शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

कश्मीर से आये राही बता

कश्मीर से आये राही बता किस हाल में हैं यारां -ए-चमन मजलूम जो सहमे रहते थे किस हाल में है अवाम -ए -वतन
क्या अब भी वहाँ की गलियो में , खून की नदियाँ की बहती हैं... क्या अब भी दुआएं लब पे लिए , वहाँ माएं परेशान रहती हैं ...
क्या अब भी वहाँ पे फौज -ओ -पुलिस , और गोलियों की बड़ी दहशत है i... क्या अब भी वहाँ पे ज़ुल्म -ओ -जबर , और बर्बरियत की वेहशत है i...
क्या अब भी मुअश्शिन मस्जिद में , रो रो के अजाने पढ़ते हैं... क्या अब भी अश्को की गतारो में i, बच्चों के जिनाज़े पढ़ते हैं ...
क्या अब भीi नारा -ए -हक, उठते ही दबाया जाता है... क्या अब भी बेबाक सफाई से , बातिल को सुनाया जाता है i...
क्या अब भीiवहाँ की फिजा में, फ़रियाद के नाले लरज़ान हैं .. क्या अब भी चमन की शाखों में , इंसाफ के बिखरे अरमान हैं ...
ऐ आने वाले कुछ न बता , यह ख़ामोशी खाकी रहने दे ... तेरे आंसो सदद अफ़साने हैं, इन्हें बात वोह बाकी कहने दे ...
- "खाकी i"
http://missionbhartiyam.blogspot.in/2013/08/a-kashmiri-inquires-about-his-land-poem.html

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल रविवार (18-08-2013) को "नाग ने आदमी को डसा" (रविवासरीय चर्चा-अंकः1341) पर भी होगा!
    स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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सुमन
लोकसंघर्ष