शनिवार, 20 मई 2017

गुलजार वानी निर्दोष साबित हुए

बाराबंकी। शनिवार को साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन बम विस्फोट कांड के मुख्य संदिग्ध आतंकी गुलजार अहमद बानी व उसके साथी अब्दुल मुबीन को अपर जिला जज कोर्ट नंबर 1 महमूद अहमद खां की कोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया गया। 14 अगस्त 2000 को रोजा गाव स्टेशन पर हुए बम विस्फोट में नौ लोगों की मौत हो गई थी। जबकि 40 लोग घायल हो गए थे। इस मामले की सुनवाई करते हुए अपर जिला जज कोर्ट नंबर 1 की कोर्ट ने आरोपियों को दोषमुक्त करते हुए कहा कि प्रकरण में अभियोजन की लापरवाही से आरोपी दोषों से मुक्त हो रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि सबूतों के अभाव में इन दोनों संदिग्ध आतांकियों को दोषमुक्त कर दिया गया है। बता दें कि साबरमती एक्सप्रेस में 14 अगस्त 2000 को बम विस्फोट किया गया था। इस मामले के आरोपी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (ए0एम0यू) के पूर्व शोध छात्र गुलजार अहमद वानी पिछले 16 साल से जेल में बंद है। वहीं गुलजार को दिल्ली पुलिस ने जुलाई 2001 में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया था। उन्हें दिल्ली के अलग-अलग इलाकों और यूपी के आगरा, कानपुर समेत विभिन्न शहरों में हुए 11 मामलों में आरोपी बनाया गया था। बाकी सभी मामलों में कोर्ट पहले ही आरोपी को बरी कर चुकी है। तो वही साथी अब्दुल मुबीन को पूर्व में जमानत मिल चुकी थी।

साबरमती विस्फोट के आरोपियों को आज साक्ष्यो के अभाव में न्यायालय श्रीमान अपर जिला जज कोर्ट नंबर 1 महोदय द्वारा दोषमुक्त कर दिया गया। अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए पूर्व में आरोपियों के बचाव पक्ष के अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हुए कहा की उक्त केस में फर्जी फसाये गए गुलजार अहमद वानी व अब्दुल मुबीन को आज सच में न्याय मिला है। न्यायालय ने आज दोनों को दोषमुक्त करते हुए पीडितो को न्याय दिया है। न्यायालय में बहस से लेकर जिरह तक अभियोजन इनके ऊपर लगाये गए आरोपों को सिद्ध कर पाने में भी नाकाम रहा है

गुरुवार, 18 मई 2017

वामपंथ ही दलितों का स्वाभाविक सहयोगी : दारापुरी


    यह साक्षात्कार लोक संघर्ष पत्रिका के प्रबंध सम्पादक-रणधीर सिंह ‘सुमन’ ने वर्तमान सन्दर्भों में दलितों की भूमिका पर एस0आर0 दारापुरी पूर्व पुलिस महानिरीक्षक उ0प्र0 की जुबानी
प्रश्न-    बहुजन समाज पार्टी का क्या भविष्य है?
उत्तर-    मेरे विचार में बहुजन समाज पार्टी का बिखराव और तेज होगा क्योंकि दलितों के एक बड़े हिस्से का भी बसपा से मोहभंग हो गया है और उन्होंने दलित नेतृत्व पर उंगली उठानी शुरू कर दी है। मायावती ने चुनाव में हारने के बाद किसी भी प्रकार की अपने ऊपर जिम्मेदारी नहीं ली है जबकि दलित उन कारणों को बड़े स्पष्ट रूप से जान रहे हैं। इसके अलावा मायावती ने न तो आज तक कभी दलित एजेण्डा बनाया है और न ही दलित उत्पीड़न के मामलों में कोई प्रभावशाली प्रतिक्रिया ही दिखाई है इससे दलित मायावती को केवल वोट और नोट लेने तक ही सीमित होना देख रहे हैं।
प्रश्न-    मायावती और उनके भाई आनन्द कुमार के खिलाफ जो जांचे चल रही है उससे मायावती का अगला कदम क्या हो सकता है?
उत्तर-    अब तक की  जांचो में मायावती और उसका भाई काफी हद तक फंसते दिखाई दे रहे है। जिस कारण मायावती सत्तारूढ़ दल का विरोध नहीं कर सकती है, इस कारण मायावती को सत्तारूढ़ पार्टी जैसे पहले कांग्रेस  , वर्तमान में भाजपा के सहयोग में रहना एक बाध्यता है।
प्रश्न-    अधिकांश दलित चिन्तक और साहित्यकार, राजनेता वामपंथ के विरोध करते है, इसका क्या कारण हो सकता है?
उत्तर-    मेरे विचार में इसका मुख्य कारण दलितों और वामपंथियों के बीच में जान बूझकर भ्रान्तियां पैदा की गयी हैं। इतिहास इस बात का गवाह है कि शुरू के दौर में डा अम्बेडकर के अधिकतर जन आन्दोलन वामपंथियों के साथ मिलकर चलाए गये थे। उदाहरण के लिए सन् 1940 में भारत की सबसे बड़ी और सबसे सफल काटन मिल मजदूरों की हड़ताल डा0 अम्बेडकर और वामपंथियों ने मिलकर करवायी थी। इसके बाद भी डा अम्बेडकर के कुछ उच्च स्तरीय वामपंथ की विचारधारा से कुछ मुद्दों पर मतभेद था जैसे राज्य का लोप हो जाना अधिनायक वाद तथा क्रान्ति में हिंसा की अनिवार्यता इसके अतिरिक्त डा अम्बेडकर ने कहीं भी मार्क्सवाद का विरोध नहीं किया है। इसके विपरीत उन्होंने तो बौद्ध धर्म और मार्क्सवाद में बहुत समानता होने की भी बात स्वीकार की थी।
        डा अम्बेडकर के बाद डा अम्बेडकर द्वारा स्थापित पार्टी आर0पी0आई0 पार्टी का सबसे बड़ा सहयोग वापमंथी पार्टियों के साथ ही रहा है और उत्तर प्रदेश इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां पर ‘नीली टोपी लाल टोपी’ के साथ का नारा था।
        मेरे विचार में यह सही है कि शुरू में वामपंथ अधिकतर वर्ग संघर्ष की बात ही करता रहा और उसने जाति संधर्ष और जातीय उत्पीड़न को उतना महत्व नहीं दिया परन्तु अब वामपंथ ने वर्ग संघर्ष के साथ-साथ जातीय संघर्ष को भी अपने एजेण्डे पर लिया है और उसके अनुसार कार्यवाहियां भी की है। यह भी सही है कि वामपंथ का रास्ता संघर्ष का रास्ता है परन्तु कुछ दलित नेताओं को इस कठिन रास्ते में परहेज रहा है।
        वर्तमान परिस्थितियों में राजनैतिक तौर पर तथा सामाजिक संघर्ष के स्तर पर वामपंथी ही दलितों के सबसे नजदीक है और एक तरीके से उनके स्वाभाविक सहयोगी है
प्रश्न-    हिन्दू धर्म के दलितों के उत्पीड़न से क्षुब्ध होकर डा अम्बेडकर ने बौध धर्म अपने समर्थकों के साथ धारण कर लिया था। वर्तमान परिस्थितियों में क्या दलित समुदाय हिन्दू कट्टरपंथियों के सामने नतमस्तक हो रहा है?
उत्तर-    डा0 अम्बेडकर ने बौध धर्म को दलितों की सामाजिक, आर्थिक मानसिक मुक्ति के लिए अपनाया था। उनको प्रेरणा से दलितों के एक हिस्से ने बौध धर्म को अपनाया भी है और उन्होंने हिन्दू दलितों की अपेक्षा प्रगति भी की है।
        दुर्भाग्य से दलित कोई एक होमोजेनियस वर्ग नहीं है तथा विभिन्न जातीयों में विभाजित है अभी तक बौध धर्म का फैलाव दलितों की कुछ विशेष जातियों तक ही हुआ है। अधिकतर दलित अभी भी हिन्दू बने हुए है। पिछले कुछ समय से आर0एस0एस0 ने बहुत सचेतन प्रयास करके इन हिन्दू दलितों में हिन्दू धर्म का प्रचार-प्रसार किया है उनकी बस्तियों में विभिन्न महापुरूषों के मन्दिर बनवाया है सहभोज करवाया है तथा प्रवचनों का आयोजन किया है।
        इसके अतिरिक्त भाजपा तथा आर0एस0एस0 ने हिन्दू दलितों की उपजातियों को राजनैतिक तौर पर बरगलाकर अपने हिन्दुत्व की छतरी के नीचे ले आये हैं। इससे यह कहा जा सकता है कि आर0एस0एस0 और भाजपा कुछ हद तक दलितों को कट्टर हिन्दू की ओर आकर्षित करने में सफल हुए है परन्तु फिर भी दलितों की बड़ी जातिया अभी भी हिन्दुत्व के प्रभाव से बड़ी जातिया बची हुई है।

