बुधवार, 23 अप्रैल 2014

महात्मा गांधी से मोदी का क्या संबंध?

   अगर नफरत की खुराक पर कोई पला हो, तो उसका असर कभी जाता नहीं। संघ परिवारियों से नफरत के अलावा और किसी बात की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। देखिए नरेंद्र मोदी की भाषा, ‘‘कांग्रेस एक बीमारी है। नेहरू परिवार में नकली गांधी हैं। कांग्रेस के नेता कहते हैं कि कांग्रेस एक विचार है। वास्तव में यह एक विचार था, जब तक गांधी जी जीवित थे। ‘‘चलिए नेहरू परिवार पर हमला बोलने के लिए ही गांधीजी को याद किया। लेकिन यह मोदी की शुद्ध मक्कारी है। महात्मा गांधी, उनके विचारों और उनकी विरासत से संघ का हमेशा 36 का आँकड़ा रहा है। संघ की औपचारिक सदस्यता का कोई रजिस्टर नहीं होता, इसलिए संघ वाले सुविधानुसार खंडन कर देते हैं कि अमुक व्यक्ति संघ में नहीं है। संघ एक विचार है और नफरत के इसी विचार से प्रेरित होकर नाथूराम गोड्से ने गांधीजी की हत्या की थी।
     मोदी और अन्य संघ परिवारियों को यह बताना चाहिए कि उन्होंने दूसरे सर संघ चालक माधव राव सदाशिव गोलवलकर के विचारों का त्याग किया है या नहीं। वे हिटलर और मुसोलिनी को प्रेरणा स्रोत के रूप में अब देखते हैं या नहीं? मुसलमानों और दूसरे अल्पसंख्यकों से अब नफरत करते हैं या नहीं? आज उनका विचार क्या है? आखिर यूरोप के फासिस्टों से संघ परिवारियों का चोली-दामन का साथ रहा है।
    मोरेश्वर राव मुंजे ने 1931 में इटली के फासिस्ट नेता मुसोलिनी से भेंट की थी और फासिस्ट आंदोलन को सराहा था। दूसरी ओर जवाहर लाल नेहरू ने मुसोलिनी से भेंट के आमंत्रण को ठुकरा दिया था। भारतीय जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कोलकाता यूनिवर्सिटी के कुलपति के नाते मुसोलिनी की एक सरकारी संस्था से संबंध स्थापित किए थे। गोलवलकर को कांग्रेस का यह सिद्धांत बहुत बुरा लगा कि देश के सभी निवासियों को मिलाकर देश बनता है। संघ ने सिद्धांत प्रतिपादित किया कि भारत हिंदुओं का है। चेकोस्लोवाकिया के जर्मन भाषी इलाके सुडेटेनलैंड पर हिटलर के कब्जे की सराहना करते हुए गोलवलकर ने लिखा कि यह एक बहुजातीय देश की विफलता का प्रमाण है। उन्होंने लिखा, ‘जर्मनी ने अपनी नस्ल और  संस्कृति की शुद्धता को बनाए रखने के लिए दुनिया को झटका मार दिया। यहाँ नस्ली गौरव की पराकाष्ठा के दर्शन होते हैं। जर्मनी ने यह भी दिखा दिया कि मूलतः भिन्न नस्लों और संस्कृतियों के लिए एक राष्ट्र समिश्रित होना कितना असंभव है। हिन्दुस्तान को  सीखने और लाभान्वित होने के लिए एक अच्छा पाठ।’ गोलवलकर की मंशा बहुत साफ थी-जैसे हिटलर ने 60 ला
ख यहूदियों को मार डाला, कुछ वैसा ही भारत को भी अपनी नस्ली और सांस्कृतिक शुद्धता के लिए करना चाहिए। 2002 के गुजरात दंगों के संदर्भ में गोलवलकर की घोषणा का पाठ होना चाहिए। मोदी ने अपने संगठन के विचार का उल्लेख किया। उन्हें स्पष्ट करना चाहिए कि गोलवलकर के इस विचार को वह स्वीकार करते हैं या नहीं।

 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

चुनाव आयोग :पेड न्यूज मीडिया की एक लाइलाज बीमारी


    पेड न्यूज के ऊपर चुनाव आयोग ने इस बार काफी चिन्ता व्यक्त की है। हर जिले में जिला निर्वाचन अधिकारी के नेतृत्व में एक मानीटरिंग कमेटी बनाकर इसकी निगरानी किए जाने के निर्देश भी चुनाव आयोग द्वारा दिए गए हैं। बावजूद इसके प्रेस की भूमिका पर सवाल खड़े हैं।
    यह सवाल खड़ा होना लाजिमी है क्योंकि अधिकांश चुनावी दलों को जनता तक अपनी झूठी सच्ची बात पहुँचाने के लिए मीडिया की आवश्यकता होती है। चुनावी खर्चा न बढ़े इसके लिए अधिकांश प्रत्याशी प्रिन्ट व इलेक्ट्रानिक मीडिया को बंद मुट्ठी डील कर लेते हैं और जनसम्पर्क के नाम पर अपने लिखे लिखाए प्रेस नोट देश के प्रमुख समाचार पत्रों में छपवाए जाते हैं।
    चुनाव के अंतिम चरणों में समीक्षा छापने का सिलसिला प्रारम्भ किया जाता है और चुनावी सर्वे की भाँति जातिगत तथा बिरादरी पर आधारित आँकड़े मतदाताओं के सम्मुख परोस कर उन मतदाताओं को प्रभावित किया जाता है जो अन्तिम समय तक चुनाव में विजयी होने वाले प्रत्याशी के ऊपर अपना मत दाँव स्वरूप लगाते हैं। जाति तथा बिरादरी के आँकड़ों को अपने मनमाफिक ऐसा खींचतान कर मतदाताओं के सामने प्रस्तुत किया जाता है कि मतदाता अपना निर्णय गलत ले लेता है।
    विगत लोकसभा चुनाव में पेड न्यूज का सिलसिला इतना परवान चढ़ा कि प्रेस परिषद ने बाद में इसे संज्ञान में लिया और कुछ समाचार पत्रों व प्रत्याशियों के खेल को बेनकाब कर उनके विरुद्ध कार्रवाई की। बाकायदा लाखों रूपये का स्पेस देश के प्रमुख समाचार पत्रों में बुक किया गया। देखने में यह विज्ञापन न लगे इसलिए पत्रकारिता के हुनर के जौहर दिखलाते हुए इसे ऐसी भाषा में पाठकों के सामने परोसा जाता है कि पेड न्यूज के दायरे से बचा जा सके।
    उधर इलेक्ट्रानिक मीडिया की हालत इस मामले में और भी बदतरीन है। जिस प्रकार से नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा व उसके सहयोगी एन.डी.ए. गठबंधन को चुनाव से पूर्व सर्वे के माध्यम से दिखाया जा रहा है और उससेे भाजपा एन.डी.ए. के पक्ष में हवा बाँधी जा रही है उस पर कांग्रेस, आप पार्टी, जनता दल (यू) राष्ट्रीय लोकदल, वाम मोर्चा, बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी व आर0जे0डी0 समेत सभी राजनैतिक दलों ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है, परन्तु इस मामले में बेबस चुनाव आयोग यह कहते हुए अपने हाथ खड़े कर चुका है कि सर्वे पर रोक लगाना उसके बस में नहीं है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय की ओर से केवल दो दिन पूर्व के सर्वे को प्रतिबंधित किया गया है। कम्युनिस्ट पार्टियाँ मीडिया को रूपया नहीं देती हैं इसलिए उनका समाचार न तो प्रिन्ट मीडिया और न ही इलेक्ट्रानिक मीडिया पर दिखाई देता है।
    पेड न्यूज का प्रारम्भ विगत दो दशकों से अधिक देखने को मिल रहा है। वास्तव में हाईटेक प्रचार का चलन जबसे भारतीय राजनीति में आया है तभी से मीडिया का महत्व राजनैतिक दलों में बढ़ा है। बाकायदा मीडिया प्रभारी की एक पोस्ट हर पार्टी ने अपने यहाँ रख कर मीडिया मैनेजमेन्ट की कवायद शुरू कर दी।
    वैसे मीडिया द्वारा जनता का मिजाज बदलने का चलन बहुत पुराना है और पूरे विश्व स्तर पर मीडिया का महत्व इसीलिए है कि प्रचार के द्वारा अपनी बात समाज में पोषित की जा सकती है। अभी हाल में विश्व स्तर पर स्थापित सोशल मीडिया ने मध्य एशिया के अरब, अफ्रीकी राष्ट्रों में हुकूमतों का तख्ता पलट दिया। परिणाम स्वरूप बहुत से राष्ट्रों ने अपने यहाँ फेसबुक इत्यादि पर प्रतिबंध भी लगा दिया है।
    देश के विभाजन से लेकर रामलहर के हक मंे देश में माहौल साजगार करने के लिए भी मीडिया का जमकर दुरुपयोग किया गया था। संसार में जहाँ नैतिक मूल्यों व जिम्मेदारियाँ को परित्याग, व्यावसायिक सोच एवं उपभोक्तावाद के चलते समाज के हर पेशे को प्रभावित किया है तो भला मीडिया इस बीमारी से केसे बच पाता? केवल कानून बनाने से मीडिया के अन्दर व्याप्त पेड न्यूज रूपी भ्रष्टाचार का इलाज नहीं किया जा सकता। देश भक्ति व सामाजिक जिम्मेदारी के एहसास का संचार जब तक समाज के हर वर्ग में नहीं होगा भ्रष्टाचार नए-नए रूप में सामने आता रहेगा।
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

