मंगलवार, 13 जून 2017

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2017अंक का मुख्य कवर

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2017अंक का मुख्य कवर

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2017अंक में श्री एस आर दारा पुरी का साक्षात्कार

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2017अंक में स्वतंत्रता सेनानी पूरन चन्द्र जोशी के संबंध में
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2017अंक में स्वतंत्रता सेनानी पूरन चन्द्र जोशी के संबंध में

अंग्रेजों के द्वारा किए गए शोषण के संबंध में रजनी पाम दत्त के विचार लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2017मे


बुधवार, 7 जून 2017

ये कोरस लोकतंत्र की हत्या का बैकग्राउंड म्यूज़िक है

डर के दस्तावेज़ नहीं होते हैं, डर का माहौल होता है. मेरा यही छोटा सा जवाब होता है जब कोई कहता है कि देश में इमरजेंसी नहीं है, इमरजेंसी का भ्रम फैलाया जा रहा है. सत्ता के आतंक और अंकुश का अंतिम पैमाना आपातकाल नहीं है. डराने के और भी सौ तरीके आ गए हैं, जो आपातकाल के वक्त नहीं थे.
सरकारें सबको नहीं डराती हैं, सिर्फ उन्हें डराती है, जिनसे उसे डर लगता है. ऐसे ही लोगों के आस-पास डर का माहौल रचा जाता है. यही वो माहौल है जहां से सत्ता आपको डराती है.
यूनिवर्सिटी में इंटरनेट कनेक्शन काट दिया जाता है. पटेल आंदोलन होता है तो इंटरनेट बंद कर दिया जाता है. दलित आंदोलन होता है तो इंटरनेट बंद हो जाता है. मध्य प्रदेश के मंदसौर में इंटरनेट बंद करने का क्या तुक रहा होगा? क्या मंदसौर में मॉस्को जितनी इंटरनेट कनेक्टिविटी होगी?
रवीश कुमार

'डर का दस्तावेज़ फाइलों में नहीं मिलेगा'

गोली खाने वाले किसानों की 'डिजिटल और डेटा हिस्ट्री' चेक की जाएगी?
सरकार को जब जनता से डर लगता है, तब उसका विश्वास इंटरनेट से उठ जाता है लेकिन जब बर्मा और बांग्लादेश की फर्ज़ी तस्वीरों को लेकर सांप्रदायिक उन्माद फैलाया जाता है, तब इंटरनेट बंद नहीं किया जाता है.
यही वो उन्माद है जो हमारे समय में डर का दस्तावेज़ है. जो फाइलों में नहीं मिलेगा, माहौल में मिलेगा.
फ़ोन पर गालियां देने वाला ख़ुद को कोलकाता का बता रहा था, कह रहा था कि तुम सुधर जाओ जबकि मैं छह जून को किसानों की आमदनी पर चर्चा करके स्टूडियो से निकला था.
किसानों को सच बताना गलत है?क्या किसानों को यह बताना ग़लत है कि आपकी मासिक आमदनी 1600 रुपये है. सरकार ने लागत में पचास फीसदी जोड़कर दाम देने का अपना वादा पूरा नहीं किया है.
क्या किसानों की बात करने पर गालियां दी जाएंगी? बहरहाल, जिस तरह की गाली दी गई, उसे मैं भारतीय संस्कृति का दुर्लभ दस्तावेज़ मानता हूं, इन सबको संकलित कर संसद के पटल पर रखा जाना चाहिए.
किसान
जब से एनडीटीवी के प्रमोटर के यहां सीबीआई ने छापे मारे हैं, तब से ऐसे फोन की तादाद बढ़ गई है. एनडीटीवी को लेकर पहले से झूठ की सामग्री तैयार रहती है, उसी का वितरण समय-समय पर चालू हो जाता है. फोन पर कोई मुझे माओवादी कहता है, कोई अलगाववादी.
कोई देख लेने की धमकियां दे रहा है, व्हाट्सऐप के ज़रिए लगातार अफ़वाह फैलाई जा रही है कि मैं माओवाद का समर्थन करता हूं. अहमदाबाद एयरपोर्ट पर ख़ुद को बीजेपी का समर्थक बताने वाले एक सज्जन को नहीं समझा सका कि मैं माओवाद का समर्थन नहीं करता हूं.
'मेरे जैसे लोग सड़क पर घेर कर मार दिए जाएंगे'व्हाट्सऐप के ज़रिए फैलाए जाने वाला झूठ एक दिन लोगों के मन में रेफरेंस प्वाइंट बन जाता है. वो उसी चश्मे से देखने लगते हैं. जिस दिन बहुत से लोग इस झूठ पर यक़ीन कर लेंगे, मेरे जैसे लोग सड़क पर घेर कर मार दिए जाएंगे.
उनकी हत्या का आदेश गृह मंत्रालय की फाइल में नहीं मिलेगा. माहौल में मिलेगा जिसे राजनैतिक तौर पर रचा जा रहा है.
अफ़वाह भारत का नया राजनीतिक उद्योग है. राजनीतिक दल का कार्यकर्ता अब इस अफवाह को फैलाने वाला वेंडर बन गया है. सिर्फ दो सवाल कीजिए, आपको सारे जवाब मिल जाएंगे. ये लोग कौन हैं और कौन लोग इनके समर्थन में हैं.
'मोदी का ट्विटर हैंडल सब बता देगा'इसके लिए आपको बार-बार प्रधानमंत्री मोदी के ट्विटर हैंडल पर जाकर चेक करने की ज़रूरत नहीं है, बहुत से गायक, लेखक, समाजसेवी बनकर घूम रहे लोगों की टाइमलाइन से भी आप इसकी पुष्टि कर सकते हैं.
ये वही लोग हैं जो किसानों और ग़रीबों की बात करने पर किसी को नक्सल घोषित कर रहे हैं. तभी तो मुख्यमंत्री कह पाते हैं कि किसान पुलिस की गोली से नहीं मरे, असामाजिक तत्वों की गोली से मरे हैं. एक और मुख्यमंत्री हैं जो कहते हैं कि जो लोग किसानों को आंदोलन के लिए भड़का रहे हैं वो पाप कर रहे हैं.
देश भर में अनेक जगहों पर किसान आंदोलन कर रहे होते हैं, एक दिन सोशल मीडिया पर उनके ख़िलाफ़ भी अभियान चलेगा कि ये किसान नहीं, पापी हैं.
आजकल कई पत्रकारों को विपक्ष के किसी नेता के ख़िलाफ़ कोई स्टोरी दे दीजिए, फिर देखिए उनके चेहरे पर कैसी आध्यात्मिक खुशी छा जाती है. आप इन्हीं पत्रकारों को केंद्र के ख़िलाफ़ या सत्ताधारियों के ख़िलाफ़ कोई स्टोरी दे दीजिए, फिर उनकी चुप्पी देखिए.
पत्रकार का काम होता है सरकार के दावों पर पहले संदेह करे, जांच करे. इन दिनों सरकार की बात पर यकीन करने वाले पत्रकारों का समूह बढ़ गया है. इन पत्रकारों के पास सबसे बड़ा तर्क यह है कि पहले भी तो होता था.
मोदी

'वो एक दिन स्टूडियो में ही गोली चला देंगे' 

भारतीय पत्रकारिता में सरकार परस्ती बढ़ गई है. सरकार से प्यार करने वाले पत्रकारों की आपूर्ति मांग से ज़्यादा है इसलिए अब पत्रकार हुकूमत की नज़र में आने के लिए कुछ भी कर सकते हैं.

यही कारण है कि ऐसे पत्रकारों में होड़ मची है कैसे हुकूमत की नज़र में आ सकें. चीख कर, चिल्ला कर, धमका कर या उकसा कर. वो एक दिन स्टूडियो में ही गोली चला देंगे.
जिन दोस्तों से बात करता हूं वो हर दूसरी बात के बाद यही कहते हैं कि फोन तो रिकॉर्ड नहीं हो रहा है. मेरे पास इसका कोई प्रमाण नहीं है मगर माहौल में यह बात है कि फोन रिकॉर्ड हो रहा है.
चुप रहने की सलाह बढ़ती जा रही है. जानता हूं भीड़ कुछ भी कर सकती है. यह भीड़ गौमांस के नाम पर किसी मुसलमान को मार सकती है, यह भीड़ बच्चा चोरी की अफवाह पर किसी हिन्दू को मार सकती है, यही भीड़ लंगर के लिए अनाज मांग रहे किसी सिख सेवादार की पगड़ी उछाल सकती है.