*प्रतिशोध और प्रतिरोध*



मैं आप को दो जीवन और उनके क्रांतिकारी सिद्धांत और क्रांतिकारी  कार्यवाइयों को प्रस्तुत कर रहा हूँ। देखना यह है कि इनके सिद्धांत और कार्यवाइयों से आप कितने संतुष्ट हैं। जहाँ चारू मजूमदार को जेल में डाल कर उनकी हत्या कर दी गई थी और उनके मृत शरीर को न तो उनके घर वालों को दिया गया और न ही उनके संगठन के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं को ही दिया गया। वहीं कानू सान्याल कई बार क्रांतिकारी कार्यवाइयों की वजह से जेल की यातनाएं काटे। अन्त में 2010 में उन्होंने आत्म हत्या कर लिया। आप को पड़ताल यह करना हैं कि कौन सी ऐसी परिस्थियाँ थीं जिसकी वजह से चारू मजूमदार को जेल में मार डाला गया तथा कौन सी ऐसी परिस्थिति ने जन्म लिया जिससे वृद्धावस्था में कामरेड कानू सान्याल को आत्महत्या करना पड़ा। दोनों सामाजिक ज्याजातियों के विरुद्ध एक सुन्दर समाज की रचना के लिए संघर्षरत थे। हाँ,अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों से सिर्फ इतनी ही भिन्नता थी कि जहाँ अन्य पार्टियाँ सशस्त्र क्राँति के समय से इंकार कर रही थीं,वहाँ ये दोनों क्रांतिकारी सशस्त्र विद्रोह में ही समाजवादी क्राँति को सफल मान रहे थे।
चारू मुजुमदार:
चारू का जन्म 1918 में सिलीगुड़ी में हुआ। उसके पिता एक स्वतन्त्रता सेनानी थे। 1937-38 में कॉलेज की पढ़ाई को छोड़कर चारू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ गए और बीड़ी कर्मचारियों को संगठित करने के प्रयास में जुट गए। इसके पश्चात वह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए ताकि इसकी किसान शाखा के लिए काम कर सकें। जल्द ही उनके नाम एक गिरफ़्तारी का वॉरंट जारी हुआ जिसके कारण उन्हें बाएँ कार्यकर्ता के रूप में पहली बार भूमिगत होना पड़ा। हालांकि सीपीआई को प्रथम विश्व युद्ध के समय प्रतिबंधित किया गया था, वह सीपीआई की गतिविधियों को किसानों के बीच जारी रखे और जलपुरीगंज जिला कमिटि के 1942 में सदस्य बन गए थे। इस प्रगति से प्रेरित होकर चारू ने फ़सल को क़ब्ज़े लेने का अभियान जलपुरीगंज में 1943 के बड़े अकाल के दौरान सफलतापूर्वक चलाया। 1946 में वह तेभागा आन्दोलन से जुड़े और उत्तर बंगाल के कामगारों के लिए हथियारबंद आन्दोलन शुरू किया। इसके पश्चात वह कुछ समय के लिए दार्जीलिंग के चाय के बागानों के कर्मचारियों के बीच काम करते रहे।
सीपीआई को 1948 में प्रतिबंधित किया गया था। चारू ने अगले तीन वर्ष जेल में बिताए। जनवरी 1954 में चारू ने लीला मुजुमदार सेनगुप्ता शादी की जो जलपुरीगंज से सी पी आई की सदस्या रही थी। इस जोड़े ने सिलीगुड़ी की ओर प्रस्थान किया जो अगले कुछ सालों तक मुजुमदार की गतिविधियों का केन्द्र बना रहा। यहीं पर उसके बीमार पिता और अवैवाहित बहन गम्भीर दरिद्रता का जीवन जी रहे थे।
1960 की दशक से मध्य में मजुमदार ने उत्तर बंगाल में सी पी एम में एक बाईं टुकड़ी बनाई। 1967 में नक्सलबाड़ी में एक हथियारों से लैस किसान विद्रोह छिड़ गया जिसकी अगुवाई कॉमरेड कानू सान्याल कर रहे थे। इस दल को आगे चलकर नक्सली कहा जाने लगा। ऐसे समय पर चारू ने आठ लेख लिखे थे जिनका उद्देश्य यह था कि सफल क्रांति चीनी क्रांति के मार्ग पर हिंसात्मक संघर्ष का रूप ले सकती है। 1969 में चारू ने "ऑल इंडिया कोऑरडिनेशन कमिटी ऑफ़ कम्यूनिस्ट रेवोलूशनरीज़" बनाई जिसके वह जेनेरल सेकरेटरी बने। जुलाई 16, 1972 को चारू को अपने खुफ़िया ठिकाने से पकड़ा गया और 28 जुलाई, 1972 की रात 4 बजे वह लॉक-अप में ही गुप्त रूप से मार डाले गए। मृत शरीर भी परिवार को नहीं सौंपा गया। पुलिस, निकटतम परिवारजनों के साथ शरीर को शवदाहगृह ले गई। पूरा इलाका घेरे में लिया गया था और किसी भी दूसरे रिश्तेदार को जिस्म को जलाते समय अन्दर आने की अनुमति नहीं दी।
कानू सान्याल:
कानू सान्याल (जन्म १९३२) भारत में नक्सलवादी आंदोलन के जनक कहे जाने हैं। दार्जीलिंग जिले के कर्सियांग में जन्में कानू सान्याल अपने पांच भाई बहनों में सबसे छोटे हैं। पिता आनंद गोविंद सान्याल कर्सियांग के कोर्ट में पदस्थ थे। कानू सान्याल ने कर्सियांग के ही एमई स्कूल से १९४६ में मैट्रिक की अपनी पढ़ाई पूरी की। बाद में इंटर की पढाई के लिए उन्होंने जलपाईगुड़ी कॉलेज में दाखिला लिया लेकिन पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी। उसके बाद उन्हें दार्जीलिंग के ही कलिंगपोंग कोर्ट में राजस्व क्लर्क की नौकरी मिली। कुछ ही दिनों बाद बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय को काला झंडा दिखाने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में रहते हुए उनकी मुलाकात चारु मजुमदार से हुई। जब कानू सान्याल जेल से बाहर आए तो उन्होंने पूर्णकालिक कार्यकर्ता के बतौर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली। १९६४ में पार्टी टूटने के बाद उन्होंने माकपा के साथ रहना पसंद किया। १९६७ में कानू सान्याल ने दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में सशस्त्र आंदोलन की अगुवाई की। अपने जीवन के लगभग १४ साल कानू सान्याल ने जेल में गुजारे। कुछ दिनों वे भाकपा माले के महासचिव के बतौर सक्रिय थे और नक्सलबाड़ी से लगे हुए हाथीघिसा गांव में रहते थे। और अंत में, 2010 में आत्महत्या कर लिया।
नक्सलवाद:
नक्सलवाद कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों के उस आंदोलन का अनौपचारिक नाम है जो भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन के फलस्वरूप उत्पन्न हुआ। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है जहाँ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने 1967 मे सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की। मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरुप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। 1967 में "नक्सलवादियों" ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। 1971 के आंतरिक विद्रोह (जिसके अगुआ सत्यनारायण सिंह थे) और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया।
आज कई नक्सली संगठन वैधानिक रूप से स्वीकृत राजनीतिक पार्टी बन गये हैं और संसदीय चुनावों में भाग भी लेते है। लेकिन बहुत से संगठन अब भी छद्म लड़ाई में लगे हुए हैं। नक्सलवाद के विचारधारात्मक विचलन की सबसे बड़ी मार आँध्र प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, झारखंड और बिहार को झेलनी पड़ रही है।
माओवाद:
माओवाद (1960-70 के दशक के दौरान) चरमपंथी अतिवादी माने जा रहे बुद्धिजीवी वर्ग का या उत्तेजित जनसमूह की सहज प्रतिक्रियावादी सिद्धांत है। माओवादी राजनैतिक रूप से सचेत सक्रिय और योजनाबद्ध काम करने वाले दल के रूप में काम करते है। उनका तथा मुख्यधारा के राजनैतिक दलों में यह प्रमुख भेद है कि जहाँ मुख्य धारा के दल वर्तमान व्यवस्था के भीतर ही काम करना चाहते है वही माओवादी समूचे तंत्र को हिंसक तरीके से उखाड़ के अपनी विचारधारा के अनुरूप नयी व्यवस्था को स्थापित करना चाहते हैं। वे माओ के इन दो प्रसिद्द सूत्रों पे काम करते हैं :
1. राजनैतिक सत्ता बन्दूक की नली से निकलती है।
2. राजनीति रक्तपात रहित युद्ध है और युद्ध रक्तपात युक्त राजनीति।
भारतीय राजनीति के पटल पर माओवादियों का एक दल के रूप में उदय होने से पहले यह आन्दोलन एक विचारधारा की शक्ल में सामने आया था पहले पहल हैदराबाद रियासत के विलय के समय फिर 1960-70 के दशक में नक्सलबाड़ी आन्दोलन के रूप में वे सामने आए।
भारत में माओवाद के कारण:
भारत में माओवाद के निम्नलिखित कारण हैं।
राजनैतिक:
भारत में माओवाद असल में नक्सलबाड़ी के आंदोलन के साथ पनपा और पूरे देश में फैल गया। राजनीतिक रूप से मार्क्स और लेनिन के रास्ते पर चलने वाली कम्युनिस्ट पार्टी में जब विभेद हुये तो एक धड़ा भाकपा मार्क्सवादी के रूप में सामने आया और एक धड़ा कम्युनिस्ट पार्टी के रूप में. इनसे भी अलग हो कर एक धड़ा सशस्त्र क्रांति के रास्ते पर चलते हुये पड़ोसी देश चीन के माओवादी सिद्धांत में चलने लगा। भारत में माओवादी सिद्धांत के तहत पहली बार हथियारबंद आंदोलन चलाने वाले चारु मजूमदार के बेटे अभिजित मजूमदार के अनुसार चारू मजूमदार जब 70 के दशक में सशस्त्र संग्राम की बात कर रहे थे, तो उनके पास एक पूरी विरासत थी। 1950 से देखा जाय तो भारतीय किसान, संघर्ष की केवल एक ही भाषा समझते थे, वह थी हथियार की भाषा। जिन्होंने जमींदारों के खिलाफ, ब्रिटिश सरकार के खिलाफ हथियार उठाया था। 1922 में चौराचौरी में 22 पुलिस वालों को जलाया गया था, उसमें भी सबसे बड़ी भागीदारी किसानों की थी। उसके बाद ही तो गांधीजी ने असहयोग और अहिंसक आंदोलन की घोषणा की थी। लेकिन किसानों ने तो अपने तरीके से अपने आंदोलन की भाषा समझी थी और उसका इस्तेमाल भी किया था।
आर्थिक:
विकास की बड़ी योजनाएँ भी अनेक लोगों को विस्थापित कर रही है अतीत में ये बड़े बाँध थे और आज सेज बन गए है, पुनर्वास की कोई भी योजना आज तक सफल नही मानी गयी है इससे जनता में रोष बढ़ता ही जाता है इसी रोष को लक्षित कर माओवादी पार्टी ने अपने पिछले सम्मेलन में साफ़ रूप से कहा था कि वो इस प्रकार की विकास परियोजनओं का विरूद्ध करेंगे तथा विस्थापितों का साथ भी देंगे यदि वे ऐसा करते है तो निश्चित रूप से एक राज्य के रूप में हमारा देश नैतिक अधिकार खो बैठैगा और उनके प्रभाव क्षेत्र में वृद्धि अपने आप ही हो जायेगी। अगर आर्थिक कारणों को देखा जाए तो वे भी माओवाद के प्रसार के लिए काफी सीमा तक जिम्मेदार है यधपि पिछले 30 सालों में निर्धनता उन्मूलन के प्रयासों को भारी सफलता मिली है लेकिन यह भी माना ही जाता रहा कि ये योजनाएँ भ्रष्टाचार और अपारदर्शिता का गढ़ रही है तथा निर्धनता उन्मूलन के आंकड़े बहुत भरोसे के लायक नहीं माने जा सकते है आबादी का बड़ा हिस्सा निर्धनता की रेखा से जरा सा ही ऊपर है, तकनीकी रूप से भले ही वो निर्धन नहीं हो लेकिन व्यवहार में है और अर्थव्यवस्था में आया थोडा सा बदलाव भी उन्हें वापिस रेखा से नीचे धकेल देने के लिए काफी होता है। फ़िर जिस अनुपात में कीमतें बढ़ जाती है उसी अनुपात में निर्धनता के मापदंड नहीं बदले जाते है इस से बड़ी संख्या में लोग निर्धनता के चक्र में पिसते रहते है; फ़िर क्या लोग इस चीज से संतोष कर लिए कि अब वो गरीब रेखा से ऊपर आ गए है ?जबकि अमीर उनकी आँखों के सामने और अमीर बनते जा रहे है फ़िर वो लोग ही क्यो उसी हाल में बने रहे ?
भारत के आंतरिक क्षेत्र जो विकास से दूर है तथा इलाके जो आज माओवाद से ग्रस्त है वे इसी निर्धनता से ग्रस्त है। बेरोजगारी भी अनेक समस्याओं को जन्म देती है इसके चलते विकास रूका रहता है, निर्धनता बनी रहती है तथा लोग असंतुष्ट बने रहते है, यह लोगों को रोजगार की तलाश में प्रवासी बना देती है, पंजाब के खेतों में काम करते बिहारी मजदूर इसका सबसे अच्छा उदाहरण माने जा सकते हैं।
सामाजिक:
भूमि सुधार कानून जो 1949 - 1974 तक एक श्रृंखला के रूप में निकले थे, विनोबा भावे का भूदान आंदोलन भी हुआ लेकिन आज भी देश में भूमि का न्यायपूर्ण वितरण भूमिहीनों तथा छोटे किसानों के बीच न्यायपूर्ण तरीक से नही हुआ है। पुराने जमींदारों ने कई चालों के जरिये अपनी जमीन बचा ली और वक्त के साथ साथ जमींदारों की नई नस्ल सामने आ गयी जो बेनामी जमीन रखती है और गरीब उतना ही लाचार है जितना पहले था
अनुसूचित जनजाति और जाति के लोग भारत में लंबे समय तक हाशिये पे धकेले हुए रहे हैं वैसे मानव भले ही स्वभाव से सामाजिक प्राणी रहा हो जो हिंसा नही करता लेकिन जब एक बड़े वर्ग को समाज किसी कारण से हाशिये पे धकेल देता हैं और पीढी दर पीढी उनका दमन चलता रहता हैं।
भारत में एक बड़ी आबादी जनजातीय समुदाय की हैं लेकिन इसे मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर आज तक नही मिला हैं आज भी सबसे धनी संसाधनों वाली धरती झारखंड तथा उडीसा के जनजातीय समुदाय के लोग निर्धनता और एकाकीपन के पाश में बंधे हुए हैं। नक्सलवाद अपने शुरू के दिनों से ही बहुत ही बदनाम रहा है। आज इसे आतंकवाद की श्रेणी में गिना जाता है।
आतंकवाद एक प्रकार के माहौल को कहा जाता है। इसे एक प्रकार के हिंसात्मक गतिविधि के रूप में परिभाषित किया जाता है, जो कि अपने आर्थिक, धार्मिक, राजनीतिक एवं विचारात्मक लक्ष्यों की प्रतिपूर्ति के लिए गैर-सैनिक अर्थात नागरिकों की सुरक्षा को भी निशाना बनाते हैं। गैर-राज्य कारकों द्वारा किये गए राजनीतिक, वैचारिक या धार्मिक हिंसा को भी आतंकवाद की श्रेणी का ही समझा जाता है। अब इसके तहत गैर-क़ानूनी हिंसा और युद्ध को भी शामिल कर लिया गया है। अगर इसी तरह की गतिविधि आपराधिक संगठन द्वारा चलाने या को बढ़ावा देने के लिए करता है तो सामान्यतः उसे आतंकवाद नही माना जाता है, यद्यपि इन सभी कार्यों को आतंकवाद का नाम दिया जा सकता है। गैर-इस्लामी संगठनों या व्यक्तित्वों को नजरअंदाज करते हुए प्रायः इस्लामी या जिहादी के साथ आतंकवाद की अनुचित तुलना के लिए इसकी आलोचना भी की जाती है।
विश्व के प्रमुख आतंकवादी संगठन आईएसआईएस, अल कायदा, कौमी एकता मूवमेंट, बास्कस, आयरिश नेशनल लिबरेशन आर्मी, आयरिश रिपब्लिक आर्मी,रेड ब्रिगेड्स, शाइनिंग पाथ,  रेड आर्मी गुट, हिज्बुल्लाह्, पापुलर फ्रंट फार लिबरेशन आफ पैलेस्टाइन, अबु निदाल गुट, उल्स्टर डिफेंस एसोसिएशन, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट, डेमोक्रेटिक फ्रंट फार लिबरेशन आफ पैलेस्टाइन, पीपुल्स मूवमेंट फार लिबरेशन आफ अंगोला,सराजो, अल्फोरा विवा, फाराबंदो मार्ती लिबरेशन फ्रंट, कुक्लुल्स क्लान, नेशनल यूनियन फार द टोटल, इंडीपेंडें आफ अंगोला, तमिल इलाम मुक्ति शेर, ख्मेर रूज, नेशनल लिबरेशन आर्मी, नेशनल डिग्रीटी कमांड, विकटर पोले, कारेन नेशन लिबरेशन आर्मी, जैश-ए-मोहम्म्द, हरकत-उल-जिहाद-ए-इस्लामी, रणवीर सेना, उल्फा, बब्बर खालसा इंटरनेशनल, खालिस्तान कमांडो फोर्स, इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मुहम्मद, हरकत उल मुजाहिदीन, हरकत उल अंसार, हरकत उल जेहाद-ए-इस्लामी, हिजबुल मुजाहिदीन, अल उमर मुजाहिदीन, जम्मू-कश्मीर इस्लामिक फ्रंट, स्टूडेंटस इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी), दीनदार अंजुमन, अल बदर, जमात उल मुजाहिदीन, अल कायदा, दुख्तरान-ए-मिल्लत और इंडियन मुजाहिदीन, यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम (उल्फा), नेशनल डेमोकेट्रिक फंट्र ऑप बोडोलैंड (एनडीएफबी), पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए), यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ), पीपुल्स रिवोल्यूशनरी पार्टी ऑफ कांगलीपक, कांगलीपक कम्युनिस्ट पार्टी, मणिपुर पीपुल्स लिबरेशन फ्रंट, आल त्रिपुरा टाइगर फोर्स, नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा,लिट्‍टे, कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (एमएल), पीपुल्स वार, एमसीसी, तमिलनाडु लिबरेशन आर्मी, तमिल नेशनल रिट्रीवल ट्रुप्स, अखिल भारत नेपाली एकता समाज, भाकपा-माओवादी, नक्सलवादी,माओवादी आदि हैं।
इनमें से बहुत सारे संगठन आतंकवादी हैं किन्तु बहुत से संगठन जल, जमीन,जंगल के लिए संघर्षरत हैं। बहुत से संगठन अमीरी-गरीबी को लेकर सक्रीय हैं। बहुत से संगठन जातीय दंश की वजह से क्रिया-प्रतिक्रिया की लड़ाई लड़ रहे हैं। कोई धर्म के आतंक से बचने के लिए लड़ रहा है। भारत बहु भाषा-भाषी देश है। यहाँ अनेक धर्म और जातियाँ हैं। मुख्यतः भारत में वर्ण-व्यवस्था है। वर्ण-व्यवस्था का पहला और दूसरा वर्ण क्रमशः ब्राह्मण और क्षत्रीय हैं। क्षत्रीय राजा रहा है और ब्राह्मण उसका संचालक व चिंतक वर्ग है। इसमें भी दो वर्ग हो गए हैं जैसा कि अमूमन भारत की सभी जातियों और धर्मों में पाए जाते हैं-प्रगतिशील वर्ग। यह प्रगतिशील वर्ग वर्गीय एकता की बात तो करता है किन्तु सांस्कृतिक रूप से अभी भी अपने को डी-कास्ट नहीं कर पाया है। इसके लिए भारत की प्रगतिशील वाम वर्ग जिम्मेदार है परन्तु कोई भी वर्ग अन्ततः व्यक्तियों पर ही निर्भर करता है और व्यक्ति सिद्धांत और चरित्र पर। इससे यही लगता है कि वाम वर्ग अभी भी सिद्धांत और चरित्र के मामले में विकसित नहीं हो पाया है। यह भी कहा जा सकता है कि व्यक्ति ईमानदार नहीं बन पाया है। कोई भी सिद्धांत मनुष्य ही तय करता है और वही लागू भी करता है। यदि मनुष्य ईमानदारी से क्रांतिकारी सिद्धांतों को समझता, तय करता और लागू करता, तो अब तक भारत से जाति और वर्ग-संघर्ष का चरण पूर्ण हो गया होता।
आज हम जिस चरण में जी रहे हैं वह चरण इतना घटिया है कि जाति और धर्म प्यारा है लेकिन मनुष्य नहीं प्यारा है। एक तरफ हम मंगल ग्रह पर हैं दूसरी तरफ हम छुआ-छूत, ऊँच-नीच,छोटी जाति-बड़ी जाति के चक्कर में रहते हैं। अनेक गाँवों-बस्तियों में दलितों का नरसंहार इसलिए कर दिया जाता है कि वे शूद्र-चमार है,भला इनकी क्या मजाल कि ये ठाकुरों-ब्राह्मणों की बराबरी करें, उनके जैसा खाएं-पीएं,पहने-ओढ़ें, शादी-ब्याह करें, घोड़ी चढ़ें,बैंड-बाजा-बारात सजाएं या फिर इनका नाम लें।
अब इसका क्या इलाज है? क्या ठाकुरों-ब्राह्मणों की मार सहें और प्रतिकार भी न करें? प्रतिकार करें तो अन्य दलित जिनकी कोई गलती नहीं है वे भी मौत के घाट उतारे जाँय? और यदि नक्सलवाड़ी में भूमिहारों-जमींदारों का विरोध करें, तो रणवीर सेना अवतार लेकर दलितों का गला काटने लगते है। क्या संभव नहीं कि नक्सलवाद का जन्म हो? ऊना में दलितों की पिटाई के बाद क्या आश्चय का विषय है कि जिग्नेश के नेतृत्व में पचासों हजार की भीड़ सडकों पर जन प्रदर्शन करने लगे? सहारनपुर के शब्बीरपुर गाँव में महाराणा प्रताप के जुलुस के दौरान जब दलितों के 50-60 घर पेट्रोल डाल कर फूंक दिए जाय और स्त्रियों के स्तन काट लिए जाँय,तो क्या भीम आर्मी अपने सवाल उठाने के लिए प्रदर्शन न करे? और यदि प्रदर्शन करे तो पुलिस उनकी पिटाई करने लगे, फिर क्या खून का खौलना कानून का उलंघन है? लेकिन दलित आर्मी की हर हरकतें गैर कानूनी हैं क्योंकि वे पूँजीपति और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए उसकी सबसे ताकतवर शक्ति ( पुलिस और सेना) से ही उलझ गए। इसलिए, उन पर टाडा और रासुका लगाया जा सकता है, इसलिए उनको आतंकवादी संगठन घोषित किया जा सकता है, इसलिए, इन साथियों को जेल में डाल कर मारा भी जा सकता है। विकल्प है कि सभी प्रगतिशील लोग शब्बीरपुर और मेरठ जैसे घृणित जघन्य अपराधों की निंदा करें और अपराधियों के साहस को कमजोर करने का सार्थक प्रयास करें।
-आर डी आनंद