पिछड़ेपन के सेल्समैन हैं नरेंद्र मोदी !

   प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी देशी-विदेशी इजारेदारों के सत्संग में मार्केटिंग की  मोदी का एक दुख देखिए, ‘‘मुझे बहुत कष्ट हुआ, क्योंकि मैं एक ऐसे गाँव में बड़ा हुआ, जहाँ बिजली नहीं थी। इस वजह से हमें बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।’’ करीब साठ साल पहले के भारत की कल्पना करिए। आजादी आए ज्यादा वक्त नहीं हुआ था। पूरा भारत पिछड़ा था। बिजली का उत्पादन बहुत कम था। जवाहर लाल नेहरू के दूरदर्शी नेतृत्व में शुरू की गई योजनाओं का फल अभी अच्छी तरह मिलना शुरू नहीं हुआ था। भारत के लाखों गाँवों में बिजली नहीं थी। मोदी के गाँव में भी नहीं रही होगी।
    हममें से बहुतों ने लालटेन, लैंप, ढिबरी की रोशनी में या म्युनिस्पलिटी के लैंप पोस्ट या बिजली के खंभे के नीचे बैठ कर पढ़ाई की होगी। आज भी हजारों गाँवों का यही हाल है। विद्युतीकरण हो भी गया है तो 12-15 घंटे या दो-दो दिन बिजली नहीं आती। बिजली उपलब्ध भी हुई तो प्राथमिकता खेती को देनी पड़ती है। तो मोदी आज भी इतना दुखी क्यों हैं? उनके बाल्य काल के दुख में क्या खास बात है? वह दुख तो करोड़ों भारतीयों का है।
    यहाँ मोदी के सोच की झलक मिलती है। राजनेता समाज और देश के विकास की योजना व्यापक संदर्भ में बनाते हैं। एक महान राष्ट्र की परिकल्पना उन्हें अनुप्राणित करती है। वह अपने बचपन की यादों को पीछे छोड़ देते हैं। लेकिन मोदी के साथ ऐसा नहीं है। उन्होंने अपने निजी जीवन के आधार पर ‘ज्योतिग्राम योजना’ शुरू की। इस योजना के तहत गुजरात में घरेलू और कृषि इस्तेमाल के लिए अलग-अलग फीडर बनाए गए। लेकिन इसमें नया कुछ नहीं है। बस नई  बात है मोदी की मार्केटिंग ट्रिक। बिजली का
उत्पादन बढ़ेगा और कमी नहीं रहेगी तो अलग-अलग फीडर से बिजली दो या न दो मिलती सबको रहेगी। मोदी के मुख्यमंत्री बनने तक स्थितियाँ काफी बदल चुकी थीं। वह जिस विकास का श्रेय खुद ले रहे हैं, उसकी शुरुआत तो बहुत पहले हो चुकी थी। यह उसी तरह है, जैसे पोखरण-2 के बाद भाजपाइयों का यह गाल बजाना कि अटल जी की सरकार ने ऐटम बम से देश को लैस कर दिया। बम तो कांग्रेसी सरकारों ने बना रखा था। बम दो-चार हफ्ते में नहीं बना करते। बम हो या गुजरात का विकास, राजनैतिक लाभ के लिए मिथ्या प्रचार भाजपाइयों की संस्कृति का हिस्सा है।
ट्रिक्स अच्छी तरह सीख गए हैं। गरीबी हो या पिछड़ापन, दुख दूसरों का हो या अपना, वास्तविकता हो या कल्पना मोदी हर बात को अपनी निजी उपलब्धि और महत्वाकांक्षा से जोड़ कर वोट में बदलने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

मुसलमानों के बच्चे दहशतगर्दी के नाम पर जेलों में डाले जा रहे हैं

बाराबंकी। मुल्क में मुसलमानों के बच्चे दहशतगर्दी के नाम पर जेलों में डाले जा रहे हैं। आम आदमी परेशान है, मँहगाई बढ़ती जा रही है और अराजकता का माहौल है। इसकी वजह है कि पूरी दुनिया का सरमायादार एक है और उसी को सत्ता दिलाने के लिए तरह-तरह के प्रचार किये जा रहे हैं।
    यह विचार व्यक्त करते हुए आतंकवाद में फर्जी फंसाए गए मौलाना तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद के अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब एडवोकेट ने लोक संघर्ष पत्रिका द्वारा आयोजित कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए कहा कि आज मुसलमान बच्चों को आतंकवाद के इल्जाम में जिस तरह से फर्जी तरीके से गिरफ्तार किया जा रहा है उसका मकसद है हिन्दू मुस्लिम में नफरत पैदा करके फूट डालना क्योंकि जब कोई मुसलमान आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार किया जाता है तो कुछ संगठन हिन्दुओं के दिलों में नफरत के बीच बोते हैं, राजनैतिक लाभ उठाते हैं। यह वही संगठन है जो विश्व सरमायेदारों के गुलाम हैं।
    कस्बा फतेहपुर के अंजुमन मार्केट में लोकसंघर्ष पत्रिका के चुनाव विशेषांक को प्रसारित करते हुए मौलाना हबीब कासमी ने कहा कि प्रदेश की हुकूमत की बेईमानी का ही नतीजा है कि आर0डी0 निमेष कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर आतंकवाद के इल्जाम में गिरफ्तार किये गए खालिद मुजाहिद और मौलाना तारिक कासमी का मुकदमा वापस नहीं लिया गया बल्कि अदालत को एक खत लिखकर मुसलमानों को बहलाने की कोशिश की गई। आर0डी0 निमेष कमीशन ने जब दोनों मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी को फर्जी माना है तो भी प्रदेश सरकार उनको कैद से मुक्त नहीं दिला पा रही है।
    कार्यक्रम को जनपद गाजीपुर से आये हुए मौलाना राशिद उमर ने कहा कि मुल्क में जो भी बिगाड़ है उसके जिम्मेदार हम मुसलमान और उलेमा है इसलिए कि हमने जो तालीम हासिल की है उसे हमने दूसरों तक पहुंचाया ही नहीं है। आज हम मुलायम सिंह, लोहिया के ख्वाबों को मायावती, डा. अम्बेडकर के ख्वाबों को लागू करने की बात करते है जबकि हकीकत यह है कि इस तरह के ख्वाबों को ताबीर होने से हम लोगों की मुसीबतों में मजीद इजाफा होगा इसलिए हम लोगों को सकून व चैन उस वक्त नसीब होगा जब हम निजाम-ए-मुस्तफा पर कायम होंगे।
    इस मौके पर लोक संघर्ष पत्रिका के सम्पादक बृजमोहन वर्मा, प्रबंध सम्पादक रणधीर सिंह सुमन नेशनल इण्टर कालेज के प्रबंधक श्याम बिहारी वर्मा व लखनऊ के पत्रकार हरेराम मिश्रा ने भी सम्बोधित किया। कार्यक्रम में डा. उमेश चन्द्र वर्मा, डा. कौशर हुसैन, मुहम्मद असलम एडवोकेट, अब्दुल मन्नान खां, मुहम्मद आरिफ हैदर, मुहम्मद गुफरान खां, मौलाना साबिर कासमी, महमूद हसन, मौलाना फैजी मजाहरी, इकबाल अजीम, मुहम्मद आकिल रजा, हाफिज मुहम्मद उस्मान, मुहम्मद सभी उल्ला, नईम अंसारी, आमिर एडवोकेट, आजम अली, नीरज वर्मा, आनन्द प्रताप सिंह, विनय कुमार सिंह, रामनरेश, दलसिंगार सहित सैकड़ों लोग शामिल थे।

