बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

किसका विकास ?



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर अपनी आमसभाओं आदि में कहते हैं कि वे सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उनके कहने का अर्थ शायद यह होता है कि वे सभी भारतीयों के विकास के लिए काम करेंगे,चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या नस्ल के हों, चाहे उनकी संस्कृति कोई भी हो व वे देश के किसी भी इलाके में रहते हों। यह सोच सराहनीय है और इस दिशा में प्रयास करने वाले नेता को हम सभी का पूरा समर्थन मिलना चाहिए।
परंतु यदि हम थोड़ी गहराई से सोचें तो दो प्रश्न हमारे मन में उभरेंगे। पहला यह कि क्या हमारे देश के पास इतने संसाधन हैं कि हम सभी 125 करोड़ भारतीयों का विकास सुनिश्चित कर सकें?तथ्य यह है कि हमारे संसाधन अत्यंत सीमित हैं और चाहे हम कितने ही आकर्षक नारे क्यों न लगायें, ऐसा विकास असंभव है जिसका लाभ सभी भारतीयों तक पहुंचे। विकास पर परस्पर विरोधाभासी दावे होना अवश्यंभावी है। जो लोग संगठित हैं और जिनके पास सरकारी तंत्र को प्रभावित करने की ताकत और नौकरशाही तक पहुंच है, वे विकास के फल उन लोगों तक नहीं पहुंचने देंगे जो अपनी आवाज उठाने में सक्षम नहीं हैं। इसलिये सभी का विकास या तो केवल एक पवित्र इरादे की घोषणा है या सहज विश्वासियों को बेवकूफ बनाने का हथियार।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हमारे देश में व्याप्त असमानताओं के परिप्रेक्ष्य में, यदि हम सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास की बात करते हैं तो क्या यह न्यायपूर्ण है?दुनिया के 100, बल्कि 50,सबसे रईस व्यक्तियों में भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है परंतु यह भी सच है कि 20 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन से कम की आमदनी पर जीवनयापन करने वाले भारतीयों की संख्या 83.6 करोड़ है। लगभग 20 करोड़ भारतीय,हर रात भूखे सोते हैंए लगभग 21.2 करोड़ कुपोषित हैं और हर वर्ष लगभग 7,000 भारतीय भूख से मर जाते हैं। अगर हम इनमें उन लोगों को जोड़ लें जो कुपोषण.जनित बीमारियों से मरते हैं तो यह संख्या करीब 1 करोड़ हो जायेगी।
सबसे रईस 50 या 100 लोगों के क्लब में भारतीयों की संख्या के बढ़ने से कुछ भारतीय, विशेषकर शहरी मध्यम वर्गए स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। वे भारत में बढ़ती असमानता की ओर देखना ही नहीं चाहते। वे इस तथ्य की ओर शुतुरमुर्गी रवैया अपनाये रहते हैं कि भारतए मानव विकास सूचकांकों की दृष्टि से, दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी पीछे है। शिक्षाए स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचए शिशु व बाल मृत्यु दर आदि की दृष्टि से हम बहुत पिछड़े हुये हैं। शुतुरमुर्गी मुद्रा में रेत में सिर गड़ाये हुये शहरी मध्यमवर्ग के भारतीय, ऐसा कुछ भी देखना.समझना नहीं चाहते जो गौरव के उनके भाव को चोट पहुंचाए। जब प्रधानमंत्री मोदी सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास की बात करते हैं तब तकनीकी रूप से वे गरीबों के विकास की बात भी करते हैं। परंतु चूंकि संसाधन सीमित हैं इसलिये प्रश्न यह उठता है कि सभी भारतीयों का विकास करने की उनकी रणनीति क्या है ?सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं? करदाताओं के पैसे का सरकार किस तरह इस्तेमाल करना चाहती है ?
एक रणनीति तो यह हो सकती है कि देश के पिछड़े इलाकों में आधारभूत संरचना का निर्माण किया जाये। इसके लिये संबंधित क्षेत्र के सभी जातियों व समुदायों के लोगों के श्रम का इस्तेमाल हो। ऐसा करने से वहां के निवासियों को विकास का लाभ तो मिलेगा हीए उन्हें रोजगार भी उपलब्ध हो सकेगा। इससे उन लोगों को नये अवसर मिलेंगेए जिन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। इससे भूखों और कुपोषितों के हाथों में कुछ पैसा आयेगा। इस आमदनी से वे जो सामान खरीदेंगे उससे उद्योगों को अपरोक्ष रूप से लाभ होगा। परंतु जब प्रधानमंत्री सब के विकास की बात करते हैं तब उनके दिमाग में स्पष्टतः यह रणनीति नहीं होती।
दूसरी रणनीति यह हो सकती है कि करदाताओं के पैसे और देश के संसाधनों ;जमीनए पानीए जंगल, खनिज व अन्य प्राकृतिक संसाधनद्ध का इस्तेमाल कर भारी.भरकम उद्योग खड़े किए जाएं, जिनसे केवल कुछ लोगों को लाभ हो। इस रणनीति के पैरोकार हमें बताते हैं कि गरीब.मजदूर, किसान,छोटे व्यवसायी व कारीगर . उन्हें उपलब्ध करा,गए अवसरों का उचित इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे और वे उतनी तेजी से विकास की राह पर देश को आगे नहीं ले जा पाएंगे जितनी तेजी से वे लोग ऐसा कर सकेंगे जिनके पास ढ़ेर सारी पूंजी है। जब विकास तेजी से होगा तब रोजगार के अवसर बढेंगे और इससे अपरोक्ष रूप से गरीबों को फायदा होगा। विदेशी निवेशक,भारत को भारी मुनाफा कमाने वाली जगह के तौर पर देख रहे हैं। परंतु वे श्रमिकों पर कम से कम पैसा खर्च करना चाहते हैं और देश के प्राकृतिक संसाधनों,जिनमें जमीन से लेकर स्पेक्ट्रम तक शामिल हैं, का भरपूर दोहन करना चाहते हैं। मुनाफा बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि श्रम पर कम से कम खर्च किया जाए। इसका एक तरीका तो यह है कि इस तरह की आधुनिक, मंहगी तकनीक का इस्तेमाल किया जाए जिससे उद्योगों में कम से कम श्रमिकों की जरूरत पड़े। इस तरह का विकास, रोजगार नहीं लाता। दूसरा तरीका है कि मजदूरी की दर कम से कम रखी जाए।'विकास' की इस दूसरी रणनीति के तहत, राज्य,पूंजीपतियों को मिट्टी के मोल जमीन व अन्य प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध करवाता है और करदाताओं के पैसे से 'विश्वस्तरीय'आधारभूत संरचना वाले कुछ द्वीप तैयार करता है, जिससे पूंजीपतियों को अच्छी सड़कें,फ्लाईओवर,बंदरगाहए बिजली आदि उपलब्ध कराई जा सके। राज्य, गरीबों से उनकी जमीनें जबरदस्ती छीनता है। किसानों को संगठित होकर अपनी जमीन की उचित कीमत पाने के लिए मोलभाव करने का मौका ही नहीं दिया जाता। गरीबों से कहा जाता है कि वे अपनी जरूरत की चीजें जैसे अनाज, खाद,कीटनाशक इत्यादि खुले बाजार से खरीदें क्योंकि अनुदान, अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। परंतु निवेशकर्ताओं से यह नहीं कहा जाता कि वे अपने उद्योग लगाने के लिए बाजार मूल्य पर जमीन आदि खरीदें। इस तरह,इस दूसरी रणनीति से केवल और केवल उन लोगों को लाभ होता है जिनके पास अरबों रूपये हैं। राज्य उनका ताबेदार बन जाता है और उन्हें जमीन व देश के अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने की खुली छूट देता है। इसके साथ ही, श्रम कानूनों में इस तरह के 'सुधार' किए जाते हैं जिससे ट्रेड यूनियनों के लिए श्रमिकों को संगठित करना मुश्किल हो जाता है। गरीबों को उनकी संपत्ति का उचित मूल्य नहीं मिलता और उन्हें कम से कम वेतन पर काम करना होता है। इससे देश में असमानताएं बढ़ती हैं। अपने विदेशी दौरों में प्रधानमंत्री मोदी अपने 'मेक इन इंडिया' नारे से विदेशी कुबेरपतियों को यही लालच दे रहे हैं और मजे की बात यह है कि वे इसे सभी 125 करोड़ भारतीयों का विकास कहते हैं।
गुजरात का विकास
आईए,हम एक नजर डालें नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में गुजरात के कच्छ जिले के कुछ गांवों में हुए विकास पर। वहां के लोगों से मिलने और वहां के हालात देखने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो भी थोड़ा.बहुत विकास हुआ है उससे दलित और मुसलमान अछूते हैं। भाजपा और संघ परिवार से जुड़ा हुआ स्थानीय श्रेष्ठि वर्ग, विकास के अभाव से लोगों का ध्यान हटाने के लिए समय.समय पर साम्प्रदायिक नारे उछालकर एक वंचित समूह को दूसरे वंचित समूह से लड़ाता आ रहा है।
जिले के बानी.पच्छम इलाके के लोग इसे तालुका का दर्जा दिए जाने की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं। 60 हजार की आबादी और 85 गांवों वाला यह इलाका, वर्तमान में भुज तालुका का भाग है। खाबड़ा इस इलाके का सबसे बड़ा गांव है और भारत.पाक सीमा पर स्थित है। खाबड़ा में रॉ, बीएसएफ आदि सहित लगभग सभी सुरक्षा एजेन्सियों के कार्यालय हैं। भुज, इस गांव से लगभग 54 किलोमीटर दूर है और अपने हर काम के लिए गांव वालों को 100 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। हाल तक, 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा देने के लिए भी भुज जाना पड़ता था जिसके कारण कई विद्यार्थी यह परीक्षा नहीं दे पाते थे। इस साल खाबड़ा में 12वीं की बोर्ड परीक्षा का केन्द्र स्थापित किया गया और यहां से 164 विद्यार्थियों ने परीक्षा दी। गांव के लोगों को लगता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है क्योंकि जहां 10 गांव वाले गांधीधाम को तालुका का दर्जा दे दिया गया है वहीं 85 गांव वाले बानी.पच्छम इलाके को यह दर्जा नहीं दिया जा रहा है। इस इलाके में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। वे आबादी का लगभग 85 प्रतिशत हैं। गांववासियों का कहना है कि उनके इलाके को तालुका का दर्जा सिर्फ इसलिए नहीं दिया जा रहा है क्योंकि वहां मुसलमानों की बहुसंख्या है और सरकार, मुसलमानों पर संदेह करती है। यह इस तथ्य के बावजूद कि 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों में स्थानीय मुस्लिम रहवासियों ने भारतीय सेना की हर तरह से मदद की थी। यहां तक कि वे सैनिकों के साथ पाकिस्तानी बंकरों तक गए थे।
पूरे इलाके में मात्र 72 स्कूल हैं। शिक्षकों के 350 पद खाली पड़े हैं। अधिकतर स्कूलों में मात्र एक शिक्षक है जो पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को पढ़ाता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार, हर स्कूल में कम से कम पांच शिक्षक होने चाहिए। तीन गांव.उदयी, झामरीवाट और लखाबो.ऐसे हैं जिनमें एक भी स्कूल नहीं है। और यह शायद संयोग मात्र नहीं कि इन तीनों गांवों की पूरी आबादी मुसलमानों की है। इन गांवों में स्कूल खोलने के लिए कई बार मांग उठाई गई परंतु सरकार ने उस पर ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत,लुहाना में मांग करते ही स्कूल खोल दिया गया। मुस्लिम.बहुल इलाकों के स्कूलों के परीक्षा परिणाम बहुत खराब आते हैं।
टूगा गांव के एक शिक्षक मोहम्मद खालिद से हमारी मुलाकात हुई। इस गांव में एक प्राथमिक व एक हाईस्कूल है। यह इलाके के बेहतर स्कूलों में से एक है। जिस प्राथमिक शाला में खालिद पढ़ाते हैं वहां 225 विद्यार्थी और छःह शिक्षक हैं। इन्हें कक्षा एक से लेकर आठ तक के विद्यार्थियों को पढ़ाना होता है। इसके लिए पहली और दूसरी व तीसरी और चौथी  कक्षाओं के विद्यार्थियों को एकसाथ बिठाया जाता है ताकि एक ही शिक्षक उन्हें पढ़ा सके। खालिद यह स्वीकार करते हैं कि स्कूल में पढ़ाई का स्तर बहुत निम्न है और सुविधाओं की बहुत कमी है। परंतु इसके लिए वे मुस्लिम समुदाय में जागरूकता की कमी को दोषी ठहराते हैं। वे कहते हैं कि अगर समुदाय में जागरूकता होती तो लोग स्कूल पर ध्यान देते और कोशिश करते कि वह अच्छी तरह चले। वे इसके लिए मुसलमानों के प्रति भेदभाव को दोषी नहीं ठहराते।
जान कुनरिया गांव में बिजाल डुंगलिया ने भी बताया कि स्कूल ठीक से नहीं चल रहे हैं। उनमें शौचालय तो दूरए पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं है।
अंजर ब्लाक के सिनोगरा गांव में दो स्कूल हैं। इनमें से एक का भवन सन् 2001 के भूकंप में ढह गया था और इसका पुनर्निर्माण कृष्ण पारिणम मंदिर द्वारा करवाया गया है। दूसरी कन्या शाला है। मुसलमान, गांव की आबादी का लगभग 20 प्रतिशत हैं। स्कूल, हिन्दुओं के रहवासी इलाके में हैं यद्यपि मुसलमानों की बस्ती वहां से बहुत दूर नहीं है। उच्च जातियों के बच्चे लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित अंजर में स्थित निजी स्कूलों में पढ़ते हैं और गांव के स्कूल में केवल मुसलमानों और दलितों के बच्चे ही हैं। 220 विद्यार्थियों में से केवल 83 मुसलमान हैं। मुसलमान बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर बहुत ज्यादा है। जो बच्चे दाखिला ले लेते हैं उनमें से ज्यादातर या तो स्कूल आते ही नहीं हैं या बहुत कम आते हैं। शिक्षकों की राय थी कि मुस्लिम अभिभावकों में जागरूकता का अभाव है। लड़कियां'बंधानी' का काम करती हैं और लड़के दुकानों आदि में। वे पढ़ना ही नहीं चाहते। मुसलमानों के केवल कुछ घर पक्के हैं और समय के साथ उनके मालिकाना हक की जमीनें कम होती जा रही हैं। दलित अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हैं और इसलिए दलित विद्यार्थियों की स्कूलों में उपस्थिति बेहतर है। लड़कों की तुलना में लड़कियों की उपस्थिति ज्यादा रहती है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी है और कई पद खाली पड़े हैं। लड़कों के स्कूल में सात और लड़कियों के स्कूल में छःह शिक्षक हैं। दोनों स्कूलों में शिक्षकों की कमी के चलते दो या दो से अधिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को एकसाथ बैठाकर पढ़ाया जाता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की हालत भी खराब है। मुस्लिम ग्रामीणों का मानना है कि उनके गांव की उपेक्षा इसलिए की जा रही है क्योंकि वहां मुसलमानों का बहुमत है।
-इरफान इंजीनियर