रविवार, 14 मई 2017

गर्भ को चीरने वाले बने मुस्लिम महिलाओं के मुक्तिदाता

 

तीन तलाक के मुद्दे पर मीडिया में जो कुछ प्रकाशित व प्रसारित हो रहा है और इस मसले पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जो कह रहे हैं, उससे मुस्लिम समुदाय के अंदर लैंगिक न्याय का संघर्ष कमज़ोर हो रहा है। मीडियाए तीन तलाक की पीड़िताओं का तमाशा बना रही है। टीवी चैनल कहीं से भी एक मौलवी को पकड़ लाते हैं और उससे ऊलजलूल बातें कहलवाकर पूरे मुस्लिम समुदाय को बदनाम करते हैं। मुस्लिम महिलाओं को लैंगिक न्याय स्वयं के संघर्ष से ही प्राप्त हो सकेगा। हांए उन्हें प्रजातांत्रिक संस्थाओं से मदद की ज़रूरत पड़ेगी। इस मुद्दे के राजनीतिकरण से मुस्लिम महिलाओं के हितों को नुकसान पहुंचेगा। मुस्लिम महिलाओं के लिए जो ज़रूरी है वह यह है कि वे एकजुट हों और स्त्रीवादी आंदोलन और उदारवादी प्रजातांत्रिक शक्तियों का सहयोग और समर्थन हासिल करें।
एक बार में तीन बार 'तलाक' शब्द का उच्चारण करए वैवाहिक संबंध तोड़ने की प्रथा इन दिनों इसलिए चर्चा में है क्योंकि उच्चतम न्यायालय इस मुद्दे पर सायरा बानो नामक महिला द्वारा दायर याचिका की सुनवाई कर रहा है। इस तरह के तलाक को 'तलाक,. तलाक की वह विधि जो धर्मशास्त्र की दृष्टि में गलत परंतु वैध है कहा जाता है। आम बोलचाल की भाषा में इसे तीन तलाक कहा जा रहा है। उलेमा का कहना है कि तीन तलाक तब भी वैध है जब वह गुस्से में या नशे में दिया गया हो या फोनए एसएमएस या डाक के ज़रिए भेजा गया हो। इस विधि से जिस महिला को तलाक दिया जाता हैए उसे तुरंत अपना वैवाहिक निवास छोड़ना पड़ता है। उसे आगे फिर कभी अपने पति के घर आने की इजाज़त नहीं होती और ना ही उसे अपने बच्चों से मिलने दिया जाता है। तलाक की यह प्रथा घोर निंदनीय और घिनौनी है और इसका किसी भी तरह से बचाव नहीं किया जा सकता। इसके बाद भीए आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने उच्चतम न्यायालय में दाखिल अपने शपथपत्र में तीन तलाक को शरिया कानून का हिस्सा बताया है। बोर्ड का कहना है कि शरिया कानूनए दैवीय है और मुसलमानों को उसका पालन करने का संवैधानिक अधिकार है। हम कई बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि तीन तलाक असंवैधानिक तो है हीए वह कुरान के भी खिलाफ है।
मुस्लिम महिलाओं के रक्षक
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस मुद्दे पर भुवनेश्वर में आयोजित भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में 16 अप्रैलए 2017 को टिप्पणी करते हुए कहाए ष्ष्हमारी मुस्लिम बहनों के साथ न्याय होना चाहिए। उनके साथ अन्याय नहीं होना चाहिएण्ण्ण्अगर कोई सामाजिक बुराई है तो समाज को जागना चाहिए और न्याय प्रदान करने की दिशा में प्रयास करना चाहिएष्ष्। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसके अगले दिनए 17 अप्रैलए 2017 कोए कहाए  ष्ष्जो लोग इस ज्वलंत मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं वे अपराधियों जैसे हैंष्ष्। उन्होंने तीन तलाक की तुलना द्रोपदी के चीरहरण से की और समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की मांग की।
प्रधानमंत्री और उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्रीए दोनों मुसलमान महिलाओं के रक्षक बन रहे हैं। वे उन्हें अमानवीय मुस्लिम पर्सनल लॉ के चंगुल से निकालने का दंभ भर रहे हैं। परंतु उन्हें उनके अतीत से जुड़े कई प्रश्नों का उत्तर देने की ज़रूरत है। जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थेए उस समय ;2002द्ध राज्य में हुए दंगों में मुस्लिम महिलाओं के खिलाफ अमानवीय यौन हिंसा हुई थी। उस समय दोनों में से किसी ने भी इस पर दुःख या पछतावा व्यक्त नहीं किया था और ना ही मुस्लिम महिलाओं के साथ हुए अन्याय के दोषियों को सज़ा दिलवाने की बात कही थी। उस समय उन्हीं की पार्टी के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी को राजधर्म का पालन करने की सलाह दी थी। तत्कालीन गुजरात सरकार ने सांप्रदायिक दंगों के डेढ़ लाख से अधिक पीड़ितोंए जो विभिन्न राहत शिविरों में बहुत बदहाली में अपने दिन बिता रहे थेए की किसी प्रकार की सहायता करने से इंकार कर दिया था। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने एक समय यह कहा था कि अगर एक हिन्दू महिला की मुसलमान से शादी कर उसका धर्मपरिवर्तन करवाया जाता है तो सौ मुस्लिम महिलाओं की हिन्दू पुरूषों से शादी करवाकर उन्हें हिन्दू बनाया जाएगा!
गर्भ को चीरने वाले बने मुस्लिम महिलाओं के मुक्तिदाता
सन 2002 में गुजरात में हुए सांप्रदायिक दंगों में हिन्दू श्रेष्ठवादियों ने मुस्लिम महिलाओं के विरूद्ध घिनौनी यौन हिंसा की थी। उन्होंने गर्भवती मुस्लिम महिलाओं के पेट चीर कर गर्भस्थ शिशु को मारा तक था। अब वही लोग मुस्लिम महिलाओं की उनके पुरूषों के दमन से रक्षा करने का दावा कर रहे हैं। मोदी ने गुजरात की हिंसा को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए उसे क्रिया की प्रतिक्रिया बताया था। उन्होंने कभी इस बात पर अफसोस जाहिर नहीं किया कि उनकी नाक के नीचे वीभत्स हिंसा हुई। जिन लोगों पर बलात्कार और हिंसा के आरोप थेए वे लगातार बरी होते जा रहे थे। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले में हस्तक्षेप किया और आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए विशेष जांच दल का गठन किया। बिलकीस बानो बलात्कार कांड का मुकदमा मुंबई की एक अदालत में हस्तांतरित किया गया। इसके बाद ही कुछ आरोपियों को सज़ा मिल सकी।
मुस्लिम महिलाओं को न्याय दिलवाने के भाजपा के तथाकथित अभियान के राजनीतिक लक्ष्य हैं। जब मोदी प्रधानमंत्री और आदित्यनाथ मुख्यमंत्री नहीं थेए तब वे अत्यंत भद्दी भाषा में मुस्लिम समुदाय को कलंकित करते थे। गुजरात दंगों के बाद नरेन्द्र मोदी ने गौरव यात्रा निकाली। इस यात्रा के दौरान सभाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि दंगा पीड़ितों के लिए स्थापित राहत शिविर बच्चे पैदा करने की फैक्ट्रियां बन गए हैं। दंगों के बाद गुजरात में हुए विधानसभा चुनाव में मोदी ने अपने भाषणों में ष्मियां मुशर्रफ मानसिकताष् पर निशाना साधा। संदेश यह था कि मुसलमान पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं और उन्हें सबक सिखाने की ज़रूरत है।
अबए मुस्लिम महिलाओं के रक्षक का भेस धरकर मोदी और आदित्यनाथ वही कर रहे हैं . अर्थात मुस्लिम समुदाय को यह कहकर बदनाम करना कि उसकी परंपराएं महिलाओं के प्रति अन्यायपूर्ण हैं और यह कि मुसलमान महिलाओं का चीरहरण हो रहा है। हिन्दू महासभा की महासचिव पूजा शकुन पांडे ने एक कदम और आगे जाकर यह कहा कि तीन तलाक की पीड़ित सभी मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू बन जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे ऐसी महिलाओं का विवाह करवाएंगी और उनका कन्यादान करेंगी। स्पष्टतःए हिन्दू श्रेष्ठतावादीए मुस्लिम महिलाओं को हिन्दू बनाकर उन्हें हिन्दू पुरूषों को भेंट कर देना चाहते हैं ताकि हिन्दुओं की आबादी बढ़ सके और मुसलमानों की कम हो। वे मुस्लिम महिलाओं को अन्याय से मुक्ति दिलवाकर उन्हें हिन्दू पुरूषों की सम्पत्ति बनाना चाहते हैं। हिन्दू श्रेष्ठतावादियों ने सन 1950 के दशक में डॉण् बीण्आर अंबेडकर द्वारा तैयार किए गए हिन्दू कोड बिल का जबरदस्त विरोध किया था। यह बिल हिन्दू महिलाओं को लैंगिक न्याय उपलब्ध करवाने के लिए बनाया गया था।
हिन्दू श्रेष्ठतावादियों को दहेज़ प्रथाए बालविवाह,कन्याभ्रूण हत्या इत्यादि से कोई समस्या नहीं है। उन्हें इस बात से भी कोई समस्या नहीं है कि महिलाएं किससे विवाह करें या न करेंए इसका निर्णय उनके माता.पिता लेते हैं। उन्होंने कभी 'ऑनर किलिंग' का विरोध नहीं किया। रोमियो स्क्वाड और लव जिहाद जैसे अभियानों का मूल उद्देश्य यही है कि हिन्दू महिलाओं के उनका जीवनसाथी चुनने और अपनी मर्जी से कपड़े पहनने के अधिकार से वंचित किया जा सके। इस सरकार के कई मंत्री महिलाओं को यह सलाह दे चुके हैं कि उन्हें यौन हमलों से बचने के लिए उपयुक्त ;अर्थात पारंपरिकद्ध वस्त्र पहनने चाहिए। भाजपा सांसद साक्षी महाराज और आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिन्दू महिलाओं का आव्हान किया है कि वे कम से कम चार बच्चे पैदा करें। ऐसा लगता है कि वे यह मानते हैं कि महिलाएं अपने पतियों और अपने समुदाय के लिए बच्चे पैदा करने की मशीनें हैं।
जहां तक महिलाओं की भूमिका और उनकी स्थिति का प्रश्न हैए हिन्दू श्रेष्ठतावादियों और मुस्लिम राजनीतिक और धार्मिक नेताओं के बीच कोई विशेष अंतर नहीं है। दोनों ही महिलाओं को पुरूषों की संपत्ति मानते हैं और उन्हें पुरूषों के संपूर्ण नियंत्रण में रखना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि महिलाएं केवल घर का काम करेंए बच्चे पैदा करें और उन्हें पालें.पोसें। और अगर पुरूषों को उनकी आय की जरूरत हो तो घर से बाहर निकलकर भी मेहनत करें। धर्म का इस्तेमाल महिलाओं को गुलाम बनाए रखने के लिए किया जाता है। महिलाओं के दमन के लिए मुस्लिम पुरूषों के हाथों में तीन तलाक का अस्त्र है तो हिन्दू पुरूषों के पास खाप पंचायतें और घरेलू हिंसा है। रणनीतियों और तरीकों में कुछ फर्क के बावजूद दोनों का उद्देश्य यही है कि महिलाओं को गुलाम बनाकर रखा जाए और वे केवल यौन आनंद की पूर्ति और वंश को आगे बढ़ाने का उपकरण बनी रहें।
मीडिया और मुस्लिम समुदाय को कलंकित करने की कोशिश
मीडिया को जब भी मौका मिलता हैए वह अपनी टीआरपी बढ़ाने के लिए ऐसे किसी भी मुददे को उछालना शुरू कर देती है जिससे मुस्लिम समुदाय को कलंकित किया जा सके। कुछ वर्ष पहलेए टीवी चैनलों ने उस फतवे का व्यापक कवरेज किया था जिसमें यह कहा गया था कि इमरानाए जिसके साथ उसके ससुर ने बलात्कार किया थाए अपने पति की पत्नि नहीं रह गई है। इसी तरह एक टीवी चैनल ने कई घंटों का कार्यक्रम प्रसारित किया था जिसका शीर्षक था 'गुड़िया किसकी'। गुड़िया एक मुस्लिम महिला थी, जिसने अपने सैनिक पति के लंबे समय तक लापता रहने के बाद एक दूसरे पुरूष से शादी कर ली थी। यह मान लिया गया था कि उसका पति मर चुका है। परंतु कुछ वर्षों बाद वह पाकिस्तान की एक जेल से रिहा होकर घर वापिस पहुंच गया। चैनल ने गुड़िया के अनेक रिश्तेदारों, कुछ मौलवियों, दूसरे पति और पूर्व पति को स्टूडियों में इकटठा कर लिया और गुड़िया की जिंदगी का तमाशा बनाया।
अधिकांश टीवी चैनल तीन तलाक के मुद्दे पर भी यही कर रहे हैं। वे कुछ मौलवियों को बुला लेते हैं जो अपने बेवकूफाना और भड़काऊ वक्तव्यों से दर्शकों का मनोरंजन करते हैं। शो में त्रासदी का तड़का लगाने के लिए तीन तलाक की कुछ पीड़िताओं को बुला लिया जाता है जो अपनी करूण गाथा रूंधे गले और आंसू भरी आंखों के साथ सुनाती हैं। इसके बाद सभी प्रतिभागी एकसाथ चिल्लाने लगते हैं और एंकर उनके बीच युद्धविराम करवाने के असफल प्रयास में जुटा रहता है। जो इस्लामिक विद्वान तीन तलाक का समर्थन नहीं करते उनके लिए स्टूडियो के दरवाजे बंद रहते हैं।
पीड़िताओं और मौलवियों के बीच बहस जितनी तीखी और कटु होती है दर्शकों का उतना ही मनोरंजन होता है। बीच.बीच में भाजपा के प्रवक्ता दर्शकों को याद दिलाते रहते हैं कि मोदी और योगी मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति के लिए आकाश से उतरे देवदूत हैं।
इस मुद्दे को उठाकर मोदी और योगी जैसे लोग मुस्लिम समुदाय को कलंकित करना तो चाहते ही हैं वे मुसलमानों को लैंगिक आधार पर विभाजित भी करना चाहते हैं। वे शियाओं और सूफियों के एक तबके को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास भी कर रहे हैं। जैसा कि सुब्रमण्यम स्वामी ने कहाए भाजपा का लक्ष्य है मुस्लिम समुदाय को बांटना और हिन्दू समुदाय को एकजुट करना ताकि हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की राह प्रशस्त हो सके।
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने पहले तीन तलाक का बचाव कर और उसे दैवीय शरिया कानून का अविभाज्य हिस्सा बताकर स्वयं को हंसी का पात्र बना लिया। बाद में मीडिया की तीखी आलोचना से परेशान होकर उसने एक नया शोशा छोड़ा। बोर्ड ने 16 अप्रैल को एक आचार संहिता जारी कर कहा कि जो लोग शरिया में दिए गए कारणों के अतिरिक्त किसी कारण से तलाक देंगेए उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा। सामाजिक बहिष्कार की यह बात केवल मीडिया के लिए कही जा रही है और इसका उद्देश्य तीन तलाक की अधम प्रवृत्ति को समाप्त करना नहीं है।
यह आश्चर्यजनक है कि बोर्ड को सामाजिक बहिष्कार करने का विचार मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी प्रकार के परिवर्तन का सत्तर साल तक विरोध करने के बाद सूझा। इस अवधि में उसे कभी तीन तलाक की पीड़िताओं का ख्याल नहीं आया। बोर्ड इतना प्रभावशाली तो है कि वह दमन की शिकार महिलाओं को चुप कर सके और उन्हें अल्लाह के शाप का डर दिखा सके। परंतु वह इतना भी शक्तिशाली नहीं है कि वह प्रभावशाली लोगों का सामाजिक बहिष्कार सुनिश्चित कर सके। इसके अलावाए किसी का सामाजिक बहिष्कार करना महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में गैर.कानूनी है। वैसे भी तीन तलाक देने वाले पुरूष का सामाजिक बहिष्कार होने से उस महिला को क्या मिलेगा जिसे खड़े.खड़े अपने पति के घर से बेदखल कर दिया गया हो। और अगर पुरूष ने नशे में या क्रोध के आवेश में ऐसा कर दिया हो और अगली सुबह वह पछताए तो उसे अकारण ही सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ेगा।
आगे का रास्ता
इन परिस्थितियों में जो एकमात्र रास्ता उपलब्ध है वह है मुस्लिम महिलाओं और पुरूषों को शिक्षित और जागृत करना। उन्हें यह बताना होगा कि कुरान में यह कहा गया है कि मेलमिलाप के प्रयासों के बगैर तलाक देना गलत है।
बोर्ड को मुस्लिम पर्सनल लॉ को कुरान की शिक्षाओं और लैंगिक समानता के सिद्धांतों के अनुरूप संहिताबद्ध करना चाहिए। इसके लिए सभी इस्लामिक विधिशास्त्रों में से अच्छी बातें ली जानी चाहिए। इस संहिता को संसद के समक्ष प्रस्तुत कर उसे कानून का स्वरूप दिया जाना चाहिए।
जब तक ऐसा नहीं होता तब तक भारतीय अदालतों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे मुस्लिम महिलाओ को न्याय दिलवाएं और उनके समानता के अधिकार की रक्षा करें। अदालतों को यह अधिकार भी है कि वे हनाफी,हनबली, मलिकी, एहल.ए.हदीद और शिया सहित विभिन्न इस्लामिक विधिशास्त्रों की इस तरह से व्याख्या करें जो संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हो।
अगर राजनीतिक दल इस मुददे का किसी भी आधार पर राजनीतिकरण करेंगे तो वे देश और मुस्लिम समुदाय दोनों को हानि पहुंचाएंगे। शांति और न्याय उदात्त लक्ष्य हैं और इनकी तुलना किसी चुनाव को जीतने या साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण से लाभ उठाने से नहीं की जा सकती।
-इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 12 मई 2017

