बुधवार, 7 जनवरी 2026

विदेश सेवा में रहकर घास छीलते हुए पूरा करियर निकालने वाले संघी एस जयशंकर ने कभी दावा किया था कि नरेंद्र मोदी से पूछे बिना दुनिया में पत्ता तक नहीं हिलता।

सौमित्र राय विदेश सेवा में रहकर घास छीलते हुए पूरा करियर निकालने वाले संघी एस जयशंकर ने कभी दावा किया था कि नरेंद्र मोदी से पूछे बिना दुनिया में पत्ता तक नहीं हिलता। किसे मालूम था कि एक दिन चार वाक्यों की बेइज्जती से जयशंकर और मोदी दोनों के शरीर से इस झूठी शान के सारे पत्ते उड़ जाएंगे। सिर्फ़ जयशंकर ही नहीं, अजित डोवाल के डिप्टी की भी इज़्ज़त चली गई। मैं कल चुपचाप देख रहा था कि कैसे पूरे दिन मोदी का पीएमओ सन्नाटे में रहा। सबसे पहले तो ट्रंप से लॉबिंग के लिए 18 लाख डॉलर सालाना पर किराए पर ली गई फर्म ने FRR के तहत पीएमओ और अमेरिका में भारतीय दूतावास के हर फोन कॉल और ईमेल का ब्यौरा जारी कर दिया। इन्हीं में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान पर हमले और सीजफायर का भी ब्यौरा शामिल था, जिसमें मोदी सत्ता ट्रंप से मीटिंग के लिए गिड़गिड़ा रही थी। बदन से पत्ते उतरते देखकर हमारे विदेश मंत्रालय ने बेशर्मी से कहा कि लॉबिंग कोई नई बात नहीं है। फिर देर रात ट्रंप ने विश्वगुरु को नंगा कर दिया और तू–तड़ाक का सारा रिश्ता एक झटके में धुल गया। ट्रंप ने कहा–मोदी मुझसे मिलने आए थे। पूछा–सर, क्या मैं आपसे मिल सकता हूं? मैंने कहा–हां। उन्होंने हमसे अपाचे हेलीकॉप्टर मांगे। हमने 5 साल तक नहीं दिए। फिर मोदी मुझसे मिलने आए थे। पूछा–सर, क्या मैं आपसे मिल सकता हूं? मैंने कहा–हां। मोदी बहुत अच्छे इंसान हैं, लेकिन मुझे खुश नहीं कर पा रहे हैं। मैंने आपको बीते मई में ही बता दिया था कि आज का दिन आयेगा और आया भी। गोदी चैनल चुप हैं। बीजेपी आईटी सेल चुप है। समूची हिंदू सत्ता की बकलोली बंद है। अमेरिका में भारत के राजदूत तक वहां के सांसदों से गिड़गिड़ा रहे हैं कि कुछ टैरिफ कम करवा दो। लेकिन, ट्रंप खुद मोदी को बाहर इंतज़ार करवाते हैं। मुलाकात का समय लॉबिंग फर्म तय करती है। व्हाइट हाउस के लिए जयशंकर की अहमियत किसी चपरासी से कम नहीं। फिर पीयूष गोयल की क्या बात करें। 70 साल में भारत की ऐसी बेइज्जती कभी नहीं हुई। इतनी बेइज्जती तो गोधरा दंगों के बाद भी नहीं हुई, जब अमेरिका ने मोदी का वीज़ा रोक था। नरेंद्र मोदी अब जीवन के सबसे बुरे दिनों से गुज़र रहे हैं। उनकी बात खुद उनकी पार्टी के भीतर कोई नहीं सुनता। मैंने यह भी चेताया था कि 14 जनवरी तक यह दिन भी देखने पड़ेंगे। बेहतर होगा कि बदन पर इज़्ज़त के बचे–खुचे पत्तों को लपेटे मोदी इस्तीफ़ा देकर निकल लें। वरना जल्द ही वे पत्ते भी नहीं रहेंगे।

उ प्र योगी पुलिस का वसूली अपहरण उद्योग

उ प्र योगी पुलिस का वसूली अपहरण उद्योग यूपी के बांदा में पुलिस की खाकी फिर दागदार हुई है। पुलिस ने एक युवक का न सिर्फ अपहरण किया बल्कि उससे 20 लाख रुपये की अवैध वसूली भी कर ली। बाद में उसे 2 किलो 250 ग्राम गांजा और एक अवैध तमंचा के साथ जेल भेज दिया। युवक की शिकायत पर तत्कालीन थानाध्यक्ष अतर्रा सहित छह पुलिसकर्मियों को पहले निलंबित किया गया। अब कोर्ट के आदेश पर मुकदमा किया जा रहा है।

निशातुन्निसा_बेगम - बेगम हसरत मोहानी

#_निशातुन्निसा_बेगम (बेगम हसरत मोहानी ) 2 जनवरी 1885 यौमें पैदाईश बेगम हसरत मोहानी की कहानी भी उन बहुत-सी भूली बिसरी दास्तानों में शुमार की जा सकती है, जिनके साथ आज़ाद हिन्दुस्तान की तवारीख़ ने मुनासिब इंसाफ नहीं किया, बेगम हसरत का शुमार उन औरतौं में किया जाता है,जिन्होंने बीसरवीं सदी में कौमी तहरीके आज़ादी में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।आप उन औरतों में सेथीं,जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी मुल्क की ख़िदमात में लगा दी, चकबस्त नेउनकी कौमी ख़िदमात को सराहते हुए सुबहे उम्मीद में कौम के नौजवानों को मश्वरा दिया था कि बेगम हसरत की हैसियत आम जलसों में सियासी मर्दानगी का राग गाने के लिए ही नहीं, बल्कि कुर्बानी का सबकृ हासिल करने के लिए भी है, निशातुन्निसा (बेगम हसरत मोहानी) की पैदाइश 2 जनवरी 1885 में मोहान जिला उन्नाव के एक इज़्जतदार घराने में हुई थी, आपके वालिद सैय्यद शबीब हसन मोहानी रियासते हैदराबाद के हाईकोर्ट में वकील थे, निशातुन्निसा बेगम उस ज्माने के लिहाज से पढ़ाई लिखाई से महरूम नहीं थीं और उन्हें मज़हबी तालीम के साथ-साथ उर्दू, अरबी, फारसी जुबानों की माकूल तालीम दी गयी थी, सन् 1901 में जब आप हसरत मोहानी की जिंदगी में दाखिल हुई तब आप सियासी ज़िन्दगी से अंजान न थीं,देहाती माहौल की पली इस लड़की का हौसला हर तरह से हसरत मोहानी के लिए माकूल था, माली एतबार से कम होने के बावजूद उनको कभी किसी किस्म की शिकायत नहीं थी, हर कदम पर आप मौलाना साहब के साथ खड़ी रहती थीं, इसलिए हसरत मोहानी को उन पर फख्र था, इस तरह जंगे आजादी में उनकी कुर्बानी और उनकी सियासी मालूमात हसरत मोहानी की जिंदगी में बड़ी अहम थी, जब हसरत मोहानी कैद किये गये तो उस वक्त बेगम हसरत जंगे आजादी में कुद पड़ीं और उन्होंने यह साबित कर दिया कि शौहर के चन्द सालों का साथ और देहाती माहौल में पली बढ़ी हुई लड़की की मालूमात कितनी बेदार और पुख्ता थी! इस तरह आप अपनी मंज़िल की तरफ़ आगे बढ़ रही थीं, 13 अप्रैल सन् 1916 को हसरत मोहानी को दूसरी बार गिरफ्तार किया गया,मगर यह गिरफ़्तारी बेगम हसरत के लिए मील का पत्थर साबित हुई और उन्होंने घर की चहारदीवारी से निकलकर हसरत के मुकुदमे की पैरवी अपने ज़िम्मे ली और इस काम को बड़ी हिम्मत व दिलेरी से अंजाम दिया, मुक़दमे की पैरवी के दौरान एक अंग्रेज़ अफ़्सर ने डराने की कोशिश की तो आप उससे डरने के बजाय लड़ गयीं और कहा कि तुम मुझे गिरफ्तार कर सकते हो लेकिन रोक नहीं सकते, हसरत मोहानी अभी कैद में ही थे कि बेगम हसरत ने वज़ीरे-हिन्द से मुलाकात करने वाले हिन्दुस्तानी ख़्वातीन के एक डेलीगेशन में शिरकत की, इस शिरकत की अहमियत इस वजह से भी बढ़ जाती है कि निशातुन्निसा बेगम ने जिस हिम्मत और बहादुरी से अपनी बात रखी, वह अकेला ही आपके किरदार की बुलन्दी के लिए काफ़ी था, सन् 1919 वह ज़माना था जब हिन्दुस्तान की सियासी जिंदगी एक नयी करवट ले रही थी, बेगम हसरत के किरदार और कौमी महाज़ पर उनकी सरगर्मियों की वजह से बी. अम्मा जैसी आज़ादी की अरज़ीम मुजाहिद की नज़़र में उनके लिए कितनी इज्जत थी इसका पता श्रीमती उमा नेहरू के नाम लिखे उनके खत से चलता हैं, जिसमें 13 दिसम्बर सन् 1917 उन्होंने लिखा था कि अख़बारों से मुझे मालूम हुआ है कि आपके और उस बहादुर और प्यारी बेटी निशातुन्निसा बेगम के साथ मुझे भी ख़्वातीन के उस डेलिंगेशन की कृयादत करनी है, जो तमाम ख़्वातीने हिन्द की तरफ से जनाब वज़ीरे हिन्द से मिलने के वास्ते इस महीने की 18 तारीख़ को मद्रास में तय हुआ है, इस तमाम तफसील का मतलब यह है कि कौमी जंगे-आज़ादी में बेगम हसरत मोहानी की कुर्बानियों, उनकी हिम्मत बहादुरी और मुल्क के लिए मोहब्बत को मुलाक़ात के वक्त भुलाया नही जा सकता, उनकी कुव्वते-इरादी की फ़ौलाद जैसी हिम्मत हर चट्टान से टकराने के लिए काफ़ी थी, साभार

मंगलवार, 6 जनवरी 2026

वेनेजुएला की तरह ट्रंप क्या हमारे प्रधान मंत्री का भी अपहरण करेंगे?', कांग्रेस नेता का चौंकाने वाला बयान

'वेनेजुएला की तरह ट्रंप क्या हमारे प्रधान मंत्री का भी अपहरण करेंगे?', कांग्रेस नेता का चौंकाने वाला बयान वेनेजुएला पर अमरीकी कार्रवाई को लेकर कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर एक टिप्पणी की है.कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण ने वेनेजुएला की घटना का हवाला देते हुए भारत में प्रधानमंत्री के अपहरण की चर्चा की.कांग्रेस नेता पृथ्वीराज चव्हाण के इस बयान को लेकर मामला गरमा गया है. कई लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं.

सोमवार, 5 जनवरी 2026

लखनऊ में वेनेजुएला पर अमरीकी हमले के विरोध में प्रदर्शन कान्ती मिश्रा नेत्री भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में प्रदर्शन

लखनऊ में वेनेजुएला पर अमरीकी हमले के विरोध में कान्ती मिश्रा नेत्री भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में प्रदर्शन

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई की निंदा करते हुए विरोध प्रदर्शन किया

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने वेनेजुएला में अमेरिकी कार्रवाई की निंदा करते हुए विरोध प्रदर्शन किया भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने रविवार को शहर में प्रदर्शन किया और वेनेजुएला के खिलाफ अमरीका के हमले की निंदा की और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़ने की कड़ी आलोचना की। पार्टी ने आरोप लगाया कि अमरीका की घुसपैठ एक आज़ाद और आज़ाद देश पर हमला है और यूनाइटेड नेशंस चार्टर का खुला उल्लंघन है। विरोध प्रदर्शन को संबोधित करते हुए, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उडीसा राज्य सचिव प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कि अमरीकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में खुलेआम वेनेजुएला के तेल रिसोर्स पर कब्ज़ा करने की बात कही, जिससे इस हमले के पीछे का असली मकसद सामने आ गया। उन्होंने कहा कि अमरीका के सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट मार्को रुबियो ने एक कदम और आगे बढ़कर चेतावनी दी कि क्यूबा और मेक्सिको अगले टारगेट होंगे। उन्होंने कहा, "US 2025 नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी डॉक्यूमेंट जारी होने के कुछ ही दिनों के अंदर आए ये सभी बयान साफ़ तौर पर दिखाते हैं कि अमेरिकी साम्राज्यवाद पूरी दुनिया पर अपना दबदबा बनाना चाहता है और ज़रूरत पड़ने पर मिलिट्री हमले का सहारा लेने के लिए भी तैयार है।" मिश्रा ने भारत सरकार से वेनेजुएला के साथ मजबूती से खड़े होने और दूसरे देशों के साथ मिलकर अमरीका के हमले की निंदा करने की अपील की।

रविवार, 4 जनवरी 2026

कनाडा को वेनेजुएला में अमेरिकी साम्राज्यवादी हमले और अपहरण की निंदा करनी चाहिए-कनाडा कम्युनिस्ट पार्टी

कनाडा को वेनेजुएला में अमेरिकी साम्राज्यवादी हमले और अपहरण की निंदा करनी चाहिए कनाडा की कम्युनिस्ट पार्टी संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा वेनेजुएला जैसे संप्रभु राष्ट्र पर किए गए आपराधिक सैन्य हमले की कड़े शब्दों में निंदा करती है। हालांकि कई विवरण अभी भी स्पष्ट नहीं हैं, लेकिन यह बिल्कुल स्पष्ट है कि काराकास पर बमबारी और देश के राष्ट्रपति का अपहरण साम्राज्यवादी हमले का एक घिनौना कृत्य और संयुक्त राष्ट्र चार्टर का गंभीर उल्लंघन है। यह हमला, जिसे धूर्त बहानों से सही ठहराया गया है, वेनेजुएला और क्षेत्र के संसाधनों पर नियंत्रण करने और वहां के लोगों के आत्मनिर्णय के अधिकार को कुचलने के उद्देश्य से किया गया एक खतरनाक कदम है। यह क्यूबा, ​​निकारागुआ, कोलंबिया और पूरे अमेरिका के लोगों पर निर्देशित आतंकवाद का एक कृत्य है। अराजकता का यह बढ़ता हुआ सिलसिला, जो कनाडाई संप्रभुता पर हमलों में भी दिखता है, फिर भी कनाडाई सरकार को इसमें सक्रिय रूप से शामिल पाता है। यह हमला मोनरो सिद्धांत की सबसे क्रूर परंपराओं को पुनर्जीवित करता है, जिसमें लैटिन अमेरिका को साम्राज्यवादी लूट के लिए एक पिछवाड़े के रूप में माना जाता है। हालांकि यह उद्देश्य हमेशा अमेरिका की अमेरिका में रणनीति को परिभाषित करता रहा है, ये बर्बर रणनीति वाशिंगटन द्वारा साम्राज्यवादी वर्चस्व की तलाश में अराजकता के एक नए चरण को चिह्नित करती है। ट्रंप का यह दावा कि अमेरिका वेनेजुएला "देश को तब तक चलाएगा" जब तक "एक उचित बदलाव नहीं हो जाता" यह पुष्टि करता है कि यह हमला वेनेजुएला की संप्रभुता पर एक गहरे हमले की सिर्फ शुरुआत है, जिससे एकजुटता और शांति के लिए कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता है। कनाडाई सरकार की प्रतिक्रिया, जिसे विदेश मामलों की मंत्री अनीता आनंद ने व्यक्त किया है, अपने आप में अंतरराष्ट्रीय कानून पर एक हमला है और वाशिंगटन की आक्रामकता के लिए सीधा राजनीतिक समर्थन प्रदान करती है। उनके बयान में कहा गया है, "2019 से... हमने मादुरो शासन की किसी भी वैधता को पहचानने से इनकार कर दिया है," और "सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करने का आह्वान करता है।" ठीक उसी समय जब अमेरिका ने खुला हमला किया, कनाडा की पहले से मौजूद शासन-परिवर्तन नीति को दोहराकर, मंत्री आनंद का बयान मुख्य आपराधिक कृत्य को छिपाता है और अमेरिकी समुद्री डकैती, हत्या और अपहरण का एक तरह से समर्थन करता है। उनके शब्द इस मौलिक सिद्धांत को नजरअंदाज करते हैं कि सभी लोगों को विदेशी हस्तक्षेप और सैन्य आतंकवाद से मुक्त होकर अपनी राजनीतिक व्यवस्था तय करने का अधिकार है। वेनेजुएला में लोकतांत्रिक और श्रम अधिकारों के लिए संघर्ष वेनेजुएला के लोगों का आंतरिक संघर्ष है। कनाडा, अमेरिका और अन्य साम्राज्यवादी शक्तियों को हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। कनाडाई सरकार का यह रुख पिछली नीति के अनुरूप है। 2025 की शरद ऋतु में, जब पूछा गया कि क्या नावों पर पिछले अमेरिकी मिसाइल हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन थे, तो विदेश मामलों की मंत्री अनीता आनंद ने सारी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया, यह कहते हुए कि यह तय करना "अमेरिकी अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में है"। यह कनाडा का मिलीभगत वाला रुख बना हुआ है। वेनेजुएला के खिलाफ़ आक्रामकता एक खतरनाक वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जो फिलिस्तीन में चल रहे नरसंहार और साम्राज्यवादी हिंसा के अन्य कृत्यों में भी देखी जाती है, जो आर्थिक रूप से अमेरिकी साम्राज्यवाद के पतन और बर्बर सैन्य साधनों के उपयोग पर बढ़ती निर्भरता को दर्शाता है। जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय कानून को तोड़ा जा रहा है, दुनिया एक बड़े और संभावित रूप से परमाणु युद्ध के करीब धकेली जा रही है। कनाडा की अपनी संप्रभुता पर बार-बार हमलों के बावजूद, कनाडाई सरकार इस अभियान में सक्रिय रूप से शामिल है, अमेरिकी और नाटो की मांगों पर WWII के बाद से अपना सबसे बड़ा सैन्यीकरण अभियान शुरू कर रही है, जबकि सामाजिक ज़रूरतों से संसाधनों को युद्ध खर्च की ओर मोड़ने के लिए मितव्ययिता लागू कर रही है। इस प्रकार वेनेजुएला की संप्रभुता के लिए लड़ाई शांति और हर जगह मेहनतकश लोगों के अधिकारों के लिए वैश्विक संघर्ष में सबसे आगे की लड़ाई है। कनाडा की कम्युनिस्ट पार्टी लामबंद होने का संकल्प लेती है और मज़दूर आंदोलन, जन संगठनों और सभी शांतिप्रिय लोगों से मांग करती है कि कनाडा तुरंत और स्पष्ट रूप से अमेरिकी हमले की निंदा करे, वेनेजुएला पर अपने प्रतिबंधों को समाप्त करे, और शांति, निरस्त्रीकरण और एकजुटता पर आधारित एक स्वतंत्र विदेश नीति अपनाए।

वेनेजुएला के मीरजाफर और अपने देश में मीरजाफर की कमी नहीं है

देवेन्द्र सुरजन की लेखनी वेनेजुएला पर अमेरिकी कब्जा तेल का असली खेल? मादुरो गिरफ्तार- सिर्फ 3 घंटे में सब खत्म! हॉलीवुड फिल्म जैसा ऑपरेशन: अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस ने मादुरो दंपति का अपहरण कर जेल में डाला, अब न्यूयॉर्क में चलेगा मुकदमा कल रात की घटना ने पूरी दुनिया को हिला कर रख दिया! 3 जनवरी 2026 की सुबह-सुबह, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि अमेरिका ने वेनेजुएला पर एक "बड़े पैमाने का हमला" किया और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस के साथ गिरफ्तार कर देश से बाहर उड़ा लिया। ये सब सिर्फ तीन घंटे में हो गया- बमबारी शुरू हुई, धमाके हुए, हेलिकॉप्टर उड़ते दिखे, और अचानक मादुरो गायब! अब सवाल ये है: इतनी जल्दी कैसे संभव हुआ ? वेनेजुएला की सेना ने एक भी मिसाइल नहीं दागी, एक गोली नहीं चलाई। बिल्कुल वैसा ही जैसा 1757 में प्लासी की लड़ाई में हुआ था- जहां रॉबर्ट क्लाइव ने मीर जाफर को रिश्वत देकर बंगाल के नवाब सिराज-उद-दौला को धोखा दिया और बिना ज्यादा लड़ाई के कब्जा कर लिया था। ट्रंप ने वही पुराना ब्रिटिश ट्रिक दोहराया है! खबरों के मुताबिक, अमेरिका ने पहले से ही वेनेजुएला के बड़े-बड़े सैन्य जनरलों, विपक्षी नेताओं और सांसदों को मोटी रिश्वतें दीं। शायद सत्ता पक्ष से जुड़े लोग भी विभीषण बन गए हों! सेना ने प्रतिरोध नहीं किया क्योंकि अंदर से ही "मीर जाफर" तैयार थे। एयर डिफेंस सिस्टम चुप रहे, एयरफील्ड पर बम गिरे लेकिन जवाबी फायरिंग जीरो। अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस ने सीधे मादुरो के बेडरूम में घुसकर उन्हें पकड़ लिया- जैसे कोई हॉलीवुड एक्शन फिल्म चल रही हो ! अब मादुरो को न्यूयॉर्क ले जाया जा रहा है, जहां उन पर नार्को-टेररिज्म के पुराने केस में मुकदमा चलेगा और नया "मीर जाफर"? शायद कोई गद्दार जनरल या ऑपोजिशन लीडर को वेनेजुएला का अंतरिम राष्ट्रपति बना दिया जाए। ट्रंप ने तो इशारा कर दिया कि अमेरिका अब वेनेजुएला के तेल पर "बहुत मजबूती से काबिज़" होगा- मतलब, असली मकसद तेल ही था! ये इतिहास की पुनरावृत्ति है लगती है- प्लासी से काराकास तक, साम्राज्यवाद का वही पुराना फॉर्मूला: रिश्वत, धोखा और तेज हमला। वेनेजुएला अब अमेरिका के कब्जे में है ...

शर्मनाक डी एम साहेब रोटी बना खिलाने के काम में लगा दिए गए हैं

शर्मनाक डी एम साहेब रोटी बना खिलाने के काम में लगा दिए गए हैं 🚨प्रयागराज राज के डीएम सत्तुआ बाबा के यहां रोटी बनाते हुए , इन्ही को डिप्टी सीएम से फटकार पड़ी है क्यूकी डीएम साहब को तो पता है गोरक्ष पीठ से जुड़े लोगों का बस ध्यान रखो और परमोशन लेते रहो पर कुशवाहा जी को पता है कि काम नहीं किया तो जनता उठा फेकेगी चाहे प्रयागराज की हो या गाज़ियाबाद की 😀

गांधी के हत्यारों गोडसे भक्त्तों के लिए

लार्ड माउंटबेटन ने महात्मा गांधी की हत्या पर किया था तंज! “ब्रिटिश राज तो अपनी पूरी जिंदगी के कलंक से बच निकला, लेकिन तुम्हारी हत्या ने तुम्हारे ही देश, तुम्हारे ही राज्यों और तुम्हारे ही कंगाल लोगों का काला चेहरा उजागर कर दिया! अगर इतिहास कभी निष्पक्ष नजर आएगा, तो वो तुम्हें ‘ईसा और बुद्ध’ की पंक्ति में खड़ा करेगा !” लेकिन विडंबना ये है कि कोई क़ौम इतनी नीच, कृतघ्न और स्वार्थी कैसे हो सकती है? जो अपने पितातुल्य संत को छाती में तीन गोलियां ठोंक दे और ऊपर से ‘निर्लज्ज ठसक’ ये कि एक वर्ग इतने पर भी इन हत्यारों को हीरो मान रही है, अफसोस तो दूर, जश्न मनाती है!! क्या यही है वो ‘राष्ट्रभक्ति’ जो चंद लोगों के द्वारा बेची जा रही है? लॉर्ड माउंटबेटन (तत्कालीन वायसराय)

शनिवार, 3 जनवरी 2026

राष्ट्रपति का अपहरण दुनिया सिर्फ हिजड़े की तरह ताली पीट सकती है

थोड़ा ये जान लें कि अमेरिकी राष्ट्रपति के पास संविधान के अनुच्छेद 2 के तहत असीमित अधिकार हैं। ट्रंप चाहे तो इस अनुच्छेद का प्रयोग कर देश पर खतरा बताकर दुनिया के किसी भी हिस्से से किसी राष्ट्रप्रमुख को उठवा सकता है। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को उसकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स समेत उठवाना भी उसी अनुच्छेद का हिस्सा है। मादुरो पर अमेरिकी अदालत में ड्रग्स तस्करी के पैसे से अमेरिका के ख़िलाफ़ षडयंत्र रचने, हथियार रखने और अमेरिका पर हमला करने की नीयत से घातक हथियारों का इस्तेमाल करने जैसे आरोप लगाए गए हैं। अमेरिकी अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी का बयान है कि मादुरो को जल्द ही अमेरिकी न्याय प्रणाली का सामना करना होगा। लेकिन, ये आरोप ट्रंप प्रशासन के लिए संसद में यह साबित करने को काफ़ी नहीं हैं कि मादुरो अमेरिका के लिए वाकई खतरा थे। जैसे दिवंगत इराकी राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन अमेरिका के लिये कोई खतरा नहीं थे। वह भी तेल और सोना लूटने का ही खेल था। जैसा कि मैंने पहले लिखा था कि ट्रंप को इसी साल दोबारा चुनाव जीतने से पहले महाभियोग का सामना करना पड़ सकता है। यह एप्स्टीन फाइल्स के कारण होगा। अब इसमें वेनेजुएला पर संसद की अनुमति के बिना हमले का आरोप भी जुड़ गया है। अगर, वेनेजुएला पर हमले में अमेरिकी सैनिकों की मौत होती है तो ट्रंप के लिए संसद को जवाब देना मुश्किल होगा। इस मसले पर नाटो देश दो खेमों में बंटे हैं। स्पेन ने वेनेजुएला की आज़ादी का समर्थन किया है, लेकिन ईयू चुप है। ट्रंप की मिट्टी पलीत होने से चीन और रूस भले खुश हों, पर ट्रंप की दादागीरी रोकने में उनकी नाकामी ख़ुद दोनों पर भरोसा उठा सकती है। अगर ट्रंप इन आरोपों से बच निकलते हैं तो समझें दुनिया भगवान भरोसे है। -सौमित्र राय
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