शनिवार, 31 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन - 4

अन्तर्राष्ट्रीय वैधानिक व्यवस्था एवं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा व्यवस्था का पतन एवं अन्तर्राष्ट्रीय विधिक न्यायालय एवं संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति की निष्क्रियता।
    संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर की प्र्रस्तावना में यह लिखा हुआ है कि हम ‘‘संयुक्त राष्ट्र संघ’’ के लोग आने वाली पीढि़यों को युद्ध की विभीषिका से बचाने के लिए कृत संकल्प हैं, जिसने कि मानवता को दो बार अनगिनत कष्टों में लिप्त किया है। इस घोषणा के बावजूद सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य जिन्होंने द्वितीय युद्ध के पश्चात व्याप्त भौगोलिक राजनैतिक, परिस्थिति के फलस्वरूप विशेष दर्जा प्राप्त किया। सहयोगी शक्तियों के राजनैतिक एवं सैनिक रूप से प्रबल होने के कारण स्थाई सदस्यों ने संयुक्त राष्ट्र संघ को निरन्तर एवं कभी न समाप्त होने वाले युद्धों की ओर ढकेला है, संयुक्त राष्ट्रों के आन्तरिक मामलों में सैनिक हस्तक्षेप किया है एवं छोटे देशों के खिलाफ आर्थिक रोक लगाई है ताकि वे उनके संसाधनों पर अनधिकृत कब्जा कर सकें। विश्व की नवीन राजनैतिक व्यवस्था जो कि मानवता के विपरीत है उस समय उत्पन्न हुई जब पूर्व सोवियत समाजवादी गणराज्य संगठन की पोलिट ब्यूरो 1991 में धराशायी हो गई। यह वह समय था जबकि विश्व के पश्चिमी देशों में अर्थ व्यवस्था मुसीबत से घिर चुकी थी, परन्तु लोगों की नजरों से यह बात छिपी हुई थी।
    चीन ने इन घटनाओं से पहले पश्चिमी संसार से यह समझौता किया था कि वह अपनी अर्थव्यवस्था और राजनीति को बदल देगा, यदि उसको सर्वाधिक प्रिय राष्ट्र का दर्जा प्रदान किया जाएगा।
    इसके बदले वह अमरीका तथा यूरोपियन कम्पनियों को एवं जी0 7 राष्ट्रों की अन्य कम्पनियों को चीन में व्यापार करने की अनुमति प्रदान करेगा तथा सभी प्रकार के व्यापारिक प्रतिबंधों को उठा लेगा। चीन इस बात पर सहमत हुआ कि वह विश्व के राजनैतिक एवं रणनीति सम्बंधी आदेशों को जिस पर अमरीका और उसके सहयोगी राष्ट्रों का पूरा दबदबा है, से पूरी तरह सहमत रहेगा। परिणाम स्वरूप चीन ने ईराक के विरुद्ध लगाए गए प्रतिबंधों पर अपने वीटों का प्रयोग नहीं किया। वह इस बात पर भी सहमत हुआ कि वह चीन का सस्ता लेबर बिना मोल भाव किए हुए प्रदान करेगा, बहुत से क्षेत्रों में राज्य द्वारा चलाई गई कम्पनियों को समाप्त कर देगा एवं इन कम्पनियों के मुनाफे को स्वदेश सुरक्षित भेज देगा एवं उत्पादन की कीमत को घटाएगा।
    सुरक्षा परिषद के द्वारा 1989 के पश्चात पारित किए गए अधिकतर प्रस्ताव अप्रजातांत्रिक हैं क्योंकि ये प्रस्ताव कमजोर राष्ट्रों को आर्थिक एवं सैनिक रूप से धमकाना चाहते हैं जो पहली दृष्टि में ही संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर का खुला हुआ अतिक्रमण है।
संयुक्त राष्ट्र संघ का चार्टर, यदि व्याख्या सम्बंधी कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो वह सभी समझौतों से सर्वोपरि है। केवल कुछ उदाहरण ही पर्याप्त हैं इस बात को साबित करने के लिए कि संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह से धराशायी हो चुकी है एवं संयुक्त राष्ट्र संघ सैनिक रूप से कमजोर, छोटे सदस्यों के हितों को अब सुरक्षा प्रदान नहीं करता। सुरक्षा परिषद के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र संघ की महा सभा ने भी लीबिया के वर्तमान मामले में आश्चर्य जनक रूप से स्वेच्छाचारिता से काम लिया है। उसने संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार सभा एवं सुरक्षा परिषद की सिफारिश पर बगैर तथ्यों की जाँच किए हुए लीबिया को संयुक्त राष्ट्र संघ से निलम्बित कर दिया। कर्नल गद्दाफी पर यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने 600 बगाज़ी नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया है। संयुक्त राष्ट्र संघ मंे भारत के स्थायी दूत श्री हरिदीप पुरी ने सुरक्षा परिषद द्वारा लीबिया के ऊपर पारित दो प्रस्तावों के संदर्भ में यह बात कही कि किसी विश्वसनीय जाँच का अभाव है। विडम्बना यह है कि नेशनल ट्रांजीशनल काउंसिल के नाटो के साथ सहयोग के बावजूद 60,000 लीबियाई नागरिकों की हत्या की गई, फिर भी सुरक्षा परिषद, महासभा एवं संयुक्त राष्ट्र संघ की मानवाधिकार सभा ने एन0टी0सी0 एवं नाटों शक्तियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

शुक्रवार, 30 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन - 3

विश्व स्तर पर प्रमुख आर्थिक एवं कार्पोरेट घरानों ने, जिन्हें उमड़ते हुए जन सैलाब का भय सता रहा है जैसा कि ग्रीस में देखा गया है, यह फैसला किया है कि वे लोगों के संवैधानिक अधिकारों को समाप्त करेंगे, हालाँकि इन घरानों के प्रमुख वक्ताओं ने अपने आधिकारिक वक्तव्यों में प्रजातंत्र एवं मानवाधिकारों का झूठा ढिंडोरा पीटा है। अधिकतर देशों में जहाँ कि अर्थव्यवस्था प्रबल है वहाँ की सरकारें चाहे वे सत्ता पक्ष की हों या विपक्ष की हों, उन्होंने मजदूर वर्ग एवं मध्यम वर्ग की आवाजों को दबाने का कार्य किया है। उन्होंने उचित एवं शांतिमय प्रतिरोधों को, भाषण एवं संगठन की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के बावजूद, पूरी तरह से कुचल दिया है। राजनैतिक आन्दोलनों में धन लगाने वाले यह सुनिश्चित करते हैं कि यदि कही गंभीर प्रतिरोध की आवाज उठे तो उसको कभी भी गंभीरता से न सुना जाए। एक कारपोरेट मीडिया उस आन्दोलन को या तो दबा देती है या उसको तोड़ मरोड़ कर पेश करती है या ध्यान को दूसरी तरफ केन्द्रित कर देती हैं या गैर सरकारी संगठन (एन0जी0ओ0) जो कारपोरेट घरानों से धन प्राप्त करते हैं उनको इस मीडिया के माध्यम से विशेष रूप से प्रसारित किया जाता है। यह मीडिया थोड़ा बहुत प्रतिरोध या (फर्जी) प्रतिरोध को उभरने देता है ताकि असहमति की आवाजंे विस्फोटक न बनने पाएँ। कारपोरेट घरानों से धन प्राप्त कर रहे गैर सरकारी संगठनों को एक विशेष कार्य परिक्षेत्र आवंटित किया जाता है जैसे कि मानवाधिकार, पर्यावरण, भ्रष्टाचार एवं सार्वजनिक हितों वाले मुद्दे (पी.आई.एल.) और जब पूँजीपति एवं कारपोरेट घराने वालों का आर्थिक एवं राजनैतिक रास्ता दुष्कर हो जाता है तो वे राजनैतिक विकल्प के रूप में अराजकता वादी समूहों को बढ़ावा देते हैं जो कि आपराधिक एवं छिपे तरीकों से नियंत्रण करने की कोशिश करते हैं।
                                          इन्हीं क्षणों में धन प्राप्त करने वाले गैर सरकारी संगठन (फर्जी) विरोधी दलों के साथ मिलकर सत्ता से अपदस्थ किए जाने वाली पार्टी के खिलाफ षड्यंत्र रचते हैं। सामाजिक समझौता जो पश्चिमी समाज के देशों के संगठित वेतनभोगी अथवा श्रमिक वर्ग एवं मध्य आय वर्ग के समूहों के साथ हुआ, वह पूर्व यू0एस0एस0आर0 एवं अन्य समाजवादी देशों की राजनैतिक समाप्ति के पश्चात धीरे-धीरे लुप्त होता गया। इन देशों को यह भय था कि कोई वैकल्पिक एवं आर्थिक व्यवस्था इसके स्थान पर आ जाएगी। इस राजनैतिक व्यवस्था के स्थान पर अब इन देशों में पुलिस राज्य स्थापित हो गया। संवैधानिक अधिकारों के ह्रास के सबसे प्रमुख उदाहरण संयुक्त राज्य अमरीका एवं ब्रिटेन हैं जहाँ भाषण देने की स्वतंत्रता का अधिकार, गोपनीयता का अधिकार, अनचाही गिरफ्तारी से स्वतंत्रता का अधिकार एवं दूसरे अधिकार जो केवल मध्यम एवं उच्च वर्ग एवं नस्ल विशेष को ही प्राप्त हैं, इनके ऊपर पिछले दो दशकों से बहुत ही व्यापक एवं गूढ़ निगरानी की जा रही है। विभिन्न वर्गों के बीच धन की विषमताएँ इतनी ज्यादा गहन है कि उन्हें भयावह की संज्ञा दी जा सकती है।
                                                   अभी हाल के दिनों मंे ब्रिटेन में जब पुलिस हत्याओं के विरोध में स्वाभाविक आंदोलन छिड़ा जिसके बाद गिरती हुई सामाजिक परिस्थितियों, बढ़ती हुई बेरोजगारी एवं गरीबी के फलस्वरूप दंगा भी हुआ। विरोधों का बर्बरता पूर्वक दमन कर दिया गया एवं रात को मजिस्टेªट नियुक्त किए गए जिन्होंने प्रथम बार के किशोर आरोपियों को भी जमानत नहीं दी, एवं उनके परिवारों को यह धमकी दी गई कि उनको सरकार द्वारा प्राप्त आवास से बेदखल कर दिया जाएगा। अमरीका में वकील एवं मुअक्किल के दरमियान पेशे वराना सम्बन्ध जो पहले बहुत पवित्र समझा जाता था, उस पर अब प्रतिबंध लगा दिया गया है। उन्हें सम्पर्क की गोपनीयता से अब वंचित कर दिया गया है। जिन राष्ट्रांे में नाटों शक्तियों एवं उनके सहयोगियों ने अधिग्रहण कर रखा है वे अब प्रजातांत्रिक देश नहीं रहें। उन्हें छावनियों में तब्दील कर दिया गया है ताकि वहाँ वे अधिक उत्पादों पर कब्जा जमा सकें। इन देशों में व्यक्तिगत एवं सामूहिक हत्याएँ आम हो गई हैं। आए दिन बम विस्फोट होते रहते हैं जैसा कि अफगानिस्तान एवं ईराक के उदाहरण से स्पष्ट हैं। ये सारी घटनाएँ नाटो शक्तियों अथवा उनकी सहयोगी सरकारों के द्वारा कराई जाती हैं, तथा इनकी कोई वैधानिक जिम्मेदारी भी नही .



