शनिवार, 31 दिसम्बर 2011

ममता, माओवाद और आतंक - 4

मसलन् माओवादी संगठन हिंसा ममता, माओवाद और आतंक के जरिए असुरक्षा का वातावरण बनाते हैं, और इस तरह वे पुलिसबलों को अत्याधुनिक हथियारों से लैस करने की जरूरत का एहसास तेज करते हैं। माओवादी या आतंकी हमलों के बाद यह माँग उठती रही है कि अत्याधुनिक हथियार खरीदे जाएँ, अत्याधुनिक संचारप्रणाली खरीदी जाए, पुलिसबलों को और भी सशस्त्र किया जाए। फलतः केन्द्र सरकार के विकासफंड का बहुत बड़ा हिस्सा सुरक्षामद में खर्च हो जाता है और देश में विकास के लिए पैसे का अभाव बना रहता है।
सामाजिक असुरक्षा और अस्थिरता का सब समय बने रहना, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए बेहद जरूरी है। इसे बहाना बनाकर हथियार और संचार उपकरण बेचने में उन्हें सुविधा होती है, वहीं दूसरी ओर केन्द्र सरकार को भी दबाव में रखने में मदद मिलती है। इस तरह के संगठनों के माध्यम से प्रच्छन्नतः ड्रग कार्टेल, शस्त्र निर्माता बहुराष्ट्रीय कंपनियों, संचार कंपनियों को अपना कारोबार बढ़ाने में मदद मिलती है।
माओवादी विचारधारा के नाम पर जो संगठन सक्रिय हैं उनका माओ के विचारों से कोई लेना देना नहीं है। इस संदर्भ में उन्हें छद्म माओवादी कहना समीचीन होगा। माओवादी जिन इलाकों में रहते हैं वहाँ सामान्य जनजीवन ठप्प हो जाता है। वहाँ दहशत का माहौल रहता है। दहशत के माहौल में सबसे बड़ी क्षति लोकतंत्र की होती है। राजसत्ता और प्रशासनिक मशीनरी निष्क्रिय हो जाती है और ये चीजें बहुराष्ट्रीय निगमों के वैचारिक लक्ष्य को पूरा करने में मदद करती हैं। वे भारत में निष्क्रिय लोकतंत्र देखना चाहते हैं और माओवादी यह काम बड़े कौशल के साथ करते हैं।
यह अचानक नहीं है कि नव्य उदारीकरण के दौर में बहुराष्ट्रीय निगमों की शक्ति बढ़ी है, वहीं दूसरी ओर माओवादियों की भी शक्ति में इजाफा हुआ है। केन्द्रीय गृहमंत्रालय की 2010 की एक रिपोर्ट के अनुसार सन् 2001 में 54 जिलों में माओवादी सक्रिय थे आज 230 से ज्यादा जिलों में सक्रिय हैं। संक्षेप में हम माओवाद के मीडिया कवरेज को भी समझ लें।
माओवादी संगठनों के बारे में मीडिया में आने वाली सूचनाएँ हमें माओवाद के बारे में कम उनके हिंसाचार के बारे में ज्यादा जानकारी देती हैं। आधुनिक सूचना क्रांति की यह सामान्य विशेषता है कि वह सूचना का विभ्रम पैदा करती है।यह दावा किया जा रहा है कि सूचना के जरिए सब कुछ बताया जा सकता है। सूचना में सभी प्रश्नों के जबाव होते हैं। लेकिन प्रसिद्ध मीडिया विशेषज्ञ बौद्रिलार्द ने इस प्रसंग में लिखा है कि सूचनाओं से हमें ऐसे सवालों के जबाव मिलते हैं जो उठाए ही नहीं गए हैं। तथाकथित मीडिया क्रांति-नेट क्रांति आदि के माध्यम से आनेवाली माओवादी संगठनों की सूचनाएँ हमें माओवादी संगठनों से जुड़े बुनियादी सवालों या प्रासंगिक सवालों का कोई उत्तर नहीं देतीं।
माओवादियों की जो इमेज मीडिया में आई है उससे उनकी वास्तविक इमेज सामने नहीं आती बल्कि निर्मित इमेज सामने आती है। नकली इमेज सामने आती है। इन इमेजों से माओवाद का आख्यान समझ में नहीं आता। माओवादी हिंसा जब होती है तब ही मीडिया में माओवादी संगठनों की कोई खबर सामने आती है। इससे यही आभास मिलता है कि माओवादी हिंसक हैं।
हिंसा की इमेज असल में माओवाद का हाइपररीयल यथार्थ है इसका वास्तव में यथार्थ से अंशमात्र संबंध है। जिस तरह उपभोक्ता मालों के विज्ञापनों की इमेज देखकर, बाजार में भीड़ देखकर, दुकानों में ठसाठस भरे माल देखकर यह कहना कि भारत बहुत समृद्ध है, यहाँ मालों की कोई कमी नहीं है। यह बात हाइपररीयल है। इसका भारत के यथार्थ से कोई संबंध नहीं है।
मीडिया इमेजों में हमें हाइपररीयल और रीयल में अंतर पैदा करना चाहिए। अमूमन मीडिया में हाइपररीयल इमेजों की वर्षा होती है और इसके आधार पर यथार्थ के बारे में सही समझ बनाना संभव नहीं होता। बाजार में भीड़, क्रेताओं ने दुकानों को सब समय घेरा हुआ है, दुकान में माल भरे हैं, ये सारी चीजें यह सूचना नहीं देतीं कि भारत में चीजों का सरप्लस उत्पादन हो रहा है। इनसे यह भी पता नहीं चलता कि भारत के नागरिक की क्रयक्षमता क्या है?
उसी तरह भारत में माओवादी इमेजों में हाइपररीयल और रीयल में अंतर करने की जरूरत है। मीडिया में माओवादी हिंसा की जो इमेज दिखाई जाती है वह वास्तविक नहीं है बल्कि संकेत या प्रतीक या साइन मात्र के रूप में सामने आती है।
माओवादी संगठनों का सबसे ज्यादा विस्तार ऐसे समय में हुआ है जब दक्षिणपंथी भाजपा, दक्षिणपंथी मिलीटेंट और जातिवादी संगठनों की राजनैतिक शक्ति में सबसे ज्यादा इजाफा हुआ है। माओवादियों ने अपनी प्रमुख क्रीडास्थली के रूप में उन राज्यों में तेजी से विकास किया है जहाँ भाजपा का शासन है या भाजपा तेजी से मजबूत हुई है। पश्चिम बंगाल में भी ममता बनर्जी के राजनैतिक उदय के समय में माओवादी संगठनों की शक्ति में अभूतपूर्व विकास हुआ है।
अतिदक्षिणपंथ के मिलीटेंट राजनैतिक प्रत्युत्तर के रूप में माओवादी संगठनों ने अपील पैदा की है। खासकर बुद्धिजीवियों में अपील पैदा करने में उन्हें सफलता मिली है। आज के माओवादी हों या पुराने नक्सलवादी हों ,ये मूलतः अतिदक्षिणपंथी राजनीति के सिक्के के दूसरे पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस अर्थ में ये कारपोरेट राजनीति के एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यह भी कह सकते हैं कि माओवादी मूलतः अतिदक्षिणपंथी राजनीति की औलाद हैं। याद करें स्वतंत्र भारत में अतिदक्षिणपंथ का सबसे पहला आक्रामक उभार 60-70 के बीच में ही देखा गया और उस समय नक्सलबाड़ी हुआ। दूसरा बड़ा उभार रामजन्मभूमि आंदोलन के साथ पैदा हुआ और इसने भारत में दक्षिणपंथी राजनीति को सम्मानजनक स्थान दिला दिया।इसके समानान्तर माओवादी आतंक और विभिन्न किस्म के आतंकी संगठनों ने जन्म लिया।
माओवादी हिंसा की इमेज का मीडिया में प्रसारण उनके प्रति नफरत पैदा नहीं करता बल्कि उनके प्रति हमदर्दी पैदा करता है। हिंसा की इमेज के साथ यह प्रचारित किया जाता है कि जिस इलाके म हिंसा की घटना घटी है उस इलाके में सड़क नहीं है, पानी नहीं है, सामान्य नागरिक सुविधाएँ नहीं हैं। यानी माओवादी हिंसा की इमेज के साथ एक-दूसरे किस्म का विचार धारात्मक शोषण आरंभ हो जाता है जिसकी दर्शक ने कल्पना तक नहीं की थी, अब दर्शक को जिससे घृणा करनी चाहिए उससे वह प्रेम करने लगता है। इस अर्थ में माओवादी कवरेज माओवादियों के प्रति हमदर्दी पैदा करता है। यह कारपोरेट विचार धारा और माओवाद का प्रेम संबंध है। माओवादी हिंसा की इमेज में जो चीज सामने ज्यादा आती है वह है हिंसा से बड़ी राजसत्ता जनित हिंसा, जो उपेक्षा के गर्भ से पैदा होती है।
माओवादियों का अहर्निश हिंसा करना, अपने से भिन्न राजनीति करने वाले को कत्ल कर देने का भावबोध मूलतःधार्मिक उन्मादी (फैनेटिक) के भावबोध से मिलता-जुलता है। माओवादी कार्यकर्ता सीधे हिंसा करते हैं, निर्दोष लोगों को कत्ल करते हैं, उनको हीरो या नायक के रूप में माओवादी सम्मान देते हैं। यह वैसे ही है जैसे भिण्डरावाले या बिनलादेन को उनके भक्त पूजते हैं। यानी माओवादी हिंसा के कवरेज में मीडिया के चरित्र के कारण कातिल नायक हो जाता है और निर्दोष व्यक्ति जालिम या जुल्मी-शोषक-उत्पीड़क हो जाता है। यही वजह है कि माओवादी हिंसा का कवरेज उनके लिए मददगार साबित होता है।
प्रत्येक माओवादी हिंसा या कत्ल के बाद उनको समझना और भी मुश्किल हो जाता है। वे हिंसा करते हैं अपना संदेश देने के लिए, लेकिन उनका संदेश प्रत्येक हिंसा या कत्ल के बाद और भी जटिल हो जाता है। उन्होंने हिंसा क्यों की? उसके तर्क और भी मुश्किल क्यों होते चले जाते हैं? यह हिंसा अंततः नागरिक के चिंतन को कुंद करता है। वे हिंसा के जरिए माओवाद का प्रतीकात्मक विनिमय करते हैं। हिंसा उनकी राजनीति का अंतिम बिन्दु नहीं है बल्कि यहाँ से तो बात आगे जाती है। यानी माओवाद में कत्ल समापन नहीं है, नए के जन्म की सूचना नहीं है, बल्कि मौत या हिंसा या आतंक का विकास है। यह अनिश्चितता और सामाजिक असुरक्षा का विकास है।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो. 09331762368
समाप्त

