मंगलवार, 19 अगस्त 2014

इस्पाती इरादों वाला कद्दावर लेखक

परसाई को याद करते हुए :22 अगस्त को जन्मदिवस पर विशेष 
नई सरकार के अच्छे दिनों की बांट जोह रहा हूं। टमाटर हमारे ऊपर 15 रुपए पाव पड़ रहा है। स्विस बैंक से कालाधन लौटता नहीं दिखता। चहुं ओर धर्म की जय है।  बुद्धिजीवियों को देश में नई ऊर्जा दिख रही है।

देश के बारे में सोचता हूं तो परसाई बरबस ही याद आते हैं। परसाई ने अपने समय के राजनीतिक सवालों से सीधे मुठभेड़ करते हुए अपने लेखन से सांस्कृतिक आंदोलन छेड़ा। पत्रकारिता और साहित्य को समृद्ध करने इस लेखक ने नईदुनिया और देशबंधु समेत अन्य अखबारों में अपने साप्ताहिक स्तंभों से आजादी के बाद से 70 के दशक तक पाठकों को अपने कस्बे, शहर, प्रदेश, देश और अतंराराष्ट्रीय परिदृश्य से एक तार्कित चेतना के साथ अवगत कराया। मध्यम वर्ग की मनोवृत्तियों को रेखांकित किया। परसाई ने अपने कालम्स के जरिए जो लोक शिक्षण किया वह आज की हिंदी पत्रकारिता में दुर्लभ है। परसाई के लेखन की खासियत रोज-मर्रा की आसपास की घटनाओं की राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय स्तर तक व्याप्ति थी। दूसरे विश्वयु्द्ध के बाद देश और दुनिया की सभी प्रमुख घटनाओं, आंदोलनों, और व्यक्तियों के बड़े सूक्ष्म और कलात्मक व्यंग्य चित्र उनके कालमों मिल जाएंगे।
1957 के बाद से नईदुनिया में छपने वाला -सुन भई साधो- नामक स्तंभ बड़ा लोकप्रिय था। परसाई इसमें कबीर के नाम से लिखते थे। वहीं जनयुग नईदिल्ली में 1965 से अदम के नाम से ये -माजरा क्या है- नामक स्तंभ अदम के नाम से लिखते थे। दैनिक देशबंधु में -पूछिये परसाई- से नामक स्तंभ बड़ा लोकप्रिय था, जिसमें परसाई पाठकों के सवालों के जवाब अपने विशिष्ट नजरिए से देते थे। इसी प्रकार अरस्तू की चिट्ठी के अंतर्गत लिखी गई चिट्ठियों में अपने समय के जीवन यथार्थ की सटीक तीखी आलोचना मिलती है। धार्मिक पाखंड, अमानवीय आचरण, सांप्रदायिकता के खिलाफ आजीवन अपनी कलम चलाई। स्वतंत्रता के बाद के सामाजिक यथार्थ को परसाई ने व्यंग्य की कलात्मक विधा से साधा और हिंदी साहित्य में प्रेमचंद के बाद संभवतः सबसे बड़ी सेलिब्रिटी का दर्जा प्राप्त किया। परसाई ने अथक लेखन किया। उनके समग्र लेखन में लघु कथात्मक व्यंग्य रचनाएं, दीर्घकथा, कहानियां, ललित विचारपरक तथ पत्रात्मक निबंध, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मसलों पर व्यंग्य निबंध, संपादकीय आलेख, साक्षात्कार, व्याख्यान और उपन्यास शामिल हैं। परसाई के व्यंग्य निबंध करीब 24 पुस्तकों में संकलित हैं। परसाई की प्रमुख पुस्तकों में सदाचार का ताबीज, पगडंडियों का जमाना, जैसे उनके दिन फिरे, वैष्णव की फिसलन, ठिठुरता हुआ गणतंत्र, निट्ल्ले की डायरी, पाखंड का आध्यात्म, विकलांग श्रद्धा का दौर आदि प्रमुख हैं। परसाई की रचनाओं के फुटकर अनुवाद लगभग सभी भारतीय भाषाओं में प्रकाशित हुए। मलयामल में उनकी सर्वाधिक 4 पुस्तकें प्रकाशित हुईं। परसाई ने 1956 में वसुधा नामक पत्रिका का प्रकाशन संपादन किया। उन्होंने मध्यप्रदेश में प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना की।
उनका जन्म होशंगाबाद जिले के जामनी गांव में 22 अगस्त 1924 को हुआ था। मेट्रिक के दौरान उनकी माताजी की मत्यु हो गई। पिता को असाध्य बीमारी के कारण गहन आर्थिक अभाव में उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाईं। इस संघर्ष ने उन्हें इस्पाती इरादे दिए और समाज की बीमारियों को पकड़ने की दृष्टि दी। उन्होंने जंगल विभाग में नौकरी की। फिर खंडवा और जबलपुर में अध्यापन कार्य किया। 1943 से 1952 तक हाई स्कूल में अध्यापन किया और 1952 में इस्तीफा दे दिया। 1953 से 57 तक प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाया और फिर नौकरी को अलविदा कह दिया। इसके बाद से आजीवन स्वतंत्र लेखन के बूते गुजर-बसर की। आजाद भारत की नब्ज पर परसाई का हाथ था और देश का तापमान उनकी रचनाओं से लोग जान लेते थे। सामाजिक, राजनीतिक जीवन की मूल्यहीनता का कोई भी पहलू उनकी विवेकदृष्टि से बच नहीं सका। समाज के उत्पीड़ित वर्ग, नारियों के प्रति परसाई में गहरी करुणा है। वे मनुष्य के ढोंग को निर्ममता से जाहिर करते हैं। उनकी रचनाओं से समकालीन भारतीय जीवन देखा-समझा जा सकता है।
परसाई का हमारे देश के एक आध्यात्मिक गुरु रजनीश के बारे में एक कोट है अपनी कोशिश से मैं अपने को श्रद्धेय बना सकता था। ताकत के लिए बिजली के इंजेक्शन देने वाले अपने को डाक्टर कहलवा देते हैं। मेरे शहर में एक अध्यापक ने नेम प्लेट पर नाम के आगे आचार्य लिखवा लिया था। मैं समझ गया कि यह आदमी ऊंचा जाएगा। वह गया। बंबई जाकर उसने नेमप्लेट में भगवान लिखवा दिया और आजकल मान्यता प्राप्त भगवान है।
    परसाई, वाल्तेयर, शा, रसेल, सार्त्र, कामू, गोर्की, मायकोवस्की जैसे सामाजिक सक्रियतावादी लेखकों की अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिन्होंने लेखन को सामाजिक जिम्मेदारी का औजार और नागरिक कर्म की तरह अपनाया। अपने आसपास की दुनिया को परसाई की नजर से देखो तो रोमांच होता है, परसाई जिस तरह सामाजिक व्याधियों और विद्रूप को डायग्नोस करते है, वह पाठकों को शिक्षित करने के साथ दृष्टिसंपन्न करता है जो सामाजिक बदलाव का माध्यम बनते हैं। आलोचक श्याम कश्यप के अनुसार परसाई की भाषा सहज, सरल और अत्यंत धारदार है। इसमें विभिन्न प्रकटन, स्थितियों, संबंधों और घटनाओं के यथार्थ वर्णन की अद्भुत क्षमता है। बुंदेली का हल्का सा शेड उनकी भाषा में गजब की चमक ला देता है। परसाई के गद्य में अद्भुत कलात्मकता है। भारतेंदु, प्रतापनारायण मिश्र, बाल मुकुंद गुप्त, और प्रेमचंद के जीवंत गद्य का अगली कड़ी परसाई को कहा जा सकता है। परसाई का प्रभाव उनके समकालीन और बाद के कथाकारों
शिवमूर्ति, अखिलेश, रवींद्रनाथ त्यागी, यशवंत व्यास,.ज्ञान चतुर्वेदी, प्रेम जन्मेजय. स्वयंप्रकाश को देखा जा सकता है।  परसाई अपनी रचनाओं में जिस तरह राजीनीति से सीधी मुठभेड़ करते हैं उसका असर हिंदी साहित्य की तमाम विधाओं के रचनाकारों पर दिखाई देता है। संक्षेप में परसाई का समूचा साहित्य समकालीन सामजिक, राजनितिक, सांस्कृतिक, और साहित्यिक परिदृश्य में एक रचनात्मक हस्तक्षेप है, जो हमें भारत में सामाजिक बदलाव के लिए संस्कारित करता है।

-अभय नेमा, इंदौर 977446791

शनिवार, 16 अगस्त 2014

साहित्य में समाज की खोज

साहित्य में समाज के खोज के अर्थ को जानने से पहले हमें इस बात पर विचार कर लेना आवश्यक जान पड़ता है कि साहित्य और समाज में किस तरह के सम्बन्ध हैं ? क्योंकि साहित्य की अनेक परिभाषाएँ दी गईं हैं । बालकृष्ण भट्ट ने साहित्य को 'जन समूह के हृदय का विकास' माना है तो महावीर प्रसाद द्वेदी ने साहित्य को 'ज्ञानराशि का संचित कोश' माना है । मुक्तिबोध ने 'कलाकृति को जीवन की पुनर्रचना' माना है और रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्य को 'जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब' माना है । साहित्य समाज में होने वाली घटनाओं को केवल हूबहू प्रस्तुत नहीं कर देता बल्कि समस्याओं से निकलने की राह भी दिखाता है । शायद इसीलिए प्रेमचंद ने 'साहित्य को समाज के आगे.आगे चलने वाली मशाल' कहा है । इसके साथ ही वह साहित्य का उद्देश्य सिर्फ मनोरंजन करना नही मानते हैंए बल्कि साहित्य को व्यक्ति के 'विवेक को जाग्रत करने वाला' तथा 'आत्मा को तेजोदीप्त' बनाने वाला मानते हैं । कहने का अर्थ यह है कि सभी विद्वान साहित्य से समाज के घनिष्ट सम्बन्ध तो स्वीकार करते हैं ।
अब प्रश्न उठता है कि साहित्य में अभिव्यक्त समाज को कैसे देखा जाए ! इस पर कई सवाल उठते हैं । क्या साहित्य में अभिव्यक्त समाज को हम प्रामाणिक मान सकते हैं ? जबकि साहित्य में साहित्यकार की कल्पनाएँए आशाएँ एवं आकांक्षाएँ भी व्यक्त होती हैं । इन प्रश्नों पर विचार करते हुए हमें पाश्चात्य जगत् के विद्वानों की मान्यताओं पर भी ध्यान देना चाहिए । 'साहित्य से समाज का घनिष्ट संबंध सबसे पहले नारी मादाम स्तेल स्वीकार करते हुए साहित्य, समाज और राजनीति में भी घनिष्ट संबंध स्थापित किया ।'1 'आगे चलकर मादाम स्तेल की मान्यता का विकास तेन ने किया । तेन साहित्य को समाज के बारे में जानने के लिए प्रमुख स्रोत स्वीकार करते थे रिचर्ड हो गार्ड ने भी 'साहित्य कल्पना' से 'समाजशास्त्रीय कल्पना' का संबंध स्वीकार करते हैं ।'2 चूंकि साहित्यकार भी सभ्यताए संस्कृति और समाज की ही निर्मित है । उनकी कलपनाएँ और आकांक्षाएँ भी इसी समाज से अर्जित होती हैं, अत: साहित्य में समाहित कलपनाओं का भी समाजशास्त्रीय अधययन संभव है ।
हम देखते हैं कि साहित्यिक रचना एक सामाजिक कर्म है और कृति एक 'सामाजिक उत्पादन' । रचना दृ भाषाए भाव और विचारों का विन्यास है । रचना का मर्म उसकी संवेदना और उसकी मानवीय चिंताएं सामाजिक मनोभूमि पर ही प्रतिष्ठित होती हैं । एक सर्जक किसी रचना को जो रूप.आकार और कल्पना देता है वह समाजनिष्ठ होती है । समाज जो कि एक अमूर्त अवधारणा है, उसका सघन और अधिक वर्चस्वकारी रूप हम समूह और समुदाय में देखते हैं । साहित्य रचना और बोध की प्रक्रिया कभी भी अपने सामाजिक संदर्भ से अप्रभावित नहीं रही है । चूंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और मनुष्य की मनुष्यता की अभिव्यक्ति कला और साहित्य के माघ्यम से होती है । साहित्य यदि संवेदनवान होता है तो इसीलिए की उसमें मानव जीवन की उपस्थित भी है । मानव वस्तु नही है इसीलिए उसकी संवेदना वस्तु की तरह ठोस नही होती । साहित्य सृजन हमारा भौतिक सौन्दर्य नही है बल्कि वह हमारी आत्मा का सौन्दर्य हैए वह हमारी भावना और मानस का सौन्दर्य है । मनुष्य के प्रत्येक विचार उसके भाव, उसके कार्य, समुदाय अथवा समाज के भावों,विचारों तथा कार्यों से अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध रहते हैं । क्योंकि समाज से बाहर व्यक्ति का सामाजिक अस्तित्व ही नही रहता । इसीलिए तो जिसे असामाजिक या व्यक्तिवादी साहित्य कहा जाता है उसका भी समाज से एक तरह का रिश्ता होता है और साहित्य में समाज को खोजने का अर्थ निश्चित करते समय इसका भी ध्यान रखना चाहिए ।
हम देखते हैं कि केवल रचना में ही समाज नही होता बल्कि रचना के हर स्तर पर यहाँ तक कि शिल्प, भाषा,संरचना सबमें समाज की अभिव्यक्ति होती है । अब सवाल उठता है कि क्या साहित्य में समाज सीधे.सीधे उतरता है ? अगर हमें कुछ साल पहले का इतिहास जानना हो तो क्या हम साहित्य की मदद ले सकते हैं ?यदि हम स्तंत्रता संग्राम के समय का साहित्य उठाते हैं तो पाते हैं कि उस समय का साहित्य लोगों को जागरुक कर रहा था । इस संदर्भ में अमृतलाल नागर की 'गदर के फूल' और मैथलीशरण गुप्त की 'भारत.भरती' जैसी रचनाएँ देखी जा सकती हैं । स्वतंत्रता संग्राम के समय की रचनाओं में विद्रोह के स्वर मुखर हो रहे थे, इसलिए उस समय की कविताओं, कहानियों,उपन्यासों और नाटकों को प्रतिबंधित किया जा रहा था । अत: स्पष्ट है कि साहित्य समाज और राजनीति से निर्पेक्ष नहीं होता है और अगर देखा जाए तो साहित्य का इतिहास भी समाज के इतिहास से कटा नहीं रह सकता क्योंकि साहित्य का इतिहास भी समाज से जुड़ा हुआ होता है । किसी विद्वान ने सही ही कहा है कि साहित्य में सिर्फ तिथियाँ नही हैं, बाकी वह पूर्ण सामाजिक इतिहास होता है । इसलिए यदि हम सामाजिक इतिहास को ठीक से समझना चाहते हैं तो हमें साहित्य के शरण में जाना पड़ेगा । आज तक जो भी इतिहास लिखे गये हैं उसमें अधिकांश शासक वर्ग के दृष्टिकोण से लिखे गये हैं जिसमें प्राय: कुलीन वर्ग का ही प्रतिनिधित्व रहता है । आम जन प्राय: उसमें से गायब ही रहता है । यह सब तभी जान पाते हैं जब हम उस इतिहास में अभिव्यक्त समाज की खोज करते हैं । शायद इसीलिए आज 'सबल्टर्न हिस्ट्री' की मांग हो रही है । और इस प्रकार के इतिहास लेखन में उस समय का साहित्य काफी मदद्गार साबित हो सकता है । जैसे मध्ययुगीन स्त्रियों, दलितों एवं वनवासियों की स्थिति के बारे में 'रामचरितमानस' से जाना जा सकता है ।
यदि हमें स्वतंत्रता के बाद आंचलिक क्षेत्र में किस तरह राजनीतिक स्थिति थी उसे समझना होता है तो हम रेणु के 'मैला आंचल' को लेते हैं । यदि हम दलित जीवन की यंत्रणा को समझना चाहते हैं तो ओमप्रकाश वाल्मीकि सहित अनेक दलित साहित्यकारों की रचनाओं को पढ़ते हैं,और वर्तमान समय में देखा जाय तो स्त्री जीवन की विडम्बनाओं, इच्छाओं और आकांक्षाओं की पूरी अभिव्यक्ति मैत्रेयी पुष्पा, प्रभाखेतान, अनामिका आदि की रचनाओं में प्रखर रूप से सामने आयी हैं और यदि हम उत्तर भारत के किसानों के जीवन को समझना चाहते हैं तो 'गोदान' को उठाते हैं । यहाँ मेरे कहने का अर्थ यही है कि इन सारी रचनाओं नें अभिव्यकत समाज की खोज करते हैं तभी हम यह जान पाते कि' 'गोदान' किसान जीवन की महागाथा है' । हजारी प्रसाद द्वेदी ने तो प्रेमचंद के विषय में यहाँ तक कह देते हैं कि 'अगर आप उत्तर भारत के समस्त जनता के आचार दृविचार जानना चाहते हैं तो प्रेमचंद से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता' । इस प्रकार के विचार साहित्य में समाज के खोज के अर्थ को अच्छी तरह से साबित करते हैं । बीसवीं सदी के दूसरे.तीसरे दशक का सामाजिक इतिहास 'गोदान' से अच्छा कहाँ मिलेगा ।
साहित्य में समाज के खोज की प्रक्रिया में उपलब्ध समाजशास्त्रीय पद्धतियों से बहुत मदद मिल सकती है । उदाहरण के लिए रणेन्द्र के उपन्यास 'ग्लोबल गाँव के देवता' में आदिवासी जीवन की समस्याओं, विस्थापन की समस्या तथा जमीन्दार एवं आदिवासी समुदाय के बीच के संघर्षों को मार्क्सवादी समाजशास्त्रीय पद्धति एवं ,अस्मितावादी, आलोचना पद्धति की मदद् से बेहतर तरीके से प्रस्तुत कर सकते हैं । इसी तरह से विभिन्न रचनाओं में समाज की खोज संरचनावादी, अनुभववादी आदि अध्ययन पद्धतियों से भी की जा सकती है ।
साहित्य में समाज के खोज का उद्देश्य, साहित्य के सामाजिक आधार को रेखांकित करना है तथा समाज की बदलती परिस्थितियों के साथ साहित्य में परिवर्तन को बतलाना है । इस प्रक्रिया के तहत'नए समाज' के निर्माण में रचनाकार की आकांक्षओं और 'रचना प्रक्रिया' को महत्व देना भी आलोचक का दायित्व हो सकता है ।
इस प्रकार साहित्य में समाज गहरे रूप से व्याप्त है और उसकी खोज की जानी चाहिए क्योंकि साहित्य 'अंतत तिथिरहित सामाजिक इतिहास है ।'
संदर्भ.सूची
1-    मैनेजर पाण्डेय . साहित्य के समाजशास्त्र की भूमिका, हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला, तृतीय संस्करण - 2006, पृष्ठ संख्या - 13
2.   वही पृष्ठ संख्या - 18
सहायक.ग्रंथ.सूची
1.   मैनेजर पाण्डेय . आलोचना की सामाजिकता,वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली,2005
2.    संपा..निर्मला जैन . साहित्य का समाजशास्त्रीय चिंतनए हिन्दी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय, नई दिल्ली विश्वविद्यालय, 1986
-सोनम मौर्या
पी.एच.डी.
प्रथम वर्ष
मोबाइल नं.9013892748
जे. एन. यू.