 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

बृहस्पतिवार, 29 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -2

कारपोरेट एवं बैंकर्स फाउन्डेशन के सबसे बुद्धिमान एवं सर्वश्रेष्ठ पश्चिमी विचारकों ने सिफारिश की है कि विभिन्न देशों के संसाधनों, वित्त एवं राष्ट्रीय बजटों को नियंत्रित करने एवं उनके हाईड्रोकार्बन एवं खनिज पदार्थों को हड़पने का सबसे अच्छा तरीका युद्ध है। इसके माध्यम से वे अफगानिस्तान के नारकोटिक्स व्यापार को भी नियंत्रित कर रहे हैं जिससे प्राप्त आय को वे पश्चिमी बैंकों एवं प्रमुख आर्थिक संस्थाओं में जिनमें कि साख निर्गमन की सर्वाधिक शेयर होल्डिंग रखने वाली संस्थाएँ भी सम्मिलित हैं, लगाते हैं। उनके प्रमुख प्रस्तावित कार्यक्रमों में से एक यह भी है
कि वे तेल उत्पादन को नियंत्रित करना चाहते हैं, वे यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि हाइड्रोकार्बन का अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार केवल डालर के माध्यम से चलाया जाए। डालर एक ऐसी करेंसी है जो निरन्तर गिर रही हैं फिर भी यह विश्व की रिजर्व करेंसी के रूप में कार्य कर रही है।
    निरन्तर युद्ध की नीति से दो उद्देश्यों को प्राप्त करना है। एक, यह कि-उन राष्ट्रों के नागरिकों को, जिन्होंने युद्ध घोषित कर दिया है निरन्तर अधीनता में रखना। दो, दूसरी सरकारों एवं राष्ट्रों को धमकाना एवं विवश करना। अनेक देशों की राजनैतिक व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। हर जगह अनिश्चितता है एवं ‘‘वर्तमान परिस्थिति में निरन्तर एवं लगातार परिवर्तन, अस्थाई गणनाओं को भी प्रभावित देशों के राज्यों, उद्योगों, सामाजिक समूहों एवं व्यक्तियों के लिए अत्यधिक समस्यात्मक बना देते हैं। ऐसे अवसर आते हैं जबकि विशिष्ट राज्यों एवं विश्व के लिए शांति के क्षण होते हैं, परन्तु इन क्षणों को बड़ी शीघ्रता से नष्ट किया जा सकता है। जो चीज इस शांति एवं आराम के क्षण को भंग कर रही है, उनमें से एक दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली वस्तुएँ ऊर्जा, खाद्यान्न आदि की कीमतों में तेजी से हो रही वृद्धि है। इन उतार चढ़ाओं के कारण विश्व के सभी स्थानों पर गरीब राज्यों, गरीब समूहों एवं गरीब व्यक्तियों के लिए समस्या उत्पन्न हो रही है।’’ इमानुअल वालर स्टीन की पुस्तक ’’विश्व में संरचनात्मक संकट’’ के अंश।
    वर्तमान समय में पूरे विश्व में अनिश्चिता है। निश्चितता केवल पश्चिमी संसार की आर्थिक व्यवस्था में अन्तहीन गिरावट है। जिसके कारण सर्वत्र रक्त, श्रम एवं आँसुओं की एक लकीर सी बन गई है। यह विश्व बैंक एवं अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष के द्वारा हर समाज पर थोपी गई नवीन उदारवाद एवं संरचनात्मक समायोजन की नीतियों का सीधा परिणाम है। व्यापक बेरोजगारी एवं खाद्यान्न असुरक्षा की समस्या हर समाज में उत्पन्न हो रही है। जिन राष्ट्रों ने इन आर्थिक नीतियों को नहीं अपनाया है, उन्हें युद्ध द्वारा तबाह किया जा रहा है। नाटों देशों के नागरिक अपने राष्ट्रीय बजट में घाटा उठा रहे हैं क्योंकि वे सेना पर ज्यादा व्यय कर रहे हैं। वे इस सच्चाई की उपेक्षा कर रहे हैं कि वियतनाम में आक्रमण से ही अमरीका की आर्थिक व्यवस्था में गिरावट की शुरूआत हुई है।
    यहाँ पर यह आवश्यक है कि हम इस ऐतिहासिक विपत्ति की गंभीरता एवं सीमा को ध्यान में रखें, क्योंकि पश्चिमी देशों के संवैधानिक प्रजातंत्र में उदारवाद की नीति के धराशायी होने के कारण एवं मुसोलिनी की अराजकतावादी व्यापारिक नीति के अपनाए जाने के कारण यह आर्थिक संकट उत्पन्न हुआ है। पहले भी विश्व इतिहास में कई बार यह घटित हो चुका है कि व्यापार की अधिकता की परिणति उसकी समाप्ति में हुई है। परन्तु इस बार यह व्यवस्था आर्थिक संचय की विफलता के परिणाम से ग्रसित है जो कि इस व्यवस्था द्वारा पुनर्जीवित नहीं किया जा सकता है या उन देशों के नागरिकों को सामूहिक रूप से मौत के घाट उतार देने की घोषणा  के पश्चात भी संभव नहीं, जिनके संसाधनों को सेना के द्वारा अधिगृहीत कर लिया गया है।
 -नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

बुधवार, 28 मार्च 2012

पश्चिमी अर्थतंत्र का अन्तहीन पतन -1




पश्चिमी आर्थिक व्यवस्था की संरचनात्मक विपत्ति का प्रभाव संसार की सभी राजनैतिक व्यवस्थाओं पर हुआ है, इसके फलस्वरूप विश्व एक ऐतिहासिक मुसीबत में डूब चुका है। इसका प्रभाव सभी प्रजातंत्रों, संवैधानिक सरकारों पर हुआ है और करोड़ों लोगों के मानवाधिकारों का हनन हुआ हैं।
पश्चिम की अब तक प्रसुप्त आर्थिक व्यवस्था में एक अप्रत्याशित ऐतिहासिक विपत्ति के कारण संसार के सभी लोग एवं सभी संवैधानिक एवं विधिक व्यवस्थाएँ प्रभावित हुई हैं। राजनैतिक अर्थशास्त्रियों ने इसे दोहरी मंदी की संज्ञा दी हैं, उन्होंने स्वीकार किया है कि यह पश्चिम में तीस के दशक में आई ‘ग्रेट डिप्रेशन’ (विराट आर्थिक गिरावट) से भी ज्यादा गंभीर है। जिसकी परिणति संसाधनों पर नियंत्रण की वैष्विक होड़ में हुई एवं अन्ततोगत्वा द्वितीय विष्व युद्ध का इसने मार्ग प्रशस्त किया। इस युद्ध को पूँजीपतियों (बैंकर्स) द्वारा संसाधनों पर नियंत्रण का युद्ध भी कहा गया है। इस प्रकार की निर्ममता के सीधे कारकों में से एक कारक यह भी था कि प्राइवेट बैंकर्स ने प्रथम विश्व युद्ध में राष्टों को जो कर्ज दिया था उन्होंने उसका सूद वसूलना प्रारम्भ कर दिया एवं पराजित देशों की सरकारों से युद्ध में हुई क्षतिपूर्ति भी वसूलना प्रारम्भ कर दिया था। यह कार्य कुख्यात ‘‘वर्सिलीज’’ संधि के माध्यम से हुआ जिसको अमरीका, ब्रिटेन, फ्रांस के राष्ट्राध्यक्षों एवं बैंकर्स के अधिकारियों द्वारा जबरदस्ती इन राष्ट्रों पर थोपा गया, युद्ध क्षतिपूर्ति उन देशों के नागरिकों के द्वारा अदा की गई, जिन्होंने उस निर्णय में हिस्सा नहीं लिया था। उन राष्ट्रों की आर्थिक व्यवस्था बिल्कुल ढह गई एवं भीषण मुद्रास्फीति का जन्म हुआ, जिससे यूरोप के करोड़ों नागरिक बिल्कुल दरिद्र हो गए। समकालीन परिस्थिति एक बार फिर इसी प्रकार की पाश्विक घटनाओं की एक भिन्न ऐतिहासिक युग में पुनरावृत्ति है। अन्तर केवल यह है इसकी भीषणता पहले से कहीं अधिक है, क्योंकि इसका प्रभाव प्रथम तथा द्वितीय विश्व युद्ध के मुकाबले में अधिक दूरगामी है। इन्हीं पूँजीवादी तथा आर्थिक हितों के उत्तराधिकारियों द्वारा एक बार फिर विश्व के भिन्न-भिन्न राष्ट्रों का शोषण किया जा रहा हैं। वहीं बैंकिंग एवं कार्पोरेट हितों वाले अपनी सरकारों के माध्यम से फिर से, उपनिवेशीकरण की प्रक्रिया में लिप्त हैं। उन्होंने ऐसी नीतियों को अपनाया है जिससे कि इन देशों की सामाजिक सुरक्षा का सम्पूर्ण ढाँचा नष्ट हो रहा है।
वे इन राष्ट्रों के राजकोषों से बड़ी-बड़ी आर्थिक सहायता (सब्सीडी) प्रदान करवा रहे हैं। बैंकों एवं निगमों पर अपना आधिपत्य जमा रहे हैं जिससे मध्यम एवं कार्य करने वाले वर्ग की सम्पत्तियों एवं बचत पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। परिणाम स्वरूप, ये राष्ट्र कर्ज में डूब रहे हैं और दिवालिया बन रहे हैं। प्रमुख रेटिंग ऐजेंसियों जैसे ‘‘स्टैण्डर्ड पुअर’’ ने इन सरकारों की आर्थिक विकास क्षमता की दर को कम कर दिया है जिसमें पूर्व के आर्थिक दैत्य अमरीका एवं जापान भी सम्मिलित हैं। फ्रांस जो कि सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य है, वह भी इस प्रकार की स्थिति का सामना कर रहा है। जबकि विश्व की जी0डी0पी0 (सकल घरेलू उत्पाद) लगभग 65 ट्रिलियन या मोटे तौर पर विश्व सार्वभौमीकरण विपणन का 10.83 प्रतिशत है जैसा कि प्रमुख अखबार ‘‘दि एकोनाॅमिस्ट ने सूचना दी है। विश्व के चार बड़े बैंकों की साख रेटिंग भी कम कर दी गई है। बैंक आफ अमरीका, सिटीग्रुप, जे0पी0 मोरगन, गोल्डमैन साच, विशैली साख निर्गमन का 95 प्रतिशत नियंत्रित कर रहे हैं जो आर्थिक व्यवस्था को गलत ढंग से डुबाए हुए थीं। यह केवल बैंकों का ही प्रश्न नहीं रहा बल्कि पश्चिमी संसार की अधिकतर देशों की सरकारें अब आर्थिक रूप से विकासशील नहीं हैं।
कारपोरेट लालसा, बेरोजगारी, तालाबंदी एवं 2008 की कारपोरेट को छूट के विरोध में अब विश्व के 80 देशों में आन्दोलन फैल चुका है। वाल स्ट्रीट, सिटी आफ लाडर््स जोकि बैंकिंग एवं आर्थिक हितों के प्रमुख केन्द्र हैं तथा जिन्होंने वित्तीय अनियमितताएँ बड़े पैमाने पर की हैं, उनको बैंकिंग संसार का ‘ग्वान्टा नामो वे’ कहा जा रहा है। विभिन्न सरकारों का बैंक डिपाजिट एवं इन्वेस्टमेंट जो कि सत्ता परिवर्तन के लिए प्रयोग किया जाता है वह अमरीका, ब्रिटेन एवं अन्य यूरोपियन देशों में निवेश किया जाता है। अमरीका तथा ब्रिटेन की सरकारों के प्रशासनिक आदेशों द्वारा इनको अधिगृहीत कर लिया गया है ताकि लीबिया, ईराक एवं अन्य देशों में सत्ता परिवर्तन किया जा सके एवं नाटो शक्तियों के प्राइवेट बैंकों एवं निगमों की बिगड़ती हुई आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सके।
नाटो शक्तियों ने इन देशों की अर्थव्यवस्थाओं को खतरे में डाल दिया है एवं उनके नागरिकों की बचत को या तो हड़प लिया है या नष्ट कर दिया है, जबकि बैंकर्स ने स्वयं अपने आपको करोड़ों रूपयों का बोनस प्रदान किया है। पुलिस ने बैंक खातेदारों को गिरफ्तार कर लिया है, ताकि वे उनके धन को निकाल सकें और खाते को बंद कर सकें। इन पाश्विक रणनीतियों की प्राप्ति के उद्देश्य से पूँजीपति एवं कापोरेट वर्ग, नागरिक एवं उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन करने में नहीं चूकते।
दिलचस्प बात यह है कि एक प्रभावशाली नाटो राष्ट्र के प्रतिनिधि ने हड़प करने वाली सरकारों के द्वारा बुलाए गए लीबिया सम्मेलन में जिसमें कि तेल कम्पनियों एवं पूँजीपतियों के प्रतिनिधि भी शामिल थे, उस देश को ‘‘मुकुट मंे आभूषण’’ की संज्ञा दी। यह एक ऐसा वाक्य है जिसके अर्थ से हम हिन्दुस्तानी खूब परिचत हैं। वास्तविकता यह है कि नाटो शक्तियों की राजनैतिक व्यवस्था अब संवैधानिक रूप से प्रजातांत्रिक व्यवस्था नहीं कही जा सकती, क्योंकि आर्थिक कुलीनतंत्रों ने इन देशों की राजनैतिक तथा आर्थिक व्यवस्था पर पूरी तरह से कब्जा कर लिया है। उन देशों का पुनः उपनिवेशीकरण जो कभी उपनिवेशवाद से मुक्त हुए के अतिरिक्त शक्तिशाली पूँजीवादी हितों की दूसरी रणनीति जो नाटो को नियंत्रित कर रहे हैं उन देशों की सरकारों की राजनैतिक व्यवस्था को समाप्त करना है, जो उनके उद्देश्य में रोड़ा बन रहे हैं। इसके लिए वह उन देशों में ऐसे आन्दोलन चलाते हैं जिसका पैसा नेशनल इनडाउनमेंट फार डेमोक्रेसी अथवा ‘द फोर्ड’ अथवा ‘राकफेलर फाउन्डेशन अथवा अन्य बैंकिंग एवं कारपोरेट हितों के फाउन्डेशन जो यू0एस0ए0, यू0के0, एवं यूरोप के अश्वेत क्रांति के लिए प्रयोग किए जाते हैं। इस उद्देश्य के लिए वे मानव अधिकारोंके हनन का बहाना लेते हैं अथवा फर्जी नरसंहार का आरोप लगाते हैं अथवा जिस सरकार को गिराना होता है उस पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हैं। वे इस प्रकार की सरकार के स्थान पर दूसरी ऐसी सरकार या नेता को लाते हैं जो उनके आदेशों के पूरे गुलाम होते हैं।
-नीलोफर भागवत
अनुवादक: मो0 एहरार एवं मु0 इमरान उस्मानी
क्रमश:

मंगलवार, 27 मार्च 2012

बाजार की गिरफ़्त में मीडिया

बाजार की एक वस्तु

आज पूरी दुनियाँ पर बाजारवाद का संकट गहराता जा रहा है। बाजार बहुत ही तेजी के साथ समस्त संसाधनों पर अपना कब्जा जमाता जा रहा है। चाहे वह प्राकृतिक संसाधन हो या गैर प्राकृतिक हो। उत्पादन शक्ति से लेकर उत्पादित वस्तु तक सभी बाजार की गिरफ़्त में आ गए हैं यहाँ तक की इंसान भी बाजार की एक वस्तु मात्र बनकर रह गया है।
पूँजीवादी सभ्यता ने साहित्य, कला, संस्कृति यहाँ तक की ज्ञान को भी बाजार की वस्तु बनाकर रख दिया है। दुनिया के सामने सच की तस्वीर रखने का दावा करने वाली हमारी मीडिया, समाचार पत्र भी आज बाजार की गिरफ्त में गए हैं। कभी-2 तो ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता पत्रकारिता होकर पूँजीपतियों और सरकारों की चाटुकारिता करती नजर आती है। खास तौर से भारत की पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा शोषकों और साम्राज्यवादी ताकतों की ही वकालत करता दिखाई देता है। ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि आज की पत्रकारिता इन्हीं पूँजीपतियों, भ्रष्टाचारियों और जमाखोरों के विज्ञापन के बलबूते जीवित है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि आज का प्रकाशक, सम्पादक और पत्रकार जनसेवक नहीं अपितु वह देश के बड़े अमीरों की कतार में खड़ा होना चाहता है। आज का प्रकाशक, सम्पादक व मीडिया कर्मी यह पूरी तरह से भूल गया है कि पत्रकारिता के मायने क्या होते हैं और पत्रकारिता किसे कहते हैं।
भूमण्डलीकरण के इस वर्तमान दौर में भारतीय पत्रकारिता ने बाजार की शक्तियों के सामने घुटने टेक दिए हैं वैसे तो भारतीय पत्रकारिता का दायरा बहुत बड़ा है। यही नहीं भारत में तो मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ भी कहा जाता है। इसके बावजूद भी भारतीय पत्रकारिता पूरी ईमानदारी के साथ जनहित में खड़ी होती नजर नहीं आती। पूरा मीडिया जगत जनसरोकारों की जगह बाजार से सरोकार रखने लगा है। अंग्रेजी पत्रकारिता तो तमाम सामाजिक सरोकारांे और नैतिक मूल्यों से पल्ला झाड़कर सीधे-2 बाजार से जुड़ गई है। लेकिन वर्तमान समय में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के बहुसंस्करणीय अखबार भी अंग्रेजी पत्रकारिता के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं और इसके चलते उनकी अपनी कोई पहचान नहीं रह गई है। भूमण्डलीकरण और साम्राज्यवादी नीतियों के चलते भारत के आम आदमी का जीवन कष्टों का पर्याय बन गया है। इससे इनका कोई नाता नहीं है। साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ संघर्षरत श्रमिकों, किसानों व जन सामान्य के कष्टों से उदासीन हमारे भारतीय भाषाओं के बड़े कहे जाने वाले अखबार आम जनता के संघर्ष से कहीं भी जुड़े हुए दिखाई नहीं देते। सत्तासीन राजनैतिक पार्टियों के जोड़-तोड़ की राजनीति में ही मशगूल हैं। जनता के दर्द से इनका कोई भी लेना देना नहीं रह गया है।
जहाँ तक क्षेत्रीय अखबारों का प्रश्न है वे अपनी साधन हीनता के चलते अपने अस्तित्व को ही बचाने में लगे रहते हैं लेकिन अब इन अखबारों के प्रकाशकों के अंदर भी बाजारवादी मानसिकता घर करने लगी है जो कभी परिवर्तन कामी आन्दोलनकारी भूमिका निभाने की इच्छा रखते थे। अब यह भी बाजार के रंग में रंगने लगे हैं। वर्तमान समय में इन अखबारों के प्रकाशक और पत्रकार स्थानीय व्यापारियों, माफियाओं, सांसदों, मंत्रियों, और छुट-भइये नेताओं के विज्ञापन के नाम पर मोटी रकम काटने के चक्कर में इनकी दलाली व चापलूसी करते फिरते हैं। स्थानीय स्तर पर फूट रहे जन-आन्दोलनों और संघर्षों की रिर्पोटिंग न के बराबर ही करते हैं। यदि करते भी हैं तो आलोचनात्मक रिर्पोटिंग करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि यह जन आन्दोलनों को उत्साहित करने की जगह हतोत्साहित करते नजर आते हैं। भारत जैसे देश में, जिसे कृषि प्रधान देश कहा जाता है, जिस देश की 60 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर करती है उस देश में लगभग 40 हजार किसानों ने पिछले एक दशक के अंदर आत्महत्याएँ कर लीं। बेरोजगारी की मार से आज का शिक्षित युवा वर्ग आत्महत्या करने को विवश है, आई।टी. जैसे संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी आत्महत्या करने को मजबूर हैं। आज देश में शिक्षा का निजीकरण दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का व्यक्तिगत क्षेत्र में विलय होता जा रहा है लेकिन वर्तमान समय में पूरे देष की मीडिया मौन खड़ी है। आज जनता शासक वर्ग के खिलाफ दिनों दिन हथियार उठाती जा रही है। केन्द्र सरकार व राज्य सरकारें अपने दमनात्मक अभियानों से उन जन आन्दोलनों को कुचलने का असफल प्रयास कर रही हैं। फिर भी ये जन आन्दोलन दिनो दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। यह बात जुदा है कि आज का जन आंदोलन संगठित न होकर अनेक धाराओं में बँटा हुआ है और जनता का भारी समर्थन जुटाने में असफल है। इसके पीछे शासक वर्ग द्वारा मीडिया के माध्यम से किया जा रहा दुष्प्रचार, ज्यादा कारगर साबित हुआ, क्योंकि मीडिया का सबसे बड़ा हिस्सा, केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, पूँजीपतियों व साम्राज्यवादी ताकतों से संचालित होता है और शासक वर्ग यह कभी नहीं चाहता है कि उसके खिलाफ खड़ा हो रहा कोई भी जन आन्दोलन मजबूत हो और उनकी शोषण परक व्यवस्था को नेस्तानाबूद कर जनता के लिए एक शोषण विहीन शासन व्यवस्था का निर्माण करे इसके लिए देश में जन सरोकारी मीडिया की अत्यन्त आवश्यकता है जो बाजार के चंगुल से मुक्त हो, जो जनता के अधिकारों के लिए काम करे, जो मानवीय संस्कृति, साहित्य, कला और शिक्षा का निर्माण करे और व्यापक जनता के पक्ष में खड़ी होकर जनपक्षधरता की बात करे, एक जनसंस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका अदा करे। सही मायने में वही पत्रकारिता एक श्रेष्ठ पत्रकारिता होगी जो वास्तव में मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त कर एक समाजवादी व्यवस्था का निर्माण करने में अपनी महती भूमिका अदा करेगी।
-लाल प्रकाश ‘राही’
मो.09451160161