शुक्रवार, 30 दिसम्बर 2011

ममता, माओवाद और आतंक -3

लालगढ़ में अभी जो ऑपरेशन चल रहा है वह केन्द्र सरकार के दबाव के कारण चल रहा है। केन्द्र का दबाव ही है जिसके कारण लालगढ़ से सैन्यबलों को हटाया नहीं गया है। माओवादियों ने ममता सरकार के पुनर्वास पैकेज की पूरी तरह उपेक्षा की है। उल्लेखनीय है कि माओवादियों के खिलाफ लालगढ़ इलाके में माकपा का एकमात्र सांगठनिक मोर्चा लगा हुआ था और माकपा अपने सक्रिय सदस्यों के जरिए आम लोगों को संगठित करके माओवाद विरोधी जनमत तैयार कर रही थी और दूसरी ओर सशस्त्र बलों की भी लोकल ताकत के रूप में मदद कर रही थी।
लेकिन ममता सरकार आने के बाद सशस्त्र बलों का माकपा को सहयोग मिलना बंद हो गया और राज्य सरकार ने विभिन्न किस्म के झूठे मुकदमों में माकपा के कार्यकर्ताओं को फँसाना आरंभ कर दिया और स्थानीय स्तर पर माकपा कार्यकर्ताओं और हमदर्दों को लालगढ़ इलाक़ा छोड़ने के लिए मजबूर किया और इसका माओवादियों को सीधे लाभ मिला। लालगढ़ इलाके में अन्य किसी दल के पास माओवादियों से लड़ने की सांगठनिक क्षमता नहीं है। ऐसे में ममता बनर्जी सरकार का माकपा पर किया गया हमला मूलतः माओवादियों के लिए एक तरह से खुली छूट की सूचना थी कि वे अब लालगढ़ में मनमानी कर सकते हैं।
माओवादियों ने इस मौके का लाभ उठाया और दुकानदारों से लेकर मकानमालिकों-किराएदारों और सरकारी नौकरों तक सबसे रंगदारी हफ्ता वसूली का धंधा तेज कर दिया है। वे लालगढ़ में प्रतिमाह दो करोड़ रूपये से ज्यादा चैथ वसूली कर रहे हैं। चैथ वसूली करने वालों के खिलाफ यदि कोई व्यक्ति पुलिस में शिकायत करने जाता है तो उसकी शिकायतदर्ज ही नहीं की जाती है और उलटे पुलिसवाले माओवादी आतंक से परेशानी की अपनी दास्तानें सुनाने लगते हैं।
ममता सरकार के आने के बाद केन्द्र-राज्य सरकार की संयुक्त कमान में चल रहा संयुक्त अभियान कमजोर हुआ है। जबकि वामशासन में लालगढ़ इलाके से माओवादियों को पूरी तरह खदेड़ दिया गया था और कई दर्जन माओवादी गिरफ्तार किए गए थे। लेकिन ममता सरकार आने के बाद किसी भी माओवादी को सशस्त्रबलों ने पकड़ा नहीं है,उलटे राज्य सरकार गिरफ्तार माओवादियों को रिहा करने का मन बना चुकी है। संयोग की बात है कि केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदम्बरम् ने ममता बनर्जी से साफ कहा है कि किसी भी माओवादी को रिहा नहीं किया जाना चाहिए।
सवाल यह है कि माओवाद की समस्या का समाधान क्या है? यह एक खुला सच है कि माओवाद की समस्या उन इलाकों में ज्यादा है जहाँ पुलिस थानों की संख्या कम है, थानों में पर्याप्त पुलिस नहीं है। सामान्य पुलिस व्यवस्था का जहाँ अभाव है वहाँ पर माओवादी जल्दी अपनी गतिविधियाँ संगठित करते हैं। माओवाद से लड़ने के लिए पुलिस व्यवस्था के विकास, थानों में पर्याप्त पुलिसकर्मी नियुक्त करने, थानों के अपग्रेडेशन की जरूरत है, इसके अलावा पुलिसकर्मियों को चुस्त-दुरूस्त बनाए जाने की भी सख्त जरूरत है। इसके अलावा माओवाद और विभिन्न किस्म के आतंकी संगठनों से निबटने के लिए माओवाद प्रभावित इलाकों में विशेषदलों की पर्याप्त मात्रा में समान रूप से नियुक्ति करने की जरूरत है।
भारत के प्रसिद्ध सुरक्षा विशेषज्ञ अजय साहनी के अनुसार माओवाद प्रभावित जिलों में आज तकरीबन 70 बटालियन नियुक्त करने की जरूरत है। एक बटालियन में 400 सैनिक होते हैं। साहनी का मानना है कि किसी एक इलाके में सैन्यबलों की खास मौजूदगी देखकर माओवादी उस इलाके से निकलकर अन्य कम पुलिसवाले इलाकों में चले जाते हैं। अतः माओवाद प्रभावित इलाकों में स्थाई तौर पर 28 हजार सैन्यबलों को नियुक्त किया जाना चाहिए और यह काम दीर्घ कालिक (मियादी) होना चाहिए। माओवाद से दीर्घ कालिक (मियादी) योजना बनाकर ही लड़ा जा सकता है। इस समस्या का समाधान यह नहीं है कि माओवाद प्रभावित इलाकों में विकास के कार्यक्रम लागू कर दिए जाएँ। विकास को माओवादविरोधी रणनीति के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए बल्कि विकास को निरंतर चलने वाली सामान्य प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।
माओवाद का समाधान विकास नहीं है। माओवाद का समाधान पुलिस एक्शन भी नहीं है। विकास को निरंतर जारी प्रक्रिया के रूप में लिया जाना चाहिए, दूसरा, माओवाद प्रभावित इलाकों में थानों को चुस्त बनाया जाना चाहिए। सामान्य तौर पर थानों में पर्याप्त पुलिस बलों की मौजूदगी और विशेषबलों द्वारा तुरंत, प्रभावशाली एक्शन लेने की मनोदशा तैयार करने की जरूरत है और इस काम को दलीय स्वार्थ से मुक्त होकर करना चाहिए।
कुछ विशेषज्ञ तर्क दे रहे हैं कि माओवादियों के सक्रिय होने का प्रधान कारण यह है कि नव्य आर्थिक उदारीकरण के कारण बड़े पैमाने पर देशी-विदेशी कारपोरेट घरानों को जमीनें दी गई हैं और इसके कारण ही माओवादी संगठनों को इन इलाकों में अपना जाल फैलाने का अवसर मिला। यह तर्क एब्सर्ड है। माओवादी पहले से हैं और उन्हें हम नक्सल नाम से जानते हैं। नेपाल में विदेशी कपनियों का कोई पैसा नहीं लगा है फिर वहाँ माओवादी संगठनों ने व्यापक जनाधार कैसे बना लिया?
गरीबी, विकास का अभाव, बहुराष्ट्रीय निगमों या करपोरेट घरानों के हाथों में बड़े पैमाने पर आदिवासियों की जमीन के स्वामित्व के कारण माओवादी संगठनों का प्रसार नहीं हुआ है। इसका प्रधान कारण है
मध्यवर्ग और निम्न मध्यवर्ग के लोगों का किसान, आदिवासी आदि के प्रति रोमैंटिक क्रांतिकारी नजरिया। दूसरा प्रधान कारण है माओवादी संगठनों का अवैध धंधों, जैसे फिरौती वसूली, तस्करी, ड्रग स्मगलिंग,
अवैध हथियारों की खरीद-फरोख्त के ग्लोबल नेटवर्कों के साथ साझेदारी और मित्रता। खासकर बहुराष्ट्रीय शस्त्रनिर्माता कंपनियों के हितों के विकास के लिए काम करना।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो. 09331762368
क्रमश:

बृहस्पतिवार, 29 दिसम्बर 2011

ममता, माओवाद और आतंक -2

ये वे लोग हैं जो वाम शासन में भूमिसुधार कार्यक्रम लागू किए जाने के बाद से विगत 20 सालों से भी ज्यादा समय से इस जमीन पर खेती, मछली पालन आदि कर रहे थे। लेकिन राज्य विधानसभा चुनावों में वाममोर्चे की हार के बाद अचानक इन लोगों पर तृणमूल कांग्रेस और भूस्वामियों के गुण्डों के हमले बढ़ गए। जिन किसानों पर हमले किए गए उनके पास वैध पट्टे थे।
इन हमलों में टेंटुलिया मौजा में 1263 बीघा, बातारगाछी में 800 बीघा, मुन्शीर घेरी में 1200 बीघा और नेबुतला में 2800 बीघा जमीन पर गुण्डों ने कब्जा कर लिया और पट्टादार किसानों को बेदखल कर दिया और पूरे इलाके में आतंकराज कायम कर दिया । टेंटुलिया में पूर्व वाम शासन के तहत भूमिसुधार के लिए अधिगृहीत 508 बीघा जमीन को 1205 किसानों में बाँटा गया था। इसके अलावा यहीं पर 755 बीघा जमीन और है जोअदालती मुकदमों में फँसी हुई थी और इसीलिए इस जमीन के औपचारिक पट्टे नहीं दिए जा सके थे। बहरहाल 2000 किसान इन जमीनों पर खेती कर रहे थे और सुप्रीम कोर्ट ने भी यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था। लेकिन इस जमीन पर खेती कर रहे तीन हजार किसानों पर तृणमूली गुण्डों ने हमले किए और उनको इस जमीन से बेदखल कर दिया।
उल्लेखनीय है हरोआ एक जमाने में सामंती भूस्वामियों का मजबूत गढ़ हुआ करता था। लंबे किसान आंदोलन के बाद इस इलाके में वाममोर्चा सरकार भूमि
सुधारों को लागू कर पाई थी। भूस्वामियों ने अपनी पुरानी जमीन को हथियाने के लिए दो स्तरों पर हमले आरंभ किए हैं। पहले स्तर पर सीधे माकपा के कार्यकर्ताओं और हमदर्दों को निशाना बनाया जा रहा है, उन्हें डरा-धमकाकर इलाका छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है। जो घर-द्वार छोड़कर नहीं जाना चाहते उन्हें सीधे झूठे मुकदमों में फँसाकर पुलिस ने गिरफ्तार किया है। इस योजना में तथाकथित हथियारों की तलाशी के नाम पर झूठे केस बनाकर गिरफ्तारियाँ की जा रही हैं।
हरोआ के अलावा वीरभूमि, नानुर, दुबराजपुर, इलमबाजार, बाकुंडा के कोतुलपुर,इंदपुर, मेदिनीपुर के कांथी, नंदीग्राम, खेजुरी, भगवानपुर, पाताशपुर, एगरा, हुगली के पुरशुरा, खानकुल, धनियाखाली आदि में बड़े पैमाने पर किसानों को बेदखल किया गया है। इसी तरह वर्द्धवान जिले के कमरकाटी इलाके में 2200 किसान परिवारों की 1200 बीघा जमीन छीनी गई है। दूसरी ओर किसान सभा के नेतृत्व में पुनः नए सिरे से किसानों ने अपने को एकजुट किया और 1200 बीघा जमीन में से 700 बीघा पर फिर से अपना कब्जा जमा लिया। उसी तरह हरोआ में भी किसानों ने अपनी जमीन पर कब्जा करने के लिए सशस्त्र आंदोलन किया और तृणमूली गुण्डों और भूस्वामियों को जमीन छोड़कर भागने को मजबूर किया।
ममता सरकार आने के साथ ही लालगढ़ इलाके में माओवादियों के खिलाफ चल रहा सशस्त्र सैन्यबलों का ऑपरेशन बिना कहे ढीला कर दिया गया और इस बीच में माओवादियों ने जो इलाके सैन्यबलों के ऑपरेशन के कारण खोए थे उन पर पुनः कब्जा जमा लिया। लालगढ़ में चल रहा माओवाद विरोधी ऑपरेशन केन्द्र सरकार और राज्य सरकार के संयुक्त कमान के तहत चलाया जा रहा है, लेकिन ममता बनर्जी ने अपने माओवादी प्रेम के चलते इस ऑपरेशन को ठंडा कर दिया और विगत 5 महीनों में पुनः आतंक का राज कायम कर लिया, अपने खोए हुए इलाकों पर पुनः कब्जा जमा लिया, ममता सरकार से मित्र संबंध के बावजूद एक भी माओवादी ने न तो समर्पण किया और न ही माओवादियों ने लालगढ़ में आतंक और हत्या की राजनीति को बंद किया।
इसके विपरीत स्थिति यह है कि लालगढ़ में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर भी माओवादियों के कातिलाना हमले हो रहे हैं। किसी भी दल को लालगढ़ में काम करने की मनाही है और इस इलाके में माओवादियों ने जबरिया धन वसूली का
धंधा तेज कर दिया है। पहले माओवादियों ने माकपा के 270 से ज्यादा सदस्यों की हत्या की और उनके आतंक के कारण सैंकड़ों लोग आज भी लालगढ़ से बाहर रह रहे हैं।
ममता सरकार ने यह मान लिया था कि वह विधानसभा चुनाव जीतने के चंद घंटों में माओवादी हिंसा को बंद कर देगी। लेकिन माओवादियों ने हिंसा और तेज कर दी और सीधे तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय नेताओं को सरेआम कत्ल करके मौत के घाट उतार दिया।
हाल में ममता बनर्जी सरकार को केन्द्र सरकार ने हिदायत दी है कि किसी भी माओवादी नेता या कार्यकर्ता को छोड़ा न जाए। दूसरी हिदायत यह दी है कि लालगढ़ में सैन्यबलों का ऑपरेशन तेज किया जाए। फलतः ममता सरकार को मजबूर होकर माओवादियों के खिलाफ अभियान चलाना पड़ रहा है।
उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुनाव जीतने के पहले बार-बार यह कहती रही हैं कि लालगढ़ में माओवादी नहीं हैं वहाँ तो माकपा की हरमदवाहिनी हमले कर रही है। ममता बनर्जी लंबे समय से पश्चिम बंगाल में खासकर लालगढ़ में माओवादियों की मौजूदगी को अस्वीकार करती रही हैं। इसके पीछे साफ कारण था कि वे माओवादियों के साथ साँठ-गाँठ करके किसी तरह चुनाव जीतना चाहती थीं और इसके लिए वे एकसिरे से झूठ बोलती रही हैं। अभी भी वास्तविकता यह है कि वे खुलकर माओवादियों के खिलाफ सक्रिय रूप से एक्शन नहीं ले रही हैं। पिछले दरवाजे से अपने हमदर्दों और मानवाधिकार कर्मियों के जरिए माओवादियों से मधुर
संबंध बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो. 09331762368
क्रमश:

बुधवार, 28 दिसम्बर 2011

ममता, माओवाद और आतंक -1

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार को शासन में आए 6 माह हो चुके हैं। इन छह महीनों में अनेक चीजें बदली हैं। सामान्यतौर पर जिस लोकतांत्रिक माहौल के लौटकर आने की कल्पना की जा रही थी उसकी आशाएँ धूमिल हुई हैं। किसानों, मजदूरों, छात्रों और आदिवासियों पर राज्य सरकार, तृणमूल कांग्रेस और माओवादियों के हमलों में इजाफा हुआ है। साथ ही कलकत्ता उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण छात्र विरोधी फैसला दिया है। इस फैसले के अनुसार कोई भी स्कूली छात्र, स्कूल समय में किसी भी किस्म की रैली-जुलूस आदि में भाग नहीं ले सकता। यदि वह ऐसा करता है तो यह अवैध होगा। जबकि पश्चिम बंगाल में उच्च माध्यमिक और माध्यमिक स्कूलों में लोकतांत्रिक ढ़ंग से चुने हुए छात्रसंघ हैं और इनमें अधिकांश पर वाम छात्र संगठनों का कब्जा है।
ममता सरकार आने के बाद तकरीबन 50 हजार से ज्यादा वाम कार्यकर्ताओं को अपने इलाके छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा है। विभिन्न जिलों में अब तक तीन करोड़ रूपये से ज्यादा का रंगदारी भत्ता तृणमूल कांग्रेस के गुण्डों ने वाम कार्यकर्ताओं और समर्थकों से जबरिया वसूला है। तृणमूल कांग्रेस के गुण्डों ने 150 से ज्यादा माकपा कार्यालयों, 450 से ज्यादा ट्रेड यूनियनों और जनसंगठनों के दफ्तरों पर अवैध कब्जा कर लिया है। तृणमूली गुण्डों के जरिए वाम दलों के सदस्यों-हमदर्दों को कहा जा रहा है कि वे यदि अपने घर या इलाके में रहना चाहते हैं तो अपनी राजनैतिक वफादारी बदलें वरना वे इलाके में नहीं रह पाएँगे। दूसरी ओर शहरी इलाकों में झुग्गी-झोपडि़यों में रहने वाले वाम समर्थकों पर बड़े पैमाने पर हमले हो रहे हैं और उनको वामदलों का साथ छोड़ने के लिए दबाव डाला जा रहा है।
राज्य में इस तरह का आतंकराज लोग पहली बार नहीं देख रहे हैं बल्कि इस तरह की घटनाएँ 1971-1977 के बीच में देख चुके हैं। आम लोगों में जो लोग 1977 के बाद जन्मे हैं उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि 71-77 के बीच का आतंकराज कैसा था? ममता बनर्जी की राजनैतिक शिक्षा उसी दौर में हुई है और उनको आतंक की राजनीति का गहरा अनुभव है।
आश्चर्य की बात है कि इस समय ममता बनर्जी के साथ माओवादियों की सहानुभूति और समर्थन है। जबकि 71-77 के बीच में कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय के शासन में सैकड़ों नक्सली पुलिस की गोलियों के शिकार बने। लेकिन इसबार नक्सलियों और माओवादियों ने कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस के संयुक्त गठबंधन को जिताने के लिए काम किया और एक पूर्व नक्सल नेता को ममता सरकार में श्रममंत्री बनाया गया है। रोचक बात यह है कि ममता सरकार नव्य-उदारीकरण के पक्ष में है और माओवादी-नक्सल और तथाकथित वामपंथी बुद्धिजीवी महाश्वेता देवी के नेतृत्व में ममता सरकार की प्रत्येक नीति को समर्थन दे रहे हैं। नव्य-आर्थिक उदारीकरण के मार्ग पर जाने का विगत वाममोर्चा सरकार का फैसला मौजूदा सरकार ईमानदारी से लागू कर रही है।
पहले विभिन्न इलाकों में माकपा के आतंक की खबरें आ रही थीं लेकिन नई सरकार आने के बाद गुण्डों की टोलियों ने माकपा का साथ छोड़कर ममता बनर्जी की शरण ले ली है और राज्य के विभिन्न इलाकों में आतंक की घटनाएँ आम हो गई हैं। इस तरह की घटनाओं की खबर सुनकर किसी को आश्चर्य नहीं होता।
पश्चिम बंगाल में राजनैतिक आतंक एक आम फिनोमिना है। आम लोग राजनैतिक सत्ता परिवर्तन के बाद राजनैतिक आतंक को लेकर गुस्से में कम हैं, इसके विपरीत आतंक के प्रति सहिष्णुताभरा व्यवहार कर रहे हैं। आतंक देख रहे हैं, लेकिन चुप हैं। मीडिया भी आतंक देख रहा है लेकिन चुप है।
दूसरी बात यह कि ममता बनर्जी को राज्य सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं है और यह अनुभवहीनता उनके सभी फैसलों में साफ झलकती है। दूसरी सबसे बड़ी समस्या है विगत वाम मोर्चा सरकार से भिन्न किस्म की कार्यप्रणाली और नीतियों को पेश करने में वे अभी तक सफल नहीं रही हैं। विधानसभा चुनाव के समय वे वाममोर्चा से भिन्न लोकतांत्रिक शासन प्रणाली देने का वायदा करके जीती हैं। आम लोगों में उनकी जनप्रिय इमेज भी है लेकिन राज्य प्रशासन में दलीय प्रतिबद्धता के आधार पर काम करने की जो बीमारी वाम शासन के दौरान घुस गई थी वह अभी तक बरकरार है। योग्यता, पेशेवर क्षमता, निष्पक्षता और सक्रियता के आधार पर फैसले कम और दलीय पक्षधरता के आधार पर फैसले ज्यादा लिए जा रहे हैं।
दूसरा एक बड़ा परिवर्तन यह आया है कि राज्य में बड़े किसान या पुराने जमींदार जो वाम शासन में हाशिए पर थे वे नए सिरे से आक्रामक हो उठे हैं, अपनी पुरानी जमीनों के स्वामित्व को जोर-जबरदस्ती और सरकारी मदद से हासिल करना चाहते हैं और गाँवों में बरगादार किसानों पर हमले तेज हो गए हैं। मीडिया और राज्य प्रशासन इस तरह के विवादों को जमीन हड़पने के मामले के बजाय माकपा बनाम तृणमूल की दलीय लड़ाई के रूप में पेश कर रहा है।
पश्चिम बंगाल में ममता सरकार आने के बाद से वामदलों और खासकर माकपा के कार्यकर्ताओं पर हमले तेज हुए हैं, तकरीबन 50 हजार लोग विस्थापित होकर अपने गाँव के बाहर अन्यत्र शिविरों में, मित्रों और रिश्तेदारों के यहाँ रह रहे हैं। सैंकड़ों कार्यकर्ताओं पर फर्जी मुकदमे दायर करके गिरफ्तार किया गया है। तकरीबन 1200 से ज्यादा माकपा कार्यकर्ताओं को राज्य प्रशासन विभिन्न किस्म के झूठे मुकदमों में फँसा चुका है। इस माहौल में वामदलों को अपनी एकजुटता का इजहार करके नए सिरे से उनका विश्वास जीतना होगा। इस प्रसंग में उत्तर चैबीस परगना के हरोआ इलाके की घटना का जिक्र करना बेहद जरूरी है। इस इलाके में जुलाई के प्रथम सप्ताह में तृणमूल कांग्रेस और भूस्वामियों ने स्थानीय प्रशासन की मदद से तकरीबन दस हजार किसानों को 7063 बीघा जमीन से बेदखल कर दिया (एक एकड़ में तीन बीघे होते हैं।)

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
मो. 09331762368
क्रमश:

मंगलवार, 27 दिसम्बर 2011

ई-मेल का खेल

दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के धर्म निरपेक्ष होने के दावे उस समय खोखले दिखाई पड़ते हैं जब मुसलमानों की देश भक्ति को शक की निगाहों से देखा जाता है। देश में जब भी आतंकवादी धमाके होते हैं तो मुसलमानों को शक की निगाहों से देखा जाता है। इस मामले में मुसलमानों को लपेटने में मीडिया की अहम भूमिका होती है। क्योंकि मामले को इतना लपेटकर पेश किया जाता है कि मुस्लिम चेहरों के लिए परेशानी का सबब बन जाता है। आप के सामने लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ माना जाने वाले मीडिया की कुछ तस्वीर पेश करते हैं-
7 सितम्बर 2011 को दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट को इस तरह से पेश किया किया जैसे कि सिर्फ एक समुदाय विशेष को टारगेट किया जा रहा है। धमाके के जाँच में जुटी जाँच एजेंसियों को कोई सबूत मिले बगैर ही हमलावरों का स्कैच जारी कर दिया गया। मुस्लिम नामोें वाले संगठनों का हौव्वा खड़ा किया गया। जाँच के नाम पर मुसलमानों को परेशान किया गया। इस आतंकवादी घटना को अंजाम देने की जिम्मेदारी वाला ई मेल आतंकवादी संगठन हूजी की तरफ से आया, ऐसा बताया गया। बाद में पता चला कि यह ई मेल जम्मू कश्मीर के किश्तवाड़ से आया था। दिल्ली बम ब्लास्ट के आरोप में दो मुस्लिम छात्रों को गिरफ्तार किया गया। ई मेल की वास्तविकता को जाँचे वगैर पुलिस और मीडिया द्वारा इस ब्लास्ट का संबंध हूजी से जोड़ दिया गया। लेकिन कई सवालों को दबा दिया गया। मसलन यह कि विस्फोट हूजी ने अंजाम दिया तो उसने अपना नाम ग़लत क्यों लिखा। क्या इसके सदस्य इतने कायर हैं कि अपने संगठन का नाम नहीं लिख सकते। इससे पहले कई और धमाकों को लेकर भी हूजी पर आरोप लगते रहे हैं।
दिल्ली हाईकोर्ट मामले में दूसरा ईमेल गुजरात के अहमदाबाद से आया बताया गया। इसमें मनु नाम के एक हिन्दू युवक का नाम सामने आया। ख़बरों के अनुसार अमरीकी जाँच एजेंसी एफ0बी0आई0 ने इस मामले में सईद-अल-हवरी का नाम चुना। इसमें बताया गया कि गुजरात के कई शहर आतंकवादियों के निशाने पर हैं। इस युवक के बारे में न तो किसी मीडियाकर्मी ने मामले को उठाया और न ही प्रशासन ने।
कल्पना कीजिए कि मनु या शनि शुक्ला के अलावा अगर कोई मुसलमान होता तो मीडिया का रवैया कैसा होता, इस ख़़बर को कई नज़रों देखा जाता। किश्तवाड़ में पकड़े गए दो नौजवान जो मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखते हैं जिनकी उम्र 18 साल से कम है उन पर आरोप लगाए गए कि इंटरनेट के माध्यम से धमकी भरा ईमेल भेजा। लेकिन ख़बरों में उनके नाबालिग होने का जिक्र नहीं किया गया। अंग्रेजी के एक बड़े अखबार ने 15 सितम्बर के प्रकाशन में कश्मीर और पश्चिम से इंडियन मुजाहिदीन और हूजी ईमेल के हवाले से गिरफ़्तारी की ख़बर प्रकाशित की। दोनों ख़बरों में शनि शुक्ला वाली खबर इस तरह है कि मजाक में ईमेल भेजने के सिलसिले में युवक को गिरफ्तार किए जाने की खबर दी गई थी।
तीसरा ईमेल जिसके बारे में कहा जाता है कि इंडियन मुजाहिदीन ने भेजा है जो छोटू मिनानी (chotoominani5@gmail.com) के नाम से भेजा गया है। इसके बारे में जाँच इस नतीजे पर पहुँची है कि इसे पश्चिमी बंगाल और झारखंड की सीमा पर स्थित पाकोड़ नामक स्थान से भेजा गया था। कोलकाता पुलिस ने शनि शुक्ला को इस मामले में गिरफ्तार किया जिसकी उम्र 14 साल है। अखबारों में उसके नाबालिग होने की खबर को महत्व दिया गया।
उल्लेखनीय है कि इंडियन मुजाहिदीन के नाम से भेजे गए उक्त ईमेल का सन्देश पिछले सभी ईमेल संदेशों से भिन्न था। इस मेल में कहा गया था कि दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट हमने किया था न कि हूजी और न ही अन्य किसी ने। इस ईमेल में साफ लिखा गया था कि हमने जानबूझकर बुधवार का दिन चुना क्योंकि इसी दिन कोर्ट में जनहित याचिकाओं की सुनवाई होती है, जिसकी वजह से कोर्ट में अधिक भीड़ होती है।
दिल्ली हाईकोर्ट ब्लास्ट के जाँच के मामले में नया मोड़ उस समय आया जब चश्मदीद गवाह ने यह खुलासा किया कि बम एक कोरियर पैकेट में सफेद कपड़े में लपेट कर रखा गया था। फिलहाल सरकारी अधिकारी इस मामले में चुप्पी साधे हुए हैं। पुलिस और मीडिया ने मुसलमानों की छवि को खराब निश्चित रूप से किया है जिसकी वजह से एक टोपी और दाढ़ी वाले आदमी को शक भरी नजरों से देखा जाता है।
हालाँकि आतंकवादी हमले को हम किसी भी रूप में स्वीकार नहीं कर सकते। आतंकवाद का न कोई चेहरा, न कोई मजहब होता है। इसे रोकने के लिए जायज कदम उठाने चाहिए। आतंकवाद की आड़ में किसी विशेष वर्ग को टारगेट बनाने के बजाए लोगों को आपस में जोड़ने की बात करनी चाहिए। जिससे कि लोगों में भाई-चारा व प्रेम बना रहे और मुल्क में शांति कायम रहे।

