रविवार, 21 सितंबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-13

धर्मान्तरण की कोशिशे
    मैंने गंभीरता से धर्मान्तरण के बारे में सोचना शुरू किया, संघ में रहते हुए यह समझ थी कि सिख, जैन और बौद्ध तो हिन्दू ही है और मुसलमानों को लेकर अभी भी दिल दिमाग में कई शंकाए आशंकाए थीं, इसलिए इस बारे में सोचना भी जरूरी नहीं लगा, तब एक मात्र विकल्प के रूप में ईसाई ही बचे थे, मैंने सोचा क्यों नहीं ईसाई लोगों से बात की जाये, ये लोग पढ़े लिखे भी होते हैं और कम कट्टर भी, रही बात संघ की तो वे ईसाइयों से भी उतने ही चिढ़ते है जितने कि मुस्लिमों से। लेकिन सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि ये ईसाई लोग पाए कहाँ जाते हैं मैं आज तक किसी भी ईसाई से नहीं मिला और ना ही कोई परिचित था हालाँकि आरएसएस में रहते उनके खिलाफ बहुत पढ़ा था, यह भी सुन रखा था कि जो भी उनके धरम में जाता है, उन्हें लड़की और नौकरी दी जाती है, पर मुझे तो दोनों की ही जरुरत नहीं थी, मुझे तो सिर्फ बदला लेना था, मुझे तो सिर्फ उनको चिढ़ाना था, जिन्होंने मेरी बेइज्जती की थी और मुझे ठुकरा दिया था। मैंने ईसाई खोजो अभियान शुरू कर दिया, जल्दी ही मैं भीलवाड़ा शहर के आजाद नगर क्षेत्र के एक प्रिंटिंग प्रेस के मालिक से मिलने में सफल रहा जिनका नाम बथुअल गायकवाड़ बताया गया था, दरअसल मेरे जीजाजी जो कि प्रेस पर कम्पोजीटर थे, वे कुछ ही दिन पहले इस प्रेस पर काम पर लगे थे और मैं उनको ढूँढते हुए वहाँ पहँुचा तो मेरी दोनों खोजें पूरी हो गई, ये महाशय एक स्कूल और चर्च के भी मालिक थे, मैंने उनसे बात की और अपना छिपा हुआ एजेंडा बताया और उनसे पूछा कि-क्या मैं ईसाई बन सकता हूँ? उन्होंने पूछा कि क्यों बनना चाहते हो? तब मैंने उन्हें आरएसएस के साथ चल रहे अपने पंगे के बारे में बताया और कहा कि मैं उनको सबक सिखाना चाहता हूँ। इस पर गायकवाड़ जी बोले-मसीहियत बदला लेने में नहीं बल्कि माफ करने में विश्वास करती है। इसलिए तुम भी उन्हें माफ कर दो और रेगुलर चर्च आना शुरू करो, जीजस में यकीन करो, वही हमारा मुक्तिदाता और सारे सवालों का जवाब है। मैंने उनसे साफ कहा कि मैं मुक्ति नहीं खोज रहा और न ही धर्म और भगवान, ना ही मेरा कोई सवाल है, मुझे कोई जवाब नहीं चाहिए मैं तो सिर्फ और सिर्फ संघ की पाखंडी और दोगली नीति को बेनकाब करना चाहता हूँ उन्होंने मेरी बात को पूरी ओढ़ी हुई धार्मिक गंभीरता से सुना और अगले रविवार को प्रार्थना में आने का न्योता दिया, मैं रविवार को उनकी प्रार्थना सभा का हिस्सा बनता इससे पहले ही पादरी साहब ने मेरे जीजाजी के मार्फत मेरे परिवार तक यह समाचार भिजवा दिए कि मुझे समझाया जाए क्योंकि मैं ईसाई बनने की कोशिश कर रहा हूँ।
बाद में उन्हें छोड़ कर मैं मेथोडिस्ट, बैप्टिस्ट, सीएनआई, सीरियन, कैथोलिक और भी न जाने कैसे कैसे अजीबो गरीब नाम वाले चर्च समूहों के पास पहुँचा, उन्हें अपनी बात बताई और कहा कि मुझे ईसाई बना दो, लेकिन सब लोग आरएसएस का नाम लेते ही घबरा जाते थे, उन्हें लगता था कि मैं आरएसएस का ही आदमी था जो किसी साजिश के तहत उन्हें जाल में फँसाने की कोशिश कर रहा था, इसलिए वे जल्दी ही किसी न किसी बहाने अपना पिंड छुड़ा लेते मुझे कहीं भी सफलता नहीं मिल पा रही थी।
मसीह मंजूर, मसीहियत नामंजूर
    पर हार मानना मेरे स्वभाव में नहीं था, मैं एक स्कूल टीचर से मिला जो मूलतः ब्राह्मण थे मगर वे धर्मान्तरण कर हरिनारायण से अच न्यूमेन हो गए थे। उन्होंने मुझे कुछ धार्मिक शिक्षा दी, मुझे धरम करम में कोई रुचि नहीं थी, सही बात तो यह थी कि मुझे बाइबिल, चर्च, जीसस और मुक्ति जैसी किसी भी बात में रुचि नहीं थी, मेरा मकसद तो कुछ और ही था, मैं न्यूमेन से संतुष्ट नहीं था, उन्होंने मुझे एक सेवंथ डे एडवेंटिस्ट पास्टर परवेज लाल का पता देकर कहा कि इनको चिट्ठी लिखना शायद ये तुम्हारी कुछ मदद कर पाएँगे, मैंने चिट्ठी लिख दी और गाँव आ गया। कुछ ही दिनों में दो अपरिचित सज्जन मेरे घर की दहलीज पर खड़े हो कर मुझी से मेरा पता पूछ रहे थे, मैंने कहा कि मैं ही हूँ वह जिसे आप खोज रहे है। उन्होंने बताया कि वे जोधपुर से आए हैं पादरी पीम लाल, मैंने उनका स्वागत किया, चाय पिलाई, उन्होंने मेरी पूरी बात सुनी और मुस्करा कर बोले कल मेरे साथ चलो।
    मैं उनके साथ जोधपुर आ गया करीब तीन महीने उनके पास रहा, उन्होंने पूरी बाइबिल शब्दशः पढ़ा दी, क्षमा, करुणा और प्रायश्चित का महत्व समझाया, इतना कुछ समझाया जितना कि एक ‘’बेचलर ऑफ थियोलोजी‘ के लिए जरुरी होता है, मगर मैं अब भी एक बागी हिन्दू ही था, इसी कारण ज्यादा भरोसेमंद नहीं था उनके लिए, एक रोज उनके चर्च के तमाम विश्वासियों और खुद पास्टर साहब ने तय किया कि मेरा बप्तिस्मा किया जाए, पर इसके लिए जरुरी था कि मैं जोधपुर के जिला कलेक्टर के सामने यह शपथपत्र प्रस्तुत करूँ कि मैं ईसाई बनना चाहता हूँ मैंने यह करने से साफ इंकार कर दिया, मैं तो सिर्फ आरएसएस को चिढ़ाना चाहता था मुझे सिर्फ इतना ही करना था, न इससे कुछ कम और न ही इससे ज्यादा  उन्होंने आपस में कुछ तय किया तथा कानूनन धर्म परिवर्तन करने की योजना को त्याग दिया। अंततः उन्होंने बपतिस्मे की केवल धार्मिक रीति गुपचुप तरीके से करने का निश्चय किया।
    फिर एक रविवार को उन्होंने कुछ गीत गाए, बाइबिल से कुछ आयतें पढ़ीं और मुझे पानी के एक टैंक में डुबोकर बाहर निकला, बाहर निकालते वक्त उन्होंने मुझे सफेद कपड़े में ढँका और मेरे कान में कहा कि ‘आज से तुम्हारा पुनर्जन्म हो गया है‘, इस प्रक्रिया को वो ‘बोर्न अगेन‘ कहते है, अब मैं उनकी नजर में एक भरोसेमंद व्यक्ति था लेकिन मुझे धर्म का खोखलापन साफ नजर आ रहा था, यह क्या धर्म है, जो हर सवाल के लिए जीसस को ही उत्तरदायी मानता हो, मेरे अन्दर विद्रोह की लहर सी उठी, मैं यह क्या होने दे रहा हूँ अपने साथ मुझे लगा कि मैं एक खाई से निकल कर कुँए में गिर गया हूँ, एक गुलामी से निकल कर दूसरी दासता में जा रहा था। वास्तव में मैं उस दिन खुद को एक ऐसे कैदी के रूप में पा रहा था जो सिर्फ जेल बदल रहा था।
    मैं अपने भीतर के विद्रोही इन्सान को दबा नहीं पा रहा था, मैंने स्पष्ट कर दिया कि मुझे मसीह तो फिर भी मंजूर हो सकते हैं पर आपकी यह मसीहियत मुझे कतई मंजूर नहीं है मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर पाऊँगा भले ही आप लोग टाई, कोट और जूते पहन कर अंग्रेजी में प्रार्थना करते हैं लेकिन मूर्खताओं में आपका भी मुकाबला नहीं है। मुझे धर्म के किसी भी संगठित स्वरूप पर घिन आने लगी, मैं ईसाइयत के अन्धे कुँए से बाहर आने को छटपटाने लगा, जल्दी ही मैंने उनको उनकी तमाम मूर्खताओं के साथ अलविदा कह दिया। मुझे सुकून तब मिला जब मैं उनसे मुक्त हुआ मैं आराम की नींद सोया, मुझे लगा कि मुक्ति जीसस, बाइबिल या मसीहियत अथवा किसी भी धर्म में नहीं है बल्कि मुक्ति तो इनसे मुक्त हो जाने में है और मैं इनसे मुक्त हो रहा था मैं खुश था मुझे खुशी हो रही थी कि मैं अब धार्मिक नहीं था मैं विश्वासी नहीं था मैं स्वर्ग में स्थान नहीं पाने जा रहा था मैं अब नरक जाने वाली गाड़ी में सवार था और मैं वाकई इससे बेहद खुश था।
-भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित 

शुक्रवार, 19 सितंबर 2014

कश्मीर से हमें कोई मतलब नहीं

मध्यप्रदेश के उज्जैन में वहां के विक्रम विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर कौल ने विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले जम्मू.कश्मीर के विद्यार्थियों की सहायता करने की अपील जारी की। यह अपील तथाकथित हिन्दू संगठनों को नहीं भायी। गत् 15 सितंबर को,बजरंग दल व विहिप के लगभग 25.30 कार्यकर्ता,लाठियां लेकर प्रोफेसर कौल के कमरे में घुस गये। इस अचानक हुये हमले और दुर्व्यवहार से प्रोफेसर कौल इतने आहत हुये कि उन्हें एक स्थानीय अस्पताल के आईसीयू में भर्ती होना पड़ा। हमलावरों ने उनके पक्ष में जमकर तोड़फोड़ मचाई। उन्होंने कम्प्यूटर आदि नष्ट कर दिये।
ये दोनों संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं। क्या संघ, इन संगठनों के माध्यम से यह चेतावनी देना चाह रहा था कि हम कश्मीर के बच्चों की कतई सहायता नहीं करेंगे? वे भूखे रहें, उनपर छत का साया रहे न रहे, वे चाहे फीस न चुका सकें, हमें इससे कोई मतलब नहीं। क्या हम उनसे यह कहना चाहते हैं कि हमें इस बात से भी कतई मतलब नहीं कि कश्मीर भारत का हिस्सा बना रहता है या नहीं। इस हमले का मतलब तो यही है।
बजरंग दल और विहिप के कार्यकर्ताओं को इस बात की परवाह भी नहीं थी कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह दौड़े.दौड़े कश्मीर गये और वहां के लोगों को भरोसा दिलाया कि हम आपके साथ हैं, पूरा भारत आपके साथ है। ऐसी ही बात मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने भी कही।
परंतु भाजपा और विहिप जैसे संगठनों के लोगों की मजबूरी है  कि इनका संपूर्ण प्रशिक्षण घृणा पर आधारित है। जिस समय उज्जैन की घटना हुई उस समय उत्तरप्रदेश में भाजपा के बड़े नेता महंत आदित्यनाथ, साक्षी महाराज व उत्तरप्रदेश के भाजपा अध्यक्ष और कुछ केन्द्रीय मंत्री 'लव जिहाद' की बात कर रहे थे,'लव जिहाद' के विरूद्ध महापंचायत का आयोजन कर रहे थे। फिर उसके प्रभाव से उज्जैन के विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के कार्यकर्ता कैसे बच सकते थे?
मध्यप्रदेश में भाजपा के दो विधायक कह रहे हैं कि नवदुर्गा के दौरान आयोजित गरबा में मुसलमानों को शामिल न होने दिया जाना चाहिए। उनका कहना है कि गरबा में शामिल होने आये युवकों के मतदाता परिचयपत्रों की जांच की जानी चाहिए। 
उज्जैन देश के पवित्रतम नगरों में से एक है। उज्जैन की गुरू.शिष्य परंपरा बहुत प्राचीन है। कहा जाता है कि उज्जैन के सांदीपनी ऋषि के आश्रम में भगवान कृष्ण की शिक्षा.दीक्षा हुई थी। उनके साथ उनके भाई बलराम और उनके सखा सुदामा भी थे। यह वही महान नगर है जिससे विक्रमादित्य  ने अपने शासन का संचालन किया थाए जहां महान कवि कालिदास ने अपने गीत गाये थे। ऐसी महान नगरी की परंपराओं और उदार चरित्र पर ये असामाजिक तत्व आये दिन कालिख पोत रहे हैं और गुरूओं पर हिंसक हमले कर रहे हैं।
आज से 8 वर्ष पूर्व इसी उज्जैन शहर में प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या हुई थी। वे उज्जैन विश्वविद्यालय से संबंध माधव कालेज में प्रोफेसर थे। एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने उनका घेराव किया था क्योंकि वे प्रोफेसर सब्बरवाल के एक निर्णय से नाराज थे।
हत्या का आरोप विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं पर लगा था। उनपर मुकदमा भी चला परंतु सभी बरी हो गये। इसका मुख्य कारण सभी 94 गवाहों द्वारा अपने बयान से मुकर जाना था।
यह किसी से छिपा नहीं है कि मध्यप्रदेश की सत्ताधारी भाजपा के एक बड़े हिस्से ने अपराधियों का साथ दिया था। जब आरोपी अदालत द्वारा निर्दोष माने गये तो एक मंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रसन्नता जाहिर की गयी थी। प्रसन्नता जाहिर करते समय मंत्री महोदय यह भूल गये कि यदि अपराधी अदालत से निर्दोष साबित होते हैं तो उसे राज्य सरकार की असफलता माना जाता है। सत्ता की असफलता पर सत्ता से जुड़े व्यक्ति द्वारा प्रसन्नता जाहिर करना कहां तक उचित था?
प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या के अनेक दर्शक थे। उनमें उसी कालेज के शिक्षक व विद्यार्थी भी शामिल थे। परंतु उनमें से एक ने भी अदालत के सामने सच बोलने की शपथ लेने के बाद भी सच नहीं बोला। यदि उस घटना के विरोध में उज्जैन के शिक्षक एकजुट हो जाते तो शायद प्रोफेसर कौल पर हमला करने का साहस संघ परिवार के सदस्य नहीं दिखा पाते।
एक समाचारपत्र के अनुसार यदि प्रोफेसर कौल को विश्वविद्यालय के शिक्षक और कर्मचारी नहीं बचाते तो शायद उनकी भी हत्या हो जाती। उस दिन विश्वविद्यालय के शिक्षकों और कर्मचारियों ने प्रोफेसर कौल को बाथरूम में बंद कर दिया इसलिये उनकी जान बच गयी। न सिर्फ उस दिन वरन् बाद में भी शिक्षकों और कर्मचारियों ने एकजुटता दिखाई और घटना के विरोध में विश्वविद्यालय बंद रखा। आशा है कि शिक्षकगण इस एकजुटता को कायम रखेंगे।
अब देखना यह है कि हमलावरों के विरूद्ध ईमानदारी से कानूनी कार्यवाही होती है कि नहीं या 2006 की घटना के आरोपियों की तरह, इन्हें भी बचाने का प्रयास किया जाता है।
जहां कांग्रेस ने इस घटना की कड़े शब्दों में भर्त्सना की है वहीं भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस घटना पर  कोई टिप्पणी नहीं की है। उज्जैन के विधायक पारस जैन, जो मंत्री भी हैं,ने घटना पर केवल खेद प्रगट किया और कहा कि राष्ट्रीय संपत्ति का नुकसान करना ठीक नहीं है। इससे ज्यादा हल्का बयान और क्या हो सकता है? मंत्री महोदय ने निंदा करने तक की आवश्यकता महसूस नहीं की।
यहां इस बात का उल्लेख करना प्रासंगिक है कि तथाकथित हिन्दू अतिवादी संगठन प्रायः ऐसी हरकतें करते हैं जो कानून की दृष्टि में अपराध हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गुरूओं का सम्मान करने की शिक्षा देता है। विद्यार्थी परिषदए संघ की शाखा है और शिक्षकों व विद्यार्थियों का मिलाजुला संगठन है। इसके बावजूद विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता आये दिन गुरूओं का अपमान करते हैं। उज्जैन में प्रोफेसर सब्बरवाल की हत्या के बाद खंडवा में वहां के शिक्षकों के मुंह पर कालिख पोतकर उनका अपमान किया गया था।  
क्या संघ, विद्यार्थी परिषद को यह परामर्श नहीं देता कि वह इस तरह की घटनाओं से बाज आये और अनुशासन की सीमा में रहकर अपना विरोध प्रगट करे ?
-एल.एस. हरदेनिया



