मंगलवार, 12 मई 2015

भक्ति.सूफी परंपराएं मानवता को एक करती हैं


वर्तमान दौर में धार्मिक पहचान का इस्तेमाल,राजनैतिक एजेण्डे को लागू करने के लिए किया जा रहा है। चाहे मुद्दा आतंकवादी हिंसा का हो या संकीर्ण राष्ट्रवाद का, दुनिया के सभी हिस्सों में धर्म के मुखौटे के पीछे से राजनीति का चेहरा झांक रहा है। कुछ दशकों पहले तकए धर्म और राजनीति को अलग करने और रखने की आवश्यकता पर जोर दिया जाता था परंतु हुआ उसका उल्टा। धर्म और राजनीति का घालमेल बढ़ता ही गया। इस संदर्भ में दक्षिण एशिया में हालात बहुत गंभीर हैं। अप्रैल 2015 में अमरीकी राष्ट्रपति ने अजमेर स्थित गरीब नवाज़ ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर चढ़ाने के लिए चादर भेजी। गत 22 अप्रैल को अखबारों में छपी खबर के मुताबिक, सोनिया गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और नरेन्द्र मोदी ने भी दरगाह पर चादर चढ़ाई।
अगर हम राज्य, राजनीति और धर्म के परस्पर रिश्तों को परे रखकर देखें तो यह दिलचस्प तथ्य सामने आता है कि कुछ धार्मिक परंपराएं, सभी धर्मों के लोगों को प्रभावित करती आई हैं। दक्षिण एशिया व विशेषकर पाकिस्तान और भारत की सूफी व भक्ति परंपराएं क्रमशः इस्लाम और हिंदू धर्म की ऐसी दो मानवतावादी धाराएं हैं जो धार्मिक पहचान से ऊपर उठकर संपूर्ण मानवता की एकता की बात करती हैं। इन परंपराओं के संतों के अनुयायी सभी धर्मों के थे और ये संत सत्ता से दूर रहते थे। इस मामले में वे मध्यकाल के पुरोहित वर्ग से भिन्न थे जो कि राजाओं और नवाबों के दरबारों की शोभा बढ़ाने में गर्व महसूस करता था। हिंदू धर्म में कबीर, तुकाराम, नरसी मेहता, शंकर देव व लाल देध जैसे संतों की समृद्ध परंपरा है तो इस्लामिक सूफी परंपरा के संतों में निज़ामुद्दीन औलिया, मोइनुद्दीन चिश्ती,ताजुद्दीन बाबा औलिया,अज़ान पीर व नूरूद्दीन नूरानी शामिल हैं। इनके अतिरिक्त सत्यपीर व रामदेव बाबा पीर दो ऐसे संत थे जो भक्ति और सूफी दोनों परंपराओं के वाहक थे।
संत गुरूनानक ने हिंदू धर्म और इस्लाम का मिश्रण कर एक नए धर्म की स्थापना की। इस्लाम का ज्ञान हासिल करने के लिए वे मक्का तक गए और हिंदू धर्म के आध्यात्मिक पक्ष को समझने के लिए उन्होंने काशी की यात्रा की। उनके सबसे पहले अनुयायी थे मरदान और सिक्खों के पवित्र स्वर्ण मंदिर की आधारशिला रखने के लिए मियां मीर को आमंत्रित किया गया था। गुरूग्रंथ साहब का धर्मों के प्रति समावेशी दृष्टिकोण है और उसमें कुरान की आयतें और कबीर व अन्य भक्ति संतों के दोहे शामिल हैं। आश्चर्य नहीं कि नानक के बारे में यह कहा जाता था कि 'बाबा नानक संत फकीर, हिंदू का गुरूए मुसलमान का पी'।
आज यदि पूरे विश्व में धर्म चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है तो इसका कारण है राजनीति के क्षेत्र में उसका इस्तेमाल। इस संदर्भ में सूफी परंपरा में लोगों की रूचि का एक बार फिर से बढ़ना सुखद है। दक्षिण एशिया में सूफीवाद का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है। सूफी शब्द का अर्थ होता है मोटा ऊनी कपड़ा, जिससे बने वस्त्र सूफी संत पहनते हैं। सूफीवाद, शिया मुस्लिम धर्म से उभरा परंतु आगे चलकर कुछ सुन्नियों ने भी इसे अपनाया। सूफीवाद में रहस्यवाद को बहुत महत्ता दी गई है और वह कर्मकाण्डों को सिरे से खारिज करता है। वह अल्लाह को मानवरूपी नहीं मानता बल्कि उन्हें आध्यात्मिक शक्ति के रूप में देखता है। यह भक्ति संतो की आस्थाओं से मिलता जुलता है। कई सूफी संत सर्वेश्वरवादी थे और उनके जीवनमूल्य,मानवीयता से ओतप्रोत थे।
शुरूआत में इस्लाम के कट्टरपंथी पंथों ने सूफी संतो का दमन करने का प्रयास किया परंतु आगे चलकर उन्होंने सूफीवाद से समझौता कर लिया। सूफी संतों में से कुछ दरवेश बन गए। दरवेश का अर्थ होता है ऐसे संत जो एक स्थान पर नहीं रहते और लगातार भ्रमण करते रहते हैं। कई देशों में सभी धर्मों के लोग उनकी दरगाहों पर खिराजे अकीदत पेश करते हैं। इसी तरहए भक्ति संतो के अनुयायी भी सभी धर्मों के लोग हैं।
सूफीवाद के समानांतर भक्ति परंपरा भी भारतीय धार्मिक इतिहस की सबाल्टर्न धारा का प्रतिनिधित्व करती है। भक्ति संत, समाज के विभिन्न तबकों से थे, विशेषकर नीची जातियों से। भक्ति संतों ने धर्म को संस्थागत रूप देने का विरोध किया और उसको विकेन्द्रीकृत करने का प्रयास किया। उनका कहना था कि धर्म, व्यक्ति का निजी मसला है। वे धर्म और राज्य सत्ता को एक.दूसरे से अलग करने के हामी थे और उन्होंने ईश्वर की आराधना की अवधारणा को ज्ञानार्जन की प्रक्रिया से जोड़ा। भक्ति संतों के लेखन में गरीब वर्ग के दुःख.दर्द झलकते हैं। भक्ति परंपरा ने कई नीची जातियों को प्रतिष्ठा दिलवाई। यह परंपरा मुसलमानों के प्रति भी समावेशी दृष्टिकोण रखती थी और इसने ऊँची जातियों के वर्चस्व को चुनौती दी।
भक्ति परंपरा, कर्मकांडों की विरोधी थी। इसके संतों ने ऐसी भाषा का उपयोग किया जिसे जनसामान्य समझ सकते थे। वे एक ईश्वर की अवधारणा में विश्वास रखते थे। इस परंपरा के संतों ने हिंदू.मुस्लिम एकता पर जोर दिया।
हमें यह समझना होगा कि हर धर्म में विभिन्न धाराएं होती हैं। भक्ति और सूफी परंपराएं, धर्मों का मानवतावादी चेहरा हैं जिन्होंने मानवता को एक किया और धर्मों के नैतिक.आध्यात्मिक पक्ष पर जोर दिया। इसके विपरीत,धर्मों की असहिष्णु प्रवृत्तियों का इस्तेमाल राजनैतिक ताकतों ने अपने एजेण्डे की पूर्ति के लिए किया। भारतीय उपमहाद्वीप में स्वाधीनता आंदोलन के दौरान राजाओं, नवाबों और जमींदारों ने हिंदू व मुस्लिम सांप्रदायिकता की नींव रखी। इस धार्मिक राष्ट्रवाद का धर्मों के नैतिक पक्ष से कोई लेनादेना नहीं था। यह केवल धार्मिक पहचान का राजनैतिक लक्ष्य पाने के लिए इस्तेमाल था। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के कई नेता जिनमें गांधीजी व मौलाना अबुल कलाम आज़ाद शामिल हैं,अत्यंत धार्मिक थे परंतु वे न तो धार्मिक राष्ट्रवाद में विश्वास रखते थे और ना ही अन्य धार्मिक परंपराओं के प्रति उनके मन में तनिक भी बैरभाव था।
सूफी और भक्ति परंपराएं हमें इस बात की याद दिलाती हैं कि वर्तमान दौर में धर्मों के आध्यात्मिक और नैतिक पक्ष को कमजोर किया जा रहा है। अगर हमें मानवता के भविष्य को संवारना है तो हमें धर्मों के समावेशी.मानवतावादी पक्ष को मजबूत करना होगा और धर्मों के समाज को बांटने के लिए इस्तेमाल को हतोत्साहित करना होगा। हमें यह समझना होगा कि सभी धर्म मूलतः नैतिकता और मानवता पर जोर देते हैं। हमें धर्मों की मूल आत्मा को अपनाना होगा न कि बाहरी आडंबरों को।
-राम पुनियानी

सोमवार, 11 मई 2015

गौहत्या पर प्रतिबंध: वैज्ञानिक पशुपालन या सांस्कृतिक राष्ट्रवादी

हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा गौरक्षा के लिए चलाए जा रहे अभियान का उद्देश्य राजनैतिक है। ये संगठन उच्च जातियों के सांस्कृतिक वर्चस्व को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं और उस पदक्रम आधारित व सामंती संस्कृति.जो ऊँची जातियों को विशेषाधिकार देती है.को राष्ट्रीय संस्कृति का दर्जा देना चाहते हैं। महाराष्ट्र विधानसभा ने सन् 1995 में 'महाराष्ट्र पशु संरक्षण अधिनियम 1976' में संशोधन किया था। इस संशोधन अधिनियम को 20 साल बाद, सन् 2015 में, राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त हुई। इस संशोधन अधिनियम का उद्देश्य गौवंश की रक्षा नहीं बल्कि अतिवादी व अराजक हिंदू राष्ट्रवादी समूहों को, हाशिए पर पड़े समुदायों,विशेषकर मुसलमानों, को भयाक्रांत करने का अवसर उपलब्ध करवाना है।
सन् 1976 के पशु संरक्षण अधिनियम, जिसे सन् 1988 में संशोधित किया गया था, में केवल गाय ;व उसके नर व मादा बछड़ों का वध प्रतिबंधित किया गया था और कानून का उल्लंघन करने वालों को छः माह तक के कारावास से दंडित किए जाने का प्रावधान था। यदि अदालत चाहे तो अपराधी पर रूपये 1000 तक का जुर्माना भी लगा सकती थी।
सन् 2015 का अधिनियम,एक प्रजातांत्रिक, संवैधानिक राज्य को एकाधिकारवादी, सांस्कृतिक राज्य में परिवर्तित करता है.एक ऐसे राज्य में जो अतिशय शक्तिसंपन्न है और जिसके तंत्र को नागरिकों के रसोईघरों, रेफ्रिजिरेटरों और खाने की थाली में झांकने का अधिकार है। अधिनियम में गाय के अलावा बैलों और सांडों का वध भी प्रतिबंधित कर दिया गया है। जिस तथ्य पर अधिकांश लोगों का ध्यान नहीं गया है वह यह है कि यह अधिनियम यूएपीए ;गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम या टाडा ;आंतकवादी व विध्वंसकारी गतिविधियां निवारण अधिनियम या पोटा ;आतंकवादी गतिविधियां निवारण अधिनियम जितना ही भयावह है। इस अधिनियम के लागू होने से उन अतिवादी व मुख्यधारा के हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को प्रोत्साहन मिलेगा जो कई तरह की गैरकानूनी गतिविधियों में संलग्न हैं। ऐसी गतिविधियों में शामिल हैं ऐसे ट्रक व अन्य वाहनों को रोकना जिनमें मवेशी ढोए जा रहे हों व मवेशियों का मालिक, विक्रेता या क्रेता या वाहन का मालिक या ड्रायवर मुसलमान हो। ये समूह, जिनमें अक्सर चार से छः संडमुसंड व्यक्ति होते हैं,ड्रायवर से कागजात मांगते हैंए उन कागजातों को फाड़कर फेंक देते हैं और मवेशी लूट लेते हैं। अगर ड्रायवर मुसलमान हो तो उसकी पिटाई लगाते हैं, पुलिस को बुला लेते हैं और झूठा प्रकरण दर्ज करवाकर वाहन को जब्त करवा देते है। उसके बाद वे मीडिया को बुलाकर यह प्रचार करते हैं कि मुसलमान, गायों को काटने के लिए ले जा रहे थे और उन्होंने उन्हें रोका।
राज्य और पवित्र गाय
सरकार का कहना है कि 2015 का अधिनियम,संविधान के चौथे भाग के अनुच्छेद 48 के अनुरूप है, जो राज्य के नीति निदेशक तत्वों से संबंधित है। ये नीति निदेशक तत्व अदालतों के जरिए लागू नहीं करवाए जा सकते। अनुच्छेद 48 कहता है,'राज्य, कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टतया गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारू और वाहक पशुओं की नस्लों के परिरक्षण व सुधार के लिए और उनके वध का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा।' राज्य सरकार ने बंबई हाईकोर्ट को बताया कि यह अधिनियम इसलिए लागू किया गया है ताकि गौवंश की रक्षा हो सके। सरकार का यह भी कहना था कि गाय के दूध, गोबर और मूत्र का इस्तेमाल कीटनाशक और अन्य औषधीय उत्पादों में किया जाता है। राज्य सरकार के इस दावे की किसी वैज्ञानिक शोध से पुष्टि नहीं हुई है और ना ही सरकार,अदालत के समक्ष ऐसे किसी भी शोध का हवाला दे सकी। जहां तक बैल के भारवाही पशु के रूप में इस्तेमाल का सवाल है, इस आधार पर तो फिर भैंसों, ऊँटों और घोड़ों के वध को भी प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। सरकार ने प्राचीन वैदिक ग्रंथों का हवाला देकर भी अपने नये कानून को उचित ठहराया। यहां तक कि 'नेशनल कमीशन ऑन केटल' की रपट में भी वैदिक ग्रंथों और 'स्मृतियों' के आधार पर यह 'साबित' किया गया है कि गाय एक उपयोगी पशु है! सच यह है कि ऊँची जातियों की धार्मिक परंपराओं का सहारा लिए बिना, गौवध पर प्रतिबंध को औचित्यपूर्ण सिद्ध करना असंभव नहीं तो बहुत कठिन अवश्य है।
अगर सन् 2015 के अधिनियम का उद्देश्य महाराष्ट्र के पशुधन का उसके दूध, गोबर और मूत्र के उत्पादों की खातिर संरक्षण करना और भारवाही पशु के रूप में बैल की उपयोगिता की दृष्टि से उसे वध से बचाना है तो फिर अधिनियम की धारा 5डी के अंतर्गत, किसी व्यक्ति के पास अन्य राज्यों से आयात किए गए गौमांस का पाया जाना अपराध घोषित क्यों किया गया है। निश्चित तौर पर अगर महाराष्ट्र के बाहर से गौमांस आयात किया जाता है तो उससे राज्य के पशुधन में कमी नहीं आएगी और ना ही राज्य में उपलब्ध गायों के दूध,गोबर या मूत्र की मात्रा घटेगी! दूसरी ओरए गौवंश के राज्य से बाहर निर्यात ;सिवा वध के लिए करने की अनुमति क्यों दी गई है ? गौवंश को चाहे वध के लिए निर्यात किया जाए या किसी अन्य उद्देश्य के लिएए महाराष्ट्र तो अपना पशुधन खोएगा ही और साथ ही दूध, गोबर और मूत्र भी खोएगा।
दरअसल, इस अधिनियम का उद्देश्य ना तो गौवंश का संरक्षण है और ना ही उसके दूध, गोबर व मूत्र का उपलब्धता सुनिश्चित करना। इस अधिनियम का असली उद्देश्य है पुलिस और कार्यपालिका को दमन करने का एक और हथियार उपलब्ध करवाना। इस अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर नजर डालिये। धारा 5ए, 5बी और 5सी में गौवंश का वध के लिए परिवहन, गौवंश का वध के लिए खरीदना.बेचना और गाय या बैल का मांस किसी व्यक्ति के पास पाया जाना अपराध घोषित किया गया है। यह अधिनियम किसी भी पुलिस अधिकारी,जो कि उपनिरीक्षक से निचले दर्जे का नहीं होगा, या राज्य सरकार द्वारा अधिकृत किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी ऐसे वाहन, जिसका इस्तेमाल गौवंश को ढोने के लिए किया जा रहा हो या किये जाने का अंदेशा हो, को रोक सकता है और उसमें प्रवेश कर उसकी तलाशी ले सकता है। अधिनियम इस तरह की तलाशी लेने के लिए किसी भी परिसर के द्वार या ताले को तोड़ने का अधिकार भी पुलिस को देता है। स्पष्ट है कि अभी जो गौरक्षक दल गैरकानूनी ढंग से काम कर रहे हैं उन्हें यह अधिनियम कानूनी अधिकार दे देगा। कोई भी पुलिस अधिकारी उन्हें अधिकृत कर सकेगा कि वे किसी भी वाहन को रोककर उसकी तलाशी ले सकते हैं। पुलिस अधिकारियों को ऐसी गायों, बछड़ों व बैलों को जब्त करने का अधिकार होगा जिन्हें वध के इरादे से बेचाए खरीदा या एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाया जा रहा हो। कहने की आवश्यकता नहीं कि 'इरादे' का आरोप किसी पर भी बहुत आसानी से जड़ा जा सकता है और उस व्यक्ति के लिए यह साबित करना मुश्किल होगा कि उसका 'इरादा' यह नहीं था।
इस अधिनियम के उल्लंघन के लिए निर्धारित सजा 10 गुना कर दी गई है। इस अधिनियम के तहत दोषी पाये जाने वाले को पांच साल तक का कारावास हो सकता है और उस पर दस हजार रूपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है। कारावास की न्यूनतम अवधि छः माह और जुर्माने की न्यूनतम राशि रूपये 1000 होगी। इस प्रकार,संशोधन के पहले जो अधिकतम सजा दी जा सकती थी, उसे अब न्यूनतम बना दिया गया है। अगर आपके पास से कम मात्रा में कोई नशीली दवा ;नार्कोटिक ड्रग जब्त होती है तो संभावना यह है कि आपको अदालत किसी पुनर्वास केंद्र में भेजे जाने का आदेश देगी। परंतु यदि आपके पास से गौवंश का मांस जब्त होता है तो आप एक साल तक के लिए जेल भेजे जा सकते हैं। शायद सरकार की दृष्टि में किसी व्यक्ति के पास से गौमांस मिलना, उसके पास से ड्रग्स मिलने से ज्यादा गंभीर अपराध है। हिंदू राष्ट्रवादी समूहों को हिंदुओं के ड्रग्स के आदी हो जाने से ज्यादा चिंता इस बात की है कि कहीं उनके पास गौमांस न हो।  
अधिनियम का सबसे कठोर और भयावह प्रावधान यह है कि गौवंश का वध, परिवहन,राज्य से बाहर निर्यात खरीदी या बिक्री या गाय या बैल का मांस पाया जाना अधिनियम का उल्लंघन नहीं है, यह साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी पर होगी। भारतीय विधिशास्त्र में आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि उसका दोष सिद्ध नहीं हो जाता। इस सिद्धांत के कुछ ही अपवाद हैं। इनमें शामिल हैं अपवादात्मक परिस्थितियों में अत्यंत गंभीर अपराधों से निपटने के लिए बनाए गए विशेष कानून उदाहरणार्थ गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम ;यूएपीए या आतंकवाद.निरोधक कानून। हत्या या राष्ट्रद्रोह के मामलों में भी आरोपी को निर्दोष माना जाता है और उसे दोषी सिद्ध करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष पर होती है। सवाल यह है कि किसी गरीब व्यक्ति को यदि इस अधिनियम के तहत आरोपी बना दिया गया तो वह स्वयं को कैसे निर्दोष साबित करेगा ? राज्य या उसके द्वारा अधिकृत कोई व्यक्ति आप के घर का दरवाजा तोड़कर अंदर घुस सकता है, आपके रसोईघर और थाली में क्या है, यह देख सकता है, आपके फ्रिज में झांक सकता है और 'अवैध' मांस जब्त कर सकता है और आपको सींखचों के पीछे डाल सकता है। अब यह आपकी जिम्मेदारी होगी कि आप जेल में रहते हुए अपने आपको निर्दोष साबित करें।
इस अधिनियम के लागू होते ही हिंदू धर्म के स्वनियुक्त रक्षक अतिसक्रिय हो उठे। वैसे भी वे न तो संविधान का सम्मान करते हैं और ना ही कानून के राज में उनकी आस्था है। उत्तरी महाराष्ट्र का मालेगांव,मुस्लिम.बहुत नगर है। वहां पर कुछ लोगों ने मुसलमानों के खिलाफ इस अधिनियम के तहत् रिपोर्ट लिखवा दी। पुलिस ने कार्यवाही की और आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। मालेगांव पुलिस ने तबस्सुम बरनगरवाला को बताया, 'प्रतिबंध लगते ही हिंदू समूह हमारे पीछे पड़ गये कि हम मुस्लिम घरों की जांच करें। लोग आपसी दुश्मनी के कारण झूठी शिकायतें लिखवा रहे हैं। कोई भी हिंदू आकर हमसे कह सकता है कि फलां मुसलमान के घर में जो गायें हैं उनका वह वध करने का 'इरादा' रखता है। ऐसे स्थिति में हम क्या करें?'मालेगांव पुलिस ने नगर के सभी ऐसे मुसलमानों, जिनके घर गायें पली हैं, को निर्देष दिया कि वे अपने जानवरों का पंजीयन करायें और गायों के मालिक की सभी गायों के साथ फोटो भी पुलिस को उपलब्ध करवायें। मालेगांव पुलिस ने एक नया रजिस्टर बनाया जिसका नाम रखा गया 'गाय, बैल,बछड़ा रजिस्टर'। मालेगांव की पुलिस अब उन मुसलमानों को ढूँढ रही है जिनके पास गायें हैं और इस बात का हिसाब रख रही है कि किस मुसलमान के पास कितनी गायें और कितने बछड़े हैं। मवेशियों के व्यवसाय और उनके परिवहन पर भी पुलिस नजर रख रही है। जिन हिंदुओं के पास गायें हैं उनसे अपने पशुओं का पंजीकरण करवाने के लिए नहीं कहा गया है क्योंकि पुलिस यह मानकर चल रही है कि केवल मुसलमान ही गौवध करते हैं हिंदू नहीं।
महाराष्ट्र में पुलिसकर्मियों की पहले से ही बहुत कमी है। पुलिस को दलित.विरोधी हिंसा, आतंकवाद, ड्रग्स के बढ़ते व्यवसाय, भू.माफियाए महिलाओं के साथ बलात्कार व अन्य सैक्स अपराध, घरेलू हिंसा, सांप्रदायिक हिंसा व अन्य संगठित अपराधों से निपटने के अलावा अब गायों और बछड़ों का हिसाब.किताब भी रखना पड़ेगा।
इस अधिनियम का सबसे बड़ा शिकार बना है हमारा विधिशास्त्र। यह अधिनियम,पुलिस और स्वनियुक्त हिंदू रक्षकों को ऐसे अधिकारों से लैस करता है, जिनका इस्तेमाल वे मुसलमानों और दलितों का दमन करने और उन्हें परेशान करने के लिए कर सकते हैं। दलित, प्रोटीन के सस्ते स्त्रोत से तो वंचित होंगे ही उनकी जीविका भी प्रभावित होगी क्योंकि उनमें से कई चमड़े का सामान बनाने के व्यवसाय में रत हैं।
धर्मनिरपेक्ष आंदोलन और मानवाधिकार संगठनों ने इस अधिनियम का इस आधार पर विरोध किया है कि यह अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुसलमानों,के अधिकारों पर अतिक्रमण है। सच यह है कि यह इससे भी ज्यादा है। हिंदुत्व की विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोगों की सरकार अब हमें यह बताना चाहती है कि हम क्या खाएं और क्या नहीं? अब आगे क्या? शायद अब सरकार हमें यह बताएगी कि अब हम कौनसे कपड़े पहने,कौनसी फिल्म देंखे या किस संगीत की महफिल में जाएं। सरकार अब शायद यह भी तय करना चाहेगी कि हम अपनी आजीविका के लिए क्या काम करें और शहर के किस इलाके में रहें। मुसलमानों को पहले शिकार इसलिए बनाया जा रहा है ताकि इस कानून का विरोध केवल मुसलमानों की ओर से होए पूरे समाज की ओर से नहीं। परंतु सच यह है कि इस तरह के कानून हर उस व्यक्ति के लिए खतरे की घंटी हैं जो प्रजातंत्र में विश्वास रखता है। ऐसे हर व्यक्ति को इस कानून और इस तरह के अन्य कदमों का खुलकर विरोध करना चाहिए।
-इरफान इंजीनियर

सोमवार, 4 मई 2015

ताक-झांक : बाबा रामदेव की डायरी में


वैशाख शुक्ल-1, विक्रम संवत 2072
हरिद्वारआज राहुल गांधी ने संसद में मोदी सरकार को ललकारते हुए कहा कि वह सूट-बूट की सरकार है. बात मेरी समझ में नहीं आई. राहुल ने ऐसा क्यों कहा! जबकि मोदी जी का सूट तो कब का नीलाम हो चुका है. वह भी करोड़ों में. सोचता हूं मैं भी अपना सूट नीलाम करवा दूं. निश्चित ही मोदी जी के सूट से ज्यादा धनराशि प्राप्त होगी. इसके दो कारण है. पहला, मेरे कई धनवान चेले हैं. दूसरा, मेरा सूट मोदी जी के सूट से कहीं ज्यादा ऐतिहासिक महत्व का है. वह सलवार सूट आज भी मेरे पास रखा हुआ है जिसे रामलीला मैदान में पहनकर मैंने दिल्ली पुलिस  से जान बचाई थी. आज भी लोग उस सूट को लेकर चुटकुले बनाते हैं और मेरा परिहास करते हैं. जबकि आपद धर्म में तो सब उचित होता है. आखिर अर्जुन ने भी अज्ञातवास में बृह्नलला का रूप धरा था. इससे क्या अर्जुन की शूरवीरता कम हो गई! आपद धर्म में जान बचाने के लिए उस समय जिस वीरांगना बहन का सूट मैंने लिया था, उसने मुझसे कभी उसे वापस नहीं मांगा. जब मैं खुद ही उसे वापस करने गया तो वह बोली कि रख लो बाबा, आप को ज्यादा सूट करता है.
मेरा सूट मोदी जी के सूट से कहीं ज्यादा ऐतिहासिक महत्व का है. वह सलवार सूट आज भी मेरे पास रखा हुआ है जिसे पहनकर मैंने दिल्ली पुलिस से जान बचाई थी

वैशाख शुक्ल-2, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
कल कैबिनेट मंत्री का दर्जा ठुकरा दिया मैंने. अरे यार! मेरी हैसियत मोदी जी के बराबर की है और हरियाणा के मुख्यमंत्री खट्टर जी मुझे मंत्री का दर्जा दे रहे हैं. एक बार अपने बयान में मैंने खुद कहा था कि मैं चाहूं तो इस देश का प्रधानमंत्री बन सकता हूं. ऐसे ही भारत सरकार पद्म भूषण देने का मन बना रही थी. इसकी औपचारिक घोषणा होने से पहले ही मैंने इसे लेने से मना कर दिया. कैबिनेट मंत्री पद छोड़कर मैंने एक बार फिर इतिहास रच दिया. लगातार दो त्याग किए मैंने. सोनिया जी का त्याग मेरे सामने कुछ भी नहीं.
वैशाख शुक्ल-4, विक्रम संवत 2072
हरिद्वार
कल कांग्रेस के प्रवक्ता मनु सिंघवी ने कहा कि मैंने योग को राजनीति से जोड़कर राजयोग शुरू कर दिया जिसमें योग पीछे और बाबा की राजनीति आगे है. मिथ्या आरोप है उनका. मैंने योग को राजनीति से नहीं जोड़ा है अपितु राजनीति में योग को जोड़ दिया है. राजनीति में योग करते-करते मैंने जाना कि वस्तुतः राजनीति भी योग का ही तो खेल है. योग अर्थात जोड़ अर्थात जोड़ना. राजनीति का मर्ज ही जोड़ों का दर्द है. नेता अपने लिए तो जोड़ता जाता है और समाज में दर्द बांटता जाता है. अपने तनिक से जोड़ के लिए वह किसी को भी दर्द बांट सकता है. बाबा सब जानता है. बाबा के अधिकांश शिष्य राजनीतिज्ञ ही तो हैं. वो भी कुशल. मैं योग कराते-कराते राज करने लगा तो कुछ छद्म राष्ट्रवादियों, मनु सिंघवी जैसे लोगों को सहन नहीं हो रहा है. देश में कितने योग गुरू हैं. कोई मेरी तरह से वीआईपी नहीं बन पाया. क्यों! क्योंकि उन्होंने योग में कुछ जोड़ा नहीं. यदि मैं योग में राजनीति को न जोड़ता तो मेरे विरोधी कब का मेरा आश्रम बंद करवा चुके होते. आज यदि योग और बाबा रामदेव एक दूसरे के पर्याय बन गए हैं तो उसका कारण राजयोग ही है.
राहुल गांधी चिंतन करने विदेश चले जाते हैं. जबकि यहां का आम आदमी शौचालय मैं बैठकर ही चिंतन कर लेता है और उसके चिंतन से कुछ न कुछ निकलता जरूर है.
वैशाख शुक्ल-5, विक्रम संवत 2072
दिल्ली
इस समय अपने  को कर्ण जैसा ही उपेक्षित महसूस कर रहा हूं. नरेंदर मोदी की ओर से लगातार उपेक्षा मिल रही है. जबकि उनकी जीत के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था मैंने. उनकी सरकार बनने के पश्चात ही मैं हरिद्वार लौटा था. अपने योग शिविर को चुनाव प्रचार कार्यालय में बदल दिया था. परंतु मोदी जी…. अरे काहे का जी… यहां कौन-सा सबके सामने भाषण दे रहा हूं. चुनाव जीतने के बाद एक बार भी पतंजलि योगपीठ नहीं आए. हमारी तरफ पीठ करके बैठ गए. कालेधन और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस को घेरने वाला मैं ही था. मोदी के पक्ष में हवा बनाने के लिए मैं आचार्य बालकृष्ण के साथ आमरण अनशन पर बैठा. नौ दिन में ही मेरी हवा टाइट हो गई थी. यहां तक कि अस्पताल पहुंच गया. तब श्रीश्री रविशंकर जी के हाथों जूस पी कर अपना अनशन तोड़ा. उस समय वह जूस नहीं समुद्र मंथन से निकला हुआ साक्षात अमृत लगा था मुझे. तब लोगों ने कैसे-कैसे सवाल किए थे. बाबा आप योगी होकर अस्पताल पहुंच गए जबकि बालकृष्ण का बाल भी बांका न हुआ था. कितनी भद्द पिटी थी मेरी. जिस मोदी के लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया था उसी ने मुझे से दांव खेल दिया. सोचता हूं किसी दिन आश्रम में आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और संजय जोशी को बुला कर अपनी व्यथा सुनाऊं!
वैशाख शुक्ल-6, विक्रम संवत 2072
करनाल
योग और आयुर्वेद के प्रचार-प्रसार के लिए मुझे भी भारत रत्न मिलना चाहिए. मेरा काम सुश्रुत,धनवंतरी से बढ़कर है. मैंने योग को दर्शनीय बनाया है. भारत रत्न की लालसा मेरे मन में तब से और ज्यादा बलवती हो गई, जब से इंडिया टीवी वाले रजत शर्मा को पदम भूषण मिला. वह भी शिक्षा और साहित्य में उनके योगदान के लिए. उन्होंने कितनी किताबें लिखी हैं,  बाबा को पता ही नहीं. जबकि बाबा सब जानता है. आश्रम में ही रहने वाले मेरे एक प्रिय शिष्य ने आज मुझसे कहा कि रजत शर्मा वाली अपनी जिज्ञासा आप गूगलबाबा को बताइए न. यह सुनकर मेरे कान खडे़ हो गए. मैंने सबसे पहले उससे सवाल किया, ‘तेरा गूगल बाबा योग तो नहीं सिखाता है न!’ वह हंसा. परंतु उसका चमत्कारी गूगल बाबा भी रजत शर्मा के द्वारा शिक्षा और साहित्य में किए गए योगदान को खोजने में असफल हो गया. इससे एक बात सिद्ध होती है कि मेरे पास  ‘दिव्य फार्मेसी’ है तो वर्तमान सरकार के पास ‘दिव्य दृष्टि’ है.
यदि इस जिह्वा को वश में रखने वाला में कोई आसन होता तो इस बाबा के खिलाफ जगह-जगह इतने मामले दर्ज होते?
वैशाख शुक्ल-7, विक्रम संवत 2072
करनाल
आज मेरे एक शिष्य ने पूछा, ‘बाबा आप प्रवचन देते हैं कि भाषण. पता नहीं चलता.’ आज सुबह से बैठा मैं इसी बात को सोच रहा हूं. शिष्य की बात पर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की चेष्टा कर रहा हूं. मध्यरात्रि हो चुकी है परंतु अभी तक सफलता नहीं मिली.
वैशाख शुक्ल-8, विक्रम संवत 2072
दिल्ली
शेर की तरह दहाड़ने वाले  गिरिराज सिंह आज मीनाकुमारी की तरह रोते हुए आए. आते ही बोले, ‘बाबा जुबान पर काबू रखने के लिए कोई आसन बताइए.’ मैंने उनको झट से सिंहासन करवा दिया. इसे करने के बाद गिरिराज बाबू बोले कि क्या बाबा इसमें भी तो मेरी जुबान बाहर ही निकली रही. यह बात मेरे ध्यान में ही नहीं रही कि यह आसन करते समय जुबान मुंह के बाहर निकालनी पड़ती है. अंत में अपना पिंड छुड़ाने के लिए मैंने उन्हें नभो मुद्रा जिसमें जुबान तालू में लगानी होती है और मांडुकी मुद्रा जिसमे जुबान को मसूढ़ों के ऊपर घुमाया जाता है, करवाया. इसको करने के बाद वह खुशी-खुशी वहां से चले गए. अबोध! अब यह बाबा उन्हें क्या बताता! यदि इस जिह्वा को वश में रखने वाला में कोई आसन होता तो इस बाबा के खिलाफ जगह-जगह इतने मामले दर्ज होते?
आज मेरे पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, विदेश में एक टापू भी है. सब योग के प्रताप से ही तो है. इसलिए योग पर विश्वास करो. योगा से ही होगा!
वैशाख शुक्ल-9, विक्रम संवत 2072
कुरुक्षेत्र
कुछ लोगों को शंका है कि योग से ज्यादा फायदा नहीं होता हैा.योग से बहुत फायदा होता हैं. प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता! आज मेरे पास हजारों करोड़ की संपत्ति है, विदेश में एक टापू भी है. सब योग के प्रताप से ही तो है. इसलिए योग पर विश्वास करो. योगा से ही होगा!
वैशाख शुक्ल-11, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
कल गत माह की बेलैंस सीट देखी तब से  योग करने का मन नहीं कर रहा है. पिछने महीने पतंजलि उत्पाद केंद्र की बिक्री में गिरावट दर्ज हुई. देखकर मन खिन्न है. आज पूरा दिन इसी सोच-विचार में व्यतीत करूंगा कि अब कौन-सा नया उत्पाद लॉन्च किया जाए. ‘दिव्य पुत्रजीवक बीज’ का अप्रत्याशित परिणाम मिला. उसका विपणन जोरों पर है. जिन्होंने इसका उपयोग किया उनके विषय में मैं कुछ नहीं कह सकता. हमने मुख्य समाचारपत्रों में प्रथम पृष्ठ पर पूरे-पूरे पृष्ठ का विज्ञापन दिया था इसका. यद्यपि मीडिया ने इसके नाम को लेकर बखेड़ा खड़ा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी थी. इन मूर्खों को पता नहीं कि अनजाने में वे मेरे उत्पाद का विज्ञापन ही कर रहे थे. प्रतिस्पर्धा बहुत बढ़ गई है. आयुर्वेद के नाम रोज नई-नई ऐरी-गैरी कंपनियां पैदा हो रही हैं. आसन क्रिया से अधिक उत्पादों को बेचने में कसरत है. तनाव बहुत बढ़ गया है. शाम के पांच बज रहे हैं. अभी-अभी भ्रामरी और सुप्त भद्रासन  किया है ताकि तनाव कम हो और मन शांत रहे.
वैशाख शुक्ल-12, विक्रम संवत 2072
चंडीगढ़
विपश्यना! पाली भाषा का शब्द. जिसका मतलब होता है जो जैसा है, वैसा देखना. इसी के लिए राहुल गांधी विदेश गए थे.  अच्छा है. जिस वय में बालक बिपाशा के लिए ध्यानमग्न होते हैं वे विपश्यना पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. होना भी चाहिए क्योंकि पार्टी की दशा चिंतनीय है. पंरतु ऐसा करना उनके पार्टी के हित में हो सकता है, राष्ट्रहित में नहीं. उन्होंने हमारी परंपरा का पालन नहीं किया. हमारे यहां हिमालय में जाकर चिंतन-मनन करने की परंपरा रही है. देखो तो राहुल की वजह से विपश्यना का कितना प्रचार हो गया. अगर वह प्राणायाम, अनुलोम-विलोम, कपालभाति करते तो कितना अच्छा होता! सबकुछ भूलभाल के मेरे योग शिविर में ही आ सकते थे. वह तो अच्छा है कि यहां सबकी आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं है कि विदेश जाकर विपश्यना करें. वरना तो मेरा योग का धंधा मंदा हो जाता. वैसे जब मैं राहुल को शहजादा कहता हूं तो क्या गलत कहता हूं. राहुल गांधी चिंतन करने के लिए विदेश जाते हैं और यहां का आम आदमी शौचालय मैं बैठकर ही चिंतन कर लेता है. यह बात भी महत्वपूर्ण है कि आम आदमी के चिंतन से कुछ न कुछ निकलता जरूर है अब देखना है कि राहुल गांधी के चिंतन से क्या निकलता है!
- अनूप मणि त्रिपाठी
लोकसंघर्ष पत्रिका  में शीघ्र  प्रकाशित

शुक्रवार, 1 मई 2015

भविष्य के भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों की आबादी

प्यू रिसर्च सेंटर की हालिया ;2 अप्रैल 2015 की रपट में आने वाले वर्षों में भारत की आबादी के संबंध में कुछ पूर्वानुमान दिये गये हैं। रपट के अनुसार, सन् 2050 तक भारत में हिंदुओं की आबादी, वर्तमान 79.5 प्रतिशत से घटकर 76.7 प्रतिशत रह जायेगी जबकि मुसलमानों की आबादी, 18 प्रतिशत के करीब हो जाएगी। सन् 2050 में भारतीय मुसलमानों की संख्या, पाकिस्तान और इंडोनेशिया में उनकी आबादी से ज्यादा हो जाएगी। इस पूर्वानुमान से व्यथित साध्वी प्राची ने हिंदू महिलाओं को यह सलाह दी है कि वे कम से कम चालीस बच्चे पैदा करें जबकि भाजपा के सांसद साक्षी महाराज की चाहत है कि हर हिंदू महिला कम से कम चार बच्चों की मां हो। समय.समय पर दक्षिणपंथी हिंदू संगठनों के नेता, हिंदू महिलाओं को अधिक से अधिक बच्चे पैदा कर 'राष्ट्रसेवा' करने की सलाह देते रहे हैं। दिलचस्प यह है कि इनमें से अधिकांश वे लोग हैं जो स्वयं 'ब्रह्मचारी' हैं।
अगर हम इन पूर्वानुमानों को सही मानें तो हमें यह विचार करना होगा कि भारत की मुस्लिम आबादी में हिंदुओं की तुलना में, अधिक तेजी से बढ़ोत्तरी क्यों हो रही है। क्या इसका कारण इस्लाम है ? अगर इस्लाम के कारण भारत की मुस्लिम आबादी बढ़ रही है तो फिर पाकिस्तान और इंडोनेशिया, जिनकी मुस्लिम आबादी अभी भारत की मुस्लिम आबादी से अधिक है, में भी इस समुदाय की आबादी उतनी ही तेजी से बढ़नी चाहिए जितनी कि भारत में। जबकि भारतीय मुसलमानों की आबादी, अन्य देशों की मुस्लिम आबादी की तुलना में अधिक तेजी से ब़ढ़ रही है। जाहिर है कि इस्लाम इसका कारण नहीं हो सकता क्योंकि अगर ऐसा होता तो 2050 में भी पाकिस्तान और इंडोनेशिया में भारत की तुलना में अधिक संख्या में मुसलमान होते। इससे यह साफ हो जाता है कि आबादी में बढ़ोत्तरी का संबंध धर्म से नहीं है। भारत में भी देश के अलग.अलग क्षेत्रों में जनसंख्या वृद्धि दर अलग.अलग है। उदाहरणार्थ, केरल के मलाबार तट और उत्तरप्रदेश.बिहार क्षेत्र की जनसंख्या वृद्धि दरों में भारी अंतर है। हिंसाग्रस्त कश्मीर घाटी में पिछले दशक में हिंदू आबादी की वृद्धि दर,मुस्लिम आबादी से अधिक रही है।
दूसरा तर्क यह है कि मुसलमान, परिवार नियोजन के साधन नहीं अपनाते क्योंकि उनका धर्म इसका निषेध करता है। अपनी पुस्तक'फैमिली प्लानिंग एंड लीगेसी ऑफ इस्लाम' ;परिवार नियोजन और इस्लाम की विरासत में काहिरा के इस्लामिक विद्वान ए आर ओमरान इस मिथक का जोरदार खंडन करते हैं कि इस्लाम, परिवार नियोजन के विरूद्ध है। उनके अनुसारए कुरान में गर्भधारण रोकने के उपायों पर प्रतिबंध की बात कहीं नहीं कही गई है। तुर्की व इंडोनेशिया जैसे इस्लामिक देशों मेंए परिवार नियोजन के विभिन्न तरीके काफी लोकप्रिय हैं। उदाहरणार्थ, तुर्की में प्रजनन.योग्य दंपत्तियों में से 63 प्रतिशत परिवार नियोजन के साधन अपनाते हैं और इंडोनेशिया के मामले में यह आंकड़ा 48 प्रतिशत है। भारत में प्रजनन.योग्य आयु वर्ग के ऐसे मुस्लिम दपंत्तियों, जो परिवार नियोजन के साधन अपनाते हैं, का प्रतिशत 1970 में 9 ;हिंदू 14 प्रतिशत और 1980 में 22.5 प्रतिशत ;हिंदू 36.1 प्रतिशत था। ये आंकड़े सन् 1985 में बड़ौदा स्थित ओपरेशन रिसर्च ग्रुप द्वारा किए गए सर्वेक्षण पर आधारित हैं। इनसे यह स्पष्ट है कि हिंदुओं की तरह,मुसलमान दंपत्तियों में भी परिवार नियोजन के साधन अपनाने वालों की संख्या व प्रतिशत लगभग बराबर गति से बढ़ रहे हैं। 
डॉ. राकेश बसंत आईआईएम अहमदाबाद में पढ़ाते हैं और अर्थशास्त्री हैं। वे सच्चर समिति के सदस्य भी थे। उनका कहना है कि 'वर्तमान में मुसलमानों की प्रजनन दर, देश की औसत प्रजनन दर से केवल 0.7 अधिक है। जहां औसत प्रजनन दर 2.9 है वहीं मुसलमानों के मामले में यह 3.6 है।' वे कहते हैं कि देश के 37 प्रतिशत मुसलमान गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करते हैं जबकि भारत की आबादी में गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल करने वालों का औसत 48 प्रतिशत है। इस प्रकार, गर्भ.निरोधकों के इस्तेमाल के मामले में मुसलमान,औसत से लगभग 10 प्रतिशत नीचे हैं। परंतु इसमें भी क्षेत्रीय विभिन्नताएं हैं। उनकी रपट के अनुसार, शिक्षा और सामाजिक.आर्थिक विकास के साथए गर्भनिरोधकों का इस्तेमाल बढ़ता जाता है और यह सभी समुदायों के बारे में सही है।
फिर आखिर क्या कारण है कि देश की मुस्लिम आबादी, हिंदुओं की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ रही है। आइए,हम हिंदुओं की आबादी की वृद्धि दर में क्षेत्रीय विभिन्नताओं पर नजर डालें। मोटे तौर पर उन दक्षिणी राज्यों में, जहां साक्षारता की दर अधिक है जैसे तमिलनाडुए कर्नाटक और केरल, हिंदू आबादी में वृद्धि की दर, उत्तरी राज्यों जैसे उत्तरप्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश से कहीं कम है। भारत में बड़ी संख्या में मुसलमान अपने समुदायों की बस्तियों में रहते हैं और उनकी आमदनी औसत से कम है। जैसा कि सच्चर समिति की रपट से स्पष्ट है,मुसलमानों के साथ रोजगार और व्यवसाय के अवसरों के मामले में भेदभाव किया जाता है। नतीजा यह है कि उनकी आर्थिक स्थिति या तो स्थिर है या गिर रही है। जहां एक ओर पूरा देश आर्थिक दृष्टि से संपन्न बन रहा है वहीं मुसलमानों के मामले में स्थिति उलट है।
इस असमानता व भेदभाव के अतिरिक्तए मुसलमान सांप्रदायिक हिंसा का शिकार भी बन रहे हैं जिसके कारण उनमें असुरक्षा का भाव बढ़ रहा है और वे अपने समुदाय की बस्तियों में सिमट रहे हैं। इन सब कारणों से मुसलमान पुरातनपंथी मौलानाओं के प्रभाव में आ रहे हैं, जो उनसे यह कहते हैं कि इस्लाम,परिवार नियोजन के खिलाफ है।
भारतीय मुसलमानों का बड़ा तबका धर्मांतरित अछूत शूद्रों का है जिनकी आर्थिक स्थिति पहले से ही बहुत खराब थी। इसके अतिरिक्त, उनकी बेहतरी के लिए सरकारें कुछ खास नहीं कर रही हैं। नतीजा यह है कि इस समुदाय के कम पढ़े.लिखे वर्ग में ज्यादा बच्चों को जन्म देने की प्रवृत्ति है। इसके विपरीत, पाकिस्तान में हिंदुओं की आबादी में कमी आई है परंतु इसके एकदम अलग कारण हैं। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि पाकिस्तान और बांग्लादेश के हिंदू बड़ी संख्या में भारत में बस गए हैं और यह क्रम अभी भी जारी है। पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं की आबादी बहुत ही कम है और वहां उनका उत्पीड़न भी किया जाता है। इसलिए भारत के मुसलमानों और पाकिस्तान व बांग्लादेश के हिंदुओं की तुलना नहीं की जा सकती। वैसे तो,पूरे दक्षिण एशिया में सांप्रदायिकता की समस्या है और भारत के धार्मिक बहुसंख्यक, पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यक हैं और उत्पीड़न व अत्याचार के शिकार हैं।
जब मैं आईआईटी मुंबई में पढ़ाता था तब मैंने स्वयं यह देखा था कि चपरासियों और मेहतरों की तुलना में प्रोफेसरों के बच्चों की संख्या कम होती थी। इसी तरह,मुंबई में जो परिवार झुग्गी बस्तियों में रहते हैं.चाहे वे किसी भी धर्म के क्यों न हों.उनके तुलनात्मक रूप से अधिक बच्चे होते हैं। अतः यह साफ है कि किसी दंपत्ति के कितने बच्चे हैं या होंगे, यह उसके धर्म पर नहीं बल्कि उसकी सामाजिक.आर्थिक.शैक्षणिक हैसियत पर निर्भर करता है।
भारतीय उपमहाद्वीप के अलग.अलग देशों में स्थितियां अलग.अलग हैं और उनका परस्पर तुलनात्मक अध्ययन नहीं किया जा सकता। जरूरत इस बात की है कि वंचित समुदायों के प्रति हम सहानुभूति और सद्भाव रखें और आबादी में वृद्धि की समस्या को सही परिप्रेक्ष्य में समझें और उसके उचित निदान के लिए कार्य करें।
-राम पुनियानी

मंगलवार, 28 अप्रैल 2015

मोदी सरकार का विघटनकारी एजेण्डा


इस साल मई में मोदी सरकार अपना एक साल पूरा कर लेगी। गुजरा सालए मुख्यतः, समाज में अलगाव और विघटन पैदा करने वाली राजनीति के नाम रहा। जहां मोदी का चुनाव अभियान विकास पर केंद्रित था वहीं उन्होंने सांप्रदायिक मुद्दे उठाने में भी कोई कोर.कसर बाकी नहीं रखी। बांग्लाभाषी मुसलमानों को बंगलादेशी बताया गया और 'पिंक रेवोल्यूशन'की चर्चा हुई। उद्देश्य था, अपरोक्ष रूप से मुसलमानों का दानवीकरण।
मोदी सरकार की नीतियों में हिंदू राष्ट्रवाद के भाजपाई एजेण्डे का खुलकर प्रकटीकरण हुआ। गणतंत्र दिवस 2015 के अवसर पर सरकार द्वारा जारी विज्ञापन में संविधान की उद्देशिका से 'धर्मनिरपेक्ष' व 'समाजवादी' शब्द गायब थे। केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज ने हिंदू धर्मग्रंथ 'भगवत गीता'  को राष्ट्रीय पुस्तक का दर्जा देने की मांग की। एक अन्य केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने सभी मुसलमानों को हरामजादा बताया तो अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नज़मा हैपतुल्लाह ने फरमाया कि मुसलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं क्योंकि देश में उनकी खासी आबादी है। पौराणिक कथाओं को ऐतिहासिक बताया जा रहा है और मुंबई में एक आधुनिक अस्पताल का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि 'प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी होती थी और यहां तक कि मानव शरीर पर जानवरों के सिर के प्रत्यारोपण की तकनीक भी उपलब्ध थी'। इस साल आयोजित इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस में ऐसे कई 'शोध प्रबंध' प्रस्तुत किए गए जिनमें इतिहास को फंतासी बना दिया गया।
पिछली एनडीए सरकार के शासनकाल में स्कूली पाठ्यपुस्तकों को सांप्रदायिक रंग दिया गया। ऐसी पुस्तकें पढ़ाई जाने लगीं जिनमें ऐतिहासिक घटनाओं का प्रस्तुतिकरण केवल और केवल धार्मिक व सांप्रदायिक दृष्टिकोण से किया गया था। अब एक बार फिर, शिक्षा के भगवाकरण की बात कही जा रही है। देश की शीर्ष अनुसंधान संस्थाओं में आरएसएस.हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा से जुड़े लोगों की नियुक्तियां हो रही हैं। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ;आईसीएचआर के अध्यक्ष पद पर प्रोफेसर सुदर्शन राव की नियुक्ति इसी का उदाहरण है। प्रोफेसर राव की अकादमिक क्षेत्र में कोई उपलब्धि नहीं है। उनका लेखन केवल कुछ ब्लागों तक सीमित है और वे जातिप्रथा को न्यायपूर्ण व उचित ठहराते हैं। उनका कहना है कि जातिप्रथा से किसी को कभी कोई शिकायत नहीं रही। वे पौराणिक कथाओं को इतिहास के रूप में प्रस्तुत करना चाहते हैं। जाहिर है कि यह वैज्ञानिक सोच और तार्किकता पर प्रहार होगा। हमारे संविधान में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी सरकार को सौंपी गई है परंतु अनुसंधान व शिक्षण के क्षेत्रों में वैज्ञानिक सोच का मखौल बनाया जा रहा है और अंधविश्वासों व अंधश्रद्धा को बढ़ावा दिया जा रहा है।
विचारधारा के स्तर पर भाजपा नेता और सांसद इस तरह की बातें कह रहे हैं जो भारतीय राष्ट्रवाद के सिद्धांतों और मूल्यों के खिलाफ हैं। भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने नाथूराम गोडसे को देशभक्त बताया और केरल के एक भाजपा नेता ने कहा कि गोडसे ने जो कुछ किया वह ठीक था परंतु उसे गांधीजी की बजाए नेहरू की हत्या करनी थी। हिंदू राष्ट्रवादी संगठनए गोडसे की मूर्तियां स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं। सोनिया गांधी के संबंध में गिरिराज सिंह की नस्लीय टिप्पणी निहायत कुत्सित व घिनौनी थी। इसके पहले किसी मंत्री ने यह कहा था कि जो लोग मोदी को वोट देना नहीं चाहते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने वाली बातें लगातार कही जा रही हैं। पुणे में बाल ठाकरे के कुछ कार्टूननुमा चित्र सोशल मीडिया पर अपलोड किए जाने के बाद, हिंदू जागरण सेना के कार्यकर्ताओं ने मोहसिन शेख नाम के एक युवक, जो किसी आईटी कंपनी में काम करता था,को सड़क पर पीट.पीटकर मार डाला। साध्वी प्राची और साक्षी महाराज हिंदू महिलाओं को यह सलाह दे रहे हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें। योगी आदित्यनाथ का कहना है कि धार्मिक अल्पसंख्यकों को हिंदुओं के पवित्र स्थलों पर नहीं जाना चाहिए। जब सानिया मिर्जा को आंध्रप्रदेश का ब्रांड एंबेसेडर नियुक्त किया गया तब कई भाजपा नेताओं ने इसका यह कहकर विरोध किया कि वे पाकिस्तान की बहू हैं। भाजपा के सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा कि चर्चों और मस्जिदों को ढहाया जा सकता है। भाजपा से जुड़ी शिवसेना के संजय राऊत ने मांग की कि मुसलमानों को मताधिकार से वंचित किया जाना चाहिए।
हम सब को याद है कि दिल्ली में भाजपा की सरकार बनने से पहले भी भाजपा और उससे जुड़े संगठन लवजिहाद और घरवापसी जैसे मुद्दों को लेकर समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोल रहे थे। ये मुद्दे गुजरे वर्ष भी छाये रहे। दिल्ली,मुंबई के पास पनवेल व हरियाणा सहित देशभर के कई स्थानों पर चर्चों पर हमले हुए और इन हमलों के दोषियों को पकड़ने के लिए सरकार व पुलिस ने समुचित कार्यवाही नहीं की।
पिछले वर्ष देशभर में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं में भी तेजी से वृद्धि हुई। हां, एक फर्क जरूर था और वह यह कि हिंसा अब छोटे पैमाने पर की जाती है। कहीं एक दुकान जला दी जाती है तो कहीं किसी आराधना स्थल पर पत्थरबाजी होती है। इसके बाद हिंसा भड़कती है जिसके नतीजे में विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच अलगाव बढ़ता है। धार्मिक आधार पर समाज का विभाजन, असहनीय स्तर तक बढ़ चुका है। धार्मिक स्थलों पर हमले और अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसाए हमारे संविधान में निहित स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों की नींव को कमजोर कर रहे हैं। अल्पसंख्यक समुदाय के कई प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने अपने क्षोभ व दुःख को स्वर देते हुए कहा है कि उन्हें ऐसा लगने लगा है मानो वे इस देश के नागरिक ही नहीं हैं।
जब भी कोई गैर.जिम्मेदाराना व घृणा फैलाने वाली बात किसी व्यक्ति द्वारा कही जाती है तो भाजपा प्रवक्ता यह कहकर उससे पल्ला झाड़ लेते हैं कि जो कुछ भी कहा गया हैए वे संबंधित व्यक्ति के व्यक्तिगत विचार हैं। इसके अतिरिक्त, भाजपा यह दावा भी करती है कि विहिप,वनवासी कल्याण आश्रमए बजरंगदल आदि स्वतंत्र संगठन हैं जिनपर उसका कोई नियंत्रण नहीं है और ना ही उनके नेताओं द्वारा कही जाने वाली बातों के लिए वह जिम्मेदार है। जबकि सच यह है कि भाजपा और इन सभी संगठनों पर आरएसएस का पूर्ण नियंत्रण है और ये संघ परिवार के सदस्य हैं। ये सभी संगठन भाजपा के साथ मिलकर,हिंदू राष्ट्र के एजेण्डे को साकार करने के लिए सुनियोजित व समन्वित प्रयास कर रहे हैं। यह मात्र संयोग नहीं है कि ये सभी संगठन, जो तथाकथित रूप से 'स्वतंत्र'  हैं एक.सी बातें और एक.सी हरकतें कर रहे हैं। कई लोगों का यह कहना है कि ये संगठन कुछ अतिवादियों के समूह भर हैं। परंतु तथ्य यह है कि संघ परिवार ने सबको अलग.अलग जिम्मेदारी सौंपी हुई है और वे संघ के निर्देशन में ही काम कर रहे हैं। यह इस बात से भी जाहिर है कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद से ये संगठन अत्यंत आक्रामक हो उठे हैं।
भाजपा, भारतीय राष्ट्रवादी विभूतियों, जिन्होंने साम्राज्यवाद.विरोधी संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और भारतीय राष्ट्र के विकास के लिए कार्य किया, को अपना बताने की कोशिश में जुटी हुई है। आरएसएस का कहना है कि महात्मा गांधी संघ से बहुत प्रभावित थे। संघ का यह दावा भी है कि अंबेडकर और आरएसएस के विचार एक से थे। ये झूठ सुनियोजित ढंग से व जानते.बूझते हुए मीडिया में 'प्लांट' किए जा रहे हैं क्योंकि आरएसएस के किसी नेता ने स्वाधीनता संग्राम में कभी कोई हिस्सेदारी नहीं की। यह प्रचार भारतीय राष्ट्र की मूल अवधारणा को कमजोर करने का प्रयास है। महात्मा गांधी को केवल स्वच्छता अभियान के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है और हिंदू.मुस्लिम एकता के लिए उनके संघर्ष को नजरअंदाज किया जा रहा है। हम केवल आशा कर सकते हैं कि मोदी सरकार, हिंदू राष्ट्र के अपने एजेण्डे को त्याग कर,भारतीय संविधान में निहित मूल्यों को मजबूती देने का प्रयास करेगी। सत्ता पर काबिज लोगों को यह याद रखना चाहिए कि देश को बांटने के भयावह परिणाम हो सकते हैं।
-राम पुनियानी

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

अरब स्प्रिंग के देश के समक्ष कई चुनौतियां

ट्युनिस में वर्ल्ड सोशल फोरम की बैठक
'वसुधेव कुटुम्बकम' व 'साउथ एशियन डॉयलाग्स ऑन इकोलॉजिकल डेमोक्रेसी' के सौजन्य से मुझे ट्युनिस में आयोजित 'वर्ल्ड सोशल फोरम' की हालिया बैठक में भाग लेने का अवसर मिला। इसके पहले मैं इस फोरम की मुंबई और नेरोबी में आयोजित बैठकों में हिस्सेदारी कर चुका था। इन बैठकों का मेरा अनुभव मिश्रित था।
वर्ल्ड सोशल फोरम, दुनियाभर के नागरिक समाज संगठनों का सांझा मंच है। ये संगठन अलग.अलग देशों में व अलग.अलग क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इनमें शामिल हैं पर्यावरण और मूलनिवासियों, दलितों व श्रमिकों के अधिकारों और लैंगिक न्याय के लिए काम करने वाले संगठन। इनके अलावा, इस फोरम में ऐसे संगठन भी शामिल हैं जिनका उद्देश्य बड़ी औद्योगिक कंपनियों को जवाबदेह बनाना, तीसरी दुनिया के देशों के कर्ज माफ करवाना, सीमित प्राकृतिक संसाधनों का युक्तियुक्त उपयोग सुनिश्चित करना, दुनिया में चल रही हथियारों की दौड़ पर रोक लगाना, परमाणु शस्त्रों का उन्मूलन, युद्ध का विरोध, दुनिया से उपनिवेशवाद का खात्मा, बहुवाद व विविधता को स्वीकृति दिलवाना और बढ़ावा देना,जवाबदारी पूर्ण शासन सुनिश्चित करना,नागरिकों का सशक्तिकरण,प्रजातंत्र को मजबूती देना आदि है। फोरम की बैठक में विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने भाग लियाए जिनमें प्रतिबद्ध सामाजिक कार्यकर्ता व शिक्षाविद,सामाजिक संगठनों व आंदोलनों के प्रतिनिधि आदि शामिल थे। इतनी बड़ी संख्या में विद्वान और अनुभवी लोगों को सुनना और उनसे सीखना अपने आप में एक अत्यंत रोमांचकारी व सुखद अनुभव था। विभिन्न आंदोलनों के जरिए दुनिया को बदलने की कोशिश में जुटे ऐसे लोगों के बीच समय बिताना, किसी के लिए भी प्रेरणा और ऊर्जा का स्त्रोत हो सकता है। ये सभी लोग घोर आशावादी हैं और उन्हें यह दृढ़ विश्वास है कि 'एक बेहतर दुनिया बनाई जा सकती है'। ऐसे लोगों से मिलने और बातचीत करने से हमारे मन में कबजब उठने वाले निराशा के भाव से लड़ने में हमें मदद मिलती है।
अगर हम यह मान भी लें कि एक नई, बेहतर दुनिया का निर्माण संभव है तब भी यह प्रश्न मन में उठना स्वाभाविक है कि क्या वर्ल्ड सोशल फोरम जैसे मंच इस लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैंघ् कुछ लोग यह मानते हैं कि वर्ल्ड सोशल फोरम, समाज के हाशिये पर पड़े समुदायों की आवाज है परंतु चूंकि इसमें भागीदारी करने वाले लोग विविध क्षेत्रों में काम करने वाले होते हैं और उनकी पृष्ठभूमि में इतनी विविधताएं होती हैं कि इस तरह की बैठकों का कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाता। दूसरे शब्दों में,वे वर्ल्ड सोशल फोरम को विचारधाराओं और दृष्टिकोणों का एक ऐसा सुपरमार्केट मानते हैं जिसमें संभावित 'ग्राहक'कुछ दुकानों पर जाते हैंए सामान उलटते.पुलटते हैं परंतु खरीदते कुछ भी नहीं हैं।
इस फोरम के अन्य आलोचकों का कहना है कि यह उतना प्रजातांत्रिक व स्वतंत्र मंच नहीं है जितना कि इसे बताया जाता है। फोरम पर विकसित देशों के कुछ ऐसे नागरिक समाज संगठनों का कब्जा है जो बैठकों के लिए धन जुटाते हैं। वे ही इसकी प्राथमिकताएं तय करते हैं, इसका एजेंडा बनाते हैं और बैठकों में किसे बोलने का मौका मिलेगा और किसे नहीं, इसका निर्णय भी वे ही करते हैं। यह 'अलग.अलग रहकर यथास्थितिवाद पर अलग.अलग प्रहार करने' का उदाहरण है, जिसके चलते सभी की ऊर्जा व्यर्थ जाती हैए सभी अलग.अलग दिशाओं में काम करते हैं और यथास्थिति बनी रहती है। 'गुलिवर इन लिलिपुट' की प्रसिद्ध कहानी की तरह,अगर लिलिपुट के लाखों छोटे.छोटे रहवासी, यथास्थितिवाद के विशाल और ताकतवर गुलिवर पर समन्वय के साथ संगठित हमला नहीं करेंगे तो वे गुलिवर को कभी हरा नहीं सकेंगे। आखिरकार, गुलिवर के पास दमनकारी शक्तियां हैं और अगर उस पर योजनाबद्ध हमला नहीं होगा तो लिलिपुट वासी अपना पूरा जोर लगाने के बावजूद भी उसका कुछ बिगाड़ नहीं पायेंगे। उलटे,वह और शक्तिशाली बनकर उभरेगा। यहां गुलिवर प्रतिनिधि है हथियार उद्योग काए विशाल कार्पोरेशनों का, नव परंपरावादियों, राष्ट्रवादियों,नस्लवादियों व पितृसत्तात्मकता और श्रेष्ठतावाद की विचारधाराओं में विश्वास रखने वालों का। जाहिर है कि हमारा शत्रु संगठित है और उसका मीडिया व शैक्षणिक और धार्मिक संस्थानों पर नियंत्रण है। इसलिए वह सच्चाई को छुपा सकता हैए लोगों के दमन की कहानियों को पर्दे के पीछे रख सकता है और गैर.बराबरी व सामाजिक वर्चस्ववाद को औचित्यपूर्ण ठहरा सकता है। वह एक ऐसी दुनिया का निर्माण करना चाहता है जिसमें उत्पादों की मुक्त आवाजाही हो ताकि अन्यायपूर्ण व्यापार व्यवस्था बनी रहे। वह ऐसी दुनिया चाहता है जिसमें पूंजी का स्वतंत्र हस्तांतरण हो ताकि पूरी दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों और सस्ते श्रम का भरपूर शोषण कर ढेर सारा मुनाफा कमाया जा सके और इस मुनाफे पर कम से कम कर लगें। यह गुलिवर सांस्कृतिक परंपराओं का भी इस्तेमाल अपने एजेंडे को लागू करने के लिए करता है। वह एक ऐसा विश्व बनाना चाहता है जिसमें असमानता का बोलबाला हो। आमजनों की गरीबी और भूख से उसे कोई लेनादेना नहीं है। वह जनसंस्कृतियों, परंपराओं और प्रथाओं में से वह सब मिटा देना चाहता है, जो समानाधिकारवादी है। वह विभिन्न धर्मों के नैतिक मूल्यों को नष्ट कर देना चाहता हैए वह संस्कृति और परंपराओं में इस तरह के बदलाव चाहता है जिससे स्वार्थ और लिप्सा में वृद्धि हो और व्यक्तिवाद को बढ़ावा मिले.ऐसा व्यक्तिवाद को जो हर व्यक्ति को यह सिखाता है कि उसे आक्रामक और क्रूर बनना चाहिए ताकि वह अपने से नीचे के लोगों का शोषण और दमन कर सके और केवल अपने लाभ की सोचे। वह उपभोक्तावाद को प्रोत्साहन देना चाहता है। वह चाहता है कि सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से वर्चस्वशाली वर्ग की नकल समाज का हर तबका करे। वह मानव.निर्मित आपदाओं और क्रूर हिंसा को स्वीकार्य बनाना चाहता है। वह चाहता है कि स्त्रियों का दर्जा समाज में नीचा बना रहे और स्त्रियों के शरीर के साथ खिलवाड़ को समाज सहर्ष स्वीकार करे। वह इसे 'आधुनिकता' बताता है। गुलिवर, एकजुटता की संस्कृति और संवेदना के मूल्यों को नष्ट कर देना चाहता है। वर्ल्ड सोशल फोरम, सैंकड़ों लिलिपुटवासियों को एक स्थान पर इकट्ठा तो कर रहा है परंतु क्या वह उनमें एकता भी कायम कर रहा है ?
अगर फोरम, नागरिक समाज संगठनों का मिलनस्थल है तो भी क्या यह सही नहीं है कि जो संगठन अधिक योजनाबद्ध ढंग से काम करेगा वह इस फोरम का उपयोग अपने जैसे अन्य संगठनों को साथ लेने के लिए ज्यादा सफलतापूर्वक कर सकेगा ?
पूर्व के सम्मेलनों की तरह,फोरम का ट्युनिस सम्मेलन भी एक ऐसा मंच था जहां हम अपने संगठन के सरोकारए परिप्रेक्ष्य और अनुभव दूसरों के साथ बांट सकते थे, अपने जैसे मुद्दों पर काम करने वाले अन्य संगठनों से वैचारिक आदान.प्रदान कर सकते थे और उनके अनुभवों से सीख सकते थे। हम अपने जैसे अन्य संगठनों के साथ मिलकर काम करने की योजना भी बना सकते थे। 'वसुधेव कुटुम्बकम'और 'साउथ एशियन डॉयलाग्स ऑन इकोलॉजिकल डेमोक्रेसी' के प्रतिनिधि बतौरए सोशल फोरम की बैठक में मुझे विभिन्न संगठनों और आंदोलनों के प्रतिनिधियों से मेलमिलाप करने का पर्याप्त मौका मिला। ट्युनिस का अपना एक अलग आकर्षण था क्योंकि यह वही शहर है जहां से 'अरब स्प्रिंग'.प्रजातंत्र के लिए जनांदोलन.शुरू हुआ था।
ट्युनिस वर्ल्ड सोशल फोरम की बैठक में भाग लेने के पीछे मेरा एक उद्देश्य यह भी था कि मैं दुनियाभर के और विशेषकर ट्युनिस के लोगों से मिल सकूं। यद्यपि भाषा की बाधा थी तथापि ट्रेनों, बसों व टैक्सियों में सफर के दौरान मुझे ट्युनिस के लोगों का व्यवहार बहुत दोस्ताना जान पड़ा। बहरहाल, मैंने अंग्रेजी के वे शब्द जो फ्रेंच में इस्तेमाल होते हैं और संकेतों की भाषा के जरिए भाषा की बाधा से कुछ हद तक निजात पाई।
ट्युनिस के लोग भारतीयों के साथ अत्यंत मैत्रीपूर्ण व्यवहार करते हैं और भारतीयों के प्रति उनके मन में बहुत आदर और स्नेह है। इसका एक कारण यह है कि वहां बॉलीवुड की फिल्में बहुत लोकप्रिय हैं और किशोर लड़के.लड़कियां हिंदी के कई वाक्य बोल लेते हैं। जिन लोगों से मैं मिला,,उनमें से ज्यादातर ने भारत की यात्रा करने की इच्छा जताई, विशेषकर बॉलीवुड के शहर मुंबई की। ट्युनिस से लगभग 170 किलोमीटर दूर,मोनास्टिर में हम एक ऐसी दुकान में गये, जिसे भारत में हम किराना दुकान कहते हैं। भाषा की समस्या के बावजूद, दुकानदार ने बड़ी मेहनत से हमें समझाया कि एक विशेष आटा किन अनाजों को पीसकर बनाया जाता है। उसने हर अनाज के दाने भी हमें दिखलाये। बाद में हमें यह पता चला कि वह 'बसीसा' आटा है,जिसमें जैतून का तेल और मीठा स्वाद देने वाली कोई चीज मिलाकर, वहां के लोगों का मुख्य आहार बनाया जाता है। उस दुकानदार ने आटे में जैतून का तेल मिलाकर हम सबको एक.एक पैकेट में रखकर दिया और इसके लिए हमसे पैसे भी नहीं लिये।
ट्युनिस का समाज हमें बहुत उदारवादी प्रतीत हुआ और यह हमारी इस धारणा के विपरीत था कि अरब,धार्मिक मामलों में दकियानूसी और कट्टरपंथी होते हैं। हमने सड़कों पर कई ऐसी महिलाओं को देखा जो फ्रेंच व पश्चिमी परिधान पहने हुए थीं। जाहिर है कि वहां महिलाओं पर यह दबाव नहीं है कि वे बुर्के या हिजाब में रहें।  ट्युनिस के 99 प्रतिशत निवासी मुसलमान हैं। वे अरब हैं और ट्यूनिसियाई अरबी भाषा बोलते हैं। शेष एक प्रतिशत, ईसाई व यहूदी हैं। हमें ऐसी महिलाएं भी दिखीं जो सिर पर स्कार्फ बांधे हुए थीं परंतु उनकी संख्या बहुत कम थी। मैंने पाया कि महिलाएं और पुरूष सार्वजनिक स्थानों पर एक.दूसरे से खुलकर मिल रहे थे और बातचीत कर रहे थे। वर्ल्ड सोशल फोरम की बैठक में अल् मुनार विश्वविद्यालय के कई विद्यार्थी स्वयंसेवकों की भूमिका में थे और उनमें लड़के और लड़कियां दोनों शामिल थे। वे बिना किसी संकोच के आपस में घुलमिल रहे थे, नाच और गा रहे थे और एक.दूसरे के गाल से गाल मिलाकर अभिवादन कर रहे थे। जिस होटल में मैं रूका था उससे करीब आधा किलोमीटर दूर एक मस्जिद थी परंतु मुझे मेरे प्रवास के दौरान एक बार भी अजान की आवाज सुनाई नहीं पड़ीए यद्यपि मैं रोज पांच बजे सुबह उठता था और छः बजे अलग.अलग दिशाओं में सुबह की सैर पर निकल जाता था। इसी तरह की धार्मिक और सामाजिक उदारता ने ट्युनिस में सन 2011 के प्रजातांत्रिक आंदोलन को जन्म दिया था।
यद्यपि शराब और सुअर का मांस इस्लाम में हराम है तथापि ट्युनिस में दोनों आसानी से उपलब्ध हैं। किसको क्या खाना है और क्या पीना हैए यह संबंधित व्यक्तियों पर छोड़ दिया गया है और राज्य, खाने.पीने की किसी भी चीज पर प्रतिबंध नहीं लगाता। एक मॉल में हमने लोगों को ऐसा मांस खाते देखा जो सुअर का प्रतीत हो रहा था परंतु हम विश्वास से कुछ नहीं कह सकते क्योंकि लेबिल अरबी और फ्रेंच में थे।
जिस तरह जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता को भारतीय राज्य के मूल सिद्धांत के रूप में अपनाया था वैसा ही कुछ हबीब बुरग्विबा ने किया, जो कि ट्युनिसिया के स्वाधीनता संग्राम के नेता तो थे ही, साथ ही जिन्होंने स्वतंत्रता के तुरंत बाद ट्युनिसिया का नेतृत्व भी किया था। सन् 2005.06 में ट्युनिसिया की सरकार ने अपने बजट का 20 प्रतिशत शिक्षा के लिए आवंटित किया था। ट्युनिसिया में शिक्षा, विशेषकर उच्च शिक्षा, फ्रेंच भाषा में दी जाती है और सरकार ने देश के अरबीकरण को प्रोत्साहन नहीं दिया। नतीजे में देश का तेजी से विकास हुआ और सन् 2007 में ट्युनिसिया, मानव विकास सूचकांक के अनुसार, 182 देशों में से 98वें स्थान पर था।
हबीब बुरग्विबा के नेतृत्व ;1956.1987 में नव.स्वतंत्र ट्युनिसिया की सरकार ने धर्मनिरपेक्षीकरण का कार्यक्रम हाथों में लिया। बुरग्विबा प्रतिबद्ध धर्मनिरपेक्ष थे और उन्होंने शिक्षा का धर्मनिरपेक्षीकरण किया और सभी धर्मों के निवासियों के लिए एक ही कानून बनाया। उन्होंने 'अज़ जिटौना धार्मिक विश्वविद्यालय'के प्रभाव को कम करने के लिए उसे उसे ट्युनिस यूनिवर्सिटी के धर्मशास्त्र विभाग का दर्जा दे दिया। उन्होंने महिलाओं के सिर पर स्कार्फ बांधने पर प्रतिबंध लगा दिया और मस्जिदों के रखरखाव और मौलवियों के वेतन पर होने वाले सरकारी खर्च को बहुत घटा दिया। नेहरू को तो हिंदू कोडबिल वापिस लेना पड़ा था परंतु बुरग्विबा ने शरियत के स्थान पर विवाह,उत्तराधिकार व अभिभावकता संबंधी नये कानून बनाए। उन्होंने बहुपत्नी प्रथा पर प्रतिबंध लगाया और तलाक के मामलों में न्यायालयों को हस्तक्षेप का अधिकार दिया।
यह स्पष्ट है कि बुरग्विबा, धार्मिक संस्थानों का प्रभाव कम करना चाहते थे ताकि वे उनके धर्मनिरपेक्षीकरण के कार्यक्रम में बाधक न बन सकें। हांए उन्होंने यह जरूर सुनिश्चित किया कि वे अपने निर्णयों को इस्लाम.विरोध नहीं बल्कि इज्तिहाद ;जहां कुरान और हदीस का आदेश साफ न हो वहां अपनी राय से उचित रास्ता निकालना के रूप में प्रस्तुत करें। इस्लाम, ट्युनिसिया के लिए भूतकाल था और आधुनिक भविष्य के लिए वह पश्चिम की तरफ देख रहा था। वहां के इस्लामवादी अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उनका आमजनों पर प्रभाव भी है। मुस्लिम ब्रदरहुड व हिज्ब.उत.तहरीर ऐसे ही दो संगठन हैं। वहां की एक मध्यमार्गी इस्लामवादी पार्टी को संविधानसभा के लिए 2011 में हुए चुनाव में 37 प्रतिशत मत मिले और 217 में से 89 सीटों पर उसके उम्मीदवार विजयी हुए। आज ट्युनिसिया से सबसे अधिक संख्या में युवा, दाइश या इस्लामिक राज्य योद्धा बनते हैं और हाल में बार्डो संग्रहालय के बाहर विदेशियों पर हुए हमले से यह पता चलता है कि ट्युनिसिया की सरकार के समक्ष गंभीर चुनौतियां हैं।
आर्थिक मोर्चे पर भी ट्युनिसिया को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। ट्युनिसिया की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है जैतून और जैतून के तेल का उत्पादन और निर्यात। पर्यटन भी आय का एक प्रमुख स्त्रोत है। बड़ी संख्या में ट्युनिसिया के नागरिक अलग.अलग देशों में काम कर रहे हैं। उनके द्वारा देश में भेजा जाने वाला धन भी आय का एक स्त्रोत है। दक्षिणी ट्युनिसिया में फास्फेट की खदाने हैं। हमें बताया गया कि ट्युनिसिया में 2011 की क्रांति के बाद से बेरोजगारी की दर बहुत तेजी से बढ़ी है। सन् 2012 में बेरोजगारों में से 72.3 प्रतिशत 15 से 29 वर्ष आयु के थे। नवंबर 2013 में 'सेंटर फॉर इंटरनेशनल प्राइवेट इंटरप्राईज' द्वारा प्रकाशित एक लेख में ट्युनिसिया की आर्थिक बदहाली और बढ़ती बेरोजगारी के कारणों की चर्चा करते हुए कहा गया है कि '2011 की क्रांति के बाद से ट्युनिसिया की अर्थव्यवस्था, क्रांति के पहले की गति नहीं पकड़ पा रही है। पिछले कुछ वर्षों में उत्तरी अफ्रीका में अलकायदा की मौजूदगी बढ़ी है। पड़ोसी लीबिया में राजनैतिक अस्थिरता का भी ट्युनिसिया पर असर पड़ा है क्योंकि पर्यटन,देश का आमदनी का मुख्य स्त्रोत है और सुरक्षा कारणों के चलते ट्युनिसिया आने वाले पर्यटकों की संख्या में कमी आई है। इसके अलावा,यूरोपियन यूनियन को ट्युनिसिया का निर्यात घटा है।'
युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी,ट्युनिसिया के शासकों के लिए चिंता का विषय है और इसी के चलते वहां के युवा,कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।
-इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

राजनैतिक विचारधारा और इतिहास की व्याख्या

यद्यपि भारतीय उपमहाद्वीप के सभी निवासियों का सांझा इतिहास है तथापि विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं में यकीन करने वाले अलग.अलग समूह, इस इतिहास को अलग.अलग दृष्टि से देखते हैं। दिल्ली में सरकार बदलने के बाद से, कई महत्वपूर्ण संस्थानों की नीतियों में रातों.रात बदलाव आ गया है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ;आईसीएचआर व राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद ;एनसीईआरटी, उन अनेक संस्थाओं में शामिल हैं, जिनके मुखिया बदल दिये गये हैं और नए मुखिया, संबंधित विषय में अपने ज्ञान से ज्यादा, शासक दल की विचारधारा के प्रति अपनी वफादारी के लिए जाने जाते हैं। ये वे संस्थान हैं जो इतिहास व शिक्षा सहित समाजविज्ञान के विभिन्न विषयों से संबंधित हैं। इन संस्थानों की नीतियों व नेतृत्व में परिवर्तन,भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस के इशारे पर किया गया प्रतीत होता है। आरएसएस की राजनैतिक विचारधारा हिंदू राष्ट्रवाद है, जो कि भारतीय राष्ट्रवाद और भारतीय संविधान के मूल्यों के खिलाफ है। आरएसएस के सरसंघचालक ने हाल ;3 मार्च 2015 में कहा था कि भारतीय इतिहास का'भगवाकरण' होना चाहिए। उनका समर्थन करते हुए भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि भारतीय इतिहास का भगवाकरण समय की आवश्यकता है और संबंधित मंत्री को इतिहास की पुस्तकों पर भगवा रंग चढाने में गर्व महसूस करना चाहिए।
इतिहास की किताबों के भगवाकरण से क्या आशय है ? भगवाकरण शब्द को प्रगतिशील व तर्कवादी इतिहासविदों और बुद्धिजीवियों ने तब गढ़ा था, जब वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ;1998 में मानव संसाधान विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने शिक्षा, इतिहास व अन्य समाजविज्ञानों के पाठ्यक्रमों और पाठ्यपुस्तकों में व्यापक परिवर्तन करने शुरू किए। जो किताबें मुरली मनोहर जोशी के कार्यकाल में लागू की गईं थीं उनमें कई तरह की आधारहीन बातें कही गईं थीं जैसे, चूंकि हम मनु के पुत्र हैं इसलिए हम मनुष्य या मानव कहलाते हैं,वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पेड़.पौधे अजीवित होते हैं परंतु हिंदू, पेड़.पौधों को जीवित मानते हैं और जब बंदा बैरागी ने इस्लाम कुबूल करने से इंकार कर दिया तो उसके लड़के की हत्या कर उसका कलेजा निकालकर, बंदा बैरागी के मुंह में ठूंसा गया। इन पुस्तकों में सती प्रथा को राजपूतों की एक ऐसी परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया थाए जिस पर हम सब को गर्व होना चाहिए। मध्यकाल के इतिहास को भी जमकर तोड़ामरोड़ा गया। जैसे,यह कहा गया कि कुतुबमीनार का निर्माण सम्राट समुद्रगुप्त ने किया था और उसका मूल नाम विष्णुस्तंभ था। इन पुस्तकों में शिवाजी और अफजल खान, अकबर और महाराणा प्रताप, गुरू गोविंद सिंह और औरंगजैब़ के बीच हुए युद्धों.जो केवल और केवल सत्ता हासिल करने के लिए लड़े गये थे.को सांप्रदायिक रंग देते हुए उन्हें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच युद्ध के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इन परिवर्तनों की पेशेवर, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष इतिहासविदों ने तार्किक आधार पर आलोचना की। उन्होंने इतिहास के इस रूप में प्रस्तुतिकरण के लिए 'शिक्षा का भगवाकरण' शब्द इस्तेमाल करना शुरू किया। परिवर्तनों की आलोचना का जवाब देते हुए मुरली मनोहर जोशी ने कहा ;अप्रैल 2003 कि यह भगवाकरण नहीं बल्कि इतिहास की विकृतियों को ठीक करने का प्रयास है। लेकिन अब, बदली हुई परिस्थितियों और परिवर्तित राजनैतिक समीकरणों के चलते, वे उसी शब्द.भगवाकरण.को न सिर्फ स्वीकार कर रहे हैं वरन् उस पर गर्व भी महसूस कर रहे हैं।
भारत में इतिहास का सांप्रदायिकीकरण,अंग्रेजों ने शुरू किया। उन्होंने हर ऐतिहासिक घटना को धर्म के चश्मे से देखना और प्रस्तुत करना प्रारंभ किया। अंग्रेजों के रचे इसी इतिहास को कुछ छोटे.मोटे परिवर्तनों के साथ, हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों ने अपना लिया। हिंदू सांप्रादयिक व राष्ट्रवादी तत्व कहते थे कि भारत हमेशा से एक हिंदू राष्ट्र है और मुसलमान व ईसाई, भारत में विदेशी हैं। मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों के लिए इतिहासए आठवीं सदी में मोहम्मद.बिन.कासिम के सिंध पर हमले से शुरू होता था। उनका दावा था कि चूंकि मुसलमान भारत के शासक थे इसलिए अंग्रेजों को इस देश का शासन मुसलमानों को सौंपकर यहां से जाना था। इतिहास के इसी संस्करण का किंचित परिवर्तित रूप पाकिस्तान में स्कूलों और कालेजों में पढ़ाया जाता है।
इसके विपरीत,जो लोग धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति प्रतिबद्ध थे उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी राजा का धर्म, उसकी नीतियों का निर्धारक नहीं हुआ करता था। यही बात स्वाधीनता आंदोलन के सर्वोच्च नेता महात्मा गांधी ने भी कही। अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में वे लिखते हैंए 'मुस्लिम राजाओं के शासन में हिंदू फलेफूले और हिंदू राजाओं के शासन में मुसलमान। दोनों पक्षों को यह एहसास था कि आपस में युद्ध करना आत्मघाती होगा और यह भी कि दोनों में से किसी को भी तलवार की नोंक पर अपना धर्म त्यागने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। इसलिए दोनों पक्षों ने शांतिपूर्वक, मिलजुलकर रहने का निर्णय किया। अंग्रेजों के आने के बाद दोनों पक्षों में विवाद और हिंसा शुरू हो गई.क्या हमें यह याद नहीं रखना चाहिए कि कई हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज एक ही थे और उनकी नसों में एक ही खून बह रहा है? क्या कोई व्यक्ति मात्र इसलिए हमारा दुश्मन बन सकता है क्योंकि उसने अपना धर्म बदल लिया हैक्या मुसलमानों का ईश्वर, हिंदुओं के ईश्वर से अलग है? धर्म, दरअसल,एक ही स्थान पर पहुंचने के अलग.अलग रास्ते हैं। अगर हमारा लक्ष्य एक ही है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि हम अलग.अलग रास्तों से वहां पहुंच रहे हैं? इसमें विवाद या संघर्ष की क्या गुंजाईश है'
स्वाधीनता के बाद अंग्रेजों द्वारा रचे इतिहास को कुछ समय तक पढ़ाया जाता रहा। शनैः शनैः, इतिहास की पुस्तकों को तार्किक आधार देते हुए उनमें इतिहास पर हुये गंभीर शोध के नतीजों का समावेश किया जाने लगा। एनसीईआरटी के गठन के बाद,उन स्कूलों में, जिनमें एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम लागू था, इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या वाली पुस्तकों के स्थान पर एनसीईआरटी की पुस्तकें पढ़ाई जाने लगीं। फिर, सन् 1998 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के सत्ता में आने के बादए डॉ.जोशी ने पाठ्यक्रम के सांप्रदायिकीकरण और शिक्षा के भगवाकरण का सघन अभियान चलाया। सन् 2004 में एनडीए सत्ता से बाहर हो गई और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए ने केंद्र में सत्ता संभाली। इसके बाद, कुछ हद तक, स्कूली पाठ्यपुस्तकों में वैज्ञानिक सोच और तार्किक विचारों की वापसी हुई और पुस्तकों को सांप्रदायिकता के जहर से मुक्त करने के प्रयास भी हुए। चाहे वह पाकिस्तान हो या भारत,इतिहास के सांप्रदायिक संस्करण का इस्तेमाल,धार्मिक राष्ट्रवाद को मजबूती देने के लिए किया जाता है। इसलिए भारत में ताजमहल को तेजो महालय नामक शिव मंदिर बताया जाता है और स्वाधीनता संग्राम को मुसलमानों के खिलाफ लड़ा गया धार्मिक युद्ध। मुस्लिम राजाओं को मंदिरों का ध्वंस करने व हिंदुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाने का दोषी बताया जाता है। इस विभाजनकारी पाठ्यक्रम का इस्तेमाल राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए होता है। पाकिस्तान में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में मुस्लिम राजाओं का महिमामंडन किया जाता है और हिंदू राजाओं की चर्चा तक नहीं होती।
आरएसएस स्कूलों की एक विस्तृत श्रृंखला का संचालन करता है जिनमें सरस्वती शिशु मंदिर, एकल विद्यालय और विद्या भारती शामिल हैं। इन स्कूलों में इतिहास का सांप्रदायिक संस्करण पढ़ाया जाता है। वर्तमान सरकार की यही कोशिश है कि आरएसएस के स्कूलों का पाठ्यक्रम ही सरकारी शिक्षण संस्थाओं में लागू कर दिया जाए। जाहिर है कि यह खतरनाक कदम होगा। इससे विविधताओं से भरे हमारे बहुवादी देश में विघटनकारी ताकतें मजबूत होंगी।
-राम पुनियानी

रविवार, 5 अप्रैल 2015

घोर प्रतिगामी समय में एक योद्धा का जाना:जितेन्द्र रघुवंशी

 दुख चाहे जितना सघन हो, उसका आघात चाहे जितना गहरा, आंसू अन्ततः ख़ुश्क हो ही जाते हैं। स्पष्ट दिखाई न पड़ने के कारण मुझे नेत्र विशेषज्ञ से सम्पर्क करना पड़ा। जांच के बाद उन्होंने बताया कि अधिक पढ़ने के कारण आपकी आखें ख़ुश्क हो गयी हैं, यानी उनमें ड्राइनेस आ गयी है। कम से कम छः माह आंखो में दवा डालनी पड़ेगी। सो मैं आई ड्राप के सहारे दुनिया देख रहा हूं और पत्र पत्रिकाएं पढ़ पा रहा हूं। कुछ लिखने की भी कोशिश करता हूं।
    व्यवस्था के हाथों सफ़दर हाशमी की निमर्म जघन्य हत्या के बाद जितेन्द्र रघुवंशी का असमय, अत्यंत आकस्मिक रूप सेंहम सब को तड़पता बिलखता छोड़ कर चले जाना सांस्कृतिक साहित्यक व बौद्धिक जगत को भीतर तक हिला गया है। वेजन सांस्कृतिक आन्दोलन के अग्रणी नायक थे। अपने समय के संस्कृति कर्मियों, युवाओं व राजनैतिक कार्यकर्ताओं मे रचनात्मक उत्तेजना भर देने वाले उतने ही बहुआयामी संभावनाशील तथा प्रतिबद्ध एक दूसरे नायक का सहसा साथ छोड़कर जाना भीतर तक झझकोर कर रख गया। कितनी उम्मीदें लगाये बैठे थे हम, नित नई ऊर्जा पाने की आस में। नाव नहीं डूबी खेवन हार ही साथ छोड़ गया।
    औपनिवेशिक ग़़ुलामी से मुक्ति पाते ही हमारी राजनीतिक सामाजिक व्यवस्था ने हत्या के कितने नये तरीके़ ईजाद कर लिए हंै। स्वाइन फुलू ऐसा ही एक तरीक़ा है। सामूहिक नरसंहार की ये भी एक पद्धति है। मनुष्य अपने-अपने परिजनों के प्रति ही संशय ग्रस्त रहेगा तो बुद्धि उसकी कुन्द हो ही जायेगी। धर्मवाद, आडम्बरकर्मकाण्ड की बल्ले-बल्ले। लोग जाति एवम् धर्म के नाम पर लड़ते रहें, एक दूसरे को मारते रहें। लूट ख़ोरों के सहारे टिकी ज़ालिम व्यवस्था को और क्या चाहिए। तीव्र गति से आधुनिक होता प्रगति करता हमारा महान देश बीसवीं सदी समाप्त होने से पहले ही 21वीं सदी में पहंुच गया परन्तु हम 18वीं व 19वीं सदी की आशंकाओं, यातनाओं, आघातों, घरों में घुसे एवम वातावरण में सक्रिय अपने शत्रुओं से मुक्ति नहीं प्राप्त कर पाये। हम पे कब कहां से कैसे हमला हो जाये हम नहीं जानते। कैसी धोर विडम्बना है कि इस प्रकार की अनेकानेक यातनाओं, हिन्दुस्तानी अवाम को अभावों, वंचनाओं का दंश देने उन्हें आधुनिकता प्रगति के अवदानों से दूर रखने के षडयंत्रों के खि़लाफ चलने वाले संघर्षों के लिए जीवन समर्पित कर देने की रोमांचक मिसाल क़ायम करने वाला एक दृढ़ संकल्पी योद्धा ही समय की क्रूरता का शिकार हो गया। जितेन्द्र किसी एक व्यक्ति का नहीं, उनके भीतर उपस्थित कई व्यक्तियों, एक संस्था, एक आन्दोलन का नाम है। उन्हें देखकर उनसे मिलकर जननाट्य आन्दोलन के भविष्य के प्रति आश्वस्ति की अनुभूति होती थी तथा अतीत की समूची भव्यता एवम रोमांच सामने आ खड़ा होता था एक से एक चमकीले सितारों की श्रंखला उर्दू में कहें तो कहकशंा। अनिल डी सिल्वा, हिमाँशु राय, विनयराय, बलराज साहनी, ख़्वाजा अहमद अब्बास, अली सरदार जाफरी, ए0के0 हंगल, हबीब तनवीर रितविक घटक, आबिद रिज़वी विश्वनाथ आदिल, रशीद जहां, ज़ोहरा सहगल उजरा सहगल, सथ्यू, सत्यदेव दुबे, शैलेन्द्र, दमयंती, भीष्म साहनी स्वयम उनके पिता राजेन्द्र रघुवंशी, बिशनकपूर, बिशन खन्ना, अमृत लाल नागर, रजि़या सज्जाद, ज़हीर क़ुदसिया ज़ैदी, रफ़ी पीर, नियाज़ हैदर कैफ़ी आज़मी, शौकत कैफ़ी। अतीत और वर्तमान परम्परा और आधुनिकता को साधने का, उनके प्रति समान सजगता व सृजनशीलता बनाये रखने का उनमंे अदभुत कौशल था। ठीक उसी प्रकार जैसे लोक नाट्य परम्परा व आधुनिकरंगमंच के प्रति उनका कौतुहल एक सी सघनता रखता था। ये जानना विस्मय कारी हो सकता है कि वे भारतीय भाषाओं के रंगमंचों पर होने वाले विविध प्रयोगों, अन्वेषणों के साथ ही पाश्चात्य मंच की अधिकांश गतिविधियों नई विकसित होती पद्धतियों के बारे में चैंकाने वाली वाक़ाफि़यत रखते थे। इस वाक्फि़यत को वे अपनी सृजनात्मकता का हिस्सा बनाते हुए नित नया सीख़ने की ललक उनमें लगातार बनी रहती, ठीक उसी तरह जैसे उर्दू की प्रगतिशील शायरी व कथा साहित्य की उनकी जानकारी कभी कभी विस्मित करती थी। अक्सर वे इस बारे में नई अजानी बातें बताते। संस्मरणों का तो उनके पास जैसे एक विपुल ख़ज़ाना था। चुटकुले सुनने व सुनाने में उनकी ख़ासी दिल चस्पी थी। ये उनकी जि़न्दा दिली का सुबूत था। देसी चुटकुलों का आनन्द अपनी जगह उनसे रूसी चुटकुले सुनने का लुत्फ़ अलग था। आगरा में सम्पन्न शोक सभा में उनकी पत्नी का कथन कि वे ज्ञान का भण्डार थे, अतिश्योक्ति नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व का यथार्थ है। कल्पना कर पाना कठिन है कि इतनी सारी प्रतिभाओं ज्ञान विद्वता तथा दक्षताओं से सम्पन्न कोई व्यक्ति इतना सहज-हंसमुख हो सकता है। खाने-पीने घूमने के भी शौक़ीन। गंभीर बहसों विमर्शों में उनकी हिस्सेदारी उनके बहुआयमी व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष उभारती थी। दिल्ली में प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय अधिवेशन था। वहां नामवर सिंह जी ने अपने व्यक्तव्य में कश्मीर के सम्बन्ध में एक ऐसी बात कह दी जिससे कई अन्य प्रतिभागियों के साथ वे भी सहमत नहीं थे, संयोग से वे मेरे ही बग़ल में बैठे हुए थे। सबसे पहले तो उन्होंने मुझसे ही अहमति प्रकट की। मैं उनके साथ था। नामवर जी की तक़रीर ख़त्म होते ही वे मंच की ओर गये और संचालक से अपनी बात कहने की अनुमति चाही। पूरी बे बाक़ी से उन्होंने अपनी असहमति दर्ज करायी। ग़लत से असहमति का उनका विवेक उतना ही प्रखर था जितना सच के समर्थन की उनकी तत्परता। उन्होंने एक बार मुझे महिला विरोधी हिंसा पर व्याख्यान देने के लिए आगरा आमंत्रित किया। आतिथ्य सत्कार की प्रशंसा मैं नहीं करूंगा, अपने व्याख्यान के दौरान जब मैंने भारतीय शिक्षा तंत्र में सक्रिय स्त्री अस्मिता पर आघात करने वाले तत्वों, विशेष रूप से पाठय सामग्री की ओर संकेत किया तो वहां उपस्थित एक पूर्व सांसद अथवा विधायक ने देश में गुरूकुल पद्धति की शिक्षा लागू करने की बात कही। इस पर मैंने जो कुछ कहा वो अपनी जगह, जितेन्द्र ने जो उस कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे, उन सज्जन का प्रतिवाद करते हुए तीखे पन से कहा कि इस प्रकार के विचार समाज को प्रगतिशील व आधुनिक बनाने के हमारे अभियान को क्षति पहुंचाते हंै। बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं।
 आप में से बहुत से लोगो ने डा0 रशीद जहां का नाम सुना होगा। कथा कार व रंगकर्मी थीं, साथ में चिकित्सक और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भी राजेन्द्र रघुवंशी के साथ वो भी मई 1943 में इप्टा के स्थापना सम्मेलन बम्बई में उपस्थित थीं। उनका शुमार इप्टा के संस्थापकों में होता है। उनके पति महमूदुज़्ज़फर विद्वान होने के साथ ही कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भी थे। उनका सम्बन्ध एक रईस राज परिवार से था। रशीद जहां की क्षमताओं, अवास व अन्य साधनों का बड़ा हिस्सा पार्टी और प्रगतिशील लेखन व जन नाटय आन्दोलन को समर्पित था। वे इनकी गतिविधियो के लिए चन्दा जमा करने, फर्श पर दरी बिद्दाने, स्टेज सजाने, कहानी पढ़ने, से लेकर नाटक लिखने, तथा उनमे अभिनय करने तक का काम करती थीं। एक बार उन्हांेने अपने पति की शादी में मिली मूल्य वान शेर वानियां तथा अपने सभी अत्यंत क़ीमती कपड़े राजेन्द्र रधुवंशी जी को दे दिए थे कि इप्टा के नाटकों में इनका हस्बेज़रूरत इस्तेमाल हो सके।
राजेन्द्र रधुवंशी के रहते उनके आवास कि़दवाई पार्क (राजा की मंडी) जाने का मतलब होता था एक ऐसे लोक में पहुँचना जहां नाटक की रिहलसल, नृत्य व गायन का अभ्यास, प्लेरीडिंग से लेकर हारमोनियम व ढोलक की धुनांे एवमं तालें सुनने को मिल सकती थीं। समूचे परिवार को इन समस्त गतिविधियांे में संलग्न देखने का अपना भिन्न रोमांच था, अदभुत और उत्तेजक। राजेन्द्र जी का वृद्धावस्था में बच्चों किशोरो को गाना सिखाते देखना तो ग़ज़ब का अनुभव होता। राजेन्द्र जी का ये रंग संस्कार जितेन्द्र से होते हुए उनके समूचे परिवार का, संस्का बना। जिसमें बाद की पीढि़यां भी शामिल हैं। इस प्रकार उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वंशानुगत मानने में संकोच नहीं होना चाहिए। इस स्मरण के साथ कि केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय का समृद्ध पुस्तकालय उनके बाबा ने स्थापित किया था। अतः विश्वास किया जा सकता है कि ये परम्परा उसी विविधता गरिमा से आगे भी जारी रहेगी। समूची इप्टा के समान वो भी धर्म निरपेक्ष पक्ष धरता से प्रतिबद्ध फ़ासीवादी साम्प्रदायिकता विरोधी जनाभियान के ज़रूरी भागीदार थे। वे इस मोर्चे पर कई तरह से अपना योगदान देते थे जैसे कि नाटक, गीत, भाषण, लेखन, ऐसे अवसरों पर सबको साथ ले चलने की उनकी छटपटाहट एक बड़ा मूल्य रचती थी। पारदर्शी लोकतांत्रिकता उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा थी।
 आगरा, जहाँ उनके जीवन का बड़ा हिस्सा गुज़रा, सांस्कृतिक विवधता तथा सामाजिक समरसता के अनेक अध्याय अपने में संजोये है जहां सामंती अवशेषों के बीच संगीत, आध्यात्म, मेलों उत्सवों का अपना अलग ठाठ है। वो आगरा अपनी समूची चमक व लय के साथ उनके भीतर प्रत्येक सांस के साथ धड़कता था। आगरा की इस विविधता के प्रति वे उतने ही संवेदनशील थे जितने कि बामपंथी माक्र्सवादी वैज्ञानिकता के प्रति। इन्हीं विशिष्टताओं का प्रतिनिधित्व करते आगरा ही के लाल नज़ीर अकबराबादी उनके व उनके परिवार का आदर्श हंै। ताजमहल के पीछे स्थित नज़़ीर की मज़ार पर प्रत्येक बसंत पर जनोत्सव की जो बुनियाद राजेन्द्र जी ने रखी थी वो आज भी उसी शान से जारी है। मैं आगरा कई बार गया हँूं। नज़ीर की मज़ार भी गया लेकिन जीवन भर का अवसाद बन जाने वाले इस दंश को शायद मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा कि राजेन्द्र जी तथा जितेन्द्र के बार बार बुलाये जाने के बावजूद इच्छा होते हुए भी मैं इस उत्सव में कभी शरीक नहीं हो सका। जितेन्द्र की बहन ज्योत्सना ने जन ज्ञान विज्ञान समिति के लिए नज़ीर पर एक पठनीय पुस्तिका लिखी है।
    वे दिन जितेन्द्र के हमसे हमेशा के लिए बिछड़ने के दिन, धर्मान्धता रूढि़वाद, कर्मकाण्ड, जनदमन व अन्याय और सांप्रदायिकता के विरूद्ध किसी सधन धारदार अभियान के समान सक्रिय भाकपा के पूर्व विधायक कामरेड पानसरे की निर्मम क्रूर हत्या के विरूद्ध समूचे देश में निन्दा प्रतिरोध तथा विक्षोभ की अभिव्यक्ति के दिन थे। हम आर्द्रमन से सभाएं कर रहे थे, जुलूस निकाल रहे थे। उस दर्दनाक घटना से कुछ अर्सा पहले ही ढाका में खुली सड़क पर धार्मिक कट्टरवाद विरोधी एक बांग्लादेशी ब्लागर की सरेआम जघन्य हत्या के विरूद्ध भी हम चीख़ रहे थे, बाद में ऐसी कई इंसान मुख़लिफ़ घटनाएं घटती रही हैं, मानवता व संविधान के अपरा धी सम्मानित हो रहे हैं, हत्यारे कोर्ट से बरी किए जा रहे हैं। व्यापक रूप से स्वीकृत राष्ट्रीय आन्दोलन की थाती बन आये सामाजिक राजनैतिक मूल्यों पर निर्लज्ज आघात हो रहे हैं, ऐसे में जितेन्द्र हमें बराबर याद आते रहे हैं । उनकी मोहक मुस्कुराहट अब भी हमारा पीछा करती है। उनकी संकल्प बद्धता हमें झिंझोड़ती है।
उनके व्यक्त्वि में व्याप्त ऊर्जा उत्साह तथा कम्युनिस्ट कार्यकर्ता की बेलौस प्रतिबद्धता उन्हें लगातार सक्रिय रखती थी। पार्टी कार्यक्रमों और मजदूर आन्दोलनों में, उनके मुकदमे इत्यादि में, उनकी दिलचस्पी व भागीदारी दूसरों को प्रेरित करती थी। कम्युनिस्ट पार्टी उसके कार्यक्रमों नीतियों में उनके विश्वास तथा उनके जुुझारूपन का ही परिणाम है कि निकट अतीत में सम्पन्न हुए आगरा पार्टी के जि़ला सम्मेलन में उन्हें सर्वसम्मति से जि़ला सचिव बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ। अपनी सृजनात्मक संगठनात्मक गतिविधियों के कारण जिससे उन्हें विनम्र असहमति प्रकट करनी पड़ी। इप्टा के राष्ट्रीय सचिव तथा प्रांतीय अध्यक्ष वो पहले ही से थे। उनके व्यक्तित्व का साहित्यिक पक्ष कम महत्वपूर्ण नहीं है। वे एक साथ लेखक अनुवादक एवम् कवि-कथाकार की प्रतिभा अपने में संजोये हुए थे। वे छात्रप्रिय अध्यापक थे। अयोध्या आन्दोलन के अन्तर्गत अयोध्या मार्च के दौरान मैंने देखा कि सार्वजनिक सभाओं में जोशीले भाषण देने में अथवा नारे लगाने में वे किसी से पीछे नहीं थे। पिछले वर्षों में सोशल मीडिया-नेट के माध्यम से समान विचार धारा के लोंगों, संस्कृति कर्मियों, लेखकों तथा इप्टा की इकाइयों से सम्पर्क संवाद स्थापित करने, लोगों में नित नया उत्साह सृजित करने, नित नई जानकारियां देने, महत्वपूर्ण जो इस माध्यम पर घटित हो रहा है, लिखा जा रहा हैं उसे साझा करने का बीड़ा उठाये हुए थे। जो किसी सरल लक्ष्य की ओर बढ़ना नहीं था। बल्कि एक कठिन लक्ष्य को साधना था। वे ही मुझे फे़सबुक पर लाये। वे ही थे या उनके पिता जो बार-बार कहते थे, शकील साहब मुक्ति संघर्ष में लिखना मत छोडि़येगा। मौजूदा घोर प्रतिगामी समय में जबकि प्रगतिशील जनवादी कलाकर्म व मूल्यों के सम्मुख, चुनौतियां दिन प्रतिदिन अधिक जटिल होती जा रही है, उनका न रहना बुरी तरह साल रहा है।
कितने गुण, कितनी क्षमताएं, कितनी प्रताभाएं यकजा थीं उस एक आदमी में ।
ऐसी मेघाएं विरल होती हैं।
 वे विरल थे, अद्वितीय थे, बहुत बड़े थे।
 उन्हें सलाम लाल सलाम

शकील सिद्दीक़ी
टिकैतराय योजना, लखनऊ-17
मो0-09839123525
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 20015 में प्रकाश्य

शिया सुन्नी तनाव: सफल अमेरिकी रणनीति का परिणाम?



        2011 में कई अरब व मध्य-पूर्व एशियाई देशों में फैले विद्रोह की आग अब यमन तक फैल गई है। वहां शिया समुदाय से संबंध रखने वाले हूदी मिलीशिया ने राष्ट्रपति आबिद रब्बू मंसूर हादी के विरुद्ध बड़े पैमाने पर विद्रोह कर उन्हें देश छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर दिया है। राष्ट्रपति हादी नेे यमन छोड़कर अदन में पनाह ली है जबकि हूदी विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना व उसके आसपास के क्षेत्रों में अपना पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया है। यमन में हालांकि 2011 के बाद से ही शिया-सुन्नी संघर्ष की चिंगारी धधक रही थी जिसने पिछले दिनों एक बड़े विद्रोह का रूप धारण कर लिया। गौरतलब है कि अमेरिकी सैन्य गठबंधन द्वारा तालिबान व उसके समर्थक लड़ाकों को अफगानिस्तान से खदेड़ने के बाद तमाम अलकायदा व अन्य सुन्नी लड़ाकों ने यमन में पनाह ली थी। इस समय यमन में एक ओर शिया विद्रोहियों को उन्हीं सुन्नी अलकायदा व वर्तमान आईएसआईएस समर्थकों से भी दो-दो हाथ करना पड़ रहा है तथा वहां की मान्यता प्राप्त सुन्नी सरकार से भी इनका मुकाबला है। यमन में शिया विद्रोह के बाद राष्ट्रपति मंसूर हादी द्वारा सहायता की अपील के बाद  प्रत्याशित रूप से सऊदी अरब ने अपने संयुक्त अरब अमीरात,मिस्र,कुवैत,कतर तथा बहरीन जैसे लगभग दस देशों के गठबंधन के साथ वहां शिया विद्रोहियों के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई विशेष कर हवाई हमले शुरु कर दिए हैं । कहने को तो सऊदी अरब यह कार्रवाई यमन की संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त सरकार को शिया विद्रोहियों से बचाने तथा वहां शांति स्थापित करने के लिए कर रहा है। परंतु दरअसल अरब द्वारा इस कार्रवाई का मकसद यमन में ईरान समर्थित शिया विद्रोहियों को सत्ता पर कब्ज़ा जमाने की कोशिशों से रोकना है। यहां यह भी  काबिलेगौर है कि यमन में हूदी मलीशिया को ईरान द्वारा प्रशिक्षित किए जाने तथा इन्हें हथियारों की आपूर्ति करने का आरोप है जबकि ईरान इन आरोपों से इंकार करता आ रहा है।
        यमन में पैदा हुए इस ताज़ातरीन घटनाक्रम ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। यमन के बहाने र्इ्ररान व सऊदी अरब को सामने ला खड़ा करने में अमेरिका की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि जिस सुन्नी विशेषकर वहाबी विचारधारा रखने वाले कट्टरपंथी बेरहम आतंकवादी संगठन आईएस ने अबु बकर अल बगदादी के नेतृत्व में सीरिया व इराक सहित कई देशों में आतंक फैला रखा है तथा कट्टरपंथी इस्लामी साम्राज्य स्थापित करने के मंसूबे पर अमल करते हुए आए दिन क्रूरता के नए इतिहास लिख रहा है, सऊदी अरब व उसके सहयोगी देशों ने आखिर  उस आइ्रएसआईएस के विरुद्ध अब तक अपना सैन्य गठबंधन इतनी सक्रियता के साथ क्यों नहीं खड़ा किया? आखिर  आईएस के लड़ाकों पर सऊदी अरब व उसके सहयोगी अरब देश इतनी सक्रियता से हवाई हमले क्यों नहीं कर रहे? एक और सवाल इसी आईएसआईएस के जेहादी मिशन से जुड़ा यह कि इन वहाबी सुन्नियों के संगठन के विरुद्ध अमेरिका ने ईरान से ही सहयोग लेने की ज़रूरत क्यों कर महसूस की? इराक व यमन में अमेरिकी रणनीति के अजीबो-गरीब समीकरण दिखाई दे रहे हैं। यानी एक ओर तो यमन में शिया विद्रोहियों के विरुद्ध अमेरिका सऊदी अरब व उसके गठबंधन सहयोगियों को सहयोग दे रहा है तो दूसरी ओर इराक में आईएसआईएस के विरुद्ध ईरान के सहयोग से अपना अभियान चला रहा है। जबकि यमन के विद्रोहियों को ईरानी समर्थन प्राप्त बताया जा रहा है और वहाबी आईएसआइ्रएस लड़ाकों को सऊदी अरब का नैतिक समर्थन हासिल है। ईरान के उपविदेश मंत्री हुसैन अमीर अब्दुल लाहियान ने पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव से मुलाकात कर यमन में सऊदी अरब के सैन्य हस्तक्षेप को तत्काल रोके जाने की अपील की है। ईरान ने यह चेतावनी भी दी है कि इस प्रकार के हमले सऊदी अरब के हित में कतई नहीं हैं और सऊदी अरब के इस कदम से पूरे क्षेत्र की शांति को खतरा हो सकता है। ईरानी मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र से मांग की कि वह यमन में अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए सऊदी अरब से यमन में हवाई हमले तत्काल बंद करने को कहे।
        यमन में अरब हस्तक्षेप में अमेरिकी भूमिका और इस आग को हवा देने में अमेरिकी जल्दबाज़ी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों प्रमुख अमेरिकी मीडिया हाऊस सीएनएन ने यह समाचार प्रसारित किया कि पाकिस्तान भी सऊदी अरब गठबंधन के साथ यमन के शिया विद्रोह को कुचलने में शामिल हो गया है। तथा उसके 15 लड़ाकू विमान यमन में हूदी विद्राहियों के विरुद्ध हो रहे हवाई हमलों में हिस्सा ले रहे हैं। इस समाचार के प्रसारित होते ही पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने इन समाचारों का ज़ोरदार खंडन करते हुए इस आशय की सभी खबरों को बेबुनियाद बताया और कहा कि पाकिस्तान सऊदी अरब गठबंधन का हिस्सा बनकर यमन में हो रही कार्रवाई में भाग नहीं ले रहा है। सवाल यह है कि फिर पाकिस्तान के हवाले से इतनी गैर जि़म्मेदराना खबर प्रसारित करने का सीएनएन का मकसद आखिर  क्या था?क्या यह विश्व में शिया-सुन्नी समुदायों के बीच फासला पैदा करने तथा पाकिस्तान को अरब समर्थक व ईरान विरोधी देश प्रमाणित करने का एक अमेरिकी प्रयास नहीं तो और क्या था?  इस समय यमन के भीतरी हालात सत्ता संघर्ष के उस खतरनाक दौर से गुज़र रहे हैं कि यदि यमनवासियों की अपनी सूझबूझ से यह हालात यथाशीघ्र नियंत्रित नहीं हो सके तो बाहरी दखल अंदाज़ी के चलते युद्ध क्षेत्र बनता जा रहा यमन एक बड़ी अमेरिकी साजि़श का शिकार होने से स्वयं को बचा नहीं सकेगा। और कोई आश्यर्च नहीं कि यमन गृहयुद्ध की भेंट चढ़ने के बाद दुनिया में दूसरा सोमालिया बन जाए? और यदि ऐसा हुआ तो यह दुनिया में शांति के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले अमेरिका की एक सफल रणनीति मानी जाएगी।
        पिछले दिनों ईरान के परमाणु मुद्दे को लेकर अमेरिका के रुख में आई नरमी को लेकर भी सऊदी अरब काफी चिंतित है। न तो उसे ईरान के प्रति अमेरिका का बदलता जा रहा लचीला रुख भा रहा है न ही इराक में आईएस के विरुद्ध होने वाले हमलों में अमेरिका-ईरान सहयोग उसके गले उतर रहा है। यमन में सऊदी अरब का सैन्य गठबंधन सहयोगी देशों के साथ दखल अंदाज़ी करना अरब की ईरान के प्रति खीझ का भी एक परिणाम है। इस पूरे घटनाक्रम में एक और मज़े की बात यह भी है कि भले ही पश्चिमी मीडिया आईएसआईएस,यमन प्रकरण तथा हूदी विद्रोहियों के मामलों में ईरान व अरब की अलग-अलग दखल अंदाजि़यों को मुस्लिम जगत के व्यापक स्तर पर होने वाले शिया-सुन्नी तनाव के रूप में क्यों न प्रचारित कर रहे हों, परंतु इसी तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि दुनिया के कई मुस्लिम देश तथा आम मुस्लिम जनता इस पूरे घटनाक्रम को शिया-सुन्नी तनाव के रूप में नहीं देखना चाहती। विश्व की एक बड़ी सुन्नी आबादी का भी यही मत है कि मुस्लिम देशों को ऐसे शासकों से निजात मिलनी चाहिए जो अमेरिका के पिछलग्गू बने रहते हैं। ऐसी विचारधारा रखने वाला विश्व का एक बड़ा सुन्नी वर्ग ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदी नेजाद तथा ईरान की अमेरिका के विरुद्ध अपना कड़ा रुख रखने वाली नीतियों का भी समर्थक है। यही वह वर्ग है जो भले ही सद्दाम हुसैन की क्रूरता व उसकी तानाशाही का विरोधी तो ज़रूर था परंतु अमेरिका के विरुद्ध सद्दाम हुसैन के कड़े रुख का समर्थक था। परंतु निश्चित रूप से यह सुन्नी जगत सऊदी अरब व अरब देशों के अन्य अमेरिकी कठपुतली नुमा शासकों के विरुद्ध है। परंतु अपनी तानाशाही को बचाने के लिए तथा आम लोगों के विद्रोह से स्वयं को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से अमेरिका की खुशामदपरस्ती करना अरब शासकों व तानाशाहों की मजबूरी बन चुकी है। दूसरी ओर अमेरिका भी पूरे विश्व में स्वयं को लोकतंत्र का कितना बड़ा हिमायती क्यों न बताता हो परंतु अरब देशों में उसी अमेरिका को न तो राजशाही नज़र आती है न ही तानाशाही?
        इसमें कोई शक नहीं कि आज अगर पूरा मुस्लिम जगत संगठित होता तथा इनमें विश्वास का वातावरण होता तो फिलिस्तीन कब का स्वतंत्र हो चुका होता और इज़राईल की क्रूरता का समय-समय पर शिकार न हो रहा होता। इराक,सीरिया व अफगानिस्तान भी इस प्रकार से बरबाद न हुए होते। परंतु एक बड़ी अमेरिकी चाल का शिकार होते हुए मुस्लिम देश कहीं एक-दूसरे देश से टकराते गए तो कहीं जातीय संघर्ष में अपने ही देश को तबाह कर डाला। और इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अब अमेरिका ने यमन के बहाने अरब व ईरान को आमने-सामने खड़ा कर पूरे विश्व को शिया-सुन्नी संघर्ष की आग में झोंकने का प्रयास किया है। इसे एक सफल अमेरिकी रणनीति का परिणाम तो ज़रूर कहा जा सकता है परंतु देखना यह होगा कि मुस्लिम जगत अमेरिका की इस चाल का शिकार किस हद तक हो पाता है और किस हद तक वह स्वयं को इस अमेरिकी साजि़श से सुरक्षित रख पाता है?
  -तनवीर जाफरी

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

भागो-भागो, विकास आया, पहले से भी तेज आया

वित्त मंत्री द्वारा हर वर्ष बजट पेश करना सरकार और मीडिया के लिए एक वार्षिकोत्सव जैसा होता है। बजट के आँकड़ों और घोषणाओं के साथ-साथ सेंसेक्स का उतार-चढ़ाव नाटकीय ढंग से दिखाया जाता है। राजनेताओं से उनके रुख को जाना जाता है। काॅर्पोरेट घरानों की नुमाइंदगी करने वाले लोग और अर्थशास्त्री स्टूडियो में आकर अपना विशेषज्ञ विष्लेषण देते हैं। मीडिया रिपोर्टर बीच-बीच में आम लोगों से बजट पर उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहते हैं। गृहिणियों व महिलाओं से और रास्ते चलते युवाओं से भी कुछ सवाल पूछे जाते हैं। ज़ाहिर है कि सरकार और सरकार के हिमायती बजट की तारीफ़ करते हैं और विपक्षी दलों के लोग और सरकार विरोधी सोच से प्रभावित लोग बजट को और कुछ नहीं, बस गलतियों का पुलिंदा भर मानते हैं।
इस बार भी सरकार का कहना है कि मोदी का (माफ़ कीजिए, अरुण जेटली का) वर्ष 2015-16 का बजट बजट देश की अर्थ व्यवस्था का कायाकल्प कर देगा। वहीं काँग्रेस सरकार में वित्तमंत्री रहे चिदम्बरम का कहना है कि न तो सरकार ने इस बजट में राजकोषीय और वित्तीय संतुलन पर ध्यान दिया है और न ही पुनर्वितरण संबंधी कोई कदम उठाये हैं कि जिनसे ग़रीब तबक़ों को कुछ तो हासिल हो।
इस सारे उत्सव को देखकर कोई अगर यह सोचे कि बजट देश की आर्थिक नीति की दिशा तय करता है तो ये उसका भोलापन ही कहा जाएगा। बजट केवल सरकार द्वारा चुनी गई आर्थिक नीति पर मुहर लगाता है। वो तय तो पहले ही की जा चुकी होती है। मोदी सरकार का ‘मेक इन इंडिया’ का आह्वान, बीमा और ज़मीन अधिग्रहण के अध्यादेश और ऐसे तमाम आदेश स्पष्ट संकेत देते हैं कि सरकार की प्रतिबद्धता देशी और विदेशी पूँजी के मुनाफ़े के रास्ते को आसान और सुविधाजनक बनाना है। अरुण जेटली के शब्दों में कहें तो, ‘कुछ तो फूल खिलाए हमने, और कुछ फूल खिलाने हैं।’ देश की ग़रीब जनता की बढ़ती हुई बदहाली से सरकार का कोई ख़ास सरोकार नहीं है।
वर्ष 1991 से हिंदुस्तान में नई आर्थिक नीति अपनाने के बाद से प्रत्येक वर्ष के बजट का केन्द्र बिंदु  वित्तीय घाटे को सीमा में बाँधे रखने का रहता है। राजग-1 के कार्यकाल के दौरान वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने ‘राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन’ संबंधी विधेयक पेश किया था जिसे 2003 में बाकायदा कानून बना दिया गया। उक्त विधेयक का मकसद राजकोषीय अनुशासन को संस्थागत रूप देना था। इस कानून में कुछ समयबद्ध लक्ष्य तय किये गए। एक लक्ष्य था 2008 तक राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3 प्रतिशत तक ले आना और दूसरा लक्ष्य था राजस्व घाटे को शून्य पर ले आना।
    बहरहाल 2007-8 में वैष्विक वित्तीय संकट से मंदी का खतरा सारी दुनिया पर मंडराया। तब दुनियाभर के देषों ने ‘कीन्सियन’ नसीहत के अनुसार राजकोषीय घाटे से अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का नुस्खा अपनाया। हिंदुस्तान में भी मंदी का ख़तरा सामने देख 2003 में बनाये गए क़ानून के सारे लक्ष्य भुला दिए गए और 2008-9 और 2009-10 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5.9 और 6.5 प्रतिशत के स्तर तक पहुँच गया।
अब चिदांबरम कह रहे हैं कि 2008-9 और 2009-10 में जो खर्चीली राजकोषीय नीतियाँ अपनायी गईं, वे ही महँगाई का और इस तरह काँग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के चुनाव हारने का कारण बनीं। दरअसल राजकोषीय घाटे का महँगाई या भुगतान संतुलन के संकट के साथ सीधा संबंध स्थापित करना सही नहीं है। लेकिन नवउदारवाद के साँचे में बार-बार यही दुहाई देकर तीसरी दुनिया की राजकोषीय  स्वतंत्रता पर यह अंकुश लगाया जा रहा है कि अगर किसी देश को उसकी जनता के लिए कुछ कल्याणकारी काम शुरू करने के लिए खर्च करना की ज़रूरत है तो भी वह देश इस पर खर्च न कर सके। वस्तुतः यह मेट्रोपोलिटन वित्तीय पूँजी का तीसरी दुनिया के व योरप के कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले मुल्कों की आर्थिक संप्रभुता पर सीधा हमला है। जब भी कोई देश व्यापार या कर्ज के संकट में होता है तो उसे मदद करने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौतों की ये शर्त होती है कि वह पहले अपने देश में ख़र्च कम करे या तथाकथित ‘आॅस्टेरिटी मेजर्स’ अपनाये जैसा अभी ग्रीस में हुआ। इसका सीधा आशय है कि अगर आप अपने राजकोषीय घाटे को अपने देश की जनता की ज़रूरत के मुताबिक कम या ज़्यादा करना चाहते हैं तो ये अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी को चुनौती देना है। और ये काम न तो संप्रग के बस का था और न ही राजग के बस का है। इसलिए राजकोषीय घाटे को पटरी पर लाना, जैसा कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी चाहती है, हमारी सरकारों की मजबूरी है। बस यही हमारे वित्तमंत्रियों की योग्यता का पैमाना है। अरुण जेटली की उपलब्धि यह है कि वे पिछले साल के 4.1 प्रतिषत के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा करने में समर्थ हैं। उनका वादा है कि इस वर्ष का राजकोषीय घाटा 3.9 प्रतिशत रहेगा और अगले तीन सालों में यह कम होकर 3 प्रतिशत हो जाएगा।
पिछले साल के 4.1 प्रतिशत के लक्ष्य को कायम करने के लिए जो कवायद की गई उसे नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए। पिछले वर्ष के बजट में जो अनुमानित आय करों से और सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश से बतायी गई, वो वास्तविकता से कहीं ज़्यादा थी। असल में आय अनुमान से काफ़ी कम हुई और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए ये ज़रूरी था कि ख़र्च को काफ़ी कम किया जाए। यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि कुछ ख़र्चों को कम करने का अखि़्तयार वित्तमंत्री के वश में भी नहीं होता मसलन ब्याज भुगतान या रक्षा बजट। ये करने ही होते हैं। जो कम किया जा सकता है, वो सामाजिक क्षेत्र पर होने वाला व्यय ही है।
पिछले वर्ष के 4.1 प्रतिषत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए मंत्रालयों के केन्द्रीय योजना के बजट समर्थन में 20 से 50 प्रतिशत तक की कमी की गई। इनमें स्वास्थ्य मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय प्रमुख हैं। इस वर्ष के बजट में ये किस्सा दोहराया जाएगा कि नहीं, ये तो अगले ही साल पता चलेगा लेकिन 3.9 प्रतिशत का लक्ष्य तय करते समय अरुण जेटली ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि आय और व्यय, दोनों ही दृष्टियों से काॅर्पोरेट सेक्टर और अमीर तबक़े को फायदा हासिल हो। टैक्स से होने वाली आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने सर्विस टैक्स बढ़ा दिया जिससे रुपये 23383 करोड़ का राजस्व मिलेगा। इसका अपेक्षाकृत अधिक भार ग़रीब तबक़े पर पड़ेगा। दूसरी तरफ़ काॅर्पोरेट टैक्स की दर 30 प्रतिशत से कम करके 25 प्रतिशत कर दी गई है और संपत्तिकर हटा दिया गया है। इससे राजस्व की आमदनी में रुपये 8315 करोड़ की कमी आएगी।
जहाँ तक व्यय का सवाल है, उसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए भारी वृद्धि की गई है। इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण का अर्थ कोई गाँव व ग़रीबों के लिए सुविधाजनक जीवन स्थितियों का निर्माण नहीं, बल्कि एक्सप्रेस हाइवे, आधुनिक एयरपोर्ट, आधुनिक सूचना-संचार सुविधाएँ और काॅर्पोरेट सेक्टर के लिए अन्य सुविधाएँ बढ़ाना ही है। मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कोशिश की थी कि देश के इस इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत हो। मनमोहन-मोंटेक माॅडल से प्राइवेट और काॅर्पोरेट सेक्टर के लिए बनी जगह में मुनाफ़े की आस में तमाम कंपनियाँ इस क्षेत्र में दाखि़ल हो गईं जिन्हें सार्वजनिक बैंकों से सस्ती दरों पर भारी-भरकम कर्ज मुहैया कराया गया। नतीजा ये है कि अब बैंकों के पास नाॅन परफाॅर्मिंग असेट्स का अंबार लग गया है। जेटली जी ने इस मुष्किल का समाधान ये निकाला कि उन्होंने काॅर्पोरेट को रियायत देते हुए कहा कि कोई बात नहीं। अगर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप भी आपको रास नहीं आ रही तो पब्लिक सेक्टर ही आपके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित कर देगा।
काॅर्पोरेट सेक्टर को ये सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए जिन मदों में बजट में कटौती की गई है, वे हैं आईसीडीएस (आँगनवाड़ी और आशा), सर्वशिक्षा अभियान, कृषि, एससी-एसटी सबप्लान, पेयजल, पंचायती राज, आदि वे सभी मदें जो ग़रीबों की जि़ंदगी को थोड़ी राहत पहुँचाती हैं। तर्क ये है कि चूँकि राज्यों को आवंटित किया जाने वाला कोष बढ़ा दिया गया है इसलिए केन्द्र की इस कटौती की भरपाई राज्य सरकारों द्वारा की जाएगी।
अंत में मनरेगा का उल्लेख करना ज़रूरी है। बजट में मनरेगा को 34000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 34600 करोड़ रुपये कोष आवंटित किया गया है। ये ज़रूरत के सामने कितना अपर्याप्त है इसका अंदाज़ा एक इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि मनरेगा में ऐसे बहुत से मामले हैं जहाँ लोगों से काम करवा लिया गया लेकिन पैसे न होने से भुगतान नहीं किया गया। इसका जो आंशिक भुगतान राज्य सरकारों ने अपने कोष से कर दिया था, अभी उसका ही केन्द्र सरकार को 6000 करोड़ रुपया देना बाकी है। और फिर अब तो मनरेगा पर खर्च की कोई सीमा नहीं बाँधी जा सकती क्योंकि अब यह लोगों का संवैधानिक अधिकार है कि अगर वे काम माँगें तो उन्हें काम देना सरकार की जिम्मेदारी होगी। संक्षेप में इस बजट का विष्लेषण यही है कि मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह देश को जिस दिशा में ले जा रहे थे, मोदी और जेटली हमें उसी दिशा में और तेज रफ्तार के साथ धकका देने के लिए कमर कसे हैं।
-जया मेहता
जन अर्थशास्त्री हैं और दिल्ली स्थित जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट आॅफ़ सोशल स्टडीज़ के साथ संबद्ध हैं।

हिन्दू राष्ट्र,गाय व मुसलमान---भाग.2

सन 1966 के आसपास, हिन्दू राष्ट्रवादियों ने गाय के मुद्दे पर एक बार फिर अपना ध्यान केन्द्रित किया। तत्समय नवगठित विश्व हिन्दू परिषद ने गौवध.विरोधी आंदोलन शुरू कर, हिन्दुओं को लामबंद करने की कोशिश की, यद्यपि यह प्रयास अधिक सफल न हो सका। सन 1967 में हजारों साधुओं ने संसद पर प्रदर्शन कर गौवध को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की मांग की। शनैः.शनैः, गाय और बोतलबंद गंगाजल, हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों के मुसलमानों को गौहत्यारा बताने के अभियान के स्थायी प्रतीक बन गए। गाय को पवित्र और ईश्वरीय दर्जा दिया जाने लगा। गौमूत्र और गाय के गोबर का जबरदस्त महिमामंडन किया गया और उन्हें कई रोगों का रामबाण इलाज बताया जाने लगा। लाखों की संख्या में ऐसे पोस्टर देश भर में लगाये गए, जिनमें विभिन्न देवताओं का वास, गाय के शरीर में बताया गया था। सन 2010 में दो प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में यह खबर छपी कि आरएसएस से जुड़े 'गौ विज्ञान अनुसंधान केंद्र'  ने गौमूत्र से एक ऐसी दवा बनाई है,जिससे कैंसर ठीक हो सकता है और इस दवा का अमरीका में पेटेंट भी करा लिया गया है।    
विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में गौशालाएं स्थापित हो गयीं और सरकारी धन से बूढ़ी गायों की देखभाल का प्रबंध होने लगा। हरियाणा में ऐसी बहुत.सी गौशालाएं हैं, जिन्हें राज्य सरकार से अनुदान प्राप्त होता है और दान के रूप में भी भारी.भरकम राशि मिलती है। परंतु फिर भीए बूढी गायों को न तो भरपेट भोजन मिलता है और ना ही उनकी उचित देखभाल की जाती है। यही हालत, कुछ अपवादों को छोड़कर, देश के सभी हिस्सों में चल रहीं गोशालाओं की है। इन गोशालाओं के संचालकों के लिएए अधिक संख्या में गायों का अर्थ होता है ज्यादा अनुदान। जाहिर है कि उनकी रूचि इसी में रहती है की गौवध पर पूर्ण प्रतिबन्ध लग जाए और इसलिए ही वे बूढी गायों की उपयोगिता का अतिश्योक्तिपूर्ण प्रचार करते हैं।
गौरक्षक दल और हिन्दू राष्ट्रवादी
विभिन्न प्रदेशों में 4.6 सदस्यीय गौरक्षक दल गठित हो गए हैं। इनकी संख्या, भाजपा.शासित राज्यों में ज्यादा है, जहाँ उनका मजबूत जाल है और उन्हें अनौपचारिक रूप से सरकार का संरक्षण प्राप्त है। ये दल सड़कों पर डेरा जमाये रहते हैं और मवेशी ले जा रहे ट्रकों को रोक लेते हैं। ये ट्रक सामान्यतः केवल मवेशियों को विक्रेता से क्रेता तक पहुंचाने का काम कर रहे होते हैं। अगर ट्रक का ड्राईवर या मालिक मुसलमान हो, तब तो उनकी खैर नहीं। अगर वाहन में सभी जरूरी कागजात उपलब्ध हों तब भी ये लोग ड्राईवर की बेतहाशा पिटाई लगाते हैं और अगर उन्हें मुंहमांगी रकम नहीं दी जाती तो वे मवेशियों पर कब्जा कर लेते हैं। ड्राईवर को मीडिया के सामने प्रस्तुत किया जाता है ताकि मुसलमानों को गौहत्यारा बताया जा सके। बाद में ड्राईवर को पुलिस के हवाले कर दिया जाता है। पुलिस, गौरक्षक दल के सदस्यों की बजाए, ड्राईवर पर मुकदमा कायम कर देती है।
इस लेखक ने गुजरात के कच्छ इलाके में कई ऐसी घटनाओं की जांच और राजस्थान के मेवात और मध्यप्रदेश के अनेक शहरों में हुईं इस तरह की घटनाओं की विस्तृत जानकारी एकत्रित की है। अकेले अहमदाबाद में कम से कम 64 ऐसे दल हैं। मीडिया में लगातार मुसलमानों को कसाईयों के रूप में प्रस्तुत किए जाने और सोशल मीडिया साईटों पर फोटोशॉप इत्यादि का इस्तेमाल कर रूपांतरित किये गये फोटो अपलोड करने के नतीजे में,देश में कई स्थानों में सांप्रदायिक दंगे हुए हैं। अहमदाबाद में सन् 1969 में सांप्रदायिक हिंसा इस अफवाह के बाद शुरू हुई कि मुसलमानों द्वारा बेरहमी से गायों की पिटाई की जा रही है। महाराष्ट्र के धुले में 5 अक्टूबर 2008 को दंगे तब शुरू हुए जब हिंदू रक्षक समिति ने शहर में बड़ी संख्या में ऐसे पोस्टर चिपकाये जिनमें मुस्लिम टोपी पहने एक दाढ़ी वाला आदमी, बड़ी क्रूरता से एक गाय को काट रहा है। पुलिस के जिस डीएसपी से हमने बात की उसने बताया कि पोस्टर में जो चित्र लगाया गया थाए वह बम धमाके में मारी गई एक गाय का था। पोस्टर में अत्यंत भड़काऊ और आपत्तिजनक बातें थीं परंतु पुलिस ने पूरे पोस्टर को हटाने की बजाए केवल उस हिस्से पर कागज की पर्चियां चिपकवा दीं।
हिंदू राष्ट्रवादी, गाय के प्रतीक का इस्तेमाल मवेशियों को ढोने वाले ट्रांसपोटरों से अवैध वसूली करने,मुस्लिम समुदाय के विरूद्ध घृणा फैलाने और सांप्रदायिक दंगे करवाने के लिए तो करते ही हैं, वे इसका इस्तेमाल अपने एक वृहद राजनैतिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भी करते हैं और वह है ऊँची जातियों के हिंदुओं और ओबीसी के एक हिस्से को एकसूत्र में बांधना। ऊँची जातियां, हिंदू आबादी का 15 प्रतिशत से भी कम हैं। गौरक्षा के नाम पर चलाए जा रहे अभियान का इस्तेमालए अलग.अलग दलों से जुड़ी ऊँची जातियों व ओबीसी के एक हिस्से को एक करने और उन्हें कांग्रेस व क्षेत्रीय पार्टियों से दूर करने के लिए किया जाता है। इससे ऊँची जातियों के सांस्कृतिक व राजनैतिक वर्चस्व को बनाए रखने में मदद मिलती है और तथाकथित 'हिंदू संस्कृति' को बढ़ावा देकर, दलितों और आदिवासियों की संस्कृति व खानपान की उनकी परंपरा को हाशिए पर पटकने की कोशिश की जाती है। गाय को गौमाता मानने और उसकी पूजा करने की प्रथा को पूरे देश पर लादने की कोशिश, सांस्कृतिक विविधता को नकारने का प्रयास है। हमारे देश में अलग.अलग धार्मिक विश्वास व आचरण प्रचलित हैं। गौमाता के नाम पर सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने का उद्देश्य, दरअसल, गौमाता के पूजकों का राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करना है। यह उन वर्गों का सांस्कृतिक.राजनैतिक दमन करने का प्रयास है जो गाय को माता नहीं मानते और जिन्हें गौमांस से परहेज नहीं है।
आश्चर्य नहीं कि हरियाणा के गोहाना में पांच दलितों को तब क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया था जब वे एक मरी हुई गाय की खाल उतार रहे थे। यह उनका पारंपरिक पेशा था। उन पर यह झूठा आरोप मढ़ा गया कि वे जिंदा गाय की खाल उतार रहे थे.ठीक उसी तरह,जिस तरह मुसलमान ट्रक मालिकों और ड्रायवरों पर यह झूठा आरोप लगाया जाता है कि वे गायों को बूचड़खाने पहुंचाने का काम करते हैं। इन सब का उद्देश्य गाय की रक्षा करना नहीं वरन् दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों पर सांस्कृतिक और राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करना है। इस अर्थ में मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के गौवध निषेध कानून, राजनैतिक लक्ष्य की पूर्ति के लिये लाए गए लगते हैं। अगर किसी दंगे में सैंकड़ों मुसलमान भी मर जायें तब भी हत्यारों को सजा मिलने की संभावना बहुत कम होती है। मुसलमानों से कहा जाता है कि वे दंगों को भूल जायें,दंगाइयों को माफ कर दें और अपना जीवन आगे बढ़ायें। एफआईआर या तो दर्ज ही नहीं की जातीं या उनमें जानबूझकर कमियां छोड़ दी जाती हैं। अगर ठीक.ठाक एफआईआर दर्ज कर भी ली जाती है, तो जांच ठीक से नहीं होती और प्रकरणों में खात्मा लगा दिया जाता है। जिन मामलों में मुकदमा चलता है, वहां भी न्याय का मखौल ही होता है। गोहाना की दलित.विरोधी हिंसा के दोषियों को सजा मिलने की संभावना न के बराबर है। दलित.विरोधी हिंसा की अन्य घटनाओं में भी यही होता आया है, उन चंद मामलों को छोड़कर,जिनमें दलित और मानवाधिकार संगठनों ने दोषियों को सजा दिलवाने के लिए अभियान चलाया। 'अनुसूचित जातिए जनजाति ;अत्याचार निवारण अधिनियम' के तहत जितनी सजा का प्रावधान किया गया है,वह गौवध के लिए निर्धारित सजा से कम है। गौवध करने वाले को सात साल तक की कैद हो सकती है। गौवध निषेध अधिनियम के अंतर्गत पुलिस और प्रशासन को तलाशी लेने और संदेहियों को गिरफ्तार करने के बहुत व्यापक अधिकार दे दिये गये हैं और स्वयं को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी, आरोपियों पर डाल दी गई है। महाराष्ट्र में इस विधेयक के कानून बनने के तुरंत बाद, हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा मुसलमानों पर हमले की अनेक घटनाएं हुईं। यह अनापेक्षित नहीं था। इस कानून का उद्देश्य गाय की रक्षा या उसके प्रति श्रद्धा को बढ़ावा देना नहीं बल्कि मुसलमानों को परेशान करना और हिंदुओं को भाजपा के साथ लाना है। संघ परिवार को दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों की जान से ज्यादा गाय की जान प्यारी है।
सांस्कृतिक राज्य
एक ऐसा राज्य, जो गाय को, हाशिए पर पड़े समुदायों के मनुष्यों से ज्यादा संरक्षण देता है, एक ऐसा राज्य जिसके लिए गाय और उसके तथाकथित रक्षकों की सुरक्षा, समाज के कमजोर तबकों.जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं.की सुरक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है,ऐसा राज्य न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता। धर्मशासित राज्य की तरहए सांस्कृतिक राज्य भी प्रजातंत्र विरोधी होता है। वह जरूरतमंदों को दो जून की रोटी और रोजगार उपलब्ध करवाने की बजाए, सेना और पुलिस पर अपना धन खर्च करता है। वह राज्य, नागरिकों के रसोईघरों और बेडरूमों में झांकना चाहता हैए वह राज्य यह तय करना चाहता है कि महिलाएं कौनसे कपड़े पहनें, वह राज्य यह तय करना चाहता है कि कौनसा नाटक मंचित होए कौनसी फिल्म दिखाई जाए और कौनसी किताब छपे। उसे इस बात की कतई फिक्र नहीं होती कि उसके नागरिकों को स्वास्थ्य व शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं या नहीं और ना ही वह सभी के समान विकास के प्रति फिक्रमंद होता है। सांस्कृतिक राज्य अपने नागरिकों की स्वतंत्रताओं को सीमित करता हैए असमानताओं को बढ़ाता है व इस तरह, अस्थिरता का वाहक बनता है।

गांधीजी का मत
गौरक्षा,गांधीजी का एक महत्वपूर्ण मिशन था और अहिंसा के सिद्धांत में उनकी आस्था का हिस्सा था। वे सभी पशुओं के खिलाफ हिंसा के विरूद्ध थे। 'गाय करूणा की कविता है', गांधीजी ने लिखाए 'इस सौम्य पशु की आंखों में करूणा झलकती है। वह लाखों भारतीयों के लिए माता है। गौरक्षा का अर्थ है ईश्वर द्वारा रचित सभी मूक प्राणियों की रक्षा .ईश्वर द्वारा रचित संसार के निचले दर्जे के प्राणियों की रक्षा अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि वे बोल नहीं सकते ;यंग इंडिया, 6 अक्टूबर 1921,पृष्ठ 36.गाय मनुष्येत्तर प्राणियों में सबसे पवित्र है। वह सभी मनुष्येत्तर प्राणियों की ओर से हमसे यह अपील करती है कि उसे मनुष्य.जो जीवित प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है.के हाथों न्याय मिलना चाहिए। वह मानो अपनी आंखों से हमसे कहती है, 'तुम हमारे ऊपर इसलिए नहीं हो कि तुम हमें मारो और हमारा मांस खाओ या अन्य तरीकों से हमारे साथ दुर्व्यवहार करो वरन् तुम हमारे ऊपर इसलिए हो ताकि तुम हमारे मित्र और अभिभावक बनो' ';यंग इंडिया 26 जून 1924, पृष्ठ 214।
परंतु गांधीजी गौरक्षा के लिए मानव हत्या के खिलाफ थे। उन्होंने लिखा ;यंग इंडिया,18 मई 1921ए पृष्ठ 156 'मैं किसी गाय की रक्षा के लिए किसी मनुष्य को नहीं मारूंगा,ठीक उसी तरह,जैसे मैं किसी मनुष्य की रक्षा के लिए गाय का वध नहीं करूंगा। 'गांधीजी ऐसे सभी लोगों को,जो जानवरों का वध करते हैं और मांस खाते हैं,इस बात के लिए राजी करना चाहते थे कि वे मांसाहार त्याग दें और अहिंसा का सिद्धांत अपना लें। उनके लिए गाय किसी को घृणा का पात्र बनाने का उपकरण नहीं थी.उस कसाई को भी वे घृणा का पात्र नहीं मानते थे,जो गाय को काटता है। वे गाय की रक्षा इसलिए करना चाहते थे क्योंकि वे अहिंसा में विश्वास करते थे और चाहते थे कि हम सभी प्राणियों के प्रति करूणा,प्रेम और दया का भाव रखें। गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन कर मुसलमानों के एक बड़े हिस्से को इस बात के लिए राजी कर लिया था कि वो गौवध नहीं करेगा। कोई भी सरकार अपने कानूनों,जेलों और पुलिस का डर दिखाकर भी उतना नहीं कर सकती जितना गांधीजी ने केवल एक अपील के जरिये कर दिखाया था।'हरिजन';15 सितंबर 1946, पृष्ठ 310 में उन्होंने लिखा, 'गौवध कभी कानून के जरिये नहीं रोका जा सकता। केवल ज्ञान, शिक्षा और गाय के प्रति दया का भाव जाग्रत कर ही यह संभव हो सकता है।' चंपारण में दिये गये उनके एक भाषण,जिसकी रपट'यंग इंडिया' के 29 जनवरी 1925 के अंक में छपी, गांधीजी ने कहा 'दुर्भाग्यवश, आज हम में से कुछ लोग यह मानते हैं कि गौरक्षा के लिए एक ही काम करना जरूरी है और वह है गैर.हिंदुओं,विशेषकर मुसलमानों,को गौवध करने और गौमांस खाने से रोकना। यह सोच, मेरी दृष्टि मेंए मूर्खतापूर्ण है। परंतु इससे इस निष्कर्ष पर कोई न पहुंचे कि जब कोई गैर.हिंदू गाय का वध करता है तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता या मैं गौवध को सहन कर सकता हूं.पर मैं कर क्या सकता हूं? क्या मुझे अपने धर्म का पालन स्वयं करना है या दूसरे से करवाना है.मान लीजिये मैं स्वयं गौवध न भी करूं तो क्या यह मेरा कर्तव्य है कि मैं मुसलमानों को भी, उनकी इच्छा के विरूद्ध, ऐसा ही करने के लिए मनाऊं? मुसलमानों का दावा है कि इस्लाम उन्हें गाय का वध करने की इजाजत देता है। ऐसी परिस्थिति में अगर किसी मुसलमान को बल प्रयोग के जरिये गौवध करने से रोका जाए तो यह, मेरे विचार में, उसे जबरदस्ती हिंदू बनाने जैसा होगा। जब भारत में स्वराज आ जायेगा तब भी, मेरे विचार से, हिंदू बहुसंख्यकों के लिए यह अनुचित व मूर्खतापूर्ण होगा कि वे कोई कानून बनाकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को इस बात के लिए मजबूर करें कि वो गौवध न करें. मेरा धर्म मुझे यह सिखाता है कि मैं अपने व्यक्तिगत आचरण के द्वारा उन लोगों, जिनके इस संबंध में अलग विचार हैं, को यह विश्वास दिलाऊं कि गौवध करना पाप है और इसलिए उसे बंद कर दिया जाना चाहिए। मैं तो चाहूंगा कि गौवध पूरी दुनिया में बंद हो जाए परंतु उसके लिए आवश्यक यह है कि मैं मस्जिद में दिया जलाने के पहले अपने घर में दिया जलाऊं।'
-इरफान इंजीनियर