-अबु ज़फ़र
मो.09540147251

सोमवार, 26 दिसम्बर 2011

मध्यम वर्गीय समाज में सामाजिक जनतंत्र के प्रति बढती उपेक्षा और उसका दायित्व

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यह जिम्मेदारी समाज के आम मध्यम वर्गीय समाज के साथ - साथ समाज के निचले हिस्से और उनके प्रबुद्ध तबको पर आ गयी है | अब यह उसी का एतिहासिक दायित्व है कि वह आम समाज को आधुनिक युग कि मांगो , आवश्यकताओ के अनुरूप जागृत करे | उनमे एकता , भाईचारगी और बराबरी को खड़ा करे |

धनाढ्य एवं उच्च वर्गीय समाज का रुख - रवैया आम समाज के प्रति उपेक्षापूर्ण हैं | इस हिस्से ने आम समाज में उठने - बैठने , रहने - सहने से अपने आप को कब से अलग कर लिया है और अलग करता जा रहा है |यहा तक कि जन प्रतिनिधि कहे जाने वाले विधायको , सांसदों तक का अपने क्षेत्र की जनता से मिलना जुलना बहुत कम हो गया है
इन सभी का जीवन स्तर ,रहन - सहन तथा शिक्षा - संस्कृति आदि का आम समाज से अब वस्तुत:कोई सम्बन्ध नही रह गया हैं |सम्बन्ध है तो उच्च वर्गीय स्वार्थ का आम जन की श्रम सम्पत्ति के इस्तेमाल का या फिर उनमे राष्ट्रीय व धार्मिक , जातीय या इलाकाई भावनाओं आदि के इस्तेमाल का | जाहिर सी बात है की , राष्ट्र व समाज के इस हिस्से से आम समाज में आधुनिक युग की बराबरी , भाचार्गी और एकता को बढावा देने के प्रति अर्थात सामाजिक जनतंत्र के प्रति किसी सक्रिय सकारात्मक भूमिका की अब कोई अपेक्षा नही की जा सकती | हां उसके विरोध की अपेक्षा जरुर की जा सकती हैं |
समाज के उच्च संभ्रांत वर्ग से आये लोगो की सक्रिय भूमिकाये अब इतिहास का विषय बन चूकि हैं | अपने ही देश में ब्रिटिश दासता के काल में बड़े व सम्भ्रांत घरो से आये - राजाराम मोहन राय , सर सैयद अहमद और बाद के दौर में बहुतेरे राष्ट्रवादी , जनतंत्रवादियों का जैसा नेतृत्त्व अब आम समाज के आधुनिक पुनर्जागरण के लिए आने वाला नही है | क्योंकि पुराना पडा रह गया या नया बनता उच्च वर्गीय हिस्सा अब आमतौर पर पैसे - पूंजी , पद - प्रतिष्ठा का दास बन चुका है | उससे अलग होकर या उसका विरोध करके अब यह हिस्सा समाज के पुनर्जागरण के लिए खड़ा होने वाला नही हैं | स्वाभाविक रूप से अब यह जिम्मेदारी समाज के आम माध्यम वर्गीय समाज के साथ - साथ - समाज के निचले हिस्से और उनके प्रबुद्ध तबको पर आ गयी है | अब यह उसी का एतिहासिक दायित्व है कि वह आम समाज को आधुनिक युग की मांगो , आवश्यकताओ के अनुरूप जागृत करे | उनमे एकता , भाईचारगी और बराबरी को खड़ा करे | लेकिन समाज का यह पढ़ा - लिखा मध्यम वर्गीय हिस्सा अपने इस एतिहासिक दायित्व को सोचने - समझने तक के प्रति उपेक्षा व तटस्थता का रवैया अपनाए हुए हैं | उसकी चिन्ताए मुख्यत: उसकी निजी व पारिवारिक जीवन की चढत - बढत तक ही सीमित हो गयी हैं | आम समाज के प्रति , सामाजिक समस्याओं के प्रति तथा आम समाज को जागृत करने के प्रति , वह भी उच्च वर्गियो की तरह का ही रवैया अपनाए हुए है | धन - पैसा , पद -प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में लगे रहने के साथ - साथ समाज की घोर दकियानूसी परम्पराओं का वाहक भी बना हुआ है | धर्म व संस्कार के नाम पर न केवल हर पुराने एवं गैर जरूरी रीति - रिवाजो व कर्मकांडो को अपनाए हुए हैं , बल्कि उसको आधुनिक बाज़ार एवं भोगवादी संस्कृति से जोडकर महिमामंडित भी करता जा रहा है | इस संदर्भ में आप हिन्दू धर्म के धर्मिक - सामाजिक सुधार का एक उदाहरण देखिये - 19 वी शताब्दी के अन्तिम दशको में शुरू हुए आर्य समाज आन्दोलन में हिन्दू धर्म की कई पुरातन पंथी धार्मिक , सामाजिक कर्मकांडी रीतियों की न केवल निर्मम व तार्किक आलोचना की , बल्कि उनको सरल व नई धार्मिक , सामाजिक रीतियों व पद्धतियों के रूप में बदल भी दिया | लेकिन उस आन्दोलन और उसके जरिये होने वाले समाज - सुधार को आम पढ़े - लिखे , जानकार मध्यम वर्गीय समाज के व्यापक हिस्से ने उस समय भी अपेक्षा से कही कम महत्व दिया |फिर आज तो उस पर या उस जैसे अन्य सुधारों पर और भी कम या कहिये न के बराबर ध्यान दिया जाता हैं , जबकि अब नई युग की सोच के अनुसार उसमे और ज्यादा सुधार करने का समूचा दायित्व ही निम्न मध्यम वर्गीय और निम्न समाज पर आ पडा हैं |
इसका एक दुसरा सबूत यह भी है कि छोटी एवं निम्न जातियों में भी खासकर उनके पढ़े - लिखे और थोड़ा - बहुत भी सम्पन्न हिस्सों में अब वे सारे पुराने कर्मकांड खड़े होने एवं बढने लग गये है , जो पहले आमतौर पर बड़ी जातियों में खासकर ब्राह्मणों , क्षत्रियो और बाद में किसी हद तक वैश्यो, कायस्थों में ही प्रचलित थे | फिर इन्ही का एक हिस्सा इन क्र्म्कान्दो
के विरोध कि अगवाई करते हुए ब्रम्हसमाज से आर्य समाज तक के आन्दोलनो का नेतृत्त्व किया था | लेकिन आज स्तिथि उलट सी हो गयी है | आम प्रबुद्ध समाज कर्मकान्डो और ज्यादा अपनाता जाता हैं | यह समाज के आम प्रबुद्ध माध्यम वर्गीय हिस्से में प्रगतिशील विचार व व्यवहार के बढने का नही , अपितु उससे पीछे हटने का सबूत हैं | समाज को आगे बढाने में सहायक बनने का नही बल्कि उसे पीछे ढकेलने में लग जाने का सबूत है |आवश्यकता है कि आम समाज खासकर उसका पढ़ा लिखा हिस्सा अब आम समाज में सुधार लाने बढाने के लिए अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करे | व्यापक समाज के लिए आवश्यक आधुनिक पुनर्जागरण के एतिहासिक दायित्व का निर्वहन करे |अपनी तर्क बुद्धि और प्रबुद्धता को पुराने युग कि सड़ी-गली रीतियों का सही औचित्य ठहराने में लगाने कि जगह , सुसंगत वैज्ञानिक तर्को के साथ नये विचार - व्यवहार को पनपाने बढाने में लगाये | आधुनिक पुनर्जागरण में योगदान दे चुके राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय विभूतियों व आन्दोलनो से प्रेरणा ग्रहण करे |आने वाले दिनों में टूटकर सम्पत्तिहीन कंकर वर्गीय स्थिति में समाहित हो जाने की दशा - दिशा का आकलन करते हुए अपने एतिहासिक दायित्व को संभालने के लिए आगे आये |समाज के उच्च वर्ग के साथ नही बल्कि निम्न वर्ग के साथ जनतांत्रिक एकता बनाये.
-सुनील दत्ता

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पत्रकार
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रविवार, 25 दिसम्बर 2011

