बुधवार, 7 दिसंबर 2016

आईन के लिेये काला दिन है 6 दिसंबर

आरएसएस और मोदी की सरकार मे भारत मे रहने वाली दुनिया की दूसरी सबसे बडी मुसलमानो की आबादी आज दलित और आदिवासियों की तरह संध के निशाने पर है जो मुसलमानो को दूसरे दर्जे के शहरी बनाने पर आमादा है और इसी ताकत ने बाबरी मस्जिद की शहादत से देश की क़ौमी एकता के परखच्चे उड़ाये थे आज वही ताकते पूर्ण बहुमत से सराकर मे है!

दूसरी ऑल इंडिया तंज़ीम ए इंसाफ़ की क़ौमी कोंफ्रेंस से ख़िताब करते हुये अमीक जामेई ने कहा की यह कैसे हो सकता है की जिस देश मे दलित पिछड़े औरतें और अल्पसंख्यक बहुजन मे आते हो वहा देश की दौलत और रिसोर्सेज पर 2% लोगो का क़ब्ज़ा हो, यह संभव कर दिया गया की बैको से अरबों लूटने वाले तो सरकार के मेहमान है लेकिन आम जनता को मोदी साब ने लाईन मे लगा रखा है, संघवाद से लड़ने के लिए हमे सामाजिक नयाय की लड़ाई को तेज करना होगा इसलिए ज़रूरी है की मंडल पार्ट-2 पसमांदा लड़ायी को तेज़ किया जाना चाहिए और भारत सरकार होश मे रहे अगर उसने रिज़र्वेशन खतम करने की तरफ सोचा भी!

तीन दिवसीय ऑल इंडिया तंज़ीम ए इंसाफ़ की क़ौमी कोंफ्रेंस से ख़िताब करते हुये अमीक जामेई ने कहा की कल 6 दिसम्बर है जिस दिन खुली धूप मे बाबरी मस्जिद को शहीद किया था और देश को तोड़ा था आज समय है की बहुजन और प्रगतिशील समाज को आगे बढ़ गुजरात मोडल राजनीती को धराशाई करना होगा क्योंकि मोदी सरकार देश को उत्तर प्रदेश को गुजरात बना देना चाहती है, गुजरात मे दलित पर अत्याचार मामले मे जामेई ने कहा की ऊना आंदोलन ने संघवाद को गुजरात मे भाजपा की सरकार को घुटने टिकवाये है और सही समय है जब मुसलिम युवाओ को दलित और पिछड़े यंग टर्क के साथ मिलकर संघमुक्त भारत और उत्तर प्रदेश के लिए आगामी चुनाव मे उतरना चाहिये, जामेई ने कहा की बिहार के निवासियो को मुबारकबाद दिया जाना चाहिए जिसने पिछली सरकार मे संघ को बिहार मे साफ कर दिया था!

ख़बरों के मुताबिक़ अमीक जामेई देश भर के छात्र युवा को "संघमुक्त उत्तर प्रदेश" तहरीक शुरू कर उत्तर प्रदेश आने का निमंत्रण दे रहे है जिसमें संविधान बचाओ देश बचाओ के नारे के साथ प्रदेश मे दस बडे जलसे होगे, आंदोलनकर्ता ने साफ किया है की वह किसी पार्टी विशेष के लिेये कोई प्रचार नही करेगे, आंदोलन मे जेएनयूएसयू के पूर्व अध्यक्ष कंहैया कुमार और जिगनेश मवानी मंच पर एक साथ आ सकते है!

तीन दिवसीय ऑल इंडिया तंज़ीम ए इंसाफ़ की क़ौमी कोंफ्रेंस से ख़िताब करते हुये अमीक जामेई ने कहा कि  6 दिसम्बर को जिस दिन खुली धूप मे संधवाद ने बाबरी मस्जिद को शहीद किया था

