकश समुदाय के लिए आत्मघाती साबित हो रहा है और आगे भी होगा | इसी के साथ धूमिल की कुछ पक्तिया याद आ रही है |
यह तीसरा आदमी कौन है?

एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूं--
'यह तीसरा आदमी कौन है ?'
मेरे देश की संसद मौन है।
- धूमिल

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

क्रान्तिधर्मी चेतना का शायर: फैज

हमारा इस बात में दृढ़ विश्वास है कि साहित्य बहुत गहराई से मानवीय नियति के साथ जुड़ा है। स्वतत्रंता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता के बिना साहित्य का विकास संभव नहीं है, उपनिवेशवाद और नस्लवाद का समूल नाश साहित्य की सृजनात्मकता के संपूर्ण विकास के लिए बेहद जरूरी है।
उपर्युक्त विचार क्रान्तिधर्मी चेतना के शायर फै़ज अहमद ‘फ़ैज’ के हैं। यह विचार उन्होंने सन् 1983 में ताशकन्द में आयोजित एफ्रो एशियाई लेखक संघ की रजत जयन्ती के अवसर पर व्यक्त किए थे, जो उनके व्यक्तित्व और तदनुरूप कृतित्व पर ज्यों का त्यों चस्पा की जा सकती है क्योंकि उनके जीवन और रचना में फाँक बेहद कम है।
सन् 2011 जहाँ हिन्दी साहित्य में क्रान्तिकारी परिवर्तन लाने वाले कतिपय महत्वपूर्ण लेखकों अज्ञेय, शमशेर, नागार्जन प्रभृत के शताब्दी वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है वहीं पर हिन्दी-उर्दू जगत में समान रूप से समादृत और लोकप्रिय शायर फै़ज़ और मज़ाज़ जैसी शख्सियतों को विभिन्न हलकों में शिद्दत के साथ याद किया जा रहा है।
फिलवक़्त उर्दू-हिन्दी अनुवादक के रूप में ख्याति प्राप्त विद्वान शकील सिद्दीकी द्वारा संपादित पुस्तक ‘फैज अहमद ‘फैज’ शख्स और शायर (पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस लि0 नई दिल्ली, मूल्य रू0 80/00) पर कुछ विचार।
यूँ तो फैज के आकर्षक चित्र से युक्त पुस्तक पढ़ने के क्रम में ज्यों ही पहले पन्ने का साक्षात्कार होता है, ‘हम मेहनतकश जग वालों से जब अपना हिस्सा माँगेंगे। इक खेत नहीं, एक देश नहीं, सारी दुनियाँ माँगंेगे।’ संपादक का, शायर फैज के प्रति उनका प्रतिबद्ध प्रगतिशील दृष्टिकोण का ऐलान कहा जा सकता है। जिसे अन्तिम पृष्ठ पर उसे पूरे का पूरा छापा गया है। बेशक! उनकी शायरी का यह एक रंग और अहम हिस्सा है। किन्तु फैज सिर्फ इतना ही नहीं और भी कुछ हैं, जो इसमे नहीं है। उनकी शायरी के वे हिस्से, शेड्स कम महत्वपूर्ण नहीं जिसमें उन्होंने अपने समाज से पे्रम, मोहब्बत और तमाम वैयक्तिक जज्बातों को शेरों के रूप मंे व्यक्त किया है, किन्तु यह बात बहस तलब है।
