शुक्रवार, 17 अप्रैल 2015

राजनैतिक विचारधारा और इतिहास की व्याख्या

यद्यपि भारतीय उपमहाद्वीप के सभी निवासियों का सांझा इतिहास है तथापि विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओं में यकीन करने वाले अलग.अलग समूह, इस इतिहास को अलग.अलग दृष्टि से देखते हैं। दिल्ली में सरकार बदलने के बाद से, कई महत्वपूर्ण संस्थानों की नीतियों में रातों.रात बदलाव आ गया है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ;आईसीएचआर व राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान व प्रशिक्षण परिषद ;एनसीईआरटी, उन अनेक संस्थाओं में शामिल हैं, जिनके मुखिया बदल दिये गये हैं और नए मुखिया, संबंधित विषय में अपने ज्ञान से ज्यादा, शासक दल की विचारधारा के प्रति अपनी वफादारी के लिए जाने जाते हैं। ये वे संस्थान हैं जो इतिहास व शिक्षा सहित समाजविज्ञान के विभिन्न विषयों से संबंधित हैं। इन संस्थानों की नीतियों व नेतृत्व में परिवर्तन,भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस के इशारे पर किया गया प्रतीत होता है। आरएसएस की राजनैतिक विचारधारा हिंदू राष्ट्रवाद है, जो कि भारतीय राष्ट्रवाद और भारतीय संविधान के मूल्यों के खिलाफ है। आरएसएस के सरसंघचालक ने हाल ;3 मार्च 2015 में कहा था कि भारतीय इतिहास का'भगवाकरण' होना चाहिए। उनका समर्थन करते हुए भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि भारतीय इतिहास का भगवाकरण समय की आवश्यकता है और संबंधित मंत्री को इतिहास की पुस्तकों पर भगवा रंग चढाने में गर्व महसूस करना चाहिए।
इतिहास की किताबों के भगवाकरण से क्या आशय है ? भगवाकरण शब्द को प्रगतिशील व तर्कवादी इतिहासविदों और बुद्धिजीवियों ने तब गढ़ा था, जब वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ;1998 में मानव संसाधान विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने शिक्षा, इतिहास व अन्य समाजविज्ञानों के पाठ्यक्रमों और पाठ्यपुस्तकों में व्यापक परिवर्तन करने शुरू किए। जो किताबें मुरली मनोहर जोशी के कार्यकाल में लागू की गईं थीं उनमें कई तरह की आधारहीन बातें कही गईं थीं जैसे, चूंकि हम मनु के पुत्र हैं इसलिए हम मनुष्य या मानव कहलाते हैं,वैज्ञानिक यह मानते हैं कि पेड़.पौधे अजीवित होते हैं परंतु हिंदू, पेड़.पौधों को जीवित मानते हैं और जब बंदा बैरागी ने इस्लाम कुबूल करने से इंकार कर दिया तो उसके लड़के की हत्या कर उसका कलेजा निकालकर, बंदा बैरागी के मुंह में ठूंसा गया। इन पुस्तकों में सती प्रथा को राजपूतों की एक ऐसी परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया गया थाए जिस पर हम सब को गर्व होना चाहिए। मध्यकाल के इतिहास को भी जमकर तोड़ामरोड़ा गया। जैसे,यह कहा गया कि कुतुबमीनार का निर्माण सम्राट समुद्रगुप्त ने किया था और उसका मूल नाम विष्णुस्तंभ था। इन पुस्तकों में शिवाजी और अफजल खान, अकबर और महाराणा प्रताप, गुरू गोविंद सिंह और औरंगजैब़ के बीच हुए युद्धों.जो केवल और केवल सत्ता हासिल करने के लिए लड़े गये थे.को सांप्रदायिक रंग देते हुए उन्हें हिंदुओं और मुसलमानों के बीच युद्ध के रूप में प्रस्तुत किया गया।
इन परिवर्तनों की पेशेवर, प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष इतिहासविदों ने तार्किक आधार पर आलोचना की। उन्होंने इतिहास के इस रूप में प्रस्तुतिकरण के लिए 'शिक्षा का भगवाकरण' शब्द इस्तेमाल करना शुरू किया। परिवर्तनों की आलोचना का जवाब देते हुए मुरली मनोहर जोशी ने कहा ;अप्रैल 2003 कि यह भगवाकरण नहीं बल्कि इतिहास की विकृतियों को ठीक करने का प्रयास है। लेकिन अब, बदली हुई परिस्थितियों और परिवर्तित राजनैतिक समीकरणों के चलते, वे उसी शब्द.भगवाकरण.को न सिर्फ स्वीकार कर रहे हैं वरन् उस पर गर्व भी महसूस कर रहे हैं।
भारत में इतिहास का सांप्रदायिकीकरण,अंग्रेजों ने शुरू किया। उन्होंने हर ऐतिहासिक घटना को धर्म के चश्मे से देखना और प्रस्तुत करना प्रारंभ किया। अंग्रेजों के रचे इसी इतिहास को कुछ छोटे.मोटे परिवर्तनों के साथ, हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों ने अपना लिया। हिंदू सांप्रादयिक व राष्ट्रवादी तत्व कहते थे कि भारत हमेशा से एक हिंदू राष्ट्र है और मुसलमान व ईसाई, भारत में विदेशी हैं। मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों के लिए इतिहासए आठवीं सदी में मोहम्मद.बिन.कासिम के सिंध पर हमले से शुरू होता था। उनका दावा था कि चूंकि मुसलमान भारत के शासक थे इसलिए अंग्रेजों को इस देश का शासन मुसलमानों को सौंपकर यहां से जाना था। इतिहास के इसी संस्करण का किंचित परिवर्तित रूप पाकिस्तान में स्कूलों और कालेजों में पढ़ाया जाता है।
इसके विपरीत,जो लोग धर्मनिरपेक्ष, प्रजातांत्रिक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति प्रतिबद्ध थे उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी राजा का धर्म, उसकी नीतियों का निर्धारक नहीं हुआ करता था। यही बात स्वाधीनता आंदोलन के सर्वोच्च नेता महात्मा गांधी ने भी कही। अपनी पुस्तक 'हिंद स्वराज' में वे लिखते हैंए 'मुस्लिम राजाओं के शासन में हिंदू फलेफूले और हिंदू राजाओं के शासन में मुसलमान। दोनों पक्षों को यह एहसास था कि आपस में युद्ध करना आत्मघाती होगा और यह भी कि दोनों में से किसी को भी तलवार की नोंक पर अपना धर्म त्यागने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। इसलिए दोनों पक्षों ने शांतिपूर्वक, मिलजुलकर रहने का निर्णय किया। अंग्रेजों के आने के बाद दोनों पक्षों में विवाद और हिंसा शुरू हो गई.क्या हमें यह याद नहीं रखना चाहिए कि कई हिंदुओं और मुसलमानों के पूर्वज एक ही थे और उनकी नसों में एक ही खून बह रहा है? क्या कोई व्यक्ति मात्र इसलिए हमारा दुश्मन बन सकता है क्योंकि उसने अपना धर्म बदल लिया हैक्या मुसलमानों का ईश्वर, हिंदुओं के ईश्वर से अलग है? धर्म, दरअसल,एक ही स्थान पर पहुंचने के अलग.अलग रास्ते हैं। अगर हमारा लक्ष्य एक ही है तो इससे क्या फर्क पड़ता है कि हम अलग.अलग रास्तों से वहां पहुंच रहे हैं? इसमें विवाद या संघर्ष की क्या गुंजाईश है'
स्वाधीनता के बाद अंग्रेजों द्वारा रचे इतिहास को कुछ समय तक पढ़ाया जाता रहा। शनैः शनैः, इतिहास की पुस्तकों को तार्किक आधार देते हुए उनमें इतिहास पर हुये गंभीर शोध के नतीजों का समावेश किया जाने लगा। एनसीईआरटी के गठन के बाद,उन स्कूलों में, जिनमें एनसीईआरटी का पाठ्यक्रम लागू था, इतिहास की सांप्रदायिक व्याख्या वाली पुस्तकों के स्थान पर एनसीईआरटी की पुस्तकें पढ़ाई जाने लगीं। फिर, सन् 1998 में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन के सत्ता में आने के बादए डॉ.जोशी ने पाठ्यक्रम के सांप्रदायिकीकरण और शिक्षा के भगवाकरण का सघन अभियान चलाया। सन् 2004 में एनडीए सत्ता से बाहर हो गई और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए ने केंद्र में सत्ता संभाली। इसके बाद, कुछ हद तक, स्कूली पाठ्यपुस्तकों में वैज्ञानिक सोच और तार्किक विचारों की वापसी हुई और पुस्तकों को सांप्रदायिकता के जहर से मुक्त करने के प्रयास भी हुए। चाहे वह पाकिस्तान हो या भारत,इतिहास के सांप्रदायिक संस्करण का इस्तेमाल,धार्मिक राष्ट्रवाद को मजबूती देने के लिए किया जाता है। इसलिए भारत में ताजमहल को तेजो महालय नामक शिव मंदिर बताया जाता है और स्वाधीनता संग्राम को मुसलमानों के खिलाफ लड़ा गया धार्मिक युद्ध। मुस्लिम राजाओं को मंदिरों का ध्वंस करने व हिंदुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाने का दोषी बताया जाता है। इस विभाजनकारी पाठ्यक्रम का इस्तेमाल राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए होता है। पाकिस्तान में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों में मुस्लिम राजाओं का महिमामंडन किया जाता है और हिंदू राजाओं की चर्चा तक नहीं होती।
आरएसएस स्कूलों की एक विस्तृत श्रृंखला का संचालन करता है जिनमें सरस्वती शिशु मंदिर, एकल विद्यालय और विद्या भारती शामिल हैं। इन स्कूलों में इतिहास का सांप्रदायिक संस्करण पढ़ाया जाता है। वर्तमान सरकार की यही कोशिश है कि आरएसएस के स्कूलों का पाठ्यक्रम ही सरकारी शिक्षण संस्थाओं में लागू कर दिया जाए। जाहिर है कि यह खतरनाक कदम होगा। इससे विविधताओं से भरे हमारे बहुवादी देश में विघटनकारी ताकतें मजबूत होंगी।
-राम पुनियानी

रविवार, 5 अप्रैल 2015

घोर प्रतिगामी समय में एक योद्धा का जाना:जितेन्द्र रघुवंशी

 दुख चाहे जितना सघन हो, उसका आघात चाहे जितना गहरा, आंसू अन्ततः ख़ुश्क हो ही जाते हैं। स्पष्ट दिखाई न पड़ने के कारण मुझे नेत्र विशेषज्ञ से सम्पर्क करना पड़ा। जांच के बाद उन्होंने बताया कि अधिक पढ़ने के कारण आपकी आखें ख़ुश्क हो गयी हैं, यानी उनमें ड्राइनेस आ गयी है। कम से कम छः माह आंखो में दवा डालनी पड़ेगी। सो मैं आई ड्राप के सहारे दुनिया देख रहा हूं और पत्र पत्रिकाएं पढ़ पा रहा हूं। कुछ लिखने की भी कोशिश करता हूं।
    व्यवस्था के हाथों सफ़दर हाशमी की निमर्म जघन्य हत्या के बाद जितेन्द्र रघुवंशी का असमय, अत्यंत आकस्मिक रूप सेंहम सब को तड़पता बिलखता छोड़ कर चले जाना सांस्कृतिक साहित्यक व बौद्धिक जगत को भीतर तक हिला गया है। वेजन सांस्कृतिक आन्दोलन के अग्रणी नायक थे। अपने समय के संस्कृति कर्मियों, युवाओं व राजनैतिक कार्यकर्ताओं मे रचनात्मक उत्तेजना भर देने वाले उतने ही बहुआयामी संभावनाशील तथा प्रतिबद्ध एक दूसरे नायक का सहसा साथ छोड़कर जाना भीतर तक झझकोर कर रख गया। कितनी उम्मीदें लगाये बैठे थे हम, नित नई ऊर्जा पाने की आस में। नाव नहीं डूबी खेवन हार ही साथ छोड़ गया।
    औपनिवेशिक ग़़ुलामी से मुक्ति पाते ही हमारी राजनीतिक सामाजिक व्यवस्था ने हत्या के कितने नये तरीके़ ईजाद कर लिए हंै। स्वाइन फुलू ऐसा ही एक तरीक़ा है। सामूहिक नरसंहार की ये भी एक पद्धति है। मनुष्य अपने-अपने परिजनों के प्रति ही संशय ग्रस्त रहेगा तो बुद्धि उसकी कुन्द हो ही जायेगी। धर्मवाद, आडम्बरकर्मकाण्ड की बल्ले-बल्ले। लोग जाति एवम् धर्म के नाम पर लड़ते रहें, एक दूसरे को मारते रहें। लूट ख़ोरों के सहारे टिकी ज़ालिम व्यवस्था को और क्या चाहिए। तीव्र गति से आधुनिक होता प्रगति करता हमारा महान देश बीसवीं सदी समाप्त होने से पहले ही 21वीं सदी में पहंुच गया परन्तु हम 18वीं व 19वीं सदी की आशंकाओं, यातनाओं, आघातों, घरों में घुसे एवम वातावरण में सक्रिय अपने शत्रुओं से मुक्ति नहीं प्राप्त कर पाये। हम पे कब कहां से कैसे हमला हो जाये हम नहीं जानते। कैसी धोर विडम्बना है कि इस प्रकार की अनेकानेक यातनाओं, हिन्दुस्तानी अवाम को अभावों, वंचनाओं का दंश देने उन्हें आधुनिकता प्रगति के अवदानों से दूर रखने के षडयंत्रों के खि़लाफ चलने वाले संघर्षों के लिए जीवन समर्पित कर देने की रोमांचक मिसाल क़ायम करने वाला एक दृढ़ संकल्पी योद्धा ही समय की क्रूरता का शिकार हो गया। जितेन्द्र किसी एक व्यक्ति का नहीं, उनके भीतर उपस्थित कई व्यक्तियों, एक संस्था, एक आन्दोलन का नाम है। उन्हें देखकर उनसे मिलकर जननाट्य आन्दोलन के भविष्य के प्रति आश्वस्ति की अनुभूति होती थी तथा अतीत की समूची भव्यता एवम रोमांच सामने आ खड़ा होता था एक से एक चमकीले सितारों की श्रंखला उर्दू में कहें तो कहकशंा। अनिल डी सिल्वा, हिमाँशु राय, विनयराय, बलराज साहनी, ख़्वाजा अहमद अब्बास, अली सरदार जाफरी, ए0के0 हंगल, हबीब तनवीर रितविक घटक, आबिद रिज़वी विश्वनाथ आदिल, रशीद जहां, ज़ोहरा सहगल उजरा सहगल, सथ्यू, सत्यदेव दुबे, शैलेन्द्र, दमयंती, भीष्म साहनी स्वयम उनके पिता राजेन्द्र रघुवंशी, बिशनकपूर, बिशन खन्ना, अमृत लाल नागर, रजि़या सज्जाद, ज़हीर क़ुदसिया ज़ैदी, रफ़ी पीर, नियाज़ हैदर कैफ़ी आज़मी, शौकत कैफ़ी। अतीत और वर्तमान परम्परा और आधुनिकता को साधने का, उनके प्रति समान सजगता व सृजनशीलता बनाये रखने का उनमंे अदभुत कौशल था। ठीक उसी प्रकार जैसे लोक नाट्य परम्परा व आधुनिकरंगमंच के प्रति उनका कौतुहल एक सी सघनता रखता था। ये जानना विस्मय कारी हो सकता है कि वे भारतीय भाषाओं के रंगमंचों पर होने वाले विविध प्रयोगों, अन्वेषणों के साथ ही पाश्चात्य मंच की अधिकांश गतिविधियों नई विकसित होती पद्धतियों के बारे में चैंकाने वाली वाक़ाफि़यत रखते थे। इस वाक्फि़यत को वे अपनी सृजनात्मकता का हिस्सा बनाते हुए नित नया सीख़ने की ललक उनमें लगातार बनी रहती, ठीक उसी तरह जैसे उर्दू की प्रगतिशील शायरी व कथा साहित्य की उनकी जानकारी कभी कभी विस्मित करती थी। अक्सर वे इस बारे में नई अजानी बातें बताते। संस्मरणों का तो उनके पास जैसे एक विपुल ख़ज़ाना था। चुटकुले सुनने व सुनाने में उनकी ख़ासी दिल चस्पी थी। ये उनकी जि़न्दा दिली का सुबूत था। देसी चुटकुलों का आनन्द अपनी जगह उनसे रूसी चुटकुले सुनने का लुत्फ़ अलग था। आगरा में सम्पन्न शोक सभा में उनकी पत्नी का कथन कि वे ज्ञान का भण्डार थे, अतिश्योक्ति नहीं बल्कि उनके व्यक्तित्व का यथार्थ है। कल्पना कर पाना कठिन है कि इतनी सारी प्रतिभाओं ज्ञान विद्वता तथा दक्षताओं से सम्पन्न कोई व्यक्ति इतना सहज-हंसमुख हो सकता है। खाने-पीने घूमने के भी शौक़ीन। गंभीर बहसों विमर्शों में उनकी हिस्सेदारी उनके बहुआयमी व्यक्तित्व का एक दूसरा पक्ष उभारती थी। दिल्ली में प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय अधिवेशन था। वहां नामवर सिंह जी ने अपने व्यक्तव्य में कश्मीर के सम्बन्ध में एक ऐसी बात कह दी जिससे कई अन्य प्रतिभागियों के साथ वे भी सहमत नहीं थे, संयोग से वे मेरे ही बग़ल में बैठे हुए थे। सबसे पहले तो उन्होंने मुझसे ही अहमति प्रकट की। मैं उनके साथ था। नामवर जी की तक़रीर ख़त्म होते ही वे मंच की ओर गये और संचालक से अपनी बात कहने की अनुमति चाही। पूरी बे बाक़ी से उन्होंने अपनी असहमति दर्ज करायी। ग़लत से असहमति का उनका विवेक उतना ही प्रखर था जितना सच के समर्थन की उनकी तत्परता। उन्होंने एक बार मुझे महिला विरोधी हिंसा पर व्याख्यान देने के लिए आगरा आमंत्रित किया। आतिथ्य सत्कार की प्रशंसा मैं नहीं करूंगा, अपने व्याख्यान के दौरान जब मैंने भारतीय शिक्षा तंत्र में सक्रिय स्त्री अस्मिता पर आघात करने वाले तत्वों, विशेष रूप से पाठय सामग्री की ओर संकेत किया तो वहां उपस्थित एक पूर्व सांसद अथवा विधायक ने देश में गुरूकुल पद्धति की शिक्षा लागू करने की बात कही। इस पर मैंने जो कुछ कहा वो अपनी जगह, जितेन्द्र ने जो उस कार्यक्रम का संचालन कर रहे थे, उन सज्जन का प्रतिवाद करते हुए तीखे पन से कहा कि इस प्रकार के विचार समाज को प्रगतिशील व आधुनिक बनाने के हमारे अभियान को क्षति पहुंचाते हंै। बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं।
 आप में से बहुत से लोगो ने डा0 रशीद जहां का नाम सुना होगा। कथा कार व रंगकर्मी थीं, साथ में चिकित्सक और कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भी राजेन्द्र रघुवंशी के साथ वो भी मई 1943 में इप्टा के स्थापना सम्मेलन बम्बई में उपस्थित थीं। उनका शुमार इप्टा के संस्थापकों में होता है। उनके पति महमूदुज़्ज़फर विद्वान होने के साथ ही कम्युनिस्ट कार्यकर्ता भी थे। उनका सम्बन्ध एक रईस राज परिवार से था। रशीद जहां की क्षमताओं, अवास व अन्य साधनों का बड़ा हिस्सा पार्टी और प्रगतिशील लेखन व जन नाटय आन्दोलन को समर्पित था। वे इनकी गतिविधियो के लिए चन्दा जमा करने, फर्श पर दरी बिद्दाने, स्टेज सजाने, कहानी पढ़ने, से लेकर नाटक लिखने, तथा उनमे अभिनय करने तक का काम करती थीं। एक बार उन्हांेने अपने पति की शादी में मिली मूल्य वान शेर वानियां तथा अपने सभी अत्यंत क़ीमती कपड़े राजेन्द्र रधुवंशी जी को दे दिए थे कि इप्टा के नाटकों में इनका हस्बेज़रूरत इस्तेमाल हो सके।
राजेन्द्र रधुवंशी के रहते उनके आवास कि़दवाई पार्क (राजा की मंडी) जाने का मतलब होता था एक ऐसे लोक में पहुँचना जहां नाटक की रिहलसल, नृत्य व गायन का अभ्यास, प्लेरीडिंग से लेकर हारमोनियम व ढोलक की धुनांे एवमं तालें सुनने को मिल सकती थीं। समूचे परिवार को इन समस्त गतिविधियांे में संलग्न देखने का अपना भिन्न रोमांच था, अदभुत और उत्तेजक। राजेन्द्र जी का वृद्धावस्था में बच्चों किशोरो को गाना सिखाते देखना तो ग़ज़ब का अनुभव होता। राजेन्द्र जी का ये रंग संस्कार जितेन्द्र से होते हुए उनके समूचे परिवार का, संस्का बना। जिसमें बाद की पीढि़यां भी शामिल हैं। इस प्रकार उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को वंशानुगत मानने में संकोच नहीं होना चाहिए। इस स्मरण के साथ कि केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय का समृद्ध पुस्तकालय उनके बाबा ने स्थापित किया था। अतः विश्वास किया जा सकता है कि ये परम्परा उसी विविधता गरिमा से आगे भी जारी रहेगी। समूची इप्टा के समान वो भी धर्म निरपेक्ष पक्ष धरता से प्रतिबद्ध फ़ासीवादी साम्प्रदायिकता विरोधी जनाभियान के ज़रूरी भागीदार थे। वे इस मोर्चे पर कई तरह से अपना योगदान देते थे जैसे कि नाटक, गीत, भाषण, लेखन, ऐसे अवसरों पर सबको साथ ले चलने की उनकी छटपटाहट एक बड़ा मूल्य रचती थी। पारदर्शी लोकतांत्रिकता उनके व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा थी।
 आगरा, जहाँ उनके जीवन का बड़ा हिस्सा गुज़रा, सांस्कृतिक विवधता तथा सामाजिक समरसता के अनेक अध्याय अपने में संजोये है जहां सामंती अवशेषों के बीच संगीत, आध्यात्म, मेलों उत्सवों का अपना अलग ठाठ है। वो आगरा अपनी समूची चमक व लय के साथ उनके भीतर प्रत्येक सांस के साथ धड़कता था। आगरा की इस विविधता के प्रति वे उतने ही संवेदनशील थे जितने कि बामपंथी माक्र्सवादी वैज्ञानिकता के प्रति। इन्हीं विशिष्टताओं का प्रतिनिधित्व करते आगरा ही के लाल नज़ीर अकबराबादी उनके व उनके परिवार का आदर्श हंै। ताजमहल के पीछे स्थित नज़़ीर की मज़ार पर प्रत्येक बसंत पर जनोत्सव की जो बुनियाद राजेन्द्र जी ने रखी थी वो आज भी उसी शान से जारी है। मैं आगरा कई बार गया हँूं। नज़ीर की मज़ार भी गया लेकिन जीवन भर का अवसाद बन जाने वाले इस दंश को शायद मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा कि राजेन्द्र जी तथा जितेन्द्र के बार बार बुलाये जाने के बावजूद इच्छा होते हुए भी मैं इस उत्सव में कभी शरीक नहीं हो सका। जितेन्द्र की बहन ज्योत्सना ने जन ज्ञान विज्ञान समिति के लिए नज़ीर पर एक पठनीय पुस्तिका लिखी है।
    वे दिन जितेन्द्र के हमसे हमेशा के लिए बिछड़ने के दिन, धर्मान्धता रूढि़वाद, कर्मकाण्ड, जनदमन व अन्याय और सांप्रदायिकता के विरूद्ध किसी सधन धारदार अभियान के समान सक्रिय भाकपा के पूर्व विधायक कामरेड पानसरे की निर्मम क्रूर हत्या के विरूद्ध समूचे देश में निन्दा प्रतिरोध तथा विक्षोभ की अभिव्यक्ति के दिन थे। हम आर्द्रमन से सभाएं कर रहे थे, जुलूस निकाल रहे थे। उस दर्दनाक घटना से कुछ अर्सा पहले ही ढाका में खुली सड़क पर धार्मिक कट्टरवाद विरोधी एक बांग्लादेशी ब्लागर की सरेआम जघन्य हत्या के विरूद्ध भी हम चीख़ रहे थे, बाद में ऐसी कई इंसान मुख़लिफ़ घटनाएं घटती रही हैं, मानवता व संविधान के अपरा धी सम्मानित हो रहे हैं, हत्यारे कोर्ट से बरी किए जा रहे हैं। व्यापक रूप से स्वीकृत राष्ट्रीय आन्दोलन की थाती बन आये सामाजिक राजनैतिक मूल्यों पर निर्लज्ज आघात हो रहे हैं, ऐसे में जितेन्द्र हमें बराबर याद आते रहे हैं । उनकी मोहक मुस्कुराहट अब भी हमारा पीछा करती है। उनकी संकल्प बद्धता हमें झिंझोड़ती है।
उनके व्यक्त्वि में व्याप्त ऊर्जा उत्साह तथा कम्युनिस्ट कार्यकर्ता की बेलौस प्रतिबद्धता उन्हें लगातार सक्रिय रखती थी। पार्टी कार्यक्रमों और मजदूर आन्दोलनों में, उनके मुकदमे इत्यादि में, उनकी दिलचस्पी व भागीदारी दूसरों को प्रेरित करती थी। कम्युनिस्ट पार्टी उसके कार्यक्रमों नीतियों में उनके विश्वास तथा उनके जुुझारूपन का ही परिणाम है कि निकट अतीत में सम्पन्न हुए आगरा पार्टी के जि़ला सम्मेलन में उन्हें सर्वसम्मति से जि़ला सचिव बनाने का प्रस्ताव पारित हुआ। अपनी सृजनात्मक संगठनात्मक गतिविधियों के कारण जिससे उन्हें विनम्र असहमति प्रकट करनी पड़ी। इप्टा के राष्ट्रीय सचिव तथा प्रांतीय अध्यक्ष वो पहले ही से थे। उनके व्यक्तित्व का साहित्यिक पक्ष कम महत्वपूर्ण नहीं है। वे एक साथ लेखक अनुवादक एवम् कवि-कथाकार की प्रतिभा अपने में संजोये हुए थे। वे छात्रप्रिय अध्यापक थे। अयोध्या आन्दोलन के अन्तर्गत अयोध्या मार्च के दौरान मैंने देखा कि सार्वजनिक सभाओं में जोशीले भाषण देने में अथवा नारे लगाने में वे किसी से पीछे नहीं थे। पिछले वर्षों में सोशल मीडिया-नेट के माध्यम से समान विचार धारा के लोंगों, संस्कृति कर्मियों, लेखकों तथा इप्टा की इकाइयों से सम्पर्क संवाद स्थापित करने, लोगों में नित नया उत्साह सृजित करने, नित नई जानकारियां देने, महत्वपूर्ण जो इस माध्यम पर घटित हो रहा है, लिखा जा रहा हैं उसे साझा करने का बीड़ा उठाये हुए थे। जो किसी सरल लक्ष्य की ओर बढ़ना नहीं था। बल्कि एक कठिन लक्ष्य को साधना था। वे ही मुझे फे़सबुक पर लाये। वे ही थे या उनके पिता जो बार-बार कहते थे, शकील साहब मुक्ति संघर्ष में लिखना मत छोडि़येगा। मौजूदा घोर प्रतिगामी समय में जबकि प्रगतिशील जनवादी कलाकर्म व मूल्यों के सम्मुख, चुनौतियां दिन प्रतिदिन अधिक जटिल होती जा रही है, उनका न रहना बुरी तरह साल रहा है।
कितने गुण, कितनी क्षमताएं, कितनी प्रताभाएं यकजा थीं उस एक आदमी में ।
ऐसी मेघाएं विरल होती हैं।
 वे विरल थे, अद्वितीय थे, बहुत बड़े थे।
 उन्हें सलाम लाल सलाम

शकील सिद्दीक़ी
टिकैतराय योजना, लखनऊ-17
मो0-09839123525
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 20015 में प्रकाश्य

शिया सुन्नी तनाव: सफल अमेरिकी रणनीति का परिणाम?



        2011 में कई अरब व मध्य-पूर्व एशियाई देशों में फैले विद्रोह की आग अब यमन तक फैल गई है। वहां शिया समुदाय से संबंध रखने वाले हूदी मिलीशिया ने राष्ट्रपति आबिद रब्बू मंसूर हादी के विरुद्ध बड़े पैमाने पर विद्रोह कर उन्हें देश छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर दिया है। राष्ट्रपति हादी नेे यमन छोड़कर अदन में पनाह ली है जबकि हूदी विद्रोहियों ने यमन की राजधानी सना व उसके आसपास के क्षेत्रों में अपना पूरा नियंत्रण स्थापित कर लिया है। यमन में हालांकि 2011 के बाद से ही शिया-सुन्नी संघर्ष की चिंगारी धधक रही थी जिसने पिछले दिनों एक बड़े विद्रोह का रूप धारण कर लिया। गौरतलब है कि अमेरिकी सैन्य गठबंधन द्वारा तालिबान व उसके समर्थक लड़ाकों को अफगानिस्तान से खदेड़ने के बाद तमाम अलकायदा व अन्य सुन्नी लड़ाकों ने यमन में पनाह ली थी। इस समय यमन में एक ओर शिया विद्रोहियों को उन्हीं सुन्नी अलकायदा व वर्तमान आईएसआईएस समर्थकों से भी दो-दो हाथ करना पड़ रहा है तथा वहां की मान्यता प्राप्त सुन्नी सरकार से भी इनका मुकाबला है। यमन में शिया विद्रोह के बाद राष्ट्रपति मंसूर हादी द्वारा सहायता की अपील के बाद  प्रत्याशित रूप से सऊदी अरब ने अपने संयुक्त अरब अमीरात,मिस्र,कुवैत,कतर तथा बहरीन जैसे लगभग दस देशों के गठबंधन के साथ वहां शिया विद्रोहियों के विरुद्ध सैन्य कार्रवाई विशेष कर हवाई हमले शुरु कर दिए हैं । कहने को तो सऊदी अरब यह कार्रवाई यमन की संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्यता प्राप्त सरकार को शिया विद्रोहियों से बचाने तथा वहां शांति स्थापित करने के लिए कर रहा है। परंतु दरअसल अरब द्वारा इस कार्रवाई का मकसद यमन में ईरान समर्थित शिया विद्रोहियों को सत्ता पर कब्ज़ा जमाने की कोशिशों से रोकना है। यहां यह भी  काबिलेगौर है कि यमन में हूदी मलीशिया को ईरान द्वारा प्रशिक्षित किए जाने तथा इन्हें हथियारों की आपूर्ति करने का आरोप है जबकि ईरान इन आरोपों से इंकार करता आ रहा है।
        यमन में पैदा हुए इस ताज़ातरीन घटनाक्रम ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया है। यमन के बहाने र्इ्ररान व सऊदी अरब को सामने ला खड़ा करने में अमेरिका की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि जिस सुन्नी विशेषकर वहाबी विचारधारा रखने वाले कट्टरपंथी बेरहम आतंकवादी संगठन आईएस ने अबु बकर अल बगदादी के नेतृत्व में सीरिया व इराक सहित कई देशों में आतंक फैला रखा है तथा कट्टरपंथी इस्लामी साम्राज्य स्थापित करने के मंसूबे पर अमल करते हुए आए दिन क्रूरता के नए इतिहास लिख रहा है, सऊदी अरब व उसके सहयोगी देशों ने आखिर  उस आइ्रएसआईएस के विरुद्ध अब तक अपना सैन्य गठबंधन इतनी सक्रियता के साथ क्यों नहीं खड़ा किया? आखिर  आईएस के लड़ाकों पर सऊदी अरब व उसके सहयोगी अरब देश इतनी सक्रियता से हवाई हमले क्यों नहीं कर रहे? एक और सवाल इसी आईएसआईएस के जेहादी मिशन से जुड़ा यह कि इन वहाबी सुन्नियों के संगठन के विरुद्ध अमेरिका ने ईरान से ही सहयोग लेने की ज़रूरत क्यों कर महसूस की? इराक व यमन में अमेरिकी रणनीति के अजीबो-गरीब समीकरण दिखाई दे रहे हैं। यानी एक ओर तो यमन में शिया विद्रोहियों के विरुद्ध अमेरिका सऊदी अरब व उसके गठबंधन सहयोगियों को सहयोग दे रहा है तो दूसरी ओर इराक में आईएसआईएस के विरुद्ध ईरान के सहयोग से अपना अभियान चला रहा है। जबकि यमन के विद्रोहियों को ईरानी समर्थन प्राप्त बताया जा रहा है और वहाबी आईएसआइ्रएस लड़ाकों को सऊदी अरब का नैतिक समर्थन हासिल है। ईरान के उपविदेश मंत्री हुसैन अमीर अब्दुल लाहियान ने पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव से मुलाकात कर यमन में सऊदी अरब के सैन्य हस्तक्षेप को तत्काल रोके जाने की अपील की है। ईरान ने यह चेतावनी भी दी है कि इस प्रकार के हमले सऊदी अरब के हित में कतई नहीं हैं और सऊदी अरब के इस कदम से पूरे क्षेत्र की शांति को खतरा हो सकता है। ईरानी मंत्री ने संयुक्त राष्ट्र से मांग की कि वह यमन में अपने प्रभाव का प्रयोग करते हुए सऊदी अरब से यमन में हवाई हमले तत्काल बंद करने को कहे।
        यमन में अरब हस्तक्षेप में अमेरिकी भूमिका और इस आग को हवा देने में अमेरिकी जल्दबाज़ी का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों प्रमुख अमेरिकी मीडिया हाऊस सीएनएन ने यह समाचार प्रसारित किया कि पाकिस्तान भी सऊदी अरब गठबंधन के साथ यमन के शिया विद्रोह को कुचलने में शामिल हो गया है। तथा उसके 15 लड़ाकू विमान यमन में हूदी विद्राहियों के विरुद्ध हो रहे हवाई हमलों में हिस्सा ले रहे हैं। इस समाचार के प्रसारित होते ही पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने इन समाचारों का ज़ोरदार खंडन करते हुए इस आशय की सभी खबरों को बेबुनियाद बताया और कहा कि पाकिस्तान सऊदी अरब गठबंधन का हिस्सा बनकर यमन में हो रही कार्रवाई में भाग नहीं ले रहा है। सवाल यह है कि फिर पाकिस्तान के हवाले से इतनी गैर जि़म्मेदराना खबर प्रसारित करने का सीएनएन का मकसद आखिर  क्या था?क्या यह विश्व में शिया-सुन्नी समुदायों के बीच फासला पैदा करने तथा पाकिस्तान को अरब समर्थक व ईरान विरोधी देश प्रमाणित करने का एक अमेरिकी प्रयास नहीं तो और क्या था?  इस समय यमन के भीतरी हालात सत्ता संघर्ष के उस खतरनाक दौर से गुज़र रहे हैं कि यदि यमनवासियों की अपनी सूझबूझ से यह हालात यथाशीघ्र नियंत्रित नहीं हो सके तो बाहरी दखल अंदाज़ी के चलते युद्ध क्षेत्र बनता जा रहा यमन एक बड़ी अमेरिकी साजि़श का शिकार होने से स्वयं को बचा नहीं सकेगा। और कोई आश्यर्च नहीं कि यमन गृहयुद्ध की भेंट चढ़ने के बाद दुनिया में दूसरा सोमालिया बन जाए? और यदि ऐसा हुआ तो यह दुनिया में शांति के नाम पर घड़ियाली आंसू बहाने वाले अमेरिका की एक सफल रणनीति मानी जाएगी।
        पिछले दिनों ईरान के परमाणु मुद्दे को लेकर अमेरिका के रुख में आई नरमी को लेकर भी सऊदी अरब काफी चिंतित है। न तो उसे ईरान के प्रति अमेरिका का बदलता जा रहा लचीला रुख भा रहा है न ही इराक में आईएस के विरुद्ध होने वाले हमलों में अमेरिका-ईरान सहयोग उसके गले उतर रहा है। यमन में सऊदी अरब का सैन्य गठबंधन सहयोगी देशों के साथ दखल अंदाज़ी करना अरब की ईरान के प्रति खीझ का भी एक परिणाम है। इस पूरे घटनाक्रम में एक और मज़े की बात यह भी है कि भले ही पश्चिमी मीडिया आईएसआईएस,यमन प्रकरण तथा हूदी विद्रोहियों के मामलों में ईरान व अरब की अलग-अलग दखल अंदाजि़यों को मुस्लिम जगत के व्यापक स्तर पर होने वाले शिया-सुन्नी तनाव के रूप में क्यों न प्रचारित कर रहे हों, परंतु इसी तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि दुनिया के कई मुस्लिम देश तथा आम मुस्लिम जनता इस पूरे घटनाक्रम को शिया-सुन्नी तनाव के रूप में नहीं देखना चाहती। विश्व की एक बड़ी सुन्नी आबादी का भी यही मत है कि मुस्लिम देशों को ऐसे शासकों से निजात मिलनी चाहिए जो अमेरिका के पिछलग्गू बने रहते हैं। ऐसी विचारधारा रखने वाला विश्व का एक बड़ा सुन्नी वर्ग ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदी नेजाद तथा ईरान की अमेरिका के विरुद्ध अपना कड़ा रुख रखने वाली नीतियों का भी समर्थक है। यही वह वर्ग है जो भले ही सद्दाम हुसैन की क्रूरता व उसकी तानाशाही का विरोधी तो ज़रूर था परंतु अमेरिका के विरुद्ध सद्दाम हुसैन के कड़े रुख का समर्थक था। परंतु निश्चित रूप से यह सुन्नी जगत सऊदी अरब व अरब देशों के अन्य अमेरिकी कठपुतली नुमा शासकों के विरुद्ध है। परंतु अपनी तानाशाही को बचाने के लिए तथा आम लोगों के विद्रोह से स्वयं को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से अमेरिका की खुशामदपरस्ती करना अरब शासकों व तानाशाहों की मजबूरी बन चुकी है। दूसरी ओर अमेरिका भी पूरे विश्व में स्वयं को लोकतंत्र का कितना बड़ा हिमायती क्यों न बताता हो परंतु अरब देशों में उसी अमेरिका को न तो राजशाही नज़र आती है न ही तानाशाही?
        इसमें कोई शक नहीं कि आज अगर पूरा मुस्लिम जगत संगठित होता तथा इनमें विश्वास का वातावरण होता तो फिलिस्तीन कब का स्वतंत्र हो चुका होता और इज़राईल की क्रूरता का समय-समय पर शिकार न हो रहा होता। इराक,सीरिया व अफगानिस्तान भी इस प्रकार से बरबाद न हुए होते। परंतु एक बड़ी अमेरिकी चाल का शिकार होते हुए मुस्लिम देश कहीं एक-दूसरे देश से टकराते गए तो कहीं जातीय संघर्ष में अपने ही देश को तबाह कर डाला। और इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अब अमेरिका ने यमन के बहाने अरब व ईरान को आमने-सामने खड़ा कर पूरे विश्व को शिया-सुन्नी संघर्ष की आग में झोंकने का प्रयास किया है। इसे एक सफल अमेरिकी रणनीति का परिणाम तो ज़रूर कहा जा सकता है परंतु देखना यह होगा कि मुस्लिम जगत अमेरिका की इस चाल का शिकार किस हद तक हो पाता है और किस हद तक वह स्वयं को इस अमेरिकी साजि़श से सुरक्षित रख पाता है?
  -तनवीर जाफरी

शनिवार, 4 अप्रैल 2015

भागो-भागो, विकास आया, पहले से भी तेज आया

वित्त मंत्री द्वारा हर वर्ष बजट पेश करना सरकार और मीडिया के लिए एक वार्षिकोत्सव जैसा होता है। बजट के आँकड़ों और घोषणाओं के साथ-साथ सेंसेक्स का उतार-चढ़ाव नाटकीय ढंग से दिखाया जाता है। राजनेताओं से उनके रुख को जाना जाता है। काॅर्पोरेट घरानों की नुमाइंदगी करने वाले लोग और अर्थशास्त्री स्टूडियो में आकर अपना विशेषज्ञ विष्लेषण देते हैं। मीडिया रिपोर्टर बीच-बीच में आम लोगों से बजट पर उनकी प्रतिक्रिया जानना चाहते हैं। गृहिणियों व महिलाओं से और रास्ते चलते युवाओं से भी कुछ सवाल पूछे जाते हैं। ज़ाहिर है कि सरकार और सरकार के हिमायती बजट की तारीफ़ करते हैं और विपक्षी दलों के लोग और सरकार विरोधी सोच से प्रभावित लोग बजट को और कुछ नहीं, बस गलतियों का पुलिंदा भर मानते हैं।
इस बार भी सरकार का कहना है कि मोदी का (माफ़ कीजिए, अरुण जेटली का) वर्ष 2015-16 का बजट बजट देश की अर्थ व्यवस्था का कायाकल्प कर देगा। वहीं काँग्रेस सरकार में वित्तमंत्री रहे चिदम्बरम का कहना है कि न तो सरकार ने इस बजट में राजकोषीय और वित्तीय संतुलन पर ध्यान दिया है और न ही पुनर्वितरण संबंधी कोई कदम उठाये हैं कि जिनसे ग़रीब तबक़ों को कुछ तो हासिल हो।
इस सारे उत्सव को देखकर कोई अगर यह सोचे कि बजट देश की आर्थिक नीति की दिशा तय करता है तो ये उसका भोलापन ही कहा जाएगा। बजट केवल सरकार द्वारा चुनी गई आर्थिक नीति पर मुहर लगाता है। वो तय तो पहले ही की जा चुकी होती है। मोदी सरकार का ‘मेक इन इंडिया’ का आह्वान, बीमा और ज़मीन अधिग्रहण के अध्यादेश और ऐसे तमाम आदेश स्पष्ट संकेत देते हैं कि सरकार की प्रतिबद्धता देशी और विदेशी पूँजी के मुनाफ़े के रास्ते को आसान और सुविधाजनक बनाना है। अरुण जेटली के शब्दों में कहें तो, ‘कुछ तो फूल खिलाए हमने, और कुछ फूल खिलाने हैं।’ देश की ग़रीब जनता की बढ़ती हुई बदहाली से सरकार का कोई ख़ास सरोकार नहीं है।
वर्ष 1991 से हिंदुस्तान में नई आर्थिक नीति अपनाने के बाद से प्रत्येक वर्ष के बजट का केन्द्र बिंदु  वित्तीय घाटे को सीमा में बाँधे रखने का रहता है। राजग-1 के कार्यकाल के दौरान वित्तमंत्री यशवंत सिन्हा ने ‘राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन’ संबंधी विधेयक पेश किया था जिसे 2003 में बाकायदा कानून बना दिया गया। उक्त विधेयक का मकसद राजकोषीय अनुशासन को संस्थागत रूप देना था। इस कानून में कुछ समयबद्ध लक्ष्य तय किये गए। एक लक्ष्य था 2008 तक राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 3 प्रतिशत तक ले आना और दूसरा लक्ष्य था राजस्व घाटे को शून्य पर ले आना।
    बहरहाल 2007-8 में वैष्विक वित्तीय संकट से मंदी का खतरा सारी दुनिया पर मंडराया। तब दुनियाभर के देषों ने ‘कीन्सियन’ नसीहत के अनुसार राजकोषीय घाटे से अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने का नुस्खा अपनाया। हिंदुस्तान में भी मंदी का ख़तरा सामने देख 2003 में बनाये गए क़ानून के सारे लक्ष्य भुला दिए गए और 2008-9 और 2009-10 में राजकोषीय घाटा जीडीपी के 5.9 और 6.5 प्रतिशत के स्तर तक पहुँच गया।
अब चिदांबरम कह रहे हैं कि 2008-9 और 2009-10 में जो खर्चीली राजकोषीय नीतियाँ अपनायी गईं, वे ही महँगाई का और इस तरह काँग्रेस नेतृत्व वाली संप्रग सरकार के चुनाव हारने का कारण बनीं। दरअसल राजकोषीय घाटे का महँगाई या भुगतान संतुलन के संकट के साथ सीधा संबंध स्थापित करना सही नहीं है। लेकिन नवउदारवाद के साँचे में बार-बार यही दुहाई देकर तीसरी दुनिया की राजकोषीय  स्वतंत्रता पर यह अंकुश लगाया जा रहा है कि अगर किसी देश को उसकी जनता के लिए कुछ कल्याणकारी काम शुरू करने के लिए खर्च करना की ज़रूरत है तो भी वह देश इस पर खर्च न कर सके। वस्तुतः यह मेट्रोपोलिटन वित्तीय पूँजी का तीसरी दुनिया के व योरप के कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले मुल्कों की आर्थिक संप्रभुता पर सीधा हमला है। जब भी कोई देश व्यापार या कर्ज के संकट में होता है तो उसे मदद करने वाले अंतरराष्ट्रीय समझौतों की ये शर्त होती है कि वह पहले अपने देश में ख़र्च कम करे या तथाकथित ‘आॅस्टेरिटी मेजर्स’ अपनाये जैसा अभी ग्रीस में हुआ। इसका सीधा आशय है कि अगर आप अपने राजकोषीय घाटे को अपने देश की जनता की ज़रूरत के मुताबिक कम या ज़्यादा करना चाहते हैं तो ये अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी को चुनौती देना है। और ये काम न तो संप्रग के बस का था और न ही राजग के बस का है। इसलिए राजकोषीय घाटे को पटरी पर लाना, जैसा कि अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी चाहती है, हमारी सरकारों की मजबूरी है। बस यही हमारे वित्तमंत्रियों की योग्यता का पैमाना है। अरुण जेटली की उपलब्धि यह है कि वे पिछले साल के 4.1 प्रतिषत के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पूरा करने में समर्थ हैं। उनका वादा है कि इस वर्ष का राजकोषीय घाटा 3.9 प्रतिशत रहेगा और अगले तीन सालों में यह कम होकर 3 प्रतिशत हो जाएगा।
पिछले साल के 4.1 प्रतिशत के लक्ष्य को कायम करने के लिए जो कवायद की गई उसे नज़रंदाज़ नहीं करना चाहिए। पिछले वर्ष के बजट में जो अनुमानित आय करों से और सार्वजनिक क्षेत्र के विनिवेश से बतायी गई, वो वास्तविकता से कहीं ज़्यादा थी। असल में आय अनुमान से काफ़ी कम हुई और राजकोषीय घाटे को कम करने के लिए ये ज़रूरी था कि ख़र्च को काफ़ी कम किया जाए। यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि कुछ ख़र्चों को कम करने का अखि़्तयार वित्तमंत्री के वश में भी नहीं होता मसलन ब्याज भुगतान या रक्षा बजट। ये करने ही होते हैं। जो कम किया जा सकता है, वो सामाजिक क्षेत्र पर होने वाला व्यय ही है।
पिछले वर्ष के 4.1 प्रतिषत के लक्ष्य को पूरा करने के लिए मंत्रालयों के केन्द्रीय योजना के बजट समर्थन में 20 से 50 प्रतिशत तक की कमी की गई। इनमें स्वास्थ्य मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय और आवास एवं शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्रालय प्रमुख हैं। इस वर्ष के बजट में ये किस्सा दोहराया जाएगा कि नहीं, ये तो अगले ही साल पता चलेगा लेकिन 3.9 प्रतिशत का लक्ष्य तय करते समय अरुण जेटली ने इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि आय और व्यय, दोनों ही दृष्टियों से काॅर्पोरेट सेक्टर और अमीर तबक़े को फायदा हासिल हो। टैक्स से होने वाली आमदनी बढ़ाने के लिए उन्होंने सर्विस टैक्स बढ़ा दिया जिससे रुपये 23383 करोड़ का राजस्व मिलेगा। इसका अपेक्षाकृत अधिक भार ग़रीब तबक़े पर पड़ेगा। दूसरी तरफ़ काॅर्पोरेट टैक्स की दर 30 प्रतिशत से कम करके 25 प्रतिशत कर दी गई है और संपत्तिकर हटा दिया गया है। इससे राजस्व की आमदनी में रुपये 8315 करोड़ की कमी आएगी।
जहाँ तक व्यय का सवाल है, उसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण के लिए भारी वृद्धि की गई है। इन्फ्रास्ट्रक्चर निर्माण का अर्थ कोई गाँव व ग़रीबों के लिए सुविधाजनक जीवन स्थितियों का निर्माण नहीं, बल्कि एक्सप्रेस हाइवे, आधुनिक एयरपोर्ट, आधुनिक सूचना-संचार सुविधाएँ और काॅर्पोरेट सेक्टर के लिए अन्य सुविधाएँ बढ़ाना ही है। मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने कोशिश की थी कि देश के इस इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत हो। मनमोहन-मोंटेक माॅडल से प्राइवेट और काॅर्पोरेट सेक्टर के लिए बनी जगह में मुनाफ़े की आस में तमाम कंपनियाँ इस क्षेत्र में दाखि़ल हो गईं जिन्हें सार्वजनिक बैंकों से सस्ती दरों पर भारी-भरकम कर्ज मुहैया कराया गया। नतीजा ये है कि अब बैंकों के पास नाॅन परफाॅर्मिंग असेट्स का अंबार लग गया है। जेटली जी ने इस मुष्किल का समाधान ये निकाला कि उन्होंने काॅर्पोरेट को रियायत देते हुए कहा कि कोई बात नहीं। अगर पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप भी आपको रास नहीं आ रही तो पब्लिक सेक्टर ही आपके लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित कर देगा।
काॅर्पोरेट सेक्टर को ये सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए जिन मदों में बजट में कटौती की गई है, वे हैं आईसीडीएस (आँगनवाड़ी और आशा), सर्वशिक्षा अभियान, कृषि, एससी-एसटी सबप्लान, पेयजल, पंचायती राज, आदि वे सभी मदें जो ग़रीबों की जि़ंदगी को थोड़ी राहत पहुँचाती हैं। तर्क ये है कि चूँकि राज्यों को आवंटित किया जाने वाला कोष बढ़ा दिया गया है इसलिए केन्द्र की इस कटौती की भरपाई राज्य सरकारों द्वारा की जाएगी।
अंत में मनरेगा का उल्लेख करना ज़रूरी है। बजट में मनरेगा को 34000 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 34600 करोड़ रुपये कोष आवंटित किया गया है। ये ज़रूरत के सामने कितना अपर्याप्त है इसका अंदाज़ा एक इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि मनरेगा में ऐसे बहुत से मामले हैं जहाँ लोगों से काम करवा लिया गया लेकिन पैसे न होने से भुगतान नहीं किया गया। इसका जो आंशिक भुगतान राज्य सरकारों ने अपने कोष से कर दिया था, अभी उसका ही केन्द्र सरकार को 6000 करोड़ रुपया देना बाकी है। और फिर अब तो मनरेगा पर खर्च की कोई सीमा नहीं बाँधी जा सकती क्योंकि अब यह लोगों का संवैधानिक अधिकार है कि अगर वे काम माँगें तो उन्हें काम देना सरकार की जिम्मेदारी होगी। संक्षेप में इस बजट का विष्लेषण यही है कि मनमोहन सिंह और मोंटेक सिंह देश को जिस दिशा में ले जा रहे थे, मोदी और जेटली हमें उसी दिशा में और तेज रफ्तार के साथ धकका देने के लिए कमर कसे हैं।
-जया मेहता
जन अर्थशास्त्री हैं और दिल्ली स्थित जोशी-अधिकारी इंस्टिट्यूट आॅफ़ सोशल स्टडीज़ के साथ संबद्ध हैं।

हिन्दू राष्ट्र,गाय व मुसलमान---भाग.2

सन 1966 के आसपास, हिन्दू राष्ट्रवादियों ने गाय के मुद्दे पर एक बार फिर अपना ध्यान केन्द्रित किया। तत्समय नवगठित विश्व हिन्दू परिषद ने गौवध.विरोधी आंदोलन शुरू कर, हिन्दुओं को लामबंद करने की कोशिश की, यद्यपि यह प्रयास अधिक सफल न हो सका। सन 1967 में हजारों साधुओं ने संसद पर प्रदर्शन कर गौवध को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की मांग की। शनैः.शनैः, गाय और बोतलबंद गंगाजल, हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों के मुसलमानों को गौहत्यारा बताने के अभियान के स्थायी प्रतीक बन गए। गाय को पवित्र और ईश्वरीय दर्जा दिया जाने लगा। गौमूत्र और गाय के गोबर का जबरदस्त महिमामंडन किया गया और उन्हें कई रोगों का रामबाण इलाज बताया जाने लगा। लाखों की संख्या में ऐसे पोस्टर देश भर में लगाये गए, जिनमें विभिन्न देवताओं का वास, गाय के शरीर में बताया गया था। सन 2010 में दो प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में यह खबर छपी कि आरएसएस से जुड़े 'गौ विज्ञान अनुसंधान केंद्र'  ने गौमूत्र से एक ऐसी दवा बनाई है,जिससे कैंसर ठीक हो सकता है और इस दवा का अमरीका में पेटेंट भी करा लिया गया है।    
विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में गौशालाएं स्थापित हो गयीं और सरकारी धन से बूढ़ी गायों की देखभाल का प्रबंध होने लगा। हरियाणा में ऐसी बहुत.सी गौशालाएं हैं, जिन्हें राज्य सरकार से अनुदान प्राप्त होता है और दान के रूप में भी भारी.भरकम राशि मिलती है। परंतु फिर भीए बूढी गायों को न तो भरपेट भोजन मिलता है और ना ही उनकी उचित देखभाल की जाती है। यही हालत, कुछ अपवादों को छोड़कर, देश के सभी हिस्सों में चल रहीं गोशालाओं की है। इन गोशालाओं के संचालकों के लिएए अधिक संख्या में गायों का अर्थ होता है ज्यादा अनुदान। जाहिर है कि उनकी रूचि इसी में रहती है की गौवध पर पूर्ण प्रतिबन्ध लग जाए और इसलिए ही वे बूढी गायों की उपयोगिता का अतिश्योक्तिपूर्ण प्रचार करते हैं।
गौरक्षक दल और हिन्दू राष्ट्रवादी
विभिन्न प्रदेशों में 4.6 सदस्यीय गौरक्षक दल गठित हो गए हैं। इनकी संख्या, भाजपा.शासित राज्यों में ज्यादा है, जहाँ उनका मजबूत जाल है और उन्हें अनौपचारिक रूप से सरकार का संरक्षण प्राप्त है। ये दल सड़कों पर डेरा जमाये रहते हैं और मवेशी ले जा रहे ट्रकों को रोक लेते हैं। ये ट्रक सामान्यतः केवल मवेशियों को विक्रेता से क्रेता तक पहुंचाने का काम कर रहे होते हैं। अगर ट्रक का ड्राईवर या मालिक मुसलमान हो, तब तो उनकी खैर नहीं। अगर वाहन में सभी जरूरी कागजात उपलब्ध हों तब भी ये लोग ड्राईवर की बेतहाशा पिटाई लगाते हैं और अगर उन्हें मुंहमांगी रकम नहीं दी जाती तो वे मवेशियों पर कब्जा कर लेते हैं। ड्राईवर को मीडिया के सामने प्रस्तुत किया जाता है ताकि मुसलमानों को गौहत्यारा बताया जा सके। बाद में ड्राईवर को पुलिस के हवाले कर दिया जाता है। पुलिस, गौरक्षक दल के सदस्यों की बजाए, ड्राईवर पर मुकदमा कायम कर देती है।
इस लेखक ने गुजरात के कच्छ इलाके में कई ऐसी घटनाओं की जांच और राजस्थान के मेवात और मध्यप्रदेश के अनेक शहरों में हुईं इस तरह की घटनाओं की विस्तृत जानकारी एकत्रित की है। अकेले अहमदाबाद में कम से कम 64 ऐसे दल हैं। मीडिया में लगातार मुसलमानों को कसाईयों के रूप में प्रस्तुत किए जाने और सोशल मीडिया साईटों पर फोटोशॉप इत्यादि का इस्तेमाल कर रूपांतरित किये गये फोटो अपलोड करने के नतीजे में,देश में कई स्थानों में सांप्रदायिक दंगे हुए हैं। अहमदाबाद में सन् 1969 में सांप्रदायिक हिंसा इस अफवाह के बाद शुरू हुई कि मुसलमानों द्वारा बेरहमी से गायों की पिटाई की जा रही है। महाराष्ट्र के धुले में 5 अक्टूबर 2008 को दंगे तब शुरू हुए जब हिंदू रक्षक समिति ने शहर में बड़ी संख्या में ऐसे पोस्टर चिपकाये जिनमें मुस्लिम टोपी पहने एक दाढ़ी वाला आदमी, बड़ी क्रूरता से एक गाय को काट रहा है। पुलिस के जिस डीएसपी से हमने बात की उसने बताया कि पोस्टर में जो चित्र लगाया गया थाए वह बम धमाके में मारी गई एक गाय का था। पोस्टर में अत्यंत भड़काऊ और आपत्तिजनक बातें थीं परंतु पुलिस ने पूरे पोस्टर को हटाने की बजाए केवल उस हिस्से पर कागज की पर्चियां चिपकवा दीं।
हिंदू राष्ट्रवादी, गाय के प्रतीक का इस्तेमाल मवेशियों को ढोने वाले ट्रांसपोटरों से अवैध वसूली करने,मुस्लिम समुदाय के विरूद्ध घृणा फैलाने और सांप्रदायिक दंगे करवाने के लिए तो करते ही हैं, वे इसका इस्तेमाल अपने एक वृहद राजनैतिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भी करते हैं और वह है ऊँची जातियों के हिंदुओं और ओबीसी के एक हिस्से को एकसूत्र में बांधना। ऊँची जातियां, हिंदू आबादी का 15 प्रतिशत से भी कम हैं। गौरक्षा के नाम पर चलाए जा रहे अभियान का इस्तेमालए अलग.अलग दलों से जुड़ी ऊँची जातियों व ओबीसी के एक हिस्से को एक करने और उन्हें कांग्रेस व क्षेत्रीय पार्टियों से दूर करने के लिए किया जाता है। इससे ऊँची जातियों के सांस्कृतिक व राजनैतिक वर्चस्व को बनाए रखने में मदद मिलती है और तथाकथित 'हिंदू संस्कृति' को बढ़ावा देकर, दलितों और आदिवासियों की संस्कृति व खानपान की उनकी परंपरा को हाशिए पर पटकने की कोशिश की जाती है। गाय को गौमाता मानने और उसकी पूजा करने की प्रथा को पूरे देश पर लादने की कोशिश, सांस्कृतिक विविधता को नकारने का प्रयास है। हमारे देश में अलग.अलग धार्मिक विश्वास व आचरण प्रचलित हैं। गौमाता के नाम पर सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने का उद्देश्य, दरअसल, गौमाता के पूजकों का राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करना है। यह उन वर्गों का सांस्कृतिक.राजनैतिक दमन करने का प्रयास है जो गाय को माता नहीं मानते और जिन्हें गौमांस से परहेज नहीं है।
आश्चर्य नहीं कि हरियाणा के गोहाना में पांच दलितों को तब क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया था जब वे एक मरी हुई गाय की खाल उतार रहे थे। यह उनका पारंपरिक पेशा था। उन पर यह झूठा आरोप मढ़ा गया कि वे जिंदा गाय की खाल उतार रहे थे.ठीक उसी तरह,जिस तरह मुसलमान ट्रक मालिकों और ड्रायवरों पर यह झूठा आरोप लगाया जाता है कि वे गायों को बूचड़खाने पहुंचाने का काम करते हैं। इन सब का उद्देश्य गाय की रक्षा करना नहीं वरन् दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों पर सांस्कृतिक और राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करना है। इस अर्थ में मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के गौवध निषेध कानून, राजनैतिक लक्ष्य की पूर्ति के लिये लाए गए लगते हैं। अगर किसी दंगे में सैंकड़ों मुसलमान भी मर जायें तब भी हत्यारों को सजा मिलने की संभावना बहुत कम होती है। मुसलमानों से कहा जाता है कि वे दंगों को भूल जायें,दंगाइयों को माफ कर दें और अपना जीवन आगे बढ़ायें। एफआईआर या तो दर्ज ही नहीं की जातीं या उनमें जानबूझकर कमियां छोड़ दी जाती हैं। अगर ठीक.ठाक एफआईआर दर्ज कर भी ली जाती है, तो जांच ठीक से नहीं होती और प्रकरणों में खात्मा लगा दिया जाता है। जिन मामलों में मुकदमा चलता है, वहां भी न्याय का मखौल ही होता है। गोहाना की दलित.विरोधी हिंसा के दोषियों को सजा मिलने की संभावना न के बराबर है। दलित.विरोधी हिंसा की अन्य घटनाओं में भी यही होता आया है, उन चंद मामलों को छोड़कर,जिनमें दलित और मानवाधिकार संगठनों ने दोषियों को सजा दिलवाने के लिए अभियान चलाया। 'अनुसूचित जातिए जनजाति ;अत्याचार निवारण अधिनियम' के तहत जितनी सजा का प्रावधान किया गया है,वह गौवध के लिए निर्धारित सजा से कम है। गौवध करने वाले को सात साल तक की कैद हो सकती है। गौवध निषेध अधिनियम के अंतर्गत पुलिस और प्रशासन को तलाशी लेने और संदेहियों को गिरफ्तार करने के बहुत व्यापक अधिकार दे दिये गये हैं और स्वयं को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी, आरोपियों पर डाल दी गई है। महाराष्ट्र में इस विधेयक के कानून बनने के तुरंत बाद, हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा मुसलमानों पर हमले की अनेक घटनाएं हुईं। यह अनापेक्षित नहीं था। इस कानून का उद्देश्य गाय की रक्षा या उसके प्रति श्रद्धा को बढ़ावा देना नहीं बल्कि मुसलमानों को परेशान करना और हिंदुओं को भाजपा के साथ लाना है। संघ परिवार को दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों की जान से ज्यादा गाय की जान प्यारी है।
सांस्कृतिक राज्य
एक ऐसा राज्य, जो गाय को, हाशिए पर पड़े समुदायों के मनुष्यों से ज्यादा संरक्षण देता है, एक ऐसा राज्य जिसके लिए गाय और उसके तथाकथित रक्षकों की सुरक्षा, समाज के कमजोर तबकों.जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं.की सुरक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है,ऐसा राज्य न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता। धर्मशासित राज्य की तरहए सांस्कृतिक राज्य भी प्रजातंत्र विरोधी होता है। वह जरूरतमंदों को दो जून की रोटी और रोजगार उपलब्ध करवाने की बजाए, सेना और पुलिस पर अपना धन खर्च करता है। वह राज्य, नागरिकों के रसोईघरों और बेडरूमों में झांकना चाहता हैए वह राज्य यह तय करना चाहता है कि महिलाएं कौनसे कपड़े पहनें, वह राज्य यह तय करना चाहता है कि कौनसा नाटक मंचित होए कौनसी फिल्म दिखाई जाए और कौनसी किताब छपे। उसे इस बात की कतई फिक्र नहीं होती कि उसके नागरिकों को स्वास्थ्य व शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं या नहीं और ना ही वह सभी के समान विकास के प्रति फिक्रमंद होता है। सांस्कृतिक राज्य अपने नागरिकों की स्वतंत्रताओं को सीमित करता हैए असमानताओं को बढ़ाता है व इस तरह, अस्थिरता का वाहक बनता है।

गांधीजी का मत
गौरक्षा,गांधीजी का एक महत्वपूर्ण मिशन था और अहिंसा के सिद्धांत में उनकी आस्था का हिस्सा था। वे सभी पशुओं के खिलाफ हिंसा के विरूद्ध थे। 'गाय करूणा की कविता है', गांधीजी ने लिखाए 'इस सौम्य पशु की आंखों में करूणा झलकती है। वह लाखों भारतीयों के लिए माता है। गौरक्षा का अर्थ है ईश्वर द्वारा रचित सभी मूक प्राणियों की रक्षा .ईश्वर द्वारा रचित संसार के निचले दर्जे के प्राणियों की रक्षा अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि वे बोल नहीं सकते ;यंग इंडिया, 6 अक्टूबर 1921,पृष्ठ 36.गाय मनुष्येत्तर प्राणियों में सबसे पवित्र है। वह सभी मनुष्येत्तर प्राणियों की ओर से हमसे यह अपील करती है कि उसे मनुष्य.जो जीवित प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है.के हाथों न्याय मिलना चाहिए। वह मानो अपनी आंखों से हमसे कहती है, 'तुम हमारे ऊपर इसलिए नहीं हो कि तुम हमें मारो और हमारा मांस खाओ या अन्य तरीकों से हमारे साथ दुर्व्यवहार करो वरन् तुम हमारे ऊपर इसलिए हो ताकि तुम हमारे मित्र और अभिभावक बनो' ';यंग इंडिया 26 जून 1924, पृष्ठ 214।
परंतु गांधीजी गौरक्षा के लिए मानव हत्या के खिलाफ थे। उन्होंने लिखा ;यंग इंडिया,18 मई 1921ए पृष्ठ 156 'मैं किसी गाय की रक्षा के लिए किसी मनुष्य को नहीं मारूंगा,ठीक उसी तरह,जैसे मैं किसी मनुष्य की रक्षा के लिए गाय का वध नहीं करूंगा। 'गांधीजी ऐसे सभी लोगों को,जो जानवरों का वध करते हैं और मांस खाते हैं,इस बात के लिए राजी करना चाहते थे कि वे मांसाहार त्याग दें और अहिंसा का सिद्धांत अपना लें। उनके लिए गाय किसी को घृणा का पात्र बनाने का उपकरण नहीं थी.उस कसाई को भी वे घृणा का पात्र नहीं मानते थे,जो गाय को काटता है। वे गाय की रक्षा इसलिए करना चाहते थे क्योंकि वे अहिंसा में विश्वास करते थे और चाहते थे कि हम सभी प्राणियों के प्रति करूणा,प्रेम और दया का भाव रखें। गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन कर मुसलमानों के एक बड़े हिस्से को इस बात के लिए राजी कर लिया था कि वो गौवध नहीं करेगा। कोई भी सरकार अपने कानूनों,जेलों और पुलिस का डर दिखाकर भी उतना नहीं कर सकती जितना गांधीजी ने केवल एक अपील के जरिये कर दिखाया था।'हरिजन';15 सितंबर 1946, पृष्ठ 310 में उन्होंने लिखा, 'गौवध कभी कानून के जरिये नहीं रोका जा सकता। केवल ज्ञान, शिक्षा और गाय के प्रति दया का भाव जाग्रत कर ही यह संभव हो सकता है।' चंपारण में दिये गये उनके एक भाषण,जिसकी रपट'यंग इंडिया' के 29 जनवरी 1925 के अंक में छपी, गांधीजी ने कहा 'दुर्भाग्यवश, आज हम में से कुछ लोग यह मानते हैं कि गौरक्षा के लिए एक ही काम करना जरूरी है और वह है गैर.हिंदुओं,विशेषकर मुसलमानों,को गौवध करने और गौमांस खाने से रोकना। यह सोच, मेरी दृष्टि मेंए मूर्खतापूर्ण है। परंतु इससे इस निष्कर्ष पर कोई न पहुंचे कि जब कोई गैर.हिंदू गाय का वध करता है तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता या मैं गौवध को सहन कर सकता हूं.पर मैं कर क्या सकता हूं? क्या मुझे अपने धर्म का पालन स्वयं करना है या दूसरे से करवाना है.मान लीजिये मैं स्वयं गौवध न भी करूं तो क्या यह मेरा कर्तव्य है कि मैं मुसलमानों को भी, उनकी इच्छा के विरूद्ध, ऐसा ही करने के लिए मनाऊं? मुसलमानों का दावा है कि इस्लाम उन्हें गाय का वध करने की इजाजत देता है। ऐसी परिस्थिति में अगर किसी मुसलमान को बल प्रयोग के जरिये गौवध करने से रोका जाए तो यह, मेरे विचार में, उसे जबरदस्ती हिंदू बनाने जैसा होगा। जब भारत में स्वराज आ जायेगा तब भी, मेरे विचार से, हिंदू बहुसंख्यकों के लिए यह अनुचित व मूर्खतापूर्ण होगा कि वे कोई कानून बनाकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को इस बात के लिए मजबूर करें कि वो गौवध न करें. मेरा धर्म मुझे यह सिखाता है कि मैं अपने व्यक्तिगत आचरण के द्वारा उन लोगों, जिनके इस संबंध में अलग विचार हैं, को यह विश्वास दिलाऊं कि गौवध करना पाप है और इसलिए उसे बंद कर दिया जाना चाहिए। मैं तो चाहूंगा कि गौवध पूरी दुनिया में बंद हो जाए परंतु उसके लिए आवश्यक यह है कि मैं मस्जिद में दिया जलाने के पहले अपने घर में दिया जलाऊं।'
-इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2015

अम्बेडकर की विचारधारा- धार्मिक राष्ट्रवाद और भारतीय संविधान

म्बेडकर की विचारधारा- धार्मिक राष्ट्रवाद और भारतीय संविधान
व्यापक समाज में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए इन दिनों आरएसएस बेसिर पैर के दावे कर रहा है। कुछ महीनों पहले यह दावा किया गया था कि गांधीजी, आरएसएस की कार्यप्रणाली से प्रभावित थे। हाल ;फरवरी 15, 2015  में एक और सफेद झूठ हवा में उछाला गया और वह यह कि अम्बेडकर, संघ की विचारधारा में यकीन करते थे। यह दावा किसी छोटे.मोटे आदमी ने नहीं बल्कि संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने किया।
आरएसएस और अम्बेडकर की विचारधारा में जमीन.आसमान का अंतर था। जहाँ अम्बेडकर भारतीय राष्ट्रवादए धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों में यकीन करते थे वहीं संघ की विचारधारा केवल दो पायों पर टिकी हुई है.पहला, हिन्दू धर्मं की ब्राह्मणवादी व्याख्या और दूसरा, हिन्दू राष्ट्रवाद, जिसका अंतिम लक्ष्य है हिन्दू राष्ट्र की स्थापना।
हिंदुत्व की विचारधारा के सम्बन्ध में अम्बेडकर की सोच क्या थी ? वे हिन्दू धर्म को ब्राह्मणवादी धर्मशास्त्र बताया करते थे। हम भी यह जानते हैं कि हिन्दू धर्मं में ब्राह्मणवाद का बोलबाला है। उन्हें यह अहसास था कि हिन्दू धर्म का प्रचलित संस्करण, मूलतः, जाति व्यवस्था पर आधारित है और यह व्यवस्थाए अछूतों और दलितों के लिए अकल्पनीय पीड़ा और संत्रास का स्त्रोत बनी हुई है। शुरुआत में अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के अन्दर से जाति प्रथा की बेडि़यों को तोड़ने की कोशिश की। दलितों को पीने के पानी के स्त्रोतों तक पहुँच दिलवाने के लिए उन्होंने चावदार तालाब और मंदिरों के द्वार उनके लिए खोलने के लिए कालाराम मंदिर आन्दोलन चलाये। उन्होंने सार्वजनिक रूप से मनुस्मृति दहन के कार्यक्रम भी आयोजित किये क्योंकि उनका मानना था कि यह ब्राह्मणवादी ग्रन्थ, जातिगत व लैंगिक पदक्रम का प्रतीक है। उन्होंने हिन्दू धर्म व ब्राह्मणवाद पर कटु व चुभने वाले प्रहार किये। परन्तु समय के साथ वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि उन्हें हिन्दू धर्म त्याग देना चाहिए। अपनी पुस्तक श्रिडिल्स ऑफ हिन्दुइज्मश्, जिसका प्रकाशन महाराष्ट्र सरकार द्वारा भी 1987 में किया गया था, में अम्बेडकर हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण के सम्बन्ध में अपने विचार प्रकट करते हैं। अपनी पुस्तक की भूमिका में वे लिखते हैं, 'यह पुस्तक उन आस्थाओं की व्याख्या करती है जिन्हें ब्राह्मणवादी धर्मशास्त्र कहा जा सकता है' 'मैं लोगों को यह बताना चाहता हूँ कि हिन्दू धर्म सनातन नहीं है' इस पुस्तक का दूसरा उद्देश्य है हिन्दू आमजनों को ब्राह्मणों के तौर.तरीकों से परिचित करवाना और उन्हें स्वयं इस पर विचार करने के लिए प्रेरित करना कि ब्राह्मण उन्हें किस तरह पथभ्रष्ट करते रहे हैं और किस प्रकार उन्हें धोखा देते आये हैं.।
अम्बेडकर 1955 के आसपास से ही हिंदू धर्म से दूर होने लगे थे, जब उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की थी कि वे हिंदू के रूप में जन्मे अवश्य हैं परंतु हिंदू के रूप में मरेंगे नहीं। सन् 1956 में उन्होंने एक सिक्ख मिशनरी कान्फ्रेंस में भी हिस्सा लिया था और सिक्ख धर्म अपनाने पर विचार भी किया था। सन् 1936 में उन्होंने 'एनिहिलेशन ऑफ कास्ट' ;जाति का उन्मूलन शीर्षक पुस्तिका प्रकाशित कीए जो कि लाहौर में आयोजित.जांतपांत तोड़क मंडल. की सभा में अध्यक्ष बतौर उनका वह भाषण था जो अंततः वे दे न सके थे। अपने लिखित भाषण के अंत में उन्होंने जोर देकर यह कहा कि उन्होंने हिंदू धर्म को छोड़ने का निर्णय ले लिया है।
उन्होंने कहाए'मैंने अपना निर्णय कर लिया है। मेरा धर्मपरिवर्तन करने का इरादा पक्का है। यह परिवर्तन मैं किसी भौतिक लाभ के लिए नहीं कर रहा हूं। मैं अगर अछूत भी बना रहूंए तो भी ऐसी कोई उपलब्धि नहीं है जो मैं प्राप्त नहीं कर सकता। मैं केवल अपने आध्यात्मिक नजरिये के कारण धर्मपरिवर्तन कर रहा हूं। मेरा अंतःकरण हिंदू धर्म को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। मेरा स्वाभिमान मुझे हिंदू धर्म से जुड़े रहने की इजाजत नहीं देता। परंतु आपको धर्मपरिवर्तन से आध्यात्मिक और भौतिक' दोनों प्रकार के लाभ प्राप्त होंगे। कुछ लोग भौतिक लाभ प्राप्त करने के लिए धर्मपरिवर्तन करने का मजाक बनाते हैं और उस पर हंसते हैं। मुझे ऐसे लोगों को मूर्ख कहने में कोई हिचक नहीं है।'
भगवान राम, आरएसएस द्वारा प्रतिपादित सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रमुख प्रतीक हैं। आईए, हम देखें कि अम्बेडकर भगवान राम के बारे में क्या कहते हैं  ' सीता के जीवन का तो मानो कोई महत्व ही नहीं था। महत्व केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और नाम का था। उन्होंने पुरूषोचित राह अपनाकर उन अफवाहों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया जो एक राजा के बतौर वे कर सकते थे और जो एक ऐसे पति के बतौर, जो अपनी पत्नी के निर्दोष होने के संबंध में आश्वस्त थाए करना उनका कर्तव्य था'। एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं,'बारह साल तक वे लड़के वाल्मिकी के आश्रम में रहे, जो अयोध्या, जहां राम का शासन था, से बहुत दूर नहीं था। इन 12 सालों में इस आदर्श पति और पिता ने कभी यह पता लगाने की कोशिश तक नहीं की कि सीता कहां हैं, जिन्दा हैं या मर गईं'। सीता ने राम के पास लौटने से बेहतर मर जाना समझा क्योंकि राम का उनके साथ व्यवहार पशुवत था'। हिन्दुत्वादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में दलितों के साथ क्या व्यवहार होगा, यह राम के स्वयं के जीवन से स्पष्ट है' वह शम्भूक नाम का शूद्र था, जो सशरीर स्वर्ग जाने के लिए तपस्या कर रहा था और उन्होंने बिना किसी चेतावनी या स्पष्टीकरण के उसका सिर काट दिया';रिडल्स ऑफ राम एण्ड कृष्ण
अम्बेडकर का सपना ष्जाति का उन्मूलनष् थाए जो स्वतंत्रता के इतने वर्ष बाद भी अधूरा है। कई कारणों से जातिए इस देश में आज भी एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है। अम्बेडकर 'जाति के उन्मूलन' की बात करते थे जबकि संघ परिवार, 'विभिन्न जातियों में समरसता' की बात कहता है और इसलिए उसने 'सामाजिक समरसता मंच' नामक एक संस्था भी बनाई है। क्या अब भी इस बात में कोई संदेह रह जाता है कि जहां तक सामाजिक मुद्दों का सवाल हैए अम्बेडकर और आरएसएस के विचार परस्पर धुर विरोधी हैं।
आरएसएस की राजनैतिक विचारधारा के मूल में है हिन्दुत्व या हिन्दू राष्ट्रवाद। अम्बेडकर ने इस मुद्दे पर बहुत गहराई से विचार किया था। उनके विचार उनकी विद्वतापूर्ण पुस्तक 'थाट्स आन पाकिस्तान' ;पाकिस्तान पर विचार में उपलब्ध हैं। इस पुस्तक में वे आरएसएस की हिन्दू राष्ट्र की विचारधारा के जनक सावरकर द्वारा प्रतिपादित हिन्दू राष्ट्रवाद और जिन्ना की मुस्लिम राष्ट्रवाद की विचारधारा की तुलना करते हुए कहते हैं, 'यह अजीब लग सकता है परंतु जहां तक एक राष्ट्र बनाम द्विराष्ट्र के मुद्दे का प्रश्न है, श्री सावरकर और श्री जिन्ना में कोई विरोध नहीं है। उल्टे, वे एक दूसरे से पूरी तरह सहमत हैं। दोनों सहमत हैं.सहमत ही नहीं बल्कि जोर देकर यह कहते हैं.कि भारत में दो राष्ट्र हैं.एक हिन्दू राष्ट्र और दूसरा मुस्लिम राष्ट्र'। उनके मतभेद सिर्फ इस मुद्दे पर हैं कि इन दोनों राष्ट्रों को किन शर्तों के अधीन रहना होगा। जिन्ना का कहना है कि भारत को पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में बांट दिया जाना चाहिए। मुस्लिम राष्ट्र को पाकिस्तान में रहना चाहिए और हिन्दू राष्ट्र को हिन्दुस्तान में। दूसरी ओर, श्री सावरकर का जोर इस बात पर है कि यद्यपि भारत में दो राष्ट्र हैं तथापि भारत दो भागों में विभाजित नहीं किया जाना चाहिए, जिनमें से एक भाग मुसलमानों का हो और दूसरा हिन्दुओं का। बल्कि, दोनों राष्ट्र एक ही देश में रहेंगे जिसका एक संविधान होगा और यह कि यह संविधान ऐसा होगा जो हिन्दू राष्ट्र को प्राधान्य देगा और मुस्लिम राष्ट्र को हिन्दू राष्ट्र के अधीन रहना होगा';थाट्स ऑन पाकिस्तान,खण्ड 3, अध्याय 7ध।
वे समग्र भारतीय राष्ट्रवाद के हामी थे।'क्या यह तथ्य नहीं है कि मोन्टेग्यू.चेम्सफोर्ड सुधार के अंतर्गत अगर सभी नहीं तो अधिकांश प्रांतों मे मुसलमानों, गैर.ब्राह्मणों और दमित वर्गों ने एकता स्थापित की और एक टीम की तरह सुधारों को लागू करने के लिए 1920 से 1937 तक कार्य किया। यह हिन्दुओं और मुसलमानों में साम्प्रदायिक सद्भाव स्थापित करने और हिन्दू राज के खतरे को समाप्त करने का सबसे मुफीद तरीका है। श्री जिन्ना आसानी से इस राह पर चल सकते हैं और ना ही उनके लिए इस राह पर चलकर सफलता प्राप्त करना मुश्किल है' ;थाट्स ऑन पाकिस्तान, पृष्ठ 359।
वे हिन्दू राज्य की अवधारणा के पूरी तरह खिलाफ थे। इस पुस्तक के'मस्ट देयर बी पाकिस्तान' खण्ड में वे लिखते हैं,' अगर हिन्दू राज स्थापित हो जाता है तो निःसंदेह वह इस देश के लिए एक बहुत बड़ी आपदा होगी। हिन्दू चाहे कुछ भी कहें, हिन्दू धर्म स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए खतरा है। इसी कारण वह प्रजातंत्र के साथ असंगत है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।   
इसी तरहए धार्मिक अल्पसंख्यकों का समाज में स्थान व उनके अधिकार और कमजोर वर्गों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता जैसे मुद्दों पर भी अम्बेडकर और आरएसएस के विचारों में न केवल कोई साम्य नहीं है बल्कि वे परस्पर विरोधाभासी हैं। जहाँ अम्बेडकर संविधान के निर्माता थे, वहीं संघ परिवार, भारतीय संविधान को हिन्दू.विरोधी बताता है और हिन्दू धर्मग्रंथों पर आधारित, नया संविधान बनाने का पक्षधर है। अम्बेडकर को आरएसएस की विचारधारा से जोड़ने का मोहन भगवत का प्रयास, लोगों की आँखों में धूल झोंकना है। संघ, दरअसल, उन लोगों का समर्थन हासिल करना चाहता है, जो अम्बेडकर की विचारधारात्मक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्ध हैं।
-राम पुनियानी

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

धर्म के नाम पर अधर्म का उन्माद

 अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में गत् 19 मार्च को फरख़ंदा नामक· एक 27 वर्षीय मुस्लिम लड़की को  स्वयं को धर्म के ठेकेदार बताने वाले मुस्लिम उन्मादियों की  हज़ारों की  भीड़ द्वारा जि़ंदा जला कर मार डाला गया तथा उसकी जली हुई क्षत-विक्षत लाश को काबुल नदी में इन्हीं उन्मादी आसामाजिक तत्वों द्वारा फेंक दिया गया। उन्मादियों का आरोप है कि इस युवती ने कुरान शरीफ को जलाकर इस धार्मिक किताब के साथ बेअदबी की थी। जबकि दूसरी ओर लड़की के भाई नजीबुल्ला मलिकज़ादा तथा फरख़ंदा के पिता ने ऐसे सभी आरोपों को  झूठा करार दिया है। फरख़ंदा के परिजनों  का कहना है कि वह पांचों वक्त की नमाज़ नियमित रूप से अदाक रती थी। उसने इस्लामिक स्टडीज़ में डिप्लोमा भीकर रखा था। इतना ही नहीं बल्कि वह नियमित रूप से कुरान शरीफ की तिलावत भी किया करती थी तथा अपने धर्म व धार्मि· पुस्तकों का दिल से सम्मान करती थी। लिहाज़ा उसपर लगाए जाने वाले सभी आरोप झूठे व निराधार हैं। कुरान शरीफ जलाए जाने की घटना से फरख़ंदा का कोई लेना-देना नहीं है। जबकि संयुक्त राष्ट्र ने इस घटना के संबंध में अपनी जांच के बाद यह पाया है कि फरखंदा मानसिक रोगी थी। इस युवती को भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डालने व उसके बाद उसे जलाए जाने व उसके शव को नदी में फेंके जाने जैसी अमानवीय घटना ने अफगानिस्तान सहित पूरे विश्व के मानवता प्रेमियों को विचलितकर दिया है। इस घटना के विरोध में अफगानिस्तान में उदारवादी वर्ग के लोग खासतौर पर महिलाओं द्वारा ज़बरदस्त रोष व्यक्त किया जा रहा है।

                इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का एक दु:खद पहलू यह भी था कि जिस समय धर्मांध लोगों कीउग्र भीड़ द्वारा फरखंदा को पीटा व जलाया जा रहा था उस समय अफगानिस्तान पुलिस के कर्मचारी तमाशाई बने इस पूरे घटनाक्रम को देख रहे थे। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गऩी ने भी इस घटना को एक जघन्य अपराध बताया है। तथा पूरे घटनाक्रम की जांच के लिए आयोग गठित करने का आदेश दिया है। राष्ट्रपति गऩी ने यह भी स्वीकार किया कि जिस पुलिस ने तालिबानों के विरुद्ध संघर्ष करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की  है वही अफगान पुलिस ऐसी घटनाओं से निपटने हेतु पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अफगान पुलिस का 90 प्रतिशत ध्यान तालिबान विरोधी लड़ाई की ओर रहता है जबकि यह उनकी संवैधानिक भूमिका  नहीं है। बहरहाल सूत्रों के  मुताबिक· फरखंदा की इस बेरहम हत्या के आरोप में 21 लोगों को गिरफ्तार  किया गया है जिनमें 8 तमाशबीन पुलिस·र्मी भी शामिल हैं। इस घटना के विरुद्ध अफगानिस्तान की महिलाओं के  गुस्से का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि  जो मुस्लिम महिलाएं आमतौर पर शव यात्रा में शामिल नहीं होतीं तथा किसी शव यात्रा में उन्हें मर्दों के साथ कब्रिस्तान में जाने की  इजाज़त नहीं होती उन्हीं महिलाओं ने बड़ी संख्या  में फरखंदा की शव यात्रा में न केवल शिरकत कीबल्कि उसके  शव को नहलाने-धुलाने से लेकर उसके ताबूत को कंधा देने व उसके अंतिम संस्कार यानी  कब्र में उतारने तक में आक्रोशित मुस्लिम महिलाएं नकाब पहने हुए अग्रणी भूमिका में रहीं। शव यात्रा के  पूरे मार्ग में महिलाओं द्वारा अल्लाह ओ अकबर की सदाएं बुलंद की गईं तथा प्रदर्शन रूपी इस शव यात्रा में सरकार से यह मांग की गई की महिलाओं तथा मानवता के विरुद्ध इस प्रकार का जघन्य अपराध अंजाम देने वाले समस्त अपराधियों व उनके समर्थको को ·ड़ी सज़ा दी जाए। इस घटना से एक बात और साबित हो रही है कि अफगानिस्तान की जो पुलिस उन्मादी भीड़ के हाथों से एक लड़कीको जि़ंदा नहीं बचा सकी वह पुलिस तालिबानों अथवा अन्य समाज विरोधी दुश्मनों से अफगानिस्तान की जनता को आखिरकैसे बचा सकती है? इस घटनाका सीधा सा अर्थ यही निकलता है कि पुलिस ऐसे हालात से निपटनेके लिए कतई सक्षम नहीं है।

                कुरान शरीफ को  जलाने अथवा इसके साथ बेअदबी करने के  हादसे तथा ऐसी घटनओं के विरुद्ध जनता का उन्माद पहले भीकई बार दुनिया के कई देशों में भड़कते हुए देखा जा चुका है। अफगानिस्तान में ही अमेरिका द्वारा संचालित बगराम जेल में 2012 में कुरान शरीफ के जलाए जाने की घटना ने अमेरिकी सेना के विरुद्ध राष्ट्रव्यापी हिंसा का रूप धारण कर लिया था। पांच दिनों तक यह हिंसा अफगानिस्तान के विभिन्न भागों में फैली हुई थी। इस हिंसा में 30 लोग मारे गए थे। इसी प्रकार नवंबर 2014में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में लाहौर से 60 किलोमीटर की  दूरी परकोट राधा किशन नामक स्थान पर एक ईसाई दंपत्ति को मुसलमानों की उन्मादी भीड़ द्वारा पीट-पीटकर मार डाला गया तथा बाद में उनकी लाशों को ईंट के  भट्टे में झोंककर जला दिया गया था। इस दंपत्ति पर भी यह आरोप था कि इसने कुरान शरीफ को जलाया तथा बाद में जले हुए कुरान के पन्नों को कूड़ेदान में फेंक दिया । हालांकि  इस मामले ने भी बाद में एक विवाद का रूप ले लिया था। ऐसी खबरें आईं थीं कि ईसाई दंपति पर कुरान शरीफ के अपमान का आरोप लगाने वाले एक मौलवी ने जानबूझ कर रंजिश के तहत ईसाई दंपत्ति पर ऐसा इल्ज़ाम लगाया था। यह घटनाएं ये सोचनेके लिए मजबूर करती हैं कि क्या धर्म के नाम पर उन्माद फैलाने वाली उग्र भीड़ को यह अधिकार हासिल है कि वह जब चाहे किसी के भी विरुद्ध ऐसे गंभीर व संवेदनशील आरोप मढ़कर उसे सामूहिक हिंसा का निशाना बनाए? उसे पीट-पीट कर मार डाले और उसकी लाश को स्वयं आग के हवाले कर दे? यदि यह मान भी लिया जाए कि कुरान शरीफ का अपमान अथवा बेहुरमती करने वाले ऐसे अपराध करते भी रहे हैं तो भी क्या इस्लाम धर्म या इसकी शिक्षाएं इस बात की इजाज़त देती हैं कि कुरान शरीफ के साथ बदसलूकी करने वालों को किसी उग्र भीड़ द्वारा इसी प्रकार की कुर्र्ता पूर्ण  सज़ाएं दी जाएं?

                कभी ऐसी घटनाओं को लेकर तो कभी हज़रत मोहम्मद अथवा इस्लाम विरोधी कार्टूनों के प्रकाशन को लेकर मुसलमानों की इस प्रकार की  उग्र व उन्मादी भीड़ के सड़को पर उतरने व हिंसा पर उतारू होने ·ीअने· घटनाएं विश्व ·े विभिन्न देशों में होती रही हैं। ज़ाहिर है ऐसी सभी घटनाओं के पीछे मुसलमानों की कटरपंथी व रूढ़ीवादी सोच तथा ऐसी सोच का पोषण करने वाले धर्मगुरु शामिल रहते हैं। यही लोग अपनी तकऱीरों के द्वारा अपने वर्ग के  अनुयाईयों मेंआकरोष  भड़काते हैं। भले ही एसे धर्मगुरु यह क्यों न समझते हों कि वे इस प्रकार का उन्माद व उत्तेजना फैला·र तथा किन्हीं एक-दो व्यक्तियों पर ऐसे दोष मढ़कर उनके विरुद्ध भीड़ को हिंसा पर उतारू होने हेतु वरगलाकर अपने धर्म की सेवा कर रहे हों अथवा पुण्य लूट रहे हों या अपने लिए जन्नत जाने का मार्ग प्रशस्तकर रहे हों। परंतु वास्तव में इस प्रकार की हिंसक प्रतिक्रियाएं न केवल धर्म व इस्लामी शिक्षाओं के विरुद्ध हैं बल्कि  इस प्रकार की हिंसक घटनाओं से इस्लाम धर्म कलंककित होता है। ऐसी ही  ज़हरीली सोच ने पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गर्वनर सलमान तासीर की हत्या उन्हीं के अंगरक्षक द्वारा सिर्फ इस लिएकरा दी थी क्योंकि सलमान तासीर पाकिस्तान में लागू ईश निंदा कानून पर पुनर्विचार किए जाने के पक्षधर थे। इस घटना के बाद भी एक सवाल यह पैदा हुआ था कि मलिक  मुमताज़ हुसैन कादरी द्वारा सलमान तासीर का  अंगरक्षक होने के बावजूद उनकी हत्याकर देना कहां का धर्म है? क्या इस्लाम धर्म इस बात की इजाज़त देता है कि किसी के अंगरक्षक के रूप में उसकी सुरक्षा कादायित्व संभाल रहे व्यक्ति द्वारा स्वयं अपने ही स्वामी की हत्या किए जाने जैसा घृणित अपराध किया जाए? और इससे अधिक अफसोसनाक यह कि कादरी द्वारा इस घिनौने अपराध को अंजाम देने के बाद पाकिस्तान की अदालत में पेशीके समय उसी हत्यारे पर फूल बरसाए गए तथा उसका कट्टरवादी मुस्लिम समाज द्वारा जिनमें तमाम वकील भी शामिल थे, ज़ोरदार स्वागत किया
ऐसी घटनओं को रोकने के लिए विश्वस्तर पर मुस्लिम धर्मगुरुओं के संगठित होने तथा ऐसे उन्मादको रोकने हेतु अपने-अपने अनुयाईयों को  नियंत्रित करने व उन्हें सहनशीलता का  पाठ पढ़ाए जाने की बहुत सख्त ज़रूरत है। यदि कहीं इस प्रका र का  ईश निंदा संबंधी अपराध होता भी है तो स्थानीय न्याय व्यवस्था तथा स्थानीय शासन व प्रशासन पर भरोसा करते हुए संबंधित घटना से कानूनी तौर पर निपटने की ज़रूरत है। निश्चित रूप से कुरान शरीफ इस्लाम  का सबसे पवित्र व सम्मानित धर्म ग्रंथ है। इसका अपमान मुसलमानों में स्वभाविक रूप से ग़ुस्सा पैदा कर सकता है। परंतु यही इस्लाम धर्म और यहीकुरान शरीफ मानवता का पाठ भी पढ़ाता है। निहत्थे पर ज़ुल्म  करने से भी रोकता है। महिलाओं पर अत्याचार करना या किसी के शव को जलाया जाना या उसे जि़ंदा जला दिया जाना इस्लामी शिक्षा  का हिस्सा कतई नहीं है। न ही ऐसे घृणित अपराध अंजाम देकर दुनिया  का कोई भी धर्मगुरु या कोई मुसलमान जन्नत में जाने या पुण्य ·मानने का दावा कर सकता है। ऐसे कृत्य पूरी तरह से इस्लाम विरोधी व मानवता विरोधी हैं।
  -तनवीर जाफरी

मंगलवार, 31 मार्च 2015

फर्जी डिग्री : डॉ राम मनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय .


किसी राष्ट्र के बौद्धिक स्तर का आकलन वहां की शिक्षा व्यवस्था के स्तर पर निर्भर करती हैं। शिक्षा का पतन किसी भी राष्ट्र के पतन का द्योतक होता है और जब शिक्षा के कर्णधार ही क्षुद्र स्वार्थवश शिक्षा की नैया डुबोने लग जायें तो शिक्षा और राष्ट्र को पूरी तरह से रामभरोसे ही समझना चाहिए। व्यावसायिकता की मानसिकता का यह चरम बिन्दु है जब व्यक्ति ने सब कुछ व्यावसायिक ही समझ लिया है। वर्तमान समय में शिक्षा की व्यवसायिकता को देखते हुए यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि विद्या मन्दिर धन उगाही और शोषण के अड्डे बन गए हैं। जहां अयोग्य शिक्षितों की फौज तैयार की जा रही है। इन विद्या मन्दिरों द्वारा भारत के जिस युवा भविष्य का निर्माण किया जा रहा है वह भार साबित होगा और आज की थकी मांदी कानून व्यवस्था, खूंखार राजनीतिक व्यवस्था, नपुंसक नौकरशाही और शिक्षा के सामन्ती जिम्मेदारान; इन चारों की चैकड़ी ने शिक्षा को ऐेसे गर्त की ओर धकेल दिया है जिसके आगे अंधकार के सिवा कुछ नहीं है। यह अभी सबकी आंखो को नहीं दिखायी देता क्योंकि उन पर स्वार्थ, अज्ञानता, कूपमण्डूकता, उदासीनता इत्यादि का पर्दा पड़ा हुआ है। हकीकत यह है कि यह शिक्षा की वह भयावह स्थिति है जो आने वाली पीढ़ी की मानसिक विकलांगता इस स्तर तक बिगाड़ देगी जिसे सुधारने में सदियां शहीद हो जाएंगी। स्थिति बन्दूक से निकली गोली की हो जाय इससे पहले देश की शिक्षा के कर्णधार शिक्षा को लेकर सचेत हो जायं और दृढ़निष्ठ कर्तव्य में लग जायं।
    बात डाॅ0 राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद के अन्तर्गत मान्यता प्राप्त स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों की है। गत दशक में महाविद्यालय कुकुरमुत्तों के अनुपात में उगे और शिक्षा को भी कुकुरमुत्ते के स्तर तक पहुँचाने में समूचे खानदान के साथ जुट गये। मान्यताएं मिलती गयीं और महाविद्यालय बढ़ते रहे। इन्ही के साथ रोपित भ्रष्टाचार भी बढता रहा। शिक्षा के मालवीयों का असंख्य संख्या में अवतार हुआ। जिन्होने अपने अपने अनुसार शिक्षा का पिण्डदान किया। शिक्षा मन्दिर के महन्तों ने शिक्षा को मन्दिर से निकालकर बाजार में लाकर खड़ा कर दिया। यह सब किसी एक के द्वारा या अचानक नहीं हुआ। इसकी जड़ भी है और उसके नाश की दवा भी। इन महाविद्यालयों का शासनादेश से छत्तीस का सम्बन्ध होता है। स्ववित्तपोषित वित्तशोषित होते जा रहे हैं। महाविद्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार प्रत्यक्ष प्रकट है। बड़ा ही दुखद आश्चर्य होता है कि यह सब साक्षात होता देखकर राजनीति और प्रशासन दोनो ही मौन है। इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या कहा जा सकता है।
    स्ववित्तपोषित महाविद्यालयों को संचालित करने हेतु समय समय पर विभिन्न शासनादेश जारी होते रहे हैं जो निश्चित ही स्वागत योग्य हैं। छात्रों की संख्या में जिस अनुपात में वृद्धि हूई उस अनुपात में महाविद्यालय खोल पाना सरकार के वश में नही था या फिर उन्होनंे कोशिश नहीं की। फलतः स्ववित्तपोषित व्यवस्था अस्तित्व में आयी। इसके शासनादेशों में महाविद्यालय के मानकों का निर्धारण किया गया, जिसका दुरूपयोग ज्यादा हुआ सदुपयोग बहुत कम। शोषण अभिभावक, प्राध्यापक और सरकारी अनुदानो का हुआ।
    महाविद्यालय में प्राध्यापक पद पर नियुक्ति की अपनी योग्यताएं हैं। योग्य प्राध्यापक की नियुक्ति के आधार पर विश्वविद्यालय सम्बन्धित महाविद्यालय को विषय का आवंटन, मान्यता आदि प्रदान करता है। आज यह सिस्टम आम हो गया है कि अभ्यर्थी के कागजात लेकर अनुमोदन तो करवा लिये जाते हैं लेकिन उन्हे पढ़ाने के लिए नही बुलाया जाता। वे कहीं अलग पढ़ाते है और अनुमोदन भी एकाधिक काॅलेजों से चलता रहता है। काॅलेज में अनुमोदित प्राध्यापक के स्थान पर अन्य लोग पढ़ाते है जो सामान्यतः नाॅनक्वालीफाइड होते हैं। एक अभ्यर्थी का अनुमोदन एकाधिक काॅलेज से होना अपराध है। जबकि व्यवहार में यह आम है। इसमें कभी कभी दोनो पक्ष की सहमति होती है और कभी कभी इस अपराध की जानकारी उस अभ्यर्थी को नहीं होती जिसका अनुमोदन उसकी बगैर जानकारी के हो जाता है। हद तो तब हो जाती है जब विश्वविद्यालय यह सब जानकार मौन बना रहता है और कोई कार्रवाई नही करता। इससे भ्रष्टाचार को शह मिलती है। शायद ही ऐसा कोई महाविद्यालय हो जहां पर समस्त अनुमोदित प्राध्यापक अध्यापन करते हैं।
प्राध्यापकोें के वेतन भुगतान का शासनादेश व्यावहारिक न होने से वह प्रबन्ध तंत्र का हथियार बन गया है जिसका प्रहार प्राध्यापक झेलता है। शासनादेश में पचहत्तर से अस्सी प्रतिशत तक वेतन मद में खर्च करने का प्रावधान है। जिसे कोई भी समझदार या गैर समझदार उचित नही कह सकता है। शासनादेश के अनुपालन में गिने चुने नाम मात्र महाविद्यालयों में प्राध्यापकों को मानक के अनुकूल वेतन मिलता होगा। सर्वाधिक संख्या ऐसे काॅलेजों की मिलेगी जहां के प्राध्यापको को मानकानुकूल वेतन नहीं मिलता (कहीं कहीं खाते पर भी नहीं दिया जाता)।सी0पी0कटौती तो गधे के सर की सींग ही समझिये। वेतन सम्बन्धी शासनादेश की पंगुता ने प्रबन्ध को मनमाना वेतन देने के लिए निरंकुश छोड़ दिया है और इसका खामियाजा वह शिक्षक पीढ़ी भुगत रही है जो उसे लेने को अभिशप्त है।
प्राध्यापक के निष्कासन से सम्बन्धित भी शासनादेश है। इस शासनादेश में कुछ त्रुटियां भी हैं। जैसे अनुमोदित प्राध्यापक का हर तीसरे या पांचवे साल नवीनीकरण कराना। एक तरह से टीचर को ठेके पर नियुक्ति देने जैसा है। नियमतः प्राध्यापक का निष्कासन विश्वविद्यालय द्वारा होना चाहिए लेकिन देखा यही गया है कि वह महाविद्यालय में विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त समय तक के लिए नही अपितंु प्रबन्ध समिति की मर्जी तक होता है। प्राध्यापक अस्थिरता के अवसाद से ग्रसित होता रहता है।
निरंतर और भयंकर होती जाती नकल प्रथा के विषदन्त ने शायद ही किसी स्ववित्तपोषित काॅलेज पर निशान न छोड़े हों। जिस तरह से आज शिक्षा के तथाकथित मालवीयों ने नकल को महाविद्यालयों का मानक बना लिया है। शिक्षा मन्त्री के काॅलेज से सामूहिक नकल पकड़ी जाती है। जो महाविद्यालय जितना ही अधिक नकल करा सकता है वह उतना ही अधिक छात्रों के एडवीसन पाता है। छात्र आकर एडमीशन कराता है फिर प्रवेश पत्र लेने आता है (अगर कोई परिचित काॅलेज मे हुआ तो वह भी घर ही पहुंच गया) और फिर परीक्षा देने। इसी प्रकार मात्र कुछ दिन आकर वह स्नातक और परास्नातक की डिग्री पा जाता है। ऐसे सिर्फ परीक्षा के दिनों आने वाले छात्रों की संख्या कोई कम नहीं है। जब उसी काॅलेज के बच्चे उसी काॅलेज में परीक्षा देंगे तो परीक्षा कैसे होगी ये तो सब जानते हैं।
तमाम काॅलेज ऐसे भी है जहां के पुस्तकालयों में दरिद्रता का साकार रूप दिखायी पड़ता है। एक तो छात्र की पढ़ने में रूचि की कमी है दूसरे पुस्तकालय के नाम पर खाना पूर्ती। पाठ्यक्रम की तो पुस्तकें शायद मिल जाएंगी लेकिन पत्र पत्रिकाएं पाठ्यक्रम से सम्बघित अन्य उपयोगी पुस्तको का दर्शन तो शायद ही मिले। पुस्तकालयाध्यक्ष की नियुक्ति में भी प्राध्यापक नियुक्ति जैसी खामियां है जो प्रबन्ध समिति को मनमाना करने को प्रेरित करती है।
बहुत काॅलेजो में क्लर्को की संख्या बहुत कम देखी जाती है। क्लर्को का आभाव, छात्रों की अधिक संख्या के कारण प्राध्यापको उन कागजों को निपटाता है। तमाम प्रबन्ध समिति का व्यवहार प्राध्यापकों के प्रति तानाशाही जैसा होता है। वे प्राध्यापकों पर मिलिट्री जैसा अनुशासन रखना चाहते हैं और तमाम रखते भी हैं। टीचर टीचर न रहकर बाबू बन जाता है।
ऐसा नहीं है कि उच्च शिक्षा के इन स्ववित्तपोषित संस्थानों की यह बीमारी लाइलाज है। चूँकि बीमारी का कारण है तो इसका समाधान भी है। पहली समस्या प्राध्यापकों के एकाधिक काॅलेजो के अनुमोदन की है जिसके कारण एक टीचर का अनुमोदन अनेक काॅलेजो से चलता रहता है और विश्वविद्यालय को गलत जानकारी देकर महाविद्यालयों को संचालित किया जाता है। वेतन भुगतान आदि की प्रक्रिया भी घपले में चलती रहती है। ऐसे में विश्वविद्यालय का यह दायित्व अपरिहार्य हो जाता है कि वह प्राध्यापक के अनुमोदन सम्बन्धी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाते हुए अनुमोदित प्राध्यापकों का विवरण आॅनलाइन करे। प्रदेश स्तर पर प्राध्यापको का अनुमोदन आॅनलाइन हो जाने से एक प्राध्यापक का अनुमोदन एक ही काॅलेज से होगा जिससे योग्य प्राध्यापकों द्वारा अध्यापन सम्भव हो सकेगा। आॅनलाइन हो जाने से प्राध्यापक भी उसी काॅलेज मे अध्यापन कर सकेगा जहां से उसका अनुमोदन चल रहा है। महाविद्यालयों में व्याप्त भ्रष्टाचार को दूर करने में विश्वविद्यालय को यह कदम अबिलम्ब उठाना होगा और यहीं से भ्रष्टाचार निवारण की ठोस शुरुवात करनी होगी।
प्राध्यापकों एवं अन्य कर्मचारियों के वेतन भुगतान हेतु स्पष्ट शासनादेश है कि शुल्क के रुप में प्राप्त आय का पचहत्तर से अस्सी प्रतिशत वेतन मद में खर्च किया जाएगा। अधिकांश महाविद्यालय ऐसे राजनीतिज्ञों के है जिनका सत्ता और राजनीति में काफी दखल होता है। लाखों करोड़ो रूपये खर्च करके महाविद्यालय अगर इतना रूपया वेतन मद में खर्च कर देेंगे तब तो वो फुटपाथ पर आ जाएंगे। आज शिक्षालय खोलना समाज सेवा नही है यह अर्थोपार्जन का माध्यम है। आज यह कहते आसानी से सुना जा सकता है कि आज के समय में सबसे बढि़या धन्धा स्कूल खोलना है। यह सही भी है आज पता नही कितने पूंजीपतियो ने राजनीतिज्ञों ने अपनी काली कमाई से स्कूल खोलकर अपने काले धन को गोरा बना लिया है। ऐसे में उनसे पचहत्तर से अस्सी प्रतिशत  वेतन मद में खर्च करने की अपेक्षा करना हास्यास्पद है। शासन को चाहिए कि वेतन सम्बन्घी शासनादेश को व्यवहारिक रूप दे। फीस के रूप में प्राप्त आय से वेतन का निर्धारण न करके न्यूनतम वेतनमान की व्यवस्था करे। शासनादेश के अनुपालन में वेतन भुगतान खाते से देना अनिवार्य करे। चूकि भविष्य केवल सरकारी प्राध्यापकों का ही नही होता है आज की महंगायी में नाम मात्र वेतन पर गुजारा करने वाले योग्य प्राध्यापकों का भी होता है। अतः सी0पी0एफ0 कटौती को अनिवार्य रूप से लागू किया जाना चाहिए।
प्राध्यापक के निष्कासन से सम्बन्धित शासनादेश व्यवहारिक है लेकिन  व्यवहार मे लाया नहीं जाता। वैसे तो प्राध्यापक का निष्कासन विश्वविद्यालय की संस्तुति से ही होता है लेकिन हकीकत यह है कि काॅलेज मे प्राध्यापक प्रबन्ध समिति की मर्जी तक कार्य कर सकता है। वह जब चाहे तब उसे हटा सकता है। ऐसे में प्राध्यापक अस्थिरता और पराधीनता की मानसिकता में जीता है। जब सरकारी प्राध्यापक और स्ववित्तपोषित प्राध्यापक की योग्यता समान रखी गयी है, कार्य समान रखा गया है तो अगर समान वेतन नही दे सकते तो नियुक्ति को तो स्थायी करने का पक्ष बनता ही है। प्राध्यापको का अनुमोदन स्थायी किया जाय या उन्हे अनुमोदन पत्र की जगह नियुक्ति पत्र दिया जाय। निश्चित अवधि पर नवीनीकरण करवाते रहने से पता क्या हित शासन, या विश्वविद्यालय का है यह समझ में नही आता। लगता है कि यह नियम प्राध्यापकों के मानसिक शोषण और उसकी पराधीनता को बनाये रखने के लिए बनाया गया है।
इन महाविद्यालयों में व्याप्त नकल व्यवस्था एक ऐसी समस्या बन चुकी है जिसका स्थायी समाधान अबिलम्ब खोजा जाना अति आवश्यक है। जब शिक्षालयों के संचालक नकल कराने को परम ध्येेय मान बैठे हों तब इसके विषय में सहज ही समझा जा सकता है। वर्तमान परीक्षा प्रणाली नकल को रोकने में सक्षम नही हो सकती। जब उसी काॅलेज के छात्र उसी काॅलेज मे परीक्षा देंगे तो नकल तो करेंगे ही। विश्वविद्यालय प्रशासन को चाहिए कि नकल रोकने के लिए ठोस कदम उठाये। इस क्रम में सबसे पहला कदम यह उठाना होगा कि परीक्षा केन्द्रो को स्थायी न किया जाय। ऐसा करके ही काफी हद तक तक परीक्षा की सुचिता और पवित्रता बनायी रखी जा सकती है।
पुस्तकालय, पुस्तकालयाध्यक्ष आदि के सम्बन्ध को विश्वविद्यालय को चाहिए कि वह महाविद्यालयो में मानको के औचक निरीक्षण की पारदर्शिता पूर्ण व्यवस्था करें। मानक पूरे न करने की दशा में विश्वविद्यालय द्वारा तुरन्त वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए। क्लर्को की संख्या भी मानकानुकूल होना चाहिए।
विश्वास नही होता कि यह भ्रष्टाचार विश्वविद्यालय और प्रशासन की जानकारी में नही है। अगर जानकारी मे होने के बावजूद इस पर आज तक कोई ठोस कदम नही उठाया गया तो इसका क्या कारण हो सकता है यह आज के बुद्धिजीवियों के लिए चिन्तन से ज्यादाा चिंता का विषय है। और अगर इतना प्रत्यक्ष और विकराल भ्रष्टाचार उसके संज्ञान में नही है तो शिक्षा के जिम्मेदार अपनी कुर्सी पर बैठे रहने के योग्य नहीं हैं। जब ऐसे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाले ही अंधे, बहरे, गूंगे की भूमिका निभाएंगे तो अदम जी की ये पंक्तियां ही रास्ता तलाशने पर विवश होंगी-
जनता के पास एक ही चारा है बगावत, ये बात कह रहा हूँ मै होशो हवाश में।
---------------डॉ.अनिल कुमार  सिंह


मंगलवार, 24 मार्च 2015

क्रास पर हमला

जूलियो रेबेरो भारत के सबसे जानेमाने पुलिस अधिकारियों में से एक हैं। गत 16 मार्च को उनका लेख एक समाचारपत्र में प्रकाशित हुआ जिसमें उन्होंने कहा कि वे इस देश में अजनबी महसूस कर रहे हैं। पुलिस अधिकारी बतौर अपने अनुभवों की याद दिलाते हुए उन्होंने कहा कि मैं ‘‘स्वयं को अपने ही देश में डरा हुआ, अवांछित और अजनबी पा रहा हूं।’’ भारत के एक विशिष्ट नागरिक और असाधारण पुलिस अधिकारी के इस दर्द और व्यथा को चर्चों पर बढ़ते हमलों और कोलकाता में एक 71 वर्षीय नन के साथ हुए बलात्कार की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। इस वीभत्स घटना के विरूद्ध पूरे देश का ईसाई समुदाय उठ खड़ा हुआ है और जगह-जगह मौन जुलूस और अन्य शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन  किए जा रहे हैं।
पिछले कुछ महीनो से इस अल्पसंख्यक समुदाय पर हमलों और उन्हें डराने-धमकाने की घटनाओं में तेजी से वृद्धि हुई है और यह मात्र संयोग नहीं है। हिंसा के स्वरूप में भी एक उल्लेखनीय परिवर्तन आया है और वह यह कि जहां पहले ये हमले दूरदराज के आदिवासी इलाकों में हुआ करते थे, वहीं अब वे शहरी क्षेत्रों में हो रहे हैं। एक अन्य परिवर्तन यह हुआ है कि नई सरकार के आने के बाद से इन हमलों की संख्या में बढोत्तरी हुई है।
ईसाई भारत में सदियों से रह रहे हैं। पहली सदी ईस्वी में सेंट थाॅमस, केरल के मलाबार तट पर उतरे और वहां उन्होंने चर्च की स्थापना की। तभी से ईसाई, भारतीय समाज का अंग बने हुए हैं और उनका सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। नन, पादरी व मिशनरी लंबे समय से देश के दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में निवासरत रहते हुए वहां शिक्षा व स्वास्थ्य संबंधी संस्थाएं स्थापित व संचालित करते आए हैं। देश के कई बड़े नगरों में उन्होंने प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना की है। आज ईसाई हमारे देश का बहुत छोटा अल्पसंख्यक समूह (2001 की जनगणना के अनुसार आबादी का 2.3 प्रतिशत) हैं। इस समुदाय में भी हिंदुओं और मुसलमानों की तरह आंतरिक विविधता है व कई पंथ अस्तित्व में हैं।
पिछले कुछ दशकों में आदिवासी इलाकों, जिनमें डांग (गुजरात), झाबुआ (मध्यप्रदेश) व कंधमाल (ओडिसा) शामिल हैं, में हुई ईसाई-विरोधी हिंसा ने पूरे समुदाय को हिलाकर रख दिया है। बहुवाद और विविधता के मूल्यों में विष्वास करने वालों को भी इन घटनाओं से गहरा धक्का पहुंचा है। सन् 1990 के दशक के मध्य से शुरू हुई इस हिंसा का एक चरम था पास्टर ग्राहम स्टेंस और उनके दो मासूम लड़कों को 23 जनवरी 1999 को जिंदा जलाया जाना। सन् 2007 व 2008 में कंधमाल में हुई घटनाएं, इस हिंसा का एक और चरम बिंदू थीं। उसके बाद से, देश के अलग-अलग हिस्सो में ईसाई पादरियों, ननों व चर्चों सहित अन्य ईसाई संस्थाओं पर हमले होते रहे। फिर, पिछले कुछ महीनों में दिल्ली में कई चर्चों पर हमले हुए। जिन चर्चों को निशाना बनाया गया वे दिल्ली के पांच कोनों में स्थित थे: दिलशाद गार्डन (पूर्व), जसोला (दक्षिण-पश्चिम), रोहिणी (बाहरी दिल्ली), विकासपुरी (पश्चिम) व बसंतकुंज (दक्षिण)। ऐसा लगता है कि इन चर्चों को एक सुनियोजित षड़यंत्र के तहत चुना गया ताकि पूरी दिल्ली को सांप्रदायिक आधार पर धु्रवीकृत किया जा सके। दिल्ली पुलिस व केंद्र सरकार का दावा है कि इन हमलों के पीछे मुख्य उद्देश्य चोरी व लूटपाट आदि था। यह इस तथ्य के बावजूद कि अधिकांश मामलों में हमलावर, चर्च में रखी दान पेटियां वहीं छोड़ गये। भाजपा प्रवक्ताओं ने यह दावा भी किया कि इसी अवधि में कई मंदिरों पर भी हमले हुए। परंतु इससे चर्चों पर हुए हमलों को न तो उचित ठहराया जा सकता है और ना ही दोनों प्रकार की घटनाओं को समान दृष्टि से देखा जा सकता है। जिस तरह से चर्चों पर हमले हुए, उससे यह साफ है कि यह एक धार्मिक समुदाय को आतंकित करने का प्रयास था।
इस बीच हिंदू दक्षिणपंथियों के मुखिया व भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस के सरसंघचालक ने यह कहकर हलचल मचा दी कि मदर टेरेसा परोपकार का जो कार्य करतीं थीं उसका मुख्य उद्देश्य धर्मपरिवर्तन करवाना था। इस वक्तव्य के बाद दो बड़ी घटनाएं हुईं। पहली, हिसार के हरियाणा में एक चर्च पर हमला कर वहां लगे क्रास को हटाकर उसकी जगह भगवान हनुमान की मूर्ति स्थापित कर दी गई और संघी पृष्ठभूमि वाले हरियाणा के मुख्यमंत्री ने यह कहा कि उक्त चर्च के पास्टर धर्मपरिवर्तन की गतिविधियों में संलग्न थे। संघ के अनुशांगिक संगठन विश्व हिंदू परिषद ने कहा कि अगर धर्मपरिवर्तन बंद नहीं हुए तो चर्चों पर और हमले होंगे। हिसार में हुई घटना, सन् 1949 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के भीतर रामलला की मूर्ति स्थापित करने की घटना की याद दिलाती है। उसके बाद यह दावा किया गया था कि वह भगवान राम का जन्मस्थान है। मुख्यमंत्री के वक्तव्य से साफ है कि घटना की जांच किस कोण से की जावेगी और असली दोषियों के पकडे जाने की कितनी संभावना है। यहां यह महत्वपूर्ण है कि उक्त पास्टर द्वारा धर्मपरिवर्तन किए जाने की पुलिस में कभी कोई शिकायत नहीं की गई। ईसाई-विरोधी हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए धर्मपरिवर्तन का आरोप लंबे समय से लगाया जाता रहा है।
दूसरी बड़ी घटना पश्चिम  बंगाल में हुई, जहां के समाज का बहुत तेजी से सांप्रदायिकीकरण किया जा रहा है। कोलकाता में एक 71 वर्षीय नन के साथ बलात्कार हुआ। इस हमले में वे गंभीर रूप से घायल हो गईं और कई दिनों तक उन्हें अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। उनका एक आपरेशन भी हुआ। उन्होंने अपने बलात्कारियों को क्षमा कर दिया है। ऐसा कहा जा रहा है कि यह बलात्कार की एक अन्य घटना मात्र है, जबकि इसके पीछे के सांप्रदायिक उद्देश्य को नजरअंदाज करना किसी के लिए भी असंभव है।
मदर टेरेसा के संबंध में भागवत की टिप्पणी के बाद से ईसाईयों पर हमले बढते जा रहे हैं और हरियाणा व कोलकाता की घटनाएं इसका प्रतीक हैं। विहिप खुलकर और हमलों की धमकी दे रही है। प्र्रधानमंत्री मोदी ने हाल में इस मुद्दे पर अपनी समझीबूझी चुप्पी तोड़ते हुए कहा कि देश में धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान किया जायेगा। परंतु हम सब जानते हैं कि मोदी अकसर जो कहते हैं, वह उनका मंतव्य नहीं होता। पिछले कई महीनों से वे अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए थे और इससे संघ परिवार को यह स्पष्ट संदेश जा रहा था कि वह अपनी विघटनकारी व हिंसात्मक गतिविधियों को जारी रख सकता है। ईसाई समुदाय का एक बड़ा हिस्सा इन बढते हमलों से सकते में है। उसका कहना है कि मोदी को विकास के मुद्दे पर देश भर में समर्थन मिला था और उसे यह उम्मीद नहीं थी कि उनके सत्ता में आने के बाद देश  में यह सब कुछ होगा। जो लोग ऐसा सोचते हैं, उन्हें हम केवल भोला ही कह सकते हैं। मोदी, आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं और विघटनकारी एजेण्डा मानो उनकी जीन्स में है। संघ परिवार के विभिन्न सदस्यों की सहायता से यह एजेण्डा देश भर में लागू किया जायेगा, इस संबंध में किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
भारत हमेशासे कई धर्मावलंबियो का देश रहा है, जो सदियों तक मिलजुल कर रहते आये थे और एक-दूसरे के त्यौहारों में शिरकत करते रहे थे। अल्पसंख्यकों को डराने-धमकाने और उन पर हमले करने की घटनाओं में पिछले कुछ दशकों में हुई वृद्धि से हमें इस नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए कि भारत में रहने वाले विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच हमेशा से बैरभाव रहा है। ईसाईयों की आज जो स्थिति है, उसका प्रजातांत्रिक अधिकारों के प्रति प्रतिबद्ध वर्गों को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। यह ‘पहले कसाई फिर ईसाई’ की पटकथा के अनुरूप है। यह सिर्फ ईसाईयों के अधिकारों पर अतिक्रमण का प्रश्न नहीं है, यह प्रजातंत्र की नींव को खोखला करने का प्रयास है। जैसा कि कहा जाता है, किसी भी प्रजातंत्र की सफलता की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी यह है कि वह अपने अल्पसंख्यक नागरिकों को समानता व सुरक्षा उपलब्ध करवा रहा है अथवा नहीं।
-राम पुनियानी

सोमवार, 23 मार्च 2015

हिन्दू राष्ट्र, गाय व मुसलमान

भाग.1
उच्च जातियों के हिन्दुओं और हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का गाय के प्रति . एक पशु बतौर व हिन्दू राष्ट्र के प्रतीक बतौर . ढुलमुल रवैया रहा है। कभी वे गाय के प्रति बहुत श्रद्धावान हो जाते हैं तो कभी उनकी श्रद्धा अचानक अदृश्य हो जाती है। हाल के कुछ वर्षों में, हिन्दू राष्ट्रवादियों ने गाय को एक पवित्र प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया है। और यह इसलिए नहीं कि सनातन धर्म की चमत्कृत कर देने वाली विविधता से परिपूर्ण धार्मिक.दार्शनिक ग्रंथ ऐसा कहते हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि गाय, हिन्दुओं को लामबंद करने और मुसलमानों को खलनायक के रूप में प्रस्तुत करने के लिए अत्यंत उपयोगी है। ऐसा क्यों ? क्योंकि मुसलमानों के गौमांस भक्षण पर कोई धार्मिक प्रतिबंध नहीं है और इस धर्म के मानने वालों का एक तबका मांस व मवेशियों के व्यापार में रत है। मुस्लिम शासकों और धार्मिक नेताओं का भी गाय के प्रति ढुलमुल रवैया रहा है। कभी उन्होंने हिन्दुओं के साथ शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की खातिर गौवध को प्रतिबंधित किया तो कभी अपने सांस्कृतिक अधिकारों और अपनी अलग पहचान पर जोर दिया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रोफेसर डीएन झा की पुस्तक 'द मिथ ऑफ होली काऊ' ;पवित्र गाय का मिथक कहती है कि प्राचीन भारत में न केवल गौमांस भक्षण आम था वरन् गाय की बलि भी दी जाती थी और कई अनुष्ठानों में गाय की बलि देना आवश्यक माना जाता था। कई ग्रंथों में इन्द्र भगवान द्वारा बलि दी गई गायों का मांस खाने की चर्चा है। चूंकि उस समय समाज, घुमंतु से कृषि.आधारित बन रहा था इसलिए मवेशियों का महत्व बढ़ता जा रहा थाए विशेषकर बैलों और गायों का। मवेशी, संपत्ति के रूप में देखे जाने लगे थे जैसा कि 'गोधन'शब्द से जाहिर है। शायद इसलिएए गाय की बलि पर प्रतिबंध लगाया गया और उस प्रतिबंध को प्रभावी बनाने के लिए उसे धार्मिक चोला पहना दिया गया। सातवीं से पांचवी सदी ईसा पूर्व के बीच लिखे गए ब्राह्मण ग्रंथों, जो कि वेदों पर टीकाएं हैं, में पहली बार गाय को पूज्यनीय बताया गया है। 
इसके बाद, भारत में बौद्ध और जैन धर्मों का उदय हुआ और सम्राट अशोक ने सभी पशुओं के प्रति दयाभाव को अपने राज्य की नीति का अंग बनाया। यहां तक कि उन्होंने जानवरों की चिकित्सा का प्रबंध तक किया और उनकी बलि पर प्रतिबंध लगा दिया, यद्यपि यह प्रतिबंध मवेशियों पर लागू नहीं था। कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' में मवेशियों के वध को आम बताया गया है। इंडोनेशिया के बाली द्वीपसमूह के हिन्दू आज भी गौमांस खाते हैं। कुछ आदिवासी समुदायों में आज भी उत्सवों पर गाय की बलि चढ़ाई जाती है। कुछ दलित समुदायों को भी गौमांस से परहेज नहीं है। हिन्दुओं के गौमांस भक्षण पर पूर्ण प्रतिबंध, आठवीं सदी ईस्वी में लगाया गया,जब आदि शंकराचार्य के अद्वैत वेदांत दर्शन का समाज में प्रभाव बढ़ा। बौद्ध धर्म.विरोधी प्रचार भी आठवीं सदी में अपने चरम पर पहुंचाए जब शंकर ने अपने मठों का ढांचा, बौद्ध संघों की तर्ज पर बनाया। ग्यारहवीं सदी तक उत्तर भारत में हिन्दू धर्म एक बार फिर छा गया, जैसा कि उस काल में रचित संस्कृत नाटक 'प्रबोधचन्द्रोदय' से स्पष्ट है। इस नाटक में बौद्ध और जैन धर्म की हार का रूपक और विष्णु की आराधना है। तब तक उत्तर भारत के अधिकांश रहवासी शैव, वैष्णव या शक्त बन गए थे। 12वीं सदी के आते.आते, बौद्ध धर्मावलंबी केवल बौद्ध मठों तक सीमित रह गए और आगे चलकरए यद्यपि बौद्ध धर्म ने भारत के कृषक वर्ग के एक तबके को अपने प्रभाव में लिया, तथापि, तब तक बौद्ध धर्म एक विशिष्ट धार्मिक समुदाय के रूप में अपनी पहचान खो चुका था। वैष्णव, पशुबलि के विरोधी और शाकाहारी थे।
मुसलमानों का ढुलमुल रवैया
    मुस्लिम शासक और धार्मिक नेता, वर्चस्वशाली उच्च जाति के हिन्दुओं की भावनाओं का आदर करने और अपने सांस्कृतिक अधिकारों पर जोर देने के बीच झूलते रहे। मुगल बादशाह बाबर ने गौवध पर प्रतिबंध लगाया था और अपनी वसीयत में अपने पुत्र हुमांयू से भी इस प्रतिबंध को जारी रखने को कहा था। कम से कम तीन अन्य मुगल बादशाहों.अकबर, जहांगीर और अहमद शाह.ने भी गौवध प्रतिबंधित किया था। मैसूर के नवाब हैदरअली के राज्य में गौवध करने वाले के हाथ काट दिए जाते थे। असहयोग और खिलाफत आंदोलनों के दौरान गौवध लगभग बंद हो गया था क्योंकि कई मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस आशय के फतवे जारी किए थे और अली बंधुओं ने गौमांस भक्षण के विरूद्ध अभियान चलाया था। महात्मा गांधी ने हिन्दुओं से खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने की जो अपील की थी, उसके पीछे एक कारण यह भी था कि इसके बदले  मुसलमान नेता गौमांस भक्षण के विरूद्ध प्रचार करेंगे। मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने इस अहसान का बदला चुकाया और गौवध के खिलाफ अभियान शुरू किया। इससे देश में अभूतपूर्व हिन्दू.मुस्लिम एकता स्थापित हुई और पूरे देश ने एक होकर अहिंसक रास्ते से ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ मोर्चा संभाला।
हाल में कई राज्यो द्वारा गौवध पर प्रतिबंध लगाने संबंधी कानून बनाए गए हैं। इनका विरोध गौमांस व्यापारी  व मांस उद्योग के श्रमिक कर रहे हैं। इनमें मुख्यतः कुरैशी मुसलमान हैं परंतु हिन्दू खटीक व अन्य गैर.मुसलमान भी यह व्यवसाय करते हैं। वे इस प्रतिबंध का विरोध मुख्यतः इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इससे उनके व्यावसायिक हितों को नुकसान पहुंचेगा। फिक्की और सीआईआई यह चाहते हैं कि उद्योगों और व्यवसायों पर सरकार का नियंत्रण कम से कम हो। अगर ये छोटे व्यवसायी भी ऐसा ही चाहते हैं तो इसमें गलत क्या है ? और यहां इस तथ्य को नहीं भुलाया जाना चाहिए कि मांस के व्यवसायियों में हिन्दू और मुसलमान दोनों शामिल हैं परंतु मीडिया केवल मुसलमानों के विरोध को महत्व दे रहा है और गैर.मुसलमानों द्वारा किए जा रहे विरोध का अपेक्षित प्रचार नहीं हो रहा है। गौवध पर प्रतिबंध और गौमांस के व्यवसाय के विनियमन को कई आधारों पर चुनौती दी जाती रही है, जिनमें से एक है संविधान के अनुच्छेद 19;1 द्वारा हर नागरिक को प्रदत्त 'कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार' करने का मौलिक अधिकार। इसके अतिरिक्तए अनुच्छेद 25, जो कि सभी नागरिकों को किसी भी धर्म को मानने और उसका आचरण करने की स्वतंत्रता देता है,के आधार पर भी इस प्रतिबंध को अनुचित बताया जाता रहा है। उच्चतम न्यायालय ने इस प्रतिबंध को इस आधार पर उचित ठहराया है कि यह जनहित ;दुधारू व भारवाही पशुओं और पशुधन का संरक्षण,में है और यह व्यवसाय करने की स्वतंत्रता पर अनुचित प्रतिबंध नहीं है। धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के उल्लंघन के आधार पर चुनौती को यह कहकर खारिज कर दिया गया कि यद्यपि इस्लाम में गौमांस भक्षण की इजाजत है तथापि मुसलमानों के लिए गौमांस भक्षण अनिवार्य नहीं है।
गौवध संबंधी पुराने कानूनों का चरित्र मुख्यतः नियामक था और उनमें गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया था। इन कानूनों में गायों और दोनों लिंगों के बछड़ों के वध को प्रतिबंधित किया गया था परंतु राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकृत अधिकारी की इजाजत से, एक निश्चित आयु से ज्यादा के पशुओं का वध किया जा सकता था। इन कानूनों को शाकाहार.समर्थक नागरिकों ने इस आधार पर चुनौती दी थी कि वे राज्य के नीति निदेशक तत्वों में से एक, जिसमें'गायों,बछड़ों व अन्य दुधारू व भारवाही पशुओं के वध पर प्रतिबंध' लगाए जाने की बात कही गई है, का उल्लंघन हैं। उच्चतम न्यायालय ने मोहम्मद हमीद कुरैशी विरूद्ध बिहार राज्य प्रकरण में इस तर्क को इस आधार पर खारिज कर दिया कि एक निश्चित आयु के बाद, गौवंश की भारवाही पशु के रूप में उपयोगिता समाप्त हो जाती है और वे सीमित मात्रा में उपलब्ध चारे पर बोझ बन जाते हैं। अगर ये अनुपयोगी जानवर न रहें तो वह चारा दुधारू व भारवाही पशुओं को उपलब्ध हो सकता है। राज्यों ने अनुपयोगी हो चुके गौवंश के संरक्षण के लिए जो गौसदन बनाए थे, वे घोर अपर्याप्त थे। इस संबंध में दस्तावेजी सुबूतों के आधार पर न्यायालय ने कहा कि गौवध पर पूर्ण प्रतिबंध उचित नहीं ठहराया जा सकता और वह जनहित में नहीं है।
परंतु दूसरे दौर के गौवध.निषेध कानूनों में गौवध पर प्रतिबंध तो लगाया ही गया साथ ही,गौमांस खरीदने व उसका भक्षण करने वालों के लिए भी सजा का प्रावधान कर दिया गया। इस संबंध में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा बनाया गया कानून तो यहां तक कहता है कि गौमांस भंडारण करने व उसे पकाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले सामान, जिनमें फ्रिज और बर्तन तक शामिल हैं, को भी जब्त किया जा सकता है। अर्थात अब पुलिसवाला हमारे रसोईघर में घुस सकता है और अगर वहां गौमांस पाया गया या उसके भंडारण या पकाने का इंतजाम मिला,तो हमें जेल की सलाखों के पीछे सात साल काटने पड़ सकते हैं।  
गौवध व हिन्दू राष्ट्रवादी संगठन
    गौवध के संबंध में जिस तरह का ढुलमुल रवैया हिन्दू व मुस्लिम धार्मिक व राजनैतिक नेताओं का था,कुछ वैसा ही हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों का भी रहा है। हिन्दुत्व चिंतक वी. डी. सावरकर ने गाय को श्रद्धा का पात्र बनाने का विरोध किया था। उनका कहना था कि गाय एक पशु है, हमें उसके प्रति मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और हिन्दुओं को करूणा व दयावश उसकी रक्षा करनी चाहिए। परंतु उनके लिए गाय किसी भी अन्य पशु के समान थी.न कम न ज्यादा। वे लिखते हैं 'गाय और भैंस जैसे पशु और पीपल व बरगद जैसे वृक्ष, मानव के लिए उपयोगी हैं इसलिए हम उन्हें पसंद करते हैं और यहां तक कि हम उन्हें पूजा करने के काबिल मानते हैं और उनकी रक्षा करना हमारा कर्तव्य है परंतु केवल इसी अर्थ में। क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि अगर किन्हीं परिस्थितियों मेंए वह जानवर या वृक्ष मानवता के लिए समस्या का स्त्रोत बन जाए तब वह संरक्षण के काबिल नहीं रहेगा और उसे नष्ट करना,मानव व राष्ट्र हित में होगा और तब वह मानवीय व राष्ट्र धर्म बन जाएगा';समाज चित्र, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 678। सावरकर आगे लिखते हैं 'कोई भी खाद्य पदार्थ इसलिए खाने योग्य होता है क्योंकि वह हमारे लिए लाभदायक होता है परंतु किसी खाद्य पदार्थ को धर्म से जोड़ना, उसे ईश्वरीय दर्जा देना है। इस तरह की अंधविश्वासी मानसिकता से देश की बौद्धिकता नष्ट होती है' ;1935, सावरकरांच्या गोष्ठी, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 2, पृष्ठ 559 द्। 'जब गाय से मानवीय हितों की पूर्ति न होती हो या उससे मानवता शर्मसार होती हो,तब अतिवादी गौसंरक्षण को खारिज कर दिया जाना चाहिए' ;समग्र सावरकर वांग्मय,खण्ड 3, पृष्ठ 341,।'मैंने गाय की पूजा से जुड़े झूठे विचारों की निंदा इसलिए की ताकि गेंहू को भूंसे से अलग किया जा सके और गाय का संरक्षण बेहतर ढंग से हो सके';1938,स्वातंत्रय वीर सावरकर, हिन्दू महासभा पर्व,पृष्ठ 143।
खिलाफत आंदोलन के दौरान, जब मुसलमानों ने गौमांस भक्षण बंद कर दिया और गौवध का विरोध करने लगे तब सावरकर और हिन्दू राष्ट्रवादियों के लिए गाय वह मुद्दा न रही जिसका इस्तेमाल हिन्दुओं को एक करने और मुसलमानों को 'दूसरा' या 'अलग' बताने के लिए किया जा सके। परंतु सावरकर हिन्दुओं द्वारा गाय की पूजा करने का विरोध एक अन्य कारण से भी कर रहे थे। सावरकर लिखते हैंए 'जिस वस्तु की हम पूजा करें, वह हमसे बेहतर व महान होनी चाहिए। उसी तरहए राष्ट्र का प्रतीक, राष्ट्र की वीरता, मेधा और महत्वाकांक्षा को जागृत करने वाला होना चाहिए और उसमें देश के निवासियों को महामानव बनाने की क्षमता होनी चाहिए। परंतु गाय, जिसका मनमाना शोषण होता है और जिसे लोग जब चाहे मारकर खा लेते हैं, वह तो हमारी वर्तमान कमजोर स्थिति का एकदम उपयुक्त प्रतीक है। पर कम से कम कल के हिन्दू राष्ट्र के निवासियों का तो ऐसा शर्मनाक प्रतीक नहीं होना चाहिए' ;1936, क्ष.किरण, समग्र सावरकर वांग्मय, खण्ड 3ए पृष्ठ 237। 'हिन्दुत्व का प्रतीक गाय नहीं बल्कि नृसिंह है। ईश्वर के गुण उसके आराधक में आ जाते हैं। गाय को ईश्वरीय मानकर उसकी पूजा करने से संपूर्ण हिन्दू राष्ट्र गाय जैसा दब्बू बन जाएगाए वह घास खाने लगेगा। अगर हमें अपने राष्ट्र से किसी पशु को जोड़ना ही है तो वह पशु सिंह होना चाहिए। एक लंबी छलांग लगाकर सिंह अपने पैने पंजों से जंगली हाथियों के सिर को चीर डालता है। हमें ऐसे नृसिंह की पूजा करनी चाहिए। नृसिंह के पैने पंजे न कि गाय के खुर, हिन्दुत्व की निशानी हैं, ;1935, क्ष.किरण, समग्र सावरकर वांग्मयए खण्ड 3,पृष्ठ 167। सावरकर की मान्यता थी कि हिन्दुओं द्वारा गाय की पूजा करने से वे जरूरत से ज्यादा विनम्र, दयालु व सभी प्राणियों को समान मानने वाले बन जाएंगे। जबकि सावरकर तो राष्ट्रवाद का हिन्दूकरण और हिन्दुओं का सैन्यीकरण करना चाहते थे।
-इरफान इंजीनियर