शनिवार, 21 मई 2016

क्रांतिकारी भगत सिंह और स्वाधीनता आंदोलन



                                                                                                        विभिन्न कारणों से इतिहास हमेषा से बहस-मुबाहिसों का विषय रहा है। हाल में भगत सिंह को लेकर जो बहस छिड़ी है, उसे भी इसी रूप में देखा जाना चाहिए। ताज़ा विवाद, अतीत को देखने के हमारे नज़रिए से जुड़ा है और विष्व स्तर पर आतंकवाद के उभार के संदर्भ में ‘आतंकवाद’ षब्द के बदलते हुए अर्थ से उपजा है। एक टीवी टॉक षो, जो संजीदा बहसों से ज्यादा षोर-षराबे और अर्थहीन विवादों के लिए जाना जाता है, में संचालनकर्ता ने ख्यात इतिहासविद् बिपिन चंद्र और उनकी पुस्तक ‘‘इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेन्डेन्स’’ पर हल्ला बोला। इन जनाब को यह आपत्ति थी कि इस पुस्तक में भगत सिंह और उनके साथियों को आतंकवादी बताया गया है। उन्होंने पुस्तक के लेखकों को कांग्रेस के ‘‘दरबारी इतिहासविद्’’ बताया और उन पर यह आरोप जड़ दिया कि उन्होंने जानते-बूझते देषभक्तों पर कीचड़ उछाला है। इसके बाद, भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने फरमाया कि पुस्तक में षहीदों को अपमानित किया गया है और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी तुरतफुरत इस निष्कर्ष पर पहुंच गईं कि यह महान स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के बलिदान की ‘‘अकादमिक हत्या’’ है।
यह पुस्तक 28 साल पहले प्रकाषित हुई थी और आज भी इस विषय पर सबसे लोकप्रिय और प्रमाणिक पुस्तक है। यह सही है कि इसमें प्रफुल्ल चाकी, खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, सचिन सान्याल, भगत सिंह और रासबिहारी बोस जैसे क्रांतिकारियों को ‘‘क्रांतिकारी आतंकवादी’’ कहा गया है। बिपिन चंद्र और उनके साथी इतिहासविदों ने ‘‘क्रांतिकारी आतंकवादी’’ षब्द का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि स्वाधीनता के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले ये युवा स्वयं को यही मानते थे। गांधीजी द्वारा इन क्रांतिकारियों की आलोचना पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उनमें से एक, भगवतीचरण वोहरा, ने लिखा, ‘‘इस तरह देष में आतंकवाद का जन्म हुआ। यह क्रांति का एक दौर है-एक आवष्यक और अपरिहार्य दौर। केवल आतंकवाद, क्रांति नहीं है परंतु आतंकवाद के बिना क्रांति अधूरी है...आतंकवाद, दमितजनों में यह आषा जगाता है कि वे उन पर हो रहे अत्याचारों का प्रतिषोध ले सकते हैं और अत्याचारियों से मुक्ति पा सकते हैं। इससे ढुलमुल लोगों में साहस और आत्मविष्वास का संचार होता है, इससे षासक वर्ग की श्रेष्ठता का आभामंडल टूटता है और पराधीन राष्ट्र के लोगों का सम्मान दुनिया की निगाहों में बढ़ता है। आतंकवाद, किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता पाने की तीव्र इच्छा का सबसे ठोस सुबूत है’’ (भगवतीचरण वोहरा की पुस्तक ‘‘फिलॉसफी ऑफ बोम्ब’’ से)।
यह अलग बात है कि आगे चलकर क्रांतिकारियों के इस समूह की विचारधारा में भी बदलाव आया, जो रामप्रसाद बिस्मिल की ‘‘रिवाल्वर और पिस्तौलें रखने की इच्छा’’ को त्यागने और इसके स्थान पर ‘‘खुले आंदोलन’’ में भाग लेने की सलाह से जाहिर है। भगत सिंह के विचार भी समय के साथ बदले और सन 1929 तक वे इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि व्यक्तिगत बहादुराना कार्यवाहियों की जगह मार्क्सवाद और व्यापक जनांदोलन क्रांति की सही राह हैं। सन 1931 में जेल से अपने साथियों को दिए गए अपने संदेष में उन्होंने आतंकवाद की रणनीति की अपनी सूक्ष्म समझ को लोगों के सामने रखा। जो लोग भगत सिंह और उनके साथियों के लिए आतंकवादी षब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति कर रहे हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि क्रांतिकारी स्वयं को आतंकवादी ही बताते थे। उस समय आतंकवाद को नीची निगाहों से नहीं देखा जाता था। सन 2001 के बाद से दुनिया के तेल संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने की वैष्विक प्रतिद्वंद्विता के चलते आतंकवाद का वीभत्स स्वरूप सामने आया।
‘‘इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेन्डेन्स’’ का प्रथम संस्करण 1988 में प्रकाषित हुआ था। इसके लगभग एक दषक बाद से बिपिन चंद्र ने भगत सिंह के बारे में कई मौकों पर लिखा परंतु उन्होंने उनके लिए आतंकवादी षब्द का इस्तेमाल नहीं किया। भगत सिंह के प्रसिद्ध लेख ‘‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’’ की अपनी भूमिका में बिपिन चंद्र लिखते हैं, ‘‘भगत सिंह न केवल भारत के महानतम स्वाधीनता संग्राम सेनानियों में से एक थे वरन वे क्रांतिकारी समाजवादी भी थे और भारत के सबसे पहले मार्क्सवादी विचारकों और सिद्धांतकारों में षामिल थे।’’ बिपिन चंद्र के सहलेखकों ने ज़ोर देकर कहा कि बिपिन चंद्र, भगत सिंह को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखते थे और पुस्तक के बिपिन चंद्र द्वारा लिखित अध्यायों में भगत सिंह की लोकप्रियता की विस्तृत चर्चा की गई है। बिपिन चंद्र ने लिखा है कि भगत सिंह पूरे देष में बहुत लोकप्रिय थे और उन्हें फांसी दिए जाने की खबर सुनने के बाद लाखों लोगों ने उस दिन भोजन नहीं किया।
ऐसा लगता है कि स्मृति ईरानी और उनके कुनबे के अन्य सदस्य, पुस्तक में आतंकवादी षब्द के इस्तेमाल के बहाने इस पुस्तक को पाठ्यक्रम से बाहर करने की मंषा रखते हैं और इसका असली कारण यह है कि यह पुस्तक भारत की सांप्रदायिक राजनीति का पैना विष्लेषण करती है। पुस्तक पढ़ने से यह साफ हो जाता है कि मुस्लिम और हिंदू, दोनों वर्गों के सांप्रदायिक तत्वों ने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। इन लोगों ने ब्रिटिष-विरोधी राष्ट्रवादी आंदोलन से दूरी बनाए रखी। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे सांप्रदायिक ताकतें छुपाना चाहती हैं और भगत सिंह के लिए आतंकवादी षब्द का इस्तेमाल जैसे बेसिरपैर के मुद्दे पर अपनी छातीयां पीटकर स्वयं को देषभक्त सिद्ध करना चाहती हैं।
संघ परिवार के कुछ अन्य सदस्यों का कहना है कि यह पुस्तक केवल नेहरू और देष में वामपंथ पर केंद्रित है। जाहिर है कि या तो उन्होंने इस पुस्तक को ठीक से पढ़ा-समझा नहीं है या फिर वे जानबूझकर ऐसी आधारहीन बातें कर रहे हैं। पुस्तक को ध्यान से पढ़ने पर किसी को भी यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह पुस्तक साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन के सभी पहलुओं पर प्रकाष डालती है। अंग्रेज़ों के खिलाफ जिन भी षक्तियों और समूहों ने लड़ाई लड़ी, उन सबको इस पुस्तक में समुचित स्थान दिया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गांधी और नेहरू, स्वाधीनता संग्राम के अनन्य नेता थे और इसलिए उनका प्रमुखता से जिक्र आना स्वाभाविक है। परंतु यह पुस्तक इस आंदोलन की आंतरिक धाराओं से भी पाठक को परिचित करवाती है। यह पुस्तक भगत सिंह, सूर्यसेन व अन्य क्रांतिकारियों के साथ पूरा न्याय करती है और ब्रिटिष-विरोधी आंदोलन में उनकी भूमिका को पर्याप्त महत्व देती है। पुस्तक में सुभाषचंद्र बोस, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, मोहम्मद अली जिन्ना, बाबासाहब अंबेडकर आदि सभी को उचित संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक यह बताती है कि आम लोगों को इस आंदोलन से कैसे जोड़ा गया। इस आंदोलन के विभिन्न चरणों, उसके सम्मुख प्रस्तुत चुनौतियों और उसमें समय के साथ आए परिवर्तनों का पुस्तक में गंभीर विष्लेषण किया गया है।
दरअसल, बिपिन चंद्र और उनके साथियों का फोकस व्यक्तियों या स्वाधीनता आंदोलन के महानायकों के आपसी टकराव पर न होकर विचारधाराओं और परिघटनाओं पर है। बिपिन चंद्र के सहलेखकों का कहना है कि ‘‘इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेन्डेन्स’’ स्वाधीनता संग्राम में उदारवादियों, समाजवादियों, साम्यवादियों आदि सभी राजनैतिक प्रवृत्तियों की भूमिका का संतुलित प्रस्तुतिकरण करती है। पुस्तक 1857 के स्वाधीनता संग्राम से लेकर गदर पार्टी, इंडियन नेषनल आर्मी, स्वदेषी व भारत छोड़ो आंदोलन, किसानों, ट्रेड यूनियनों आदि के आंदोलनों, जाति-विरोधी व देषी रियासतों के नागरिकों के आंदोलनों सहित स्वाधीनता संग्राम के सभी पक्षां के साथ न्याय करती है। इस पुस्तक में दादाभाई नोरोजी से लेकर बिरसा मुंडा, लोकमान्य तिलक  गांधीजी, सरदार पटेल, जयप्रकाष नारायण और अरूणा आसफ अली आदि सभी की भूमिका को समुचित महत्व दिया गया है।
आज आतंकवाद षब्द का अर्थ बदल गया है और प्रोफेसर बिपिन चंद्र अब इस दुनिया में नहीं हैं। इसलिए उनके सहलेखक, अन्य इतिहासविदों के साथ विचारविमर्ष कर इन महान स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के लिए ‘‘उग्रवादी क्रांतिकारी’’ या अन्य कोई उपयुक्त षब्द चुन सकते हैं। भाजपा, अपने राजनैतिक एजेंडे को लागू करने के लिए इतिहास से खिलवाड़ करती आई है। ताज़ा घटनाक्रम से यह साफ है कि वह स्वाधीनता आंदोलन पर केंद्रित इस बहुमूल्य पुस्तक से छुटकारा पाने का प्रयास कर रही है क्योंकि यह पुस्तक हिंदुत्ववादी ताकतों की कथित देषभक्ति का पर्दाफाष करती है और यह बताती है कि इन षक्तियों ने स्वाधीनता संग्राम में कोई भूमिका अदा नहीं की।


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