इससे बेहतर बात यह है कि शकील सिद्दीकी ने अपनी इस संपादित पुस्तक में शायर फैज को उनकी सम्पूर्णता मंे, पूरी जीवन्तता के साथ उन्हें पकड़ने का सराहनीय प्रयास किया है। जहाँ एक ओर इस मंे उन्होंने उनकी 38 गजलों, नज्मों, शेर और तरानों को संकलित कर उनकी शायरी के कमोबेश सभी महत्वपूर्ण पहलुओं से पाठक को उनका परिचय कराने का प्रयत्न किया है वहीं पर उन्होंने उनके व्याख्यान (जिसका एक हिस्सा ऊपर उद्धृत है) वक्तव्य, आत्मकथ्य, उनकी पत्नी एलिस फैज तथा उनकी पुत्री सलीका हाशमी का साक्षात्कार, भीष्म साहनी, शमीम फैजी और यासिर अरफात के लेखों के जरिए उनके संघर्षशील जुझारू व्यक्तित्व को समझने के साथ उनकी शायरी की बनावट और बुनावट तथा वैचारिकी को समझने में काफी मददगार साबित हुए हैं। इसे समझने के लिए लेखक के आत्मकथ्य का देखना जरूरी है।
‘शुरू मंे ख़याल हुआ हम क्रिकेटर बन जाएँ, फिर जी चाहा उस्ताद बन जाएँ। रिसर्च करने का शौक था। अन्ततः उस्ताद बनकर अमृतसर चले गए। हमारी जिन्दगी का शायद सबसे खुशगवार जमाना अमृतसर का ही था। मजदूरों में काम शुरू किया। सिविल लिबर्टीज की एक अंजुमन बनी तो उसमें काम किया।’
यह कथन यह सिद्ध करता है कि उनकी आशाओं, आकांक्षाओं के अनुरूप उन्हें जिन्दगी नसीब न हो सकी। इसका मलाल भी कहीं निश्चय ही उन्हें रहा होगा जो उनकी शायरी के पहले दौर में अभिव्यक्ति पा सका है। मजदूरों में काम, संघर्ष जद्दोजहद, तरक्की पसंद संगठनों के साथ उनके नजरिये को अपनाकर उन्होंने समाज और देश की जनता के लिए अपना जीवन और अपनी शायरी को समर्पित किया था। यही उनकी महानता है। शायद इसीलिए भीष्म साहनी ने ‘यादे फैज’ में लिखा है कि एक कवि की रचना धर्मिता और उसी ऊँचाई की उसकी संगठन व संचालन क्षमता उसकी व्यावहारिक बुद्धि का परिचायक है।
आज के दौर में फैज को आम फहम बनाने में उनके व्यक्तित्व का यह पहलू भी कम अहम नहीं है। इसके लिए उनके प्रारंभिक उद्धरण पर ध्यान देना ही पर्याप्त होगा कि उन्होंने उपनिवेशवाद, नस्लवाद और विभिन्न देशों में बढ़ रहे साम्राज्यवादी दृष्टिकोण का, विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर, अपनी शायरी के माध्यम से पुरजोर विरोध किया है। कदाचित शकील सिद्दीकी ने ‘फैज-अवाम के अरमानों सपनों का शायर’ में सच ही कहा है कि फ़ैज़ ने एक साथ जुल्म व नाइंसाफी के खिलाफ उठ खडे़ होने तथा दर्द के बढ़ते जाने को शैलीब्रेट तथा उनसे नई ऊर्जा हासिल करने का हौसला दिया है। जिसका परिणाम उन्हें देश निकाला के रूप में भुगतना पड़ा। वे भारत की शरण में आए, यदि वह हिस्सा भी पुस्तक का अंग बनता तो पुस्तक भारतीय जन आंकाक्षाओं के अनुरूप ज्यादा स्वागत योग्य होती। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि शकील सिद्दीकी जैसे विद्वान ने भी उनके गद्य और संपादन कला के प्रति दूसरों की तरह चुप्पी ही साधी है। एक रस्म अदायगी भरा काम ही उनका यह कहा जाएगा। अगर इस उपमहाद्वीप में लोकप्रियता की बात हो तो दावे के साथ यह कहना कठिन है कि वे मिर्जा गालिब या कुर्रतुल ऐन हैदर के समकक्ष हैं किन्तु इतना निश्चित ही कहा जा सकता है कि वर्तमान युग में एक बेहद जरूरी समझे जाने वाले शायर हैं।

-महन्त विनय दास
मो0: 9935323168 (समीक्षक)

