शनिवार, 22 अप्रैल 2017

अधिवक्ताओं को गुलाम बनाने की साजिश

भारतीय विधि आयोग द्वारा भाजपा सरकार को प्रस्तावित कानून अधिवक्ता अधिनियम 1961 में संशोधन का प्रस्ताव विदेशी कानून फर्मों को भारत में प्रवेश कराने के लिए मुखौटा है और यह भारत के बार कौंसिल और राज्य बार कौंसिल की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को नष्ट कर देगा और स्वतंत्र अधिवक्ताओं और एक डेमोक्रेटिक बार के नागरिकों को मजबूर व गुलाम बनाने के लिए एक कठोर प्रावधान हैं।
इस देश के अधिवक्ता लॉ कमीशन ऑफ़ इंडिया द्वारा प्रस्तावित बिल के प्रावधानों को लेकर बहुत उत्तेजित हैं, जो कि भाजपा के कानून मंत्री को अधिवक्ता अधिनियम 1961 में संसोधन के लिए प्रेषित की गयी है.
आश्चर्य नहीं कि यह विधेयक भारत सरकार के विचारों को दर्शाता है जो कि हाल में कुछ जी 7 देशों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय कॉरपोरेट निकायों और वित्तीय संस्थाओं को “भारतीय कानूनी सेवाओं के बाजार" में प्रवेश करवाने के लिए हुए विधायी उपायों से प्रेरित है. जिसकी खिलाफत ढाई दशक से बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया और राज्य बार कौंसिलों और लॉयर्स एसोसिएशनों द्वारा की जा रही थी, क्योंकि इनका आगमन न्यायिक व्यवस्था पर बुरा असर डालेगा. विशेष रूप से संवैधानिक ढांचे और वैधानिक कनूनो जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों सहित आर्थिक नीति को आर्थिक रूप से नष्ट करेगी और परिणामस्वरूप भारतीय राज्य की राजनीतिक संप्रभुता को।
इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर भारत के कानून आयोग की रिपोर्ट के अध्याय XIV को पढ़ने और GATS जो कि ‘General Agreement on Trade and Services’ है,  इस रिपोर्ट के इरादे में लेस मात्र भी संदेह नही छोड़ता है कि वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था के विचार "पुनः-उपनिवेश" के हैं जो हमारे देश के विभिन्न क्षेत्रों को प्रवेश के लिए खोलने और इस के साथ न्याय वितरण प्रणाली को तोड़ने और कानूनी पेशे की अब तक की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक कार्यवाही को नष्ट करना चाहती है जिसने गंभीर हस्तक्षेप के बावजूद भी पक्षपातपूर्ण कॉरपोरेट और राजनीतिक नियंत्रण से अपनी आजादी को बनाए रखा हुआ है.   
इस बिल का निष्ठुर प्रस्ताव अधिवक्ताओं को अधिवक्ताओं से जुड़े किसी महत्वपूर्ण मुद्दे या फिर सत्ता के गंभीर दुरपयोग के खिलाफ सामूहिक हड़ताल या कार्य बहिष्कार से रोकता है. यह अधिवक्ताओं को, राज्य द्वारा अधिवक्ताओं पर हिंसा, गंभीर अन्याय या न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, जिसमें शिकायतों के बावजूद कोई उपाय नहीं किया गया है,  सामूहिक, लोकतान्त्रिक और अहिंसक कार्यवाई करने से रोकता है. प्रस्तावित बिल में लोकतान्त्रिक अधिकार को दुर्व्यवहार मानते हुए अधिवक्ताओं पर अनुशासनात्मक, दंडात्मक कार्यवाई और नुकसान की भरपाई असंवैधनिक है और अन्याय व राज्य द्वारा हिंसा के खिलाफ अधिवक्ताओं द्वारा आवाज़ उठाने के अधिकारों का उल्लंघन है. यह आश्चर्य की बात है कि लॉ कमीशन ने इसे प्राथमिकता दी है, 'स्वतंत्रता आंदोलन' की अवधि के अलावा भारत में कानूनी पेशे के इतिहास में, बहुत कम सामूहिक हड़ताल या अदालतों का बहिष्कार किया गया है और आम तौर पर एक दिन से अधिक नहीं किया गया है.
सबसे गंभीर मुद्दे जो मुकदमे और न्याय व्यवस्था झेल रही है वह अदालतों का बहिष्कार नहीं है और न ही एकल न्यायाधीश या अधिवक्ताओं का ‘दुर्व्यवहार’ है, अस्पष्ट शब्द ‘शिष्टाचार’ और ‘निषिद्ध कार्य’ या ‘ गैरकानूनी काम’ या अप्रिय व्यवहार सहित हर चीज़ या सब कुछ सम्मिलित कर जिस प्रकार की परिभाषा को  प्रस्तावित बिल में बढाया गया है. हालांकि ‘दुर्व्यवहार’, ‘शिष्टाचार’ और ‘निषिद्ध कार्य’ या ‘ गैरकानूनी काम’ या ‘अप्रिय व्यवहार’ क्या है इसकी कोई विस्तारपूर्वक परिभाषा नही दी गयी है. इसी तरह, "परिश्रम से काम न करने" के लिए अस्पष्ट संदर्भ हैं जो पेशेवर "कदाचार" की सभी व्यापक परिभाषाओं में शामिल है. इसकी परिभाषा इतनी बड़ी है कि सरकार के कामों का विरोध करने को भी ‘निषिद्ध कार्य’ माना जा सकता है, राजनीतिक संघर्षों के लिए जेल होने पर इसी तरह "गैरकानूनी" माना जा सकता है, जिसके लिए एक वकील के रूप में नामांकन करने के अधिकार से वंचित किया जा सकता है और नया संशोधन का एक और कठोर प्रावधान बार कौंसिल से इस तरह के निष्कासन के लिए कोई सीमित समय निश्चित नहीं करता है; पहली बार यह निलंबन लंबित अनुशासनात्मक कार्यवाही के लिए करता है जो शिकायत साबित होने से पहले भी हो सकता है, ऐसे व्यवसाय में जहां सामाजिक सुरक्षा या स्वास्थ्य देखभाल और पेंशन का पूर्ण अभाव है।
हमारे देश के नागरिक जिन गंभीर और पीड़ादायी समस्याओं का सामना कर रहे हैं वह अदालतों का बहिष्कार नहीं हैं या कुछ अधिवक्ताओं द्बारा किया गया दुर्व्यवहार नही है. बल्कि गंभीर देरी और हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक व्यवस्था का लकवाग्रस्त होना, पर्याप्त संख्या में न्यायधीशों और फाइलों के विशाल ढेर को संचित करने के लिए बुनियादी सुविधाओं का न होना और कुल लंबित मुकदमेबाजी के 50% से अधिक मामूली सरकारी मुकदमे, जहां सख्त अभियोग के बिना सरकार के  सचिवों द्वारा अंतहीन अपील दायर की जाती है और कुछ मामलों में तत्काल जवाबदेही या वित्तीय खर्च से बचने में रुचि रखने वाले सरकार के मंत्रियों के आग्रह पर या कुछ मामलों में अन्य कारणों के लिए न्यायालय के निर्णय के कार्यान्वयन को टालना गंभीर समस्या है।
भारतीय राज्यों और भारतीय संघ द्वारा दायर तुच्छ प्रकार के मुकदमें, पर्याप्त न्यायधीशों की कमी, उच्चतम और उच्च न्यायालयों के विभागों की शामिल कानूनी प्रक्रिया और अक्षमता जिसे सरलीकृत और सुव्यवस्थित होना चाहिए और विभागों के कर्मचारयों को उत्तरदायी तथा न्यायधीशों को बोर्डों के प्रबंधन और मामलों के निपटान में प्रशिक्षण देना चाहिए, लॉ कमीशन इन सभी मुद्दों को महत्व देकर निपटाने से बचता है. वादी और वकीलों के द्वारा ऐसी गंभीर शिकायतें हैं जिस तरह केंद्र व राज्य सरकारों के लॉ अफसर सरकारी अधिकारीयों और अधिवक्ताओं के निर्देशों पर सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के सामने तुच्छ मामलों के लिए आवेदन करते हैं और हमेशा इन स्थगन को मंजूरी देते हैं। गौरतलब है कि सरकार के कानून अधिकारी, उनका 'कदाचार', उनका 'परिश्रम से काम नहीं करना ', उनका '' अप्रिय '' और भ्रष्टाचारी व्यवहार सहित राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करना , जिसमें रजिस्ट्री विभाग में मामलों में देरी कराना या मामलों को रोक कर रखना, अपील की सिफारिश करना जहाँ कोई भी अपील दायर नहीं किया जाना चाहिए, इस बिल के किसी भी प्रावधान से कहीं भी कवर नहीं किया गया है।
बार कौंसिल ऑफ इंडिया पर एक सीधा हमला है जो एक लोकतांत्रिक रूप से गठित निकाय है, जिसके लिए प्रत्येक राज्य बार कौंसिल को एक सदस्य का चुनाव करने का अधिकार है, यह प्रस्तावित है कि पूरी बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया में सिर्फ नामित सदस्य होंगे, हर राज्य बार कौंसिल उच्चतम न्यायलय में प्रतिनिधित्व करने का अपना संवैधानिक और कानूनी अधिकार खो देगी.  राज्य बार कौंसिल के सिर्फ 5 जोन नामांकन में प्रतिनिधित्व करेंगे, मतलब सिर्फ राज्य बार कौंसिल के सिर्फ एक सदस्य को 5 क्षेत्रों में समूहीकृत किया जायेगा, राज्य बार काउंसिल के केवल पांच सदस्य ही बार काउंसिल ऑफ इंडिया में प्रतिनिधित्व करेंगे, हर राज्य बार काउंसिल नहीं।
इसके अलावा प्रस्तावित विधेयक में कानून के अलावा अन्य विषयों के छह प्रख्यात व्यक्तियों को बार कौंसिल ऑफ़ इंडिया में भारत के चार्टर्ड एकाउंटेंट्स के अपीलीय निकाय के अध्यक्ष और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त, सुप्रीम कोर्ट के जज सदस्यीय एक समिति द्वारा नामित किया जाएगा। यह प्रखाय्त व्यक्ति विभिन्न क्षेत्रों जैसे वाणिज्य, चिकित्सा विज्ञान, प्रबंधन, सार्वजनिक मामलों और राज्य के अधिकारियों, जैसे व्यक्तियों, जो अपनी श्रेष्ठता के बावजूद कानूनी पेशे के कार्य और संगठन के बारे में कुछ नही जानते , या वादी और न्यायालयों को जरूरी सहायता की प्रकृति के बारे में कुछ भी नहीं जानते हैं। नामांकित सदस्य अन्य लोगों के साथ अनुशासनात्मक समितियों और कानूनी शिक्षा और कार्य की देखरेख करेंगे।
इसी तरह उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित किए जाने वाले राज्य सरकारों के अधिकारियों सहित विभिन्न क्षेत्रों के ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों को राज्य बार कौंसिलों में भी नामांकित कर पुनर्गठन की भी मांग की गई है। जबकि न्यायपालिका के सेवानिवृत्त सदस्यों के बार काउंसिल ऑफ इंडिया या स्टेट बार काउंसिल में नामांकन पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती है,  वे वरिष्ठ अधिवक्ताओं के साथ और सभी समितियों के साथ काम करने के लिए सह-चयन कर सकते हैं, क्योंकि इससे बार काउंसिल ऑफ इंडिया के कामकाज में सुधार होगा। लेकिन राज्य सरकार के अधिकारियों और व्यक्तियों को इन निकायों पर काम करने के लिए अनुमति देना भले ही वे अन्य क्षेत्रों में कितने ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, अधिवक्ता अधिनियम 1961 के अनुरूप नहीं है और अधिनियम के उद्देश्यों और प्रयोजनों से पूरी तरह असंगत हैं।