हिन्दुत्व की राजनीति बाबरी से अन्ना तक

इस महीने (दिसंबर 2011) बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के उन्नीस साल पूरे हो गए। इस अवसर पर कुछ मुस्लिम संगठनों ने मस्जिद के पुनर्निर्माण की माँग फिर से उठाई। इस माँग के पूरी होने में कानूनी बाधाएं तो हैं ही, यह एक ऐसी राजनैतिक गुत्थी बन गया है जिसका कोई हल नजर नहीं रहा है। कई अलगअलग राजनैतिक ताकतें, इस मुद्दे का इस्तेमाल अपनीअपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर रहीं हैं।
यहां हम एक बार फिर दुहराना चाहेंगे कि हिंदुत्व का हिंदू धर्म से कोई लेनादेना नहीं है। हिंदुत्व तो संघ परिवार की राजनीति का नाम है। हिंदुत्व, संकीर्ण सोच व सांप्रदायिक दृष्टिकोण की राजनीति है। हिंदुत्व, दरअसल, उच्च जातियों के हिंदुओं के उस तबके की सोच को प्रतिबिंबित करता है जो प्रजातंत्र का खात्मा कर देना चाहता है। हिंदुत्व का पैरोकार वर्ग अपेक्षाकृत समॢद्ध और अधिकांशतः शहरी है। हिंदुत्व की राजनीति का उद्देश्य, हिंदू राष्ट्र की स्थापना है जहां समाज के ॐचे तबके का वर्चस्व होगा और जहां सामंती मूल्यों का बोलबाला होगा। जो खेल खेला जा रहा है वह है सामंती मूल्यों व जन्मआधारित ॐचनीच को गौरवशाली परंपरा के नाम पर आधुनिक कलेवर में परोसना।
बाबरी मस्जिद का ़हाया जाना केवल एक राष्ट्रीय स्मारक का विनाश नहीं था बल्कि उसके साथ ही भारतीय राजनीति का एक नया दौर शुरू हुआ जिसमें राजनीति के प्रांगण में अब तक दबेछिपे ंग से काम कर रहीं सांप्रदायिक राजनैतिक ताकतें, खुलकर अपना कुत्सित खेल खेलने लगीं। इसके चलते अल्पसंख्यकों के विरूद्ध हिंसा ब़ी और भारतीय संविधान के मूल्यों का मखौल बना। बाबरी मस्जिद का ़हाया जाना, दिल्ली की गद्दी पर काबिज होने की ओर सांप्रदायिक राजनैतिक दलों का पहला कदम था।
बाबरी घटना के तुरंत बाद भाजपा राज्य सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया परंतु इससे समाज का सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण न रूक सका। जमकर सांप्रदायिक हिंसा हुई और हाशिए से खिसककर भाजपा, राजनीति के मंच के केन्द्र में आ पहुँची। वह सबसे बड़े विपक्षी दल के रूप में उभरी। भाजपा के पितृसंगठन आऱएस़एस़ की समाज में स्वीकार्यता ब़ने लगी। अल्पसंख्यकों के विरूद्ध पूर्वाग्रह, सामूहिक सामाजिक सोच का हिस्सा बन गया। मुसलमानों के अलावा ईसाई अल्पसंख्यक भी सांप्रदायिक ताकतों के निशाने पर आ गए। पॉस्टर ग्राहम स्टेन्स को जिंदा जला दिया गया और देश के कई हिस्सों में ईसाई मिश्नरियों के विरूद्ध हिंसा हुई। इसका चरमोत्कर्ष था कंधमाल में खूनी मारकाट।
मूलतः प्रजातंत्रविरोधी व हिंदू राष्ट्र की पक्षधर भाजपा पहली बार सन 1996 में केन्द्र में सत्ता में आई। उस समय सभी अन्य पार्टियों ने उसका साथ देने से इंकार कर दिया। सत्ता का लालच भी उन्हें न बांध सका परंतु बाद में, शनै:शनै: राजनैतिक पार्टियाँ, सत्ता की खातिर भाजपा से जुड़ने लगीं। उन्हें बाबरी मस्जिद ़हाने के आरोपियों से हाथ मिलाने में कोई संकोच नहीं हुआ। उन्हें उन लोगों से कोई परहेज न रहा जिन्होंने पूरे देश में भारी खूनखराबा मचाया था। भाजपा केन्द्र में सत्ता में आ गई और इससे विहिप, बजरंग दल, वनवासी कल्याण आश्रम आदि जैसे संघ परिवार के अन्य सदस्यों की बन आई। वे मनमानी पर उतर आए। राज्यतंत्र और पुलिस बलों का तेजी से सांप्रदायिककीकरण होने लगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी भगवाधारियों ने अपने हाथपैर फैलाने शुरू कर दिए। वैज्ञानिक सोच व तार्किकता के स्थान पर आस्था व विश्वास शिक्षा के आधार बनने लगे।
इससे भाजपा की ताकत और ब़ी। चुनावों में जीत उसके लिए आसान होती गईं। संघ का प्रचार तंत्र केवल अल्पसंख्यकों का दानवीकरण नहीं करता, वह बहुसंख्यकों के मन में अल्पसंख्यकों के "खतरे" का भय भी उत्पन्न करता है। इससे संघ का प्रचार और धारदार बन जाता है और मध्यमार्गी भी संघ के झंडे तले जुटने लगते हैं। कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनने के साथ ही, दक्षिण भारत में भाजपा के पैर जमाने की शुरूआत हुई। भाजपा की राजनैतिक विचारधारा पूरे देश में अपनी जडें़ जमा रही है। उसकी जडें़ और मजबूत, और मोटी होती जा रहीं हैं।
बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के साथ ही कई प्रक्रियाएं शुरू हुईं। हिंसा पीड़ित न्याय पाने से वंचित कर दिए गए। उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन जीने पर मजबूर कर दिया गया। बाद में, आतंकवाद का मुद्दा भी मुसलमानों के दानवीकरण का बहाना बन गया। ईसाई अल्पसंख्यक भीविशेषकर आदिवासी इलाकों मेंसाम्प्रदायिक ताकतों के शिकार बनने लगे।
9/11 के बाद, अमरीकी प्रचारतंत्र अल्कायदा को आतंकवाद का स्त्रोत बताने लगा। मुसलमानों व इस्लाम को आतंकवाद से जोड़ना शुरू कर दिया गया। अमरीकी मीडिया ने "इस्लामिक आतंकवाद" शब्द ग़ा। तेल संसाधनों पर कब्जे की राजनीति में सफलता की खातिर आमजनों की विचारधारा और सोच में जहर घोलना शुरू कर दिया गया। भारत में भी मुसलमानों के खिलाफ दुष्प्रचार ने नई ॐचाईयाँ छूईं। इस्लाम की शिक्षाओं और मुसलमानों को आतंकवाद के लिए दोषी ठहराया जाने लगा। यह झूठा प्रचार अत्यंत होशियारी से किया गया।
आऱएस़एस़भाजपा की राजनीति अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ सामाजिक धु्रवीकरण को चरम पर पहॅुचा देने के बाद अब इन तत्वों ने अन्ना हजारे के आंदोलन के नाम पर प्रजातांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का अभियान शुरू कर दिया है। वे एक ऐसे तंत्र का निर्माण करना चाहते हैं जिसमें "लोकपाल" नामक सर्वशक्तिमान संगठन, हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों व संस्थाओं पर नजर रखे। ऊपर से देखने से ऐसा लग सकता है कि लोकपाल से देश की समस्याएं सुलझेंगी। परंतु दरअसल इससे एक ऐसी संस्था अस्तित्व में आएगी जिसपर प्रजातांत्रिक नियमकानून लागू नहीं होंगे। कुछ लोग और संगठन, जो जनता का एकमात्र प्रतिनिधि होने का दावा कर रहे हैं और "अन्ना संसद के ऊपर हैं" जैसे बेमानी नारे लगा रहे हैं, असल में पर्दे के पीछे से देश के संचालन के सूत्र अपने हाथों में लेना चाहते हैं। अन्ना आंदोलन ने एक ऐसे सामाजिक वर्ग को जन्म दिया है जो यह मानता है कि पहचान से जुड़े मुद्दे (राम मंदिर) और भ्रष्टाचार जैसे मसले, जो कि असली बीमारी के लक्षण मात्र हैं, ही देश की मूल समस्याएं हैं। उन्हें दलितों, अल्पसंख्यकों व समाज के अन्य वंचित समूहों की समस्याओं से कोई लेनादेना नहीं है। पहचानआधारित मुद्दे और बाहरी लक्षणों से जुड़े मसले, राजनैतिक यथास्थितिवाद के हामी होते हैं और धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले सभी समूहचाहे वे ईसाई कट्टरपंथी हों, इस्लामिक कट्टरपंथी हों या हिंदुत्ववादी भी यही चाहते हैं।
अब चूंकि राममंदिर मुद्दे की चमक खो गई है इसलिए सामाजिकराजनैतिक यथास्थितिवादी तत्वों ने भ्रष्टाचारविरोध का पल्ला थाम लिया है। यह एक चालाकी भरा कदम है। "मैं अन्ना हूँ" "हम जनता हैं" जैसे नारों से वंचित वर्ग स्वयं को अलगथलग महसूस कर रहे हैं। अन्ना आंदोलन के कर्ताधर्ताओं का संदेश साफ है। इस देश की व्यवस्था केवल "शाईनिंग इंडिया" वर्ग से निर्देशित होगी और वंचित वर्ग सदा हाशिए पर रहेंगे।
संघहिंदुत्व राजनीति, समाज का धु्रवीकरण व सांप्रदायिकीकरण करने व मूल मुद्दों से समाज का ध्यान हटाने के लिए नित नई रणनीतियाँ अपनाता रहता है। जहाँ पहले रथ यात्राओं व सांप्रदायिक हिंसा ने समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत करने में भूमिका अदा की वहीं अब भ्रष्टाचार जैसे सामाजिक मुद्दे का इस्तेमाल उस राजनीति को मजबूत करने के लिए किया जा रहा है जिसका लक्ष्य सामाजिक असमानताओं को बनाए रखना है।

राम पुनियानी

शनिवार, 24 दिसम्बर 2011

जी हाँ, हम धोखेबाज़ हैं

बुनकरों की कर्ज़ माफ़ी
इस पॅकेज से बुनकर समुदाय को कुछ राहत जरुर मिलेगी | पर केवल राहत ही मिलेगी और वो भी तात्कालिक |एकदम दर्द में राहत दिलाने वाली गोलियों की तरह | लेकिन जिस तरह गोली का असर खत्म होते ही दर्द पुन:उसी वेग से शुरू हो जाता हैं |उसी तरह यह राहत पॅकेज का फौरी असर भी खत्म हो जाना हैं |
केन्द्रीय वाणिज्य उद्योग और कपड़ा मंत्री ने 19 नवम्बर के दिन देश के बुनकरों के लिए 6234 करोड़ रूपये के पॅकेज की घोषणा की | इस पॅकेज में से 3884 करोड़ रूपये को बुनकरों की कर्ज़ माफ़ी के लिए आवंटित किया गया हैं | कर्ज़ माफ़ी के इस पॅकेज से 15 हजार बुनकर समितियों के 50 हजार तक के कर्ज़ माफ़ कर दीये गये है | इसके अलावा 14 लाख निजी बुनकरों के भी 50 हजार तक के कर्ज़ माफ़ कर दीये गये है | बताया गया है की इस कर्ज़ माफ़ी से उत्तर प्रदेश के 3 लाख बुनकरों को राहत मिलेगी | कर्ज़ माफ़ी के अलावा इस पॅकेज से बुनकर क्रेडिट कार्ड की शुरुआत की गयी है | इसके जरिये 3% व्याज पर 3 लाख रूपये तक का कर्ज़ लिया जा सकता है | इस पॅकेज के अलावा वाराणसी , मुबारकपुर , बिजनौर ,और बाराबंकी में 25 हजार लूम लगाये जायेंगे | इसके लिए केन्द्रीय सरकार प्रत्येक स्थान पर दो करोड़ के साथ 5 हजार हथकरघो का भी अंशदान करेगी | मंत्री महोदय की घोषणाओं के अनुसार राष्ट्रीय हथकरघा विकास निगम द्वारा आपूर्ति किए जाने वाले धागे पर 10% की छूट दी जायेगी |साथ ही सूत , जुट व सिल्क धागे के देश भर में दुलाई भाड़े में भी 2.5% से लेकर 10% तक की सब्सिडी दी जायेगी , ताकि हथकरघा समूह को उचित मूल्य पर धागा मिल सके | स्वभावत:इन घोषणाओं का बुनकर समूह द्वारा स्वागत किया गया हैं | कई अखबारों ने भी इसे चुनावी पॅकेज , पर आवश्यक पॅअकेज बताते हुए इसका स्वागत किया है | यह बात भी कही गयी है की यदि यह फैसला पहले किया जाता तो वर्षो से आर्थिक संकट झेलते आ रहे बुनकर न तो बुनकरी पेशा छोड़ने के लिए बाध्य होते और न ही आत्महत्या करने और सन्तान बेचने तक के लिए बाध्य होते , जिसकी सूचनाये कुछ सालो से आती रही हैं | इसमें कोई दो राय नही है कि इस पॅकेज से बुनकर समुदाय को कुछ राहत जरुर मिलेगी | पर केवल राहत ही मिलेगी और सो भी तात्कालिक | एकदम दर्द निवारक गोलियों की तरह | लेकिन एक बात है जिस तरह दर्द निवारक गोलियों का असर खत्म होते ही दर्द शुरू हो जाता हैं | उसी तरह यह राहत पॅकेज का फौरी असर भी खत्म हो जाना है |बुनकरों कि समस्याओं , संकटों को बदस्तूर जारी रहना है | इसका एक पक्का सबूत भी आप देख ले |2007 के केन्द्रीय बजट में सरकार के किसानो पर चदे सरकारी कर्जो कि माफ़ी कि घोषणा के साथ कुल 70 हजार करोड़ रूपये की कर्ज़ माफ़ी कि थी | लेकिन उसका असर न तो खेती किसानी के बढ़ते संकटों के कम होने के रूप में आया और न ही कर्ज़ में डूबे किसानो की आत्महत्याओं को रोकने के रूप में आया | उल्टे वह बढ़ता ही रहा | क्योंकि कर्ज़ में फसने का मुख्य कारण खेती में बढ़ते लागत और उसकी अपेक्षा कृषि उत्पादों के कही कम मूल्य भाव का मिलना रहा है |अर्थात बचत की जगह घाटे उठाते रहने की समस्या का लगातार बढना रहा है | जिसके चलते न तो आम किसान की लागत निकल पाती है और न ही रोज्मरा के खर्चो की भरपाई हो पाती है | फलत:न तो लागत के लिए उठाये गये कर्जो की वापसी कर पाते है और न ही सरकारी कर्जो में और फिर गैर सरकारी महाजनी कर्जो में और ज्यादा फसने से बच पाते है |इसीलिए सरकारी माफ़ी के बाद माफ़ी पाए किसानो को बैंको से दुबारा कर्ज़ लेने का अधिकार तो मिल गया लेकिन लागत कम करने और बेहतर बाज़ार व बेहतर मूल्य भाव पाने का कोई अवसर नही मिल पाया | कृषि संकट की बीमारी की जड़ जहा की तहा रह गयी |किसान क्रेडिट कार्ड पर कृषि ऋण आसानी से पाने और कृषि ऋण पर व्याज दर में घटाव का भी कोई असर नही पडा है क्योंकि ऋणों का बढना उसकी देनदारी के लिए आवश्यक बचत न हो पाने से जुडा हैं | इसीलिए बढ़ता कर्ज़ व उसकी देनदारी न कर पाना प्रमुख संकट की मूल बीमारी का एक परिलक्षण मात्र है | बुनकरी का मामला भी एकदम वैसा ही है | बुनकरों पर चड़ा कर्ज़ भी बढ़ते लागत कटते - घटते बाज़ार और लागत के मुकाबले बुनकरी उत्पादों के कही कम बढ़ते बाज़ार भाव से जुड़ा हुआ है | इसी के चलते आम बुनकरों का न केवल बचत लाभ गिरता रहा है बल्कि वे घाटे में भी जाते रहे है |इसके फलस्वरूप वे न तो अपने धंधे को बढा पा रहे है और न ही उसके लिए गये कर्जो की अदायगी कर पा रहे हैं | बुनकरी का ( तथा खेती किसानी समेत अन्य तमाम छोटे व परम्परागत उद्योग धंधो ) यह संकट कम या ज्यादा रूप में हैं तो पहले से , लेकिन पिछले 15 - 20 सालो से वह तेज़ी से बढ़ता जा रहा है | क्योंकि इन 20 सालो से लागू की जाती रही विदेशी वैश्वीकरणवादी नीतियों के अंतर्गत बुनकरी समेत तमाम छोटे उत्पादकों व साधारण मजदूरों को छूटो , अनुदानों व अवसरों को काटा - घटाया जाता रहा है | देश के बाज़ार में देश की बड़ी कम्पनियों को उत्पादनों व विदेशी आयातित मालो , सामानों की छूटे देकर उनके बाज़ार को काटा घटाया गया है बुनकरी के क्षेत्र में भी यही हो रहा है | एक तरफ सुता , बिजली आदि के बढ़ते दामो के चलते बुनकरी की लागत बढती जा रही है | दूसरे बुनकरी के बाज़ार में बड़ी कम्पनियों व विदेशी आयातकों का दबदबा बढ़ता जा रहा हैं | दरअसल यही संकट बुनकरों के घाटे में जाने और कर्ज़ वापस न कर पाने का असली संकट भी हैं इसलिए कर्जमाफी के पॅकेज से तथा बुनकरों के क्रेडिट कार्ड और 3% तक के कम व्याज पर से लागत व बाज़ार के संकटों में कोई कमी नही आनी है | हां इससे उन्हें थोड़ी देर की राहत जरुर मिल पाएगी | इस राहत के रूप में अब पुराने कर्ज़ की अदायगी किए बिना ही बुनकर समुदाय बैंको से नया कर्ज़ पा सकेगा | लेकिन उसके बाद फिर उसे कर्ज़ संकट में फसना अपरिहार्य हैं |इससे न तो वह बच सकता है और न किसान व दूसरे उद्यमी बच सकते है | उनका इन संकटों से वास्तविक बचाव तब तक नही हो सकता जब तक वे देश में लागू की जाती रही विदेशी नीतियों के अंतर्गत देशी व विदेशी बड़ी कम्पनियों का लागत व बाज़ार पर बढ़ते दबदबे को रोका नही जाता | उन पर अंकुश नही लगाया जाता | छोटे उद्यमियों , किसानो और उनके साथ लगे मजदूरों के जीविका की सुरक्षा करते हुए खेतियो व छोटे उद्योगों के विकास विस्तार को आगे नही बढाया जाता | लेकिन यह काम बड़ी कम्पनियों और विदेशी कम्पनियों के स्वार्थो पूर्ति में लगी , देश की सत्ता , सरकारे और विभिन्न राजनितिक पार्टिया नही कर सकती | फिर आज बुनकरों के कर्ज़ माफ़ी की घोषणा करने वाली कांग्रेस पार्टी ने ही तो 1991 में अपनी केन्द्रीय सरकार के जरिये धनाढ्य देशी व विदेशी कम्पनियों को छूट देने और छोटे उद्यमियों की छूटे काटने की उदारीकरणवादी नीतियों की शुरुआत की थी | लिहाजा प्रदेश में खड़े हो रहे चुनावी माहौल में बुनकर समुदाय को भी कर्ज़ माफ़ी व अन्य छूटो से मिली राहत का उठाते हुए भी कम से कम इन नीतियों के विरोध में बड़ी कम्पनियों को मिलती बढती जा रही छूटो व अधिकारों के विरोध में जरुर खड़ा होना चाहिए | संगठित हो जाना चाहिए | किसानो के साथ मोर्चाबद्ध हो जाना चाहिए केवल तभी और केवल तभी एक स्थाई राहत तथा संकटों में सुधार की बात सोची जा सकती हैं | बाबा नागार्जुन की यह पक्तिया बार बार याद आ रही हैं ..............................
.....हम कुछ नहीं हैं
कुछ नहीं हैं हम
हाँ, हम ढोंगी हैं प्रथम श्रेणी के
आत्मवंचक... पर-प्रतारक... बगुला-धर्मी
यानी धोखेबाज़
जी हाँ, हम धोखेबाज़ हैं
जी हाँ, हम ठग हैं... झुट्ठे हैं
न अहिंसा में हमारा विश्वास है
मन, वचन, कर्म... हमारा कुछ भी स्वच्छ नहीं है
हम किसी की भी 'जय' बोल सकते हैं DSC_0009.JPG
हम किसी को भी धोखे में डाल सकते हैं,
-सुनील दत्ता
पत्रकार