फिडेल के क्यूबा की यात्रा का संस्मरण

सन् 1969 में भोपाल में अखिल भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के अधिवेशन के सफल आयोजन से संघ का केन्द्रीय नेतृत्व काफी प्रसन्न था। मैं सम्मलेन की आयोजन समिति का महामंत्री था और स्वर्गीय धन्नालाल शाह अध्यक्ष थे। उस समय संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष भूषण राव थे। भूषण राव ‘द टाईम्स आॅफ इंडिया‘ में महत्वपूर्ण पद पर थे। एक दिन देर रात राव का फोन आया कि मुझे सात दिन के अंदर क्यूबा जाना है। मैंने पूछा ‘‘क्यों‘‘? इसपर उन्होंने कहा कि ‘‘सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए मैं तुम्हें पुरस्कृत कर रहा हूं‘‘ं क्यूबा में अन्तर्राष्ट्रीय पत्रकार सम्मेलन है। यह बात 1971 की है। उन्होंने सूचित किया कि मेरे साथ अखिल भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ के महासचिव एस.बी. कोलपे जा रहे हैं। क्यूबा जाने के लिए पहले हमें मास्को जाना पड़ा। वहां से हमें एयरोफ्लोट (सोवियत एयरलायन्स) की फ्लाइट से क्यूबा की राजधानी हवाना के लिए रवाना होना था। हमें बताया गया था कि मास्को से हवाना पहॅुचने में 15 से 18 घंटे का समय लगेगा। लगभग सारी यात्रा के दौरान हमें समुद्र के ऊपर ही उड़ना है।
रास्ते में हमारी उड़ान को बरमूडा नामक द्वीप में आपातकालीन लैंडिग करनी पड़ी। काफी देर के बाद पायलट ने आपातकालीन लैंडिग का कारण बताया। पायलट ने बताया कि उड़ान के दौरान अनेक बार तूफान आये इसलिए हवाई जहाज की रफ्तार धीमी हुई। रफ्तार धीमी होने से ईधन ज्यादा जल गया। चूॅकि कम ईधन बचा था अतः रिफ्यूलिंग के लिए बरमूडा में उतरना पड़ा। यह भी बताया गया कि बरमूडा में उतरने की इजाजत बड़ी मुश्किल से मिली। बरमूडा द्वीप पर अमरीका व ब्रिटेन का संयुक्त कब्जा था। बताया गया कि बरमूडा में परमाणु हथियारों का अड्डा था इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से वह अत्यधिक संवेदनशील स्थान था।
हमारे हवाई जहाज में हम लोगों के साथ ‘प्रावदा‘ के संपादक भी थे। ‘प्रावदा‘ सोवियत कम्यूनिस्ट पार्टी का मुखपत्र  था। हमें बताया गया कि ‘प्रावदा‘ के संपादक ने सोवियत राष्ट्रपति ब्रेजनेव से संपर्क कर स्थिति की गंभीरता से अवगत कराया। उन्हें बताया गया कि हवाई जहाज में ईधन बड़ी दुªतगति से खत्म हो रहा है और यदि शीघ्र ही बरमूडा पर उतरने की अनुमति नहीं मिली तो जहाज समुद्र में गिर जायेगा।
इस पर ब्रेजनेव ने स्वयं अमरीकी राष्ट्रपति तथा ब्रिटिश प्रधानमंत्री से संपर्क कर हमें बरमूडा हवाई अड्डे पर उतरने की इजाजत दिलवाई। हमारे हवाई जहाज के बरमूडा मंे उतरते ही अनेक सुरक्षाकर्मी जहाज में घुस आये। उन सबने चेतावनी दी कि हममें से कोई भी जहाज के बाहर न जाए। हवाई जहाज के सभी यात्री पत्रकार थे। सुरक्षाकर्मियों का मानना था कि हम बहुत ही खतरनाक लोग हंै। सुरक्षाकर्मी सभी यात्रियों के कैमरे ले गये। बरमूडा में हमारा विमान लगभग आठ घंटे खड़ा रहा। इस दरम्यान हम लोगों को पानी तक नहीं दिया गया। बड़ी मुश्किल से बरमूडा के अधिकारियों ने हवाई जहाज में ईधन भरा। ईधन मिलने के बाद पायलट ने उड़ने की इजाजत मांगी। परंतु वह भी हमें काफी मुष्किल से मिली। बरमूडा के अधिकारियों ने लंदन व वाशिंगटन संपर्क किया और वहां से क्लियरेन्स मिलने के बाद ही हमारा हवाई जहाज उड़ सका।
इस दरम्यान हवाना में यह खबर पहॅुच चुकी थी कि हम पत्रकारों के साथ बरमूडा में काफी दुव्र्यवहार किया गया। जब हम लोग हवाना पहुॅचे तो हम लोगों ने देखा कि एक विशाल भीड़ हवाई अड्डे पर पहॅुच चुकी थी। हमें यह भी बताया गया कि हम लोगों के स्वागत के लिए क्यूबा के राष्ट्रपति तथा वहां की कम्यूनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता फिडेल केस्ट्रो स्वयं हवाई अड्डे आये हुए हैं। भीड़ अत्यंत गुस्से की मुद्रा में थी। भीड़ नारे लगा रही थी “अमरीकी साम्राज्यवाद मुर्दाबाद“। हवाई अड्डे पर फिडेल केस्ट्रो ने भाषण भी दिया।
फिडेल केस्ट्रो का कहना था कि हम लोगों के साथ इसलिए अपमानजनक व्यवहार किया गया क्योंकि हम लोग मास्कों से एक ऐसे सम्मेलन में भाग लेने आ रहे थे, जिसका आतिथ्य क्यूबा कर रहा था। उस समय संयुक्त राज्य अमरीका, क्यूबा को अपना नंबर एक का दुश्मन मानता था। आज क्यूबा में कम्यूनिस्ट राज्य की स्थापना हुये 60 वर्ष हो गये हैं परंतु अभी तक अमरीका ने क्यूबा में कम्यूनिस्ट राज को मान्यता नहीं दी है। अमरीका ने इतना ज्यादा समय सोवियत संघ तथा कम्यूनिस्ट चीन को मान्यता देने में भी नहीं लगाया था। अमरीका को यह भय था-और आज भी है- कि यदि कम्यूनिस्ट व्यवस्था उनके पड़ोस के एक देश (क्यूबा, अमरीकी सीमा से मात्र 90 किलोमीटर दूर है) में सफल हो जाती है तो वह संक्रामक रोग की तरह सारे अमरीकी महाद्वीप में फैल सकती है।
अमरीका ने क्यूबा को नष्ट करने का भरसक प्रयास किया। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु उसने सर्वप्रथम फिडेल केस्ट्रो की हत्या की कोशिश की। यह बात अमरीका की सुरक्षा एजेन्सियों ने भी स्वीकार की है कि उनकी ओर से फिडेल केस्ट्रो पर अनेक बार कातिलाना हमले किए गए। परंतु अमरीका के सभी प्रयास असफल रहे। उस समय हमें क्यूबा में बताया गया था कि सुरक्षा कारणों से फिडेल केस्ट्रो एक स्थान पर एक से ज्यादा रातें नहीं बिताते।
फिडेल केस्ट्रो उस समय क्यूबा में असाधारण रूप से लोकप्रिय थे। क्यूबावासी, फिडेल केस्ट्रों को उनके पहले नाम से ही पुकारते हैं। वे अपने देश के और शायद दुनिया के भी किसी देश के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं। फिडेल केस्ट्रो कहते हैं कि कम्यूनिस्ट क्रांति के पहले क्यूबा, अमरीका के रईसजादों का चकलाघर था। वेश्यावृति क्यूबा का सबसे बड़ा उद्योग था। क्यूबा में भारी गरीबी थी। कम्यूनिस्ट क्रांति के पहले क्यूबा में साक्षरता का प्रतिशत मात्र 20 था। क्रांति होते ही वहां की महिलाओं को सम्मान का जीवन व्यतीत करने का अवसर मिला। शनैः-शनैः गरीबी के अभिशाप से उन्हें छुटकारा मिल गया। एक वर्ष में क्यूबा के समस्त निवासियों को साक्षर बना दिया गया।
साक्षरता अभियान में क्यूबा के प्रत्येक साक्षर नागरिक ने भाग लिया। वहां के मंत्रियों, उच्च अधिकारियों और यहां तक कि स्वयं फिडेल केस्ट्रो ने साक्षरता के अभियान में हिस्सेदारी की। दुनिया में शायद ही  कोई साक्षरता अभियान इतने बडे़ पैमाने पर चला होगा, जितना कि क्यूबा में चला। फिडेल केस्ट्रो एक अत्यधिक प्रभावशाली वक्ता हैं। वे तीन-तीन घंटे तक लगातार बोलते हंै और उनके भाषण वहां की जनता ध्यान व बड़े चाव से सुनती है। भाषण के बीच अनेक बार तालियां बजती हैं और फिडेल केस्ट्रो जिन्दाबाद के नारे लगते हैं। उनके भाषण के अनेक अंश मुझे आज भी याद हैं। जैसे, उन्होंने एक भाषण में कहा था कि कम्यूनिस्ट इसी धरती पर इंसान को सुखी बनाने का प्रयास करता है और धर्म, स्वर्ग में। क्यूबा में डाक्टरों की कमी का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा था कि हमारे देश के अनेक डाक्टर अपने धनी रोगियों के साथ क्यूबा छोड़कर चले गये हैं।
क्यूबा सम्मेलन में अनेक मुद्दों पर विचार किया गया। इन मुद्दों का संबंध सिर्फ पत्रकारिता जगत से नहीं था। सम्मेलन में विश्व शांति से संबंधित अनेक समस्याओं पर भी विचार किया गया। सम्मेलन को समाजवादी देशों का जोरदार समर्थन प्राप्त था। (यह लेख श्री एल एस हरदेनिया की सन् 2014 में प्रकाशित आत्मकथा ‘‘फूल और कांटों से भरी जीवन यात्रा‘‘ से उद्धृत है)
-एल. एस. हरदेनिया