अधिवक्ता अधिनियम 1961 में संशोधन करने के लिए लॉ कमीशन द्वारा सरकार को भेजे गए बीमार विधेयक के अन्य विचारों में से इनके मुख्य विचार से, ऐसा लगता है कि संशोधनों का वास्तविक उद्देश्य कुछ जी 7 देशों की बहुदेशीय कंपनियों के निर्देशों के अनुसार, जो पहले औपनिवेशिक शक्तियां थीं जिनके साथ हमारी वर्तमान सरकार चाटुकारिता से पूर्ण भक्तिभाव दिखा रही है, विदेशी कानून फर्मों की दखलंदाजी को भारत में प्रवेश करने की अनुमति देना है।, जो अब कानूनी सेवाओं के भारतीय ‘बाजार’ सहित अपने पूर्व उपनिवेशों के बाजारों को खोलने का हुक्म दे रही हैं। इन प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य व्यवसाय या न्याय प्रणाली या कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार करना नहीं है। इन संशोधनों के द्वारा कानूनी शिक्षा पहले की तुलना में अधिक विशिष्ट हो जाएगी। इन प्रस्तावों का वास्तविक उद्देश्य भारत की बार कौंसिल और राज्य बार कौंसिल की स्वायत्तता को ख़त्म कर इन निकायों को गुलाम बनाना है, लोकतांत्रिक ढंग से सदस्य के रूप में निर्वाचित अधिवक्ताओं के प्रतिनिधित्व को कमजोर करना है, कानूनी पेशे के सदस्यों को गुलामी के लिए मजबूर करना और कानूनी पेशे की स्वतंत्रता को नष्ट करना है । इस विधेयक का विरोध होना चाहिए. 
-नीलोफ़र भागवत
मोबाइल 9869014020
अनुवादक भूपेन्दर पाल  सिंह