मार्क्सवाद विरोध नस्लवाद हैं



      दलितों, गरीबों और मजदूरों को दुःख से निवृत होने के लिए अनन्तः अपनाना ही पड़ेगा। बौद्ध धर्म भी एक धर्म है। एक समय अद्वितीय प्रगतिशील होने के उपरांत आज वह भी अन्य धर्मों की ही तरह कर्मकांडों में फंस गया है। जो लोग यह कहते हैं कि बौद्ध धर्म भारतीय परिवेश से निकला हुआ हिन्दू धर्म का ही अंग है, वे सही कहते हैं। धर्मों में ईश्वर की विचारधारा गरीबों का अवलम्बन होते हुए भी एक भ्रम है। धर्म झगड़े की जड़ है। पूजा प्रार्थनाएं मनुष्य के मनोबल को संतुलित रखती है लेकिन उससे अधिक वह साम्प्रदायिकता बढ़ाकर मनुष्य को दुःख पहुँचाती रहती है। मैं अपनी सारी बात गलत मान लूँ तो क्या विकल्प है कि पूँजीवादी-व्यवस्था ख़त्म हो जाय? एक बात तो आप को समझना ही चाहिए कि निजीकरण के बजाय राष्ट्रीयकरण होना चाहिए। एक व्यक्ति के हाथों में अरबों-खरबों की पूँजी निरर्थक पड़ी रहती है और दूसरी तरफ लोग भूंखों मरते हैं। क्या आप को नहीं लगता है यदि पूँजी का अकाधिकारीकरण न हो तो पूरी दुनिया अमन-चैन से रह सकती है। समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के लिए क्या हमें कुछ करना चाहिए? क्या सब को शिक्षा और सब को काम के लिए सामूहिक आंदोलन होना चाहिए? कोई विकल्प सोचिए।
      मैं सिर्फ दलितों की गरीबी और अशिक्षा के सवाल को ही नहीं देखता हूँ। मैं दलितवादी या आम्बेडकरवादी भी नहीं हूँ।  मुझे दलित खेमें का व्यक्ति न समझें। मैं हर जातियों-धर्मों के गरीबों-मजलूमों की धारा का व्यक्ति हूँ। सभी से तर्क प्रस्तुत करते हुए मार्क्सवाद की वकालत करता हूँ। सिर्फ दलितों के लिए शिक्षा की बात की जाय तो क्या संभव है शिक्षा पूरी हो जाएगी? बिना व्यवस्था परिवर्तित हुए, बिना समाजवादी संविधान लागू किए, किसी भी जाति, व्यक्ति व समूह को दुखों से छुटकारा नहीं मिलेगा। आप को चिंतित होना चाहिए कि परम्परावादी सवर्ण और इसके अनुसांगिक संगठन तथा दलितों के सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक संगठन दोनों मार्क्सवाद विरोधी हैं। मुझे नहीं पता कि कौन सा डीएनए का अंश इनके बीच में समरूप है। परम्परावादी सवर्ण ईश्वर को मानता है, हिन्दू धर्म को मानता है, वर्ण को मानता है, जाति को मानता है,  जातिप्रथा को तोड़ना नहीं चाहता है। हाँ, भोज में छुआछूत नहीं करता है। उठने-बैठने में भिन्नता नहीं करता है। समता की बात नहीं समरसता की बात करता है। समरसता समता का विपरीतार्थी अर्थ है। उसके लोग शादी-ब्याह जाति, कुल, गोत्र, राशि और कुंडली विचार-देखकर ही करते हैं। कम्युनिस्ट व आंबेडकरवादी पूरी जाति-व्यवस्था को ही नष्ट करना चाहते हैं। यहां पर हम-आप दो राष्ट्र के रूप में हैं। हमारे विचार आप के विचार के हमेशा विपरितार्थी ही लगेंगे। ठीक इसका उल्टा भी। यहां हम दो विचारधाराओं के व्यक्ति हैं। फिर विचारों में संतुलन का होना नामुमकिन है।
      मैं सवर्णों को साथ लेने की बात नहीं कर रहा हूँ बल्कि गरीब और प्रगतिशील सवर्णों को वर्गीय एकता के लिए साथ लेना चाहता हूँ और उन्हें बताता रहता हूँ कि तुम्हारे जाति के सम्भ्रांत लोग तुम्हारे लिए कभी नहीं लड़ेंगे, तुम्हारे शिक्षा और रोजगार के लिए कुछ उपाय नहीं करेंगे। सिर्फ जाति के नाम पर, मंदिर के नाम पर और हिंदुत्व के नाम पर तुम्हारा शोषण करेंगे। वर्ग की चेतना ही दलित और सवर्ण व अन्य धर्मों के गरीबों का कल्याण कर सकता है।
      जाति ही तो अमीर सवर्णों के सम्मान से जीने का आधार है लेकिन वर्ग-संघर्ष के बाद जो व्यवस्था हासिल होगी, वहां सभी जातियां और धर्म के लोग खुशहाल और सम्मान पूर्वक जिएंगे, कोई किसी का शोषण नहीं कर पाएंगे। एक दिन क्रान्ति होगी ही। हो सकता है मेरी पीढ़ी न कर पाए लेकिन सत्य हमेशा विजई होता है। यह मानवता का सबसे सुन्दर सिद्धांत है। यह अलगाववादी नहीं है। इसमें ऊँच और नीच का फर्क मिट जाएगा। यह छुआछूत नहीं करेगा। यह कामचोरों से भी काम करवाएगा। यह हराम का किसी को नहीं खाने देगा। यह व्यवस्था निजी हाथों से सब कुछ छीनकर राष्ट्रीयकरण कर देगा। अब निजीकरण में आराम और मौजमस्ती से जीने वालों को तो कष्ट होगा ही क्योंकि उन्हें भी बराबर की मेहनत करना पड़ेगी।
     कुछ लोग अच्छे हैं किन्तु वैचारिक रूप से भिन्न विचारधारा उनको गरीबों के पक्ष में क्रान्ति नहीं सहानुभूति का दृष्टिकोण देता है और आप जैसे विद्वान और ईमानदार साथियों को भी यही लगता है कि क्राँति एक स्वप्न है, ऐसा नहीं हो सकता है। वैज्ञानिक समाजवाद के लिए एंगेल्स की पुस्तक "From utopian to scientific communism" जरूर पढ़ डालें। मैं यह आग्रह नहीं पालता की आप कम्युनिस्ट हो जाएंगे लेकिन सत्य आप को कचोटेगा जरूर।
     बिना दलित के क्रांतिकारी हुए,बिना दलितों के मार्क्सवादी हुए, बिना दलितों के नेता हुए इस देश में क्रान्ति नहीं हो सकती है। जब तक सही मायने में दलित क्रांतिकारी नहीं होंगे, न ब्रह्मणवाद ख़त्म होगा न पूँजीवाद। अगर मेरी बात से सहमत हों और बाबा साहब के बातों से इत्तिफ़ाक बने, तो भी और न बने तो भी, आप अपनी राय बनाएं कि ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद कैसे ख़त्म हो? हम लोग क्या करें? मैं लेख लिखता रहता हूँ। कोई सही कहता है कोई गलत। सभी अपने -अपने विचार रखते हैं। पिछले लेख पर लोगों ने बहुत विमर्श किया। कई लोग मेरी विचारधारा से सहमत नहीं हैं, फिर भी बहस तो हो रही है। लोग अपने विचार को लेकर चैतन्य तो हैं इसलिए ऊर्जा बेकार नहीं है। माना कुछ न लिखूं,  कुछ न पढूं, तो खाकर सोने का क्या मतलब? ऐसे में आप लोगों का प्रेम, गुस्सा और विचारधारा का फायदा तो देखने को मिल रहा है। कई बार इससे भी ख़ुशी मिलती है कि मेरे भाइयों में तर्क-वितर्क और लड़ने का माद्दा तो पैदा हो रहा है। आप चूंकि मेरा लेख पढ़ रहे हैं इसलिए आप से निवेदन है कि इससे पूर्व मेरा लेख "डा.आम्बेडकर का अवतारीकरण" पढ़ डालें। उस पर बहुत लोगों ने अच्छा-बुरा दोनों कमेंट्स किया है। कुछ साथी आरएसएस के भी हैं और आरएसएस को अच्छा कहते हुए बाबा साहब को अनुचित खाते में डाल रहे हैं। जो मुझसे नहीं बन पा रहा है आप लिखकर मेरे अध्याय को पूरा करें। मेरी आलोचनाओं के साथ-साथ उन  बिंदुओं को भी दिखाइए, जिससे दलित समाज का फायदा हो और अर्थशास्त्र का सत्य भी उद्घाटित हो। सिर्फ मुझ से चिढ़ने या चिढ़ाने से हमारा-आप का-दलित समाज का-गरीबों का मकसद तो पूरा नहीं होगा। उम्मीद है आप मेरी विनम्रता का मतलब समझ रहे होंगे। मैं समाज को दिशा देने के लिए लिखता हूँ, बड़े होने के लिए नहीं। कोई भी लेखक अपने नाम के लिए नहीं लिखता है। उसको यह समझ में आता है कि यह समाज की जरूरत है। एक निवेदन और कि आप जब भी आलोचना करिए तो बाबा साहब के शब्दों को रखिए जिससे मुझे भी तथा समाज को भी उसके सापेक्ष विचार प्राप्त हो।
      मजदूर विभिन्न जातियों में विभक्त है। मजदूरों-गरीबों को उनके जातियों के मोहपाश से मुक्त कराना होगा। भारत का ऐतिहासिक भौतिकवाद जातियों के मध्य से होकर गुजरता है। हर जातियों के मध्य अंतर्द्वंद है और एक जाति का दूसरी जाति के साथ अंतर्द्वंद्व है। भारत का ब्राह्मणवाद असमानता, छुआछूत और ऊँच-नीच की भावना पर आधारित हैं। जब आप फेसबुक को देखते हैं, वहाँ "आम्बेडकर का अवतरीकरण" पर आए कमेंट्स को पढ़ते हैं और देखते हैं कि जातियों की भावना कैसी विषाक्त होती है। दलित गरीब है लेकिन मार्क्सवाद से क्यों नहीं जुड़ना चाहता है? मेरे लेखों का विरोध करने वाला अधिकतर दलित ही है या फिर विशुद्ध ब्राह्मणवादी सवर्ण, ऐसा क्यों है?
     इस बार हिंदुत्व के नाम पर बीजेपी जीत गई। अब तो जातियों को भी धर्म के तरफ मोड़ा जा रहा है। हिंदुत्व को इस्लाम के विरुद्ध खड़ा किया जा रहा है तथा दलितों को हिंदुत्व के झंडे के नीचे लाने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। हैं तो सभी गरीब, लेकिन गरीबों को भी जाति और धर्म का नशा है। ये गरीब भी इस्लाम के विरुद्ध क्रियाशील हैं और कहीं-कहीं तो दलितों के विरुद्ध मुसलमान भी हैं। सारी कम्युनिस्ट पार्टियाँ मिलकर भी वर्ग-संघर्ष के लिए वर्गीय एकता बनाने में क्यों फेल हो रही हैं? आप को पता होना चाहिए कि दलित और परम्परावादी सवर्ण दोनों मार्क्सवाद का घोर विरोध भी करते हैं। कहा तो जाता है कि ब्राह्मण और दलित जातियां एक दूसरे के विरुद्ध हैं किंन्तु कौन सा ऐसा कामन फैक्टर है जो दोनों को मार्क्सवाद विरोध के लिए एक कर देता है? मुझे जहाँ तक ज्ञात है कि दोनों नस्लवादी हैं।
     दलित आम्बेडकर के जातिप्रथा उन्मूलन से इत्तिफ़ाक नहीं रखता है। वह जाति को मजबूत कर सत्ता प्राप्त करने में विश्वास रखने लगा है। ब्राह्मण अपने सुपेर्मेसी को त्यागना नहीं चाहता है। कम्युनिस्ट पार्टियों में ब्राह्मण सर्वहारा संस्कृति से आज भी महरूम है। खुद के बाद घर की दूसरी पीढ़ी कम्युनिस्ट नहीं हो पाई, क्या कारण है? जो हैं वो बहुत ही रेयर हैं,  इसलिए आम्बेडकर और दलितों के मध्य जाति के सवाल से टकराते हुए मार्क्सवाद के वास्तविक समझ को इनके बीच ले जाना होगा।
     बहुत साथियों की कोशिश तो यही रहती है किन्तु कुछ गैर विचारधारा के लोग प्रहार करके उलझाते रहते हैं। हम भी उनको जवाब देने के चक्कर में यह भूल जाते हैं कि इन पर हमें उतना ध्यान नहीं देना चाहिए जितना आवश्यक विचारों पर। इन्हें न आम्बेडकर साहब का ज्ञान है न मार्क्सवाद का और न ही ये साथी यह समझ पा रहे हैं कि दलितों के मध्य किन विषयों पर चर्चा की जानी चाहिए। वे आम्बेडकर के पक्ष में तर्क को भी गलत ठहराने की कोशिश करते हैं और मार्क्सवादी दृष्टिकोण को भी गलत साबित करते हैं। वे अपना दृष्टिकोण न आम्बेडकर साहब के विचारों पर स्पष्ट कर पाते हैं न मार्क्स पर। जो मैं लिख रहा हूँ वह तुरंत न दलितों को ग्राह्य है और न सवर्णों को ही। इस लिहाज से यह एक कठिन विषय पर व्यवहारिक लेख चल रहा है। जो साथी वर्तमान की आवश्यकता को नहीं समझेगा तथा डा.आम्बेडकर के सपनों, विचारों, दर्शन और सहयोगी की भूमिका को नहीं समझेगा तो वह गलती कर रहा होगा। आज दलितों का गलती करना कम से कम 100 साल पीछे चले जाना है।
     जब हम "जय भीम" कहते हैं तो उसका मतलब होता है "जातिप्रथा उन्मूलन" और जब "लाल सलाम"  कहते हैं तो उसका मतलब होता है "सम्पूर्ण क्रान्ति"। जब लाल सलाम का मतलब सम्पूर्ण क्रान्ति होता है तो प्रश्न उठता है कि जातिप्रथा उन्मूलन उसी में समाहित है फिर जय भीम की क्या आवश्यकता है? दरसल, जय भीम शब्द दलित से भावनात्मक रूप से जुड़ा शब्द है और जय भीम उसके लिए क्रान्ति का ही प्रयाय हैं। यदि दलित की भावनाओं को क्रान्ति के साथ नहीं जोड़ा गया तो वह भावनात्मक रूप से क्रान्ति से अलग रहेगा जबकि क्रान्ति दलितों के आर्थिक और मनोवैज्ञानिक शोषण के विरुद्ध अत्याधिक आवश्यक अवधारणा है। यदि दलित क्रान्ति को भावनात्मक जुड़ाव के कारण छोड़ दे तो मूल रूप से दलित वर्ग का ही नुकसान होता है इसलिए जय भीम के साथ लाल सलाम को जोड़ देने की आवश्यकता गंभीर रूप से महसूस किया गया है। इस शब्द से हमारे परम्परावादी-नस्लवादी दलित साथियों को भी परहेज है, और आरएसएस के लोगों को अत्यधिक क्रोध आ रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि "जय भीम और लाल सलाम" करने से दलित और अन्य जातियों के सर्वहारा वर्ग के आपस में संगठित हो जाने का खतरा उनको दिखता है।
      यदि ऐसा मुमकिन हो गया तो नस्लवादी कमजोर हो जाएंगे। इनके चालाक लोग यह नहीं चाहते हैं कि आम्बेडकर और मार्क्स एक स्थान पर खड़े हों। कुछ दलित साथी भी विरोध करते हैं किन्तु वे चालाकी वश नहीं करते हैं, बल्कि उनके अंदर यह भावना काम करती है कि कहीं मार्क्सवाद के आड़ में कोई हमारे साथ छल न कर ले, किन्तु यह साथियो का डर उन्हें नस्लवाद की तरफ ही ले जाता है जो देर-सबेर नस्लवाद की ही झोली में गिरता है। नस्लवाद की जीत दलितों,गरीबों,  मजदूरों और किसानों के हित में कभी भी नहीं होगा।
-आर डी आनंद