सोमवार, 26 मार्च 2012

उड़ीसा में पोस्को परियोजना से फायदा कौन उठाएगा? -2


अब यही फायदे दूसरों को भी दिए जाते हैं, यही कारण है कि इन मामलों परटाटा, मित्तल या जिन्दल जैसे प्रतिस्पर्धा वाले लोग भी चुप्पी साध लेते हैं।
मेरे विचार में इसी को मुख्य आर्थिक मुद्दा समझा जाना चाहिए तथा सभी सूक्ष्म बिन्दुओं तक के लिए, सभी निर्णयों के लिए तथा उड़ीसा की जनता पर इसके विपरीत प्रभाव के लिए वहाँ की सरकार को उत्तरदायी माना जाना चाहिए।
उड़ीसा की जनता इन सब बातों को कैसे सुनिश्चित करेगी? वास्तव में इस हेतु पारदर्शी प्रक्रियाओं की स्थापना जब हो जाएगी तब ही उड़ीसा की जनता इस बात के लिए आश्वस्त होगी कि जो भी धनराशि उड़ीसा में आ रही है उसकी पूर्ण निगरानी की जाती है, मगर इन निगरानी तंत्र सम्बंधी प्रक्रियाओं की स्थापना हेतु उड़ीसा की जनता को ही दबाव बनाने के लिए आगे बढ़ना होगा।
मो09453993476

रविवार, 25 मार्च 2012

उड़ीसा में पोस्को परियोजना से फायदा कौन उठाएगा? -1



आर्थिक विश्लेषकों की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष समीक्षा एवं उनके यह विचार कि भारत में उड़ीसा राज्य एवं उसकी जनता के हित के लिए पोस्को प्रोजेक्ट हस्ताक्षरित नहीं किया गया है। हम इस बात को पूछने पर मजबूर हैं कि आखिर इससे कौन लाभान्वित होगा और जनता पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
संभवतः यह बात रेखांकित करने योग्य है कि एक ऐसा लोकतंत्र हो जिसमें सभी की सक्रिय सहभागिता हो तथा नागरिकों का एक समूह हो जो सदा सर्तक रहे तब ही शासक वर्ग को मजबूर किया जा सकेगा कि वह जिम्मेदारी की भूमिका में आए। राज्यों का एक समूह यह देखे कि उड़ीसा की ‘रायल्टीज’ में बढ़ोत्तरी हो। समझौते के स्मृति पत्र में उड़ीसा राज्य सरकार को यह स्पष्ट आश्वासन देती है कि वह प्रोजेक्ट की प्रगति हेतु हर सुविधा प्रदान करेगी परन्तु इस बात पर चुप है कि प्रोजेक्ट के कार्यों से स्थानीय समुदायों पर क्या कुप्रभाव पड़ेगा?
उड़ीसा राज्य सरकार को जिम्मेदार बनाना:- उड़ीसा के नागरिकों को चाहिए कि वे राज्य सरकार से प्रोजेक्ट की विस्तृत योजनाओं की पूर्ण पारदर्शिता की मांग करें। क्या वहाँ के अवसरों का मूल्यांकन एवं विश्लेषण किया गया? पोस्को द्वारा जल प्रयोग का आर्थिक मूल्य क्या होगा? जो लोग बेघर हो जाएँगे। उनके नुकसान का आंकलन कैसे होगा? पास पड़ोस के कृषक वर्ग की बड़ी बरबादी होगी। कृषि उत्पादन का जो नुकसान होगा उसका आर्थिक मूल्यांकन कैसे होगा एवं लाखों कृषक परिवारों की आजीविका में जो विघ्न होगा, इन सब बरबादियों का आर्थिक मूल्यांकन किस प्रकार किया जाएगा? यह बात तो स्पष्ट है कि उनका उद्योग लाखों प्रभावितों को रोजगार तो दे नहीं सकेगा। अब हम इन सब का तख़मीना लगा सकते हैं। कृषि मामलों का वार्षिक नुकसान 100 करोड़ के आसपास होगा। अर्थात लगभग उसी वेतन/ मजदूरी के बराबर जो इस प्लान्ट से सालाना आर्जित होगा। यह एक बड़ी धनराशि हुई। इसी से कुछ ऐसे प्रश्न सामने आते हैं जिनका उत्तर, सरकार को देना ही होगा। उडि़या समाज को भी यह सुनिश्चित करना है कि सरकार इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर दे।
कृषि क्षेत्र में जो हानियाँ र्हुइं उनके सरकारी अनुमान क्या हैं और जिसके लिए उड़ीसा राज्य सरकार को जिम्मेदार करार देना चाहिए। जब तक उसे बिल्कुल निष्क्रिय न मान लिया जाए। इतने अधिक भूजल उपयोग और उसके विपरीत प्रभाव सम्बंधी हानियों का उड़ीसा राज्य सरकार ने क्या तख़मीना लगाया है?
उड़ीसा राज्य सरकार की इन सब बातों से निपटने की क्या योजना है? पोस्को से प्राप्त लाभ को कृषि सम्बंधी हानियों हेतु राहत दी जा सकती है या बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं या शैक्षिक कार्यों में इन समुदायों को सुविधा प्रदान की जा सकती है। या लाभ की धनराशि से इन समुदायों हेतु लघु उद्योगों की स्थापना भी की जा सकती है। हम को यह देखना चाहिए कि उड़ीसा राज्य सरकार ने इन सब के लिए क्या योजनाएँ बनाई हैं।
वास्तव में नए रोजगार सृजन से उड़ीसा को वेतन से 120 करोड़ सालाना का अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है जिससे स्थानीय आर्थिक दशा सुदृढ़ हो सकती है। दूसरी ओर पोस्कों को भूमि लीज़ पर देने से उसे 180 करोड़ रूपये की कीमत का नुकसान उठाना पड़ रहा है। जल मूल्य की 75 करोड़ सालाना की हानि, कृषि सम्बंधी 100 करोड़ वार्षिक हानियाँ तथा प्रोजेक्ट पर 2400 से 3600 करोड़ टैक्स हानियाँ भी उठानी पड़ रही हैं।
इसके अतिरिक्त कोयले पर बाजार आधारित ‘रायल्टी’ का नुकसान और इससे सम्बंधित 12 एम0टी0/वार्षिक स्टील की जो हानियाँ हैं वे अलग हैं।
ये सब ऐसेइस्टीमेटहैं जिन्हेंमेमोरैन्डमआॅफअन्डरस्टैंडिंग’ (डव्न्) के आंकड़ोंसेछनकरआईहुईसूचनाओंसेसावधानीपूर्वकहासिलकियागयाहै।इन सबके सम्बंध में उड़ीसा सरकार ने कभीपारदर्शिता नहीं दिखाई।परन्तु जो रुझान हैं वे स्पष्ट हैं। गैरमुनासिबरायल्टीकेस्तरकेकारण।जबकिउनलोगोंपरप्रत्यक्षलाभकीअपेक्षाअप्रत्यक्षहानिकाअधिकभारपड़ाहै।अबक्याउड़ीसासरकारयहजवाबदेगीकियहडीलउड़ीसा के लिए क्यों बेहतर है?
सरकार के इरादे या दिशाएँ स्पष्ट हैं, जब कोई इस बात पर यह विचार करता है कि भारत का कुल ज्ञात भण्डार 18 बिलियन टन है, इसमें से 4.5 बिलियन टन उड़ीसा में है। इस 4.5 में से राज्य सरकार एक बिलियन टन पोस्को को दे देगी और इसमें से 400 एम0टी0 वह कोरिया को निर्यात कर देगी।
उड़ीसा सरकार केवल 48000 करोड़ रुपये दर्शाती है, वह उस धनराशि को नहीं बता रही है जो घोटालों में गया, न ही अवसरों के नुकसान और प्रत्यक्ष मूल्यों के नुकसान को बतलाती है। अब इन बातों पर जब प्रश्न उठाए जाते हैं तो उन्हें उड़ीसा विरोधी बताया जाता है और राजनेताओं व नौकरशाहों की मशीनरी द्वारा उन्हें धमकाया जाता है।
जब उड़ीसा सरकार के जीत हार के धागे को देखा जाता है तो यह बात सामने आती है कि पोस्को विजयी हुई, उड़ीसा राज्य सरकार के राजनेता एवं नौकरशाहों ने भी विजय प्राप्त की, अगर इस खेल में कोई हारा तो वह उड़ीसा की जनता है।
खनिज को जिस प्रकार कम दाम पर बेच दिया गया है और जिस ढीलेपन से समझौता या ‘डील’ हुई वह यह बताने के लिए काफी है कि इसके द्वारा कितनी गै़र जिम्मेदारी का परिचय दिया गया और कितनी अपारदर्शिता की गई? फिर भी अभी सब कुछ गया नहीं है। एक सृदृढ़ और निगरानी रखने वाला समुदाय सरकार को इस बात के लिए मजबूर कर सकता है कि वह जिम्मेदार बने और उसे आर्थिक समझ आ जाए।
हमारा इस बात पर पूर्ण विश्वास है कि पुनर्वास या विस्थापितों के जिन मुद्दों की बात होती है यह वास्तव में इसलिए है कि पोस्को को 2,50,000 करोड़ की जो सब्सिडी लौह अयस्क के मूल्यों पर दे दी गई है, इस पर से हमारा ध्यान हट जाए।
-डाॅ0 सनत मोहंती/संदीप दास वर्मा
-अनुवादक-डाॅ.एस.एम. हैदर
क्रमश:

शनिवार, 24 मार्च 2012

आज मुल्क में रूहानियत के नाम पर ठग विद्या चल रही है

ढोंगी बाबा अवाम का जज्बाती इस्तेह्साल कर मुल्क में मजहबी मुनाफिरत फैला रहे हैं।


सर्वश्री रवीन्द्र प्रभात, डॉ सुभाष राय, मुद्राराक्षस, वीरेन्द्र यादव "सतनाम संप्रदाय और संत जगजीवन दास" पुस्तक का विमोचन करते हुए।

मुद्राराक्षस, विनोद दास, श्री हरिशरण दास साथ में वीरेन्द्र यादव पुस्तक को प्रदर्शित करते हुए