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

गोरिल्ला लड़ाई की तरह है कहानी - रमाकान्त श्रीवास्तव


दमोह। कहानीकारों ने अपना कार्य ईमानदारी से करते हुए अपने समय को कहानियों में जिन्दा रखा है। आज जब सामाजिक मूल्य नष्ट होने की कगार पर हैं तब कहानी का दायित्व और कहानी की आवश्यकता समाज में अधिक है। सामाजिक यथार्थ और सत्यान्वेषण कहानी की जरूरत है। आज की कहानी गोरिल्ला लड़ाई की तरह है जो अपने साथ विपक्ष को शामिल करती हुई उस पर प्रहार करती है उक्त उदगार ख्यात कथा लेखक रमाकान्त श्रीवास्तव ने प्रगतिशील लेखक संघ इकाई दमोह द्वारा आयोजित दो दिवसीय प्रदेश स्तरीय कहानी कार्यशाला में कहानी और समाज पर केन्द्रित विचार - विमर्श के तहत प्रदेश के नवरचनाकारों को सम्बोधित करते हुये अभिव्यक्त किए ।

                इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुये कहानीकार सुबोध श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि दमोह में उनके कथा लेखन की जड़ है ।यहाँ कथा का अपना इतिहास है ।आज समाज हाशिये पर पहुँचने की स्थिति में है ऐसे हालात में कहानी कार का दायित्व बनता है कि वे अपनी कहानियों के जरिए विसंगतियों के साथ निराकरण को भी सामने लायें क्योंकि कहानी अपने समय का ऐतिहासिक दस्तावेज़ होती है ।
         इस विमर्श में कहानीकार दिनेश भट्ट (छिंदवाड़ा), अनिल अयान (सतना), संजीव माथुर (ग़ाज़ियाबाद) ,दीपा भट्ट (सागर),अनुपम दाहिया (सतना), अक्षय जैन, एवं अमर सिंह ने हस्तक्षेप करते हुए कई अहम् सवाल उठाकर अपनी व् शिविरार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया ।
                इस विमर्श से पूर्व स्वागत भाषण में अध्यक्ष सुसंस्कृति परिहार ने यथार्थवादी प्रथम कहानी "टोकरी भर मिट्टी" के लिये जाने वाले लेखक श्री माधव प्रसाद सप्रे की इस माटी में रचनाकारों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि पहले की कहानियाँ निद्रा में ले जातीं थीं आज वे जगाने का काम करती हैं। उद्घाटन भाषण देते हुए प्रलेसं दमोह संस्थापक अध्यक्ष सत्मोहन वर्मा ने कथा परम्परा पर अपने विचार रखते हुये कार्यशाला को जरूरी बताया ।
               दूसरे चरण में कहानी की विषय वस्तु और शिल्प पर व्याख्यान युवा कथाकार दिनेश भट्ट ने दिया । श्री भट्ट का मानना था कि कहानी की विषयवस्तु यदि आप जरा से भी संवेदनशील हैं तो वह कहीँ भी मिल सकती है। मूल बात उसके शिल्प की है। जिसका तानाबाना बुनने में आपका अध्ययन, और सूक्ष्म अन्वेषण महत्वपूर्ण होता  है। नन्द लाल सिंह ने परसाई की कहानी "चूहा और मैं" के माध्यम से शिल्प की ओर इशारा करते हुए कहा कि चूहे को आगे क्यों रखा गया, ये समझना कहानी लेखक के मंतव्य  समझने में मदद करता है।  अनिल अयान ने लघु कथा और कहानी के शिल्प पर, संजीव माथुर ने व्यक्तिगत अनुभव की कहानियों और सामाजिक सरोकार की कहानियों के फासले पर और महत्व पर विविध सवाल किये जिस पर रमाकांत जी ने टिप्पणियाँ कीं तथा स्पष्ट तौर पर कहा कि लघु कथाओं में कथ्य महत्वपूर्ण है जबकि कहानी में शिल्प और परिवेश की कसावट भी अत्यंत आवश्यक है। सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ यकीनन दीर्घजीवी होती हैं ।
          दूसरे दिन कहानी पाठ का सिलसिला प्रारंभ हुआ कार्यशाला में लिखी गई कहानी "सपनों की उड़ान" से, जिसे सतना से आये नवरचनाकार अंकुर चौरसिया ने प्रस्तुत किया । उपस्थितों ने कार्यशाला की कहानी कहकर इसका स्वागत किया। इसी क्रम में दीपा भट्ट ने "आर्डर", अक्षय जैन ने "टाईपिस्ट मेडम", उमेश दास साहनी ने "पद्मा", अनुपम दाहिया ने "अपने-अपने श्मशान", अनिल अयान ने "एक अनुबंध", अरबाज खान ने "दीवानी", पुरूषोत्तम रजक ने "दया",  आभा भारती ने "वसंत" और ओजेन्द्र तिवारी ने "शिक्षा" कहानी का पाठ किया ।
      रचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए वरिष्ठ कथाकार त्रयी ने इन लेखकों को संभावनाशील बताया। रमाकान्तजी ने सुझाव दिया कि विषयवस्तु के चयन में जल्दबाजी नहीं करना चाहिए जब तक कथ्य पक न जाये। कहानी लिखने के बाद कहानी कई बार पाठ होना चाहिए इससे उसकी खामियां सामने आती हैं। कहानी का टुकड़ों में अवलोकन भी गलत है। कहानीकार को अपनी भाषा, अपने मुहावरे, अपनी शैली और विषय वस्तु से जुड़ाव होना जरूरी है। चमकदार शिल्प और नकली आधुनिकता कहानी को अपंग बना देती है। सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि नवरचनाकार ध्यान रखें कि वे कहानी लिखकर सामाजिक कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं ।
    समापन सत्र में मिस्र के लेखक युसुफ अल फजई की राजेन्द्र शर्मा द्वारा अनुवादित कहानी "कठपुतली का नाच"  रंगकर्मी राजीव अयाची ने, एवं भीष्म साहनी की कहानी "चीफ की दावत" का पाठ सुसंस्कृति परिहार ने किया। इन मानक कहानियों के पाठोपरांत सुबोध श्रीवास्तव ने "भले लोग", दिनेश भट्ट ने "अंतिम बूढ़े का लाफ्टर डे" एवं रमाकांत श्रीवास्तव ने "साहब, बीबी और बाबाजी" कहानियों का पाठ कर तमाम रचनाधर्मियों को इन कथाओं की खूबियों से अवगत कराया। ये कहानियां सभी की  मार्गदर्शक बनेगी, इसी अपेक्षा के साथ दो दिवसीय कहानी कार्यशाला का समापन हुआ। इस कार्यशाला का सफल संचालन गफूर तायर ने किया। आभार व्यक्त करते हुये सुसंस्कृति परिहार ने इसे दमोह इकाई लिए ही नहीं, बल्कि प्रदेश के लिए भी महत्वपूर्ण आयोजन कहा और तमाम सहयोगियों को धन्यवाद दिया ।
ज्ञातव्य हो, कार्यशाला के मध्यांतर में दक्षेस सिँह व सुसम्मति परिहार ने हरिप्रसाद चौरसिया के निर्देशन में जनगीत गाये। रमेश तिवारी ने बुन्देली गीतों की छटा बिखेरी, वहीं केशू तिवारी ने गजलों से समां बांधा । इँदौर से आये रंगकर्मी लेखक शिवम् कुन्देर ने बांसुरी वादन कर सबका मन मोह लिया ।
                 कार्यक्रम में आनंद श्रीवास्तव ,नरेन्द्र दुबे,  ठा नारायण सिंह, श्रीकांत चौधरी, डा रघुनंदन चिले ,नितिन अग्रवाल ,पीएस परिहार, पुष्पा चिले, भारत चौबे, अभय नेमा, कॄष्णा विश्वकर्मा, वीरेन्द्र दबे, शिखा उमाहिया के साथ महाविद्यालीन छात्र छात्राएं  मौजूद रहे ।
- सुसंस्कृति परिहार

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

नेहरू युग के सभी इतिहासविदों द्वारा लिखी किताबों में आग लगा दो


सुब्रमण्यम स्वामी एक ऐसे व्यक्ति हैं जो जब भी बोलते हैं जहर उगलते हैं। दिल्ली में एक कार्यक्रम में बोलते हुये उनने कहा कि नेहरू युग के सभी इतिहासविदों द्वारा लिखी किताबों में आग लगा देना चाहिए।
इस संदर्भ में स्वामी ने विशेष रूप से विपिन चंद्र और रोमिला थापर का नाम लिया। उनका आरोप है कि इस तरह के लेखकों ने अनेक हिंदू राजा.महाराजाओं की उपेक्षा की है। स्वामी दिल्ली में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समर्थित एक संस्था है। कार्यक्रम में बोलते हुये अनेक वक्ताओं ने कहा कि मार्क्सवादी,मुसलमान और पश्चिमी इतिहासकारों ने भारत के प्राचीन इतिहास की बहुत उपेक्षा की है।
स्वामी और अन्य वक्ताओं ने इस तरह के अनेक हिंदू राजाओं का नाम लिया जिनका उल्लेख इन इतिहासज्ञों ने नहीं किया है। वक्ताओं ने विशेष रूप से हेमचंद्र विक्रमादित्य का नाम लिया है, जिन्होंने उत्तर भारत में 1556 के द्वितीय पानीपत युद्ध के बाद हिंदू राज्य की स्थापना की थी।
तथाकथित इन इतिहासज्ञों की इस घनघोर हिंसक प्रवृत्ति की सारे देश में आलोचना की गई। प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स ने 9 अक्टूबर को लिखे एक संपादकीय में इस बात पर घोर चिंता प्रगट की है कि हमारे देश में किताबों को सिर्फ इस कारण जलाने की बात की जाए क्योंकि उनमें कुछ ऐसे विचार हैं जो कुछ लोगों को पसंद नहीं हैं। संपादकीय में कहा गया है कि सुब्रमण्यम स्वामी समाचारपत्रों में सुर्खियां जीतने के लिए इस तरह की गैर.जिम्मेदार बात करते हैं। वे आये दिन बुद्धिजीवियों और मुसलमानों पर हमला करते रहते हैं। हिंदुस्तान टाईम्स ने यह मांग की है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व को चाहिए कि वह स्वामी पर लगाम लगायें। स्वामी बहुत ही भद्दी और भडकाऊ भाषा में, मुसलमानों,पाकिस्तान, सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि के बारे में निंदापूर्ण बातें कहते रहते हैं। इसी क्रम में उनने नेहरूवियन और वामपंथी इतिहासज्ञों पर हमला किया है। उनका कहना है कि विपिन चंद्र और रोमिला थापर के समान इतिहासज्ञों की किताबों को जला देना चाहिए।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े अनेक संगठनों को स्वामी की बात न सिर्फ अच्छी लगती है वरन् वे उनसे सहमत भी होते हैं। इसी सिलसिले में यहां उल्लेख करना होगा कि दीनानाथ बत्रा द्वारा लिखित कुछ किताबों को गुजरात के पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है। दीनानाथ बत्रा भी एक अत्यधिक घनघोर प्रतिक्रियावादी लेखक हैं। वे अखंड भारत की वकालत करते हैं और कहते हैं कि पश्चिमी ढंग से लोगों को अपने जन्मदिन नहीं मनाने चाहिए। चूंकि गुजरात में इनकी पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल कर ली गई हैं इसलिये यह कहना उचित होगा कि इस तरह के विचारों को स्वीकार करने वालो की संख्या काफी ज्यादा है।
स्वामी ने जिन इतिहासज्ञों पर हमला किया है वे दुनिया के महान इतिहासज्ञों में से हैं। इतिहास की दुनिया में उनकी अद्भुत स्वीकार्यता है। इस तथ्य के बावजूद यह दुःख की बात है कि स्वामी उनकी किताबों को जलाने की बात करते हैं। आखिर ये लोग कितनी किताबों को प्रतिबंधित करेंगे। दिल्ली की सरकार और भाजपा के नेताओं को स्पष्ट करना चाहिए कि उनका इस तरह के विचारों से कोई लेना.देना नहीं हैं। न सिर्फ उनको असहमति दिखाना चाहिए बल्कि इस तरह की बेबुनियाद, भड़काऊ बातें कहने के लिए उनके विरूद्ध कार्यवाही भी होना चाहिए।
आज के आधुनिक समाज में विभिन्न नजरियों से इतिहास का विवेचन व मूल्यांकन स्वाभाविक है। यह पाठक पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस विवेचन व मीमांसा को स्वीकार करता है। इस तरह की स्वीकार्यता पर किसी प्रकार का बंधन न तो संभव है और ना ही लगाना चाहिए। हमारे जैसे बहुआयामी देश में इस तरह का बंधन संभव नहीं है।
आखिर परस्पर विरोधी विचारों को सहना ही तो हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत है। स्वामी के समान लोग जो भारत को एक ही दिशा में ले जाना चाहते हैं और जो किसी भी प्रकार के विरोधी विचार को सहने के लिए तैयार नहीं हैं उनके इस दकियानूसी रवैये से हमारे देश का भारी नुकसान होता है। प्रधानमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि हम इस तरह के एकतरफा संकुचित विचारों के विरूद्ध हैं। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को स्वामी जैसे संकुचित विचार वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों पर लगाम कसना चाहिए और उन्हें स्पष्ट रूप से बता देना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी की चिंता क्या है। उसका इस तरह के मुद्दों पर रवैया क्या है? हिंदुस्तान टाईम्स ने अंत में अपने संपादकीय में चेतावनी देते हुये कहा है कि यदि सत्ताधारी पार्टी ऐसा नहीं करती है तो वह वास्तव में हमारे देश का भारी नुकसान करेगी।
संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुये लोगों के रवैये की अमरीका के सर्वाधिक लोकप्रिय समाचारपत्र न्यूयार्क टाईम्स ने भी निंदा की है। अपने 8 अक्टूबर के संस्करण के संपादकीय में न्यूयार्क टाईम्स लिखता है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के युवकों को एक सुनहरे भविष्य का आश्वासन दिया है। शायद वे जानते होंगे कि इस आश्वासन को पूरा करने के लिए उच्च कोटि की शिक्षा और उच्च कोटि के अवसर प्रदान करना आवश्यक है। तभी 25 वर्ष से कम आयु वाले 60 करोड़ भारतीय युवकों को सही दिशा मिलेगी। आज इन युवकों में बुनियादी योग्यताओं की कमी है।
अपने 2014 के घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी ने कहा था कि राष्ट्र के विकास के लिये और गरीबी के उन्मूलन के लिये शिक्षा ही सबसे बड़ा प्रभावी हथियार है। अब सवाल यह है कि क्या शिक्षा में सुधारों का उपयोग एक प्रबुद्ध शिक्षित नागरिकों की जमात बनाने के लिये ही किया जायेगाघ् क्या इस तरह की जमात को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जायेगा या एक विशेष प्रकार की विचारधारा को आगे बढ़ाया जायेगा?
पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी ने राष्ट्र का प्रशासन चलाने के लिए गुजरात मॉडल की सिफारिश की थी। अनेक मतदाताओं ने इसे एक लचीली अर्थव्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता माना था। परंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि गुजरात मॉडल में वे पाठ्यपुस्तकें भी शामिल हैं जिन्हें दीनानाथ बत्रा ने लिखी हैं। बत्रा एक ऐसे विद्वान हैं जो भारत को दक्षिणपंथी रास्ते पर ले जाना चाहते हैं।
पिछले फरवरी माह में उनने पेंग्विन पर यह दबाव बनाया कि वह वेंडी डोनीगर जो शिकागो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं उनकी किताबों का प्रकाशन रद्द किया जाये। क्योंकि बत्रा की राय में उस प्रकाशन ने हिंदू धर्म का अपमान किया है। उसके बाद जून के महीने में गुजरात सरकार ने यह आदेश जारी किया कि गुजरात के पाठ्यक्रम में बत्रा की किताबें शामिल की जायें। बत्रा की किताबों में अनेक ऐसी बातें शामिल हैं जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। उनकी किताबों में विद्यार्थियों को सलाह दी गई है कि वे केक और मोमबत्ती के साथ अपना जन्मदिन न मनायें क्योंकि यह गैर भारतीय रीति रिवाज है।
बत्रा विद्यार्थियों से कहते हैं कि वे अखण्ड भारत का नक्शा बनायें। जिस अखण्ड भारत में बांग्लादेश,श्रीलंका,तिब्बत,पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल हैं। बत्रा की यह भी मान्यता है कि प्राचीन भारत में कारें थीं, हवाईजहाज भी थे और अणु अस्त्र भी थे। वे कहते हैं कि विद्यार्थियों को इसका ज्ञान होना चाहिए।
यहां स्मरण दिलाना उचित होगा कि 1999 में जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली मिलीजुली सरकार थी उस समय बत्रा को इतिहास की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उस समय यह काम अधूरा रह गया था, चूंकि 2004 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चुनाव में अपदस्थ हो गई थी और वह काम अधूरा रह गया था। इसलिए अब बत्रा दावा करते हैं कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री स्मृति जूबिन ईरानी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उनकी किताबें शीघ्र ही राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का हिस्सा बन जायेंगी।
शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण विद्या है यदि इस पर ऐसे लोगों का नियंत्रण हो जाता है जो ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़मरोड़कर पेश करते हैंए जो लगभग तानाशाही के ढंग से यह तय करते हैं कि कौन से सांस्कृतिक रीतिरिवाज भारतीय हैं, जो एक योजना के अनुसार की जाने वाली गतिविधि के द्वारा पड़ोसियों के मन में खतरनाक भावनाओं को जन्म देते हैं। इस तरह की प्रवृत्तियों से देश का भला नहीं होगा न्यूयार्क टाईम्स अंत में लिखता है।
 -एल.एस. हरदेनिया

