शनिवार, 6 जुलाई 2019

शमीम फैजी महान पत्रकार भी थे - रण धीर सिंह सुमन

कम्युनिस्ट पार्टी राष्ट्रीय सचिव के निधन पर हुआ शोकसभा का आयोजन

बाराबंकी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव व सम्पादक कामरेड शमीम फैजी के निधन पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शोकसभा का आयोजन किया गया। पार्टी राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने शोक संवेदना व्यक्त करते हुये कहा कि कामरेड शमीम फैजी ने 1965 में नागपुर में पार्टी में शामिल हुए थे। और भारतीय कम्युनिस्ट के मुख्यालय में पार्टी के पत्र-पत्रिकाओं के इंचार्ज बने। और अंतिम सांस तक पार्टी के लेखन कार्य से जुड़े रहे हैं। 1979 में पार्टी के राष्ट्रीय परिषद के सदस्य, 1993 में राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य, 1997 में पार्टी राष्ट्रीय सचिव चुनें गए। नागपूर से प्रकाशित हिटवाडा के सह सम्पादक बने। फैजी 1979 मे उर्दू साप्ताहिक हयात के संपादक व ऐज अंग्रेजी साप्ताहिक के संपादक भी जीवन पर्यंत रहे हैं। उनके निधन से अंग्रेजी, उर्दू, मराठी व हिन्दी की अपूर्णनीय क्षति है वह महान पत्रकार थे। शोकसभा में सचिव ब्रज मोहन वर्मा, शिव दर्शन वर्मा डॉ कौसर हुसैन, विनय कुमार सिंह, प्रवीण कुमार आदि प्रमुख मौजूद रहे।

शुक्रवार, 5 जुलाई 2019

शमीम फैजी

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय सचिव व न्यू ऐज के सम्पादक कामरेड शमीम फैजी का स्वास्थ्य कैंसर रोग के कारण अत्यधिक खराब है लोकसंघर्ष पत्रिका और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बाराबंकी की ओर से शीघ्र स्वास्थ्य लाभ की कामना है

गुरुवार, 27 जून 2019

बाराबंकीः भाजपा के अफवाह बाजी सिस्टम मंे फंसकर किसानों ने वोट तो दे दिया
 लेकिन उनकी नीतियों के कारण अब तक लाखों किसान आत्महत्या कर चुके है यह बात आॅल इण्डिया किसान सभा के दूसरे दिन राज्य परिषद की बैठक को सम्बोधित करते हुए संगठन के महामंत्री राजेन्द्र यादव पूर्व विधायक ने कहा कि ’’अगामी’’ 11 जुलाई को योगी और मोदी की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ प्रदेश भर के किसान धरना, अनशन, प्रदर्शन व चक्का जाम करेंगे वहीं प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेश त्रिपाठी ने कहा कि किसानों को धार्मिक अफवाह बाजी से बचाने की जरूरत है। वरिष्ठ अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन ने किसान सभा के प्रतिनिधियों से वादा किया कि वह किसान संघर्षों में हमेशा उनके साथ रहेंगे और लोक संघर्ष पत्रिका उनके आन्दोलन को बढ़ावा देने के लिए समय समय पर किसान सभा के समर्थन में विशेषांक प्रकाशित करेगी।
संगठन के प्रदेश अध्यक्ष ’इम्तियाज बेग ने कहा कि 4 अगस्त से 28 अगस्त तक पूरे प्रदेश में सेमिनार गोष्ठी जनसभाए कर योगी-मोदी की किसान विरोधी नीतियों का पर्दा फास किया जायेगा। राज्य परिषद को जयशंकर सिंह राम कुमार भारती, छीतर सिंह, शास्त्री प्रसाद त्रिपाठी, अशोक तिवारी, देवेन्द्र मिश्रा, सुभाष पटेल, राम नारायन सिंह, अखिलेश राय, दीनानाथ त्रिपाठी, फूलमती, विनय कुमार सिंह आदि प्रमुख किसान नेताओं ने सम्बोधित किया राज्य परिषद की बैठक में 32 जिलो के किसान नेताओ ने हिस्सा लिया, बृजमोहन वर्मा ने  किसान सभा प्रतिनिधियों का बाराबंकी आने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।




बुधवार, 26 जून 2019

देश गम्भीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है--अतुल कुमार अंजान

आज देश गम्भीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है और उसमें देश का प्र्राचीनतम व्यवसाय कृषि अतिदयनीय अवस्था मेें है। लाखांे किसान कर्ज मंे डूब कर आत्महत्या कर रहे हैं और विडम्बना य

ह है कि आज किसान राजनैतिक दलों के राजनैतिक प्रचार का मुद्दा बनकर रह गया है। डर इस बात का है कि इस मुल्क में किसानों की बात करना कहीं फैशन न बन जाये।
आल इण्डिया किसान सभा के जनक स्वामी सहजानन्द सरस्वती की पुण्य तिथि के अवसर पर ‘‘किसानांे की समस्या एवं सरकार’’ विषय पर आयोजित गोष्ठी में मुख्यवक्ता के तौर पर अपने उद्बोधन में आल इण्डिया किसान सभा के राष्ट्रीय सचिव अतुल कुमार अंजान ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी किसानों की आय दुगनी करने की बात करते है परन्तु राष्ट्रपति के भाषण के अभिवादन में लोकसभा में किसानों की समस्या का उन्होंने कोई जिक्र तक करना मुनासिफ नहीं समझा। भारतीय जनता पार्टी सरकार की नीतियाँ प्रारम्भ से ही किसान विरोधी एवं गरीब विरोधी रही हैं। उनके ही शासनकाल में बीज महंगा, खाद महंगी और डीजल की कीमतें आसमान छू रहीं है। अब अमेरिका के दबाव में पेट्रोलियम पदार्थों का आयात ईरान से न करने पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में और उछाल आयेगा। किसानों की समस्यायें बढ़ने वाली हैं। मुद्रा स्फूर्ति दर मंे भी इजाफा होगा आम जनता को महंगाई का सामना करना होगा।
कामरेड अतुल कुमार अंजान ने मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों और विदेशी नीति एवं रक्षा नीतियों पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि देश मंे जल्द से जल्द डेढ़ सौ से अधिक सार्वजनिक उपकरणों का निजीकरण सरकार द्वारा कर दिया जायेगा। सरकारी बैंकों के अस्तित्व पर भी भारी संकट है। नितिन गडकरी के रिश्तेदारों के इंड्सइंड बैंक पर मोदी सरकार मेहरबान है इसी प्रकार एक्सिस बैंक, यस बैंक, एच0डी0एफ0सी0 बैंक जनता को लूट रही हैं। उन्हांेने देश की सामाजिक, संस्कृति को भी अस्मिता व स्थिरता के लिए चिन्तनीय बताते हुए कहा मात्र एक विशेष धर्म व समुदाय के विरूद्ध लीचिंग जैसी घटनाएं देश के लोकतंत्र के लिए बहुत ही शर्मनाक हैैं।
उ0प्र0 किसान सभा के अध्यक्ष इम्तियाज बेग की आयोजित गोष्ठी को संगठन के
उपाध्यक्ष सुरेश त्रिपाठी ने सम्बोधित करते हुए किसानों की समस्याएँ, सरकारों की नीतियों, सरकारी तंत्र भ्रष्टाचार पर चर्चा की। उ0प्र0 किसान सभा के महामंत्री एवं पूर्व विधायक कामरेड राजेन्द्र यादव ने अपने सम्बोधन मंे किसानों की वर्तमान जटिल परिस्थितियों के विरूद्ध संघर्ष करने का आवाह्न किया।
इस अवसर पर उ0प्र0 किसान सभा के सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने गोष्ठी में सभी सदस्यों का स्वागत करते हुए ’लोक संघर्ष पत्रिका के विशेष अंक ‘‘किसान सभा’’ का लोकर्पण किसान सभा के वरिष्ठ पदाधिकारियों द्वारा करा गया। गोष्ठी का समापन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव कामरेड बृजमोहन वर्मा के द्वारा धन्यवाद ज्ञापित से हुआ। 


रणधीर सिंह सुमन
मोबाइल: 9450195427

रविवार, 23 जून 2019

2016 में शुरू की गई थी योजना

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना को साल 2016 में लॉन्च किया गया था, जिसमें फसल के साथ-साथ बुवाई के पूर्व और फसल कटाई के बाद के नुकसान को वहन किया जाता है। साथ ही इस योजना में खरीफ में अधिकतम 2 फीसदी, रबी में 1.5 फीसदी और कामर्शियल व बागवानी फसलों के लिए मात्र 5 फीसदी प्रीमियम किसानों से लिया जाता है। जबकि शेष प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकारें वहन करती हैं। वहीं, किसान अपनी उपज का औसतन 150 फीसदी तक फसल बीमा करा सकते हैं।

आवारा भीड़ के खतरे

अंतरंग गोष्ठी सी हो रही थी युवा असंतोष पर। इलाहाबाद के लक्ष्मीकांत वर्मा ने बताया-पिछली दीपावली पर एक साड़ी की दुकान पर कांच के केस में सुंदर मॉडल खड़ी थी। एक युवक ने एकाएक पत्थर उठाकर उस पर दे मारा। काँच  टूट गया। आसपास के लोगों ने पूछा कि उसने ऐसा क्यों किया? उसने तमतमाए चेहरे से जवाब दिया-हरामजादी बहुत खूबसूरत है।
हम 4-5 लेखक चर्चा करते रहे कि लड़के के इस कृत्य का क्या कारण है? क्या अर्थ है? यह कैसी मानसिकता है? यह मानसिकता क्यों बनी? बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ये सवाल दुनिया भर में युवाओं के बारे में उठ रहे हैं-पश्चिम के सम्पन्न देशों में भी और तीसरी दुनिया के गरीब देशों में भी। अमरीका से आवारा हिप्पी और ‘हरे राम हरे कृष्ण’ गाते अपनी व्यवस्था से असंतुष्ट युवा भारत आते हैं और भारत का युवा लालायित रहता है कि चाहे चपरासी का काम मिले, अमरीका में रहूं। ‘स्टेटस’ जाना है यानी चौबीस घंटे गंगा नहाना है। ये अपवाद है। भीड़-की-भीड़ उन युवकों की है, जो हताश, बेकार और क्रुद्ध हैं। संपन्न पश्चिम के युवकों के व्यवहार और भारत के युवकों के व्यवहार में अंतर है।
सवाल है उस युवक ने सुंदर मॉडल के चेहरे पर पत्थर क्यों फेंका? हरामजादी बहुत खूबसूरत है-यह उस गुस्से का कारण क्यों है? वाह, कितनी सुंदर है- ऐसा इस तरह के युवक क्यों नहीं कहते?
युवक साधारण कुर्ता पाजामा पहने था। चेहरा बुझा था जिसकी राख में चिंगारी निकली थी पत्थर फेंकते वक्त। शिक्षित था, बेकार था। नौकरी के लिए भटकता रहा था। धंधा कोई नहीं, घर की हालत खराब, घर में अपमान बाहर अवहेलना। वह आत्मग्लानि से क्षुब्ध, घुटन और गुस्सा। एक नकारात्मक भावना, सबसे शिकायत। ऐसी मानसिकता में सुंदरता देखकर चिढ़ होती है। खिले हुए फूल बुरे लगते हैं। किसी के अच्छे घर से घृणा होती है। सुंदर कार पर थूकने का मन होता है। मीठा गाना सुनकर तकलीफ होती है। अच्छे कपड़े पहिने खुशहाल साथियों से विरक्ति होती है। जिस चीज से खुशी, सुंदरता, संपन्नता, सफलता, प्रतिष्ठा का बोध होता है, उस पर गुस्सा आता है।
बूढ़े-सयाने लोगों का लड़का जब मिडिल स्कूल में होता है, तभी से शिकायतें होने लगती हैं। वे कहते हैं ये लड़के कैसे हो गए? हमारे जमाने में ऐसा नहीं था। हम पिता, गुरु, समाज के आदरणीयों की बात सिर झुका के मानते थे। अब ये लड़के बहस करते हैं। किसी की नहीं मानते। मैं याद करता हूँ कि जब मैं छात्र था, तब मुझे पिता की बात गलत तो लगती थी, पर मैं प्रतिवाद नहीं करता था। गुरु का भी प्रतिवाद नहीं करता। समाज के नेताओं का भी नहीं। मगर तब हम किशोरावस्था में थे, जानकारी ही क्या थी? हमारे कस्बे में दस-बारह अखबार आते थे। रेडियो नहीं। स्वतंत्रता संग्राम का जमाना था। सब नेता हमारे हीरो थे-स्थानीय भी और जवाहरलाल नेहरू भी, हम पिता, गुरु, समाज के नेता आदि की कमजोरियां नहीं जानते थे। मुझे बाद में समझ में आया कि मेरे पिता कोयले के भट्टों पर काम करने वाले गोंडों का शोषण करते थे, पर अब मेरा ग्यारह साल का नाती पांचवीं कक्षा का छात्र है। वह सबेरे अखबार पढ़ता है, टेलीविजन देखता है, रेडियो सुनता है। वह तमाम नेताओं की पोलें जानता है। देवीलाल और ओमप्रकाश चौटाला की आलोचना करता है। घर में कुछ ऐसा करने को कहो तो प्रतिरोध करता है-मेरी बात भी तो सुनो। दिन भर पढ़कर आया हूं। अब फिर कहते हो कि पढ़ने बैठ जाऊँ। थोड़ी देरं खेलूँगा नहीं तो पढ़ाई भी नहीं होगी हमारी पुस्तक में लिखा है। वह जानता है कि घर में बड़े कब-कब झूठ बोलते हैं।
ऊँची पढ़ाई वाले विश्वविद्यालय के छात्र सबेरे अखबार पढ़ते हैं तो तमाम राजनीति और समाज के नेताओं के भ्रष्टाचार, पतनशीलता के किस्से पढ़ते हैं। अखबार देश को चलाने वालों और समाज के नियामकों के छल, कपट, प्रपंच, दुराचार की खबरों से भरे रहते हैं। धर्माचार्यों की चरित्रहीनता उजागर होती है। यही नेता अपने हर भाषण हर उपदेश में छात्रों से कहते हैं- युवकों, तुम्हें देश का निर्माण करना है (क्योंकि हमने नाश कर दिया) तुम्हें चरित्रवान बनना है (क्योंकि हम तो चरित्रहीन हैं) शिक्षा का उद्देश्य पैसा कमाना नहीं है, नैतिक चरित्र का ग्रहण करना है-(हमने शिक्षा और अशिक्षा से पैसा कमाना और अनैतिक होना सीखा) इन नेताओं पर छात्रों-युवकों की आस्था कैसे जमे? छात्र अपने प्रोफेसरों के बारे में सब जानते हैं। उनका ऊँचा वेतन लेना और पढ़ाना नहीं। उनकी गुटबंदी, एक-दूसरे की टांग खींचना, नीच कृत्य, द्वेषवश छात्रों को फेल करना, पक्षपात, छात्रों का गुटबंदी में उपयोग। छात्रों से कुछ भी नहीं छिपा रहता अब। वे घरेलू मामले भी जानते हैं। ऐसे गुरुओं पर छात्र कैसे आस्था जमाएँ। ये गुरु कहते हैं- छात्रों को क्रांति करना है। वे क्रांति करने लगे तो सबसे पहले अपने गुरुओं को साफ करेंगे। अधिकतर छात्र अपने गुरुओं से नफरत करते हैं।
बड़े लड़के अपने पिता को भी जानते हैं। वे देखते हैं कि पिता का वेतन तो तीन हजार है, पर घर का ठाठ-बाट आठ हजार रुपयों का है। मेरा बाप घूस खाता है। मुझे ईमानदारी के उपदेश देता है। हमारे समय के लड़के-लड़कियों के लिए सूचना और जानकारी के इतने माध्यम खुले हैं कि वे सब क्षेत्रों में अपने बड़ों के बारे में सबकुछ जानते हैं। इसलिए युवाओं से ही नहीं बच्चों से भी अंधआज्ञाकारिता की आशा नहीं की जा सकती। हमारे यहाँ ज्ञानी ने बहुत पहले कहा था-‘प्राप्तेषु षोडसे वर्षे पुत्र मित्र समाचरेत।’
उनसे बात की जा सकती है, उन्हें समझाया जा सकता है। कल परसों मेरा बारह साल का नाती बाहर खेल रहा था। उसकी परीक्षा हो चुकी है और लंबी छुट्टी है। उससे घर आने के लिए उसके चाचा ने दो तीन बार कहा डांटा। वह आ गया और रोते हुए चिल्लाया, हम क्या करें? ऐसी-तैसी सरकार की जिसने छुट्टी कर दी। छुट्टी काटना उसकी समस्या है। वह कुछ तो करेगा ही। दबाओगे तो विद्रोह कर देगा। जब बच्चे का यह हाल है तो तरुणों की प्रतिक्रियाएं क्या होंगी।
युवक-युवतियों के सामने आस्था का संकट है। सब बड़े उसके सामने नंगे हैं। आदर्शों, सिद्धातों, नैतिकताओं की धज्जियाँ उड़ते वे देखते हैं। वे धूर्तता, अनैतिकता, बेईमानी, नीचता को अपने सामने सफल और सार्थक होते देखते हैं। मूल्यों का संकट भी उनके सामने है। सब तरफ मूल्यहीनता उन्हें दिखती है। बाजार से लेकर धर्मस्थल तक। वे किस पर आस्था जमाएँ और किसके पद चिहृं पर चलें? किन मूल्यों को मानें?
यूरोप में दूसरे महायुद्ध के दौरान जो पीढ़ी पैदा हुई उसे लॉस्ट जनरेशन’(खोई हुई पीढ़ी) का कहा जाता है। युद्ध के दौरान अभाव, भुखमरी, शिक्षा, चिकित्सा की ठीक व्यवस्था नहीं। युद्ध में सब बड़े लगे हैं तो बच्चों की परवाह करने वाले नहीं। बच्चों के बाप और बड़े भाई युद्ध में मारे गए। घर का, संपत्ति का, रोजगार का नाश हुआ। जीवन मूल्यों का नाश हुआ। ऐसे में बिना उचित शिक्षा, संस्कार, भोजन, कपड़े के विनाश और मूल्यहीनता के बीच जो पीढ़ी बढ़कर जवान हुई तो खोई हुई पीढ़ी। इसके पास निराशा, अंधकार, असुरक्षा, अभाव, मूल्यहीनता के सिवा कुछ नहीं था। विश्वास टूट गए थे। यह पीढ़ी निराश, विध्वंसवादी, अराजक, उपद्रवी, नकारवादी हुई। अंग्रेज लेखक जार्ज ओसबर्न ने इस क्रुद्ध पीढ़ी पर नाटक लिखा था जो बहुत पढ़ा गया और उस पर फिल्म भी बनी। नाटक का नाम है- ‘लुक बैक इन एंगर’। मगर यह सिलसिला यूरोप के फिर से व्यवस्थित और सम्पन्न हो जाने पर भी चलता रहा। कुछ युवक समाज के ‘ड्राप आउट’ हुए। ‘बीट जनरेशन’ पैदा हुई। औद्योगीकरण के बाद यूरोप में काफी प्रतिशत बेकारी है। ब्रिटेन में अठारह प्रतिशत बेकारी है। अमरीका ने युद्ध नहीं भोगा। मगर व्यवस्था से असंतोष वहां भी पैदा हुआ। अमरीका में भी लगभग बीस प्रतिशत बेकारी है। वहाँ एक ओर बेकारी से पीड़ित युवक हैं तो दूसरी ओर अतिशय सम्पन्नता से पीड़ित युवक भी। जैसे यूरोप में वैसे ही अमेरिकी युवकों, युवतियों का असंतोष, विद्रोह, नशेबाजी, यौन स्वछंदता और विध्वंसवादिता में प्रकट हुआ। जहां तक नशीली वस्तुओं के सेवन का सवाल है, यह पश्चिम में तो है ही, भारत में भी खूब है। दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यवेक्षण के अनुसार दो साल पहले (1989 में) सत्तावन फीसदी छात्र और पैंतीस फीसदी छात्राएं नशे के आदी पाए गए। दिल्ली तो महानगर है। छोटे शहरों में, कस्बों में नशे आ गए हैं। किसी-किसी पान की दुकान में नशा हर कहीं मिल जाता है। ‘स्मैक’ और ‘पाट’ टाफी की तरह उपलब्ध हैं।
छात्रों-युवकों को क्रांति की, सामाजिक परिवर्तन की शक्ति मानते हैं। सही मानते हैं। अगर छात्रों-युवकों में विचार हो, दिशा हो, संगठन हो और सकारात्मक उत्साह हो, वे अपने से ऊपर की पीढ़ी की बुराइयों को समझें तो उन्हीं बुराइयों के उत्तराधिकारी न बनें, उनमें अपनी ओर से दूसरी बुराइयां मिलाकर पतन की परंपरा को आगे नहीं बढ़ाएं। सिर्फ आक्रोश तो आत्मक्षय करता है।
एक हर्बर्ट मार्क्यूस चिंतक हुए हैं, जो सदी के छठे दशक में बहुत लोकप्रिय हो गए थे। वे ‘स्टूडेंट पावर’ में बहुत विश्वास करते थे। मानते थे कि छात्र क्रांति कर सकते हैं। वैसे सही बात यह है कि अकेले छात्र क्रांति नहीं कर सकते। उन्हें समाज के दूसरे वर्गों को शिक्षित करके चेतनाशील बनाकर संघर्ष में साथ लेना होगा। लक्ष्य निर्धारित करना होगा। आखिर क्या बदलना है यह तो तय हो। अमेरिका में हर्बर्ट मार्क्यूस से प्रेरणा पाकर छात्रों ने नाटक ही किए। हो ची मिन्ह और चे गुवेरा के बड़े-बड़े चित्र लेकर जुलूस निकालना और भद्दी, भौंड़ी, अश्लील हरकतें करना। अमेरिकी विश्वविद्यालयों की पत्रिकाओं में बेहद फूहड़ अश्लील चित्र और लेख कहानी। फ्रांस के छात्र अधिक गंभीर शिक्षित थे। राष्ट्रपति द गाल के समय छात्रों ने सोरोबोन विश्वविद्यालय में आंदोलन किया। लेखक ज्यां पाल सात्र ने उनका समर्थन किया। उनका नेता कोहने बेंडी प्रबुद्ध और गंभीर युवक था। उनके लिए राजनैतिक क्रांति करना तो संभव नहीं था। फ्रांस के श्रमिक संगठनों ने उनका साथ नहीं दिया। पर उनकी मांगें ठोस थीं जैसे शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन। अपने यहां जैसी नकल करने की छूट की क्रांतिकारी मांग उनकी नहीं थी। पाकिस्तान में भी एक छात्र नेता तारिक अली ने क्रांति की धूम मचाई। फिर वह लंदन चला गया।
युवकों का यह तर्क सही नहीं है कि जब सब पतित हैं तो हम क्यों नहीं हों। सब दलदल में फंसे हैं तो जो लोग नए हैं, उन्हें उन लोगों को वहां से निकालना चाहिए। यह नहीं कि वे भी उसी दलदल में फंस जाएं। दुनिया में जो क्रांतियां हुई हैं, सामाजिक परिवर्तन हुए हैं, उनमें युवकों की बड़ी भूमिका रही है। मगर जो पीढ़ी ऊपर की पीढ़ी की पतनशीलता अपना ले, क्योंकि वह सुविधा की है और उसमें सुख है, वह पीढ़ी कोई परिवर्तन नहीं कर सकती। ऐसे युवक हैं, जो क्रांतिकारिता का नाटक बहुत करते हैं, पर दहेज भरपूर लेते हैं। कारण बताते हैं- मैं तो दहेज को ठोकर मारता हूं, पर पिताजी के सामने झुकना पड़ा। यदि युवकों के पास दिशा हो, विचारधारा हो, संकल्पशीलता हो, संगठित संघर्ष हो तो वे परिवर्तन ला सकते हैं। पर मैं देख रहा हूं एक नई पीढ़ी अपने से ऊपर की पीढ़ी से अधिक जड़ और दकियानूस हो गई है। यह शायद हताशा से उत्पन्न भाग्यवाद के कारण हुआ है। अपने पिता से अधिक तत्ववादी, बुनियादपरस्त (फंडामेंटलिस्ट) लड़का है। दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी बेकार युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है। इसका उपयोग खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं। इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया। यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है जो उन्माद और तनाव पैदा कर दें। फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं। यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है। हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है। आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है।

-हरिशंकर परसाई

सांस्थानिक हत्या की सनातन परम्परा :शंबूक से लेकर डॉ.पायल तक

मुम्बई के नायर हॉस्पिटल में डॉ. पायल तडावी की आत्महत्या को सांस्थानिक हत्या बताते हुए उच्च शिक्षा में जाति-घृणा को ऐतिहासिक संदर्भों में देख रही हैं प्रोफेसर हेमलता महिश्वर :
मैंने कहीं पढ़ा कि “व्हाटसऐप ग्रुप में उसकी जाति को लेकर मजाक उड़ाया जाने लगा, उसकी लैब में उसे काम करने से रोका जाने लगा, उसकी योग्यता पर सवाल किया जाने लगा, उसके इलाज से मरीजो के अशुद्ध हो जाने की बात की जाने लगी, उसके आदिवासी होने ने उसे जंगली की श्रेणी में रख दिया, खाने की टेबल पर उसे इन तीनों सवर्ण इलीट महिलाओं ने गॉशिप पॉइंट बना दिया।”
डॉ पायल तडावी, वी.वाई.एल. नायर हॉस्पिटल से संबद्ध टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज, मुंबई में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही थीं। गॉयनेकोलॉजी विभाग में काम करना मतलब 48-72 घंटे लगातार काम करना। इन मेडिकोज को कंघी-चोटी की फुरसत नहीं मिलती तो किसी और बात की तो सोचना ही क्या? मेरे घर से एक बच्ची गॉयनी में पीजी कर रही है। एक बार एक ही रात में बीस सीजर और अट्ठारह नॉर्मल डिलवरी करवाई। ऐसा इन लोगों के साथ अक्सर होता है। इन मेडिकोज के लिए कोई मानवाधिकार की आवाज तो उठाए। ऐसी सघन व्यस्तता में सीनियर्स जाति का ध्यान रखे हुए हैं तो सोचिए कि कितनी बजबजाती हुई मानसिकता है जबकि वे मेडिकल कॉलेज के विद्यार्थी हैं, गॉयनी विभाग के विद्यार्थी हैं। बच्चे के पैदा होने के कारण की समूल जानकारी रखते हैं और फिर भी जाति व्यवस्था पर यकीन करते हैं। कैसा विरोधाभास है यह? यह इलीट वर्ग धर्म की जकडबंदी से खुद को मुक्त नहीं कर पाया। अस्पृश्यता तो अब तक अंत्यजों के साथ होती रही, आदिवासी को भी लपेट लिया गया, यह नया है। यह इलीट वर्ग की बौद्धिक चेतना का चमत्कार है कि वे आदिवासियों के साथ भी छुआछूत बरत सकते हैं। अस्पृश्यता का विस्तार करते जा रहे हैं। मरीज को तो इलाज से मतलब होता है, उसे चिकित्सक की जाति से क्या लेना-देना? पर ये असुरक्षित भावना से घिरे दयनीय इलीट वर्ग के लोग अपने व्यवसाय की अनिवार्य मानवता से जैसे अंजान हैं।
जब कभी भी आरक्षण को लेकर विरोध उठा है, एम्स के डॉक्टर्स ने सड़कों पर झाडू लगाई है। क्या संदेश देना चाहते हैं वे? वंचित समुदाय के लोग शिक्षा प्राप्त करेंगे तो इनके हाथों में झाड़ू ही क्यों आएगी? सड़कों पर झाड़ू लगाने का एकमात्र ठेका क्या सिर्फ वंचित समुदाय का है? काम को लेकर इतना अपमान-बोध इनके भीतर क्यों है? ये तो भाग्यवादी हैं, इनके भाग्य से भला कौन क्या छीन लेगा? ये लोग डरते हैं कि कहीं अध्ययन के पश्चात् यह वंचित वर्ग हमें ही प्रतियोगिता में न ले आए। इसलिए धूर्ततापूर्वक इन लोगों ने वंचितों से शिक्षा का अधिकार ही छीन लिया। 
क्या राम कथा का शंबूक वध यह याद नहीं दिलाता हैं? जैसे ही कोई शूद्र तपस्या करेगा, वैसे ही ब्राह्मण का बेटा मरेगा। क्या है इस दृष्टांत में? ब्राह्मण स्वंय को सदा-सदा के लिए प्रतियोगिता से परे रखना चाहता है। अध्ययन-अध्यापन को सिर्फ अपने साथ ही सुरक्षित रखने का मतलब है, किसी और को इलीट कस्मि का धोखा देते रहना। शबरी पूरी श्रद्धा के साथ, अंध-श्रद्धा के साथ जूठे बेर भी खिलाए तो मंजूर है क्योंकि 
अंध-श्रद्धा सत्ता के लिए चुनौती कभी नहीं बनती। पर शंबूक का तपस्या करना मतलब ज्ञान प्राप्त करते हुए योग्यता अर्जित करना तो सत्ता के लिए चुनौती होगा ही न! एक सेवक यदि ज्ञान प्राप्त कर लेगा तो वह सदियों से थोपे जा रहे शास्त्रों को सवाल के घेरे में ले आएगा। इसलिए इनकी भाषा में शंबूक का वध होता है, हत्या नहीं, गांधी-वध होता है, हत्या नहीं। शंबूक केवल सेवा के लिए है, ज्ञान प्राप्तकर सवाल करने के लिए नहीं। इसलिए क्षत्रीय राम ब्राहमण नामक नीति निदेशक की रक्षा के लिए शंबूक वध करते हैं। ब्राह्मण सत्ता को नियंत्रित करता है और क्षत्रीय उसके निर्देशन में सत्ता को संभालता है। यह सदियों से चला आ रहा है और आज औद्योगिक समाज भी इसे तोड़ नहीं पा रहा है।
भारत में जिस तरह का विरोध अंग्रेजों का हुआ, मुगल या अन्य बाहर से आए हुए शासक का नहीं हुआ, क्यों? मुगलों ने हिंदू व्यवस्था पर चोट नहीं की थी। अंग्रेजों ने हिंदू व्यवस्था को चरमरा दिया था। स्त्री शिक्षा, दलित वर्ग की शिक्षा ने हिंदू धर्म शास्त्रों की धज्जियाँ उड़ा दी। सती-प्रथा पर कानूनी रोक लग गई, लड़कियों के लिए पाठशालाएँ आरंभ हुईं, ज्योतिबा फुले का सामाजिक संघर्ष अंग्रेजी शिक्षा की बदौलत परवान चढ़ा। डॉ अम्बेडकर ने हिंदू धर्म की पहेलियों को समझने का प्रयास करते हुए उसका त्याग किया। यहीं से शक्ति प्राप्त करते हुए स्वतंत्र भारत के वंचित समुदाय ने नागरिक होने की हैसियत प्राप्त करते हुए अपने सतत हो रहे अपमान के बदले सम्मान प्राप्त करने के लिए संघर्ष करना आरंभ किया। अभी तो प्रथम वर्ग में पहली दूसरी पीढ़ी ने कदम रखा ही है कि ये सदियों से सम्मान पर कुंडली मारे बैठे लोग इस संघर्ष को धूल धूसरित करने में लग गए हैं।
डॉ पायल रोहित वेमुला की तरह ही सांस्थानिक हत्या का शिकार हुई हैं। हम सब यह जानते हैं कि मेडिकल कॉलेज की पढ़ाई कितनी कठिन है? फिर मेडिकल पीजी की प्रवेश परीक्षा कठिनतम है। ऐसे में मुंबई जैसे महानगर के मेडिकल कॉलेज में पढने का मतलब है विद्यार्थी बहुत मेहनती रहा है। डॉ पायल तडावी तो आदिवासी बताई जाती हैं। वहॉं से तो तथाकथित सभ्य समाज तक की यात्रा और भी कठिन, दुरुह रही होगी। मेडिकल कॉलेज में सामान्य कॉलेज की तरह आपके पास अपनी जाति को छुपाने का कोई रास्ता नहीं होता। यहाँ जातियां जग जाहिर होती हैं और इलीट वर्ग के हाथों में जैसे हथियार आ जाता है। इनकी जुबान फोरसिप (एक तरह का चाकू जिससे मांसपेशी की पतली से पतली परत काटी जा सकती है) की तरह हो जाती हैं। मन को बहुत महीनता के साथ परत-दर-परत छीलने लगती हैं। लहू-लुहान होता हुआ मन पीड़ित के चेहरे पर जैसे-जैसे दिखाई देता है, वैसे-वैसे इनका प्रहार बढ़ता चला जाता है। अंत में इनकी फोरसिपी जबान पीड़ित की हत्या कर देती है और ये पीड़क उसे आत्म हत्या का नाम देते हैं। डॉ पायल तडावी भविष्य में क्या कुछ नहीं कर सकती थी, सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं।
रोहित वेमुला तो आम्बेडकरी चेतना से लैस था फिर भी सांस्थिनक हत्या का शिकार हुआ। यह जानने के बावजूद मैं समस्त समाज से अपील करना चाहती हूँ कि वे अपने बच्चों को डॉ आम्बेडकर, ज्योतिबा फुले की जीवनी और विचार से अनिवार्यत परिचित करवाएँ। यही अपील मैं वंचित वर्ग के अध्यापकों से भी करती हूँ कि वे अपने प्रत्येक विद्यार्थी, चाहे वे दलित हों या गैर दलित, आदिवासी, स्त्री, पुरुष सबको इनके कामों से परिचित करवाएँ और सभ्य समाज बनाने की दिशा में अपना अमूल्य योगदान दें ताकि हेमा आहूजा, भक्ति महर और अंकिता खंडेलवाल जैसी सिनिक सीनियर्स पैदा ही न हों।
सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि समाज में ऐसी नफरतों को रोकने के लिए ऐसे जातिवादियों को कड़ी से कड़ी सजा दे ताकि कोई और रोहित वेमुला, डॉ पायल तड़वी सांस्थानिक हत्या का शिकार न हो।

-हेमलता महिश्वर

कर्ज माफी

कर्ज माफी किसानों को राहत तो देती है, लेकिन ये उनकी समस्याओं का हल नहीं है। आप दसियों लाख किसानों को दिए चालीस हजार करोड़ कर्ज की चिंता करते हैं जबकि अकेले अडानी को अरबों डॉलर का कर्ज दे देते हैं। 2008 में यूपीए सरकार ने कर्ज माफी का ऐलान किया था लेकिन इसके फायदे ज्यादातर किसानों तक नहीं पहुंच पाए। ज्यादातर किसानों ने निजी कर्ज लिया है. ऐसे में कर्ज माफी का फायदा वे नहीं उठा पाते हैं। देश में पहली कर्जमाफी चौधरी देवीलाल के समय 1980 के दशक में की गई थी। उसके बाद यूपीए ने 2008 में किसानों का कर्ज माफ किया।
लेकिन यही सरकारें हर साल लाखों-करोड़ का कॉर्पोरेट कर्ज माफ करती हैं. 2006-2007 के बजट के बाद से बजट में राजस्व माफ का भी ब्यौरा होता है. 2015 में सरकार ने 78 हजार करोड़ का कॉर्पोरेट टैक्स माफ किया। सरकार के पास विजय माल्या को नौ हजार करोड़ देने का पैसा है। यानी सरकार के पास पैसा है, लेकिन सवाल यह है कि वह मिल किसे रहा है।

सरकार किसानों की हालत में कैसे सुधार करेगी?

       नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल की पहली कैबिनेट मीटिंग में यह फैसला किया है कि किसान सम्मान निधि योजना के तहत अब सभी किसानों को सालाना 6,000 रुपये मिलेंगे। साथ ही किसानों के लिए पेंशन योजना का ऐलान भी किया गया है।
बीजेपी ने अपने चुनाव संकल्प पत्र में इस योजना में सभी किसानों को शामिल करने का वादा किया था, जिस पर पहली ही कैबिनेट मीटिंग में मुहर लगाई गई, लेकिन क्या इससे किसानों की मौजूदा स्थिति में सुधार हो जाएगा? कृषि संकट का समाधान, किसानों की पैदावार और उनके आर्थिक हालात को बेहतर बनाना मोदी सरकार की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है।
अपने दूसरे कार्यकाल में उसे इस पर बहुत गंभीरता के साथ ध्यान देना होगा। विशेषज्ञों की राय है कि कृषि संकट इतना विकराल रूप धारण कर चुका है कि उसमें सुधार के लिए सरकार को तुरंत उपाय सोचने होंगे। कृषि मामलों के विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं, नीति आयोग ने भी माना है कि पिछले दो साल यानी 2017-18 में किसानों की आय में वास्तविक बढ़ोतरी लगभग शून्य हुई है. उसके पिछले पाँच सालों में देखें तो नीति आयोग का मानना है कि उस दौरान किसानों की आय में हर साल आधा प्रतिशत से भी कम बढ़ोतरी हुई है। यानी सात सालों से किसानों की आय में वृद्धि न के बराबर हुई है। तो इसका मतलब खेती का संकट बहुत गहरा है।

जल संकट सबसे बड़ी समस्या

कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि देश में किसानों की स्थिति सुधारने के लिए सबसे बड़ी जरूरत है कि इंफ्रास्ट्रक्चर में खर्च किया जाना चाहिए। पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन कहते हैं कि नए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के सामने सबसे बड़ी चुनौती होगी कि पानी की समस्या का समाधान कैसे किया जाए।
हुसैन कहते हैं, पानी की कमी पर ध्यान देने की जरूरत है। सरकार को चाहिए कि वे लॉन्ग टर्म योजनाएँ बनाए। पानी बचाने, उसके बेहतर उपयोग करने और साथ ही इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश करना जरूरी है। किसानों के पास पानी कितना पहुँचा है इसका डेटा रिलीज किया जाना चाहिए। इससे ज्यादा लोग रिसर्च कर सकेंगे और इससे सरकार की नीतियां बेहतर हो सकेंगी। सिंचाई के अलावा कृषि सुधारों की दिशा में वर्ष 1995 में लागू किए गए आवश्यक वस्तु अधिनियम में आमूल संशोधन की जरूरत है. बाजार में कोल्ड स्टोरेज में निवेश की जरूरत है।
वे कहते हैं, यदि मुझसे यह पूछा जाये कि सबसे बड़े तीन सुधार कौन से होने चाहिए तो मैं कहूँगा पानी-पानी और पानी। पानी की समस्या कितनी विकराल रूप ले रही है इस पर छत्तीसगढ़ में किसानी कर रहे आशुतोष कहते हैं, जल संकट सबसे बड़ी समस्या है। फसल को पानी चाहिए लेकिन इसकी उपलब्धता मॉनसून पर निर्भर है। बीज कब बोएँं इसकी निर्भरता मानसून पर है। तमाम दावों के बावजूद अभी तक सिंचाई की वैसी व्यवस्था नहीं हो सकी है जैसा कि एक किसान को चाहिए। फसल को जिस दिन पानी की जरूरत है वह उस दिन उसे उपलब्ध नहीं हो पाती। जमीन में पानी का स्तर (वाटर लेवल) बहुत नीचे जा रहा है. समुचित पानी नहीं मिल पाने से किसान की पैदावार पर और उसकी कमाई पर इसका असर दिखता है।

नहीं मिलती फसल की सही कीमत

ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट की रिपोर्ट के मुताबिक 2000-2017 के बीच में किसानों को 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ क्योंकि उन्हें उनकी फसलों का समुचित मूल्य नहीं मिला।
छत्तीसगढ़ में किसानी कर रहे आशुतोष कहते हैं, एक किसान के रूप में अच्छे बाजार की जरूरत होती है। किसान को उसकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाता। 
देवेंद्र शर्मा कहते हैं, ये किसान इतने दशकों से कैसे गुजारा करते होंगे, क्या हम इसे समझ सकते हैं।
वे कहते हैं कि कई दशकों से वर्ल्ड बैंक, आईएमएफ और अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की आर्थिक सोच के मुताबिक हम अपनी आर्थिक नीतियाँ बनाते रहे और उन नीतियों को व्यावहारिक बनाने के लिए कृषि को हाशिये पर रखा जा रहा था।
उनका कहना है, आर्थिक सुधार तभी व्यावहारिक बने रहेंगे जब हम किसानों को उनका हक न दें। उसके दो कारण हैं-महँगाई को नियंत्रण में रखना और उद्योग को कच्चा माल सस्ते में उपलब्ध कराना। तो इन दो कारणों को पाने के लिए किसानों को जानबूझ कर गरीब रखा गया. कहीं भी हमारे देश में यह नहीं सोचा गया कि उसके हक के हिसाब से उसकी आय बढ़नी चाहिए। किसान कर्ज लेता है और उसके बोझ तले दब जाता है, आत्महत्या के लिए मजबूर होता है। इस आर्थिक डिजाइन को तोड़ना पड़ेगा।
ग्रामीण सड़क योजना के तहत हो रहे सड़क निर्माण में बरती जा रही कथित अनियमितता की शिकायतें की जा रही हैं।

इंफ्रास्ट्रक्चर गांव से पलायन रोकने में कारगर

इकोनॉमिक स्टेटस की बात करें तो ऑक्सफैम की रिपोर्ट कहती है कि 73 फीसदी दौलत देश के 1 फीसदी लोगों के पास है। यानी स्थिति यह है कि अमीर और अमीर जबकि गरीब और गरीब होता जा रहा है।
वहीं 2016 के आर्थिक सर्वे में किसान परिवार की 17 राज्यों में आय 20 हजार रुपये सालाना से कम है यानी 1,700 रुपये मासिक या लगभग 50 रुपये दैनिक. सवाल है कि इस आय में कोई परिवार कैसे पलता होगा?
देवेंद्र शर्मा कहते हैं, आर्थिक डिजाइन की सोच यह कहती है कि किसानों को खेती से बेदखल किया जाये और शहर में लाया जाये क्योंकि शहरों में सस्ते मजदूरों या दिहाड़ी मजदूरों की जरूरत है। यदि इकोनॉमिक डिजाइन यह कहता है कि किसानों को गाँव से निकाला जाए और शहर लाया जाए।
लेकिन सिराज हुसैन उनकी इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं, कृषि पर जरूरत से ज्यादा आबादी निर्भर है लेकिन ज्यादातर किसान खुद खेती नहीं करते हैं। इससे कृषि की लागत बढ़ रही है, तो कृषि के अलावा जिन क्षेत्रों में रोजगार मिल रहा है वे उस ओर जा रहे हैं तो इसमें बुराई नहीं है. लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर ध्यान दें, बिजली, स्वास्थ्य, शिक्षा पर खर्च करें तो पलायन कम होंगे। देश में केरल के राज्य से कम पलायन होता है जबकि यूपी जैसे राज्यों से पलायन आम है।
छत्तीसगढ़ के शिक्षित किसान आशुतोष भी कहते हैं, छोटे किसानों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव भी एक बहुत बड़ी समस्या है। गाँव तक जो सड़क की पहुँच बहुत अच्छी नहीं होती है। जैसे कि अपने खेत से फसल निकालना है और बारिश हो गयी तो आप उस दिन उसे नहीं निकाल सकते।
बेरोजगारी बड़ा संकट
एनएसएसओ की लीक हुई रिपोर्ट को सरकार ने गलत बताया था, लेकिन अब सरकार ने खुद मान लिया है कि जॉब क्रिएशन अपने निम्नतम स्तर पर आ गयी है यानी नई नौकरियां न के बराबर आ रही हैं।
देवेंद्र शर्मा कहते हैं, उस रिपोर्ट के मुताबिक 2011-12 से 2017-18 के बीच में गाँव के तकरीबन सवा तीन करोड़ अनियमित मजदूर अपनी नौकरियाँ खो चुके थे और इनमें से तीन करोड़ खेतिहर मजदूर थे। यानी खेतिहर मजदूरों में 40 फीसदी गिरावट आयी है। कुछ आर्थिक विशेषज्ञों ने शोध किया और देखा कि 2011-12 से 2015-16 के बीच में उत्पादन के सेक्टर में भी नौकरियों में कमी आयी है। वहाँ इस दौरान नौकरियों में करीब एक करोड़ की कमी आयी है।
रोजगार के अवसर पैदा हों, इसकी जरूरत है। अर्थव्यवस्था में वृद्धि होगी तो माँग बढ़ेगी, माँग होगी तो क्षमताओं का उपयोग होगा और उद्योग का लाभ बढ़ेगा। इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना आसान नहीं होता।
वहीं देवेंद्र शर्मा कहते हैं, खेती में पैसा नहीं है, उसके मजदूरों के पास काम नहीं है। चुनाव के नतीजे आने के बाद से देश में एक माहौल सा बनाया जा रहा है कि सरकार आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करेगी क्योंकि जीडीपी ग्रोथ 6 प्रतिशत से भी कम पर आ गई है। निवेश बढ़ाये जाने की बात चल रही है। कहा जा रहा है कि जीडीपी ग्रोथ को आगे बढ़ाने से रोजगार बढ़ेगा। निवेश निजी क्षेत्र में आना चाहिए। वही सब जो पूरी दुनिया में विफल रहा है उसकी बात एक बार फिर की जा रही है, जैसे कि देश के सामने कोई विकल्प नहीं है।
भारत में करीब 3 करोड़ किसान गन्ने की खेती करते हैं
सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास कृषि संकट से उबरने के लिए क्या किया जाना चाहिए। इस पर देवेंद्र शर्मा कहते हैं, मेरे विचार से प्रधानमंत्री ने जो कहा है कि सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास ही एक रास्ता है।
वे कहते हैं कि, नोबेल विजेता जोसेफ स्टिग्लिज ने कुछ दिन पहले कहा है कि नियोलिब्रलिज्म पूरी दुनिया में विफल रहा है। न्यूजीलैंड ने आर्थिक वृद्धि को लेकर अपनी राजनैतिक प्राथमिकता को बजट में दरकिनार करते हुए सुखी समाज को वरीयता दी है। न्यूजीलैंड एक विकसित देश है। चीन ने कई साल पहले उनके हाई ग्रोथ रेट को छोड़ देने का संकल्प लिया था। उन्होंने 7 फीसदी के आसपास अपनी ग्रोथ को बनाए रखने की बात कही थी क्योंकि जिस ग्रोथ रेट पर वे जा रहे थे उससे पर्यावरण का इतना नुकसान हुआ कि चीन को उसका खामियाजा दिखना शुरू हो गया था।
वे कहते हैं कि, हम चीन के मॉडल को लेकर चलते हैं, लेकिन चीन की सरकार 2018 में अपने 70 लाख लोगों को गाँव में लेकर गई उनमें से 60 फीसदी लोग वहीं रह गए अब वे ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार को मजबूत बनाने में लगे हैं। हर साल यूनिवर्सिटी के छात्रों को गाँव में लेकर जाने पर करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं। चीन इस बात को समझ रहा है। दुनिया में जो हो रहा है हम उससे 10 साल पीछे चल रहे हैं।
देवेंद्र शर्मा कहते हैं, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आर्थिक लॉबी से निकलना होगा। सबका साथ, सबका विकास कैसे हो यह देखना जरूरी होगा। कृषि में निवेश चाहिए, लेकिन किसानों के पास बाजार नहीं है। किसान अपने उत्पाद लेकर जाएँ तो कहाँ। उसे वह सड़कों पर फेंकता है। टमाटर, आलू, प्याज को सड़कों पर फेंकने की घटना हम सब देखते आये हैं। तो निवेश कृषि में क्यों नहीं जाता है?
रिजर्व बैंक का आँकड़ा कहता है कि 2005-06 और 2015-16 के बीच कृषि में निवेश जीडीपी का 0.3 और 0.5 फीसदी के बीच हुआ है। कृषि क्षेत्र में 60 करोड़ लोग खेती से सीधे या परोक्ष रूप से जुड़े हैं। भाजपा के घोषणा-पत्र में अगले पाँच साल में 25 लाख करोड़ निवेश की बात की गई है।
इस पर देवेंद्र शर्मा का कहना है कि सरकार गंभीर हो कर 5 लाख करोड़ रुपये हर साल कृषि क्षेत्र में लगाए। वे कहते हैं, कृषि उपज मंडी समिति (एग्रीकल्चरल प्रोड्यूस मार्केट कमेटी यानी एपीएमसी) के मुताबिक देश में इस वक्त 7,600 मंडिया हैं। जबकि यदि हम हर पांच किलोमीटर के दायरे में एक किसान को मंडी उपलब्ध कराना चाहते हैं तो जरूरत 42 हजार मंडियों की है। यह निवेश मंडियों को बढ़ाने में किया जाना चाहिए। गोदाम बनाएँं ताकि उत्पाद बेकार न हों।

दुनिया में सबसे अधिक चीनी भारत में ही बनती है

कॉरपोरेट सेक्टर में सब्सिडी सबसे अधिक लेकिन माहौल कुछ और...देवेंद्र शर्मा कहते हैं, एक माहौल बनाया गया है कि कृषि क्षेत्र आर्थिक गतिविधि नहीं है। यह पूछा जाता है कि कृषि में लगाने के लिए पैसे कहां से आएँगे। यह कहा जाता है कि कॉरपोरेट जब तक विकास नहीं करेंगे और उनसे टैक्स नहीं मिलेगा तब तक हम कृषि में पैसा कहाँ से लगाएँंगे। आज तक हमारा सबसे अधिक सब्सिडी वाला क्षेत्र कॉरपोरेट सेक्टर रहा है।
वे कहते हैं, 2005 से अब तक उन्हें 50 लाख करोड़ रुपये से अधिक की टैक्स में छूट मिल चुकी है। एक अध्ययन के मुताबिक अगर एलपीजी की सब्सिडी खत्म कर दी जाए तो 48 हजार करोड़ रुपये बचते हैं और इससे एक साल की गरीबी मिट सकती है। अगर कॉरपोरेट सेक्टर से इन 50 लाख करोड़ रुपये के टैक्स लिये गए होते तो इस हिसाब से हम 100 साल की गरीबी मिटा सकते थे। पिछले 10 सालों में बैंकों का 7 लाख करोड़ रुपये माफ किया गया तो किसी ने ये सवाल किया कि इससे राजकोषीय घाटा बढ़ जाएगा। यदि इनमें से आधा भी कृषि क्षेत्र में लगाएँ तो विकास की गति बहुत तेजी से आगे बढ़ेगी।

क्या करने की जरूरत है?

देवेंद्र शर्मा कहते हैं, दो चीजें करने की जरूरत है। लोगों को गाँव से निकाल कर शहर में लाना यह विकास का मॉडल नहीं है। हमें उन्हें संपन्न करने की जरूरत है। इससे माँग पैदा होगी। इससे उद्योग या एफएमसीजी उत्पादों की माँग बढ़ती है इससे उद्योग का पहिया स्वतः चल पड़ेगा। सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को उद्योग के लिए बूस्टर डोज बताया जा रहा है लेकिन यदि गांव पर ध्यान दिया गया तो वह ग्रोथ का रॉकेट डोज होगा क्योंकि उससे इतनी माँग बढ़ेगी कि हमारी इकोनॉमी बहुत तेजी से दौड़ेगी। अभी हम 7 फीसदी के आसपास हैं, वैसा करने से हम 14 फीसदी तक भी पहुंच सकते हैं।
फरवरी में अंतरिम बजट पेश करते हुए रेहड़ी-पटरी वाले, रिक्शा चालक, कूड़ा बीनने वाले, खेती कामगार, बीड़ी बनाने वाले जैसे असगंठित क्षेत्र से जुड़े कामगारों को 60 साल की उम्र के बाद तीन हजार रुपये प्रति महीने की पेंशन देने का ऐलान किया गया था. शपथग्रहण के एक दिन बाद ही शुक्रवार को एक टीवी चौनल को श्रम मंत्री संतोष गंगवार ने बताया कि मोदी सरकार ने असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को तीन हजार रुपये की मासिक पेंशन देने की फाइल पर साइन कर दिए है। 
देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि पीएम-किसान पेंशन योजना को और सुदृढ़ किए जाने की जरूरत है। वे कहते हैं, इंडस्ट्री के लिए ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की बात की जाती है, लेकिन किसानों के लिए ईज ऑफ डूइंग फार्मिंग की बात क्यों नहीं की जाती है। मंडी हो, उत्पादन हो या पीएम फसल योजना में मुआवजा ही लेना हो किसानों को हर कदम पर दिक्कतें आती हैं। किसानों की ये समस्याएं खत्म हो जाएँगी तो इकोनॉमी दौड़ेगी।
यानी कृषि को संकट से उबारने के लिए सरकार को इस क्षेत्र में निवेश, जल संकट, इंफ्रास्ट्रक्चर केम साथ ही शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म कई बड़े फैसले लेने पड़ेंगे। कुल मिलाकर कृषि में सुधार का रास्ता गांव के रास्ते ही जाएगा।
-अभिजीत श्रीवास्तव
-साभार

भाजपा का 2014 में वादा

किसानों के लिए स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करेंगे। लागत मूल्य और इसका 50 फीसदी जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य देंगे। सरकार ने 2015 में कोर्ट में एफिडेविट देकर और आरटीआई के जवाब में कहा कि यह नहीं हो सकता है। सरकार में आने के बाद अब तक छह अलग-अलग बात कह चुकी है पार्टी। साथ ही कहा था कि विदेश से हर भारतीय के लिए 15 लाख रुपए वापस लाएंगे। मुझे कन्फ्यूजन है कि वे क्या बोले- 15 लाख लाएंगे या हर भारतीय का 15 लाख एक्सपोर्ट करेंगे। लोग सरकार से बहुत डरते हैं। मैंने मीडिया को कभी इतना डरा हुआ नहीं देखा। एचएएल के पूर्व डायरेक्टर ने कहा है कि हम रफाल बना सकते हैं। लेकिन निर्मला सीतारमन कह रही हैं कि एचएएल के पास क्षमता नहीं है। तो किसकी क्षमता है, चंद दिन पहले बनी अनिल अंबानी की कंपनी की। हर वादे पर मोदी सरकार रक्षात्मक मुद्रा में है। संघ के पास एंटीनेशनल और कम्युनल के अलावा क्या मुद्दा है? बताया जाएगा कि देश और हिंदू खतरे में है। मंदिर, मोदी की हत्या का षड्यंत्र और सांप्रदायिकता जैसे मुद्दे आगे बढ़ाएँगे।

सरकार पहले पानी की समस्या पर ध्यान दे

      भारत का लगभग आधा हिस्सा पहले से ही सूखे की चपेट में है। वर्ष 2020 तक, 21 भारतीय शहरों में भूजल स्तर शून्य तक पहुँचने की उम्मीद है, जो 100 मिलियन लोगों के लिए पानी की पहुँच को प्रभावित करेगा। भारत का लगभग आधा हिस्सा गर्मियों के दौरान पहले से ही सूखे की चपेट में है और चेन्नई में वर्तमान जल संकट इसका ताजा उदाहरण है। नई सरकार अपने नवीनतम मंत्रालय, “जल शक्ति” में पानी के मुद्दों को सुलझाने की कोशिश कर रही है। यह एक मंत्री के तहत पानी के मुद्दों पर सभी विभागों को लाने का वादा करती है। 
नए मंत्रालय का फोकस भारत की नदियों को जोड़ने के अपने कार्यक्रम को तेज करना और 2024 तक हर भारतीय घर में पानी सुनिश्चित करना है। यह कोई नई अवधारणा नहीं है, कई राज्यों की सरकारों ने बिना ज्यादा सफलता के घरों में पानी पहुँचाने की कोशिश की है। ऐसा इसलिए है क्योंकि लगभग 85 प्रतिशत वर्तमान ग्रामीण जल आपूर्ति योजनाएँ भूजल स्रोतों पर आधारित हैं जो बारहमासी नहीं हैं। राजस्थान में मेरे पड़ोसी गाँव गोपालपुरा में पांच साल बाद भी जनस्वास्थ्य एवं अभियांत्रिकी विभाग द्वारा निर्मित पीने के पानी की टंकी खाली है। यह एक पाइप-लाइन के माध्यम से एक सूखे बोरवेल से जुडी हुई है। 

भूजल स्तर में गिरावट

देश के आधे से अधिक भूजल स्तर में गिरावट है, लाखों लोग अपर्याप्त या खराब जल गुणवत्ता प्राप्त कर रहे हैं। परिणाम स्वरूप, समुदाय पीने के पानी के एकल या दूरस्थ स्रोत पर निर्भर करते हैं, जो अक्सर महिलाओं और लड़कियों के साथ भेदभाव को बढ़ाता है। एक और सर्वव्यापी वास्तविकता, सामान्य जन द्वारा जल-दबाव वाले क्षेत्र में भी पानी की बर्बादी है। घंटों तक, आप बिना नल के सड़कों या सड़कों पर बहती सार्वजनिक पाइप लाइनों को देख सकते हैं। नए मंत्रालय को भारत के लिए वास्तव में जल सुरक्षा प्रदान करने के लिए सोचने की आवश्यकता है। इसे पानी के निकायों को पुनर्स्थापित करना होगा और इसके भूजल को रिचार्ज करना होगा। केवल जब हमारी पीने के पानी की आपूर्ति बारहमासी सतह के जल स्रोतों पर आधारित होती है, तो हमारे पीने के पानी की सुरक्षा हासिल की जा सकती है।
मैं राजस्थान में एक हजार से अधिक किसानों के साथ काम करता हूँ जिन्होंने पिछले चार वर्षों में स्प्रिंकलर तकनीकों को प्रभावी ढंग से लागू किया है। प्राप्त निष्कर्षों में प्रति एकड़ सिंचाई के लिए पानी की खपत में 40 प्रतिशत की कमी, सिंचाई के दौरान पानी की कमी में 30 प्रतिशत की कमी है। जिससे पानी की पम्पिंग के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, प्रति एकड़ सिंचाई के लिए आवश्यक मानव श्रम समय में 80 प्रतिशत की कमी होती है। 
ग्रामीण भारत में अभी भी मिट्टी और जल संरक्षण की अपार संभावनाएँ हैं। सरकार को सीएसओ और सीएसआर को किसान और घरेलू स्तर पर वर्षा जल के प्रबंधन में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए पंचायत या जिला अधिकारियों को सामुदायिक स्तर पर जल संसाधनों को बहाल करना चाहिए। वर्तमान में, जल-समृद्ध जिलों या राज्यों से जल परिवहन को जल-संकट समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। मेरा मानना है कि यह एक अल्पकालिक आपातकालीन समाधान है, लेकिन एक स्थायी समाधान नहीं है। एक दशक से 150 किलोमीटर दूर जयपुर शहर ने टोंक के बीसलपुर से पानी आयात किया।  
हालाँकि, अब बीसलपुर बांध अपने आप भर नहीं रहा है और स्थानीय सरकार द्वारा ब्राह्मणी और चंबल नदियों से पानी लाने की योजना बनाई जा रही है। कौन जानता है, इन नदियों को भी कितने दिनों के बाद कहीं और से पानी की आवश्यकता होगी। यह एक अंतहीन खेल है जो निश्चित रूप से दाता जिले, राज्य या बेसिन और प्राप्तकर्ताओं के बीच विवादों में परिणाम देगा। इस आयातित पानी का दुरुपयोग सबसे गंभीर अपराधों में से एक है। शहरों में उपयोगकर्ता आमतौर पर इस पानी के मूल्य को नहीं जानते हैं और इसे कार धोने, सड़क की सफाई आदि में उपयोग करते हैं जो कई किसानों के खेतों को पानी दे सकते हैं।
सरकार को मांग-प्रबंध पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए यह तीन रणनीतियों द्वारा संभव है। पहला नियंत्रित-आपूर्ति, दूसरा माँग-नियंत्रण और तीसरा दीर्घकालिक जागरूकता होना चाहिए पहले चरण में, सरकार को 24/7 की आपूर्ति के बजाए समय पर, रिसाव-प्रूफ और सुरक्षित-पानी की आपूर्ति सुनिश्चित करनी चाहिए। दूसरा, सरकार को किसानों के लिए घरेलू स्तर या ड्रिप/स्प्रिंकलर जैसे कुशल पानी के उपयोग वाले उत्पादों और सेंसर-टैप एक्सेसरीज, ऑटोमैटिक मोटर कंट्रोलर आदि पर सब्सिडी देकर उपभोक्ताओं को प्रोत्साहित करना और उनकी सहायता करना चाहिए वर्तमान में सार्वजनिक-सब्सिडी प्रणाली अक्षम हैं, भारी कागजी कार्रवाई और एक लंबी प्रक्रिया की आवश्यकता होती है जो किसानों को नई सिंचाई तकनीकों को अपनाने से हतोत्साहित करती है। देश की खाद्य सुरक्षा को प्रभावित किए बिना सिंचाई स्तर पर पानी के उपयोग को नियंत्रित करना, सबसे महत्वपूर्ण विचार है क्योंकि यह 85 प्रतिशत भूजल का उपभोग करता है।
जल संरक्षण के कुछ सुझाव
मैं राजस्थान में एक हजार से अधिक किसानों के साथ काम करता हूँ जिन्होंने पिछले चार वर्षों में स्प्रिंकलर तकनीकों को प्रभावी ढंग से लागू किया है। प्राप्त निष्कर्षों में प्रति एकड़ सिंचाई के लिए पानी की खपत में 40 प्रतिशत की कमी, सिंचाई के दौरान पानी की कमी में 30 प्रतिशत की कमी है। जिससे पानी की पंपिंग के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, प्रति एकड़ सिंचाई के लिए आवश्यक मानव श्रम समय में 80 प्रतिशत की कमी होती है। जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से निराई-गुड़ाई में कमी आती है और मिट्टी की लवणता, कम कीट और बीमारी के छापे और कम खरपतवार की प्रतिस्पर्धा कम होने से फसल की पैदावार और गुणवत्ता में 20 फीसदी की वृद्धि हुई है।
तीसरा, राष्ट्रीय स्तर पर जल-साक्षरता प्राथमिक ध्यान होना चाहिए जो अब तक गंभीरता से नहीं किया गया है। यह समय है कि पानी की बचत, संरक्षण पर कक्षाओं में विशेष मॉड्यूल पेश किए जाएँ। सरकार की जल संबंधी योजनाओं को अपने माता-पिता को सूचित करने और प्रभावित करने के लिए उच्च-माध्यमिक और कॉलेज स्तर के युवाओं को जागरूक  होना चाहिए वार्षिक या मासिक कार्यक्रम के बजाए, कुशल जल साक्षरता हमारी शिक्षा प्रणाली का घटक होना चाहिए। राष्ट्रीय स्तर पर जल साक्षरता में, जल सरंक्षण में लगे जमीनी कार्यकर्ताओं के अनुभव से सिर्फ सीखा ही नहीं जा सकता, बल्कि उनका साथ लेकर इसे महा-अभियान बनाया जा सकता है। ये सब मानसून की पहली बूंद के साथ बंद नहीं होना चाहिए।
भारत सरकार को सभी स्थानीय अधिकारियों को अपने अधिकार क्षेत्र के तहत जल निकायों के नक्शे छह महीने के भीतर प्रकाशित करने के लिए आदेश देना चाहिए। राजस्व विभाग द्वारा इन दस्तावेजों को सीमांकित, 
अधिसूचित और राजपत्रित किया जाना चाहिए। इन जल निकायों, झीलों, नालों, नदियों, नालों आदि के लिए ‘भूमि उपयोग में कोई परिवर्तन नहीं’ का प्रावधान होना चाहिए सरकार को भूजल के निष्कर्षण और पुनर्भरण के लिए नियमों के साथ जलमार्ग और जल निकायों के उपयोग को भी सीमित करना चाहिए। इसमें सभी निषिद्ध परिचालनों की सूची होनी चाहिए, जैसे अवैज्ञानिक रेत खनन, ड्रेजिंग और अलंकरण, आदि जो एक जल निकाय को खतरे में डाल सकते हैं, उन्हें उपयुक्त भारतीय दंड संहिता के तहत अधिकतम दण्ड के साथ लगाए गए अपराधों के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
रेत के कारण नदियों की हत्या हो रही है। सरकार को एक निर्माण सामग्री के रूप में रेत के विकल्प की पहचान करनी चाहिए यदि वास्तविक रूप से संभव हो तो रेत का आयात एक अल्पकालिक समाधान हो सकता है। आखिरकार हम नहीं चाहते कि हमारी नदियां तस्वीरों में हमारे घर की दीवारों पर लटकी हों। नई सरकार को प्रकृति आधारित समाधानों, पारिस्थितिक बहाली का कार्यक्रम शुरू करना होगा। जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए लचीलापन बनाने और आजीविका उत्पन्न करने के लिए नए जल शक्ति मंत्रालय का मूल दर्शन, नदियों का पुनर्जीवन, संरक्षण, नदी पर प्रदूषण भार को रोकने और जलीय पुनर्भरण और निर्वहन के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए।

-मौलिक सिसोदिया
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