आज मुल्क में रूहानियत के नाम पर ठगी का कारोबार चल रहा है। जिस मुल्क में गौतम बुद्ध, गुरुनानक, महावीर, कबीरदास और बाबा जगजीवन दास जैसे रूहानी कुव्वत के साधु संत गुजरे हों उसी मुल्क में आज बाबा रामदेव, श्री श्री रवि शंकर और धीरेन्द्र ब्रम्हचारी जैसे हाईटेक साधु पनप रहे हैं।
इन खयालात का इजहार हिंदी जुबान के आलिमी शोहरत याफ्ता अदीब मुद्राराक्षस जुमे की सेपेहर जिला बार एसोसिएशन के मीटिंग हाल में सतनामी पंथ के बुजुर्ग बाबा जगजीवन दास की जिंदगी व उनकी फ़िक्र पर लिखी गयी तसनीफ के रस्म ए उजरा के मौके पर मुन्न्केदा तकरीब में अपने मेहमान ए खुसूसी खुतबे के दौरान कर रहे थे।
मुद्राराक्षस ने मौजूदा जमाने के साधू संतों के ऊपर तनकीद करते हुए कहा कि अभी हाल में श्री श्री रविशंकर ने मुल्क के तालीमी निजाम पर तनकीद करते हुए कान्वेंट तर्ज के प्राइवेट तालीमगाहों की वकालत की है जो मुल्क के लिये निहायत मोहलिक है। मुद्राराक्षस ने कहा की आज लोगों ने किताबों से किनाराकशी इख्तियार कर ली है और मुताल्या करना छोड़ दिया है। इसी का फायदा उठकर ये ढोंगी बाबा और साधू लोग योग के करतब दिखला व सिखलाकर लोगों के मजहबी जज्बात का इस्तेह्साल करते फिर रहे हैं।
हिंदी अदब के मशहूर तनकीद निगार वीरेन्द्र यादव ने हरिशरण दास के जरिए लिखी गयी किताब "सतनाम सम्प्रदाय और संत जगजीवन दास" के ऊपर तब्सिरा करते हुए कहा कि यह किताब देर से सही लेकिन दुरुस्त मौके पर आई है। आज सतनामी खयालात की शायद सबसे ज्यादा जरूरत मुल्क को है। हिन्दुस्तानी तहजीब में मजहब का तस्सवुर हजारों बरसों से चला आ रहा है लेकिन आज के मजहब का तस्सवुर अवाम के इस्तेह्साल तक ही महदूद होकर रह गया है।

-तारिक खान

शुक्रवार, 23 मार्च 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी एक अतुलनीय जन विरोधी फैसला-2


यह चिकोर आकृति को गोल करने का करतब दिखाने का आधार क्या है। कहा जा रहा है कि ये बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ अनेक बिचैलियों को हटाकर बीच के मुनाफे को घटा देंगी। पहली बात तो यह है कि क्या ये विशाल खुदरा विदेशी सीधे हमारे सात लाख के करीब गाँवों के इर्द-गिर्द पसरे खेतों से खरीदकर पाएँगे। या तो उनके कर्मचारी यह काम करेंगे या उनके एजेंट, दलाल। एक थोक व्यापारी को अनेक अन्य थोक व्यापारियों को किसान का माल खरीदने में टक्कर देनी होती है। जिसका जितना वाजिब दाम और जल्दी भुगतान होगा और नाप-तौल में पारदर्शी ईमानदारी होगी, वही उतना ज्यादा माल खरीद पाएगा। इस स्थिति के मुकाबले इन बड़ी कम्पनियों के मुख्यालय अपने दलालों या कर्मचारियों को एक निश्चित कीमत पर खरीदने का हुक्म देंगे। किसानों के पास खरीदारांे के विकल्प नहीं रहेंगे। मजबूरन उन्हंे इन बड़े मगरमच्छांे द्वारा तय कीमत ही मिल पाएगी। ये मगरमच्छ इन जिन्सों के वायदा बाजार में भी सौदे करते हैं उनके पास सारे देश और संसार की संभावित फसल के आँकड़े होते हैं। इनके सामने किसान की शक्ति, क्षमता, सूचना, विकल्पों आदि की बेहद कमी। ऐसी स्थिति मंे यह उम्मीद करना कि सैकड़ों करोड़ धनराशि को पैरवी में लगाने वाली ये कम्पनियाँ किसान को वाजिबदाम यानी अभी मिल रहे दामों से ऊँचे दाम किसानों को देकर उपभोक्ताओं को अभी चुकाने पड़ने वाले दामों से कम पर बेचेंगे, किसी सामान्य समझवाले इन्सान के गले के नीचे नहीं उतर सकती है।
ऐसे लुभावने झाँसों की पुरानी, लम्बी परम्परा की यह नई खेप क्यों लाई गई है। इन दिनों भारत के विदेशी लेन-देन का घाटा राष्ट्रीय आय के चार प्रतिशत का आँकड़ा छूने की ओर बढ़ रहा है। बाहर से पूँजी आकर्षित करना अब अधिकाधिक कठिन होता जा रहा है। जिन धनी देशों से यह पूँजी आती थी, वे स्वयं गिरावट, पारस्परिक विश्वास, समाप्ति से ग्रस्त वित्तीय क्षेत्र, बेरोजगारी, सरकारी बजट घाटे और भारी कर्जों के बोझ से पीडि़त हैं। अतः खुलेे आॅयल की छूट देकर बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को बड़ा बाजार देना दिनांे-दिन विदेशी भुगतान संकट को निकट करता है। अतः अब इन कम्पनियों और उनकी वितरक खुदरा और थोक व्यापार कम्पनियों को चोर दरवाजे से रिटेल बाजार की पूँजी के रूप में भारत में अपना जाल फैलाने के लिए आने की अनुमति दी जा रही है। इस तरह 2500 करोड़ रूपये से ज्यादा विदेशी मुद्रा लाने वाली कम्पनियों को हमारे यहाँ एक-दो लाख रूपयों से लकर 5-10 करोड़ तक की पूँजी से व्यापार करने वालों के खिलाफ व्यापारिक जंग में उतारा जा रहा है। इस तरह विदेशी कम्पनियों तथा पूँजी को भारत मंे आकर मुनाफे कमाने के अवसर देने का एक खास कारण विदेशी मुद्रा संकट से बचना है। इसका सीधा अर्थ है भूमण्डलीकरण की आजादी बढ़ाने के लिए करोड़ों परिवारों की रोजी-रोटी यानी आजीविका को दाँव पर लगा दिया गया है।
वास्तव में थोक बाजार में बाहरी पूँजी को अनुमति दी जा चुकी है। विदेशी माल को बेचने के लिए उनके उत्पादकों को सीधे अपनी दुकाने खोलने की इजाजत दी जा चुकी है। रिटेल में आने की इजाजत के साथ कुछ भ्रामक शर्तें लगाई गई हैं। इन शर्तों के पालन की कोई जाँच नहीं होगी। इनको कितने अरसे में पूरा करना है, यह भी नहीं बताया गया है। गाँवों खेतों से माल खरीदने, भण्डार बनाने और उनके हानिरहित रख-रखाव में निवेश पहले होगा या दुकानें पहले खोली जाएँगी? दुकान आज खोलो और इन व्यापार सहायक कामों में निवेश वर्षो बाद करो, किन्तु घोषणा कर दो हमनेA ये शर्तें पूरी कर ली हैं। तब इन संभावित लोगों का क्या हश्र होगा। फिर 30 प्रतिशत माल देश के अन्दर खरीदने का अर्थ है वे 70 प्रतिशत माल आयात कर सकते हैं। हमारे उद्योगों के लिए यह एक भयावह खतरे की घंटी है। जब रोजगार समाप्त हो जाएगा, लोग उपभोक्ता ही नहीं रह पाएँगे फिर किसके भले के लिए ये कम्पनियाँ आएँगी। केवल धनी शहरी लोगों के लिए। स्पष्ट है इतने बड़े जनविरोधी फैसले की शायद ही कोई दूसरी मिसाल मिले।
-कमल नयन काबरा
मो0:- 09013504389

बृहस्पतिवार, 22 मार्च 2012

23 मार्च:शहीदे आजम भगत सिंह


अजीब था शहीदे आजम भगत सिंह
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली
ये मुश्ते -ख़ाक हैं ,फानी रहे रहे न रहे |
फांसी के समय भगत सिंह की उम्र कुल 23 साल थी |उनके क्रांतिकारी जीवन की कुल अवधि 1923 से लेकर 1931 तक के कुल 8 वर्षो की ही रही |इतनी कम उम्र और इतने कम राजनितिक जीवन में भगत सिंह ब्रिटिश साम्राज्य से राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता के लिए देश के मेहनतकशो की मुक्ति के लिए वैचारिक एवं व्यावहरिक क्रान्ति का विराट और अथक प्रयास करते रहे |यह दुर्भाग्यपूर्ण है की देश का जन मानस उन्हें बम -पिस्तौल वाले बहादुर नौजवान राष्ट्रभक्त क्रांतिकारी के रूप में ही जानते है |विदेशी शोषण -लूट व परतंत्रता के संबंधो से राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता और राष्ट्र के मेहनत कशो के हित में समाज के क्रांतिकारी बदलाव के उनके महान वैचारिक और बहुआयामी प्रयासों को नही जानता |जबकि भगत सिंह की उच्चता ,महानता को समझने के लिए वर्तमान परिस्थितियों में राष्ट्र व समाज के क्रांतिकारी बदलाव के लिए भी देश के जनसाधारण को उनके उन प्रयासों को जानना जरूरी है |भगत सिंह के विचारों को आज के संदर्भ में जानने समझने का प्रयास जरुर किया जाना चाहिए |आज भगत सिंह हमारे बीच नही है लेकिन उनके चिंतन व विचार मौजूद है |