शुक्रवार, 23 दिसम्बर 2011

यह स्तर है भारतीय पुलिस सेवा का

लखनऊ के पासपोर्ट अधिकारी जयप्रकाश सिंह नर्वदेश्वर लॉ कॉलेज के छात्र भी हैं और लखनऊ विश्वविद्यालय के सीतापुर रोड स्तिथ परिसर में परीक्षा दे रहे थे परीक्षा में जयप्रकाश सिंह नक़ल भी कर रहे थे उड़न दस्ता द्वारा नक़ल करते हुए पकडे जाने पर धमकाया कि तुम सब जानते नहीं हो मै आइ.पी.एस अफसर हूँ तुम सबको देख लूँगा इस छोटी सी घटना से आप सभी अंदाजा लगा सकते हैं कि भारतीय प्रशासनिक पुलिस सेवा के अधिकारियों का वास्तविक स्तर क्या है ?
ये सभी अफसर अपने को ईश्वर का साक्षात स्वरूप मानते हैं। घूस खाने से लेकर लम्पट एलेमेन्ट सबकुछ गैर कानूनी ढंग से करने के लिये हमेशा तैयार रहते हैं हाँ कुछ अफसर ईमानदार हो सकते हैं। लखनऊ के आस पास के जिलों में प्रशासनिक व पुलिस अफसरों के बड़े-बड़े फार्म हाउसेस हैं जो इनकी काली कमाई के स्पष्ट प्रमाण हैं। ये अफसर सुबह से लेकर रात तक जो भी कुछ खर्च करते हैं उसमें से उनके वेतन से एक नया पैसा खर्च नहीं होता है। छोटे जिलों में एक जिलाधिकारी के लिये शहर की तहसील का लेखपाल नियुक्त होता है। जो इनकी पत्नी का साप्ताहिक घरेलू सामान का सप्लाई मुफ्त में करता है। एक लेखपाल के अनुसार सौ पीस पीयर्स साबुन, सौ पीस मार्टीन जैसे आइटम खरीद के देने पड़ते हैं और दूसरा नौकर आस-पास की परचून की दुकान पर उक्त साबुन या आवश्यकता से अधिक सामान वापस कर मेमसाहब को पैसे देता है। जेल अधिकारीयों का काम होता है उनकी गाय को भूसा सप्लाई करना। यह सब प्रशिक्षण उनको किसी प्रशिक्षण महाविद्यालय मे नहीं दिया जाता है बल्कि स्वभावत: उनकी प्रशासनिक सेवा की यह सब हरकतें भी अंग हैं।

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बृहस्पतिवार, 22 दिसम्बर 2011

प्रधानमंत्री द्वारा एक सच्चाई की स्वीकारोक्ति ----लेकिन किस लिए ?

16 नवम्बर के समाचार पत्रों में प्रधानमंत्री का एक बयान छपा है | उसमे उन्होंने देश में गरीबी , स्वास्थ्य , पर्यावरण की समस्याओं को दूर करने के लिए नयी सोच और नई कार्य -प्रणाली की जरूरत को उठाया है | इस संदर्भ में नये परिवर्तन के लिए बने 'इनोवेशन फण्ड (प्रवर्तन कोष ) की शुरुआत के लिए सरकार द्वारा 100 करोड़ रूपये देने की घोषणा भी की गयी है | यहा तक इस खबर में कोई ख़ास बात नही हैं |कयोंकि इसमें तमाम प्रोग्रामो की घोषणाये आये दिन होती रहती है | लेकिन उनका कोई उल्लेखनीय परिणाम आम समाज में आज तक दिखाई नही पड़ता | इस मौके पर प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में एक महत्वपूर्ण सच्चाई को भी स्वीकार किया |उसे आप भी सुनिए | पहले तो उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक ' नई सोच ' का इस्तेमाल अमीरों की जरूरते पूरा करने के लिए हुआ हैं | लेकिन अब गरीबो के लिए कुछ करने की जरूरत है |फिर इस बात को और स्पष्ट करते हुए कहा कि 'हमने अन्तरिक्ष ,प्रैद्योगिकी , परमाणु उर्जा और वाहन जैसे क्षेत्रो में बहुत कुछ नया किया है |हमारे देश में यह नव प्रवर्तन ज्यादातर अमीरों की जरुरतो को ध्यान में रखकर किया गया है और गरीबो की समस्याओं को दूर करने पर पर्याप्त ध्यान नही दिया गया है |हम चाहते है कि इस दिशा में भी कुछ किया जाए | नव प्रवर्तन कि अवधारणा फण्ड एक बड़ा बदलाव लाने में कारगर साबित होगा |
यह देश का प्रधानमन्त्री कह रहा है कि अभी तक किया जाता रहा नव प्रवर्तन अमीरों की जरूरते पूरी करता रहा है और उसमे गरीबो की समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान नही दिया गया है | इस सच्चाई और उसकी स्वीकारोक्ति के लिए प्रधामंत्री जी को गरीबो कि तरफ से धन्यवाद जरुर दिया जाना चाहिए | लेकिन साथ ही उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर उन्हें इसकी जानकारी कब हुई ? अगर यह जानकारी उन्हें पहले से ही थी तो वे देश के बहुमत गरीबो को अब तक उपेक्षित करके अमीरों के हितो के अनुसार नव प्रवर्तन का काम क्यों होने दीये ? उसे शुरू से ही देश के बहुसख्यक गरीबो के हित की दिशा में क्यों नही मोड़ा ?
लेकिन इससे अलग और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि आखिर ऐसा हुआ कैसे ? अमीरों का भला और गरीबो कि उपेक्षा क्यों कर होती रही | 1991 के वित्त मंत्री और अब के प्रधानमन्त्री के रूप में वे स्वंय तथा अन्य कांग्रेसी व गैर कांग्रेसी नेतागण 20 साल से लागू की जाती रही नीतियों से देश के तीव्र आर्थिक विकास के साथ देश से गरीबी , बेकारी दूर करने की बाते कहते रहे है | वैश्वीकरण की ' नई सोच ' नये आधुनिकतम तकनीकी विकास के नव -प्रवर्तन के जरिये देश को 21 वी सदी में ले जाने तथा वैभव , शक्ति से सम्पन्न बनाने के बयानों प्रचारों को चलाते , चलवाते रहे है | क्या माना जाए कि तब हमारे नेतागण व् विद्वान् अर्थशास्त्री गण और इन दोनों के सिरमौर , वर्तमान अर्थशास्त्री प्रधानमन्त्री जी भी यह नही जानते थे कि इस नई सोच व नई तकनीकी विकास आदि के नव - प्रवर्तन के जरिये देश के गरीबो का नही बल्कि अमीरों का ही भला होना है ?यह बात कत्तई मानने लायक नही हैं | साफ़ बात है वे और अन्य उच्च स्तरीय नेतागण यह बात बखूबी जानते थे और जानते है कि देश दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों को छूटे व अधिकार देते हुए देश के मेहनतकश व् गरीब जनसाधारण हिस्से की छूटो व् अधिकारों को काटा व् घटाया जाना जरूरी है | क्योंकि देश दुनिया को बढावा देने का कोई ' नया रास्ता ' ' नई तकनिकी ' न तो है और न ही हो सकती है | इसलिए आम किसानो , मजदूरों , दस्तकारो , छोटे उद्यमियों तथा साधारण पढ़े - लिखे नौजवानों की छूटो व अधिकारों , अवसरों तथा स्थायी साधनों की निरन्तर कटौती के रूप में यह काम किया भी जाता रहा | अब अगर गरीबो के लिए ' नई सोच ' नई तकनीक ' या नव प्रवर्तन के जरिये कुछ करना है तो उसका एक ही रास्ता है की अमीरों की बढती अमीरी पर सख्त रोक लगाई जाए | लेकिन यह काम वैश्वीकरणवादी , उदारीकरणवादी ,निजीकरणवादी नीतियों को वापस लिए बिना सम्भव नही है | या कहिये की इसकी शुरुआत ही अब यही से करनी पड़ेगी | लेकिन प्रधानमंत्री जी का मंत्रीपरिषद तो उन नीतियों को आगे बढाने में जुटा हुआ हैं | उसके लिए विधयेक पर विधयेक तैयार कर रहा है | फिर यही काम पिछले 15 सालो से सभी प्रमुख पार्टिया केन्द्रीय शासन - सत्ता में बैठकर करती रही है | ऐसी स्थितियों में प्रधानमन्त्री महोदय का या किसी अन्य राजनेता व विद्वान् का गरीबो की भलाई के लिए नई सोच व नई तरकीब के लिए प्रयास करने के बयान व चिंताए जनसाधारण गरीब जनता के लिए एक और झूठ व छलावा ही साबित होना हैं | प्रधानमंत्री के बयान को सुनकर मुझे नागार्जुन बाबा के यह शब्द याद आ गये

ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का,
फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका!
बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!
भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!

ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,
अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!
सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर
एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!

छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,
देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!