मंगलवार, 16 सितंबर 2014

बांटने वाली राजनीति के दो हथियार :नफरत फैलाने वाली भाषा और पितृसत्तात्मक मूल्य

पिछले आम चुनाव में विजय हासिल करने के बाद से भाजपा का चुनावी मुकाबलों में प्रदर्शन बहुत अच्छा नहीं रहा है। आम चुनाव के बाद हुये उपचुनावों में पार्टी को करारी मात खानी पड़ी है। बिहार में भाजपा को परास्त करने में लालू.नीतीश मॉडल काम आया। उत्तरप्रदेश में उपचुनाव में क्या इस मॉडल को राज्य की राजनैतिक पार्टियां अपना सकीं हैंए यह प्रश्न अभी अनुत्तरित है। भाजपा ने उत्तरप्रदेश में चुनावी विजय हासिल करने के लिए अपने पुराने हथियार.विभाजनकारी राजनीति.का जमकर इस्तेमाल किया। योगी आदित्यनाथ जहर उगलते पूरे प्रदेश में घूमे। इसके साथ हीए 'लव जिहाद' के नाम पर ढ़ेर सारी अफवाहें और झूठ फैलाये गये।
भाजपा की विभाजनकारी राजनीति के इस सीजन की शुरूआत, लोकसभा में योगी आदित्यनाथ के भड़काऊ भाषण से हुई। उन्होंने अपने भाषण में सांप्रदायिक दंगों के लिए मुसलमानों और केवल मुसलमानों को दोषी ठहराया। आगे भी वे इसी तर्ज पर बातें करते रहे। उन्होंने इस आशय के निराधार आरोप लगाये कि जिस इलाके में मुसलमानों की आबादी जितनी ज्यादा होती है वहां उतना ही तनाव और हिंसा होती है। उन्होंने कहा कि मुसलमान, हिंसा की शुरूआत करते हैं और बाद में इसका फल भी भोगते हैं। भारत में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की व्यापक जांचें और विश्लेषण हुये हैं और इनके नतीजे, योगी आदित्यनाथ के आरोपों को झुठलाते हैं। लव जिहाद की तरफ इशारा करते हुए आदित्यनाथ ने कहा कि अगर 'वे एक हिंदू लड़की को मुसलमान बनायेंगे तो हम सौ मुस्लिम लड़कियों को हिंदू बनायेंगे।' योगी आदित्यनाथ लगातार नफरत फैलाने वाली बातें कह रहे हैं और यह तब, जबकि प्रधानमंत्री ने यह कहा है कि देश में हिंसा पर 10 साल तक पूर्ण रोक लगनी चाहिए।
आरएसएस.भाजपा गठबंधन को मानो लव जिहाद के नाम पर सोने की खान हाथ लग गई है। लव जिहाद को मुद्दा बनाने से उन्हें दोहरा लाभ हुआ है। जब वे यह कहते हैं कि मुस्लिम लड़कों को हिंदू लड़कियों को प्रेम जाल में फंसाने के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है तो एक ओर वे मुसलमानों का दानवीकरण करते हैं तो दूसरी ओर महिलाओं और लड़कियों के जीवन पर उनका नियंत्रण और कड़ा होता है। इस प्रचार में यह निहित है कि हिंदू महिलाओं को आसानी से बहलाया.फुसलाया जा सकता है और वे अपनी जिंदगी के बारे में सही निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं। इस तरह,सांप्रदायिक राजनीति के एजेण्डे के दो लक्ष्य एक साथ पूरे होते हैं। सांप्रदायिक राजनीतिए धार्मिक अल्पसंख्यकों को समाज के हाशिये पर पटकना चाहती है और साथ में समाज में महिलाओं के अधिकारों और उनकी स्वतंत्रताओं पर रोक लगाना भी उसके एजेण्डे में रहता है।
भाजपा और उसके साथी लव जिहाद का न सिर्फ भाषणों और वक्तव्यों के जरिये विरोध कर रहे हैं वरन् उन्होंने लव जिहाद का 'मुकाबला' करने के लिए मोर्चे बनाने भी शुरू कर दिये हैं। ऐसा ही एक मोर्चा मेरठ में गठित किया गया है और अन्य शहरों में भी इस तरह के संगठन बनाये जाने की चर्चा है। विहिप ने इस मुद्दे पर मोर्चा संभाल लिया है। विहिप का कहना है कि 'लव जिहाद के विरूद्ध हमारी लड़ाई का देशभक्त समर्थन करेंगे क्योंकि यह देश को एक दूसरे विभाजन की ओर ले जा रहा है।'संघ परिवार से जुड़ा एक अन्य संगठन धर्म जागरण मंच अचानक सक्रिय हो गया है और उसने एक अभियान चलाकर हिंदुओं से लव जिहाद के'खतरे' से लड़ने की अपील की है।
जहां तक लव जिहाद के जरिये हिंदू लड़कियों को मुसलमान बनाने के आरोप का संबंध है इसमें कोई दम नहीं है। मेरे एक मित्र, जो उत्तरप्रदेश में रहते हैंए ने बताया कि वे वहां लड़कियों के एक कालेज में किसी विषय पर भाषण देने गये थे। वहां पर उन्हें कालेज के एक युवा शिक्षक ने.जो हिंदू लड़कियों की रक्षा के लिए कटिबद्ध थे.बताया कि उनके इलाके में 6,000 से अधिक लड़कियां मुसलमान बन गई हैं। परंतु जब उनसे यह कहा गया कि वे उनमें से कम से कम 60 के नाम दे दें तो वे पीछे हट गये। उन्होंने कहा कि ये बात उनने सुनी थीं और इसलिए सच होंगी!
लव जिहाद के षड़यंत्र के संबंध में 15 रूपये कीमत की एक पुस्तिका भी जगह.जगह दिखलाई दे रही है। इस पुस्तिका का शीर्षक है 'हमारी महिलाओं को लव जिहाद के आतंकवाद से कैसे बचायें?'इसमें लव जिहाद के कुछ तथाकथित मामलों का वर्णन किया गया है। सभी विवरण लगभग एक से हैं। कोई मुस्लिम पुरूष स्वयं को हिंदू बताकर किसी हिंदू लड़की से प्रेम संबंध स्थापित कर लेता है। पुस्तिका में यह दावा किया गया है कि शादी हो जाने के बादए लड़कियों पर इस्लाम कुबूल करने का दबाव डाला जाता है। ऐसी लड़कियों को 'मुक्त' कराये जाने की जरूरत है।
लव जिहाद के मुद्दे पर कई बातें कही जा रही हैं परंतु इनमे से दो महत्वपूर्ण हैं। कई विश्लेषकों ने मोदी की राजनीति की तुलना हिटलर की राजनीति से की है। हिटलर ने भी जर्मनी के नागरिकों को यहूदियों का शत्रु बनाने के लिए इसी तरह की रणनीति का इस्तेमाल किया था। यहूदियों को 'आतंरिक शत्रु' बताया जाता था। हिटलर की प्रचार मशीनरी यह कहती थी कि युवा यहूदी पुरूष, जर्मन लड़कियों को बहला.फुसलाकर आर्य नस्ल की शुद्धता को प्रदूषित कर रहे हैं और उनका उद्देश्य जर्मन राष्ट्र को गुलाम बनाना है।
भारत में आर्यसमाज और हिंदू महासभा ने सन् 1920 के दशक में इसी तरह की रणनीति अपनाई थी। उस समय भी इन संस्थाओं ने हिंदू महिलाओं के सम्मान को बचाने का आह्वान करते हुए पर्चे निकाले थे जिनमें से एक का शीर्षक था 'हिन्दू औरतों की लूट'। इस दुष्प्रचार का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया था।
क्या इस दुष्प्रचार का मुकाबला करने का कोई तरीका है? एक खबर यह है कि लव जिहाद के धुआंधार प्रचार में घिरे कुछ इलाकों के मुस्लिम युवकों ने सद्भाव का वातावरण निर्मित करने के लिए शांतिमार्च निकालने का निर्णय किया है। हमें उम्मीद है कि ऐसे ढे़र सारे मार्च निकाले जायेंगे और हमारे समाज को उस पागलपन से बचाया जायेगा जिस ओर उसे ढकेला जा रहा है।
-राम पुनियानी

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-12

दोस्त हो तो दौलतराज जैसा
    मैं कृषि मंडी से बाहर हो गया, घर लौटने का मन नहीं था, संघ के लोगों द्वारा खाना फेंकने के बाद से मैं घर जाने से कतराता था, भीलवाड़ा में ही इधर-उधर भटकना, कहीं खाना, कहीं सोना, कुछ भी ठिकाना न था, अनिश्चय, अनिर्णय और अन्यमनस्क स्थिति के चलते मेरा अध्ययन प्रभावित हो गया, मैंने माणिक्यलाल वर्मा राजकीय महाविद्यालय में प्रथम वर्ष कला संकाय में प्रवेश तो लिया और साल भर छात्र लीडरशिप भी की, लेकिन एग्जाम नहीं दे पाया ,घर पर पिताजी को जब इसकी खबर मिली तो उनकी डाँट पड़ी ,कुछ गालियाँ भी, बस गनीमत यह थी कि पिटाई नहीं हुई, लेकिन इससे पढ़ाई बाधित हो गई, बाद का सारा अध्ययन स्वयंपाठी के रूप में ही संपन्न हुआ। उन विकट दिनों में मुझे अपने छोटे से कमरे में शरण दी, करेड़ा क्षेत्र की नारेली ग्राम पंचायत के रामपुरिया गाँव के निवासी दौलत राज नागोड़ा ने, वे भी आरएसएस के स्वयंसेवक थे, ऑफिसर्स ट्रेनिंग प्राप्त, संघ कार्यालय पर भी रह चुके थे, बदनोर में रहते हुए उन्होंने संघ के आदर्श विद्या मंदिर में आचार्य के नाते भी अपनी सेवाएँ दी थीं, वे बहुत ही सक्रिय स्वयंसेवक माने जाते थे, उनका बौद्धिक भी बेहद सधा हुआ होता था, एक शिक्षक की तरह वे बोलते जो समझने में आसान होता, संघ के गीत भी उन्हें खूब कंठस्थ थे, जिन्हें वे विभिन्न मौकों पर गाते थे ,उनमे लोगो को मोबलाइज करने की अदभुत क्षमता है। उन्हें भी संघ कार्य के दौरान कई प्रकार के कटु अनुभव हुए, भेदभाव और अस्पृश्यता की कड़वी अनुभूतियाँ। एक बार उन्होंने महाराजा अजमीड आदर्श विद्या मंदिर में आयोजित आरएसएस के ऑफिसर्स ट्रेनिंग कैंप (ओटीसी) के बौद्धिक सत्र में जाति उन्मूलन में संघ की भूमिका से सम्बंधित सवाल उठा दिया, जिसका कोई जवाब संघ के पदाधिकारियों से देते नहीं बना ,तत्कालीन प्रचारक महोदय ने दौलत जी को कुछ उल्टा सीधा जवाब दे दिया, मामला इतना तूल पकड़ गया कि मारपीट की नौबत आ गई, जिला प्रचारक और दौलत राज नागोड़ा गुत्थमगुत्था हो गए, दौलत जी भी ठहरे ठेठ देहाती संघर्षशील व्यक्ति। हार मानने का तो सवाल ही नहीं उठता था, उन्होंने संघ के सैंकड़ों कार्यकर्ताओं की मौजूदगी में प्रचारक जी के बाल नोच लिए और उस दिन से आरएसएस से किनारा भी कर लिया, बाद में उन्होंने एक अम्बेडकर बचत समूह बनाकर दलितों को संगठित करना शुरू किया, यह काम उन्होंने निरंतर जारी रखा, दलित आदिवासी युवाओं को कानूनी प्रशिक्षण देने और उन्हें फूले, कबीर, अम्बेडकर के मिशन से जोड़ने में लगे रहे और आज भी लगे हुए हंै। संघ से लड़ाई होने के बाद दौलत राज जी गाडरीखेड़ा में एक कमरा किराये पर ले कर इलेक्ट्रीशियन ट्रेड में आईटीआई करने लगे इस सरकारी संस्थान में भी संघियों की भरमार थी, उनको वहाँ भी उनसे संघर्ष करना पड़ा, बहुत ही कठिन परिस्थितियों में उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल की, पान की केबिन लगाकर उन्होंने अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी की। फिर प्रैक्टिस शुरू की, वहाँ भी गरीबों के मुद्दे उठाये, उनकी पैरवी की, आज भी पीडि़तों के लिए उनकी प्रतिबद्धता जग जाहिर है तो ऐसे समर्पित साथी के साथ उस छोटे से कमरे में मैं कई दिनों तक टिका, वहीं से एक अखबार निकालने की धुन मुझ पर सवार हुई, मैं अभिव्यक्ति का एक जरिया चाहता था, जिससे संघ और उसकी विचार धारा के दोगलेपन को उजागर कर सकूँ, अंततः वह जरिया पा लिया ‘दहकते अंगारे’ नामक पाक्षिक समाचार पत्र प्रारंभ करके, दौलत राज नागोड़ा तब से आज तक साथ बने हुए हैं, कई बार उन्मादी हुड़दंगी लोगों ने हमारे खिलाफ फतवे जारी किए, हमारी निंदा की गयी ,हमें अलग थलग करने के प्रयास किये गए, मगर संघी हमें दलित, पीडि़त, वंचित जनता से अलग कर पाने में सफल नहीं हुए। दलितों पीडि़तो और हाशिये के तबकों के लिए हमारी आवाज बंद होने के बजाए बुलंद ही हुई। आज दौलत राज नागोड़ा एक स्थापित वकील है, तीन बार वे आसींद बार एसोसिएशन के निर्विरोध अध्यक्ष रह चुके हैं और राजस्थान के दलित मूवमेंट का जाना पहचाना नाम है। इन दिनों वे दलित आदिवासी एवं घुमंतू अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के प्रदेश संयोजक भी हंै और वंचितों के लिए पूरी तरह से समर्पित रहते हैं।
    जिन्दगी में दोस्त तो बहुत मिले और मिलते रहते हैं, आगे भी मिलेंगे, पर विगत 25 वर्षों से दौलत जी के साथ जो वैचारिक और मिशनरी दोस्ती बनी रही, उसे मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ और अक्सर कहता हूँ कि जीवन में दोस्त हो तो दौलत राज जैसा।
बदलाव नहीं बदला लेने की इच्छा
    मैं किसी भी तरीके से प्रतिशोध लेना चाहता था, इसके लिए किसी से भी हाथ मिलाने को तैयार था, जैसा कि नीति कहती है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है, इसलिए मैं उन तमाम लोगांे से मिलने लगा जिनको आरएसएस के लोग बुरे लोग बताते थे, अब मेरे परिचय क्षेत्र में सेकुलर विधर्मी सब आने लगे, मैं आगे होकर उनसे परिचय बढ़ा रहा था, संघ में रहते हुए मेरे गिनती के मुसलमान ही परिचित थे, चूँकि मैं उन दिनों हास्य व्यंग्य के नाम पर घटिया किस्म की फूहड़ राजस्थानी कविताएँ लिखता था और उन्हें सुनाने के लिए कवि सम्मेलनों में जाता था, इसलिए जमालुद्दीन जौहर, अजीज जख्मी और एक मौलाना नौशाद आलम नामक मुसलमान मेरे जान पहचान के थे, एक और भी व्यक्ति थे वे ट्रेड यूनियन लीडर थे अलाउद्दीन बेदिल, वो भी कभी कभार शेरो शायरी करते थे, इसलिए मुलाकातें हो जाया करती थीं, इनमें से नौशाद आलम मेरी उम्र के ही थे और कविता कहानी के अलावा भी उनसे बातें होती थीं, इसलिए मैंने उनसे दोस्ती बनाने का निश्चय किया और उनसे मिलने निकल पड़ा। नौशाद आलम मूलतः बिहारी थे और मेरे निकटवर्ती गाँव भगवानपुरा में एक मस्जिद में इमामत भी करते थे और मदरसे में पढ़ाते भी थें, ग़ज़लें लिखना तो उनका शौक मात्र था, बाद के दिनों में वे गुलनगरी भीलवाड़ा की मस्जिद के इमाम बन गए, यह उन दिनों की बात है जब कि दूसरी कारसेवा भी हो चुकी थी और बाबरी मस्जिद तोड़ी जा चुकी थी, मुस्लिम मानस गुस्सा था, विशेषकर संघ परिवार के प्रति मुस्लिम युवाओं में भयंकर गुस्सा दिखलाई पड़ता था, तो उस तरह के गरमागरम माहौल में मैं एक दिन मौलाना नौशाद आलम से मिलने पहुँचा, थोड़ी झिझक तो थी, आज मैं एक मस्जिद से लगे मदरसे में बैठा था, इन मस्जिदों के तहखानों में असलहे छिपाकर रखे जाने की बातें संघ में रहते बहुत सुनी थी, इसलिए थोड़ा सा भय भी था पर जब आ ही गया तो बात करके ही वापसी होनी थी, इसलिए रुका रहा, मदरसे से फ्री होकर मौलाना साहब नमाज पढ़ने चले गए, लौटे तो बातचीत का सिलसिला चला, घंटों तक हुई गुफ्तगू का कुल जमा सार सिर्फ यह था कि हमारा दुश्मन एक ही है इसलिए मिलकर उसकी खिलाफत की जाए, सहमति बनी एक संगठन दलित युवाओं का और एक मुस्लिम यूथ का बनाने की। मैंने दलित एक्शन फोर्स बनाई जिससे दलित नौजवान जुड़ने थे और मौलाना नौशाद आलम ने मुसलमान युवाओं के लिए हैदर -ए-कर्रार इस्लामिक सेवक संघ बनाया, मकसद था आरएसएस की कारगुजारियों का पर्दाफाश करना और जरूरत पड़ने पर सीधी कार्यवाही करके जवाब देना, इन संगठनों के बारे में जगह जगह चर्चा शुरू की गई, लोग जुड़ने भी लगे लेकिन हम कुछ भी कर पाते इससे पहले ही खुफिया एजेंसियांे को इन दोनों संगठनों की भनक लग गई और सीआईडी तथा आईबी के अधिकारी और स्थानीय पुलिस हमारे पीछे पड़ गई, हमारे द्वारा नव स्थापित दोनों ही संगठन अपने जन्म के साथ ही मर गए, हम कुछ भी नहीं कर पाए लेकिन इस असफलता ने मुझे निराश और हताश नहीं किया, मेरा गुस्सा जरूर और बढ़ गया, मैंने हार मानने की जगह आरएसएस को चिढ़ाने के लिए धर्म परिवर्तन कर लेने की तरकीब सोची।
-भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित 