गुरुवार, 14 अगस्त 2014

क्या 'हिन्दू' हमारी राष्ट्रीय पहचान है ?

सन् 1980 के दशक से पहचान.आधारित राजनीति ने हमारे देश में जड़ें जमानी शुरू कीं। शाहबानो मामले,राममंदिर की समस्या और रथयात्राओं ने पहचान पर आधारित मुद्दों को देश के सामाजिक.राजनीतिक रंगमंच के केन्द्र में ला दिया। इस राजनीति का सबसे पहला बड़ा शिकार बनी बाबरी मस्जिद। कुछ लोग गंभीरतापूर्वक यह विश्वास करने लगे कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और 'हम सब हिन्दू हैं' के नारे की गूंज जगह.जगह सुनाई देने लगी। हाल में, मोदी.भाजपा को लोकसभा में बहुमत मिलने के बाद से यह मुद्दा और जोरशोर से उठाया जा रहा है। सन् 1990 में भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कहा था कि हम सब हिन्दू हैं.मुसलमान, अहमदिया हिन्दू हैं, ईसाई क्रीस्टी हिन्दू हैं और जैन, सिक्ख और बौद्ध तो हिंदू हैं ही। आरएसएस यह मानता है कि बौद्ध, सिक्ख और जैन धर्म, हिन्दू धर्म के पंथ हैं। यह अलग बात है कि कुछ समय पूर्व, जब तत्कालीन सरसंघचालक के. सुदर्शन ने यह कहा था कि सिक्ख, अलग धर्म नहीं वरन् हिन्दू धर्म का पंथ मात्र है तो इसके खिलाफ पंजाब में जोरदार विरोध प्रदर्शन हुए थे। मोदी के सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के बाद से, आरएसएस बार.बार,लगातार यह दोहरा रहा है कि सभी भारतीयों को स्वयं को हिन्दू कहना चाहिए। अंग्रेजी की कहावत है कि कुछ लोगों को जब झुकने को कहा जाता है तो वे दंडवत करने लगते हैं। इसी तर्ज पर, गोवा के उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता फ्रांसिस डिसूजा ने कहा कि सभी ईसाई, हिन्दू हैं। आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि 'सारी दुनिया भारतीयों को हिन्दू मानती है इसलिए भारत, हिन्दू राष्ट्र है। यह बहुत साधारण सी बात है। जिस तरह ब्रिटेन में रहने वाले ब्रिटिश हैं, जर्मनी के सभी निवासी जर्मन हैं और अमेरिका के सभी नागरिक अमरीकी हैं उसी तरह हिन्दुस्तान के सभी रहवासी हिन्दू हैं।' हिन्दुत्व और हिन्दू धर्म जैसी दो नितांत अलग.अलग चीजों का मिश्रण करते हुए उन्होंने कहा, 'सारे भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिन्दुत्व है और इस वर्तमान में इस देश में रहने वाले सभी लोग एक ही महान संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं।' इस तरह के दावों के पीछे असली राजनीतिक एजेण्डा क्या है, इसकी पोल खोलते हुए गोवा के सहकारिता मंत्री दीपक धावलीकर ने विधानसभा में कहा कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतए हिन्दू राष्ट्र बनने की ओर उद्यत है।
सच यह है कि हिन्दू, हिन्दुत्व और हिन्दू राष्ट्र ये तीनों अलग.अलग चीजें हैं और इनका राजनैतिक निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए दुरूपयोग किया जा रहा है। इन तीनों अवधारणाओं को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। हिन्दू धर्म के बारे में जो दावे किये जा रहे हैं, उनकी वर्तमान संदर्भों में पड़ताल अपेक्षित है। हिन्दू शब्द के उदय की कहानी लंबी है। समय के साथ इस शब्द के अर्थ और संदर्भ बदलते रहे हैं। हिन्दू धर्म का राजनैतिक संस्करण हिन्दुत्व है और हिन्दुत्व का राजनैतिक लक्ष्य, हिन्दू राष्ट्र है। इन तीनों शब्दों को संघ परिवार ने अपने राष्ट्रवाद के पैकेज का हिस्सा बना लिया है।
यह दिलचस्प है कि जिन ग्रंथों को हिन्दू धर्मग्रंथ कहा जाता है, उनमें भी 8वीं सदी ईस्वी तक, हिन्दू शब्द का जिक्र नहीं मिलता। दरअसल, हिन्दू शब्द अस्तित्व में तब आया जब अरब और मध्यपूर्व से मुसलमान यहां पहुंचे। उन्होंने सिंधु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया। इस प्रकार, हिन्दू मूलतः एक भौगोलिक अवधारणा है। यही कारण है कि दुनिया के कुछ हिस्सों, विशेषकर पश्चिम एशिया में आज भी भारत को हिन्दुस्तान कहा जाता है। भागवत का यह कहना गलत है कि पूरी दुनिया में भारत को हिन्दुस्तान नाम से पुकारा जाता है। केवल सऊदी अरब और पश्चिम एशिया में यह शब्द प्रचलन में है। सऊदी में आज भी भारत से जाने वाले हाजियों को हिन्दी कहा जाता है और सऊदी अरब की स्थानीय भाषा में गणित को हिन्दसा ;हिन्द से आया हुआ; कहा जाता है।
समय के साथ हिन्दू, भौगोलिक के स्थान पर धार्मिक अवधारणा बन गया और सिंधू नदी के पूर्व में रहने वाले लोगों की धार्मिक परंपराओं और कर्मकाण्डों को हिन्दू कहा जाने लगा। यह दावा कि प्राचीन भारत में हिन्दू संस्कृति का बोलबाला था, बेबुनियाद है। सिंधू घाटी की सभ्यता, देश के दूसरे इलाकों की सभ्यता व संस्कृति से एकदम भिन्न थी। शुरूआत में आर्य पशुपालक थे परंतु बाद में उन्होंने एक जगह रहकर खेती करना और राज्यों व साम्राज्यों की स्थापना करना शुरू कर दिया। भारत में पहले से रहने वाले आदिवासियों की अपनी एक अलग संस्कृति थी। उसी तरह, ब्राह्मणवादी व बौद्ध परंपराएं एकदम अलग.अलग थीं। जहां ब्राह्मणवाद जन्म.आधारित जातिगत ऊँचनीच में विश्वास करता था वहीं बौद्ध धर्म इसका विरोधी था। यह कहना कि पूरे प्राचीन भारत में एक सी संस्कृति थी, एकदम गलत है। हम सब जानते हैं कि संस्कृति, नए लोगों के किसी स्थान पर बसने और उस स्थान पर रहने वाले लोगों के दूसरी जगह जाने से परिवर्तित होती रहती है।
हिन्दुत्व शब्द का उदय 19वीं सदी में हुआ जब उभरते हुए राष्ट्रीय आंदोलन के विरूद्ध सांप्रदायिक राजनीति ने मोर्चा संभाला। जब सन 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई तब मुसलमान और हिन्दू, दोनों धर्मों के सामंती तत्वों ने इसका विरोध किया और अपनी सांप्रदायिक सोच को हवा दी। हिन्दू संप्रदायवादियों की सोच को ही मोटे तौर पर हिन्दुत्व कहा जाता है। इस विचारधारा को आकार देने में सावरकर ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सावरकर ने ही सबसे पहले सन् 1924 में हिन्दू शब्द की परिभाषा दी। उन्होंने कहा कि हिन्दू वह है जिसकी पितृभूमि और पुण्यभूमि दोनो भारत हैं। इस तरह ईसाई और मुसलमान, अपने आप हिन्दू धर्म की परिभाषा से बाहर हो जाते हैं। सावरकर के अनुसार हिन्दू वह है जो आर्य है, ब्राह्मणवादी संस्कृति में विश्वास रखता है और हिमालय से लेकर समुद्र तक फैले भूभाग में रहता है। सावरकर ने ही हिन्दू राष्ट्र की अवधारणा को आकार दिया। इस अवधारणा को 1925 में आरएसएस ने अपने लक्ष्य के रूप में अपना लिया। हिन्दू राष्ट्र का लक्ष्य, भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के लक्ष्य से एकदम भिन्न था। राष्ट्रीय आंदोलन का उद्देश्य धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक भारत का निर्माण करना था।
यह बार.बार कहा जा रहा है कि हम सब को अपने आप को इसलिए हिन्दू कहना चाहिए क्योंकि हिन्दू,दरअसल, कोई धर्म नहीं बल्कि जीने का तरीका है। और इस देश के सभी निवासी एक ही तरह से जीते हैं। यह लोगों को बेवकूफ बनाने की चाल है। कोई मुस्लिम भी यह कह सकता है कि इस्लाम,धर्म नहीं वरन् जीवन पद्धति है। यह स्पष्ट है कि केवल धर्म, जीवनपद्धति नहीं हो सकता। जीवनपद्धति धर्म से अधिक विस्तृत अवधारणा है और इसमें भाषा, स्थानीय संस्कृति आदि शामिल हैं,जो कि पूरे देश में कभी एक नहीं हो सकते। उसी तरह, धर्म भी एकसार नहीं है। दरअसल, धर्म, जीवनपद्धति का एक हिस्सा है। वह जीवनपद्धति नहीं है और न हो सकता है। नवस्वतंत्र देश का क्या नाम होना चाहिएए इस पर संविधान सभा में लंबी बहस हुई थी और अंत में यह तय किया गया कि देश का नाम 'इंडिया देट इज भारत' होगा। यह नाम किसी धर्म विशेष से जुड़ा हुआ नहीं है। हिन्दू शब्द के राष्ट्रीय.सांस्कृतिक अर्थ नहीं है। यह एक विशुद्ध धार्मिक शब्द है। भारत के सभी निवासियों को हिन्दू बताने के खेल के पीछे एक कुटिल चाल है। पहले भौगोलिक पहचान की बात करोए फिर कहो कि चूंकि हम सब के पूर्वज एक ही हैं और चूंकि हम सब हिन्दू हैं इसलिए गीता और मनुस्मृति हमारी राष्ट्रीय पुस्तकें हैं और गाय हमारा राष्ट्रीय पशु हैं और हम सबको राम आदि की पूजा करनी चाहिए।
आरएसएस जो कुछ कर रहा है वह कोई सीधा.साधा या सामान्य सा प्रयास नहीं है। उसका अंतिम तर्क यह होगा कि 'हम सब हिन्दू हैं अतः भारत हिन्दू राष्ट्र हैए, अतः हमें हिन्दू धर्म के स्वनियुक्त ठेकेदारों और हिन्दू साधु.संतों के निर्देष मानने हैं।' इस मुद्दे पर हमारा संविधान बहुत साफ है हिन्दू एक धार्मिक पहचान है जबकि भारतए राष्ट्रीय पहचान है। आरएसएस का न तो स्वाधीनता संग्राम से कोई लेनादेना रहा है और ना ही भारतीय संविधान में उसे कोई विशेष श्रद्धा है। आश्चर्य नहीं कि उसका एजेण्डा भारतीय संविधान की आत्मा और उसके प्रावधानों के ठीक उलट है। आरएसएस दरअसल देश पर हिन्दू पहचान लादना चाहता है। संघ का अगला कदम क्या होगा, यह आरएसएस के एक अभ्यास वर्ग में हुए प्रश्नोत्तर से जाहिर है। आरएसएस के एक नेता यादवराव जोशी का कुछ दशक पहले का निम्नांकित कथन महत्वपूर्ण है और आरएसएस के असली एजेण्डे की झलक दिखलाता है। 'प्रश्नोत्तर के दौरान एक स्वयंसेवक ने जोशी, जो कि उस समय आरएसएस के दक्षिण भारत प्रमुख थे, से जानना चाहा 'हम कहते हैं कि आरएसएस एक हिन्दू संगठन है। हम कहते हैं कि भारत हिन्दुओं का देश है। उसी सांस में हम यह भी कहते हैं कि ईसाई और मुसलमान अपने.अपने धर्मों का पालन करते रह सकते हैं बशर्ते वे भारत के प्रति वफादार रहें और देश से प्रेम करें। हमें यह छूट देने की क्या आवश्यकता है? हम यह क्यों साफ नहीं कहते कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और उसमें मुसलमानों और ईसाईयों के लिए कोई स्थान नहीं है।यादवराव जोशी ने उत्तर देते हुए कहा, 'वर्तमान में हिन्दू समाज और आरएसएस इतने शक्तिशाली नहीं है कि हम ईसाईयों और मुसलमानों से यह कह सकें कि यदि उन्हें भारत में रहना है तो उन्हें हिन्दू धर्म को स्वीकार करना होगा। या तो वे हिन्दू बनें या मारे जायें। परंतु जब हिन्दू समाज और आरएसएस पर्याप्त शक्तिशाली हो जायेंगे तब हम उनसे कहेंगे कि यदि वे भारत में रहना चाहते हैं और यदि वे भारत से प्रेम करते हैं तो उन्हें यह स्वीकार करना होगा कि कुछ पीढि़यों पहले तक वे हिन्दू थे और उन्हें हिन्दू धर्म में वापसआनाहोगा।'http://www.caravanmagazine.in/reportage/rss-30#sthash.GmBGCZLQ.dpuf
जो बात आरएसएस वर्षों से कहता आ रहा हैए केन्द्र में मोदी के सत्ता में आने के बाद उसके सदस्य अब वही बात और जोर.जोर से साफ शब्दों में कह रहे हैं। आरएसएस के मुखिया भागवत के बयान और आरएसएस के सदस्यों द्वारा टीवी पर आयोजित बहसों में जो भी कहा जा रहा हैए वह भारतीय संविधान के मूल्यों के स्पष्टतः खिलाफ है। अतः आवश्यक है कि भारत के हम सभी नागरिक इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करें कि हम आखिर किस दिशा में जा रहे हैं। क्या हम उन मूल्यों और सिद्धांतों को पूरी तरह त्याग देना चाहते हैं जो हमारे राष्ट्रीय आंदोलन और संविधान की रीढ़ हैं? इन सिद्धांतों और मूल्यों को हमें बचाए रखना है और देश को संकीर्ण ताकतों के हाथों का खिलौना नहीं बनने देना है। यही समय की मांग है।
-राम पुनियानी,

मंगलवार, 12 अगस्त 2014

पर खड़ा रहा नहीं,निर्धनों का झोपड़ा


रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं
दिन गए बरस गए यातना गई नहीं

रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं
एक ही तो प्रश्न है, रोटियाँ के पीर का

पर उसे भी आसरा है आंसुओं के नीर का
राज है गरीब का ताज दानवीर का

तख्त भी पलट गए पर कामना गई नहीं
रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं

वेणु श्याम की बजी,राम का धनुष चढ़ा
युद्ध भी लड़े गए,ज्ञान बुद्ध का बढ़ा

पर खड़ा रहा नहीं,निर्धनों का झोपड़ा
अर्थियां चली गईं पर योजना गई नहीं

रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं।
जो स्वयं भटक रहे, राह वह दिखा रहे

जो रमे महल-महल त्याग वह सिखा रहे
जग हुआ शहीद तो नाम वह लिखा रहे

पंच के प्रपंच में प्रवंचना गई नहीं
रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं

भूप संत रहनुमाँ,यह कभी तो वह कभी
मंच से उतर गए एक-एक कर सभी

प्यास है अभी वहीं भूख है अभी वहीं
साँस है तो भूख की पर वासना गई नहीं

रोटियाँ गरीब की प्रार्थना बनी रहीं
- गोपाल सिंह 'नेपाली'

बुधवार, 6 अगस्त 2014

भारतीय इतिहास का ‘बत्रा युग’


जनाब पी एन ओक का नाम कितने लोगों ने सुना है, जिन्होंने फौज से रिटायरमेण्ट के बाद अपनी उम्र यही लिखने में गुजार दी कि ‘क्रिश्चानिटी और इस्लाम दोनों हिन्दु धर्म से ही व्युत्पन्न हैं’ या ‘ताजमहल की तरह कैथोलिक वैटिकन, काबा और वेस्टमिन्स्टर अब्बे’ ये सभी एक जमाने में शिवमंदिर थे,’ या ‘वैटिकन मूलतः वैदिक रचना है जिसका मूल नाम वाटिका है’ और ‘पोप का पद किसी जमाने में वैदिक पुरोहितवर्ग का प्रतीक है’ ‘भारत में इस्लामिक आर्किटेक्चर’ नाम से कोई चीज़ अस्तित्व में नहीं है, वगैरा।
भाजपा की अगुआई में जब पहली दफा राजग की सरकार बनी, उन दिनों ओक ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाया था और एक याचिका दायर की थी कि ताजमहल के इतिहास का पुनर्लेखन किया जाए क्योंकि उसे शाहजहां ने नहीं बल्कि एक हिन्दू राजा ने बनाया है। यह अलग बात है कि सुप्रीम कोर्ट की द्विसदस्यीय पीठ ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि यह ‘बकवास’ है और याचिका का मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि ‘किसी बाॅनेट में मधुमक्खी घुस गयी है, इसलिए यह याचिका दायर हुई है’ (समबडी हैज ए बी इन हिज बानेट, हेन्स धिस पीटिशन)
अब गुजरात सरकार द्वारा सरकारी स्कूलों के लिए अनिवार्य बना दी गयी दीनानाथ बात्रा की किताबों को पलटें, तो ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वह ‘हिन्दू संस्कृति के गौरव’ का बखान करते हुए कहीं कही जनाब ओक को भी मात देते हैं।
गौरतलब है कि विगत 30 जून को गुजरात सरकार ने एक परिपत्रा के जरिए राज्य के 42,000 सरकारी स्कूलों को यह निर्देश दिया कि वह पूरक साहित्य के तौर पर दीनानाथ बात्रा की नौ किताबों के सेट को शामिल करे। इन किताबों को लेकर पिछले दिनों ‘इंडियन एक्स्प्रेस’ ने दो तीन भागों में स्टोरी की। अलग अलग किताबांे के अलग अलग पन्नों पर अंकित सामग्री में से कुछ अंशों को इसमें पाठकों के साथ साझा किया गया थाः
- क्या आप भारत का नक्शा बना रहे हैं ? इस बात की गारंटी कर लें कि आप उसमें पाकिस्तान, अफगाणिस्तान, नेपाल, भूतान, तिब्बत, बांगलादेश, श्रीलंका और माइनामार अर्थात बर्मा को भी शामिल कर रहे है। यह सभी अविभाजित भारत या ‘‘अखंड भारत’’ का हिस्सा हैं।
- पाकिस्तान का स्वतंत्राता दिवस 14 अगस्त को , राष्ट्रीय छुटिटयों में शामिल करना होगा जिसे ‘‘अखण्ड भारत स्मृति दिवस’’ के तौर पर मनाना चाहिए।
- आप की सालगिरह पर मोमबत्ती न जलाएं क्योंकि वह ‘‘पश्चिमी संस्कृति’’ का हिस्सा है और उसका विरोध किया जाना चाहिए। इस दिन स्वदेशी कपड़ों को पहने, हवन का आयोजन करें, अपने इष्टदेव की पूजा करें, गायों को भोजन दें
अनिवार्य वाचन के लिए सरकार के प्रायमरी एवं सेकेण्डरी स्कूलों में इस साल से अनिवार्य बनायी गयी यह किताबें न केवल भारत की संस्कृति, इतिहास और भूगोल के ‘‘तथ्यों’’ से बच्चों को अवगत कराती है, वह विज्ञान खासकर मील का पत्थर माने जानेवाली खोजों को लेकर भी अलग नज़रिया रखती हैं। ‘तेजोमय भारत’ किताब में भारत की ‘महानता’ के किस्से बयान किए गए है:
अमेरिका स्टेम सेल रिसर्च का श्रेय लेना चाहता है, मगर सच्चाई यही है कि भारत के बालकृष्ण गणपत मातापुरकर ने शरीर के हिस्सों को पुनर्जीवित करने के लिए पेटेण्ट पहले ही हासिल किया है .. आप को यह जान कर आश्चर्य होगा कि इस रिसर्च में नया कुछ नहीं है और डा मातापुरकर महाभारत से प्रेरित हुए थे। कंुती के एक बच्चा था जो सूर्य से भी तेज था। जब गांधारी को यह पता चला तो उसका गर्भपात हुआ और उसकी कोख से मांस का लम्बा टुकड़ा बाहर निकला। द्वैपायन व्यास को बुलाया गया जिन्होंने उसे कुछ दवाइयों के साथ पानी की टंकी में रखा। बाद में उन्होंने मांस के उस टुकड़े को 100 भागों में बांट दिया और उन्हें घी से भरपूर टैंकों में दो साल के लिए रख दिया।दो साल बाद उसमें से 100 कौरव निकले। उसे पढ़ने के बाद मातापुरकर ने एहसास किया कि स्टेम सेल की खोज उनकी अपनी नहीं है बल्कि वह महाभारत में भी दिखती है। (पेज 92-93)
हम जानते हैं कि टेलीविजन का आविष्कार स्काटलेण्ड के एक पादरी ने जान लोगी बाइर्ड ने 1926 में किया। मगर हम आप को उसके पहले दूरदर्शन में ले जाना चाहते हैं ..भारत के मनीषी योगविद्या के जरिए दिव्य दृष्टि प्राप्त कर लेते थे। इसमें केाई सन्देह नहीं कि टेलीविजन का आविष्कार यहीं से दिखता है .. महाभारत में, संजय हस्तिनापुर के राजमहल में बैठा अपनी दिव्य शक्ति का प्रयोग कर महाभारत के युद्ध का सजीव हाल दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को दे रहा था। पेज 64
हम जिसे मोटरकार के नाम से जानते हैं उसका अस्तित्व वैदिक काल में बना हुआ था। उसे अनाश्व रथ कहा जाता था। आम तौर पर एक रथ को घोड़ों से खींचा जाता है मगर अनाश्व रथ एक ऐसा रथ होता है जो घोड़ों के बिना - यंत्रा रथ के तौर पर चलता है, जो आज की मोटरकार है, ऋग्वेद में इसका उल्लेख है। - पेज 60
हम आसानी से देख सकते हैं कि जहां पी एन ओक ने अपने आप को हिन्दू धर्म के सर्वोपरि साबित करने तक सीमित किया था, वहीं दीनानाथ बात्रा विज्ञान की खोजों की जड़ें भी हिन्दू धर्म में ढंूढ लेते हैं और वैदिक काल को सर्वश्रेष्ठ काल बताते हैं।
यह तो कोई सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी बता सकता है कि ऐसी मनगढंत बातें पढ़ना अनिवार्य बना कर बाल मन को किस कदर अवरूद्ध किया जा रहा है।
दिलचस्प बात यह है कि गुजरात के सरकारी स्कूलों में पूरक पाठयक्रम में शामिल इन किताबों में प्रधानमंत्राी जनाब नरेन्द्र मोदी एवं गुजरात के शिक्षामंत्रियों भूपेन्द्र सिंह चुडासमा, नानूभाई वडानी और वासुबेन त्रिवेदी आदि के सन्देश भी शामिल किए गए हैं। क्या यह पूछा जाना जरूरी नहीं कि संविधान की कसम खाएं यह सभी महानुभाव आखिर किस बुनियाद पर ‘अखंड भारत’ के नाम पर पड़ोसी सम्प्रभु राष्ट्रों को भारत के नक्शे में शामिल करने की इस अनर्गल हरकत को औचित्य प्रदान कर रहे हैं। और ऐसी वैज्ञानिक खोजें - जिनके आविष्कार को लेकर दुनिया जानती है - उन्हें ‘वैदिक काल’ की खोज बता कर दुनिया में अपनी हंसी उड़वाना क्यों चाहते हैं ?
अन्त मंे, सुकरात से लेकर पाॅलो फ्रायरे तक महान शिक्षकों ने हमेशा शिक्षा की ऐसी व्यवस्था की हिमायत की है जो प्रश्न पूछने के बच्चों की क्षमता को बढ़ावा दे, उनके आलोचनात्मक चिन्तन जगाए जो पारम्पारिक प्राधिकारों को चुनौती दे सके। किसी भी परिघटना की वस्तुनिष्ठ पड़ताल ही ज्ञान के विकास एवं सामाजिक भलाई को बढ़ावा दे सकती है।
और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सम्बद्ध विद्या भारती के प्रमुख दीनानाथ बात्रा ब्राण्ड समाजविज्ञान इस सभी का प्रतिलोम है।
-सुभाष गाताडे
लोकसंघर्ष   पत्रिका के सितम्बर   2014 में प्रकाशित होगा

फतवे और मुस्लिम महिलाएं

उच्चतम न्यायालय ने 7 जुलाई 2014 को घोषित अपने एक निर्णय में कहा कि फतवों की कोई कानूनी वैधता नहीं है और फतवे किसी फौजदारी या दीवानी मामले में निर्णय का आधार नहीं बन सकते। स्वतंत्र भारत की संवैधानिक व्यवस्था में फतवों के लिए कोई जगह नहीं है। यद्यपि सुप्रीम कोर्ट ने इस्लामिक धार्मिक संस्थाओं जैसे दारूलउलूम, देवबंद, दारूलकज़ा या निजामेकज़ा द्वारा फतवे जारी करने पर प्रतिबंध नहीं लगाया है क्योंकि'फतवे अपने आप में गैरकानूनी नहीं हैं' परंतु न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि 'फतवे अदालती डिक्री नहीं है और ना ही वे न्यायालयों, राज्य अथवा व्यक्ति पर बंधनकारी हैं।'
उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में संतुलित रूख अपनाया है। जहाँ उसने फतवों को प्रतिबंधित नहीं किया है वहीं यह स्पष्ट कर दिया है कि वे बंधनकारी नहीं होंगे और अदालतें उनका संज्ञान नहीं लेंगी। न्यायालय किसी भी व्यक्ति को अपनी धार्मिक राय व्यक्त करने से नहीं रोक सकता क्योंकि संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद का धर्म मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। परंतु ये विचार किसी तीसरे व्यक्ति पर लादे नहीं जा सकते और ना ही किसी को उन्हें मानने पर मजबूर किया जा सकता है। मुस्लिम समुदाय में साक्षरता व शिक्षा का स्तर नीचा होने के कारण व सामाजिक.आर्थिक पिछड़ेपन और सुरक्षा की भावना के अभाव के चलते, समुदाय के गरीब तबके के सदस्य आधा.अधूरा ज्ञान रखने वाले इमामों ;वह व्यक्ति जो मस्जिदों में नमाज का नेतृत्व करता है,द् द्वारा जारी फतवों को भी ईश्वरीय कानून समझ बैठते हैं। इन लोगों के दैनिक जीवन में धार्मिक संस्थायें और संगठन महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। वे उन्हें मदद और नैतिक सहारा उपलब्ध करवाते हैं जिसके कारण उन पर इन संगठनों का गहरा प्रभाव रहता है। फतवों आदि को पुरूषों की तुलना में महिलाएं अधिक महत्व देती हैं क्योंकि मुस्लिम समुदाय में अब भी पितृसत्तामक मूल्यों का बोलबाला है और महिलाओं को पुरूषों के बराबर दर्जा उपलब्ध नहीं है। असम की एक मस्जिद के इमाम ने कुछ समय पहले एक बहुत अजीब सा फतवा जारी किया था। एक महिला ने अपने पड़ोसियों को बताया कि उसके पति ने सपने में तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण किया। पति.पत्नि दोनों ने इस सपने को हंसी में उड़ा दिया परंतु पड़ोसियों ने इसकी सूचना इमाम को दे दी जिसने तुरंत यह घोषणा कर दी कि सपने में भी तीन बार तलाक कहने से पति.पत्नि का तलाक हो गया है और अब उनका साथ रहना हराम है। इस तरह के मूर्खतापूर्ण फतवों को भी समुदाय के कुछ सदस्य महत्व देते हैं और इससे समुदाय की छवि को गंभीर क्षति पहुंचती है। कई बार मुफ्ती और इमाम, परस्पर विरोधाभासी फतवे जारी कर देते हैं। सुन्नियों में चार विधिशास्त्र प्रचलित हैं.हनाफी, ,शफी व मलिकी और शियाओं में तीन.जाफरी, इस्माइली व जैदी। जाहिर है कि जो इमाम या मुफ्ती इन सात विधिशास्त्रों में से जिसे मानता है,  वह उसके हिसाब से फतवा जारी कर देता है। ऐसे में इन फतवों में परस्पर विरोधाभास स्वाभाविक है।
फतवों के बारे में कई तरह के भ्रम हैं। फतवे जारी करना और वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता करना दो अलग.अलग चीजें हैं। फतवे जारी करने का काम दारूलइफ्ता द्वारा किया जाता है जबकि वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता करने का काम दारूलकज़ा या निजामेकज़ा का है। कभी.कभी बिरादरी के सदस्य मिलकर भी इस तरह के विवादों का निपटारा करते हैं। दारूलकज़ा द्वारा की जाने वाली मध्यस्थता को ही शरिया अदालत कहा जाता है। इस मामले में याचिकाकर्ता एडवोकेट विश्वलोचन मदान ने उच्चतम न्यायालय से यह प्रार्थना की थी कि शरिया अदालतों पर प्रतिबंध लगाया जाए और काजियों और नायब काजियों को आम लोगों की जिंदगी में हस्तक्षेप करने के अधिकार से वंचित किया जाए।
फतवाए अरबी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है राय या मत। दूसरे शब्दों मेंए फतवा, शरियत से जुड़े किसी मसले पर फतवा जारी करने वाले की राय है। चूंकि इस्लाम में पुरोहित वर्ग नहीं है अतः फतवा जारी करने वाला चाहे कितना ही विद्वान क्यों न हो, फतवा कभी किसी पर बंधनकारी नहीं हो सकता। दारूलइफ्ता द्वारा जारी हर फतवे की अंतिम पंक्ति यह होती है,'परंतु अल्लाह बेहतर जानता है'। इन शब्दों से ही यह स्पष्ट है कि फतवा जारी करने वाला यह स्वीकार कर रहा है कि उसने अपने ज्ञान के हिसाब से जो भी कहा है वह बंधनकारी नहीं है क्योंकि'अल्लाह बेहतर जानता है'।
फतवा तब जारी किया जाता है जब कोई व्यक्ति अपनी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़े किसी मसले पर शरियत के अनुरूप राय मांगे। इस तरह की राय कोई भी व्यक्ति मांग सकता है और यह आवश्यक नहीं है कि मुद्दा उससे ही संबंधित हो। कई बार पत्रकार,मस्जिदों के इमामों से किसी भी मुद्दे पर उनकी राय पूछ लेते हैं। इन इमामों को इस्लामिक धर्मशास्त्र का बहुत अल्प ज्ञान होता है। इनकी राय को बाद में फतवे के रूप में अखबारों में छापा जाता है या टीवी चैनलों पर प्रसारित किया जाता है। इसका उद्देश्य अखबार की बिक्री या चैनल का टीआरपी बढ़ाना होता है। दूसरे अखबार व चैनल भी इन फतवों पर महीनों चर्चा करते हैं। इमराना के मामले में फतवा एक पत्रकार के अनुरोध पर जारी किया गया था ना कि इमराना या उसके पति या उसके बलात्कारी ससुर के कहने पर।
फतवे केवल इस्लामिक विद्वानों द्वारा,इस्लामिक कानून के आधार पर, जारी किए जा सकते हैं। जो व्यक्ति फतवे जारी करने के लिए अधिकृत होता है उसे मुफ्ती कहा जाता है। जो व्यक्ति फतवे जारी करता है उसका एकमात्र उद्देश्य फतवा मांगने वाले को सही रास्ता दिखाना होना चाहिए। उसे धर्मशास्त्र का गहरा ज्ञान होना चाहिए। उसे संतुलित व शांत तबियत का होना चाहिए और उसे समकालीन मुद्दों और सामान्य लोगों के जीवन की जानकारी होनी चाहिए। अल्लामा इकबाल ने अपनी पुस्तक 'रिकन्सट्रक्शन ऑफ रिलीजियस थॉट इन इस्लाम' में लिखा है कि मुसलमानों की हर पीढ़ी को सभी मुद्दों पर पुनर्विचार करना चाहिए और अपनी बदली हुई आवश्यकताओं के अनुरूप नए नियम और कानून बनाने चाहिए। गांवों की मस्जिदों में बहुत कम वेतन पर काम करने वाले इमामों को न तो धर्मशास्त्र का ज्ञान होता है और ना ही वे इतने बुद्धिमान व समझदार होते हैं कि किसी मुद्दे पर ठीक राय दे सकें। जो कुछ लिखा है वे उसे यंत्रवत दोहरा देते हैं। इससे कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होती हैं और वे उपासना, अर्थव्यवस्था, परिवार, राजनीति, सरकार आदि किसी भी मुद्दे पर अपनी अधकचरी राय को फतवे के रूप में प्रस्तुत कर देते हैं।
फतवा किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित हो सकता है या फिर पूरे समुदाय से। मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने विभिन्न पंथों के उलेमा द्वारा भारत के विभाजन के विरूद्ध जारी सौ से अधिक फतवों को संकलित कर एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया था। जिस नये मुस्लिम देश को बनाने की मांग की जा रही थी उसका नाम पाकिस्तान रखा जाना प्रस्तावित था। मदनी का कहना था कि किसी भी भौगोलिक इलाके को'पाक' अर्थात पवित्र कहना गुनाह है। उनका यह भी तर्क था कि इस्लाम के पैगम्बर ने जिस पहले राज्य की स्थापना की थी वह समग्र राष्ट्रवाद पर आधारित था। मदीना के समझौते के अनुसार मुसलमानों, ईसाईयों और यहूदियों ने यह प्रण किया था कि मदीना पर यदि उसके शत्रु हमला करेंगे तो वे एकसाथ मिलकर शत्रु से मुकाबला करेंगे परंतु साथ हीए मदीना के सभी रहवासी अपने.अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र होंगे। भारत का राष्ट्रवाद भी समग्र राष्ट्रवाद था जिसमें सभी धर्मों को फलने.फूलने का मौका उपलब्ध था और मुसलमानों को अपने धर्म का पालन करने की आजादी थी। मदनी ने देश के एक कोने से दूसरे कोने तक यात्राएं कीं और सार्वजनिक सभाओं में मुसलमानों से यह अपील की कि पाकिस्तान के निर्माण का विरोध करना उनका धार्मिक कर्तव्य है।
इसी तरह निर्दोशों को निशाना बनाने वाले आतंकवाद के खिलाफ भारत और दुनिया के अन्य कई देशों के उलेमा ने फतवे जारी किए हैं। तुर्की के मर्दिन में हुई बैठक में सऊदी अरब, तुर्की, भारत, सेनेगल, कुवैत,ईरान,मोरक्को व इंडोनेशिया से आए इस्लामिक विद्वान इकट्ठा हुए। इनमें बोस्निया के बड़े मुफ्ती मुस्तफा सेरिक, मोरिटीनिया के शेख अब्दुल्ला बिन बया और यमन के शेख हबीब अली अल.जिफ़री शामिल थे। इस बैठक में इन सभी विद्वानो ने इमाम इब्न तैमिया के उस फतवे को खारिज किया जिसका इस्तेमाल ओसामा बिन लादेन और उसके समर्थक अपनी तथाकथित जिहाद को उचित ठहराने के लिए कर रहे थे। इमाम इब्न तयमिया के फतवे में यह कहा गया था कि किसी अन्यायी शासक के खिलाफ हिंसा का इस्तेमाल औचित्यपूर्ण है यदि अन्याय से लड़ने का वही एकमात्र रास्ता बचा हो। इमाम हनबल ने अन्यायी शासक के खिलाफ भी विद्रोह को प्रतिबंधित किया था क्योंकि इससे खून.खराबा और अराजकता होती। मर्दिन सम्मेलन में नागरिकों और निर्दोषों के खिलाफ अकारण हिंसा को गलत ठहराया गया और उसकी निंदा की गई। यह कहा गया कि आज की दुनिया में अन्यायी शासक से मुक्ति पाने के लिए भी हिंसा के अतिरिक्त अन्य तरीके उपलब्ध हैं। परंतु यह दुःख की बात है कि इस तरह के सकारात्मक फतवों को मीडिया पर्याप्त महत्व नहीं देता। इसका एक कारण तो जानकारी का अभाव है और दूसरा यह कि  मीडियाए इस्लाम को पिछड़ा हुआ,हिंसक व आक्रामक धर्म मानता है और इसलिए जब इस्लामिक विद्वान शांति, रहम और करूणा की बात करते हैं तो मीडिया उसे महत्व नहीं देता।

फतवे और मुस्लिम महिलाएं
समुदाय के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। मुफ्ती अपने.अपने विधिशास्त्र के नियमों का यंत्रवत पालन करते हैं और फतवा जारी करने के पहले बदली हुई परिस्थितियों और संदर्भ पर विचार ही नहीं करते। असली समस्या यह है कि भारत में इज्तिहाद ;बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप इस्लामिक शिक्षाओं की रचनात्मक व्याख्या व अमल,के दरवाजे  मध्यकाल में ही बंद कर दिए गए थे। भारत में अंग्रेजों के आने के पहले तक इस्लामिक विधिशास्त्र एक विकसित होता विज्ञान था, जिसमें बदलते वक्त के अनुसार परिवर्तन किए जाते थे। सन 1772 की वारेन हैस्टिंग्स योजना के अंतर्गत भारत में दीवानी और फौजदारी अदालतें स्थापित की गईं और उत्तराधिकार,विवाह आदि के मामलो में हिंदुओं और मुसलमानों को उनके परंपरागत नियमों व कानूनों को मानने की स्वतंत्रता दी गई। सन् 1791 में हैस्टिंग्स के निर्देश पर चार्ल्स हैमिंग्टन ने 'हिदाया' ;पथ प्रदर्शक;का अरबी से अंग्रेजी में अनुवाद किया। इसके बाद से ब्रिटिश अदालतें लिखित सामग्री के आधार पर अपने निर्णय देने लगीं और शरियत में समय के साथ होने वाले परिवर्तनों की प्रक्रिया थम गई। मौलाना मोहम्मद कासिम नानोटवी ने इस्लामिक आस्थाओं पर संभावित पश्चिमी हमले को रोकने के लिए दारूलउलूम देवबंद की स्थापना की।
दारूलउलूम ने दारूलइफ्ता का गठन किया और तभी से दारूलइफ्ता, इस्लाम के दकियानूसी वहाबी व हनाफी विधिशास्त्र के हिसाब से फतवे जारी करता आ रहा है। इन दकियानूसी फतवों से सबसे ज्यादा परेशानियां मुस्लिम महिलाओं को उठानी पड़ रही हैं क्योंकि इन फतवों के जरिये उनके अधिकारों को कम किया जा रहा है और उनकी आजादी पर बंदिशें लगाई जा रही हैं। ये फतवे यह मानकर जारी किए जाते हैं कि महिलाओं को बहुत ही कम अधिकार उपलब्ध हैं और उनका एकमात्र काम अपने पतियों की सेवा करना है। ये फतवे पुरूषों को महिलाओं के शरीर पर पूरा अधिकार देते हैं। इनके अनुसार, पुरूष, महिलाओं के आने.जाने पर नियंत्रण रख सकते हैं और महिलाएं केवल पुरूषों की शारीरिक भूख को शांत करने, उनके बच्चे पैदा करने और घर का कामकाज निपटाने के लिए बनी हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह सोच इस्लाम की मूल आत्मा के विरूद्ध है। डाक्टर असगर अली इंजीनियर के अनुसार, पवित्र कुरान,मुस्लिम महिलाओं को पूरी स्वतंत्रता देती है। वे अपने जीवनयापन के लिए धन कमा सकती हैं और अपनी कमाई को अपनी मर्जी से खर्च कर सकती हैं। तलाक की स्थिति में उन्हें अपने पतियों से गुजारा भत्ता पाने का हक है और वे अपनी मर्जी के वस्त्र पहन सकती हैं बशर्ते उससे उनकी जीनत का सार्वजनिक प्रदर्शन न होता हो। उन्हें अपने पति को एकतरफा तलाक देने का हक है जिसे खुला कहा जाता है। उन्हें ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार है, मस्जिद में नमाज पढ़ने का हक है और वे मस्जिद में पुरूषों और महिला नमाजियों के समूह का नेतृत्व भी कर सकती हैं। वे काज़ी की भूमिका भी अदा कर सकती हैं। स्थान की कमी के कारण हम यहां इन अधिकारों का कुरान में संदर्भ नहीं दे रहे हैं।
हाल में एक फतवा जारी किया गया जिसमें यह कहा गया कि महिलाओं को किसी ऐसे संस्थान में काम नहीं करना चाहिए जहां दूसरे पुरूष काम करते होंए जब तक कि उनके परिवार को चलाने के लिए उनकी आमदनी आवश्यक न हो। और अगर मजबूरी में उनको पुरूष सहयोगियों के साथ काम करना भी पड़े तो कार्यालय में नख से शिख तक उनका पूरा शरीर ढ़का होना चाहिए। कश्मीर में लड़कियों के बैंड के विरूद्ध फतवा जारी किया गया जिसके बाद उस बैंड को भंग कर दिया गया। कई फतवों में टीवी चैनल देखनाए संगीत सुनना आदि को भी महिलाओं के लिए प्रतिबंधित किया गया है। सबसे ज्यादा खतरनाक और दुर्भाग्यपूर्ण फतवा वह था जिसमें महिलाओं को सूफी दरगाहों में प्रवेश करने से रोका गया था। जबकि सूफी दरगाहों में महिलाओं और पुरूषोंए हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं होता। अगस्त 2005 में दारूलउलूम ने एक फतवा जारी कर मुस्लिम महिलाओं के वोट देने पर प्रतिबंध लगा दिया और यह कहा कि यदि वे वोट देने जाएं भी तो बुर्का पहनकर जाएं। और उनके चुनाव लड़ने का तो प्रश्न ही नहीं था। यह सौभाग्य और संतोष की बात है कि मुस्लिम समुदाय,इस तरह के बेवकूफाना फतवों को जरा भी तवज्जो नहीं देता।
सबसे पहले हमें उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वागत करना चाहिए जो कि मुस्लिम समुदाय को यह याद दिलाता है कि यद्यपि फतवे जारी करना असंवैधानिक नहीं है परंतु फतवे केवल जारी करने वाले की राय है जो किसी पर बंधनकारी नहीं हैं। उच्चतम न्यायालय ने फतवा जारी करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को यह सलाह भी दी है कि वे किसी तीसरे व्यक्ति या पक्ष, जिसका संबंधित मामले से कोई लेना.देना नहीं हो, के कहने पर फतवा जारी न करें। क्योंकि ऐसा करने से कई प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।
हमें मुस्लिम समुदाय व विशेषकर गांवों व कस्बों में रहने वाली महिलाओं को यह समझाना चाहिए कि उनके लिए फतवों का पालन करना आवश्यक नहीं है। जहां भी संभव हो हमें छोटी.छोटी सभाएं आयोजित कर उच्चतम न्यायालय के इस निर्णय का स्वागत करना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं कि शरिया अदालतों की तुलना में संविधान के अंतर्गत काम करने वाली अदालतों ने मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों और पात्रताओं की रक्षा के लिए कहीं ज्यादा किया है.फिर चाहे वह तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ता देने का सवाल हो या केवल तीन बार तलाक शब्द का उच्चारण करके तलाक देने की प्रक्रिया को गैरकानूनी ठहराने का। बच्चों की अभिरक्षा, उत्तराधिकार व घरेलू हिंसा का सामना कर रही मुस्लिम महिलाओं को सुरक्षा देने के मामलों में भी सामान्य अदालतों और कानूनों ने धार्मिक अदालतों और कानूनों की तुलना में महिलाओं की कहीं अधिक मदद की है। जाहिर है कि मुस्लिम महिलाओं को वहीं जाना चाहिए जहां उन्हें न्याय मिले।
 -इरफान इंजीनियर


शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --10

खुद को खत्म कर देने का ख़याल
मैंने सर संघचालक को जो चिटठी लिखी, उसका कोई जवाब नहीं आया, मैं हर स्तर पर जवाब माँगता रहा, लड़ता रहा लेकिन हर स्तर पर एक अजीब सी चुप्पी थी, हर तरफ से निराशा ही हाथ लगी, कोई भी इस घटना की गंभीरता को समझने को तैयार नहीं था, सबको लगता था कि यह एक बहुत ही सामान्य घटना है, ऐसा तो होता ही रहता है, इसमें क्या बड़ी बात है, जिससे मुझे इतना नाराज और तनावग्रस्त होना चाहिए। मैंने इतनी पीड़ा कभी नहीं महसूस की थी पहले, जितनी उन दिनों कर रहा था, वे दिन वाकई बेहद दुखद थे, मैं अक्सर खुद को किंकर्तव्यविमूढ़ पाता था, कुछ भी करने और सोचने की शक्ति नहीं बची थी, मैं अवसाद की स्थिति में जा रहा था, मुझे कहीं भी सुना नहीं जा रहा था, जो बात मेरे अन्दर इतनी उथल पुथल मचाए हुए थी, उससे लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ा, दुनिया तो वैसे ही चल रही थी, जैसी पहले चलती थी। मैं इतना निराश था कि मेरे दिमाग में खुद को खत्म कर देने के खयाल आने लगे, मैंने खुदकशी के बारे में सोचा, मैंने मरने की कईं तरकीबें सोची, कुएँ में कूद जाना, फाँसी लगाना या जहर खा कर मुक्त हो जाना, कुछ तो करना ही था, इसलिए विषपान का विकल्प ही मुझे सर्वाधिक उपयुक्त जान पड़ा, घर में चूहे मारने की दवा मौजूद थी, एक रात खाने के साथ ही मैंने उसे खा लिया और सो गया, मुझे नींद का आभास हो रहा था, मुझे लग रहा था कि अब मेरी जिन्दगी की फिर कोई सुबह नहीं होगी। मैं सोया हुआ था, शायद नींद में था या जग रहा था मैं जी रहा था या मैं मर रहा पेट में दर्द की एक भयंकर लहर सी उठी। उल्टी करने की अदम्य इच्छा और जरूरत ने मुझे झकझोर दिया, मैं दर्द के मारे दोहरा हो रहा था, मैं उठ बैठा और उल्टियाँ करने को बाहर भागा उल्टियों के चलते बुरा हाल था, कलेजा मुँह को आने लगा, अंतडि़याँ खिंची चली आती थी, सिर चकराता था और बेहोशी जारी थी, अचानक बिगड़ी तबियत से परिजन चिंतित हो उठे, बड़े भाईसाहब को तुरंत बुलाया गया, वे आए तब तक मेरी आँखें बंद होने लगी, भाईसाहब ने पूछा कि अचानक क्या हुआ, मैं बामुश्किल सिर्फ इतना बता पाया कि मैंने चूहे की दवा खायी। बाद में मुझे बताया गया कि भाईसाहब गाँव से डॉक्टर को लेने को भागे, डॉ0 सुरेश शर्मा तुरंत भागते हुए आ पहुँचे, उन्होंने ग्लूकोज में कई सारे इंजेक्शन डाले और इलाज प्रारंभ किया, चूँकि पुलिस और अन्य लोगों तक बात नहीं पहँुचे इसलिए अगले कई घंटों तक घर में ही गुपचुप इलाज    चलाया गया, मेरे बड़े भाई बद्री जी भाईसाहब का इतना बड़प्पन रहा कि उन्होंने कभी भी किसी को इस घटना का जिक्र नहीं किया, मैं उनकी सक्रियता और डॉ0 शर्मा के त्वरित इलाज की वजह से बच गया पर ऐसी बातें अंततः बाहर आ ही जाती है, डॉ0 साहब ने गोपनीयता भंग कर दी, बात आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई, मैं स्वस्थ तो हो गया पर लज्जा और ग्लानि से भर गया, मैं उन दिनों हर जगह असफलता का सामना कर रहा था, आत्महत्या के प्रयास में भी सफल नहीं हो पाया, हर जगह की तरह यहाँ भी मैं हार गया था, मौत हार गई, जिन्दगी जीत गई थी, मुझे लगता था कि हर गाँव वासी को मेरी इस नादानी के बारे में जानकारी है इसलिए मैं मारे शर्म के कई महीनों तक लोगों का सामना नहीं कर पाता था, मैं वापस भीलवाड़ा चला गया। शहर आकर मैंने सोचना शुरू किया, खुद से ही पूछने लगा कि मैं क्यों मर रहा था और किनके लिए मर रहा था, किस बात के लिए? मेरे मर जाने से किसको फर्क पड़ने वाला था? ठन्डे दिमाग से सोचा तो अपनी तमाम बेवकूफियों पर सिर पीट लेने को मन करने लगा, मरने को तो मैं पहले भी उनके प्यार में राजी था अयोध्या जाकर और मरने को तो मैं बाद में भी तैयार हो गया था उनके नफरत भरे व्यवहार के कारण पर दोनों ही स्थिति मंे मरना तो मुझे ही था, कभी हँसते-हँसते तो कभी रोते-रोते क्या वे मेरी जिन्दगी के मालिक हैं? क्या मेरे जीने के लिए आरएसएस का प्यार या नफरत जरुरी है? मुझे क्यों मरना चाहिए, मुझे उनसे क्यों सर्टिफिकेट चाहिए, वे कौन होते हैं मेरे जीवन और सोच को नियंत्रित करने वाले? मैं अब तक भी उनके साथ क्यों बना हुआ हूँ? मैं ऐसे घटिया और नीच सोच विचार और पाखंडी व्यवहार वाले लोगों के साथ क्यों काम करना चाहता हूँ,जो मेरे घर पर बना खाना तक नहीं खा सकते हैं! मैं ऐसे लोगों का हिन्दू राष्ट्र क्यों बनाना चाहता हूँ? मैं एक ऐसा धार्मिक राष्ट्र बनाने का आकांक्षी क्यों था जिसमें मेरे साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार होने वाला है आखिर क्यों?
    ऐसे ही जलते हुए सैंकड़ों सवालों ने मुझे जकड़ लिया था  खूब अन्तद्र्वन्द्व मनन चिंतन और थक जाने की स्थिति तक मंथन के पश्चात मैंने तय किया कि मैं आरएसएस को न केवल पूरी तरह नकार दूँगा बल्कि उनके द्वारा मेरे साथ किए गए जातिगत भेदभाव को भी सबके समक्ष उजागर करूँगा, इस दोगले हिन्दुत्व और हिन्दुराष्ट्र की असलियत से सबको वाकिफ करवाना मेरा आगे का काम होगा। मैंने संकल्प कर लिया कि संघ परिवार के चेहरे से समरसता के नकाब को नोंचकर इनका असली चेहरा मैं लोगों के सामने लाऊँगा। मैंने अपनी तमाम सीमाओं को जानते हुए भी निश्चय कर लिया था कि मैं संघ परिवार के पाखंडी हिन्दुत्व को बेनकाब करूँगा और मैं अपनी पूरी ताकत के साथ अकेले ही आरएसएस जैसे विशालकाय अर्धसैनिक सवर्ण जातिवादी संगठन से दो-दो हाथ करने निकल पड़ा। मैंने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा और अपमान को निजी दुश्मनी बनाने के बजाए सामाजिक समानता, अस्मिता एवं गरिमा की सामूहिक लड़ाई बनाना तय किया और एक भीम प्रतिज्ञा की कि मैं अब हर तरीके से संघ और संघ परिवार के समूहों तथा उनके विघटनकारी विचारों की मुखालिफत बोलकर, लिखकर और अपने क्रियाकलापों के जरिये करूँगा, यह जंग जारी रहेगी।
   
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
 (लेखक की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा: हिन्दू तालिबान’ का पहला भाग)      
    मोबाइल: 09571047777

गुरुवार, 31 जुलाई 2014

पाकिस्तान की नीव सिंध में मोहम्मद बिन कासिम रखी थी


हिंदुस्तान का नया इतिहास लिखा जाएगा - पाकिस्तान का भी नया इतिहास है
चुनावी राजनीति उन कई रास्तों में से केवल एक है जिनका इस्तेमाल निहित स्वार्थी तत्व अपने राजनीतिक एजेण्डे को लागू करने के लिए करते हैं। लोगों के दिमागों पर कब्जा करना, उनकी सोच बदलना और किसी विशिष्ट विचारधारा का प्राधान्य स्थापित,करना ,वे अन्य तरीके हैं,जिनके रास्ते राजनैतिक एजेण्डे की नींव रखी जाती है और उसे लागू किया जाता है। यही कारण है कि इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में परिवर्तन और इतिहास के सांप्रदायिक संस्करण का पठन.पाठन, कई दक्षिण एशियाई देशों की संप्रदायवादी राष्ट्रवादी शक्तियों की रणनीति का हिस्सा है। पाकिस्तान में सांप्रदायिक तत्व कहते हैं कि पाकिस्तान की नीव, आठवीं सदी में सिंध पर मोहम्मद बिन कासिम की विजय के साथ रखी गई थी। हम जानते हैं कि राजाओं के साम्राज्यों और आधुनिक राष्ट्र.राज्यों के बीच अंतर को इस तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता परंतु जब सांप्रदायिक ताकतों के हाथों में सत्ता होती है तब किसी भी चीज को तोड़.मरोड़ कर इस ढंग से प्रस्तुत किया जा सकता है कि लोगों के दिमागों में गलत धारणाएं घर कर जावें। यही कारण है कि एन.डी.ए. के पिछले शासनकाल ;1999.2004 में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में इस तरह के परिवर्तन किए गए थे जिनसे गुजरे जमाने को सांप्रदायिक चश्मे से देखा.दिखाया जा सके। इस बार, भाजपा ने पूर्ण बहुमत से अपनी सरकार बनाई है और शिक्षा के क्षेत्र में जिस तरह के परिवर्तनों की योजना बनाई जा रही है, वह पहले से भी अधिक खतरनाक है।
प्रोफेसर वाय. सुदर्शन राव को भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ;आईसीएचआर का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है। प्रोफेसर रावए इतिहास के क्षेत्र में किसी विशेष अकादमिक उपलब्धि के लिए नहीं जाने जाते हैं। वे मुख्यतः रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्यों की ऐतिहासिकता सिद्ध करने की परियोजनाओं में व्यस्त रहे हैं। अपने साथी विद्वानों द्वारा अपने शोधपत्रों की आलोचनाध्विश्लेषण करवाने की बजाए वे अपने तर्क मुख्यतः ब्लॉगों के जरिए प्रस्तुत करते रहे हैं। और इन ब्लॉगों पर उनका लेखन,उनके विचारधारात्मक झुकाव को परिलक्षित करता है। यद्यपि वे यह दावा करते हैं कि आरएसएस से उनका कोई लेनादेना नहीं है तथापि उनके लेखन में हिन्दू राष्ट्र का एजेण्डा स्पष्ट प्रतिबिम्बित होता है। वे हिन्दुओं के प्राचीन इतिहास और जाति व्यवस्था का महिमामंडन करते हैं और भारतीय समाज की सारी बुराईयों के लिए 'विदेशी' मुस्लिम शासकों को दोषी ठहराते हैं। उनके अनुसारए 'भारतीय समाज में व्याप्त जिन सामाजिक रस्मों.रिवाजों पर अंग्रेजीदां भारतीय बुद्धिजीवियों और पश्चिमी विद्वानों ने प्रश्न उठाए हैं, उन सभी की जड़ें उत्तर भारत में लगभग सात शताब्दियों तक चले मुस्लिम शासन में खोजी जा सकती हैं।' उनका तर्क है कि 'प्राचीनकाल में ;जाति व्यवस्था सुचारू रूप से काम कर रही थी और इससे किसी को कोई शिकायत नहीं थी।'
अगर प्रोफेसर राव ने अछूत प्रथा, जाति व्यवस्था और उन अन्य सामाजिक कुरीतियों का तार्किक अध्ययन किया होता, जिन्हें भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रणेताओं ने निंदनीय करार दिया था,तो उन्हें यह समझ में आता कि जातिप्रथा के कुप्रभाव का कारण मुस्लिम बादशाह नहीं बल्कि हिन्दू धर्मग्रंथ हैं,जो तत्कालीन सामाजिक व्यवस्था को प्रतिबिम्बित करते हैं। शनैः शनैः सामाजिक श्रम विभाजन,जातिप्रथा में परिवर्तित हो गया जिसमें व्यक्ति की जाति,उसके कर्म नहीं वरन् उसके जन्म से निर्धारित होने लगी। हिन्दू समाज में ऊँच.नीच और शुद्धता.अशुद्धता की अवधारणाएं, मुस्लिम शासनकाल के बहुत पहले से विद्यमान थीं।
मुस्लिम राजाओं ने जातिप्रथा की सामाजिक व्यवस्था से कोई छेड़छाड़ नहीं की। वैसे भी, यह उनका लक्ष्य नहीं था। उल्टे, मुस्लिम समुदाय, जाति व्यवस्था की चपेट में आ गया और मुसलमान अनेक जातियों,उपजातियों में बंट गए। जहां पाकिस्तान के सांप्रदायिक इतिहासविद्, अविभाजित भारत में हिन्दू धर्म व हिन्दुओं के अस्तित्व से ही इंकार करते हैं वहीं भारत के सांप्रदायिक तत्वए भारतीय समाज की सभी कुप्रथाओं के लिए 'बाहरी' प्रभाव को दोषी ठहराते हैं। इसी तर्ज पर आईसीएचआर के नए मुखिया,जातिप्रथा की बुराईयों के लिए बाहरी कारक ;मुस्लिम शासन को दोषी ठहरा रहे हैं। प्रोफेसर राव के काल्पनिक इतिहास में अप्रिय प्रसंगों पर पर्दा डाल दिया जाता है और ऐसा चित्र खींचा जाता है मानो सभी बुराईयों के लिए मुस्लिम राजा जिम्मेदार हों। वे यह भूल जाते हैं कि मुस्लिम राजाओं ने भारत की सामाजिक व्यवस्था को जस का तस स्वीकार कर लिया था और उनकी प्रशासनिक मशीनरी में हिन्दू व मुसलमान दोनों शामिल थे। औरंगजेब के दरबारियों में से एक.तिहाई से भी अधिक हिंदू थे। अपनी संकीर्ण विचारधारा के पिंजरे में बंद प्रोफेसर साहब चाहते हैं कि हम यह भूल जाएं कि जाति व्यवस्था और दमनकारी लैंगिक ऊँच.नीच को मनुस्मृति में औचित्यपूर्ण ठहराया गया है और यह पुस्तक, भारत में मुस्लिम शासन प्रारंभ होने के 1000 वर्ष पहले लिखी गई थी।
ऋग्वेद और मनुस्मृति में कई जगह यह कहा गया है कि नीची जातियों के लोगों के लिए ऊँची जातियों के व्यक्तियों के नजदीक आना भी प्रतिबंधित था और उन्हें गांवों के बाहर बसाया जाता था। निःसंदेह, इसका यह अर्थ नहीं है कि ऋग्वैदिक काल में कठोर जाति व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थीए जिसके अंतर्गत समाज को विभिन्न वर्णों में विभाजित किया जाता है। यह व्यवस्था मनुस्मृति के काल और उसके बाद भारतीय समाज में मजबूती से स्थापित हुई।
'वजस्नेही संहिता' ;जिसकी रचना 10वीं सदी ईसा पूर्व के आसपास हुई थी में चांडाल और पालकसा शब्दों का प्रयोग है। 'छान्दोग्योपनिषद' ;8वीं सदी ईसा पूर्वमें स्पष्ट कहा गया है 'जिन लोगों के कर्म निम्न हैं वे जल्दी ही कुत्ता या चांडाल बनकर पैदा होंगे' ;छान्दोग्योपनिषद 5ए 10.7।
भारत में मुस्लिम आक्रांताओं की पहली लहर 11वीं सदी में आई और यूरोपवासियों ने भारत में 17वीं.18वीं सदी में कब्जा करना शुरू किया। इसके सैकड़ों वर्ष पहले से शूद्रों को समाज से बाहर माना जाता था और 'उच्च' जातियों के सदस्यों के उनके साथ खानपान या वैवाहिक संबंधों पर प्रतिबंध था। जाति व्यवस्था को कायम रखने के लिए शुद्धता.अशुद्धता की अवधारणाओं को सख्ती से लागू किया जाता था। शूद्रों को अछूत माना जाता था और इसी कठोर सामाजिक विभाजन का वर्णन, मनु के 'मानव धर्मशास्त्र' में है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व सरसंघचालक एम. एस.गोलवलकर,वर्ण व्यवस्था के समर्थक थे। 'वह हिन्दू सामाजिक व्यवस्था की उन तथाकथित कमियों में से एक नहीं है जो हमें हमारे प्राचीन गौरव को पुनः हासिल करने से रोक रही है' ;एमएस गोलवलकर, 'व्ही ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड', भारत पब्लिकेशन्स, नागपुर, 1939, पृष्ठ 63। इसी बात को बाद में उन्होंने दूसरे शब्दों में कहा,'अगर कोई विकसित समाज यह समझ जाए कि समाज में अलग.अलग वर्ग, वैज्ञानिक सामाजिक ढांचे के कारण हैं और वे समाज रूपी शरीर के विभिन्न अंगों की तरह हैं, तो यह विभिन्नता कोई कलंक नहीं रह जाती' ;'आर्गनाईजर', 1 दिसंबर 1952, पृष्ठ 7। संघ परिवार के एक अन्य प्रमुख विचारक दीनदयाल उपाध्याय फरमाते हैं'चार वर्णों की हमारी अवधारणा यह है कि हम विभिन्न वर्णों को विराट पुरूष के विभिन्न अंग मानते हैं.ये अंग न केवल एक दूसरे के पूरक हैं वरन उनमें एकता भी है। उनके हित और उनकी पहचान एक है.अगर इस विचार को जीवित नहीं रखा गया तो जातियां एक.दूसरे की पूरक बनने की बजाए टकराव का कारण बन जाएंगी। परंतु यह एक विरूपण होगा' ;डी उपाध्याय, 'इंटीग्रल ह्यूमेनिज्म', भारतीय जनसंघ, नई दिल्ली, 1965, पृष्ठ 43।
जाति व्यवस्था और अछूत प्रथा के उन्मूलन के संबंध में अंबेडकर और गोलवलकर के विचारए संघ परिवार की असली मानसिकता को उजागर करते हैं। अंबेडकर, मनुस्मृति को जाति व्यवस्था का पोषक मानते थे और उन्होंने एक आंदोलन शुरू किया था जिसके अंतर्गत इस पुस्तक को सार्वजनिक रूप से जलाया जाता था, जबकि गोलवलकर,मनु और उनकी संहिता का महिमामंडन करते हैं।
जहां तक इस तर्क का प्रश्न है कि ';जाति व्यवस्था सुचारू रूप से काम कर थी और इससे किसी को कोई शिकायत नहीं थी' इस हद तक सही है कि उच्च जातियों को इससे कोई शिकायत नहीं थी क्योंकि इससे उनका हित साधन होता था। नीची जातियां इस दमनकारी और अमानवीय व्यवस्था की शिकार थीं। यह भी सही है कि जाति व्यवस्था के प्रति किसी व्यक्ति या वर्ग के असंतोष व्यक्त करने का कोई लिखित प्रमाण उपलब्ध नहीं है। चूंकि नीची जातियों को पढ़ने.लिखने का हक ही नहीं था अतः उनके द्वारा उनके असंतोष को दर्ज करने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता।  बुद्ध के समय से जाति व्यवथा का विरोध शुरू हुआ। बल्कि बौद्ध धर्म ही जातिगत ऊँच.नीच के विरूद्ध एक आंदोलन था। कबीर और उनके जैसे अन्य मध्यकालीन संतों ने नीची जातियों की आह को वाणी दी और यह बताया कि किस तरह वे जाति व्यवस्था के लाभार्थियों के हाथों दुःख भोग रहे हैं। और ठीक इन्हीं लाभार्थी जातियों की वकालत प्रोफेसर राव कर रहे हैं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद में जो परिवर्तन किए गए हैं उनसे यह स्पष्ट है कि आने वाले समय में हमें अपने भूतकाल   और जातिगत व लैंगिक ऊँचनीच को किस तरह से देखने पर मजबूर किया जाएगा.

         -राम पुनियानी

बुधवार, 30 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --9

बन्धु, खाना पैक कर दो
    मैंने अस्थिकलश यात्रियों से भोजन करने का जैसे ही आग्रह किया, वे थोडा सा झिझके, मुझे सेवा भारती के तत्कालीन जिला प्रमुख और संघ के एक पदाधिकारी तुरंत एक तरफ ले कर गए, बहुत ही प्यार से उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, मेरे द्वारा किए गए इस शानदार आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की, मेरे काम को देर तक सराहने और मेरी संघ और राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर अतीव प्रसन्नता जाहिर करने के बाद वे अत्यंत ही धीमी आवाज में बोले-बन्धु, आप तो हमारे समाज की विषमता से परिचित ही है, संघ के सारे प्रयासों के बाद भी अभी तक हिन्दू समाज समरस नहीं हो सका, हम तो आप जब भी चाहोगे तब आपके साथ आपके ही घर पर एक ही थाली में बैठकर खाना खा लेंगे, पर आज हमारे साथ साधु संत और अन्य लोग भी हैं, वे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि हमने उन्हें किसी वंचित समुदाय के घर का खाना खिला दिया है, वे नाराज हो कर यात्रा छोड़कर वापस चले जाएँगे, मुझे काटो तो  उस वक्त खून नहीं निकले, मैं स्तब्ध था, मेरे मस्तिष्क में विचारों की कई आँधियाँ एक साथ चल रही थी, मेरे जबान पर कोई शब्द ही नहीं आ रहे थे, जिससे मैं उन्हें अपनी परिस्थिति बता पाता, न मैं कुछ बोल पा रहा था और न ही उनके द्वारा दिए जा रहे तर्कों कुतर्कों को ही मैं सुन पा रहा था लेकिन उनके आखिरी वाक्य मुझे आज तक याद रह गए है-आप ऐसा करो कि खाना पैक करके गाड़ी में रखवा दो, अगले गाँव में कार्यक्रम के बाद सबको बैठाकर खिला देंगे मतलब साफ था कि वे बिना यह बताए कि यह मुझ दलित स्वयंसेवक के घर का बना खाना है, इसे चुपचाप सबको अगले गाँव में खिला दिया जाएगा। मेरी स्थिति उस वक्त बड़ी विचित्र हो गई थी, मैं अपने ही घर में हार महसूस कर रहा था, बिना कुछ किए ही मेरे पिताजी जीतते प्रतीत हो रहे थे, मैं उलझन में था कि पिताजी के सवालों का क्या जवाब दूँगा कि क्यों नहीं खाना खाया उन लोगों ने? फिर भी दिल कड़ा करके मैंने खाना पैक करवाना शुरू करवाया, घरवालों ने कारण पूछा तो मैंने कह दिया कि अगले गाँव भगवानपुरा में एक और कार्यक्रम है, पहले ही बहुत देरी हो गई है, इसलिए वहीं जाकर खाएँगे खाना, जैसे तैसे यह कह कर मैंने उस वक्त तो अपना पिंड छुड़वा लिया पर मन का सारा उत्साह जाता रहा, जाति से हीन होने का भाव हावी होने लगा, बार-बार यही सोच उभर कर आने लगी कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है? संघ के लोग मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं? मैं एक अनुशासित स्वयंसेवक, जुनूनी कारसेवक, जिला कार्यालय प्रमुख अगर मेरे साथ ही ऐसा छुआछूत, तो मेरे अन्य समाज बंधुओं के साथ कैसा दुर्व्यवहार हो रहा होगा? उस दिन पहली बार मैंने एक हिन्दू से परे हट कर सिर्फ निम्न जातिय दलित के नजरिए से सोचना शुरू किया, मैं जितना सोचता था, उतना ही उलझता जाता था सही बात तो यह है कि वह रात मेरे जीवन की सबसे लम्बी रात थी, बीतने का नाम ही नहीं लेती थी आँखों ही आँखों में गुजारी वह रात और कल का सूरज तो और भी भयंकर उदित होने जा रहा था, उसकी तो शायद मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
और उन्होंने खाना फेंक दिया
    आज मेरे लिए कयामत का दिन था, कल की रात अभी बीती ही थी कि सुबह का भयावह सूरज अपनी तेज किरणों के साथ उपस्थित था, मेरे साथी स्वयंसेवक पुरुषोत्तम क्षत्रिय जो की अस्थि कलश यात्रा के साथ ही चल रहे थे, घर आ पहुँचे, वे मेरे अम्बेडकर छात्रावास के दिनों के पड़ोसी भी थे, कवि होने के नाते अच्छे दोस्त भी। हम लोग आजाद नगर शाखा में साथ साथ जाते थे, हर बात एक दूसरे को साझा करते थे, गहरी मित्रता थी, वे सुबह खीर की केतली लेकर लौटे थे, उन्होंने जो कुछ मुझे बताया, वह अविश्वसनीय और अकल्पनीय था, उनके द्वारा दी जा रही सूचना मेरे दिमाग पर हथौड़े मारने जैसी थी। पुरुषोत्तम जी ने बताया कि आपके यहाँ से ले जाई गई खीर, पूरी भगवानपुरा मोड़ पर सड़क किनारे फेंक दी गई और रात को खाना वैध शर्मा के यहाँ बनवा कर देर रात खाया गया, मुझे कहा गया है कि मैं आपको यह बात नहीं बताऊँ लेकिन मैं झूठ नहीं बोलना चाहता, आपके खाने को खाया नहीं गया बल्कि फेंक दिया गया, मैंने पुरुषोत्तम जी से साफ कहा कि कुछ भी हो लेकिन संघ के स्वयंसेवक इतने जातिवादी और निकृष्ट नहीं हो सकते हैं, आप मजाक करने के लिए इतना बड़ा सफेद झूठ नहीं बोल सकते हैं? उन्होंने कहा कि यकीन नहीं होता है तो चल कर देख लो, कुछ ना कुछ तो अवशेष वहाँ मिल ही जाएँगे हम दोनों दोस्त साईकिल पर सवार हुए और भगवानपुरा मोड़ पर पहँुचे, जाकर देखा, पुरुषोत्तम सही साबित हुए, वाकई मेरे घर से गया खाना सड़क किनारे बिखरा हुआ था, जिसे चील, कौव्वे, कुत्ते, चींटिया बिना किसी भेदभाव के लगभग चटकर चुके थे, यह मेरे बर्दाश्त के बाहर था। उस शाम अस्थि कलश यात्रा ब्राह्मणों की सरेरी पहँुचने वाली थी, मैंने वहा जाकर खुल कर बात करने का निश्चय कर लिया था, अब बहुत हो चुका था, निर्णायक जंग का वक्त आ पहँुचा था, लड़ाई शुरू हो गई थी, सिर्फ घोषणा बाकी थी।
कहीं कोई सुनवाई नहीं
    शाम को मैं अत्यंत आक्रोश के साथ ब्राह्मणों की सरेरी पहुँचा, मैंने अस्थि कलश यात्रियों से इस शर्मनाक घटनाक्रम के बारे में सफाई माँगी, उन्होंने भोजन फेंकने की घटना से साफ इनकार कर दिया, जब मैंने उन्हें बताया कि पुरुषोत्तम जी ने मुझे यह जानकारी दी है तब उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि भोजन लिए गाड़ी में पीछे बैठे व्यक्ति के हाथ से भगवानपुरा के मोड़ पर जब गाड़ी स्पीड में मुड़ी तो खाना गिर गया, अब भला गिरा हुआ खाना कैसे खाते? इसलिए वैद जी के घर पर रात में खाना बनवा कर खाना पड़ा मैं उनके शब्दों और उनके चेहरे के भावों के बीच फंसे हुए सच को साफ-साफ देख पा रहा था, ये परम पूज्य भाई साहब सफेद झूठ भी कितनी आसानी से बोल रहे हैं। मुझे पक्का यकीन हो गया कि वे सरासर असत्य बोल रहे हैं। अगर खाना किसी के हाथ से गिरता तो सड़क के बीचों बीच गिरता, सड़क के किनारे पर जा कर कैसे गिरा खाना? दूसरे अगर पूरी गिरती तो खीर बची रहती और अगर खीर गिरती तो केतली पर मोच के निशान आते, मगर खीर और पूरी दोनों ही फेंके गए थे जान बूझ कर, उन्होंने पूरे होशोहवास में एक दलित स्वयंसेवक के घर से आया खाना फेंक दिया था, अब इस गलती को गलती मानने के बजाए अजीब से कुतर्क देने पर तुले हुए थे उनके झूठ और जूठ को सच के रूप में स्थापित करने की कोशिश से मेरा दिल फट गया, मुझे अत्यंत लज्जा और अपमान का अहसास हुआ, मैंने महसूस किया कि संघ के लोगों ने सिर्फ मेरे घर का बना खाना ही नहीं फेंका बल्कि मुझे भी दूर फेंक दिया है। मेरे सामने वह सारा समय और घटनाक्रम चलचित्र की भाँति गतिशील था, जब मैं अपनी पूरी क्षमता लगा कर संघ के काम को बढ़ाने पर तुला हुआ था। मैं उस मौके को याद कर रहा था, जब मैं रामजी के नाम पर शहीद होने के लिए घर से भाग गया था अगर मैं अयोध्या पहँुचने में सफल हो जाता और सरयू पुल पर पुलिस की गोली का शिकार हो जाता तो क्या वे मेरी लाश को भी छूते, मेरी मृतदेह घर भी पहँुचाई जाती या खाने की ही तरह सरयू में फेंक दी जाती? मैंने खुद से सवाल किया कि क्या मैं इसी हिन्दू राष्ट्र के लिए मरने मारने पर उतारू हूँ, जिसमें मेरा स्थान ही नहीं है। मेरी औकात क्या है? मेरी अपनी पहचान क्या है? मैं क्या हूँ? आखिर कौन हूँ मैं? एक रामभक्त कारसेवक हिन्दू या शूद्र अछूत जिसके घर का बना खाना भी स्वीकार नहीं। हिन्दू राष्ट्र की ध्वजा फहराने वालों के साथ मैं अपने को किस पहचान के साथ खड़ा करूँ?
       बहुत सोचा पाया कि हिन्दू वर्ण व्यवस्था में शूद्र और जाति व्यवस्था में अछूत हूँ मैं अवर्ण मैं भले ही स्वयंसेवक था लेकिन पूरा हिन्दू नहीं था इसलिए मेरी स्वीकार्यता नहीं थी इसीलिए मुझे विस्तारक बनने की तो सलाह दी गई थी लेकिन प्रचारक बनने से रोक दिया गया था बस, अब मुझे खुद को जानना है, अपने साथ हुए हादसे के कारणों को खोजना है और उन कारणों को जड़ से मिटा देना है। मैंने इस अन्याय और भेदभाव के खिलाफ नागपुर तक अपनी आवाज बुलंद करने का निश्चय कर लिया मैं अस्थि कलश यात्रा के साथ चल रहे नेताओं से लेकर संघ के विभिन्न स्तर के प्रचारकों के पास गया मैंने कोई भी जगह और स्तर नहीं बाकी रख छोड़ा, जहाँ अपनी व्यथा नहीं पहँुचाई हो लेकिन सुनवाई कहीं भी नहीं होती दिखी, तब मैंने माननीय सर संघचालक रज्जू भैय्या तक भी अपनी गुहार लगाई। उन्हें पत्र लिखा, सारी बात लिखी और कहा कि आपके संगठन के स्थानीय ठेकेदार नहीं चाहते हैं कि मैं अब और एक भी दिन हिन्दू के नाते रहूँ और काम करूँ, लेकिन संघ के नक्कारखाने में मुझ तूती की आवाज को कौन सुनता? वहाँ भी किसी ने नहीं सुना सही बात तो यह थी कि सुनना ही नहीं था, जिन-जिन भी संघ प्रचारकों और पदाधिकारियों से मैं मिला, उन्होंने इसे एक बहुत छोटी सी बात कह कर टाल दिया, उल्टे मुझे ही नसीहतें मिलीं कि इस बात को छोड़कर मैं सकारात्मक काम में मन लगाऊँ पर मैं मानने को कतई तैयार नहीं था कि यह छोटी सी बात है, तब भी नहीं और आज भी नहीं, छुआछूत और भेदभाव किसी भी इन्सान की जिन्दगी में छोटी सी बात नहीं होती है, सिर्फ हिन्दू राष्ट्र के निर्माताओं के लिए यह छोटी सी बात हो सकती है।
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

रविवार, 27 जुलाई 2014

मोदी युग की पहली कविता -----------

कारगिल -कारगिल ------------के अपराधियों से जोड़ा खाने वाले.
अपराधियों ने नौजवानों को मरवा दिया था
आज वहीअपराधी
शहीद - शहीद चिल्ला रहे है
यानी पहले शहीद कराओ
-फिर फूल चढाओ
फिर अपराधियों से हाथ मिलाओ
फिर ताबूत में कमीशन खाओ
फिर स्मारक बनवाओ
उसमे भी कमीशन खाओ
राष्ट्र प्रेम की अलख जगाओ
फिर चिल्लाओ कश्मीर मांगोगे
तो फिर सीना चीर देगे
संदेश भेजोगे कश्मीर सुंदर
आजाद मुल्क बनाओ
रक्षा क्षेत्र में एफ डी आई
अमरीका की गुलामी
गुजरात में
फट्टा के साथ
हवाला की सलामी
हिन्दू की एकता में
आरक्षण का विरोध
धर्म के नाम पर
धार्मिक गुलामी
सहारनपुर में सद्भाव
काठ में दंगा
लखनऊ में चेलो से
हुरदंगा
वोट के लिए सब चंगा
गाजा की ख़ुशी
यू. एन में दुखी
बर्लिन में
सेतुवा
जिनपिंग से
हलुवा
जरूरत है
तो बाप
नही है तो
देगे श्राप
यही इनका
राष्ट्र प्रेम
राष्ट्रप्रेमी है
बाकी सभी देश
द्रोही है
खुद का बाप
गाँधी नही
हिटलर है
संसद में
गाँधी
बाहर गोडसे की
आंधी
आजादी युद्ध में
अंग्रेज भक्त
आज बड़े
स्वतंत्रता सेनानी
कायरो की ज़मात
देश रक्षक
है यही
नोट -सभी संघी मित्रो से अनुरोध है कि कविता में कामा फुल स्टॉप सही करने का कष्ट करे
सादर

उन्ही का कापीराइट युक्त
सुमन

लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 26 जुलाई 2014

भारत: समुदायों का संघ

गत 25 जून को महाराष्ट्र की मंत्रिपरिषद ने मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का निर्णय लिया। मराठा,राज्य की आबादी के लगभग 32 प्रतिशत हैं और यह आरक्षण, कुनबी मराठाओं को ओबीसी की हैसियत से पहले से ही मिल रहे आरक्षण के अतिरिक्त होगा। मंत्रिमंडल ने यह निर्णय भी लिया कि 50 पिछड़ी मुस्लिम जातियों को भी 5 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा। मुसलमान, राज्य की आबादी का 10.6 प्रतिशत हैं और यह आरक्षण ओबीसी की सूची में शामिल मुस्लिम जातियों को मिल रहे आरक्षण के अतिरिक्त होगा। वर्तमान में जुलाहा, मोमिनए अंसारी, रंगरेज, तेली, नक्कासी, मुस्लिम काकर, पिंजारी और फकीर जातियों के मुसलमानों को ओबीसी की हैसियत से आरक्षण मिल रहा है। इस नए 21 प्रतिशत आरक्षण के साथ, राज्य में शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रतिशत बढ़कर 73 हो गया है। बंबई उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर, मराठाओं को दिए गए 16 प्रतिशत आरक्षण को कई आधारों पर चुनौती दी गई है, जिनमें से प्रमुख यह है कि मराठा, शैक्षणिक या सामाजिक दृष्टि से पिछड़े नहीं हैं। महाराष्ट्र के 17 मुख्यमंत्रियों में से 10 मराठा थे। वर्तमान में राज्य विधानसभा के 288 सदस्यों में से 152 मराठा हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मराठा,राजनैतिक व सामाजिक दृष्टि से प्रभुत्वशाली हैं। वे बड़ी संख्या में सहकारी शक्कर मिलों,सहकारी बैंकों और व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों का संचालन कर रहे हैं। यहां तक कि यह मराठी राज्य, मराठा राज्य बन गया है।
संविधान के अनुच्छेद 16 ;4 के अनुसार राज्य ,नागरिकों के उन पिछड़े वर्गों के सदस्यों को नियुक्तियों या पदों में आरक्षण दे सकता हैए जिन्हें सरकारी सेवाओं में उपयुक्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है।
यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या मराठा और 50 मुस्लिम जातियां, सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं? मंत्रिमंडल ने मराठा समुदाय के बारे में निर्णय, नारायण राणे समिति की रपट के आधार पर लिया जबकि मुस्लिम समुदायों को आरक्षण देने का आधार बनी डाक्टर एम. रहमान की अध्यक्षता में नियुक्त अध्ययनदल की रपट। दरअसल, मराठाओं में इतनी उपजातियां हैं कि उन्हें एक समुदाय कहना ही गलत है। मराठा समुदाय के दो मुख्य हिस्से हैं.किसान उपजातियां व योद्धा उपजातियां। पहले, कुनबी कहलाते हैं और दूसरे शायनावकुली। योद्धा उपजातियों का प्रभुत्व अधिक है। दोनों अपनी अलग पहचान कायम रखे हुए हैं और उनके आपस में वैवाहिक संबंध नहीं होते। अतः उपजातियों के इन दोनों समूहों को एक समुदाय मानकर, उसे पिछड़ेपन की कसौटी पर कसना ही गलत है।
यह दिलचस्प है कि अध्ययन दल ने जिन 50 मुस्लिम जातियों को पिछड़ा बताया या माना है, उनके नाम न तो अध्ययन दल ने सार्वजनिक किए और ना ही सरकार ने। ये वे समुदाय हैं जिन्हें नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 5 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध होगा। जहां मराठा समुदाय के सभी सदस्यों को आरक्षण का लाभ मिलेगा वहीं 50 पिछड़ी मुस्लिम जातियों के उन सदस्यों को यह लाभ नहीं मिलेगा, जो कि क्रीमिलेयर में आते हैं। राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने मीडिया के साथ बातचीत में कहा कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं बल्कि पिछड़ेपन को बनाया गया है। मुख्यमंत्री ने यह स्पष्ट नहीं किया कि पिछड़ेपन को नापने के लिए किन मानकों का इस्तेमाल किया गया है। जहां तक अध्ययन समूह का सवाल है, उसकी रपट सन् 2001 की जनगणना,सन् 2006 की सच्चर समिति रपट और सन् 2009 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज के प्रोफेसर अब्दुल शब्बन द्वारा किए गए एक अध्ययन के आंकड़ों का संकलन मात्र है। तीनों रपटों में न तो पिछड़े मुस्लिम समुदायों के नाम बताए गए हैं और ना ही उनका अलग से अध्ययन किया गया है। उदाहरणार्थ, इनमें से किसी रपट में नक्षबंदी, बेग, मीर,ए हकीम, मुल्ला, हैदरी, नूरी, उस्मानी इत्यादि समूहों के शैक्षणिक स्तर, साक्षरता, जीवनयापन का जरिया, रोजगार, सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व, आमदनी का स्तरए लैंगिक अनुपात, बैंक ऋण व स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आदि के संबंध में अलग से कोई आंकड़े नहीं दिए गए हैं। सारे आंकड़े सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय के हैं। जो चित्र इन रपटों से उभरता है वह निश्चय ही निराशाजनक है। बच्चे स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं कर रहे हैं और इसका कारण गरीबी व बाल मजदूरी है। यद्यपि मुसलमानों की साक्षरता दर 78.1 है तथापि उनमें से केवल 2.2 प्रतिशत ग्रेजुएट हैं। मुस्लिम महिलाओं में ग्रेजुएशन करने वालों का प्रतिशत मात्र 1.4 है। शहरों और गांवों में रहने वाले मुसलमानों में से लगभग 60 प्रतिशत गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। मुसलमानों की कार्य सहभागिता दर ;आबादी का वह हिस्सा जो या तो कोई काम कर रहा है अथवा ढूंढ रहा हैद्ध केवल 32.4 प्रतिशत है और महिलाओं के मामले तो यह 12.7 प्रतिशत मात्र है। महाराष्ट्र काडर में कोई आईएएस अधिकारी मुसलमान नहीं है और पुलिस बल में केवल 4.4 प्रतिशत मुसलमान हैं। इस परिस्थिति में यह समझना मुश्किल है कि मंत्रिमंडल इस निर्णय पर कैसे पहुंचा कि पूरे मुस्लिम समुदाय नहीं वरन् केवल 50 मुस्लिम जातियों को आरक्षण की जरूरत है।
आरक्षण की राजनीति
आरक्षण के जरिए, राज्यए शनैः शनैः समाज में व्याप्त गैर.बराबरी को दूर करने के अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा करता है। आरक्षण के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि समाज के उस वर्ग के नागरिकों, जिन्हें ऐतिहासिक कारणों से आगे बढ़ने के उपयुक्त व पर्याप्त अवसर नहीं मिले,को ऐसे अवसर उपलब्ध कराए जाएं ताकि जो क्षति उन्हें हुई है उसकी पूर्ति हो सके। परंतु महाराष्ट्र सरकार के आरक्षण संबंधी हालिया फैसले का इस संवैधानिक दायित्व की पूर्ति से कोई लेना.देना नहीं है। आरक्षण,दरअसल, सत्ताधारी पार्टी द्वारा किसी जाति या समुदाय के वोट कबाड़ने के लिए उसे आकर्षित करने का जरिया बन गया है। शरद पवार ने तो मीडिया से यह तक कह दिया कि अगर सत्ताधारी दल चुनाव में लाभ उठाने के लिए भी आरक्षण देता है तो इसमे गलत क्या है। मुसलमान लगभग पिछले 30 सालों से सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अपने लिए आरक्षण की मांग करते आ रहे हैं। परंतु उनकी मांग की अब तक अनसुनी होती आई है। 16वें आम चुनाव में भाजपा.शिवसेना.आरपीआई गठबंधन द्वारा महाराष्ट्र की 48 में से 42 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर लेने के बाद कांग्रेस को यह समझ में आया कि जनता उसके साथ नहीं है। और इसलिए उसकी सरकार ने मराठाओं को आरक्षण देने का फैसला किया। मुसलमानों की कुछ जातियों को आरक्षण देने का उद्देश्य भी उनके पिछड़ेपन को समाप्त करना नहीं है बल्कि मराठा समुदाय को दिए गए आरक्षण को औचित्यपूर्ण सिद्ध करना है। दरअसल, शक्तिशाली मराठा समुदाय को खुश करने के सरकारी प्रयास में मुसलमान अनायास ही लाभांवित हो गए हैं। वरना, क्या कारण है कि अगर सरकार मुसलमानों के एक तबके को आरक्षण देना चाहती थी तो इस तबके की पहचान के लिए आवश्यक प्रयास क्यों नहीं किए गए।

पहचान की राजनीति व कांग्रेस और भाजपा की धर्मनिरपेक्षता
जब भारत के संविधान का निर्माण हुआ था तब उसकी उद्देशिका में'धर्मनिरपेक्षता' शब्द नहीं था। परंतु धर्मनिरपेक्षता, संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा थी। संविधान के अनुच्छेद 14, 15 व 16 में प्रत्येक नागरिक को समानता की गारंटी दी गई है,भले ही उसका धर्म या जाति कोई भी हो। इसी तरह, अनुच्छेद 19 के अंतर्गत दी गई स्वतंत्रताएं भी समस्त नागरिकों को हासिल हैं। अनुच्छेद 25 देश के सभी रहवासियों को अंतर्रात्मा की स्वतंत्रता व अपनी पसंद के किसी भी धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। जो एकमात्र अधिकार धार्मिक समुदायों को है वह यह है कि वे धार्मिक मामलों का स्वयं प्रबंधन कर सकते हैं और धर्मार्थ या धार्मिक प्रयोजन से संस्थाओं की स्थापना व उनका प्रबंधन कर सकते हैं। अनुच्छेद 27 कहता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी धर्म विशेष या धार्मिक संस्था को प्रोत्साहन देने के लिए टैक्स देने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 28ए राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा का निषेध करता है।
यह स्पष्ट है कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार व स्वतंत्रताएंए व्यक्तियों को उपलब्ध हैं न कि समुदायों या जातियों को। हां, संवैधानिक अधिकारों व स्वतंत्रताओं से लैस नागरिक, अपनी सामाजिकए सांस्कृतिक या धार्मिक आवश्यकताओं  की पूर्ति के लिए एकसाथ मिलकर किसी संस्था का गठन कर सकते हैं। परंतु किसी भी स्थिति में, व्यक्तियों को उपलब्ध अधिकार व स्वतंत्रताएंए उनके समूह को स्थानांतरित नहीं हो सकतीं, चाहे वह समूह धार्मिक हो, नस्लीय, जातिगत या भाषायी। संविधान की यह मान्यता है कि ये समूह स्थायी नहीं है और इनकी दीवारें इतनी ऊँची नहीं होतीं कि कोई इन्हें लांघ न सके। सरल शब्दों में हम कहें तो एक धर्म का व्यक्ति जब चाहे किसी दूसरे धर्म को अपना सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि कोई धार्मिक समूह,स्थायी संस्था नहीं है। उसके पुराने सदस्य उसे छोड़कर जा सकते हैं और नए सदस्य उसमें शामिल हो सकते हैं। हां, इस स्थिति के कुछ अपवाद भी हैं जैसे महिलाएं, बच्चे, अनुसूचित जाति व जनजातियों के सदस्य या शैक्षणिक व सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग या ऐसे लोग जिन्हें सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय से वंचित रखा गया हो। ऐसे सभी नागरिक, सामूहिक रूप से कुछ अधिकारों के तब तक पात्र हैं जब तक कि वे कमजोर, सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े व भेदभाव के शिकार बने रहते हैं। इस तरह के वर्गों को आरक्षण व अन्य कल्याण कार्यक्रमों से लाभांवित होने का अधिकार है।
परंतु राजनैतिक दल अपने संकीर्ण लाभ के लिए इस संवैधानिक सिद्धांत की अवहेलना करते हैं। यह सुनिश्चित करने की बजाय कि हर व्यक्ति को वे स्वतंत्रता,मिलें, जिनका वह पात्र है और किसी को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय से वंचित न किया जाए, राजनैतिक दल जाति, समुदाय या नस्ल पर आधारित समूहों के हितों को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं। इससे इन समूहों को अपनी अलग पहचान को मजबूती देने में लाभ नजर आने लगता है और उनमें कट्टरता बढ़ती है। श्रेष्ठी वर्ग को जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र या नस्ल के आधार पर अलग पहचान को मजबूती देने में मदद करने के लिए राजनैतिक दल, सरकारी संसाधनों व सत्ता का दुरूपयोग करते हैं और जाति या समुदाय के आधार पर लोगों को उपकृत कर अपना हितसाधन करते हैं। कांग्रेसए समाजवादी पार्टी व बसपा जैसे राजनैतिक दलए जो कि स्वयं को 'सेक्युलर'बताते हैं,आर्थिक व राजनैतिक लाभों का वितरण मुख्यतः जाति के आधार पर करना चाहते हैं,जिसमें उनकी पंसदीदा जाति को उसकी पात्रता से अधिक हिस्सा मिले। दूसरी ओर, भाजपा, लाभों, पदों व अवसरों के वितरण का आधार धर्म को बनाना चाहती है।
इस प्रक्रिया में ये पार्टियां भारत को धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा व नस्ल पर आधारित समुदायों के महासंघ में परिवर्तित कर रही हैं.एक ऐसे महासंघ में, जिसमें विभिन्न समुदायों को अलग.अलग विशेषाधिकार प्राप्त हों। कुछ लोग यह मांग करते हैं कि मराठाओं को अधिक अधिकार व लाभ मिलने चाहिए,य कुछ अन्य चिल्ला.चिल्लाकर कहेंगे कि मुसलमानों को अन्य समुदायों की तुलना में अधिक सुविधाएं मिलनी चाहिए तो कुछ अन्य का दावा होगा कि हिन्दुओं का देश के संसाधनों पर अधिक अधिकार है। तथ्य यह है कि ये सभी वर्ग मिलकर हमारे संविधान का मखौल बना रहे हैं और कानून के राज को कमजोर कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसे वातावरण में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली संस्कृति का बोलबाला हो जाता है। उस समुदाय या जाति को अधिक तवज्जो मिलती है जिसकी आबादी अधिक है या जिसके सदस्यों का राजनीति में ज्यादा दखल है। विभिन्न समुदायों के बीच अधिक से अधिक लाभ पाने की प्रतियोगिता भी चलती रहती है जिसके कारण विवाद और हिंसा होते हैं। क्या ही अच्छा हो कि हमारे राजनेता लोगों को समुदायों के तौर पर देखने की बजाए यह सुनिश्चितत करने का प्रयास करें कि हर व्यक्ति को समानता व समान अवसर का अधिकार मिले। और अगर राजनेता ऐसा नहीं करते तो क्या प्रजातंत्र की अन्य संस्थाएं सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए आगे आयेंगी?
 -इरफान इंजीनियर