मंगलवार, 9 मई 2017

राष्ट्रवाद देशभक्ति और स्वतंत्रता

मूल्य ---50 रुपए
सम्पर्क सूत्र :मोबाइल---9450195427

रविवार, 7 मई 2017

एडवोकेट्स एक्ट 1961 में प्रस्तावित संशोधन

पिछले तीन सालों में, हम यह देख रहे हैं कि कैसे केंद्र सरकार ने विधायिका, कार्यकारी और मीडिया पर अपनी पकड़ बढ़ा दी है। उसने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम और 99 वें संवैधानिक संशोधन के अधिनियमन के माध्यम से न्यायपालिका को नियंत्रित करने के प्रयास किए। यदि सुप्रीम कोर्ट ने इसे कायम रखा, तो मोदी सरकार संविधान के सभी महत्वपूर्ण अंगों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लेगी। संविधान के खंडपीठ ने वें संवैधानिक संशोधन और एनजेएसी अधिनियम को हटा दिया, यह घोषणा करते हुए कि न्यायपालिका सरकार के प्रति "ऋणग्रस्तता के जाल" में पकड़े जाने का जोखिम नहीं उठा सकती है। मोदी सरकार बहुत गुस्से में थी और एक मंत्री सुप्रीम कोर्ट के फैसले को "चुने गए लोगों पर गैर चुने हुए लोगों के अत्याचार" के रूप में ब्रांडिंग करने की सीमा तक पहुंचे। केंद्र सरकार, तब से सुप्रीम कोर्ट के साथ सहयोग नहीं किया है, इतना ही, जस्टीस टी. एस ठाकुर, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश का गला रुंध गया था मुख्य न्यायाधीशों के सम्मलेन को सम्बोधित करते हुए जिसमें प्रधान मंत्री भी मौजूद थे, को संबोधित करते हुए कहा था कि  केंद्र सरकार न्यायाधीशों की नियुक्ति और नियुक्ति पर अंतिम नियंत्रण पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। परिणामस्वरूप, न्यायाधीशों के चुनाव और नियुक्ति के लिए ज्ञापन प्रक्रिया अवरोधित हो गई है। यह अनिवार्य रूप से सर्वोच्च न्यायालय और कार्यकारी मंडल के कॉलेजिएम्स के बीच सत्ता संघर्ष का एक स्पष्ट मामला है। अधिवक्ता अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन उपर्युक्त संदर्भ में जांच किया जाना चाहिए क्योंकि अधिवक्ता न्याय प्रणाली का हिस्सा हैं। वकालत पेशे को एक महान पेशे के रूप में वर्णित किया गया है। देश के स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने बढ़-चढ़ कर भागीदारी की है और उत्कृष्टता से लिखे संविधान तैयार करने में तथा  उसमें समतावादी सामग्री शामिल करने के योगदान की वजह से इसमें कोई अतिश्योक्ति नही है। यहां तक ​​कि भारत की स्वतंत्रता के बाद भी, कानून के सभी शाखाओं के साथ-साथ संवैधानिक कानूनों के उदाहरणों को और धनी बनाने के लिए अधिवक्ताओं ने विद्वान न्यायाधीशों के साथ मिलकर बहुत अधिक योगदान दिया है।



अधिवक्ता अधिनियम, 1961 अधिवक्ताओं से संबंधित कानून को मजबूत करने और बार परिषदों और अखिल भारतीय बार के गठन के लिए प्रदान करने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था। वैश्वीकरण के बाद से, एडवोकेट नई चुनौतियों और नई समस्याओं का सामना कर रहे हैं। जीवन के सभी क्षेत्रों में भ्रष्टाचार व्यापक हो गया है. केंद्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, कार्यकारी, न्यायपालिका, मीडिया ने भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोपों का सामना किया है। उनमें से कुछ ने जेल में कुछ समय बिताया है। हालांकि, वे सभी अपनी सामान्य गतिविधियों में वापस आ गए हैं जैसे कि जीवन में कुछ भी शर्मनाक कभी नहीं हुआ है। भारतीय समाज में एक चौतरफा गिरावट है इसने पेशेवरों को प्रभावित किया है.  सड़ांध के साथ-साथ, इससे  संबंधित मुद्दों के संबंध में समाज के लगभग सभी वर्गों द्वारा हम आंदोलन के विस्फोट को देख रहे हैं। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की उनकी शिकायत के संबंध में आकस्मिक छुट्टी पर जाने का एक उदाहरण है। डॉक्टर हड़ताल पर जाते हैं, पत्रकार हड़ताल पर जाते हैं, विधायक हड़ताल पर जाते हैं, मुख्यमंत्री भूख हड़ताल पर बैठते हैं।



हां, देश के विभिन्न हिस्सों में अधिवक्ता भी हड़ताल पर गए थे ताकि पुलिस द्वारा उन पर हमलों के विरोध में या उनकी मांगों के अनुसरण में विरोध किया जा सके। कुछ मामलों में अदालत के काम से दूर रहने वाले अधिवक्ताओं को उचित नहीं कहा जा सकता। लेकिन यह विभिन्न तरीकों से उनकी आजादी को रोकना न्यायसंगत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालय, केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे अधिवक्ताओं की बदलती जरूरतों के प्रति उत्तरदायी हों। वकील समुदाय की बदलती जरूरतों को समझने और जवाब देने के लिए सरकार द्वारा कोई ऐसा प्रयास नहीं किया गया है। वास्तव में बार काउंसिल और बार एसोसिएशन के माध्यम से प्रतिनिधित्व करने वाले अधिवक्ताओं की मांगों को शायद ही कभी उनके कल्याण से संबंधित अपनी वैध मांगों पर समय पर विचार प्राप्त होता है



यह पृष्ठभूमि में है, अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के प्रस्तावित संशोधनों का विरोध भारत के बार कौंसिल, राज्य बार परिषदों और बार एसोसिएशनों द्वारा जी जान से विरोध कर रहे हैं और वह पूरी तरह से न्यायसंगत हैं। न्यायपालिका में दोनों पीठ और बार शामिल हैं न्यायपालिका की गरिमा और प्रतिष्ठा को बनाए रखने के लिए, न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं दोनों के लिए जिम्मेदार भूमिका निभानी होती है। अधिवक्ता अधिनियम 1961 यहाँ वकालत करने वालों के आचरण को विनियमित करने के लिए है, लेकिन उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों के आचरण को विनियमित करने के लिए क्या तंत्र है? न्यायपालिका की जवाबदेही क्या है? क्या भारत के संवैधानिक इतिहास में उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के महाभियोग का कोई उदाहरण है मुद्दा यह है कि यदि उद्देश्य न्यायपालिका के मानक में सुधार करना है, तो न्यायाधीशों के आचरण का न्याय करने के लिए उनकी व्यवस्था के दौरान कुछ तंत्र होना चाहिए। पूरे तंत्र में स्थापित किया जाना है।



हम यह नोट कर सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के कई मामलों में अधिवक्ताओं के आचरण से निपटने का अवसर था। सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व कैप्टन हरीश उप्पल के मामले में (एआईआर 2003 एससी 739) सर्वोच्च न्यायालय में कहा था कि वकीलों को हड़ताल पर जाने या बहिष्कार के लिए बुलाने का कोई अधिकार नहीं है, यहां तक कि टोकन स्ट्राइक पर भी नहीं, दुर्लभ से दुर्लभ मामलों में, अखंडता और बार और या पीठ की स्वतंत्रता दांव पर लगी हो. महिपाल सिंह राणा वर्सेज  स्टेट यूपी (एआईआर 2016 एस सी 3302) के नवीनतम मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के प्रावधानों की समीक्षा करने की आवश्यकता के बारे में बताया, विशेष रूप से वकीलों की व्यावसायिक आचरण के संबंध में। इसलिए, सरकार ने कानून आयोग को मामले को संदर्भित किया।



डॉ. न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान की अध्यक्षता में भारतीय कानून आयोग ने 23.03.2017 को केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। आयोग ने सिफारिशें की हैं जो कि एडवोकेट बिरादरी पर बहुत प्रभावशील हैं। प्रस्तावित महत्वपूर्ण संशोधनों से संबंधित है

क)     राज्य बार कौंसिल के सदस्यों की संख्या में कमी

ख)    35 साल के अभ्यास के साथ तीन नामित वरिष्ठ अधिवक्ताओं का सहयोजन। गैर-उपलब्धता के मामले में, कम से कम 5 वर्षों के अभ्यास वाले अधिवक्ताओं को सह-चयन किया जा सकता है।