बीजेपी का खतरनाक ओबीसी कार्ड

  संघ परिवार के बारे में यह जगजाहिर है कि वह अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए किसी भी झूठ-फरेब और विषैले प्रचार का सहारा ले सकता है। इस बार वह जाति का कार्ड सिद्धांत नहीं, सुविधा और अवसर के अनुसार खेल रहा है। बहुत समय नहीं गुजरा, जब भाजपा ने मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू करने के लिए वी.पी. सिंह की सरकार गिरा दी थी। इसका कारण यह था कि सवर्ण मानसिकता वाले बंधु सदियों से पिछड़े वर्गों के साथ न्याय नहीं चाहते थे। एक संपूर्ण-समग्र हिंदू समाज के नाम पर वह पिछड़ी जातियों को यथास्थिति के दलदल में रखना चाहते थे। विभिन्न पिछड़े वर्गों के साथ सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अनपलट संगठन हो  गई, तो मजबूरी में भाजपा को खामोश रहना पड़ा।
    लेकिन उनके दिल नहीं बदले। जैसे आर.एस.एस. के वरिष्ठ पदाधिकारी, सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा, ‘‘जाति के नाम पर वोट की ताकत हासिल करने वाले नेता इस बार सत्ता में आए तो हिंदुओं को और दीनहीन और उत्पीड़न का शिकार बना कर छोड़ेंगे। इनको वोट का मतलब है, देशद्रोहियों को समर्थन।’’ अर्थात, जाति के नाम पर वोट माँगना देशद्रोह की श्रेणी में आता है।
    जब फ्री स्टाइल कुश्ती की तरह चुनाव लड़ा जा रहा हो और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार, नरेंद्र मोदी को फ्री स्टाइल में बोलने की आदत हो, तो देखिए क्या अनर्थ हो जाता है। कृष्ण गोपाल ने जिसे वर्जित बताया, मोदी ने वही काम कर डाला। कांग्रेस ने और खुद राहुल गांधी ने स्पष्ट किया कि पार्टी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार क्यों नहीं घोषित कर रही। लेकिन मोदी ने कुछ और कारण ढूँढ निकाला, क्योंकि उन्हें जाति का कार्ड खेलना था। उन्होंने कहा, ‘‘राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं बने क्योंकि उन्हें समाज के एक निम्न वर्ग से आए व्यक्ति के हाथों पराजित होना पसंद नहीं था। कांग्रेस मानती है कि निम्न जाति के जिस व्यक्ति ने चाय बेची हो, जिसकी माँ घरेलू नौकरानी रही हो, उससे लड़ना ठीक नहीं।’’
    जिस संगठन का देश की आजादी की लड़ाई से ही दूर-दराज का वास्ता न रहा हो, उसके नेता कांग्रेस की गौरवशाली परंपरा के ज्ञान से वंचित हैं तो इसमें उनका दोष नहीं। कांग्रेस में रह कर स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए तथाकथित निम्न जाति के लोगों की सूची बहुत लंबी है। उनकी जाति का उल्लेख उन महापुरुषों का अनादर होगा। ऐसे लोगों की भी सूची बहुत लंबी है, जिन्होंने अपना सब कुछ त्याग कर आजादी की लड़ाई का रास्ता चुना। इन्हीं में से एक था नेहरू परिवार। अपने समय के सबसे
धनी वकीलों में एक, मोतीलाल नेहरू ने वकालत छोड़ दी थी। जवाहर लाल नेहरू ने आनंद भवन के  आनंद को त्याग कर गरीबी में संघर्ष का मार्ग चुना था। रोटी चलाने के लिए आनंद भवन के बर्तन-भाड़े तक बेचे गए थे। नेहरू के निधन के बाद उनकी बेटी इंदिरा गांधी दिल्ली में बेघर हो गई थीं। तब कांग्रेस के बड़े नेताओं ने लाल बहादुर शास्त्री से कह कर शोक संतप्त इंदिरा को मंत्री बनवाया था, ताकि रहने का ठिकाना हो जाए। बाद में इंदिरा गांधी ने आनंद भवन ही राष्ट्र को समर्पित कर दिया था। इसलिए नरेंद्र मोदी के मुँह से अपनी जाति और गरीबी का उल्लेख शोभा नहीं देता,    और भी अशोभनीय है कि मोदी राजनैतिक लाभ के लिए अपनी माँ का जिक्र कर रहे हैं। नारी पूज्य होती है। किसी व्यक्ति की माँ उसके लिए विशेष पूज्य होती है। माँ तो बहुत प्रतिकूल स्थितियों में भी बच्चे के मुँह में निवाला डालती है। मोदी की माँ की भी कुछ प्रतिकूल स्थितियाँ रहीं होंगी। उन्होंने माँ के धर्म का निर्वाह किया। अब चुनावी मंच से बार-बार उस परम पुनीत धर्म का उल्लेख करने वालों के बारे में क्या कहा जाए!
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