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

जिया-उल-हक़ के निजामे मुस्तफा से हिन्दू राष्ट्र तक

 नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश में पहली बार भाजपा ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर लिया है। हिन्दुत्ववादी शक्तियों को ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे बरसों का उनका सपना अब साकार हुआ है, लेकिन इसके क्या नतीजे देश को भोगने होंगे यह भविष्य के गर्भ में छुपा है। स्वतंत्रता संग्राम के लम्बे संघर्ष के उपरान्त जब यह तय हो गया था कि अब देश आजाद होने वाला है तो उसी समय से हिन्दुत्ववादी शक्तियों ने एक सपना देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने का अपनी आँखों में सँजोया था। उनके प्रयासों को बल दिया मुस्लिम कट्टर पंथी शक्तियों ने और दोनों का सहारा बने देश से रुसवा होकर जाते अंग्रेज, जिनके आखिरी वायसराय लार्ड माउन्टबैटन ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को देश के दो प्रांतों क्रमशः पंजाब व बंगाल के विभाजन के लिए राजी कर लिया था। इस विभाजन से देश व हिन्दू मुसलमानों को क्या नुकसान हुआ यह बात आज किसी से छुपी नहीं है। विभाजन तो हुआ देश के मात्र दो प्रांतों का लेकिन हिन्दू एवं मुसलमानों के पलायन का सिलसिला चल पड़ा पूरे देश से। इस पलायन को रोकने के बजाए दोनों देशों की हुकूमतों ने और सहयोग दिया कि सरकारी विभागों में कार्यरत कर्मचारियों को देश बदलने का खुला अवसर एवं सहयोग बाकायदा उनकी लिखित इच्छा के अनुसार एक प्रारूप भराकर ली गई। देश के विभाजन एवं आबादी के पलायन के दुष्परिणाम आज तक दोनों समुदाय के लोग आपसी नफरत के रूप में नस्ल दर नस्ल भुगतते चले आ रहे हैं।
                                                  जो मुसलमान यहाँ से पाकिस्तान गए उनकी सम्पत्तियाँ पहले निष्क्रान्त एवं बाद में शत्रु सम्पत्ति एक्ट के अन्तर्गत सरकारी तौर पर अधिगृहीत कर ली गईं। परिणाम उनके परिवारीजनों को दोनों देशों में भुगतने पड़े। चंद दिनों के भीतर दोनों कौमों के लोग बेवतन हो गए। संसार के इतिहास में इतनी बड़ी आबादी का खूनी पलायन शायद ही इससे पूर्व कभी हुआ हो और आगे शायद ही कभी फिर हो। इस पलायन को रोकने का प्रयास दोनों देशों में से किसी राजनेता ने उस समय नहीं किया। इंसानियत सरेआम जख्मी होती रही। गृहस्थियाँ उजड़ती रहीं लेकिन उस समय के वे नेता जो अंग्रेजों से लम्बी लड़ाई लड़ते-लड़ते शायद थक से गए थे अपनों से लड़ाई लड़ने के लिए आगे न बढ़ सके और बेबस होकर देश की अस्मिता और उसकी अखण्डता को तार-तार होते देखते रहे। ना लौह पुरूष आगे बढ़े और न महात्मा गांधी, न खान अब्दुल गफ्फार खां उर्फ सरहदी गांधी अपने मुजाहिदाना तेवर दिखला पाए और न कायदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना की कूटनीति कुछ काम आई, केवल एक कमजोर जिस्म से मजबूत व जोशीली आवाज जामा मस्जिद की सीढि़यों से बुलन्द हुई ओर उस आवाज ने अपने मादरे वतन को छोड़कर जाते हुए मुसलमानों के कदमों को न सिर्फ रोक दिया बल्कि मुल्क के लिए समर्पण का ऐसा जज्बा उनमें पैदा कर दिया कि हजारों की तादाद में साम्प्रदायिक दंगों का दंश झेलने के बावजूद फिर कभी उनके दिलों में तर्के वतन का खयाल तक नहीं आया।
                                                                      एक लेख में प्रसिद्ध कहानी कार व हिन्दी उर्दू साहित्य के प्रख्यात विद्वान राही मासूम रजा ने लिखा है कि जब उन्होंने रामायण के संवाद लिखे और टीवी सीरियल में उनके संवादों की चर्चा देश व विदेशों में बढ़ी तो दिल्ली में भाजपाइयों द्वारा एक प्रोग्राम का आयोजन उनके सम्मान में किया गया। उस आयोजन में तमाम लोगों ने उनकी शान में प्रशंसा के कसीदे पढ़े, उनका खूब महिमामण्डन हुआ। शाम को लाल कृष्ण आडवाणी ने उनके सम्मान में अपने घर पर एक भोज का आयोजन किया। वहाँ चंद लोगों की मौजूदगी में राही मासूम रजा ने एक सवाल लाल कृष्ण आडवाणी से यह किया कि देश में अब तक कितनी संख्या में साम्प्रदायिक दंगे हुए हैं। आडवाणी ने जवाब दिया कि कई हजार तो जरूर हो चुके हैं। राही मासूम रजा ने दूसरा सवाल आडवाणी से किया कि जब वह पाकिस्तान में थे तो कितने दंगे वहाँ उन्होंने देखे थे। आडवाणी जी ने कहा कि उनके सामने तो मात्र एक दंगा हुआ था उसके बाद वह अपना वतन छोड़कर भारत आ गए थे। इस पर राही मासूम रजा ने चुटकी लेते हुए कहा आडवाणी जी आप जैसे तमाम लोग बराबर भारतीय मुसलमानों की देश भक्ति और वफादारी पर सवालिया निशान खड़ा करते रहते हैं।                                                
                                                                  भारतीय मुसलमान इतने दंगे भारत में झेलने के बाद भी कभी अपना वतन छोड़ने की बात नहीं सोचता जबकि आडवाणी जी आप एक दंगा नहीं बर्दाश्त कर सके और अपनी मातृभूमि छोड़कर यहाँ आ गए। राही मासूम रजा की बात आज भी सच साबित हो रही है। चाहे मुजफ्फरनगर का हाल का दंगा हो या गोधरा व अहमदाबाद (गुजरात) का 2002 का दंगा। चाहे 1993 का महाराष्ट्र दंगा हो या हाशिमपुरा मालियाना मेरठ, भागलपुर व जमशेदपुर के दंगे, मुसलमान जानी व माली नुकसान उठाने के बावजूद भी उन्हीं दंगा प्रभावित क्षेत्रों में फिर से तिनका तिनका जोड़कर अपना आशियाना बनाने में जुटा रहा। मौलाना आजाद के प्रयासों से जब मुसलमानों के पलायन का सिलसिला रुका तो सबसे अधिक पीड़ा हिन्दू कट्टर पंथियों को हुई। उनके अरमान पूरे नहीं हो सके। दो कौमी नजरिए की जो योजना अंग्रेजों ने देश से जाते-जाते बनाई थी, वह अधूरी रह गई।
                                                                               दूसरी ओर जब मुहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान असेम्बली को संबोधित करते हुए यह एलान कर दिया कि पाकिस्तान एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र रहेगा धार्मिक स्टेट नहीं। भारत के संविधान में भी 1950 में यही घोषणा की गई कि देश का स्वरूप धर्मनिरपेक्षता पर आधारित होगा। उसका कोई धर्म नहीं होगा। सारे नागरिकों को एक समान अधिकार व अवसर प्राप्त रहेंगे। परन्तु दोनों ही मुल्क अपने संविधान पर नहीं चले। जिन्ना के देहान्त के बाद पाकिस्तान अमरीका की गोद में जा बैठा, जिसने उसे धार्मिक स्टेट बनाने की ओर सदैव प्रेरित किया। पाकिस्तानी अवाम सदैव लोकतंत्र से वंचित रहा। नागरिक अधिकारों को वे तरसते रहे। अधिकांशतः एक धर्म से सम्बंधित होने के बावजूद क्षेत्रीय पक्षपात का शिकार रहे। परिणाम स्वरूप आजादी के 24 वर्ष बाद ही क्षेत्रवाद की साम्प्रदायिकता के चलते पाकिस्तान दो भागों में तकसीम हो गया और दो कौमी नजरिए को एक बार फिर जबरदस्त आघात पहुँचा। अपना एक बाजू कट जाने के बाद विकलांग पाकिस्तान को आर्थिक, औद्योगिक विकास तथा समाजवाद व लोकतंत्र के मार्ग पर जैसे ही ले जाने का प्रयास जुल्फिकार अली भुट्टो ने शुरू किया अमरीका व अन्य पूँजीवादी राष्ट्रों को अपनी दुकान पाकिस्तान में बंद होती नजर आने लगी। सो उन्होंने धार्मिक कट्टरपंथियों को आगे बढ़ाने का काम शुरू कर दिया और परिणाम स्वरूप थलसेना अध्यक्ष जनरल जियाउल हक ने पाकिस्तान को धार्मिक स्टेट बनाने का एलान कर निजामे मुस्तफा कायम करना शुरू कर दिया।
                                                                 लोक तांत्रिक शक्तियों ने जब इसका विरोध किया तो जनरल जियाउल हक ने सैन्य बल का प्रयोग कर उसे दबाते हुए मार्शल ला लगा दिया और पूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को जेल की सलाखों के पीछे डालकर फर्जी आरोप उनके ऊपर मढ़ते हुए मुकदमा चलाया और 4 अप्रैल 1979 को उन्हें फाँसी के तख्ते पर लटका दिया। निजामे मुस्तफा कायम करने के जनरल जियाउल हक के पूरे प्रयासों के पीछे अमरीकी बराबर के शरीक रहे। इसका प्रभाव अफगानिस्तान पर पड़ना शुरू हुआ जहाँ उस समय सोवियत यूनियन समर्थित हुकूमत थी। कम्युनिस्टों को काफिर कहकर अफगानिस्तान को आजाद कराने का जेहाद अमरीका ने शुरू कराया। जनरल जियाउल हक ने अमरीका की इस कमजोरी का फायदा उठाकर पाकिस्तान के लिए आधुनिकतम हथियार प्राप्त कर लिए। नतीजे में भारत को भी अपने रक्षा बजट में बढ़ोत्तरी करनी पड़ी। अफगानिस्तान में खोते अपने वर्चस्व व सी0आई0ए0 की गतिविधियों के कारण आक्रोशित होकर सोवियत यूनियन ने वर्ष 1980 में अफगानिस्तान में अपनी सेना उतार दी। अमरीका यही चाहता था कि वह पठानों की सिरफिरी एवं जंगजू कौम से उसे युद्ध क्षेत्र में उसी प्रकार फंसा दे जिस प्रकार उसे वियतनाम युद्ध में सोवियत यूनियन ने फाँसा था। सोवियत अफगान युद्ध लगभग एक दशक तक चला अन्ततः विफल एवं विवश होकर सोवियत सेनाएँ अफगानिस्तान से वापस चली र्गइं, इसका दुष्परिणाम सोवियत यूनियन के आत्मबल पर इस दर्जा पड़ा कि वह टूट कर 1991 में बिखर गया। उधर अमरीका को निरन्तर ब्लैकमेल करते चले आ रहे जनरल जियाउल हक को एक विमान दुर्घटनाग्रस्त कराकर सी0आई0ए0 ने अमरीका को राहत तो दे दी, लेकिन तालिबान से वह निजात हासिल न कर सका। अमरीकी अस्त्र-शस्त्रों से लैस तालिबान और अमरीकी पूँजी से पनपे मुस्लिम कट्टरपंथी पूरे क्षेत्र के लिए आतंक का पर्याय बन गए, जिसको बड़ी चुतराई से अमरीका ने भारत की ओर और विशेष तौर पर कश्मीर की ओर मोड़कर भारत में अपने अपेक्षित लक्ष्य की प्राप्ति प्रारम्भ कर दी।
                                      पाकिस्तान में 80 के दशक में तालिबान व मुस्लिम कट्टरपंथियों की जमात खड़ी करने के पश्चात भारत में हिन्दुत्व उग्रवाद को बढ़ावा देने का काम भी अमरीका ने शुरू कर दिया। इससे पूर्व वह खालिस्तानी उग्रवाद को जनरल जियाउल हक से बढ़वा कर उनके आतंक का शिकार इन्दिरा गांधी को बना चुका था। बाद में राजीव गांधी को तमिल उग्रवादियों को मुकाबले में उतार कर उनकी हत्या भी अमरीकी सी0आई0ए0 ने करवाकर भारत में अपने मजबूत कदम जमाने का रास्ता साफ कर लिया था। अपने दिग्गज नेताओं को खो चुकी कांग्रेस के बीच से सी0आई0ए0 ने नरसिम्हा राव व मनमोहन सिंह को सत्ता में बैठाकर नेहरू, इन्दिरा की समाजवाद की नीतियों को दफन कर आर्थिक उदारीकरण एवं बाजारवाद की संस्कृति से देश की जनता को रूबरू कराया। साथ ही इलेक्ट्रानिक मीडिया के सहारे अपने नापाक मंसूबों को अमली जामा पहनाने की योजना पर कार्य प्रारम्भ कर दिया।
                                    1991 से शुरू हुए इस सफर के लक्ष्य को 2014 में पहली बार हिन्दुत्ववादी शक्तियों को सत्ता में बैठाकर अमरीका तथा पूँजीपतियों ने देश में मौजूद साम्राज्यवादी शक्तियों के साथ मिलकर पूरा कर लिया। तथाकथित निज़ामे मुस्तफा से पाकिस्तान की बर्बादी का सफर लगभग तीन दशक का रहा। अब देखना यह है कि हिन्दू राष्ट्र से भारत की बर्बादी का सफर कितने समय में पूरा होता है। सोचने वाली बात यह हे कि 99 प्रतिशत एक धर्म की आबादी वाले पाकिस्तान में जब निजामे मुस्तफा कामयाब न हो सका तो 80 प्रतिशत हिन्दू धर्म की आबादी वाले भारत में हिन्दू राष्ट्र क्या गुल खिलाएगा?
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-तारिक खान
मोबाइल-9455804309