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

प्रो. ग्रोथ से प्रो. बिजनेस: बदले मुखौटों के पीछे वही ढाक के तीन पात

 राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दो की सरकार ने अपने पहले बजट के समर्थन में एक बेबाक सच का सहारा लिया है। डंके की चोट पर कहा है कि ‘प्रो. बिजनेस’ यानी व्यवसाय और व्यवसायी पक्षीय और उनके प्रति सकारात्मक समर्थक-सहायक नीतियों का पालन करके वे गरीबों के पक्ष के, उनके लिए हितकर नतीजे दे सकते हैं। वर्तमान भारत की स्थिति के संदर्भ में उनके इस विचार के समर्थन में हम प्रतिष्ठित, नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के विचार का भी हवाला दे सकते हैं। अभी कुछ अरसे पहले जयपुर की एक ‘साहित्यकार’ की सभा में कहा था कि 16वीं लोकसभा में वे एक व्यवसाय व्यवसायी (प्रो. बिजनेस) समर्थक, किन्तु पंथ निरपेक्ष शासकदल को देखना चाहेंगे। पंथ-निरपेक्षता के प्रमाण खोजने के लिए तो सरकार का सालाना बजट शायद उपयुक्त मंच नहीं हो, किन्तु व्यवसायी व्यवसाय पोषक तत्वों से सन् 2014-15 का केन्द्रीय बजट लबालब भरा हुआ है। ठीक यूपीए दो की नीतियों की तरह ही, ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है: यह एक निरन्तर जारी प्रतिबद्धता की नवीनतम कड़ी भर है। किन्तु फिर भी स्पष्ट नजर आता है कि सोच, प्रतिबद्धता और राजनैतिक, सामाजिक रणनीति का खुल्लमखुला बयान, इसको किसी झाँसेबाजी के शब्दजाल से मुक्त रखना, अपने आप में उल्लेखनीय ही नहीं, प्रसंशनीय भी है। जनता को सच्चाई जानकर निर्णय करने का मौका मिल रहा है। लम्बे अरसे से जीडीपी वृद्धि, निवेश-प्रोत्साहन आदि को भारत के आर्थिक विकास का, यहाँ तक कि सामाजिक समावेशक विकास का जरिया भी बताया जाता रहा है, बिना यह बताए कि यह मूलरूप से व्यवसायों और व्यवसायियों के हितों, उद्देश्यों और स्वार्थों-हितों को बढ़ाने का रास्ता है। गैर बराबरी और व्यापक वंचना की जमीन पर व्यवसाय की आजादी गैर बराबरी के वटवृक्ष को और सींचेगी। अचंभे की बात है कि इसके संभावित अधोगामी प्रभावों द्वारा गरीबों की हित साधना अपेक्षित मानी गयी है बिना व्यवसाय व्यवसायी पक्षधर नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं के अनिवार्य रूप से ऊर्द्ध प्रवाहमान (गशिंग-अप) केन्द्रीयकृत प्रभावों से कोई छेड़छाड़ या उन पर अंकुश लगाए। आखिर छुई-मुई जैसी व्यवसायी, निवेशक, धनीमानी तबकों की अति संवेदी उद्यमिता को अक्षुण्ण रखे बिना जीडीपी यानी बाजाराधारित राष्ट्रीय उत्पादन और उसकी अनिवार्य शर्त बढ़ते निवेश को लगातार बढ़ाये रखना (जो कि प्रत्यक्ष और मूल घोषित उद्देश्य है) संभव नहीं माना गया है। विषमता वर्द्धन, धनियों को और ज्यादा धनी बनाने और राज्य द्वारा इस प्रक्रिया को सबल बनाने की जगह सीधे-सीधे, बड़ी और पहली प्राथमिकता की तरह सबको पर्याप्त, पुख्ता और सम्मानजनक रूप मंे आजीविका की गारन्टी आदि को राजग दो की व्यवसाय और व्यवसायी मित्रता में जगह नहीं मिल पाती है। इन नीतियों में टैक्स कटौती का स्व-घोषित तड़का राज्य की वित्तीय क्षमता को कड़ी संकीर्ण सीमाओं में बांध देती है, खासकर राज्य द्वारा मौद्रिक प्रसार की कड़ी सीमा में बांधने को अपनी पीठ आप ठोकने का कारण मानने के चलते। जाहिर है राज्य अपनी बिना पर सामाजिक सुरक्षा, जन कल्याण तथा और व्यवसायी वर्गों के लिये जीवन की सुख सुविधाएँ और गुणवत्ता सुधारने और उनकी उत्पादन क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र सांकेतिक खर्च कार्यक्रम ही अपने हाथों में ले पाती है। मुख्यतः चलते आ रहे कार्यक्रमों की लकीर पीटते रहने और उन्हें घोषित रूप से घटाने हटाने का साहस नहीं जुटा सकने के कारण हमने ईमानदारी से अपनी नीतियों का रूप खुलकर सार्वजनिक करने के राजग दो के वक्तव्य की प्रशंसा से इस लेख की शुरूआत की थी किन्तु भूलना नहीं चाहिए कि राजनैतिक ईमानदारी की सीमाएँ लांघना भी एक हद तक ही देखा गया है। अनेक बड़े छलावों भुलावों की नींव पर ही तो सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ा गया था। अब किस्तों में हमें उनके पीछे छिपे सचों को उजागर होने की प्रतीक्षा करनी होगी।
    लोकसभा चुनाव के कटु तथा अतिरंजित धुआंधार प्रचार में अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति पेश की गई थी। इस साल की  सरकारी आर्थिक समीक्षा में दिए गए नवीनतम आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी होती है। अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए राजग दो सरकार के बजट को पहला बड़ा बहुमुखी प्रयास माना जा सकता है। देश की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक चुनौतियांे (महंगाई, बेरोजगारी, सामान्य सामाजिक सेवाओं तथा आधारभूत सुविधाओं की गहन अपर्याप्तता) को सभी रेंखांकित करते रहते हैं। इनके दुष्प्रभाव से आम जन दुखी है। आम आदमी की पक्षधर अर्थव्यवस्था की आस लोग दशकों से लगाए हुए हैं। ऐसा तो नहीं हो पाया किन्तु दो भिन्न दिशाओं में चल रही नावों की सवारी करने के लिए मूल स्वरूप राजकीय राजस्व की अपर्याप्तता, विदेशी लेन देन का बढ़ता घाटा, बैंक कर्जों का डूबते खाते में जाना, कर चोरी तथा देश से काले धन का पलायन ने अर्थव्यवस्था के रीढ़ को कमजोर अवश्य कर दिया है। इससे राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर मंे सुस्ती तो आई ही है, इसने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन संचालन की विफलता और कमजोरी को भी प्रकट किया है।
    पिछले, 23-24 सालों से चली आ रही नीतियों ने थोड़े अरसे के लिए अच्छी वृद्धि दर दी जरूर लेकिन फिर वे अनिवार्यतः अपनी मंथर गति और अघोषित गुप्त  गतिविधियों में लिप्त हो गईं। बीते दो तीन दशकों में बड़ी कम्पनियांे को दिन दूना रात चैगुणा मुनाफा हुआ हैं परन्तु मजदूर और आम आदमी की स्थिति दयनीय हुई है। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पिछले तीन दशकों के फैक्टरी उत्पादन में मजदूरी वेतन आदि का अनुपात 40.6 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत के इर्द-गिर्द हो गया हैं 1980 के दशक के मुकाबले इस सदी के पहले दशक में मुनाफों का हिस्सा दो गुणा हो गया है। संगठित रोजगार की ओर किसी का ध्यान नहीं है। पक्के संगठित रोजगार की वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत वृद्धि दर के औसत के साथ मात्र 0.5 प्रतिशत रह गई है। देश में प्रति वर्ष सवा करोड़ युवाओं को रोजगार की आवश्यकता प्रो. ग्रोथ से प्रो. बिजनेस: बदले मुखौटों के पीछे वही ढाक के तीन पात
-कमल नयन काबरा
        राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दो की सरकार ने अपने पहले बजट के समर्थन में एक बेबाक सच का सहारा लिया है। डंके की चोट पर कहा है कि ‘प्रो. बिजनेस’ यानी व्यवसाय और व्यवसायी पक्षीय और उनके प्रति सकारात्मक समर्थक-सहायक नीतियों का पालन करके वे गरीबों के पक्ष के, उनके लिए हितकर नतीजे दे सकते हैं। वर्तमान भारत की स्थिति के संदर्भ में उनके इस विचार के समर्थन में हम प्रतिष्ठित, नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्यसेन के विचार का भी हवाला दे सकते हैं। अभी कुछ अरसे पहले जयपुर की एक ‘साहित्यकार’ की सभा में कहा था कि 16वीं लोकसभा में वे एक व्यवसाय व्यवसायी (प्रो. बिजनेस) समर्थक, किन्तु पंथ निरपेक्ष शासकदल को देखना चाहेंगे। पंथ-निरपेक्षता के प्रमाण खोजने के लिए तो सरकार का सालाना बजट शायद उपयुक्त मंच नहीं हो, किन्तु व्यवसायी व्यवसाय पोषक तत्वों से सन् 2014-15 का केन्द्रीय बजट लबालब भरा हुआ है। ठीक यूपीए दो की नीतियों की तरह ही, ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है: यह एक निरन्तर जारी प्रतिबद्धता की नवीनतम कड़ी भर है। किन्तु फिर भी स्पष्ट नजर आता है कि सोच, प्रतिबद्धता और राजनैतिक, सामाजिक रणनीति का खुल्लमखुला बयान, इसको किसी झाँसेबाजी के शब्दजाल से मुक्त रखना, अपने आप में उल्लेखनीय ही नहीं, प्रसंशनीय भी है। जनता को सच्चाई जानकर निर्णय करने का मौका मिल रहा है। लम्बे अरसे से जीडीपी वृद्धि, निवेश-प्रोत्साहन आदि को भारत के आर्थिक विकास का, यहाँ तक कि सामाजिक समावेशक विकास का जरिया भी बताया जाता रहा है, बिना यह बताए कि यह मूलरूप से व्यवसायों और व्यवसायियों के हितों, उद्देश्यों और स्वार्थों-हितों को बढ़ाने का रास्ता है। गैर बराबरी और व्यापक वंचना की जमीन पर व्यवसाय की आजादी गैर बराबरी के वटवृक्ष को और सींचेगी। अचंभे की बात है कि इसके संभावित अधोगामी प्रभावों द्वारा गरीबों की हित साधना अपेक्षित मानी गयी है बिना व्यवसाय व्यवसायी पक्षधर नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं के अनिवार्य रूप से ऊर्द्ध प्रवाहमान (गशिंग-अप) केन्द्रीयकृत प्रभावों से कोई छेड़छाड़ या उन पर अंकुश लगाए। आखिर छुई-मुई जैसी व्यवसायी, निवेशक, धनीमानी तबकों की अति संवेदी उद्यमिता को अक्षुण्ण रखे बिना जीडीपी यानी बाजाराधारित राष्ट्रीय उत्पादन और उसकी अनिवार्य शर्त बढ़ते निवेश को लगातार बढ़ाये रखना (जो कि प्रत्यक्ष और मूल घोषित उद्देश्य है) संभव नहीं माना गया है। विषमता वर्द्धन, धनियों को और ज्यादा धनी बनाने और राज्य द्वारा इस प्रक्रिया को सबल बनाने की जगह  सीधे-सीधे, बड़ी और पहली प्राथमिकता की तरह सबको पर्याप्त, पुख्ता और सम्मानजनक रूप मंे आजीविका की गारन्टी आदि को राजग दो की व्यवसाय और व्यवसायी मित्रता में जगह नहीं मिल पाती है। इन नीतियों में टैक्स कटौती का स्व-घोषित तड़का राज्य की वित्तीय क्षमता को कड़ी संकीर्ण सीमाओं में बांध देती है, खासकर राज्य द्वारा मौद्रिक प्रसार की कड़ी सीमा में बांधने को अपनी पीठ आप ठोकने का कारण मानने के चलते। जाहिर है राज्य अपनी बिना पर सामाजिक सुरक्षा, जन कल्याण तथा और व्यवसायी वर्गों के लिये जीवन की सुख सुविधाएँ और गुणवत्ता सुधारने और उनकी उत्पादन क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र सांकेतिक खर्च कार्यक्रम ही अपने हाथों में ले पाती है। मुख्यतः चलते आ रहे कार्यक्रमों की लकीर पीटते रहने और उन्हें घोषित रूप से घटाने हटाने का साहस नहीं जुटा सकने के कारण हमने ईमानदारी से अपनी नीतियों का रूप खुलकर सार्वजनिक करने के राजग दो के वक्तव्य की प्रशंसा से इस लेख की शुरूआत की थी किन्तु भूलना नहीं चाहिए कि राजनैतिक ईमानदारी की सीमाएँ लांघना भी एक हद तक ही देखा गया है। अनेक बड़े छलावों भुलावों की नींव पर ही तो सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ा गया था। अब किस्तों में हमें उनके पीछे छिपे सचों को उजागर होने की प्रतीक्षा करनी होगी।