रविवार, 20 अप्रैल 2014

‘चाय वाले ’ की असलियत


    अपने जीवन के असली या काल्पनिक कष्टों का बार-बार बयान कर जनता की सहानुभूति हासिल करने की कोशिश अब नरेंद्र मोदी की आदत बन चुकी है। शायद ही उनकी कोई ऐसी सभा होती हो, जिसमें वह अपने को चाय बेचने वाला न बताते हों। वह किस तरह के चाय बेचने वाले थे, यह नहीं बताते। उनके कथन का यह अर्थ निकलता है कि बाल्यावस्था में वह इतना गरीब थे कि चाय बेचा करते थे। दिमाग में छवि आती है ट्रेनों में चाय बेचने वाले की या इसी तरह कुछ और। अब वरिष्ठ कांग्रेस नेता और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल ने रौशनी डाली है कि मोदी चाय बेचने वाले कोई गरीब-दुखिया नहीं थे।
    मोदी के जीवनीकार नीलांजन मुखोपाध्याय ने ‘चाय बेचने वाले’ की असलियत विस्तार से बताई है। सामग्री जुटाने के लिए नीलांजन गुजरात के मेहसाणा जिले में मोदी के गाँव वडनगर तक गए। उन्होंने उस घर को भी देखा ,जहाँ मोदी का जन्म हुआ था। वडनगर रेलवे स्टेशन के बाहर मोदी के पिता दामोदर दास की चाय की दुकान थी। छह साल के मोदी पास ही में अपने घर से पिता की दुकान तक आया करते थे। यह किसी भी बच्चे के लिए बिल्कुल स्वाभाविक बात है। आते थे तो पिता की कुछ सहायता भी कर देते थे।
    यह बात 1956 के आस-पास की है। तब अधिकांश भारत गरीब था। पूरा समाज पिछड़ा था। मध्य वर्ग और निम्न मध्य वर्ग बहुत सीमित था। उस लिहाज से मान सकते हैं कि मोदी गरीबी में रहे। लेकिन यह भी जान लेना जरूरी है कि चाय की दुकान चलाने वाला 1956 के संदर्भ में पैसे वाला भी हो सकता है, सामान्य भी हो सकता है और गरीब भी हो सकता है। जो भी हो, पेट की आग बुझाने के लिए मोदी को चाय नहीं बेचनी पड़ी और अगर मान लें कि किसी ने अपने जीवन के किसी दौर में चाय बेची है या अब भी बेच रहा है तो सार्वजनिक मंचों से इसमें प्रचार की क्या बात हो गई?
    अगर कोई इसे भुना रहा है, तो इसके पीछे कौन सी मनोदशा हुई? तय है कि वह व्यक्ति चाय बेचने के काम को सम्मानजनक नहीं मानता। यह आत्म-पीड़न का मनोविज्ञान हुआ। मोदी एक बड़े पद के दावेदार हैं। आत्म-पीड़न की तस्वीर आए दिन पेश करते रहना उन्हें शोभा नहीं देता। चाय बेचने के काम को हिकारत के दबे भाव के साथ पेश करना और भी अशोभनीय है। 
यह ईमानदारी की गारंटी नहीं है
मोदी जी!
    नरेंद्र मोदी के मीडिया सलाहकारों और स्क्रिप्ट राइटरों को कितनी मेहनत करनी पड़ती होगी। सभा स्थल के अनुसार विषय चुनना और भाषण को रसीला बनाने के लिए डायलॉग लिखना। लेकिन हर बार कुछ न कुछ गड़बड़ हो जाता है। कभी ऐतिहासिक तथ्यों में हास्यासपद दोष तो कभी कुछ। ताजा मिसाल है हिमाचल की सभा। मोदी ने भरोसा दिलाया-मेरे आगे पीछे कोई नहीं जिसके लिए मैं करप्शन करूँगा। यह बात भी जमी नहीं। आगे-पीछे का कथन सत्य पर
आधारित नहीं है। अब कोई घर से भाग खड़ा हो और अपनी जिम्मेदारी न महसूस करे तो बात दीगर है।
    जशोदाबेन से बाकायदा उनकी शादी हुई थी। तीन साल वह उनके साथ रहीं। मोदी उन्हें छोड़ कर वडनगर से निकल आए। कभी खोज-खबर नहीं ली। एक हिंदू विवाह के समय जो सात वचन देता है, मोदी ने उनका पालन नहीं किया। मोदी ने विधिवत परित्याग भी नहीं किया। राम भरोसे जशोदाबेन को छोड़ दिया। अविवाहित होने का ढोंग करते रहे।
    भ्रष्टाचार न करने का उनका तर्क भी कुतर्क है। अविवाहित रहना या घर छोड़ कर अलग रहना ईमानदारी की गारंटी नहीं है। एक उत्तरी राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री के बारे में किस्से मशहूर हैं। भ्रष्टाचार के मामलों की फाइल तैयार करने में सी.बी.आई. को महीनों लग गए होंगे। मामला सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान में है। वह अविवाहित हैं। एक दक्षिणी राज्य की मुख्यमंत्री का किस्सा भी इसी तरह का है। उनकी सालियों और जूतों-चप्पलों  तक के किस्से मशहूर हो गए। उनकी तुलना फिलीपीन की लेडी मार्कोस से की जाने लगी, जिनके भ्रष्टाचार की अनगिनत कहानियाँ थीं। अगर किसी के बाल-बच्चे हैं तो इस आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि वह भ्रष्ट होगा या भ्रष्टाचार कर सकता है। भारतीय राजनीति में इसकी सैकड़ों मिसालें मिल जाएँगी।
    मोदी जी, भ्रष्टाचार का संबंध व्यवस्था से भी होता है और चारित्रिक पतन से भी। धन का लोभ मुख्य रूप से भ्रष्टाचार को पनपाता है। लोभी तथा क्रोध और झूठ मानव स्वभाव का हिस्सा है। जो इन विकारों पर  विजय पा लेते हैं, वह महात्मा हो जाते हैं (आशा है, महात्मा के उल्लेख से आप को एतराज नहीं होगा क्योंकि महात्मा से आशय महात्मा गांधी से है!)।
    अब आप सोचें इनमें से कितने विकारों पर आप ने विजय प्राप्त कर ली है। इसलिए करप्शन के बारे में आपने जो भरोसा दिलाया है, उस पर यकीन नहीं होता। 
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

क्या मोदी मध्यमार्गीय बन गए हैं?

दि इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख ;मोदी द मोडरेट   में आशुतोश वासर वार्ष्णेय लिखते हैं,मोदी की शैली भले ही वाजपेयी जैसी न हो परंतु कुल मिलाकर,पिछले कुछ महीनों मेंए उनके चुनाव अभियान के दौरान, वे वाजपेयी की लीक के नेता ही नजर आते हैं। अपने दावे के समर्थन में वार्ष्णेय लिखते हैं कि मोदी ने अपने एक चुनावी भाषण में मौलाना आजाद को श्रृद्धांजलि अर्पित की,उन्होंने दलित पार्टियों के साथ गठबंधन किया,जिनमें वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो उनके खिलाफ बोलते रहे हैं और उन्होंने अपने एक भाषण में कहा कि गुजरात का हज कोटा पूरा भर जाता है जबकि बिहार और उत्तरप्रदेश में ऐसा नहीं होता क्योंकि गुजरात के मुसलमानों की तुलना में, बिहार और उत्तरप्रदेश के मुसलमान पिछड़े हुए हैं। वार्ष्णेय का यह दावा है कि उक्त तीनों उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि मोदी पूरी तौर पर न सहीए परंतु काफी हद तक, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से हट गए हैं। यहां पर दो प्रश्न हैं। पहला यह कि क्या उक्त तीनों उदाहरणों से ऐसा जाहिर होता है कि मोदी उग्र हिंदू राष्ट्रवादी नहीं रह गए हैं। और दूसरे, अगर ऐसा है, तो क्या यह केवल चुनावी रणनीति है या मोदी की विचारधारा में सचमुच परिवर्तन आया है।
उदारवादियों के एक तबके को उम्मीद है कि भारत जैसे विभिन्नताओं से भरे देश का शासन चलाने की जिम्मेदारी उठाने वाली किसी भी दक्षिणपंथी पार्टी के लिए अपने तेवर नरम करना आवश्यक होगा और उसे मजबूरी में मध्यमार्गी पार्टी बनना होगा। वार्ष्णेय के कहने का अर्थ यह है कि गठबंधन सरकार चलाने की मजबूरियों के चलते,वाजपेयी और भाजपा को मध्यमार्गी नीतियां अपनानी पड़ीं और ऐसा ही मोदी को करना पड़ेगा। दूसरी ओर, कुछ अन्य लोगों का कहना है कि ऐसी आशा करना व्यर्थ है क्योंकि हिन्दू राष्ट्रवादी, राज्य को एक ऐसे उपकरण के रूप में देखते हैं जिसका इस्तेमाल भारत और हिन्दुओं को एकसार राष्ट्र के रूप में पुनर्गठित करने के लिए किया जा सकता है। शनैः शनैः देश की सांस्कृतिक विविधता को समाप्त कर दिया जाएगा, उदारवादी, प्रजातांत्रिक मूल्यों से किनारा कर लिया जायेगा और अंततः देश, हिन्दू राष्ट्र में बदल जाएगा जो कि एक एकाधिकारवादी.सांस्कृतिक राज्य होगा। भारतीय समाज,विविधताओं से परिपूर्ण है। जातिगतए धार्मिक, नस्लीय, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताएं इतनी अधिक हैं कि समाज को पुनर्गठित करने के लिए यह आवश्यक होगा कि लोगों के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया जाए। इसके लिए, शैक्षणिक संस्थानों,संचार माध्यमों और नौकरशाही व सरकारी तंत्र, विशेषकर पुलिस, का इस्तेमाल किया जाए। जो भी दल सत्ता में रहता है उसका इन तीनों ही संस्थाओं पर जबरदस्त प्रभाव व नियंत्रण रहता है।
मीडिया और शैक्षणिक संस्थाओं का इस्तेमाल समाज को सांस्कृतिक दृष्टि से एकसार बनाने के लिए किया जाता है। दूसरी ओरए विविधता के प्रति असहिष्णुता विकसित की जाती है व सुरक्षाबलों और गुंडा ब्रिगेडों का इस्तेमाल उन समूहों या समुदायों के विरूद्ध किया जाता है जो कि अपनी विविधता बरकरार रखने का साहस या इरादा प्रदर्षित करते हैं। जाहिर है कि इस रणनीति का सबसे बड़ा शिकार अल्पसंख्यक समुदाय बनता है। उसके विरूद्ध हिंसा में बढोत्तरी होती है क्योंकि उसकी ओर से उसके विशिष्ट पारिवारिक कानूनों, खानपान की आदतों, त्योहार मनाने के तरीकों आदि में हस्तक्षेप का विरोध होता है। धार्मिक अल्पसंख्यकों की विविधता पर अलगाववादी मानसिकता का लेबल चस्पा कर दिया जाता है और यह कहा जाता है कि वे 'हिन्दू राष्ट्र' की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। मृदु शक्ति ;मीडिया व शैक्षणिक संस्थान; व कठोर शक्ति ;सुरक्षाबल व नौकरशाही का इस्तेमाल कर अल्पसंख्यकों का दानवीकरण किया जाता है। उन पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे ढेर सारे बच्चे पैदा कर अपने संख्याबल में वृद्धि कर रहे हैं। यह कहा जाता है कि वे बंग्लादेशी घुसपैठिये हैं, आतंकवादी हैं,मंदिरों का ध्वंस करने वाले हैं और हिन्दू संस्कृति को नष्ट कर देना चाहते हैं। यह भी आरोप लगाया जाता है कि देश के मुस्लिम शासकों ने जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाया था। मृदु शक्ति व कठोर शक्ति के द्वारा अल्पसंख्यकों की वर्तमान पीढ़ी से, उसके पूर्वजों द्वारा किए गए कथित अपराधों का बदला लेने को औचित्यपूर्ण सिद्ध किया जाता है।
परंतु राज्य द्वारा पूरे समाज को सांस्कृतिक दृष्टि से एकसार बनाने का विरोधए अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से ही नहीं होता। समाज के कई दूसरे वर्ग, जैसे निम्न व मध्यम जातियां, पिछड़े इलाकों के रहवासी, महिलाएं, आदिवासी,लैंगिक अल्पसंख्यक व अन्य कई वर्ग भी इसके विरोध करते हैं।