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

मैं तुम्हारी "शहीद की बेटी" नहीं हूँ

एक प्रश्न, जिसका उत्तर मै कुछ हफ़्तों पहले बिना किसी संकोच या सावधानी के अपने हंसमुख अंदाज़ में दे सकती थी . अब, मुझे यकीन नही है.

क्या मैं वो हूँ जैसा ट्रोल मुझे सोचते हैं ?
क्या मैं वो हूँ जैसा मीडिया मुझे चित्रित करता है ?
क्या मैं वो हूँ जैसा सेलिब्रिटीज मुझे सोचते हैं ?
नहीं, मैं उनमें से कोई भी नही हो सकती. जैसी लड़की आपने अपने टीवी पर देखा है, हाथों में तख्ती पकडे हुए, भौहें तनी हुई. छोटे गोल सेलफोन कैमरे के लेंस पर टकटकी लगाये, निश्चित रूप से मेरे जैसी दिखती है. उसके विचारों की तीव्रता जो चित्र में परिलक्षित होती है निश्चित रूप से उसमें मेरा असर है. वह ज्वलंत दिखती है. मैं उससे सम्बंधित हूँ लेकिन ब्रेकिंग न्यूज़ हैडलाइन कुछ अलग ही कहानी बताती है. वह हेडलाइंस मैं नही हूँ.

शहीद की बेटी
शहीद की बेटी
शहीद की बेटी

मैं अपने पिता की बेटी हूँ. मैं पापा की गुलगुल हूँ. मैं उनकी गुडिया हूँ. मैं दो साल की कलाकार हूँ जो शब्दों को नही समझ सकती लेकिन stick figure को समझ जाती है, जो वह मुझे प्रेषित चिट्ठियों में बना कर भेजते थे. मैं अपनी मम्मी का सिरदर्द हूँ, उनकी स्वछंद, लापरवाह, मूडी बच्ची- उन्ही का प्रतिबिम्ब. मैं अपनी बहन की पॉप संस्कृति की मार्गदर्शक और उसकी झगडालू साथी हूँ. मैं ऐसी भी लडकी हूँ जो लेक्चर के दौरान पहली बेंच पर शिक्षक को दखल देने के इरादे से बैठती है और हरचीज़ या किसी भी चीज़ पर ज्वलंत वाद-विवाद शुरू करती है, इसलिए क्योंकि साहित्य इस तरह से और भी ज्यादा मजेदार है. मेरे दोस्त कुछ-कुछ मेरी तरह के ही हैं, मैं उम्मीद करती हूँ. वे कहते हैं कि मेरा हास्य भाव सूखा है लेकिन कभी-कभी काम करता है (मैं उसके साथ रह सकती हूँ).  किताबें और कवितायेँ मुझे संतुष्टि देते हैं.
एक पुस्तक प्रेमी, घर की लाइब्रेरी हद से ज्यादा भर चुकी है. और पिछले कुछ दिनों से मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि मैं माँ को उनके लैम्प्स और तस्वीरों को हटाने के लिए कैसे मनाऊँ जिससे एक नई अलमारी बनाने के लिए जगह बन सके.
मैं एक आदर्शवादी हूँ. एक खिलाडी, एक युद्ध की मुखालफत करने वाली. मैं आपकी गुस्सा, प्रतिशोधी, युद्ध की मांग करने वाली बेचारी नही हूँ, जैसा आप आशा व्यक्त कर रहे हैं . मैं युद्ध नही चाहती हूँ क्योंकि मैं इसकी कीमत जानती हूँ. यह बहुत महंगा पड़ता है. मेरा विश्वास करो मुझे बेहतर पता है क्योंकि मैंने इसे हर रोज़ का भुगता है अब भी करती हूँ। इसके लिए कोई बिल नहीं है, शायद अगर ऐसा होता है तो, कुछ लोग मुझसे इतनी नफरत नहीं करेंगे. नंबर इसे और अधिक विश्वसनीय बनाते हैं.
न्यूज़ चैनल्स के मतदान चिल्लाते हैं क्या गुरमेहर का दर्द सही है या गलत ? एक निश्चित वोट अनुपात के साथ परिणाम के रूप में हमें सामान्य जनता को इतना अधिक समझ में आता है
और हाँ! उसके सामने हमारी पीड़ा का मूल्य क्या है?  अगर 51% लोगों को लगता है कि मैं गलत हूँ, तो मुझे गलत होना चाहिए। उस स्थिति में, भगवान जानता है कि मेरे दिमाग को किसने प्रदूषित किया है.
पापा मेरे साथ यहाँ नहीं हैं. वह 18 साल से नहीं हैं. मेरी 200 शब्दों की सीमित शब्दावली ने 16 अगस्त 1999 के बाद कुछ नए शब्द सीखे थे – मृत्यु, युद्ध और पाकिस्तान. स्पष्ट कारणों से मुझे वास्तव में उन की लक्षित परिभाषा को समझने में कुछ साल लग गए। मैं कहती हूं लक्षित क्योंकि ईमानदारी से क्या किसी को भी उसके सच्चे अर्थ का पता है? मैं इसे जीती हूँ और मैं अभी भी इसे समझने की कोशिश कर रही हूँ, खासकर दुनिया के तात्पर्य में।
मेरे पिता शहीद हैं लेकिन मैं उनको इस तरह से नही जानती हूँ. मैं उसे उस आदमी के रूप में जानती हूँ, जो बड़े कार्गो जैकेट पहनता थे, जिसकी जेबें मिठाइयों से भरी हुई होती थीं. जब भी वे मेरे माथे को चूमते थे उनकी दाढ़ी मेरी नाक पर खरोंच जाती थी. शिक्षक जिसने मुझे सिखाया कैसे स्ट्रॉ से पीते हैं और मुझे च्युइंग गम से मिलवाया. मैं उन्हें अपने पिता के रूप में जानती हूँ. मैं उन्हें उस कंधे के रूप में भी जानती हूँ जिसे मैं अपनी बाँहों से लिपटती थी इस आशा में कि मैं उन्हें कसकर पकडूँ तो वह नही जायेंगे. वह गए. वह कभी वापस नही आये.
मेरे पिता एक शहीद हैं। मैं उनकी बेटी हूँ.
परंतु।

मैं तुम्हारी "शहीद की बेटी" नहीं हूँ. 

गुरमेहर के ब्लॉग से 
अनुवादक : अमर प्रताप सिंह

शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

गुलाम भारत मे मिले अधिवक्ताओ के अधिकारो को आजाद भारत मे छीना जा रहा हैं

वाई0एस0लोहित सम्बोधित हुए
बाराबंकी। गुलाम भारत में जो अधिकार अधिवक्ताओ और जनता को प्राप्त थे। उन अधिकारो को आज आजाद भारत में छीना जा रहा है। आज अधिवक्ता को अपने अधिकारो के प्रति जागना होगा। अधिवक्ता ही बड़ी आसानी से बड़ी से बड़ी संसद में अपनी बात रखने में समक्ष होता है। कानून मे संशोधन करने के समय हकूमरानों को यह याद रखना चाहिए कि कानून बदलने में नेता नही होने चाहिए। जिस प्रकार 403 विधायक विधानसभा में अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते है। और 542 संसद सदस्य लोकसभा में प्रतिनिधित्व करते है। उसी प्रकार जनता के प्रतिनिधि के रुप में अधिवक्ता होता है। 
                                                     यह बात जिला बार एसोसिएशन सभागार में आयोजित 'अधिवक्ता स्वतन्त्रता एंव प्रतिबन्ध' संगोष्ठी में इण्यिन एसोसिएशन आफ लायर्स के राष्ट्रीय महासचिव वाई0एस0 लोहित ने कही। उन्होने आगे कहा आज अधिवक्ताओ के अधिकारो पर प्रतिबन्ध लगाने का कार्य किया जा रहा है। लेकिन कोई भी फैसला बिना अधिवक्ता के नही लिया जाना चाहिए। अधिवक्ता न्यायालय मे प्रेक्टिस करता है। लेकिन मजबूरन आज उसको आन्दोलन की प्रेक्टिस शुरु करनी पड़ेगी। 
                                       वही जनपद गोण्ड़ा के पूर्व बार अध्यक्ष सुरेश त्रिपाठी ने कहा कि अगर विरोध करना पड़ा तो अधिवक्ता पीछे नही हटेगें। पूर्व विधायक व अधिवक्ता दीप नारायण पाण्डे ने कहा कि आज नये अधिनियमो में अधिवक्ताओ को वचिंत किया जा रहा है। 
                                एसोसिएशन के राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्य  रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि आज 16 लाख अधिवक्ताओ को टारगेट बनाया जा रहा है। अधिवक्ताओ की शक्ति पर आज प्रतिबन्ध लगाने की कोशिश की जा रही है। 
                                                       संगोष्ठी में जिला बार महामंत्री नरेन्द्र कुमार वर्मा, पूर्व अध्यक्ष बृजेश दीक्षित, पूर्व महामंत्री हिसाल बारी किदवई, अनूप कल्याणी, रामशंकर गौतम, हूमायू नईम खां, बृजमोहन वर्मा ने अपने विचार रखे। संगोष्ठी का संचालन सीनियर अधिवक्ता उपेन्द्र सिंह द्वारा किया गया। संगोष्ठी में मुख्य रुप से विजय प्रताप सिंह, पुष्पेन्द्र सिंह, राजेन्द्र सिंह राणा, सरदार भूपिन्दर पाल सिंह, रईस कादरी, अशोक द्विवेदी, आनन्द सिंह, रमन द्विवेदी, गौरी रस्तोगी, प्रतूष शुक्ला, निर्मल वर्मा, योगेन्द्र प्रताप वर्मा, मो0 जमीर, सजंय सिंह, मलखान सिंह, ज्ञान सिंह, मो0 तालिब खां आदि मौजूद रहे।

गुरुवार, 6 अप्रैल 2017

काले कानून से न्याय तंत्र को ख़त्म करने की साजिश

देश में लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था को संचालित करने के कार्य में अधिवक्ताओं की महत्वपुर्ण भूमिका होती है. अधिवक्ताओं द्वारा देश की जनता को न्याय दिलाने में एक महत्वपूर्ण हिस्सेदारी करनी होती है लेकिन विधि आयोग कि सिफारिशों को मानते हुए केंद्र सरकार विधि आयोग द्वारा प्रस्तावित अधिवक्ता अधिनियम (संशोधन) विधेयक 2017 को तैयार किया है जो सीधे तौर पर देश के अन्दर विभिन्न न्यायालयों में काम करने वाले 14 लाख अधिवक्ता प्रभावित होंगे जिससे पूरी की पूरी न्याय व्यवस्था को खतरा हो गया है.  प्रस्तावित विधेयक की कुछ प्रमुख बातें : काम में लापरवाही करने, अनुशासन तोड़ने पर वकीलों पर कार्रवाई होगी, वकीलों को उपभोक्ता आयोग द्वारा तय नियमों के मुताबिक मुवक्किलों को हर्जाना देना होगा, जज या कोई भी न्यायिक पदाधिकारी लापरवाही व अनुशासनहीनता पर वकील का लाइसेंस रद कर सकता है, हड़ताल करने पर वकील पर कार्रवाई या जुर्माना हो सकता है, राज्य बार काउंसिल के आधे से ज्यादा सदस्य उच्च न्यायालयों द्वारा नामित किए जाएंगे। इन सदस्यों में डॉक्टर, इंजीनियर, बिजनेसमैन आदि होंगे, बीसीआइ के सदस्य के लिए कोई चुनाव नहीं होगा, सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश, केंद्रीय निगरानी आयुक्त, चार्टर्ड अकाउंटेंट के अपीलीय पदाधिकारी के द्वारा बीसीआइ के आधे से अधिक सदस्य नामित किए जाएंगे। 
               इस तरह से अधिवक्ता की स्वतंत्रता को अप्रत्यक्ष रूप से सरकार छीनने की कोशिश कर रही है. इस तरह के संसोधनो से अधिवक्ता पूरी तरह से न्यायिक अधिकारीयों की गिरफ्त में आ जायेगा और वह अपनी बात को स्वतंत्रता पूर्वक रखने में असमर्थ होगा. बार कौंसिल का चुनाव न कराकर सरकार अपने पिट्ठू लोगों को नामित कर न्याय व्यवस्था को तथा अधिवक्ताओं को नियंत्रित कर तानाशाही की दिशा में देश को ले जाना चाहती है. 
        सरकार न्यायपालिका में न्यायिक अधिकारीयों की नियुक्ति ही नही कर रही है. जिसके कारण से वादों की संख्या बढती जाती है. नित्य नए कानून सरकार बनाती है लेकिन उन कानूनों को लागू करने के लिए न्यायिक तंत्र को विकसित नहीं करती है जिससे वादों की संख्या बढती जाती है और जब आज वादों का निस्तारण तेजी से नहीं हो रहा है तो उसका ठीकरा अधिवक्ताओं के सर पर फोड़ा जा रहा है.  एक तरफ देश की तमाम हाईकोर्ट न्यायिक अधिकारियों, या जजों की कमी का रोना रो रही हैं और इनमें उच्च न्यायालयों में करीब दो करोड़ और 80 लाख मुकदमें लंबित हैं, वहीं सुप्रीम कोर्ट इस मामले में थोड़ी उपलब्धि हासिल करता दिखाई पड़ रहा है।
     देश की उच्चतम न्यालाय में साल 2002 के मुकाबले साल 2016 में भर्तियों में दो फीसदी का इजाफा हुआ है। साल 2002 में उच्चम न्यायालय में नौकरियां 20 से 22 फीसदी हो गई है। बता दें कि उच्च न्यायालयों में 40 फीसदी जजों की कमी है।
       सरकार जब भी कोई कानून बनाए तो कानून बनाते समय ही उस कानून को तोड़ने वाले व्यक्तियों को दण्डित करने के लिए बजट व नए न्यायिक अधिकारीयों की नियुक्ति करे तभी न्याय व्यवस्था सुचारूरूप से चल सकेगी. अधिवक्ताओं को दबाकर नहीं रखा जा सकता है. पूरे न्यायिक तंत्र को संचालित करने का काम अधिवक्ता ही करता है और अगर काले कानूनों द्वारा अधिवक्ताओं की स्वतंत्रता को छीनने का प्रयास हुआ तो न्यायिक तंत्र समाप्त हो जायेगा.

रणधीर सिंह सुमन
लो क सं घ र्ष !