सोमवार, 15 सितंबर 2014

संघियों तुम्हारा मुंह काला-देखो -------------


फर्जी लघु उद्योगो के नाम पर हजारो टन
कागजो पर चल रहे 78 उद्योगो के कोयले की काला बाजारी
  बीते वर्ष सतपुड़ा थर्मल पावर स्टेशन सारनी के लिए कोयला संकट को लेकर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पाथाखेड़ा की कोयला खदानो के कोयले पर सारनी थर्मल पावर स्टेशन को कोयला आपूर्ति न करने एवं कोयला की कालाबाजारी का आरोप लगाते हुये एक बड़ा राजनैतिक ड्रामा किया था। वे एक टोकड़ी में कोयला लेकर सारनी की ओर कूच किये थे लेकिन एक साल बाद केन्द्र एवं राज्य भाजपा शासित होने के बाद भी पाथाखेड़ा की कोयला खदानो से निकलने वाला अधिकांश कोयला सारनी थर्मल पावर स्टेशन के लिए न जाकर उसे रोड़ सेल की आड़ में फर्जी उद्योगो के परमीटो पर महंगे दामों में बेचा जा रहा है। मजेदार बात तो यह है कि अधिकांश भाजपा से जुड़े कोल टं्रासपोर्टर ही अब रोड़ सेल की कालाबाजारी का आरोप लगाने लगे है। काली माई ट्रक ओनर्स नामक संस्था ने जिला कलैक्टर बैतूल से लेकर पुलिस अधिक्षक एवं कोल सेल्स आफिसर वेस्टर्न कोल फिल्ड लिमीटेड नागपुर को भेजे शिकायती पत्र में आरोप लगाया है कि मध्यप्रदेश लघु उद्योग के नाम पर जारी कोयले के परमीट पर प्राप्त कोयले की कालाबाजारी हो रही है। कोल इंडिया को प्रति माह दो करोड़ रूपये की कोयले की आर्थिक क्षति के पीछे कारण बताते हुये ट्रक ओनर्स यूनियन के अध्यक्ष शिवनाथ सिंह का आरोप है कि लघु उद्योग का कोयला तवा वन , शोभापुर, तथा सारनी मांइस से रोड सेल के नाम पर जिन उद्योगो के नाम पर बाहर निकलता है उसकी शोभापुर काली मांई से फर्जी बिल्टी तैयार करके उसे खण्डवा, मण्डीदीप, भोपाल, इन्दौर, सीहोर, में नीजी उद्योगो को बेच कर कोयला माफिया करोड़ो रूपैया का मुनाफा कमा कर सेल टैक्स की भी चोरी कर रहा है। पड़ौसी राज्य महाराष्ट्र के नागपुर स्थित वेस्टर्न कोल फिल्ड के मुख्यालय नागपुर से लगी चन्द्रपुर जिले की कोयला खदानो से निकलने वाले कोयले की कालाबाजारी से सेल टैक्स की क्षति के मामलें में चन्द्रपुर जिला कलैक्टर ने सख्ती से कार्रवाई करके हडकम्प मचा दी है। चन्द्रपुर जिले की 34 कोयला खदानो से निकलने वाले कोयले की गुजरात तक हो रही कालाबाजारी की शिकायत चन्द्रपुर जिले के काग्रेंस नेता नन्दू नागरकर ने की थी। चन्द्रपुर कलैक्टर श्री दीपक महसेकर ने टीपी परमीट को ही कानून की नज़र में अपराध बताते हुये स्वंय भी कार्रवाई की एवं पुलिस तथा सेल टैक्स विभाग को भी कार्रवाई करने के निर्देश जारी किये। जिला उद्योग केन्द्र एवं राज्य लद्यु उद्योग मध्यप्रदेश , छत्तिसगढ़ द्वारा एक हजार परमीट जारी किये गये है जिन पर हजारो मैट्रिक टन कोयला प्रति दिन ब्लेक मार्केटिंग में चला जाता है। मध्यप्रदेश के सेल टैक्स कमिश्रर को प्रेषित शिकायत के अनुसार देश के माडल राज्य गुजरात की एक कंपनी कोयला का परमीट जारी किया गया है लेकिन कोयला गुजरात के बदले मध्यप्रदेश में ही मंहगे दामो पर बेचा जा रहा है। मध्यप्रदेश लघु उद्योग ने सीधे परमीट का कोयला उद्योगो को न देकर उसके लिए बकायदा नियम विरूद्ध एक बिचौलिये को अधिकृत कर दिया है। मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम भोपाल के पत्र दिनांक 23 8 2014 के अनुसार संजय कुमार वर्मा (रघुवंशी) आत्मज गणेश प्रसाद वर्मा को 15 सौ मैट्रिक टन बिक्स कोयले के परमीट के लिए अधिकृत किया है जो कि 78 उद्योगो के नाम पर आवंटित किया गया है। उक्त कोयला शोभापुर खदान से दिया जाना है। श्री बीएन तिवारी जनरल मैनेजर बीडीसी द्वारा आदेशित पत्र में लिखा गया है कि उक्त 15 सौ मैट्रिक टन कोयला शोभापुर , तवा टू एवं तवा खदान से दिया जाना है। यहां पर सूचि दिनांक शोभापुर खदान से मिक्स क्वालिटी का कोयला जिन उद्योगो के नाम पर आवंटित है उनके नाम इस प्रकार है:-
1.गोयल इंडस्ट्रिज होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
2. गायत्री कोंटिंग इंडस्ट्रीज प्रायवेट लिमीटेड बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन,
3.गुप्ता शाप इंडस्ट्रीज खिलचीपुर राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
4. गणेश एग्रो इंडस्ट्रीज राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
5.गुरू इंडस्ट्रीज राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
6. हनु मान उद्योग बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
7. हरिहर शाप मिल होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
8. हीरो इंटर प्राइजेस होशंगाबाद 17 मैट्रिक टन
9. इंडिया इंजीनिरींग होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
10. इव्स ड्रग्स इंडिया प्रायवेट लिमीटेड प्रीथमपुर 10 मैट्रिक टन
11. जय भवानी ड्रिट्रीजेन्ट शाप इंडस्ट्रीज शाजापुर 14 मैट्रिक टन
12. जीवन उद्योग बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
13. ज्योति ट्रिम्बर इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
14. जीवन शीजिंग वक्र्स बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
15. जानू उद्योग होशंगाबाद 17 मैट्रिक टन
16. जुगनू केलसिनटन छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
17. जे के उद्योग छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
18. कैलाश टैक्स टाइल इंडस्ट्रीज बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
19. के एस आइल मुरैना 12 मैट्रिक टन
20. किशन इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 14 मैट्रिक टन
21. खान मेन्यूफेक्चर होशंगाबाद 17 मैट्रिक टन
22. करिश्मा एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
23. किशन एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
24. किशना एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
25. किशन एग्रो यंत्र शाजापुर 12 मैट्रिक टन
26. कान्हा शाफ फैक्ट्ररी इन्दौर 15 मैट्रिक टन
27. ख्यात्री फूडस रायसेन 13 मैट्रिक टन
28. महाराजा प्रोसेसर बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
29. महेन्द्रा एण्ड महेन्द्रा शीजिंग मिल्स बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
30.मैक्सो हेल्थ केयर प्रायवेट लिमीटेड मण्डीदीप 17 मैट्रिक टन
31.मालवा टायर रिमोल्ड शाजापुर 10 मैट्रिक टन,
32. मां काली एग्रो इंडस्ट्रीज राजगढ 10 मैट्रिक टन
33. मालवा टायर रिमोल्डींग धोबी चौराहा शाजापुर 13 मैट्रिक टन
34. मारवाड़ी एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
35. मंगलम् केमिक्स मण्डीदीप 15 मैट्रिक टन
36.मध्यप्रदेश एग्रो फूडस इंडस्ट्रीज लिमीटेड मण्डीदीप 10 मैट्रिक टन
37. महाकाल उद्योग उज्जैन 15 मैट्रिक टन
38. मध्य भारत फोसाटे लिमीटेड यूनिट 2 झाबुआ 14 मैट्रिक टन
39. एमपी एग्रोटेनिक मण्डीदीप 10 मैट्रिक टन,
40. एमपी बोर्ड एवं पेपर मिल प्राय. लिमी. विदिशा 18 मैट्रिक टन
41. महाकाली फूडस लिमीटेड देवास 18 मैट्रिक टन
42. एम पी एग्रो न्यूचरी फूडस लिमी. इन्दौर 10 मैट्रिक टन
43 मध्य भारत प्रोसेसट रायसेन 10 मैट्रिक टन
44. मनीष एग्रोटेक लिमी. प्रीथमपुर 18 मैट्रिक टन
45. नवभारत पावरलूम बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
46. नोशलर इंटरनेशनल प्राय. लिमी. मण्डीदीप 13 मैट्रिक टन
47. नाकोडा एग्रो इंडस्ट्रीज राजगढ़ 10 मैट्रिक टन,
48. नील कमल प्रोसेसकार बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
49. सुधीर इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
50. श्री कुंज बिहारी प्रोसेस बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
51.श्री नर्मदा प्रोजेक्ट होशंगाबाद 15 मैट्रिक टन
52. सम्यक फ्रेबरीक प्राय. लिमी. बुरहानपुर 10 मैटिक टन
53. सूरजभान आइल प्राय. लिमी. मुरैना 10 मैट्रिक टन
54. सिंग एग्रो इंडस्ट्रीज मालवीय गंज इटारसी होशंगाबाद 10 मैट्रिक टन
55.श्रीजी इंडस्ट्रीज सोहागपुर बैतूल 13 मैट्रिक टन
56. शिव इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
57. श्री कृष्णा इंडस्ट्रीज उज्जैन 15 मैट्रिक टन
58. सम्राट प्रोसेसर बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
59. एस एम टैक्स टाइल वक्र्स बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
60. संघर्ष एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
61. सूरज कोल कंटीना इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
62. श्री ईश्वर इंडस्ट्रीज प्राय. लिमी. छिन्दवाड़ा 11 मैट्रिक टन
63. शिवम इंडस्ट्रीज बैतूल 13 मैट्रिक टन
64. श्रीजी कारर्पोरेशन इन्दौर 10 मैट्रिक टन
65. सर्वोत्तम वेजीटेबल रिफाइनरी प्राय. लिमी. इन्दौर 10 मैट्रिक टन
66. साई शक्ति एग्रोटे धार 10 मैट्रिक टन
67. श्री पंकज इंडस्ट्रीज बैतूल 13 मैट्रिक टन
68. तिरूपति एग्रो प्रोसेसस खरगोन 14 मैट्रिक टन
69. तिरूमला सिजिंग मिल बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
70. टरबो टायर छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
71. यूनीटी पल्प पेपरर्स होशंगाबाद 11 मैट्रिक टन
72. यूनिवर्सल इंडस्ट्रीज होंशंगाबाद 18 मैट्रिक टन
73. विश्वकर्मा एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 11 मैट्रिक टन
74. विश्व मंगलम इंटरप्राइजेस झाबुआ 10 मैट्रिक टन
75. वानटेक फूडस इंडिस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 12 मैट्रिक टन
76. व्येंकटेश न्यूचरल एक्साट्रेक छिन्दवाड़ा 12 मैट्रिक टन
77. वंशीका इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
78. योगेश इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 14 मैट्रिक टन
कोयला का आवंटन
बाक्स में
पाथााखेड़ा में एक बार फिर कोयला माफिया के रूप में पुन: रक्त संघर्ष की स्थिति
दो कौड़ी का कोयला दलाल बना कोल माफिया, बनाई करोड़ो की संपत्ति का मालिक
