मंगलवार, 24 मार्च 2015

क्रास पर हमला

जूलियो रेबेरो भारत के सबसे जानेमाने पुलिस अधिकारियों में से एक हैं। गत 16 मार्च को उनका लेख एक समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि वे इस देश में अजनबी महसूस कर रहे हैं। पुलिस अधिकारी बतौर अपने अनुभवों की याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि मैं ‘‘स्वयं को अपने ही देश में डरा हुआ, अवांछित और अजनबी पा रहा हूं।’’ भारत के एक विशिष्ट नागरिक और असाधारण पुलिस अधिकारी के इस दर्द और व्यथा को चर्चों पर बढ़ते हमलों और कोलकाता में एक 71 वर्षीय नन के साथ हुए बलात्कार की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। इस वीभत्स घटना के विरूद्ध पूरे देश का ईसाई समुदाय उठ खड़ा हुआ है और जगह-जगह मौन जुलूस और अन्य शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन  किए जा रहे हैं।
पिछले कुछ महीनो से इस अल्पसंख्यक समुदाय पर हमलों और उन्हें डराने-धमकाने की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है और यह मात्र संयोग नहीं है। हिंसा के स्वरूप में भी एक उल्लेखनीय परिवर्तन आया है और वह यह कि जहां पहले ये हमले दूरदराज के आदिवासी इलाकों में हुआ करते थे, वहीं अब वे शहरी क्षेत्रों में हो रहे हैं। एक अन्य परिवर्तन यह हुआ है कि नई सरकार के आने के बाद से इन हमलों की संख्या में बढोत्तरी हुई है।
ईसाई भारत में सदियों से रह रहे हैं। पहली सदी ईस्वी में सेंट थाॅमस, केरल के मलाबार तट पर उतरे और वहां उन्होंने चर्च की स्थापना की। तभी से ईसाई, भारतीय समाज का अंग बने हुए हैं और उनका सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नन, पादरी व मिशनरी लंबे समय से देश के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में निवासरत रहते हुए वहां शिक्षा व स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं स्थापित व संचालित करते आए हैं। देश के कई बड़े नगरों में उन्होंने प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की है। आज ईसाई हमारे देश का बहुत छोटा अल्पसंख्यक समूह (2001 की जनगणना के अनुसार आबादी का 2.3 प्रतिशत) हैं। इस समुदाय में भी हिंदुओं और मुसलमानों की तरह आंतरिक विविधता है व कई पंथ अस्तित्व में हैं।
पिछले कुछ दशकों में आदिवासी इलाकों, जिनमें डांग (गुजरात), झाबुआ (मध्यप्रदेश) व कंधमाल (ओडिसा) शामिल हैं, में हुई ईसाई-विरोधी हिंसा ने पूरे समुदाय को हिलाकर रख दिया है। बहुवाद और विविधता के मूल्यों में विष्वास करने वालों को भी इन घटनाओं से गहरा धक्का पहुंचा है। सन् 1990 के दशक के मध्य से शुरू हुई इस हिंसा का एक चरम था पास्टर ग्राहम स्टेंस और उनके दो मासूम लड़कों को 23 जनवरी 1999 को जिंदा जलाया जाना। सन् 2007 व 2008 में कंधमाल में हुई घटनाएं, इस हिंसा का एक और चरम बिंदू थीं। उसके बाद से, देश के अलग-अलग हिस्सो में ईसाई पादरियों, ननों व चर्चों सहित अन्य ईसाई संस्थाओं पर हमले होते रहे। फिर, पिछले कुछ महीनों में दिल्ली में कई चर्चों पर हमले हुए। जिन चर्चों को निशाना बनाया गया वे दिल्ली के पांच कोनों में स्थित थे: दिलशाद गार्डन (पूर्व), जसोला (दक्षिण-पश्चिम), रोहिणी (बाहरी दिल्ली), विकासपुरी (पश्चिम) व बसंतकुंज (दक्षिण)। ऐसा लगता है कि इन चर्चों को एक सुनियोजित षड़यंत्र के तहत चुना गया ताकि पूरी दिल्ली को सांप्रदायिक आधार पर धु्रवीकृत किया जा सके। दिल्ली पुलिस व केंद्र सरकार का दावा है कि इन हमलों के पीछे मुख्य उद्देश्य चोरी व लूटपाट आदि था। यह इस तथ्य के बावजूद कि अधिकांश मामलों में हमलावर, चर्च में रखी दान पेटियां वहीं छोड़ गये। भाजपा प्रवक्ताओं ने यह दावा भी किया कि इसी अवधि में कई मंदिरों पर भी हमले हुए। परंतु इससे चर्चों पर हुए हमलों को न तो उचित ठहराया जा सकता है और ना ही दोनों प्रकार की घटनाओं को समान दृष्टि से देखा जा सकता है। जिस तरह से चर्चों पर हमले हुए, उससे यह साफ है कि यह एक धार्मिक समुदाय को आतंकित करने का प्रयास था।
इस बीच हिंदू दक्षिणपंथियों के मुखिया व भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस के सरसंघचालक ने यह कहकर हलचल मचा दी कि मदर टेरेसा परोपकार का जो कार्य करतीं थीं उसका मुख्य उद्देश्य धर्मपरिवर्तन करवाना था। इस वक्तव्य के बाद दो बड़ी घटनाएं हुईं। पहली, हिसार के हरियाणा में एक चर्च पर हमला कर वहां लगे क्रास को हटाकर उसकी जगह भगवान हनुमान की मूर्ति स्थापित कर दी गई और संघी पृष्ठभूमि वाले हरियाणा के मुख्यमंत्री ने यह कहा कि उक्त चर्च के पास्टर धर्मपरिवर्तन की गतिविधियों में संलग्न थे। संघ के अनुशांगिक संगठन विश्व हिंदू परिषद ने कहा कि अगर धर्मपरिवर्तन बंद नहीं हुए तो चर्चों पर और हमले होंगे। हिसार में हुई घटना, सन् 1949 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के भीतर रामलला की मूर्ति स्थापित करने की घटना की याद दिलाती है। उसके बाद यह दावा किया गया था कि वह भगवान राम का जन्मस्थान है। मुख्यमंत्री के वक्तव्य से साफ है कि घटना की जांच किस कोण से की जावेगी और असली दोषियों के पकडे जाने की कितनी संभावना है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि उक्त पास्टर द्वारा धर्मपरिवर्तन किए जाने की पुलिस में कभी कोई शिकायत नहीं की गई। ईसाई-विरोधी हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए धर्मपरिवर्तन का आरोप लंबे समय से लगाया जाता रहा है।
दूसरी बड़ी घटना पश्चिम  बंगाल में हुई, जहां के समाज का बहुत तेजी से सांप्रदायिकीकरण किया जा रहा है। कोलकाता में एक 71 वर्षीय नन के साथ बलात्कार हुआ। इस हमले में वे गंभीर रूप से घायल हो गईं और कई दिनों तक उन्हें अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। उनका एक आपरेशन भी हुआ। उन्होंने अपने बलात्कारियों को क्षमा कर दिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि यह बलात्कार की एक अन्य घटना मात्र है, जबकि इसके पीछे के सांप्रदायिक उद्देश्य को नजरअंदाज करना किसी के लिए भी असंभव है।
मदर टेरेसा के संबंध में भागवत की टिप्पणी के बाद से ईसाईयों पर हमले बढते जा रहे हैं और हरियाणा व कोलकाता की घटनाएं इसका प्रतीक हैं। विहिप खुलकर और हमलों की धमकी दे रही है। प्र्रधानमंत्री मोदी ने हाल में इस मुद्दे पर अपनी समझीबूझी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जायेगा। परंतु हम सब जानते हैं कि मोदी अकसर जो कहते हैं, वह उनका मंतव्य नहीं होता। पिछले कई महीनों से वे अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए थे और इससे संघ परिवार को यह स्पष्ट संदेश जा रहा था कि वह अपनी विघटनकारी व हिंसात्मक गतिविधियों को जारी रख सकता है। ईसाई समुदाय का एक बड़ा हिस्सा इन बढते हमलों से सकते में है। उसका कहना है कि मोदी को विकास के मुद्दे पर देश भर में समर्थन मिला था और उसे यह उम्मीद नहीं थी कि उनके सत्ता में आने के बाद देश  में यह सब कुछ होगा। जो लोग ऐसा सोचते हैं, उन्हें हम केवल भोला ही कह सकते हैं। मोदी, आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं और विघटनकारी एजेण्डा मानो उनकी जीन्स में है। संघ परिवार के विभिन्न सदस्यों की सहायता से यह एजेण्डा देश भर में लागू किया जायेगा, इस संबंध में किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
भारत हमेशासे कई धर्मावलंबियो का देश रहा है, जो सदियों तक मिलजुल कर रहते आये थे और एक-दूसरे के त्यौहारों में शिरकत करते रहे थे। अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने और उन पर हमले करने की घटनाओं में पिछले कुछ दशकों में हुई वृद्धि से हमें इस नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए कि भारत में रहने वाले विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच हमेशा से बैरभाव रहा है। ईसाईयों की आज जो स्थिति है, उसका प्रजातांत्रिक अधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध वर्गों को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। यह ‘पहले कसाई फिर ईसाई’ की पटकथा के अनुरूप है। यह सिर्फ ईसाईयों के अधिकारों पर अतिक्रमण का प्रश्न नहीं है, यह प्रजातंत्र की नींव को खोखला करने का प्रयास है। जैसा कि कहा जाता है, किसी भी प्रजातंत्र की सफलता की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी यह है कि वह अपने अल्पसंख्यक नागरिकों को समानता व सुरक्षा उपलब्ध करवा रहा है अथवा नहीं।
-राम पुनियानी