सोमवार, 20 मार्च 2017

हम कुछ नही कहते हैं --------

 'तपसी धनवंत दरिद्र गृही कलि कौतुक तात न जात कही |'
कलियुग मे तपस्वी धनवान और गृहस्थ गरीब होंगे....यह बात  गोस्वामी तुलसी दास ने लिखी  है तपस्वी को भोग अच्छा लगने लगा और गृहस्थ को योग....विदेशी हमारे यहां योग और अध्यात्म जानने आते हैं और हमारे यहां से लोग विदेश धन कमाने जाते हैं | संत को सरल और सहज जीवन जीने वाला होना चाहिए |..उनके समर्थक  भी गजब हैं...देख रहे किले की तरह अट्टालिका बना कर संत जी हमे त्याग सिखा रहे हैं.....फिर भी होश में नहीं....कोर्ट का सम्मान करते हुए सामने आकर स्वयं अदालत मे हाजिर नही होते है .पथराव,फायरिंग आदि करते  है 
यह अमृतवाणी हमने नहीं प्रकट किया है. अब आप स्वयं देखिए कि यह अमृत वाणी किसकी है.
"जब अयोध्या में विवादित ढांचा गिराने से कोई नहीं रोक सका तो मंदिर बनाने से कौन रोकेगा."
  "मूर्ति विसर्जन से होने वाला प्रदूषण दिखता है लेकिन बकरीद के दिन हज़ारों निरीह पशु काटे गए काशी में, उनका ख़ून सीधे गंगा जी में बहा है क्या वो प्रदूषण नहीं था?"
  "यूपी कैबिनेट के मंत्री आजम ख़ान ने जिस तरह यूएन जाने की बात कही है, उन्हें तुरंत बर्ख़ास्त किया जाना चाहिए. आज ही मैंने पढ़ा कि अख़लाक़ पाकिस्तान गया था और उसके बाद से उसकी गतिविधियां बदल गई थीं. क्या सरकार ने ये जानने की कभी कोशिश की कि ये व्यक्ति पाकिस्तान क्यों गया था? आज उसे महिमामंडित किया जा रहा है."
 "जो लोग योग का विरोध कर रहे हैं उन्‍हें भारत छोड़ देना चाहिए. जो लोग सूर्य नमस्‍कार को नहीं मानते उन्‍हें समुद्र में डूब जाना चाहिए."
  "मुस्लिमों की जनसंख्या तेजी से बढ़ना खतरनाक रुझान है, यह एक चिंता का विषय है, इस पर केंद्र सरकार को कदम उठाते हुए मुसलमानों की आबादी को कम करने की कोशिश करनी चाहिए."
 "अगर उन्हें अनुमति मिले तो वो देश के सभी मस्जिदों के अंदर गौरी-गणेश की मूर्ति स्थापित करवा देंगे. आर्यावर्त ने आर्य बनाए, हिंदुस्तान में हम हिंदू बना देंगे. पूरी दुनिया में भगवा झंडा फहरा देंगे. मक्का में ग़ैर मुस्लिम नहीं जा सकता है, वैटिकन में ग़ैर ईसाई नहीं जा सकता है. हमारे यहां हर कोई आ सकता है."
 लव जेहाद' को लेकर  एक वीडियो सामने आया था.  वह कहते कि हमने फैसला किया है कि अगर वे एक हिंदू लड़की का धर्म परिवर्तन करवाते हैं तो हम 100 मुस्लिम लड़कियों का धर्म परिवर्तन करवाएंगे. 
हम कुछ लिखेंगे तो परम आदरणीय, प्रातः स्मरणीय संतमहापुरुषों के भक्त गण अपने मुखार बिंदु से जिस वाणी का प्रकटन करेंगे उसको सुनकर सम्पूर्ण स्त्री जाति शर्मिन्दिगी महसूस करेगी.
           उसके बात भी हम स्वागत करते हैं कि अगर बिहार में नीतीश कुमार शराब बंदी लागू कर सकते हैं तो इस धर्म राज्य में शराब बंदी तुरंत लागू होनी चाहिए. अगर महात्मा गौतम बुद्ध इस देश के महानायक हैं तो उत्तर प्रदेश राज्य में सम्पूर्ण मांसबंदी लागू होनी चाहिए. अगर यह सब नहीं होता है तो गोस्वामी तुलसीदास ने ऊपर जो लिखा है वह सत्य ही है. तुलसीदास लिखते हैं:-
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥
जो वेषधारी ठग हैं, उन्हें भी अच्छा साधु का सा वेष बनाए देखकर वेष के प्रताप से जगत पूजता है, परन्तु एक न एक दिन वे चौड़े आ ही जाते हैं, अंत तक उनका कपट नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का हाल हुआ. 

रणधीर सिंह सुमन

रविवार, 19 मार्च 2017

वादे मोदी के -इरादे योगी के

उत्तर प्रदेश में 46 मंत्रियों के साथ उग्र हिंदुवत्व के नेता योगी अजय सिंह बिष्ट ने मुख्यमंत्री पद का पदभार संभाल लिया है और आशा की जाती थी. अन्य मुद्दों के अलावा किसान के कर्ज माफ़ी की घोषणा की जाएगी किन्तु किसान कर्जे के सम्बन्ध में या अन्य वादों के सम्बन्ध में कोई भी बात नहीं की गयी है. वादे चुनाव में मोदी के थे और  मोदी प्रधानमंत्री हैं, उत्तर प्रदेश का चुनाव समाप्त हुआ और अब वह गुजरात सहित अन्य राज्यों की तैयारियां शुरू कर दी हैं. वादों से अब उनका कोई सम्बन्ध नही रह गया है. वहीँ, योगी साहब के इरादे भी सत्ता मिलते ही बदल गये हैं. अगर कोई दूसरा दल होता और अल्पसंख्यक समुदाय का सदस्य न जीत कर आता और कोई मंत्री उस समुदाय का बनाया जाता तो तुरंत नागपुर मुख्यालय और उसका प्रचारतंत्र मुस्लिम तुष्टिकरण का राग अलापना शुरू हो जाता लेकिन योगी साहब मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही सबसे पहला काम मुस्लिम तुष्टिकरण के तहत मोहसिन रजा को मंत्रिपद की शपथ दिलाना था. उग्र हिंदुवत्व फायरब्रांड नेता अजय सिंह बिष्ट उर्फ़ आदित्यनाथ ने विश्व हिंदू परिषद के सम्मेलन में कहा कि देश के हर मस्जिद में गौरी-गणेश की मूर्ति विराजमान कर देंगे जैसे उकसावेपूर्ण बयानबाजी के लिए जाने जाते थे अब वह सेक्युलर संविधान के तहत शपथ लेकर नया मुखौटा धारण कर लिया है. गुंडाराज बनाम मंगलराज का नारा देने वाले लोग उच्च आदर्शों और राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ अभियान चलाने वाले अब जब मुख्यमंत्री योगी साहब को चुना जिनके ऊपर कई अपराधिक मुक़दमे विचाराधीन हैं तब यह सब लोग पूर्व में कही गयी बातें भूल गये. उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के ऊपर हत्या सहित सांप्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने समेत 11 अपराधिक मुक़दमे हैं.
        गुंडाराज को समाप्त करने का नारा अब सिर्फ जुमला रह गया है. मोदी के वादे सिर्फ कल्पना मात्र हैं वहीँ मुख्यमंत्री बनने से पहले योगी साहब के इरादे ओस की बूंदों की तरह से गायब हो गये हैं. जब भी किसी दुसरे दल की सरकार बनेगी तब ये वादे और इरादे पुनर्जीवित होंगे. सिर्फ समाज को विघटन की दिशा में ले जाने के लिए ये वाडे और इरादे दिखाई देते हैं. संघ का एजेंडा बहुत धीमी रफ्तार से लागू करने की प्रक्रिया जारी रहेगी जिससे लोग उनके सम्बन्ध में सही बात न जान पाएं. 
  योगी ने सभी मंत्रियों को 15 दिन के अंदर संपत्ति का ब्योरा देने का निर्देश दिया है जैसी बाते कर रहे है जबकि सभी  विधायक चुनाव आयोग को अपनी संपत्ति का ब्यौरा दे  चुके हैविकास का नारा दिया जा है  जनता की आय  विकास होगा या पूंजीपतियों का होगा बात साफ नही की जा रही है केंद्र सरकार कि नीतियों से जनता कि आय घटी है और  अदानी  ,अम्बानियो कि औय में लाखो गुना   बढ़ी है
      वर्तमान सरकार कॉर्पोरेट जगत के रुपयों से चुनी गयी है और जिस तरह से कॉर्पोरेट जगत के इलेक्ट्रॉनिक व प्रिंट मडिया ने एक छाया जनता की भलाई का दिखाया है. जनता का भला नहीं होने जा रहा है हाँ अब कॉर्पोरेट सेक्टर की लूट बढ़ेगी बैंक सिर्फ जनता से पैसा जमा कराकर कॉर्पोरेट सेक्टर को देंगे और कॉर्पोरेट सेक्टर उन रुपयों को वापस नही करेगा. मजदूर, किसान, मेहनतकश जनता सिर्फ लुटेगी और लुटेगी इसके अतिरिक्त कोई उपलब्धि नही होगी. 
बेरोजगारी के सवाल पर सरकार का कोई नजरिया नहीं रहेगा जिससे नवजवानों को रोजगार नही मिलेंगे.कॉर्पोरेट सेक्टर की सेवक सरकार सिर्फ कॉर्पोरेट सेक्टर की ही सेवा करेगी. 

रणधीर सिंह सुमन 

शुक्रवार, 10 मार्च 2017

सैफुल्लाह एनकाउंटर फर्जी कहने पर मौलाना आमिर रशदी पर मुकदमा कायम

 सैफुल्लाह के एनकाउंटर को आमिर रशदी ने उसको फर्जी बताया था और कानपुर जाकर अबतक उस केस से संबधित पकडे गये लोगों के परिवारवालों से मुलाकात भी की थी इसलिए राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल के अध्यक्ष आमिर रशदी मदनी के खिलाफ कानपुर में एफआईआर दर्ज की गई है. रशदी पर लखनऊ में हाल में मारे गए संदिग्ध आतंकी सैफुल्ला के परिवार वालों को कथित तौर पर भड़काने का आरोप है. उत्तर प्रदेश के एडीजी (लॉ एंड ऑर्डर) दलजीत चौधरी ने कानपुर में एसएसपी को रशदी के खिलाफ केस दर्ज करने का निर्देश दिया था.  वहीँ, उलेमा कौंसिल के दफ्तर पर पुलिस पहुँच कर आमिर रशदी का इंतज़ार कर रही है.