बैतूल, मध्यप्रदेश लघु उद्योग भोपाल द्वारा कुछ माह पूर्व तक कोयले के परमीट और आंवटन का काम सीधे फम्र्स को जाता था उसकी एक प्रति सेल्स आफिसर को आती थी। अब कोयला आवंटन एवं परमीट तथा टीपी परमीट का पूरा काम बिचौलियें के माध्यम से होने लगा है। छै माह पूर्व झोपड़ी में रहने वाले छिन्दवाड़ा जिले की कोयला खदानो में कोयले की दलाली का काम कर रहे संजय की किस्मत अचानक पलटी खाई और वह झोपड़ी से महलो में जा पहुंचा। भोपाल के किसी बलवीर नामक व्यक्ति के लिए काम करने वाला संजय आज करोड़ो की बेनामी संपत्ति का मालिक बन गया है। सोचो कल तक जिसके पास ढंग की मोटर साइकिल नहीं थी आज वह 15 लाख की गाडिय़ों में घुम कैसे रहा है। पर्दे के पीछे की कहानी कुछ इस प्रकार है कि कोयला खदानो से स्ट्रीक एवं सिलेक कोयला जिन लघु उद्योगो के नाम पर जारी किया जाता है उन्हे उक्त कोयला 25 सौ रूपये प्रति मैट्रिक टन के हिसाब से दिया जाता है लेकिन उसकी यदि निलामी की जाये तो वहीं कोयला 5500 सौ के हिसाब से बिकता है। भोपाल - मण्डीदीप, इन्दौर, प्रीथमपुर, देवास सीहोर के बाजार में उक्त कोयले की पहुंच कीमत 9 हजार रूपये प्रति मैट्रिक टन तक हो जाती है। पाथाखेड़ा का खेल देखिये यहां पर दो भाईयों की जुगल जोड़ी हमेशा सुर्खियों में रही है। संतोष - मंतोष - संजय - विजय के बाद अब अजय और संजय की जोड़ी सुर्खियों में है। पीसीआर कंपनी से निकाले गये अजय के हाथ उस समय लाटरी लग गई जब उसका छोटा भाई भोपाल के किसी बलवीर सिंह नामक बिचौलियें की मदद से मध्यप्रदेश लघु उद्योग के अधिकारियों को मोटी रकम देकर सीधे 15 सौ मैट्रिक स्ट्रीम एवं 15 सौ टन स्लेक कोयले की सप्लाई के आर्डर अपने नामजद ले आया। नियम यह कहता है कि जिसके नाम का परमीट है वह या उसका कोई अधिकृत व्यक्ति ही उक्त कोयले को पा सकता है। पूरा कोयला आवंटन किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर नहीं जारी किया जा सकता। भोपाल के बीएन तिवारी ने सारे नियम कानून कायदे को ताक में रख कर बैतूल जिले के पाथाखेड़ा कोयलाचंल में बिहार की तर्ज पर कोल माफिया को जन्म दे दिया। लगभग साढ़े तीन दशक पहले पाथाखेड़ा में विश्राम सिंह नामक एक कोल माफिया का उदय हुआ था उस समय काफी रक्त संघर्ष होने के बाद उसके पर कतरने को जिला प्रशासन विवश हुआ लेकिन एक बार फिर उसी कोयला माफिया के रक्त बीज को जिंदा करके कोयलाचंल में वर्ग संघर्ष , रक्त संघर्ष को बढ़ावा देने की ओर कदम बढ़ा दिया गया है।
बाक्स
मोटी रकम का मोटा खेल
एन्ट्री का खेल सब कुछ हो जाए मेल
बैतूल, पाथाखेड़ा की कोयला खदानो से प्रति दिन रोड सेल का कोयला निर्घारित है लेकिन यहां पर पाथाखेड़ा की कोयला खदान के सब एरिया मैनेजर से लेकर बेरियर तक लम्बा चौड़ा खेल रहा है। नियम यह है कि कोयला खदान से परमीट धारक को बिना छंटाई के कोयला लेना है लेकिन 10 टन कोयला का परमीट धारक और 40 टन कोयले का परमीट धारक मजूदर लगा कर कोयले की प्रतिबंधित खदान एरिया में छटाई करके कोयला भरता है। ओव्हर लोड के नाम पर कोयला धारक 10 टन के बदले 15 टन और कभी - कभी तो 28 टन तक भर लेता है। एरिया मैनेजर एवं पूरे स्टाफ को एक परमीट धारक प्रतिदिन सौ रूपये तथा सेल्स विभाग को प्रति टन दो से तीन रूपैया देता है। एक नम्बर की गाड़ी एक ही बार में कोयला चेक पोस्ट से आती है और जाती है लेकिन बेरियर वालो की सेंटिग की वजह से एक नम्बर की गाड़ी समयावधि के पूर्व अपने वाहन का क्रासिंग 18 किमी के पूर्व करके पुन: उसी परमीट पर दुबारा कोयला प्राप्त कर लेता है। इस काम में बेरियर , वीटो मीटर एवं सेल्स आफिसर तथा सब एरिया मैनेजर की टं्रासपोर्टर एवं परमीट धारक से सीधी मिली भगत होती है। जानकार सूत्रो का दावा है कि कोयला खदानो से परमीट पर कोयला 22 सौ रूपये प्रति मैटिक टन मिलता है लेकिन कोयला खदान क्षेत्र से काली माई आने के बाद वही कोयला 6 हजार 500 सौ से 7 हजार रूपये प्रति मैट्रिक टन हो जाता है। स्लेक कोयला 22 सौ रूपये तथा स्ट्रीम कोयला 24 सौ रूपये प्रति मैट्रिक टन परमीट धारक को मिलता है। कोयला की भराई के पहले ही छटाई हो जाने से कोयला का स्तर काफी अच्छा हो जाता है। सी ग्रेड का कोयला छंटाई के बाद ए ग्रेड का हो जाता है। एक दिन में एक चौपहिया से लेकर बारह पहिया वाहन में कोयला की भराई नियमानुसार दस मैट्रिक टन होना चाहिए लेकिन एक ट्रक में कम से कम 10 और अधिक से अधिक 28 टन तक कोयला भरा जाता है। एक समय में एक ट्रांसपोर्टर ओव्हर लोड के लिए पुलिस और अन्य खर्च के लिए कालीमाई पर तीन सौ रूपये एन्ट्री देता है। क्रासिंग के काम का रूपैया अलग होता है जो कि कोई लालू भाई नामक व्यक्ति द्वारा पुलिस से लेकर विधायक तक के नाम पर वसूला जाता है। जानकार सूत्रो का यहां तक कहना है कि कालीमाई पर इस समय संजय सिंह रघुवंशी - अजय सिंह रघुवंशी नामक दोनो भाई प्रति दिन शोभापुर खदान से 15 सौ मैट्रिक टन कोयला आवंटित किया जाता है। इसी तरह तवा टू खदान से 71 परमीट धारको को 15 सौ मैट्रिक स्लेक कोयला आवंटित किया जाता है। इसी कड़ी में तवा खदान से 56 परमीट धारको को 12 सौ मैट्रिक टन स्ट्रीम कोयला आवंटित किया जाता है। जानकार सूत्रो का कहना है कि 42 सौ मैट्रिक टन कोयला प्रतिदिन मध्यप्रदेश लघु उद्योग निगम के पत्रानुसार परमीट धारको को दिया जाता है। मध्यप्रदेश में सबसे अधिक परमीट पर कोयला पड़ौसी होशंगाबाद जिले के 13 लघु उद्योगो को दिया जाता है। दुसरे नम्बर पर पड़ौसी छिन्दवाड़ा जिला आता है जिसके 10 लघु उद्योगो को कोयला दिया जाता है जबकि छिन्दवाड़ा जिले से कोयला दुसरे जिले के लघु उद्योगो को दिया जाता है। तीसरे नम्बर पर मध्यप्रदेश का बुरहानपुर जिला आता है जहां पर 9 लघु उद्योगो को स्ट्रीम कोयला दिया जाता है।
तवा टू खदान से जारी स्ट्रीम कोयला के परमीट धारको के नाम
अग्या आटो लिमीटेड युनिट टू धार 11 मैट्रिक टन
भारत टायर्स शाजापुर 10 मैट्रिक टन
कॉक्स इंडिया लिमीटेड छतरपुर 17 मैट्रिक टन
किसान इंडिस्ट्रीज होशंगाबाद 19 मैट्रिक टन
खान मेन्यूफेचर होशंगाबाद 21 मैट्रिक टन
कृष्णा एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 14 मैट्रिक टन
किसान एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 15 मैट्रिक टन
किसान एग्रो यंत्र शाजापुर 16 मैट्रिक टन
कान्हा शो फैक्ट्ररी इन्दौर 20 मैट्रिक टन
ख्याति फूडस रायसेन 18 मैट्रिक टन
महाराजा प्रोसेसर बुरहानपुर 16 मैट्रिक टन
महेन्द्र एण्ड महेन्द्र शाइजिंग मिल्स बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
मैक्सन हेल्थ केयर प्रा. लि. मण्डीदीप रायसेन 20 मैट्रिक टन
मालवा टायर रिमोल्ड शाजापुर 10 मैट्रिक टन
मां काली एग्रो इंडस्ट्रीज ब्यावरा राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
मालवा टायर रिमोल्डिींग धोबी चौराहा शाजापुर 18मैट्रिक टन
मारवाड़ी एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 15 मैट्रिक टन
मंगलम सेरामिक्स मण्डीदीप रायसेन 19 मैट्रिक टन
मध्यप्रदेश एग्रो फूडस इंडस्ट्रीज लिमीटेड मण्डीदीप 11 मैट्रिक टन
महाकाल उद्योग उज्जैन 20 मैट्रिक टन
मध्यभारत फोसफेट प्रा.लि. युनिट टू झाबुआ 19 मैट्रिक टन
एम पी एग्रोटोनिक्स मण्डीदीप 11 मैट्रिक टन
एम पी बोर्ड एण्ड पेपर मिल प्रा.लि. विदिशा 20 मैट्रिक टन
महाकाली फूडस प्रा.लि. देवास 20 मैट्रिक टन
रूसोमा लेबोस्ट्रीज प्रा.लि. इन्दौर 10 मैट्रिक टन
श्रीनिवास बोर्ड एण्ड पेपर प्रा.लि. देवास 15 मैट्रिक टन
साहू टायर रिमोल्डींग राजगढ़ 11 मैट्रिक टन
संदीप एग्रो राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
शीतल डिटर्जेन्ट राजगढ़ 11 मैट्रिक टन
शिवशक्ति पेपर मिल्स लिमी. विदिशा 17 मैट्रिक टन
स्वास्तीक एग्रो पार्क होशंगाबाद 14 मैट्रिक टन
सुधीर इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 13 मैट्रिक टन
श्री कुंज बिहारी प्रोसेस बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
श्री नर्मदा प्रोजेक्ट होशंगाबाद 19 मैट्रिक टन
सम्यक फेब्रिक्स प्रा.लि. बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
सूरजभान आइल्स प्रा. लि. मुरैना 12 मैट्रिक टन
सिंग एग्रो इंडस्ट्रीज मालवीय गंज इटारसी होशंगाबाद 10 मैट्रिक टन
श्री जी इंडस्ट्रीज सोहागपुर बैतूल 17 मैट्रिक टन
शिव इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 13 मैट्रिक टन
श्री कृष्णा इंडस्ट्रीज उज्जैन 19 मैट्रिक टन
सम्राट प्रोसेसर बुरहानपुर 11 मैट्रिक टन
एस.एम. टेक्सटाइल वक्र्स बुरहानपुर 16 मैट्रिक टन
संघर्ष एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 14 मैट्रिक टन
सूरज केलीसीनेशन इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
एस. ईश्वार इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 11 मैट्रिक टन
श्री नकोडा केमिकल्स छिन्दवाड़ा 13 मैट्रिक टन
शिवम इंडस्ट्रीज बैतूल 17 मैट्रिक टन
शोमी इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
श्रीजी कारपोरेशन इन्दौर 10 मैट्रिक टन
सर्वोत्तम वेजिटेबल आइल रिफाइनरी इन्दौर 10 मैट्रिक टन
साई शक्ति एग्रोटेक धार 10 मैट्रिक टन
श्री पंकज इंडस्ट्रीज बैतूल 17 मैट्रिक टन
तिरूपति एग्रो प्रोसेसर्स खरगोन 18 मैट्रिक टन
तिरूमला साइजींग मिल्स बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
टरबो टायर्स छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
युनिटी पल्प पेपर्स होशंगाबाद 15 मैट्रिक टन
युनिवर्सल इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 19 मैट्रिक टन
विश्वकर्मा एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 15 मैट्रिक टन
विश्वमंगल इंटर प्राईजेस झाबुआ 10 मैट्रिक टन
वंकटेश फूडस इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 16 मैट्रिक टन
वेंकटेश नेच्यूरल एक्सटे्रक्ट प्रा. लिमी. 16 मैट्रिक टन
वंशिका इंडस्ट्रीज छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
योगेश इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 18 मैट्रिक टन
गणेश एग्रो इंडस्ट्रीज राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
गुरू शोप इंडस्ट्रीज राजगढ़ 10 मैट्रिक टन
हनुमान उद्योग बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
हरि हर सॉ मिल होशंगाबाद 14 मैट्रिक टन
हीरो इंटरप्राइस होशंगाबाद 20 मैट्रिक टन
इंडिया इंजीनियरींग होशंगाबाद 14 मैट्रिक टन
आइव्स ड्रग्स इंडिया प्रा. लि. पीथमपुर 10 मैट्रिक टन
जय भवानी डिटर्जेन्ट शोप इंडस्ट्रीज शाजापुर 18 मैट्रिक टन
जीवन उद्योग बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
ज्योति टिम्बर इंडस्ट्रीज होशंगाबाद 15 मैट्रिक टन
जीवन शाइजिंग वक्र्स बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
जानू उद्योग होशंगाबाद 20 मैट्रिक टन
जुगनू केल्सीनेशन छिन्दवाड़ा 10 मैट्रिक टन
जे.के. उद्योग छिन्दवाड़ा 12 मैट्रिक टन
कैलाश टैक्सटाईल्स इंडस्ट्रीज बुरहानपुर 10 मैट्रिक टन
के. एस. ऑईल मुरैना 17 मैट्रिक टन
करिश्मा एग्रो इंडस्ट्रीज शाजापुर 15 मैट्रिक टन
लगातार प्रकाशित
---------राम किशोर पंवार  बैतूल