वाजपेयी की राजनैतिक मजबूरियां
गठबंधन सरकार चलाने की मजबूरी के चलते, वाजपेयी के शासनकाल में भाजपा ने यह बेहतर समझा कि वह ऐसे मुद्दों को न उठाए जो हिन्दू राष्ट्रवादियों के प्रिय मुद्दे रहे हैं जैसे समान आचार संहिता,बाबरी मस्जिद के स्थान पर रामजन्मभूमि मंदिर का निर्माण और जम्मू कश्मीर को कुछ हद तक स्वायत्तता देने वाले संविधान के अनुच्छेद ३७० की समाप्ति। अगर भाजपा ने वाजपेयी शासन के दौरान अपने इस विघटनकारी एजेण्डे को लागू नहीं किया तो इसका कारण यह नहीं था कि उसकी राजनैतिक सोच में कुछ परिवर्तन आ गया था बल्कि इसका कारण यह था कि उसके पास इन कदमों को उठाने के लिए संसद में आवसश्यक बहुमत नहीं था। परंतु फिर भी, राज्य ने समाज को एकसार बनाने के अपनी परियोजना पर जमकर काम किया।
मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में मुरली मनोहर जोशी ने जे.एस. राजपूत को एनसीईआरटी का निदेशक नियुक्त किया। उन्होंने कई प्रतिष्ठित इतिहासविदों द्वारा लिखी पुस्तकों को स्कूली पाठ्यक्रमों से बाहर कर दिया और इतिहास की किताबों का साम्प्रदायिकीकरण किया, उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवादियों को विभिन्न पदों पर नियुक्त किया और अनुदान के मामले में भेदभाव किया। जोशी ने विश्वविद्यालय स्तर पर ज्योतिष को एक विषय के रूप में शामिल किया और हिन्दू पंडितों को प्रशिक्षित करने के लिए पाठ्यक्रम विकसित करवाए। गुजरात ;व राजस्थान, जहां वसुन्धराराजे सिंधिया मुख्यमंत्री थीं में पाठ्यपुस्तकों में हिटलर की सरकार का गुणगान किया जाने लगा। इन पुस्तकों में हिटलर द्वारा यहूदियों के कत्लेआम की चर्चा तक नहीं की गई। वाजपेयी की सरकार के दौरान ही २००२ के गुजरात दंगे हुए और वाजपेयी ने दंगों के लिए मोदी द्वारा दिये गये
क्रिया.प्रतिक्रिया स्पष्टीकरण को अप्रत्यक्ष रूप से सही ठहराते हुए पूछाए परंतु गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एस.६ कोच में आग किसने लगाई थी?
वाजपेयी सरकार के दौरान ही सन् १९९८ में गुजरात के डांग और मध्यप्रदेश के झाबुआ जिलों में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में तेजी से बढोतरी हुई। इसकी प्रतिक्रिया में न तो सरकार ने पीडि़तों को मुआवजा दिया और ना ही दोषियों को सजा दिलवाने की कोशिश की। उलटे, वाजपेयी ने यह मांग की कि धर्मपरिवर्तन पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। जब भी भाजपा सत्ता में रहती है, हिन्दू राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं की हिम्मत बढ़ जाती है, उन्हें शासन से प्रोत्साहन मिलता है और राज्य के संसाधनों का इस्तेमाल करने की पूरी छूट भी। कानून उन्हें छू भी नहीं पाता। खण्डवा में प्रोफेसर एस एस ठाकुर पर कथित एबीव्हीपी कार्यकर्ताओं ने हमला किया। साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर की मालेगांव में सन् २००८ में हुए धमाकों में संलिप्तता सामने आई। इसी तरह की अनेक घटनाएं देश के विभिन्न भागोंए विशेषकर भाजपा शासित प्रदेशों में हुईं। नौकरशाही में हिन्दू राष्ट्रवादियों की बडे पैमाने पर भर्ती की गई और उन्हें ऐसे पदों पर पदस्थ किया गया जिससे वे भाजपा के मूल एजेण्डे को लागू कर सकें।
हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से दूरी?
बंबई हाईकोर्ट के समक्ष कई चुनाव याचिकाएं दायर की गईं थीं जिनमें यह आरोप लगाया गया था कि शिवसेना और भाजपा उम्मीदवारों ने महाराष्ट्र विधानसभा के सन् १९९५ के चुनाव में धर्म के नाम पर वोट मांगे और विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच शत्रुता उत्पन्न करने के प्रयास किए। इन आरोपों को हाईकोर्ट ने सही ठहराया। इसके बादए साम्प्रदायिक पार्टियों ने चुनाव के दौरान खुलकर धर्म के नाम पर वोट मांगना बंद कर दिया। परंतु किसी पार्टी के असली चरित्र को सिर्फ इस आधार पर आंकना उचित न होगा कि वह चुनाव प्रचार के दौरान किन मुद्दों का इस्तेमाल करती है। अब ये पार्टियां दबे.छुपे ढंग से अपने साम्प्रदायिक संदेश को लोगों तक पहुंचाती हैं। सार्वजनिक तौर पर इन पार्टियों के उम्मीदवार व पदाधिकारी, धर्मनिरपेक्षता की बात करते नजर आते हैं परंतु इन पार्टियों से जुड़े संगठन समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के अपने एजेण्डे पर काम करते रहते हैं। भाजपा के उत्तरप्रदेश प्रभारी अमित शाह, अयोध्या के रामजन्मभूमि मंदिर गए और मीडिया के जरिये उन्होंने लोगों तक यह बात पहुंचाई कि उन्होंने वहां प्रार्थना की कि उस स्थल पर एक भव्य रामजन्मभूमि मंदिर बने। विहिप ने उत्तरप्रदेश में धार्मिक ध्रुवीकरण करने के उद्देश्य से चैरासीकोसी परिक्रमा निकालने की कोशिश की। जब यह नहीं हो सका तब जाट महापंचायत का आयोजन किया गया और साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की भरपूर कोशिश की गई। न तो मोदी और ना ही उनके दाहिने हाथ अमित शाह ने इन गतिविधियों की निंदा की। क्या फिर भी हम यह कह सकते हैं कि मोदी, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से दूर हो गये हैं? मोदी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्वयं कहा कि वे जन्म से हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं इस कारण वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं। अगर केवल हिन्दू राष्ट्रवाद के सहारे भाजपा सत्ता में आ सकती होती तो वह केवल इसी का इस्तेमाल करती। हिन्दू राष्ट्रवाद, भाजपा की मूल विचारधारा है और वह इसका इस्तेमाल उन लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए किया जाता है जो कि कट्टर हिन्दुत्ववादी हैं। इसके साथ.साथए भाजपा और आरएसएस के अन्य अनुषांगिक संगठन अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाने के लिए भी काम करते रहते हैं। चुनाव के दौरान केवल हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा पर जोर देने से काम नहीं चलता। इसलिए इस विचारधारा को त्यागे बगैर, ये संगठन समाज के अन्य वर्गों को आकर्षित करने के लिए कांग्रेस.विरोध, पाकिस्तान के प्रति आक्रामक तेवर व ३५ प्रतिशत युवा उम्मीदवारों को आकर्षित करने के लिए विकास की बातें करते हैं।
भाजपा के कांग्रेस विरोध का उद्देश्य प्रजातंत्र व प्रजातांत्रिक संस्थाओं को मजबूती देना और राज्य को अधिक जवाबदेह बनाना नहीं है। भाजपा का कांग्रेस विरोध दो मुद्दों पर आधारित है पार्टी के अध्यक्ष के इटेलियन मूल का होने का मुद्दा ;गांधी परिवार पर इसलिए हमला किया जाता है क्योंकि वह पार्टी को एक रखे हुए है व उन कार्यक्रमों का विरोध,जो अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए चलाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों को पार्टी अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण बताती है। सच तो यह है कि भाजपा का कांग्रेस विरोध भी उसके हिन्दू राष्ट्रवादी चरित्र का उदाहरण है। पाकिस्तान के खिलाफ विषवमन भी भाजपा के हिन्दू राष्ट्रवादी राजनैतिक कार्यक्रम का हिस्सा है। पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा कर हिन्दू राष्ट्रवादी, मुसलमानों को आईएसआई का एजेण्ट निरूपित करना चाहती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर जो पहला चुनाव मोदी ने लड़ा था वह मियां मुशर्रफ के खिलाफ था!
विज्ञापनों के जरिए भाजपा सरकारों द्वारा किए गए विकास कार्यों का ढोल बजाया जा रहा है। सच यह है कि इस तथाकथित विकास से केवल पूंजीपति और कारपोरेट संस्थान लाभांवित हुए हैं। उनके मुनाफे में आशातीत बढ़ोतरी हुई है। इस विकास से हाशिए पर पड़े समूहों विशेषकर किसानों, श्रमिकों, दलितों और आदिवासियों को कोई लाभ नहीं मिला है। विकास के फल का लाभ समाज के सभी वर्गों तक नहीं पहुंचा है। इसलिए अगर ये पार्टियां चुनाव के दौरान हिंदु राष्ट्रवाद के अपने एजेण्डे के अलावा अन्य मुद्दों पर भी बात करती हैं तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवाद के अपने एजेण्डे को त्याग दिया है। उनका मूल चरित्र वही है और वही रहेगा।   
आरएसएस व मोदी
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी के राजतिलक का भाजपा के सबसे सम्मानित नेता एल के आडवाणी ने विरोध किया था। सुषमा स्वराज, शत्रुध्न सिन्हा व यशवंत सिन्हा ने भी उस बैठक में भाग नहीं लिया था जिसमें मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया गया था। बाद में आडवाणी, राजनाथ सिंह व अन्य नागपुर स्थित आरएसएस के मुख्यालय गए और उन्हें मोदी को स्वीकार करना पड़ा। मोदी केवल भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। वे आरएसएस के भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। आरएसएसए हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है। यह मानना भूल होगी कि आरएसएस ने मोदी की उम्मीदवारी का समर्थन इसलिए किया ताकि वे हिन्दू राष्ट्रवाद की राह से हट सकें। आरएसएस ने अपने हजारों कार्यकर्ताओं को मोदी के समर्थन में प्रचार अभियान में झोंक दिया है। अगर मोदी हिन्दू राष्ट्रवाद के एजेण्डे से जरा भी हटेंगे तो आरएसएस तुरंत अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को प्रचार अभियान से हटा लेगी। मोदी, हिन्दू राष्ट्रवाद के एजेण्डे पर कायम हैं, यह इस तथ्य से भी जाहिर है कि उन्होंने सन् २००२ के दंगों के लिए माफी मांगने से इंकार कर दिया है।
-इरफान इंजीनियर