स्वतंत्रता आन्दोलन के क्रान्तिकारियो ,शहीदों में सबसे ज्यादा प्रसिद्धि प्राप्त नाम भगत सिंह का ही है |23 मार्च 1931 के दिन राजगुरु व सुखदेव के साथ उन्हें फांसी दी गयी थी |तब से आज तक देश के हर क्षेत्र में भगत सिंह व उनके साथियो के शहादत के दिन को 'शहीद दिवस ' के रूप में मनाया जाता है |भगत सिंह की शहादत के सर्वाधिक ऊँचे मूल्याकन के फलस्वरूप देश का जन मानस उन्हें 'शहीदे -आजम 'भगत सिंह के रूप में याद करता आ रहा है |उनके 81 वे शहादत दिवस के अवसर पर यह देखना और समझना बेहतर रहेगा कि उनकी शहादत का इतना उंचा मूल्याकन आखिर क्योंकर किया जाता है ?और हमे यह भी समझना होगा कि वर्तमान दौर में भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियो को याद करने के साथ उनके क्रांतिकारी विचारों ,व्यवहारों से कुछ प्रेरणा ली जा सकती है या ली जानी चाहिए ?
जंहा तक भगत सिंह के सर्वाधिक मूल्याकन का सवाल है तो इसके लिए केवल भगत सिंह के जीवन एवं संघर्ष को ही जानना काफी नही होगा बल्कि उस दौर कि यानी 1907 से 1931 के दौर कि परिस्थितियों को तथा उसके महत्व व महानता को जानना ,समझना भी एकदम जरूरी है |क्योंकि ऐसी परिस्थितिया ही भगत सिंह जैसे महान क्रांतिकारी विभूतियों कि सृजनकर्ता होती है |ऐसी परिस्थितिया ही एक नही अनेकानेक महान विभूतियों को क्रान्तिकारियो और शहीदों को जन्म देती है |उनमे से कुछ विभूतियों को महानता के शिखर पर पहुचने का अवसर प्रदान करती है |भगत सिंह और उनकी शहादत कि महानता कि पृष्ठभूमि में भी ऐसी महान परिस्थितिया मौजूद रही है |कोई महान परिस्थिति भी अचानक नही बन जाती बल्कि वह अपेक्षित सामाजिक संघर्षो कि एक कड़ी के रूप में विकसित होती है |1905 -06 के बाद राष्ट्रीय संघर्षो के उभार कि परिस्थितियों के निर्माण में भी 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उसके पहले और बाद में चले ब्रिटिश विरोधी आंदोलनों ,संघर्षो का निश्चित योगदान था |इतिहास कि थोड़ी बहुत जानकारी रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि भगत सिंह के समय कि वैश्विक परिस्थितिया महान परिवर्तनकारी परिस्थितिया थी |खासकर प्रथम विश्व युद्ध (1914-1917)के दौरान और उसके बाद रूस व कई यूरोपीय देशो में समाजवादी आंदोलनों व संघर्षो का सिलसिला चल पडा था |इसी के साथ हिन्दुस्तान जैसे तमाम पिछड़े व गुलाम देशो में विदेशी साम्राज्यी ताकतों के विरुद्ध राष्ट्र के स्वतंत्रता संघर्षो का सिलसिला भी तेज़ी से बढने लगा था |
विश्व युद्ध के दौर में ही रूस में 'मजदूर क्रान्ति ' सम्पन्न हुई थी |इस क्रान्ति ने दुनिया के तमाम पिछड़े देशो के मजदूरों ,किसानो एवं अन्य जनसाधारण को साम्राज्यी ताकतों की शोषण ,लूट तथा परतंत्रता व प्रभुत्व के संबंधो से अपने आप को पूरी ताकत से मुक्त कर लेने का पुरजोर आह्वान किया था और उसके लिए यथासंभव प्रेरणा व मदद भी दी थी |इसके फलस्वरूप इस देश में भी राष्ट्र की स्वतंत्रता के साथ जनसाधारण मजदूरों ,किसानो की स्वतंत्रता का लक्ष्य लेकर आंदोलनों ,संघर्षो की शुरुआत हो गयी |
अपने पुरवर्ती क्रान्तिकारियो ,शहीदों की तुलना में भगत सिंह और उनके साथियो की महानता इन्ही वैश्विक परिस्थितियों की देन थी |उन्होंने और उनके साथियो ने ब्रिटिश साम्राज्यी ताकतों से राष्ट्र की पूर्ण स्वतंत्रता के साथ -साथ इस राष्ट्र के नये पुराने धनाढ्य वर्गो से देश के जनसाधारण की मेहनत कशो की स्वतंत्रता का मुद्दा भी उठा दिया |ब्रिटिश राज को हटाकर हिन्दू राज ,मुस्लिम राज या जनतांत्रिक राष्ट्र -राज बनाने की जगह ,उन्होंने देश के मेहनतकशो के नेतृत्त्व में समाजवादी -प्रजातांत्रिक राष्ट्र राज के पक्ष में खुली घोषनाये की |
भगत सिंह के क्रांतिकारी जीवन पर अमेरिका व कनाडा में रह रहे हिन्दुस्तानियों द्वारा गठित गदर पार्टी के संघर्षो व प्रयासों का भी असर जरुर पडा था |भगत सिंह अपने क्रांतिकारी जीवन में 1857 के स्वतंत्रता संघर्ष से लेकर गदर पार्टी के उद्देश्यों व क्रियाकलापों से प्रेरणा व उर्जा ग्रहण करते रहे थे |जंहा तक उस दौर की राष्ट्रीय परिस्थितियों का सवाल है तो 1905 में बंगाल के विभाजन के विरुद्ध राष्ट्रवादी आंदोलनों व संघर्षो का ज्वार उठा हुआ था |यह ज्वार विदेशी बहिष्कार के साथ ,स्वदेशी अपनाने राष्ट्रीय -शिक्षा -संस्कृति को बढावा देने तथा स्वराज्य का लक्ष्य हासिल करने के लिए राष्ट्रवादी संघर्ष के रूप में आगे बढ़ता रहा था |राष्ट्रीय आंदोलनों के इसी उभार के दिनों में लोकमान्य तिलक का यह राष्ट्रवादी सन्देश पूरे देश में गूजने लगा था की "स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर रहेंगे |"
राष्ट्र की इन्ही महान संघर्षशील एवं क्रांतिकारी परिस्थितियों में पंजाब के लायलपूर जिले के बंगा गाँव में 27 अक्तूबर 1907 को भगत सिंह का जन्म हुआ था |भगत सिंह का बचपन पंजाब में खासतौर पर प्रथम विश्व युद्ध के दौर में अंग्रेजी शासन के भारी दमन व उत्पीडन को देखते और भोगते बीता था |1919 में घटा जलियावाला बाग़ काण्ड उसकी चरम अभिव्यक्ति था |उस समय 7 वीक्लास का छात्र रहा 12 साल का भगत सिंह जलियावाला बाग़ की घटना के बाद वहा की मिट्टी लेने गया और उसे अपने साथ लाया भी |यह जलियावाला बाग़ काण्ड के साथ -साथ ब्रिटिश शासन द्वारा किए जाते रहे दमन के प्रति बालक भगत सिंह में उठते विद्रोह व विरोध का एक परिलक्षण भी था | ब्रिटिश शासन के दमन -अत्याचार के विरुद्ध पंजाब में खड़े होते रहे आंदोलनों ,संघर्षो की परिस्थियों ने भी भगत सिंह और उनके साथियो को महान क्रांतिकारी बनाने में महत्व पूर्ण भूमिका निभायी |
इन आम परिस्थियों के अलावा भगत सिंह के साथ जुडी विशिष्ठ परिस्थितियाँ भी थी |भगत सिंह का स्वंय एक राष्ट्रवादी -क्रांतिकारी परिवार में जन्म और पालन -पोषण |भगत सिंह के जन्म के समय पिता किशन सिंह और चाचा अजित सिंह ब्रिटिश साम्राज्यवाद विरोधी ,राष्ट्रवादी गतिविधियों कर कारण जेल में थे |ठीक उनकी पैदाइश के ही दिन दोनों रिहा होकर घर पहुचे थे |इसलिए घरवालो ने भगत सिंह का नाम भागो वाला (यानी भाग्य वाला )रख दिया |निसंदेह:भगत सिंह की पारिवारिक पृष्ठ भूमि ने उन्हें भागो वाला से महान क्रांतिकारी भगत सिंह बनने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी |दूसरी भूमिका लाहौर के नेशनल कालेज की परिस्थितियों की थी |इस कालेज में भगत सिंह ने उच्च शिक्षा लेने के लिए दाखिला लिया था |उस समय लाला छबीलदास उस कालेज के प्रिंसिपल थे वे नौजवानों को पाठ्य पुस्तके पढने के साथ -साथ इस बात को प्रोत्साहित करते रहते थे की उन्हें राष्ट्र व समाज हित में क्या कुछ पढ़ना और जानना चाहिए|
लाहौर में लाला लाजपत राय की 'द्वारका दास लाइब्रेरी 'और लाहौर के ही अनारकली बाज़ार में 'रामकृष्ण एंड सन्स' की किताबो की दूकान से भगत सिंह को मैगजीन ,गैरी बाल्डी,वाल्टेयर,जैसे यूरोपीय क्रान्तिकारियो के जीवन संघर्ष को पढने और जानने के साथ विक्टर ह्यूगो ,टालस्टाय,बर्नाड शा ,मैक्सिम गोर्की आदि जैसे महान लोगो के साहित्य को भी पढने का सुअवसर मिला और उससे उन्होंने भरपूर मार्ग दर्शन लिया | भगत सिंह को देश के जनसाधारण के प्रति मेहनत कशो के प्रति सिद्धांतनिष्ठ एवं कर्तव्यनिष्ठ होने का मार्गदर्शन देने में सोहन सिंह जोश ने अहम भूमिका निभायी |वे कम्युनिस्ट नेता होने के साथ -साथ 'कीरति' मासिक पत्रिका के सम्पादक भी थे |
वे भगत सिंह से विभिन्न विषयों पर चर्चा करने के साथ -साथ उन्हें 'कीरति 'में लिखने के लिए प्रोत्साहित भी करते रहते थे |उन्ही के शुरूआती प्रयासों के फलस्वरूप भगत सिंह कई अखबारों के लेखन ,सम्पादन में महत्व पूर्ण भूमिका निभाने में सफल रहे |
इसके अलावा वे ब्रिटिश ताकतों के विरुद्ध देश में होते रहे विरोधो ,विद्रोहों के खासकर 1857 के और फिर उससे भी ज्यादा गदर पार्टी के विरोध -विद्रोह के प्रयासों को जानने समझने में लगे रहते थे |वे गदर पार्टी के महान नेता करतारसिंह सराभा की फोटो अपने पास रखते थे और कहते थे कि यह मेरा गुरु ,मेरा साथी और मेरा भाई है | याद रखने की बात है कि करतार सिंह सराभा को भगत सिंह से कम उम्र में (19 )वर्ष फांसी के फंदे पर झुलना पडा था |यह बात स्मरणीय है कि गदर पार्टी के करतार सिंह सराभा जैसे ज्यादातर पंजाब से जुड़े हुए थे |इन्ही महान संघर्षशील अन्तराष्ट्रीय व राष्ट्रीय तथा स्थानित परिस्थितियों ने भगत सिंह को महान क्रांतिकारी की भूमिका निभाने के लिए उनका पथ प्रशस्त किया |उन्हें वैचारिक व व्यहारिक रूप में राष्ट्रीय व सामाजिक क्रान्ति का अग्रदूत बनने का सुअवसर प्रदान किया |यह बात दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश कि बहुसंख्यक जनता उन्हें बम पिस्तौल वाले बहादुर नौजवान एवं राष्ट्रभक्त क्रांतिकारी बलिदानी के रूप में जानती है |जबकि राष्ट्र स्वतंत्रता से लेकर समाज के बदलाव के बारे में उनके वैचारिक क्रान्ति के प्रयास कही ज्यादा है |देश कि आम जनता के लिए आज के दौर में भी वे प्रयास मार्गदर्शक और दिशानिर्धारक है |
देश काल कि उपरोक्त परिस्थितियों से उर्जा लेते हुए सबसे पहले नेशनल कालेज के छात्र के रूप में भगत सिंह और उनके साथियो ने 1926 में लाहौर में नौजवान भारत सभा का गठन किया |भगत सिंह इस सभा के महासचिव और भगवती चरण वोहरा प्रचार मंत्री बने |1928 में अमृतसर में हुए सम्मलेन में नौजवान भारत सभा ने अपना घोषणा पत्र जारी किया उसमे साफ़ कहा गया है कि "हमे अपनी जनता को आने वाले महान संघर्ष के लिए करना पडेगा |हमारी राजनैतिक लड़ाई 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के ठीक बाद से ही आरम्भ हो गयी थी |वह कई दौरों से होकर गुजर चूकि है |20 वी शताब्दी के आरम्भ से अंग्रेज नौकरशाही ने भारत के प्रति एक नयी नीति अपनाई है |वे हमारे देश के पूंजीपतियों तथा निम्न पूंजीपति वर्ग को सहूलियत देकर उन्हें अपनी तरफ मिला रहे है |दोनों का हित एक हो रहा है |भारत में ब्रिटिश पूंजी के अधिकाधिक प्रवेश का अनिवार्यत:यही परिणाम होगा |निकट भविष्य में बहुत शीघ्र हम उस वर्ग को तथा उसके नेताओं को विदेशी शासको के साथ जाते देखेंगे |अत:'अब देश को तैयार करने के भावी कार्यक्रम का शुभारम्भ इस आदर्श वाक्य से होगा -क्रान्ति जनता द्वारा जनता के हित में |दूसरे शब्दों में 98 प्रतिशत के लिए स्वराज्य जनता द्वारा प्राप्त ही नही बल्कि जनता के लिए भी |