रविवार, 14 सितंबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-11

देशी तालिबानियों से संघर्ष की शुरुआत
    अब मैं वे सब काम करने को तत्पर था, जो तालिबान के इस भारतीय संस्करण को चोट पहुँचा सके, इसकी शुरुआत मैंने छात्र राजनीति में विद्रोही कदम उठाने के जरिये की, भीलवाड़ा कॉलेज में आरएसएस के विद्यार्थी संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से बगावत करके एक नया छात्र संगठन बनाया गया, जिसे विद्यार्थी अधिकार रक्षक संघ (वार्स) नाम दिया गया, संघ के ही एक अन्य बगावती स्वयंसेवक बृजराज कृष्ण उपाध्याय इसका नेतृत्व कर रहे थे, मैं इसके प्रारंभिक काल का संगठन मंत्री बना, हमने संघी छात्र संगठन के पाँव उखाड़ना चालू कर दिया, जगह-जगह पर वार्स की इकाइयाँ स्थापित होने लगीं, लोग संघ की मानसिक गुलामी से निजात पाने के लिए वार्स को विकल्प के रूप में देखने लगे, हमारे नेता बृजराज में गजब की हिम्मत और लगन रही, अद्भुत जीवट वाला व्यक्ति, उस बन्दे पर आरएसएस के लोगों ने बहुत जुल्म ढाए अलग छात्र संगठन बनाना संघ को बर्दाश्त नहीं था, इसलिए आरएसएस और एबीवीपी के कार्यकर्ताओं द्वारा उन पर कई बार जानलेवा हमले किए गए, एक बार तो मांडलगढ़़ इलाके में त्रिवेणी चैराहे के पास उनके साथ भयंकर मारपीट की गयी, सिर में पेचकश घुसेड़ दिया गया और फिर मरा समझ कर छोड़कर भाग गए, यह हमला इसलिए किया गया क्योंकि वार्स के साथी संघ से जुड़े लोगों के आपराधिक कृत्यों को उजागर कर रहे थे
 दरअसल उन दिनों संघ के अल्पकालिक प्रचारक और विस्तारक किस्म के जो लोग थे, वे इस खनन क्षेत्र में अवैध एक्सप्लोजिव तथा हथकड़ी शराब बेचने वालों को संरक्षण दे रहे थे, ऐसा हमें मालूम हुआ था, यह भी पता चला कि कुछ माननीय भाई साहब ऐसे लोगों से वसूली भी करते रहे थे, बस इन्हीं बातों के बारे में सार्वजनिक रूप से बोलना हमें भारी पड़ गया, निशाने पर पूरा संगठन ही था, मगर हत्थे सिर्फ बृजराज कृष्ण उपाध्याय ही चढ़े, सो उन्हें इतना मारा गया कि वे राष्ट्रभक्तों के हाथों शहीद होते-होते बचे वैसे भी मांडलगढ़    सेंड स्टोन माइनिंग का इलाका है जहाँ पर किसी की भी जान लेना खनन माफिया के दाहिने हाथ का खेल रहा है, ऐसे इलाके में उपाध्याय को मारने की साजिश की गई थी, लेकिंन किसी प्रकार से उनकी जान बचा ली गयी, आसपास के लोगों ने गंभीर रूप से घायल उपाध्याय को समय रहते उपचार के लिए महात्मा गांधी चिकित्सालय भीलवाड़ा पहुँचा दिया, जहाँ वे लम्बे उपचार के पश्चात ठीक हो पाए। बात सिर्फ संघ के कथित अनुशासित स्वयंसेवकों के धतकरमों को उजागर करने मात्र की ही नहीं थी बल्कि चरित्र, शील और संस्कार का दंभ भरने वाले उस छात्र संगठन की कारगुजारियों के पर्दाफाश की भी थी, जिन्होंने अपनी ही छात्रा इकाई की पदाधिकारियों के शील को भंग करने जैसे पाप कर्म करने से भी गुरेज नहीं किया था, हालत इतने संगीन थे कि उनमें से एक का गर्भपात करवा कर भ्रूण हत्या जैसी अधम कार्यवाही तक को अंजाम दिया गया था। इस फर्जी शील, चरित्र और संस्कार पर हम नहीं बोलते, ऐसा तो हो नहीं सकता था, हमने जब उनकी पोल खोलनी शुरू की तो वे अपने चिर परिचित हथियार डंडे के साथ हम लोगों से विचार विमर्श करने आ पहुँचे, संघ के लोग ज्यादातर मौकों पर तर्क के स्थान पर लट्ठ का उपयोग करते हैं, उन्हें यही सिखाया गया है कि लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं खैर, संघी आकाओं के इशारे पर शिक्षा के मंदिरों को गुंडागर्दी के अड्डे बनाने की हर कोशिश को विफल करने के लिए वार्स बेहद मजबूती से कई साल तक भीलवाड़ा में सक्रिय रहा,कई कॉलेजों में कई बार छात्र संघ चुनाव में हमारे अभ्यर्थी जीते, हमने न केवल भाजपाई संघी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् को, बल्कि कांग्रेसी छात्र संगठन एनएसयूआई को भी कॉलेज परिसर से खदेड़    दिया। वार्स एक वैकल्पिक छात्र संगठन के रूप में उभरा जिसने लम्बे समय तक केवल छात्र समस्याओं को ही नहीं उठाया बल्कि शहर और जिले की विभिन्न जन समस्याओं को भी प्रभावी तरीके से उठाया तथा युवाओं को जातिवादी और सांप्रदायिक छात्र संगठनों से भी दूर रखा।
ये कौन से ब्राह्मण हुए ?
    संघ की वजह से अम्बेडकर छात्रावास छूट गया था और अब संघ कार्यालय भी, शहर में रहने का नया ठिकाना ढूँढना पड़ा, मेरे एक परिचित संत चैतन्य शरण शास्त्री, जो स्वयं को अटल बिहारी वाजपेयी का निजी सहायक बताते थे, वे उन दिनों कृषि उपज मंडी भीलवाडा में स्थित शिव हनुमान मंदिर पर काबिज थे, मैंने उनके साथ रहना शुरू किया, हालाँकि थे तो वे भी घनघोर हिन्दुत्ववादी लेकिन संघ से थोड़े    रूठे हुए भी थे, शायद उन्हें किसी यात्रा के दौरान पूरी तवज्जोह नहीं दी गयी थी, किसी जूनियर संत को ज्यादा भाव मिल गया, इसलिए वे खफा हो गए, हम दोनों ही खफा-खफा हिंदूवादी एक हो गए और एक साथ रहने लगे। मैं दिन में छात्र राजनीति करता और रात्रि विश्राम के लिए शास्त्री जी के पास मंदिर में रुक जाता, बेहद कठिन दिन थे, कई बार जेब में कुछ भी नहीं होता था, भूखे रहना पड़ता, ऐसे भी मौके आए जब किसी पार्क में ही रात गुजारनी पड़ी भूखे प्यासे ऊपर से एंग्री यंगमैन की भूमिका जहाँ भी जब भी मौका मिलता, आरएसएस के खिलाफ बोलता और लिखता रहता। उन दिनों कोई मुझे ज्यादा भाव तो नहीं देता था पर मेरा अभियान जारी रहता, लोग मुझे आदिविद्रोही समझने लगे। संघ की ओर से उपेक्षा का रवैय्या था ना तो वे मेरी बातों पर कुछ बोलते और ना ही प्रतिवाद करते, एकठंडी सी खामोशी थी उनकी ओर से, इससे मैं और भी चिढ गया। संत शास्त्री भी कभी कभार मुझे टोकाटाकी करते थे कि इतना उन लोगों के खिलाफ मत बोलो, तुम उन लोगों को जानते नहीं हो अभी तक, संघ के लोग बोरे में भर कर पीटेंगे और रोने भी नहीं देंगे। पर मैंने कभी उनकी बातों की परवाह नहीं की
वैसे तो चैतन्य शरण शास्त्री जी अच्छे इन्सान थे मगर थे पूरे जातिवादी। एक बार मेरा उनसे जबरदस्त विवाद हो गया, हुआ यह कि शास्त्री और मैं गांधी नगर में गणेश मंदिर के पास किसी बिहारी उद्योगपति के घर पर शाम का भोजन करने गए, संभवतः उन्होंने किन्हीं धार्मिक कारणों से ब्राह्मणों को भोजन के लिए आमंत्रित किया था, शास्त्री जी मुझे भी साथ ले गए, मुझे कुछ अधिक मालूम न था, सिर्फ इतनी सी जानकारी थी कि आज शाम का भोजन किसी करोड़पति बिहारी बनिए के घर पर है। इस प्रकार घर-घर जाकर भोजन करने की आदत संघ में सक्रियता के दौरान पड़ ही चुकी थी, इसलिए कुछ भी अजीब नहीं लगा, संघ कार्यालय प्रमुख रहते हुए मैं अक्सर प्रचारकों के साथ संघ के विभिन्न स्वयंसेवकांे के यहाँ खाने के लिए जाता था और वह भी कथित उच्च जाति के लोगों के यहाँ, सो बिना किसी संकोच के मैं शास्त्री जी के साथ चल पड़ा। भोजन के दौरान यजमान (दरअसल मेजबान) परिवार ने मेरा नाम पूछा, मैंने जवाब दिया-भंवर मेघवंशी, वे लोग बिहार से थे, राजस्थान की जातियों के बारे में ज्यादा परिचित नहीं थे, इसलिए और पूँछ बैठे कि-ये कौन से ब्राह्मण हुए? मैंने मुँह खोला-मैं अनुसूचित, मेरा जवाब पूरा होता उससे पहले ही शास्त्री जी बोल पड़े-ये क्षत्रिय मेघवंशी ब्राह्मण हैं। बात वहीं खत्म हो गई, लेकिन जात छिपाने की पीड़ा ने मेरे भोजन का स्वाद कसैला कर दिया और शास्त्री भी खफा हो गए कि मैंने उन्हें क्यों बताने की कोशिश की कि मैं अनुसूचित जाति से हूँ। हमारी जमकर बहस हो गई मैंने उन पर झूठ बोलकर धार्मिक लोगों की आस्था को ठेस पहँुचाने का आरोप लगा दिया तो उन्होंने भी आखिर कह ही दिया कि ओछी जाति के लोग ओछी बुद्धि के ही होते हैं। मैं तो तुम्हे ब्राह्मण बनाने की कोशिश कर रहा हूँ और तुम उसी गन्दी नाली के कीड़े बने रहना चाहते हो, मैं गुस्से के मारे काँपने लगा, जी हुआ कि इस ढोंगी की जमकर धुनाई कर दूँ पर कर नहीं पाया, मगर उस पर चिल्लाया, मैं भी कम नहीं मैंने भी कह दिया तुम भी जन्मजात भिखमंगे ही तो हो, तुमने कौन सी कमाई की आज तक मेहनत करके, तो शास्त्री ने मुझे नीच जाति का प्रमाण पत्र जारी कर दिया और मैंने उन्हें भिखारी घोषित कर दिया अब साथ रह पाने का सवाल ही नहीं था। मैं मंदिर से निकल गया, मेरे साथ रहने से उनके ब्राह्मणत्व पर दुष्प्रभाव पड़ सकता था और कर्मकांड से होने वाली उनकी आय प्रभावित हो सकती थी, वहीं मैं भी अगर ब्राहमणत्व की ओर अग्रसर रहता तो मेरी भी संघ से लड़ाई प्रभावित हो सकती थी, इसलिए हमारी राहें जुदा हो गईं, न मैं ब्राह्मण बन सका और न ही वे इन्सान बनने को राजी हुए, बाद में हम कभी नहीं मिले।

-भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

शनिवार, 13 सितंबर 2014

मोदी अपने मनशूर पर वापिस: कुलदीप नय्यर

   इन्तिखाबी मुहिम के दौरान नरेन्द्र मोदी भारतीय जनता पार्टी को जो हिन्दुत्व नवाज तंजीम है अपनी माँ करार देते हुए आबदीदह हो गए तो मैंने समझा कि गहरे जजबात का इजहार है और जब हिन्दुस्तान का वजीर आजम होने के बाद इन्होंने कहा कि वह तरक्की की राह पर तमाम 125 करोड़ लोगों को अपने साथ लेकर चलेंगे तो मुझे इस पर यकीन आ गया था।
    लेकिन ज्यों-ज्यों पार्टी अपने प्रोग्राम सामने ला रही है तो मुझे लगता है कि आर0एस0एस0 की वजह कर्दा तफरीकी हिकमते अमली की पर्दा पोशी है। मोदी खुद को गैर मुतास्सिब के तौर पर पेश करते हैं जबकि बी0जे0पी0 मय आर0एस0एस0 तक्शीरियत के तख्फ़ीक के इक्दामात करती  है। आर0एस0एस0 पहले ही अपने मोतबर अफराद को मुख्तलिफ कमीशनों की रुक्नियत दे रही है और कलीदी ओहदों पर बैठा रही है। इस से ताल्लुक रखने वाले नवजवानों को कम दर्जे के कामों के लिए मुकर्रर किया जाता है। चूँकि ब्यूरो क्रेसी का झुकाव हवा की रुख की तरफ होता है, बी0जे0पी0 और आर0एस0एस0 को अपने एजेण्डे के नफाज में किसी मजाहिमत का सामना करना नहीं पड़ रहा है।
    साविक वजीर जराअत शरद पवार ने जो महाराष्ट्र के वजीर आला भी थे बजातौर पर तबसरा किया है कि बी0जे0पी0 की फतेह के बाद फिरका वारियत हर जगह सर उभार रही है और मोदी हुकूमत के पहले दो हफ्तों में ही ये हो रहा है। जबकि इसे अभी अपनी पाँच साला मुद्दतकार पूरी करनी है। महाराष्ट्र के एतदाल पसन्द शहर पुणे में जो कुछ हुआ वह बेकाबू हो जाने वाली ताकतों की तरफ इशारा करता है। एक इन्तिहा पसन्द हिन्दू ग्रुप ने शिवाजी और इन्तेहा पसन्द शिवसेना के बानी बाल ठाकरे की अहानत आमेज तस्वीरें इरसाल किए जाने पर 28 साला आई0टी0 मैनेजर मोहसिन शेख को जान से मार डाला। मोहसिन महज मशकूक था और उसके खिलाफ न कोई शहादत थी न सबूत।
    ये सच है कि बी0जे0पी0 ने इस कत्ल की मजम्मत की है लेकिन मोदी के लिए खुद को गैर महफूज समझने वाले मुसलमानों को यह यकीन दिलाने को बेहतरीन मौका था कि इनकी हुकूमत इसका ख़याल रखेगी कि मोहसिन के कातिलों के खिलाफ फौरन कानूनी चारहजोई की जाएगी। यहाँ तक कि जब उनसे खासतौर पर मजलूम के खानदान से हमदर्दी का एक लफ्ज कहने की दरख्वास्त की गई तो भी मोदी ने खामोशी अख्तियार की।
    इस रवैये से हैरत नहीं होना चाहिए। 2002 में गुजरात के वजीर आला की हैसियत से जब बशमूल पुलिस इन्तजामिया की साजबाज से 2000 से ज्यादा मुसलमानों को हलाक किया गया तो मोदी ने इजहार अफसोस नहीं किया। दर हकीकत मोदी ने गुजरात की एक मजिस्ट्रेट अदालत से हासिल कर्दा क्लीन चिट तनकीद करने वालों के मुँह पर मार दी। आज तक इन्होंने अफसोस का इजहार नहीं किया। उनके तास्सुफ के अल्फाज मुसलमानों के अहसासात को तस्कीन देने और तक्सीरियत पर मबनी हिन्दुस्तान के तसव्वुर को तकवियत देने में मुअस्सर होंगे।
    मुझ जैसे अफराद 15 से 16 करोड़ की आबादी पर मुस्तमिल मुस्लिम फिरके को ये यकीन दिलाना चाहते हैं कि इन्हें खायफ होने की जरूरत नहीं है क्योंकि हिन्दुस्तान दस्तूर पर कार बन्द है जो कानूनों की नजर में हर शहरी को मसावात की जमानत देता है। अगर इस फिरके को निशाना बनाया जाता है तो अदालतें, मीडिया और एतदाल पसन्द आवाजंे हैं जो मुसलमानों की हामी हैं। इसका मुजाहिरा उस वक्त देखने में आया जब बाबरी मस्जिद मुन्हदिम की गई और गुजरात में मुस्लिम कश फसादात हुए।
    वह लोग जो रियासत जम्मू व कश्मीर को खुसूसी हैसियत देने वाले आर्टिकल 370 को खत्म करने का मुतालबा कर रहे हैं वही मुस्लिम मुखालिफ अनासिर हैं। आर्टिकल 370 दस्तूरे-हिन्द की तरह 65 साल पुराना है क्योंकि जम्मू व कश्मीर मुस्लिम अक्सरीयत वाली रियासत है, इन अनासिर को मोदी के दौरे हुकूमत मंे इस रियासत की हैसियत पर एतराज उठाने का साजगार माहौल फिर अहम हो गया है। तारीख से वह वाकिफ नहीं हैं और न ही हकायक जानने में इन्हें कोई दिलचस्पी है।
    अगस्त 1947 में बरतानवी तसल्लुत के खात्मे पर रियाया की अक्सरीयत के मजहब के पेशे नजर तकरीबन 560 रजवाड़ो को इस इन्तखाब की आजादी दी गई कि या तो वे हिन्दुस्तान में शामिल रहें या तो तश्कील शुदा पाकिस्तान के साथ हो जाएँ। कोई हुकमरान अगर चाहता तो आजाद भी रह सकता था। जम्मू व कश्मीर के हुक्मराँ महाराजा हरि सिंह ताखीर से हिन्दुस्तानी वफाक में शामिल हो गए, अगरचे इस रियासत की आबादी में मुसलमानों की गालिबअकसरियत थी। मेरा मुशाहिदा यह है कि अगर उसने सब्र से काम लिया होता तो कश्मीर पाकिस्तान में चला जाता लेकिन इसने रियासत के अलहाक के लिए पहले कबायली और फिर बाकायदा फौज को भेजा। अपनी फौज के हाथों कत्ल व खून रोकने की गरज से महाराज ने हिन्दुस्तान के हक में दस्तखत कर दिए। महाराज ने सिर्फ तीन मामलात हिन्दुस्तान को सौंपे। दिफा, खारजी उमूर और मवासिलात। रियासत ने दीगर मामलात अपने पास ही रखे। आर्टिकल 370 इसी मफाहिमत की दस्तावेजी शकल है। अगर हिन्दुस्तान वफाक मजीद मामलात को अपने हाथ में लेना चाहे तो इसका फैसला रियासत जम्मू व कश्मीर के अख्तियार में है। क्योंकि वह इसी शर्त पर वफाक में शामिल हुई थी। रियासत की रजामन्दी के बगैर वफाक मजीद मामलात अपने अख्तियार में नही ले सकता। इसलिए आर्टिकल 370 के खात्मे के मुतालबे को आगे बढ़ाने वाली आर0एस0एस0 का अमल गैर कानूनी है।
      दर हकीकत मामलात इस कदर उलझ गए हैं कि किसी हल तक पहुँचने के लिए तीन फिरको की रजामन्दी जरूरी है। वह हैं हिन्दुस्तान, पाकिस्तान और जम्मू व कश्मीर के अवाम।
      अगर आज रायशुमारी कराई जाए तो वादीए कश्मीर एक आजाद रियासत की हिमायत में वोट देगी। हिन्दू अक्सरीयत वाले जम्मू के अवाम हिन्दुस्तान में रहना चाहेंगे और लद्दाख जहाँ गालिब अक्सरीयत बौद्धांे की है बराहे रास्त के तहत मरकज के जेरे निगरानी इलाके की हैसियत पाना चाहेगा। इन तमाम मुश्किलों ने मसले को नाकाबिल हल बना दिया है।
     जब आर0एस0एस0 शकाफती तन्जीम होने का दावा करती है तो इसे किसी हालत में भी सियासत बाजी नहीं करनी चाहिए। मुझे याद है कि आर0एस0एस0 के आदमी नाथूराम गोड्से के हाथों महात्मा गांधी के कत्ल के बाद 30 जनवरी 1948 को इस पर पाबन्दी आयद की गई थी। फिर 1949 में आर0एस0एस0 की तरफ से पाबन्दी हटाने की दरख्वास्त के जवाब में उस वक्त के वजीर दाखिला सरदार वल्लभ भाई पटेल और आर0एस0एस0 के दरमियान एक मुअहिदा हुआ जिसमें यह जमानत दी गई कि आर0एस0एस0 किसी सियासी सरगर्मी में शरीक नहीं होगा और यह कि आर0एस0एस0 सिर्फ शकाफ्ती सरगर्मियों में शामिल होगा।
         फिर पटेल ने जो आर0एस0एस0 के वादे से मुतमइन नहीं थे मतालबा किया कि इसमें यह वादा शामिल किया जाय कि वह संघ की तशकील में सियासी सरगर्मियों में हिस्सा नहीं लेगी, मुआहिदे को मुहरबन्द किया जाए और आर0एस0एस0 को हमेशा के लिए सियासी सगर्मियों से रोक दिया जाए। यह 1949 में हुआ था और इसके बाद हुकूमत ने पाबन्दी हटा दी। ताहम एक हैरतनाक बदअहदी यह हुई कि आर0एस0एस0 अपने सरसंघ चालक मोहन भागवत की कयादत में जून 2013 से साबिक आर0एस0एस0 प्रचारक मोदी को हिन्दुस्तान के वजीर आजम के मनसब पर बैठाने के लिए जारिहाना सियासी सरगर्मियो में मुलब्बिस हो गई। नतीजा आपके सामने है।
-कुलदीप नय्यर
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 11 सितंबर 2014