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

अदालतें भ्रष्टाचार से मुक्त हों

न्यायपालिका के पास विशाल शक्तियाँ है क्योंकि वह जो कहती है अंतिम बात होती है, अचूक एवं अमोघ। इतनी शक्तिशाली है न्यायपालिका कि जब कार्यपालिका का कोई अधिकारी कानून का उल्लंघन करता है तो जज उसके आदेश को निरस्त कर सकते हैं और हुक्मनामे की अपनी ताकत से दिशा-निर्देश दे सकते हैं। जब संसद कोई कानून पास करती है और कानून का अतिक्रमण कर देती है या मौलिक अधिकारों की सीमाओं से बाहर निकल कर आदेश जारी करती है तो अदालत उस आदेश और कार्रवाई को खारिज कर सकती है। पर जब उच्च न्यायालय कानून के बेरोकटोक उल्लंघन के अपराधी हों तो उनकी इस चूक, उनकी इस गलती के लिए कोई तरीका है संहिता। हर संविधान का एक सामाजिक दर्शन होता है, खासकर भारत के संविधान का एक सामाजिक दर्शन है। हम एक समाजवादी लोकतांत्रिक गणतंत्र हैं। यदि संविधान के इन आदेशों का उल्लंघन होता है और जजों से जिस तरह के बर्ताव की उम्मीद की जाती है वे उस बर्ताव को धता बता देते हैं तो किसी को अधिकार नहीं कि उन्हें सही रास्ते पर लाए और उनके दुराचार को ठीक करे।
“जज लोग तत्वतः दूसरे सरकारी अधिकारियों से कुछ अलग नहीं हैं। न्यायिक ड्यूटियों पर आकर भी सौभाग्य से वे इंसान बने रहते हैं। अन्य इंसानों की तरह उन पर भी समय-समय पर गर्व और मनोविकारों का, तुच्छता एवं चोट खाई भावनाओं का, गलत समझ या फालतू जोश का असर पड़ता है।”
-ह्यूगो ब्लैक
अपनी पुस्तक में डेविड पैमिक जजों के बारे में लिखते हैंः
“अमरीका के सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस जैक्सन ने 1952 में टिप्पणी की कि “जो लोग कुर्सी पर पहुँच जाते हैं कभी-कभी घमंड, गुस्सेपन, तंग नजरी, हेकड़ी और हैरान करने वाली कमजोरियों जैसी उन कमजोरियों का परिचय देते हैं जो इंसानियत को विरासत में मिली हुई है। यह हैरानी की बात होगी, असल में चिंताजनक बात होगी कि जो प्रख्यात मस्तिष्क वाले लोग इंग्लैंड की न्यायपालिका में हैं वे अपने अवकाश, जो उन्हें विरले ही मिलता है, के दिनों में गैरन्यायिक तरीके से काम करें। हाल में लॉर्ड चांसलर हेल्शाम ने स्वीकार किया, उन्होंने कहा कि जो लोग जज की कुर्सी पर बैठते हैं कभी वे उस चीज का शिकार हो जाते हैं जिसे जजी का रोग कहते हैं अर्थात एक ऐसी हालत जिसके लक्षण हैं तड़क-भड़क, चिड़चिड़ापन, बातूनीपन, ऐसी बातें कहने की प्रवृत्ति जो मामले में फैसला करने में जरूरी नहीं होती और शार्टकट का रुझान।”
दुख की बात है कि कानून के अंदर महाभियोग-जो इस बीमारी को बढ़ने से रोकने के लिए एक राजनैतिक इलाज है- के अलावा इसका अन्य कोई इलाज नहीं। इन चिंताजनक बातों से भी बदतर बात है वह जो लार्ड एक्शन ने कही है- ”सत्ता भ्रष्ट बनाती है और चरम भ्रष्ट बनाती है।” लोकतंत्र में लोगों को न्यायपालिका की आलोचना करने का अधिकार है जिससे पारदर्शी, स्वतंत्र, अच्छे व्यवहार वाली, पक्षपात से दूर और हर किस्म की कमजोरियों से मुक्त होने की अपेक्षा की जाती है। कितना भी महत्वपूर्ण मामला क्यांे न हो हर विवाद मंे जज जो फैसला करते हैं वह उस संबंध में अंतिम फैसला होता है। अतः जजों का चयन जाँच-पड़ताल के बाद और उनकी वर्ग राजनीति और वर्ग पूर्वाग्रहों के समीक्षात्मक मूल्यांकन के बाद हद दर्जे की सावधानी के साथ किया जाना चाहिए। (देखिए, पोलिटिक्स ऑफ जुडिशयरी, लेखक प्रो. ग्रिफिथ)।