'यह भीड़ नहीं, राजनीति का नया रॉकेट है'

यूपी में जब पुलिस अधिकारी नहीं बचे तो मैं सुरक्षा किससे मांगू. कहीं ऐसा न हो जाए कि यूपी का एसएसपी बजरंग दल के नेताओं की सुरक्षा में ड्यूटी पर जा रहा हो.
यह भीड़ नहीं, राजनीति का नया रॉकेट है जिसका हर दिन प्रक्षेपण किया जाता है. सतर्क रहने की चेतावनी जब बढ़ जाए तो इसका मतलब है कि डर का सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक वितरण व्यापक हो चुका है.
डर का माहौल हर जगह नहीं होता है. उन्हीं के आसपास होता है जो सामाजिक आर्थिक मसलों पर बोलते हैं. यह व्यक्ति भी हो सकता है और समूह भी. दो रोज़ पहले पुरानी दिल्ली के किनारी बाज़ार से एक फोन आया था. कहने लगे कि हम व्यापारी हैं, अब हम खुलकर तो नहीं बोल सकते वरना ये सेल्स टैक्स और सीबीआई लगा देंगे, सोशल मीडिया से गाली दिलवा देंगे.
अच्छा है कि भाई साहब आप खुलकर बोलते हो. कोई तो बोल रहा है.
'फोन से डर की आवाज़ आ रही थी'
मैं हर विषय पर नहीं बोलता हूं. बोलने की पात्रता भी नहीं रखता. मेरी इस सफाई से किनारी बाज़ार के व्यापारी को कोई फर्क नहीं पड़ा. उनकी आवाज़ में डर था. मेरा हौसला बढ़ाने के लिए किया गए फोन से डर की आवाज़ आ रही थी.
ठीक इसी समय में बहुत से पत्रकार बोल रहे हैं. लिख रहे हैं मगर उनकी खबरों की पहुंच लगातार सीमित होती जा रही है. वो सब अपने-अपने संस्थान और मोहल्ले में अकेले हैं. जो हुकूमत के सुर से सुर मिलाकर गीत गा रहे हैं, उनकी आवाज़ ज़्यादा है. आप इस कोरस को ग़ौर से सुनियेगा. इस कोरस से जो संगीत निकल रहा है, वो भय का संगीत है.

लोकतंत्र की हत्या से पहले का बैकग्राउंड म्यूज़िक है.

भारत का मीडिया डर की राजधानी में रहता है. हम सब उस राजधानी से रोज़ गुज़रते हैं. डर सीबीआई का नहीं है, उस भीड़ का है जो थाने के बाहर भी है, अदालत के परिसर में भी. इस भीड़ को लेकर जो लोग नरम हैं, वही तो डर के दस्तावेज़ हैं.
वैसे लोग फाइलों में नहीं मिलते, आपके पड़ोस में हैं.
 

रविवार, 28 मई 2017

सीमा पर जवान सरकार की नीतियो के कारण शहीद हो रहे है-डा0 गिरीश

बाराबंकी। फतेहपुर कस्बें में आयोजित भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के तीन दिवसीय शिक्षा अध्ययन शिविर के तीसरे दिन कार्यकर्ताओ को सम्बोधित करते हुये प्रदेश सचिव डा0 गिरीश शर्मा ने कहा कि सीमा पर जवानो को सरकार की नीतियो के कारण लोग शहीद हो रहे है। और सत्तारुढ़ दल उनकी शहादत पर राजनीति कर वोट बैंक को बढ़ाने का काम कर रही है।
                                        अध्ययन शिविर को सम्बोधित करते हुये गोण्ड़ा के वरिष्ठ अधिवक्ता सुरेश त्रिपाठी ने कहा कि कार्यकर्ताओ को नित्य अपने कार्यक्रम निश्चित करना चाहिए। और प्रतिदिन उसकी समीक्षा करनी चाहिए और समय का सद्उपयोग करना चाहिए। अध्ययनशील होकर जनपक्षीय साहित्य का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। भौतिकवादी चिन्तन धारा के महापुरुषो की कृतियो की जैसे राहुल सांकृत्यायन, मुंशी प्रेमचन्द, डा0 अम्बेड़कर आदि का अध्ययन कर प्रचारित करना चाहिए। भारतीय संविधान की मूल धाराओ की रक्षा करने के लिए पढ़े-लिखे चिन्तनशील व्यक्तियो को व प्रमुख रुप से अधिवक्ताओ का आगे आना चाहिए। 
                                  पार्टी के केन्द्रीय शिक्षा विभाग अध्यक्ष अनिल राजिमवाले ने शिविर को सम्बोधित करते हुये कहा कि साथियो को वैचारिक प्रशिक्षण के लिए आज ज्यादा महत्व का हो गया है। क्योकि शासक पार्टी द्वारा बहुत बड़ा वैचारिक आक्रमण किया जा रहा है। देश के इतिहास संस्कृति, राष्ट्रभाषा की अलग-अलग परिभाषा बताई जा रही है। अर्थव्यवस्था और जनतन्त्र इन दोनो पर खतरा है। इसलिए हमारा प्रशिक्षण शिविर इसका जवाब देने मे सक्षम बनाएंगा। 
                                     पार्टी के जिला सचिव बृज मोहन वर्मा ने सभी शिक्षार्थियो को जनपद आने के लिए धन्यवाद किया। वही पार्टी सहसचिव रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि संघ की जहरीली विचारधारा को समाप्त करने के लिए जनपद के विभिन्न जगहो में आयोजित किये जायेगें। 
                                        शिविर मे पुष्पेन्द्र सिंह, विनय कुमार, गिरीश चन्द्र, रामनरेश, अधिवक्ता सरदार भूपिन्दर पाल सिंह, अमर सिंह, विजय प्रताप सिंह, प्रवीन कुमार निर्मल वर्मा, अमर सिंह प्रधान, आनन्द प्रताप सिंह, राजेन्द्र सिंह राणा, कर्मवीर सिंह, नीरज वर्मा मौजूद रहे।

शनिवार, 20 मई 2017

गुलजार वानी निर्दोष साबित हुए

बाराबंकी। शनिवार को साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन बम विस्फोट कांड के मुख्य संदिग्ध आतंकी गुलजार अहमद बानी व उसके साथी अब्दुल मुबीन को अपर जिला जज कोर्ट नंबर 1 महमूद अहमद खां की कोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया गया। 14 अगस्त 2000 को रोजा गाव स्टेशन पर हुए बम विस्फोट में नौ लोगों की मौत हो गई थी। जबकि 40 लोग घायल हो गए थे। इस मामले की सुनवाई करते हुए अपर जिला जज कोर्ट नंबर 1 की कोर्ट ने आरोपियों को दोषमुक्त करते हुए कहा कि प्रकरण में अभियोजन की लापरवाही से आरोपी दोषों से मुक्त हो रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि सबूतों के अभाव में इन दोनों संदिग्ध आतांकियों को दोषमुक्त कर दिया गया है। बता दें कि साबरमती एक्सप्रेस में 14 अगस्त 2000 को बम विस्फोट किया गया था। इस मामले के आरोपी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (ए0एम0यू) के पूर्व शोध छात्र गुलजार अहमद वानी पिछले 16 साल से जेल में बंद है। वहीं गुलजार को दिल्ली पुलिस ने जुलाई 2001 में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया था। उन्हें दिल्ली के अलग-अलग इलाकों और यूपी के आगरा, कानपुर समेत विभिन्न शहरों में हुए 11 मामलों में आरोपी बनाया गया था। बाकी सभी मामलों में कोर्ट पहले ही आरोपी को बरी कर चुकी है। तो वही साथी अब्दुल मुबीन को पूर्व में जमानत मिल चुकी थी।

साबरमती विस्फोट के आरोपियों को आज साक्ष्यो के अभाव में न्यायालय श्रीमान अपर जिला जज कोर्ट नंबर 1 महोदय द्वारा दोषमुक्त कर दिया गया। अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए पूर्व में आरोपियों के बचाव पक्ष के अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हुए कहा की उक्त केस में फर्जी फसाये गए गुलजार अहमद वानी व अब्दुल मुबीन को आज सच में न्याय मिला है। न्यायालय ने आज दोनों को दोषमुक्त करते हुए पीडितो को न्याय दिया है। न्यायालय में बहस से लेकर जिरह तक अभियोजन इनके ऊपर लगाये गए आरोपों को सिद्ध कर पाने में भी नाकाम रहा है

गुरुवार, 18 मई 2017

वामपंथ ही दलितों का स्वाभाविक सहयोगी : दारापुरी


    यह साक्षात्कार लोक संघर्ष पत्रिका के प्रबंध सम्पादक-रणधीर सिंह ‘सुमन’ ने वर्तमान सन्दर्भों में दलितों की भूमिका पर एस0आर0 दारापुरी पूर्व पुलिस महानिरीक्षक उ0प्र0 की जुबानी
प्रश्न-    बहुजन समाज पार्टी का क्या भविष्य है?
उत्तर-    मेरे विचार में बहुजन समाज पार्टी का बिखराव और तेज होगा क्योंकि दलितों के एक बड़े हिस्से का भी बसपा से मोहभंग हो गया है और उन्होंने दलित नेतृत्व पर उंगली उठानी शुरू कर दी है। मायावती ने चुनाव में हारने के बाद किसी भी प्रकार की अपने ऊपर जिम्मेदारी नहीं ली है जबकि दलित उन कारणों को बड़े स्पष्ट रूप से जान रहे हैं। इसके अलावा मायावती ने न तो आज तक कभी दलित एजेण्डा बनाया है और न ही दलित उत्पीड़न के मामलों में कोई प्रभावशाली प्रतिक्रिया ही दिखाई है इससे दलित मायावती को केवल वोट और नोट लेने तक ही सीमित होना देख रहे हैं।
प्रश्न-    मायावती और उनके भाई आनन्द कुमार के खिलाफ जो जांचे चल रही है उससे मायावती का अगला कदम क्या हो सकता है?
उत्तर-    अब तक की  जांचो में मायावती और उसका भाई काफी हद तक फंसते दिखाई दे रहे है। जिस कारण मायावती सत्तारूढ़ दल का विरोध नहीं कर सकती है, इस कारण मायावती को सत्तारूढ़ पार्टी जैसे पहले कांग्रेस  , वर्तमान में भाजपा के सहयोग में रहना एक बाध्यता है।
प्रश्न-    अधिकांश दलित चिन्तक और साहित्यकार, राजनेता वामपंथ के विरोध करते है, इसका क्या कारण हो सकता है?
उत्तर-    मेरे विचार में इसका मुख्य कारण दलितों और वामपंथियों के बीच में जान बूझकर भ्रान्तियां पैदा की गयी हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि शुरू के दौर में डा अम्बेडकर के अधिकतर जन आन्दोलन वामपंथियों के साथ मिलकर चलाए गये थे। उदाहरण के लिए सन् 1940 में भारत की सबसे बड़ी और सबसे सफल काटन मिल मजदूरों की हड़ताल डा0 अम्बेडकर और वामपंथियों ने मिलकर करवायी थी। इसके बाद भी डा अम्बेडकर के कुछ उच्च स्तरीय वामपंथ की विचारधारा से कुछ मुद्दों पर मतभेद था जैसे राज्य का लोप हो जाना अधिनायक वाद तथा क्रान्ति में हिंसा की अनिवार्यता इसके अतिरिक्त डा अम्बेडकर ने कहीं भी मार्क्सवाद का विरोध नहीं किया है। इसके विपरीत उन्होंने तो बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद में बहुत समानता होने की भी बात स्वीकार की थी।
        डा अम्बेडकर के बाद डा अम्बेडकर द्वारा स्थापित पार्टी आर0पी0आई0 पार्टी का सबसे बड़ा सहयोग वापमंथी पार्टियों के साथ ही रहा है और उत्तर प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां पर ‘नीली टोपी लाल टोपी’ के साथ का नारा था।
        मेरे विचार में यह सही है कि शुरू में वामपंथ अधिकतर वर्ग संघर्ष की बात ही करता रहा और उसने जाति संधर्ष और जातीय उत्पीड़न को उतना महत्व नहीं दिया परन्तु अब वामपंथ ने वर्ग संघर्ष के साथ-साथ जातीय संघर्ष को भी अपने एजेण्डे पर लिया है और उसके अनुसार कार्यवाहियां भी की है। यह भी सही है कि वामपंथ का रास्ता संघर्ष का रास्ता है परन्तु कुछ दलित नेताओं को इस कठिन रास्ते में परहेज रहा है।
        वर्तमान परिस्थितियों में राजनैतिक तौर पर तथा सामाजिक संघर्ष के स्तर पर वामपंथी ही दलितों के सबसे नजदीक है और एक तरीके से उनके स्वाभाविक सहयोगी है
प्रश्न-    हिन्दू धर्म के दलितों के उत्पीड़न से क्षुब्ध होकर डा अम्बेडकर ने बौध धर्म अपने समर्थकों के साथ धारण कर लिया था। वर्तमान परिस्थितियों में क्या दलित समुदाय हिन्दू कट्टरपंथियों के सामने नतमस्तक हो रहा है?
उत्तर-    डा0 अम्बेडकर ने बौध धर्म को दलितों की सामाजिक, आर्थिक मानसिक मुक्ति के लिए अपनाया था। उनको प्रेरणा से दलितों के एक हिस्से ने बौध धर्म को अपनाया भी है और उन्होंने हिन्दू दलितों की अपेक्षा प्रगति भी की है।
        दुर्भाग्य से दलित कोई एक होमोजेनियस वर्ग नहीं है तथा विभिन्न जातीयों में विभाजित है अभी तक बौध धर्म का फैलाव दलितों की कुछ विशेष जातियों तक ही हुआ है। अधिकतर दलित अभी भी हिन्दू बने हुए है। पिछले कुछ समय से आर0एस0एस0 ने बहुत सचेतन प्रयास करके इन हिन्दू दलितों में हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार किया है उनकी बस्तियों में विभिन्न महापुरूषों के मन्दिर बनवाया है सहभोज करवाया है तथा प्रवचनों का आयोजन किया है।
        इसके अतिरिक्त भाजपा तथा आर0एस0एस0 ने हिन्दू दलितों की उपजातियों को राजनैतिक तौर पर बरगलाकर अपने हिन्दुत्व की छतरी के नीचे ले आये हैं। इससे यह कहा जा सकता है कि आर0एस0एस0 और भाजपा कुछ हद तक दलितों को कट्टर हिन्दू की ओर आकर्षित करने में सफल हुए है परन्तु फिर भी दलितों की बड़ी जातिया अभी भी हिन्दुत्व के प्रभाव से बड़ी जातिया बची हुई है।

*प्रतिशोध और प्रतिरोध*



मैं आप को दो जीवन और उनके क्रांतिकारी सिद्धांत और क्रांतिकारी  कार्यवाइयों को प्रस्तुत कर रहा हूँ। देखना यह है कि इनके सिद्धांत और कार्यवाइयों से आप कितने संतुष्ट हैं। जहाँ चारू मजूमदार को जेल में डाल कर उनकी हत्या कर दी गई थी और उनके मृत शरीर को न तो उनके घर वालों को दिया गया और न ही उनके संगठन के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को ही दिया गया। वहीं कानू सान्याल कई बार क्रांतिकारी कार्यवाइयों की वजह से जेल की यातनाएं काटे। अन्त में 2010 में उन्होंने आत्म हत्या कर लिया। आप को पड़ताल यह करना हैं कि कौन सी ऐसी परिस्थियाँ थीं जिसकी वजह से चारू मजूमदार को जेल में मार डाला गया तथा कौन सी ऐसी परिस्थिति ने जन्म लिया जिससे वृद्धावस्था में कामरेड कानू सान्याल को आत्महत्या करना पड़ा। दोनों सामाजिक ज्याजातियों के विरुद्ध एक सुन्दर समाज की रचना के लिए संघर्षरत थे। हाँ,अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों से सिर्फ इतनी ही भिन्नता थी कि जहाँ अन्य पार्टियाँ सशस्त्र क्राँति के समय से इंकार कर रही थीं,वहाँ ये दोनों क्रांतिकारी सशस्त्र विद्रोह में ही समाजवादी क्राँति को सफल मान रहे थे।
चारू मुजुमदार:
चारू का जन्म 1918 में सिलीगुड़ी में हुआ। उसके पिता एक स्वतन्त्रता सेनानी थे। 1937-38 में कॉलेज की पढ़ाई को छोड़कर चारू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए और बीड़ी कर्मचारियों को संगठित करने के प्रयास में जुट गए। इसके पश्चात वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए ताकि इसकी किसान शाखा के लिए काम कर सकें। जल्द ही उनके नाम एक गिरफ़्तारी का वॉरंट जारी हुआ जिसके कारण उन्हें बाएँ कार्यकर्ता के रूप में पहली बार भूमिगत होना पड़ा। हालांकि सीपीआई को प्रथम विश्व युद्ध के समय प्रतिबंधित किया गया था, वह सीपीआई की गतिविधियों को किसानों के बीच जारी रखे और जलपुरीगंज जिला कमिटि के 1942 में सदस्य बन गए थे। इस प्रगति से प्रेरित होकर चारू ने फ़सल को क़ब्ज़े लेने का अभियान जलपुरीगंज में 1943 के बड़े अकाल के दौरान सफलतापूर्वक चलाया। 1946 में वह तेभागा आन्दोलन से जुड़े और उत्तर बंगाल के कामगारों के लिए हथियारबंद आन्दोलन शुरू किया। इसके पश्चात वह कुछ समय के लिए दार्जीलिंग के चाय के बागानों के कर्मचारियों के बीच काम करते रहे।
सीपीआई को 1948 में प्रतिबंधित किया गया था। चारू ने अगले तीन वर्ष जेल में बिताए। जनवरी 1954 में चारू ने लीला मुजुमदार सेनगुप्ता शादी की जो जलपुरीगंज से सी पी आई की सदस्या रही थी। इस जोड़े ने सिलीगुड़ी की ओर प्रस्थान किया जो अगले कुछ सालों तक मुजुमदार की गतिविधियों का केन्द्र बना रहा। यहीं पर उसके बीमार पिता और अवैवाहित बहन गम्भीर दरिद्रता का जीवन जी रहे थे।
1960 की दशक से मध्य में मजुमदार ने उत्तर बंगाल में सी पी एम में एक बाईं टुकड़ी बनाई। 1967 में नक्सलबाड़ी में एक हथियारों से लैस किसान विद्रोह छिड़ गया जिसकी अगुवाई कॉमरेड कानू सान्याल कर रहे थे। इस दल को आगे चलकर नक्सली कहा जाने लगा। ऐसे समय पर चारू ने आठ लेख लिखे थे जिनका उद्देश्य यह था कि सफल क्रांति चीनी क्रांति के मार्ग पर हिंसात्मक संघर्ष का रूप ले सकती है। 1969 में चारू ने "ऑल इंडिया कोऑरडिनेशन कमिटी ऑफ़ कम्यूनिस्ट रेवोलूशनरीज़" बनाई जिसके वह जेनेरल सेकरेटरी बने। जुलाई 16, 1972 को चारू को अपने खुफ़िया ठिकाने से पकड़ा गया और 28 जुलाई, 1972 की रात 4 बजे वह लॉक-अप में ही गुप्त रूप से मार डाले गए। मृत शरीर भी परिवार को नहीं सौंपा गया। पुलिस, निकटतम परिवारजनों के साथ शरीर को शवदाहगृह ले गई। पूरा इलाका घेरे में लिया गया था और किसी भी दूसरे रिश्तेदार को जिस्म को जलाते समय अन्दर आने की अनुमति नहीं दी।
कानू सान्याल:
कानू सान्याल (जन्म १९३२) भारत में नक्सलवादी आंदोलन के जनक कहे जाने हैं। दार्जीलिंग जिले के कर्सियांग में जन्में कानू सान्याल अपने पांच भाई बहनों में सबसे छोटे हैं। पिता आनंद गोविंद सान्याल कर्सियांग के कोर्ट में पदस्थ थे। कानू सान्याल ने कर्सियांग के ही एमई स्कूल से १९४६ में मैट्रिक की अपनी पढ़ाई पूरी की। बाद में इंटर की पढाई के लिए उन्होंने जलपाईगुड़ी कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। उसके बाद उन्हें दार्जीलिंग के ही कलिंगपोंग कोर्ट में राजस्व क्लर्क की नौकरी मिली। कुछ ही दिनों बाद बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में रहते हुए उनकी मुलाकात चारु मजुमदार से हुई। जब कानू सान्याल जेल से बाहर आए तो उन्होंने पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली। १९६४ में पार्टी टूटने के बाद उन्होंने माकपा के साथ रहना पसंद किया। १९६७ में कानू सान्याल ने दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की। अपने जीवन के लगभग १४ साल कानू सान्याल ने जेल में गुजारे। कुछ दिनों वे भाकपा माले के महासचिव के बतौर सक्रिय थे और नक्सलबाड़ी से लगे हुए हाथीघिसा गांव में रहते थे। और अंत में, 2010 में आत्महत्या कर लिया।
नक्सलवाद:
नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है जहाँ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 मे सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की। मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरुप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। 1967 में "नक्सलवादियों" ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। 1971 के आंतरिक विद्रोह (जिसके अगुआ सत्यनारायण सिंह थे) और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया।
आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गये हैं और संसदीय चुनावों में भाग भी लेते है। लेकिन बहुत से संगठन अब भी छद्म लड़ाई में लगे हुए हैं। नक्सलवाद के विचारधारात्मक विचलन की सबसे बड़ी मार आँध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड और बिहार को झेलनी पड़ रही है।
माओवाद:
माओवाद (1960-70 के दशक के दौरान) चरमपंथी अतिवादी माने जा रहे बुद्धिजीवी वर्ग का या उत्तेजित जनसमूह की सहज प्रतिक्रियावादी सिद्धांत है। माओवादी राजनैतिक रूप से सचेत सक्रिय और योजनाबद्ध काम करने वाले दल के रूप में काम करते है। उनका तथा मुख्यधारा के राजनैतिक दलों में यह प्रमुख भेद है कि जहाँ मुख्य धारा के दल वर्तमान व्यवस्था के भीतर ही काम करना चाहते है वही माओवादी समूचे तंत्र को हिंसक तरीके से उखाड़ के अपनी विचारधारा के अनुरूप नयी व्यवस्था को स्थापित करना चाहते हैं। वे माओ के इन दो प्रसिद्द सूत्रों पे काम करते हैं :
1. राजनैतिक सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है।
2. राजनीति रक्तपात रहित युद्ध है और युद्ध रक्तपात युक्त राजनीति।
भारतीय राजनीति के पटल पर माओवादियों का एक दल के रूप में उदय होने से पहले यह आन्दोलन एक विचारधारा की शक्ल में सामने आया था पहले पहल हैदराबाद रियासत के विलय के समय फिर 1960-70 के दशक में नक्सलबाड़ी आन्दोलन के रूप में वे सामने आए।
भारत में माओवाद के कारण:
भारत में माओवाद के निम्नलिखित कारण हैं।
राजनैतिक:
भारत में माओवाद असल में नक्सलबाड़ी के आंदोलन के साथ पनपा और पूरे देश में फैल गया। राजनीतिक रूप से मार्क्स और लेनिन के रास्ते पर चलने वाली कम्युनिस्ट पार्टी में जब विभेद हुये तो एक धड़ा भाकपा मार्क्सवादी के रूप में सामने आया और एक धड़ा कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में. इनसे भी अलग हो कर एक धड़ा सशस्त्र क्रांति के रास्ते पर चलते हुये पड़ोसी देश चीन के माओवादी सिद्धांत में चलने लगा। भारत में माओवादी सिद्धांत के तहत पहली बार हथियारबंद आंदोलन चलाने वाले चारु मजूमदार के बेटे अभिजित मजूमदार के अनुसार चारू मजूमदार जब 70 के दशक में सशस्त्र संग्राम की बात कर रहे थे, तो उनके पास एक पूरी विरासत थी। 1950 से देखा जाय तो भारतीय किसान, संघर्ष की केवल एक ही भाषा समझते थे, वह थी हथियार की भाषा। जिन्होंने जमींदारों के खिलाफ, ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हथियार उठाया था। 1922 में चौराचौरी में 22 पुलिस वालों को जलाया गया था, उसमें भी सबसे बड़ी भागीदारी किसानों की थी। उसके बाद ही तो गांधीजी ने असहयोग और अहिंसक आंदोलन की घोषणा की थी। लेकिन किसानों ने तो अपने तरीके से अपने आंदोलन की भाषा समझी थी और उसका इस्तेमाल भी किया था।
आर्थिक:
विकास की बड़ी योजनाएँ भी अनेक लोगों को विस्थापित कर रही है अतीत में ये बड़े बाँध थे और आज सेज बन गए है, पुनर्वास की कोई भी योजना आज तक सफल नही मानी गयी है इससे जनता में रोष बढ़ता ही जाता है इसी रोष को लक्षित कर माओवादी पार्टी ने अपने पिछले सम्मेलन में साफ़ रूप से कहा था कि वो इस प्रकार की विकास परियोजनओं का विरूद्ध करेंगे तथा विस्थापितों का साथ भी देंगे यदि वे ऐसा करते है तो निश्चित रूप से एक राज्य के रूप में हमारा देश नैतिक अधिकार खो बैठैगा और उनके प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि अपने आप ही हो जायेगी। अगर आर्थिक कारणों को देखा जाए तो वे भी माओवाद के प्रसार के लिए काफी सीमा तक जिम्मेदार है यधपि पिछले 30 सालों में निर्धनता उन्मूलन के प्रयासों को भारी सफलता मिली है लेकिन यह भी माना ही जाता रहा कि ये योजनाएँ भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता का गढ़ रही है तथा निर्धनता उन्मूलन के आंकड़े बहुत भरोसे के लायक नहीं माने जा सकते है आबादी का बड़ा हिस्सा निर्धनता की रेखा से जरा सा ही ऊपर है, तकनीकी रूप से भले ही वो निर्धन नहीं हो लेकिन व्यवहार में है और अर्थव्यवस्था में आया थोडा सा बदलाव भी उन्हें वापिस रेखा से नीचे धकेल देने के लिए काफी होता है। फ़िर जिस अनुपात में कीमतें बढ़ जाती है उसी अनुपात में निर्धनता के मापदंड नहीं बदले जाते है इस से बड़ी संख्या में लोग निर्धनता के चक्र में पिसते रहते है; फ़िर क्या लोग इस चीज से संतोष कर लिए कि अब वो गरीब रेखा से ऊपर आ गए है ?जबकि अमीर उनकी आँखों के सामने और अमीर बनते जा रहे है फ़िर वो लोग ही क्यो उसी हाल में बने रहे ?
भारत के आंतरिक क्षेत्र जो विकास से दूर है तथा इलाके जो आज माओवाद से ग्रस्त है वे इसी निर्धनता से ग्रस्त है। बेरोजगारी भी अनेक समस्याओं को जन्म देती है इसके चलते विकास रूका रहता है, निर्धनता बनी रहती है तथा लोग असंतुष्ट बने रहते है, यह लोगों को रोजगार की तलाश में प्रवासी बना देती है, पंजाब के खेतों में काम करते बिहारी मजदूर इसका सबसे अच्छा उदाहरण माने जा सकते हैं।
सामाजिक:
भूमि सुधार कानून जो 1949 - 1974 तक एक श्रृंखला के रूप में निकले थे, विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भी हुआ लेकिन आज भी देश में भूमि का न्यायपूर्ण वितरण भूमिहीनों तथा छोटे किसानों के बीच न्यायपूर्ण तरीक से नही हुआ है। पुराने जमींदारों ने कई चालों के जरिये अपनी जमीन बचा ली और वक्त के साथ साथ जमींदारों की नई नस्ल सामने आ गयी जो बेनामी जमीन रखती है और गरीब उतना ही लाचार है जितना पहले था
अनुसूचित जनजाति और जाति के लोग भारत में लंबे समय तक हाशिये पे धकेले हुए रहे हैं वैसे मानव भले ही स्वभाव से सामाजिक प्राणी रहा हो जो हिंसा नही करता लेकिन जब एक बड़े वर्ग को समाज किसी कारण से हाशिये पे धकेल देता हैं और पीढी दर पीढी उनका दमन चलता रहता हैं।
भारत में एक बड़ी आबादी जनजातीय समुदाय की हैं लेकिन इसे मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर आज तक नही मिला हैं आज भी सबसे धनी संसाधनों वाली धरती झारखंड तथा उडीसा के जनजातीय समुदाय के लोग निर्धनता और एकाकीपन के पाश में बंधे हुए हैं। नक्सलवाद अपने शुरू के दिनों से ही बहुत ही बदनाम रहा है। आज इसे आतंकवाद की श्रेणी में गिना जाता है।
आतंकवाद एक प्रकार के माहौल को कहा जाता है। इसे एक प्रकार के हिंसात्मक गतिविधि के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो कि अपने आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं विचारात्मक लक्ष्यों की प्रतिपूर्ति के लिए गैर-सैनिक अर्थात नागरिकों की सुरक्षा को भी निशाना बनाते हैं। गैर-राज्य कारकों द्वारा किये गए राजनीतिक, वैचारिक या धार्मिक हिंसा को भी आतंकवाद की श्रेणी का ही समझा जाता है। अब इसके तहत गैर-क़ानूनी हिंसा और युद्ध को भी शामिल कर लिया गया है। अगर इसी तरह की गतिविधि आपराधिक संगठन द्वारा चलाने या को बढ़ावा देने के लिए करता है तो सामान्यतः उसे आतंकवाद नही माना जाता है, यद्यपि इन सभी कार्यों को आतंकवाद का नाम दिया जा सकता है। गैर-इस्लामी संगठनों या व्यक्तित्वों को नजरअंदाज करते हुए प्रायः इस्लामी या जिहादी के साथ आतंकवाद की अनुचित तुलना के लिए इसकी आलोचना भी की जाती है।
विश्व के प्रमुख आतंकवादी संगठन आईएसआईएस, अल कायदा, कौमी एकता मूवमेंट, बास्कस, आयरिश नेशनल लिबरेशन आर्मी, आयरिश रिपब्लिक आर्मी,रेड ब्रिगेड्स, शाइनिंग पाथ,  रेड आर्मी गुट, हिज्बुल्लाह्, पापुलर फ्रंट फार लिबरेशन आफ पैलेस्टाइन, अबु निदाल गुट, उल्स्टर डिफेंस एसोसिएशन, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट, डेमोक्रेटिक फ्रंट फार लिबरेशन आफ पैलेस्टाइन, पीपुल्स मूवमेंट फार लिबरेशन आफ अंगोला,सराजो, अल्फोरा विवा, फाराबंदो मार्ती लिबरेशन फ्रंट, कुक्लुल्स क्लान, नेशनल यूनियन फार द टोटल, इंडीपेंडें आफ अंगोला, तमिल इलाम मुक्ति शेर, ख्मेर रूज, नेशनल लिबरेशन आर्मी, नेशनल डिग्रीटी कमांड, विकटर पोले, कारेन नेशन लिबरेशन आर्मी, जैश-ए-मोहम्म्द, हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी, रणवीर सेना, उल्फा, बब्बर खालसा इंटरनेशनल, खालिस्तान कमांडो फोर्स, इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद, हरकत उल मुजाहिदीन, हरकत उल अंसार, हरकत उल जेहाद-ए-इस्लामी, हिजबुल मुजाहिदीन, अल उमर मुजाहिदीन, जम्मू-कश्मीर इस्लामिक फ्रंट, स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी), दीनदार अंजुमन, अल बदर, जमात उल मुजाहिदीन, अल कायदा, दुख्तरान-ए-मिल्लत और इंडियन मुजाहिदीन, यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा), नेशनल डेमोकेट्रिक फंट्र ऑप बोडोलैंड (एनडीएफबी), पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए), यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ), पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांगलीपक, कांगलीपक कम्युनिस्ट पार्टी, मणिपुर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट, आल त्रिपुरा टाइगर फोर्स, नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा,लिट्‍टे, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (एमएल), पीपुल्स वार, एमसीसी, तमिलनाडु लिबरेशन आर्मी, तमिल नेशनल रिट्रीवल ट्रुप्स, अखिल भारत नेपाली एकता समाज, भाकपा-माओवादी, नक्सलवादी,माओवादी आदि हैं।
इनमें से बहुत सारे संगठन आतंकवादी हैं किन्तु बहुत से संगठन जल, जमीन,जंगल के लिए संघर्षरत हैं। बहुत से संगठन अमीरी-गरीबी को लेकर सक्रीय हैं। बहुत से संगठन जातीय दंश की वजह से क्रिया-प्रतिक्रिया की लड़ाई लड़ रहे हैं। कोई धर्म के आतंक से बचने के लिए लड़ रहा है। भारत बहु भाषा-भाषी देश है। यहाँ अनेक धर्म और जातियाँ हैं। मुख्यतः भारत में वर्ण-व्यवस्था है। वर्ण-व्यवस्था का पहला और दूसरा वर्ण क्रमशः ब्राह्मण और क्षत्रीय हैं। क्षत्रीय राजा रहा है और ब्राह्मण उसका संचालक व चिंतक वर्ग है। इसमें भी दो वर्ग हो गए हैं जैसा कि अमूमन भारत की सभी जातियों और धर्मों में पाए जाते हैं-प्रगतिशील वर्ग। यह प्रगतिशील वर्ग वर्गीय एकता की बात तो करता है किन्तु सांस्कृतिक रूप से अभी भी अपने को डी-कास्ट नहीं कर पाया है। इसके लिए भारत की प्रगतिशील वाम वर्ग जिम्मेदार है परन्तु कोई भी वर्ग अन्ततः व्यक्तियों पर ही निर्भर करता है और व्यक्ति सिद्धांत और चरित्र पर। इससे यही लगता है कि वाम वर्ग अभी भी सिद्धांत और चरित्र के मामले में विकसित नहीं हो पाया है। यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति ईमानदार नहीं बन पाया है। कोई भी सिद्धांत मनुष्य ही तय करता है और वही लागू भी करता है। यदि मनुष्य ईमानदारी से क्रांतिकारी सिद्धांतों को समझता, तय करता और लागू करता, तो अब तक भारत से जाति और वर्ग-संघर्ष का चरण पूर्ण हो गया होता।
आज हम जिस चरण में जी रहे हैं वह चरण इतना घटिया है कि जाति और धर्म प्यारा है लेकिन मनुष्य नहीं प्यारा है। एक तरफ हम मंगल ग्रह पर हैं दूसरी तरफ हम छुआ-छूत, ऊँच-नीच,छोटी जाति-बड़ी जाति के चक्कर में रहते हैं। अनेक गाँवों-बस्तियों में दलितों का नरसंहार इसलिए कर दिया जाता है कि वे शूद्र-चमार है,भला इनकी क्या मजाल कि ये ठाकुरों-ब्राह्मणों की बराबरी करें, उनके जैसा खाएं-पीएं,पहने-ओढ़ें, शादी-ब्याह करें, घोड़ी चढ़ें,बैंड-बाजा-बारात सजाएं या फिर इनका नाम लें।
अब इसका क्या इलाज है? क्या ठाकुरों-ब्राह्मणों की मार सहें और प्रतिकार भी न करें? प्रतिकार करें तो अन्य दलित जिनकी कोई गलती नहीं है वे भी मौत के घाट उतारे जाँय? और यदि नक्सलवाड़ी में भूमिहारों-जमींदारों का विरोध करें, तो रणवीर सेना अवतार लेकर दलितों का गला काटने लगते है। क्या संभव नहीं कि नक्सलवाद का जन्म हो? ऊना में दलितों की पिटाई के बाद क्या आश्चय का विषय है कि जिग्नेश के नेतृत्व में पचासों हजार की भीड़ सडकों पर जन प्रदर्शन करने लगे? सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में महाराणा प्रताप के जुलुस के दौरान जब दलितों के 50-60 घर पेट्रोल डाल कर फूंक दिए जाय और स्त्रियों के स्तन काट लिए जाँय,तो क्या भीम आर्मी अपने सवाल उठाने के लिए प्रदर्शन न करे? और यदि प्रदर्शन करे तो पुलिस उनकी पिटाई करने लगे, फिर क्या खून का खौलना कानून का उलंघन है? लेकिन दलित आर्मी की हर हरकतें गैर कानूनी हैं क्योंकि वे पूँजीपति और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए उसकी सबसे ताकतवर शक्ति ( पुलिस और सेना) से ही उलझ गए। इसलिए, उन पर टाडा और रासुका लगाया जा सकता है, इसलिए उनको आतंकवादी संगठन घोषित किया जा सकता है, इसलिए, इन साथियों को जेल में डाल कर मारा भी जा सकता है। विकल्प है कि सभी प्रगतिशील लोग शब्बीरपुर और मेरठ जैसे घृणित जघन्य अपराधों की निंदा करें और अपराधियों के साहस को कमजोर करने का सार्थक प्रयास करें।
-आर डी आनंद

रविवार, 14 मई 2017

गर्भ को चीरने वाले बने मुस्लिम महिलाओं के मुक्तिदाता

 

तीन तलाक के मुद्दे पर मीडिया में जो कुछ प्रकाशित व प्रसारित हो रहा है और इस मसले पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो कह रहे हैं, उससे मुस्लिम समुदाय के अंदर लैंगिक न्याय का संघर्ष कमज़ोर हो रहा है। मीडियाए तीन तलाक की पीड़िताओं का तमाशा बना रही है। टीवी चैनल कहीं से भी एक मौलवी को पकड़ लाते हैं और उससे ऊलजलूल बातें कहलवाकर पूरे मुस्लिम समुदाय को बदनाम करते हैं। मुस्लिम महिलाओं को लैंगिक न्याय स्वयं के संघर्ष से ही प्राप्त हो सकेगा। हांए उन्हें प्रजातांत्रिक संस्थाओं से मदद की ज़रूरत पड़ेगी। इस मुद्दे के राजनीतिकरण से मुस्लिम महिलाओं के हितों को नुकसान पहुंचेगा। मुस्लिम महिलाओं के लिए जो ज़रूरी है वह यह है कि वे एकजुट हों और स्त्रीवादी आंदोलन और उदारवादी प्रजातांत्रिक शक्तियों का सहयोग और समर्थन हासिल करें।
एक बार में तीन बार 'तलाक' शब्द का उच्चारण करए वैवाहिक संबंध तोड़ने की प्रथा इन दिनों इसलिए चर्चा में है क्योंकि उच्चतम न्यायालय इस मुद्दे पर सायरा बानो नामक महिला द्वारा दायर याचिका की सुनवाई कर रहा है। इस तरह के तलाक को 'तलाक,. तलाक की वह विधि जो धर्मशास्त्र की दृष्टि में गलत परंतु वैध है कहा जाता है। आम बोलचाल की भाषा में इसे तीन तलाक कहा जा रहा है। उलेमा का कहना है कि तीन तलाक तब भी वैध है जब वह गुस्से में या नशे में दिया गया हो या फोनए एसएमएस या डाक के ज़रिए भेजा गया हो। इस विधि से जिस महिला को तलाक दिया जाता हैए उसे तुरंत अपना वैवाहिक निवास छोड़ना पड़ता है। उसे आगे फिर कभी अपने पति के घर आने की इजाज़त नहीं होती और ना ही उसे अपने बच्चों से मिलने दिया जाता है। तलाक की यह प्रथा घोर निंदनीय और घिनौनी है और इसका किसी भी तरह से बचाव नहीं किया जा सकता। इसके बाद भीए आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय में दाखिल अपने शपथपत्र में तीन तलाक को शरिया कानून का हिस्सा बताया है। बोर्ड का कहना है कि शरिया कानूनए दैवीय है और मुसलमानों को उसका पालन करने का संवैधानिक अधिकार है। हम कई बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि तीन तलाक असंवैधानिक तो है हीए वह कुरान के भी खिलाफ है।
मुस्लिम महिलाओं के रक्षक
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस मुद्दे पर भुवनेश्वर में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में 16 अप्रैलए 2017 को टिप्पणी करते हुए कहाए ष्ष्हमारी मुस्लिम बहनों के साथ न्याय होना चाहिए। उनके साथ अन्याय नहीं होना चाहिएण्ण्ण्अगर कोई सामाजिक बुराई है तो समाज को जागना चाहिए और न्याय प्रदान करने की दिशा में प्रयास करना चाहिएष्ष्। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके अगले दिनए 17 अप्रैलए 2017 कोए कहाए  ष्ष्जो लोग इस ज्वलंत मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं वे अपराधियों जैसे हैंष्ष्। उन्होंने तीन तलाक की तुलना द्रोपदी के चीरहरण से की और समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की मांग की।
प्रधानमंत्री और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्रीए दोनों मुसलमान महिलाओं के रक्षक बन रहे हैं। वे उन्हें अमानवीय मुस्लिम पर्सनल लॉ के चंगुल से निकालने का दंभ भर रहे हैं। परंतु उन्हें उनके अतीत से जुड़े कई प्रश्नों का उत्तर देने की ज़रूरत है। जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थेए उस समय ;2002द्ध राज्य में हुए दंगों में मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अमानवीय यौन हिंसा हुई थी। उस समय दोनों में से किसी ने भी इस पर दुःख या पछतावा व्यक्त नहीं किया था और ना ही मुस्लिम महिलाओं के साथ हुए अन्याय के दोषियों को सज़ा दिलवाने की बात कही थी। उस समय उन्हीं की पार्टी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को राजधर्म का पालन करने की सलाह दी थी। तत्कालीन गुजरात सरकार ने सांप्रदायिक दंगों के डेढ़ लाख से अधिक पीड़ितोंए जो विभिन्न राहत शिविरों में बहुत बदहाली में अपने दिन बिता रहे थेए की किसी प्रकार की सहायता करने से इंकार कर दिया था। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने एक समय यह कहा था कि अगर एक हिन्दू महिला की मुसलमान से शादी कर उसका धर्मपरिवर्तन करवाया जाता है तो सौ मुस्लिम महिलाओं की हिन्दू पुरूषों से शादी करवाकर उन्हें हिन्दू बनाया जाएगा!
गर्भ को चीरने वाले बने मुस्लिम महिलाओं के मुक्तिदाता
सन 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों में हिन्दू श्रेष्ठवादियों ने मुस्लिम महिलाओं के विरूद्ध घिनौनी यौन हिंसा की थी। उन्होंने गर्भवती मुस्लिम महिलाओं के पेट चीर कर गर्भस्थ शिशु को मारा तक था। अब वही लोग मुस्लिम महिलाओं की उनके पुरूषों के दमन से रक्षा करने का दावा कर रहे हैं। मोदी ने गुजरात की हिंसा को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए उसे क्रिया की प्रतिक्रिया बताया था। उन्होंने कभी इस बात पर अफसोस जाहिर नहीं किया कि उनकी नाक के नीचे वीभत्स हिंसा हुई। जिन लोगों पर बलात्कार और हिंसा के आरोप थेए वे लगातार बरी होते जा रहे थे। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए विशेष जांच दल का गठन किया। बिलकीस बानो बलात्कार कांड का मुकदमा मुंबई की एक अदालत में हस्तांतरित किया गया। इसके बाद ही कुछ आरोपियों को सज़ा मिल सकी।
मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलवाने के भाजपा के तथाकथित अभियान के राजनीतिक लक्ष्य हैं। जब मोदी प्रधानमंत्री और आदित्यनाथ मुख्यमंत्री नहीं थेए तब वे अत्यंत भद्दी भाषा में मुस्लिम समुदाय को कलंकित करते थे। गुजरात दंगों के बाद नरेन्द्र मोदी ने गौरव यात्रा निकाली। इस यात्रा के दौरान सभाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि दंगा पीड़ितों के लिए स्थापित राहत शिविर बच्चे पैदा करने की फैक्ट्रियां बन गए हैं। दंगों के बाद गुजरात में हुए विधानसभा चुनाव में मोदी ने अपने भाषणों में ष्मियां मुशर्रफ मानसिकताष् पर निशाना साधा। संदेश यह था कि मुसलमान पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं और उन्हें सबक सिखाने की ज़रूरत है।
अबए मुस्लिम महिलाओं के रक्षक का भेस धरकर मोदी और आदित्यनाथ वही कर रहे हैं . अर्थात मुस्लिम समुदाय को यह कहकर बदनाम करना कि उसकी परंपराएं महिलाओं के प्रति अन्यायपूर्ण हैं और यह कि मुसलमान महिलाओं का चीरहरण हो रहा है। हिन्दू महासभा की महासचिव पूजा शकुन पांडे ने एक कदम और आगे जाकर यह कहा कि तीन तलाक की पीड़ित सभी मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू बन जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे ऐसी महिलाओं का विवाह करवाएंगी और उनका कन्यादान करेंगी। स्पष्टतःए हिन्दू श्रेष्ठतावादीए मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू बनाकर उन्हें हिन्दू पुरूषों को भेंट कर देना चाहते हैं ताकि हिन्दुओं की आबादी बढ़ सके और मुसलमानों की कम हो। वे मुस्लिम महिलाओं को अन्याय से मुक्ति दिलवाकर उन्हें हिन्दू पुरूषों की सम्पत्ति बनाना चाहते हैं। हिन्दू श्रेष्ठतावादियों ने सन 1950 के दशक में डॉण् बीण्आर अंबेडकर द्वारा तैयार किए गए हिन्दू कोड बिल का जबरदस्त विरोध किया था। यह बिल हिन्दू महिलाओं को लैंगिक न्याय उपलब्ध करवाने के लिए बनाया गया था।
हिन्दू श्रेष्ठतावादियों को दहेज़ प्रथाए बालविवाह,कन्याभ्रूण हत्या इत्यादि से कोई समस्या नहीं है। उन्हें इस बात से भी कोई समस्या नहीं है कि महिलाएं किससे विवाह करें या न करेंए इसका निर्णय उनके माता.पिता लेते हैं। उन्होंने कभी 'ऑनर किलिंग' का विरोध नहीं किया। रोमियो स्क्वाड और लव जिहाद जैसे अभियानों का मूल उद्देश्य यही है कि हिन्दू महिलाओं के उनका जीवनसाथी चुनने और अपनी मर्जी से कपड़े पहनने के अधिकार से वंचित किया जा सके। इस सरकार के कई मंत्री महिलाओं को यह सलाह दे चुके हैं कि उन्हें यौन हमलों से बचने के लिए उपयुक्त ;अर्थात पारंपरिकद्ध वस्त्र पहनने चाहिए। भाजपा सांसद साक्षी महाराज और आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिन्दू महिलाओं का आव्हान किया है कि वे कम से कम चार बच्चे पैदा करें। ऐसा लगता है कि वे यह मानते हैं कि महिलाएं अपने पतियों और अपने समुदाय के लिए बच्चे पैदा करने की मशीनें हैं।
जहां तक महिलाओं की भूमिका और उनकी स्थिति का प्रश्न हैए हिन्दू श्रेष्ठतावादियों और मुस्लिम राजनीतिक और धार्मिक नेताओं के बीच कोई विशेष अंतर नहीं है। दोनों ही महिलाओं को पुरूषों की संपत्ति मानते हैं और उन्हें पुरूषों के संपूर्ण नियंत्रण में रखना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि महिलाएं केवल घर का काम करेंए बच्चे पैदा करें और उन्हें पालें.पोसें। और अगर पुरूषों को उनकी आय की जरूरत हो तो घर से बाहर निकलकर भी मेहनत करें। धर्म का इस्तेमाल महिलाओं को गुलाम बनाए रखने के लिए किया जाता है। महिलाओं के दमन के लिए मुस्लिम पुरूषों के हाथों में तीन तलाक का अस्त्र है तो हिन्दू पुरूषों के पास खाप पंचायतें और घरेलू हिंसा है। रणनीतियों और तरीकों में कुछ फर्क के बावजूद दोनों का उद्देश्य यही है कि महिलाओं को गुलाम बनाकर रखा जाए और वे केवल यौन आनंद की पूर्ति और वंश को आगे बढ़ाने का उपकरण बनी रहें।
मीडिया और मुस्लिम समुदाय को कलंकित करने की कोशिश
मीडिया को जब भी मौका मिलता हैए वह अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए ऐसे किसी भी मुददे को उछालना शुरू कर देती है जिससे मुस्लिम समुदाय को कलंकित किया जा सके। कुछ वर्ष पहलेए टीवी चैनलों ने उस फतवे का व्यापक कवरेज किया था जिसमें यह कहा गया था कि इमरानाए जिसके साथ उसके ससुर ने बलात्कार किया थाए अपने पति की पत्नि नहीं रह गई है। इसी तरह एक टीवी चैनल ने कई घंटों का कार्यक्रम प्रसारित किया था जिसका शीर्षक था 'गुड़िया किसकी'। गुड़िया एक मुस्लिम महिला थी, जिसने अपने सैनिक पति के लंबे समय तक लापता रहने के बाद एक दूसरे पुरूष से शादी कर ली थी। यह मान लिया गया था कि उसका पति मर चुका है। परंतु कुछ वर्षों बाद वह पाकिस्तान की एक जेल से रिहा होकर घर वापिस पहुंच गया। चैनल ने गुड़िया के अनेक रिश्तेदारों, कुछ मौलवियों, दूसरे पति और पूर्व पति को स्टूडियों में इकटठा कर लिया और गुड़िया की जिंदगी का तमाशा बनाया।
अधिकांश टीवी चैनल तीन तलाक के मुद्दे पर भी यही कर रहे हैं। वे कुछ मौलवियों को बुला लेते हैं जो अपने बेवकूफाना और भड़काऊ वक्तव्यों से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। शो में त्रासदी का तड़का लगाने के लिए तीन तलाक की कुछ पीड़िताओं को बुला लिया जाता है जो अपनी करूण गाथा रूंधे गले और आंसू भरी आंखों के साथ सुनाती हैं। इसके बाद सभी प्रतिभागी एकसाथ चिल्लाने लगते हैं और एंकर उनके बीच युद्धविराम करवाने के असफल प्रयास में जुटा रहता है। जो इस्लामिक विद्वान तीन तलाक का समर्थन नहीं करते उनके लिए स्टूडियो के दरवाजे बंद रहते हैं।
पीड़िताओं और मौलवियों के बीच बहस जितनी तीखी और कटु होती है दर्शकों का उतना ही मनोरंजन होता है। बीच.बीच में भाजपा के प्रवक्ता दर्शकों को याद दिलाते रहते हैं कि मोदी और योगी मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति के लिए आकाश से उतरे देवदूत हैं।
इस मुद्दे को उठाकर मोदी और योगी जैसे लोग मुस्लिम समुदाय को कलंकित करना तो चाहते ही हैं वे मुसलमानों को लैंगिक आधार पर विभाजित भी करना चाहते हैं। वे शियाओं और सूफियों के एक तबके को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास भी कर रहे हैं। जैसा कि सुब्रमण्यम स्वामी ने कहाए भाजपा का लक्ष्य है मुस्लिम समुदाय को बांटना और हिन्दू समुदाय को एकजुट करना ताकि हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की राह प्रशस्त हो सके।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पहले तीन तलाक का बचाव कर और उसे दैवीय शरिया कानून का अविभाज्य हिस्सा बताकर स्वयं को हंसी का पात्र बना लिया। बाद में मीडिया की तीखी आलोचना से परेशान होकर उसने एक नया शोशा छोड़ा। बोर्ड ने 16 अप्रैल को एक आचार संहिता जारी कर कहा कि जो लोग शरिया में दिए गए कारणों के अतिरिक्त किसी कारण से तलाक देंगेए उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। सामाजिक बहिष्कार की यह बात केवल मीडिया के लिए कही जा रही है और इसका उद्देश्य तीन तलाक की अधम प्रवृत्ति को समाप्त करना नहीं है।
यह आश्चर्यजनक है कि बोर्ड को सामाजिक बहिष्कार करने का विचार मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का सत्तर साल तक विरोध करने के बाद सूझा। इस अवधि में उसे कभी तीन तलाक की पीड़िताओं का ख्याल नहीं आया। बोर्ड इतना प्रभावशाली तो है कि वह दमन की शिकार महिलाओं को चुप कर सके और उन्हें अल्लाह के शाप का डर दिखा सके। परंतु वह इतना भी शक्तिशाली नहीं है कि वह प्रभावशाली लोगों का सामाजिक बहिष्कार सुनिश्चित कर सके। इसके अलावाए किसी का सामाजिक बहिष्कार करना महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में गैर.कानूनी है। वैसे भी तीन तलाक देने वाले पुरूष का सामाजिक बहिष्कार होने से उस महिला को क्या मिलेगा जिसे खड़े.खड़े अपने पति के घर से बेदखल कर दिया गया हो। और अगर पुरूष ने नशे में या क्रोध के आवेश में ऐसा कर दिया हो और अगली सुबह वह पछताए तो उसे अकारण ही सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ेगा।
आगे का रास्ता
इन परिस्थितियों में जो एकमात्र रास्ता उपलब्ध है वह है मुस्लिम महिलाओं और पुरूषों को शिक्षित और जागृत करना। उन्हें यह बताना होगा कि कुरान में यह कहा गया है कि मेलमिलाप के प्रयासों के बगैर तलाक देना गलत है।
बोर्ड को मुस्लिम पर्सनल लॉ को कुरान की शिक्षाओं और लैंगिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप संहिताबद्ध करना चाहिए। इसके लिए सभी इस्लामिक विधिशास्त्रों में से अच्छी बातें ली जानी चाहिए। इस संहिता को संसद के समक्ष प्रस्तुत कर उसे कानून का स्वरूप दिया जाना चाहिए।
जब तक ऐसा नहीं होता तब तक भारतीय अदालतों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे मुस्लिम महिलाओ को न्याय दिलवाएं और उनके समानता के अधिकार की रक्षा करें। अदालतों को यह अधिकार भी है कि वे हनाफी,हनबली, मलिकी, एहल.ए.हदीद और शिया सहित विभिन्न इस्लामिक विधिशास्त्रों की इस तरह से व्याख्या करें जो संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हो।
अगर राजनीतिक दल इस मुददे का किसी भी आधार पर राजनीतिकरण करेंगे तो वे देश और मुस्लिम समुदाय दोनों को हानि पहुंचाएंगे। शांति और न्याय उदात्त लक्ष्य हैं और इनकी तुलना किसी चुनाव को जीतने या साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से लाभ उठाने से नहीं की जा सकती।
-इरफान इंजीनियर