यह एक बहुत कठिन काम है ...........युवको के सामने काफी कठिन काम है और उनके साधन बहुत थोड़े है |उनके मार्ग में बहुत सी बाधाये भी आ सकती है लेकिन थोड़े किन्तु निष्ठावान व्यक्तियों की लगन उन पर विजय पा सकती है |युवको को आगे जाना चाहिए |उनके सामने जो कठिन एवं बाधाओं से भरा मार्ग है ,और उन्हें जो महान कार्य सम्पन्न करना है ,उसे समझना होगा |उन्हें अपने दिल में यह बात रख लेनी चाहिए कि सफलता मात्र एक संयोग है जबकि बलिदान एक नियम |.......................... इस बीच नौजवान भारत सभा के क्रान्तिकारियो ने काकोरी ट्रेन डकैती में पकडे गये रामप्रसाद बिस्मिल जैसे क्रान्तिकारियो को जेल से छुडा लेने की योजना भी बनाई ,परन्तु ब्रिटिश पुलिस प्रशासन की बड़ी और संगठित ताकत के चलते वह योजना अमल में नही लायी जा सकी |
इसी दौरान भारत में संवैधानिक सुधारों के लिए ब्रिटिश सरकार द्वारा मनमाने ढंग से गठित साइमन कमीशन का देश में आगमन हुआ |इस कमीशन का देश भर में विरोध हुआ |30 अक्तूबर 1928 को यह कमीशन लाहौर पहुचा |विरोध प्रदर्शन में हुए लाठी चार्ज के चलते लाला लाजपत राय पर लाठियाँ बरसाने के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारी साडर्स की हत्या कर दी |भगत सिंह ने इसमें प्रमुख भूमिका निभाई |साडर्स -वध के बाद क्रान्तिकारियो द्वारा गठित हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संगठन की तरफ से जारी नोटिस में यह घोषणा की गयी कि.....'मनुष्य का रक्त बहाने के लिए हमे खेद है |परन्तु क्रान्ति की बलि वेदी पर कभी -कभी रक्त बहाना अनिवार्य हो जाता है |हमारा उद्देश्य एक ऐसी क्रान्ति से है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अन्त कर देगी ।इन कारवाइयो के साथ -साथ भगत सिंह कीरति नाम की पंजाबी पत्रिका में तथा हिदी के प्रताप ,प्रभा महारथी ,चाँद आदि पत्रिकाओं में राष्ट्र की स्वतंत्रता और समाज कीं विभिन्न समस्याओं को लेकर लिखते रहे |उनके लेखो में पंजाब -की भाषा तथा लिपि की समस्या (1924) 'विश्व प्रेम '(1929 )'युवक '(1925) 'धर्म और हमारा स्वतंत्रता संग्राम (1928 )'साम्प्रदायिक दंगे 'और उनका इलाज़ '(1928) 'अछूत 'समस्या (1928) 'मैं नास्तिक क्यों हूँ '(1930 )आदि जैसे महत्वपूर्ण लेख है |राजनीतिक लेखो में वे और उनके क्रांतिकारी साथी राष्ट्र की क्रांतिकारी घटनाओं और शहीदों के जीवन संघर्षो को लेकर निरंतर लेख लिखते और प्रकाशित करते रहे
इनमे 'होली के दिन रक्त के छीटे' (1926) 'काकोरी के वीरो से परिचय ''काकोरी के शहीदों की फांसी के हालात' (1928) 'काकोरी के शहीदों के लिए प्रेम के आंसू 'सूफी अम्बा प्रसाद (1928) बलवंत सिंह (1928) डाक्टर मथुरा सिंह (1928) शहीद करतार सिंह सराभा (1928) मदनलाल धिगरा (1928) शहीद खुदीराम बोस (1928) अराजकता वाद (1928) विद्यार्थी और राजनीत (1928) 'नौजवान भारत सभा लाहौर का घोषणा पत्र (1928) हिन्दुस्तान रिपब्लिक एसोसिएसन का घोषणा पत्र (1929 )बम का दर्शन (1930 )क्रांतिकारी मसौदा (1931) युद्ध अभी जारी है (1931 ) तथा अन्य बहुत सारे सारगर्भित एवं महत्वपूर्ण लेख तथा पर्चे व पत्र आदि शामिल है |भगत सिंह के जीवन के बाद की घटनाओं में असेम्बली बम काण्ड प्रमुख है |ब्रिटिश साम्राज्य का जन विरोधी और मजदूर विरोधी नीतियों को बढावा देने के लिए सरकार सदन में चर्चा के बाद सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक (पब्लिक सेफ्टी बिल )और 'औद्योगिक विवाद विधयेक (ट्रेड डिस्प्यूट बिल ) लागू करने जा रही थी |असेम्बली हाल में उन्ही बिलों पर चर्चा के दौरान भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने 8 अप्रैल 1929 को हाल की खाली जगह पर दो बमो का धमाका करने के साथ हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक सेना की तरफ से पर्चे फेके |इस बम विस्फोट से कोई मारा नही गया और न ही बम फेकने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त वहा से भागे नही |उन्होंने पूर्वनियोजित योजना के अनुसार अपनी गिरफ्तारिया दी |इसके बाद उसी योजनानुसार न्यायालय की सुनवाई के दौरान भगत सिंह ने अपना ब्यान अदालत के माध्यम से पूरे देश में पहुचा दिया |वे ब्यान भी एक महत्वपूर्ण एतिहासिक दस्तावेज बन चुके है |न्यायालय में पहला मुकदमा असेम्बली बम काण्ड को लेकर था जिसकी जिमीदारी दोनों ने बम के साथ पर्चे फेकने के रूप में ही ले ली थी |अदालत में उन्होंने स्पष्ट कहा की उनका उद्देश्य भरी सरकार की जनविरोधी बिलों के प्रति अपने विरोध को सुनाना था न की किसी को मारना |इस केस में दोनों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी | लाहौर षड्यंत्र केस में भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव को मृत्यु दंड दिया गया |मुकदमे के दौरान भगत सिंह ने क्रान्तिकारियो के साथ जेल में होते रहे अमानुषिक व्यवहार व अत्याचार के विरुद्ध लंबा अनशन किया |लेकिन इस बीच उनका लिखना पढ़ना और पत्र व्यवहार निरन्तर जारी रहा |अनशन के दौरान कमजोर हालात में स्ट्रेचर पर लाये जाने के वावजूद उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य और उसकी न्यायालयी व्यवस्था के ढोंग ,पाखण्ड को नगा करने के साथ -साथ क्रान्तिकारियो के लक्ष्यों ,उद्देश्यों को स्पष्ट करने तथा उनके विरुद्ध होते रहे दुष्प्रचारो का जबाब देना जारी रखा |23 मार्च 1931 के दिन सारे नियम -कानून ताक पर रखकर भगत सिंह ,राजगुरु और सुखदेव को शाम के समय फांसी दे दी गयी |जेल प्रशासन ने उनकी लाशें परिजनों को भी नही दी |उनको सतलुज के किनारे जलाकर खत्म कर दिया |क्योंकि उनको डर था की लाशें पाकर भारी जन समूह इकठ्ठा हो सकता है और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ उग्र विरोध के लिए खड़ा हो सकता है |साम्राज्यवादियों की यह करतूत एकदम समझ में आने वाली है |लेकिन कडवी सच्चाई यह भी है की 1947 से पहले और उसके बाद भी देश के ख्याति प्राप्त नेताओं द्वारा भी भगत सिंह और उनके साथियो के साथ भारी अन्याय किया जाता रहा है |उनके क्रान्ति के महान व गंभीर उद्देश्यों पर पर्दा डालने का काम किया जाता रहा है |उन्हें मुख्य रूप से कांग्रेस व गांधी जी के अहिंसा के पथ के विपरीत हिंसा के पथ के अनुगामी के रूप में चित्रित किया जाता रहा |आज भी देश का जन मानस गांधी व अन्य कांग्रेसी नेताओं को अहिंसावादी देशभक्त तथा भगत सिंह व अन्य क्रान्तिकारियो को हिंसावादी देशभक्त के रूप में ही जानता है |
जबकि सच्चाई एकदम दूसरी है |वह यह की 1922 -24 के बाद से देश का धनाढ्य एवं उच्च हिस्सा कांग्रेस व मुस्लिम लीग जैसी पार्टियों की अगुवाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद से समझौता करते हुए सत्ता की बागडोर को अपने हाथ में लेना चाहता था |देश पर 250 सालो से आधिपत्य जमाए रहे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के लूट के संबंधो को बरकरार रखते हुए देश के संसाधनों पर और शासन सत्ता पर धनाढ्य एवं उच्च वर्गो का पूर्ण अधिकार स्थापित करना चाहता था |इन्ही अधिकारों को ब्रिटिश साम्राज्य के साथ किए जाते रहे समझौतों के जरिये बढाया भी जाता रहा था |और फिर समझौतों की अगली व अंतिम कड़ी के रूप में 1947 की स्वतंत्रता का समझौता भी पूरा कर लिया गया |इसकी भविष्यवाणी भगत सिंह के संगठन हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातांत्रिक संगठन ने अपने घोषणा (वर्ष 1929 ) में पहले ही कर दी थी |इसे आप संगठन के घोषणा पत्र में देख सकते है |उस घोषणा पत्र के कुछ अंश "".भारत साम्राज्यवाद के जुए के नीचे पिस रहा है |इसमें करोड़ो लोग आज अज्ञानता और गरीबी के शिकार हो रहे है |भारत की बहुत बड़ी जनसख्या मजदूरों और किसानो की है ,उनको विदेशी दबाव एवं आर्थिक लूट ने पस्त कर दिया है |भारत के मेहनतकश वर्ग की हालत आज बहुत गंभीर है |उसके सामने दोहरा खतरा है -विदेशी पूंजीवाद का एक तरफ से और भारतीय पूंजीवाद के धोखे भरे हमले का दूसरी तरफ से |भारतीय पूंजीवाद विदेशी पूंजी के साथ हर रोज बहुत से गठजोड़ कर रहा है |कुछ राजनैतिक नेताओं का डोमिनियन (प्रभुता सम्पन्न ) का रूप स्वीकार करना भी हवा के उसी रुख को स्पष्ट करता है |......
भारतीय पूंजीपति भारतीय लोगो को धोखा देकर विदेशी पूंजीपति से विश्वास घात की कीमत के रूप में सरकार से कुछ हिस्सा प्राप्त करना चाहता है |......... फिर फांसी से 13 दिन पहले जेल से लिखे लेख 'युद्ध अभी जारी है (10 मार्च 1931 ) में भगत सिंह ,राजगुरु ,सुखदेव ने यह घोषणा की है की "अंग्रेज जातिऔर भारतीय जनता के मध्य एक युद्ध चल रहा है |....हमने निश्चित रूप से इस युद्ध में भाग लिया है |...यह युद्ध तब तक चलता रहेगा जब तक शक्तिशाली व्यक्तियों ने भारतीय जनता और श्रमिको की आय के साधनों पर अपना एकाधिकार कर रखा है |चाहे ऐसे व्यक्ति अंग्रेज पूंजीपति और अंग्रेज या सर्वथा भारतीय ही क्यों ना हो |उन्होंने आपस में मिलकर एक लूट जारी चाहे शुद्ध भारतीय पूंजीपति के द्वारा ही निर्धनों का खून चूसा जा रहा हो तब भी |..इससे कोई अन्तर नही पड़ता |यह युद्ध जारी रहेगा ..जब तक की समाज का वर्तमान ढ़ाचा समाप्त नही हो जाता |.....
क्या यह युद्ध आज भी जारी नही है ? एकदम जारी है |अमेरिका इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी देशो की साम्राज्यी कम्पनियों ,सरकारों और उनकी सहयोगी बनी भारत -पाक जैसे पिछड़े देशो की धनाढ्य कम्पनियों व सरकारों में गठजोड़ व सहयोग से जारी है |पिछड़े देशो के जनसाधारण पर हो रहे आर्थिक ,कुटनीतिक एवं सैन्य हमलो के रूप में जारी है |पिछले 20 सालो से देश दुनिया के धनाढ्य वर्गो के हितो को बढाने और जनसाधारण के हितो को काटने -घटाने वाली वैश्वीकरणवादी आर्थिक नीतियों और भोगवादी संस्कृति नीतियों के रूप में प्रत्यक्ष:जारी है |फिर यह युद्ध ईराक ,अफगानिस्तान ,लीबिया जैसे पिछड़े देशो में हमलावार सैन्य साम्राज्यी नीतियों के रूप में भी प्रत्यक्ष:जारी है इस युद्ध और हमले को देश का जनसाधारण महंगाई ,बेकारी के रूप में ,खेती -किसानी एवं छोटे स्तर के कारोबारों की टूटन के रूप में महंगाई और पहुच से बाहर होती जा रही शिक्षा के रूप में ,नग्न -अर्धनग्न लचर भोगवादी संस्कृति के रूप में और सामाजिक टूटन -बिखराव आदि के रूप में झेलता जा रहा है |दुःख कष्ट और जिल्लत से जीने की मजबूरी के साथ वह आत्महत्या का रास्ता भी पकड़ता जा रहा है |क्योंकि वह इस युद्ध को देख नही पा रहा है ,समझ नही पा रहा है |आवश्यकता है इस जारी युद्ध को समझने की और संगठित होकर उसका मुकाबला करने की |विदेशी वैश्विक नीतियों के विरोध के साथ राष्ट्र व राष्ट्र के जनसाधारण को वैश्विक लूट व प्रभुत्व के संबंधो से मुल्त करने के लिए नया क्रांतिकारी युद्ध छड़ने की |उसके लिए भगत सिंह व अन्य राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय क्रान्तिकारियो से सबक ,शिक्षा व मार्ग दर्शन ग्रहण करने की |
युद्ध अभी जारी है ...