    लोकसभा चुनाव के कटु तथा अतिरंजित धुआंधार प्रचार में अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति पेश की गई थी। इस साल की  सरकारी आर्थिक समीक्षा में दिए गए नवीनतम आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी होती है। अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए राजग दो सरकार के बजट को पहला बड़ा बहुमुखी प्रयास माना जा सकता है। देश की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक चुनौतियांे (महंगाई, बेरोजगारी, सामान्य सामाजिक सेवाओं तथा आधारभूत सुविधाओं की गहन अपर्याप्तता) को सभी रेंखांकित करते रहते हैं। इनके दुष्प्रभाव से आम जन दुखी है। आम आदमी की पक्षधर अर्थव्यवस्था की आस लोग दशकों से लगाए हुए हैं। ऐसा तो नहीं हो पाया किन्तु दो भिन्न दिशाओं में चल रही नावों की सवारी करने के लिए मूल स्वरूप राजकीय राजस्व की अपर्याप्तता, विदेशी लेन देन का बढ़ता घाटा, बैंक कर्जों का डूबते खाते में जाना, कर चोरी तथा देश से काले धन का पलायन ने अर्थव्यवस्था के रीढ़ को कमजोर अवश्य कर दिया है। इससे राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर मंे सुस्ती तो आई ही है, इसने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन संचालन की विफलता और कमजोरी को भी प्रकट किया है।
    पिछले, 23-24 सालों से चली आ रही नीतियों ने थोड़े अरसे के लिए अच्छी वृद्धि दर दी जरूर लेकिन फिर वे अनिवार्यतः अपनी मंथर गति और अघोषित गुप्त
गतिविधियों में लिप्त हो गईं। बीते दो तीन दशकों में बड़ी कम्पनियांे को दिन दूना रात चैगुणा मुनाफा हुआ हैं परन्तु मजदूर और आम आदमी की स्थिति दयनीय हुई है। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पिछले तीन दशकों के फैक्टरी उत्पादन में मजदूरी वेतन आदि का अनुपात 40.6 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत के इर्द-गिर्द हो गया हैं 1980 के दशक के मुकाबले इस सदी के पहले दशक में मुनाफों का हिस्सा दो गुणा हो गया है। संगठित रोजगार की ओर किसी का ध्यान नहीं है। पक्के संगठित रोजगार की वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत वृद्धि दर के औसत के साथ मात्र 0.5 प्रतिशत रह गई है। देश में प्रति वर्ष सवा करोड़ युवाओं को रोजगार की आवश्यकता होती है। परन्तु अवसर न मिलने के कारण इनमें से अधिकतर आजीविका विहीन और अभावग्रस्त करोड़ों लोगों की भीड़ में शामिल हो जाते हैं। दुखद है कि सरकार व अधिकारी आर्थिक सामाजिक तथ्यों की आधिकारिक जानकारी होते हुए भी कुछ ठोस सुधारात्मक, सकारात्मक ठोस कदम नहीं उठाते। भारत की सबसे गंभीर समस्या, गैर-बराबरी है। अमानवीय गैर बराबरी के कारण देश की युवा पीढ़ी, बालक एवं वृद्ध फटेहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। देश इस बड़े मानव संसाधन के प्रयासों से संभावित राष्ट्रीय उपलब्धियों से भी वंचित हो रहा है। नेता शासक कम्पनियाँ मात्र राष्ट्रीय आय के कुल योग और औसत में राष्ट्रीय गौरव खोजने में लगे रहते हैं। अनेक समाज विज्ञानी उनके सुर में सुर मिलाते हैं। उन्हें इन करोड़ों नवयुवकों की ज्ञान क्षमता तथा अनुभव में संभावित योगदान दिखाई नहीं देता। नकली और थोथे राष्ट्रवाद में विषमताएँ भरी हुई हैं। उनके दुष्परिणामों की गणना तो दूर कभी उनकी फेहरिस्त भी नहीं बनाई गई। अधिकारी वर्ग किसी बीते जमाने की खुमारी में डूबे स्वप्नदर्शी स्वाभिमानी की तरह हो गए हैं। वे अपने परिवेश की वंचनाओं और कष्टों की घोर उपेक्षा कर रहे हैं।
    खैर, काफी अरसे बाद जनमत ने राजकीय सत्ता की वैधानिक दुर्बलता को दूर किया है। केन्द्र में एक सशक्त राज्य सत्ता की स्थापना हुई है। लोगों ने भाजपा में गहरा विश्वास और अपनी उम्मीदों की पूर्ति को दंाव पर लगाया है। इस परिप्रेक्ष्य मंे हमें 2014-15 के बजट के चरित्र, प्रावधानों और संभावित प्रभावों को देखना चाहिए। आज के परिवेश में गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और विषमताएँ आपस मंे पूरी तरह गुत्थमगुत्थ हैं। साथ ही यह चतुष्कोण आर्थिक सांस्कृतिक और अन्तर्राष्ट्रीय पटल के सम्बंधों कार्य प्रणाली, शक्ति संतुलन तथा राजकीय नीतियाँ और सुविधाएँ तथा प्रकृति का दुष्परिणाम भी है। हर साल राजकोषीय वित्तीय आवंटन में पुरानी लीक पीटा जाता है। इस वर्ष भी केवल सीमांत, मामूली रद्दोबदल ही किए गए हैं। राजग दो सरकार ने जो बजट पेश किया हैं, उसे देखकर वर्षों से आलोचना और खंडन मंडन में निरंतर, केन्द्रीय सत्ता संचालन के पुराने अनुभवी, अनेक राज्यों की लम्बे समय तक बागडोर सँभालने वाले तथा अपनी स्पष्ट आर्थिक सामाजिक प्रतिबद्धताओं की ताल ठोकने वाले लोग आश्चर्यचकित हैं। उनका कहना है कि बजट से नई सरकार ने अपनी कोई छाप नहीं छोड़ी। वे ऐसा कह रहे हैं तो कोई कारण भी होगा। कारण खोजने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। वर्ष 1970 के बाद से ही देश में असंतुलन अपना पैर फैलाने लगा था। बड़ी राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी परस्त बाजार यानी निजी लाभ प्रेरित नीतियाँ मामूली फेरबदल के साथ लगातार अपनी पैठ जमाती गईं। इसका परिणाम यह हुआ कि देश में गैर बराबरी नीति असंतुलित, अनैतिक और अलोकतांत्रिक होने के साथ साथ दीर्घकालीन जनहितों की बलि भी लेता रहा। भारत सरकार ने वित्तीय और विदेशी क्षेत्र को अत्यधिक महत्व दिया, जिससे कृषि और ग्रामीण जीवन की न्यूनतम  जरूरतों की घोर उपेक्षा हुई।
    बाजारोन्मुखी नीतियों को लागू करने के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति निरंतर कमजोर हो रही है। प्रभावी माँग एवं उत्पादन के स्वरूप के बीच असमान्य समीकरण होने की वजह से कीमतों में लगातार इजाफा हो रहा है। बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के तमाम दावे खोखले साबित हो रहे हैं। देश में भ्रष्टाचार, काला धन, मानवीय मूल्यों की हत्या, जघन्य अपराधों का तांडव चल रहा है। राजनीति मूल्यहीन घटिया व्यवसाय फरेबी हो गई है। सालाना बजटों की तरह इस साल का बजट भी पिछली नीतियों को ही आगे बढ़ाता है। वर्ष 2014-15 के बजट में सार्वजनिक व्यय को महज 14 प्रतिशत तक रखा गया। जिसमें करीब दस प्रतिशत
कराधान तथा शेष बजट घाटे का है। यह अनुपात कुछ वर्षों पहले करीब 17 प्रतिशत हो चला था। इसे बढ़ाने के बदले घटाया गया है। इसे पूरा करने के लिए भी विनिवेश (यानी सामाजिक सम्पत्ति कर निजी हाथों में हस्तांतरण तथा दीर्घ स्थायी परिसम्पत्तियों को बेचकर उससे चालू खर्चों पर लगाना यानी असामाजिकता और अदूरदर्शिता का कष्टकर संयोग) द्वारा करीब 435 अरब रूपये की उगाही की तजबीज है। कुल राजस्व में 17.7 प्रतिशत वृद्धि की आशा महंगाई की बढ़ी दर पर टिकी है। जिस पर सरकार नियंत्रण करने में विफल हो रही हैं।
    ये सब कदम है व्यवसाय और व्यवसायिक यानी बिजनेस परस्ती या मित्रता के। ये व्यवसायी, खास तौर पर कारपोरेट व्यवसायी बमुश्किल देश के सर्वोच्च आय और सम्पत्ति तथा शासन पर हावी लोग हमारी जनशक्ति, हमारे जन मन गण के एक प्रतिशत के करीब होंगे। इनकी वर्तमान स्थिति को लगातार मजबूती देते कहकर यह परिकल्पना करना कि 99 प्रतिशत लोगों खास तौर पर करीब तीन चैथाई लोगों का सापेक्ष और निरपेक्ष विकास, सामाजिक समावेशन और शक्तिकरण हो जाएगा बालू का भुतहा महल बनाने जैसा शेख चिल्लीपन है।
    लगता है राजग दो सरकार भी निजी सार्वजनिक साझीदारी (पीपीपी) के जरिए अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के ख्वाब देख रही है। यहाँ तक कि चालू सरकारी स्कूलों तक को व्यापारी वर्ग को सौंपने की तैयारी हो रही है। राज्य के साथ मिलकर अब बड़ी-बड़ी विशाल पूँजी तथा वित्त जुटाने में समर्थ तबके आर्थिक और सामाजिक भूमिका के केन्द्र में हांेगे। परन्तु सरकार भूल रही है कि पीपीपी की बेहिसाब बढ़ोत्तरी ने आय और सम्पत्ति के केन्द्रीयकरण रूपी कुप्रभावों को बढ़ाया है। इससे सामाजिक राजनैतिक शक्ति के वितरण में भी विषमता का दंश बढ़ा है। गृहस्थ, बैंक तथा वित्तीय क्षेत्र की बचत को उधार लेकर बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ राज्य के अधिकारों पर काबिज होती हैं। सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात संचार आदि सार्वजनिक सेवाओं को पूर्णतः निजी हाथों में दे दिया है। इस तरह की निजी दुकानों ने सामाजिक समस्याओं की जड़ों को पहले ही अतिरिक्त मजबूती दे दी है। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के साम्यकारी रूप से अर्द्धशिक्षित, निजी शिक्षक और व्यापारी कुलपति अपने पैरों तले कुचल रहे हैं। चिकित्सा के नाम पर निर्धन की सम्पत्तियों की कुर्की हो रही है। सरकार ने अपने बजट में इन असमानताओं को दूर करने के कोई प्रयास नहीं किए हैं, बल्कि इन्हें प्रोत्साहित ही किया है।
    लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार भी पूँजीपतियों के हाथों का खिलौना प्रतीत होती है। सारे विकल्प नागनाथ और साँपनाथ के बीच चयन तक सिमट जाते हैं। गैर बराबरीमय भूमंडलीकरण इन असमानताओं को आगे बढ़ाता है।
    सामाजिक सुरक्षा के लिए बीमा व्यवसाय में भी तेज मुनाफे खोजे जा रहे हैं। इसके लिए हवा के झोंकों की तरह इधर उधर भागती सट्टोरी विदेशी वित्तीय पूँजी  को बड़ी भूमिका दी जा रही है। कराधान, कर कानूनों में छिद्र, उनकी उपेक्षा तथा कर कानून और प्रशासन में रिश्वतखोरी से पूँजीपतियों को बच निकलने के कई रास्ते मिल जाते हैं। इन मुट्ठी भर लोगों का राष्ट्रीय आय, सम्पत्ति और सुविधाओं के अकल्पनीय बड़े भाग (लगभग 60 से 70 प्रतिशत तक) पर कब्जा सा हो गया हैं। हमारे आर्थिक वित्तीय नीतिगत सोच पर पश्चिमी देश और उनके द्वारा चयनित स्थानीय पंडितों ने पूरी तरह कब्जा कर रखा है। हम भूल गए हैं कि वर्ष 2008 में धनी पश्चिमी देशों की आर्थिकी कैसे धाराधायी हुई थी। फिर जन  धन की बलि चढ़ाकर उसे उबारा गया था। अफसोस कि पिछले 67 सालों से हर बजट की प्रकृति विषमता वर्धक रही है। लोकतांत्रिक शासक बदल रहे हैं। शासक वर्ग का ब्राण्डनेम बदल रहा है लेकिन असमानता बदस्तूर जारी है। नई सरकार यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, सही खान पान, पर्यावरण तथा छोटे उद्योगों के संरक्षण पर ध्यान दे, गरीबों की जमीन को पूँजीपतियों के हाथों से बचाए तो उनके जीवन के कष्ट कम हो सकते हैं। सबके विकास से ही मजबूत अर्थव्यवस्था की परिकल्पना की जा सकती है।   
   -कमल नयन काबरा
  मोबाइल: 09013504389
लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित

सोमवार, 6 अक्टूबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-17

दलित बहुजन राजनीति की ओर
      दलित सेना से निकाले जाने के बाद मेरे लिए अगला स्वाभाविक ठिकाना बहुजन समाज पार्टी और उस जैसी सोच रखने वाले संस्था, संगठन थे, मैं अपने आपको अब वैचारिक रूप से इन्हीं के करीब पाता था, मैंने सोच रखा था कि किसी दिन अगर मैं सक्रिय राजनीति का हिस्सा बनूँगा तो उसकी शुरुआत बसपा से ही होगी, बसपा उन दिनों मेरे लिए एक सामाजिक आन्दोलन थी, मेरे एक मित्र आर0पी0 जलथुरिया के घर बहुजन संगठक नामक अखबार आता था, मैं उसे नियमित रूप से पढ़ता था, बसपा सुप्रीमों मान्यवर कांशीराम के प्रति मन में बहुत अधिक सम्मान भी था, उनके द्वारा सोई हुई दलित कौमों को जगाने के लिए किए जा रहे प्रयासों का मैं प्रशंसक और समर्थक था, तिलक तराजू और तलवार को जूते मारने की बात मुझे अपील करती थी। उस वक्त का मीडिया आज जितना ही दलित विरोधी था, मान्यवर मीडिया के इस चरित्र का बहुत ही सटीक और सरल विश्लेषण करते हुए कहते थे कि मीडिया कभी भी बहुजन समर्थक नहीं हो सकता है, उसमें बनिए का पैसा और ब्राह्मण का दिमाग लगा हुआ है, अगर हम देखें तो हालात अब भी जस के तस ही है, अभी भी अधिकांश मीडिया हाउस के मालिक वैश्य हैं और संपादक ब्राह्मण।
    कांशीराम को तत्कालीन मीडिया अक्सर एक अवसरवादी और जातिवादी नेता के रूप में पेश करता था, अवसरवाद पर बोलते हुए उन्होंने एक बार कहा था-हाँ मैं अवसरवादी हूँ और अवसर ना मिले तो मैं अवसर बना लेता हूँ समाज के हित में और वाकई उन्होंने बहुजनों के लिए खूब सारे मौके बनाए, उनके द्वारा दिए गए नारों ने उन दिनों काफी हलचल मचा रखी थी, मनुवाद को उन्होंने जमकर कोसा, जयपुर में हाईकोर्ट में खड़े मनु की मूर्ति को हटाने के लिए भी उन्होंने अम्बेडकर सर्कल पर बड़ी मीटिंग की, हम भीलवाड़ा से पूरी बस भर कर लोगों को लाए, मान्यवर की पुस्तक चमचा युग भी पढ़ी, उसमें चमचों के विभिन्न प्रकार पढ़कर आनंद आया, चमचों का ऐसा वर्गीकरण शायद ही किसी और ने किया होगा, वाकई कांशीराम का कोई मुकाबला नहीं था। बाबा साहब अम्बेडकर के बाद उन्होंने जितना किया, उसका आधा भी बहन कुमारी कर पातीं तो तस्वीर आज जितनी निराशाजनक है शायद नहीं होती, पर दलित की बेटी दौलत की बेटी बनने के चक्कर में मिशन को ही भुला बैठी।
    मुझे मान्यवर से 5 बार मिलने का अवसर मिला, उनकी सादगी और समझाने के तरीके ने मुझे प्रभावित किया, वे जैसे थे, बस वैसे ही थे, उनका कोई और चेहरा नहीं था, तड़क भड़क से दूर, मीडिया की छपास लिप्सुता से अलग, लोगों के बीच जाकर अपनी बात को समझाने का उनका श्रम
साध्य कार्य मेरी नजर में वन्दनीय था, मैं उनकी बातों और नारों का तो दीवाना ही था, ठाकुर ब्राह्मण बनिया को छोड़कर सबको कमेरा बताना और इन्हें लुटेरा बताने का साहस वो ही कर सकते थे, ये मान्यवर कांशीराम ही थे जिन्होंने कांग्रेस को साँपनाथ, भाजपा को नागनाथ, जनता दल को सँपोला और वामपंथियों को हरी घास के हरे साँप निरूपित किया था, बसपा सपा गठबंधन सरकार के शपथ ग्रहण के वक्त लगा नारा-मिले मुलायम कांशीराम, भाड़ में जाए जय श्रीराम, उस वक्त जितना जरुरी था, आज भी उसकी उतनी ही या उससे भी अधिक जरूरत महसूस होती है।
   चूँकि मेरा प्रारम्भिक प्रशिक्षण संघी कट्टरपंथी विचारधारा के साथ हुआ इसलिए चरमपंथी विचारधारा मुझे तुरंत लुभा लेती थी, उदारवादी और गांधीवादी टाइप के अम्बेडकरवादियों से मुझे कभी प्रेम नहीं रहा, समरसता, समन्वयन और भाईचारे की फर्जी बातों पर मेरा ज्यादा यकीन वैसे भी नहीं था, इसलिए मान्यवर जैसे खरी खरी कहने वाले व्यक्ति को पसंद करने में मुझे कोई दिक्कत नहीं थी, एक और बात जो उनकी मुझे पसंद आती थी वह यह थी कि वे कभी किसी की चमचागीरी नहीं करते दिखाई पड़े, याचक सा भाव नहीं, बहुजनों को हुक्मरान बनाने की ललक और उसके लिए जीवन भर का समर्पण, इसलिए मैं सदैव ही कांशीराम को पसंद करता रहा और आज भी अपनी सम्पूर्ण चेतना के साथ उन्हें आदर देता हूँ। मेरी उनसे आखिरी मुलाकात चित्तौड़गढ़ के डाक बंगले में हुई, वे गाडि़या लोहारों के सम्मेलन को संबोधित करने आए थे, उन्होंने कहा कि मैं चाहता हूँ की राजस्थान में कोई मेघवाल मुख्यमंत्री बने, मैं उन्हें राजा बनाने आया हूँ, लेकिन मान्यवर की इस इच्छा को परवान चढ़ाने के लिए बसपा कभी उत्सुक नहीं नजर आई, जो लीडरशिप इस समुदाय से उभरी शिवदान मेघ, भोजराज सोलंकी अथवा धरमपाल कटारिया के रूप में, उसे भी किसी न किसी बहाने बेहद निर्ममता से खत्म कर दिया गया, मैंने देखा कि ज्यादातर प्रदेश प्रभारी बहन जी उतर प्रदेश से ही भेजती हैं जिनका कुल जमा काम राजस्थान से पार्टी फण्ड, चुनाव सहयोग और बहन जी के बर्थ डे के नाम पर चंदा इकट्ठा करना रहता है,
जब तक मान्यवर कांशीराम जिंदा और सक्रिय रहे, तब तक बसपा एक सामाजिक चेतना का आन्दोलन थी ,उसके बाद वह जेबकतरों की पार्टी में तब्दील होने लगी, जिधर नजर दौड़ाओ उधर ही लुटेरे लोग आ बैठे, बातें विचारधारा तथा मिशन की और काम शुद्ध रूप से लूट-पाट। सेक्टर प्रभारी से लेकर बहनजी तक जेब गरम ही बसपा का खास  धरम हो गया, धन की इस वेगवान धारा में विचारधारा कब बह कर कहाँ जा गिरी, किसी को मालूम तक नहीं पड़ा, आज भी यह प्रश्न अनुत्तरित है कि बसपा नामक विचारधारा का आखिर हुआ क्या?
            तिलक तराजू और तलवार को चार-चार जूते मारने वाले उन्हीं  तिलक धारियों के जूते और तलुवे चाटने लग गए, बसपा का हाथी अब मिश्रा जी का गणेश था, मनुवाद को कोसने वाले अब ब्राह्मण भाईचारा सम्मेलनों में शंखनाद कर रहे थे और पूरा बहुजन समाज बहनजी की इस कारस्तानी को सामाजिक अभियांत्रिकी समझ कर ढपोरशंख बना मूक दर्शक बना हुआ था, किसी की मजाल जो दलित समाज की नई नवेली इस तानाशाह के खिलाफ सवाल उठाने की हिम्मत करता? बसपा अब द्विजों को जनेऊ बाँटने का गोरखधंधा भी करने लगी थी, दलितों को बिकाऊ नहीं टिकाऊ होने की नसीहत देने वाली पार्टी के चुनावी टिकट सब्जी मंडी के बैगनों की भाँति खुले आम बिकने लगे, पैसा इकट्ठा करना ही महानतम लक्ष्य बन चुका था, बर्थ डे केक, माथे पर सोने का ताज और लाखों रूपए की माला पहन कर बहनजी मायावती से मालावती बन बैठीं, बहुजन समाज स्वयं को ठगा सा महसूस करने लगा, सामाजिक परिवर्तन के एक जन आन्दोलन का ऐसा वैचारिक पतन इतिहास में दुर्लभ ही है, मैं जिस उम्मीद के साथ बसपा में सक्रिय हुआ, वैसा कोई काम वहाँ था ही नहीं, वहाँ कोई किसी की नहीं सुनता है, बहन जी तो कथित भगवानों की ही भाँति अत्यंत दुर्लभ हस्ती हैं , कभी कभार पार्टी मीटिंगों में दर्शन देतीं, जहाँ सिर्फ वे कुर्सी पर विराजमान होतीं और तमाम बहुजन कार्यकर्ता उनके चरणों में बैठ कर धन्य महसूस करते, बसपा जैसी पार्टी में चरण स्पर्श जैसी ब्राह्मणवादी क्रिया नीचे से ऊपर तक बेहद पसंद की जाती है, जो जो चरनागत हुए वे आज तक बहन जी के शरनागत है, शेष का क्या हाल हुआ, उससे हर कोई अवगत है, जो भी बहन जी को चमकता सितारा लगा, उसकी शामत आ गयी, बोरिया बिस्तर बँध गए, सोचने समझने की जुर्रत करने वाले लोग गद्दार कहे जा कर मिशनद्रोही घोषित किए गए और उन्हें निकाल बाहर किया गया, हालत इतने बदतर हुए कि हजारों जातियों को एकजुट करके बनी बहुजन समाज पार्टी सिर्फ ब्राह्मण चमार पार्टी बन कर रह गई, मान्यवर कांशीराम रहस्यमय मौत मर गए और धीरे-धीरे बसपा भी अपनी मौत मरने लगी, उसका मरना जारी है। सामाजिक चेतना के एक आन्दोलन का इस तरह मरना निःसंदेह दुख का विषय है पर किया ही क्या जा सकता है, जहाँ आलोचना को दुश्मनी माना जाता हो और कार्यकर्ता को पैसा उगाहने की मशीन, वहाँ विचार की बात करना ही बेमानी है, मैं बसपा का सदस्य तो रहा और मान्यवर ने मुझे राष्ट्रीय कार्यकारिणी के लिए भी नामित किया, लेकिन मैं कभी भी आचरण से बसपाई नहीं हो पाया, मुझमें वह क्षमता ही नहीं थी, यहाँ भी लीडर नहीं डीलर ही चाहिए थे, जिन कारणों ने पासवान जी से पिंड छुड़वाया वे ही कारण बहनजी से दूर जाने का कारण बने, दरअसल जिस दिन कांशीराम मरे, उस दिन ही समाज परिवर्तन का बसपा नामक आन्दोलन भी मर गया, मेरे जैसे सैंकड़ों साथियों के सपने भी मर गए, उस दिन के बाद ना मुझे बसपा से प्यार रहा और ना ही नफरत।
 -भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित
  मोबाइल: 09571047777

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-16

रामविलास या भोगविलास
    दलित साहित्य का पठन पाठन निरन्तर जारी था, अब मैंने दलित समुदाय के सामाजिक एवं राजनैतिक कार्यकर्ताओं से भी मिलना जुलना प्रारम्भ कर दिया था, उन्हीं दिनों मुझे न्यायचक्र नामक पत्रिका पढ़ने को मिली, जिसे दलित नेता रामविलास पासवान सम्पादित करते थे, उस अंक के कवर पर लिखा उद्धरण मुझे बहुत अच्छा लगा, जिसमें पासवान कहते हैं कि ‘मैं उन घरों में दिया जलाने चला हूँ, जिनमें सदियों से अँधेरा है, मैंने सोचा, मुझे भी तो ऐसी ही आँखों से आँसू पोछने हैं जिनमें बरसों से आँसुओं के अलावा कुछ भी नहीं है, इस तरह तो पासवान जी और मेरी राह एक ही है, मैंने राम विलास पासवान से मिलने की ठान ली, और एक दिन मैं उनके 12 जनपथ, नई दिल्ली स्थित निवास पर जा पहुँचा, काफी प्रयास के बाद उनसे मुलाकात हो पाई। मैं दिखने में तो आज की तरह ही दुबला-पतला बिल्कुल बच्चे जैसा था, मेरी बातों पर वे यकीन ही नहीं कर पा रहे थे कि मैं आर0एस0एस0 जैसे विशाल अर्द्धसैनिक संगठन से अकेले लोहा ले रहा हूँ, जब मैंने उन्हें अपने द्वारा सम्पादित ‘ दहकते अंगारे ‘की खबरें और अपने नाम से विभिन्न अखबारों में छपे आलेख दिखाए तब उन्हें यकीन होने लगा, उनकी आँखों में विश्वास और प्रशंसा के भाव एक साथ ही दिखाई पड़े, इस मुलाकात का फायदा यह हुआ कि मैं मात्र 20 वर्ष की आयु में ही दलित सेना का भीलवाड़ा जिले का अध्यक्ष बना दिया गया, मैंने दलित सेना में रहते हुए जमकर काम किया, कई दलित चेतना शिविर आयोजित किए, रैलियों में जयपुर से लेकर प्रगति मैदान तक भीड़ लेकर गया, मेम्बरशिप में भी हमारा जिला काफी आगे रहा, नतीजतन पासवानजी मेरे काम से काफी खुश हुए और 1996 में जब वे रेल मंत्री बने तो उन्होंने मुझे पश्चिमी रेलवे का सलाहकार बना दिया। मंत्री रहते हुए पासवान और उनके नजदीकी दलित नेताओं की कार्यशैली और व्यवहार काफी बदल गए, जिस क्रांतिकारी दलित नेता रामविलास पासवान से मैं मिला और जिसके विचारों से मैं प्रभावित हुआ था, अब सत्ता की चकाचैंध और उनके आसपास उग आए दलालों ने उन्हें बिल्कुल ही बदल डाला था, पूरा राजनैतिक सामाजिक परिदृश्य ही बदल गया था, हर कोई भारतीय रेलवे को लूट खाने में लग गया, राम नाम की लूट मची हुई थी, दलित सेना के कई नेता जो रेलवे भर्ती बोर्ड के सदस्य बने हुए थे, भर्तियों के नाम पर खुल्लमखुल्ला पैसा बटोर रहे थे, छोटे-मोटे सब नेता अपनी अपनी क्षमता जितना लूटने में लगे थे, जिसे कुछ नहीं मिल सकता था, वे रेलवे में छोटे-मोटे ठेके ही लेने की कोशिश में लगे थे, रेलवे भवन से लेकर प्रत्येक रेलवे स्टेशन तक हर तरफ सिर्फ धन का साम्राज्य फैला हुआ था, अब दलित सेना में जय भीम सिर्फ एक नारा था, जो पैसा बटोर कर ला सके और दलाली कर सके वही कार्यकर्ता सबसे प्यारा था, मैं आया तो यहाँ मिशन के लिए था, पर हमारे मसीहाओं को तो कमीशन खाने से ही फुरसत न थी, मेरा यहाँ भी दम घुटने लगा, मुझे अपने आप पर ही शक होने लगा कि हर जगह मैं इतना जल्दी क्यों ऊबने लगता हूँ, कहीं पर भी फिट क्यों नहीं हो पाता हूँ, अब यहाँ तो सब लोग अपने ही हैं फिर भी सवाल उठने लगे कि मैं यहाँ क्यों हूँ? मैं यहाँ लीडरशिप करने आया था पर यहाँ तो डीलरशिप करने की जरूरत पड़ रही है, क्या मैं लोगों से पैसा बटोर-बटोर कर दिल्ली ले जाने का काम कर पाऊँगा ,मैं उन लोगों से नजरें कैसे मिलाऊँगा, जिनकों मैं बड़ी-बड़ी सैद्धांतिक बातें समझाता रहा हूँ, यह कैसा दीपक है जिसे मैं जलाने चला हूँ, इससे मैं किसी का घर रोशन कर पाऊँगा या उनका घर ही जला बैठूँगा, सैंकड़ों सवाल मेरे मन मस्तिष्क में उमड़ने लगे, एक बार फिर मैं बैचेनी और अवसाद का शिकार होने लगा था, मुझसे रहा नहीं गया, मैंने दलित मसीहा रामविलास पासवान की राजसी जीवनशैली और उनके इर्द गिर्द के चमचानुमा नेताओं द्वारा इकट्टा की जा रही अकूत धन सम्पदा पर एक सम्पादकीय दहकते अंगारे में लिख डाला, जिसका शीर्षक था ‘रामविलास या भोगविलास‘ ?
      बस फिर क्या था, मुझे इस अपराध की तुरंत सजा दी गई, दलित सेना के राजस्थान प्रदेश के तत्कालीन अध्यक्ष ने मुझे अनुशासनहीनता के आरोप में जिलाध्यक्ष के पद से हटा दिया और प्राथमिक सदस्यता से भी निकाल बाहर किया, मैंने भी दलितों की इस दलाल सेना से बाहर हो जाने में ही अपनी भलाई समझी, कभी वापसी के बारे में नहीं सोचा, दलित सेना से निकाले जाने के लगभग 15 साल बाद अन्ना हजारे के आन्दोलन के साम्प्रदायिक चरित्र पर मेरे द्वारा उठाए गए सवालों को पढ़कर लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव खालिक साहब ने मुझे वर्ष 2012 में अपनी पार्टी के कैडर को
संबोधित करने के लिए सोमनाथ आमंत्रित किया, तब मंच पर पासवान और उनकी मंडली से पुनः मुलाकात हुई, बीच के दिनों में वे एन0डी0ए0 सरकार में मंत्री रह लिए थे, फिर गुजरात में किए गए अल्पसंख्यकों के एकतरफा नरसंहार को मुद्दा बनाकर वे राजग का डूबता जहाज छोड़ भागे छूटे, बाद में बिहार में मुस्लिम मुख्यमंत्री का मुद्दा बनाए डोलते फिरे, असफल रहे। अंततः हाल ही में राजनाथ सिंह के पाँव पड़कर वापस राजग का हिस्सा बन बैठे, कभी मोदी को गुजरात नरसंहार के लिए दोषी बताने वाले रामविलास पासवान अब उन्हें पाप मुक्ति का प्रमाण पत्र बाँट रहे थे, अंततः अपना और अपने खानदान और अपनी जेबी पार्टी एल0जे0पी0 का भविष्य सँवारने के लिए तमाम पिछली बातों को भुला कर अपना ही थूँका हुआ चाटकर वे मोदी के शरणागत हो गए, गठबंधन में जीत कर आ गए और अब खाद्य एवं आपूर्ति मामलों के मिनिस्टर बन कर सत्ता का उपभोग करने को तत्पर हैं।
    सत्ता की मछली थे, कुर्सी लिप्सुओं से मिलकर अब बेहद खुश हैं , अम्बेडकर के नाम और मिशन को बेच खाने में इनका कोई सानी नहीं है। जय भीम कहते-कहते जय सियाराम का जाप करने लगे हैं, समानता के प्रतीक नीले दुपट्टे की जगह गले में विषमता पैदा करने वाला भगवा पट्टा डाल कर ये फर्जी दलित मसीहा फिर हमारे आपके बीच आने वाले हंै, इन्हें जवाब देना कबीर, फुले अम्बेडकर के अनुयायियों का काम है, समाज को छोड़कर जो राज की ओर चले जाते हंै और सत्य के स्थान पर सत्ता को प्रमुखता दे देते हैं , वे बड़े से बड़े तिकड़मबाज तो हो सकते हंै, मगर हमारे मसीहा नहीं हो सकते है। हमें भेड़ की खाल ओढ़े भेडियों को पहचानना हंै, अब वक्त है कि हम अपने दोस्तों और दुश्मनों की शिनाख्त कर लें ।
 -भँवर मेघवंशी
 लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित


शनिवार, 4 अक्टूबर 2014

अमरीका की न तो दोस्ती अच्छी है और ना ही दुश्मनी

मैंने कुछ दिन पहिले एक लेख लिखा था जिसका शीर्षक था ‘‘अमरीका की न तो दोस्ती अच्छी है और ना ही दुश्मनी’’। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अभी हाल की यात्रा के संदर्भ में मैं यह बताना चाहूंगा कि आखिर मैंने यह शीर्षक ही क्यों दिया था? क्या मोदी जी की सफल यात्रा के बावजूद यह तर्क अभी भी प्रासंगिक है? अमरीका की दोस्ती व दुश्मनी दोनों खतरों से भरपूर है।
सबसे पहले स्वयं मोदी के प्रति अमरीकी रवैये को लें। 2002 के गुजरात में हुये दंगे के बाद अमरीका ने मोदी को वीजा देने से इंकार कर दिया था। उसके बाद वे जैसे ही प्रधानमंत्री बने उन्हें न सिर्फ अमरीका में आने की इजाजत दी गई वरन् उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया। क्या प्रधानमंत्री बनते ही वे सब कारण लुप्त हो गये जिनके चलते मोदी का अमरीकी प्रवेश वर्जित कर दिया गया था?
मुझे याद है कि एक समय ऐसा था जब दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार का सारी दुनिया में बहिष्कार होता था। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने सभी राष्ट्रों से बहिष्कार का आव्हान करते हुए एक प्रस्ताव भी पारित किया था। जब तक दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने वहां के मूल निवासियों पर ज्यादतियां करना बंद नहीं कर दिया और अंततः उनके ही हाथों में सत्ता नहीं सौंप दी गई तब तक दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार का बहिष्कार जारी रहा।
इस तरह यह पूछा जा सकता है कि क्या मोदी जी को जिन कारणों से वीजा नहीं दिया गया था, क्या वे समाप्त हो गए थे? यदि मोदी का बहिष्कार किसी सिद्धांत पर आधारित था तो अमरीका को उस पर कायम रहना चाहिए था। ज्योंही मोदी प्रधानमंत्री बने अमरीका का रवैया पूरी तरह से बदल गया।
सच पूछा जाये तो अमरीकी रवैये में परिवर्तन का संकेत उस समय से ही मिलने लगा था जब भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार घोषित किया था और इस बात कि संभावना नजर आने लगी थी कि भारत के अगले प्रधानमंत्री मोदी ही बनेंगे। यदि बारीकी से देखा जाये तो अमरीका का परिवर्तित दृष्टिकोण किसी सिद्धांत नहीं बल्कि अपने खुद के निहित स्वार्थों पर आधारित है। भारत अब एक विशाल बाजार हो गया है। जिस देश के 80 करोड़ निवासियों के पास मोबाइल आ चुके हैं या आने वाले हैं उस देश से कौन व्यापार नहीं करना चाहेगा।
हमारे देश ने बिजली के उत्पादन के लिए अणुशक्ति के कारखाने बनाने का फैसला किया है। इस तथ्य के बावजूद कि जर्मनी, जापान और कुछ हद तक अमरीका स्वयं ने अणुशक्ति आधारित बिजली के उत्पादन के खतरों को महसूस किया है। जापान और जर्मनी ने तो अगले 20 सालों तक के लिए इस तरह के कारखानों को बंद कर दिया है। अब ये कारखाने बेकार पड़े हैं। इसलिए इन कारखानों को दूसरे देशों को बेचना है। भारत बहुत बड़ा बाजार है, जहां इन बंद पड़े कारखानों को खरीदने की अपार संभावनायें हैं। इसलिए जापान ने भी नरेन्द्र मोदी का गर्मजोशी से स्वागत किया। यह एक वास्तविकता है कि देशों के पारस्परिक संबंध राजनैतिक कारणों से ज्यादा, आर्थिक कारणों से संचालित होते हैं।
हम यहां पर अब हमारे देश के प्रति अमरीकी रवैये के इतिहास पर जाना चाहेंगे। हम 1947 में आजाद हुये। इस बात में संदेह नहीं कि अमरीका ने हमें आजाद होने में सहायता की थी और समय-समय पर ब्रिटेन के ऊपर हमें आजाद करने के लिए दबाव बनाया था। परंतु ज्योंही हम आजाद हुये हमारे साथ अमरीका ने लगभग सौतेला व्यवहार करना प्रारंभ कर दिया। आजादी के तुरंत बाद जवाहरलाल नेहरू ने अणुशक्ति के शांतिपूर्ण उपयोग पर जोर देना प्रारंभ कर दिया था। इसकी संभावना का पता लगाने के लिए नेहरू जी ने हमारे देश के महान अणु वैज्ञानिक डाक्टर भाभा को अमरीका भेजा था। अमरीका में जब डाक्टर भाभा ने इस मुद्दे पर संबंधित लोगों से विचार विमर्श करना प्रारंभ किया तो उनको यह कहकर लगभग अपमानित किया गया कि अणुशक्ति का शांतिपूर्ण उपयोग आपके बस में नहीं है। आप तो खेती करो और प्रगति के बाकी सोपानों को हमारे ऊपर छोड़ दो। अमरीका के इस रवैये से डाक्टर भाभा इतने दुःखी हुये कि बताया जाता है कि उनकी आंखों में आंसू आ गये।
उसके बाद अमरीका ने न तो हमारे देश के औद्योगिक विकास में मदद की और ना ही हमारे देश में प्रजातंत्र की जड़ें मजबूत करने में सहायता की। लगातार अमरीका ने पड़ौसी देश पाकिस्तान को हमारे विरूद्ध भड़काया और पाकिस्तान को लगातार हथियारों की सहायता देते रहे। अमरीकी सहयोग के कारण ही पाकिस्तान ने 1965 में हमसे युद्ध किया। इस दरम्यान दुनिया में समाजवादी खेमा बहुत मजबूत हो गया था। सोवियत संघ को दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शक्तिशाली देश माना जाता था। सोवियत संघ ने भारतवर्ष समेत दुनिया के उन तमाम राष्ट्रों को खुले दिल से सहायता दी जो द्वितीय महायुद्ध के बाद विभिन्न साम्राज्यों के चंगुल से आजाद हुये थे। इनमें एशिया और अफ्रीका के अनेक देश शामिल थे। सोवियत संघ ने हमें सबसे पहला इस्पात का कारखाना दिया जो उस समय के मध्यप्रदेश के भिलाई नामक एक गांव में स्थापित किया गया। रक्षा, तेल का शोधन, दवाईयों का उत्पादन, ऐसा कोई भी क्षेत्र नहीं था जिसमें सोवियत संघ ने हमारी मदद न की हो।
अमरीका को दुनिया का सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश माना जाता है। परंतु दुःख की बात है कि अमरीका ने दुनिया के नव आजाद देशों में लोकतंत्र व्यवस्था मजबूत करने में कतई सहायता नहीं की। उसने एक के बाद एक एशिया और अफ्रीका के देशों पर तानाशाहों को लादा। इन देशों के लोकप्रिय नेताओं को अमरीका ने या तो कमजोर किया या उनकी हत्या करवा दी। इस बात को कैसे भुलाया जा सकता है कि अफ्रीका के अत्यधिक लोकप्रिय नेता पेट्रिस लुम्मबा की हत्या अमरीका ने करवायी थी और उसके बाद वर्षों तक कांगो का शासन एक अत्यधिक यातताई तानाशाह के हाथों में सौंप दिया। अपनी विभिन्न नीतियों के सहारे मिश्र में नासर को कमजोर किया, इण्डोनेशिया में सुकर्णो की सत्ता में सेंध लगाई, पाकिस्तान में भी प्रजातंत्र को मजबूत नहीं होने दिया। वहां भी प्रथम प्रधानमंत्री लियाकत अली की हत्या हुई। फिर सैनिक शासक फील्ड मार्शल अय्यूब को 10 साल तक समर्थन दिया। पाकिस्तान में भी एक के बाद एक लोकप्रिय नेताओं की हत्यायें हुईं। अफगानिस्तान में कम्युनिस्टों का शासन स्थापित हो गया था, जिसके चलते वहां के निवासियों को अनेक भौतिक सुविधाओं प्राप्त हुईं थीं, महिलाओं को आजादी मिली थी, स्कूलों और अस्पतालों में तमाम प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध हो गईं थीं। चूंकि अफगानिस्तान सोवियत संघ के पड़ौस में था इसलिये उस देश की प्रगतिशील सरकार का तख्ता उलटने के लिए अनेक प्रकार के षडयंत्र किये गये और तालिबान की नींव डाली गई। अमरीका की पूर्व विदेश मंत्री हैलेरी क्लींटन ने स्वयं स्वीकार किया है कि हमने अफगानिस्तान में तालिबान को बढ़ावा दिया था। तालिबानों की ताकत बढ़ने से अफगानिस्तान नरक बन गया। तालिबानियों ने महिलाओं का घर से निकलना भी
प्रतिबंधित कर दिया। उन्हंे अस्पतालों, स्कूलों में भी काम नहीं करने दिया गया और उनसे कहा गया कि यदि वह बाहर निकलें तो सिवा उनके पैरों के अलावा शरीर का और कोई भी अंग नहीं दिखना चाहिए। अनेक वर्षों से वहां तबाही मची हुई है। दिन-रात आतंकवादी वहां निर्दोषों को मारते हैं।
लगभग यही हाल ईराक में भी है। अमरीका ने ईरान पर हमला करने के लिए सद्दाम हुसैन की सहायता ली। उन्हें हथियार दिये, डाॅलर दिये और 10 वर्षों तक ईरान से लड़वाया। जब सद्दाम हुसैन आत्मनिर्भर बन गये और अमरीका का पिछलग्गू बनने से उन्होंने इंकार कर दिया तो उनके खिलाफ ईराक में विद्रोह करवाया और बाद में झूठे आरोप लगाकर उन्हें फांसी की सजा दी गई। आज उसी ईराक में जो हालत है वह अराजकता से भी बदतर है।
अनुभव बताते हैं कि अमरीका की नीति है ‘‘यूज एण्ड थ्रो’’। देखना यह है कि मोदी और मोदी सरकार के साथ भविष्य में उनका रवैया कैसा रहता है। इस समय अमरीका की कोशिश है कि भारत को पूरी तरह से इजरायल की गोदी में बैठा दिया जाये और सारे अरब देशों से हमारे संबंधों में कड़वाहट पैदा करवा दी जाये। हमारी विदेशनीति की परंपरा के अनुसार वर्षों से हमने फिलीस्तीन का साथ दिया है। अमरीका हमें इस तरह पूरे अरब और मध्य पूर्व देशों से अलग-थलग करना चाहता है। लगता है ऐसा करवाने में मोदी पूरी तरह तैयार हैं। दीर्घकाल में इससे हमारा कितना लाभ होगा यह एक सोचने की बात है।
-एल.एस. हरदेनिया

शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2014

मूर्तियों के विसर्जन के बहाने गुंडागर्दी

दरोगा जी खूब पिटे प्रशासन भी साथ ना आया
दरोगा जी खूब पिटे प्रशासन भी साथ ना आया

उत्तर प्रदेश में आज दुर्गा पूजा के बाद जगह जगह मूर्ति विसर्जन का कार्यक्रम चल रहा है इस धार्मिक उत्सव में अराजक तत्वों के हौसले बुलंद है. जगह जगह सड़क पर चल रहे वाहनों के ड्राईवरओ  से मार पीट की जा रही है . अपशब्दों का प्रयोग किया जा रहा है . जुलूस में चल रहे असामाजिक तत्व मारपीट भी कर रहे हैं . बाराबंकी के जहांगीराबाद थाना इंचार्ज सुजाऊदीन के साथ क्षेत्र पंचायत सदस्य उमाकांत यादव ने मार पीट की जिससे थाना इंचार्ज के पूरे शरीर में गंभीर चोटें आई हैं उनका डाक्टरी मुआयना भी नहीं कराया गया है . पुलिस अधीक्षक ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए तुरंत थाना इंचार्ज को निलंबित कर दिया है जिससे अराजक तत्वों के हौसले और बुलंद हो गए हैं . यह अराजक तत्व हिन्दू धार्मिक उत्सवों पर अपनी गुंडागर्दी को चमकाने के लिए बाहर की जनता से व फ़ोर्स पर हमलावर होते हैं . प्रशासन शांतिपूर्वक कार्यक्रम हो जाए इसके लिए इनके आगे नतमस्तक रहता है . बाराबंकी का प्रशासन भी इसी तरह से पूर्णतया गुंडों और मवालियों के आगे नतमस्तक रहा है . धार्मिक उत्सवों में डी जे तथा शराब पीना कहीं से भी जायज नहीं है .

सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 29 सितंबर 2014

समाचारपत्र या चैनल,ठाकरे या शिवसेना के विरूद्ध लिखता है, उसके दफ्तरों पर हमले


महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का गठबंधन टूट गया है। गठबंधन सीटों के बंटवारे को लेकर टूटा है। शिवसेना, जैसा कि सभी जानते हैंए एक अत्यधिक दकियानूसी संगठन है। वैसे भी यह आश्चर्य की बात है कि एक संगठन,जिसके नाम से 'सेना' शब्द जुड़ा हो वह राजनीतिक पार्टी कैसे हो सकता है?उससे भी बड़ा आश्चर्य यह है कि चुनाव आयोग ने एक 'सेना'  को राजनैतिक पार्टी के रूप में मान्यता प्रदान कर रखी है।
शिवसेना की स्थापना बालासाहेब ठाकरे ने की थी। राजनीति में प्रवेश के पहले,ठाकरे मुंबई के एक अखबार में बतौर कार्टूनिस्ट सेवारत थे। अपने संगठन का नाम उन्होंने शिवाजी के नाम पर रखा था। यहां यह स्मरण दिलाना प्रासंगिक होगा कि राज्य पुनर्गठन आयोग ने वैसे तो भाषा.आधारित राज्यों के गठन की सिफारिश की थी परंतु महाराष्ट्र और गुजरात को एक ही राज्य रहने दिया था, इसका जोरदार विरोध महाराष्ट्र और गुजरात में हुआ। महाराष्ट्र में विरोध अपेक्षाकृत ज्यादा आक्रामक था और उसने अनेक स्थानों पर हिंसक रूप ले लिया था। यद्यपि महाराष्ट्र के निर्माण की मांग करने वाली समिति में कांग्रेस को छोड़कर, सभी राजनीतिक दल शामिल थे परंतु इस आंदोलन के दौरान एक संकुचित भाषा.आधारित विचार ने जन्म लिया था। महाराष्ट्र के निर्माण के लिए बनी समिति के नेताओं में प्रोफेसर पी.के. अत्रे भी शामिल थे। वैसे तो वे एक महान साहित्यकार थे परंतु उन्होंने आंदोलन के दौरान कुछ ऐसी बातें कहीं जिससे महाराष्ट्र आंदोलन ने एक काफी संकुचित रूप ले लिया। प्रोफेसर अत्रे ने अनेक अवसरों पर कहा कि भारतवर्ष के राज्यों में इतिहास तो सिर्फ महाराष्ट्र का है बाकी राज्यों का तो मात्र भूगोल है। सच पूछा जाये तो बालासाहेब ठाकरे ने इसी तरह के विचारों से प्रेरित होकर शिवसेना की स्थापना की थी। वैसे बालासाहेब ठाकरे शिवसेना को एक हिंदुत्ववादी पार्टी मानते थे। परंतु मेरी राय में शिवसेना वास्तव में एक हिंदू.विरोधी पार्टी है। शिवसेना का एक प्रमुख नारा है 'मुंबई में सिर्फ मराठी भाषी ही रह सकते हैं'। इस नारे के चलते शिवसैनिकों ने अनेक बार मुंबई में रहने वाले गैर मराठी भाषा.भाषी नागरिकों पर हिंसक हमले किए। मुंबई में मराठी भाषियों की संख्या भले ही ज्यादा हो परंतु मुंबई को देश की सबसे बड़ी औद्योगिक और व्यवसायिक नगरी बनाने में गैर मराठी भाषा.भाषियों का भी योगदान है। मुंबई हर दृष्टि से उतना ही कास्मोपोलिटन शहर है जितना कि न्यूयार्क, लंदन और पेरिस हैं। इसलिए उसे किसी भी हालत में एक ऐसा शहर नहीं बनाया जा सकता जिसमें एक ही भाषा बोलने वाले रह सकें। मुंबई में देश में बोली जाने वाली सभी भाषाओं के प्रतिनिधि रहते हैं। वास्तव में मुंबई एक लघु भारत ही है। जब यह नारा लगाया जाता है कि मुंबई में सिर्फ मराठी भाषी रह सकते हैं और जो मराठी भाषी नहीं उन्हें मुंबई छोड़ देना चाहिए तो इस नारे का सर्वाधिक प्रतिकूल असर हिंदुओं पर ही पड़ता है। उत्तरप्रदेश के हिंदू, मुंबई के नागरिकों को दूध पिलाते हैं, उत्तरप्रदेश और बिहार के हिंदू मुंबई में टैक्सी और ऑटो चलाते हैं। ये सब ऐसे हिंदू हैं जो रोजी.रोटी के लिए मुंबई आते हैं और अपने असाधारण श्रम से मुंबई को जिंदा रखते हैं। ऐसे हिंदू.विरोधी संगठन से भारतीय जनता पार्टी का नाता वैसे भी अस्वाभाविक था।
भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा है। संघ का कहना है कि वह हिंदुओं की रक्षा के लिए और हिंदुओं की एकता के लिए समर्पित है। इस उद्देश्य को हासिल करने की राजनीतिक जिम्मेदारी, भारतीय जनता पार्टी को सौंपी गई है। शिवसेना के साथ हाथ मिलाकर यह जिम्मेदारी कैसे पूरी की जा सकती है? यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर ढूंढना अनिवार्य है।
इस तरहए सच पूछा जाये तो भाजपा को चुनाव में सीटों के बंटवारे को लेकर ही नहीं, बल्कि वैचारिक आधार पर भी, शिवसेना से अपना संबंध पहले ही तोड़ लेना चाहिए था। फिर,शिवसेना की कुछ ऐसी गतिविधियां भी हैं जो भाजपा के एजेण्डे में नहीं हैं। जैसे.शिवसेना कहती है कि मुंबई में पाकिस्तान की किक्रेट टीम को हम खेलने नहीं देंगे, पाकिस्तानी फिल्मों का प्रदर्शन नहीं होने देंगे, प्रसिद्ध गजल गायक मेंहदी हसन और गुलाम अली समेत पाकिस्तान के गायकों का कार्यक्रम नहीं होने देंगे। इस तथ्य के बावजूद कि भारत की सबसे महान गायिका लता मंगेश्कर, इन दोनों प्रसिद्ध गजल गायकों की प्रशंसक हैं। हम पाकिस्तान के गायकों को तो गाना नहीं गाने देंगे परंतु प्रसिद्ध अमरीकी गायक माइकल जैक्सन को गाने की इजाजत देंगे। इसके अलावाए शिवसेना का घोषित एजेण्डा मुस्लिम.विरोधी भी है। जब 1992 में मुंबई में दंगे हुए तो ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से कहा कि मेरे सैनिकों ने हिंदुओं की रक्षा की है। मुंबई के दंगों में शिवसेना की भागीदारी का श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी अद्भुत रिपोर्ट में अनेक बार उल्लेख किया है। बाबरी मस्जिद तोड़ने का श्रेय भी बालासाहेब ठाकरे ने अपने ;लड़कों; को दिया था।
शिवसेना ने अगले प्रधानमंत्री के तौर पर सुषमा स्वराज का नाम सुझाया था। आज जब नरेन्द्र मोदी सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि उन्हें भारत के मुसलमानों के देशभक्त होने पर पूरा भरोसा है, जब वे सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि भारत का मुसलमान अलकायदा का साथ नहीं देगा, इसके बावजूद यदि घनघोर मुस्लिम.विरोधी शिवसेना से भाजपा अपना संबंध बनाये रखती तो यह कहां तक उचित होता?
शिवसेना एक घोर अवसरवादी संगठन भी है। एनरोन नाम की एक विदेशी कंपनी ने महाराष्ट्र में बिजली का कारखाना डालने का प्रस्ताव किया था। शिवसेना ने इसका घोर विरोध किया। परंतु जब शिवसेना और भाजपा की सरकार बनी तो शिवसेना ने एनरोन को महाराष्ट्र में बिजली का कारखाना स्थापित करने की इजाजत दे दी। अवसरवादिता का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है? शिवसेना और उसके संस्थापक बालासाहेब ठाकरे ने कभी भी भारतीय संविधान, न्यायपालिका और मीडिया के प्रति सम्मान नहीं दिखाया है। जो भी समाचारपत्र या चैनल,ठाकरे या शिवसेना के विरूद्ध लिखता है, उसके दफ्तरों पर हमले किए जाते हैं। बालासाहेब ठाकरे का दृष्टिकोण कितना संकुचित था,इसका एक बहुत ही दिलचस्प उदाहरण है। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व के दौरान जब पोखरन में परमाणु विस्फोट हुआ तो ठाकरे ने हिंदू वैज्ञानिकों को ही बधाई दी। इसी तरह, जब मुंबई में एक मराठी भाषी बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया तो बालासाहेब ठाकरे ने कहा कि मराठी भाषी बलात्कार कर ही नहीं सकते।
अब प्रश्न यह है कि भाजपा ने स्थाई रूप से शिवसेना से तलाक लिया है या कुछ समय बाद स्थिति बदल सकती है? इस संबंध में अभी कुछ भी कहना उचित नहीं होगा। एक और मुद्दा है जिसका यहां उल्लेख करना आवश्यक है। भारतीय जनता पार्टी, राजनीति में परिवारवाद की विरोधी है। परंतु जब शिवसेना में परिवारवाद आया तो भाजपा मौन धारण किए रही। बालासाहेब ठाकरे ने अपने जीवनकाल में ही अपने पुत्र उद्धव ठाकरे को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। उनके इस निर्णय से खफा होकर,उनके भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना से अपना संबंध विच्छेद कर लिया और एक नई पार्टी बना ली थी। यह सभी लोग मानते हैं कि राज ठाकरे में नेतृत्व की क्षमता ज्यादा है और शिवसेना के संकुचित विचारों के आधार पर गतिविधियां संचालित करने की रणनीति में राज ठाकरे को पारंगता हासिल है। इस तरह, देखा जाये तो शिवसेना और भाजपा के बीच असमानताएं ज्यादा थीं इसलिए दोनों के संबंध विच्छेद से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
-एल.एस. हरदेनिया

शनिवार, 27 सितंबर 2014

आईसीएचआर के अध्यक्ष का ‘इतिहास बोध’

नयी सरकार आने के बाद अकादमी क्षेत्र में सबसे त्वरित और केन्द्रीत हमला इतिहास पर हुआ है क्योंकि शासक और विजेता इतिहास को तलवार-बंदूक से अधिक कारगर हथियार मानते हैं। किसी भी समाज की मानसिकता बदल देने में इतिहास की बहुत बड़ी भूमिका होती है, इसलिए हर शासक अपने अनुकूल इतिहास लिखवाने की कोशिश करता है। मोदी सरकार ने रणनीति के तहत इसकी शुरूआत कर दी है। भारत में इतिहास अनुसंधान और इतिहास लेखन की सर्वोच्च संस्था भारतीय ऐतिहासिक अनुसंधान परिषद(आईसीएचआर) के चेयरमैन वाई0 सुदर्शन राव की नियुक्ति इस रणनीति का पहला कदम है। कालकाटिया विश्वविद्यालय में इतिहास विभाग के प्रमुख रहे सुदर्शन राव ने 2007 में लिखे गये एक लेख- ‘इण्डियन कास्ट सिस्टमः अ रीअप्रेजल’ के कारण विवाद में रहे। इस लेख में उन्होंने
लिखा है कि ‘‘जाति व्यवस्था प्राचीन काल में बहुत अच्छे ढंग से कार्य कर रही थी और हमें किसी भी पक्ष से शिकायत नहीं मिलती। इस व्यवस्था को अक्सर शोषक सामाजिक व्यवस्था कहा जाता है, जिसके जरिये सत्ताधारी वर्ग ने आर्थिक-सामाजिक आधिपत्य बनाया है। लेकिन वह गलत धारणा है।’’
इतिहास लेखन की वैज्ञानिकता और वस्तुनिष्ठता प्रदान करने के उद्देश्य से 1972 में स्थापित आईसीएचआर के चेयरमैन नियुक्त होने के बाद वाई0 सुदर्शन राव ने अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक को एक साक्षात्कार दिया, (21 जुलाई अंक में) जो इतिहास के प्रति उनकी सोच और विचारधारा प्रस्तुत होती है। इस लेख में आउटलुक को दिये साक्षात्कार के सारांश को विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है-
‘भारतीय परिदृश्य’ में इतिहास-लेखन-
वाई0 सुदर्शन राव का मानना है कि इतिहास का लेखन ‘भारतीय परिदृश्य’ में होना चाहिए। अब तक का इतिहास-लेखन वामपंथ और पाश्चात् विद्वानों द्वारा किया गया है। जोकि भ्रामक है।
वस्तुतः किसी भी देश का इतिहास दुनिया के इतिहास का एक हिस्सा होता है। इतिहास को मुल्क की सीमा रेखाओं में कैद करना मुश्किल ही नहीं बल्कि आने वाली पीढि़यों के लिए घातक भी होता है। पिछले छः दशकों में इतिहास एक विषय के रूप में उल्लेखनीय प्रगति की है, खास करके ‘विवादित या भ्रामक इतिहास’ का सही चेहरा उजागर हुआ है। सीड्स आॅफ पीस अन्तर्राष्ट्रीय शिविर जैसी संस्था का उदय हुआ है ताकि आने वाली पीढि़याँ ‘सही इतिहास’ को जान सके। इसी तर्ज पर भारत और पाकिस्तान के युवा इतिहासकारों ने ‘द हिस्ट्री
प्रोजेक्ट’ नाम से एक संस्था बनायी है जिसका काम है भारत और पाकिस्तान के परस्पर विरोधी इतिहास लेखन को उजागर करना। ताकि इसे पढ़कर लोगों के भीतर एक प्रक्रिया शुरू हो और कथित रूप से स्थापित किये उन तथ्यों पर संदेह करना शुरू करें जो उन्हें भ्रामक लगते हैं। परन्तु आईसीएचआर के निदेशक महोदय ने इतिहास को सीमाओं में कैद कर लेने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया है।
इतिहास लेखन को लेकर दक्षिणपंथी विचारधारा की चिंता नयी नहीं है। पूर्व मानव संसाधन मंत्री रहे डा0 मुरली मनोहर जोशी ने 30 दिसम्बर 2001 में ‘द हिन्दू’ में लिखा कि- ‘‘इस देश को दो प्रकार के आतंकवाद का सामना करना पड़ रहा है। एक है ‘बौद्धिक आतंकवाद’ जो देश में धीमें जहर की तरह फैला हुआ है, जो वामपंथी इतिहासकारों द्वारा ‘भारतीय इतिहास के गलत प्रस्तुतीकरण’ की वजह स्थापित हुआ है और वह सरहद पार आतंकवाद से कहीं ज्यादा घातक है।’’ वस्तुतः इतिहास के सबसे करीब पहुँचने वाले इतिहासकार के ऊपर वामपंथ का ठप्पा लगाकर दक्षिणपंथी और ‘राष्ट्रवादी’ लोग इतिहास बोध को दबा देना चाहते हैं। ताकि जिस ‘राष्ट्रवाद’ की आग में वे अपनी रोटियाँ सेंक रहे हैं, उस पर सवाल न खड़ा हो सके।
इतिहास का पुर्नलेखन-
इतिहास के पुर्नलेखन पर पूछे गये एक सवाल के उत्तर में सुदर्शन राव ने कहा कि ‘वह सत्य के फालोवर हैं।’ और ‘सत्य’ सामने आना चाहिए। राव साहब के इस जवाब से स्पष्ट है कि ‘सत्य’ के नाम पर एक बार फिर से ‘इतिहास का भगवाकरण’ किया जायेगा। वह पूरी प्रक्रिया हिन्दूत्व और राष्ट्रवाद के कलेवर में हमारे सामने आयेगी। नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से अपनी 385 भारत विजय रैलियों’ मेें राष्ट्रवाद का नारा बुलंद किया, वह जर्मन राष्ट्रवाद ‘मेरा राष्ट्र सही या गलत परन्तु सबसे अच्छा’ से रत्ती भर कम नहीं है। परन्तु इतिहास के लिए यह बेहद घातक होगा जैसा कि एरिक हाॅब्सबाॅम ने सटीक सुझाया है कि राष्ट्रवाद इतिहास के लिए अफीम जैसा है।
वस्तुतः इतिहास लेखन फिर से साम्प्रदायिक इतिहास लेखन की तरफ मुड़ रहा है। जेम्स मिल द्वारा ‘इतिहास विभाजन’ के औचित्य को सुदर्शन राव जी सही साबित करना चाहते हैं कि प्राचीन भारत (हिन्दूकाल) में भारतीय सभ्यता का स्वर्णिम काल था और मध्यकालीन भारत (मुस्लिमकाल) राष्ट्र और सभ्यता के विघटन और विध्वंश का काल था। दक्षिणपंथी विचारधारा इसकी प्रबल समर्थक रही है तभी तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी संसद में 9 जून को अभिभाषण में कहा कि- ‘‘कुछ बातों में बारह सौ सालों की गुलामी हमें परेशान करती है।’’ वह 1200 वर्षों की गुलामी आखिर किस तरफ इशारा करती है? गौरतलब है
कि यह धारणा यह स्थापित करती है कि 711 ई0 में सिंधु पर अरबों का आक्रमण और उसके बाद ‘तुर्की शासन’ की स्थापना भारत के लिए गुलामी थी। अब इतिहास पूर्नलेखन के नाम पर फिर से राष्ट्रनायक और खलनायको को परिभाषित किया जायेगा।
ऐतिहासिक स्रोत बनाम ‘कलेक्टिव मेमोरी’-
प्राचीन इतिहास लेखन में राव के अनुसार अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को प्राथमिकता दी जायेगी। इतिहास के प्राथमिक और द्वितीयक स्रोतों को ताख पर रखकर अब किंवदंतियों और गाथाओं को आधार माना जायेगा। एक तरफ इतिहास पुरानी घटनाओं, वस्तुओं की प्रमाणिकता को सिद्ध करने के लिए कई वैज्ञानिक उपकरणों व प्रक्रियाओं से लैस हुआ है, वही दूसरी तरफ भारत के इतिहास शोध के सर्वोच्च संस्थान के चेयरमैन ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात कर रहे हैं।
वस्तुतः ‘कलेक्टिव मेमोरी’ और कुछ नहीं बल्कि बहुसंख्यकवाद की एक अभिव्यक्ति होगी जो यह स्थापित करने में सफल होगी कि राजा दशरथ के बाद ‘शब्दभेदी बाण’ दिल्ली का अंतिम ‘हिन्दू शासक’ हेमू और पृथ्वीराज चैहान चलाते थे। साथ ही साथ वह भी प्रमाणित कर देगी कि मु0 गोरी को पृथ्वीराज ने ‘शब्दभेदी बाण’ से मार गिराया।
यह सत्य कि इतिहास लेखन में गाथाओं और किवदंतियों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है परन्तु जिस ‘कलेक्टिव मेमोरी’ की बात सुदर्शन राव जी कर रहे हैं वह हिन्दूत्व की महिमा मंडन ही है। जिस तरह से ‘जनभावनाओं की संतुष्टी’ के नाम फांसी की सजा सुनाया जा रहा है, उसकी तरफ अब ‘कलेक्टिव मेमोरी’ के नाम पर इतिहास को दफन करने की कोशिश की जायेगी।
प्राचीन इतिहास और ‘महाभारत प्रोजेक्ट’-
सुदर्शन राव जी ‘महाभारत प्रोजेक्ट’ नाम एक शोध कार्य किया है और उनका मानना है कि महाभारत और रामायण दोनों सत्य घटनाओं पर आधारित हैं। इसके लिए बकायदा तिथि निर्धारण का भी कार्य किया जा रहा है। इन दोनों महाकाव्यों को लेकर एक इतिहासकार के सामने मुख्यतः दो समस्या होती है-
पहला इनकी महाकाव्यों की पवित्रता और दूसरा आस्था और इतिहास में फर्क न कर पाना। प्रसिद्ध इतिहासकार रोमिला थापर का मानना है कि ‘‘आज इतिहास को आस्था पर नहीं बल्कि गहन अन्वेषण पर आधारित होना होगा।’’ परन्तु क्या हम सुदर्शन राव से आस्था से इतर सोचने की उम्मीद कर सकते हैं, जिन्होंने अपने साक्षात्कार में अपने आप को सिर्फ हिन्दू ही नहीं कहा बल्कि यह भी जोड़ा कि वे ब्राह्मण भी हैं।
प्रायः कहा जाता है कि भारतीयों में इतिहासबोध बिल्कुल नहीं होता। वस्तुतः इतिहास बदलावो का एक दस्तावेज है, परन्तु भारतीय इतिहास में वाई0 सुदर्शन राव सरीखे व्यक्तियों की भरमार रही है जो प्रतिगामी रहे हैं और समाज को स्थिर बनाये रखने में यकीन रखते हैं। रामायण या महाभारत जैसे  महाकाव्य समाज को समझने का एक स्रोत हो सकता है। परन्तु आँख बंद करके यह मान लेना कि महाभारत या रामायण के सारे पात्र ऐतिहासिक हैं, गलत ही नहीं बल्कि घातक है। रोमिला थापर का मानना है, ‘‘यदि आपने तय कर लिया है कि वह राम है जिसने धर्म की स्थापना की थी, तब आपको सिद्ध करना पड़ेगा कि वह बुद्ध, ईसा और मोहम्मद साहब की तरह ही ऐतिहासिक रूप से अस्तित्व में था।
‘महाभारत प्रोजेक्ट’ वस्तुतः यही साबित करना चाहता है ताकि धर्म के आधारपर ही ‘भारतीय गुलामी’ को परिभाषित करते हुए मुसलमानो और ईसाइयों को बाहरी साबित किया जा सके। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तो पहले ही घोषित कर रखा है कि भारत हिन्दूओं के लिए ‘सुरक्षित स्थान’ होगा, आखिर इसे कोई तर्क चाहिए ना।
राम की अयोध्या-
अयोध्या पर पूछे गये एक सवाल के जवाब में सुदर्शन राव जी ने कहा कि यदि राम का जन्म अयोध्या में नहीं हुआ तो कहाँ हुआ? वस्तुतः सुदर्शन राव जी इतिहास के जरिये अयोध्या को राम की जन्मभूमि बनाने की कवायद में जुड़ जायेगें ओर भारतीय जनता पार्टी के घोषणा-पत्र में शामिल राममंदिर मुद्दा का संवैधानिक हल निकालकर मंदिर निर्माण के सपने को हकीकत में बदलने की पुरजोर कोशिश करेगें।
  प्राचीन काल में छुआछूत नहीं थी-
  प्राचीन काल का महिमा मण्डन करने वाले सुदर्शन राव ने स्पष्ट कहा है कि प्राचीन काल में छुआछूत अस्तित्व में नहीं थी। 2007 में लिखे अपने लेख में भी ‘जाति-प्रथा’ को भारतीय संस्कृति का सकारात्मक पक्ष मानते हुए लिखा है कि प्राचीन काल की जाति व्यवस्था में किसी भी वर्ग को किसी से शिकायत नहीं थी। यदि सुदर्शन राव के द्वारा जारी ‘कलेक्टिव मेमोरी’ को सही माना जाये तो कई सवाल इसके तथ्य को आईना दिखाने के लिए खड़े हो जाते हैं। जैसे- यदि महाभारत अथवा रामायण के समय छुआछूत नहीं थी तो लक्ष्मण ने शबरी का बेर क्यों नहीं खाया? तपस्वी रहते हुए भी राम ने शंबूक की हत्या क्यों की? एकलव्य से निर्लज्जतापूर्वक अंगूठा कैसे और क्यों मांगा गया।
गौरतलब है कि अपनी अतीतग्रस्तता के वजह से सुदर्शन जी इन सारी गाथाओं को नजर अंदाज कर दिये होगें। अतीतग्रस्तता एक सहज प्रवृत्ति है, मतुख्यतः असहाय बने अकर्मण्य लोगों की। दक्षिणपंथी विचारधारा यहीं मार खा जाती है,
जब वही ‘स्वर्णिम काल’ की बात करती है और जब सवाल वर्णव्यवस्था या जातिवाद पर उठ जाता है तो सारा इतिहास बोध पारलौकिकता और नियतिवाद में तब्दील हो जाता है। जातिभेद के सवाल पर अपने साक्षात्कार में वाई0 सुदर्शन ने कहा कि विश्वामित्र ने दलित के घर कुत्ते का मांस खाया था। सुदर्शन राव साहब इसके जरिये यह दिखाना चाहते हैं कि दलित कुत्ता खाता था, परन्तु क्या उनमें यह हिम्मत है कि आर्यों के गोमांस खाने के प्रमाणिक तथ्यों को वह स्वीकार करेगें?
इतिहास बनाम धर्म-
  इतिहास साक्ष्यों पर आधारित होता है वही धर्म आस्था का विषय है। परन्तु सुदर्शन राव साहब ने सिर्फ आस्थावान व्यक्ति ही नहीं बल्कि असहिष्णु भी है। तभी तो सनातन धर्म की बड़ाई करते-करते राव साहब यहाँ तक दावा कर दिया है कि सनातन धर्म सर्वश्रेष्ठ धर्म है। साथ ही साथ इस्लाम को विध्वंसक धर्म बताया है कि मध्यकाल में किस तरह से उन्होंने मंदिरो को नुकसान पहुँचाया। इतिहासबोध की इतनी छिछली जानकारी रखने वाले राव साहब को पता होना चाहिए कि तुर्कों से पहले भी भारत में हिन्दू शासको ने एक दूसरे के मंदिरों को तोड़ा था, क्योंकि मंदिर शासक की प्रतिष्ठा हुआ करते थे। अतः यह कहना कि सिर्फ मुसलमानों ने मंदिर तोड़े यह बचकाना बात है। मध्य काल में मंदिरो का तोड़ा जाना मुख्यतः आर्थिक कारण था न कि धार्मिक कारण।
खैर 1972 में  स्थापित आईसीएचआर के पहले चेयरमैन प्रो0 रामशरण शर्मा  के साथ इरफान हबीब, सव्यसाची भट्टाचार्य का ‘इतिहासबोध’ को दोराहे पर खड़ा कर दिया गया है। क्योंकि सुदर्शन राव ने इतिहास की धारा को ‘इतिहास जो है’ से ‘इतिहास जो हो सकता है’ की तरफ मोड़ने का प्रयास किया है। फिलहाल
समाज और सरकारों को नहीं भूलना चाहिए कि यदि हम अतीत पर पिस्तौल से गोली चलायेगें तो आने वाला भविष्य हम पर तोप से गोले दागेगा।
-अनिल यादव
मो0 09454292339
लोकसंघर्ष पत्रिका के दिसम्बर अंक में प्रकाश्य

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

क्या हिन्दू धर्म का चेहरा बदल रहा है?

जाने माने विधिवेत्ता फाली एस नरीमन ने हाल में एक बहुत महत्वपूर्ण बात कही। वर्तमान राजनैतिक स्थिति के संदर्भ में उन्होंने कहा कि 'हिंदू धर्म, पारंपरिक रूप से, अन्य सभी भारतीय धर्मों से तुलनात्मक रूप में सबसे अधिक सहिष्णु रहा है' परंतु हाल में कट्टरवादियों द्वारा फैलाये जा रहे धार्मिक तनाव और घृणा फैलाने वाले भाषणों से ऐसा लगता है कि'हिंदू धर्म अपना सौम्य चेहरा बदल रहा है'
इन दिनों आरएसएस की विचारधारा, अर्थात हिंदुत्व विचारधारा, से जुड़े संगठन लगातार ऐसी बातें कह रहे हैं जिनसे यह ध्वनित होता है कि भारत हमेशा से हिंदू राष्ट्र है और रहेगा। उनमे से कुछ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भी प्रगट कर रहे हैं। हिंदू एक धर्म है। हिंदुत्व एक राजनैतिक विचारधारा है। हिंदुत्ववादी संगठन तरह.तरह की बेहूदा बातें कर रहे हैं। वे दूसरे समुदायों के प्रति घृणा का वातावरण पैदा करने के लिए जहां एक ओर लव जिहाद जैसे मुद्दे उठा रहे हैं तो दूसरी ओर यह भी कह रहे हैं कि 'हम सब हिंदू हैं'। इसके साथ ही, उदारवादी हिंदू धर्म पर हमले भी हो रहे हैं। जिन लोगों ने एक मुस्लिम परिवार में जन्में सूफी संत शिरडी के सांई बाबा को अपना भगवान मान लिया है, उनसे यह कहा जा रहा है कि उन्होंने ठीक नहीं किया। हिंदुत्ववादी कई अलग.अलग बातें कह रहे हैं और उनके दावों में परस्पर विरोधाभास भी है। परंतु सबका लक्ष्य एक ही है.किसी न किसी तरीके, किसी न किसी बहाने से धार्मिक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना। जो मूल प्रश्न पूछा जाना चाहिए वह यह है कि क्या संघ परिवार से उठ रही आवाजें, हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करती हैं या वे हिंदू धर्म के नाम पर राजनीति करने का प्रयास है। यह प्रश्न अधिक जटिल इसलिए बन जाता है क्योंकि इन दिनों अलकायदा और आईसिस जैसे कई संगठनए इस्लाम के नाम पर अपनी कुत्सित गतिविधियां चला रहे हैं।
स्वाधीनता आंदोलन में महात्मा गांधी और मौलाना आजाद जैसे नेता शामिल थे जो अपने.अपने धर्मों में गहरी आस्था रखते थे। परंतु जहां तक उनकी राजनीति का प्रश्न है, वह पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष थी। उसी दौर में सावरकर और मोहम्मद अली जिन्ना जैसे लोग भी थे जो'धार्मिक' तो नहीं थे परंतु हिंदू धर्म और इस्लाम के नाम पर अपनी राजनीति करते थे।
संघ परिवार, हिंदू धर्म को इस धर्म की एक संकीर्ण धारा.ब्राह्मणवाद.से जोड़ रहा है। हिंदू धर्म किसी एक पुस्तक, पैगम्बर या पुरोहित वर्ग पर आधारित नहीं है। हिंदू धर्म में ढे़र सारे देवता हैं, ईश्वर की कई तरह की मीमांसाएं हैं और सैंकड़ों पवित्र ग्रंथ हैं।
स्वाधीनता आंदोलन के दौरान  गांधीजी ने यह दिखाया कि किस प्रकार हिंदू धर्म की उदारवादी परंपराओं का इस्तेमाल कर, धर्म को राजनीति से पृथक रखा जा सकता है। गांधीजी ने भारतीय राष्ट्रवाद की नींव रखी। उनका भारतीय राष्ट्रवाद, उस हिंदू राष्ट्रवाद से एकदम अलग था, जिसके प्रतिपादक हिंदू महासभा और आरएसएस थे। इन संगठनों का हिंदू धर्म संकीर्ण और असहिष्णु था।
चूंकि अधिकांश हिंदू, गांधीजी के अनुयायी थे,इसलिए हिंदू महासभा.आरएसएस का असहिष्णु हिंदू धर्म हाशिए पर पड़ा रहा। परंतु पिछले तीन दशकों में राममंदिर आंदोलन से शुरू होकर, राजनीति में 'दूसरों' के बारे में असहिष्णु दुष्प्रचार का बोलबाला बढ़ता ही जा रहा है। इस समय देश पर भाजपा का शासन है। स्वाभाविक तौर पर भाजपा और उससे जुड़े संगठनों को राज्य का संरक्षण प्राप्त है और इसलिये वे और खुलकर धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध घृणा फैला रहे हैं।
वे उन लोगों को आतंकित करना चाहते हैं जो राजनीति और धर्म के उनके संस्करण से सहमत नहीं हैं। आरएसएस की राजनीति केवल 'दूसरों' को आतंकित करने तक सीमित नहीं है। वह उन हिंदुओं पर भी निशाना साध रही है जो संघ से भिन्न राय रखते हैं। मुझ जैसे लोगों को रोजाना अपमानित करने वाले और अश्लील भाषा में लगभग गालियां देने वाले संदेश बड़ी संख्या में मिलते हैं। जैसे.जैसे धर्म के नाम पर राजनीति परवान चढ़ती जायेगी,समाज में असहिष्णुता भी बढ़ेगी। हमारे सामने चुनौती यह है कि हम लोगों को कैसे यह समझायें कि धर्म और धर्म के नाम पर राजनीति एकदम अलग.अलग चीजें हैं। इस संदर्भ में श्री नरीमन का वक्तव्य, उस प्रजातांत्रिक उदारवादी वर्ग की आह है, जो संघ परिवार के नेतृत्व में चल रही हिंदुत्वादी राजनीति के तेजी से आगे बढ़ते कदमों से अचंभित और परेशान है।
 -राम पुनियानी