-सुनील दत्ता
पत्रकार

बुधवार, 21 दिसम्बर 2011

देश के 75 प्रतिशत आवाम को जीने का कोई हक नही धनाढ्य वर्ग नही चाहता कि ये अपनी जिन्दगी को जिए

प्रचारित घाटे का हो -हल्ला पर वास्तविक घाटे पर चुप्पी

( देश की सत्ता - सरकारे तथा देश के धनाढ्य व उच्च वर्गीय हिस्से देश की बहुसख्यक जनता के वास्तविक संकट को राष्ट्रीय संकट व जन - संकट मानते ही नही | सच्चाई तो यह है कि वे देश कि 60 - 70 प्रतिशत जनता को देश में जीवित रहने के काबिल ही नही मानते )

कई यूरोपीय देशो और अमेरिका के कर्ज़ - संकट का हो - हल्ला मच रहा है | सम्मलेन पर सम्मलेन हो रहे है |अन्तराष्ट्रीय स्तर पर उसके समाधान के रास्ते तलाशे जा रहे है | वहा के संकटों के विश्वव्यापी फैलाव - बढ़ाव पर भी दुश्चिंताए प्रकट की जा रही है | इस देश में उसके उपर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर चिंताए - चर्चाये चल रही है | इन संकटों के फलस्वरूप देश से विदेशो को होने वाले निर्यात वृद्धि दर में घटाव के आंकड़ो के साथ भविष्य में और ज्यादा घटाव की आशंकाएं जताई जा रही है |उदाहरण ----जुलाई माह के निर्यात में 80% की वृद्धि को अक्तूबर में घटकर 35% की वृद्धि रह जाने पर खासी हाय तौबा मची हुई है | फिर विदेशो से देश में होने वाले आयात के स्थिर रहने या बढ़ते रहने और निर्यात की वृद्धि दर में गिरावट आने के फलस्वरूप देश के विदेशी व्यापार घाटो के तेज़ी से बढने के आंकड़े भी सुनाये जा रहे है | वैश्विक आर्थिक संकट के फलस्वरूप घटे निर्यात और बढ़ते विदेशी व्यापार घाटे के साथ घटे विदेशी निवेश आदि देश के आर्थिक विकास की दर में कमी आने की आशंकाएं जताई जा रही हैं| बताया यह जा रहा है कि बढ़ते वैश्विक आर्थिक संकट के फलस्वरूप पहले से अनुमानित 8.5% की आर्थिक वृद्धि दर अब 7.5% तक या उससे भी नीचे जा सकती है | अभी तीन साल पहले विश्वव्यापी वित्तीय संकट का रोना रोया जा रहा था | एक तरफ तो यह कहा जा रहा था कि इस वैश्विक संकट का देश में बहुत कम प्रभाव पड़ा है और दूसरी तरफ देश की धनाढ्य कम्पनियों को , निर्यातको , आयातकों को लाखो करोड़ो का पैकेज दिया जा रहा था | यह पॅकेज नाम मात्र के घटाव के साथ पिछले 3 - 4 सालो से दिया जाता रहा है | अब नये वैश्विक संकट के नाम पर यानी पहले के वित्तीय संकट का हो - हल्ला मचाकर देश के धनाढ्य हिस्सों के "घाटे " कि या संभावित घाटे की आशकाए बताई जा रही है | फिर उसकी भरपाई के लिए भी सरकारी छूटे , सहायताए मांगी जा रही है |सरकार उनकी मांगो को ध्यान से सुन रही है और उसकी आपूर्ति के लिए तैयारी भी कर रही है | जबकि यह प्रचारित और संभावित घाटा भी ज्यादा से ज्यादा उनके लाभ दर में कमी या उसमे संभावित कमी से ज्यादा कुछ नही हैं | यह घाटा उनके जीवन का घाटा तो कदापि नही है | इस बहुप्रचारित व संभावित घाटो के वावजूद धनाढ्य व उच्च हिस्सों के उच्च स्तरीय रहन - सहन, सुख - सुविधा तथा ऐश- आराम के साथ करोड़ो - करोड़ के खेल तमाशो आदि में न तो तीन साल पहले कमी आई और न अब नजर आ रही है | फिर भी उनके घाटो का प्रचार लगातार जारी है | सरकार को उसकी घहरी चिनाये भी है |धनाढ्य हिस्से सरकारों के सिर आँखों पर है | न केवल उनके प्रचारित संभावित घाटो कि आपूर्ति के लिए सरकारे तत्परता से खड़ी रही है , बल्कि उनके लाभों - पूंजियो , सम्पतियो , आमदनियो आदि में बेतहाशा वृद्धि के लिए नीतिगत एवं योजनागत छूटे व अधिकार देती और बढाती आ रही हैं। जनता से वसूले गये जाते रहे टैक्सों से भरे जाते रहे सरकारी खजाने का मुँह उनके लिए हमेशा खुला रहा है |खासकर पिछले 20 -25 सालो से लागू विदेशी आर्थिक नीतियों एवं डंकल प्रस्ताव के बाद से तो यह काम एकदम नग्न रूप में किया जाता रहा है |देश की सत्ता - सरकारे न केवल देश के धनाढ्यो के वृद्धि दर में घटाव की आपूर्ति के लिए तत्पर है , बल्कि यूनान व इटली जैसे यूरोपीय देशो के कर्ज़ संकट को टालने के लिए भी पूरा जोर लगा रही है | चूँकि देशी कम्पनियों व आयातकों , निर्यातको के कारोबार अमेरिका व यूरोप से मिलते रहे वित्तीय व तकनीकी सहायताओ तथा वहा के बाजारों से जुड़े हुए है इसलिए भी वे और देश की सत्ता - सरकारे विदेशो के संकटों के समाधान में अपना सहयोग देने के लिए हमेशा ही तत्पर खड़े हैं |.............पर देश के जनसाधारण के संकटों के लिए क्या हो रहा है ?उसको आमतौर पर संकट कहना ही बन्द कर दिया गया है |न कही किसानो में बढती आत्महत्याओं पर चिंता है और न ही आम मजदूरों , किसानो दस्तकारो , दुकानदारों , छोटे कारोबारियों व साधारण पढ़े - लिखे नवयुवको के रोजगार आदि की चिन्ता हैं |न ही बढती महगाई के संकटों पर किसी हद तक लगाम लगाने की चिन्ता है और न ही जनसाधारण के किसी हद तक स्थाई संसाधनों आदि के कटने - घटने पर कोई चिन्ता , चर्चा हैं | उल्टे बढती जनसमस्याओ के संदर्भ में कभी - कभार की खबरों के अलावा देश की आम जनता को गरीबी व भुखमरी के संकटों से उपर उठते हुए दिखाया व प्रचारित किया जाता रहा है |जबकि दर हकीकत बढती महगाई , बेकारी आदि की समस्याओं से देश की 75% आबादी का जीवन संकटों से घिरता जा रहा है | खाने - पीने , रहने - सहने की दिकत्तो , संकटों के साथ शिक्षा व स्वास्थ्य की न्यून स्तर की उपलब्धि हासिल करने में भी जनसाधारण का व्यापक हिस्सा अक्षम व अशक्त होता जा रहा है | टी0 वी0 पर हो रहे करोड़ो - करोड़ के खेल - तमाशे को तथा उच्च वर्गीय घरो - परिवारों की हरामखोरी - फैशनबाजी आदि से सुसज्जित सीरियलों , फिल्मो को दिखाकर ही आम लोगो को , खासकर नई पीढ़ी के लोगो को खुशफहमी पालने की सीख दी जा रही हैं | लेकिन जीवन की बुनियादी आवश्यकताओ की आपूर्ति में बढती जा रही कमी कटौती में ऐसीखुशफहमियो का कोई आधार नही खड़ा हो पा रहा है , न ही उसकी कोई उम्मीद नजर आ रही है कि देश की सत्ता - सरकारे तथा देश के धनाढ्य व उच्च वर्गीय हिस्से देश की बहुसख्यक जनता के इस वास्तविक संकट को राष्ट्रीय -संकट व जन - संकट मानते ही नही | सच्चाई तो यह है की देश की 60- 70 प्रतिशत जनता को देश में जीवित रहने के काबिल ही नही मानते |क्योंकि उच्च तकनिकी के अंधाधुंध आयात और अंधाधुंध इस्तेमाल के आगे अब उनको साधारण श्रम की और जनसाधारण के रूप में मौजूद बाज़ार की पहले जैसी जरूरत नही हैं |क्योंकि आम जन अपनी कमजोर क्रय शक्ति के कारण देश - विदेश की धनाढ्य कम्पनियों के टिकाऊ और ज्यादा लाभ देने वाले मालो , सामानों की बिक्री बढाने वाले बाज़ार नही बन सकता |इसलिए अब मुख्यत:धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के लिए काम करती रही सत्ता - सरकार की जनसाधारण के प्रति मुख्य चिन्ता पार्टियों और सत्ता - सरकारों के प्रति चुनावी व गैर चुनावी समर्थन की ही रह गयी है | यह उन्हें विभिन्न रूपों में खासकर धर्म , जाति, इलाका , भाषा आदि के नाम - नारों और वैसे ही छोटे - मोटे पर बहुप्रचारित छूटो सहूलियतो आदि के जरिये मिलता भी रहा है | इसीलिए भी वे देश के व्यापक जन की समस्याओं , संकटों की उपेक्षा करके उसे निरन्तर बढाते हुए देश - दुनिया के धनाढ्य वर्गो के बहुप्रचारित संकटों को टालने के काम में जी जान से लगी हुई है |लेकिन तब इन सत्ता सरकारों को जनसाधारण की जनतांत्रिक सत्ता - सरकारे नही बल्कि धनाढ्य व उच्च हिस्से की जनतांत्रिक सत्ता - सरकारे कहना , समझना ही उचित हैं | उन्हें जन - साधारण की बुनियादी समस्याओं की अनदेखी करने वाली सत्ता - सरकार कहना व मानना कही से अनुचित नही है एक दम उचित हैं |

है बहुत अंधियार अब सूरज निकलना चाहिए
जिस तरह से भी हो ये मौसम बदलना चाहिए

रोज़ जो चेहरे बदलते है लिबासों की तरह
अब जनाज़ा ज़ोर से उनका निकलना चाहिए
फूल बन कर जो जिया वो यहाँ मसला गया
जीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए

छिनता हो जब तुम्हारा हक़ कोई उस वक़्त तो
आँख से आँसू नहीं शोला निकलना चाहिए

नीरज की यह लाइने हमें लड़ने का संबल देती है

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

मंगलवार, 20 दिसम्बर 2011

अमरीका में वाल स्ट्रीट कब्जा करो आंदोलन स्वर्ण किले पर दावेदारी भाग 2


इस प्रदर्शन के प्रति पुलिस का रवैया काफी कड़ा है। अब तक हजारों लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। सैकड़ों लोग पुलिस के बल प्रयोग से बुरी तरह घायल हुए हैं। इस अभियान में शामिल प्रदर्शनकारी महिलाओं के खिलाफ पुलिस अत्यंत हिंसक और यौन उत्पीड़क व्यवहार कर रही है। यह अमरीका में अपने ही लोगों के खिलाफ किए जा रहे व्यवहार का भिन्न तरह का नमूना है, जो बताता है कि वहाँ की राजसत्ता किस तरह अपना नकाब उतार कर फेंक चुकी है। अमरीका में चल रहा आंदोलन यूरोप में चल रहे मजदूर आंदोलन का विस्तारित रूप है। यह ऊपर से देखने पर अरब में उभरकर आए जनांदोलन जैसा दिख सकता है। यह रूप की समानता भले ही हो, पर अंतर्वस्तु में एकदम भिन्न है। यह आंदोलन एक भिन्न देश व सन्दर्भ में उभरकर आया है। जिसकी काफी हद तक समानता यूरोप में उठ रहे असंतोष, मजदूर व आम लोगों के द्वारा किए जा रहे हड़ताल प्रदर्शन के साथ है। दरअसल यह पूँजी के साम्राज्य का उतरता हुआ आवरण है, जो बुरी तरह झीना हो चुका है। बमुश्किल चार साल पहले- 2008 में मंदी की मार से एशियाई व यूरोपीय देश बुरी तरह तबाह थे। उस समय यह दावा किया गया कि मंदी खत्म हो चुका है और पूँजीवादी अर्थव्यवस्था एक बार फिर पटरी पर है। पर न तो उस समय मंदी की मार खत्म हुई और न ही उससे निपटने के शिगूफे सफल हो पाए। जापान का विकास दर .05 प्रतिशत के आसपास बना। यूरोपीय देशों में जर्मनी, स्वीडेन जैसे कुछ देशों को छोड़कर वहाँ के हालात बद से बदतर बने रहे। अमरीका में 1947 से 2011 की शुरुआत तक औसत विकास दर 3.80 प्रतिशत रहा है, वह 2011 के मध्य में आकर 1.30 प्रतिशत रह गया है। आमतौर पर मैन्यूफैक्चरिंग यूनिटों में विकास दर गिरने का अर्थ बड़े पैमाने पर मजदूरों की छँटनी होना होता है। जब यह आम बीमारी की तरह फैलने लगता है तब इसका सीधा असर बैंकिंग या वित्तीय पूँजी पर होता है। पूँजीवादी व्यवस्था पर खड़ी सरकार के आय व व्यय पर पड़ने वाले इसके असर से न केवल विभिन्न संस्थान संकट में आ जाते हैं बल्कि यदि संकट गंभीर हो तो खुद सरकार के होने का ही संकट खड़ा हो जाता है। मध्यम आयवर्ग के लोगों की आय में या तो सीधी कटौती की जाती है या उनकी खरीद क्षमता को ही गिराकर उनसे अधिक वसूल किया जाने लगता है। मध्यम व उच्च आय के लोग अपनी जरूरतें पूरा करने के लिए कर्ज का सहारा भी लेते हैं जिसे आय न होने के चलते पर पाना मुश्किल होता है। वित्तीय बाजार में यह संकट बचत से अधिक खर्च के रूप में प्रकट होता है। वैश्वीकरण के दौर में पूँजीवादी साम्राज्यवाद ने जिस वृहद एकाकार होते वैश्विक पूँजी के राज का चित्र खींचा था वह एक देश में अपने विशिष्ट संकटों के साथ दूसरे देशों के आम संकट से मिलकर एक वृहद संकट का चित्र खड़ा कर रहा है। वैश्वीकरण के दौर में जिस वित्तीय पूँजी के सहारे गैर उत्पादक कार्य के माध्यम से अर्थव्यस्था को फूँककर फुलाया गया, वह आज अपनी वास्तविक जमीन को खोजते हुए नीचे आ रहा है। आज भारत व चीन में जो विकास दर दिख रहा है उसके पीछे भागकर आ रही वित्तीय पूँजी का निवेश है जो अमरीकी संकट के दौरान कमाई का जरिया खोजने में लगी है। वैश्विक मुद्रा की दावेदारी करने वाले डालर को राजनैतिक जोर जबरदस्ती के बदौलत उसकी साख को अमरीका बचाने में लगा है। वास्तविक उत्पादन विनिमय में मुद्रा की यह भूमिका पहले से कहीं अधिक जटिल व आक्रामक होकर उभरा है। वैश्वीकरण जिस पूँजीवादी साम्राज्यवाद को बचाने के लिए युद्ध व विŸा की व्यवस्था के साथ उभरी आज वह तबाही का मंजर खड़ा करते हुए अंततः खुद अपने ही देश में बन रहे दलदल में फँस गया है। वॉल स्ट्रीट पर कब्जा आंदोलन यह बता रहा है कि मंदी 2008 के बाद भी खत्म नहीं हुआ बल्कि वह बढ़ता गया है। आज इस मंदी की बाढ़ से लोगों का दम घुट रहा है। यह मीडिया ही है जो संकट की तस्वीर देने के बजाय यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि मंदी तो बस ग्रीस तक है और वह भी उबर ही जाएगा जबकि अमरीकी अर्थव्यवस्था अपने ही पैरों पर गिरने को हो रही है। यहाँ यह जरूर याद कर लेना ठीक होगा कि मंदी से धनिकों की संपत्ति में इजाफा होना नहीं रुकता और न ही उनके सी0इ0ओ0 की तनख्वाहों में कमी आती है। हाँ, धनिकों का एक हिस्सा तबाह हो जाता है और संचित निधि का बँटवारा चंद पूँजीपति अपनी ताकत के अनुसार कर लेते हैं। पूँजीवाद जब तक है वह अपने राजनीति व अर्थनीति में धनी होने का सिद्धांत है। इसकी सबसे बड़ी मार आम जन व श्रमिक समुदाय पर पड़ता है। आज अमरीका के आम लोग व श्रमिक समुदाय जिस वॉल स्ट्रीट कब्जा आंदोलन के साथ आगे आए हैं वह अमरीकी पूँजीवादी साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष की शुरुआत है। यह आंदोलन धनिकों पर नियंत्रण रखने, सरकार की नीतियो में फेर बदल कर जन के पक्ष में ले आने, बेरोजगार व नौकरी खो रहे लोगों को सामाजिक सुरक्षा देने व मजदूरों को उनके यूनियन बनाने के अधिकार के साथ सामने आया है। यदि हम इसे अमरीका के श्रमिक आंदोलन के इतिहास के सामने रखकर देखें तो यह बेहद कमजोर दिखेगा। पर यदि हम इसे आज के सन्दर्भ में रखें तो निश्चय ही इसके विभिन्न मायने निकलेंगे।

-अंजनी कुमार
समाप्त
-साभार

सोमवार, 19 दिसम्बर 2011

अमरीका में वाल स्ट्रीट कब्जा करो आंदोलन स्वर्ण किले पर दावेदारी भाग १


वैश्वीकरण के दौर में बुद्धिजीवियों के एक हिस्से ने अमरीका को इम्पायर यानी महान सम्राट के नाम से सम्बोधित किया था। यह नाम उसकी अपराजेयता और उसका खात्मा होने पर साम्राज्य के पहले जैसे बने रहने के लिए दिया गया था। इस बात में कितनी सच्चाई है यह अब भविष्य के गर्भ में है, पर यह भी सच है कि आज यूरोपीय साम्राज्यवाद अपने ही भार से जिस तरह भहरा रहा है उससे अमरीकी साम्राज्यवाद अछूता नहीं रह गया है। ग्रीस का बजट घाटा और बाजार में देनदारी व खुद सरकार की वैश्विक बाजार में गिर चुकी साख की बीमारी पड़ोसी देशों में इस कदर फैलती जा रही है कि उसने महज दो सालों में अमरीका की वित्तीय साख में भी बट्टा लगा दिया है। बजट घाटा की अध्यक्षा ने साफ घोषित कर दिया कि यदि इस तरह के हालात बने रहे तो मुद्रा कोष इस तबाही को सँभाल नहीं पाएगा। अब तक कुल 160 बिलियन डॉलर ग्रीस में झोंक देने के बाद भी संप्रभू साख यानी सरकार चलाने के लिए जरूरी आय को हासिल करने की क्षमता हासिल नहीं हो पा रही है।
चंद दिनों पहले सरकारी खर्च की कटौती के लिए 30 हजार लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया गया। यही हालत इटली, स्पेन, फ्रांस आदि देशों की भी है। अमरीका में त्रिस्तरीय उच्च ग्रेड के एक हिस्से के ए से बी हो जाने का असर यह हुआ है कि लाखों लाख लोग सड़क पर फेंक दिए गए। आय को बचाने के लिए सामाजिक कटौती करने की नीति पर चर्चा होने लगी। बावजूद इसके वॉल स्ट्रीट पर हालात नहीं सुधरे। बोइंग कंपनी से निकाले जाने वालों की संख्या में कमी नहीं आई। ओबामा ने एक तरफ रोजगार के अवसर बनाने का आश्वासन दिया, तो दूसरी ओर वित्तीय साख को हासिल करने के लिए हर संभव प्रयास करने का आश्वासन भी, पर सूचकांक की गिरावट में कभी-कभार के चंद सुधारों के बाद भी हालात बिगड़ते ही गए। आज खुद अमरीका में स्थितियाँ इतनी जटिल होती गई हैं और कारपोरेट व वित्तीय संस्थानों की पकड़ इतनी मजबूत हो चुकी है कि वहाँ कींस के सिद्धांत पर अमल की बात करना भी एक क्रांतिकारी काम हो गया है। अमरीका में इस इम्पायर के स्वर्ण किला वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करने का अभियान चल रहा है। वॉल स्ट्रीट पर कब्जा यानी वित्तीय संस्थानों की घेराबंदी। वॉल स्ट्रीट के सूचकांकों के ऊपर या नीचे होने से सिर्फ कंपनियों के शेयर खरीदने वालों की ही तबाही नहीं होती, इससे सीधा बाजार भाव व आय और रोजगार जुड़ा होता है। यहाँ प्रति मिनट अरबों डालर हवा की तरह भले उड़कर जाता या आता हुआ न दिखे, पर रोजमर्रा की जिंदगी में यह बेहद ठोस रूप में आता-जाता है। सितंबर 2011 के मध्य में अमरीका में नौकरी खोजने वाले युवा, नौकरी खो देने वाले कर्मचारी, श्रम करने वाले विभिन्न विभागों के लोग, मध्यम आय वर्ग के बुजुर्गों आदि ने एक लंबे सुगबुगाहट, सोशल नेटवर्क पर एक दूसरे के साथ संपर्क बनाने के बाद विभिन्न जुटानों, चैराहों पर बहस-मुबाहिसों के बाद 17 सितंबर को न्यूयार्क की सड़कों पर मार्च किया। 18 सितंबर को न्यूयार्क के एक चैराहे- 12 स्ट्रीट, जिसे अब ‘लिबर्टी चैराहा’ कहा जा रहा है, पर आम सभा (जनरल एसेंबली) बुलाई गई। न्यूयार्क पुलिस ने वहाँ किसी भी तरह का टेंट आदि लगाने पर रोक लगा दी। बावजूद इसके मेडिकल, भोजन उपलब्ध कराने वाले गु्रप व मीडिया खुलकर सहयोग में आ गए। यहाँ विभिन्न समूहों के बीच चली घंटों बहस के बाद नारा तय किया आक्यूपाई वॉल स्ट्रीट यानी वॉल स्ट्रीट पर कब्जा करो। 18 सितंबर की सुबह वॉल स्ट्रीट की ओर हजारों लोगों ने मार्च किया। इसके बाद अमरीका के विभिन्न शहरों में इस तरह के जुटान व वित्तीय और पुलिस संस्थानों के खिलाफ प्रदर्शन का सिलसिला शुरू हो गया। वाशिंगटन, लॉस ऐजेंल्स, शिकागो, बोस्टन मियामी, पोर्टलैंड, ओरेगों, सीएटल, देनेवर आदि शहरों में हजारों की संख्या में लोग इकठ्ठा होकर वॉल स्ट्रीट कब्जा करो के अभियान में लग गए। विभिन्न टेड यूनियनों ने इसमें भागीदारी का खुलकर समर्थन किया है। अमरीका की सबसे बड़ी यूनियन ए0एफ0एल0, सी0आई0ओ0 ने कलिन पुल पर कब्जा करने की रणनीति को समर्थन देते हुए इसके अध्यक्ष ने कहा कि वॉल स्ट्रीट हमारे नियंत्रण से बाहर हो गया है। इस पर कब्जा करने की नीति से हमारी ओर इनका ध्यान खींचना आसान होगा। सैनफ्रांसिस्को लेबर काउंसिल ने इस प्रदर्शन को समर्थन देते हुए नारा दिया संपत्ति की असमानता को खत्म करो, बेघरों को घर दो, गरीबी खत्म करो, भ्रष्टाचार खत्म करो। आॅक्यूपाई वॉल स्ट्रीट मूवमेंट ने 13 माँगों को सामने रखा है-जीने के लिए वेतन, बीमार होने पर दवा करा सकने की मेडिकल सुरक्षा, बेरोजगारी भत्ता, मुफ्त शिक्षा, तेल की तबाह करने वाली अर्थव्यवस्था को खत्म करने के लिए ऊर्जा के अन्य साधनों का अनिवार्य प्रयोग, अधिसंरचना विकास के लिए एक ट्रिलियन डालर का निवेश, नस्ल व लैंगिक बराबरी को लागू करना, प्रवास पर रोक का खात्मा, चुनाव को पारदर्शी बनाना, सभी तरह के कर्ज का खात्मा, देनदारी सूचकांक एजेंसी का खात्मा, यूनियन बनाने व मजदूरों को अपना यूनियन चुनने का अधिकार। 12 लाख की सक्रिय सदस्यता वाली यूनियन अमेरिकी स्टील वक्र्स ने इस आंदोलन में हिस्सेदारी करने का निर्णय लिया है। न्यूयार्क की 40 हजार सदस्यता वाली ट्रांसपोर्ट वर्कर्स यूनियन, जिसमें रिटायर लोग भी शामिल हैं, ने इसमें भागीदारी व जरूरत पड़ने पर हड़ताल पर जाने का निर्णय लिया है। आज अमरीका में एक करोड़ लोग सामान्य जीवन जीने की सुविधाओं से वंचित हो चुके हैं। यहाँ 20 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। प्रतिवर्ष लाखों लोग नौकरी से बाहर किए जा रहे हैं। दूसरी ओर उतनी ही तेजी से धनाढ्यता के टापू खड़े हो रहे हैं। इस आंदोलन को नोअमी क्लेन, नोम चोम्सकी, माइकेल मूर, एनी रैंड, जोसेफ स्टील्ज, जार्ज सोरोस आदि ने खुला समर्थन दिया है व इसमें भागीदारी की है। इसमें विभिन्न वैचारिक धाराओं, अराजकतावादी, लिबरल, समाजिक जनवादी जैसे लोग शामिल हा रहे हैं।

-अंजनी कुमार
क्रमश:
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