-सुनील दत्ता
पत्रकार
साभार चर्चा आज कल

बुधवार, 21 मार्च 2012

खुदरा व्यापार में विदेशी पूँजी एक अतुलनीय जन विरोधी फैसला




खुदरा व्यापार के विदेशीकरण की केन्द्रीय सरकार की मुहिम भारत के आम लोगों की आजीविका के साधनों पर एक बहुमुखी हमला है। इस निर्णय पर राजनीति के जंग में सरकार एक बार मुँह की खा चुकी है। वास्तव में यह फैसला स0प्र0ग0 दो की सरकार का नहीं है। कांग्रेस का केन्द्रीय नेतृत्व जोरशोर से इसके पीछे है किन्तु न केवल कुछ बड़े सहयोगी दल, अपितु कांग्रेस के अनेक लोग इस निर्णय के खिलाफ आवाज उठा चुके हैं। एक पारिवारिक सम्पत्ति की तरह चलने वाली कांग्रेस पार्टी को कम्पनी क्षेत्र के बड़े स्तम्भ अपने घर की दुकान बता रहे हैं। विदेशी कम्पनियों और सरकारों के पैरोकार, विदेशी तथा देसी अखबार, विदेशी कम्पनियों के भारत प्रवेश को यू0पी0ए0-2 की कुशलता और शक्ति का प्रतीक बता चुके हैं। खुल्लम खुल्ला विदेशी कम्पनियाँ भारत में खुदरा व्यापार में प्रवेश की अनुमति दिलाने के लिए लाॅबी करने यानी अपने पक्ष में प्रचार करने और रिझाने में मोटा खर्च कर रही हैं। खबर छपी है कि खुदरा व्यापार की एक बड़ी कम्पनी ने अपने पक्ष में निर्णय करने के लिए वर्षों से मुहिम चला रखी थी। वह अब तक 70 करोड़ रूपये इस गोरखधन्धे पर लगा चुकी है। क्या यह भारत की राजनीति और नीतिगत निर्णय प्रक्रिया में बाहरी वित्ती आर्थिक इकाइयों की सीधी-सीधी दखलंदाजी का उदाहरण नहीं है। असली मुद्दा यह भी है कि महज 70 करोड़ रूपये में ऐसा जन विरोधी नीतिगत निर्णय भारतीय लोकतंत्र पर थोपा जा सकता है। हजारों करोड़ रूपये के निवेश को यहाँ के खेती के बाद आम आदमी के रोजगार के दूसरे मुख्य धन्धों में लगाने की इजाजत ऐसी शर्तों, ऐसी प्रतिकूल चालू आर्थिक स्थिति और सरकार की घटती साख के दौरान तकनीकी तथा व्यावहारिक रूप से एक सुगमतम धन्धे में लगाने की आजादी विश्व की विशालतम कम्पनियों को दे दी गई थी। एक बार इसे स्थगित करने के बाद एक ओर तो इस आत्मघाती (आ बैल, मुझे मार नुमा) फैसले के पक्ष में प्रचार बढ़ा दिया गया है, दूसरी ओर यह घोषणा भी की जा रही है कि इसे शीघ्र लागू कराने की कोशिशें जारी हैं।
किस तरह बेहतर राजनैतिक या कम विरोध की स्थितियाँ पैदा की जाएँगी या इस निर्णय में सुधार किए जाएँगे ताकि कम से कम इसके गलत प्रभावों को कमतर किया जा सके, यह स्पष्ट नहीं किया जा रहा है।
हाँ, कई बेतुकी दलीलें देकर जनता को भरमाने के प्रयास जरूर हो रहे हैं। यू0पी0 के विधान सभा चुनावों ने राजनैतिक लोगों को एक बार फिर जनता के दरवाजों पर दस्तक लगाने को मजबूर कर दिया है। इस अवसर का इस्तेमाल खुदरा व्यापार में विशाल विदेशी कम्पनियों की भारत प्रविष्टि के पक्ष में प्रचार करने के लिए भी किया जा रहा है। इस सिलसिले में एक बिना सिर पैर की दलील का उदाहरण इस मुहिम के खोखलेपन की पोल खोलने के लिए पर्याप्त नजर आता है।
कांग्रेस के एक अति शक्तिशाली नेता ने किसानों को एक बहुत ही लचर और सच्चाई से कोसों दूर दलील देकर वालमार्ट जैसी कम्पनियों के आगमन से मिलने वाले फायदों का खाका खींचा। इस दलील का सार यह है कि किसान के आलू जैसे उत्पादन को अभी बहुत कम कीमत पर खरीदा जाता है और उसका इस्तेमाल करके डिब्बा या थैली बन्द सामान जैसे उत्पाद बनाकर उन्हें कई गुना ऊँचे दामों पर बेच दिया जाता है। इस तरह किसान को अपनी मेहनत का लाभ बहुत नाम मात्र मिल जाता है। दूसरी ओर मुख्य रूप से किसान द्वारा पैदा किए गए सामान को काफी ऊँची या महँगी दरों पर बेचा पाता है। यह सारा लाभ कृषिमाल का इस्तेमाल करने वाले उत्पादक हजम कर लेते हैं जाहिर है यह सिलसिला लगातार चला आ रहा है। सरकार और देश के लोग मिलकर इन हालात को बदल नहीं पाए है।
नेता आम सभाओं में कहते हैं कि अब सरकार इस कमी को दूर करके किसान को उसका हक दिलाना चाहती है। अब सरकार विदेशी, मुख्य रूप से यूरोप और अमरीका की बड़ी-बड़ी कम्पनियों के सहारे यह करने जा रही है।
प्रत्येक कम्पनी जो 2500 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश भारत के दस लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों में काम कर सकने मंे समर्थ है (कुल 53 शहरों में) उनको अब भारत में खुदरा दुकानें खोलने की इजाजत देना कांग्रेस की सदारत में चलने वाली सरकार का लगभग एक तरफा निर्णय था। अभी तो विरोध के चलते इसे लागू नहीं किया जा पा रहा है किन्तु सरकार इस निश्चय पर अडिग है और इसे लागू करवा कर किसान को उसकी उपज के अच्छे दाम दिलाने को कटिबद्ध है। जाहिर है इस सरकार को अति विशाल पूँजीवाली विदेशी कम्पनियों का दामन थामकर किसानों को उनके माल का अच्छा दाम दिलाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझ रहा है। अब तक के अपने लम्बे शासनकाल में किसानों को उनकी उपज का वाजिब दाम दिला पाने में नाकामयाब सत्ता अब इन बाहरी विशाल कम्पनियों के माध्यम से इस मकसद को अंजाम देना चाहती है।
यहाँ दो सवाल विचारणीय हैं सच है किसान को उसकी फसल के उचित दाम मिलने में कई बाधाएँ आती हैं। उदारीकरण के बीस सालों में पेप्सी जैसी बाहरी कम्पनियों मैकडोनालड स्टारबक, सब वे, जैसी कई रेस्त्रां सीधे किसानों से फसल खरीदने वाली बहुराष्ट्रीय अनाज व्यापारी कम्पनियों को भारत में न्यौता गया, किन्तु स्थिति सुधरी नहीं। अनुबन्ध खेती में अग्रणी पंजाब जैसे राज्यों में जहाँ आलू, टमाटर की विदेशी कम्पनियों से अनुबन्ध या कान्ट्रेक्ट, खेती का चलन बहुत बढ़ा, किसानों को आलू सड़क पर फेंकने को मजबूर होना पड़ा। खाद्य प्रसंस्करण के नाम पर हानिप्रद पैकटों में नमकीन बेचने को इतना बढ़ाया गया कि लाखों हलवाइयों का रोजगार घटा। ये सब बाजार की शक्तिशाली कम्पनियों को बढ़ावा देने का नतीजा है। इन्हीं नीतियों के सूत्रधार अब अपने करतूतों के खराब नतीजों से किसानों को बचाने के लिए और ज्यादा कड़ी, प्रतियोगिता, खुदरा व्यापारियों को न्यौतकर किसान को न्यायपूर्ण वाजिब कीमत दिलाने का झूठा भरोसा दिला रहे हैं। राजस्थानी में कहावत है कि ‘झूठ बोलने वाला और जमीन पर सोने वाला तंगी महसूस नहीं करता’’। इस वादे का दो मुँहा चरित्र और खुलकर सामने आता है जब यह कहा जाता है कि किसान की उपज उससे अच्छे (यानी ऊँचे) दामों पर खरीदी जाएगी और वही फसल उपभोक्ताओं को सस्ती बेच दी जाएगी।
-कमल नयन काबरा
क्रमश: