बुधवार, 28 जनवरी 2026

असम के मुख्यमंत्री भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं - भारतीय जनता पार्टी

असम बीजेपी में घमासान जारी, पूर्व मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने मुख्यमंत्री हिमंता और उनकी पत्नी के ख़िलाफ़ मोर्चा खोला* असम बीजेपी में घमासान अब खुली जंग में बदल चुका है। जिस पार्टी को कभी “अनुशासित संगठन” कहा जाता था, आज वही पार्टी अंदर से सड़ती हुई दिखाई दे रही है। ताज़ा विस्फोट खुद असम के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ बीजेपी नेता सर्बानंद सोनोवाल के पत्र से हुआ है, जिसमें उन्होंने सीधे-सीधे मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा और उनकी पत्नी पर भ्रष्टाचार के आरोपों को बीजेपी के नुकसान की सबसे बड़ी वजह बताया है। यह कोई विपक्ष का आरोप नहीं है, न ही किसी बाहरी आलोचक की टिप्पणी। यह बीजेपी के भीतर से उठी वह आवाज़ है, जो लंबे समय से दबाई जा रही थी। सर्बानंद सोनोवाल का यह कहना कि हिमंता और उनके परिवार के भ्रष्टाचार के कारण पार्टी को राजनीतिक नुकसान हो रहा है, दरअसल उस सच्चाई की सार्वजनिक स्वीकारोक्ति है, जिसे असम की जनता पहले से महसूस कर रही है। हिमंता बिस्वा सरमा का शासन अब विकास नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार, डर और सत्ता के दुरुपयोग का प्रतीक बन चुका है। सरकारी तंत्र परिवार के इर्द-गिर्द सिमटता गया, फैसले चंद लोगों के हित में होने लगे और आम असमिया खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगा। जनता में बढ़ता आक्रोश अब बीजेपी के भीतर भी फूट के रूप में सामने आने लगा है। *सबसे गंभीर सवाल यह है कि जिस मुख्यमंत्री को पार्टी का चेहरा बनाकर बीजेपी चुनाव मैदान में उतरना चाहती है, वही चेहरा अब पार्टी के लिए सबसे बड़ा बोझ बन चुका है। जब खुद एक पूर्व मुख्यमंत्री यह कहने पर मजबूर हों कि मौजूदा मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी के भ्रष्टाचार से पार्टी को नुकसान हो रहा है, तो यह साफ संकेत है कि असम बीजेपी नैतिक, राजनीतिक और संगठनात्मक संकट में फंस चुकी है।* बीजेपी का केंद्रीय नेतृत्व चाहे जितना पर्दा डालने की कोशिश करे, लेकिन सच्चाई अब सामने आ चुकी है। अंदरखाने असंतोष, नेताओं की मजबूर चुप्पी और अब खुले आरोप इस बात का सबूत हैं कि असम बीजेपी की बुनियाद हिल चुकी है। सत्ता के नशे में चूर नेतृत्व यह समझने में नाकाम रहा कि जनता सब देख रही है और सब समझ रही है। आज असम में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बीजेपी चुनाव हारेगी या जीतेगी। असली सवाल यह है कि भ्रष्टाचार से घिरी सरकार जनता का भरोसा कैसे बचाएगी। जब पार्टी के अपने वरिष्ठ नेता ही नेतृत्व पर सवाल खड़े कर रहे हों, तो यह मान लेना चाहिए कि असम में बदलाव की आहट तेज़ हो चुकी है। *असम बीजेपी का यह अंदरूनी घमासान आने वाले राजनीतिक भूचाल का साफ संकेत है। जनता का गुस्सा, पार्टी की अंदरूनी फूट और नेतृत्व की साख एक साथ गिरती दिखाई दे रही है। अब फैसला असम की जनता के हाथ में है कि उसे भ्रष्टाचार से घिरी सत्ता चाहिए या एक ईमानदार, जवाबदेह और भरोसेमंद विकल्प।*

कामरेड एम एन राय की पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि

आज 'नवमानवता वाद' के जनक, कॉम्रेड एम. एन. राय की 72 वी पुण्यतिथि के उपलक्ष्य में क्रांतिकारी अभिवादन . उम्र के 13 साल के बच्चे या बच्चीकी वैचारिक समझदारी क्या रहती होगी ? संत ज्ञानेश्वर के सोलह साल की उम्र का तत्वज्ञानी होने को लेकर, इस विषय के अधिकारी व्यक्तियों को मैंने इस विषयपर काफी छेडा है . लेकिन आज नरेन्द्रनाथ भट्टाचार्य उर्फ मानवेंद्र नाथ राय ( एम. एन. राय नाम ज्यादा विख्यात है ) यह तेरह साल का बालक आजसे 138 साल पहले, 21 मार्च 1887 मे बंगाल के चौबीस परगना जिले में पैदा हुआ. मतलब उन्नसवी शताब्दी के अंतिम पड़ाव में नरेंद्र का जन्म हुआ है. और तेरह साल पार करते हुए एक क्रांतिकारी के रूप मे आगे की जिंदगीको झोंक दिया. बीसवीं शताब्दी के आरंभ में बंगाल में अनुशीलन समिति की गतिविधियों मे शामिल रहा हैं, और उम्र के बीस साल के पहले ही अपने गांव की राजनीतिक डकैती के जुर्म में पकड़े गये थे. लेकिन सबुतोके अभावों के कारण छोड़ दिया. किंतु दो साल के भीतर ही हौरा कांड में, बीस महीनों की सजा सुनाई गई . जेल से छुटकारा पाने के बाद बंगाल,संयुक्त प्रांत और पंजाब में क्रांतिकार्य के प्रचार-प्रसार के लिए विशेष रूप से समय दिया है. और बीच-बीच में पकड़े जाने, और छूटने का चुहा-बिल्ली की तरह खेल का सिलसिला जारी रहा. उसके बाद प्रथमं विश्व युद्ध की शुरूआत हुई, तो नरेन्द्र को जर्मनी से शस्र-सामुग्री लाने के लिए विशेष रूप से 1915 को जिम्मेदारी सौंपी गई थी. और वह 'मार्टिन' नाम से, जावा के बॅटिवीया पोर्ट में, जर्मन वकालत मे, एप्रिल महिने में पहुंच कर, जर्मन के कैंसर से दो जहाज भेजने की वार्ता के बाद वापस आये, लेकिन किसी कारण वह सामुग्री नहीं पहुंच सकी, तो अगस्त में, आस्ट्रेलिया-जापान से होते हुए, चीन में डॉ. सन - यत- सेन को मिलने के लिए, चीन चले गए. लेकिन इसमें भी सफलता नहीं मिली, तो वह इस निर्णय पर आये, कि कुछ चंद लोगों की और वह भी विदेशी मदद से, भारत की आजादी को अंजाम देना अव्यवहारीक है, और भारतकी आजादी का आंदोलन भारत के किसानों तथा मजदूरों और बहुजन समाज के सामुदायिक प्रयास से ही संभव है, इस नतीजेपर वह आ गये. लेकिन इस बिचमे उन्होंने जापान,चीन,जावा,सुमात्रा,डच, वेस्ट इंडिज,जमैका,फिलीपीन्स इत्यादि देशोकी यात्रा करने के कारण, साम्राज्यवादी शोषण के प्रत्यक्ष दर्शन करने, और स्थानीय लोगों के, उसके खिलाफ चल रहे विरोध करने के प्रयासों को, खुद अपनी आँखो से देखने के कारण उन्हें पता चला कि, साम्राज्यवादी शोषण का स्वरूप, सभी जगहों पर लगभग एक जैसाही है. और इस कारण वह थक-हार के अमेरिका में अगली पढाई करने हेतु पहुँच गए. और वही से उन्होंने अपने नरेंद्र भट्टाचार्य नामका त्याग कर दिया, और मानवेंद्र नाथ राय, जो बाद में संक्षेप में एम. एन. रॉय के नाम से, ज्यादा जाना जाता रहा है. यह नाम धारण किया, जो 25 जनवरी 1954 तक, उनके मृत्यु तक कायम रहा. और आज इसी नाम से जाने जाते हैं. और नरेंद्र भट्टाचार्य विस्मृति की गर्त में विलुप्तप्राय हो गया. अमेरिका में ही, उनका मार्क्सवाद से परिचय हुआ है. और बहुत ही जल्द, प्रमुख मार्क्सवादी लोगों मे, उनकी गणना होने लगी. अमेरिका से सटा हुआ पडोसी मेक्झिको में, अमेरिकी और ब्रिटिश शोषण के खिलाफ, मेक्झिकन किसान-मजदूर इकठ्ठे हो कर, लडाई लड रहे थे. तो एम. एन. राय ने मेक्झिको में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की. और यह बात रशियाके बाद, दुनिया के किसी और देश में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना करने का ऐतिहासिक काम भी उन्होेंने ही किया है. दुसरे देश की बात है. और मेक्झिको के स्वतंत्रता संग्राम का, यशस्वी नेतृत्त्व करने वाले ( मेक्झिको के लेनिन ) नेता के रूप में मशहूर हुए . और यह बात, लेनिन की नजर में आने के कारण, उन्होंने एम. एन. राय को रशियामे आने के लिए विशेष रूप से आग्रह किया. यह उनके जीवन का टर्निग पॉइंट है. मेक्सिको से रशिया जाने के रास्ते में, स्पेन और जर्मनी इन दो देशों में गये, तो स्पेन मे भी कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना की. और जर्मनी में भी, काफी कम्युनिस्ट नेताओं से मिलने का मौका मिला है. और 1919 के शुरूआती दिनों में, वह रशियामे पहुंच कर, लेनिन की नजर में आने के बाद, उनके नजदीकी सहयोगियों मे उनकी गणना होने लगी. और तीसरे कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के संस्थापकों में से एक है. कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के पहले पांच अधिवेशन के लिए विशेष रूप से सहभागी रहे हैं. और कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के कार्यकारी मंडल के सदस्य रहे हैं. और रशियन कम्युनिस्ट पार्टी के पोलिटबूरो के सदस्योंमेंसे एक रहे हैं. और और पूर्व के देशों के, मुख्यतः भारत और एशियाई देशोको, अधिकृत रूप से, 'कम्युनिस्ट इंटरनेशनल' की तरफ से, मार्गदर्शन करने की जिम्मेदारी का वहन किया है . चौबीस परगना के एक छोटे से गाँव में, एक गरीब घर मे पैदा हुआ, बहुत ही कम औपचारिक शिक्षा किया हुआ नरेंद्र भट्टाचार्य उम्र के पैतीस सालों से भी कम समय में, यह कामयाबी हासिल करना किसी चमत्कार से कम नहीं है. इसका मतलब एम. एन. राय की प्रतिभा और रशियन,जर्मन,स्पैनिश,अंग्रेजी, फ्रेंच मतलब दुनिया कि पाँच प्रमुख भाषाओं में महारत हासिल कर, विश्व पटल पर नेता के रूप में काम करने वाले लोगों मे, मुझे तो भारत ही क्या ? विश्व में भी दूसरा नाम याद नहीं आ रहा . और अंग्रेजी में ऐसे व्यक्ति को 'स्टेट्समन' बोला जाता है. और सबसे एतिहासिक बात भारत में भी, कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना का काम करने वाले भी एम. एन. राय ही है. ताश्कंद मे 'इंडिया हाउस' नामके केद्र की स्थापना की है. और भारत के लोगों को प्रशिक्षण दिया है. और 1920 के समय मे, उसके बाद उन्होंने बर्लिन में अपनी गतिविधियों को गति प्रदान करने के क्रम में चीन और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी के स्थापना का काम करने की कोशिश की है. और 'व्हॅनगार्ड' और 'मासेस' नामके दो अखबार अपने संपादकत्व मे शुरु किया है . 1924 से 1928 के चार साल का दौर उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दौर है. उसी तरह से, कांग्रेस के लिए क्या कार्यक्रम होने चाहिए ? इसलिए भी उन्होंने प्रथम बार संविधान सभा की घोषणा की है . 1927 के शुरूआती दिनों में ही कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के तरफसे, उन्हें चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सलाहकार के रूप में, काम करने केलिए भेजा गया है, और 1926-27 का समय चीन के क्रांतिका परमोच्च क्षणों में से एक है . 1925 मे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साम्राज्यशाही खत्म करने की व्यूवहरचना मे कुछ-कुछ गलती के कारण, 1926 मे एम. एन. राय की प्रतिभा और रशियन कम्युनिस्ट पार्टी के सलाह के कारण किसानों की क्रांति के लिए एतिहासिक दस्तावेज बनाने वाले एम. एन. राय ने अपनी प्रतिभासे काफी कोशिश की. लेकिन उनके जैसे ही बोरोडिन नाम के एक रशियन कम्युनिस्ट पार्टी के नेता को भी चीन में भेजा था, और पैसे और कई महत्वपूर्ण निर्णय लेने की जिम्मेदारी बोरोडिन के उपर थी. और उनके अडियल रुख के कारण, आठ महीनों की अथक कोशिश करने बावजूद, एम. एन. राय ने 20,000 किसान सेना को शस्रधारी करने के बावजूद, उन्होंने कहा कि "बोरोडिन के आत्मघाती निर्णय की वजह से चांग - कै - शेकने क्रांतिको कुचल डाला. " एम. एन. राय ने अपनी 'माय एक्सप्रियंस इन चायना' नामके किताब मे यह सब विस्तृत रूप से लिखा है. कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के छठवी कांग्रेस ने 1928 मे अति जहाल निर्णय लिया, और भारत के आजादी के आंदोलन मे नेतृत्वकारी कांग्रेस के लिए, पूंजीवाद की समर्थक पार्टी कहकर, उसके एवज में सही क्रांतिकारी पार्टी की स्थापना की घोषणा कर दी. जिसका विरोध करते हुए, उन्होंने 'निर्वसाहतीकरण' के सिद्धांत टाईटल से एक पेपर लिखकर भेजा. क्योकिं उनकी तबीयत खराब होने के कारण वह खुद उस समय उपस्थित नहीं रह सके. और उनके अनुपस्थिति का फायदा उठाकर कुसेनिन और अन्य प्रतिनिधियों ने उन्हें साम्राज्यवादी देशों के दलाल तथा पथभ्रष्ट करार दिया. और इस बात का कि, उन्होंने लेनिन के विरोधी निबंध लिखने की वजह से कम्युनिस्ट इंटरनेशनल ने उन्हें निकाल बाहर किया है. लेकिन रशिया के सबसे बडे नेता लेनिन के साथ, अपने मतभेदों की वजह से, एम. एन. राय की हिम्मत तथा प्रतिभा और आत्मविश्वास की दाद देनी पड़ेगी. उन्होंने अपने स्तर पर कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के नेतृत्व करने वाले लोगों के साथ भी पंगा लिया है . इस तरह के अंतराष्ट्रीय राजनीतिक क्षेत्र से, पंद्रह साल के अंतराल के बाद, डॉ. महमूद नाम धारण कर के, वापस भारत 1930 के दिसंबर महीने के अंतमे वापस आकर, रातदिन मेहनत कर के अपने साथियों को तैयार किया है. और कराची कांग्रेस के लिए विशेष रूप से कोशिश करने लगे, लेकिन अंग्रेज पुलिसने 21 जुलाई 1931 को उन्हें पकडा. और बारह साल की सजा सुनाई गई थी. लेकिन छह साल पहले ही, वह 1936 में जेल से रिहा होने के बाद सिधे फैजपूर कांग्रेस के 51 वे अधिवेशन मे शामिल हुए. और उस कांग्रेस अधिवेशन में, एक-से-बढकर एक प्रस्ताव रखने के लिए, विशेष रूप से उल्लेखनीय भुमिका निभाने के कारण, वह सभी प्रतिनिधियों के ध्यान में आये . और उन्होंने ऊसके बाद भारत में बौद्धिक जागरण के लिए, विशेष रूप से लिखना और भाषणोके द्वारा तथा 'इंडिपेंडेंट इंडिया' नामसे एक जबरदस्त साप्ताहिक पत्रिका की शुरूआत की. और अपने विचारों से अवगत कराने के लिए, विशेष रूप से उस पत्रिका में बहुत ही गंभीर रूप से अपने वैचारिक समझदारी और वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए, विवेक वाद- मानवता वाद जैसे नये दर्शन, इस्लाम, फासिज्म जैसे अत्यंत संवेदनशील विषयों पर लिखने तथा बोलते हुए , अपनी आगे की जिंदगी को खपाकर, 25 जनवरी 1954 को 67 की उम्र में देहरादून मे अपने घर मे इस दुनिया को विदा करके चले गये हैं . एम. एन. राय की प्रतिभा और विश्व स्तर पर नेता के रूप में काम करने वाले आदमी को भारत मे कुछ अनुयायी जरूर मिले. जिनमे से कुछ लोगों से मुझे मेरे कलकत्ता के निवासी होने के समय (1982 - 97 ) दोस्ती करने का मौका मिला है. विशेष रूप से बंगाल में रहने के कारण, प्रोफेसर शिवनारायण राय,बंगला भाषा के वरिष्ठ पत्रकार तथा लेखक गौर किशोर घोष,प्रोफेसर अम्लान दत्त,बैरिस्टर वी. एम. तारकुंडे तथा महाराष्ट्र टाइम्स के संपादक गोविन्द तळवळकर,और लक्ष्मण शास्त्री जोशी, तथा इंडियन सेक्युलर सोसायटी के संस्थापक प्रोफेसर ए. बी. शाह जैसे विलक्षण प्रतिभा के धनी थे. लेकिन पता नहीं, क्यों इन सब महानुभावों के बावजूद, एम. एन. राय की वैचारिक धारा खंडित हो गई है. और आज की तारीख में शायद ही कोई उनके अनुयायी कहने वाले मिले ? और सबसे हैरानी की बात वर्तमान पीढ़ी के युवा या युवतियों को तो शायद ही एम. एन. रॉय के बारे में कुछ भी जानकारी है क्या ? और नही है तो फिर क्यों नहीं है ? यह बात मैंने इन सभी वरिष्ठ मित्रोंको भी बार - बार कहीं थी. मुझे व्यक्तिगत रूप से एम. एन. राय जी से मिलने का मौका नहीं मिला है. क्योंकि मै वह इस दुनिया को विदा किये उस समय सिर्फ एक महिने की उम्र का था. लेकिन उनके विचारों से अवगत कराने के लिए विशेष रूप से बंगाल के प्रोफेसर शिवनारायण राय, प्रोफेसर अम्लान दत्त तथा वरिष्ठ पत्रकार तथा बंगला भाषा के मशहूर लेखक गौरकिशोर घोष जैसे मित्र और मराठी में श्री. लक्ष्मण शास्त्री जोशी,श्री. डी. बी. कर्णिक,प्रोफेसर ए. बी. शाह ने लिखा साहित्य का मै मुरीद हूँ . आज एम. एन. राय जी की 72 वी पुण्यतिथि के अवसर पर मेरी विनम्र श्रद्धांजलि . डॉ. सुरेश खैरनार, 25 जनवरी 2026 ,नागपुर.

मंगलवार, 27 जनवरी 2026

योगी के समर्थन में इस्तीफा देने वाले प्रशान्त सिंह नकली विकलांग प्रमाण पत्र लगा कर नौकरी कर रहे हैं

योगी के समर्थन में आज घड़ियाली आंसू बहाकर नौकरी छोड़ने वाला प्रशांत सिंह तो नमक हराम निकला। अब इसका बड़ा भाई ही इसकी पोल–पट्टी खोल रहा है। इसी ने अपने छोटे भाई की फ़र्ज़ी विकलांगता की जांच की मांग की है। मैं इसीलिए गोबर पट्टी के चोरों से भरे गटर में नहीं उतरता। (कागज़ अभिषेक उपाध्याय ने जुटाए हैं)

पकमुल्लो की नाजायज औलादें अब कुछ नहीं बोलेगी

सतुआ बाबा बुलडोजर से माघ मेले में घूम लेता है लेकिन शंकराचार्य अपनी पालकी नहीं ले जा पाए। यह बताता है कि सत्ता में बैठे लोग धर्म का सम्मान नहीं करते बल्कि उन धार्मिक चोला ओढ़े लोगों का सम्मान करते हैं जो सरकार की भाषा बोलते हैं। यह वीडियो देखें, "सतुवा बाबा बुलडोजर पर" https://share.google/S7odI8uvSwsIAuXIb

नकली बाप बने बैठे हो - असली बाप बनो।

नकली बाप बने बैठे हो - असली बाप बनो।

"साला ,पंडित पागल हो गया" लखनऊ से बरेली DM को किसने फोन पे कहा।

"साला ,पंडित पागल हो गया" लखनऊ से बरेली DM को किसने फोन पे कहा। बरेली सिटी मजिस्ट्रेट पद से इस्तीफा देने वाले अलंकार अग्निहोत्री को सुनें : उन्हें बरेली के कलेक्टर ने बातचीत के लिए बुलाया और 45 मिनट तक डीएम आवास में बंधक बनाकर रखा गया। यूपी

रविवार, 25 जनवरी 2026

किंग जार्ज मेडिकल विश्व विद्यालय नाजायज बना है ईसाईयों ने बनाया है तोड दे - मौलाना कल्बे जव्वाद शिया धर्म गुरु

किंग जार्ज मेडिकल विश्व विद्यालय नाजायज बना है ईसाईयों ने बनाया है तोड दे - मौलाना कल्बे जव्वाद शिया धर्म गुरु किंग जार्ज मेडिकल विश्व विद्यालय आजकल संघी एजेंडा का केन्द्र बना हुआ है उसकी गरिमा से भयभीत व षड्यंत्र कारी तत्व नष्ट कर देना चाहते हैं। जानबूझकर कर धर्म परिवर्तन लव जिहाद संघी प्रयोगशाला की ईजाद शब्द के माध्यम से लखनऊ मीड रुपये खा कर मेडिकल विश्व विद्यालय के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चलाए हुए हैं यदि गम्भीरता से जांच की जाए तो देश विरोधी शक्तियां की साजिश का एक हिस्सा भी हो सकता है। मेडिकल जगत में किंग जार्ज मेडिकल विश्व विद्यालय की धाक और प्रतिष्ठा है उसकी प्रतिद्वंद्वी शक्तियां एक षड्यंत्र के तहत करा रही हो। शिया धर्म गुरु ने तंज करते हुए कहा कि अवैध मजारों के साथ साथ विश्वविद्यालय भी नाजायज है और उसको भी गिरा दे। सनातनी व्यवस्था में आर्युवेद पद्धति चिकित्सा की व्यवस्था है और ईसाईयों में अंग्रेजी दवायें और अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति है। इसलिए अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति के सभी अस्पताल बंद करवाने की संघी गिरोह की साजिश हो सकती है। स्वमूत पान गौबर स्नान गौमूत्र पान पद्दति अपनाने की व्यवस्था होनी हो। ये भजपिल्ले देखिए कौन कौन सा परिवर्तन करें। अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति में गाय सूवर का कोई परहेज नहीं है। जीवन बचाना मुख्य उद्देश्य होता है।

गौहत्या - भाजपा - गौभक्षण - नारा

योगी के राम राज्य उत्तर प्रदेश की राजनीति में फतेहपुर सदर से बीजेपी के पूर्व विधायक विक्रम सिंह की चर्चा आजकल जोरों पर है... विधायक जी सोशल मीडिया पर युवा हिंदू के मार्गदर्शक बने बैठे हैं... जिसके चलते ये विधायक सारा दिन हिन्दू मुस्लिम, भारत पाकिस्तान, गौ रक्षा और लव जिहाद पर अपने विचार सोशल मीडिया पर पेलते रहते हैं... लेकिन विधायक की बेटियां यशस्विनी राजे सिंह और मनस्विनी राजे सिंह के सोशल मीडिया पर बीफ खाने, पाकिस्तानी बॉयफ्रेंड और फ्री फिलिस्तीन के स्लोगन वायरल करती रहती हैं... विधायक की बेटी पाकिस्तान के युवक के साथ बीफ खा रही है लेकिन ये यहां डबल स्टैंडर्ड राजनीति कर रहे हैं... मामला सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद विधायक ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट को डिएक्टिवेट कर दिया है... और बेटियों ने अपने अकाउंट प्राइवेट कर लिए है... फ़िलहाल भक्ति जा ज्वार ठण्डा पड़ा हुआ है... ज़िम्मेदार कौन?... 🤔🤔

गुरुवार, 22 जनवरी 2026

मोदी की नीतियों का पोस्टमार्टम प्रदूषण को भारत के लिए टैरिफ से ज्यादा बड़ा खतरा है- गीता गोपीनाथ

मोदी की नीतियों का पोस्टमार्टम प्रदूषण को भारत के लिए टैरिफ से ज्यादा बड़ा खतरा है- गीता गोपीनाथ उन्होंने कहा कि जब नए कारोबार और आर्थिक विकास की बात होती है, तो चर्चा ज्यादातर व्यापार, टैरिफ और नियमों तक सीमित रहती है, जबकि प्रदूषण को उतनी अहमियत नहीं दी जाती। पिछले साल लैंसेट काउंटडाउन की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत को बाहर की हवा (PM2.5, धुआं, गाड़ियों का प्रदूषण, फैक्ट्रियां) के प्रदूषण से करीब 30 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। प्रदूषण से देश के विकास को लंबे वक्त का नुकसान गीता गोपीनाथ ने बताया कि इतनी बड़ी संख्या में लोगों की मौत से परिवारों पर असर पड़ता है, कामकाजी लोगों की संख्या घटती है और देश के लंबे समय के विकास को नुकसान होता है। गीता ने बताया कि भारत में प्रदूषण एक बड़ी चुनौती है और इसका असर अब तक लगाए गए किसी भी टैरिफ से कहीं ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला है। उन्होंने कहा कि प्रदूषण की वजह से लोगों की काम करने की क्षमता घटती है, इलाज पर खर्च बढ़ता है और देश की आर्थिक गतिविधियों पर बुरा असर पड़ता है। इससे विकास की रफ्तार धीमी होती है। गीता गोपीनाथ ने कहा कि प्रदूषण सिर्फ भारत की अंदरूनी समस्या नहीं है, बल्कि यह उन विदेशी निवेशकों के लिए भी चिंता का विषय है जो भारत में इन्वेस्ट करने के बारे में सोच रहे हैं। विदेशी इन्वेस्टर निवेश करने से पहले पर्यावरण भी ध्यान में रखते हैं गीता गोपीनाथ ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय निवेशक जब भारत में कारोबार शुरू करने और यहां रहने की योजना बनाते हैं, तो वे पर्यावरण को भी ध्यान में रखते हैं। खराब हवा और खराब रहने की स्थिति, खासकर सेहत से जुड़े खतरे, निवेशकों को रोक सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यह चिंता उन भारतीयों के लिए और भी ज्यादा है जो रोज प्रदूषित शहरों में रहते और काम करते हैं। प्रदूषण पर कंट्रोल और नियमों में ढील जैसे मुद्दों पर तुरंत पॉलिसी लेवल पर कदम उठाने की जरूरत है। भारत जब खुद को एक ग्लोबल आर्थिक और मैन्युफैक्चरिंग सेंटर के तौर पर पेश कर रहा है, तब ये बातें साफ करती हैं कि साफ शहर और बेहतर जीवन स्थितियां बहुत जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि प्रदूषण से निपटना सिर्फ पर्यावरण से जुड़ा मामला नहीं है, बल्कि यह लोगों की जान बचाने, आर्थिक विकास बढ़ाने और भारत को विदेशी निवेशकों के लिए आकर्षक बनाने से जुड़ा है। लैंसेट रिपोर्ट में दावा- भारत में प्रदुषण जानलेवा खतरा बना भारत में वायु प्रदूषण अब सिर्फ एक पर्यावरण की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि यह लोगों की जान और देश की अर्थव्यवस्था दोनों के लिए बड़ा खतरा बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज ने 29 अक्टूबर 2025 को जारी रिपोर्ट में इसकी पुष्टि की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2022 में भारत में PM 2.5 नामक बारीक प्रदूषक कणों के कारण 17 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुईं। ये 2010 के मुकाबले 38% ज्यादा हैं। इनमें से करीब 44% मौतें कोयला और पेट्रोलियम जैसे जीवाश्म ईंधनों (फॉसिल फ्यूल) के जलने से हुईं। रिपोर्ट में कहा गया है कि सिर्फ कोयले के कारण करीब 3 लाख 94 हजार लोगों की मौत हुई, जिनमें से ज्यादातर मौतें थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाले प्रदूषण की वजह से हुईं। इसके अलावा सड़कों पर चलने वाले वाहनों में इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल से भी बड़ी संख्या में मौतें जुड़ी हैं। 2022 में बाहरी वायु प्रदूषण से ₹30 लाख करोड़ का नुकसान लैंसेट की यह रिपोर्ट 71 शैक्षणिक संस्थानों और UN एजेंसियों से जुड़े 128 एक्सपर्ट्स ने मिलकर तैयार की है। रिपोर्ट की प्रमुख लेखिका मारियाना रोमानेलो ने कहा कि भारत के लिए एक अलग रिपोर्ट तैयार की गई है, क्योंकि देश जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से बहुत ज्यादा प्रभावित है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि 2022 में बाहर की हवा (PM2.5, धुआं, गाड़ियों का प्रदूषण, फैक्ट्रियां) के प्रदूषण से होने वाली मौतों का आर्थिक नुकसान करीब 339 अरब डॉलर (करीब 30 लाख करोड़ रुपए) रहा। यह भारत की कुल अर्थव्यवस्था का करीब 9.5% है। घर के अंदर होने वाला प्रदूषण भी एक बड़ी समस्या बना हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, लकड़ी, कोयला और अन्य गंदे ईंधन से होने वाले घरेलू प्रदूषण के कारण ग्रामीण इलाकों में ज्यादा मौतें हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति एक लाख लोगों पर 125 मौतें दर्ज की गईं, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 99 रहा। 2024 में लोगों को भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि 2024 में भारत के लोगों को औसतन करीब 20 दिन भीषण गर्मी का सामना करना पड़ा। इनमें से लगभग एक-तिहाई दिन ऐसे थे, जो जलवायु परिवर्तन के बिना नहीं होते। रिपोर्ट के मुताबिक, बहुत गर्मी के कारण लोगों को पहले के मुकाबले ज्यादा समय तक खतरनाक तापमान में काम करना पड़ा। इसका असर देश की कामकाजी क्षमता पर पड़ा और 2024 में करीब 247 अरब घंटे के कामकाजी नुकसान हुआ। इसका सबसे ज्यादा असर खेती और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर पर पड़ा।

पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के साथी गीत गाते हुए तू जिंदा है तो जिन्दगी की जीत पर यकीन कर

पाकिस्तान की कम्युनिस्ट पार्टी के साथी गीत गाते हुए तू जिंदा है तो जिन्दगी की जीत पर यकीन कर तू ज़िंदा है तो ज़िन्दगी की जीत में यक़ीन कर अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर तू ज़िंदा है ये ग़म के और चार दिन सितम के और चार दिन ये दिन भी जाएंगे गुज़र गुज़र गए हज़ार दिन ये ग़म के और चार दिन सितम के और चार दिन ये दिन भी जाएंगे गुज़र गुज़र गए हज़ार दिन कभी तो होगी इस चमन पर भी बाहर की नज़र अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर तू ज़िंदा है तू ज़िंदा है तो ज़िन्दगी की जीत में यक़ीन कर अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर तू ज़िंदा है सुबह शाम के रंगे हुए गगन को चूम कर तू सुन जमीन गा रही हे कबसे झूम झूम कर सुबह शाम के रंगे हुए गगन को चूम कर तू सुन जमीन गा रही हे कबसे झूम झूम कर तू आ मेरा सिंगार कर तू आ मुझे हसीं कर अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर तू ज़िंदा है तू ज़िंदा है तो ज़िन्दगी की जीत में यक़ीन कर अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर तू ज़िंदा है हज़ार भेस धर के आई मौत तेरे द्वार पर मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर हजार भेस धर के आई मौत तेरे द्वार पर मगर तुझे न छल सकी चली गई वो हार कर नई सुबह के संग सदा तुझे मिली नई उम्र अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर तू ज़िंदा है तू ज़िंदा है तू ज़िन्दगी की जीत में यक़ीन कर अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर तू ज़िंदा है बुरी है आग पेट की बुरे है दिल के दाग ये ना दब सकेगें एक दिन बनेंगे इंकलाब ये बुरी है आग पेट की बुरे हैं दिल के दाग ये ना दब सकेंगे एक दिन इंकलाब ये गिरेंगे जुल्म के महल बनेंगे फिर नवीन घर अगर कहीं स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर तू ज़िंदा है तू ज़िंदा है तू ज़िन्दगी की जीत में यक़ीन कर अगर कहीं स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर तू ज़िंदा है तू ज़िंदा है तू ज़िन्दगी की जीत में यक़ीन कर अगर कहीं स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर तू ज़िंदा है
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