“जज लोग आप कहाँ निष्पक्ष हैं?” आप सभी कर्मचारियों की तरह उसी गोल चक्कर में चलते रहते हैं और नियोक्ता लोग जिन विचारों में शिक्षित हुए हैं और पले-बढ़े हैं आप लोग भी उन्हीं मंे शिक्षित हुए और पले-बढ़े हैं। किसी मजदूर या टेªड यूनियन कार्यकर्ता को इंसाफ कैसे मिल सकता है? जब विवाद का एक पक्ष आपके वर्ग का होता है और दूसरा आपके वर्ग का नहीं होता तो कभी-कभी यह सुनिश्चित करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि आपने इन दो पक्षों के बीच स्वयं को पूरी तरह निष्पक्ष स्थिति में रखा है।”
- लॉर्ड जस्टिस स्क्रटून
न्याय और न्यायतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है भ्रष्टाचार, साम्प्रदायिकता और भाई-भतीजावाद। हाल के दिनों में न्यायापालिका में भ्रष्टाचार बहुत अधिक बढ़ा है यहाँ तक कि सर्वोच्च स्तर पर भी। गुनाहगार जजों पर संसद में महाभियोग का तरीका पूरी तरह नाकाफी और बेकार साबित हुआ है, इसका ज्वलंत उदाहरण है रामास्वामी का मामला। प्रशांत भूषण ने
न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार का जो आरोप लगाया है, और जिसका समर्थन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस वर्मा ने किया है, क्या उसमें रत्तीभर भी अतिशयोक्ति है? जजों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप दिन दूना रात चैगुना बढ़ते ही जा रहे हैं। महाभियोग इनका कतई कोई समाधान नहीं है। अदालतों में बकाया पड़े-मुकदमों का अम्बार बढ़ता जा रहा है, पार्किन्सन्स कानून (संख्या बढ़ा दो) और पीटर प्रिंसिपल (अयोग्यता में वृद्धि)। कोई इलाज नहीं, इसका इलाज है नियुक्ति आयोग (अपॉइटमेंट कमीशन) और एक ऐसा कार्य निष्पादन आयोग (परफार्मेन्स कमीशन) जिनके पास काफी अधिक शक्तियाँ हों। नियुक्ति आयोग के पास यह शक्ति हो कि वह कार्य पालिका द्वारा नियुक्ति के लिए सुझाए गए नामों को खारिज कर सके और नियुक्ति से पहले उनके नाम सार्वजनिक कर सके। परफार्मेन्स कमीशन के पास जजों के दुराचार के खिलाफ जाँच करने की और दोषी पाए जाने पर उन्हें बर्खास्त करने की शक्तियाँ हों। ये चीजें संविधान में संशोधन कर न्यायिक आचरण संहिता का हिस्सा होना चाहिए। प्रस्तावित उम्मीदवार के बारे में कुछ कहने का अधिकार हर नागरिक को होना चाहिए। क्यों?
एक रोमन कहावत हैः जिस चीज का हम सब पर असर पड़ता है उसका फैसला सबके द्वारा होना चाहिए। हमारी न्यायापालिका अभी भी एक प्रतिष्ठित संस्था है। उनके नियतकालिक पाठ्यक्रम होने चाहिए ताकि वे अपने विषय में पूरी तरह पारंगत रहें।

-वी0आर0 कृष्णा अय्यर

रविवार, 23 अक्तूबर 2011

माओवाद, आधुनिकतावाद और हिंसाचार- अंतिम भाग

आज भारत में नव्य उदारतावाद का एजेण्डा पिट चुका है। दूसरा कारण है माओवादी आंदोलन का चंद क्षेत्रों तक सीमित हो जाना। हिन्दुस्तान के अन्य वर्गों की समस्याएँ उनके आंदोलन के केन्द्र में नहीं हैं। वे राजनेताओं और विभिन्न राजनैतिक दलों की नीतियों को खारिज करते हैं। कल तक माओवादियों के अंदर एक हिस्सा था जो लोकतंत्र को नहीं मानता था लेकिन अब वे चुनावों में भाग लेते हैं।
आज माओवादियों के सामने संकट यह है कि नव्य उदारतावाद के खिलाफ उनका संघर्ष किसानों से लेकर मध्यवर्ग तक अपील खो चुका है। दूसरी ओर बुर्जुआ उदार लोकतंत्र की साख में भी बट्टा लग चुका है। समाजवाद के अधिकांश मॉडल पिट चुके हैं ऐसी अवस्था में माओवादी समझ नहीं पा रहे हैं कि क्या करें?
माओवादियों ने हाल के वर्षों में नव्य उदारतावाद के खिलाफ संघर्ष करके जो जमीन बनाई थी वह ग्लोबल एजेण्डा पूरी तरह पिट गया है। यह अमरीकी ग्लोबल एजेण्डा था। आज जब अमेरिका में इस एजेण्डे का अंत हुआ है तो स्वाभाविक तौर पर सारी दुनिया में इसकी विदाई की घोषणा हो गई है।
नव्य उदारतावाद की विदाई की बेला में माओवादियों के पास सही एजेण्डे का अभाव है, यही बुनियादी वजह है जिसके कारण वे अंधाधुंध हत्याएँ कर रहे हैं। यह उनके दिशाहीन होने का संकेत है। माओवादियों का हिंसाचार 2001 के बाद से क्रमशः बढ़ा है और यह उनके एजेण्डे के पिटने का संकेत है।
माकपा और वामदलों ने नव्य उदारतावाद के बरक्स अपनी राजनीति में संतुलन पैदा किया और विकल्प का मार्ग चुना और इस दौर में नव्य उदारतावाद के संदर्भ में नए नीतिगत उपाय लागू कराने में सफलता हासिल की। नव्य उदारतावाद के पिटते ही सोनिया-राहुल गांधी भी किसानों के हितों का ख़याल रखने की बातें करने लगे हैं। आज सोनिया और माओवादियों में किसानों की जमीन के मामले में एक ही स्वर दिखाई दे रहा है। अब वे जमीन
अधिग्रहण के मामले में नया सख्त कानून लाना चाहते हैं। लेकिन अधिकांश राज्यों में किसानों की लाखों एकड़ जमीन तो कारपोरेट घराने खरीद चुके हैं। कानून ही लाना था तो 10 साल पहले क्यों नहीं लाए?
माओवादी संगठनों के हिंसाचार का एक अन्य कारण है भारत में खासकर आदिवासी इलाकों में लोकतंत्र में जनता की व्यापक शिरकत। लोकतंत्र में व्यापक शिरकत के कारण ही वे लाख प्रचार करके भी साधारण लोगों को वोट ड़ालने से रोक नहीं पाए हैं। यही वजह है कि वे गरीबों की अंधाधुंध हत्याएँ कर रहे हैं। उल्लेखनीय है नव्य उदारतावाद के लाख दोष हों लेकिन आम आदमी की चेतना और शिरकत में कई गुना वृद्धि हुई है। संचार क्रांति ने क्रांति के सभी रूपों को फीका बना दिया है। बुर्जुआ लोकतंत्र के प्रति आकर्षण बढ़ा है।

समाप्त

जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो0: 09331762360