गोमांसः समाज को बांटने वाला एक और मुद्दा


गोरक्षा के मुद्दे पर पहला बड़ा आंदोलन आज से ठीक 50 वर्ष पूर्व (नवंबर 1966) हुआ था और तब से यह मुद्दा जिंदा है। इसी मुद्दे को लेकर हाल में मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। इस मुद्दे को लेकर हिंसा होती रही है। मवेशियों के कई व्यापारियों को जान से मार दिया गया। इसके पहले, हरियाणा में कुछ दलितों को तब मार दिया गया था जब वे एक मरी हुई गाय की खाल उतार रहे थे। कुछ समय पूर्व ऊना (गुजरात) में मरी हुई गाय की खाल उतार रहे चार दलितों की सार्वजनिक रूप से बेरहमी से पिटाई की गई। यह घटना एक पुलिस स्टेशन के नज़दीक हुई। भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सत्ता में आने के बाद से इस तरह की घटनाओं में बढ़ोत्तरी हुई है।
तथ्य यह है कि वैदिक काल में भारत में गोमांस भक्षण आम था। जानेमाने इतिहासविद डी.एन. झा ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘‘द मिथ ऑफ होली कॉऊ’’ (पवित्र गाय का मिथक) में इसकी पुष्टि की है। इस पुस्तक के प्रकाशन का हिन्दू राष्ट्रवादियों ने कड़ा विरोध किया था। जिस समय यह पुस्तक प्रकाशित होने जा रही थी, प्रो. झा को कई धमकी भरे टेलीफोन कॉल मिले। यह पुस्तक अत्यंत विद्वतापूर्ण और तथ्यात्मक है। प्राचीन भारतीय इतिहास के हवाले से यह पुस्तक बताती है कि आर्य भी गोमांस खाते थे। भगवान गौतम बुद्ध ने ब्राह्मणवादी यज्ञों में गाय की बलि देना बंद करने पर ज़ोर दिया था। उस समय भारत एक कृषि आधारित अर्थव्यवस्था बनने की ओर था और बैल इस अर्थव्यवस्था के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। बुद्ध ने समता का संदेश भी दिया, जो तत्कालीन ब्राह्मणवादी मूल्यों के विरूद्ध था। इसके बाद लंबे समय तक बौद्ध धर्म और ब्राह्मणवाद के बीच संघर्ष चलता रहा। बौद्ध धर्म पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैल गया और ब्राह्मणवाद का सूरज का कुछ समय के लिए अस्त हो गया। जब ब्राह्मणवाद का पुनउर्दय हुआ तो उसने गाय को माता के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया।
‘गोमाता’ हिन्दू सम्प्रदायवादियों की राजनीति का भी एक प्रमुख हथियार रहा है। इस राजनीति के पैरोकार थे ऊँची जातियों के हिन्दू, जिन्हें राजाओं और ज़मींदारों का संरक्षण प्राप्त था। ब्राह्मणवाद ने हिन्दू धर्म का चोला पहन लिया और गाय को अपना प्रतीक घोषित कर दिया। परंतु आज भी हिन्दुओं सहित कई वर्गों के लोग गोमांस खाते हैं। मानवशास्त्रीय अध्ययनों से यह पता चलता है कि भारत में गोमांस भक्षण करने वाले कई समुदाय हैं। आदिवासियों व दलितों के कुछ तबकों और कुछ अन्य हिन्दू समुदाय इनमें शामिल हैं। गोवा, केरल और असम जैसे कई राज्यों में गोमांस खानपान का हिस्सा है।
जहां एक सांप्रदायिक धारा ने गाय को अपना प्रतीक बनाया वहीं दूसरी सांप्रदायिक धारा ने सूअर के मुद्दे पर भावनाएं भड़कानी शुरू कर दीं। स्वाधीनता आंदोलन के दौरान दोनों धाराओं के सांप्रदायिकतावादियों ने समर्थन जुटाने के लिए इन मुद्दां का इस्तेमाल किया। जहां राष्ट्रीय आंदोलन धर्मनिरपेक्ष मुद्दों पर केन्द्रित था वहीं सांप्रदायिकतावादी, गाय और सुअर के मुद्दों को उछाल रहे थे।
स्वाधीनता के बाद, गोरक्षा के मुद्दे पर संविधानसभा में लंबी चर्चा हुई और अंततः यह निर्णय लिया गया कि इसे मूलाधिकारों का हिस्सा न बनाते हुए नीति निदेषक तत्वों में शामिल किया जाए। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने गांधीजी से यह अनुरोध किया कि वे गोहत्या और गोमांस को प्रतिबंधित करने के लिए काम करें। गांधी, जो कि 20वीं सदी के महानतम हिन्दू थे, ने इस अनुरोध को इस आधार पर अस्वीकार कर दिया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है और जब तक यहां ऐसे समुदाय हैं जो गोमांस भक्षण करते हैं, तब तक गोमांस को प्रतिबंधित करना अनुचित होगा।
हिन्दू संप्रदायवादियों ने राजनीति की बिसात पर गाय को लाने का पहला प्रयोग आज से ठीक 50 वर्ष पहले किया। सन 1966 के नवंबर में बडी संख्या में लोग इकट्ठे होकर संसद का घेराव करने पहुंचे। इसके बाद सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए इस पर विचार के लिए एक समिति नियुक्त की। समिति के समक्ष कई व्यक्तियों और संस्थाओं ने अपने प्रतिवेदन दिए जिनमें आरएसएस के गोलवलकर शामिल थे। समिति किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी और लगभग एक दशक बाद उसे भंग कर दिया गया। यहां यह महत्वपूर्ण है कि 1966 के इस आंदोलन ने भाजपा के पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ को मिलने वाले मतों को दुगना कर दिया। इससे संप्रदायवादियों को यह समझ में आ गया कि गाय के मुद्दे का इस्तेमाल वोट कबाड़ने के लिए किया जा सकता है और तब से ही यह मुद्दा सांप्रदायिक शक्तियों की रणनीति का हिस्सा बन गया। आज 50 साल बाद भी वे लोग इस मुद्दे का इस्तेमाल अपना जनाधार बढ़ाने के लिए कर रहे हैं।
आज के भारत में गोमांस और गोरक्षा के मुद्दे पर मचे बवाल के दो प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो रहे हैंः पहला, गोवध पर प्रतिबंध के कारण मवेशी व्यापारियों पर हमले हो रहे हैं और दूसरा, किसानों की आर्थिक स्थिति खराब हो रही है क्योंकि उनके अनुपयोगी पशुओं को खरीदने वाला अब कोई नहीं है। मवेशी व्यापारियों और कसाईखानों में काम करने वाले लोग अपने रोज़गार से वंचित हो रहे हैं। चमड़ा उद्योग, जो गाय की खाल पर निर्भर था, गर्त में जा रहा है और चमड़े का सामान उत्पादित करने वाली कई इकाईयां बंद हो गई हैं।
यह दिलचस्प है कि मांस का निर्यात करने वाली कई बड़े कंपनियों के मालिक वे लोग हैं जो भाजपा और उसकी राजनीति के समर्थक हैं। भारत, मांस का एक बड़ा निर्यातक है। नरेन्द्र मोदी ने सन 2014 के आम चुनाव के प्रचार के दौरान गोमांस के मुद्दे को उठाया था। उन्होंने यूपीए सरकार पर ‘पिंक रेव्यूलेशन’ को प्रोत्साहन देने का आरोप लगाकर उसे कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी। संप्रदायवादियों का पाखंड स्पष्ट है। वे इस मुद्दे का उपयोग केवल अपने राजनीतिक लक्ष्य प्राप्त करने के लिए करना चाहते हैं। राजस्थान की भाजपा सरकार ने एक ‘गोरक्षा विभाग’ का गठन किया और जयपुर के नज़दीक हिंगोलिया में एक विशाल गोशाला स्थापित की। वहां रखी गई गायों में से सैंकड़ों की मौत हो गई क्योंकि वहां न उन्हें खाना मिला और ना ही पानी। इससे यह जाहिर है कि गोरक्षकों का गोप्रेम केवल वोट पाने तक सीमित है।
ऊना की घटना के बाद दलितों का एक बड़ा तबका हिन्दुत्ववादी राजनीति के एजेंडे के खिलाफ उठ खड़ा हुआ है। संघ परिवार की गाय पर केंद्रित राजनीति से कृषि अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है। ऊना की घटना हमारी राजनीति का चरित्र बदल सकती है। एक ओर जहां इस मुद्दे का इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है वहीं दलितों पर हमले हो रहे हैं। ऊना ने दलितों को आरएसएस की राजनीति के असली चेहरे से परिचित करवाया है। इससे विघटनकारी हिन्दुत्ववादी राजनीति का मुकाबला करने के लिए नए सामाजिक गठबंधन बनने की राह प्रशस्त हुई है। हमारे मन में सभी पशुओं के प्रति सम्मान और दया का भाव होना चाहिए परंतु किसी पशुका उपयोग राजनीति के लिए करना शर्मनाक और घृणास्पद है।

 -राम पुनियानी

रविवार, 4 दिसंबर 2016

नाक कटवाना - स्वर्ग मिलेगा

केतकी गडकरी : एक हज़ार करोड़ रुपये में विवाह
पीएम ने रैली में पूछा कि गरीबों के हक के लिए लड़ना क्या गुनाह है? मैं आपके लिए लड़ रहा हूं। मेरा क्या कर लेंगे ये लोग? मैं फकीर हूं, झोला लेकर निकल लूंगा। अगर गरीब के हाथ में ताकत आ जाए तो गरीबी कल खत्म हो जाएगी। इरादे नेक हैं, तो देश कुछ भी सहने को तैयार को जाता है, ये मैंने महसूस किया है। आज सवा सौ करोड़ के देश ने जिम्मेदारी को अपने कंधे पर ले लिया है। देश भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहता है।
             दस लाख रुपये का सूट पहनने वाला सत्तर करोड़ रुपये के काजू खाने वाला किस तरह से अपने मुंह से अपने को फ़कीर घोषित कर रहा है. इन बगुला भगतों ने अपने शब्दकोष से शर्म नाम के शब्द को हटा दिया है. मोदी कि इसी रैली के पहले  यूपी पुलिस ने 2000 रुपए के नए नोटों से भरी भा ज पा कि एक गाड़ी पकड़ी है। उस गाड़ी में 2000 की नई करेंसी के 95 लाख रुपए मिले थे । गाड़ी को जब्त कर लिया है।करोड़ों रुपये विदेश यात्राओं पर खर्च कर नोटबंदी लागू कर चुका है. बैंक की लइनों में लगे हुए लोगों में से 200 लोग मर चुके हैं. हद तो यहाँ तक हो चुकी है कि पैसा निकालने कि लाइन में लगे-लगे ही बच्चा पैदा हो चुका है.
               प्रधानमंत्री शादी ब्याह में ढाई लाख रुपये बैंक से निकालने कि अनुमति देते हैं और इतनी शर्तें लगा देते हैं कि ढाई लाख रुपये बैंक से निकलने भी न पाए. वहीँ, खनन करोबारी और भाजपा के पूर्व मंत्री बी जनार्दन रेड्डी की बेटी ब्रह्माणी की 16 नवंबर को बंगलुरू में भव्य शादी हुई थी.  यह विवाह समारोह पांच दिन का था.
                अब मोदी सरकार के मंत्री नितिन गडकरी के पुत्री केतकी के विवाह में 50 चार्टर्ड प्लेन, 10000 लोगों के फाइव स्टार रुकने वा खाने कि व्यवस्था जिसमें लगभग 1000 करोड़ रुपये खर्च कर फकीरी ढंग से शादी की जा रही है. 3 और 4 दिसम्बर को  नागपुर के लिए किसी भी जगह से हवाई टिकट उपलब्ध नहीं हैं। अतिथियों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत, केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह समेत उनमें से ज्यादातर वीवीआईपी, मुकेश अंबानी और रतन टाटा, शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे, केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और उद्योगपति है. इस कार्यक्रम में मोहन भागवत का स्वदेशी डांस भी होगा.
            अब प्रधानमंत्री मोदी साहब को देश को यह बताना चाहिए कि एक हज़ार करोड़ रुपये में खर्च होने वाले नोट नए नोट हैं या पुराने नोट हैं. काला धन है या सफ़ेद धन है. मोदी का मंत्रिमंडल सफ़ेद झूठ बोलने वालों का मंत्रिमंडल है यहाँ सभी झूंठ पर झूंठ बोलने के आदी हैं. शर्म तो आनी ही नही है. नाक  कटवाओ - स्वर्ग मिलेगा की नीति के तहत जनता को नोट बंदी के सवाल के ऊपर समझाया जा रहा है.

सुमन

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

भक्तों का नोटों का कारोबार है

उत्तर प्रदेश विधान सभा के सामने किसान अपना आलू बांटते हुए   नोट बंदी के कारण कोई खरीददार नही है
8 नवम्बर को विमुद्रीकरण की घोषणा कि जाती है लेकिन सत्तारूढ़ दल के लोगों को पहले से ही मालूम था कि एक हज़ार वा पांच सौ के नोट सरकार बंद करने जा रही है जिसके चलते उन लोगों ने अपने हज़ार व पांच सौ के नोटों को सौ, पचास, बीस व दस के नोटों के रूप में परिवर्तित कर लिया था और घोषणा होने के बाद इन लोगों ने गाँव से लेकर शहर तक एक हज़ार रुपये की नोट 600 रुपये में व 500 की नोट 300 रुपये में खरीदने का काम ज़ारी कर दिया. आज उस कड़ी में भारतीय जनता पार्टी  का एक नेता 20 लाख रुपये की करेंसी के साथ पकड़ा गया है. तमिलनाडु के सेलम में भारतीय जनता पार्टी  नवजवान विंग के लीडर को पुलिस ने तब धर दबोचा जब वो बैंक से पैसे बदलने के बाद लौट रहा था. उसके पास से नए और पुराने दोनों नोटों का ज़खीरा मिला. नोटों के साथ गिरफ्तार  भारतीय जनता पार्टी  नवजवान विंग के लीडर का नाम जेवीआर अरुण है. इसी तरीके से "मोदी ने यह काम अच्छा किया" "काला धन आएगा विकास होगा" "थोडा सा कष्ट होगा लेकिन देश खुशहाल होगा" की बात करने वाले लोग वास्तव में नोटों कि खरीददारी का काम कर रहे हैं और जो पुराने नोट आ रहे हैं उनको बदलने कि व्यवस्था भी उन लोगों के पास है. नोट बंदी सत्तारूढ़ दल के छोटे-छोटे नेताओं के लिए नई रोशनी का काम कर रहा है. भारतीय जनता पार्टी ने पूरे देश के अन्दर नोट बंदी के फैसले के आने के पहले जगह-जगह जमीन खरीदी है. गाँव से लेकर शहर तक बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाये गए हैं, एक-एक होर्डिंग की कीमत एक लाख से लेकर कई लाख रुपये तक है. ये  होर्डिंग्स 8 नवम्बर के बाद लगाए गए हैं. सत्तारूढ़ दल बता नहीं सकता है कि यह रुपये काला धन हैं या सफ़ेद धन हैं, इनका भुगतान पुरानी करेंसी में किया गया है या नई करेंसी में किया गया है. वहीँ, फाइनेंस मिनिस्ट्री ने घोषणा की है कि आयकर विभाग की सर्च के दौरान शादीशुदा महिलाएं पांच सौ ग्राम सोना रखने की हकदार होंगी। अविवाहित महिलाएं 250 ग्राम सोना रख सकेंगी। पुरुषों के लिए ये लिमिट 100 ग्राम की गई है। यह घोषणा भी कालाधन को सफ़ेद करने कि योजना का एक हिस्सा है. एक परिवार में अगर दस महिलाएं हैं तो पांच किलो सोना. कुछ अविवाहित लड़कियां व पुरुष भी परिवार में हैं तो बीसों किलो सोना रखा जा सकता है. यह घोषणा उन लोगों के लिए फायदेमंद है जिन्होंने 8 नवम्बर के बाद भारी पैमाने पर सोने की खरीद की मोदी सरकार इस तरह काले धन वालों को संरक्षण दे रही है.
वहीँ, दूसरी तरफ रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के गवर्नर साहब कि पूर्व पत्नी विभा जोशी के खिलाफ काला धन छिपाने के मामले में गिरफ्तारी वारंट ज़ारी किया गया है और पति उर्जित पटेल काला धन समाप्त करेंगे और ससुराल वाले काला धन पैदा करेंगे इस तरह की योजनाओं को मोदी योजना कहा जा सकता है.
                    सरकार ने 15 दिसम्बर तक पेट्रोल पम्प पर चलने वाले पांच सौ के नोटों का चलन बीच में स्थगित कर 2 दिसम्बर कर दिया है. इसका सीधा-सीधा अर्थ है कि आवश्यकता पड़ने पर आप अपने नोटों को कम दामों पर बेच कर अपनी आवश्यकता कि पूर्ती करें क्यूंकि बैंकों को आदेश है कि एक सप्ताह में चौबीस हज़ार रुपये से ज्यादा की निकासी न करें. भक्तों के नोटों के व्यापार को इस फैसले के बाद नई उर्जा नई दिशा मिलेगी और सत्तारूढ़ दल कि बड़ी-बड़ी होर्डिंग्स गाँवों-कस्बों में लगेंगी. देश बदल रहा है.

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 30 नवंबर 2016

दिवालिया किसको कहते हैं

भारत सरकार, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया वा सत्तारूढ़ दल लगातार कह रहा है कि 24000 रूपये प्रति सप्ताह  और जिनके घरों में शादी है वह ढाई लाख रुपये अपने खाते से रुपया निकाल सकते हैं. जमीनी हकीकत यह है कि शादी-ब्याह वाले घरों के लोग ढाई लाख रुपये अपने खाते से नहीं निकाल पा रहे हैं क्यूंकि रुपया निकालने के लिए जो शर्तें लगायी गयी हैं उन शर्तों को पूरा नहीं किया जा सकता है. अब चौबीस हज़ार रुपये प्रति सप्ताह निकालने की वास्तविकता यह है कि 24000 रुपये कि चेक लेकर जब व्यक्ति बैंक गया तो बैंक आफ इंडिया बाराबंकी ने चेक पर लिख कर दे दिया है कि बैंक के पास रूपए ही नही है तब लीड बैंक के प्रबंधक से बात की गई तो उन्होंने बताया कि रिजर्व बैंक आफ इंडिया के पास ही रूपये नहीं है. बताए दिवालिया किसे कहते हैं. 
बैंकों के पास रुपया ही नहीं है उनको किसी तरह से जो रुपया मिलता है उससे वह 2000 रुपये 1000 रुपये बाँट रहे हैं एटीएम वगैरह खाली पड़े हैं. जनता अपना रुपया निकालने के लिए लाइन में सुबह से लेकर शाम तक लगी रहती है और बाद में नो कैश हो जाता है. दिल्ली और बम्बई के अधिकारी मीडिया से कहते हैं कि सब कुछ ठीक है थोड़ा- बहुत कष्ट कि बात है इसके विपरीत वास्तविकता यह है कि व्यापार से लेकर खेती किसानी तक बंद है. गाँव के अन्दर दूसरी जगहों पर काम करने गए नवजवान वापस आ रहे हैं. बेरोज़गारी बढ़ रही है उसके बाद भी सत्तारूढ़ दल के बेशर्म नेतागण उत्तर प्रदेश में 1 करोड़ नवजवानों को रोज़गार देने कि बात कर रहे हैं. अफरातफरी का माहौल है. मोदी से लेकर रूडी तक नागनाथ से लेकर प्रलयनाथ तक झूंठ पर झूंठ बोले चले जा रहे हैं. जनता के कमजोर तबके बेरोजगार नवजवान किसान अपने पैसे का उपभोग नही कर पा रहा है. दुर्घटना होने पर नई करेंसी के अभाव में इलाज संभव नहीं हो पा रहा है. सरकार चाहे जो घोषणा कर रही हो. अब तो यही हो रहा है कि होइहि सोइ जो राम रचि राखा।

सुमन 

सोमवार, 28 नवंबर 2016

लोगों के पास ही बैंक खाते नहीं


बाराबंकी। नोट बंदी के बहाने गरीब, मजदूर, किसानों को बर्बाद करने वाली मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने मोदी का पुतला लेकर जुलूस निकाला और पटेल चैराहा पर फूंक दिया।
    जुलूस से पहले सम्बोधित करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सहसचिव रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि भारत में 52 प्रतिशत लोगों के पास ही बैंक खाते हैं, बहुत सारे नागरिकों को बैंक की सुविधा 50 किलोमीटर दूर है ऐसे में मोदी की तुगलकी योजना के कारण गरीब आदमी का एक या दो नोट बदल पाना असम्भव है।
       भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सहसचिव डा0 कैसर हुसैन ने कहा कि मोदी सरकार कालाधन को सफेद करने की यह योजना है और उन उद्योग पतियों को कर्जा फिर देना है जो लाखों लाख करोड़ रूपये हजम कर चुकें है।
    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृज मोहन वर्मा ने कहा कि मोदी की नोट बंदी योजना से किसान पूरी तरीके से बर्बाद हो रहा है आलू कोल्डस्टोरेज में सड़ गया है रूपया न होने से बोआई नहीं हो पा रही है। धान का मूल्य सात सौ रूपये प्रति कुन्तल चल रहा है पूरे देशमें  मोदी की योजना से किसान बर्बाद हो चुका है। मोदी व उसके गिरोह के लोग झूठ पर झूठ बोलते जा रहे है। मोदी कालाधन से चुनाव लड़े थे और कालेधन से मोदी पूरे देश में सभायें कर रहे है।
    किसान सभा के जिला अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि बैंकों के सामने गरीब जनता खड़ी है और अमीर जनता एसी कमरे में सो रही है मोदी जो कह रहे है उसके उलट देष की स्थिति है।
पुतला फूंकने में हनोमान प्रसाद, सचिन छाबड़ा, साबिर समसाद, राम लखन वर्मा, अमर सिंह गुड्डू, पुष्पेन्द्र सिंह, गिरीश चन्द्र वर्मा, सरदार भूपेन्द्र सिंह, सत्येन्द्र यादव, अवधेश, टिंकू, मोहम्मदवैश्य, मो0 अजीम, सहाबुद्दीन, इस्लाम खान, मुनेष्वर वर्मा, सेखू, विनोद यादव, जितेन्द्र यादव, मुसाहिद समसाद, साकिब जमाल आदि प्रमुख लोग थे।
    जुलूस में मोदी मुर्दाबाद, नोट बंदी वापस लो, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिन्दाबाद के नारे लग रहे थे।

शनिवार, 26 नवंबर 2016

कॉर्पोरेट सेक्टर से काला धन बरामद कराएं

तंजीम-ए-इन्साफ के महासचिव अमीक जामेई वा समाजवादी चिन्तक फ्रैंक हुजुर
बाराबंकी। मोदी की नोटबंदी नीति के कारण लाखों लोग बेरोजगार हो चुके हैं. खेती चैपट हो चुकी है, व्यापार ठप है. वहीँ, लाखों करोड़ रुपये की कर्ज माफी मोदी सरकार के नियंत्रक कॉर्पोरेट सेक्टर को दी जा चुकी है। सैकड़ों लोग विमुद्रीकरण के कारण मर चुके हैं। लगभग 50 लाख लोगों कि शादियाँ अधर में हैं. काले धन से पांच सौ करोड़ रुपये की शादी हो रही है। दूसरी तरफ आम जनता अपने ही रुपयों में से 2.5 लाख रुपये बैंक से निकालने में असमर्थ है।         
                       गाँधी भवन में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए तंजीम-ए-इन्साफ नई दिल्ली के महासचिव अमीक जामेई व समाजवादी चिन्तक फ्रैंक हुजूर ने कहा कि मोदी सरकार विमुद्रीकरण या नोटबंदी कार्यक्रम से यह प्रचारित किया जा रहा है है कि इससे आतंकवाद या माओवादियों को रुपये सप्लाई कार्य रुक जायेगा। यह बात भी मोदी सरकार की हवा हवाई है। यह बात उसी तरीके से है कि अमीर लोगों की नींद हराम हो चुकी है और काला धन बरामद किया जा रहा है। वास्तविकता यह है कि आम आदमी अपने ही रुपयों को निकालने के लिए तीन-तीन दिन तक बैंक की लइनों में लगा रहा है और खाने-पीने के लिए तंगी का सामना किया. इसके विपरीत पेट्रोल पंप मालिकों, बिग बाजार को फायदा पहुँचाया गया। सरकार यह बताने में पूर्णतया असमर्थ है कि कितना काला धन अभी तक वह बरामद कर पायी है। प्रधानमंत्री संसद का सामना करने से मुंह चुरा रहे हैं। अब तक 14 दिनों में मोदीजी ने किसी नेता के यहां छापा मारकर एक लाख के अमान्य नोट तक नहीं पकड़े हैं, आयकर विभाग ने 91 लाख के नोट महाराष्ट्र के भाजपा विधायक और मंत्री की कार से पकड़े हैं।
इनका नोट बंदी अभियान चीन की ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा के संस्थापक तथा चीन के सबसे धनी व्यक्तियों में से एक जैक मा को लाभ पहुँचाना हैं। पेटीएम प्रचार अभियान उसी का हिस्सा है। एक तरफ चीन के खिलाफ युद्ध का माहौल बनाया जाता है और दूसरी तरफ चीन को फायदा पहुंचाने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से मोदी सरकार द्वारा कार्य किया जा रहा है।
दोनों नेताओं ने कहा कि मोदी सरकार अगर वास्तव में भ्रष्टाचार को समाप्त करने तथा काला धन बरामद करना चाहती है तो  कॉर्पोरेट सेक्टर के यहाँ छापे डाले तथा बकायेदारों का कर्ज माफ करने के बजाये उनसे वसूली अभियान तेज करे।
तंजीम-ए-इन्साफ जनता कि मदद के लिए तथा देश को दिवालिया करने के खिलाफ मोदी सरकार कि नीतियों को आम जनता तक ले जाएगी. उसी कड़ी में यह संवाददाता सम्मलेन भी किया जा रहा है।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

क्या टीपू सुल्तान स्वाधीनता संग्राम सैनानी थे?

कर्नाटक सरकार द्वारा गत 10 नवंबर, 2016 को टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने के मुद्दे पर जमकर विवाद और हंगामा हुआ। पिछले वर्ष, इसी कार्यक्रम का विरोध करते हुए तीन लोग मारे गए थे। टीपू सुल्तान की जयंती मनाए जाने का विरोध मुख्यतः आरएसएस-भाजपा और कुछ अन्य संगठनों द्वारा किया जा रहा है। इनका कहना है कि टीपू एक तानाषाह था, जिसने कोडवाओं का कत्लेआम किया, कैथोलिक ईसाईयों का धर्मपरिवर्तन करवाया और उनकी हत्याएं कीं, कई ब्राह्मणों को जबरदस्ती मुसलमान बनाया और अनेक मंदिरों को तोड़ा। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने कन्नड़ की बजाए फारसी भाषा को प्रोत्साहन दिया। दूसरी ओर, कुछ अन्य लोगों का कहना है कि टीपू एक अत्यंत लोकप्रिय राजा थे और उनकी वीरता के किस्से अब भी नाटको और लोकगीतों का विषय हैं। वे एकमात्र ऐसे भारतीय राजा थे जो ब्रिटिश      शासकों से लड़ते हुए मारे गए। प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड ने तो यहां तक मांग की है कि बैंगलोर के नए हवाईअड्डे का नाम टीपू सुल्तान के नाम पर रखा जाना चाहिए। कर्नाड ने यह भी कहा है कि अगर टीपू हिन्दू होते तो उन्हें कर्नाटक में उतने ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता, जितने सम्मान से महाराष्ट्र में शिवाजी को देखा जाता है।
यह दिलचस्प है कि कर्नाटक भाजपा के अध्यक्ष बीएस येदियुरप्पा ने जब 2010 में भाजपा को छोड़कर अपनी पार्टी बनाई थी, तब उन्होंने मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए टीपू सुल्तान जैसी टोपी पहनी थी और तलवार हाथ में उठाई थी। आज वे ही टीपू सुल्तान का जन्मदिन मनाए जाने के विरोध का नेतृत्व कर रहे हैं। यह भी दिलचस्प है कि आरएसएस द्वारा 1970 के दशक में प्रकाशित भारत-भारती पुस्तक श्रृंखला में टीपू को एक देशभक्त नायक के रूप में प्रस्तुत किया गया था। आज वे ही लोग टीपू सुल्तान को एक धर्मांध शासक बता रहे हैं। संघ परिवार द्वारा एक ट्रेन का नाम टीपू पर रखे जाने का भी विरोध किया गया था। ऐसा आरोप लगाया जा रहा है कि टीपू सुल्तान ने अपने सेनापतियों को पत्र लिखकर यह कहा था कि काफिरों का सफाया कर दिया जाना चाहिए। यह कहा जाता है कि ये पत्र अब ब्रिटिश सरकार के कब्ज़े में हैं। जब विजय माल्या ने लंदन में आयोजित एक नीलामी में टीपू की 42 इंच लंबी तलवार खरीदी थी तब भी बहुत बवाल मचा था। टीपू को लेकर समय-समय पर विवाद होते रहे हैं।
टीपू सुल्तान कौन थे? उनका स्वाधीनता संग्राम में क्या योगदान था? टीपू ने अपना राज्य अपने पिता हैदर अली से उत्तराधिकार में पाया था। युद्ध लड़ने की तकनीकी के विकास में हैदर और टीपू का योगदान सर्वज्ञात है। उन्होंने अंग्रेज़ों के विरूद्ध अपने युद्धों में मिसाइलों का इस्तेमाल किया था। अंग्रेज़ों के साथ हुए उनके युद्ध बहुत प्रसिद्ध हैं। हैदर और टीपू ने ब्रिटिश साम्राज्य के भारत में विस्तार को रोकने में महती भूमिका अदा की थी। टीपू की राजनीति, धर्म पर आधारित नहीं थी। उलटे इतिहास में यह दर्ज है कि उन्होंने हिन्दू मठों को दान दिया था, यद्यपि इसके पीछे भी हिन्दुओं का समर्थन हासिल करने की राजनैतिक मंशा थी। सच यह है कि चूंकि टीपू ने अंग्रेज़ों के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी थी इसलिए उन्होंने उसका दानवीकरण किया।
टीपू ने मराठाओं और हैदराबाद के निज़ाम से पत्रव्यवहार कर उनसे यह अनुरोध किया था कि वे अंग्रेज़ों का साथ न दें क्योंकि अंग्रेज़, उस क्षेत्र के अन्य राजाओं से बिलकुल भिन्न हैं और यदि उनका राज कायम होता है तो यह पूरे क्षेत्र के लिए एक बड़ी आपदा होगी। उनकी इसी सोच ने उन्हें अंग्रेज़ों के खिलाफ अनवरत युद्ध करने की प्रेरणा दी। ऐसे ही एक युद्ध में उन्हें अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा। परंतु वे आज भी कर्नाटक के लोगों की स्मृतियों में जिंदा हैं। उन पर केन्द्रित कई नाटक और गीत (लावणी) हैं। जनता के बीच उनकी लोकप्रियता के कारण ही वे आज भी कर्नाटक के एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक व्यक्तित्व बने हुए हैं।
जहां तक कन्नड़ और मराठी के साथ-साथ फारसी भाषा का इस्तेमाल करने की उनकी नीति का प्रश्न है, हमें यह समझना होगा कि उस समय भारतीय उपमहाद्वीप में फारसी ही राजदरबारों की भाषा थी। टीपू कतई धर्मांध नहीं थे। कांची कामकोटि पीठम के षंकराचार्य को लिखे एक पत्र में उन्होंने शंकराचार्य को ‘जगतगुरू’ (विश्व का शिक्षक) कहकर संबोधित किया और उनके मठ को बड़ी राशि दान के रूप में दी। इसके विपरीत, रघुनाथ राव पटवर्धन की मराठा सेना ने मैसूर के बेदानूर पर हमला कर श्रंगेरी मठ में लूटपाट की। मराठा सेना ने मठ को अपवित्र किया। शंकराचार्य ने इस बारे में टीपू को लिखा। टीपू ने पूरे सम्मान के साथ मठ की पुनर्प्रतिष्ठा की। उन्होंने श्रीरंगपट्नम के मंदिर को दान भी दिया। उनके राज में मैसूर में दस दिन तक दशहरा बड़े जोर शोर से मनाया जाता था और वाडियार परिवार का कोई सदस्य इस आयोजन का नेतृत्व करता था। ऐसा कहा जाता है कि उनके पिता, मध्य कर्नाटक के चित्रदुर्गा के एक सूफी संत थिप्पेरूद्रस्वामी के अनन्य भक्त थे।
टीपू के महामंत्री एक ब्राह्मण थे जिनका नाम पुरनैया था। उनके कई मंत्री भी ब्राह्मण थे। उन्होंने जो भी गठबंधन किए उसके पीछे धर्म नहीं बल्कि अपनी ताकत में इज़ाफा करने का प्रयास था। अपनी पुस्तक ‘सुल्तान-ए-खुदाद’ में सरफराज़ षेख ने ‘टीपू सुल्तान का घोषणापत्र’ प्रकाषित किया है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह घोषणा की है कि वे धर्म के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करेंगे, अपनी आखिरी सांस तक अपने साम्राज्य की रक्षा करेंगे और ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेकेंगे। यह सही है कि कुछ विशिष्ट समुदाय उनके निशाने पर थे। इस संबंध में टिप्पणी करते हुए इतिहासविद केट ब्रिटलबैंक लिखती हैं कि ‘‘उन्होंने ऐसा धार्मिक कारणों से नहीं बल्कि उन समुदायों को सज़ा देने के लिए किया था’’। उन्होंने जिन समुदायों को निशाना बनाया, वे वह थे जो उनकी दृष्टि में साम्राज्य के प्रति वफादार नहीं थे। तथ्य यह है कि उन्होंने  माहदेवी जैसे कई मुस्लिम समुदायों को भी निषाना बनाया। ये समुदाय वे थे जो अंग्रेज़ों के साथ थे और ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के घुड़सवार दस्ते के सदस्य थे। एक अन्य इतिहासविद सूसान बैले लिखती हैं कि अगर टीपू ने अपने राज्य के बाहर हिन्दुओं और ईसाईयों पर हमले किए तो यह भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि अपने राज्य में रहने वाले इन्हीं समुदायांे के सदस्यों के साथ उनके मधुर रिश्ते  थे।
टीपू को मुस्लिम कट्टरपंथी के रूप में प्रस्तुत करना अंग्रेज़ों के हित में था। उन्होंने यह प्रचार किया कि वे टीपू की तानाशाही से त्रस्त गैर-मुसलमानों की रक्षा के लिए टीपू के खिलाफ युद्ध कर रहे हैं। यह मात्र एक बहाना था। कहने की आवष्यकता नहीं कि आज के ज़माने में हम राजाओं और नवाबों का महिमामंडन नहीं कर सकते। वे हमारे राष्ट्रीय नायक नहीं हो सकते। परंतु इसके बाद भी, टीपू, भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न हिस्सों में तत्समय राज कर रहे भारतीय राजाओं से इस अर्थ में भिन्न थे कि वे अंग्रेज़ों के भारत में अपना राज कायम करने के खतरों को पहले से भांप सके। वे अंग्रेज़ों के खिलाफ युद्ध में सबसे पहले अपनी जान न्यौछावर करने वालों में से थे। भारत में स्वाधीनता आंदोलन, टीपू के बहुत बाद पनपना शुरू हुआ और इसमें आमजनों की भागीदारी थी। टीपू के बलिदान को मान्यता दी जाना ज़रूरी है। आज साम्प्रदायिक विचारधारा के बोलबाले के चलते टीपू जैसे नायकों का दानवीकरण किया जा रहा है। अंग्रेज़ों के खिलाफ युद्ध में टीपू की भूमिका को नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता।
-राम पुनियानी

        

रविवार, 20 नवंबर 2016

नोटबंदी देश का कालाधन निकालने की मोदी की योजना एक बड़ा छलावा

बाराबंकी। नोटबंदी के नाम देश का कालाधन निकालने की मोदी सरकार की योजना एक बड़ा छलावा है। मोदी जी यदि अगले चन्द वर्ष तक इसी तरह मनमाने रवैये देशहित व समाज हित को त्याग कर लेते रहे तो देश के सामने गम्भीर आर्थिक परिणाम खड़े हो जायेगें।     लोक संघर्ष पत्रिका के सलाहकार डा0 उमेश चन्द्र वर्मा की दिवंगत आत्मा की शान्ति के लिए गांधी भवन में आयोजित एक शोक सभा में उपस्थित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सह सचिव अरविन्द राजस्वरूप अपने उक्त विचार रख रहे थे। उन्होंने कहा कि देश इस समय जबरदस्त सामाजिक प्रक्रियाओं के दौर से गुजर रहा है जिनकी रफ्तार सुस्त अवश्य होती है। लेकिन निश्चित रूप से निर्णायक स्थिति तक पहुँचती है। उन्होंने जनता से आह्वान किया कि वर्तमान हालात से कतई निराश न हो और साम्राज्यवादी शक्तियों के विरूद्ध एक जुट होकर संघर्ष करें। एक न एक दिन वह सुबह जरूर आयेगी। मोदी जी के नोट बन्दी ऐलान को उन्होंने अपने चन्द उद्योगपति मित्रों को आर्थिक रूप से और सम्पन्न बनाने की प्रक्रिया बताया। उन्होंने कहा कि मोदी अब छोटे व्यवसायियों के हितों के संरक्षक नहीं है बल्कि उन 35 बड़े पूंजीपतियों के संरक्षक बन गये है जिन्होंने राष्ट्रीय बैंको को अस्सी हजार करोड़ रूपये लोन नहीं लौटाया है। कम्युनिस्ट नेता ने कहा कि साम्राज्यवादी विचारधारा का मुकाबला केवल साम्यवादी विचारधारा कर सकती है।
    देश के प्रसिद्ध ब्लागर रवीन्द्र प्रभात ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज देश व समाज एक खोखले व्यक्ति के ऊपर केन्द्रित होकर रह गया है जो ऐसे निर्णय ले रहा है जो देश व समाज के लिए अहितकारी है।
    प्रसिद्ध समाजवादी विचारक राजनाथ शर्मा ने कहा कि देश में वैचारिक शून्यता आ गयी है। इसी के कारण हमारा समाज व राजनीति दिशाहीन हो चली है और खुदरा नेताओं की उत्पत्ति हो रही है।
    जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष बृजेश दीक्षित ने शोक सभा में डा0 उमेश चन्द्र वर्मा को अपनी श्रृद्धाजंलि अर्पित करते हुए कहा कि उनको सच्ची श्रृद्धाजंलि हम तभी दे सकते है जो देश में गोडसेवाद को कमजोर करे। उन्होंने मोदी द्वारा नये पूँजीपति घरानो को बढ़ावा देना देश के लिए घातक बताया।
    उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महासचिव फवाद किदवाई ने अपने विचार रखते हुए कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में निष्पक्ष एवं निर्भीक मीडिया की अति आवश्यकता है। कारर्पोरेट मीडिया देश व समाज के लिए हितकारी नहीं है।
शोक सभा की अध्यक्षता बृजमोहन वर्मा तथा तारिक खान के संचालन में आयोजित शोक सभा के अन्त में स्वर्गीय डा0 उमेश चन्द्र वर्मा के सुपुत्र संजय कृष्ण मोहन वर्मा ने उपस्थितजन के प्रति आभार व्यक्त किया।
    शोक सभा में श्रृद्धांजलि अर्पित करने वालों में प्रबन्ध सम्पादक लोक संघर्ष पत्रिका के रणधीर सिंह सुमन, इं0 विनय श्रीवास्तव, डा0 जसवन्त सिंह, डा0 कौसर हुसैन, कदीर खान, हनोमान प्रसाद, मनोहर लाल वर्मा, श्याम बिहारी वर्मा, कौशल किशोर त्रिपाठी, मोहम्मद वसीम राईन आदि शामिल रहे।
    इस अवसर पर मुनेश्वर वर्मा, पुष्पेन्द्र सिंह, सरदार भूपेन्द्र सिंह, नीरज वर्मा, रामनरेश, गिरीश चन्द्र, मास्टर अतीकुर्रहमान, मिर्जा कसीम बेग, सत्येन्द्र यादव, विनय दास, गिरीश चन्द्र, रामलखन वर्मा, अवधेश आदि उपस्थित थे।



शनिवार, 19 नवंबर 2016

2000 रुपये का नोट: ठगी का नया तरीका तो नही है


भारतीय रिज़र्व बैंक जनता को दो हज़ार रुपये का नोट दे रहा है किन्तु जब आज बैंक ऑफ़ बरौदा की बाराबंकी शाखा में दो हज़ार रुपये का नोट खाते ज़मा करने से मना कर दिया. वहीँ, बैंक अधिकारीयों ने यह भी कहा कि सौ रुपये का भी नोट नहीं ज़मा किया जायेगा. यह नई गाइडलाइन्स अम्बानी के बहनोई उर्जित पटेल अर्थात रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया गवर्नर साहब का है. मोदी सरकार जितना लिखित कानून है उससे कहीं ज्यादा मौखिक कानून जारी कर रही है और मौखिक आदेश में कोई न कोई जालसाजी छिपी हुई है. 
                मोदी सरकार जनता को रंग छूटने वाला दो हज़ार रुपये का नोट दे रही है और जब बैंक में पुन: नहीं ज़मा हो पा रहा है तो इसका क्या अर्थ निकाला जाए. कहीं यह ठगी का नया गुजराती तरीका निकाला गया है. अभी तक जानकारी के अनुसार कोई रुपया अगर सरकार जारी करती है तो वह रुपया बैंक और सरकार स्वयं भी लेगी लेकिन झूठों की सरकार है, बागों में बहार है. 

सुमन