सोमवार, 23 मार्च 2015

हिन्दू राष्ट्र, गाय व मुसलमान

भाग.1
उच्च जातियों के हिन्दुओं और हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का गाय के प्रति . एक पशु बतौर व हिन्दू राष्ट्र के प्रतीक बतौर . ढुलमुल रवैया रहा है। कभी वे गाय के प्रति बहुत श्रद्धावान हो जाते हैं तो कभी उनकी श्रद्धा अचानक अदृश्य हो जाती है। हाल के कुछ वर्षों में, हिन्दू राष्ट्रवादियों ने गाय को एक पवित्र प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है। और यह इसलिए नहीं कि सनातन धर्म की चमत्कृत कर देने वाली विविधता से परिपूर्ण धार्मिक.दार्शनिक ग्रंथ ऐसा कहते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि गाय, हिन्दुओं को लामबंद करने और मुसलमानों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऐसा क्यों ? क्योंकि मुसलमानों के गौमांस भक्षण पर कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं है और इस धर्म के मानने वालों का एक तबका मांस व मवेशियों के व्यापार में रत है। मुस्लिम शासकों और धार्मिक नेताओं का भी गाय के प्रति ढुलमुल रवैया रहा है। कभी उन्होंने हिन्दुओं के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की खातिर गौवध को प्रतिबंधित किया तो कभी अपने सांस्कृतिक अधिकारों और अपनी अलग पहचान पर जोर दिया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर डीएन झा की पुस्तक 'द मिथ ऑफ होली काऊ' ;पवित्र गाय का मिथक कहती है कि प्राचीन भारत में न केवल गौमांस भक्षण आम था वरन् गाय की बलि भी दी जाती थी और कई अनुष्ठानों में गाय की बलि देना आवश्यक माना जाता था। कई ग्रंथों में इन्द्र भगवान द्वारा बलि दी गई गायों का मांस खाने की चर्चा है। चूंकि उस समय समाज, घुमंतु से कृषि.आधारित बन रहा था इसलिए मवेशियों का महत्व बढ़ता जा रहा थाए विशेषकर बैलों और गायों का। मवेशी, संपत्ति के रूप में देखे जाने लगे थे जैसा कि 'गोधन'शब्द से जाहिर है। शायद इसलिएए गाय की बलि पर प्रतिबंध लगाया गया और उस प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए उसे धार्मिक चोला पहना दिया गया। सातवीं से पांचवी सदी ईसा पूर्व के बीच लिखे गए ब्राह्मण ग्रंथों, जो कि वेदों पर टीकाएं हैं, में पहली बार गाय को पूज्यनीय बताया गया है। 
इसके बाद, भारत में बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ और सम्राट अशोक ने सभी पशुओं के प्रति दयाभाव को अपने राज्य की नीति का अंग बनाया। यहां तक कि उन्होंने जानवरों की चिकित्सा का प्रबंध तक किया और उनकी बलि पर प्रतिबंध लगा दिया, यद्यपि यह प्रतिबंध मवेशियों पर लागू नहीं था। कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में मवेशियों के वध को आम बताया गया है। इंडोनेशिया के बाली द्वीपसमूह के हिन्दू आज भी गौमांस खाते हैं। कुछ आदिवासी समुदायों में आज भी उत्सवों पर गाय की बलि चढ़ाई जाती है। कुछ दलित समुदायों को भी गौमांस से परहेज नहीं है। हिन्दुओं के गौमांस भक्षण पर पूर्ण प्रतिबंध, आठवीं सदी ईस्वी में लगाया गया,जब आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत दर्शन का समाज में प्रभाव बढ़ा। बौद्ध धर्म.विरोधी प्रचार भी आठवीं सदी में अपने चरम पर पहुंचाए जब शंकर ने अपने मठों का ढांचा, बौद्ध संघों की तर्ज पर बनाया। ग्यारहवीं सदी तक उत्तर भारत में हिन्दू धर्म एक बार फिर छा गया, जैसा कि उस काल में रचित संस्कृत नाटक 'प्रबोधचन्द्रोदय' से स्पष्ट है। इस नाटक में बौद्ध और जैन धर्म की हार का रूपक और विष्णु की आराधना है। तब तक उत्तर भारत के अधिकांश रहवासी शैव, वैष्णव या शक्त बन गए थे। 12वीं सदी के आते.आते, बौद्ध धर्मावलंबी केवल बौद्ध मठों तक सीमित रह गए और आगे चलकरए यद्यपि बौद्ध धर्म ने भारत के कृषक वर्ग के एक तबके को अपने प्रभाव में लिया, तथापि, तब तक बौद्ध धर्म एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय के रूप में अपनी पहचान खो चुका था। वैष्णव, पशुबलि के विरोधी और शाकाहारी थे।
मुसलमानों का ढुलमुल रवैया
    मुस्लिम शासक और धार्मिक नेता, वर्चस्वशाली उच्च जाति के हिन्दुओं की भावनाओं का आदर करने और अपने सांस्कृतिक अधिकारों पर जोर देने के बीच झूलते रहे। मुगल बादशाह बाबर ने गौवध पर प्रतिबंध लगाया था और अपनी वसीयत में अपने पुत्र हुमांयू से भी इस प्रतिबंध को जारी रखने को कहा था। कम से कम तीन अन्य मुगल बादशाहों.अकबर, जहांगीर और अहमद शाह.ने भी गौवध प्रतिबंधित किया था। मैसूर के नवाब हैदरअली के राज्य में गौवध करने वाले के हाथ काट दिए जाते थे। असहयोग और खिलाफत आंदोलनों के दौरान गौवध लगभग बंद हो गया था क्योंकि कई मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस आशय के फतवे जारी किए थे और अली बंधुओं ने गौमांस भक्षण के विरूद्ध अभियान चलाया था। महात्मा गांधी ने हिन्दुओं से खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने की जो अपील की थी, उसके पीछे एक कारण यह भी था कि इसके बदले  मुसलमान नेता गौमांस भक्षण के विरूद्ध प्रचार करेंगे। मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस अहसान का बदला चुकाया और गौवध के खिलाफ अभियान शुरू किया। इससे देश में अभूतपूर्व हिन्दू.मुस्लिम एकता स्थापित हुई और पूरे देश ने एक होकर अहिंसक रास्ते से ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ मोर्चा संभाला।
हाल में कई राज्यो द्वारा गौवध पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून बनाए गए हैं। इनका विरोध गौमांस व्यापारी  व मांस उद्योग के श्रमिक कर रहे हैं। इनमें मुख्यतः कुरैशी मुसलमान हैं परंतु हिन्दू खटीक व अन्य गैर.मुसलमान भी यह व्यवसाय करते हैं। वे इस प्रतिबंध का विरोध मुख्यतः इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इससे उनके व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंचेगा। फिक्की और सीआईआई यह चाहते हैं कि उद्योगों और व्यवसायों पर सरकार का नियंत्रण कम से कम हो। अगर ये छोटे व्यवसायी भी ऐसा ही चाहते हैं तो इसमें गलत क्या है ? और यहां इस तथ्य को नहीं भुलाया जाना चाहिए कि मांस के व्यवसायियों में हिन्दू और मुसलमान दोनों शामिल हैं परंतु मीडिया केवल मुसलमानों के विरोध को महत्व दे रहा है और गैर.मुसलमानों द्वारा किए जा रहे विरोध का अपेक्षित प्रचार नहीं हो रहा है। गौवध पर प्रतिबंध और गौमांस के व्यवसाय के विनियमन को कई आधारों पर चुनौती दी जाती रही है, जिनमें से एक है संविधान के अनुच्छेद 19;1 द्वारा हर नागरिक को प्रदत्त 'कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार' करने का मौलिक अधिकार। इसके अतिरिक्तए अनुच्छेद 25, जो कि सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने और उसका आचरण करने की स्वतंत्रता देता है,के आधार पर भी इस प्रतिबंध को अनुचित बताया जाता रहा है। उच्चतम न्यायालय ने इस प्रतिबंध को इस आधार पर उचित ठहराया है कि यह जनहित ;दुधारू व भारवाही पशुओं और पशुधन का संरक्षण,में है और यह व्यवसाय करने की स्वतंत्रता पर अनुचित प्रतिबंध नहीं है। धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन के आधार पर चुनौती को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि यद्यपि इस्लाम में गौमांस भक्षण की इजाजत है तथापि मुसलमानों के लिए गौमांस भक्षण अनिवार्य नहीं है।
गौवध संबंधी पुराने कानूनों का चरित्र मुख्यतः नियामक था और उनमें गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया था। इन कानूनों में गायों और दोनों लिंगों के बछड़ों के वध को प्रतिबंधित किया गया था परंतु राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकृत अधिकारी की इजाजत से, एक निश्चित आयु से ज्यादा के पशुओं का वध किया जा सकता था। इन कानूनों को शाकाहार.समर्थक नागरिकों ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि वे राज्य के नीति निदेशक तत्वों में से एक, जिसमें'गायों,बछड़ों व अन्य दुधारू व भारवाही पशुओं के वध पर प्रतिबंध' लगाए जाने की बात कही गई है, का उल्लंघन हैं। उच्चतम न्यायालय ने मोहम्मद हमीद कुरैशी विरूद्ध बिहार राज्य प्रकरण में इस तर्क को इस आधार पर खारिज कर दिया कि एक निश्चित आयु के बाद, गौवंश की भारवाही पशु के रूप में उपयोगिता समाप्त हो जाती है और वे सीमित मात्रा में उपलब्ध चारे पर बोझ बन जाते हैं। अगर ये अनुपयोगी जानवर न रहें तो वह चारा दुधारू व भारवाही पशुओं को उपलब्ध हो सकता है। राज्यों ने अनुपयोगी हो चुके गौवंश के संरक्षण के लिए जो गौसदन बनाए थे, वे घोर अपर्याप्त थे। इस संबंध में दस्तावेजी सुबूतों के आधार पर न्यायालय ने कहा कि गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध उचित नहीं ठहराया जा सकता और वह जनहित में नहीं है।
परंतु दूसरे दौर के गौवध.निषेध कानूनों में गौवध पर प्रतिबंध तो लगाया ही गया साथ ही,गौमांस खरीदने व उसका भक्षण करने वालों के लिए भी सजा का प्रावधान कर दिया गया। इस संबंध में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा बनाया गया कानून तो यहां तक कहता है कि गौमांस भंडारण करने व उसे पकाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सामान, जिनमें फ्रिज और बर्तन तक शामिल हैं, को भी जब्त किया जा सकता है। अर्थात अब पुलिसवाला हमारे रसोईघर में घुस सकता है और अगर वहां गौमांस पाया गया या उसके भंडारण या पकाने का इंतजाम मिला,तो हमें जेल की सलाखों के पीछे सात साल काटने पड़ सकते हैं।  
गौवध व हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन
    गौवध के संबंध में जिस तरह का ढुलमुल रवैया हिन्दू व मुस्लिम धार्मिक व राजनैतिक नेताओं का था,कुछ वैसा ही हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का भी रहा है। हिन्दुत्व चिंतक वी. डी. सावरकर ने गाय को श्रद्धा का पात्र बनाने का विरोध किया था। उनका कहना था कि गाय एक पशु है, हमें उसके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और हिन्दुओं को करूणा व दयावश उसकी रक्षा करनी चाहिए। परंतु उनके लिए गाय किसी भी अन्य पशु के समान थी.न कम न ज्यादा। वे लिखते हैं 'गाय और भैंस जैसे पशु और पीपल व बरगद जैसे वृक्ष, मानव के लिए उपयोगी हैं इसलिए हम उन्हें पसंद करते हैं और यहां तक कि हम उन्हें पूजा करने के काबिल मानते हैं और उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है परंतु केवल इसी अर्थ में। क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि अगर किन्हीं परिस्थितियों मेंए वह जानवर या वृक्ष मानवता के लिए समस्या का स्त्रोत बन जाए तब वह संरक्षण के काबिल नहीं रहेगा और उसे नष्ट करना,मानव व राष्ट्र हित में होगा और तब वह मानवीय व राष्ट्र धर्म बन जाएगा';समाज चित्र, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 678। सावरकर आगे लिखते हैं 'कोई भी खाद्य पदार्थ इसलिए खाने योग्य होता है क्योंकि वह हमारे लिए लाभदायक होता है परंतु किसी खाद्य पदार्थ को धर्म से जोड़ना, उसे ईश्वरीय दर्जा देना है। इस तरह की अंधविश्वासी मानसिकता से देश की बौद्धिकता नष्ट होती है' ;1935, सावरकरांच्या गोष्ठी, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 559 द्। 'जब गाय से मानवीय हितों की पूर्ति न होती हो या उससे मानवता शर्मसार होती हो,तब अतिवादी गौसंरक्षण को खारिज कर दिया जाना चाहिए' ;समग्र सावरकर वांग्मय,खण्ड 3, पृष्ठ 341,।'मैंने गाय की पूजा से जुड़े झूठे विचारों की निंदा इसलिए की ताकि गेंहू को भूंसे से अलग किया जा सके और गाय का संरक्षण बेहतर ढंग से हो सके';1938,स्वातंत्रय वीर सावरकर, हिन्दू महासभा पर्व,पृष्ठ 143।
खिलाफत आंदोलन के दौरान, जब मुसलमानों ने गौमांस भक्षण बंद कर दिया और गौवध का विरोध करने लगे तब सावरकर और हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए गाय वह मुद्दा न रही जिसका इस्तेमाल हिन्दुओं को एक करने और मुसलमानों को 'दूसरा' या 'अलग' बताने के लिए किया जा सके। परंतु सावरकर हिन्दुओं द्वारा गाय की पूजा करने का विरोध एक अन्य कारण से भी कर रहे थे। सावरकर लिखते हैंए 'जिस वस्तु की हम पूजा करें, वह हमसे बेहतर व महान होनी चाहिए। उसी तरहए राष्ट्र का प्रतीक, राष्ट्र की वीरता, मेधा और महत्वाकांक्षा को जागृत करने वाला होना चाहिए और उसमें देश के निवासियों को महामानव बनाने की क्षमता होनी चाहिए। परंतु गाय, जिसका मनमाना शोषण होता है और जिसे लोग जब चाहे मारकर खा लेते हैं, वह तो हमारी वर्तमान कमजोर स्थिति का एकदम उपयुक्त प्रतीक है। पर कम से कम कल के हिन्दू राष्ट्र के निवासियों का तो ऐसा शर्मनाक प्रतीक नहीं होना चाहिए' ;1936, क्ष.किरण, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 3ए पृष्ठ 237। 'हिन्दुत्व का प्रतीक गाय नहीं बल्कि नृसिंह है। ईश्वर के गुण उसके आराधक में आ जाते हैं। गाय को ईश्वरीय मानकर उसकी पूजा करने से संपूर्ण हिन्दू राष्ट्र गाय जैसा दब्बू बन जाएगाए वह घास खाने लगेगा। अगर हमें अपने राष्ट्र से किसी पशु को जोड़ना ही है तो वह पशु सिंह होना चाहिए। एक लंबी छलांग लगाकर सिंह अपने पैने पंजों से जंगली हाथियों के सिर को चीर डालता है। हमें ऐसे नृसिंह की पूजा करनी चाहिए। नृसिंह के पैने पंजे न कि गाय के खुर, हिन्दुत्व की निशानी हैं, ;1935, क्ष.किरण, समग्र सावरकर वांग्मयए खण्ड 3,पृष्ठ 167। सावरकर की मान्यता थी कि हिन्दुओं द्वारा गाय की पूजा करने से वे जरूरत से ज्यादा विनम्र, दयालु व सभी प्राणियों को समान मानने वाले बन जाएंगे। जबकि सावरकर तो राष्ट्रवाद का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैन्यीकरण करना चाहते थे।
-इरफान इंजीनियर

रविवार, 22 मार्च 2015

‘लक्षित आक्रमण’ से पैदा होता अविश्वास का वातावरण

  धर्मनिरपेक्षता तथा सहिष्णुता से लिए दुनिया में अपनी अलग पहचान रखने वाला हमारा देश भारतवर्ष इन दिनों अल्पसंख्यक  समुदाय विशेष·कर ईसाई समुदाय से  चर्च,मिशनरी स्कूलों तथा नन आदि पर होने वाले लक्षितआक्रमण को लेकर एक  बार फिर चर्चा में है। हालांकि देश मेें ऐसे धर्मस्थलों पर होने वाले हमलों का  इतिहास कोई नया नहीं है। परंतु इस बात से भी इंकार नहीं किया  जा सकता कि देश में नरेंद्र मोदी सरकार के  सत्ता में आने के  बाद दक्षिणपंथी उग्र विचारधारा रखने वाली शक्तियों के  हौसले काफ़ी बढ़ गए हैं। और शायद यही वजह है कि केवल राजधानी दिल्ली में दिसंबर 2014 सेलेकर अब तक  ऐसे 6 हादसे घटित हो चुके  हैं जिनमें विभिन्न चर्चों व कान्वेंट स्कूलों पर हमले किए गए। पहला हादसा दिसंबर में सेंट सिबेसटियन चर्च, दिलशाद गार्डन में घटित हुआ जिसमें आसामाजिक तत्वों द्वारा चर्च में तोड़फोड़ की गई। केंद्रीय गृहमंत्रालय ने इस हादसे की जांच के लिए एसआईटी भी गठित की  है। दूसरी घटना इसके  बाद जसेला क्षेत्र में हुई जिसमें एक चर्च पर पत्थरबाज़ी की गई। तीसरी घटना में रोहिणी के  एक  चर्च में क्रिसमस  का  पालना जला दिया गया। इसी प्रकार विकासपुरी में कुछ लोगों द्वारा एक चर्च पर आक्रमण किया गया तथा तोड़फोड़की गई। इसके पश्चात वसंतकुंज के  एक चर्च में तोड़फोड़ व हमला किए जाने का  समाचार आया। और अभी ताज़ातरीन घटना में वसंतकुंज  के एक ईसाई  स्कूल में भी अवांछित तत्वों द्वारा लूटपाट की घटना अंजाम दी गई है। हालांकि इनमें से कई घटनाओं को दिल्ली पुलिस सांप्रदायिकतापूर्ण अथवा लक्षित हिंसा के दृष्टिकोण से नहीं देखना चाह रही है। परंतु कुछ ही समय के अंतराल में एक ही समुदाय के धर्मस्थलों व  स्कूल पर होने वाली इस प्रकार की घटनाओं ने अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय के लोगों के दिलों में भय व दहशत का माहौल ज़रूर पैदा कर दिया है। दिल्ली में ईसाई धर्मस्थलों पर हुए हमलों के विरोध में ईसाई समुदाय के लोगों को गुहमंत्री राजनाथ सिंह के  निवास पर प्रदर्शन तक  करना पड़ा है।

                उपरोक्त घटनाओं की गंभीरता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने भी पिछले दिनों अपने एक सार्वजनिक संबोधन में इन्हीं घटनाओं के परिपेक्ष्य में देश के अल्पसं यकों को पूर्ण सुरक्षा का भरोसा भी दिलाया। इसके अतिरिक्त भाजपा शासित राज्य हरियाणा के हिसार में एक निर्माणधीन चर्च को कुछ उपद्रवियों द्वारा गिरा दिया गया तथा कथित रूप से इसमें हनुमानजी की मूर्ति  उग्र भीड़ द्वारा स्थापित कर दी गई। ऐसे ही एक लक्षित  आक्रमण में पश्चिम बंगाल -में कोलकाता से मात्र 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित रानाघाट टाऊन में गत् 14 मार्च को एक 72 वर्षीय नन के साथ कुछ लोगों द्वारा सामूहिक बलात्कार किया गया। कान्वेंट स्कूल में काम ·रने वाली इस नन ने हालांकि अपराधियों को सार्वजनिक रूप से माफ किए जानेकी घोषणा तो ज़रूर कर दी है परंतु पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने अपराधियों की गिरफ़तारी हेतु तथा मामले  की   तह तक जाने के लिए इस घटना को सीबीआई के  सुपुर्द कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हरियाणा व पश्चिम बंगाल में घटी इन दोनों घटनाओं पर संज्ञान लेते हुए घटनाओं  की रिपोर्ट तलब की  है। दूसरी ओर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने हिसार की घटना के पीछे ईसाई समुदाय द्वारा धर्म परिवर्तन कराए जाने के चलते लोगों के आक्रोशित होने का  अंदेशा जताया है। वहीं विश्व हिंदू परिषद के कुछ जिम्मेदार नेता भी  आक्रमणकारियों का बचाव करते दिखाई दे रहे हैं। हद तो यह है कि विश्व हिंदू परिषद के एक नेता ने 72 वर्षीय नन के साथ हुई बलात्कार की घटना को  भी ईसाई संस्क्रतिका एक  हिस्सा बताकर अपराध की गंभीरता को ·मकरने की कोशिश की  है। सवाल यह है कि अल्पसं यक समुदायके प्रति होने वाले इस प्रकारके दुरव्यहार,उनके  विरुद्ध होने वाली आपत्तिजनक बयानबाजि़यां,धर्मस्थलों व उनकी शिक्षण संस्थाओं पर होने वाले हमले आखिर क्या संकेत दे रहे हैं? ऐसी शक्तियों के  हौसले आखिर ऐसी शक्तियों के  हौसले आखिर नेरंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद ही  क्योंकर बुलंद हो गए हैं? और क्या वर्ग विशेष के लोगों में भय तथा अविश्वास की भावना पैदा होना या इसका बढ़ना देशकी प्रगति तथा विकास अथवा इसकीअंतर्राष्ट्रीय छवि के लिए हानिकारक नहीं है?

                जूलियो रिबैरो भारतीय पुलिससेवा का  एक  ऐसा वरिष्ठतम नाम है जिनकी सेवाओं के लिए राष्ट्र हमेशा उनका कृतग रहेगा। उन्होंने मुंबई पुलिस कमिश्रनर के रूप में अपनी सेवाएं दीं। पंजाब तथा गुजरात में भी वे पुलिस महानिदेशक रहे तथा उनके बेहतरीन सेवा रिकार्ड व बेदाग छवि के मद्देनज़र उन्हें रोमानिया का राजदूत भी नियुक्तकिया गया। इस समय श्री रिबेरो 86 वर्ष की आयु के हो चुके हैं। गत् दिनों देश के एक प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी दैनिक में उन्हें एक लेख लिख·र अपनी पीड़ा को सार्वजनिक करने के लिए मजबूर होना पड़ा। वे देश में लगातार बढ़ रहे ऐसे लक्षित आक्रमण व हिंसा की  घटनाओं से   चिंतित हैं कि वे स्वयं को अपने ही देश में एक परदेसी सा महसूस करने लगे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह सारी घटनाएं हिंदू दक्षिण पंथियों द्वारा अंजाम दी जा रही हैं जो बेहद खतरनाक हैं। उन्होंने पाकिस्तान में जनरल जि़या उल हक के शासनकाल के बाद पाकिस्तान के   बिगड़े हालात का उदाहरण देते हुए कहा है कि जिस प्रकार पाकिस्तान आज इतने बुरे दौर से इन्हीें सांप्रदायिकता पूर्ण विचारों के चलते पहुंच गया है वैसी स्थिति हमारे देश में पैदा नहीं होनी चाहिए। उनका भी यही मानना है कि पिछले 9 महीने से इस प्रकार की घटनाओं में तेज़ी से इज़ाफा हुआ है तथा सांप्रदायिक शक्तियों का सशक्तीकरण हुआ है। आखिर देश के इतने जि़म्मेदार तथा दबंग व बेदाग छवि के पुलि अधिकारी द्वारा जिसकी अपनीकई पुश्तें भारत में ही पैदा हुईं,पलीं-बढ़ी तथा देश की सेवा करती रहीं उन्हें स्वयं को  परदेसी समझने के ज़रूरत  आखिर क्यों महसूस हुई? क्या यह हमारे देश के लिए,यहां की शासन व्यवस्था,सरकार तथा संविधान के लिए यह चिंता का विषय नहीं है? क्या ऐसे लोगों ·ी व्यथा दृुनिया में देश का  सिर झुकाने के लिए काफी नहीं है?

                   ईसाईयों अथवा उनके धर्मस्थलों पर होने वाले हमलों अथवा उनके साथ किए जा रहे बलात्कार अथवा अन्य हिंसक घटनाओं को यह कहकर कतई जायज़ नहीं ठहराया जा सकता कि यह उस समुदाय के लोग हैं जो धर्म परिवर्तन कराते रहते हैं। हां इस विषय को  उछालकर तथा उन पर यह आरोप मढ़कर राजनीति ज़रूर की जा सकती है। गुजरात,छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश जैसे भाजपा शासित राज्यों में ही जा·र यह बखूबी देखा जा सकता है कि दूर-दराज़  के क्षेत्रों में जहां आदिवासी व जनजातीय समुदाय के लोग रहते हैं तथा जहां सरकार की ओर से सुविधायुक्त अस्पताल तथा पाठशालाओं की व्यवस्था नहीं हो सकी  है वहां ईसाई मिशनरीज़ द्वारा स्वास्थय केंद्र भी खोले गए हैं तथा स्कूल भी संचालित किए जा रहे हैं। ज़रा सोचिए कि एक बीमार व्यक्ति अपने इलाज हेतु क्या किसी ईसाई स्वास्थय केंद्र पर जाने से इंकार ·रेगा जबकि वहां सरकार अथवा उसके अपने धर्म की ओर से कोई दूसरा सवास्थयकेंद्रर संचालित न किया जा रहा हो? यही हाल शिक्षा का भी है। जहां सरकारी स्कूल नहीं है वहां ईसाईयों ने मिशनरीज़ द्वारा संचालि स्कूल खोल रखे हैं। अब यदि धर्म परिवर्त रोकना है तो सर्वप्रथम उन कारणों की तलाश की जानी चाहिए जिसके चलते दूसरे समाज के लोग ईसाई समुदाय की ओर आकर्षित होने के लिए मजबूर होते हैं। असमानता व ऊंच-नीच व जात-पात की भावना भी इनमें एक महत्वपूर्ण कारण है। अभी इसी वर्ष जनवरी के दूसरे सप्ताह में बिहार के सारण व गया जि़लों में 1700 हिंदू,दलित व महादलित समुदाय के लोगों द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया गया। इनमें बारह सौ लोग सारण जि़ले के बैंकथपुर व कुदारबाघा गांव के थे जबकि पांच सौ लोगों गया में बौद्ध धर्म अपनाया। इन लोगों का     कहना था कि उन्हें रोज़मर्रा में जीवन में सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था। और उन्होंने बौद्ध धर्म इसलिए अपनाया कि इसमें एकता पर ज़ोर दिया जाता है तथा वहां आपस में भेदभाव का कोई स्थान नहीं है।

                   बाबा साहब भीमराव अंबेडकर से लेकर अब तक लाखों लोग भारतवर्ष में बौद्ध धर्म अपना चुके हैं। बौद्ध धर्म के धर्मगुरुओं द्वारा तो किसी प्रकार की लालच दिए जानेकी भी कोई खबर नहीं आती। ऐसे में क्या बौद्धधर्म सथलों पर या उनके शिक्षण संस्थानों पर आक्रमणकर दिया जाना चाहिए? या फिर इस समुदाय के लोगों के साथ भी हिंसा से पेश आना चाहिए? या फिर इनके लिए भी कथित घरवापसी की मुहिम छेड़े जाने की ज़रूरत है? दरअसल नरेंद्र मोदी के सत्ता संभालने के  बाद सांप्रदायिकतावादी सोच रखने वाले संगठनों तथा इनके नेताओं के हौसले सातवें आसमान पर पहुंच गए हैं। कोई गांधीजी को अपमानित कर रहा है तो कोई गोडसे की  मूर्ति स्थापित करने पर तुला है। कोई घर वापसी के मिशन में लगा हुआ है तो कहीं हिंदुओं कोई जनसंख्या कम होने का भय दिखाया जा रहा है। कोई भाजपा नेता मस्जिदों को तोड़े जाने को जायज़ ठहरा रहा है तो कोई  देश को हिंदू राष्ट्र घोषित किए बैठा है।कई सांसद ऐसे हैं जो सार्वजन· रूप से धर्म विशेष के लोगों को अपमानित ·रते व उनके विरुद्ध ज़हर उगलते देखे जा रहे हैं। और यही हालात ऐसे है जिनकी वजह से गणतंत्र दिवस पर भारत पधारे अमेरिकी राष्ट्र्रपति बराक ओबामा को एकता व धार्मिक सहिष्णुताका पाठ पढ़ाना पड़ा। संभव है कि ऐसी परिसिथतियां चंद सांप्रदायिकतावादी लोगों केलिए संतोष अथवा प्रसन्नता का कारण बनती हों अथवा इस प्रकार होने वाले धु्रवीकरण का लाभ उन्हें सत्ता के रूप में मिल जाता हो। परंतु इस प्रकार के हालात देश की अंतराष्ट्रीय छवि तथा भारत की धर्मनिरपेक्ष वैश्विक पहचान पर धब्बा ज़रूर हैं। -तनवीर जाफरी

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

धर्म, राजनीति और समाज

धर्म का राजनीति से क्या लेनादेना है? धर्म और हिंसा का क्या संबंध है? वर्तमान समय में, विभिन्न राजनैतिक एजेण्डे कौनसा रूप धर कर हमारे सामने आ रहे हैं?
ऐसा लगता है कि राजनीति ने धर्म का चोला ओड़ लिया है और यह प्रवृत्ति दक्षिण व पष्चिमएशिया में अधिक नजर आती है। अगर हम पिछले कुछ दशकों की बात करें तो धर्म की राजनीति में घुसपैठ की शुरूआत हुई ईरान में अयातुल्लाह खुमैनी के सत्ता में आने के साथ। इसके पहले, मुसादिक की सरकार का तख्ता पलट दिया गया था। मुसादिक, सन् 1953 में प्रजातांत्रिक रास्ते से ईरान के प्रधानमंत्री चुने गए थे। उन्होंने देश  के कच्चे तेल के भंडार का राष्ट्रीयकरण कर दिया, जो, पष्चिम विशेष कर अमरीकी बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों को पसंद नहीं आया क्योंकि इससे उनका मुनाफा प्रभावित हो रहा था। मुसादिक सरकार को उखाड़ फेंकने के बाद, अमरीका के पिट्ठू शाह रजा पहलवी को सत्ता सौंप दी गई। इसके बाद हुई एक क्रांति के जरिये अयातुल्लाह खुमैनी सत्ता में आए। खुमैनी और उनके साथी कट्टरवादी इस्लाम के झंडाबरदार थे। उनके सत्ता में आने से पष्चिमी मीडिया में हलचल मच गई और इस्लाम को ‘आने वाले समय का सबसे बड़ा खतरा’ बताया जाने लगा। जहां तक दक्षिण एशिया का सवाल है, पिछले कुछ दशकों में भारत में हिंदू धर्म की पहचान की राजनीति परवान चढ़ी और पाकिस्तान में जिया-उल-हक ने राजनीति का इस्लामीकरण किया। इस्लाम की मौलाना मौदूदी की व्याख्या का इस्तेमाल, जिया-उल-हक ने अपनी सत्ता को मजबूती देने के लिए किया। इसके कुछ समय बाद, म्यंामार में अशिन विरथू जैसे लोगों का उदय हुआ, जिसे बर्मा का बिन लादेन कहा जाने लगा। श्रीलंका में बौद्ध पुरोहित वर्ग ने धर्म के नाम पर राजनीति में घुसपैठ शुरू कर दी। इसी दौर में अमरीका में ईसाई कट्टरवाद का बोलबाला बढ़ा।
न्यूयार्क के डब्ल्यूटीसी टाॅवर पर 9/11 के हमले के बाद, अमरीकी मीडिया ने ‘इस्लामिक आतंकवाद’ शब्द गढ़ा। इसके जरिये इस्लाम को आतंकवादी हिंसा के कीचड़ में घसीट लिया गया। तब से लेकर आज तक यह आम धारणा बनी हुई है-बल्कि मजबूत हुई है-कि इस्लाम और मुसलमान, आतंकवादी हिंसा की जड़ में हैं। इस्लाम का राजनीति मे उपयोग और कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा अपने हितों की रक्षा के लिए इस्लाम के नाम का इस्तेमाल करने के कारण इस धारणा को मजबूती मिली और पूरी दुनिया में मुसलमानों की छवि खराब हुई।
लगभग सभी धर्म, अपने-अपने संदर्भों में, मानवतावाद की बात करते हैं परंतु न जाने क्यों, धर्मों के दर्शनिक पक्ष की बजाए उनके रीतिरिवाज, सामुदायिक कार्यक्रम और पुरोहित वर्ग उनकी पहचान बन गए और अब भी बने हुए हैं।
सामंती, प्राक्-औद्योगिक समाज में पुरोहित वर्ग और सत्ताधारियों के बीच गठजोड़ हुआ करता था। पुरोहित वर्ग ने ही इस अवधारणा को प्रस्तुत किया कि राजाओं को शासन करने का दैवीय अधिकार है। यूरोप में राजा और पोप हमराही हो गए, इस्लामिक दुनिया के बड़े हिस्से में नवाब और शाही इमाम में दोस्ती हो गई और हिंदू धर्म के प्रभाव वाले क्षेत्रों में राजा और राजगुरू एक साथ खड़े दिखने लगे। इस गठजोड़ का लाभ यह हुआ कि शासक अब अधिक से अधिक सत्ता अपने हाथों में  केंद्रित करने के लिए धर्म का इस्तेमाल कर सकते थे। आश्चर्य  नहीं कि राजाओं ने अपनी विस्तारवादी महत्वाकांक्षाओं को धार्मिक आधार पर औचित्यपूर्ण ठहराना शुरू कर दिया। अगर कोई ईसाई राजा अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था तो उसके लिए किए जाने वाले युद्ध को वह ‘क्रूसेड’ बताता था। इसी तरह, मुस्लिम राजा कभी युद्ध नहीं करते थे, वे हमेशा  जिहाद करते थे। हिंदू राजाओं की हर लड़ाई धर्मयुद्ध हुआ करती थी।
जिन देशों में धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया शुरू हो गई और समाज पर सामंती-पुरोहित वर्ग का शिकंजा ढीला हो गया, वहां धर्म को उसके दायरे में सीमित कर दिया गया। धर्म, हर व्यक्ति का व्यक्तिगत मसला है, यह मान्यता पुष्ट हुई। राज्य सभी नागरिकों को समान दर्जा देने लगा, चाहे उनकी धार्मिक आस्था कुछ भी हो। इसके विपरीत, दक्षिण एशिया  में या तो  धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया शुरू ही नहीं हुई और या फिर अधूरी रह गई। जमींदारों और पुरोहितों के अस्त होते वर्गों ने जोरशोर से धर्म के नाम पर राजनीति शुरू कर दी। भारत में हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक धाराएं उभरीं, जिनको बढ़ावा दिया राजाओं, नवाबों और जमींदारों के एक तबके ने। बाद में शिक्षित मध्यम वर्ग के कुछ लोग भी इन धाराओं का हिस्सा बन गए। हिंदू और मुस्लिम राष्ट्रवादी उभरे, जिनका नेतृत्व जिन्ना, सावरकर व गोलवलकर जैसे उच्च शिक्षित श्रेष्ठी वर्ग के सदस्यों के हाथों में था। इन सांप्रदायिक धाराओं ने हमारे औपनिवेषिक षासकों को उनकी ‘‘फूट डालो और राज करो’’ की नीति को लागू करने में मदद की। औपनिवेशिक ताकतें, जो शनैः शनैः साम्राज्यवादी ताकतें बनती जा रही थीं, का आर्थिक प्रभुत्व बनाए रखने में सांप्रदायिक ताकतों ने उनकी मदद की। इसके विपरीत, मौलाना अबुल कलाम आजाद और मोहनदास करमचंद गांधी जैसे नेता, धार्मिक होते हुए भी धर्मनिरपेक्ष राज्य और समाज के हामी थे। सांप्रदायिक धाराएं जहां दूसरे समुदायों के विरूद्ध विष वमन करती थीं वहीं ये नेता सभी धर्मों को साथ लेकर चलने की नीति में विष्वास रखते थे और उस पर अमल भी करते थे।
समय के साथ दक्षिण एषिया में सांप्रदायिक हिंसा ने भयावह रूप धारण कर लिया है। भारत में वह हिंदू धर्म का चोला ओढ़े है तो बांग्लादेश और पाकिस्तान में इस्लाम का। श्रीलंका और म्यांमार में वह बौद्ध धर्म के वेश में है। इस हिंसा का राजनैतिक लक्ष्य और एजेंडा है प्राक्-आधुनिक सामंतवादी मूल्यों को आधुनिक कलेवर में समाज पर लादना। जाति और लैंगिक पदानुक्रम के सामंती मूल्यों को मजबूती देने के लिए ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जाता है जो आधुनिक मालूम होती है। कई बार समकालीन संदर्भों के अनुरूप इन मूल्यों में थोड़े-बहुत परिवर्तन भी कर लिए जाते हैं।
धर्म के नाम पर हिंसा के संदर्भ में इस्लाम को सबसे ज्यादा बदनाम किया गया है। जहां खोमैनी के बाद इस्लाम को दुनिया के लिए नया खतरा बताया गया, वहीं 9/11 के बाद खुलकर, इस्लामिक आतंकवाद शब्द का इस्तेमाल होने लगा। समय के साथ अलकायदा उभरा जो मध्य व पष्चिम एशिया में आतंकवादी हिंसा की अधिकतर वारदातों के पीछे था। बोको हरम, आईसिस और अलकायदा की तिकड़ी, इस्लामिक पहचान को केंद्र में रखकर वीभत्स हिंसा कर रही है। यह प्रक्रिया शुरू हुई थी अफगानिस्तान में सोवियत सैनिकों को काफिर बताकर उन पर हमला करने के आह्वान से। अब हालत यह है कि मुसलमानों का एक पंथ ही दूसरे पंथ के सदस्यों को काफिर बता रहा है और अत्यंत क्रूर व दिल दहलाने वाले तरीकों से लोगों की जान ली जा रही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तिकड़ी द्वारा जिन लोगों की जान ली गई है, उनमें से सबसे ज्यादा मुसलमान ही हैं।
अलकायदा के उभार के पीछे कई कारक थे। इनमें से एक था जिया-उल-हक द्वारा पाकिस्तान का इस्लामीकरण। जिया-उल-हक ने पाकिस्तान में ऐसे मदरसों की स्थापना की, जिनका इस्तेमाल युवाओं के दिमाग में जहर भरने के लिए किया जाने लगा। सउदी अरब से इस्लाम के वहाबी संस्करण का आयात कर लिया गया। वहाबियों की यह मान्यता है कि शासक, ईश्वर का प्रतिनिधि होता है। इस्लाम के इस संस्करण के अनुसार, जो उनसे सहमत नहीं है, वह काफिर है और काफिर की जान लेना पवित्र जिहाद है। जो लोग इस जिहाद में मारे जाते हैं उन्हें जन्नत नसीब होती है। अलकायदा के खूनी अभियान को सबसे
अधिक मदद अमरीका से मिली, जिसने लगभग 800 करोड़ डाॅलर और 7000 टन असला अलकायदा को उपलब्ध करवाया। कैंसर की तरह अलकायदा धीरे-धीरे पूरे दक्षिण एशिया में फैल गया और उसे उखाड़ फेंकना मुष्किल होता गया।
तो अब हमारे सामने आगे की राह क्या है? अलग-अलग काल में धर्म की अलग-अलग भूमिका रही है। हमें धर्मों की संत परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा। हमें लोगों को यह बताना होगा कि धर्म एक नैतिक षक्ति है और धर्म के नाम पर हिंसा किसी भी स्थिति में जायज़ नहीं है। और यह भी कि धर्म के नाम पर की जा रही हिंसा का असली उद्देष्य पुरातनपंथी मूल्यों को समाज पर लादना है। धार्मिक विद्वानों और अध्येताओं को धर्मों के नैतिक पक्ष पर जोर देना चाहिए और लोगों को पहचान से जुड़े मुद्दों और बाहरी आडंबर से दूर रहने की सलाह देनी चाहिए।
-राम पुनियानी

सोमवार, 16 मार्च 2015

कमंडल की ही राजनीति का विस्तार था मंडल

Rajeev Yadav's profile photoमोदी के प्रचंड बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता में आने और कथित समाजिक न्याय की पार्टियों का लगभग संसद से सफाया हो जाने के बाद पिछड़ों और दलितांे की अस्मितावादी राजनीति के सामने जो अस्तित्व का संकट पैदा हुआ था वह 6 महीने के बाद भी जारी है। खासकर महाराष्ट्र और झारखंड के विधानसभा चुनावों से तो यह स्पष्ट हो ही गया है, जहां पिछड़ों और दलितों ने बड़े पैमाने पर भगवा पार्टी को वोट दिया। जिससे एक बार फिर यह साबित हो जाता है कि लोकसभा चुनाव में पिछड़ों और दलितों का मोदी की तरफ झुकाव आकस्मिक और किसी लहर के कारण नहीं था बल्कि बिल्कुल सोचा-समझा और स्वाभाविक था।
                                                    यह समझने के लिए कि ऐसा क्यों होना ही था, पिछली सदी के 8 वें दशक के अंत और 9 वें दशक की शुरूआत की राजनीति पर नजर डालना जरूरी होगा। जब मंडल कमीशन की सिफारिशों जिसमें पिछड़ी जाति के लोगों को रोजगार और शिक्षा में आरक्षण दिए जाने की बात की गई थी के लागू होते ही पिछड़ी हिंदू जातियों खासकर यादवों के नेतृत्व की तरफ से यह मिथक बड़े जोर-शोर से प्रचारित
किया जाने लगा कि अब पिछड़ों का ‘क्रांतिकारी राजनीतिक उभार’ हो गया है, जिससे सामाजिक न्याय का राज कायम होगा और हजारों साल से ‘छले’ गए पिछड़ों (शूद्रों) को अब ‘उनका हक’ मिलेगा। जाहिर है जब यहां ‘उनका हक’ मिलने की बात हो रही थी तो यह ‘हक’ उन्हें हिंदू वर्णव्यवस्था जिसपर स्वर्ण कही
जाने वाली जातियों का वर्चस्व था, से मिलना था जिसकी यह हिस्सा थीं। यानी ‘हक’ उनको समाज के कमजोर नागरिक समूह की हैसियत से नहीं मिलना था बल्कि कमजोर हिंदू नागरिक समूह-पिछड़े हिंदू, के बतौर मिलना था। जो अस्वाभाविक नहीं था क्योंकि सत्ता की संरचना हिंदू वर्णव्यवस्था आधारित ही थी। यानी ‘हक’ का लिया जाना और दिया जाना दोनांे, कम से कम राजनीतिक रूप से एक विशुद्ध हिंदू वर्णव्यवस्था की आंतरिक परिघटना थी। यानी ‘सामाजिक न्याय’ मूलतः ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ था। एक तरह का हिंदू राजनीतिक सुधार।
                                              इसीलिए इस परिघटना के बाद एक महत्वपूर्ण बदलाव यह आया कि पिछड़ी जातियों ने अपने को शूद्र कहना बंद कर दिया जो हिंदू वर्णव्यवस्था के नियमों के अनुसार वो थे। अब वे राजनीतिक और सामाजिक शब्दावली में पिछड़े ‘हिंदू’ थे।
                                                       वहीं अस्मितावाद का यह ‘करिश्माई और गौरवपूर्ण’ राजनीतिक ‘उभार’ दो कारणों से मिथक था। पहला, कि यह कोई उभार ही नहीं था। क्योंकि राजनीतिक भाषा में उभार वह होता है जिसके लिए लम्बे समय से संघर्ष किया जा रहा हो, जेल जाया जा रहा हो और जिसमें समय के साथ आवाम की भागीदारी बढ़ती जा रही हो। जैसे बाबरी मस्जिद को तोड़ने वाला संघ परिवार का आंदोलन था। लेकिन
मुलायम, लालू या नितीश ने इसके लिए गिरफ्तारी देना तो दूर एक धरना तक नहीं दिया है। बल्कि यह ‘न्याय’ तो उन्हें अचानक वीपी सिंह ने 1980 से पड़े मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके दे दिया जिसका इन्हें अनुमान तक नहीं था। यानी ‘उभार’ अचानक था। लेकिन इस छली नेतृत्व ने उसे ‘मंडल
आंदोलन’ का नाम दे दिया। जबिक आंदोलन तो अपने एकाधिकार में सेंधमारी से नाराज मंडल विरोधी लोग चला रहे थे, सड़कों पर उतर रहे थे, अराजकता फैला रहे थे, आत्मदाह कर रहे थे। जबकि इस कानून से लाभान्वित होने वाले लोग  आंदोलन के नाम पर सिर्फ स्वणों के आंदोलन के विरोध में हल्ला मचा रहे थे
उनका ‘काउंटर’ कर रहे थे।
                                                     दूसरा, ऐसा नहीं था कि मंडल कमीशन के लागू हो जाने के बाद अचानक से पिछड़ों की आबादी में गुणात्मक वृद्धी हो गई हो और वो इसके बल पर सत्ता तक पहंुच गए हों। जाहिर है यह ‘करिश्मा’ इसलिए सम्भव हो पाया कि बिहार और यूपी में पिछड़ों खासकर यादवों के तकरीबन 8-9 फीसद आबादी में मुसलमानों का 16-18 फीसद आबादी अचानक जुड़ गयी। क्योंकि मुसलमान बाबरी मस्जिद का ताला खोले जाने के कारण कांग्रेस से नाराज थे और कोई नया राजनीतिक ठिकाना ढूढ़ रहे थे। यानी इस ‘उभार’ का मुख्य आधार मुसलमानों का एकमुश्त वोट था जिसने सत्ता का समीकरण सम्भव बनाया था। जिसे ‘पिछड़ा उभार’ के शोर में उसके नेतृत्व द्वारा जान बूझकर दबाया गया।
                                           जिसका एक तरीका था नई उम्मीद से चहकते पिछड़ों के पीछे मुसलमानों को एक पीडि़त की तरह ही रखना। उसे इस नई सम्भावनाओं वाली राजनीति में उत्साही या सकारात्मक समूह के बतौर नहीं उभरने दिया गया। जो अनायास नहीं था बल्कि तेजी से हिंदुत्ववादी दायरे में सिमटते राजनीतिक माहौल में एक सोची समझी रणनीति थी। उसके नेतृत्व को मालूम था कि अगर मुसलमान सकारात्मक नजरिये से इस समीकरण में शामिल होगा तो अपनी संख्या के बल पर वह अपनी बारगेनिंग पावर बढ़ा लेगा। इसलिए मनोवैज्ञानिक तौर पर उसे बैकफुट पर रखने के लिए जरूरी था कि उसे बार-बार बाबरी मस्जिद, दंगों, उर्दू जिसपर वह हारा और ठगा हुआ महसूस करता रहा है के इर्दगिर्द उसकी राजनीतिक बहसों को केंद्रित
किए रखा जाए। यानी यह उनके फियर साइकोसिस से खेलने की रणनीति थी। दूर की सोचने वाले संघ परिवार को इस ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति से कोई दिक्कत नहीं थी। क्योंकि वह देख रहा था कि मुसलमानों के वोट का इस्तेमाल करके यह राजनीति हिंदू धर्म के कमजोर तबकों को जो आरक्षण का लाभ
उठाकर आर्थिक तौर पर भी मजबूत हो रहा था, राजनीतिक तौर पर मजबूत कर रही है और उनके अंदर इस बिरादरी के चालाक इस्तेमाल के हुनर (जैसे कि वह मंडल कमीशन की रिर्पोट के लागू होने को सामाजिक न्याय बताता है लेकिन सच्चर कमेटी रिपोर्ट को वह मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति मानता है) को भी
विकसित कर रही है। उसे अपनी सोच पर दो कारणों से पूर्णविश्वास था। पहला, इन जातियों को वह बहुत पहले से मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक हिंसा में बहुत सफलतापूर्वक इस्तेमाल करता रहा है। मसलन, कुख्यात भागलपुर दंगे में दंगाईयों का सबसे बड़ा हिस्सा यादवों का था। दूसरा, उसे मालूम था कि
यादव-मुस्लिम गठजोड़ का जो सांस्कृतिक अपील है जो निश्चित तौर पर इस समीकरण में अपरहैंड पर रहने वाले यादवों की तरफ से हो रहा था, कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की तरह पिछड़े और दमित हिंदू थे जिन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था इसलिए यह एकता बननी चाहिए, संघ के वैचारिकी के ही अनुरूप थी।
उसका मुसलमानों या इसाईयों के बारे में हमेशा से यही मानना रहा है जिसे हाल के कथित ‘घरवापसी’ कार्यक्रमों में सुना जा सकता है। यानी संघ को मालूम था कि इस एकता का जो आधार बताया जा रहा है, उससे पिछड़ों में उसकी ही सांस्कृतिक धारणा जा रही है कि मुसलमान भी पहले उन्हीं की जमात के थे और यह एकता मुसलमानों को उनकी स्वतंत्र धार्मिक पहचान को खारिज करके बन रही है।
                                             यानी इस यादव-मुस्लिम एकता से हिंदुत्व और मजबूत हो रहा था। खास तौर से पहली बार वह इस एकता के जरिए पिछड़ों में किसी हिंसक कार्रवाई के बजाए राजनीतिक और रचनात्मक तरीके से घुसपैठ कर रहा था। यानी मंडल या हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति पिछड़ों में हिंदुत्व के सांस्कृतिक बीज बो रही थी, जिसे आगे चलकर साम्प्रदायिक हिंसा की परिघटना को गांव-गांव तक पहुंचाना और उसका नेतृत्व करना था। जैसा कि फैजाबाद समेत तमाम जगहों पर हुई मुस्लिम विरोधी हिंसा में होते हुए देखा गया या मुस्लिम विरोधी जनंसहार के सबसे बड़े चेहरे के राज्याभिषेक के दौरान देखा गया। यानी अफवाह के विपरीत मंडल की राजनीति ने कमंडल को रोका नहीं उसे गांव-गांव और पिछड़ी जातियों तक पहंुचाया। जहां स्वयं संघ उसे नहीं पहुंचा पाया था।
                                                 वहीं सियासी मोर्चे पर संघ देख रहा था कि हिंदुत्व की यह ‘बी’ टीम वह कर
सकती थी जो वह खुद अपने सवर्णवादी ढांचे के कारण नहीं कर सकती थी- वामपंथ का सफाया। क्योंकि जातीय अस्मिता पर सवार यह राजनीति पिछड़ों (और दलितों) पर जिनका वर्गीय तौर पर गरीब और शोषित होने के कारण वामपंथी पार्टियों के साथ लगाव था, वामपंथियों द्वारा सवर्ण नेतृत्व थोपने का आरोप लगाने लगीं। जिसने न सिर्फ वामपंथी पार्टियों के जनाधार को अपील किया बल्कि उसके नेतृत्व के भी पिछड़े नेताओं की एक जमात ने अपने को हिंदू सामाजिक न्याय की राजनीति का हिस्सा बना लिया। यहां गौरतलब है कि पिछड़ों की राजनीति ने तेजी से भाजपा में जाते पिछड़ों को रोकने के लिए भाजपा के सवर्ण नेतृत्व पर उतने तीखे सवाल नहीं उठाए। जिसने भाजपा के मुस्लिम विरोधी फासीवादी एजंेडे के संगठित और विचारधारात्मक प्रतिरोध को कमजोर कर दिया। क्योंकि अब धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले खेमे में धर्मनिरपेक्ष लोग नहीं थे वे पिछड़ी जातियों के ‘हिंदू’ थे जिनका संघ के मनुवाद से सिर्फ भागीदारी या समायोजन को लेकर बहस था, उसके मुस्लिम विरोधी साम्प्रदायिक एजेंडे से नहीं बल्कि वह तो उसका पुराना योद्धा था। यानी ‘हिंदू सामाजिक न्याय’ की राजनीति का यह धर्मनिरपेक्ष मोर्चा एक फिफ्थ काॅलम था, एक भीतरघात था। जिसके सैकड़ांे नहीं हजारों उदाहरण दिए जा सकते हैं।
                                               यानी मंडल की राजनीति ने बहुत पहले से ही ंिहंदुत्व के एजेंडे पर चलना
शुरू कर दिया था। जिसके दो रोचक उदाहरण देखे जा सकते हैं। पहला, सपा-बसपा ने 1993 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान जो नारा ‘मिले मुलायम कांशीराम-हवा में उड़ गए जयश्रीराम’ लगाया था फिर उसे दुबारा नहीं सुना गया। क्योंकि उन्हंे मालूम था कि इस नारे के साथ अब अपनी हिंदू बिरादरियों का वोट नहीं मिलने वाला और यह कोई धोखा नहीं था स्वाभाविक था क्योंकि हजारों साल के अन्याय का ‘मुआवजा’ ले लेने के बाद उस वृहद हिंदू अस्मिता में उसे विलीन होने की ओर ही बढ़ना था। दूसरा, जद (यू) के स्थापना कार्यक्रम में सबसे प्रमुख रूप से वल्लभभाई पटेल की तस्वीरंे लगाई गई थी, जो कट्टर हिंदुत्ववादी राजनीति के वाहक थे। जाहिर है ऐसा करके जद (यू) ने अपने हिंदू पिछड़े समुदाय को संदेश दे दिया था कि मुसलमानों के बारे में वह क्या सोच रखती है और उसे क्यों भाजपा के साथ जाने में कोई दिक्कत नहीं है।
                                                 इसीलिए जब सपा या बसपा ठाकुर या ब्राह्मण जातियों के सहयोग से सत्ता
चलाती हैं तो यह उनके द्वारा पिछड़ों या दलितों के वोटों का सवर्णों के आगे गिरवी रखा जाना नहीं है। यह हिंदू जातियों का स्वाभाविक गठजोड़ है। जिसे वर्गीय रूप से मजबूत होने के कारण सवर्ण नियंत्रित करते हैं और
जिसपर उनके जनाधार को कोई दिक्कत न हो इसके लिए अस्मितावादी हिंदुत्ववादी तर्क भी गढ़ लिए जाते हैं। मसलन, इस लेखक द्वारा बसपा के एक कार्यकर्ता से पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान यह पूछने पर कि बसपा ने तो ब्राह्मणों की पार्टी भाजपा के साथ सरकार बनाई थी पर उनका लावजवाब तर्क था कि
ब्राह्मणों को राजनीत में आज तक कोई धोखा नहीं दे पाया था, पहली बार बसपा ने उसे धोखा देकर यह ऐतिहासिक काम किया, जब उसने 6 महीने मुख्यमंत्री रह लेने के बाद जब भाजपा की बारी आई तो उसे धोखा दे दिया।
                                                     इसीलिए जब पिछड़ों-दलितों के बीच में संघ ने मोदी को उनकी पिछड़ी जाति की पहचान के साथ परोसा तो उसने उसे हाथों-हाथ लिया। क्योंकि उन्हें पहली बार ‘अपने’ आदमी के प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिल रहा था। उसके लिए यह कोई विचारणीय सवाल ही नहीं था कि वह उसके दंगाई चरित्र पर सोचे भी क्योंकि इसपर उसकी मोदी से वैचारिक असहमति नहीं थी। और इसीलिये सपा बसपा जैसी पार्टियों ने अपने जनाधार के बीच खुले तौर पर मोदी के दंगाई छवि को सवाल नहीं बनाया। बल्कि यह समझाने की कोशिश की कि भाजपा तो बनियों और ब्राह्मणों की पार्टी है जो वोट तो पिछड़े मोदी के नाम पर ले लेगी लेकिन प्रधानमंत्री किसी ठाकुर या पंडित को बना देगी। लेकिन उसने सपा-बसपा के इस तर्क को खारिज कर दिया, मोदी की मीडिया द्वारा बनाई गई छवि के कारण नहीं जैसा कि मुलायम, लालू, नितीश या मायावती बता रहे हैं। क्योंकि टीवी तो मुसलमान भी देखता है और अगर ऐसा होता तो मुसलमान भी मोदी प्रचार से प्रभावित होकर उन्हें ‘विकासपुरुष’ मान कर वोट दे देता। लेकिन ऐसा नहीं था इसीलिए उसने अपने पुराने मतदाता सहयोगी मुसलमानों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी और बिल्कुल किसी युद्ध की रणनीति की तरह उसे भ्रम में रखा कि वह तो ‘सेक्यूलर’ सपा या बसपा के साथ है और इसीलिए वह अपने को मीडिया द्वारा प्रभावित कर दिए जाने को छुपाता रहा, मध्यवर्गीय सवर्णाें की तरह अपने प्रभावित हो जाने को वोकल होकर नहीं बता रहा था। दरअसल, उसे मालूम था कि इस बार ‘संघ’ वही करेगा जो वह कह रहा है, उसे संघ पर पूरा भरोसा था। यह भरोसे और आत्मीयता का बहुत भावुक और चालाक मिलन था जिसकी जमीन मंडल
राजनीत ने पिछले 25 सालों में तैयार की थी। जिसे बहुत आसानी से अस्मितावादी बुद्धीजीवी भाजपा का डेमोक्रेटाइजेशन बताकर जायज ठहरा सकते थे। जैसाकि 2003 में मध्यप्रदेश में पहली बार उमा भारती जो अतिपिछड़ी जाति से आती हैं के मुख्यमंत्री बनने पर गेल ओम्बेट समेत कई अस्मितावादियों ने किया था, जब वे इसमें भाजपा के डेमोक्रेटाइजेशन की सम्भावना ढूंढने लगे थे। 2003 में यानी ठीक गुजरात दंगों के बाद जब पूरी दुनिया भाजपा को दुरदुरा रही थी तब इस तरह की सम्भावना की खोज आसान खोज नहीं थी। जाहिर है यह सम्भावना उन्हें इसीलिए दिखी कि उनके लिए डेमोक्रेसी का मतलब पिछड़ों और दलितों की सत्ता में भागीदारी से ज्यादा कुछ नहीं है। जो उन्हें इसलिए मिलना चाहिए कि शासन करने का वास्तविक हक
उनका था क्योंकि वे ही ‘मूलनिवासी’ हैं और वृहद् हिंदू आबादी में उनकी ही संख्या सबसे ज्यादा है जिनपर अल्पसंख्यक हिंदूओं ने कब्जा कर रखा था। मुसलमानों के जनसंहार से डेमोक्रेसी पर कोई फर्क नहीं पड़ता।
                      दरअसल, पिछड़ों की राजनीति नाम की कोई राजनीत ही नहीं होती वह हिंदुत्व की ही एक प्रतिक्रियावादी शाख होती है। क्योंकि राजनीति के लिए जरूरी विचारधारा, वैकल्पिक, सांस्कृतिक, आर्थिक नजरिया उसके पास नहीं होता। क्योंकि जाति संगठन तो हो सकती है लेकिन वह विचार नहीं हो सकता। जबकि हिंदुत्व हिंदुओं को आकर्षित कर सकने वाले संगठन के साथ-साथ एक विचार भी है। लिहाजा इस प्रतिक्रियावादी शाख को एक दिन मुख्यवृक्ष में विलीन हो ही जाना था।

-राजीव कुमार यादव

‘‘कांग्रेस मुक्त भारत’’ देश के लिए सार्थक या घातक-3

यहीं से प्रारम्भ हुआ देश में राजनैतिक अस्थिरता का माहौल। जनता पार्टी की हुकूमत का कार्यकाल मात्र ढाई साल चला। हुकूमत के पतन का कारण दो विपरीत विचारधाराओं के बीच आपसी सामंजस्य स्थापित न होना बना। जनसंघ का नाम बदल कर आर0एस0एस0 की सलाह व मदद से भारतीय जनता पार्टी बनी। आर0एस0एस0 उनसे रिश्ते तोड़ने की बात की तो उनका असली चेहरा सामने आ गया और उन्होंने सभा को त्यागना पसंद किया। आर0एस0एस0 से अपने रिश्ते नहीं तोड़े। उस समय अटल बिहारी ने कहा था कि आर0एस0एस0 हमारी जननी है कोई बेटा अपनी मां से रिश्ता कैसे तोड़ सकता है। परिणाम स्वरूप जनता पार्टी हुकूमत का पतन हो गया।
     1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में लोगांे ने फिर विश्वास प्रकट किया। मुस्लिम वोट जो आपातकाल के दौरान जबरी नसबंदी से नाराज था, वह भी पुनः इंदिरा गांधी पर विश्वास करते हुए कांग्रेस में वापस लौट आया। लेकिन कांग्रेस के बुरे दिनों के दौरान काली टोपी उतार कर सफेद टोपी पहने संजय गांधी की अनुभवहीनता का लाभ उठाकर नए कांग्रेसियों ने इंदिरा
गांधी जैसी समझदार व परिपक्व राजनेत्री को यह समझाने में कामयाबी हासिल कर ली कि पहली बार कांग्रेस मुस्लिम समर्थन के बगैर सभा में वापस आयी है इसलिए अगर वह खुलकर हिन्दू कार्ड खेले तो फिर उसे कोई सभा से कभी हिला न सकेगा। इंदिरा गांधी इस झांसे में आ गईं और वीर बहादुर सिंह, अरूण नेहरू व आरिफ मो0 खां जैसे कांग्रेसी लीडरों ने अपनी मजबूत पकड़ पी0एम0 कार्यालय में बना ली।
    उधर साम्राजी शक्तियांे ने जब देखा कि इंदिरा गांधी ने उनके इरादों को शिकस्त देकर उन्हें देश की सत्ता पर अपनी पिट्ठू शासकों को बिठा कर अपने उद्देश्यों की पूर्ति के उनके सपनों को ढेर कर दिया है तो उन्होंने अपने जियाउल हक के द्वारा संचालित आई0एस0आई0 व अमरीकी सी0आई0ए0 के द्वारा सिक्खों के भीतर खालिस्तान तहरीक की लहर को पैदा कर पंजाब में आतंकवाद की फसल को पनपाना शुरू कर दिया। इसका जवाब इंदिरा गांधी ने अपने मिजाज के मुताबिक दमन से दिया और आपरेशन ब्लू स्टार अभियान का नाम देकर सैन्य शक्ति से आतंक का प्रयाय बन चुके भिंडरवाला व उनके साथियों का नरसंहार अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में कर खालिस्तान तहरीक को कुचल डाला।
    परिणाम स्वरूप धार्मिक भावनाओं से आहत उन्हीं के सिक्ख सुरक्षा गार्डों ने उनके निवास स्थल पर गोलियों से भून कर उनकी हत्या कर दी। बात यहीं तक नहीं रुकी राजधानी देहली सहित कई राज्यों में सिक्खों के विरुद्ध हिन्दुओं के क्रोध ने हिंसा का रूप धारण कर लिया और उनकी हत्या व उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को लूटकर जलाने का कार्य उस वक्त तक जारी रहा जब तक राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री की शपथ ग्रहण कर शान्ति की अपील नहीं की। नेहरू इंदिरा के बाद कांग्रेस का क्या होगा की बात उठने लगी। अन्र्तराष्ट्रीय जगत में भी साम्राज्यवादी ताकतें उत्साहित थी कि अब राजनैतिक तौर पर अनुभवहीन राजीव गांधी को अपने हिसाब से वह कंट्रोल कर संचालित कर लेंगे। विदेशी मीडिया में उनकी खूब प्रशंसा रही। अमरीका के पहले दौरे पर उनके अमरीकी सदन के भाषण पर खूब तारीफों के पुल बांधे गए। वहीं कांग्रेस में मौजूद पूँजीवादी व साम्प्रदायिक सोच के लोगों ने राजीव को अपने काबू में कर उनसे गलत नीतियों पर अमल करवाना प्रारम्भ भी कर दिया। वर्षों से ठण्डे बस्ते में चले आ रहे बाबरी मस्जिद का ताला 1986 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह ने कोर्ट के रास्ते से आदेश प्राप्त कर खुलवा दिया। इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी नामक संस्था का वजूद, अमल में आ गया और मुहम्मद आजम खां, सैयद शहाबुद्दीन, उबैदउल्ला आजमी, अहमद बुखारी जैसे धुआंधार वक्ताओं का उदय यदि एक समुदाय से हुआ तो उसके जवाब में अशोक सिंघल, साध्वी ऋतम्भरा, साध्वी उमा भारती, साक्षी महाराज और महंत अवैद्यनाथ जैसे उत्तेजनात्मक व आपत्तिजनक भाषण देने वाले राजनेताओं ने भी भारतीय राजनीति में अपनी जगह बना ली। कार्यकाल मात्र दस माह का रहा, उसके पश्चात एक साल तक इन्द्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने रहे। फिर 1988 से 13 माह तक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एन0डी0ए0 सत्ता पर काबिज रही और 1998 के आम चुनाव में अटल बिहारी के नेतृत्व में एन0डी0ए0 ने 298 सीटें लेकर पूर्ण बहुमत प्राप्त किया और कांग्रेस अपने सहयोगियों को साथ लेकर केवल 136 सीटें ही ला पाई। कांग्रेस का बुरा हश्र तब हुआ जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान अपने हाथों में ली। कांग्रेस की हार पर सोनिया गांधी को भी निशाने पर लिया गया लेकिन सोनिया गांधी ने कठोर परिश्रम कर यहीं से प्रारम्भ हुआ देश में राजनैतिक अस्थिरता का माहौल। जनता पार्टी की हुकूमत का कार्यकाल मात्र ढाई साल चला। हुकूमत के पतन का कारण दो विपरीत विचारधाराओं के बीच आपसी सामंजस्य स्थापित न होना बना। जनसंघ का नाम बदल कर आर0एस0एस0 की सलाह व मदद से भारतीय जनता पार्टी बनी। आर0एस0एस0 उनसे रिश्ते तोड़ने की बात की तो उनका असली चेहरा सामने आ गया और उन्होंने सभा को त्यागना पसंद किया। आर0एस0एस0 से अपने रिश्ते नहीं तोड़े। उस समय अटल बिहारी ने कहा था कि आर0एस0एस0 हमारी जननी है कोई बेटा अपनी मां से रिश्ता कैसे तोड़ सकता है। परिणाम स्वरूप जनता पार्टी हुकूमत का पतन हो गया।
     1980 के आम चुनाव में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में लोगांे ने फिर विश्वास प्रकट किया। मुस्लिम वोट जो आपातकाल के दौरान जबरी नसबंदी से नाराज था, वह भी पुनः इंदिरा गांधी पर विश्वास करते हुए कांग्रेस में वापस लौट आया। लेकिन कांग्रेस के बुरे दिनों के दौरान काली टोपी उतार कर सफेद टोपी पहने संजय गांधी की अनुभवहीनता का लाभ उठाकर नए कांग्रेसियों ने इंदिरा
गांधी जैसी समझदार व परिपक्व राजनेत्री को यह समझाने में कामयाबी हासिल कर ली कि पहली बार कांग्रेस मुस्लिम समर्थन के बगैर सभा में वापस आयी है इसलिए अगर वह खुलकर हिन्दू कार्ड खेले तो फिर उसे कोई सभा से कभी हिला न सकेगा। इंदिरा गांधी इस झांसे में आ गईं और वीर बहादुर सिंह, अरूण नेहरू व आरिफ मो0 खां जैसे कांग्रेसी लीडरों ने अपनी मजबूत पकड़ पी0एम0 कार्यालय में बना ली।
    उधर साम्राजी शक्तियांे ने जब देखा कि इंदिरा गांधी ने उनके इरादों को शिकस्त देकर उन्हें देश की सत्ता पर अपनी पिट्ठू शासकों को बिठा कर अपने उद्देश्यों की पूर्ति के उनके सपनों को ढेर कर दिया है तो उन्होंने अपने जियाउल हक के द्वारा संचालित आई0एस0आई0 व अमरीकी सी0आई0ए0 के द्वारा सिक्खों के भीतर खालिस्तान तहरीक की लहर को पैदा कर पंजाब में आतंकवाद की फसल को पनपाना शुरू कर दिया। इसका जवाब इंदिरा गांधी ने अपने मिजाज के मुताबिक दमन से दिया और आपरेशन ब्लू स्टार अभियान का नाम देकर सैन्य शक्ति से आतंक का प्रयाय बन चुके भिंडरवाला व उनके साथियों का नरसंहार अमृतसर के स्वर्ण मंदिर परिसर में कर खालिस्तान तहरीक को कुचल डाला।
    परिणाम स्वरूप धार्मिक भावनाओं से आहत उन्हीं के सिक्ख सुरक्षा गार्डों ने उनके निवास स्थल पर गोलियों से भून कर उनकी हत्या कर दी। बात यहीं तक नहीं रुकी राजधानी देहली सहित कई राज्यों में सिक्खों के विरुद्ध हिन्दुओं के क्रोध ने हिंसा का रूप धारण कर लिया और उनकी हत्या व उनके व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को लूटकर जलाने का कार्य उस वक्त तक जारी रहा जब तक राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री की शपथ ग्रहण कर शान्ति की अपील नहीं की। नेहरू इंदिरा के बाद कांग्रेस का क्या होगा की बात उठने लगी। अन्र्तराष्ट्रीय जगत में भी साम्राज्यवादी ताकतें उत्साहित थी कि अब राजनैतिक तौर पर अनुभवहीन राजीव गांधी को अपने हिसाब से वह कंट्रोल कर संचालित कर लेंगे। विदेशी मीडिया में उनकी खूब प्रशंसा रही। अमरीका के पहले दौरे पर उनके अमरीकी सदन के भाषण पर खूब तारीफों के पुल बांधे गए। वहीं कांग्रेस में मौजूद पूँजीवादी व साम्प्रदायिक सोच के लोगों ने राजीव को अपने काबू में कर उनसे गलत नीतियों पर अमल करवाना प्रारम्भ भी कर दिया। वर्षों से ठण्डे बस्ते में चले आ रहे बाबरी मस्जिद का ताला 1986 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे वीर बहादुर सिंह ने कोर्ट के रास्ते से आदेश प्राप्त कर खुलवा दिया। इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी नामक संस्था का वजूद, अमल में आ गया और मुहम्मद आजम खां, सैयद शहाबुद्दीन, उबैदउल्ला आजमी, अहमद बुखारी जैसे धुआंधार वक्ताओं का उदय यदि एक समुदाय से हुआ तो उसके जवाब में अशोक सिंघल, साध्वी ऋतम्भरा, साध्वी उमा भारती, साक्षी महाराज और महंत अवैद्यनाथ जैसे उत्तेजनात्मक व आपत्तिजनक भाषण देने वाले राजनेताओं ने भी भारतीय राजनीति में अपनी जगह बना ली। कार्यकाल मात्र दस माह का रहा, उसके पश्चात एक साल तक इन्द्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने रहे। फिर 1988 से 13 माह तक भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एन0डी0ए0 सत्ता पर काबिज रही और 1998 के आम चुनाव में अटल बिहारी के नेतृत्व में एन0डी0ए0 ने 298 सीटें लेकर पूर्ण बहुमत प्राप्त किया और कांग्रेस अपने सहयोगियों को साथ लेकर केवल 136 सीटें ही ला पाई। कांग्रेस का बुरा हश्र तब हुआ जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान अपने हाथों में ली। कांग्रेस की हार पर सोनिया गांधी को भी निशाने पर लिया गया लेकिन सोनिया गांधी ने कठोर परिश्रम कर वह चाहे कांग्रेस हो या भारतीय जनता पार्टी क्योंकि आज भी भारतीय समाज अपने अतीत के आदर्शों के प्रति मन में सम्मान रखता है। धार्मिक सहिष्णुता आपसी मेल जोल, अमन शान्ति यहाँ के आम नागरिक के खून की
धरोहर है इसे थोड़े समय के लिए उत्तेजित कर बहकाया तो जा सकता है लेकिन अन्त में सुबह का भूला शाम को वापस जरूर आता है।
-तारिक खान
 मो.09455804309

लोकसंघर्ष पत्रिका  मार्च 2015  में प्रकाशित

रविवार, 15 मार्च 2015

'तमाशा-ए-घर वापसी:कितनी हकीकत कितना फसाना ?

Displaying Tanveer Jafri.jpgराष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उसके सहयोगी संगठन धर्म जागरण मंच ने इन दिनों देश में धर्म परिवर्तन कराए जाने का एक अभियान छेड़ रखा है। कहीं मुस्लिम तो कहीं ईसाई समुदाय से संबंध रखने वाले गरीबी रेखा से नीचे के लोगों को बीपीएल कार्ड बनावाए जाने अथवा नकद पैसे देकर उनका धर्म परिवर्तन कराए जाने की मुहिम को यह 'घर वापसी' का नाम दे रहे हैं। घर वापसी के इन योजनाकारों द्वारा यह बताया जा रहा है कि चूंकि हज़ारों वर्ष पूर्व भारत में रहने वाले मुसलमानों व ईसाईयों के पूर्वजों  द्वारा हिंदू धर्म त्यागकर इस्लाम व ईसाई धर्म स्वीकार किया गया था। लिहाज़ा अब इनके वंशजों की अपने ही मूल धर्म अर्थात् हिंदू धर्म में वापसी होनी चाहिए।  प्रोपेगंडा के तौर पर इन्होंने देश में कई स्थानों पर हवन आदि कर कुछ ऐसे कार्यक्रम भी आयोजित किए जिनके बारे में यह प्रचारित किया गया कि यह 'घर वापसी' के कार्यक्रम थे जिनमें सैकड़ों मुस्लिम परिवारों के सदस्यों ने पुन: हिंदू धर्म अपनाया। हालांकि बाद में इस कार्यक्रम में कथित रूप से 'घर वापसी' करने वाले कई लोगों द्वारा यह भी बताया गया कि उन्हें किस प्रकार नकद धनराशि का लालच देकर व उनके बीपीएल के पीले कार्ड बनवाने का भरोसा दिलाकर उन्हें हिंदू बनने तथा हवन में बैठने के लिए तैयार किया गया। हालांकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एजेंडों को राजनैतिक जामा पहनाने वाली भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद इस प्रकार की और भी कई सांप्रदायिकतापूर्ण विवादित बातें सुनाई दे रही हैं। परंतु धर्म परिवर्तन अथवा उनके शब्दों में 'घर वापसी' जैसे मुद्दे ने भारतीय मुसलमानों व ईसाईयों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि धर्मनिरपेक्ष संविधान पर संचालित होने वाली देश की सत्ता का चेहरा क्या अब धर्मनिरपेक्षता से अलग हटकर हिंदुत्ववादी होने जा रहा है? या फिर इस तरह की बातें प्रचारित करने के पीछे केवल यही मकसद है कि ऐसे विवादित बयान देकर तथा सांप्रदायिकता का वातावरण कायम रखकर देश के हिंदू मतों का ध्रुवीकरण कर सत्ता में स्थायी रूप से बने रहने के उपाय सुनिश्चित किए जा सकें?

                घर वापसी के नायकों द्वारा कहा जा रहा है कि छठी शताब्दी के बाद भारत में आक्रमणकारी मुगल शासकों द्वारा बड़े पैमाने पर भय फैलाकर धर्म परिवर्तन कराया गया। यदि इनकी बातों को सही मान भी लिया जाए तो भी क्या हज़ारों वर्ष पूर्व आज के मुसलमानों के पूर्वजों द्वारा जो धर्म परिवर्तन किया गया था आज उनके वंशज अपने पूर्वजों के फैसलों का पश्चाताप करते हुए पुन: हिंदू धर्म में वापस जाने की कल्पना कर सकते हैं? इस विषय को और आसानी से समझने के लिए हमें वर्तमान सांसारिक जीवन के कुछ उदाहरणों से रूबरू होना पड़ेगा। मिसाल के तौर पर यदि किसी गांव का कोई व्यक्ति शहर में जाकर किसी कारोबार या नौकरी के माध्यम से अपना जीवकोपार्जन करता है और वह शहर में ही रहकर अपने बच्चो  की परवरिश,उसकी पढ़ाई-लिखाई करता है तथा उसे शहरी संस्कार देता है तो क्या भविष्य में उस शहर में परवरिश पाने वाले उसके बच्चो अपने पिता के स्थाई निवास यानी उसके गांव से कोई लगाव रखेंगे? ज़ाहिर है आज देश में करोड़ों परिवार ऐसे हैं जो अपनी रोज़ी-रोटी के लिए गांवों से शहरों की ओर आए और वहीं बस गए। परिवार का वह बुज़ुर्ग भले ही अपने अंतिम समय में अपने गांव वापस क्यों न चला जाए परंतु उसकी अगली पीढ़ी शहर में ही रहकर अपना जीवन बसर करना मुनासिब समझती है। सिर्फ इसलिए कि उसके संस्कार शहरी हैं। इसी प्रकार जो भारतीय लोग विदेशों में जा बसते हैं और वहीं उनके बच्चो पैदा होते हैं वे बच्चो भारत में आकर रहना व बसना कतई पसंद नहीं करते। क्योंकि उनके संस्कार विदेशी हैं। एक विवाहित महिला अपने विवाह पूर्व के संस्कार नहीं छोडऩा चाहती क्योंकि उसका पालन-पोषण युवावस्था तक उसके अपने मायके में हुआ होता है। उसे वहीं के संस्कार अच्छे लगते हैं। इसी प्रकार गांव के बुज़ुर्गों को कभी-कभार किसी कारणवश शहर आना पड़े तो उन्हें शहर की तेज़रफ्तार  जि़ंदगी,यहां का शोर-शराबा,प्रदूषण,अफरा-तफरी का माहौल यह सब रास नहीं आता। क्योंकि उनके संस्कार गांव के शांतिपूर्ण,प्रदूषणमुक्त व परस्पर सहयोग व सद्भाव के हैं।

                        सवाल यह है कि जब बीस-पच्चीस  और सौ साल के संस्कारों को और वह भी सांसारिक जीवन के संस्कारों को आप बदल नहीं सकते फिर आज सैकड़ों और हज़ारों वर्ष पूर्व विरासत में मिले धार्मिक संस्कारों को कैसे बदला जा सकता है? और वह भी ऐसे धार्मिक संस्कार जिनकी घुट्टी प्रत्येक धर्म के माता-पिता द्वारा अपने बच्चो को पैदा होते ही पिलानी शुरु कर दी जाती हो? शहर में रहने वाले किसी जीन्सधारी युवक से यदि आप कहें कि वह अपने दादा की तरह लुंगी या धोती पहनने लगे तो क्या वह युवक उस लिबास को धारण कर सकेगा? कतई नहीं। क्या आज बच्चो को स्लेट व तख्ती  पर पुन: पढ़ाया जा सकता है? हरगिज़ नहीं। कहने का तात्पर्य यह कि समाज का कोई भी वर्ग पीछे मुड़कर न तो देखना पसंद करता है और न ही इसकी कोई ज़रूरत है। फिर आखिर  घर वापसी के नाम पर धर्म परिवर्तन कराए जाने के पाखंड का मकसद यदि सत्ता पर नियंत्रण नहीं तो और क्या है? इसी घर वापसी से जुड़ा एक और सवाल घर वापसी के इन योजनाकारों से यह भी है कि आखिर इसकी सीमाएं निर्धारित करने का अधिकार किसको किसने दिया? क्या सिर्फ मुसलमानों और ईसाईयों की ही घर वापसी से हिंदू धर्म का उत्थान हो जाएगा? आखिर सिख धर्म भी तो हिंदू धर्म की ही एक शाखा  है। सिखों के पहले गुरु नानक देव जी के पिता कालू राम जी भी तो हिंदू ही थे? फिर आखिर सिखों की घर वापसी कराए जाने का साहस क्यों नहीं किया जाता? महात्मा बुद्ध भी हिंदू परिवार में जन्मे थे। आज उनके करोड़ों अनुयायी बौद्ध धर्म का अनुसरण करते दिखाई दे रहे हैं। कई देशों में बौद्ध धर्म के लोग बहुसंख्या  में हैं। क्या यह सांस्कृतिक राष्ट्रवादी उनकी घरवापसी के भी प्रयास कभी करेंगे? चलिए यह बातें तो फिर भी सैकड़ों साल पुरानी हो चुकी हैं। परंतु अभी कुछ ही दशक पूर्व संघ के मुख्यालय नागपुर के ही एक विशाल पार्क में बाबासाहब डा0 भीमराव अंबेडकर के लाखों समर्थकों द्वारा हिंदू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया गया था। क्या उनकी घर वापसी भी कराई जाएगी? और एक सवाल यह भी कि क्या सिख धर्म की उत्पत्ति,बौद्ध धर्म का अस्तित्व में आना, देश के लाखों दलितों द्वारा बौद्ध धर्म में शामिल होना इस सब के पीछे भी क्या किसी आक्रांता मु$गल शासक की तलवार का योगदान था? क्या इन लोगों ने भी भयवश या लालचवश इन गैर हिंदू धर्मों का दामन थामा था?

                कुल मिलाकर घर वापसी के नाम पर छेड़ी गई यह मुहिम महज़ एक प्रोपेगंडा रूपी राजनैतिक मुहिम है जो हिंदू धर्म के सीधे-सादे व शरीफ लोगों के बीच में स्वयं को हिंदू धर्म का शुभचिंतक जताने व चेताने के लिए छेड़ी गई है। कभी इन्हें पांच व दस बच्चो  पैदा कर हिंदू धर्म को बचाने जैसी भावनात्मक अपील कर इन को जागृत करने के नाम पर स्वयं को हिंदू धर्म का हितैषी दिखाने का प्रयास किया जाता है तो कभी मुसलमानों के चार पत्नियां व चालीस बच्चो होने जैसे झूठी अफवाहें फैलाकर हिंदू धर्म के लोगों में अपनी पैठ मज़बूत की जाती है। आश्यर्च की बात तो यह है कि हिंदुत्व का दंभ भरने वाले इन्हीं तथाकथित हिंदुत्ववादी नेताओं में ऐसे कई नेता मिलेंगे जिनके बेटों व बेटियों ने मुस्लिम परिवारों में शादियां रचा रखी हैं। गोया व्यक्तिगत रूप से तो यह अपना पारिवारिक वातावरण सौहाद्र्रपूर्ण रखना चाहते हैं जबकि मात्र हिंदू वोट बैंक की खातिर समाज को धर्म के आधार पर विभाजित करने में लगे रहते हैं। अन्यथा यदि इनका मिशन घर वापसी वास्तव में हिंदू धर्म के कल्याण अथवा हिंदू हितों के लिए उठाया गया कदम होता तो इन्हें अपने इस मिशन की शुरुआत गऱीब मुसलमानों अथवा ईसाईयों को पैसों की लालच देकर या उनके पीले कार्ड बनवाने की बात करके नहीं बल्कि सबसे पहले इन्हें अपनी पार्टी के केंद्रीय मंत्रियों नजमा हेपतुल्ला,मुख़्तार  अब्बास नकवी तथा शाहनवाज़ हुसैन जैसे पार्टी नेता की तथाकथित 'घर वापसी' कराकर करनी चाहिए न कि गरीबों के बीच अपना पाखंडपूर्ण 'घर वापसी' का दुष्प्रचार करके? देश के लोगों को ऐसे दुष्प्रचारों से सचेत रहने की ज़रूरत है। देश का तथा देश के सभी धर्मों व समुदाय के लोगों का कल्याण तथा राष्ट्र की प्रगति इसी में निहित है कि सभी देशवासी मिलजुल कर रहें,एक-दूसरे के धर्मों व उनकी धार्मिक भावनाओं तथा उनके धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान करें। घर वापसी जैसे ढोंग तथा नाटक से किसी को भयभीत होने या घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह मुहिम हकीकत से कोसों दूर है। और इस मुहिम को महज़ एक फसाना अथवा राजनीति से परिपूर्ण स्क्रिप्ट ही समझा जाना चाहिए।
-तनवीर जाफरी    

शनिवार, 14 मार्च 2015

दलित की नाक कटने पर चुपक्यों ------------------दलित राजनीति

Displaying anil yadav pic.jpgजालौन जिले के सुरपति गांव के अमर सिंह दोहरे उस वक्त चर्चा में आए जब यह मामला सामने आया कि उच्च जाति के लोगों के साथ खाना खा लेने के बाद उनकी नाक काट ली गई। उच्च जाति के लोगों ने दोहरे की नाक इसलिए काट ली कि उनकेसाथ खाना खाने की वजह से समाज में उनकी नाक कट गई थी। यह घटना उत्तर प्रदेश के उस दलित बाहुल्य गांव की है जिसमें दलित आबादी पचास फीसदी से अधिक है। वैसे तो न सिर्फ यह बुंदेलखंड या फिर यूपी ही नहीं बल्कि देश की ऐसी घटनाओं के लिए जाना जाता है बस फर्क इतना सा है कि इन घटनाओं पर देश ‘शर्मसार’ होकर इंडिया गेट पर ‘कैंडिल’ नहीं जलाता है। पर जिस बुंदेलखंड क्षेत्र को एसटी/एससी आयोग ने भी दलित ंिहंसा के लिए अति संवेदनशील घोषित किया है उस प्रदेश में यह कैसा ‘समाजवाद’ या फिर ‘बहुजनवाद’ पल रहा है, इसकी तफ्तीश जरूरी हो जाती है। क्योंकि यहां यह तर्क भी नहीं टिकता कि दलित या फिर पिछड़ा सत्ता को नियंत्रित नहीं कर रहा है।
                                                                           ठीक इसी दौर में उस राजनीति जिसके खिलाफ गोलबंद होने के नारे के साथ ‘सामाजिक न्याय’ की राजनीति सत्ता के शिखर पर पहुंची हैं उसी ने पिछले दिनों अछूतों को धर्मयोद्धा करार देते हुए ‘कोई नहीं दलित-अछूत, सब हैं भारत माता के सपूत’ का नारा दिया। विहिप नेता अशोक सिंघल द्वारा फरवरी 2015 में इलाहाबाद के विहिप सम्मेलन से किया यह आह्वान हो या फिर 1983
में भाजपा के समरसता आंदोलन के दौरान कालाराम मंदिर के पुजारी का दलितों के प्रति अपने पूर्वजों के व्यवहार पर मांफी मांगने की परिघटना स्पष्ट संकेत देती हैं कि हिन्दुत्वादी राजनीति दलितों को समाहित करने के लिए हर स्तर पर समरस हो सकती है। जिस कालाराम मंदिर में प्रतिरोध स्वरूप जब अंबेडकर के नेतृत्व में दलितों के प्रवेश के वक्त उनकी हत्याएं की जाती हैं उस मंदिर के इस लचीलेपन पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
                                                      यह तब और जरूरी हो जाता है जब यूपी में बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्या गोबर-गणेश की पूजा को अंधविश्वास व आडंबर बताते हुए नकारते हैं तो बसपा की सुप्रिमो मायावती इसे मौर्या के निजी विचार कहते हुए किनारा कर लेती   हैं। यह सब उस उत्तर प्रदेश में हो रहा है जहां इसी बुंदेलखंड में सितंबर 2014 में झांसी के एक दलित युवक को उच्च जाति के लोगों ने मल-मूत्र ही नहीं खिलाया बल्कि उस युवक के प्राइवेट पार्ट में आग भी लगा दिया। यह सवाल हो या फिर ऐसे बहुतेरे सवाल इन सवालों को न उठाने के पीछे ठोस विचार काम करता है। बहरहाल, दलितों, आदिवासियों व अल्पसंख्यकों के    लोकतांत्रिकअधिकारों के लिए लड़ने वाले संगठन रिहाई मंच ने इस सवाल को न सिर्फ उठाया बल्कि फरवरी में विधानसभा सत्र के दौरान ‘इंसाफ दो’ धरना देकर अमर सिंह दोहरे के इंसाफ की मांग की। पर सवाल यह है कि सामाजिक न्याय और दलित राजनीति की जुगाली करने वाले नेता अंधविश्वास व रूढि़वादी विचारों के खिलाफ उस दौर में चुप्पी साध रखे हैं जब नरेन्द्र दाभोलकर और गोविंद पंसारे की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी
जाती है कि वह उन दकियानूस विचारों के खिलाफ सशक्त जनप्रतिरोध खड़ा करते हैं। इसके विपरीत जिस दूसरी राजनीति ‘तिलक, तराजू और तलवार’ को जूते मारने की बात कहकर व्यापक दलित समाज को संबोधित करते हुए सत्ता का सफर तय किया वह ‘गोबर-गणेश’ के सहारे सोशल इंजीनियरिंग कर रही है। 2012 के विधानसभा चुनावों में एक बसपा नेता ने तर्क दिया कि भारतीय राजनीति कीमुख्यधारा से दलित और ब्राह्मण कटे रहे हैं, इसलिए यह गठजोड़ जरूरी है।
                                       दलित अस्मिताओं की राजनीति अपने इतिहासबोध से कोसों दूर मनुवादी व्यवस्था
में ही अपने अस्तित्व की तलाश कर रही है। एक तरफ दलित नेता अपनी अस्मिताओं का रोना रोते हैं, वहीं जब सवाल दलित उत्पीड़न का आता है तो वोट बैंक की राजनीति का पहाड़ा पढ़ाने लगते हैं। वस्तुतः दलित राजनीति अपने अपमानबोध से संघर्षों की यात्रा को भुला चुकी है। तभी तो दल राजनीति का खुद को अगुवा बताने वाले ‘लाल फीता धारियों’ के वर्चस्व वाले संगठन भी दलित हिंसा पर चुप्पी साध लेते हैं और अपना दायित्व जनपदीय, प्रादेशिक व राष्ट्रीय सम्मेलनों तक ही सीमित रखते हैं। जब व्यवहारिक  राजनीति की बात आती है तो सरकारी नौकरी की दलील देते हुए और उसमें बना रहना ‘दलित समाज’ के लिए कितना जरूरी है, कहते हुए प्रतिरोध की संस्कृति को नकार देते हैं। वह जरूर मूल निवासियों के गौरवशाली इतिहास का प्रवचन करते हैं पर उस इतिहास के व्यवस्था विरोधी तेवर को वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ न खड़ा हो इसका हर संभव प्रयास करते हैं। ऐसा इसलिए कि उनका अस्तित्व बरकरार रहे।
                                                           एक तरफ जब देश ‘नमामि गंगे’ में मशगूल है तो वहीं इसकी कर्ता धर्ता और बुंदेलखंड इलाके से ही सांसद उमा भारती के निर्वाचन क्षेत्र में एक दलित की इसलिए हत्या कर दी जाती है कि उसने उन सामंती तत्वों की पार्टी को वोट नहीं दिया था। ऐसे में आदर्श गांव की जो परिपाटी देश में रचने की कोशिश की जा रही है उसकी जमीनी हकीकत कुछ और ही है। अब सवाल यह है कि क्या केन्द्र सरकार संघ के ‘आदर्श ग्राम’ के एजेंण्डे पर तो काम नहीं कर रही है? आरएसएस के पास आदर्श ग्रामों को स्थापित करने का एक पुरातनपंथी खाका है। जिसमें दलितों और पिछड़ों का सैन्यीकरण करते हुए उनको उच्च जातियों का रक्षक अथवा हिंदू धर्म का योद्धा बताया जाता है। यदि उत्तर भारत में संघ द्वारा प्रचारित धारणाओं पर गौर करें तो पूरा मामला साफ हो जाता है। उदाहरण के तौर पर दलित जातियों के बाल्मीकी और पासी समुदाय को लिया जा सकता है। बाल्मीकी समुदाय को संघ परिवार ने क्षत्रिय बताते हुए यह धारणा
गढ़ी है कि वे उन्होंने मुसलमान बनना नहीं स्वीकार किया भले ही इसके एवज में उनसे मल-मूत्र साफ करवाया जाने लगा। ठीक इसी तरह पासी जाति को सूअर पालन की नसीहत जमीनी स्तर पर संघ परिवार के नेताओं द्वारा दी जाती रही है। ताकि पहले की तरह वह सूअर पालन करके आदर्श ग्रामों की मुसलमानों से रक्षा करें। 2014 लोकसभा का चुनाव इस बात की पुष्टि करता है कि संघ परिवार और भाजपा का यह अस्मिताओं का मायाजाल इस तरह फैल चुका है जिसका कोई काट दलित राजनीति के पास नहीं है।
                                            कमण्डल की राजनीति के गर्भ से उपजी अस्मिताओं की राजनीति के पास शायद अब नैतिक साहस भी नहीं बचा है कि वह दलित हिंसा पर अपना प्रतिरोध दर्ज करा पाए। इसीलिए अमर सिंह दोहरे की नाक काटे जाने पर अस्मितावादी राजनीति आपराधिक चुप्पी साधे हुये है।
 -अनिल कुमार यादव

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

राजनीति की बिसात पर पवित्र गाय का मांस

क्या समाज के किसी वर्ग की खानपान की आदतों को राजनीति का विषय बनाया जा सकता है ? क्या कोई पशु, जिसे  समाज का एक तबका, माता की तरह पूजता हो, राजनीति की बिसात का मोहरा बन सकता है? यद्यपि यह अकल्पनीय लगता है परंतु यह सच है कि गाय, भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है। महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा  पारित 'महाराष्ट्र पशु संरक्षण ;संशोधन  विधेयक 1995' को हाल में राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल गई। इस नए कानून के अंतर्गत, गाय के अलावा बैलों का वध भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस कानून का उल्लंघन करने वालों को पांच साल तक की कैद और 10 हजार रूपये तक के जुर्माने से दंडित किया जा सकेगा। जब मैंने विधेयक के शीर्षक में शामिल'पशु संरक्षण' शब्दों को पढ़ा तो मुझे लगा कि यह उन सभी पशुओं के बारे में होगा, जिनका भक्षण मानव करते हैं और या फिर यह समाज द्वारा जानवरों के विभिन्न गतिविधियों में इस्तेमाल से संबंधित होगा। परंतु आगे पढ़ने पर मुझे यह ज्ञात हुआ कि यह कानून केवल गौवंश पर लागू होगा। लगभग एक दशक पहले, मुझे यह पढ़कर बहुत धक्का लगा था कि प्राचीन भारतीय इतिहास के अनन्य अध्येता प्रोफेसर द्विजेन्द्र नाथ झा को फोन पर कई लोगों ने यह धमकी दी कि अगर उन्होंने उनकी पुस्तक 'होली काउ बीफ इन इंडियन डायटरी ट्रेडिशन' ;भारतीय खानपान परंपरा में पवित्र गाय का मांस को प्रकाशित किया तो उन्हें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। यह विद्वतापूर्ण पुस्तक,भारतीय खानपान में गौमांस भक्षण की सदियों पुरानी परंपरा पर केन्द्रित है।
जाहिर है कि नए कानून का उद्धेश्य गौमांस भक्षण और गौवध के बहाने अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना है। सन्  2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान जो कई नारे उछाले गए थे उनमें से दो थे, 'मोदी को मतदान, गाय को जीवनदान' और'बीजेपी का संदेश, बचेगी गायए बचेगा देश'। ये नारे भाजपा के 'गौ विकास प्रकोष्ठ' द्वारा गढ़े गए थे।
धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति में इस तरह के भावनात्मक व पहचान से जुड़े मुद्दों का इस्तेमाल आम है। हम सब जानते हैं कि किस प्रकार भाजपा ने पहचान से जुड़े एक अन्य मुद्दे.राममंदिर.का इस्तेमाल कर अपनी राजनैतिक ताकत बढ़ाई थी। गाय,लंबे समय से संघ.भाजपा की राजनीति का हिस्सा रही है। गौवध के मुद्दे पर सैकड़ों दंगे भड़काए गए हैं। सन् 1964 में आरएसएस द्वारा विश्व हिन्दू परिषद के गठन के बाद से, योजनाबद्ध तरीके से गाय का मुद्दा समय.समय पर उठाया जाता रहा है। गाय और गौमांस भक्षण के संबंध में कई गलत धारणाएं प्रचारित की जाती रही हैं। गौमांस भक्षण को मुस्लिम समुदाय से जोड़ना, इनमें से एक है। मुसलमानों के एक वर्ग 'कसाईयों' को घृणा का पात्र बना दिया गया है। इस तरह की बातें कही जाती रही हैं जिनसे यह भ्रम होता है कि गौमांस भक्षण, मुसलमानों के लिए अनिवार्य है। समाज के एक बड़े वर्ग में यह धारणा पैठ कर गई है कि चूंकि गाय हिन्दुओं के लिए पवित्र है इसलिए मुसलमान उसका वध करते हैं। यह भी कहा जाता है कि गौमांस भक्षण की परंपरा भारत में मुस्लिम आक्रांताओं ने स्थापित की। ये सभी धारणाएं तथ्यों के विपरीत हैं परंतु फिर भी समाज का एक बड़ा हिस्सा इन्हें सही मान बैठा है।
इन मिथकों का निर्माण शनैः.शनैः किया गया। गौमांस से जुड़े मुद्दों को लेकर गायों के व्यापारियों और दलितों के खिलाफ साम्प्रदायिक हिंसा की खबरें आती रहती हैं। गाय का इस्तेमाल समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया जाता रहा है। गायों की खाल का व्यापार करने वाले दलितों की हरियाणा के गोहाना सहित कई स्थानों पर हत्या की घटनाएं हुई हैं और विहिप के नेताओं ने इन हत्याओं को औचित्यपूर्ण ठहराया है।
सच यह है कि गौमांस भक्षण और गायों की बलि देने की परंपरा भारत में वैदिक काल से थी। कई धर्मग्रंथों में यज्ञों के दौरान गाय की बलि देने का जिक्र है। अनेक पुस्तकों में गौमांस भक्षण का जिक्र भी है। तेत्रैय ब्राह्मण का एक श्लोक कहता है 'अथो अन्नम विया गऊ' ;गाय सच्चा भोजन है  । अलग.अलग देवताओं को अलग.अलग किस्म का गौमांस पसंद था। प्रोफेसर डीएन झा ने अपनी उत्कृष्ट कृति में इस तरह के कई उदाहरणों को उद्वत किया है।
भारत में अहिंसा की अवधारणा कृषि आधारित समाज के विकास के साथ आई। जैन धर्म हर प्रकार की हिंसा के खिलाफ था। बौद्ध धर्म भी अहिंसा का पैरोकार व पशु बलि का विरोधी था। इन धर्मों द्वारा प्रतिपादित अहिंसा के सिद्धांत की प्रतिक्रिया स्वरूप व उसके प्रतिउत्तर में, काफी बाद में, ब्राह्मणवाद ने गाय को अपने प्रतीक के रूप में अंगीकार किया। चूंकि ब्राह्मणवाद स्वयं को हिन्दू धर्म के पर्याय के रूप में प्रचारित करना चाहता था इसलिए उसने यह प्रचार करना शुरू कर दिया कि गाय सभी हिन्दुओं के लिए पवित्र और पूजनीय है। सच यह है कि समाज के कई वर्ग, विशेषकर दलित और आदिवासी, लंबे समय से गौमांस भक्षण करते आए हैं। यह अलग बात है कि हिन्दुत्व के बढ़ते प्रभाव के चलते कई समुदायों, जिनके लिए गौमांस प्रोटीन का समृद्ध व सस्ता स्त्रोत था, को इसे छोड़ने या छोड़ने पर विचार करने के लिए बाध्य किया जा रहा है।
भाजपा और उसके संगी.साथियों के दावों के विपरीतए स्वामी विवेकानंद ने अमेरिका में एक बड़ी सभा में भाषण देते हुए कहा थाए 'आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्राचीनकाल में विशेष समारोहों में जो गौमांस नहीं खाता था उसे अच्छा हिंदू नहीं माना जाता था। कई मौकों पर उसके लिए यह आवश्यक था कि वह बैल की बलि चढ़ाए और उसे खाए' 'शेक्सपियर क्लब, पेसेडीना, कैलीर्फोनिया में 2 फरवरी 1900 को'बौद्ध भारत' विषय पर बोलते हुए 'द कम्पलीट वर्क्स ऑफ स्वामी विवेकानंद', खण्ड 3, अद्वैत आश्रम, कलकत्ता, 1997 पृष्ठ 536
                                         स्वामी विवेकानंद द्वारा स्थापित रामकृष्ण मिशन द्वारा प्रायोजित कई अन्य अनुसंधान परियोजनाओं ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है। इनमें से एक में कहा गया है 'ब्राह्मणों सहित सभी वैदिक आर्य, मछली, मांस और यहां तक कि गौमांस भी खाते थे। विशिष्ट अतिथियों को सम्मान देने के लिए भोजन में गौमांस परोसा जाता था। यद्यपि वैदिक आर्य गौमांस खाते थे तथापि दूध देने वाली गायों का वध नहीं किया जाता था। गाय को 'अघन्य' ;जिसे मारा नहीं जाएगा  कहा जाता था परंतु अतिथि के लिए जो शब्द प्रयुक्त होता था वह था 'गोघ्न' ;जिसके लिए गाय को मारा जाता है  । केवल बैलों, दूध न देने वाली गायों और बछड़ों को मारा जाता था। 'सुनीति कुमार चटर्जी व अन्य द्वारा संपादित 'द कल्चरल हेरीटेज ऑफ इंडिया'खण्ड.1m प्रकाशक रामकृष्ण मिशन, कलकत्ता में सी कुन्हन राजा का आलेख'वैदिक कल्चर', पृष्ठ 217
महाराष्ट्र सरकार के विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिलने के पश्चात्, मुंबई के देवनार बूचड़खाने के हजारों श्रमिकों, जो इसके कारण अपना रोजगार खो बैठेंगे, ने 11 मार्च को इसके खिलाफ जोरदार प्रदर्शन किया। अलग.अलग धर्मों के कई व्यवसायी महाराष्ट्र सरकार के इस साम्प्रदायिक कदम का विरोध करने के लिए मुंबई के आजाद मैदान में एकत्रित हुए।  नए कानून के खिलाफ बंबई उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें यह कहा गया है कि गौमांस पर प्रतिबंध, नागरिकों के अपना भोजन चुनने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है।
हमें आशा है कि समाज, राजनैतिक लक्ष्य पाने के लिए किए पहचान से जुड़े इस तरह के मुद्दों के दुरूपयोग को रोकने के लिए आगे आएगा। लोगों को क्या खाना चाहिए और क्या नहीं, यह उनपर छोड़ दिया जाना चाहिए और मांस के व्यवसाय से जुड़े श्रमिकों और व्यवसायियों से उनकी रोजी.रोटी नहीं छीनी जानी चाहिए।
-राम पुनियानी

गुरुवार, 12 मार्च 2015

ज़िंदगी जिस धुन में जी, मौत से भी पानसरे ने वही काम लिया



                      
Displaying SAM_0914.JPGनई दिल्ली । महाराष्‍ट्र के कोल्‍हापुर में हाल में 16 फरवरी को अज्ञात हमलावरों की गोलियों का शिकार हुए कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के वरिष्‍ठ नेता कॉमरेड गोविंद पानसारे की याद में दिल्ली में श्रद्धांजलि सभा आयोजित की गई। आईटीओ स्थित हिंदी भवन में जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज़ और ऑल इंडिया स्‍टूडेंट्स फेडरेशन की ओर से आयोजित इस स्‍मृति सभा में महाराष्‍ट्र सीपीआई के सचिव डॉ. भालचंद्र कानगो, दिल्‍ली से वरिष्‍ठ पत्रकार प्रफुल्‍ल बिडवई, सांप्रदायिकता और फासीवाद के खिलाफ लगातार काम कर रहे मुंबई आईआईटी के पूर्व  प्रोफेसर राम पुनियानी सहित न्‍यू एज अखबार के संपादक शमीम फैजी ने पानसरे को याद किया और वर्तमान राजनीति और चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए।
इस मौके पर महाराष्‍ट्र के सीपीआई सचिव डॉ भालचंद्र कानगो ने डॉ कॉमरेड पानसरे को याद करते हुए क‍हा कि उन्‍होंने कोई चुनाव नहीं लड़ा था, लेकिन वे जनता में बहुत लोकप्रिय थे और समाज के हर वर्ग का प्‍यार और समर्थन उन्‍हें मिला। उन्‍होंने कहा कि पानसरे समाज के हर वर्ग की समस्‍या को सुलझाने, समझने के लिए  तैयार रहते थे। यह बड़ी बात है कि उनकी हत्‍या पर महाराष्‍ट्र के मुख्‍यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस बात को स्‍वीकार किया कि कामरेड पानसरे की हत्‍या के पीछे प्रतिक्रियावादी ताकतों सहित पूरी व्‍यवस्‍था जिम्‍मेदार है। उन्‍होंने कहा कि कॉमरेड पानसरे हमेशा विचारों की लड़ाई लड़ते थे, उन्‍होंने तकरीबन 21 किताबें लिखीं और उनमें सबसे ज्‍यादा चर्चित महाराष्‍ट्र के इतिहास पुरुष छत्रपति शिवाजी पर लिखी किताब हुई। शिवाजी कौन है? नाम से लिखी पुस्‍तक में उन्‍होंने शिवाजी के बारे में सांप्रदायिक ताकतों द्वारा फैलाए गए झूठ के सच को सामने लाने की कोशिश की। उन्‍होंने कहा कि उनकी इस किताब की तकरीबन डेढ़ लाख से ज्‍यादा प्रतियां बिक चुकी है। उन्‍होंने कॉमरेड पानसरे के साथ अपने कई संस्‍मरणों को याद करते हुए कहा कि वे अजातशत्रु थे। डॉ. कानगो ने कहा कि पानसरे की मृत्यु से महाराष्ट्र की राजनीति में बिखरे हुए तमाम वामपंथी समूह, दलित व् आदिवासी जुड़े हैं। पानसरे देह से भले अस्सी के हो गए हों लेकिन रचनात्मकता और उत्साह उनका भरपूर युवा था।
कॉमरेड पानसरे की शहादत पर श्रद्धांजलि देते हुए सीपीआई नेता, और मध्‍य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी ने वरिष्‍ठ साहित्‍यकार, लेखक और पत्रकार विष्‍णु खरे और जोशी इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल स्‍टडीज के प्रेसिडेंट श्री एस. पी. शुक्‍ला के संदेश पढ़े। एस. पी. शुक्‍ला ने अपने संदेश में कहा कि पानसरे मजदूर तबके से आते थे और महाराष्‍ट्र के शाहू जी महाराज और सत्‍यशोधक आंदोलन से सीखकर कम्‍युनिस्‍ट आंदोलन में शामिल हुए थे। लेकिन उन्‍होंने कभी भी शाहू जी महाराज और सत्‍यशोधक आंदोलन को भुलाया नहीं। उन्‍होंने कहा कि पानसरे को इस बात की खुशी थी कि उन्‍होंने महाराष्‍ट्र के इतिहास पुरुष छत्रपति शिवाजी महाराज को सांप्रदायिक ताकतों के पास जाने से रोकने का प्रयास किया और उन्‍हें उनकी असली जनता को सौंपा जो मेहनतकश और गैर सांप्रदायिक है। विष्‍णु खरे ने अपने संदेश में कहा कि मराठी कवि नामदेव ढसाल की श्रद्धांजलि सभा में पानसरे से हुई दो घंटे की मुलाकात मेरे जीवन पर उनके व्‍यक्तित्‍व की अमिट छाप छोड़ गई। उन्‍होंने कहा कि वे असली योद्धा थे जो आजीवन समतावादी समाज, लोकतांत्रिक मूल्‍यों और समाजवाद के लिए लड़ते रहे।  
डॉ पानसरे को याद करते हुए मुंबई आईआईआईटी के पूर्व प्रोफेसर और सांप्रदायिकता और फासीवादी मुद्दों के खिलाफ लगातार काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता डॉ राम पुनियानी ने कहा कि पानसरे जैसे लीडर अपने लक्ष्‍य और काम को लेकर बहुत ही समर्पित थे। उन्‍होंने कहा कि कॉमरेड पानसरे की हत्‍या के पीछे समाज में फैलता धार्मिक अंधविश्‍वास और महाराष्‍ट्र लगातार फैल रहा जातिवाद ही है। उन्‍होंने कहा कि पानसरे महाराष्‍ट्र में सांप्रदायिकता के खिलाफ काम कर रहे थे। उन्‍होंने पुणे में दाभोलकर की हत्‍या को भी इसी से जोड़ते हुए कहा कि यह दोनों ही अपनी-अपनी तरह से महाराष्‍ट्र में जागरूकता पैदा कर रहे थे और दोनों की ही हत्‍याएं तथाकथित प्रगतिशील महाराष्‍ट्र के लिए चुनौती है। उन्‍होंने कहा कि महाराष्‍ट्र के इतिहास के प्रतीक पुरुष शिवाजी पर पानसरे का कार्य अभूतपूर्व है और जिस तरह से महाराष्‍ट्र में शिवाजी का सांप्रदायिक उपयोग कर राजनीति को चमकाया गया है उसके खिलाफ पानसरे के शिवाजी एक चुनौती की तरह खड़े होते हैं। उनके इस काम ने मुझे भी चौंका दिया। उन्‍होंने कहा कि उनकी मृत्‍यु के बाद शिवाजी पर किया गया कार्य और जनता के बीच पहुंचेगा।पानसरे ने अपने जवान बेटे के न रहने के दुःख को भी एक रचनात्मक दिशा देकर हमें सिखाया कि व्यक्तिगत दुःख-सुख से समाज के लिए किया जाने वाला काम नहीं रुकना चाहिए। प्रो पुनियानी ने पानसरे के साथ अपने संस्‍मरणों को साझा करते हुए उन्‍हें एक समर्पित नेता और कभी न टूटने वाला इंसान बताया। 
वरिष्‍ठ पत्रकार प्रफुल्‍ल बिडवई ने कहा कि रामकृष्ण बजाज ने ही बाल ठाकरे को ये विचार दिया था कि शिवाजी की संहारक और शिव की सृष्टिकर्ता की छबि का शिवसेना इस्तेमाल करे। इससे महाराष्ट्र की राजनीति को दक्षिण पंथी मोड़ देने की कार्रवाई हुई। उन्होंने महाराष्‍ट्र में मुंबई के बड़े मज़दूर नेता कॉमरेड कृष्‍णा देसाई की 1970 में हुई हत्‍या का हवाला देते हुए कहा कि उस समय भी उनकी हत्‍या के विरोध में लाखों लोग मुंबई और दिल्‍ली में इकट्ठे हुए थे, लेकिन कम्‍युनिस्‍ट पार्टियों ने उनसे अपने गुस्‍से को नियंत्रित करने के लिए कहा था। उन्होंने कहा कि उस वक़्त जनाक्रोश को दिशा देने में वामपार्टियां असफल रही थीं और शिवसेना ने सांप्रदायिक नीतियों को फ़ैलाने की जगह बनाई। पानसरे भी कृष्णा देसाई की तरह अनेक वर्गों के सर्वमान्य नेता थे। उन्होंने कहा कि जब वे अस्सी वर्ष के हुए तो बहुत सी ट्रेड यूनियनों और महाराष्ट्र के अनेक लोगों ने उनका अभिनन्दन करने के लिए धन संग्रह किया। जब उन्हें बताया गया तो उन्होंने कहा कि इस पैसे से ऐसे सौ लोगों पर केंद्रित पुस्तकें प्रकाशित की जाएं जो प्रसिद्धि की आकांक्षा किये बगैर चुपचाप समाज के हक़ में, वंचित लोगों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं। 
न्‍यू एज अखबार के संपादक और गोविन्द पानसरे के पुराने साथी शमीम फ़ैज़ी ने कहा कि महाराष्‍ट्र में एक और साथी की हत्‍या चौंकाने वाली है। उन्‍होंने कहा कि अभी तक दाभोलकर के हत्‍यारे पकड़े नहीं गए हैं, लेकिन पानसरे के साथ न्‍याय में हम देरी नहीं होने देंगे। उन्‍होंने कहा कि वर्तमान सरकार सांप्रदायिक बयानबाजियों से रोजी, रोटी और सोशल इकॉनॉमिक मुद्दों से जनता का ध्‍यान हटाना चाहती है इसलिए जब अदानी को स्‍टेट बैंक से हजारों करोड़ का लोन देने की बात आती है तो साक्षी महाराज गोड्से पर बयान देते हैं, जब भू अधिग्रहण पर बात उठती है तो मोहन भागवत मदर टेरेसा पर बयान देते हैं। उन्‍होंने कहा कि कृष्‍णा देसाई की मौत के वक़्त जो चूक हुई वो अब नहीं होगी और जनता के गुस्से को जाया नहीं जाने दिया जाएगा। हम सभी लोकतांत्रिक, प्रगतिशील और सामाजिक संगठनों को इसके खिलाफ एकत्रित करेंगे और एक नई लड़ाई का आगाज करेंगे।   
कार्यक्रम के आखिर में दिल्ली इप्टा से मनीष श्रीवास्तव व अन्य सदस्यों ने "ऐ लाल फरेरे तेरी कसम" तथा "हम सब इस जहां में ज़िंदगी के गीत गाएँ" गीत गाकर अपना सलाम पेश किया। कार्यक्रम में वेनेज़ुएला के दूतावास से प्रथम सचिव रिचर्ड्स स्पिनोज़ा भी अपनी श्रद्धांजलि प्रकट करने आये थे। प्रो विश्‍वनाथ त्रिपाठी, इतिहासकार सुमित सरकार, तनिका सरकार, प्रो अर्जुन देव, प्रो गार्गी चक्रवर्ती, प्रो. कृष्णा मजूमदार, प्रो. सुबोध मालाकार, प्रो. दिनेश अबरोल, प्रो. मधु प्रसाद, साहित्‍यकार पंकज बिष्‍ट, पत्रकार रामशरण जोशी, तीसरी दुनिया पत्रिका के संपादक आनंदस्‍वरूप वर्मा, पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव, बीबीसी के पत्रकार इकबाल अहमद, महिला फेडरेशन की राष्‍ट्रीय महासचिव एनी राजा, अर्थशास्‍त्री जया मेहता, शांता वेंकटरमण, अनहद की शबनम हाशमी, लेखक सुभाष गाताडे, प्रो अचिन विनायक, महिला फेडरेशन की वरिष्‍ठ नेत्री प्रमिला लुम्‍बा, लेखिका नूर जहीर, दिल्ली भाकपा के सचिव कॉम. धीरेन्द्र शर्मा और प्रो दिनेश वार्ष्णेय, अमीक़ जामेई, पिलानी से आये विमल भानोट, उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ शिक्षक संघ नेता हरिमंदिर पांडे और स्‍टूडेट फैडरेशन के राष्‍ट्रीय महासचिव विश्‍वजीत सहित अनेक वामपंथी संगठनों के प्रतिनिधि व अन्य लोग उपस्थित थे, जिन्‍होंने कामरेड पानसरे को श्रद्धांजलि दी। कार्यक्रम का संचालन जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट के निदेशक प्रो अजय पटनायक ने किया। 

     
- विनीत और सोनू

बुधवार, 11 मार्च 2015

‘‘कांग्रेस मुक्त भारत’’ देश के लिए सार्थक या घातक-2

भारत से मुसलमानों के पलायन  का सिलसिला मौलाना अबुल कलाम आजाद ने अपने जज्बाती  भाषणों से रोक तो दिया लेकिन हिन्दू महासभा के लोगों को जाते हुए मुसलमानों का देश में रुके रहना एक आँख नहीं भाया। दोनों देशों के आजाद हो जाने के बाद दोनों ही देश के रहनुमाओं क्रमशः मुहम्मद अली जिनाह व देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने पाकिस्तान व भारत को गैर धार्मिक स्टेट बनाने का एलान कर धार्मिक कट्टरपंथियों के इरादों पर रोक लगा दी। भारत में तो यह नुस्खा काफी हद तक कामयाब रहा लेकिन पाकिस्तान में धार्मिक कट्टरपंथ सदैव हावी रहा।
    पाकिस्तान में तो मात्र 1 प्रतिशत हिन्दू बचे थे परन्तु भारत में उस समय भी 10 प्रतिशत से अधिक आबादी मुसलमानों की रह गई थी। जिसने मौलाना आजाद की पुकार और गांधी, नेहरू जैसे धर्मनिरपेक्ष लीडरों ने सुरक्षा की यकीन दहानी कराके उनके उखड़ चुके कदमों को फिर से अपने मादरे वतन में  जमाने का भरोसा दिया।
    26 जनवरी 1950 को भारत के संविधान में जब देश की अक्लियतों को विशेष अधिकार दिए गए, जिसमें उनकी धार्मिक आजादी की जमानत दी गई थी उनको अपने धार्मिक स्वरूप व शरई कानूनों की पाबन्दी के साथ जिन्दगी बिताने की गारन्टी दी गई थी, मुसलमानों ने राहत की सांस ली और वे इस मुल्क की तरक्की व उसके लिए मर मिटने तक में अपने वतन के साथ जुट गए। 1947 के बाद पाकिस्तान के तीन हमलों क्रमशः 1947, 1965 और 1971 में भारतीय मुसलमानों ने देश की सुरक्षा के लिए सरहद पर अपना खून भी बहाया और शहादत का जाम भी नोश फरमाया।
    आजाद भारत में कांग्रेस ने प्रथम चक्र में 1947 से 1977 तक और द्वितीय चक्र में 1980 से 1989 तक और फिर तृतीय चक्र में 1991 से 1996 तक फिर चैथे चक्र में यू0पी0ए0 के गठबंधन के साथ 2004 से 2014 तक देश में 54 वर्ष तक हुकूमत की। इसमें 17, 17 साल पं0 जवाहर लाल नेहरू व इंदिरा गांधी की हुकूमत रही। बाकी दस वर्ष यू0पी0ए0 के गठबंधन के साथ मनमोहन की हुकूमत व 5-5 वर्ष राजीव गांधी व नरसिम्हा राव की हुकूमतें रहीं।
    देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू को जहाँ इस बात का श्रेय जाता है कि उन्होंने आजाद भारत के स्वरूप को एक बहुरंगीय व बहुधर्मी सभ्यता से सुसज्जित समाज के साथ आधुनिक वैज्ञानिक सोच तथा समाजवादी आर्थिक नीतियों से सजाकर देश के आम आदमी को यह एहसास दिलाया कि इस देश की तरक्की में उसका भी महत्वपूर्ण योगदान है। पंडित नेहरू ने जब देश की बांगडोर संभाली तो उनके सामने दो तरह के माॅडल अर्थ व्यवस्था के थे। एक पूँजीवाद का माॅडल जिसमें साम्राज्यवादी शक्तियों के पास सारे आर्थिक अधिकार सीमित  हो जाते हैं। दूसरा सोवियत यूनियन व अन्य कम्युनिस्ट विचारधाराओं वाले राष्ट्रों की सामन्त शाही निजाम का सोशलिस्ट आर्थिक माॅडल। पंडित नेहरू ने दोनों के बीच का रास्ता चुना और मिक्सड एकनाॅमी का अनुसरण किया। उन्होंने देश के पूँजीपति टाटा, बिरला इत्यादि को यदि देश की औद्योगिक उन्नति की ओर ले जाने का जिम्मा सौंपा तो वहीं उनके ऊपर सरकारी अंकुश भी लगाए रखा। पंडित नेहरू ने शिक्षा, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, कृषि, रक्षा, विज्ञान, पर्यावरण, प्राकृतिक, संसाधन इत्यादि के श्रोतों को सार्वजनिक क्षेत्रों के हवाले रखा। पंडित नेहरू के नेतृत्व में लगभग हर क्षेत्र में देश ने उन्नति की। 1950 से 1965 तक 7 प्रतिशत की औद्योगिक विकास इसका सुबूत है। उनके समय में विकासशील देशों में भारत अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो गया था और विश्व में औद्योगिक विकास के मामले में 7वें स्थान पर भारत था। पंडित नेहरू के समय हुई उन्नति से परेशान साम्राजी शक्तियों जो भारत को बहुत मजबूरी में छोड़ कर गयी थी ने पड़ोसी राष्ट्र के साथ उसके संबंधों में खटास पैदा करनी शुरू कर दी। जबकि पंडित नेहरू ने चीन के साथ पंचशील समझौता करके चीन व भारत के बीच परस्पर सांस्कृतिक, आर्थिक व व्यावसायिक सहयोग करके रिश्तों को सुदृढ़ कर दिया था।
    साम्राजी शक्तियों ने दो विकास शील पड़ोसी मित्र राष्ट्रों की मित्रता को शत्रुता में परिवर्तित कर दिया। नतीजे में 1962 में हिन्द चीन युद्ध हुआ और सैन्य शक्ति में कमजोर भारत को चीन के हाथों पराजय का मुँह देखना पड़ा। चीन ने भारत की काफी भूमि अपने कब्जे में कर ली जो अब भी उसी के पास है। पंडित नेहरू को यह सजा साम्राजी शक्तियों ने दो कारणों से दी। एक साम्राज्यवादी नीतियों के स्थान पर समाजवादी नीतियों का अनुसरण और दूसरा दोनों सुपर पावर राष्ट्र अमरीका व सोवियत यूनियन के गुट में न शामिल होकर गुटनिरपेक्षता की राह अपनाना।
     अपने प्रयासों में विफल पंडित नेहरू इसके बाद अधिक दिन तक जीवित न रह सके और 1964 को उनका असामायिक निधन हो गया।
    पंडित नेहरू के निधन के बाद उनकी जानशीन इन्दिरा गांधी ने अपने पिता के अधूरे सपनों को और तेजी के साथ पूरा करना शुरू कर दिया। प्रारम्भ में उन्हें कांग्रेस के भीतर छिपे साम्राजी व साम्प्रदायिक शक्तियों के समर्थकों के विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन मुजाहिद बाप की बेटी भी उनसे कहीं कमजोर मुजाहिद नहीं निकली। उनके ऊपर कांग्रेस को विभाजित करने का आरोप लगा। जिद्दी मिजाजी व तानाशाही रवैये का इल्जाम लगाया गया लेकिन वे अपनी मजबूत, इच्छा शक्ति के सहारे किसी के दबाव के आगे नहीझुकीं और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती ही गई। इंदिरा गांधी के दौर में ही भारत ने अन्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त की। हरित क्रान्ति का नारा देकर उन्होंने कृषि को उसके उन्नति के शिखर पर पहुँचाया। विज्ञान एवं तकनीक के मामले में भी उन्होंने देश को विकासशील राष्ट्रों की फेहरिस्त में अग्रणी रखा। बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर ग्रामीण अंचलों तक बैंक की सुविधाएँ पहुँचा दीं। बेरोजगारी दूर करने के लिए छोटे-छोटे कुटीर उद्योग लगाने के लिए शिक्षित युवाओं को प्रोत्साहित किया। रक्षा क्षेत्र में भी उन्हीं के दौर में देश ने निपुणता हासिल की और अमरीका के दबाव को नकारते हुए 1975 में उन्होंने परमाणु विस्फोट कर उपमहाद्वीप में अपना सैन्य वर्चस्व स्थापित कर दिया। इंदिरा गांधी की ही राह का अनुसरण कर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्ठो ने भी अपने देश को औद्योगिक प्रगति तथा आर्थिक समृद्धि की ओर ले जाने की ओर कदम बढ़ा दिए। साथ ही हिन्द पाक रिश्तों में भी दोनों लीडरों ने सुधार के संकेत देने शुरू कर दिए। इन सबसे नाराज अमरीका ने दोनों को सबक सिखाने की मंसूबा साजी कर दी। दोनों ही लीडरों को उनके राजनैतिक प्रतिद्वन्द्वियों ने घेरना शुरू किया। भुट्ठो ने तो चुनाव में पाला मार लिया लेकिन इंदिरा गांधी अपने राजनैतिक विरोधियों के जाल में फँस गई और घबराकर उन्होंने देश में आपात काल की घोषणा कर दी। इससे उनके विरुद्ध ऐसा सियासी माहौल तैयार हुआ कि 1977 के आम लोकसभा चुनाव में वह परास्त हो कर सत्ता से बेदखल हो गईं। देश में पहली बार गैर कांग्रेसी हुकूमत मोरारजी देसाई के नेतृत्व में स्थापित हो गई और लीडरों की बैसाखी के सहारे साम्राज्यवादी व साम्प्रदायिक सोच रखने वाली भारतीय जनता पार्टी ने सत्ता का मजा पहली बार चखा। 
-तारिक खान
 मो.09455804309
क्रमस:

लोकसंघर्ष पत्रिका  मार्च 2015  में प्रकाशित