 आमिर रशदी ने कहा कि आतिफ के घर में तीन दिन तक कानपुर के एसपी सिटी किस कानून के तहत पूछताछ कर रहे थे. उन्होंने धमकी भरे लहजे में कहा कि अगर एसपी सिटी को तुरंत निलंबित नहीं किया गया, तो वो उत्तर प्रदेश को बंद करा देंगे. आमिर रशदी ने ये भी कहा कि सैफुल्ला के पिता बयान बदलना चाहते हैं, लेकिन बहुत दबाव होने की वजह से डरे हुए हैं.
ज्ञातव्य है कि उलेमा काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना आमिर रशादी मदनी ने कहा कि सैफुल्लाह का एनकांउटर फर्जी है। आतंकी सैफुल्लाह नहीं है, आतंकी तो सरकार है। उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि पुलिस वालों ने सैफउल्लाह को घर के अंदर बंधक बना रखा था।
शुक्रवार दोपहर मौलाना आमिर रशदी मदनी सैफउल्लाह, इमरान और आतिफ के घर पहुंचे। उन्होंने सभी के परिजनों से अलग-अलग बात की। केवल इमरान के घर पर ताला लगा होने के कारण परिजनों से बात नहीं हो सकी। सभी के परिवारों से मिलने के बाद उन्होंने मीडिया से कहा, सैफउल्लाह का एनकाउंटर फर्जी है। आतंकी वह नहीं आतंकी सरकार है। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस वालों ने सैफउल्लाह को घर के अंदर बंधक बना रखा था।
 वहीँ, दूसरी तरफ उत्तर पप्रदेश की जागरूकता की नई मिसाल भी देखने को मिली लखनऊ में हुए आतंकी सैफुल्ला के मुठभेड़ के बाद प्रदेश में  हाई अलर्ट कर दिया गया था। संदिग्धों की तलाश में तेलंगाना एटीएस के चार जवान सिविल ड्रेस में इटावा पहुंचे हुए थे। बताया जा रहा है कि इटावा पुलिस ने तेलंगाना एटीएस के तीन जवानों को संदिग्ध समझकर उन्हे हवालात में डालकर उनकी जमकर धुनाई कर दी। तेलंगाना एटीएस के आईजी तक मामले की जानकारी पहुँचने के बाद यूपी के आला अधिकारियों के हाथ पाव फूले, जिसके बाद उन्हे छोड़ा गया।
इटावा में संदिग्ध आतंकियों की सूचना पर पिछले 15 दिनों से तेलंगाना एटीएस के चार जवान डेरा जमाये हुए थे। बताया जा रहा है कि एटीएस जवानों को ठीक से हिन्दी नहीं आती, जिसके चलते मंगलवार देर रात बाइक सवार तीन जवानों को कुछ स्थानीय लोगों ने शक के आधार पर रोक लिया और उनकी भाषा ना समझ पाने के चलते उन्हे आतंकी समझकर पिटाई कर दी और मामले की सूचना पुलिस को दे दी। जो पुलिस आतंकवादी और एटीएस के कर्मचारी में अंतर नही समझ पाती है वह कानून और व्यवस्था किस तरह से कायम रखती है. वह भी इस उदहारण को देखने के बाद जनता को समझना चाहिए.
मध्य प्रदेश ट्रेन विस्फोट के तुरंत बाद जिस तरह से पुलिस ने कार्यवाई की है, वह अद्भुद है. अभी तक लखनऊ में सर्राफा व्यवसाई के यहाँ हुई लोट का आज तक पता लगाने में असमर्थ है या यूँ कहें कि दिल्ली पुलिस नजीब का आजतक पता नही लगा पायी है.
एग्जिट पोल में भाजपा की सरकार आने की बात आते ही नौकरशाही का भगवाकरण सम्बन्धी विचार पैदा होने शुरू हो गये हैं. एनकाउंटर जब भी कोई होता है तो उसकी स्वत: मजिस्ट्रेटी जांच शुरू हो जाती है. अगर पुलिस की मुठभेड़ सही है तो मजिस्ट्रेटी जांच क्यूँ की जाती है लेकिन हर मुठभेड़ में मरने वाले व्यक्ति के सम्बन्ध में मजिस्ट्रेटी जांच का प्राविधान है इसलिए आमिर रशदी के ऊपर वाद कायम करने का कोई औचित्य नही है लेकिन आने वाली संभावित सरकार के लिए अपनी अभी से भक्ति साबित करना मजबूरी है. 
          लोकतंत्र में किसी भी घटना या किसी कार्य की जांच की मांग लोकतान्त्रिक व्यवस्था का अंग है और यह किसी तरह से अपराध नही है. अभी कुछ दिन पूर्व भाजपा के स्टार प्रचारक मोदी ने चुनाव आयोग के सभी निर्देशों का उल्लंघन करते हुए रोड शो बनारस में किया जबकि धारा 144 सीआरपीसी लगी हुई थी पांच व्यक्तियों को एक साथ जाना मना था लेकिन जब कार्यवाई करने की बात आई तो मंदिर दर्शन का नाम देकर प्रशासन ने हाथ खिंच लिए थे.

-रणधीर सिंह सुमन 

बुधवार, 8 मार्च 2017

सैफुल्लाह का बाहरी आतंकी सम्बन्ध नही था


चुनाव की पूर्व संध्या पर मध्य प्रदेश में ट्रेन में विस्फोट, कानपुर में संदिग्ध आतंकियों की धरपकड़, मणिपुर में विस्फोट व लखनऊ में सैफुल्लाह का एनकाउंटर होना यह दर्शित करता है कि सोची समझी रणनीति के तहत आतंकवाद की राजनीति को राजनीतिक लाभ उठाने के लिए हिस्सा बनाया गया है. 
             कथित आतंकी सैफुल्लाह के एनकाउंटर की मुख्य बात यह है कि सुबह पुलिस ने सैफुल्लाह से पूछताछ की थी.  पुलिस, ID देखा था और जिस मकान में एटीएस ने यह ऑपरेशन किया है उसके दूसरे किरायेदार अब्दुल कय्यूम और उसके बेटे के बीच झगड़े की सूचना पर पुलिस घटना के पांच घंटा पहले ही आई थी। पुलिस ने यहां आकर पिता और पुत्र के बीच पंचायत की थी और मामले को शांत कराया था। इतना ही नहीं पुसिस ने जाते-जाते दूसरे किरायेदार के कमरे में भी झांक-झांककर देखा था और वहां मौजूद दोनों संदिग्ध आरोपियों से भी पूछताछ की थी।
 दूसरे किरायेदारों का कहना है कि पुलिस ने उनकी आईडी भी देखी थी। कय्यूम ने बताया कि सुबह साढ़े नौ बजे बेटे से एक बात को लेकर उनका और उनके बेटे की बीच झगड़ा हो गया था। इसके लेकर उन्होंने पुलिस कंट्रोलरूप को फोन किया। कुछ देर बाद ही पीआरसी मौके पर पहुंच गई। यहां तक की काकोरी थाने से एक दारोगा और सिपाही भी आ गए। कथित एनकाउंटर 7 मार्च को शाम को 4 बजे से प्रारंभ होता है और देर रात ढाई तीन बजे तक चलना यह भी बहुत सारी चीजों को संदिग्ध बनाता है.
        इस बात से यह पुष्टि होती है कि पुलिस उसे पहचानती थी और दुबारा चार बजे पुलिस के पहुँचने पर दरवाजा बंद कर फायरिंग करने लगना यह अपराध शास्त्र के मनोविज्ञान के ही खिलाफ है. 
आर डी निमेष कमीशन ने जब कचेहरी सीरियल बम विस्फोट कांड की जांच की थी तो कमीशन ने यह माना था कि तारिक काशमी व खालिद मुजाहिद आतंकी नहीं थे और उनकी गिरफ्तारी और बरामदगी को फर्जी माना था. कचेहरी सीरियल बम विस्फोट काण्ड में भी उत्तर प्रदेश एटीएस ने बहुत सारे स्वनाम धन्य आतंकी संगठनो से तार जोड़े थे.
वहीँ, "दलजीत सिंह , यूपी,एडीजी, कानून -व्यवस्था ,ने बताया की सैफ़ुल्लाह एंड कंपनी का किसी भी बाहरी आतंकी संगठन से संबंध नहीं था, उनको बाहर से किसी भी किस्म की मदद नहीं मिलती थी। प्रेस कॉंफ़्रेंस में अभी दिया गया यह बयान बहुत ही महत्वपूर्ण है। इससे मीडिया और फेसबुक पर बटुकसंघ का प्रचार खारिज होता है। इसका अर्थ यह है वे आईएसआईएस के साथ जुड़े नहीं थे।" - जगदीश्वर चतुर्वेदी की फेसबुक वाल से
         इस बयान के आने के बाद अब जरूरत इस बात की है कि इन सभी प्रकारों की जांच माननीय उच्च न्यायलय के वर्तमान न्यायाधीश को आयोग का अध्यक्ष बना कर करायी जा.