जब किसी को भार समझा जाने लगे


    अगर धर्म, जाति, रंग या नस्ल के आधार पर किसी समुदाय को देश या बहुसंख्यक वर्ग पर भार समझा जाने लगे, तो उसकी तर्कसंगत परिणति यह होती है कि उस ‘‘आश्रित’’ वर्ग को बहिष्कृत कर दिया जाना चाहिए। याद करें, पहले महायुद्ध में जर्मनी की हार के बाद क्या हुआ था। जर्मनी की हर समस्या के लिए
यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया जाने लगा। यहूदी विरोधी भावनाएँ पहले से मौजूद थीं। हिटलर और उसका साथ देने वाली ताकतों ने यहूदियों से छुटकारा पाने का फैसला कर लिया। 60 लाख यहूदी मार डाले गए।
    अब देखिए भारत में क्या हो रहा है। संघ परिवार हमेशा मुस्लिम विरोधी रहा है। लेकिन अब नफरत के कैप्सूल खुल कर बाँटे जा रहे हैं।
    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह डाॅ. कृष्ण गोपाल कहते हैं कि सच्चर कमेटी की सिफारिशों के जरिए भारत के एक और विभाजन की नींव रखी जा रही है, इससे हिंदुओं की मुसीबत और बढ़ जाएगी, हिंदुओं के पैसे और कमाई से मुसलमानों को सहूलियत देने की तैयारी चल रही है। वह यह भी कहते हैं कि भारत किसी नेता नहीं, हिंदुओं के कारण ही पंथनिरपेक्ष (सेकुलर और धर्मनिरपेक्ष शब्द संघियों का दिमाग असंतुलित कर देते हैं) है।
    संघ का जहरीला और घातक सोच बिना किसी लागलपेट के सामने आ गया। देश की दौलत किसी एक वर्ग की नहीं बल्कि पूरे देश की होती है और पूरे देश में बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक सभी शामिल होते हैं। आधुनिक राज्यसत्ता सर्वग्राही होती है। समान नागरिकता का बोध राज्य सत्ता के अस्तित्व की एक बुनियादी शर्त है। जहाँ-जहाँ, जब-जब इस समान नागरिकता को नकारा गया है, परिणाम भयानक दुखद हुए हैं।
    पाकिस्तान टूटा क्योंकि पश्चिमी हिस्से के पंजाबियों ने यह यकीन कर लिया कि वही पाकिस्तान हैं। उन्होंने पूर्वी हिस्से के बंगालियों को उनके निहायत वाजिब अधिकार देने से मना कर दिया। सर्व वर्चस्व बनाए रखने के हठ ने युगोस्लाविया के टुकड़े-टुकड़े कर दिए।
    महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने भारत की अटूट एकता का फार्मूला स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ही खोज लिया था। फार्मूला था सबकी शिरकत का, सबको साथ लेकर चलने का। इंदिरा गांधी ने मिजोरम में उस फार्मूले पर अमल किया। नतीजा यह हुआ कि हथियारबंद बगावत के नेता लल डेंगा संविधान की कसम खाकर भारत की एकता के सिपाही बन गए। आपत्तिजनक कार्यों के कारण जिन शेख अब्दुल्ला को जेल में डाल दिया गया था, इंदिरा गांधी ने उन्हीं को कश्मीर की बागडोर सौंप दी। असम समझौते के बाद राजीव गांधी ने लाल किले के प्राचीर से घोषणा की थी, कांग्रेस हारी लेकिन भारत जीता। राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग हुए लोगों को साथ लाने के इस जज्बे ने, इस सिद्धांत ने भारत को रखा है और एकता की गारंटी दी है।
    संघ भारत को उस प्राणवायु से वंचित करने में लगा है। ऐतिहासिक कारणों से भारत के कई वर्गों में गरीबी और पिछड़ापन है। इनमें मुसलमान भी हैं।
    सीधी बात है, देश के विकास का फल अगर सभी वर्गों को नहीं मिलेगा, देश का स्वामी होने का भाव अगर समान रूप से सबमें नहीं होगा और परायेपन की भावना मौजूद रहेगी तो देश मजबूत नहीं हो सकता। राज्यसत्ता में अधिकारपूर्वक जिनकी हिस्सेदारी नहीं होती, वे उस राज्यसत्ता के लिए सहर्ष प्राण न्योछावर करने के लिए भी तैयार नहीं रहते। इसलिए हे कृष्ण गोपाल जी नफरत फैला कर, ‘हम और वो’ की स्थाई दीवार खड़ी कर देश को तोड़ने का काम तो आप का संगठन कर रहा है। इसमें आप का नहीं, मानसिकता का दोष है। इसी मानसिकता ने राष्ट्रपिता की हत्या करवाई थी।
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

भेडि़ए की रामनामी चादर

आने वाले चुनाव की एक खास बात यह है कि इस बार फिरकापरस्ती का भेडि़या रामनामी चादर कभी उतार देता तो कभी ओढ़ लेता है। कोई स्थाई मुद्रा नहीं है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठनों के नेता मौका देख कर बोलते हैं। हर जगह एक रिकार्ड नहीं बजाया जा रहा। 7 फरवरी को नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में तीन दिन के ‘उम्मत सम्मलेन’ को संबोधित किया। यह मुस्लिम उद्यमियों का सम्मलेन था। आधुनिक इतिहास में साबरमती नदी महात्मा गांधी के नाम से जुड़ी हुई है, इसलिए प्रतीक स्वरूप ‘उम्मत सम्मलेन’ इसी के किनारे रखवाया गया। मोदी ने मुसलमानों को रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने कहा कि देश के विकास के लिए धर्म, जाति आदि का भेद किए बगैर सबको समानता के अवसर मिलने चाहिए। सबको भयहीन माहौल मिलना चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि दस साल से गुजरात में ये सब मिल रहा है।
    लेकिन दो दिन बाद, 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश की राजधानी का सीन देखिए। संघ के ही सूत्रों से मीडिया को मिली जानकारी के अनुसार भगवा खेमे ने मोदी को प्रधानमंत्री की गद्दी तक पहुँचाने के लिए एक योजना बनाई है। इसके तहत मठों और मंदिरों पर देश भर में ध्यान केंद्रित किया जाएगा। भगवान की आरती और भोग में शामिल होने के लिए आने वाले भक्तों को मोदी के प्रताप की जानकारी दी जाएगी। मोदी के भाषणों के कैसेट दिए जाएँगे। पुस्तिकाएँ दी जाएँगी। मठों, मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों की सूची बनाने का जिम्मा भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्षों को सौंपा गया है।
    भगवान के दर्शन के लिए आने वालों को मोदी के ‘‘दिव्य रूप’’ के दर्शन कराए जाएँ और उसमें नफरत का तड़का न लगे, यह कैसे संभव है। इसलिए भक्तों को बताया जाएगा कि मिशन मोदी को सफल न बनाया तो इसलामी आतंकवाद बढ़ेगा। मुसलमानों के वोट हासिल करने की होड़ में जुटे दल हिंदुओं की भावी पीढि़यों के लिए  नए खतरे पैदा कर देंगे। तो राम मंदिर को भूल राम का इस्तेमाल इस तरह करने लगे! जाहिर है, साबरमती के किनारे नहीं, गोमती के किनारे भाजपा का असली चेहरा सामने आया। अल्पसंख्यक, उसमें भी मुख्यतः मुस्लिम विरोध पर आधारित घृणा संघ परिवार की सिफत है। उसका त्याग संघ परिवार के लिए असंभव है। लेकिन ताल ठोक रहे हैं आतंकवाद से लड़ने की, इसलिए यह याद दिलाना जरूरी है कि अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर और भारत की प्रभुसत्ता की प्रतीक, संसद पर आतंकी हमलों के समय इन्हीं शूरवीरों की सरकार थी।
 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से



गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

धन्य है ये चाल और चरित्र!

ढाई साल के अंदर ही भाजपा में बी.एस. येदुरप्पा की वापसी के साथ ‘अलग चाल, चलन और चरित्र’ का पार्टी का दावा एक बार फिर खोखला साबित हुआ। वापसी भी सुनिश्चित हुई प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार (वैसे इस पद के प्रथम प्रत्याशी लाल कृष्ण आडवाणी अब भी घात लगाए बैठे हैं) नरेंद्र मोदी की इच्छा पर। बड़ी उम्मीदों के साथ येदुरप्पा को वापस लाया गया है। उन्होंने कर्नाटक में विधानसभा का चुनाव जीत कर दक्षिण में पार्टी का झंडा ऊँचा किया था। उन्हीं की वजह से पार्टी के मुँह पर कालिख भी लगी थी और उन्हें बेआबरू होकर पार्टी से बाहर होना पड़ा था।
    यूँ तो येदुरप्पा सरकार की छवि पहले से ही धूमिल हो रही थी, नवंबर 2010 में खुलकर आरोप लगा कि बंगलूर और शिमोगा में हुए भूमि घोटालों में उनके पुत्रों को लाभ मिला। बेलारी, तुमकुर और चित्रदुर्ग में अवैध खनन में भी येदुरप्पा परिवार की संलिप्तता रोशनी में आई। लोकायुक्त संतोष हेगड़े की रिपोर्ट से येदुरप्पा पर मर्मांतक चोट हुई। लोकायुक्त को सरेआम चुनौतियाँ दी जाने लगीं। येदुरप्पा कुर्सी पर बने रहने के लिए आखिरी वक्त तक विरोधियों से दो-दो हाथ करते रहे। पार्टी नेतृत्व का एक वर्ग भी उनके साथ खड़ा था। लेकिन वक्त उनके खिलाफ था। पार्टी लगातार कलंकित हो रही थी। 31 जुलाई 2011 को उन्होंने मुख्यमंत्री का पद छोड़ दिया। 
    येदुरप्पा के इस्तीफे के फौरन बाद पार्टी नेतृत्व अचानक नैतिकता के हिमालय पर बैठा हुआ महसूस करने लगा। उन दिनों यात्राएँ कर रहे आडवाणी ने कहा, ‘‘हम पार्टी की किसी भी कमजोरी को हलके-फुल्के नहीं लेते। कर्नाटक में हमने यह साबित कर दिया। हमने उन्हें पहले ही चेतावनी दे दी थी। लेकिन लोकायुक्त रिपोर्ट आने के फौरन बाद उन्हें इस्तीफा देना पड़ा। हम इस तथ्य से अच्छी तरह अवगत हैं कि काग्रेस के खिलाफ कोई भी पार्टी जनता का विश्वास नहीं जीत सकती, अगर वह खुद उसी तरह की कमजोरियों से ग्रस्त है।’’
    लोकायुक्त अदालत ने एक भूमि घोटाले में येदुरप्पा को जेल भेज दिया। आर.एस.एस. की इच्छा से भाजपा के अध्यक्ष बने नितिन गडकरी ने कहा, ‘‘जो भ्रष्टाचार में लिप्त रहना चाहते हैं, उनके लिए पार्टी में कोई स्थान नहीं हो सकता। उनके लिए दरवाजे बंद हैं।’’ जब बड़े नेता किसी को पीट रहे हों तो छोटों का भी हाथ साफ करने का मन हो जाता है। इसलिए शाह नवाज ने कहा, ‘‘भाजपा में भ्रष्टाचार बिल्कुल नाकाबिले बर्दाश्त है। लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद पार्टी ने कुछ दिनों नहीं, कुछ घंटों में फैसला ले लिया।’’
    उन दिनों चर्चा थी और असलियत भी यह थी कि आडवाणी और उनके समर्थक येदुरप्पा के सख्त खिलाफ हो गए थे। अनंत कुमार खुल कर बोल रहे थे। 9 जनवरी 2014 को बंगलूर में पार्टी मुख्यालय में इन्हीं अनंतजी ने येदुरप्पा को मिठाई खिलाकर पार्टी में उनका स्वागत किया। उन्होंने इस अवसर पर घोषणा की, ‘‘हम फिर अलग कभी नहीं होंगे। हम साथ-साथ रहेंगे। मिलकर संघर्ष करेंगे।’’  येदुरप्पा ने कहा, ‘‘जिस पार्टी को मैंने खड़ा किया था, मेरी अनुपस्थिति में उसे नुकसान पहुँचा। मैं पूरे राज्य का दौरा करूँगा और मोदी को मजबूत करने और प्रधानमंत्री बनवाने के लिए काम करूँगा।’’
    प्रधानमंत्री पद की लालसा क्या-क्या न करवाए। 2008 में कर्नाटक में पार्टी नेतृत्व जब येदुरप्पा के हाथों में था, भाजपा को लोकसभा की 50 में से 33 सीटें मिली थीं। 2008 में पार्टी को राज्य में 33.86 प्रतिशत मत मिले थे। 2013 के विधानसभा चुनाव में येदुरप्पा की कर्नाटक जनता पार्टी को 9.8 फीसदी वोट मिले, जिससे भाजपा 19.95 प्रतिशत पर ठहर गई। भाजपा को उम्मीद है कि येदुरप्पा की वापसी से उनके लिंगायत समुदाय के अधिकांश वोट उसे प्राप्त हो जाएँगे। पार्टी में औपचारिक वापसी से पहले ही येदुरप्पा विश्वास व्यक्त कर चुके हैं कि कम से कम 28 सांसद तो वह मोदी को उपहार में दे ही देंगे। 
यहाँ एक पेंच फँस रहा है। भाजपा अगर अन्य पार्टियों वाली कमजोरियों से ग्रस्त रही, तो वह जनता का विश्वास नहीं जीत पाएगी-आडवाणी की यह चेतावनी सही साबित हो गई तो?
-प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से

नफरत का गुबार

   इस बार चूके तो लंबे समय तक हिंदुओं को प्रताडि़त होना पड़ेगा - डाॅ. कृष्ण गोपाल, सह सरकार्यवाह, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। अभी चुनाव नहीं घोषित हुए हैं, मगर संघ ने असामान्य जहरीला दुष्प्रचार शुरू कर दिया है। संघ ने अपनी राजनैतिक शाखा, भारतीय जनसंघ, भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनाव में हमेशा काम किया है। लेकिन इस बार सीन बिल्कुल बदला हुआ है। संघ के पदाधिकारी भाजपा को विजय दिलाने के लिए खुल कर मैदान में इस तरह पहली बार उतरे हैं। पहली बार उन्होंने पाखंड का यह चोला उतार फेंका है कि संघ तो समाज-राष्ट्र निर्माण को समर्पित एक सांस्कृतिक संगठन है।
    सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल का वक्तव्य संघ परिवार की आशा और चिंता, दोनों को व्यक्त कर रहा है। आशा यह कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अपने विरोधियों के खिलाफ व्यापक दुष्प्रचार और कार्पोरेट जगत से लेकर आम आदमी सहित विभिन्न वर्गों को सब्ज बाग दिखाकर इस बार केंद्र की कुर्सी  तक पहुँचा जा सकता है। चिंता यह कि मोदी का व्यक्तित्व अटल बिहारी वाजपेयी की तरह नहीं है, जिसे उनसे असहमत लोग भी स्वीकार कर लें। अब अगर मोदी के विभाजक व्यक्तित्व के कारण भाजपा सत्ता से वंचित रह गई, तो फिर लंबे समय के लिए वनवास झेलना होगा। दूसरे शब्दों में, संघ परिवार मोदी को फिलहाल अपने तरकश का आखिरी तीर मान रहा है। एड़ी-चोटी का जोर लगा देने का यही कारण है।
    लोकतंत्र में सत्ता हासिल करना एक वाजिब राजनैतिक अधिकार है। लेकिन इस अधिकार पर अमल मर्यादा की जिस सीमा में होना चाहिए, संघ परिवार उसका नृशंस उल्लंघन करने में जुट गया है। देखिए सह सरकार्यवाह क्या कह रहे हैं, ‘‘इस बार चूके तो लंबे समय के लिए हिंदुओं को हिंदू विरोधी ताकतों के हाथों अपमानित और उत्पीडि़त होना पड़ेगा। जाति के नाम पर वोट की ताकत हासिल करने वाले (मानों भाजपा यूपी से लेकर कर्णाटक तक यह करती ही नहीं रही है!) यह नेता इस बार सत्ता में आए तो हिंदुओं को और दीनहीन और उत्पीड़न का शिकार बना कर छोड़ेंगे। इनको वोट का मतलब देशद्रोहियों का समर्थन है। यह सामान्य चुनाव नहीं है। यह देश को संक्रमण काल से उबारने का मौका है। संघ परिवार पर बड़ी जिम्मेदारी है।’’
    नफरत और उन्माद के बूते जब कोई अपना वजूद बनाए हो तो तर्क और विवेक के लिए गुंजाइश नहीं रह जाती। यह सोच पाने की क्षमता नष्ट हो जाती है कि कथन का भावार्थ क्या है। गौर करिए, संघ के सह सरकार्यवाह ने पूरे हिंदू समाज को देशद्रोही बता डाला! कांग्रेस और सेकुलर राजनीति के प्रति अडिग आस्था रखने वाली अन्य पार्टियाँ आखिर ‘‘विधर्मियों और म्लेच्छों’’ (इस शब्दावली पर कॉपी राइट संघ का है) के वोट के बल पर सत्ता में नहीं आती रही हैं। आखिर कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदुओं के विराट बहुमत ने आज तक जनसंघ-भाजपा को वोट नहीं दिया है। तो क्या हिंदुओं की यह कोटि-कोटि संख्या अभी तक देशद्रोह का समर्थन करती रही है? देशद्रोह का समर्थन करने वाले भी तो देशद्रोही हुए!
    बात देशद्रोह तक आ गई है तो बस एक सवाल। आजादी की लड़ाई में मूक दर्शक बने रहने वालों को  किस श्रेणी में रखा जाए? संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। 1925 से 1947 के बीच संघ के अनेक नेताओं और कार्यकर्ताओं की उम्र वही थी, जो जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद, आचार्य कृपलानी, जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया, इंदिरा गांधी (कहाँ तक उल्लेख करें, बहुत लंबी लिस्ट है) खुदीराम बोस, हेमू कालाणी, चाफेकर बंधुओं, असेंबली बम कांड, काकोरी और चटगाँव के वीर सैनिकों की  थी। संघ की शाखाओं में यह गीत प्रायः गाया जाता है- शीश दिया है, मगर नहीं दी कभी देश की माटी है, युगों-युगों से यही हमारी बनी रही परिपाटी है। कृपया एक नाम बताइए जिसने 1925 से 1947 के बीच भारत माता के लिए शीश दिया हो। डमी तलवारों से खड्ग युद्ध का प्रशिक्षण लेकर और लाठियाँ भाँज-भाँज कर आखिर भारत माता के यशस्वी पुत्रों का कैसा परिवार तैयार हुआ जिससे एक भी खुदीराम बोस नहीं निकल सका? हाँ, माफीनामा लिखने वालों के नाम जरूर मिल जाएँगे!  
 -प्रदीप कुमार
लोकसंघर्ष पत्रिका  चुनाव विशेषांक से