नशेमन से धुआँ उठता है तुम कहते हो बादल है

 हालिया पार्लियामानी इन्तखाबात से पहले मुस्लिम तंजीमों और इदारों के सरबराहान में बड़ी इजतराबी कैफियत देखने को मिली थी। हर जानिब से ये आवाज बुलन्द की गई कि किसी सूरत बी0जे0पी0 और मोदी को बरसरे एक्तदार आने से रोका जाए। इस अन्दाज से मोदी के खिलाफ नारे बुलन्द किए गए कि हिन्दू वोटरों का एक बड़ा तबका खामोशी के साथ मुत्तहिद हो गया और मुस्लिम वोटर मुन्तसिर होकर कई खानों में बँट गए। नतीजा यह हुआ कि बी0जे0पी0 अक्सरीयत से जीत गई और मोदी सिर्फ हिन्दुस्तान को ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को हैरत में डालकर बाआसानी वजीर आजम बन गए। ऐसे लोग जो हर हाल में किसी भी हुकूमत से करीब तर हो जाना चाहते हैं वह अपनी सियासी मन्तिक को फेल होता देख कर परेशान व बेचैन हो गए, अब खौफ व डर की वजह से उजलत में वजीर आजम मोदी को अपनी हिमायत की खबर पहुँचाना चाहते हैं। चूँकि इन लोगों ने यह अन्दाजा अपने तौर पर कर लिया है कि आइन्दा दस साल तक मोदी एक्तदार उज़मा पर काबिज रहेंगे। गालिबन यही सोच मुस्लिम इदारों के सरबराहान को भी खुद सुपुर्दगी पर मजबूर कर रही है। ताज्जुब की बात यह है कि न किसी ने इनकी हिमायत तलब की है न अब किसी को हुकूमत साजी के लिए मुसलमानों की हिमायत की जरूरत है। रजाकाराना तौर पर अपनी जानिब से हिमायत का एलान किस बात का पैगाम देता है? बेमहल बे मौका और बेजरूरत बातों से सिर्फ कीमत ही नहीं घटती बल्कि बचा बचाया वकार भी बाकी नहीं रहता और इसको हलकापन भी कहा जाता है।
      वजीर आजम मोदी ने अपने इलेक्शन के तकरीरों में और टी0वी0 चैनलों को इंटरव्यू देते हुए बहुत सारे नेकात की तरफ इशारा किया है और कुछ बातें मुस्लिम अवाम के तईं खुल कर की हैं। अभी तो मोदी की ताजपोशी को एक माह भी नहीं गुजरा हम अभी से उतावले होकर खुद को इनके हवाले कर दें, ये कहाँ की अकलमंदी है। इसे खौफ या लालच ही तसव्वुर किया जाएगा। गलती दर गलती यह सियासी सूझ बूझ हरगिज नहीं है। हम हिन्दुस्तानी शहरी हैं। हमारे हुकूक बराबर के हैं। हम किसी के मरहूनेमिन्नत नहीं हैं। हमारे हुकूक की अदायगी में अगर जानिबदारी बरती गई तो हम खामोश नहीं रहेंगे। दस्तूर हिन्द ने हमें जो मुराआत दी हैं इन में अगर किसी तरह की नाइंसाफी की गई तो हमें अपने हुकूक को वागुजार कराने के जायज तरीकों से कोई ताकत रोक नहीं सकती और खुद मोदी ने कहा है कि मैं किसी मखसूस कौम या फिरका का नहीं बल्कि एक सौ पच्चीस करोड़ हिन्दुस्तानियों का चैकीदार और सेवक हूँ। मुझसे किसी को डरने की जरूरत नहीं है। मोदी से कौन डरता है। मुसलमानों में गुजरात के फसाद का गुस्सा जरूर बाकी है। अगर उन्हें इस गुस्से को खत्म करना है तो अपनी गैर जानिबदारी का सबूत पेश करने के लिए ही मसायल हल करें।
    चाहिए तो ये था कि हम अभी खामोश रहकर हुकूमत के रवैये का जायजा लेते क्योंकि पूरा हिन्दुस्तान गुजरात नहीं है। हिन्दुस्तानी मुसलमानों को और इनके मफादात को नजरअंदाज करना या इन पर जबर जुल्म करना कोई आसान बात नहीं है। अगर ऐसा हुआ तो इसके बड़े भयानक नतीजे  बरामद होंगे, हमें मोदी से कोई ज़ाती दुश्मनी नहीं थी न है। बात सिर्फ यह है कि गुजरात में मुसलमानों का जो कत्लेआम हुआ उस वक्त वह खुद वजीर आला थे। इनकी मौजूदगी में जो हुआ इसको रोकना इनका फर्ज मनसवी था जिसे इन्होंने नहीं निभाया। न मुजरिमों को इन्होंने कैफरे किरदार तक पहुँचाया। यही शिकायत और इसी कारकिर्दगी का जख्म आज भी हरा है। इसके बावजूद हमारी बेहिसी और चापलूसी की इन्तिहा देखिए कि मोदी साहब को और इनके करीबी लोगों को जामिया मिलिया और एक दीगर मुस्लिम इदारे में दावत दी जा चुकी है। यह इदारा एक कल्चरल सेन्टर है जिसका सियासत से कोई लेना देना नहीं है वहाँ के जिम्मेदारों में एक होड़ लग गई है कि कैसे मोदी तक पहुँचा जाए। इनके करीबी मुअतमिद हैं जो गुजरात से आकर आजकल दिल्ली में कयाम पजीर हंै। जामिया मिलिया में इनको दावत दी जा चुकी है जबकि इसके बरअक्स मुजफ्फरनगर फसाद के हीरो को वजीर बना दिया गया है। पुणे में एक मुसलमान इंजीनियर को टोपी और दाढ़ी के जुर्म में कत्ल किया गया, अभी तक इस पर खामोशी है कि हिन्दू राष्ट्र सेना पर कब पाबन्दी आयद होगी और कब तक इसको बेलगाम छोड़ा जाएगा। एक तरफ यह एलान है कि हम एक सौ पच्चीस करोड़ अवाम के सेवक हैं दूसरी तरफ अमल यह है कि बेगुनाह मुसलमानों को दसियों साल तक जेल में बन्द करके स्कीम बनाने वाला आई0बी0 अफसर अजीत देवल को एन0एस0ए0 बनाया जाता है। दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद शहादत के वक्त कल्याण सिंह का होम सेक्रेटरी जो बाद में टी0आई0आई0 का चेयरमैन बना, गैर कानूनी तरीके से कैबिनेट सेक्रेटरी आर्डिनेन्स के जरिये बनाया जाता है। इससे हुकूमत की करनी का तजाद और जहनियत का पता चलता है।
    हमारी जिन्दगी और मौत का मालिक रज्जाक सिर्फ अल्लाह है, यही हमारा ईमान है। ईमान व यकीन को मजबूत करके अपने मौक्किफ पर इस्तकलाल के साथ कायम रहना एक मोमिन की शान है। अगर हमारे साथ अच्छा रवैया रहा और हमारे मजहबी उमूर में बेजा मदाखिलत नहीं की गयी। हमारे चैन सुकून की जिन्दगी में रखनान्दाजी नहीं की गई तो खामख्वाह मुखालिफत का हमें शौक नहीं। नरेन्द्र मोदी के खिलाफ 60 फीसदी हिन्दू आज भी ऐसे हैं जो खुद को सेक्यूलर कहते हैं। इन्हें ये बताना चाहिए कि 1947 में हमने हिन्दुस्तान के इक्तिदार को यह कहकर इनके हवाले कर दिया था कि अब हम हिन्दुस्तान की हुकूमत आपके जिम्मे करते हैं आप हुकूमत कीजिए हम आपके पीछे हैं। जो हालत उस वक्त हमारी थी वही हालत आज 2014 में हिन्दुस्तान के सेक्यूलर हिन्दुओं की है। अब ये मुल्क गांधी, लोहिया, या अम्बेडकर की सोच पर चलेगा या फिर गोलवलकर या सावरकर के ख्वाब की ताबीर पूरी करेगा। यह एक लमहा फिफ्र मुसलमानों के लिए ही नहीं बल्कि सेकुलर हिन्दुओं के लिए भी है। इन्हें चाहिए कि वे आपस में इत्तिहाद पैदा करें और सेकुलर पार्टियों के लीडरों को चाहिए गुजिश्ता सियासी रंजिशों को भूलकर करीब आएँ और मौजूदा सियासी तब्दीलियों का मुकाबला करने के लिए अवाम का एतमाद हासिल करें। तभी कोई बेहतर रास्ता निकल सकता है और हुकूमत को सीधे रास्ते पर चलाने के लिए एक दबाव कायम किया जा सकता है। वरना वही होगा जो आजादी के बाद से अब तक होता आ रहा है। वादा और मीठी बातों से खुश होकर और भरोसा करने की वजह से गुजिश्ता साठ वर्षों से हमारे जज्बात और एतमाद के साथ मुसलसल खेला जा रहा है। एक अरसा दराज तक रामविलास पासवान मुसलमानों की नजर में खुद को सेकुलर साबित करने के लिए बी0जे0पी0 से कसदन दूर रहे। आज अपने सियासी मफादात के हुसूल के लिए इन्होंने बी0जे0पी0 का दामन पकड़ा और मुसलमानों को पस्त हिम्मत करने के लिए इनके मुस्लिम नुमाइन्दे मुसलमानों की मजलिस में जाकर तकरीर करते हैं और अपने मतालबात से बाज रहने की तल्क़ीन करते हैं ऐसे बहुत सारे लोग मुस्लिम नुमाइन्दा बनकर खैरख्वाही की आड़ में हुकूमत के मन्जूरे नजर होने की गरज से मुसलमानों में दाखिल होकर दहशत पैदा करने की कोशिश में मुन्हमिक हंै। ऐसे लोग कौम व मिल्लत के भी खैरख्वाह नहीं हो सकते। इनसे होशियार रहने की अशद जरूरत है। आइन्दा पाँच बरसों में सियासत गिरगिट की तरह न जाने कितने रंग बदलेगी। अगर हमारे साथ बदसलूकी नहीं की गई तो हमसे ज्यादा वफादार दुनिया की कोई कौम नहीं है। पन्द्रह सौ साला तारीख इस सच्चाई की चश्मदीद गवाह है, इस पर किसी तरह के शक की गुंजाइश नहीं है। किसी को ज़ाती तौर पर हमारी हिमायत वफादारी का मुशाहिदा करना है तो हमारे जुमला मसायल को हल करे और फिर देखे कि हम किस कदर जां निशार हैं। अब सिर्फ वादों से काम नहीं चलेगा। अमली इकदामात ही जख्म पर मरहम का काम कर सकते हैं। इसलिए अभी वक्त हमारे सब्र व तहम्मुल का मोत्कादी है।
अभी इश्क के इम्तिहाँ और भी हैं।
आईना-जमीर हाशमी
लो उजागर हो गया पटना धमाकों का भी सच
कार्यवाही थी वहाँ भी सब उसूलांे के बगैर।
ला न पाए छः महीने में भी कोई फर्दे जुर्म
बेगुनाहों पर थी तोहमत फिर सबूतों के बगैर।।

 -मुहम्मद अदीब
मजमून निगार
(राज्यसभा के पूर्व सदस्य हैं। )
मोबाइल: 09868181945
साभार-इंकलाब
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

बुधवार, 10 सितंबर 2014

आईसिस,तेल की राजनीति और इस्लाम के प्रति घृणा का चरम

 लगभग एक माह पहले ;अगस्त 2014, मुस्लिम कार्यकर्ताओं.अध्येताओं के एक समूह ने विभिन्न शहरों में प्रेस वार्ताएं आयोजित कीं। उन्होंने आईसिस द्वारा की जा रही क्रूर हिंसा की भर्त्सना करते हुए वक्तव्य जारी किये। इन वक्तव्यों पर सबसे ऊपरए बड़े.बड़े अक्षरों में लिखा गया था, 'इस्लाम मीन्स पीस' ;,का अर्थ है शांति। बयान में कहा गया था कि'भारतीय मुसलमान, ईराक और सीरिया में आईसिस द्वारा अल्पसंख्यकों पर किए जा रहे भीषण अत्याचारों की कड़ी निंदा करते हैं। हम धार्मिक असहिष्णुता और इस्लाम के नाम पर हिंसा और उत्पीड़न की भी निंदा करते हैं।' मैंने इस वक्तव्य को कई जगह भेजा। एक व्यक्ति का जवाब आया, ''इस्लाम का अर्थ है शांति' यहए इस सदी का सबसे बड़ा चुटकुला है'।
भारत में इन दिनों लवजिहाद के बारे में प्रचार, जंगल में आग की तरह फैल रहा है। जाहिर है कि इस मुद्दे को सांप्रदायिक तत्वों द्वारा हवा दी जा रही है। शादी के साथ.साथ धर्मपरिवर्तन करने और लड़कियों द्वारा पीछे हट जाने की चन्द घटनाओं का इस्तेमालए यह बताने के लिए किया जा रहा है कि मुस्लिम पुरूष, हिंदू लड़कियों से धोखा देकर विवाह कर रहे हैं और इसका उद्देश्य उन्हें मुसलमान बनाना है। एक मित्र ने मुझसे जानना चाहा कि क्या मैं ऐसे 100 मामले भी बता सकता हूं, जब मुस्लिम लड़कियों ने हिंदू पुरूषों से शादी की हो। मेरी किस्मत अच्छी थी कि और मैं 100 से भी अधिक ऐसे दंपत्तियों की सूची बनाने में सफल रहा। हिंदू पुरूष,मुस्लिम पत्नि के नाम से गूगल सर्च करने पर कई मर्मस्पर्शी प्रेमकथाएं सामने आईं। यह शायद उल्टा लवजिहाद हैhttps://www.facebook.com/R3alityofPorkistan/posts/613266692020533। पहले से ही जहरीले हो चुके वातावरण में अल कायदा के अल जवाहिरी ने एक वीडियो जारी कियाए जिसमें कहा गया है कि अल कायदा अपनी गतिविधियों का भारत में विस्तार करेगा।
 इस्लाम और मुसलमानों के बारे में इतनी सारी भ्रांतियां फैला दी गई हैं और जनसाधारण के मन में इतनी गलतफहमियां बैठा दी गईं हैं कि किसी से यह कहना ही मुहाल हो गया है कि वे धर्म, और राजनीतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए धर्म के दुरूपयोग,के बीच अंतर करें। देश और दुनिया में दिल को हिला देने वाली जो घटनाएं हो रही हैं उनके लिए इस्लाम और मुस्लिम समुदाय को दोषी बताया जा रहा है। आमजन अन्य धर्मों को तो 'नैतिकता और शांति' के साथ जोड़ने को तैयार हैं परंतु इस्लाम को नहीं। कई समूहों और संगठनों द्वारा 'सहमति के उत्पादन' के चलते, मुसलमानों का एक ऐसा चित्र बनाया जा रहा है जो न तो सही है और ना ही विश्व में शांति की स्थापना में मददगार साबित होगा। सभी मुसलमानों को एकसा बताया जा रहा है। चंद अपराधी मुसलमानों और इस्लाम के कट्टरवादी संस्करण को असली इस्लाम बताया जा रहा है, जिससे दशकों से चले आ रहे पूर्वाग्रह और मजबूत हो रहे हैं।
आईसिस का जन्म अलकायदा की कोख से हुआ है। अलकायदा के लड़ाकों को अमरीका और आईएसआई द्वारा स्थापित किये गये मदरसों में प्रशिक्षित किया गया था। इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि अमरीका,पश्चिम एशिया के तेल संसाधनों पर कब्जा करना चाहता है। इस क्षेत्र के बारे में अमरीका की नीति को इन शब्दों में बयान किया जा सकता है,'तेल इतना कीमती है कि उसे वहां के निवासियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता।' अमरीका की पश्चिम एशिया नीति को समझने के लिए आपको बड़े.बड़े विद्वानों की मोटी.मोटी किताबें पढ़ने की जरूरत नहीं है। आपको केवल हिलेरी क्लिंटन की एक छोटी सी वीडियो क्लिप भर देखनी होगी। वीडियो क्लिप में वे बड़ी शान से और बिना किसी लागलपेट के कहती हैं कि अमरीका ने मुस्लिम युवकों को प्रशिक्षित कर अल कायदा का निर्माण किया था। http://www.youtube.com/watch?v=nLhRKj6633w। इस क्षेत्र के इतिहास पर एक नजर डालने से ही हमें समझ में आ जायेगा कि मुस्लिम युवकों को प्रशिक्षित करने के लिए इस्लाम के तोड़ेमरोड़े गये वहाबी संस्करण का इस्तेमाल किया गया था।
 अल कायदा का अमरीका ने केवल निर्माण ही नहीं किया वरन उसने उसे धन और हथियार भी उपलब्ध करवाये ताकि अल कायदा, अफगानिस्तान पर काबिज रूसी सेनाओं से मोर्चा ले सके। धीरे.धीरे, जब अलकायदा के भयावह अत्याचारों की खबरें छन.छन कर बाहर आनी शुरू हुईं तब अमरीकी मीडिया ने इस्लाम को ही दानवी प्रवृत्तियों का स्त्रोत बताने के लिए 9-11-2001 के बाद से 'इस्लामिक आतंकवाद' शब्द का इस्तेमाल शुरू कर दिया। 9-11 के पहले तकए आतंकी हमलों को किसी धर्म से नहीं जोड़ा जाता था। वैसे भी, सभी धर्मों के मानने वाले आतंकी हमलों में शामिल रहे हैं। महात्मा गांधी और राजीव गांधी के हत्यारे हिंदू थे तो इंदिरा गांधी को सिक्खों ने मारा था। थायलैण्ड, म्यानमार और श्रीलंका में बौद्ध भिक्षुक आतंकी हमलों में शामिल हैं। नार्वे के एंडर्सबर्लिंग ब्रेविक भी आतंकी थे परंतु मुसलमान नहीं। सच यह है कि लगभग सभी धर्मों के लोगों ने कभी न कभी राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आतंकी हमलों में भाग लिया है। परंतु 9-11 के बाद से, आतंकी हमलों को इस्लाम और केवल इस्लाम से जोड़ दिया गया।
यह दिलचस्प है कि अल कायदा को खड़ा करने और मुजाहिदीनों के दिमाग में घोर कट्टरता भरने के लिए अमरीका ने इस्लाम के जिस संस्करण का इस्तेमाल किया, उसे सूत्रबद्ध करने वाले थे अब्द अब्द अल वहाब, जिन्होंने इस्लाम को कट्टर बनाने की प्रक्रिया शुरू की थी और धर्म की केवल अपनी व्याख्या को सही बताया था। वे लिखते हैं 'यदि कोई धर्मावलंबी, इस्लाम की इस ;वहाबी व्याख्या पर अपने विश्वास को स्वीकार करने में जरा सा भी संकोच या संदेह दर्शाता है तो वह अपना संपत्ति और जीवन का अधिकार खो बैठेगा।' इस्लाम के इसके अलावा कई अन्य संस्करण भी हैं। परंतु क्या कारण है कि यह संस्करण सबसे प्रभुत्वशाली बनकर उभरा है। इसका कारण यह है कि इस संस्करण को सऊदी अरब के शासकों का संरक्षण प्राप्त है। अब्द अल वहाब के सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है तकफीर। इस सिद्धांत के अनुसारए 'वे मुस्लिम काफिर हैं जो ऐसी किसी भी गतिविधि में हिस्सा लेते हैं जिससे शासक ;अर्थात राजा की प्रभुसत्ता और उसके अधिकारों का अतिक्रमण होता हो। जो लोग इस सिद्धांत को स्वीकार नहीं करेंगे उन्हें अपनी जान से हाथ धोना पड़ेगा,उनकी पत्नियों और लड़कियों के साथ जबरदस्ती की जायेगी और उनकी संपत्ति जब्त कर ली जायेगी।'http://www.huffingtonpost.com/alastair-crooke/isis-wahhabism-saudi-arabia_b_5717157.html
  यह संस्करण सऊदी शासकों को भाता था क्योंकि इससे वे तेल के संसाधनों पर अपना कब्जा बरकरार रख सकते थे। यह अमरीका के लिए भी बहुत काम का था क्योंकि इसमें काफिर ;जो सत्य को छुपाता है का अर्थ गैर.मुस्लिम या 'दूसरा' कर दिया गया था। इस संस्करण में जिहाद का अर्थ है गैर.मुस्लिम की जान लेना। इस्लाम के जानेमाने विद्वानों का कहना है कि जिहाद का अर्थ है अच्छे काम करने की हर संभव कोशिश करना। इस्लाम, जो यह कहता है कि'मेरे लिये मेरा दीनए तुम्हारे लिये तुम्हारा' और जो यह कहता है कि 'इसी कारण इजरायल की संतान के लिए हमने यह आदेश लिख दिया था कि जिसने किसी इंसान को कत्ल के बदले या जमीन में बिगाड़ फैलाने के सिवाए किसी और वजह से कत्ल कर डाला उसने मानो सारे ही इंसानों को कत्ल कर दिया और जिसने किसी की जान बचाई उसने मानो सारे इंसानों को जीवनदान दिया ;कुरान,अध्याय 5, आयत 32। शांति के पैरोकार इस धर्म के नाम पर मासूमों को मारा गया। इस्लाम का यह संस्करण उन लोगों के लिए बहुत उपयोगी था जो दूसरों के कंधों पर बंदूक रखकर रूसी सेना से लड़ना चाहते थे। परंतु समस्या यह है कि ब्रेनवाश करके जिन लड़ाकों को तैयार किया गया था वे सोवियत संघ की अफगानिस्तान से वापसी के बाद भी उतने ही कट्टर बने रहे। रूसी सेना को हराने के बाद अल कायदा इस्लाम के तोड़ेमरोड़े गये संस्करण में विश्वास करता रहा और उसके पास अमरीका द्वारा उसे उपलब्ध कराये गये खतरनाक हथियार बने रहे। उनके दिमाग में वहाबी इस्लाम भरा हुआ था और हाथों में अमरीकी बंदूकें थीं। इसी का नतीजा है कि आईसिस का अस्तित्व में आना, उनका यह भ्रम कि वे अब दुनिया पर शासन कर सकते हैंए उनके द्वारा खलीफा को गद्दी पर बैठाया जाना और उसके बाद पागलपन के कामों की लंबी श्रृंखला।
जाहिर है कि अमरीका बांटो और राज करो की नीति का इस्तेमाल ठीक उसी तरह कर रहा है जैसे कि पहले साम्राज्यवादी ताकतें किया करती थीं। भारत में साम्राज्यवादियों ने सांप्रदायिक राजनीति के बीच बोये। पश्चिम एशिया में पिछले कुछ दशकों के दौरान, अमरीकी साम्राज्यवादियों का लक्ष्य रहा है नस्लीय और सांप्रदायिक विभाजनों को और गहरा करना, और उनके आधार पर छोटे.छोटे देशों का गठन करवाना। यही कारण है कि शियाओं, सुन्नियों और कुर्दों आदि के बीच हिंसा को अमरीका प्रोत्साहन दे रहा है। एक ओर अमरीका बांटो और राज करो की अपनी नीति लागू कर रहा है और दूसरी ओर वह पूरी दुनिया में इस्लाम का दानवीकरण भी कर रहा है और इसका आधार बनाया जा रहा है अल कायदा और आईसिस जैसे संगठनों के कुकर्मों को।
शक्तिशाली निहित स्वार्थी तत्व,अपने राजनैतिक लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए धर्म का दुरूपयोग करने पर आमादा हैं। वे एक धर्म विशेष के मुंह पर कालिख पोत रहे हैं। ऐसे दौर में आमजनों को तार्किक ढंग से सोचने के लिए राजी करना दुष्कर कार्य है। जो धारणायें लोगों के दिमागों में बैठ गयी हैं उन्हें निकालना आसान नहीं है। परंतु यदि हमें अपने समाज में शांति और प्रगति लानी है तो हमें यह करना ही होगा। 
 -  राम पुनियानी

मंगलवार, 9 सितंबर 2014

हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का 'विदेशियों' से घृणा करो जिहाद

हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का उन समुदायों.जिन्हें वे 'विदेशी' बताते हैं.को कलंकित करने का तरीका बहुत दिलचस्प है। व्ही.डी. सावरकर ने अपनी पुस्तक 'हिन्दुत्व' में लिखा है 'लोगों को एक राष्ट्र के रूप में एकजुट करने और राष्ट्रों को राज्य का स्वरूप देने में कोई भी चीज इतनी कारगर नहीं है जितनी कि सबका शत्रु एक ही होना। घृणा बांटती भी है और एक भी करती है।' सावरकर ने मुसलमानों और ईसाईयों के रूप में उस शत्रु को ढूंढ निकाला। ये वे समुदाय थे, जिनके पवित्रतम तीर्थस्थल सिंधुस्तान अर्थात सिंधु नदी से अरब सागर तक में फैले भूभाग,से बाहर थे। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों ने इस शत्रु का निर्माण करने में बहुत मेहनत की है। यह अलग बात है कि यह शत्रु काल्पनिक अधिक है वास्तविक कम, पौराणिक अधिक है ऐतिहासिक कम। पहले उनके निशाने पर केवल मुसलमान थे परंतु सन् 1998 में एनडीए के सत्ता में आने के बाद से, उन्होंने ईसाईयों को भी हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करवाने के नाम पर कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया।
हिन्दू संगठन बड़े सुनियोजित ढंग से उन मुद्दों को चुनते और प्रचारित करते हैं,जिनका इस्तेमाल 'विदेशी समुदायों' पर कीचड़ उछालने के लिए किया जा सकता है। पहले उनके शीर्ष स्तर के नेता, चुनिंदा लोगों को प्रशिक्षित करते हैं। फिर ये प्रशिक्षित प्रचारक, उन मुद्दों को स्थानीय स्तर पर ले जाते हैं। वे मुद्दों को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं और कभी.कभी नये मुद्दों का आविष्कार भी कर लेते हैं। इन मुद्दों पर वे तब तक लगातार बोलते रहते हैं जब तक कि कम से कम कुछ लोगए खतरे को वास्तविक और गंभीर न मानने लगें और संबंधित समुदाय के प्रति नकारात्मक रवैया न अपना लें। जब ऐसे लोगों की संख्या पर्याप्त हो जाती है तब उन्हें काल्पनिक'शत्रु' पर हमला करने के लिए उकसाया जाता है।
सबसे पहले कुछ'कट्टरपंथी तत्व'किसी ऐसे मुद्दे को उठाते हैंए जिसके जरिये'शत्रु' समुदाय को बदनाम किया जा सके। अगर उस मुद्दे पर विपरीत प्रतिक्रिया होती है और मीडिया में उसकी निंदा की जाती है तो उसे वहीं छोड़ दिया जाता है। इसका उदाहरण है पब जाने वाली महिलाओं पर हमले या वैलेन्टाइन डे मनाने का विरोध। परंतु यदि किसी मुद्दे या हिंसक हमले पर जनविरोध नहीं होता, उसकी निंदा नहीं की जाती, तब कोई स्थापित हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन उस मुद्दे को उठाना शुरू कर देता है। उससे संबंधित नया साहित्य तैयार किया जाता है और काल्पनिक तथ्यों के सहारे उसे अधिक मसालेदार बनाया जाता है। फिर उस मुद्दे पर व्यापक अभियान छेड़ दिया जाता है ताकि'शत्रु समुदाय' के प्रति अविश्वासए घृणा और गुस्से का वातावरण निर्मित किया जा सके। अंत में, उस मुद्दे को भाजपा, राज्य व शासन के स्तर पर उठाती है। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, दरअसल,किसी बास्केटबाल या फुटबाल टीम की तरह काम करते हैं। खिलाड़ी ;संगठनद्ध, बॉल ;मुद्दे को ड्रिबिल करते हुए फारवर्ड खिलाड़ी तक ले जाते हैं ताकि वह गोल कर सके। बाबरी मस्जिद का मुद्दा भी इन विभिन्न चरणों से गुजरा। सन् 1949 में वहां राम की मूर्तियां स्थापित की गईं और मस्जिद के दरवाजे, मुसलमानों के लिए बंद कर दिए गए। केवल एक पुजारी को अंदर जाकर स्थापित की गई मूर्तियों की पूजा करने की इजाजत दी गई। फिर,  विहिप ने'रामजन्मभूमि मंदिर' को आम लोगों के लिए खोले जाने की मांग को लेकर सन् 1986 में अभियान शुरू किया। यह अभियान इतना सफल हुआ कि आज बड़ी संख्या में लोग यह जानते हैं कि भगवान राम का जन्म ठीक.ठीक किस स्थान पर हुआ था भले ही उन्हें यह नहीं मालूम कि राम कब.यहां तक कि किस सदी में.जन्मे थे। मंदिर मुद्दे के आंदोलन ने इस 'तथ्य' को स्थापित किया कि मुसलमान बादशाहों ने मस्जिदों का निर्माण करने के लिए मंदिरों को ढहाया। ऐसा दावा किया गया कि देश में कम से कम ऐसी 3000 मस्जिदें हैं जिन्हें मंदिरों के मलबे पर खड़ा किया गया है। इन मस्जिदों की सूची कभी सामने नहीं आई। इसका कारण स्पष्ट था। सूची न होने के कारण कभी भी किसी भी मस्जिद को मंदिर की जगह बनाया गया होना बताना आसान था।
उसी तरह, गुजरात के सन् 2002 के मुस्लिम.विरोधी दंगे भी अचानक नहीं हुए थे। यह कहना कि ये दंगे ट्रेन आगजनी की क्रिया की प्रतिक्रिया थे,असलियत पर पर्दा डालना है। दरअसल, मुसलमानों और ईसाईयों को अलग.अलग बहानों से,हिन्दुओं का शत्रु बताने का क्रम तब से जारी था जब से भाजपा वहां पहले चिमनभाई पटेल के गुजरात जनता दल के साथ मिलकर और बाद में अपने बलबूते पर सरकार चला रही थी।
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का 'गौहत्या विरोधी अभियान' भी इसी तर्ज पर चलता है। किसी भी ऐसे वाहन को जिसमें मवेशी ले जाए जा रहे हों और जिसका मालिक या ड्रायवर मुसलमान हो, को रोक लिया जाता है। वाहन के मुसलमान ड्रायवर या मालिक की पिटाई की जाती है और मीडिया में यह प्रचार किया जाता है कि मुसलमान, गैरकानूनी ढंग सेए गायों को काटने के लिए ले जा रहे थे। यह तब भी होता है जब मवेशी गायें हों ही ना या जब गायों को किसी ऐसे व्यक्ति के पास ले जाया जा रहा होए जिसने उन्हें वैध तरीके से पालने के लिए खरीदा हो। यह सब ऐसे स्थानों पर किया जाता है जहां हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को राजनैतिक संरक्षण उपलब्ध हो या कम से कम जहां के पुलिस अधिकारी और मीडिया उनके साथ सहानुभूति रखते हों। इस कड़े परिश्रम के बदले, हिंदू राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं को 'जब्त' किए गए मवेशी इनाम के रूप में मिल जाते हैं।
इसी तरह के अभियानों के जरिये यह धारणा लोगों के मन में बैठा दी गई है कि मुसलमानों की कई बीवियां होती हैं, वे ढेर सारे बच्चे पैदा करते हैं और जल्दी ही उनकी आबादी,हिन्दुओं से ज्यादा हो जायेगी। यह भी कहा जाता है कि वे देश के प्रति वफादार नहीं हैं और उनकी वफादारी केवल उनके धार्मिक नेताओं और पाकिस्तान के प्रति है। यह भी आरोप लगाया जाता है कि वे आक्रामक और हिंसक समाजविरोधी तत्व हैं जो अपनी ही महिलाओं का शोषण करते हैं और जिनके नैतिक और सामाजिक मानदंड एकदम अलग हैं।
ईसाईयों को इस आधार पर बदनाम किया जाता है कि उनका पवित्रतम तीर्थस्थल भारत के बाहर, जेरूसलेम में है और वे हिंदुओं को तेजी से ईसाई बना रहे हैं। किसी व्यक्ति के अपनी इच्छा से ईसाई बनने को भी मुद्दा बना लिया जाता है। इस मसले को लेकर हिंसा और अतिश्योक्तिपूर्ण दावों के आधार पर कई जिलों में अभियान चलाए गए। जब भाजपा ने राज्यों में और एनडीए ने केन्द्र में सत्ता संभाली, तब ईसाईयों के खिलाफ हिंसा और तेज कर दी गई। गुजरात के डांग और मध्यप्रदेश के झाबुआ जिले में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में नाटकीय वृद्धि हुई। और फिर,प्रधानमंत्री ने धर्मपरिवर्तन पर राष्ट्रीय बहस का आव्हान किया।
हिंदुत्व को प्यार से क्यों नफरत है?
हिंदुत्ववादियों को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगता कि दो समुदायों के सदस्यों के बीच सद्भाव या प्रेम के रिश्ते बनें। उन्हें यह बिल्कुल नहीं भाता कि हिंदुओं और 'शत्रु समुदायों'के आराधना के तरीकोंए संस्कृति या सभ्यता में कुछ भी समान हो। वे बिल्कुल नहीं चाहते कि दोनों समुदायों के सदस्य एक ही मोहल्ले में रहें या उनमें आपसी वैवाहिक रिश्ते बने। हिंदुत्व पर अपनी पुस्तक में सावरकर लिखते हैं,'हमारे और हमारे शत्रु के बीच जितनी समानतायें होंगीए, हमारे लिए शत्रु का विरोध करना उतना ही मुश्किल होता जायेगा। जिस शत्रु से हमारी कुछ भी समानता न होए उसका हम सबसे मजबूती से विरोध कर सकते हैं।' किसी भी प्रकार की समानता न बन सके और यदि होए तो उसे समाप्त कर दिया जाये, इसके लिए दूसरे समुदायों को बदनाम करने के अभियान चलाये जाते हैं, जिनमें हिंसा का भी इस्तेमाल होता है। छोटे.मोटे अंतरों जैसे खानपान की आदतों, को बढ़ाचढ़ा कर प्रस्तुत किया जाता है। यह धारणा कि मुसलमान व ईसाई 'हम' से एकदम अलग हैं उन इलाकों में अधिक मजबूत है जहां सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास है। इसका सबसे ताजा उदाहरण मुजफ्फरनगर है। सितंबर 2013 में वहां भड़की हिंसा के पहले तकए इलाके के जाटों और मुसलमानों की एक जैसी परंपराएं और सामाजिक रीतिरिवाज थे। वे एक ही बोली बोलते थे और यहां तक कि दोनों में ही सगोत्र विवाह पर प्रतिबंध था। अंतर केवल एक था.और वह यह कि वे अलग.अलग जगहों पर अपने खुदा की इबादत करते थे। दंगों के बाद जब हम मुजफ्फरनगर गए तो हमने पाया कि वहां के हालात एकदम बदल चुके हैं। गांवों के लोग अब 'वे' और 'हम' की भाषा में बात करने लगे थे। सांप्रदायिक हिंसा की हर घटना के बाद,संबंधित शहर में मिलीजुली आबादी वाले मोहल्ले कम हो जाते हैं और लोग ऐसे इलाकों में रहना पसंद करने लगते हैं जहां उनके समुदाय के लोग अधिक संख्या में हों। सन् 1993 के दंगों के बाद मुंबई में भी यही हुआ। मीरा रोड और मुंबरा में मुसलमानों की बड़ी.बड़ी बस्तियां बन गईं। इन बस्तियों में आपको ढूंढने पर भी कोई हिंदू घर नहीं मिलेगा। हाल में प्रवीण तोगडि़या ने एक ऐसे मुसलमान के विरूद्ध हिंसा करने के लिए भीड़ को उकसाया जिसने एक हिंदू इलाके में फ्लैट खरीदा था। यहां तक कि यह धमकी भी दी गई कि अगर उसने यह फ्लैट नहीं छोड़ा तो फ्लैट पर जबरन कब्जा कर लिया जायेगा।
हम जिस समुदाय को हिन्दू कहते हैं, वह, दरअसल एक विविधवर्णी समाज है,जिसके सदस्य कई भाषाएं बोलते हैं, 33 करोड़ अलग.अलग देवी.देवताओं की आराधना करते हैं व जिसमें नास्तिक भी शामिल हैं। उनके विभिन्न समूहों के अलग.अलग दर्शन हैं, जिनमें मूलभूत अंतर हैं। उनके कई धार्मिक ग्रंथ हैं और वे असंख्य जातियों में विभाजित हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म की कोई सर्वमान्य परिभाषा देना बहुत कठिन है। हिंदुत्व का लक्ष्य यह था कि जहां एक ओर इस विविधता के महत्व को कम किया जाएए वहीं दूसरी ओर, जातिगत ऊँचनीच को मजबूती दी जाए। सावरकर के शब्दों में,'अगर भारत को अपनी आत्मा के अनुसार अस्तित्व में बने रहना है,चाहे आध्यात्मिक तौर पर या राजनैतिक दृष्टि सेए तो उसे वह ताकत नहीं खोनी चाहिए जो राष्ट्रीय और नस्लीय एकता से मिलती है।' जातिगत ऊँचनीच को बनाए रखते हुएए राष्ट्रीय और नस्लीय एकता स्थापित करने के लक्ष्य को पूरा करने का तरीका सावरकर ने 1923 में हिंदुत्व पर लिखी अपनी पुस्तक में बताया है। उनका कहना है कि देश में उन लोगों की रगों में एक खून बह रहा है जिनकी पुण्यभूमि सिंधुस्तान में है। हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों ने एक खून और नस्लीय शुद्धता पर आधारित राष्ट्रवाद की इस अवधारणा को हिटलर से लिया है।
एक समस्या यह थी कि इस एक खून वाले सिद्धांत से वह वर्ग प्रभावित नहीं होता जो जाति के पिरामिड के सबसे निचले पायदान पर था और जिसका दर्जा जानवरों से भी नीचा था और जिसे रोजाना अपमान झेलने पड़ते थे। इसलिए इस विविधतापूर्ण समाज को हिन्दू राष्ट्र के सांचे में ढालने के लिए यह जरूरी था कि एक समान शत्रु का निर्माण किया जाए। इस लक्ष्य की प्राप्ति में हिंसा के इस्तेमाल से हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को कोई परहेज नहीं था।
यही कारण है कि इन संगठनों के लिए अंतर्धार्मिक विवाह एक बड़ा मुद्दा हैं। अगर अंतर्धार्मिक विवाह होंगे तो वे हिंदुओं जैसे विविधवर्णी समुदाय को एक राष्ट्र व एक नस्ल का स्वरूप नहीं दे सकेंगे। सावरकर ने बहुत पहले कहा था कि अपने शत्रु और स्वयं में किसी भी प्रकार की समानता को ढूंढने से राष्ट्र कमजोर होता है। उनकी पुस्तक में म्लेच्छों द्वारा साधुओं की लड़कियों का अपहरण करने की चर्चा है। विभाजन के बाद हुए खूनी दंगों के पश्चात, भारत में पहला बड़ा सांप्रदायिक दंगा, जबलपुर में सन् 1961 में हुआ था जब ऊषा भार्गव नाम की एक लड़की, एक बड़े मुस्लिम बीड़ी व्यापारी के लड़के के साथ भाग गई थी। मीडिया में इस घटना का बहुत आक्रामक ढंग से प्रस्तुतिकरण हुआ और यह आरोप लगाया गया कि मुस्लिम युवक ने ऊषा भार्गव के साथ बलात्कार किया है। इस दुष्प्रचार से तंग आकर ऊषा भार्गव ने आत्महत्या कर ली। सन् 1998 में गुजरात के पंचमहल जिले के रणधीकपुर और बारडोली में अंतर्धार्मिक विवाहों के बहाने दंगे भड़काये गये। विहिप ने बिना किसी सुबूत के यह आरोप लगाया कि रणधीकपुर में मुस्लिम युवक, हिन्दू लड़कियों को अगवा कर उनके साथ बलात्कार कर रहे हैं। उस छोटे से गांव में रहने वाले 60.70 मुस्लिम परिवारों को अपनी जान बचाने के लिए गांव से भागना पड़ा। वे तीन महीनों तक अपने गांव नहीं लौट सके। बारडोली में जून 1998 में वर्षा शाह और हनीफ मेमन ने शादी कर ली। इसके बाद इस भाजपा शासित प्रदेश में हिंदुत्व की विचारधारा के अनुरूप, यह कानून बना दिया गया कि अंतर्धार्मिक विवाह के पंजीकरण के पूर्व,  प्रशासन से अनुमति लेना आवश्यक होगा। अगर किसी हिंदू राष्ट्रवादी संगठन को ऐसा विवाह होने की सूचना मिलती है तो वे इतना हंगामा खड़ा कर देते हैं कि अगर लड़का.लड़की और उनके माता.पिता विवाह के लिए राजी हों तब भी विवाह नहीं हो पाता। हाल में अहमदाबाद में मुस्लिम महिलाओं के लिए आयोजित एक कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों ने बताया कि गुजरात में अंतर्धार्मिक विवाह करना असंभव है। हमें बताया गया कि ऐसे युगलों के लिए एकमात्र रास्ता यह है कि वे किसी दूसरे राज्य में भाग जायें और वहां शादी कर लें। परंतु इससे उनके परिवार और विशेषकर 'शत्रु समुदाय' के परिवार की सुरक्षा खतरे में पड़ जाती है। उन्हें अपना कामकाज भी छोड़ना पड़ता है। किसी दूसरे राज्य में जाकर रोजगार पाना आसान नहीं होता और ना ही अपने परिवार से नाता तोड़ लेना और मुसीबत के समय अपने समुदाय से सहायता मिलने की उम्मीद समाप्त कर लेना सब के लिए संभव होता है।
बाबू बजरंगी को ऐसे प्रेमी युगलों को अलग करने में विशेषज्ञता हासिल थी। तरीका बहुत आसान था। लड़के के विरूद्ध अपहरण और बलात्कार का मामला दर्ज करो और गुजरात पुलिस को उसके पीछे लगा दो। उसे पकड़ने के बाद उसका इस ढंग से 'इलाज' करो कि प्रेमी युगल के सामने अलग होने के सिवाए कोई रास्ता न बचे।
-इरफान इंजीनियर