ग)       बार काउंसिल एक ऐसे व्यक्ति को पूर्व-नामांकन प्रशिक्षण और शिक्षा प्रदान करे, जिसने कानून पाठ्यक्रम में डिग्री प्राप्त की है।

घ)      बार काउंसिल भारतीय और विदेशी कानून फर्मों को पंजीकृत करने और ऐसी कंपनियों को विनियमित करने के लिए।

ङ)       भारत में अभ्यास करने के लिए पंजीकृत और अधिकृत करने वाले विदेशी वकीलों को विनियमित करने के लिए

च)      अनुशासनात्मक समिति का गठन जिसमें शामिल हैं.



      i)    बार काउंसिल ऑफ इंडिया अनुशासनात्मक समिति में तीन सदस्य होंगे जिनमें   सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होंगे, जो अध्यक्ष होंगे, बीसीआई से एक व्यक्ति और बीसीआई द्वारा नामांकित एक वरिष्ठ अधिवक्ता होंगे।

ii) स्टेट बार कौंसिल अनुशासनात्मक समिति में सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (अध्यक्ष), एसबीसी द्वारा नामांकित एक सदस्य और एसबीसी द्वारा नामित किए जाने वाले एक वकील या वरिष्ठ अधिवक्ता शामिल होंगे।

iii) साबित दुर्व्यवहार की गंभीरता के ठीक आनुपातिक रूप से अधिकतम 3 लाख रूपए का आर्थिक दंड और कार्यवाही की लागत।

iv) शिकायतकर्ता को अधिकतम 5 लाख रूपए के मुआवजा v) अधिवक्ता पर अधिकतम 2 लाख रुपये की विशेष और अनुकरणीय लागत लागू करें।

vi) गंभीर दुरुपयोग के आरोपों के मामले में वकील निलंबन के तहत रखा जा सकता है।

छ)     कार्य से बहिष्कार या निष्कासन पर पूरा निषेध।



जब हम उपरोक्त महत्वपूर्ण प्रस्तावित संशोधनों को देखते हैं, तो वे प्रकृति में प्रतिगामी हैं। कानून आयोग, अधिवक्ताओं के अदालतों के बहिष्कार, या हड़ताल पर जाने के कारणों की समीक्षा के बजाय  कानून आयोग  तुरंत दंडात्मक और निषेधात्मक क्षतिपूर्ति और लागत का सुझाव देता है. यह कानून आयोग से अपेक्षित नहीं था



संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों, भारतीय कानून स्नातक अपने देश में अभ्यास करने की अनुमति नहीं देते हैं, जब तक भारतीय वकील / स्नातक अपनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते। बिना किसी पारस्परिकता के, प्रस्तावित संशोधनों के साथ, विदेशी वकील सीधे भारत में अभ्यास कर सकते हैं और विदेशी कंपनियां यहां काम कर सकती हैं। यह सिफारिश करने में कानून आयोग उचित नहीं है



बीसीआई और एसबीसी ने प्रस्तावित संशोधनों का विरोध किया है। एक विरोध दिवस 31.03.2017 को मनाया गया। ये प्रस्तावित संशोधन बीसीआई और एसबीसी की स्वायत्तता को प्रभावित करते हैं। यह अधिवक्ताओं की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है



आइए हम अपनी लड़ाई को जारी रखते हैं जब तक कि इन प्रतिगामी संशोधनों को हटा नही दिया जाता है क्योंकि वकालत अपने मामलों का प्रबंधन करने के लिए सक्षम हैं।

इस तरह न्यायपालिका को बंधक बना कर पूरे न्यायतंत्र को साम्राज्यवादी शक्तियों के हाथ में सौंपने की साजिश है.

मुरलीधर
महासचिव . आईएएल

शनिवार, 6 मई 2017

*जातिप्रथा और आरक्षण*

जातिप्रथा उन्मूलन हो जाय, तो समझो हिन्दू धर्म ख़त्म हो गया। हिन्दू धर्म को जिन्दा रखना है, तो जातियों का बने रहना जरूरी है। हिन्दू धर्म में समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व आ जाय, तो फिर बचेगा क्या। यदि सभी सामान हो जाँय, तो हिन्दू धर्म का मूल दर्शन वर्ण-व्यवस्था ख़त्म हो जाएगा। यदि वर्ण-व्यवस्था ख़त्म हो जाएगा, तो ब्राह्मण की सर्वोच्चता ख़त्म हो जाएगी। क्या ऐसा संभव होने दिया जाएगा कि ब्राह्मण की सर्वोच्चता ख़त्म हो जाय? यदि नहीं, तो जातियों को कभी भी ख़त्म नहीं होने दिया जाएगा।
     ब्राह्मणवाद शब्द अनुचित है। ब्राह्मणवाद कहने से एक साधारण ब्राह्मण भी उसका अर्थ ब्राह्मण ही लगाता है और संगठित होने लगता है। हम जितना ही ब्राह्मणवाद-ब्राह्मणवाद उच्चारित करेंगे, ब्राह्मण हमारे विरुद्ध तो संगठित होगा ही, अन्य सवर्णों और ओबीसी को भी हिन्दू के नाम पर संगठित कर हमें कमजोर करेगा।            
     बाबा साहब ने जातिप्रथा उन्मूलन के लिए कहा था। हमें जातिवाद शब्द का प्रयोग कर उनके प्रतिक्रियात्मक क्रोध को कम करना पड़ेगा। जातिप्रथा उन्मूलन से ब्राह्मण जातियाँ भी विरोधात्मक रुख नहीं अपनाती हैं, बल्कि बहुत से लोग हामी भरकर जाति तोड़ने की बात भी स्वीकारते हैं, जिससे वर्ग की एकता कायम होगी और जाति विहीन भारत का मार्ग प्रशस्त होगा।
     आरक्षण ख़त्म कर दो। मुझे जाति के बदले आरक्षण नहीं चाहिए। मैं जानता हूँ यह बैशाखी अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए बहुत बड़ी कायरता के रूप में कार्य कर रही है। जिस दिन दलित कहा जाने वाला यह वर्ग आरक्षण विहीन हो जाएगा, इसके पास जुझारू आंदोलन के सिवा कोई विकल्प नहीं बचेगा। तब इसकी कायरता ख़त्म होगी और यह अपने वास्तविक हक़ के लिए संघर्ष करेगा। जरूर संघर्ष करेगा और ईमानदारी से संघर्ष करेगा। यदि फिर भी संघर्ष नहीं करेगा, तो मरेगा। पुनः दास बनकर सेवा करेगा।
     नहीं, मैं किसी को खुश करने के लिए ऐसा नहीं लिख रहा हूँ, बल्कि, दलित वर्ग की जाहिलियत, स्वार्थी और कायरपना को निजात दिलाने के लिए उसकी आँखें खोलने के लिए लिख रहा हूँ। यह वर्ग जातिवाद का सारा इल्जाम ब्राह्मणों पर लगाता है, परन्तु अपनी जाति का प्रमाण-पत्र खुद ही बनवाकर धोबी-चमार-पासी होने का सबूत देता है। आखिर कैसे लड़ेगा जातिवाद से? जातिप्रथा तोड़ने के लिए सबसे पहले पहल कौन करेगा? जो नीचता का बोध करता है वही तो अपनी जाति को तोड़ेगा। फिर बाद में सवर्णों की जाति तोड़ने अथवा उन्मूलन का सवाल उठता है। जब तक आरक्षण रहेगा, दलित जातिप्रथा उन्मूलन का संघर्ष नहीं करेगा। एक हद तक दलित जातियाँ कायर हो चुकी है। मैं जानता हूँ आरक्षण होने की वजह से ही मुझे नौकरी मिली है। काश! ऐसा न हुआ होता, तो आज सवर्णों का चुभता हुआ ताना न सहना पड़ता। जिस दिन रोटी, कपड़ा और मकान का सवाल पैदा हुआ, उस दिन दलितों के सम्मुख जीने-मरने का सवाल भी पैदा हो जाएगा। उस दिन नीव की ईंट हिल जाएगी। फिर भी, जोश नहीं आया, तो गुलामी सिद्ध है।
     जिन्हें अपनी नींव की ईंट हिलवानी होगी, वो आरक्षण ख़त्म कर देंगे।
     क्यों डर रहे हैं? इनकी मजाल नहीं की आरक्षण ख़त्म कर दें। हाँ, डरेंगे, लड़ेंगे नहीं, तो आरक्षण जरूर ख़त्म हो जाएगा। एक बात बताइए, आप को आरक्षण चाहिए कि सम्मान? आरक्षण चाहिए, तो कैसे जाति की लड़ाई लड़ेगे? फिर, क्यों ब्राह्मणवाद-ब्राह्मणवाद चिल्लाते हैं? क्यों जाति का दोष ब्राह्मणों पर मढ़ते हैं? यदि जातिवाद की लड़ाई लड़नी है तो आरक्षण छोड़ना पड़ेगा, जाति-प्रमाण-पत्र बनवाना छोड़ना पड़ेगा। सम्मान का एक पल का जीवन गुलामी के हजारों वर्षों के जीवन से बेहतर होता है।
     आरक्षण पर मैं आप से पहले भी बात कर चुका हूँ। आरक्षण न जाति आधारित होनी चाहिर और न आर्थिक आधार पर। सिर्फ नौकरियां बढ़ाई जाँय और सब को शिक्षा सब को काम का प्रावधान किया जाय।
     15 लाख दलित नौकरी कर रहे हैं जिससे 3 करोड़ दलित खा-पी रहा है। 27 करोड़ निरक्षर है। न खेत है, न मजदूरी। वह खेत मजदूर है। उसके लिए आरक्षण से कौन सा फायदा दिलवा रहे हैं? क्या प्रतिनिधित्व का आधार वह तय नहीं करता है, फिर कहाँ गया उसका उचित हिस्सा? उसकी रोजी-रोटी के लिए दलित और संविधान क्यों चुप हो जाता है? उन गरीबों के लिए भी सोचिए कि क्या उन्हें ये आरक्षण और संविधान कुछ दे सकता है? खाया-अघाया दलित चिंतित हो जाता है कि यदि उसका आरक्षण ख़त्म हो गया, तो उसका क्या होगा। जो यहाँ तक आरक्षण के सहारे पोजीशन तैयार किया है,पल भर में बालू की भीत की तरह ढह जाएगा और पुनः उन दलित गरीबों के मध्य जाना और रहना पड़ सकता है जो निरक्षर और गरीब हैं, प्रतिदिन 20/- खर्च करने भर को ही कमा पाते हैं। यह अर्जुन सेन कमिटी की रिपोर्ट है। ऐसा मैं नहीं लिख रहा हूँ।
     मैं यही चाहता हूँ कि छीनने का माद्दा पैदा करो। बैशाखी पर कब तक चलोगे। यह सही है कि आरक्षण न होता, तो मुझे शायद नौकरी क्या शिक्षा भी न मिली होती। किन्तु, अब तो 3 करोड़ दलित पढ़े हैं। 3 करोड़ ब्राह्मण भी पढ़ा-लिखा है। आंदोलन इतना तीव्र करो कि संविधान को अपने (गरीबों) अनुकूल बदल दो। समता, स्वतंत्रता और बंधुत्व को ला दो। आरक्षण डा.आम्बेडकर का त्रिसूत्र कभी नहीं दिला सकता है।
     डा.आम्बेडकर आरक्षण नहीं चाहते थे। वह पृथक निर्वाचन चाहते थे। गांधी जी के आमरण अनसन की वजह से डा.आम्बेडकर को पूना पैक्ट कर मजबूरन आरक्षण स्वीकार करना पड़ा। यदि पूना पैक्ट न हुआ होता,तो क्या आरक्षण मिलता? फिर क्या होता? तो क्या दलितों को नौकरियां न  मिलतीं? दलित उस समय क्या करता?
     पृथक निर्वाचन अच्छा है अथवा आरक्षण? यदि पृथक निर्वाचन अच्छा है, तो हमें आरक्षण के बदले पृथक निर्वाचन की जोरदार माँग उठानी चाहिए। उसके लिए पुनः संघर्ष करना चाहिए। उस समय डा.आम्बेडकर अकेले थे, इस समय 3 करोड़ दलित पढ़े-लिखे हैं। कुर्बानी दे सकते हैं। यदि अपने ही गरीब भाइयों के पेट पर लात मार कर  आरक्षण पर ही गुजारा करना है, तो मुझे दलित समाज से कुछ नहीं कहना है।
     आप ने मेरे सही मर्म को समझ लिया है और लोगों को समझाया भी, किन्तु सुविधा संपन्न दलितों को सम्मान नहीं आरक्षण चाहिए। अपने भाइयों के लिए न रोटी, कपड़ा, मकान की बात करते हैं, न आरक्षण की सुबिधाओं की। और सच ये है कि इन्हीं की बदमाशियों का परिणाम होता है कि दूर-दराज में गरीब दलितों की सवर्णों द्वारा प्रतिक्रिया स्वरूप पिटाई होती रहती है।
-आर डी आनंद

*क्या करें क्या न करें*


     मैंने तो 2007 में एक लेख "बसपा का घटता जनाधार" लिखकर स्पष्ट कर दिया था कि सुश्री मायावती जी का जनाधार गिर रहा है और अगला दसक उनका आखिरी दसक होगा। बस दुखद ये है कि ये बहुजन का भी वह दसक है जो इसे घोर कठिनाइयों में घसीट रहा है। इसके बाद, यह दसक डा.आम्बेडकर के क्रांतिकारी मूल विचारों को भी वाट लगाने का प्रारंभिक वर्ष है।
     अब जातिप्रथा उन्मूलन शब्द का उच्चारण करना होगा। ब्राह्मणवाद शब्द कहना-लिखना दलितों-बहुजनों-मूलनिवासियों को बंद करना पड़ेगा। इस शब्द के उच्चारण से ब्राह्मण वर्ग अपने को अधिक गोलबंद करने में सफल हुआ है और दलितों पर इल्जाम आसानी से मान लिए जाने लगे हैं। इस शब्द की प्रतिक्रियात्मक शक्ति रक्तबीज की तरह बढ़ जाती है और दलित बलहीन-मतहीन-वोटहीन होता जाता है।
     जातिप्रथा के दोष को बता कर दलित सवर्णों को भी कन्विंस कर सकता है, यह कि हम सब के जाति के नेता अपने वोट ध्रुवीकरण के लिए हमारा प्रयोग तो करते हैं किन्तु हमारे बच्चों के शिक्षा, रोजगार, आवास, मेडिकल, हमारी आवश्यक आवश्यकताओं को बिल्कुल ध्यान नहीं रखते हैं। हम उन्हें चुनते हैं, बस हमारा उतना ही अधिकार व हित है।
     हमारे जाति ध्रुवीकरण को भय के रूप में प्रोजेक्ट करके अन्य जातियों को भयभीत करने के लिए प्रयोग में रखते हैं। और, ऐसा हर जाति के नेता सत्ता में आने पर करते हैं।
     वास्तव में, सत्ता पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमिटी होती है और सत्ता का मुखिया उसका मैनेजर।
     ऐसी स्थिति में सिर्फ और सिर्फ एक बात ही काम की हो सकती है कि हम संसदीय लोकतंत्र के दौरान ईमानदारी और वैचारिक क्राँति के द्वारा बहुजन वैचारिक रूप से ईमानदार होकर चुनाव के लिए सक्षम, ईमानदार और चरित्रवान नेता पैदा करे, उसे जिताए, और बारगेनिंग की शक्ति प्रदान करे। किन्तु उस खतरे के लिए भी विमर्श करते रहें जो सत्ता में आए हुए संत्री-मंत्री पर अंकुश रख सके। नहीं तो वही सब घटेगा जो आज बसपा के साथ घटा है।
    किन्तु मैं संसदीय राजनीति को सिर्फ बहुजन को मजबूत करने तक ही उचित मान रहा हूँ। जैसे ही बहुजन मजबूत हो,  बिना किसी हीलाहवाली के उसे इस संविधान को बहुजन लायक बनाने के लिए क्राँति करनी होगी, क्योंकि संसदीय राजनीति में बहुमत दल सुन्दर से सुन्दर मानवहित के शर्तों-सिद्धांतों को बदल देता है। केवल नया संविधान ही मानव हित-बहुजन हित की रक्षा का प्रबंध कर सकता है।
     एक और अंतिम बात यह कि ऐसा हम सिर्फ दलितों के लिए ही नहीं कर रहे होते हैं, बल्कि सवर्णों के लिए भी हम शोषण विहीन मूल्यों को स्थापित करेंगे। हाँ, जातिप्रथा उन्मूलन की लड़ाई शुरू तो दलित करेगा, परन्तु फ़ाइनल दलित नहीं करेगा। फ़ाइनल करने के लिए हमें हर जातियों के क्रांतिकारी लोगों को साथ में लेना पड़ेगा। यहाँ भी बहुजन अथवा सर्वहारा संस्कृति के बात को नहीं भूलना चाहिए। सांस्कृतिक क्रांन्ति लगातार चलना पड़ेगा। सभी जातियों के क्रांतिकारी लोगों को माफ़िया-बाहुबलियों-गुंडों-जाति
वादी नेताओं-पूँजीपतियों और अपने जाति-धर्म के विरुद्ध जुझारू संघर्ष करते रहना पड़ेगा।
     बसपा को तो 22 प्रतिशत वोट मिले हैं। ऐसा नहीं कह सकते हैं कि आप के लोगों ने वोट नहीं दिया है, किन्तु दूसरों के वोट लेने से आप वंचित रहे और यह आप की नपुंसकता के कारण नहीं हुआ है बल्कि वैचारिक कमजोरी की वजह से हुआ है। सुश्री मायावती जी के माफ़िया ब्राह्मणों को साथ लेने की वजह से हुआ है। ऐसे ब्राह्मणों को साथ लेने की वजह से हुआ है जो दलितों को राजनैतिक हरवाह बनाने के लिए खुली छूट पा गए। हमारे नेता पैदा होने से रोक दिए गए। ऐसा इस नाते हुआ कि सुश्री मायावती ने सभी 403 विधानसभा सीटों पर बीएसपी कैंडिडेट्स के जातिगत आंकड़े अनाउंस किए थे। इसमें 87 (21%) दलित, 97 (24%) मुस्लिम, 106 (26%) ओबीसी और 113 (28%) (ब्राह्मण 66, ठाकुर 36, बनिया-वैश्‍य-कायस्‍थ 11) सवर्ण कैंडिडेट्स शामिल हैं। बसपा का अब तक का गणित यही रहा है कि दलित और मुस्लिम एकजुट होकर अगर उसके पक्ष में वोट करते हैं तो दूसरे दलों को परेशानी उठानी पड़ सकती है। उत्तरप्रदेश में करीब 19 फीसदी मुस्लिम और 22 फीसदी दलित हैं। वहीं, कुल 54 फीसदी पिछड़ी जाति का वोट बैंक है। 70 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्‍लिमों की संख्या 20 फीसदी से ज्‍यादा है। ईस्ट यूपी की 20, वेस्ट यूपी की 10, सेंट्रल यूपी की 5 और बुंदेलखंड की एक सीट पर मुस्लिम वोटर्स की संख्या 55 से 60 फीसदी है। सुश्री मायावती जी 22.5 प्रतिशत दलित मत और 19 प्रतिशत अल्पसंख्यक मत तथा कुछ सवर्ण और कुछ ओबीसी तथा अन्य ओबीसी को मिलाकर जीत का पक्का हिसाब जोड़ रखी थीं।
    भारत में 24.39 करोड़ परिवार में रहते है। उनमें से 17.91 करोड़ परिवार ग्रामीण इलाकों में रहते है। अनुसूचित जाति-जनजाति के 3.86 करोड़ परिवार, यानी 21.53 प्रतिशत ग्रामीण भारत में रहते है। 2.37 करोड़ (13.25 प्रतिशत) ग्रामीण एक कमरें मे रहते है और उनके घर के छप्पर और दीवारें पक्की नही हैं। 65.15 लाख ग्रामीण परिवारों में 18.59 वर्ष आयु वर्ग के पुरुष सदस्य नहीं हैं। 68.96 लाख परिवारों की प्रमुख महिलाएं हैं। 5.37 करोड़ (29.97 प्रतिशत परिवार भूमिहीन है व मजदूरी करके जीते है। 17.91 करोड़ परिवारों में से 3.3 करोड़ यानी 18.46 प्रतिशत परिवार अनुसूचित जातियों से हैं तो 1.9 करोड़ (10.97 प्रतिशत) अनुसूचित जनजातियों के। अनुसूचित जाति के 1.8 करोड़ (54.67 प्रतिशत) परिवार भूमिहीन हैं और आदिवासियों के 70 लाख यानी 35.62 प्रतिशत। अनुसूचित जाति और जनजाति को शैक्षणिक संस्थानों और नौकरियों में आरक्षण होते हुए भी 3.96 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 4.38 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति के लोग ही नौकरी में हैं। सार्वजनीक क्षेत्र की नौकरियों में अनुसूचित जाति यों की भागीदारी 0.93 प्रतिशत है जबकि अनुसूचित जनजाति की 0.58 प्रतिशत है। निजी क्षेत्र की नौकरियों में अनुसूचित जातियों की भागीदारी 2.42 प्रतिशत है तो अनुसूचित जनजाति का 1.48 प्रतिशत है।
ग्रामिण भारत में रुपये 5000 प्रतिमाह में जीवन जीने वाले अनुसूचित जाति के 83.53 प्रतिशत परिवार हैं और अनुसूचित जनजाति के 86.56 प्रतिशत। शेष लोगों में 5000 रूपये में बसर करने वाले परिवार 74.49 प्रतिशत हैं। 0.46 प्रतिशत अनुसूचित जाति, 0.97 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति तथा 2.46 प्रतिशत शेष परिवारों के पास चार पहिया गाडिय़ां हैं। नौकरियों में भागीदारी का निम्न विवरण है :
ऊंची जाति: ७६.८%
ओबीसी:   ६.९%
अनुसूचित जाति:  ११.५%
अनुसूचित जनजाति: ४.८%  
जब तक इन बिंदुओं पर चर्चा-परिचर्चा नहीं होगा, तब तक आप न दलित हित में कुछ कर पाएंगे और न सवर्ण के गरीबी का कोई अनुमान लगा पाएंगे। वैसे तो सवर्ण हर जगहों पर अधिक कब्ज़ा करता हुआ दिखता है किन्तु वास्तविक मूल्याङ्कन यह नहीं है। वास्तविक मूल्यांकन में खोज का विषय यह है कि कितने सवर्ण गरीब है जिनको कोई भी सवर्ण नेता कुछ नहीं देता है, न राजनैतिक रूप से न आर्थिक रूप से। जबकि सामाजिक सर्वोच्चता का मुकुट पहना कर उनका दोहन बिना चारा-पानी दिए करते रहते हैं। और, गरीब दलिरों का आंकड़ा देखकर सक्षम दलितों को और बसपा सुप्रिमों सुश्री मायावती को ईमानदारी से गरीबों के उत्थान के लिए योजनाएं बना कर चुनावी रणनीति तैयार करनी चाहिए।
-आर डी आनंद

साम्यवादियों अब क्या होगा

    लाल सलाम क्या है? लाल सलाम क्रांतिकारी अभिवादन है। कोई व्यवस्था जब मनुष्यों का शोषण चौतरफा करने लग जाती है तो उसे बदल देना नितांत आवश्यक हो जाता है। कुछ लोग यह जिम्मेदारी उठाते हैं तो अपने साथियों में प्रेरणा भरने के लिए लाल सलाम करते हैं। जैसे हिन्दू-जयराम, श्रीराम, सीताराम, जयश्रीकृष्ण, राधे-राधे, मुसलमान-अस्सलाम वालेकुम, आंबेडकरवादी-नमो बुद्धाय, जय भीम, देश के रक्षक-जय हिन्द, देश के आजादी आंदोलन के समय आंदोलनकारी-भारत माता की जय, बंदेमातरम् इत्यादि करते हैं। कम्युनिष्ट के अभिवादन का तरीका लाल सलाम होता है।
    प्रश्न है सिस्टम नष्ट कैसे किया जाय? सिस्टम नष्ट करने में कौन-कौन हमारे शत्रु हैं और कौन दुश्मन? इन्हें चिन्हित करना पड़ेगा। इस सिस्टम के बाद कौन सा सिस्टम लागू किया जाय? राम के समय में राम राज की कल्पना की गई किन्तु वह सामंती व्यवस्था थी और उसी को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी स्वीकार किया जो कई दूसरे वर्गों के लिए उचित नहीं होगा। पूँजीवाद वर्तमान में चल रहा है। साम्राज्यवाद पूँजीवाद का ही विकृत रूप है जो भूमंडलीकरण के बहाने एकाधिकारी पूँजी को जन्म देकर पल्लवित-पोषित कर रहा है। इस व्यवस्था में दुनिया के 100 लोगों के पास पूरी संपत्ति का 99 प्रतिशत है तथा 99 प्रतिशत लोग 1 प्रतिशत में गुजर-बसर कर रहे हैं। कुछ लोगों के पास ऐसो आराम बाकी मुफ़लिसी और बदहाली की जिंदगी जिएंगे। समाजवाद नेहरू और आम्बेडकर का सपना था किन्तु वे सरकारी तौर पर उसे लागू करना चाहते थे जो बहुमत होने नहीं देता है। बचा तानाशाही, अब बड़ाई तानाशाही से सभी डरते हैं। साम्यवाद में है सर्वहारा की तानाशाही अर्थात बहुमत की तानाशाही। जो बहुमत के नियंत्रण में रहेगा। आप को ओशो पसंद हैं किन्तु ओशो ने भी कोई व्यवस्था नहीं दी है जिस पर राजकीय व्यवस्था चलाया जा सके। कोई व्यवस्था सोचिए फिर उस पर कार्य किया जाय जिससे कम्युनिस्ट का अत्याचार न हो, मारकाट न हो। जनमत क्या है?
     मानवता का विकास ही वर्ण संकरता पर आधारित है। यह गाली नहीं है। गाली लगती जरूर है। गंदे खून के नाते कोई गन्दा नहीं होता वर्ना पूरा रामायण और महाभारत काल के वीर और बुद्दिजीवी सब के सब वर्ण संकर हैं। वर्ण संकरता ही है जो मनुष्य को अपंग होने से बचाता है। रोगी होने से बचाता है। अंधे होने से बचाता है। यह तो खून की सुद्धता है जो अधिक बइमान है। एक ही खून में शादी-ब्याह करिए, देखिए कितनी कमीनी प्रजाति पैदा होती है। ये जो अधिक गंदे लग रहे है, ये शुद्ध खून का नतीजा है। गड़बड़ियां विचारों की भौतिक परिस्थितियों में है।
     जय भीम। आप पढ़ते भी हैं और उसे अपने दिल पर भी लेते हैं। दोनों ही स्थितियों में ईमानदार हैं। संस्थागत कमियों के कारन हम लोग क्रियागति परिणति तक नहीं पहुँच पाते हैं। अभी कोई ऐसी पार्टी नहीं है जो क्रान्ति के लिए तैयार हो। सर्वहारा संस्कृति व भीम संस्कृति का आभाव है। क्रान्ति के लिए जनगण में एकरूपता नहीं बन पाई है। क्रान्ति के लिए क्रन्तिकारी सिद्धांत और पार्टी की आवश्यकता है। नौकरी की स्थिति में हम लोग बहुत एक्टिव होकर पार्टिसिपेट नहीं कर सकते हैं। जितना कर सकें उतना प्रयाप्त है।
    अब क्राँति की जरूरत नहीं है। जनता का विश्वाश मोदी में जम गया है, अब मोदी समाजवाद लाएंगे। मोदी के समाजवाद से सभी को खुश रहना सीखना होगा। जो क्राँति की बात करेगा वोलार दिया जाएगा। क्राँति में खून बहता है इसलिए मोदी साहब नहीं चाहते हैं कि गरीब खून बहाए। देश-राष्ट्र का विकास होगा तो गरीबों का भी विकास होगा, गरीबी का भी विकास होगा। अब साम्यवादी बदमाशी न करें। बदमाशी करेंगे तो ओलारे जाएंगे। साम्यवादियों के दुर्दिन शुरू। अब भी संभल जाओ साम्यवादियों, समय है। फिर न कहना कि मोदी साहब ने समझाया नहीं।
    वैसे भी दलित आम्बेडकर वाली कुछ कर नहीं रहा था। अपनी ढपली-अपनी राग अलाप रहे हैं। जातिप्रथा उन्मूलन के बजाय जाति को दलित मजबूत कर रहा था इसलिए आम्बेडकर दलितों के लिए बेकार हो चुके थे। बहन मायावती ने जाति का ध्रुवीकरण किया। दलित ने उनको सत्ता का स्वाद चखाया परन्तु माया बहन को समाज और आम्बेडकर कम दिखे। उन्हें सत्ता और सर्वजन के गुंडे ही समझ में आए। जनता ने सोचा जब मेरी भी सरकार गुंडों की सरकार है तो किसी की भी सरकार बने, क्या हर्ज है। कोउ होय नृप हमें का हानी।
    और ये कम्युनिस्ट एक हो ही नहीं सकते है। किसी को मार्क्स, किसी को लेनिन, किसी को स्टालिन, किसी को माओ, किसी को विनोद मिश्रा, किसी को कानू सान्याल, किसी को चंद्र शेखर, किसी को चाओ मजूमदार पसंद हैं तो फिर मार्क्स का द्वंद्वात्मक भौतिकवाद और वर्ग-संघर्ष का फार्मूला पर किसी को एक मत होना नहीं है। वर्गीय एकता बनाने से कोई मतलब नहीं। चिंतन की एकरूपता से कोई मतलब नहीं। जनवादी केन्द्रीयता से कोई मतलब नहीं। ऐसी स्थिति में मोदी जी का समरसतावाद और बीजेपी अच्छा है।
    जनता खुश है कि देश से काला धन मोदी ने ख़त्म कर दिया। आप इस बात को समझो या न समझो, जनता ने इस बात को समझा, माना और वोट दिया। आप के समझने से क्या होता है। आप जनता को बेवक़ूफ़ कहते रहो। मोदी पर इलज़ाम लगते रहो। फासीवाद की आहट सुनते रहो, क्या मतलब?
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आर डी आनंद

हम क्या करें



     बहुत जरूरत है कि आलोचना के तुरंत बाद सही क्या है बताना और उसके प्रैक्टिकल रूप को सुझाना जिससे लोग निराश न हों और आशापूर्ण क्रांतिकारी कार्यक्रम के मसौदे पर सामूहिक कार्यवाही हो सके तथा इससे पूर्व वैचारिक एक रूपता और वर्गीय एकरूपता पर कार्य किया जाना अति अनिवार्य है। आलोचनाएं तो होती ही रहेंगी। यह तो सतत प्रक्रिया में होना चाहिए। आलोचना की प्रकिया से दूर रहने की वजह से कई पार्टियाँ बिखर जाती हैं।
     एक दिन फेसबुक पर मेरे एक आलोचक ने मेरे एक लेख पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि यदि डा.आम्बेडकर किसी ब्राह्मण के घर पैदा हुए होते तो आज उनकी पूजा होती। प्रत्योत्तर में मैंने कहा कि यही तो डर है कि आज डा.आम्बेडकर को विष्णु का 28वां अवतार घोषित कर 126 लीटर दूध से अभिषेख किया जा रहा है। यह उनको देवता बनाने की साजिश है। जिस दिन आम्बेडकर पूजा की वस्तु हो जाएंगे, उनके विचार अँधेरी कोठारी के हवाले कर दिया जाएगा। दलित बाबा साहब बाबा साहब रटता हुआ कौआ हो जाएगा। इसलिए बाबा सहन को पूज्य मत बनाइए। उनके पुस्तकों का अध्ययन कीजिए और विमर्श कीजिए। जो जरूरी हो उस पर आंदोलन तेज कीजिए और जो समय सापेक्ष निरर्थक हो चुका है, बिना मोह त्याग देना चाहिए। यह नहीं कि यह तो मेरे बाबा साहब ने लिखा है इसलिए हम इसे भी सत्य मानते हैं। टीबी की दवा के स्थान पर उसी कम्पनी के कैंसर की दवा खाएंगे तो मृत्यु निश्चित है। लेकिन, दलित है कि ब्राह्मणों सदृश्य झूठी बातों पर भी अड़ा रहता है। दलित साथियों की सोच बहुत ही मकैनिकल होटी जा रही है। सर, मेरे वाल पर मैंने कई लेख-विमर्श पोस्ट कर रखा है। हो सके तो जरूर पढ़ लीजिएगा। कार्टून वाली बात का अंदेशा दलितों का यही है कि जवाहर लाल जी का हण्टर डा.आम्बेडकर पर तना है जबकि ऐसा नहीं है। जब यह बात चर्चा में आई थी मैं लोगों से यही बता रहा था कि हण्टर समयावधि पर है न कि बाबा साहब पर। पर दलित है उसका दृष्टिकोण है। क्या किया जाय।
     जाति और धर्म को आधार बनाकर संगठन खड़ा करने वाले और आंदोलन के लिए इनका आह्वान करने वाले जनता को धोखा दे रहे हैं। वे किसी भी जाति-धर्म के संगठन और लोग क्यों न हों।
     जाति और धर्म का नाम लेकर संघर्ष की शुरुआत करने वाले सर्वप्रथम अपने लोगों को गुमराह करते हैं और उन्हीं का शोषण भी करते हैं। उन्हें टूल्स के रूप में प्रयोग करते हैं।
     ऐसे लोग गैर जाति और धर्म के अनुयायियों को दुश्मन करार देते हैं जिससे हर जाति और धर्म के गरीब लोग अपनी गरीबी की लड़ाई के लिए कभी एकमत व एक नहीं हो पाते हैं।
     हर जाति और धर्म के ईमानदार लोगों का कर्तव्य है कि वे अपने जाति व धर्म के ऐसे लोगों से आम-अवाम को जागरूक करें और उनकी आवश्यक आवश्यकताओं की लड़ाई की अगुवाई भी करे।
      इसके लिए आप को यह भी जानना होगा कि किसी भी देश की मिलिट्री और पुलिस पूँजीपतियों की सुरक्षा की सशस्त्र गुंडावाहिनी होती है। देश की सुरक्षा के नाम पर अमीरों की सुरक्षा करते हैं। गरीबों की सुरक्षा के अगुआ दस्ते को सर्वप्रथम पुलिस और मिलिट्री से ही मुठभेंड होता है। पुलिस, मिलिट्री और गरीब एक ही वर्ग के हैं किन्तु इनको गरीबों के पक्ष में लड़ने वालों के विरुद्ध लड़ाया जाता है। उम्मीद है आप बेहतर समझ गए होंगे।
     पूँजीवाद और पुरुष प्रधानता के कारण यह लिंग भेद है और पुरुष प्रधानता स्त्रियों पर हर उत्तराधिकार थोपते रहते हैं किन्तु अनेक स्त्रियों ने पुरुष द्वारा थोपी किसी नियम-नियमावली को नहीं माना। उन्होंने चूड़ी, कंगन, बिंदिया, किसी प्रकार के गहने, काजल, एब्रो, पलक, झुमका, कील, नथनी, मंगल सूत्र, साड़ी-ब्लाउज पहनना बंद कर दिया। लम्बे-लम्बे बाल रखना बंद कर दिया। पुरुषों के द्वारा वर्जित अंग-प्रत्यंगों को अपने अनुसार सजाना-सवारना शुरू कर दिया है।
     संस्कृति शब्द बहुत ही भ्रामक और पुरातन हो चुका है। सती प्रथा, बाल-विवाह, घूँघट-प्रथा, स्त्रियों को पुरुषों के बाद भोजन ग्रहण करना, बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापा में बेटों पे आश्रित रहना, पुरुषों के सम्मुख कोई भी निर्णय न लेना, साड़ी-ब्लाउज में ही रहना, बड़े बाल रखना, सिंगूर खूब गहरा लगाना, पति के लिए भरपूर सजना और सिंगार करना,घहनों को धारण करना, घर के भीतर रहना इत्यादि भारतीय स्त्रियों की संस्कृति है। यही स्त्री का शोषण भी है। यही पुरुष प्रधानता भी है। अब संस्कृति के नाम पर स्त्री शोषण स्वीकार है तो सवाल बेकार है। स्त्री मुक्ति का आंदोलन बेकार है। संस्कृति मनुष्य के विकास के लिए होना चाहिए, मनुष्य को गुलाम बनाने के लिए नहीं। हालांकि हमारी स्त्रियों ने संस्कृति और सनातन धर्म के नाम पर खुद ही पुरुष प्रधानता के विष को अपने अंदर धारण किए हुए हैं। ऐसी स्थिति में वास्तविक स्त्री मुक्ति नामुमकिन है।
     यह मेरे निजी विचार हैं। जरूरी नहीं कि आप मुझसे सहमत हों। पर मैं स्त्री मुक्ति आंदोलन में हमेशा आप के साथ हूँ।
(१) लोग इस बात का सर्वे कर रहे हैं कि भाजपा क्यों जीती? या इस विषय पर कि सपा और बसपा क्यों हारी? पर इस बात का सर्वे क्यों नहीं किया जा रहा कि कम्युनिस्ट राजनीति क्यों फेल हो गयी? क्यों वह इस देश को राजनीतिक विकल्प नहीं दे पा रही है?
(२) हम बार बार उन्हीं लोगों के बीच में बोलते हैं, जो पहले से वाम विचारों के हैं. हम उनसे जो भी बोलते हैं, उसे वे पहले से ही जानते ही हैं. फिर क्या जानकारों के बीच बोलकर हम अपना समय और ऊर्जा बर्बाद नहीं कर रहे हैं?
(३) यहाँ मौजूद जितने भी कामरेड और सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं, वे अपने घर में अकेले ही हैं दूसरा कोई भी उनके घर में न कामरेड है और न सामाजिक कार्यकर्त्ता है जब आप अपने बच्चो को कामरेड और सामाजिक कार्यकर्त्ता बना ही रहे हैं, तो कैसे आप आरएसएस और भाजपा को भगा देंगे?
(४) आप अपनी विचारधारा को उन दलितों के बीच क्यों नहीं लेकर जा रहे हैं, जो हिन्दूकरण के शिकार हो रहे हैं, और डा. आंबेडकर को पूजा की वस्तु बनाये हुए हैं?
1)जुझारूपन का मतलब है कि लोग अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हजारों में शहीद होने की महत्वाकांक्षा रखते हों।
2)हमारे अंदर Uniformity of thinking   नहीं है।
3)हमारे अंदर Singleness of propose नहीं है।
4)हमारे अंदर Oneness in approach नहीं है।
4)32 लाख अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग नौकरी कर रहे हैं, किन्तु बाबा साहब की 21 खण्ड पुस्तकें मात्र रु.750/- में है-को खरीदकर नहीं रखते हैं।
5)जिनके पास बाबा साहब की पुस्तकें हैं उनमें से कुछ लोग ही उसको पढ़ाते हैं।
6)कोई बसपा का है।
7)कोई बीएमपी का है।
8)कोई बौद्धिस्ट है।
9)सब के अलग-अलग विचार हैं।
10)बाबा साहब जातिप्रथा उन्मूलन की बात करते थे। एक व्यक्ति का एक मूल्य स्थापित करना चाहते थे।
11)अब लोग अपनी-अपनी जाति को मजबूत कर रहे हैं।
12)न सामूहिक उद्देश्य है और न सामूहिक प्रयास।
13)बाबा साहब राष्ट्रीयकरण की बात कर रहे थे। हम निजीकरण में आरक्षण मांग रहे हैं।
14)बाबा साहब राजकीय समाजवाद को संविधान में लागू करवाने का सन्देश दे गए हैं। हम व्यक्तिगत संपत्ति के लिए खड़े हैं।
15)बाबा साहब "Who were Shudras?" में लिखा है कि आर्य एक प्रजाति नहीं है। आर्य एक भाषा है। इस भाषा को बोलने वाले लोग आर्य कहलाए।
16)बाबा साहब ने ब्राह्मणों को भी इसी देश का मूलनिवासी लिखा है। आज हम उन्हें आर्य कह रहे हैं। उन्हें युरेशियन ब्राह्मण कह रहे हैं।
17)हम उनका DNA प्रमाणित कर कह रहे हैं कि उनके खून की शुद्धता बनी है।
18)तथाकथित मूलनिवासियों में कोई भी अपना खून परीक्षण करवाकर यह नहीं सिद्ध कर रहा है कि मैं शुद्ध मूलनिवासी हूँ।
19)हम विभिन्न दृष्टिकोण में विभक्त हैं।
20)हमें दलितों (मूलनिवासी, अनु.जाति-जनजाति, ओबीसी एवं कनवर्टेड अल्पसंख्यक) में उद्देश्य की एकरूपता बनानी होगी फिर युद्ध करना होगा।
21)गांधीवादी अहिंसा व आंबेडकरवादी अहिंसा से काम नहीं चलेगा।
22)क्रान्ति में हम खून नहीं चाहते किन्तु अनिवार्य रूप से खून बहेगा।
     आप के मांगने से कुछ भी मिलने वाला नहीं है क्योंकि निजी कम्पनियाँ कभी नहीं चाहेंगी कि उनके यहां कोई लफड़ा हो। वे जहां सस्ता श्रम मिलेगा, क्रय  कर लेंगी। भारत में श्रम की कमी है नहीं। आप मांगते रहों चाहे जायज या नाजायज। बिना लड़े कुछ नहीं मिलेगा। क्या हममें दम नहीं है कि व्यवस्था को बदल दें? क्रान्ति कर दें। अगर क्रान्ति का दम नहीं है तो आप की सब जायज मांगे भी नाजायज हैं।
     जरुरत है जमीन पर सिद्धांत को  उतारा जाय , लेकिन कौन उतारेगा इसे जमीन पर ? हम इस क्रान्तिकारी मसौदे को जमीन पर नहीं उतार पाएंगे तो हमारे चिन्तन का कोई अस्तित्व नही है। अभी तक हमारे समाज के चिन्तकों को यह ही नहीं पता है कि दुश्मन कौन है ? किससे लड़ा जाय कैसे लड़ा जाय ? हमारे मुफलिसी के लिए व्यक्ति दोषी है या व्यवस्था? कुछ को कहने मे देर नहीं लगती है कि कि दोषी व्यवस्था है। जब उनसे पूछते है कि फिर किसी जाति को क्यों गाली दे रहे हो? उन्हें नहीं मालूम है कि दूनियां की सारी चीजे केवल दो भागो मे बंटी है ,उसी प्रकार केवल दो व्यवस्था है:-1) पूँजीबाद और 2) समाजबाद । हमारे समाज का चिन्तक एक ऐसे बाद के खिलाफ लड़ रहा है,जिसको वह ब्राह्मणवाद कहता है । इस "वाद" के खिलाब लड़कर हमारा समाज 100 साल से जादा समय गुजार दिया है, लेकिन उसका रोंवां भी टेढ़ा नहीं कर सका है । दरअसल,  हम परछाईं  काट रहे है। किसी भी व्यवस्था का मूलाधार उस समाज की अर्थव्यवस्था है , धर्म और संस्कृतियां उस की अधिरचना है। बिना मूलाधार पर प्रहार किये अधिरचना नहीं बदला जा सकता है। इसलिए, लड़ाई का केन्द्र बिन्दु रोटी होना चाहिए। रोटी मजबूत रें,सम्मान मिल जाएगा
याद रहे, जो समाज रोटी मांगकर खायेगा, सम्मान नहीं पायेगा। इसलिए, रोटी के उत्पादन के संसाधनों का मालिकाना हक समाज को सौंपना होगा। दूसरी बात, लोगों को लम्बा रास्ता पसन्द नही है। हर आदमी सोचता है कि भगत सिंह पैदा हों लेकिन पड़ोसी के घर। आदमी के दिमाग पर पूँजीवाद हावी है। इस पल पूँजी अगले पल मुंनाफा चाहिए। यही कारण है कि चुनाव में करोड़ो खर्च करने वाले दलित भी मिल जायगे , लेकिन क्रान्तिकारी आन्दोलनों के लिए दस रुपये देने में बगले झांकते है। हम अवतारवाद के शिकार हैं। हम यही सोच रहे है कि कोई अवतार लेगा। तीसरा हमारे मन मे यह विचार घर कर गया है कि हमारा भला केवल हमारी जाति करेगी। उनको नीति से नहीं मतलब है। वे जानकर भी अन्जान बनते है कि आरक्षण नीति में था, जाति का प्रधान मंत्री न होने बाद भी लाभ मिला। यही कारण है वे अपनी जाति का नेता ढूढते है और दुश्मन वर्ग की मदद करते हैं।व्यक्तिवाद का अन्त ही इसका समाधान है,इसका समाधान संघवाद से आजादी है, जिसका हमें कडाई से पालन करना होगा। अध्यक्ष की जगह अध्यक्ष मण्डल ही इसका समाधान है।
-आर डी आनंद