रणधीर सिंह सुमन

रविवार, 5 मार्च 2017

विदेशों में मोदी का पाप सामने आ रहा है

मोदी की विदेश यात्राओं का फल अब अमेरिका से मिलना शुरू हो गया है और कुछ दिन पूर्व अमेरिका के कनसास में भारतीय इंजीनियर श्रीनिवास कुचिभोटला की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. हत्यारे ने गोली मारने के दौरान चिल्लाकर कहा था 'मेरे देश से निकल जाओ.' 
              अब अमेरिका में एक अज्ञात शख्स ने 39 साल के एक सिख को उसके घर के बाहर गोली मारकर घायल कर दिया. बताया जा रहा है कि हमलावर ने गोली चलाते समय कथित तौर पर कह था- ‘अपने देश वापस जाओ.’ अमेरिकी मीडिया में छपी खबर के मुताबिक यह सिख व्यक्ति शुक्रवार को वॉशिंगटन के केंट शहर स्थित अपने घर के बाहर अपनी गाड़ी ठीक कर रहा था, 
          प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी ने अब तक 68 देशों कि विदेश यात्राएं की हैं और लगभग हर देश में अनिवासी भारतियों कि सभाओं को संबोधित कर भारत से जुड़ने कि अपीलें कर रहे थे. देश क अन्दर अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणापद प्रचार उनके सत्ता को चलाने का एक हिस्सा है वहीँ उनके तथाकथित अभिन्न मित्र ट्रम्प अपने चुनाव प्रचार में भारतीय या दूसरे देशों क रहने वाले अनिवासियों के खिलाफ घृणापद प्रचार चला रहे थे. जिससे अमेरिका सहित विभिन्न देशों में रहने वाले अनिवासियों को वहां रहना मुश्किल हो रहा है राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की अंतर्राष्ट्रीय शाखा अनिवासी भारतियों से चंदा वसूल-वसूल कर यहाँ भेजती है और उसी चंदे से देश के अन्दर अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणापद प्रचार अभियान चलाया जाता है. मोदी ने विदेशों में जाकर अनिवासी भारतीयों को एक मंच पर लाकर देश से जुड़ने कि बड़ी-बड़ी अपीलें की थीं जिससे उन नागरिकों की निष्ठा उस मुल्क में संदिग्ध होना शुरू हो गयी थी. 
            इससे पूर्व कि सरकारें अनिवासी भारतीयों को उस देश का नागरिक मानते हुए उसी देश के प्रति निष्ठा बनाए रखने कि नीति को कायम रखा था लेकिन मोदी ने उस नीति को परिवर्तित कर सम्पूर्ण अनिवासी भारतीयों की उस देश के प्रति निष्ठावान रहने की स्तिथि को बदल दिया. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के नाम पर नागपुर मुख्यालय ने जो प्रचार अभियान विदेशों में चलाया है उससे विदेशों में रहने वाले अनिवासी भारतीयों के प्रति एक घृणा का माहौल पैदा हो गया है. 
         बगैर किसी नीति के मोदी के मन में जो भी आता है करने लगते हैं उसके दुष्परिणाम वह समझते नहीं हैं या जानबूझकर उसकी अनदेखी करते हैं. मुख्य बात यह भी है कि उन्हें अच्छी तरह से अंग्रेजी  नहीं आती है जिसके कारण वह कई बार परेशान हो जाते है कि, किस तरह बातें करना है और कैसे उन्हें जवाब देना है  इसलिए नागपुरी प्रचार कि भाषा इस्तेमाल  करना उनके आसन पड़ता है 
                           मोदी ने विदेश नीति के नाम पर नागपुर मुख्यालय की विषाक्त विचारधारा का जो प्रचार विदेशों में किया है वह उनके पाप हैं जिसकी सजा अनिवासी भारतीयों ने विदेशों में भुगतना शुरू कर दिया हैं. यह लोग यह नहीं सोचते हैं कि अगर अपने देश में रहने वाले दुसरे धर्मों के मतावलंबी या विचारधारा के आधार पर अंतर्राष्ट्रीयतावाद में यकीन करने वाले लोगों के ऊपर नागपुरी मुख्यालाय जब हमला करता है तब  अनिवासी भारतीयों का क्या होगा. पाप कोई करे सजा कोई भुगते.

रणधीर सिंह सुमन 

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2017

सरकार बनाएगा और कॉर्पोरेट सेक्टर की ही सेवा करेगा.

दुनिया के एक बड़े हिस्से ने शोषकों से उत्पीडित जनता को निजात दिलाने के लिए साम्यवाद के विचारों को अपनाया था जब तक वह कारण दुनिया में विद्यमान रहेंगे साम्यवादी विचारों की आवश्यकता बनी रहेगी.
आज प्रदेश में विराट बेरोजगारी फैली हुई है सत्तारूढ़ दल बेरोजगारी की समस्या का समाधान करने में असमर्थ हैं उसका मुख्य कारण विचारों का अभाव होना है. कॉर्पोरेट सेक्टर के पैसे से चुनाव लड़ने वाले सत्तारूढ़ दल व अन्य पूंजीवादी दल कॉर्पोरेट सेक्टर की सेवा करने के लिए पढ़े-लिखे नौजवानों को बेरोजगार बनाये रखना चाहते हैं इसलिए लाखों-लाख इंजिनियर, प्रशिक्षित अध्यापक, बिज़नेस मैनेजमेंट कर्ता पांच हज़ार रुपयों से लेकर 10 हज़ार रुपये प्रतिमाह की नौकरी करने के लिए मजबूर हैं वहीँ  लाखों-लाख करोड़ रुपये का मुनाफा प्रतिवर्ष कॉर्पोरेट सेक्टर करता हैं, पूंजीवादी मुनाफे के लिए आवश्यक है कि बेरोजगारों की मंडी बनी रहे और इसीलिए कॉर्पोरेट सेक्टर हज़ारों करोड़ रुपये पूंजीवादी राजनीतिक दलों के ऊपर खर्च करता है.
                               सपा, बसपा, भाजपा, कांग्रेस कॉर्पोरेट सेक्टर की सेवा में उन्ही के पैसे चुनाव लड़ रहे हैं जो भी जीतेगा वह सरकार बनाएगा और कॉर्पोरेट सेक्टर की ही सेवा करेगा.
              आज किसान को अपने उत्पादन का मूल्य न मिलने से कोल्ड स्टोरेज में रखा उसका आलू सड़ गया और नए आलू का मूल्य 400 रुपये प्रति कुंतल है, 600 रुपये प्रति कुंतल में धान अभी बिका है. किसान दिवालिया हो रहा है. बुनकरों के पास काम न होने के कारण वह प्रतिदिन 100 रुपये कि भी मजदूरी नहीं कर पा रहा है. प्रतिवर्ष धान वा गेंहू की खरीद कि व्यवस्था कागजों पर ही होती रही है. जिससे प्रदेश के किसानो कि माली हालत ख़राब हुई है. नोटबंदी के कारण गाँवों के अन्दर मजदूरी मिलनी बंद हो गयी है.
         प्रदेश में कांग्रेस, सपा, बसपा, भाजपा की सरकारें रही हैं. इन सभी दलों के नेतागण मजदूरों, किसानो, बुनकरों कि चिंता में रात दिन लगे रहते हैं जिससे यह तबके आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं कॉर्पोरेट सेक्टर का मुनाफा लाखों-लाख करोड़ हो रहा है. विकास की इस धारा में कॉर्पोरेट सेक्टर मालामाल हो रहा है और मजदूर, किसान, बुनकर, मध्यम वर्ग तबाह हो रहा है.
            आइये ! हम आप सब मिलकर एक नई व्यवस्था का निर्माण करे जिसमें भूख, शोषण, अत्याचार, उत्पीडन न हो और एक शोषण रहित सुखी समाज की स्थापना हो सके.
इसके लिए

  • 17 वीं विधान सभा में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के चुनाव निशान हंसिया बाली वाले खाने का बटन दबा कर विजयी बनाएं तथा वामपंथी दलों को जितायें.
  • सांप्रदायिक, जातिवादी तथा वंशवादी ताकतों को परास्त करें.
  • भ्रष्ट, अपराधी तथा माफिया सरगनाओं को विधान सभा में पहुँचने से रोकें.
  • किसान, मजदूर एवं आम आदमी की बर्बादी का कारण आर्थिक नवउदारवाद की नीतियों को पीछे धकेलें.

  नोट ; भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी प्रतिनिधि रणधीर सिंह सुमन  का लेख  1 मार्च   को आल इंडिया रेडियो  से  प्रसारित  किया जाएगा