रविवार, 7 सितंबर 2014

फासिस्ट सरकार का भुतहा विकास माॅडल

    चावल का एक दाना मसलकर सारी बटलोई का हाल मालूम किया जा सकता है, फिर भी मैंने झाँककर, सूँघकर, कलही से खुदर-बुदर करके गुजरात के विकास माॅडल की बटलोई, जिसे लोकसभा चुनावों में तेज आँच पर चढ़ाया गया था, का हाल मालूम किया है। यह वही विकास माॅडल है जिसके बूते पर 2014 का कार्पोरेट प्रेरित प्रायोजित चुनावी महासमर छल और धूर्तता से विजय किया गया है। जिसमें सबसे अधिक नुकसान विरोधी पार्टियों का नहीं वरन् भारत की उस एक सौ तेरह करोड़ जनता का हुआ है जिसका इस चुनाव से किंचित सम्बंध नहीं है, क्योंकि इस सत्तारूढ़ पार्टी को देश भर से मात्र सत्रह करोड़ वोट मिले थे।
    यह वही विकास माॅडल है जिसकी भारतीय जनता को समाचार पत्रों, रेडियो, सोशल मीडिया से लेकर टी.वी. के सभी न्यूज चैनलों पर प्रत्येक पाँच-पाँच मिनट पर दुहाई दी जा रही थी। एक उभरा हुआ नेता बार-बार यह कह रहा था कि हम सारे देश को गुजरात जैसा बना देंगे। किन्तु यह विकास माॅडल जिसे एक तिलिस्म की तरह प्रयोग करके हम सबको अभिभूत किया जा रहा था इसमें एक हाॅरर है जो मुझे ही नहीं आप सभी को आतंकित करेगा और जो हर भुतही शय की भाँति बाहर और दूर से खूबसूरत लगता है। एक दिन जब मैं
गांधीनगर से अहमदाबाद जा रहा था उसी दिन चैबीस घण्टों में सात सेंटीमीटर वर्षा हुई और गुजरात का विकास माॅडल चीखने लगा। मैंने देखा कि सड़कंे नदियाँ बन गई हैं, आॅटो पानी में डूब गये हैं, कारें जहाँ की तहाँ पानी में तैरकर बन्द हो गई हैं। खैर! यह इस अन्ध विकासवाद के लिए एक स्वाभाविक बात है कोई बड़ी बात नहीं। यह विकास पानी और मनुष्य के निकलने  के सारे रास्ते बन्द कर देता है।
    सौभाग्य या दुर्भाग्य से मैं गांधीनगर जो कि गुजरात की राजधानी है, का प्रवासी हूँ। यह वही शहर है जहाँ तीन किलोमीटर का आॅटो का किराया सौ रुपये है, जहाँ चीनी पचास रुपये किग्रा0 और आलू अस्सी रुपये किग्रा0 बिकता है। जहाँ के निवासियों को कार्पोरेटी मुनाफाखोरी संस्कृति ने जानवर बना दिया है, जो सिर्फ मुनाफे की तलाश में रहते हैं और यू0पी0 बिहार के लोगों को गालियाँ देते हुए उन्हीं को ऊँची दरों पर अपने घरों का अधिकांश भाग किराये पर देते हैं। जहाँ के पुलिस और खुफिया हमेशा आतंकवादियों की तलाश में रहते हैं और न मिलने पर किसी निर्दोष मुस्लिम युवक को आतंकवादी बनाकर गायब कर देते हैं।
    चमाचम सड़कों, फुटपाथों, चैराहों और चैड़े ग्रीन मफलरों वाला यह नया-नया शहर प्रत्येक उस मध्यवर्गीय व्यक्ति को आकर्षित करता है जो सुविधा भोगी, स्वार्थी, उदरंभरि और दिखावेदार है। लेकिन इन चमाचम सड़कों और फुटपाथों के और पीछे, जहाँ ग्रीन मफलर हैं, उन्हीं से थोड़ा और आगे मफलरों के पीछे या उसी में भारत की वही राज्य दर राज्य विस्थापित की गई भोली और निर्दोष जनजातियाँ पत्ती और गत्तों के झोपड़ों में महानगरीय जीवन शैली को अपनी पीली और अतृप्त आँखों से निहारती हुई नारकीय जीवन जी रही हैं। ये शहर के हुस्न की बुनियाद है। ये जनजातियाँ जो अदृश्य मानव हंै जिन्हें कोई नहीं देख पाता या देखना नहीं चाहता, इस राज्य और देश के किसी भी विकास माॅडल का हिस्सा नहीं रही हंै। राष्ट्रवादी सरकार जिसने राष्ट्रवाद को फासीवाद का पर्याय बना रखा है। इन्हें अपने राज्य और राष्ट्र का हिस्सा नहीं मानती तथा अपने विकास माॅडल में इन्हें भागीदार नहीं बनाना चाहती क्योंकि गुजरात का विकास माॅडल सिर्फ और सिर्फ बिड़ला, अम्बानी और अडानी के लिए है। गांधीनगर की महँगाई से ऊबकर जब मैं किसी चायखाने पर चाय पीने के लिए जाता हूँ तो वहाँ खड़ा कोई सामान्य गुजराती मुझसे वार्तालाप में कह रहा होता है-मोदी जी ने हमारे वास्ते क्या किया? कुछ नई ये सब (गांधीनगर की महानगरीय व्यवस्था) तो आप लोग (बाहरी) का वास्ते हैं। बरोबर! यह सुनकर मैं मुस्कराता हूँ और चाय पीकर अपने महँगे अस्थायी आशियाने की ओर लौटता हूँ।
    मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और ओडिशा के बाद सबसे अधिक जनजातियाँ गुजरात में हैं। यानी गुजरात देश में चैथा सबसे बड़ा जनजातियों वाला राज्य है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इन्हीं जनजातियों का सबसे अधिक विस्थापन, दमन और शोषण हो रहा है। इंडियन एक्सप्रेस का गुजरात संस्करण, चाय के साथ मेरे हाथ में है और यह लेख लिखने से पहले मैंने पढ़ा है कि किस प्रकार एक बिल्डर ने राजनैतिक कार्पोरेटी धन बल की सहायता से किसी आदिवासी नागरिक की करोड़ों रुपये मूल्य की जमीन फर्जी कागजों के सहारे छीन ली है और इस प्रक्रिया में राजस्व प्रशासन का भी सहयोग है। यहाँ के कार्पोरेटी औद्योगिक विकास में भी एक फासीवाद है क्योंकि अम्बानी और अडानी के अतिरिक्त यहाँ कोई एक आटा चक्की तक नहीं लगा सकता। पूरे भारत की तरह यहाँ भी केवल सवर्णों (प्रमुख रूप से पटेल और शाह) का ही कब्जा हर क्षेत्र में है। किसी भी कमजोर अथवा आर्थिक सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति को उभरने का ये कोई भी मौका नहीं दे रहे हैं। दुःख की बात तो यह है कि इस राज्य की सरकार (जो अब पूरे देश की सरकार है) के पास इन लोगों के लिए कोई प्रभावी अथवा ठीक ठाक योजना नहीं है। विकास का दावा कर चुनाव जीतने वाली इस राज्य की सरकार में यहाँ के दलित और आदिवासी बच्चे चढ़ी हुई नदियांे में पिलकर अथवा रस्सियों के पुल पर अपनी जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते हैं।
    मैंने गुजरात के विकास माॅडल को भुतहा विकास माॅडल इसलिए कहा है कि मुझे गांधी नगर की शान्त सड़कों और यहाँ के विकास से डर लगता है, या कुछ ऐसी ही अनुभूति होती है। चमाचम सड़कों पर मुझे गरीब जनजातियों के बच्चों, महिलाओं की आत्माएँ भटकती हुई दिखाई देती हैं जिनकी हत्याकर उनके कंकालों की नींव पर इस भुतहा विकास माॅडल का ढाँचा खड़ा किया गया है। कितना हास्यापद है। कितनी घृणा होती है यह देखकर कि चमाचम सड़कों के किनारे शानदार फुटपाथों पर सुबह सुबह आदिवासियों के बच्चे कतारबद्ध उकड़ू बैठकर अपनी हाज़्ात रफा कर रहे होते हैं। गुजरात के विकसित आदर्श विकास माॅडल (जो पूरे देश में लागू होने वाला है) के बीच में, खुले आसमान के नीचे तराशे गये पत्थरों से निर्मित फुटपाथ पर इन टट्टी करते हुए बच्चों के सामने से सड़क पर कोई महंगी विदेशी कार, भीतर का वातावरण वातानुकूलित करके स्पीड से गुजर जाती है और उस कार की पाॅलिशदार चमक में, उसके शीशों पर, टट्टी करते हुए बच्चों और उनके द्वारा त्याग किये गये मल का प्रतिबिम्ब पलभर के लिए ठहर जाता है। विकास की यह तस्वीर क्या डरावनी नहीं है?
    मैं कभी नहीं चाहूँगा कि मेरे राज्य उत्तर प्रदेश में जहाँ की जनता सिर्फ कृषि पर निर्भर है, ऐसा कोई भुतहा विकास माॅडल लागू हो जिसमें यहाँ की गरीब जनता हवन सामग्री बनाकर आहुति के रूप में उग्र हिन्दुत्व  के विकास यज्ञ में झोंक दी जाए।
कोई भी सरफिरा धमका के,
जब  चाहे  जिना  कर ले
हमारा  मुल्क  इस माने में
बुधुआ  की  लुगाई  है।
-अदम गोण्डवी

-संतोष अर्श  
मोबाइल: 09919988123
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित