रविवार, 9 अगस्त 2020

सांस्कृतिक मोर्चे का शक्तिशाली अस्त्र : जनगीत - डॉ राजेश मल्ल

१- सांस्कृतिक मोर्चे का शक्तिशाली अस्त्र : जनगीत

           साहित्य हमें संस्कारित करता है। मानवीय बनाता है, मानव विरोधी विचारों के विरुद्ध संघर्ष के लिए तैयार करता है। गैर बराबरी, शोषण और उत्पीड़न के पीछे तर्कशास्त्र समझने में सहयोग करता है। आज कारपोरेट की लूट (जल, जंगल, जमीन) तथा सत्ता के साथ उसके गठबंधन ने देश के किसानों, मजदूरों, छोटे व्यापारियों, दलितों, आदिवासियों के जीवन को त्रस्त कर दिया है। बहुलतावादी हमारी संस्कृति, सहभाव, साझापन को रौंद दिया है। झूठ फरेब, लूट की संस्कृति को ऐसे अर्ध सत्य बनाकर पेश किया जा रहा है जहाँ महान मानवीय मूल्यों का स्पेश कम हो। साहित्य को भी प्रश्नांकित कर उसे फालतू और बाजारू बनाकर सत्ता के हित साधक के रूप में बदला जा रहा है। यह एक बेहद खौफनाक समय है मनुष्यता विरोधी और जन विरोधी। लेकिन ऐसे ही समय में सबसे ज्यादा साहित्य की जरूरत होती है या है। फर्दाफाश करने वाले, लूट के तर्क को खोलने वाले। बढ़ती निराशा से मुक्त होकर मानवता के पक्ष में खड़ा करने में सहयोग देने वाले। ऐसे साहित्य की जरूरत जो बकौल प्रेमचन्द्र ‘राजनीति के आगे चलने वाले मशाल’ की तरह हो।

               अगर भारत के इतिहास को देखें तो ऐसा साहित्य राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के दौर में खूब लिखा गया, जन-जन तक पहुँचा। काव्य पंक्तियाँ जन संग्रामों का कण्ठ हार बन गइंर्। कई-कई कविताएँ तो आन्दोलनों का केन्द्रीय नारा बन गईं। कहने का तात्पर्य यह है कि जन संघर्ष को पर्याप्त ऊष्मा, ऊर्जा और दिशा साहित्य इस दौर में प्रदान करती रही। शीत युद्ध के दौर में यह क्रम बदला लेकिन आजाद भारत में भी जन संघर्षों के साथ जो साहित्य रचा गया वह अत्यन्त सारवान रहा और जन उपयोगी तथा जनपक्षधर भी।

             इस तरह के आन्दोलनधर्मी तथा जन संघर्षों के गीत-कविताओं के दो रूप हैं। पहला जनता के लिए दूसरा जनता के संघर्ष को संचालित करने वाले हिरावल लोगों के लिए। पहले को हम जनगीत नाम से जानते हैं तथा दूसरे को गंभीर विमर्श वाले सौन्दर्य बोधीय तराने के रूप में। आज बड़े पैमाने पर आन्दोलन चलाए जा रहे हैं छात्रों, नौजवानों, किसानों, मजदूरों, व्यवसायियों के। फिर से एक बार नये जनगीतों की जरूरत है जो जनता के बीच नये समाज का स्वप्न तथा भरोसा बाँट सकें। जन संघर्षों को उद्दीप्त  कर सकें। ऊर्जा प्रदान करें, सत्ता के शोषण कारी चरित्र को उजागर कर सकें।

    जन गीतों की बुनावट जहाँ एक तरफ लोकधर्मी (धुन, लय, भाव) के स्वर पर हो तो दूसरी तरफ जनता के गहरे बिखराव और निराशा के भावों को दर किनार कर नया सौन्दर्य भाव सृजित कर सकें। इस सन्दर्भ में हमें अपने पूर्ववर्ती जनगीतों को याद करना चाहिए। ऐसे जनगीत आज भी हमारे बैठकों, धरनों, गोष्ठियों, मार्चों में गाये जाते हैं।


        सबसे लोकप्रिय गीतों में कोई विभेद तो नहीं किया जा सकता लेकिन फैज के तराने का कोई सानी नहीं है। लाजिम है कि हम देखेंगे, आज भी हमारे बैठकों का सबसे जरूरी गीत है। गीत की बुनावट कयामत की अवधारणा के रूपक को स्टेप बाई स्टेप फैज ने क्रांति के संभव होने के वक्त में बारीकी से बदल दिया है जो आज भी हमारे लिये मानीखेज है। कयामत के दिन ‘पहाड़ रुई की तरह उड़ने लगेंगे, काबे से बुत उठाये जाएँगे, धरती धड़धड़ धड़केगी, ऐसा पवित्र ग्रंथों में लिखा है वह संभव होगा। लेकिन इसी रूपक में फैज ने तख्त-ताज के गिराने, उछाले जाने, मजलूमों के पाँव तले और अहले हकम के सर ऊपर उपेक्षित हरम के लोगों को मसनद पर बैठने को जोड़कर क्रांति के दिन में बदल दिया है। गीत पढ़ें और कयामत के रूपक को ध्यान में रखें तो इसका आनन्द और बढ़ जाता है। अपने अंतिम बन्द तक रूपक को नया आयाम देते हुए फैज घोषणा करते हैं कि-


उठ्ठेगा अन-अल, हक का नारा

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।

और राज करेगी खल्क-ए-खुदा 

जो मैं भी हूँ और तुम भी हो।

यह इकलौता गीत नहीं है। 


हिन्दी उर्दू बांग्ला, मराठी के बड़े कवियों ने जनगीत लिखे। उनके लय-धुन, भाव-संवेदना को लोक तथा समय के साथ आज नये सिरे से पढ़ने या पाठ करने की जरूरत है। लाउड होना भी एक कला है। अपने भीतर खौलते हुए जज्बात को गीतों में ढालना एक महान सृजन है तथा उसे संयत स्वरों में जन-जन तक पहुँचाना जनगीतों का आन्तरिक धर्म। इस क्रम में शलभ श्रीराम सिंह और शशिप्रकाश के गीतों को याद करना बेहद जरूरी है। शलभ श्रीराम सिंह ने ढेरों गीत लिखे लेकिन उनका गीत ‘घिरे हैं हम सवाल से हमें जवाब चाहिए’ आज भी बेहद लोकप्रिय है। गीत की लय मार्च पास्ट की है और हर बन्द नये रूपक तथा उपमानों से सुसज्जित है अपने समय की विडम्बना को उन्होंने तेजाबी भाषा में रचा है जो वर्षों बाद आज भी प्रासंगिक हैः-

नफस-नफस, कदम-कदम

बस एक फिक्र दम-ब-दम

घिरे हैं हम सवारल से

हमें जवाब चाहिए

जवाब दर सवाल है

कि इन्कबाल चाहिए।

शलभ श्री राम सिंह के इस गीत के प्रत्येक बन्द नये प्रतीकों तथा उपमानों में अपने समय की सत्ता का फर्दाफाश करते हैं।         जहाँ पे लफ्ज-ए-अम्न एक खौफनाक राज हो, जहाँ कबूतरों का सरपरस्त एक बाज हो, उन्हीं की सरहदों में कैद हैं हमारी बोलियाँ, वही हमारी थाल में परस रहे हैं गोलियाँ। इस तरह की पंक्तियाँ जहाँ पर्दाफाश करती हैं वहीं उत्साहित करने, संघर्ष करने की ताकत देती हैं। इनकी झूठी बात पर ना और तू यकीन कर, इस रूप में गीत मात्र नारे बाजी नहीं बल्कि गहरे जनतांत्रिक व्यवस्था को प्रश्नांकित करती हैं। राजनीति के झूठ को बेनकाब करती है।

    इस क्रम में नये लोगों में शशि प्रकाश ने जन गीत खिले हैं। वे परिवर्तन सृजन, संघर्ष का बखूबी एक नया लोक ही रचते हैं उनका प्रसिद्ध गीत जिन्दगी ने एक दिन कहा जिन प्रतीकों, विम्बों से रचा गया है वह हमारे भीतर कहीं गहरे एक नई ऊष्मा ऊर्जा भरता है। जनगीतों को नारा कहने वाले कला आग्रही लोगों को इस गीत को पढ़ना चाहिए। उनके सारे सौन्दर्य बोधीय कलात्मक प्रतिमान टूट जाएँगे। जिन्दगी का कहन खासकर स्वर कैसे एक नये संघर्ष के लिए प्रेरित करता है। कैसे गीत के क्रमशः अगले बन्द नये स्वर सृजन का संधान करते हैं, बेजोड़ है।

    जिन्दगी ने कहा-क्या, क्या, क्या, तुम लड़ां कि चह-चहा उठे हवा के परिन्दे, आसमान चूम ले जमीन को, जिन्दगी महक उठे.....। तुम उठो- कि उठ पडं़े असंख्य हाथ, चलो कि चल पड़ें असंख्य पैर साथ मुस्करा उठे क्षितिज पर भोर की किरन। जिन्दगी ने एक दिन कहा.... क्या कि तुम बहो, रुधिर की तरह, जिन्दगी ने एक दिन कहा तुम जलो कि रौशनी के पंख झिलमिला उठें, जिन्दगी ने एक दिन कहा तुम रचो हवा पहाड़ रोशनी नई, महान आत्मा नई गीत लड़ने, उठने, जलने, कहने और रचने का आह्वान करती है। कैसे रुधिर प्रवाह की तरह नये जीवन के रचने की लड़ने की उठने की, कि दुनिया बदल जाए। भाव तथा रूप की ऐसी गहरी एकता विरल है।

    यहाँ लगभग तीन जन गीतकार फैज, शलभ श्रीराम सिंह तथा शशिकांत के तीन गीतों की ओर मैंने आपका ध्यान दिलाया है। ऐसे हजारां जनगीत हैं जो लाखों करोड़ों की जुबान पर आज भी मौजूद हैं, लेकिन जैसे प्रत्येक समय अपने संघर्ष आन्दोलन पैदा करता है उसी प्रकार वह अपने गीत जन गीत पैदा करता है। विरासत को संभाले हमें आज के नये गीत रचने और गाने होंगे जो हमें इस सदी के लिये नये संघर्षों को वाणी दे सकें। लिखा तो आज भी जा रहा है, लेकिन उसे अभी जन कण्ठ तक पहुँचने में थोड़ा वक्त लगेगा। 

२-जनगीतों का विजन : हर नारे में महाकाव्य सृजन की प्रतिश्रुति

कविता के वितान में महाकाव्य को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। हालाँकि बदलते जीवन सन्दर्भ तथा गद्य के विकास के साथ अब महाकाव्य का स्थान उपन्यास ने ले लिया है। रैल फॉक्स ने लिखा है कि ‘‘उपन्यास आधुनिक युग का महाकाव्य  है।’’ बावजूद इसके महाकाव्य की सर्वश्रेष्ठता के भाव पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा। अपने उदात्त भावों तथा बड़े विजन के कारण महाकाव्य की महत्ता यथार्थ रूप में न सही भावरूप में अभी भी बनी हुई है। मुक्तिबोध अपनी कविता ‘‘मुझे कदम कदम पर चौराहे मिलते हैं’’ में कहते हैं- 


मुझे भ्रम होता है कि 

प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है, 

हर एक छाती में आत्मा अधीरा है, 

प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है, 

मुझे भ्रम होता है कि 

प्रत्येक वाणी में महाकाव्य की पीड़ा है। 


     प्रतीक रूप में ही सही मुक्तिबोध महाकाव्य की सर्वश्रेष्ठता स्वीकार करते हैं हालाँकि उन्होंने स्वयं कोई महाकाव्य नहीं रचा। इसी तरह तुर्की के प्रसिद्ध कवि नाजिम हिकमत अपनी कविता में महाकाव्य का प्रतीक रूप में प्रयोग करते हैं- 


पढ़ना किसी महाकाव्य की तरह, 

सुनना किसी प्रेमगीत की तरह, 


लेकिन ठीक इसके उलट अपनी छोटी सी रचना विधान में जनगीतों ने बड़े विजन और उदात्त भावों को सृजित किया है। स्वप्न, यथार्थ, परिवर्तनकामी चेतना, पीड़ा-दुख, संघर्ष, उत्साह, उल्लास का जो सन्दर्भ जनगीतों में है वह महाकाव्यों के विस्तृत कलेवर के बावजूद कमतर दृष्टिगत होता है। माहेश्वर के चर्चित गीत की पंक्तियाँ हैं- 

‘‘सृष्टि बीज का नाश न हो हर मौसम की तैयारी है। हर नारे में महाकाव्य के सृजन कर्म को बारी है।’’ नारा वैसे भी गंभीर आचार्यों का जनगीतों के लिए आरोपित शब्द है। कविता नहीं है, यह तो नारे बाजी है। दूसरी तरफ महाकाव्य सृजित करने की प्रतिश्रुति है, न विडम्बना, लेकिन हजारों कण्ठों में रचे बसे नारे इतिहास के खास मुकाम पर जो रोल अदा करते हैं या किए हैं बड़ी से बड़ी कविता, महान कविता ईर्ष्या करे। कवि की सार्थकता जनता की जुबान पर चढ़ना और नारे बनने में है। यह अलग बात है कि आपके लिए कविता समाज बदलने का उपकरण हो। मात्र सौन्दर्य 

बोधी तराने न हों। जब भी आप साहित्य को बड़े तथा मानवीय सरोकारों से जोड़कर देखेंगे तो सहज ही आपके निष्कर्ष जनगीतों में मौजूद नारों तथा उसमें निहित महा काव्यात्मक औदात्य के पक्ष में होंगे। 

माहेश्वर के गीत को पहले देखा जाए। अपने लघु कलेवर में बड़ा विजन, शाश्वत संघर्षों के मूल्य तथा परिवर्तन कारी चेतना को अद्भुत तरीके से माहेश्वर ने पिरोया है। परत-दर परत गीत महान मानवता के पक्ष में क्रमशः नई जमीन और नये भाव विन्यासों से मेल करता है। पहली ही पंक्ति नये समाज सृजन की बुनियाद रखती है :- 

सृष्टि बीज का नाश न हो हर मौसम की तैयारी है, 

कल का गीत लिये होठों पर आज लड़ाई जारी है। 


‘सृष्टि बीज’ एक तरह से गीत की आधार रेखा है और कल का स्वप्न तथा आज का संघर्ष परिवर्तनकारी चेतना की प्रतिश्रुति। गीत के अगले चरण पर पहुँचने से पहले सृष्टि बीज शब्द तथा भाव की अर्थ व्याप्ति पर गौर करना चाहिए। यही वह सूत्र है जो गीत को बड़े विजन के साथ जोड़ देता है। बेहतर कल के लिए आज का संघर्ष, सृष्टि बीज को बचाते हुए। हैं न अद्भुत भाव तथा सोच। गीत के अगले बंद में माहेश्वर इस संघर्ष को शाश्वत संघर्ष, बेहतर दुनिया के लिए जोड़ देते हैं। ध्वंस और निर्माण जवानी की निश्छल किलकारी। ध्वंस और निर्माण शाश्वत सत्य हैं। इसलिए यह समझ संघर्ष में उतरने की प्ररेणा भी देता है वहीं इस बात की ओर संकेत भी करता है कि सिर्फ ध्वंस ही काम्य नहीं है बल्कि ध्वंस के बाद निर्माण भी हमारा ही कार्यभार है। लेकिन जवानी, युवा, निश्छलता, किलकारी, हताशा तो एक साथ निराशा के विरुद्ध समाज परिवर्तन में लगे लोगों के लिए बेहद जरूरी उपकरण हैं। जवानी की निश्छल किलकारी और परचम, परचम चमकता बूढ़ा सूरज। एक तरफ युवा जोश तो दूसरी तरफ ज्ञान अनुभव की थाती। दोनों के समवेत संघर्ष से ही नये समाज का निर्माण संभव है। 

जंजीरों से क्षुब्ध युगों के प्रणयगीत ही रणभेरी पंक्ति तो निश्चय ही गीत को महाकाव्यात्मक औदात्य प्रदान करती है। शायद माहेश्वर इसीलिए लिखते हैं कि हर नारे में महाकाव्य के सृजनकर्म की बारी है। इस रूप में जनगीत अपनी छोटी सी रचना विधान में बड़े विजन का सृजन करते हैं। निश्चय ही यह महाकाव्य तो नहीं लेकिन महाकाव्यात्मक तो है ही। 


इसीक्रम में शंकर शैलेन्द्र की प्रसिद्ध और चर्चित रचना ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर’, के विजन स्वर्ग को धरती पर उतारने की बात होनी चाहिए। हजारों लोग आज भी इस गीत को गुनगुनाते रहते हैं। स्कूलों कालेजों में चर्चित समूहगान है यह गीत। स्वर्ग एक मिथकीय परिकल्पना है। बकौल गालिब-हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल को खुश रखने को ‘गालिब’ ये खयाल अच्छा है।

  जो भी हो लेकिन स्वर्ग, दुख विहीन समाज तथा जीवन का बड़ विजन है। शंकर शैलेन्द्र पहले ही साफ कर दे रहे हैं अगर कही हो स्वर्ग तो। इसलिए स्वर्ग को धरती पर उतार लाने का विजन धरती को स्वर्ग जैसा बनाने का स्वप्न मात्र है। समस्याहीन तथा दुखहीन जीवन। दरअसल जन गीतों में वर्णित चित्रित जीवन संधर्ष तथा लक्ष्य स्पष्ट रूप से आजादी समानता से लैस महान मानवीय समाज की रचना है। इस क्रम में स्वर्ग जैसा विजन  सहज भी है और शानदार भी। शंकर शैलेन्द्र इसे धरती पर उतार लाने का अह्वान करते हैं। गम और सितम के चार दिनों से पार जाने की शदियों से चली आ रही जद्दो जहद को वह स्वर देते हैं। 

बड़े स्वप्न-विजन और उसके लिए सतत् संघर्ष। नाउम्मीदी के दुश्चक्र से बाहर आना, एक जुटता उत्साह, उल्लास तथा प्रयत्न जनगीतों की महत्वपूर्ण विशेषता है। यही कारण है कि ये गीत आज भी हमारे कण्ठहार बने हुए हैं। ऐसा नहीं है कि जन गीतों में अपने समय के कटु यथार्थ का चित्रण नहीं है या गीतकार यथार्थ से मुंह चुराते हैं बल्कि अन्य कविताओं के मुकाबले यहाँ यथार्थ की तीव्रता कहीं ज्यादा ही है। श्ांकर शैलेन्द्र स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं कि- 

बुरी है आग पेट की बुरे हैं दिल के दाग ये। या ‘जुल्म के महल’, ‘भूख और रोग के स्वराज’ तो असामानता और उत्पीड़न का कटु सत्य और यथार्थ है। जिसके लिये वे स्वर्ग को जमीन पर उतारने के संघर्ष का एहसास करते हैं। इस रूप में जीवन का भयावह शोषण उत्पीड़न से भरा मंजर और इससे मुक्ति के लिए धरती को स्वर्ग में बदलने की तीव्र आकांक्षा। जनगीत का यही काव्य सौन्दर्य है। शंकर शैलेन्द्र ने अत्यन्त कुशलता से रचा है। यथार्थ और स्वप्न-विजन का द्वन्द्व। बेहतरी के लिए संघर्ष गीत का केन्द्रीय भाव है। 

राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के दौर में लिखे साहिर लुधियानवी के चर्चित गीत का उल्लेख इस सन्दर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। साहिर बड़े शायर हैं। उनकी परिकल्पना और विजन महान है। भयावह यथार्थ और परिकल्पित स्वप्न के द्वन्द्व पर रचा गया उनका गीत यह सुबह कभी तो आएगी, अपने सम्पूर्ण रचना विधान में महाकाव्यात्मक है। साहिर आश्वस्त हैं कि यह सुबह कभी तो आएगी और यह भी कि यह सुबह हमी से आयेगी हम अर्थात शोषित पीड़ित जन। वे एक तरफ अपने समय के भयावह यथार्थ तथा दुख को याद करते हैं, भयानक शोषण उत्पीड़न की रात को रखते हैं दूसरी तरफ यह विश्वास भी व्यक्त करते हैं कि सुबह आएगी कभी तो आएगी। उनको यकीन है कि जब दुख के बादल पिघलेंगे और जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी और यह संघर्षों से एक दिन संभव होगा। 

साहिर अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाने से पहले अपने समय के भयावह यथार्थ को रखते हैं। यही वह संदर्भ है जहाँ से नई दुनिया के रचना की जरूरत बनती है। यथार्थ चित्रण के क्रम में वे सारा ध्यान पीड़ित मानवता पर रखते हैं। खासकर मजदूरों, किसानों स्त्रियों की स्थिति पर। भूख गरीबी, लाचारी शोषण उत्पीड़न पर उनकी निगाह ठहरती है और वहीं से वह एक अनोखी दुनिया का विजन लेकर चलते हैं। मांग रखते हैं या उसकी बुनियाद उठाने की बात करते हैं। एक सुबह ऐसी जिसमें वर्तमान की अंधेरी रात डूब जाएगी। वे वर्तमान के भयावह यथार्थ वर्णन करते हैं। इंसानों का मोल मिट्टी से भी गया बीता है। उनकी इज्जत सिक्कों से तौली जा रही है। दौलत के लिए स्त्रियों की अस्मत बेची जा रही है। चाहत को कुचला जा रहा है। औरत को बेचा जा रहा है। भूख और बेकारी का साम्राज्य फैला है। दौलत की इजारेदारी में मानवता कैद है। एक तरफ मजबूर बुढ़ापा धूल फांक रहा है तो दूसरी तरफ बचपन गंदी गलियों में भीख मांगने पर विवश है। हक की आवाज उठाने वालों को सूली पर चढ़ाया जा रहा है। फांकों की चिंता में हैं और सीने में दोजख की आग लगी हुई है। अर्थात यह दुनिया पूरी तरह भयावह लूट और शोषण अन्याय के हजारों सन्दर्भों से पटी पड़ी है। अंधेरी रात बहुत ही भयानक है लेकिन इसी भयानक यथार्थ के बीच साहिर उम्मीद बनाये रखते हैं। शोषण विहिन समाज का महान विजन सामने रखते है। हमें आश्वस्त करते है। यह शोषण की, उत्पीड़न की, लूट की रात एक दिन खत्म होगी। सुबह तो आएगी और हमीं से आएगी। साहिर एक तरफ भयावह यथार्थ को देखते हैं तो दूसरी तरफ उससे मुक्ति के प्रति आशा व्यक्त करते हैं। यह आस्था और विश्वास आज अत्यन्त सारवान है। यथार्थ के तीखे सन्दर्भ और उससे मुक्ति के लिये संघर्ष को पूरी शक्ति के साथ साहिर ने अपने कालजयी गीत में पिरोया है। 

इसी तरह शशि प्रकाश का एक गीत है। बेहद स्वप्न दर्शी और विजनरी। नई दुनिया का ख्वाब। इस ख्वाब को हम ही पूरा करेंगे। यह हमारा ऐतिहासिक कार्यभार है। गीत के बोल है- 


दुनिया के हर सवाल के हम ही जवाब हैं, 

आंखां में हमारी नई दुनिया के ख्वाब है। 


शशि प्रकाश मेहनतकश अवाम की महान संघर्ष गाथा को पहले चंद पंक्तियों में रखते हैं जो कुछ दुनिया में सुन्दर है, महान है, वह हम मेहनतकश श्रमिकों की रचना है। दुनिया का निर्माण श्रमजीवी वर्ग ने ही किया है। 


  इन बाजुओं ने दुनिया बनायी है, 

  काटा है जंगलों को बस्ती बसाई है, 

  जांगर खटा के खेतों में फसलें उगाई है, 

  सड़कें निकाली है, अटारी उठाई है, 

  ये बांध बनाये हैं फैक्ट्री बनाई है।  


हमने अपनी मेहनत से दुनिया को गढ़ा है लेकिन हमीं इस दुनिया में सबसे ज्यादा शोषण-उत्पीड़न के शिकार हुए हैं। दुनिया में जो भी बदसूरत हैं वह मुट्ठी भर शोषकों तथा उसकी व्यवस्था की देन है। लेकिन जो दुनिया को बना सकते हैं, वही एक जुट संघर्ष से शोषण और उत्पीड़न को समाप्त करेंगे। यही स्थायी ख्वाव हमारी आँखों में है। शोषण मुक्त समाज का स्वप्न। 

दरसल हमेशा से जनगीतों को राजनैतिक विचारों की उद्रणी, लाउड पोयट्री, भावों की गहराई का अभाव, उथलापन आदि आरोप लगाकर बड़े कलेवर की कृतियों महाकाव्य आदि तथा प्रोजियन फार्म की कविताओं के मुकाबले कम महत्व का माना जाता रहा है। जबकि जनगीतों को आन्तरिक बुनावट, कथन, यथार्थ बोध और सबसे ऊपर महान तथा बड़ा विजन तथा उसका व्यापक फलक किसी तरह से कमतर नहीं है। जनगीतों की अपार लोकप्रियता तथा सफलता और इससे भी आगे बढ़कर एक साथ बड़े जन समूह को उद्वेलित प्रेरित करने की शक्ति उसे अलग से रेखांकित करने की मांग करती है। जहाँ तक भावों विचारों की गहराई तथा कलात्मकता की बात है वह भी कविता के किसी फार्म के मुकाबले कमतर भी नहीं है। बस गंभीरता का लबादा फेंककर जन गीतों के आन्तरिक सौन्दर्य को नया पाठ रचना होगा। यदि कविता की सार्थकता महाकाव्य होने में है तो जनगीतों की सार्थकता नये समाज के विजन को हकीकत में बदलने वाले संघर्षों के प्रेरक बनने में है।     




3-जनगीतों का सामाजिक सन्दर्

साहित्य अपने अन्तिम निष्कर्षों में एक सामाजिक उत्पाद होता है। कत्र्ता के घोर उपेक्षा के बावजूद समय और समाज की सच्चाई उसके होठों  पर आ ही जाती है। ऐसे में जब कविता का मूल भाव समाज परिवर्तन हो तो समाज में निहित द्वन्द्व, अन्त र्विरोध अत्यन्त स्वाभाविक रूप से कविता में घुल-मिलकर प्रवाहित होते हैं। ‘जनगीतों’ का स्वरूप कुछ ऐसे ही बना-रचा हुआ है। सामाजिक अन्तः सम्बन्ध और उनमें निहित असमानता के तनावपूर्ण रूप जनगीतों  के मूल विषय हैं।

 जनगीतों में सर्वाधिक गैर बराबरी तथा शोषण और उत्पीड़न के सन्दर्भ चित्रित हुए हैं। लगभग सभी गीतों  का आधार तथा दृष्टि इस बात से परिचालित है कि जो लोग अपने मेहनत से दुनिया का सृजन करते हैं वही समाज में उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार हैं। चूंकि समाज का ताना-बाना, मूलतः एक विशाल शोषणकारी तन्त्र द्वारा संचालित है जिसमें मेहनतकश अवाम के लिए कुछ भी नहीं है और मुठ्ठीभर लोगों  के लिए ‘सब कुछ है।’ इसलिए जनगीतों का इसके विरुद्ध संघर्ष और परिवर्तन का स्वर प्रमुख है। इस रूप में जनगीतों के भीतर एक शोषण और अन्याय से भरे समाज का चित्रण हुआ है तो दूसरी ओर इसके बदलने की बेचैनी का।



समाज अपने व्यापक तथा सीमित दोनों  अर्थों में व्यक्ति, परिवार, जाति समूह गांव, रिश्ते-नाते, देश आदि से बँधा होता है। लेकिन उसके बीच मौजूद असमान रूप तथा उत्पीड़नकारी सम्बन्ध निरन्तर संचालित होते हैं। जनगीतों में मौजूद समाज इस नुक्ते को साफ कर के चलता है कि सारे सामाजिक सम्बन्ध मात्र शोषक-शोषित के बीच बँटे हुए होते हैं। इस रूप में जनगीतों का समाजशास्त्र शास्त्रीय किस्म का समाज नहीं है बल्कि लूट और उत्पीड़न से संचालित समाज है जिसे बदलने की बेहद जरूरत है। लेकिन इसके कथन की शैली तथा रूपकों में भिन्नता एक नये आवर्त और उठान के साथ आता है जिससे एक ताजगी बनी रहती है। इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य है कि एक पूरा का पूरा समाज और उसके बुनियादी द्वन्द्व जनगीतों का यह विशेष सामाजिक सन्दर्भ है।

 ‘आहृवान’ नाट्य टोला का प्रसिद्ध गीत है जो ‘हमारा शहर’ फिल्म में गाया भी गया है। पूरे गीत में भारतीय समाज के मुख्य तथा अन्य सामाजिक अन्तविर्रोधों को बेहद खूबसूरती से उठाया गया है। प्रत्येक बन्द अलग-अलग सामाजिक गतियों  को चित्रित-वर्णित करते हैं। पहले बन्द में कृषक समाज का चित्र रखा गया है-


अपनी मेहनत से भाई धरती की हुई खुदाई

माटी में बीज बोया, धरती भी दुल्हन बनाई

पसीना हमने बहाया, जमींदार ने खूब कमाया

साहूकार के कर्ज ने हमको गांव से शहर भगाया।

अरे दाने-दाने को मजदूर तरसे जीने की कठिनाई

ऐसी क्यों हे भाई......................।


 गीत एक बारगी किसान के मजदूर बनने की प्रक्रिया और गांव से उजड़ने के कारणांे का खुलासा करता है। समस्या उस समाज की है जिसमें जमींदार और साहूकार अभी भी मौजूद हैं और नये तरीके से ‘धरती को दुल्हन’ की तरह अपने पसीने से सजाने वाले किसान को बदहाल बना देते हैं। इसी क्रम में गीत के क्रमशः अपने अगले बन्दों में एक-एक सामाजिक समूह की बिद्रूपताआंे को उठाया गया है तथा-


अपनी मेहनत से भाई, धरती की हुई खुदाई

माटी से गारा बनाया, माही से ईंट बनाई

धनवान को मिली सुविधा, सुख चैन भुलाया हमने

अरे अपना ही रहने का घर नहीं है भाई। यह बिल्डरों  का राज है।

खाने को दाना नहीं पीने को पानी नहीं रहने को घर नहीं पहनने को कपड़ा नहीं। यह कैसा राज है भाई।


 इसी क्रम में बुनकरों  की सामाजिक स्थितियों  तथा उनके कर्म की उपेक्षा का चित्र है यथा-


 अपनी मेहनत से, रूई को सूत बनाया

उसको चढ़ा पहिये पर, कपड़ा हमने बनाया

कपड़े पर रंग-बिरंगे झालर चढ़ाई हमने

टी0बी0 को अपनाया, माल लिया मालिक ने अरे हम अध नंगे मुर्दाघाट पर कफन की भी महंगाई। ऐसा क्यों है भाई।


किसानों,मजदूरों,बुनकरों,दलितों की विडम्बना पूर्ण स्थितियों के बिदू्रप चित्रों तथा विडम्बना मूलक सामाजिक सन्दर्भो से भरे पड़े हैं जनगीत। बल्कि उनकी रागिनी उनके दुःख पीड़ा की ठंडी लहर सी निर्मित होती है।

 जनगीतों का सारा ध्यान मेहनतकश अनाम तथा उसके श्रम की लूट पर टिका हुआ है। ब्रज मोहन के गीत कुछ इस तरह हैं:-


धरती को सोना बनाने वाले भाई रे

माटी से हीरा उगाने वाले भाई रे

अपना पसीना बहाने वाले भाई रे

उठ तेरी मेहनत को लूटे हैं कसाई रे।

मिल, कोठी, कारें, ये सड़कें  ये इंजन

इन सब में तेरी ही मेहनत की धड़कन

तेरे ही हाथों  ने दुनिया बनाई

तूने ही भर पेट रोटी न खाई.........।


 कहने का अर्थ यह कि एक ऐसा समाज जो मेहनत कश के अपार श्रम के लूट पर टिका है वह समाज नहीं चल सकता। उसे बदलने की जरूरत है। निश्चय ही यही जनगीतों का महत्वपूर्ण सामाजिक सन्दर्भ है। श्रम जीवी समाज की दुःख, पीड़ा, गरीबी और दुश्वारियों  के चित्रण के साथ जनगीत उस बुनियादी अन्तर्विरोध को उठाते हैं जो मानव समाज को आगे ले जाने में समर्थ हैं अर्थात श्रम और पूंजी का अन्तर्विरोध। शील ने इसे साफ शब्दों में रचा है-


हँसी जिन्दगी, जिन्दगी का हक हमारा।

हमारे ही श्रम से है जीवन की धारा।


 ऐसे समाज में जहाँ समस्त श्रमजीवी समाज यथा मजदूर, किसान, दलित स्त्री उत्पीड़ित है उसे बदलने की जरूरत है। यह आकस्मिक नहीं कि जनगीत समाज परिवर्तन के लिए निरन्तर संघर्ष के लिए पे्ररित करते दिखते हैं। इस रूप में जनगीत का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू समाज परिवर्तन तथा एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण विशेष सामाजिक सन्दर्भ है। यहाँ यह भी साफ होना चाहिए कि जनगीत किसी अमीर और व्यक्गित उन्नति का पाठ नहीं रचते बल्कि उनका सारा जोर समाज बदलने का आहृवान, संघर्ष, प्रेरणा और नवीन समाज के स्वप्न से भरा हुआ है।

 जनगीत विशुद्ध रूप में सामाजिक हैं उनका ध्येय शोषण पर टिके समाज को बदलकर नये समाज का सृजन है, यही उनका मान है यही लय है और यही छन्द। साहिर का प्रसिद्ध गीत है-यह किसका लहू है कौन मरा। उसकी चन्द पंक्तियों  का उल्लेख जरूरी है:-


 हम ठान चुके हैं अब जी में

 हर जलियाँ से टक्कर लेंगे

 तुम समझौते की आस रखो

 हम आगे बढ़ते जाएँगे

 हमंे मंजिल आजादी की कसम

 हर मंजिल पे दोहराएँगें ।


 सर्वेश्वर दयाल सक्सेना तो अपने गीत में एक साथ शोषण तन्त्र के तमाम रूपों  तथा कारणों को चित्रित करते हैं और उसके खिलाफ एक साथ जंग का ऐलान करते हैं। अपने आस-पास बिखरी समस्याओं की पहले वे व्याख्या करते हैं-


यह छाया तिलक लगाये जनेऊ धारी हैं

यह जात-पात के पूजक हैं

यह जो भ्रष्टाचारी हैं।

यह जो भू-पति कहलाता है जिसकी साहूकारी है।

उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।


इसी गीत का अगला बंद है-


 यह जो तिलक मांगता, लड़के की धौंस जमाता है। 

कम दहेज पाकर लड़की का जीवन नरक बनाता है। 

पैसे के बल पर यह जो अनमेल विवाह रचाता है। 

उसे मिटाने और बदलने की तैयारी है।

जारी है-जारी है आज लड़ाई जारी है।


 संघर्ष के आहृवान का दूसरा मुकाम संघर्ष से नये समाज को प्राप्त करने का है। बल्ली सिंह का प्रसिद्ध गीत है-

 ले मशालें  चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के, अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के, पूछती है झोपड़ी और पूछते खेत भी, कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गांव के। बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता यहां यह जानकर अब लड़ाई लड़ रहे हैं, लोग मेरे गांव के।

  जनगीत कार एक नये समाज रचना के लिए प्रतिबद्ध है। वह समाज जो शोषण-उत्पीड़न से मुक्त बराबरी समानता का हो। मेहनत कश अवाम का हो। गरीब मजदूर किसान की दुश्वारिया जहां न हों, जहाँ स्वास्थ्य शिक्षा की सबके लिए व्यवस्था हो। उसे उम्मीद है कि शोषण का पूरा ढांचा एक दिन गिरेगा। ब्रेख्त के शब्दों में -


एक दिन ऐसा आयेगा

पैसा फिर काम न आयेगा

धरा हथियार रह जायेगा

और यह जल्दी ही होगा

ये ढाँचा बदल जायेगा.........।


 इस प्रकार जनगीत बेलौस तरीके से समाज के मुख्य अन्तर्विरोध को उठाते हैं। उनके लिए मेहनत की लूट और पूँजीवादी निजाम महत्वपूर्ण सामाजिक सच्चाई है। लेकिन वे यहीं नहीं रुकते वे इसे बदलने के लिए संघर्ष की हामी भरते हैं। परिवर्तन में आस्था व्यक्त करते हैं। एक लम्बी तथा दीर्घ कालिक संघर्ष को सजाये गीत नये समाज के स्वप्न को धरती पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध हैं। श्रम और पूंजी के इस जंग में वे श्रम के सभी पक्षकारों को आमन्त्रित करते हैं-


गर हो सके तो अब कोई शम्मा जलाइए

इस अहले सियासत का अन्धेरा मिटाइए 

अब छोड़िये आकाश में नारा उछालना, 

आकर हमारे कन्धे से कन्धा मिलाइए। 

क्यों  कर रहे हैं आँधी के रुकने का इन्तजार,

ये जंग है, इस जंग में ताकत लगाइए।


 ख ख्याल 

४ घ-  जनगीतां कात रचना विधान : कला का नया शास्त्र


 सामान्यतः जगगीतां

की स ृजनात्मकता, कलात्मकता, भाषिक

सौन्दर्य तथा रचाव-गठन पर चर्चा ही

नहीं हुई है। उस े गम्भीर आलोचनात्मक

विमर्श का हिस्सा ही नहीं माना गया है।

सतही, लाउड, नारे बाजी कहकर उसम ें

निहित कलात्मकता की उपेक्षा होती रही

है। इस सन्दर्भ म ें यह भी उल्लेखनीय

तथ्य है कि बड ़ी प्रतिभाआें क े शामिल

होने क े बावज ूद उन पर विचार करते

समय जनगीतां को उनक े साहित्यिक

अवदान स े बाहर रखा गया ह ै।

जनगीतकारां तथा उनके सृजन को गम्भीर

अकादमिक विमर्श स े बाहर रखना दुखद

भी है और आश्चर्य का विषय भी। इस

रूप म ें जनगीतां क े रचना विधान तथा

उनम ें निहित काव्यात्मक सौन्दर्य पर एक

तरह स े विचार करने क े लिए जरूरी है

कि गम्भीर कलात्मक उपकरणां के सर्वमान्य

मान दण्डां के बरक्स नया शास्त्र प्रस्तावित

किया जाय। यह मांग कविता क े व्यापक

जनतांत्रिक समझ को और लाख-लाख

संघर्षो की आवाज को अकादमिक मान्यता

तथा विमर्श का हिस्सा बनाने क े लिए

जरूरी है।

यह बेहद आश्चर्य का विषय है कि

राष्ट्रीय मुक्ति स ंग्राम और बाद क े जन

संघर्षो के बीच लाख-लाख परिवर्तन कामी

भी कष्ट से गाये जाने वाले तराने कलात्मक

नहीं हैं बल्कि पुस्तकालयां और पाठ्यक्रमां

म ें शामिल श्रोता पाठक विहीन रचनाएँ

काव्य कला क े उत्क ृष्ट नम ूने है ं। इस

भटकाव का कारण मुख्य रूप स े कविता

रचना को देखने क े नजरिये स े सम्बन्धित

है। चूंकि स ंहिता को आप जन स ंघर्ष

विहीन तथा परिवर्तन क े उपकरण क े

स्थान पर महान कालजयी सा ैन्दय र्

बोधीय तराने क े रूप म ें देखते है ं तो आप

के दृष्टि पक्ष में जनगीत तथा उनमें निहित

कलात्मकता नहीं दिखलाई पड ़ती है।

जरूरी ह ै कि जनगीता ं े की अपार

लोकप्रियता तथा परिवर्तन कामी चेतना

को अपने दृष्टि म ें रखें तो उनम ें निहित

कलात्मकता को समझना बेहद आसान

हा े जाएगा। पाठक-श्रा ेता बिहीन

पुस्तकालयी कविता की तुलना में जनगीतां

की कलात्मकता ही है कि वे लाखां लेगां

का े निराशा, पस्त-हिम्मती स े बाहर

निकालकर एकज ुट स ंघर्ष क े लिए आज

भी प्र ेरणा स ्रोत बने हुए है ं। एक आलेख

म ें तो यह सम्भव नहीं कि जनगीतां की

बुनावट क े उन तत्वां की पहचान हो जो

बेहद कठिन समय म ें भी हमें स ंघर्षो क े

लिए प्र ेरणा प्रदान करते है ं बल्कि बिखर

जाने स े थाम ें रहते हैं लेकिन इस दिशा म ें

पहल तो करनी ही होगी।

जनगीतों क े रचना विधान का पहला

और सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू उसकी

काव्यभाषा है जो शब्द कोशों स े नहीं

बल्कि जीवन कोशां स े निर्मित है। यहां

साधारण से साधारण जनभाषा को अत्यन्त

कलात्मक काव्य भाषा में बदलने का

अभूतपूर्व कौशल दिखलाई पड़ता है। बेहद

साधारण और मामूली वाक्य विन्यास तथा

शब्द पदक्रम गहरे आत्ममिक स ंस्पर्श स े

मारक काव्य शक्ति ग्रहण करते है ं और

व्यापक जन को सम्मोहित कर लेते है ं।

दिव्य काव्य बोध स े सम्पन्न रचनाओं में

निहित आत्मा की भाषा का स ृजन शास्त्र

उन्हें बेजोड ़ बनाता है। गौरव पाण्डेय क े

बेहद चर्चित गीत को उदाहरण क े लिए

देखा जा सकता है-

समय का पहिया चले रे साथी,

समय का पहिया चले।

फौलादी घोड ़ों की गति स े

आग बफ र् में जले।

रात और दिन पल-पल

छिन-छिन आगे बढ़ता जाए

तोड ़ पुराना नये सिरे स े सब

क ुछ गढ़ता जाए।

पर्वत-पर्वत धारा फूटे लोहा मोम सा

गले रे साथी

गीत क े मुखड ़े स े लेकर अंतिम बन्द

तक आप सिफ र् शब्द चयन और वाक्य

विन्यास को ध्यान दें तो अवश्य ही लगेगा

कि गीत की भाषा बेहद सहज सरल और

रोजमर्रा क े जीवन का हिस्सा है। कवि ने

उस े एक लय क्रम में रख भर दिया है

जिसस े अर्थ चमक उठा है। ‘आग बफ र् में

जले’ ‘लोहा मोम सा गले’ आजादी की

सड़क ढले आप रुककर प्रयुक्त वाक्य पद

में विरोधी अवस्थितियों को देखें और उससे

निकलन े वाल े ब ेहद साधारण भाषिक

विन्यास क े भीतर से अर्थ चमक को पढ़ने

की जहमत उठाएँ तो आपको जनगीतों

की कलात्मकता का दर्शन होगा। दरअसल

जनगीतों पर बात न होने के कारण उसकी

कलात्मकता पर विचार नहीं हुआ वरना

उपर्युक्त वाक्य पद विन्यास हिन्दी कविता

में दुर्लभ है।

काव्य भाषा का एक और महत्वपूर्ण

पहलू जो जनगीतों में रेखांकित किया

जाना चाहिए वह है उर्दू, हिन्दी, भोजपुरी,

अवधी एवं अन्य बोलियों का अधिकतम

प्रयोग। यह वह तत्व है जो भाषा को

जीवन्त और हृदय स्पर्शी बनाता है। आम

अवाम तक पह ु ंचन े म े ं यह अत्यधिक

सहायक बना है। यदि स ूत्र वाक्य में कहें

तो जन गीतों की काव्य भाषा जनभाषा के

स ृजनात्मक प्रयोग का कलात्मक कौशल

है। सामान्यतः जन भाषा म ें काव्य भाषा को ढालना और उनस े बड ़े विजन तथा

परिवर्तन कामी चेतना स े लवरेज कर

इच्छित लक्ष्य की ओर गतिमान करना

बेहद उन्नत किस्म की कला है जिसे जन

गीतकारों ने सम्मान दिया है। प ्रमुख

जनगीत कारों में विशेषकर ‘शील’ शलभ

श्रीराम सि ंह, श ंकर श ैल ेन्द ्र, साहिर

लुधियानवी, बृजमोहन, फैज अहमद फ ैज,

राम क ुमार क ृषक, शशिप्रकाश, गोरख

पाण्डे के जनगीतों में यह कलात्मक उत्कर्ष

चरम पर है ं। गोरख पाण्डे का एक और

जनगीत दृष्टव्य है-

हमारे वतन की नयी जिन्दगी हो,

नयी जिन्दगी इक मुकम्मल खुशी हो

नया हो गुलिस्तां नई बुलबुले हां

मुहब्बत की कोई नई रागिनी हो

न हो कोई राजा न हो रंक कोई

सभी हों बराबर सभी आदमी हां,

न ही हथकड़ी कोई फसलों को डाले

हमारे दिलों की न सौदागरी हो।

पूरे गीत क े रचाव में चलती

हिन्दुस्तानी ज ुबान है। वही ज ुबान जो

मीर की है, फ ैज की है। मुकम्मल भाषा।

भाषाई सादगी का सौन्दर्य, गोरख आगे

कहते है ं-

सभी होठ आजाद हो मयकदे में, कि

गंगो जमन ज ैसी दरियादिली हो।

गंगो जमन, की दरियादिली यही है

भाषा मिजाज, जिस े जन गीतों ने सम्भव

किया है। इस सन्दर्भ में एक और महत्वपूर्ण

पक्ष की ओर गौर करना जरूरी है। वह है

वर्णिक, मात्रिक छ ंदों स े बाहर लय और

स ंगीत को कविता का आधार रेखा बना

देना। यह भी उल्लेखनीय है कि लय और

संगीत को लोकधुनों से लेकर नवीन संगीत

से लबरेज कर देना। कलात्मकता का यह

और भी विरल उदाहरण है कि आप चाहें

तो उन धुनों, लयों को नये अंदाज तथा

लोच अपने हिसाब स े भी दे सकते है ं

अर्थात गायन का मुक्त अवकाश। यह

कविता में बिल्क ुल करिश्मा ज ैसा है।

दिल्ली और पटना, गुजरात और गोरखपुर

क े साथी एक ही गीत को अलग-अलग

धुनों और लोच क े साथ प्रस्तुत करते है ं

जिसमें थोड ़ी सी स्थानीयता भी लगी

रहती है। कहने का तात्पर्य यह है कि

राग रागिनीया े ं स े आबद्ध जनगीत

अपनी-अपनी तरह के धुनों लयों के प्रयोग

को स्पेश भी देते है ं। जितना स ंगीत का

बंधन है उतना लय और धुनों की उन्मुक्तता

भी। दरअसल जनगीतों की स ृजनशीलता

के पीछे समूह की सृजनात्मकता भी शामिल

ह ै। इस े नजरअ ंदाज नही ं किया जा

सकता। ज ैस े फ ैज क े एक तराने को

अलग-अलग टोलियाँ अलग-अलग तरह

से गाती हैं और लय और धुन तथा उठान

और सम पर जोर बदल जाता तो हमेशा

क ुछ नया मिलता है। जनगीतों की यह

संगीतात्मक शक्ति अनूठी है। शशि प्रकाश

का एक गीत है-

जिन्दगी लड ़ती रहेगी गाती रहेगी

नदिया बहती रहेगी।

कारवां चलता रहेगा चलता रहेगा।

अलग-अलग टीम ें इस े अलग-अलग

धुनों में जन कण्ठ तक पहुचांती रहती है ं

और नया पन बना रहता है। जनगीतों क े

रचना विधान का सबस े महत्वपूर्ण पहलू

मुखड ़ा है। मुखड ़े में ही वह सारी काव्य

शक्ति तथा स ृजनात्मकता का प ्रयोग

फलित होता है। बाद की पंक्तियों में नये

बिम्बो चित्रों तथा सामाजिक सत्यों को

उद्घाटित करने वाले पद विन्यास होते हैं

जो एक लयात्मक आवर्त क े साथ पुनः

मुखड ़े पर पहु ंचते है ं। इस रूप में मुखड ़े

पर पुनः लौटते समय गीत नयी अर्थछवि

ग्रहण करता है। यही कला उस े कविता

क े छन्द बंद्ध रूप अथवा छन्द मुक्त रूप

विन्यास स े विलग करता है। आवृत्ति क े

साथ नई अर्थ छवियों का स ृजन यह

अद्भुत काव्य कौशल है जो जनगीतों क े

अतिरिक्त दुलर्भ है। शंकर शैलेन्द्र का

चर्चित जन गीत है। गीत का मुखड ़ा है

‘भगत सिंह इस बार लेना काया भारतवासी

की।’ गीत अपने हर बन्द में नये तरह की

गुलामी का साक्षात्कार करते हुए सम पर

लौटकर मुखड ़े की टेक की आवृत्ति स े

नया काव्य बोध स ृजित करता है। यथा-

सत्य अंहिसा का शासन है, रामराज्य

फिर आया है

भेड ़ भेडि ़ये एक घाट है, सब ईश्वर की

माया है,

दुश्मन ही जज अपना, टीपू ज ैसों का

क्या करना है

शांति स ुरक्षा की खातिर हर हिम्मतकर

को डरना है

पहनेगी हथकड ़ी भवानी रानी लक्ष्मी

झांसी की।

देश भक्ति क े लिए आज भी सजा

मिलेगी फ ांसी की

इस प्रकार स े जनगीतों का रचना विधान

ऊपर स े सहज सरल इकहरा दिलखाई

तो पड़ता है लेकिन अपने आन्तरिक गठन

तथा रचाव में बेहद कलात्मक ठहरता है

थोड ़े स े आम फहम शब्दों में स ंगीतात्मक

स ंस्पर्श से व्यापक जन समुदाय को प्रेरित

उद्वेलित करने की काव्य कला जनगीतों

का रचना विधान है।

बहुत सारे जनगीत लोक धुनों

तथा लोक गीतों क े सन्दर्भ में भी रचे गये

है ं, लेकिन वे लोकगीत नहीं जनगीत है ं।

दरअसल लोकगीतों में बहुत सारे पिछ ़ड ़े

म ूल्य भी मिल जाते है ं लेकिन जनगीत

उसस े बुरी तरह स े मुक्त हैं और अपनी

प्रगतिशील चेतना स े स ंचालित है ं। लोक

उनक े लिए मात्र जन-जन तक पहुँचने

का माध्यम भर है ं। इस स्नदर्भ में ढेर सारे

भोजपुरी, अवधी में लिखे जनगीतों को

उद्धृत किया जा सकता है, बल्कि भोजपुरी

जनगीतों पर अलग स े कार्य करने की

आवश्यकता है। हजारों जनगीतों के रचना

विधान के कलात्मक सौन्दर्य का साक्षात्कार

करने क े लिए जरूरी है कि नये काव्य

शास्त्र की खोज की जाये। पुराने काव्य

विमर्श जनगीतों क े कलात्मक उत्कर्ष की

व्याख्या क े लिए नाकाफी है

 


शुक्रवार, 7 अगस्त 2020

नेहरू की दृष्टि ही भारतीय संस्कृति है - डॉ गिरीश


 

भारतीय संस्कृति के विषय में पं॰ जवाहर लाल नेहरू का द्रष्टिकोण

 

[ अपने निहित राजनैतिक स्वार्थों के लिये दक्षिणपंथियों द्वारा आज भारतीय संस्कृति पर जो तीखे हमले बोले जा रहे हैं और उसे धर्म विशेष से जोड़ कर संकुचित, कुंठित और पथभ्रष्ट करने के भयानक प्रयास किये जा रहे हैं, तब भारतीय संस्कृति के बारे में पं॰ जवाहर लाल नेहरू के सुष्पष्ट विचार हमें उसकी व्यापकता का दिग्दर्शन कराते हैं। आज के संगीन हालातों में यह और अधिक प्रासंगिक हो  गये हैं। श्री रामधारीसिंह दिनकर की पुस्तक “संस्कृति के चार अध्याय” की भूमिका के रूप में यह आलेख 30 सितंबर 1955 को पूरा किया गया था। अंतिम ढाई पंक्तियों को छोड़ यह आलेख अक्षरशः प्रस्तुत किया जा रहा है। इसका शीर्षक भी मेरे द्वारा दिया गया है- डा॰ गिरीश ]

 

मेरे मित्र और साथी दिनकर ने, अपनी पुस्तक के लिये जो विषय चुना है, वह बहुत ही मोहक और दिलचस्प है। यह ऐसा विषय है जिससे, अक्सर, मेरा अपना मन भी ओत- प्रोत रहा है और मैंने जो कुछ लिखा है, उस पर इस विषय की छाप आप से आप पड़ गयी है। अक्सर मैं अपने आप से सवाल करता हूँ, भारत है क्या? उसका तत्व या सार क्या है? वे शक्तियां कौन-सी हैं जिनसे भारत का निर्माण हुआ है तथा अतीत और वर्तमान विश्व को प्रभावित करने वाली प्रमुख प्रव्रत्तियों के साथ उनका क्या संबंध है? यह विषय अत्यंत विशाल है, और उसके दायरे में भारत और भारत के बाहर के तमाम मानवीय व्यापार आ जाते हैं। और मेरा ख्याल है कि किसी भी व्यक्ति के लिये यह संभव नहीं है कि वह इस संपूर्ण विषय के साथ अकेला ही न्याय कर सके। फिर भी, इसके कुछ खास पहलुओं को लेकर उन्हें समझने की कोशिश की जा सकती है। कम से कम, यह तो संभव है ही कि हम अपने भारत को समझने का प्रयास करें, यद्यपि, सारे संसार को अपने सामने न रखने पर भारत-विषयक जो ज्ञान हम प्राप्त करेंगे, वह अधूरा होगा।

संस्क्रति है क्या? शब्दकोश उलटने पर इसकी अनेक परिभाषायें मिलती हैं। एक बड़े लेखक का कहना है कि “संसार भर में जो भी सर्वोत्तम बातें जानी या कही गयी हैं, उनसे अपने आपको परिचित करना संस्कृति है।“ एक दूसरी परिभाषा में यह कहा गया है कि “संस्कृति शारीरिक या मानसिक शक्तियों का प्रशिक्षण द्रढ़ीकरण या विकास अथवा उससे उत्पन्न अवस्था है।“ यह मन आचार या रुचियों की परिष्क्रति या शुद्धि” है। यह “सभ्यता का भीतर से प्रकाशित हो उठना” है। इस अर्थ में, संस्क्रति कुछ ऐसी चीज का नाम हो जाता है जो बुनियादी और अंतर्राष्ट्रीय है। फिर, संस्कृति के कुछ राष्ट्रीय पहलू भी होते हैं। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि अनेक राष्ट्रों में अपना कुछ विशिष्ट व्यक्तित्व तथा अपने भीतर कुछ खास ढंग के मौलिक गुण विकसित कर लिये हैं।

इस नक्शे में भारत का स्थान कहाँ पर है? कुछ लोगों ने हिन्दू-संस्कृति, मुस्लिम-संस्कृति और ईसाई-संस्कृति की चर्चा की है। ये नाम मेरी समझ में नहीं आते, यद्यपि, यह सच है कि जातियों और राष्ट्रों की संस्कृतियों पर बड़े-बड़े धार्मिक आंदोलनों का असर पड़ा है। भारत की ओर देखने पर मुझे लगता है, जैसा कि दिनकर ने भी ज़ोर देकर दिखलाया है, कि भारतीय जनता की संस्कृति का रूप सामासिक है और उसका विकास धीरे धीरे हुआ है। एक ओर तो इस संस्कृति का मूल आर्यों से पूर्व, मोहंजोदड़ों आदि की सभ्यता तथा द्रविड़ों की महान सभ्यता तक पहुंचता है। दूसरी ओर, इस संस्कृति पर संस्कृति  की बहुत ही गहरी छाप है जो भारत में मध्य एशिया से आये थे। पीछे चल कर, यह संस्क्रति उत्तर-पश्चिम से आने वाले तथा फिर समुद्र की राह से पश्चिम से आने वाले लोगों से बार-बार प्रभावित हुयी। इस प्रकार, हमारी राष्ट्रीय संस्क्रति ने धीरे धीरे बढ़ कर अपना आकार ग्रहण किया। इस संस्क्रति में समन्वयन तथा नये उपकरणों को पचा कर आत्मसात करने की अद्भुत योग्यता थी। जब तक इसका यह गुण शेष रहा, यह संस्क्रति जीवित और गतिशील रही। लेकिन, बाद को आकर उसकी गतिशीलता जाती रही जिससे यह संस्क्रति जड़ होगयी और उसके सारे पहलू कमजोर पड़ गये। भारत के इतिहास में हम दो परस्पर विरोधी और प्रतिद्वंदी शक्तियों को काम करते देखते हैं। एक तो वह शक्ति है जो बाहरी उपकरणों को पचा कर समन्वय और सामंजस्य पैदा करने की कोशिश करती है, और दूसरी वह जो विभाजन को प्रोत्साहन देती है; जो एक बात को दूसरी से अलग करने की प्रव्रत्ति को बढ़ाती है। इसी समस्या का, एक भिन्न प्रसंग में, हम आज भी मुक़ाबला कर रहे हैं। आज भी कितनी ही बलिष्ठ शक्तियां हैं जो केवल राजनीतिक ही नहीं, सान्स्क्रतिक एकता के लिये भी प्रयास कर रही हैं। लेकिन, ऐसी ताक़तें भी हैं जो जीवन में विच्छेद डालती हैं, जो मनुष्य- मनुष्य के बीच भेद-भाव को बढ़ावा देती हैं।

अतएव आज हमारे सामने जो प्रश्न है वह केवल सैद्धान्तिक नहीं है उसका संबंध हमारे जीवन की सारी प्रक्रिया से है और उसके समुचित निदान और समाधान पर ही हमारा भविष्य निर्भर करता है। साधारणतः, ऐसी समस्याओं को सुलझाने में नेत्रत्व देने का काम मनीषी करते हैं। किन्तु, वे हमारे काम नहीं आये। उनमें से कुछ तो ऐसे हैं जो इस समस्या के स्वरूप को ही नहीं समझते। बाकी लोग हार मान बैठे हैं। वे विफलता-बोध से पीड़ित तथा आत्मा के संकट में ग्रस्त हैं और वे जानते ही नहीं कि जिंदगी को किस दिशा की ओर मोड़ना ठीक होगा।

बहुत से मनीषी मार्क्सवाद और उसकी शाखाओं की ओर आक्रष्ट हुये और इसमें कोई सन्देह नहीं कि मार्क्सवाद ने ऐतिहासिक विकास का विश्लेषण उपस्थित करके समस्याओं पर सोचने और उन्हें समझने के काम में हमारी सहायता की। लेकिन आखिर को, वह भी संकीर्ण मतवाद बन गया और, जीवन की आर्थिक पध्दति के रूप में उसका चाहे जो भी महत्व हो, हमारी बुनियादी शंकाओं का समाधान निकालने में वह भी नाकामयाब है। यह मानना तो ठीक है कि आर्थिक उन्नति जीवन और प्रगति का बुनियादी आधार है; लेकिन जिंदगी यहीं तक खत्म नहीं होती। यह आर्थिक विकास से भी ऊंची चीज है। इतिहास के अंदर हम दो सिद्धांतों को काम करते देखते हैं। एक तो सातत्य का सिद्धान्त है और दूसरा परिवर्तन का। ये दोनों सिद्धान्त परस्पर विरोधी लगते हैं, परन्तु, ये विरोधी हैं नहीं। सातत्य के भीतर भी परिवर्तन का अंश है। इसी प्रकार, परिवर्तन भी अपने भीतर सातत्य का कुछ अंश लिये रहता है। असल में, हमारा ध्यान उन्हीं परिवर्तनों पर जाता है जो हिंसक क्रांतियों या भूकंप के रूप में अचानक फट पड़ते हैं। फिर भी, प्रत्येक भूगर्भ-शास्त्री यह जानता है कि धरती की सतह में जो बड़े-बड़े परिवर्तन होते हैं, उनकी चाल बहुत धीमी होती है और भूकंप से होने वाले परिवर्तन उनकी तुलना में अत्यंत तुच्छ समझे जाते हैं। इसी तरह, क्रान्तियाँ भी धीरे धीरे होने वाले परिवर्तन और सूक्ष्म रूपान्तरण की बहुत लंबी प्रक्रिया का बाहरी प्रमाण मात्र होती है। इस द्रष्टि से देखने पर, स्वयं परिवर्तन एक ऐसी प्रक्रिया है जो परंपरा के आवरण में लगातार चलता रहता है। बाहर से अचल दीखने वाली परंपरा भी, यदि जड़ता और म्रत्यु का पूरा शिकार नहीं बन गयी है, तो धीरे धीरे वह भी परिवर्तित हो जाती है।

इतिहास में कभी कभी ऐसा भी समय आता है जब परिवर्तन की प्रक्रिया और तेजी कुछ अधिक प्रत्यक्ष हो जाती है। लेकिन, साधारणतः, बाहर से उसकी गति दिखाई नहीं देती। परिवर्तन का बाहरी रूप, प्रायः, निस्पंद ही दीखता है। जातियाँ जब अगति की अवस्था में रहती हैं, तब उनकी शक्ति दिनोंदिन छीजती जाती है, उनकी कमज़ोरियाँ बढ़ती जाती हैं। परिणाम यह होता है कि उनकी रचनात्मक कलाओं और प्रव्रत्तियों का क्षय हो जाता है। तथा, अक्सर वे राजनीतिक रूप में गुलाम भी हो जाती हैं।

संभावना यह है कि भारत में संस्कृति के सबसे प्रबल उपकरण आर्यों और आर्यों से पहले के भारतवासियों, खास कर, द्रविड़ों के मिलन से उत्पन्न हुये। इस मिलन, मिश्रण या समन्वय से एक बहुत बड़ी संस्क्रति उत्पन्न हुयी जिसका प्रतिनिधित्व हमारी प्राचीन भाषा संस्क्रत करती है। संस्कृति

 और प्राचीन पहलवी, ये दोनों भाषायें एक ही माँ से मध्य एशिया में जनमी थीं, किन्तु, भारत में आकर संस्क्रत ही यहाँ की राष्ट्रभाषा हो गयी। यहाँ संस्क्रत के विकास में उत्तर और दक्षिण, दोनों ने योगदान दिया। सच तो यह है कि आगे चल कर संस्क्रत के उत्थान में दक्षिण वालों का अंशदान अत्यंत प्रमुख रहा। संस्क्रत हमारी जनता के विचार और धर्म का ही प्रतीक नहीं बनी, वरन भारत की सांस्क्रतिक एकता भी उसी भाषा में साकार हुयी। बुद्ध के समय से लेकर अब तक संस्क्रत यहाँ की जनता की बोले जाने वाली भाषा कभी नहीं रही है, फिर भी, सारे भारतवर्ष पर वह अपना प्रचुर प्रभाव डालती ही आयी है। कुछ दूसरे प्रभाव भी भारत पहुंचे और उनसे भी विचारों और अभिव्यक्तियों को नयी दिशाएं प्राप्त हुयीं।

काफी लंबे इतिहास के अन्दर, भूगोल ने भारत को जो रूप दिया, उससे वह एक ऐसा देश बन गया जिसके दरवाजे बाहर की ओर बन्द थे। समुद्र और महाशैल हिमालय से घिरा होने के कारण, बाहर से किसी का इस देश में आना आसान नहीं था। कई सहस्राब्दियों के भीतर, बाहर से लोगों के बड़े बड़े झुंड भारत आये, किन्तु, आर्यों के आगमन के बाद से कभी ऐसा नहीं हुआ, जबकि बाहरी लोग बहुत बड़ी संख्या में भारत आये हों। ठीक इसके विपरीत, एशिया और यूरोप के आर-पार मनुष्यों के अपार आगमन और निष्क्रमण होते रहे; एक जाति दूसरी जाति को खदेड़ कर वहाँ खुद बसती रही और इस प्रकार, जनसंख्या की बुनावट में बहुत बड़ा परिवर्तन होता रहा। भारत में, आर्यों के आगमन के बाद, बाहरी लोगों के जो आगमन हुये, उनके दायरे बहुत ही सीमित थे। उनका कुछ-न-कुछ प्रभाव तो पड़ा, किन्तु, उससे यहाँ की जनसंख्या के स्वरूप में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं आया। लेकिन, फिर भी, याद रखना चाहिये कि ऐसे कुछ परिवर्तन भारत में भी हुये हैं। सीथियन और हूण लोग तथा उनके बाद भारत आने वाली कुछ अन्य जातियों के लोग यहाँ आकर राजपूतों की शाखाओं में शामिल होगये और यह दावा करने लगे कि हम भी प्राचीन भारतवासियों की संतान हैं। बहुत दिनों तक बाहरी दुनियाँ से अलग रहने के कारण, भारत का स्वभाव भी अन्य देशों से भिन्न  हो गया। हम ऐसी जाति बन गये जो अपने आप में घिरी रहती है। हमारे भीतर कुछ ऐसे रिवाजों का चलन होगया जिन्हें बाहर के लोग न तो जानते हैं और न ही समझ पाते हैं। जाति-प्रथा के असंख्य रूप भारत के इसी विचित्र स्वभाव के उदाहरण हैं। किसी भी दूसरे देश के लोग यह नहीं जानते कि छुआछूत क्या चीज है तथा दूसरों के साथ खाने-पीने या विवाह करने में, जाति को ले कर, किसी को क्या उज्र होना चाहिये। इन सब बातों को लेकर हमारी द्रष्टि संकुचित होगयी। आज भी भारतवासियों को दूसरे लोगों से खुल कर मिलने में कठिनाई महसूस होती है। यही नहीं, जब भारतवासी भारत से बाहर जाते हैं, तब वहाँ भी एक जाति के लोग दूसरी जाति के लोगों से अलग रहना चाहते हैं। हममें से बहुत लोग इन सारी बातों कों स्वयंसिद्ध मानते हैं और हम यह समझ ही नहीं पाते कि इन बातों से दूसरे देश वालों को कितना आश्चर्य होता है, उनकी भावना को कैसी ठेस पहुंचती है।

भारत में दोनों बातें एक साथ बढ़ीं। एक ओर तो विचारों और सिद्धांतों में हमने अधिक-से-अधिक उदार और सहिष्णु होने का दावा किया। दूसरी ओर, हमारे सामाजिक आचार अत्यंत संकीर्ण होते गये। यह विभक्त व्यक्तित्व, सिध्दांत और आचरण का यह विरोध, आज तक हमारे साथ है और आज भी हम उसके विरुध्द संघर्ष कर रहे हैं। कितनी विचित्र बात है कि अपनी द्रष्टि की संकीर्णता, आदतों और रिवाजों की कमजोरियों को हम यह कर नजर-अंदाज कर देना चाहते हैं कि हमारे पूर्वज बड़े लोग थे और उनके बड़े बड़े विचार हमें विरासत में मिले हैं। लेकिन, पूर्वजों से मिले हुये ज्ञान और हमारे आचरण में भारी विरोध है और जब तक हम इस विरोध की स्थिति को दूर नहीं करते, हमारा व्यक्तित्व विभक्त का विभक्त रह जायगा।

जिन दिनों जीवन अपेक्षाक्रत अधिक गतिहीन था, उन दिनों सिध्दान्त और आचरण का यह विरोध इतना उग्र दिखायी नहीं देता था। लेकिन, ज्यों-ज्यों राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों की रफ्तार तेज होती गयी, इस विरोध की उग्रता भी अधिक से अधिक प्रत्यक्ष होती आयी है। आज तो हम आणविक युग के दरवाजे पर खड़े हैं। इस युग की परिस्थितियाँ इतनी प्रबल हैं कि हमें अपने इस आंतरिक विरोध का शमन करना ही पड़ेगा और इस काम में हम कहीं असफल होगये तो यह असफलता सारे राष्ट्र की पराजय होगी और हम उन अच्छाइयों को भी खो बैठेंगे जिन पर हम आज तक अभिमान करते आये हैं।

जैसे हम बड़ी-बड़ी राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं का मुकाबला कर रहे हैं वैसे ही, हमें भारत के इस आध्यात्मिक संकट का भी सामना करना चाहिये। भारत में औद्योगिक क्रान्ति बड़ी तेजी से आ रही है और हम नाना रूपों में बदलते जा रहे हैं। राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों का यह अनिवार्य परिणाम है कि उससे सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न होते हैं; अन्यथा न तो हमारे वैयक्तिक जीवन में समन्वय रह सकता है, न राष्ट्रीय जीवन में। ऐसा नहीं हो सकता कि राजनीतिक परिवर्तन और औद्योगिक प्रगति तो हो, किन्तु, हम यह मान कर बैठें रह जायें कि सामाजिक क्षेत्र में हमें कोई परिवर्तन लाने की आवश्यकता नहीं है। राजनीतिक और आर्थिक परिवर्तनों के अनुसार समाज को परिवर्तित नहीं करने से हम पर जो बोझ पड़ेगा, उसे हम बर्दाश्त नहीं कर पायेंगे, उसके नीचे हम दब जाएँगे।

ईसा के जन्म के बाद की पहली सहस्राब्दी और उससे पहले के भारत की जो तस्वीर हमारे सामने आती है वह उस तस्वीर से भिन्न है, जो बाद को मिलती है। उन दिनों के भारतवासी बड़े मस्त, बड़े जीवन्त, बड़े साहसी और जीवन के प्रति अद्भुत उत्साह से युक्त थे तथा अपना संदेश वे विदेशों में दूर दूर तक ले जाते थे। विचारों के क्षेत्र में तो उन्होने ऊंची से ऊंची चोटियों पर अपने कदम रखे और आकाश को चीर डाला। उन्होने अत्यंत गौरवमयी भाषा की रचना की और कला के क्षेत्र में उन्होने अत्यंत उच्च कोटी की कारयित्री प्रतिभा का परिचय दिया। उन दिनों का भारतीय जीवन घेरों में बंद नहीं था, न तत्कालीन समाज में ही जड़ता या गतिहीनता की कोई बात थी। उस समय एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक, समग्र भारत में सांस्क्रतिक उत्साह भी लहरें ले रहा था। इसी समय, दक्षिण भारतवर्ष के लोग दक्षिण-पूर्व एशिया की ओर गये और वहाँ उन्होने अपना उपनिवेश स्थापित किया। दक्षिण से ही बौध्द मत का संदेश लेकर बोधि-धर्म चीन पहुंचा। इस साहसिक जीवन की अभिव्यक्ति में उत्तर और दक्षिण दोनों एक थे और वे परस्पर एक दूसरे का पोषण भी करते थे।

इसके बाद, पिछली शताब्दियों का समय आता है, जब पतन की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। भाषा में क्रत्रिमता और स्थापत्य में सजावट की भरमार इसी पतनशीलता के प्रमाण हैं। यहाँ आकर हमारे विचार पुराने विचारों की आव्रत्ति बन जाते हैं और कारयित्री शक्ति दिनोंदिन क्षीण होने लगती है। शरीर और मन, दोनों की साहसिकता से हम भय खाने लगते हैं तथा जाति-प्रथा का और भी विकास होता है एवं समाज के दरवाजे चारों ओर से बन्द हो जाते हैं। पहले की तरह बातें तो हम अब भी ऊंची-ऊंची करते हैं, लेकिन, हमारा आचरण हमारे विश्वास से भिन्न हो जाता है।

हमारे आचरण की तुलना में हमारे विचार और उद्गार इतने ऊंचे हैं कि उन्हें देख कर आश्चर्य होता है। बातें तो हम शान्ति और अहिंसा की करते हैं, मगर, काम हमारे कुछ और होते हैं। सिध्दांत तो हम सहिष्णुता का बघारते हैं, लेकिन, भाव हमारा यह होता है कि सब लोग वैसे ही सोचें, जैसे हम सोचते हैं, और जब भी कोई हम से भिन्न प्रकार से सोचता है, तब हम उसे बर्दाश्त नहीं कर सकते। घोषणा तो हमारी यह है कि स्थितप्रज्ञ बनना अर्थात कर्मों के प्रति अनासक्त रहना हमारा आदर्श है, लेकिन, काम हमारे बहुत नीचे के धरातल पर चलते हैं और बढ़ती हुयी अनुशासनहीनता हमें वैयक्तिक और सामाजिक, दोनों ही क्षेत्रों में नीचे ले जाती है।

जब पश्चिम के लोग समुद्र के पार से यहाँ आये, तब भारत के दरवाजे एक खास दिशा की ओर से खुल गये। आधुनिक औद्योगिक सभ्यता बिना किसी शोर-गुल के धीरे-धीरे इस देश में प्रविष्ट होगयी। नये भावों और नये विचारों ने हम पर हमला किया और हमारे बुध्दिजीवी अंग्रेज़ बुध्दिजीवियों की तरह सोचने की आदत डालने लगे। यह मानसिक आंदोलन, बाहर की ओर वातायन खोलने का यह भाव, अपने ढंग पर अच्छा रहा, क्योंकि इससे हम आधुनिक जगत को थोड़ा-बहुत समझने लगे। मगर, इससे एक दोष भी निकला कि हमारे ये बुध्दिजीवी जनता से विच्छिन्न हो गये क्योंकि जनता विचारों की इस नयी लहर से अप्रभावित थी। परंपरा से भारत में चिंतन की जो पध्दति चली आ रही थी, वह टूट गयी। फिर भी कुछ लोग उससे इस ढंग से चिपके रहे, जिसमें न तो प्रगति थी, न रचना की नयी उद्भावना और जो पूर्ण रूप से नयी परिस्थितियों से असंबध्द थी।

पाश्चात्य विचारों में भारत का जो विश्वास जगा था, अब तो वह भी हिल रहा है। नतीजा यह है कि हमारे पास न तो पुराने आदर्श हैं, न नवीन, और हम बिना यह जाने हुये बहते जा रहे हैं कि हम किधर को या कहाँ जा रहे हैं। नयी पीढ़ी के पास न तो कोई मानदंड है, न कोई दूसरी ऐसी चीज, जिससे वह अपने चिंतन या कर्म को नियंत्रित कर सके।

यह खतरे की स्थिति है। अगर इसका अवरोध और सुधार नहीं हुआ तो इससे भयानक परिणाम निकल सकते हैं। हम आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्रों में संक्रान्ति की अवस्था से गुजर रहे हैं। संभव है, यह उसी स्थिति का अनिवार्य परिणाम हो। लेकिन आणविक युग में किसी देश को अपना सुधार करने के लिए ज्यादा मौके नहीं दिये जायेंगे। और इस युग में मौका चूकने का अर्थ सर्वनाश भी हो सकता है।

यह संभव है कि संसार में जो बड़ी बड़ी ताक़तें काम कर रही हैं, उन्हें हम पूरी तरह न समझ सकें, लेकिन, इतना तो हमें समझना ही चाहिये कि भारत क्या है और कैसे इस राष्ट्र ने अपने सामासिक व्यक्तित्व का विकास किया है। उसके व्यक्तित्व के विभिन्न पहलू कौन-से हैं और उसकी सुद्रढ़ एकता कहाँ छिपी हुयी है। भारत में बसने वाली कोई भी जाति यह दावा नहीं कर सकती कि भारत के समस्त मन और विचारों पर उसी का एकाधिकार है। भारत, आज जो कुछ है, उसकी रचना में भारतीय जनता के प्रत्येक भाग का योगदान है। यदि हम इस बुनियादी बात को नहीं समझ पाते तो हम भारत को भी समझने में असमर्थ रहेंगे और यदि भारत को नहीं समझ सके तो हमारे भाव, विचार और काम, सब के सब अधूरे रह जायेंगे और हम देश की कोई ऐसी सेवा नहीं कर सकेंगे जो प्रभावपूर्ण और ठोस ह

 

पुनरुत्पादित और जारी द्वारा

डा॰ गिरीश 

हिजोम इराबोत सिंह क्रांति का दूसरा नाम - अनिल राजिमवाले


हिजोम इराबोत सिंह का नाम मणिपुर
के घर-घर में जाना जाता है। उनका
जन्म 30 सितंबर 1896 को
ओइनाम लेकाई में एक गरीब परिवार
में हुआ था। उनके पिता हिजोम
इबुन्गोहल सिंह जल्द ही चल बसे और
माता चोन्गथाम निन्गोल की मृत्यु
1915 में ही हो गई। वे सातवीं क्लास
तक जॉन्स्टन हायर सेकेंडरी स्कूल,
इम्फाल में पढ़े। वहां उन्होंने बाल संघ
और छात्र सम्मेलन की स्थापना की।
1913 में ढाका में स्कूल में भर्ती हो
गए। गरीबी के कारण उन्हें स्कूल
छोड़ना पड़ा और अगरतला होते हुए वे
घर लौट आए।
इराबोत विभिन्न सामाजिक
गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे थे और
लोकप्रिय बनते जा रहे थे। अपने मित्र
माइबम बान्गखेई के साथ रहने लगे।
माइबम राजा चूराचंद के कोर्ट में काम
करते थे जिससे इराबोत राजपरिवार
के संपर्क आए। मणिपुर के महाराजा ने
उनका विवाह अपनी भतीजी राजकुमारी
खोम्डोन्साना देवी से कर दिया। साथ
ही उनकी नियुक्ति वहां के उच्चतम कोर्ट
में जज के रूप में कर दी।
महाराजा से टकराव
जल्द ही इराबोत का टकराव
महाराजा से होने लगा। महाराजा ने
निखिल हिन्दू मणिपुर महासभा का गठन
1934 में किया। इसका गठन अखिल
भारतीय हिन्दू महासभा की तर्ज पर
किया गया था और ईसाइयों के खिलाफ
था। वे इसके अध्यक्ष थे लेकिन इराबोत
ही उपाध्यक्ष की हैसियत से सारा कार्य
करते थे। चिंगा में महासभा का चौथा
अधिवेशन हुआ जिसमें ‘हिन्दू’ शब्द
हटा दिया गया। इसमें महाराजा
उपस्थित नहीं थे। इसके अलावा कई
सामंत-विरोधी जनतांत्रिक मांगें पेश की
गईं। इराबोत ने जज का पद छोड़
दिया और पूरावक्ती राजनैतिक कार्यकर्ता
बन गए। उन्होंने महासभा को एक
राजनैतिक पार्टी का रूप दे दिया।
महाराजा ने इन घटनाओं पर
इराबोत को चेतावनी दे दी। इराबोत
और रेवेन्यू विभाग में एक विभाग में
एक क्लर्क एलांगबाम तोम्पोथ के
इस्तीफे के बाद मणिपुर दरबार और
राजा को विधायिका के गठन का प्रस्ताव
दिया जिसे राजा ने मानने से इन्कार
कर दिया।
जन आंदोलन
दिसंबर 1939 में महिलाओं का
विशाल जनांदोलन फूट पड़ा। इसका
प्रमुख कारण था चावल की भारी कमी।
चावल बाजार से लगभग गायब हो
गया। यु( के नाम पर उसका निर्यात
किया जाने लगा और बड़े पैमाने पर
जमाखोरी की जाने लगी। 11 दिसंबर
को महिलाओं ने ख्वाईरमबंद बाजार
घेर लिया, सारा चावल भंडार अपने
कब्जे में कर लिया और लोगों के बीच
कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी-18
इराबोत सिंहः मणिपुर के निर्माता
बेच दिया। उस वक्त इराबोत त्रिपरा में
थे। उन्होंने लौटकर आंदोलन का नेतृत्व
किया। चौथी असम राइफल ने भारी
दमन किया।
दमन के बावजूद आंदोलन सफल
रहा। सरकार ने चावल के निर्यात पर
पाबंदी लगा दी।
मणिपुर भाषा में ‘नूयी लान’ का
अर्थ होता है ‘नारी या महिला यु(’।
मणिपुर के इतिहास में महिलाओं द्वारा
कई ‘यु(’ लड़े गए हैं। 1939 में
मणिपुर महाराजा और उनके ब्रिटिश
पोलिटिकल एजेंट गिमसन की
दमनकारी नीतियों के खिलाफ महिलाओं
द्वारा व्यापक आंदोलन चलाया गया
था। यह आंदोलन आगे चलकर मणिपुर
मे संवैधानिक-प्रशासनिक सुधार
आंदोलन में बदल गया।
मणिपुर के कृषि अर्थतंत्र में
महिलाओं की केंद्रीय भूमिका है।
रुवाइरमबंद बाजार प्रमुख बाजार होता
है। ‘नूयी लान’ यहीं से आरंभ हुआ
था। महिलाओं ने पोलिटिकल एजेंट
मैक्सवेख्ल के खिलाफ जबरन मजदूरी
समाप्त करने की मांग करते हुए
आंदोलन किया।
1891 में एंग्लो-मणिपुरी यु(
हार जाने पर मणिपुर को ब्रिटिश प्रशासन
ने चूराचंद नामक युवा को महाराजा
बनाकर उसके अधीन कर दिया और
नियंत्रण अपने हाथों में रखा। मोटर
गाड़ियां आ जाने तथा मारवाड़ी व्यापरियों
के आगमन के फलस्वरूप बड़ी मात्रा
में चावल बाहर जाने लगा और संकट
पैदा हो गया।
11 दिसंबर 1939 को महिलाएं
जब बाजार आई तो उन्हें चावल
बिल्कुल नहीं मिला। एक और ग्रुप
चावल के बढ़ते दामों के खिलाफ लड़
रहा था। इस प्रकार दोनों ग्रुपों ने
मिलकर संघर्ष किया। 12 दिसंबर को
हजारों महिलाएं स्टेट दरबार ऑफिस
के पास जमा हो गईं और चावल निर्यात
पर पाबंदी की मांग करने लगीं। दरबार
सदस्य पिछले दरवाजे से भाग गए।
मि. शार्प, दरबार के अध्यक्ष, पकड़े
गए और महिलाओं ने उन्हें टेलीग्राफ
ऑफिस में बंद कर दिया। असम
राइफल्स के दमन में कई महिलाएं
घायल हो गईं।
16 दिसंबर को हाजोम इराबोत
आ गए और आंदोलन नई मंजिल में
पहुंच गया। इराबोत ने एक नई पार्टी
‘मणिपुर प्रजा समेलिनी’ का गठन किया
क्योंकि महासभा के अधिकतर लोग
महिला आंदोलन का समर्थन नहीं
करना चाहते थे। इराबोत ने विशाल
सभाओं को संबोधित किया।
नई पार्टी की स्थापना :
कम्युनिज्म की ओर
1939 में दूसरा ‘नूयी लान’
आरंभ हुआ। इसमें एक हिस्सा निखिल
मणिपुरी महासभा से अलग होकर
आंदोलन में शामिल हो गया। यह हिस्सा
प्रजा सन्मेलनी कहलाया। जनता ने
सामंती टैक्स और लेवी देना बंद कर
दिया। 7 जनवरी 1940 को इराबोत
सिंह ने आमसभा में भाषण दिया। पुलिस
ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। पहले तो
उन्हें मणिपुर जेल में रखा गया जहां
स्थितियां बहुत खराब थीं। इराबोत ने
हालत बेहतर करने के लिए कई संघर्ष
किए। कैदियों की स्थिति में थोड़ा सुधार
हुआ। फिर उन्हें सिलहट जेल भेज
दिया गया जो आजकल बांगलादेश में
है। उन्हें तीन साल की सजा दी गई।
जेल में उनकी मुलाकात भारतीय
कम्युनिस्ट नेता हेमंग विश्वास और
ज्योर्तिमय नंदी से हुई। वे कम्युनिज्म
की ओर झुकने लगे। उन्होंने काफी
बहस और अध्ययन किया। उस समय
1942 का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन
चल रहा था। जेलों में बहुत सारे कैदी
रखे गए थे। इराबोत ने कम्युनिस्ट पार्टी
की सदस्यता का आवेदन असम
प्रादेशिक कमिटि को दिया। जेल में
रहते हुए ही उन्हें सदस्यता दी गई।
इराबोत को 20 मार्च 1943
को सिलहट जेल से रिहा किया गया
लेकिन मणिपुर जाने की इजाजत नहीं
दी गई। वे कछार जिले में ही रहते हुए
मणिपुर किसानों तथा चाय बागान
मजदूरों के बीच काम करने लगे।
उन्होंने असम और त्रिपुरा में किसान
सभा संगठित की। नेत्रकोना ;मैमेनसिंह,
बंगाल, मार्च 1944ऋ आजकल
बांगलादेशद्ध में आयोजित अ.भा. किसान
सभा के नौवें सम्मेलन में उन्होंने
1945 में असम के प्रतिनिधि के रूप
में हिस्सा लिया।
वे कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ
संपर्क में बने रहे। उन्होंने भा.क.पा. की
प्रथम पार्टी कांग्रेस ;बम्बई,1943द्ध
में कछार से आमंत्रित प्रतिनिधि के रूप
में भाग लिया। कछार में उन्होंने ‘स्वदेश
गानेर दल’ के नाम से सांस्कृतिक दल
बनाए। इसे इप्टा में शामिल किया गया।
1944 में वे विजयवाड़ा के
काताकुआल गांव किसान सम्मेलन में
भाग लेने गए। उसी वर्ष वे सूरमा वैली
किसान सभा अधिवेशन में भी गए।
इराबोत को 15 सितंबर 1944
को सिलचर जिला जेल में सुरक्षा कैदी
के रूप में गिरफ्तार कर रख लिया
गया। उन पर कम्युनिस्ट होने का आरोप
था। उन्हें एक सप्ताह के लिए मणिपुर
जाने की इजाजत दी गई।
कछार वापस लौटकर उन्होंने
किसान आंदोलन संगठित किया। वे
कछार जिला किसान सभा के महासचिव
बनाए गए। उन्होंने असम किसान सभा,
पार्टी और विद्यार्थी संगठन स्थापित करने
में बड़ी सहायता की। उन्होंने असम
प्रादेशिक विधान सभा के 1946 का
चुनाव भा.क.पा.के उम्मीदवार के रूप
में लड़ा। वे बहुत थोड़े-से मतों से
पराजित हुए।
आखिर उन्हें मार्च 1942 में
मणिपुर जाने की इजाजत मिल गई।
यह देश में भारी उथल-पुथल का समय
था। देश आजादी की ओर बढ़ रहा
था। मणिपुर में सामंतवाद के विरू(
आंदोलन तेज हो रहा था और
जगह-जगह कांग्रेस के संगठन उभर
रहे थे।
इराबोत ने अप्रैल 1946 में
मणिपुर प्रजामंडल की स्थापना की ।
उन्होंने निखिल मणिपुरी महासभा के
दो अधिवेशनों में हिस्सा लिया। लेकिन
इसके बाद उन पर कम्युनिस्ट पार्टी
का सदस्य होने का आरोप लगाकर
उन्हें महासभा की कार्यसमिति से
निकाल बाहर कर दिया गया।
मणिपुर कृषक संघ का दूसरा
सम्मेलन 1946 में नामबोल में संपन्न
हुआ। यह स्थान इम्फाल से नौ मील
की दूरी पर है। इस शानदार सम्मेलन
की अध्यक्षता इराबोत सिंह ने की।
सम्मेलन ने व्यस्क मताधिकार के आधार
पर जिम्मेदार सरकार के गठन की मांग
की। अन्य मांगें भी रखी गई जिनके
लिए बाद में संघर्ष चलाया गया।
भारत की आजादी और मणिपुर
1947 की 15 अगस्त को भारत
की आजादी के बाद मणिपुर के महाराजा
ने संविधान सभा, चुनी हुई
 विधायिका, इ. का वादा किया।
पहाड़ों और मैदानों की जनता को
एक करने के इरादे से इराबोत ने 30
नवंबर 1947 को नौ पार्टियों और
कबीलाई संगठनों का एक सम्मेलन
बुलाया।
इराबोत ने कलकत्ता में 28 फरवरी
से 6 मार्च 1948 को आयोजित भा.
क.पा. की दूसरी कांग्रेस में हिस्सा लिया।
मणिपुर में 23 अगस्त 1948 को
कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया गया।
मणिपुर के महाराजा ने सारी ताकत
अपने ही हाथों में केंद्रित रखी। 1947
में प्रथम आम चुनाव संपन्न हुए। मणिपुर
कृषक सभा ने 23 सीटों लड़ींऋ इनमें
से 5 जीतीं जिनमें एक इराबोत सिंह
भी थे।
उस वक्त सरदार पटेल उत्तर-पूर्वी
राज्यों को मिलाकर एक सीमावर्ती राज्य
अनिल राजिमवाले
इराबोत सिंह
शेष पेज 14 परबनाने की योजना बना रहे थे। इसमें मणिपुर, कछार, लुशाई, हिल्स और त्रिपुरा
को शामिल करने की योजना थी।
इसके विरोध में 21 सितंबर 1948 को इम्फाल में एक बड़ी आम सभा
आयोजित की गई। सारे मणिपुर से लोग इकट्ठा होने लगे। पुलिस ने आक्रमण
कर दिया। सभा पर पाबंदी लगा दी गई और कई नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी
का वारंट जारी कर दिया गया।
इराबोत सिंह अंडरग्राउंड चले गए। उन पर 10,000/रु. का इनाम
घोषित कर दिया गया।
पार्टी पर संकीर्णतावादी और दुस्साहवाद का असर था। फलस्वरूप तेलंगाना,
काकद्वीप, त्रिपुरा, मैमेनसिंह इ. इलाकों में सशस्त्र संघर्ष चलाया जा रहा था।
मणिपुर में भी सशस्त्र आंदोलन छेड़ दिया गया। सरकार ने चारों ओर पुलिस
कैम्प खड़े कर दिए।
इराबोत को सहायता पाने के लिए मई 1951 में बर्मा के छापेमारों से
संपर्क स्थापित करने भेज दिया गया। उस समय बर्मा में गृहयु( चल रहा था।
थाकिन सो के नेतृत्व में बर्मा की कम्युनिस्ट पार्टी तथा अन्य संगठन ऊ नू की
प्रतिक्रियावादी सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष चला रहे थे।
इराबोत ने वहां के सभी कम्युनिस्ट दलों को एक करने का प्रयत्न किया।
इसके लिए एकता सम्मेलन भी किया गया। वे इराबोत और मणिपुर में चल रहे
संघर्ष की सहायता के लिए तैयार हो गए।
लेकिन वापस लौटते वक्त टाइफायड के कारण इराबोत सिंह की 26
सितंबर 1951 को सीमावर्ती वांगबो गांव में मृत्यु हो गई। बर्मी छापेमारों ने
उनकी पूरे सम्मान के साथ अंत्येष्टि की।
इराबोत सिंह को मणिपुर का ‘जन नेता’ और ‘पिता’ कहा जाता है। 1948
की 21 सितंबर को उत्तर-पूर्वी सीमांत प्रदेश बनाने के प्रस्ताव के विरोध में आम
सभा हुई जिसका नेतृत्व इराबोत कर रहे थे। उन पर गिरफ्तारी का वारंट जारी
किया गया। इसे ‘पुंगडोंगबाम घटना’ कहा जाता है। इसे मणिपुर की रक्षा’ का
दिन माना जाता है। 1976 में इराबोत का जन्मदिन राजकीय छुट्टी घोषित
की गई। 2018 में मणिपुर की सरकार ने ‘जननेता इराबोत दिवस’ को राज्य
समारोह का दर्जा दिया।
इराबोत सिंह बहुमुखी प्रतिभाशाली थे। एक कम्युनिस्ट राजनीतिज्ञ के अलावा
सामाजिक कार्यकर्ता एवं नेता, कृषि, चाय बागान मजदूर संगठनकर्ता, कवि,
ड्रामा लेखक, कलाकार, एक्टर, खिलाड़ी, मार्शल आर्ट के विशेषज्ञ भी थे।
मणिपुर में हर साल उनका ऋतुएंन सारे राज्य में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता
है। उनका पुतला इम्फाल में खड़ा किया गया है।
1922 में उन्होंने हस्तलिखित पत्रिका ‘मिवेई चानु’ प्रारंभ की। उनकी
लिखित पुस्तकें हाई स्कूल विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। वे मणिपुर
साहित्य परिषद के संस्थापक महासचिव थे।
इराबोत सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए एक असाधारण कम्युनिस्ट 9 - 15 अगस्त, 2020 मुक्ति संघर्ष साप्ताहिक 7
हिजोम इराबोत सिंह का नाम मणिपुर
के घर-घर में जाना जाता है। उनका
जन्म 30 सितंबर 1896 को
ओइनाम लेकाई में एक गरीब परिवार
में हुआ था। उनके पिता हिजोम
इबुन्गोहल सिंह जल्द ही चल बसे और
माता चोन्गथाम निन्गोल की मृत्यु
1915 में ही हो गई। वे सातवीं क्लास
तक जॉन्स्टन हायर सेकेंडरी स्कूल,
इम्फाल में पढ़े। वहां उन्होंने बाल संघ
और छात्र सम्मेलन की स्थापना की।
1913 में ढाका में स्कूल में भर्ती हो
गए। गरीबी के कारण उन्हें स्कूल
छोड़ना पड़ा और अगरतला होते हुए वे
घर लौट आए।
इराबोत विभिन्न सामाजिक
गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे थे और
लोकप्रिय बनते जा रहे थे। अपने मित्र
माइबम बान्गखेई के साथ रहने लगे।
माइबम राजा चूराचंद के कोर्ट में काम
करते थे जिससे इराबोत राजपरिवार
के संपर्क आए। मणिपुर के महाराजा ने
उनका विवाह अपनी भतीजी राजकुमारी
खोम्डोन्साना देवी से कर दिया। साथ
ही उनकी नियुक्ति वहां के उच्चतम कोर्ट
में जज के रूप में कर दी।
महाराजा से टकराव
जल्द ही इराबोत का टकराव
महाराजा से होने लगा। महाराजा ने
निखिल हिन्दू मणिपुर महासभा का गठन
1934 में किया। इसका गठन अखिल
भारतीय हिन्दू महासभा की तर्ज पर
किया गया था और ईसाइयों के खिलाफ
था। वे इसके अध्यक्ष थे लेकिन इराबोत
ही उपाध्यक्ष की हैसियत से सारा कार्य
करते थे। चिंगा में महासभा का चौथा
अधिवेशन हुआ जिसमें ‘हिन्दू’ शब्द
हटा दिया गया। इसमें महाराजा
उपस्थित नहीं थे। इसके अलावा कई
सामंत-विरोधी जनतांत्रिक मांगें पेश की
गईं। इराबोत ने जज का पद छोड़
दिया और पूरावक्ती राजनैतिक कार्यकर्ता
बन गए। उन्होंने महासभा को एक
राजनैतिक पार्टी का रूप दे दिया।
महाराजा ने इन घटनाओं पर
इराबोत को चेतावनी दे दी। इराबोत
और रेवेन्यू विभाग में एक विभाग में
एक क्लर्क एलांगबाम तोम्पोथ के
इस्तीफे के बाद मणिपुर दरबार और
राजा को विधायिका के गठन का प्रस्ताव
दिया जिसे राजा ने मानने से इन्कार
कर दिया।
जन आंदोलन
दिसंबर 1939 में महिलाओं का
विशाल जनांदोलन फूट पड़ा। इसका
प्रमुख कारण था चावल की भारी कमी।
चावल बाजार से लगभग गायब हो
गया। यु( के नाम पर उसका निर्यात
किया जाने लगा और बड़े पैमाने पर
जमाखोरी की जाने लगी। 11 दिसंबर
को महिलाओं ने ख्वाईरमबंद बाजार
घेर लिया, सारा चावल भंडार अपने
कब्जे में कर लिया और लोगों के बीच
कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी-18
इराबोत सिंहः मणिपुर के निर्माता
बेच दिया। उस वक्त इराबोत त्रिपरा में
थे। उन्होंने लौटकर आंदोलन का नेतृत्व
किया। चौथी असम राइफल ने भारी
दमन किया।
दमन के बावजूद आंदोलन सफल
रहा। सरकार ने चावल के निर्यात पर
पाबंदी लगा दी।
मणिपुर भाषा में ‘नूयी लान’ का
अर्थ होता है ‘नारी या महिला यु(’।
मणिपुर के इतिहास में महिलाओं द्वारा
कई ‘यु(’ लड़े गए हैं। 1939 में
मणिपुर महाराजा और उनके ब्रिटिश
पोलिटिकल एजेंट गिमसन की
दमनकारी नीतियों के खिलाफ महिलाओं
द्वारा व्यापक आंदोलन चलाया गया
था। यह आंदोलन आगे चलकर मणिपुर
मे संवैधानिक-प्रशासनिक सुधार
आंदोलन में बदल गया।
मणिपुर के कृषि अर्थतंत्र में
महिलाओं की केंद्रीय भूमिका है।
रुवाइरमबंद बाजार प्रमुख बाजार होता
है। ‘नूयी लान’ यहीं से आरंभ हुआ
था। महिलाओं ने पोलिटिकल एजेंट
मैक्सवेख्ल के खिलाफ जबरन मजदूरी
समाप्त करने की मांग करते हुए
आंदोलन किया।
1891 में एंग्लो-मणिपुरी यु(
हार जाने पर मणिपुर को ब्रिटिश प्रशासन
ने चूराचंद नामक युवा को महाराजा
बनाकर उसके अधीन कर दिया और
नियंत्रण अपने हाथों में रखा। मोटर
गाड़ियां आ जाने तथा मारवाड़ी व्यापरियों
के आगमन के फलस्वरूप बड़ी मात्रा
में चावल बाहर जाने लगा और संकट
पैदा हो गया।
11 दिसंबर 1939 को महिलाएं
जब बाजार आई तो उन्हें चावल
बिल्कुल नहीं मिला। एक और ग्रुप
चावल के बढ़ते दामों के खिलाफ लड़
रहा था। इस प्रकार दोनों ग्रुपों ने
मिलकर संघर्ष किया। 12 दिसंबर को
हजारों महिलाएं स्टेट दरबार ऑफिस
के पास जमा हो गईं और चावल निर्यात
पर पाबंदी की मांग करने लगीं। दरबार
सदस्य पिछले दरवाजे से भाग गए।
मि. शार्प, दरबार के अध्यक्ष, पकड़े
गए और महिलाओं ने उन्हें टेलीग्राफ
ऑफिस में बंद कर दिया। असम
राइफल्स के दमन में कई महिलाएं
घायल हो गईं।
16 दिसंबर को हाजोम इराबोत
आ गए और आंदोलन नई मंजिल में
पहुंच गया। इराबोत ने एक नई पार्टी
‘मणिपुर प्रजा समेलिनी’ का गठन किया
क्योंकि महासभा के अधिकतर लोग
महिला आंदोलन का समर्थन नहीं
करना चाहते थे। इराबोत ने विशाल
सभाओं को संबोधित किया।
नई पार्टी की स्थापना :
कम्युनिज्म की ओर
1939 में दूसरा ‘नूयी लान’
आरंभ हुआ। इसमें एक हिस्सा निखिल
मणिपुरी महासभा से अलग होकर
आंदोलन में शामिल हो गया। यह हिस्सा
प्रजा सन्मेलनी कहलाया। जनता ने
सामंती टैक्स और लेवी देना बंद कर
दिया। 7 जनवरी 1940 को इराबोत
सिंह ने आमसभा में भाषण दिया। पुलिस
ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। पहले तो
उन्हें मणिपुर जेल में रखा गया जहां
स्थितियां बहुत खराब थीं। इराबोत ने
हालत बेहतर करने के लिए कई संघर्ष
किए। कैदियों की स्थिति में थोड़ा सुधार
हुआ। फिर उन्हें सिलहट जेल भेज
दिया गया जो आजकल बांगलादेश में
है। उन्हें तीन साल की सजा दी गई।
जेल में उनकी मुलाकात भारतीय
कम्युनिस्ट नेता हेमंग विश्वास और
ज्योर्तिमय नंदी से हुई। वे कम्युनिज्म
की ओर झुकने लगे। उन्होंने काफी
बहस और अध्ययन किया। उस समय
1942 का ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन
चल रहा था। जेलों में बहुत सारे कैदी
रखे गए थे। इराबोत ने कम्युनिस्ट पार्टी
की सदस्यता का आवेदन असम
प्रादेशिक कमिटि को दिया। जेल में
रहते हुए ही उन्हें सदस्यता दी गई।
इराबोत को 20 मार्च 1943
को सिलहट जेल से रिहा किया गया
लेकिन मणिपुर जाने की इजाजत नहीं
दी गई। वे कछार जिले में ही रहते हुए
मणिपुर किसानों तथा चाय बागान
मजदूरों के बीच काम करने लगे।
उन्होंने असम और त्रिपुरा में किसान
सभा संगठित की। नेत्रकोना ;मैमेनसिंह,
बंगाल, मार्च 1944ऋ आजकल
बांगलादेशद्ध में आयोजित अ.भा. किसान
सभा के नौवें सम्मेलन में उन्होंने
1945 में असम के प्रतिनिधि के रूप
में हिस्सा लिया।
वे कम्युनिस्ट आंदोलन के साथ
संपर्क में बने रहे। उन्होंने भा.क.पा. की
प्रथम पार्टी कांग्रेस ;बम्बई,1943द्ध
में कछार से आमंत्रित प्रतिनिधि के रूप
में भाग लिया। कछार में उन्होंने ‘स्वदेश
गानेर दल’ के नाम से सांस्कृतिक दल
बनाए। इसे इप्टा में शामिल किया गया।
1944 में वे विजयवाड़ा के
काताकुआल गांव किसान सम्मेलन में
भाग लेने गए। उसी वर्ष वे सूरमा वैली
किसान सभा अधिवेशन में भी गए।
इराबोत को 15 सितंबर 1944
को सिलचर जिला जेल में सुरक्षा कैदी
के रूप में गिरफ्तार कर रख लिया
गया। उन पर कम्युनिस्ट होने का आरोप
था। उन्हें एक सप्ताह के लिए मणिपुर
जाने की इजाजत दी गई।
कछार वापस लौटकर उन्होंने
किसान आंदोलन संगठित किया। वे
कछार जिला किसान सभा के महासचिव
बनाए गए। उन्होंने असम किसान सभा,
पार्टी और विद्यार्थी संगठन स्थापित करने
में बड़ी सहायता की। उन्होंने असम
प्रादेशिक विधान सभा के 1946 का
चुनाव भा.क.पा.के उम्मीदवार के रूप
में लड़ा। वे बहुत थोड़े-से मतों से
पराजित हुए।
आखिर उन्हें मार्च 1942 में
मणिपुर जाने की इजाजत मिल गई।
यह देश में भारी उथल-पुथल का समय
था। देश आजादी की ओर बढ़ रहा
था। मणिपुर में सामंतवाद के विरू(
आंदोलन तेज हो रहा था और
जगह-जगह कांग्रेस के संगठन उभर
रहे थे।
इराबोत ने अप्रैल 1946 में
मणिपुर प्रजामंडल की स्थापना की ।
उन्होंने निखिल मणिपुरी महासभा के
दो अधिवेशनों में हिस्सा लिया। लेकिन
इसके बाद उन पर कम्युनिस्ट पार्टी
का सदस्य होने का आरोप लगाकर
उन्हें महासभा की कार्यसमिति से
निकाल बाहर कर दिया गया।
मणिपुर कृषक संघ का दूसरा
सम्मेलन 1946 में नामबोल में संपन्न
हुआ। यह स्थान इम्फाल से नौ मील
की दूरी पर है। इस शानदार सम्मेलन
की अध्यक्षता इराबोत सिंह ने की।
सम्मेलन ने व्यस्क मताधिकार के आधार
पर जिम्मेदार सरकार के गठन की मांग
की। अन्य मांगें भी रखी गई जिनके
लिए बाद में संघर्ष चलाया गया।
भारत की आजादी और मणिपुर
1947 की 15 अगस्त को भारत
की आजादी के बाद मणिपुर के महाराजा
ने संविधान सभा, चुनी हुई
 विधायिका, इ. का वादा किया।
पहाड़ों और मैदानों की जनता को
एक करने के इरादे से इराबोत ने 30
नवंबर 1947 को नौ पार्टियों और
कबीलाई संगठनों का एक सम्मेलन
बुलाया।
इराबोत ने कलकत्ता में 28 फरवरी
से 6 मार्च 1948 को आयोजित भा.
क.पा. की दूसरी कांग्रेस में हिस्सा लिया।
मणिपुर में 23 अगस्त 1948 को
कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया गया।
मणिपुर के महाराजा ने सारी ताकत
अपने ही हाथों में केंद्रित रखी। 1947
में प्रथम आम चुनाव संपन्न हुए। मणिपुर
कृषक सभा ने 23 सीटों लड़ींऋ इनमें
से 5 जीतीं जिनमें एक इराबोत सिंह
भी थे।
उस वक्त सरदार पटेल उत्तर-पूर्वी
राज्यों को मिलाकर एक सीमावर्ती राज्य
अनिल राजिमवाले
इराबोत सिंह
शेष पेज 14 परबनाने की योजना बना रहे थे। इसमें मणिपुर, कछार, लुशाई, हिल्स और त्रिपुरा
को शामिल करने की योजना थी।
इसके विरोध में 21 सितंबर 1948 को इम्फाल में एक बड़ी आम सभा
आयोजित की गई। सारे मणिपुर से लोग इकट्ठा होने लगे। पुलिस ने आक्रमण
कर दिया। सभा पर पाबंदी लगा दी गई और कई नेताओं के खिलाफ गिरफ्तारी
का वारंट जारी कर दिया गया।
इराबोत सिंह अंडरग्राउंड चले गए। उन पर 10,000/रु. का इनाम
घोषित कर दिया गया।
पार्टी पर संकीर्णतावादी और दुस्साहवाद का असर था। फलस्वरूप तेलंगाना,
काकद्वीप, त्रिपुरा, मैमेनसिंह इ. इलाकों में सशस्त्र संघर्ष चलाया जा रहा था।
मणिपुर में भी सशस्त्र आंदोलन छेड़ दिया गया। सरकार ने चारों ओर पुलिस
कैम्प खड़े कर दिए।
इराबोत को सहायता पाने के लिए मई 1951 में बर्मा के छापेमारों से
संपर्क स्थापित करने भेज दिया गया। उस समय बर्मा में गृहयु( चल रहा था।
थाकिन सो के नेतृत्व में बर्मा की कम्युनिस्ट पार्टी तथा अन्य संगठन ऊ नू की
प्रतिक्रियावादी सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष चला रहे थे।
इराबोत ने वहां के सभी कम्युनिस्ट दलों को एक करने का प्रयत्न किया।
इसके लिए एकता सम्मेलन भी किया गया। वे इराबोत और मणिपुर में चल रहे
संघर्ष की सहायता के लिए तैयार हो गए।
लेकिन वापस लौटते वक्त टाइफायड के कारण इराबोत सिंह की 26
सितंबर 1951 को सीमावर्ती वांगबो गांव में मृत्यु हो गई। बर्मी छापेमारों ने
उनकी पूरे सम्मान के साथ अंत्येष्टि की।
इराबोत सिंह को मणिपुर का ‘जन नेता’ और ‘पिता’ कहा जाता है। 1948
की 21 सितंबर को उत्तर-पूर्वी सीमांत प्रदेश बनाने के प्रस्ताव के विरोध में आम
सभा हुई जिसका नेतृत्व इराबोत कर रहे थे। उन पर गिरफ्तारी का वारंट जारी
किया गया। इसे ‘पुंगडोंगबाम घटना’ कहा जाता है। इसे मणिपुर की रक्षा’ का
दिन माना जाता है। 1976 में इराबोत का जन्मदिन राजकीय छुट्टी घोषित
की गई। 2018 में मणिपुर की सरकार ने ‘जननेता इराबोत दिवस’ को राज्य
समारोह का दर्जा दिया।
इराबोत सिंह बहुमुखी प्रतिभाशाली थे। एक कम्युनिस्ट राजनीतिज्ञ के अलावा
सामाजिक कार्यकर्ता एवं नेता, कृषि, चाय बागान मजदूर संगठनकर्ता, कवि,
ड्रामा लेखक, कलाकार, एक्टर, खिलाड़ी, मार्शल आर्ट के विशेषज्ञ भी थे।
मणिपुर में हर साल उनका ऋतुएंन सारे राज्य में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता
है। उनका पुतला इम्फाल में खड़ा किया गया है।
1922 में उन्होंने हस्तलिखित पत्रिका ‘मिवेई चानु’ प्रारंभ की। उनकी
लिखित पुस्तकें हाई स्कूल विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं। वे मणिपुर
साहित्य परिषद के संस्थापक महासचिव थे।
इराबोत सिंह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए एक असाधारण कम्युनिस्ट थे। 

शुक्रवार, 31 जुलाई 2020

क्रांति की मशाल ः डॉ जेड ए अहमद


डॉ. जेड.ए. अहमद के परदादा का
नाम रामसिंह चौहान था। यह राजपूत
परिवार जालंधर में रहा करता था।
शुरू में वे राजस्थान की एक रियासत
में बड़े ओहदे पर थे। फिर जम्मू-कश्मीर
में मीर मुंशी के पद पर रहे।
1830 में उनकी मुलाकात एक
मुसलमान फकीर से हो गई और उन्होंने
इस्लाम कबूल कर लिया तथा
मुसलमान बन गए। उनकी तस्स्वीर
आज भी लौहार के चीफ्स कॉलेज में
लगी हुई है।
जेड.ए. अहमद के पिता जियाउद्दीन
अहमद थे। उनकी मां इकबाल बेगम
थीं जो जाट परिवार की थीं। अहमद
का जन्म उमरकोट, सिंध, जिला
थरपारकर ;आजकल पाकिस्तान में
में 29 सितंबर 1907 को हुआ था।
उनके पिता बड़े उदार थे जिनकी
बदौलत जेड.ए. अहमद राष्ट्रवादी और
कम्युनिस्ट बन गए। जेड.ए. अहमद
का पूरा नराम जैनुल आबदीन अहमद
था।
पिताजी ने जैनुल के इस्लामी
मदरसे में भेजने का विरोध किया
क्योंकि वह कठमुल्लापन का अड्डा
हुआ करते। प्राइवेट ट्यूटर का इंतजाम
कर अंग्रेजी की पढ़ाई शुरू कर दी।
1914 में गोधरा ;गुजरात  में ट्रांसफर
के बाद जैनुल म्युनिसिपल स्कूल में
भर्ती हो गए। फिर सिंध वापस, वहां
हैदराबाद से मैट्रिक ;सातवीं क्लास
ओर फिर ‘जैन’ ;जैनुल को अलीगढ़
यूनिवर्सिटी में भर्ती करा दिया गया।
बी.ए. में अंग्रेजी, इतिहास और
अर्थशास्त्र पढ़ा। ‘फ्रांसीसी क्रांति’ ऑनर्स
का विषय था।
अलीगढ़ में सैद्धांतिक बहसों में भाग
लिया और शापुरजी सकलतवाला को
सुनने का मौका मिला। यहां जेड़.ए.
अहमद ने अपने कुछ साथियों के साथ
मिलकर रेडिकल पार्टी बनाई जो
समाजवादी क्रांति के पक्ष में थी।
अलीगढ़ में रहते हुए उन्होंने के.एस.
अशरफ को भी अपनी ओर खींच लिया।
1921 में ही जैनुल ने अपने
पिता के हाथों में लेनिन की एक जीवनी
देखी। पिता ने उन्हें बताया कि लेनिन
एक महान पुरूष थे और एक नए
समाज को बनाने में लगे हुए थे। बी.ए.
ऑनर्स करने के बाद जैनुल की
इच्छानुसार उन्हें 1928 में उच्च शिक्षा
के लिए इंगलैंड भेज दिया गया।
लंदन की पढ़ाई के लिए मुस्लिम
एजुकेशन ट्रस्ट से लंदन के थॉमस
कुक एंड संस के जरिए 250/ -प्रति
माह का खर्चा मिलने लगा। यह कर्ज
था जिसे लौटाना था लेकिन देश के
विभाजन के बाद ट्रस्ट पाकिस्तान चला
गया और बात खत्म हो गई। लंदन में
मौलाना मुहम्मद अली के साथ रहने
का मौका मिला।
कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी -17
डॉ. जेड.ए. अहमदः बहुमुखी प्रतिभा
लंदन में जैनुल  शापुरजी
सकलतवाला से मिले। वे एक फ्लैट में
परिवार सहित रहा करते, साधारण
अवस्था में। यदि शापुरजी कम्युनिस्ट
नहीं होते तो टाटा खानदान के मुखिया
बन सकते थे! लेकिन कम्युनिस्ट बनने
के बाद उनकी सारी दौलत जब्त कर
ली गई। वे ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी की
ओर से 1927 में बैटरसी से एम.पी.
चुने गए।
सकलतवाला जेड.ए. अहमद लंदन
स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स में पढ़े। वहां
उनका परिचय फेबियन सोशलिज्म तथा
वैज्ञानिक समाजवाद से हुआ।
ऑक्सफोर्ड यूनिवसिर्टी में सज्जद जहीर
एक कम्युनिस्ट ग्रुप का नेतृत्व कर रहे
थे। लंदन ग्रुप में अहमद, अशरफ,
शौकत उमर, निहरेन्दु दत्त मजूमदार,
बनर्जी इ. साथी थे।
ब्रिटिश कम्युनिस्ट सिद्धांतकार राल्फ
फॉक्स ने मार्क्सवाद संबंधी नियमित
लेक्चर दिए। बेन ब्रैडले ने भी क्लास
लिया। भारत नामक एक पत्रिका भी
निकाली गई। ग्रुप ने एक और महत्वपूर्ण
काम किया। गोलमेज सम्मेलनों में आए
लोगों के हाथों मार्क्सवादी साहित्य भारत
पहुंचाया गया क्योंकि उनकी जांच नहीं
होती थी। उसमें से एक बंडल
घूमते-घामते इलाहाबाद के आनंद
भवन पहुंच गया। इंदिरा गांधी ने वर्षों
बाद सूचना दी कि मार्क्स और लेनिन
संबंधी वे किताबें नेहरू जी की निजी
लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं!
लंदन निवास के दौरान अहमद,
गुप्ता और शौकत उमर ने योरोप के
कई देशों की यात्रा साइकिल से कीः वे
हॉलैंड से चलकर घूमते-घामते ढाई
महीनों में इटली पहुंचे और रातों में
किसानों के घर ठहरते रहे। 1932
में उन्हें, सज्जाद जहीर और हाजरा
बेगम को ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी का
गुप्त सदस्य बनाया गया।
अहमद को 1931 में लंदन
स्कूल ऑफ इकोनोमिक्स से बी.एस.
सी ;अर्थशास्त्र डिग्री मिली। आई.
सी.एस. की संभावना होते हुए भी वे
शामिल नहीं हुए। उन्होंने ‘‘महिला और
बाल श्रमिकों की स्थिति’’ पर पी.एच.
डी. की और इस सिलसिले में फील्ड
वर्क के लिए 6 महीने भारत-यात्रा
की। इस बीच बंबई में एक कॉलेज में
पढ़ाया भी। 1935 में उन्हें पी.एच.
डी.की डिग्री मिल गई।
1935 में ब्रिटिश भाकपा के
महासचिव हैरी पॉलिट ने उन्हें बुलाकर
फासिज्म विरोधी मोर्चे की चर्चा की।
कॉमिन्टर्न की सातवीं कांग्रेस के संदर्भ
में ऐसे मोर्चे की जरूरत थी। अहमद
की मुलाकात मौरिस डॉब, प्रो. लास्की
तथा अन्य सुप्रसिद्ध व्यक्तियों से हुई।
1934 में वे ब्रसेल्स में फासिज्म और
युद्ध विरोधी सम्मेलन में शामिल हुए
जिसे कुछ युवा-विद्यार्थी संगठनों ने
आयोजित किया था। उनके साथ हाजरा
बेगम और दो बंगाली साथी भी गए।
सम्मेलन से वे काफी उत्साहित हुए।
भारत वापसी
डॉ. अहमद 1936 में भारत लौट
आए। बंबई में एस.जी. सरदेसाई तथा
अन्य साथियों से मिले। बी.टी.रणदिवे
के साथ उनकी मुलाकात निराशाजनक
रही और रणदिवे सख्त रहे। वे कॉमिन्टर्न
के सातवें सम्मेलन ;1935 के फैसलों
से सहमत नहीं थे। अहमद के साथ
महमुदुज्जफर भी थे।
वे कराची पहुंच गए। उनके पिता
उनके विचारों के बारे में सब जानते
थे। वे डी.आई.जी. थे और उनके पास
गुप्त रिपोर्टें आया करतीं। भविष्य के
बारे में बातें होने लगीं। अहमद को
कॉलेजों से नौकरी के प्रस्ताव आने लगे।
वे सिंध में एक कॉलेज में लेक्चरर बन
गए लेकिन मन नहीं लगा। इस कॉलेज
के विकास में काफी काम किया।
इस बीच 1936 में सज्जाद
जहीर ने पत्र के जरिए उन्हें लखनऊ
बुला लिया। वहां लंदन ग्रुप इक्ट्ठा हो
रहा था। कांग्रेस का अधिवेशन भी हो
रहा था जो बड़ा शानदार था। अहमद
ने कॉलेज से इस्तीफा दे दिया और
सज्जाद जहीर से मिलने इलाहाबाद
चले गए। फिर लखनऊ में पी.सी जोशी
से मिले और भविष्य में योजनाएं में
काम करने की सलाह दी। संयुक्त मोर्चे
का संदेश जनता तक पहुंचाना है। इसी
वक्त भा.क.पा. की केंद्रीय समिति की
बैठक लखनऊ में ;1936 हुई। पी.
सी. जोशी ने अहमद से पार्टी सदस्यता
का फॉर्म भरवाया। पी.सी. जोशी ने एक
विशेष कुर्सी लगवाकर अहमद को मंच
पर बिठाया। उन्हें केंद्रीय समिति का
आमंत्रित सदस्य बनाया गया।
जेड.ए. अहमद फिर नेहरू से
इलाहाबाद में मिले। नेहरू ने उनके
विचार और योजनाएं पूछने के बाद
अहमद को 50/-रु. माहवार पर
आनंद भवन में होलटाइमर रख लिया।
शादी के बाद यह 75/-रु. हो जाता!
के.एम. अशरफ पहले ही कांग्रेस में
शामिल हो चुके थे। अहमद आनंद
भवन में ही रहने लगे।
इस बीच हाजरा बेगम के साथ
उनका विवाह हो गया।
कांग्रेस में काम
नेहरू की देखरेख में विभिन्न विभागों
का गठन किया गया। डॉ. जेड.ए. अहमद
को आर्थिक विभाग की जिम्मेदारी दी
गई। उन्होंने कृषि और आर्थिक
समस्याओं पर कई पुस्तिकाएं प्रकाशित
कीं। इनमें एक थी ‘एग्रेरियन प्राब्लेम्स
इन इंडिया’ ;भारत में कृषि समस्याएं।
यह पुस्तक खूब प्रसिद्ध हुईं। नेहरू
इतने खुश हुए कि अहमद का हाथ
पकड़कर उन्हें गांधी जी से मिलवाया।
पुस्तक की बात सुनकर गांधीजी ने
उनहें गले लगा लिया। इसके अलावा
कई अन्य पुस्तकें भी तैयार की गईं।
इस बीच जेड.ए. अहमद ने प्रेस
वर्कर्स यूनियन, गवर्नमेंट प्रेस वर्कर्स
यूनियन तथा अन्य प्रेस तथा दूसरे
मजदूरों की यूनियनें बनाईं। दो वर्षों में
इलाहाबाद में कम्युनिस्ट पार्टी की यूनिट
भी बना ली गई। 1937 में उनकी
मुलाकात आर.डी. भारद्वाज से गुप्त रूप
से हुई। जेड.ए. अहमद को आगे सी.
एस.पी.;कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी;कांग्रेस
के अंदर गठित का महासचिव नियुक्त
किया गया।
1937 से 1939 के बीच जेड.
ए. अहमद यू.पी. प्रदेश कांग्रेस कमेटी
के सचिव थे। साथ-साथ वे कम्युनिस्ट
पार्टी का काम भी करते रहे। उन्होंने
उन जिलों का भी दौरा किया जहां
कम्युनिस्ट पार्टी के ग्रुप बन चुके थे।
1938 में वे चौरी-चौरा गए जहां
जबर्दस्त किसान आंदोलन चल रहा
था। शिब्बन लाल सक्सेना और मुंशी
कालिका प्रसाद के साथ कई दिनों तक
गांवों की यात्रा की। आर.डी. भाद्वाज के
साथ घूमकर कई जगह कम्युनिस्ट पार्टी
की इकाइयां बनाई। 1936 से
1940 के बीच कानपुर में मजदूरों
का जबर्दस्त संघर्ष चले। इसमें मौलाना
संत सिंह युसुफ तथा अन्य नेता थे।
अहमद की मुलाकात इस बीच रमेश
सिन्हा, शिवदान सिंह चौहान, एम.एन.
टंडन, भट्टाचार्य, रफीक नकवी,
अयोध्या प्रसाद, नारायण तिवारी इत्यादि
साथियों से हुआ।
1937 में उन्होंने यू.पी. प्रादेशिक
कांग्रेस कमेटी के सम्मेलन में भाग
लिया। वे ए.आई.सी.सी के महासचिव
में से एक बनाए गए।
उन्हीं दिनों बिहार के मोतीहारी में
किसान सम्मेलन में भाग लेने के लिए
उन्हें बुलावा आया। सम्मेलन के
संचालक राहुल सांकृत्यायन थे। बाद
में राहुल जी 1939 में इलाहाबाद में
अहमद के साथ 20-25 दिन रहे।
उनके लिए एक विशेष झोंपड़ी बनवा
दी गई। संभवतः वहां राहुलजी ने अपनी
सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘वोल्गा से गंगा’’ के
कुछ अंश लिखे। राहुलजी को वहीं से
गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में जेड.
ए. अहमद को भी गिरफ्तार कर लिया
गया। लगभग डेढ़ महीने बाद देवली
कैम्प भेज दिया गया।
देवली कैम्प में
यह विशेष जेल थी जिसमें सबसे
खतरनाक समझे जानेवाले कैदियों को
रखा जाता था। इसका निर्माण 1857
के गदर के कैदियों के लिए किया गया
था। बंद किए जाने के बाद 1880
में इसे फिर से खोला गया। 1940
में 20-20 की टोलियों में कैदियों
को पहुंचाया गया। यह गर्म रेगिस्तान
के बीच कोटा ;राजस्थान से लगभग
60 कि.मी. दूर कंटीले तारों और वॉच
टॉवरों से घिरा हुआ था जहां से कोई
भाग नहीं सकता था। इसकी देखभाल
सेना करती थी। डॉ. जेड.ए. अहमद
को वहीं ले जाया गया। वहां बड़ी संख्या
में कम्युनिस्ट तथा अन्य नजरबंद थे।
वहां बड़ी संख्या में अन्य पार्टियों के
लोग कम्युनिस्ट पार्टी में भर्ती हो गए।
देवली कैम्प में समय और संख्या
का सदुपयोग करते हुए मार्क्सवाद की
क्लासें चलाई गईं। एस.ए. डांगे ने डॉ.
जेड.ए. अहमद को आर्थिक प्रश्नों पर
लेक्चर देने के लिए कहा जो काफी
पसंद किए गए।
जब बीच में परिवार और अन्य
लोगों पर मिलने की पाबंदी लगा दी
गई तो कैदियों ने भूख-हड़ताल कर
दी जिसमें अहमद भी शामिल थे। यह
भूख हड़ताल 2 अक्टूबर 1941 को
आरंभ हुई। मांगों में आश्रितों को भत्ता,
अपने-अपने प्रदेशों की जेलों में भेजने
की मांगें भी शामिल थीं। जबरन खिलाने
की कोशिशें की गई। अहमद
भूख-हड़ताल के दौरान काफी कमजोर
हो गए। मिरजकर और नरेन्द्र शर्मा को
अस्पताल में भर्ती कर दिया गया।
भूख-हड़तालियों पर दमन का सारे
भारत में विरोध किया गया। महिलाओं
का एक प्रतिनिधिमंडल गृहसचिव
मैक्सवेल से मिला जिसमें हाजरा बेगम,
फरीदा बेदी तथा अन्य शामिल थीं।
महिलाओं ने चेतावनी दी कि कैदियों
के समर्थन में वे भी भूख-हड़ताल पर
बैठ जाएंगी। मांगें मान लीं गई और
भूख-हड़ताल समाप्त कर दी गई।
जनवरी 1942 के प्रथम सप्ताह में
कैम्प बंद करने की तैयारियां शुरू हो
गई। जेड.ए. अहमद को बरेली सेंट्रल
जेल भेज दिया गया। अप्रैल 1942
में उन्हें रिहा कर दिया। वे लाहौर अपने
परिवार से मिलने चले गए।
पार्टी पर से पाबंदी हटा दी गई
थी। लाहौर में एक नया दफ्तर भी
कायम कर लिया गया। अहमद की
मुलाकात हरकिशन सिंह सुरजीत,
मंसूर, सोहन सिंह जोश, इ. से हुई।
पेरिन भी सक्रिय थीं। हाजरा ने
राजनैतिक शिक्षा का काम संभाला।
जल्द ही अहमद और हाजरा यू.
पी. में किसान सभा और पार्टी का काम
करने चले गए।
प्रकाशन केंद्र
1942 में जेड.ए. अहमद ने
इंडिया पब्लिशिंग हाउस की स्थापना
की। इसके तहत ‘सोश्लिस्ट बुक क्लब’
की स्थापना की गई जिसमें पांच सौ
आजीवन सदस्य बनाए गए। इसके बाद
प्रकाशन का काम आरंभ किया गया।
सुभाष बोस, जयप्रकाश नारायण और
कई अन्य को भी जोड़ा गया। हाजरा
की देखरेख में प्रगतिशील लेखक संघ
से भी काफी सहायता मिली। छह-सात
महीनों में क्लब के इर्द-गिर्द
बुध्दि जीवियों का एक अच्छा-खासा ग्रुप
संगठित हो गया। जेड.ए. अहमद ने
स्वयं कई पुस्तकें, और छोटी पुस्तिकाएं
लिखीं। उनकी सरल भाषा में लिखित
‘सोशलिज्म की पहली किताब’ बड़ी
लोकप्रिय हुई।
इस कार्य से अहमद की आर्थिक
समस्याएं काफी हद तक हल हो गईं।
इलाहाबाद के मजदूरों में काम
जेड.ए. अहमद ने कानपुर में प्रेस
मजदूरों को संगठित कर प्रेस वर्कर्स
यूनियन का गठन किया। इलाहाबाद में
हाजरा ने रेलवे कुलियों की यूनयिन
बनाई। कुली संगठन भी बनाया। इसके
अलावा अहमद ने बीडी, टिन,
इक्का-तांगा, रिक्शा चालकों, दुकान
मजदूरों तथा अन्य मजदूरों के संगठन
बनाए।
इनके अलावा छिवकी सेंट्रल
ऑर्डिनेस डिपो में यूनियन बनाई जहां
1200 मजदूर काम करते थे। इसके
अलावा मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विस की
भी यूनियन गठित की। अहमद के साथ
इस काम में के.जी. श्रीवास्तव भी थे
जो आगे चलकर एटक के महासचिव
बने। उन्हें अहमद ने ही पार्टी में लाया।
इसके अलवा 1944 में बनारस
में हथकरघा मजदूर सम्मेलन में उन्होंने
हिस्सा लिया। इसे रूस्तम सैटिन ने
आयोजित किया था। इस प्रकार अहमद
ने बुनकरों के बीच काम किया। इस
काम में अब्दुल बाकी और खैरूल बशर
उनके साथ थे। गांव-गांव घूमकर
उन्होंने बुनकारों को संगठित किया।
उन्हें राजनैतिक दिशा दी। जेड.ए.
डॉ. जेड.ए. अहमदः बहुमुखी प्रतिभा
अहमद ने मऊ को अपना केंद्र बनाया।
उनका इरादा एक छोटा-सा घर बनाकर
वहीं बस जाने और आजीवन बुनकरों
के बीच कार्य करने का था। लेकिन
पार्टी ने मानने से इंकार कर दिया।
बुनकर आंदोलन पूरे पूर्वी उत्तरप्रदेश
में फैल गया। पार्टी की मजबूती के
पीछे बुनकर आंदोलन की भूमिका रही।
अ.भा. किसान सभा में
1936 में 11 अप्रैल को
लखनऊ में सारे भारत में किसान
प्रतिनिधि इकट्ठा हुए। यह अ.भा.
किसान सभा का प्रथम राष्ट्रीय सम्मेलन
था। इसी में अ.भा. किसान सभा की
स्थापना हुई। इस सम्मेलन में जेड.ए.
अहमद दर्शक प्रतिनिधि के रूप में
उपस्थित थे। उनकी मुलाकात
उच्च-स्तरीय सुप्रसिध्द किसान नेताओं
से हुई। इनमें इन्दूलाल याज्ञनिक और
एन.जी.रंगा से हुई। उन्होंने जेड.ए.
अहमद का स्वागत करते हुए कहाः
‘‘अब तुमको कहीं जाने की जरूरत
नहीं है। सीधे किसान सभा में आ जाओ
और हिन्दी-भाषी क्षेत्रों में किसान सभा
को संगठित करो।’’
अहमद ने यू.पी. और बिहार में
किसान सभा गठित करने एवं प्रसारित
करने में सक्रिय भूमिका अदा की।
किसान सभा के सिलसिले में उन्हें सारा
देश घूमने का मौका मिला। वे 1938
में अ.भा. किसान सभा की केंद्रीय
कार्यकारिणी में आ गए। जयबहादुर
सिंह, सरजू पांडे और जेड.ए. अमद
को ‘त्रिगुट’ कहा जाता था।
अवध प्रांत में कम्युनिस्ट पार्टी
किसान सभा के विकास में जेड.ए.
अहमद ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
मुंशी कालिका प्रसाद और बाबा
रामचन्दर ने इस इलाके में काफी काम
किया। जेड.ए. अहमद मुंशी कालिका
प्रसाद को पार्टी में लाने में सफल रहे।
1946 में उन्होंने साथियों में सक्रियता
से काम किया।
1943 में जेड.ए. अहमद ने भा.
क.पा. की प्रथम कंग्रेस में बंबई में भाग
लिया।
अलीगढ़ इलाके में 1944-45
कि दौरान किसान सभा का गठन हुआ
और किसान आंदोलन तेज हुआ।
कांग्रेसजनों का एक बड़ा ग्रुप कम्युनिस्ट
पार्टी में शामिल हो गया। हाजरा बेगम
ने विशेष सक्रियता से काम कियाः फंड
जमा करने के लिए एक नारा खूब
प्रसिद्ध हो गया-‘‘आ गई हाजरा, दे
दो बाजरा’’!किसान सभा के कार्य के
दौरान अहमद को स्वामी सहजानंद
की नाराजगी दूर करने बिहटा ;बिहार
जाना पड़ा। फिर अहमद को मालाबार
;आज केरल में का दौरा करना पड़ा,
जहां किसान आंदोलन तेज हो रहा
था। वहां नम्बूदिरीपाद से मुलाकात हुई।
फिर अहमद बंबई आ गए। जोशी ने
पत्र के जरिये उन्हें तुरंत बंगाल जाने
के लिए कहा। बंगाल में भुखमरी और
अकाल छाया हुआ था। 1946 में
बंगाल में ऐतिहासिक तेभागा आंदोलन
में जेड.ए. अहमद ने भाग लिया।
आजादी के बाद
1948 में अहमद ने कलकत्ता
पार्टी कांग्रेस में भाग लिया। उस वक्त वे
यू.पी. पार्टी के सचिव थे। सरकार ने
पार्टी पर पाबंदी लगा दी। इस समय
पार्टी पर ‘बी.टी.आर. लाईन’ हावी थी।
रातों-रात 60-70 लोगों ने एक
विश्वस्त सूचना के आधार पर दफ्तर
खाली कर दिया। दो-तीन दिन फिरोज
कोठी में रहने के बाद शौकत उमर ने
ट्रेन से दिल्ली जाने का इंतजाम कर
दिया। वे एक फौजी वर्दी में छिपकर
गए। अगले दिन डाकोटा प्लेन से लाहौर
चले गए। पाकिस्तान में भी उनकी
गिरफ्तारी कर वारंट जारी कर दिया
गया था। फिर वहां से उनके भाई साहब
ने कराची रवाना कर दिया। वहां उनके
भाई जफरूद्दीन अहमद डी.आई.जी. थे,
इसलिए पुलिस की गाड़ी में ही घर
पहुंच गए! उनके डी.आई.जी. भाई ने
पुलिस वालों को साफ कहा कि अहमद
वहीं ठहरे हैं, ठहरेंगे और आप निगरानी
बंद करें!
हैदराबाद ;सिंध से वे धनी व्यापारी
के भेष में जोधपुर चले आए। फिर
बंबई चले गए। फिर कुछ समय बाद
इलाहाबाद आ गए।
बी.टी.आर. लाईन और तौर-तरीकों
की जेड.ए. अहमद ने तीखी आलोचना
की है। पार्टी ‘डेन’ में वे रहने लगे। बी.
टी.आर. ने आदेश दिया कि उनसे केवल
शारीरिक काम कराया जाय अर्थात खाना
पकाने और बर्तन धोने का!
इसमें अलावा बी.टी.आर. ने आदेश
दिया कि हाजरा जेड.ए. अहमद को
तलाक दे दें क्योंकि वे कम्युनिस्ट नहीं,
सुधारवादी और संशोधनवादी हो गए
हैं! उन दोनों ने मानने से इंकार कर
दिया।
इस बीच ‘कॉमिन्फार्म’ ;विश्व
कम्युनिस्ट सूचना ब्यूरो-मास्को के
अखबार का संपादकीय शिवकुमार मिश्र
दौड़े-दौड़े लेकर आए। सभी भौंचक्के
रह गए क्योंकि वह पार्टी लाईन से
बिल्कुल अलग था-भारत को आजादी
से मिली, अर्थव्यवस्था मजबूत करें,
जन कल्याणकारी कामों में हिस्सा लें,
इ.। राज्य पार्टी की आपात बैठक
बुलाकर नया नेतृत्व चुना गया और
 पहले शिव कुमार मिश्र, और फिर जेड.ए. अहमद को सचिव बनाया गया।
1951 में कलकत्ते में पार्टी की गुप्त
सम्मेलन हुआ। अहमद छिपकर पुलिस
को चकमा देते हुए कलकत्ता और वहां
से गन्तव्य स्थान पहुंचे। पार्टी सम्मेलन
में अजय घोष को नया महासचिव बनाया
गया। जेड.ए. अहमद को 21 सदस्यीय
नई केंद्रीय समिति ;सीसी का सदस्य
बनाया गया। वे मदुरई ;1953-54
कांग्रेस में चुनी गई सी.सी. के भी सदस्य
थे। पालघाट ;1956 की पार्टी की
पार्टी कांग्रेस में बनी सी.सी. और पॉलिट
ब्यूरो में अहमद को शामिल कर लिया
गया। 1958 ;अमृतसर कांग्रेस में
बनी सेक्रेटरिएट में उन्हें शामिल किया
गया। उसके बाद 1964 तक वे
सेक्रेटरिएट में रहे।
1968 में पटना कांग्रेस में उन्हें
केंद्रीय कार्यकारिणी में लिया गया। वे
1992 तक इसके सदस्य रहे।
जेड.ए. अहमद 1958 से
1962, 1966, 72,
1972-78 और 1990 से
1994 तक राज्य सभा के मेंबर बने
रहे। बीच में वे विधान परिषद के भी
सदस्य रहे। वे 1952 का लोकसभा
चुनाव इलाहाबाद से लड़े लेकिन हार
गए।
जेड.ए. अहमद का देहान्त 17
जनवरी 1999 को हो गया।
-अनिल राजिमवाले

डॉ जेड ए अहमद अपनी पत्नी हाजरा बेगम व पुत्री सलीमा रजा
डॉ जेड ए अहमद व विश्व नाथ प्रताप सिंह

डा जेड ए अहमद व हाजरा बेगम