शनिवार, 19 सितंबर 2020

कामरेड रोजा देशपांडे का निधन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बाराबंकी ने शोक व्यक्त किया


मुंबई: वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता और लोकसभा के पूर्व सदस्य रोजा देशपांडे का बुढ़ापे के कारण शनिवार दोपहर यहां उनके आवास पर निधन हो गया।


देशपांडे, 9 1वर्षीय , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक, श्रीपाद अमृत डांगे की बेटी थीं।


वह एक बेटे और एक बेटी से बचे हैं।


देशपांडे ने संयुक्ता महाराष्ट्र आंदोलन (महाराष्ट्र राज्य के निर्माण के लिए आंदोलन) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य के रूप में गोवा मुक्ति संघर्ष में हिस्सा लिया था।


1974 में, वह बॉम्बे दक्षिण मध्य निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुनी गईं।


उन्होंने कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश का लाभ प्राप्त करने के लिए एक अभियान का नेतृत्व किया था, और विभिन्न केंद्रीय और राज्य सरकार की समितियों में श्रम समस्याओं, विशेष रूप से महिला श्रमिकों की सेवा की।


महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया।

 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

मोदी के नाम वीडियो वाइरल कर पूर्व विधायक पुत्र ने आत्महत्या की


 सूरज न बदला चांद न बदला न बदला  भगवान

 कितना बदल गया इंसान


 मोदी जी प्रधानमंत्री

 हम लोग क्या करें केसीसी भी  बैंक नहीं बना रही है बताइए हम लोग कैसे जिएं पित्र पक्ष की चतुर्दशी व  आज अमावस्या भी है माता पिता को प्रणाम करते हुए बड़े बाबा कोटवा धाम को प्रणाम करता हूं एवं अपने समस्त  पूर्वजों को प्रणाम करते हुए अपने दिल की बात करता हूं बात अच्छी लगे तो लाइक कर दीजिएगा या शेयर कर दीजिएगा हमने तो आपको चुना था आपने हमको दुत्कार दिया ऐसा न करें इसका परिणाम जनता आपको देगी। आप मन की बात करते हैं हम आपसे दिल की बात कर रहे हैं: आज लोग भटक रहे हैं मैं भटक रहा हूं जनता भी भटक रही है।

एक आम आदमी की तरह से बात कर रहा हूँ।

दिल की बात  अपने दोस्तों से साझा कर रहा हूं इसमें कोई पार्टी की बात नहीं है दिल की बात कर रहा हूं।

जय हिंद।

जय भारत। यह वीडियो वाइरल करने के बाद संजय शुक्ला पुत्र स्वर्गीय शेष नारायण शुक्ला के बेटे ने आत्महत्या कर ली है।

बाराबंकी मैं आत्महत्याओं का दौर जारी है योगी मोदी सरकार को दृष्टि दोष के कारण नहीं दिखता है।

मुंशीगंज बाराबंकी

भवानी शंकर सेनगुप्ता आजादी के महानायक ःअनिल राजिमवाले


भवानी शंकर सेनगुप्ता का जन्म

26 जनवरी 1909 को खुलना

जिले के फूलटोला थाने के भैरव

नदी किनारे स्थित पयग्राम में हुआ

था। अब वह स्थान बांग्लादेश में स्थित

है। वे अत्यंत अल्प साधनों वाले

मध्यम-वर्गीय परिवार के थे। उनके

पिता का नाम हर्षित सेनगुप्त और

माता का नलिनीबाला था। प्रारंभिक

शिक्षा करने के बाद भवानी सेन 13

वर्ष की उम्र में गांव छोड़ 20मील

दूर मूलधर फूफी के घर चले गए।

इसका कारण था परिवार की गरीबी।

वहां उसने 1921 में खररिया हाई

स्कूल में प्रवेश ले लिया। 1927 में

मैटिक पास करने के बाद मूलधर

छोड़ दिया।

राजनैतिक गतिविधियों का आरंभ

वह असहयोग आंदोलन का

जमाना था। हथकरघे और चरखे ने

उनकी देशभक्ति की भावनाओं को

जगा दिया था। प्रत्येक रविवार वे

स्कूल के अपने सहपाठियों के साथ

‘हित साधन समिति’ के स्वयंसेवक

के रूप में मुष्टि-भिक्षा के लिए निकल

जाया करते। इस काम में उन्हें अत्यंत

ही आनंद मिलता। 1926 में उन्होंने

एक कताई प्रतियोगिता में प्रथम

पुरस्कार जीता। वे चरखा चलाने में

निपुण हो गए थे।

1929 में ही मूलधर में खुलना

जिला राजनैतिक सम्मेलन का

अधिवेशन आयोजित किया गया।

देशबंधु सी.आर. दास आनेवाले थे

लेकिन नहीं आ पाए, इसलिए

वीरेंद्रनाथ सस्भाल ने उनका स्थान

लिया। भवानी सेन के शब्दों में ‘‘इसी

समय मैं अव्यक्त रूप से क्रांति के

शिविर में आ गया।’’

भवानी सेन निर्मल दास के मार्फत

‘जेसोर-खुलना दल’ के नेता प्रमथ

भौमिक के संपर्क में आ गए। दल

डॉ. भूपेंद्रनाथ दत्त के प्रभाव में

मार्क्सवाद की ओर झुकने लगा। यह

1925 की बात है। साथ ही भवानी

ने टैगोर तथा अन्य द्वारा रचित साहित्य

में भी दिलचस्पी ली। उन्होंने लिखा है

कि मूलधर हाई इंगलिश स्कूल से

मैट्रिक करके प्रथम श्रेणी की

स्कॉलरशिप पाई। वे दौलतपुर के हिन्दू

अकादमी में इंटरमीडियट में भर्ती हो

गए और छात्रवृत्ति प्राप्तकर्ता की

हैसियत से उन्हें निःशुल्क छात्रावास,

भोजन तथा मुक्त पढ़ाई मिला करती।

कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनियां-23

भवानी सेनः बहुमुखी प्रतिभा युक्त साथी

इस बीच उन्होंने लेनिन, ट्रॉट्रस्की,

पोस्टगेट, एम.एन.रॉय, इ. लेखकों की

पुस्तकें पढ़ डालीं। प्रमथ भौमिक के

अलावा उनका परिचय विष्णु चटर्जी

से हुआ जो आगे चलकर बांग्लादेश

के महान किसान नेता बने।

1929 में इंटरमीडियट पास

करने के बाद कलकत्ता चले गएऋ

उन्हें फिर छात्रवृत्ति मिली। उन्होंने

स्कॉटिश चर्च कॉलेज में अर्थशास्त्र

में ऑनर्स के साथ पढ़ाई की। उनकी

फीस माफ थी।

चटगांव शास्त्रगार कांड के बाद

प्रमथ भौमिक भूमिगत हो गए। उस

वक्त भवानी बी.ए. की परीक्षा की

तैयारी में लगे हुए थे। प्रमथ उनसे

गुप्त रूप से मिले और ट्रेड यूनियन

का काम करने तथा कम्युनिस्ट पार्टी

से संपर्क बनाने की सलाह दी। सुभाष

चंद्र बोस ने इन युवाओं को अपने

दल में शामिल करने का प्रयत्न किया

था लेकिन प्रमथ की कोशिशों से यह

नाकाम हो गया।

मेरट षड्यंत्र केस के दौरान बाहर

के साथियों में भवानी ने बी.टी.आर

तथा अन्य कुछ साथियों से संपर्क

किया लेकिन उन्हें उनका रूख पसंद

नहीं आया। कुछ समय तक भवानी

सेन ने ‘कारखाना’ नामक साप्ताहिक

का सम्पादन किया लेकिन बिना नाम

के। वे 22 मई 1932 को गिरफ्तार

कर लिए गए और अलीपुर सेंट्रल

जेल भेज दिए गए। वहां वे

फरवरी1933 तक रहे। फिर

हिजली कैम्प भेज दिए गए। वहां

उनकी मुलाकात जेसोर-खुलना ग्रुप

के पुराने साथियों से हुई। वे कम्युनिस्टों

के प्रवक्ता बन गए। जेल के अंदर

‘अनुशीलन’ वालों के साथ मार्क्सवाद

पर जमकर वाद-विवाद हुआ। उन्होंने

सबों पर विजय पाई और मार्क्सवादी

विद्वान के रूप में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ी।

कई लोग कम्युनिस्ट बनने लगे।

जुलाई 1933 में भवानी सेन

का तबादला प्रेसिडेन्सी जेल कर दिया

गया। वहां कई लोग उन्हें जानते थे

और उनका ज्ञान का लोहा मानते थे।

वहां कॉ. गोपाल हलधर भी थे।

देवली कैम्प में

1934 में भवानी सेन को सुदूर

देवली कैम्प भेज दिया गया। वहां

विभिन्न क्रांतिकारी गुटों के नेता और

सदस्य भी थे। वहां प्रमथ भौमिक,

धरणी गोस्वामी, रेवती बर्मन, पांचु

गोपाल भादुरी, जीतेन घोष ;बाद में

बांग्लादेश मेंद्ध, सरोज आचार्य, सुधांशु

अधिकारी, इ. थे।

मार्क्सवाद पर क्लास लगने लगे

और मार्क्सवादी दर्शन संबंधी भवानी

सेन के लेक्चर काफी लोकप्रिय होने

लगे। कुछ लोग कम्युनिस्टों से ईर्ष्या

करने लगे। बात यहां तक बढ़ गई

कि कई कम्युनिस्ट विरोधी नजरबंदों

ने 1936 में एक दिन कम्युनिस्टों

की खूब पिटाई कर दी। कम्युनिस्टों

की संख्या कम थी। भवानी सेन को

बहुत पीटा गया और वे बेहोश हो गए।

कई कम्युनिस्टों को अस्पताल भेजना

पड़ा।

इस घटना के कुछ दिनों बाद

स्थिति में परिवर्तन होने लगा और

पिटाई करने में प्रमुख भूमिका अदा

करने वाला स्वयं ही कम्युनिस्ट बन

गया! भवानी ने दंगाइयों के नाम बताने

से इन्कार कर दिया। इस पर दंगा

करने के आरोप में उन्हें दो हफ्ते

‘‘काल-कोठरी की सजा’’ दी गई

उन्हें एम.ए. ;अर्थशास्त्रद्ध की परीक्षा में

भी देवली से ही बैठना पड़ा।

देवली में ढेर-सारी किताबें हुआ

करतीं। उन्होंने जेम्स जीन्स, एडिंगटन,

मैक्स प्लैंक से लेकर भारतीय दर्शन

संबंधी पुस्तकें भी पढ़ लीं। प्रमथ

भौमिक के अनुसार, अंग्रेजी में उपलब्ध

हेगेल की सारी रचनाएं उन्होंने पढ़

रखी थीं। उन्होंने मार्क्स की पूंजी का

अध्ययन किया।

1936 में वे देवली में कम्युनिस्ट

समन्वय समिति ;कोऑर्डिनेशन

कमिटिद्ध में शामिल हो गए। उनके

साथ-साथ धरणी गोस्वामी, रेवती

बर्मन, प्रमथ भौमिक, पांचु गोपाल

भादुरी, सुशील चटर्जी और लगभग

सौ अन्य नजरबंद भी शामिल हो गए।

देवली कैम्प में पहली बार 7

नवंबर 1936 को सुशील चटर्जी

के कमरे में ‘‘नवंबर क्रांति दिवस’

मनाया गया। पांच कैम्पों से लगभग

125 नजरबंद इसमें शामिल हुए।

भवानी सेन का भी भाषण हुआ।

1937 में उन्हें देवली से हटाकर

कोमिल्ला में एक गांव में रहने पर

मजबूर किया गया। विभिन्न जेलों में

छह वर्ष बिताने के बाद अगस्त

1938 में वे रिहा कर दिए गए।

रिहा होने पर भवानी सेन अपने

घर और परिवार के पास नहीं गए।

इसके बजाय वे कलकत्ता चले गए।

उन्होंने पूर्वी बंगाल रेलवे वर्कर्स यूनियन

के कांचरापाड़ा और लिलुआ केंद्रों में

रेलवे मजदूरों के बीच काम करना

आरंभ कर दिया। 1938 में उन्हें

रेलवे पार्टी शाखा में सदस्यता मिल

गई। वे पूर्व बंगाल रेलवे वर्कर्स यूनियन

के संगठन सचिव चुने गए।

1940 में उन्हें कलकत्ता से

निष्कासित कर दिया गया। वे तुरंत

भूमिगत हो गए। भूमिगत रहते हुए ही

उन्होंने इंदिरा सेन से विवाह कर

लिया। 1947 में इंदिरा बीमार हो

गईं और मृत्यु-पर्यन्त कई वर्षों तक

बीमार रहीं। भवानी सेन ने बड़े शांत

भाव से ये सारे दुख झेले और परिवार

की देखभाल की। 1942 में जब

पार्टी पर से पाबंदी हटाई गई तो उन्हें

भा.क.पा. की प्रांतीय समिति का

कार्यकारी सचिव बनाया गया। अब वे

खुलकर काम करने लगे। मई

1943 बंबई में आयोजित प्रथम पार्टी

कांग्रेस में उन्हें केंद्रीय समिति का

सदस्य बनाया गया।

बंगाल का महा-अकाल, 1943

1943-44 में बंगाल में

भयंकर महा-अकाल पड़ा जिसमें तीस

लाख से भी अधिक लोग मारे गए।

अकाल की पृष्ठभूमि में 1944 में

भवानी सेन ने बंगला में ‘भंगनेर मुखे

बांग्ला’ ;बर्बादी के कगार पर बंगालद्ध

नामक पुस्तक लिखी। यह अंग्रेजी में

‘रूरल बंगाल इन रूइन्स’ के शीर्षक

तले प्रकाशित हुई।

यु(ोत्तर साम्राज्यवाद-विरोधी

उभार, 1945-47

इस दौर की विभिन्न घटनाओं के

दौरान भवानी सेन एक गंभीर और

सुयोग्य नेता के रूप में उभर आए।

29 जुलाई 1946 को सारा बंगाल

बंद रहा। कांग्रेस और फॉरवर्ड ब्लॉक

के कुछ शरारती तत्वों ने पार्टी दफ्तर

पर हमले किए। भवानी सेन ने

शांतिपूर्वक स्थिति का सामना किया।

‘कलकत्ता नरसंहार’ और

नोआखाली के भयानक दंगे हुए।

भवानी ने संतुलन बनाए रखा। वे

बेलियाघाटा में गांधीजी से मिले और

संप्रदायवाद-विरोधी अभियान में पार्टी

के पूर्ण समर्थन की घोषणा की।

भवानी सेन की क्षमता 1946

में आरंभ हुए तेभागा आंदोलन के

दौरान उभरी। वे इस महान किसान

संघर्ष के रणनीति-निर्धारक, प्रमुख

प्रवक्ता, प्रचारक, लेखक और

संगठनकर्ता थे।

दूसरी पार्टी कांग्रेस, 1948

फरवरी-मार्च 1948 में भारतीय

कम्युनिस्ट पार्टी की दूसरी पार्टी

कलकत्ता में ही संपन्न हुई। उन्होंने

कांग्रेस में सक्रिय भूमिका अदा की।

वे केंद्रीय समिति और पोलिट ब्यूरो

के सदस्य चुने गए। बंगाल में पार्टी

अवैध घोषित कर दी गई।

इस दौर के जीवन का एन.के.

कृष्णन ने बड़ा ही दिलचस्प वर्णन

किया है। वे भी पॉलिट ब्यूरो सदस्य

थे और भवानी सेन के साथ एक ही

‘डेन’ ;अड्डेद्ध में रहते थे। वहां दोनों

को ही स्वादिस्ट बंगला खाना बनाना

सीखने का मौका मिला।

पोलिट ब्यूरो सदस्य के रूप में

भवानी सेन भी अन्य साथियों के साथ

संकीर्णतावादी दुस्साहिक लाईन के

लिए जिम्मेदार थे। 1951 में उन्होंने

इस संबंध में आत्म-आलोचना की।

उनकी आत्म-आलोचना सबसे स्पष्ट

और सबसे खरी थी।

वे 1951 के पार्टी सम्मेलन में

पार्टी सदस्यता से एक साल के लिए

मुअत्तल कर दिए गए। उन्होंने यह

फैसला सच्चे मन से मान लिया और

निचले स्तर से काम शुरू किया।

लेकिन उन्हें अनावश्यक रूप से

प्रताड़ित किया गया। उनका नाम

पूरावक्ती कार्यकर्ताओं की लिस्ट से

हटा दिया गया और अपना बंदोबस्त

खुद करने को कहा गया। इसलिए

उन्हें किसान सभा के ऑफिस में रहना

पड़ा। उन्हें पार्टी की साप्ताहिक पत्रिका

‘मतामत’ का उप-संपादक बनाया

गया। बाद में वे बारासात चले गए

और 24-परगना के किसानों के बीच

काम करना आरंभ किया।

1954 में उन्हें अखिल भारतीय

किसान सभा का महासचिव चुना गया।

उन्होंने बदलते कृषि संबंधों का काफी

अध्ययन किया और कई पुस्तकें

लिखीं। 1955 में उन्होंने ‘भारतीय

भूमि व्यवस्था और भूमि सुधार’

प्रकाशित की। इस पुस्तक ने तहलका

मचा दिया। 1955 में पार्टी कांग्रेस

से पहले ‘फोरम’ में भी उनका लेख

प्रसि( हुआ। उस वक्त किसान और

कम्युनिस्ट आंदोलनों में कृषि के क्षेत्र

अनिल राजिमवाले

शेष पेज 6 परपूंजीवादी संबंधों के विकास के

बारे में काफी विवाद रहा। भवानी सेन

ने इसमें अग्रणी भूमिका अदा की।

वे किसानों से आसानी से संबंध

कायम कर लेते। साथ ही सै(ांतिक

अध्ययन भी करते। उन्होंने नए खेत

मजदूर वर्ग को पहचान लिया। इस

विषय में खासकर उन साथियों से

बड़ी बहस चलती जो आगे चलकर

पार्टी छोड़ गए। वे अ.भा. किसान सभा

के बनगांव अधिवेशन के प्रमुख

संगठनकर्ता थे।

1955 के बाद भावानी सेन ने

विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन की नई

प्रस्थापनाएं तेजी से आत्मसात करना

आरंभ किया। वे विश्व कम्युनिस्ट

सम्मेलनों के नए दस्तावेजों एवं

प्रस्थापनाओं के दृढ़ समर्थक बन गए।

1970 में बारासात में अ.भा.

किसान सभा ने अपना सम्मेलन किया

जिसके वे प्रमुख संगठकर्ता थे। वे

इसके अध्यक्ष चुने गए। लाखों लोग

उन्हें सुनने सभा-स्थल पर आए।

पार्टी में विभाजन और भावानी सेन

प. बंगाल की पार्टी इकाई लगातार

उनकी उपेक्षा करती रही। आगे

चलकर ये ही लोग पार्टी से बाहर

चले गए। 1962 में चीनी आक्रमण

के बाद स्थिति गंभीर हो गई। भवानी

सेन ने एक पुस्तक लिखीः

‘‘कम्युनिस्ट शिविर में मतभेद

क्यों?’’ इसकी दसियों हजार प्रतियां

भवानी सेनः बहुमुखी प्रतिभा युक्त साथी

बिकीं। संकीर्णतावादियों के बाहर जाने

के बाद पार्टी के प्रमुख साथियों ने

पार्टी के पुनर्गठन का कार्य आरंभ

किया। प. बंगाल में यह काम बहुत

कठिन था। पार्टी को लगभग

आरंभ-बिन्दु से शुरू करना पड़ा।

भवानी सेन ने अथक परिश्रम के जरिए

60 और 70 के दशकों में राज्य में

भा.क.पा. को फिर से खड़ा कर

लिया, बल्कि उसे एक महत्चपूर्ण शक्ति

का रूप भी दे दिया।

पार्टी संगठन में

1956 में पालघाट ;केरलद्ध

कांग्रेस में भवानी सेन पार्टी की केंद्रीय

समिति के सदस्य चुने गए। 1958

में वे भा.क.पा. की राष्ट्रीय परिषद

सदस्य चुने गए। 1961 में पार्टी की

राष्ट्रीय परिषद और केंद्रीय

कार्यकारिणी समिति में शामिल कर

लिए गए।

1964 में पार्टी में विभाजन के

बाद वे पार्टी की प. बंगाल राज्य

परिषद के सचिव बनाए गए। उसी

वर्ष बंबई कांग्रेस में वे पार्टी की केंद्रीय

कार्यकारिणी समिति के सदस्य चुने

गए।

1965 में उन्होंने कलकत्ता में

पार्टी की नई पुस्तक-दुकान स्थापित

की। वे ‘कालांतर’ अखबार के दैनिक

बनने के बाद इसके सम्पादक मंडल

के अध्यक्ष बन गए।

1968 में पटना में संपन्न पार्टी

कांग्रेस में उन्हें राष्ट्रीय परिषद, केंद्रीय

कार्यकारिणी और पहली बार केंद्रीय

सेक्रेटारिएट में शामिल किया गया।

1971 में कोचीन पार्टी कांग्रेस में वे

फिर से केंद्रीय सेक्रेटारिएट में आ

गए। उन्हें अन्य कार्यों के अलावा पार्टी

शिक्षा का प्रभारी बनाया गया तथा पार्टी

स्कूल एवं सिलेबस को नया रूप देने

का कार्य उन्होंने अन्य साथियों के

साथ किया। इस सिलसिले में उन्होंने

बल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया और पूर्वी

जर्मनी की यात्राएं कीं।

बांग्लादेश की मुक्ति में भवानी

सेन की भूमिका

1971 में पाकिस्तानी आक्रमण

के विरू( बांग्लादेश मुक्ति-आंदोलन

की सहायता में भवानी सेन की भूमिका

को आज भी याद किया जाता है।

मुक्ति संघर्ष को बिरादराना सहायता

देने में उनकी भूमिका आमतौर पर

अनजानी है। उन्होंने प. बंगाल की

सीमावर्ती जिलों में पार्टी साथियों को

बांग्लादेश के साथियों का स्वागत और

सहायता करने के इंतजाम का आदेश

दिया। उन्हें केंद्रीय पार्टी से बांग्लादेश

के संबंध में विशेष जिम्मेदारी दी गई

थी। जेसोर, खुलना तथा अन्य

सीमावर्ती क्षेत्रों में प्रशिक्षण का विशेष

इंतजाम किया गया। भवानी सेन ने

व्यापक दौरा किया, यहां तक कि वहां

की जनता को संबोधित भी किया।

उन्होंने अद्भुत कार्य किया। मुक्ति के

बाद वे कई बार बांग्लादेश गए।

भवानी सेन की मृत्यु 10 जुलई

1972 को मास्को में हृदय-गति

रूकने से हो गई। वहां वे इलाज के

लिए गए थे।

सोमवार, 14 सितंबर 2020

योगी सरकार किसानों की जमीन छीन लेना चाहती हैं - रणधीर सिंह सुमन

ठबाराबंकी। विकास प्राधिकरण बाराबंकी का गठन का प्रस्ताव पहले भी हुआ था, लेकिन किसानों के विरोध के कारण प्रस्ताव ठण्डे बस्ते में चला गया था और अब जिला प्रशासन फिर किसानों की जमीन को औने-पौने दामों पर खरीदकर किसानों को बेरोजगार कर देना चाहते हैं, जब मजदूर गुजरात महाराष्ट्र से जब वहां से भागे तो उन्हें गांव में ही ठिकाना मिला था। 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि बाराबंकी विकास प्राधिकरण बनाकर सरकार किसानों की जमीन छीन लेना चाहती है। पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि एक तरफ किसानों की जमीन छीनी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी कर्मचारियों की नौकरी छिन रही हैं, यह सरकार नरभक्षी सरकार है। सहसचिव शिवदर्शन वर्मा ने भी कहा कि ओ0पी0डी0 अविलम्बह खोली जाये, जनता को इलाज मिल सके। जुलूस छाया चैराहे से जिलाधिकारी कार्यालय बाराबंकी तक गननभेदी नारे लगाते हुए आया। जिसका नेतृत्व किसान सभा अध्यक्ष विनय कुमार सिंह, पार्टी के सह सचिव डाॅ0 कौसर हुसैन व किसान सभा उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने योगी-मोदी मुर्दाबाद, नरभक्षी सरकार बदलनी है, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी जिन्दाबाद आदि नारे लगाते हुए जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचे। 

प्रदर्शनकारियों में प्रमुख लोग अंकुल वर्मा, श्याम सिंह, विनीत वर्मा, अलाउद्दीन, नीरज वर्मा, महेन्द्र यादव, आशीष, प्रदीप, रितेश यादव, शिवम यादव, पवन पाण्डे, अभिषेक, दीपक, लव त्रिपाठी, भूपेन्द्र प्रताप सिंह, सहजराम, गिरीश चन्द्र, वीरेन्द्र वर्मा, सहजराम, कल्लूराम प्रधान, अमर सिंह गुड्डू आदि प्रमुख लोग थे। 



 

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

आजादी के महानायक कॉ. एस.एस. मिरजकर


कॉ. एस.एस. मिरजकर बंबई और

भारत के मजदूर एवं कम्युनिस्ट

आंदोलन के असाधारण नेताओं में थे।

हालांकि इनका नाम अधिक नहीं जाना

जाता है, वे उन नेताओं में थे जिन्होंने

भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की नींव

रखी। साथ ही वे बंबई में संगठित

मजदूर आंदोलन के निर्माणकर्ताओं में

थे ।

शांताराम सावलाराम मिरजकर का

जन्म 8 फरवरी 1899 को महाराष्ट्र

के रायगढ़ जिले के मनगांव तालुक के

खारावली गांव में हुआ था। उनके पिता

सावलाराम के पास जमीन का प्लॉट

अवश्य था लेकिन वह नाकाफी था।

परिवार की आय बहुत कम थी। इसलिए

पिता एक किराना और कपड़े की

छोटी-सी दुकान भी चलाया करते। आगे

बड़े भाई की नौकरी के कारण सारा

परिवार उरान चला गया। मिरजकर ने

अपनी वर्नाकुलर अंतिम परीक्षा ;मिड्लि

स्कूल परीक्षाद्ध वहीं से पास की।

परिवार की खराब आर्थिक स्थिति

के कारण उनकी मां बंबई में एक कपड़ा

मिल में काम करने लगीं। 13 वर्ष की

उम्र में मिरजकर एक दर्जी के पास

सहायक का काम करने लगे। 1914

में उन्होंने मराठा हाई स्कूल में दाखिला

लिया और मैट्रिक तक पढ़ाई की।

मजदूर आंदोलन में

प्रथम विश्वयु( के दौरान मजदूरों

की स्थिति अत्यंत दयनीय हो गई थी।

1917 में कपड़ा मिल मजदूरों और

डाकियों ने कई संघर्ष किए। स्कूली

शिक्षा पूरी करके मिरजकर ने मजदूरों

के बीच सक्रिय काम आरंभ किया। इस

बीच उन्होंने एक फ्रांसीसी बैंक में क्लर्क

का भी काम किया। एटक के स्थापना

सम्मेलन ;1920द्ध के अवसर पर

मिरजकर ने होटल और कपड़ा मजदूरों

के जूलूस का नेतृत्व भी किया।

वे तिलक और गांधीजी से गहरे

रूप में प्रभावित हुए और 1920 में वे

असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए।

शराब की एक दुकान की पिकेटिंग

करते समय वे गिरफ्तार कर लिए गए

और उन्हें 6 महीनों की सजा दी गई।

 1927 में बंबई की

मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना की

गई। इसके प्रथम सचिव एस.एस.

मिरजकर बनाए गए। वास्तव में ‘कांग्रेस

लेबर पार्टी’ नाम से एक ग्रुप कांग्रेस के

अंदर काम कर रहा था। कांग्रेस हाउस

में एक बैठक में इसका नाम बदलकर

मजदूर-किसान पार्टी कर दिया गया।

उसी वर्ष उन्हें ‘भारत और चीन’

नामक पुस्तिका लिखने के लिए

गिरफ्तार कर लिया गया।

धुंदीराज ठेंगड़ी इसके अध्यक्ष

कम्युनिस्ट नेताआंे की जीवनी-22

एस.एस. मिरजकरः कम्युनिस्ट एवं टेªड यूनियन नेता

बनाए गए। इन दोनों के अलावा एस.

बी. घाटे, के.एन. जोगलेकर, निम्बकर,

जे.वी. पटेल, झाबवाला, इ. लोग भी

शामिल थे।

अप्रैल 1928 में बंबई में

ऐतिहासिक गिरणी कामगार हड़ताल हो

गई जो छह महीनों तक चली। इसी

दौरान गिराणी कामगार यूनियन का

गठन किया गया। मिरजकर इसके

अग्रणी नेता के रूप में उभर आए।

उन्होंने डांगे, जोगलेकर, निम्बकर, वी.

वी. गिरी वगैरह के साथ इस मजदूर

हड़ताल का सक्रिय नेतृत्व किया। वे

एक परिपक्व नेता के रूप में उभरे।

1927 में ही बंबई से क्रांति

नामक साप्ताहिक का प्रकाशन आरंभ

हुआ। इसके प्रथम संपादक एस.एस.

मिरजकर थे। यह पत्रिका मराठी में

प्रकाशित हुआ करती थी।

मेरठ षड्यंत्र केस में

1925 में भारतीय कम्युनिस्ट

पार्टी की स्थापना कानपुर में की गई।

इसका तेजी से प्रसार होने लगा और

प्रभाव बढ़ने लगा। ब्रिटिश सरकार

चिंतित हो उठी। उसने उभरते कम्युनिस्ट

आंदोलन को कुचलने की तैयारी कर

ली। 1929 में सारे देश से 32

शीर्षस्थ कम्युनिस्टों को गिरफ्तार कर

मेरठ की एक विशेष जेल में रखा गया।

यह मुकदमा मेरठ षड्यंत्र केस के नाम

से सुप्रसि( हुआ जो 1933 तक

चला।

एस.एस. मिरजकर को भी इसी

मुकदमे में गिरफ्तार कर लिया गया।

मुकदमे के दौरान अपने बयान में

मिरजकर ने कहा कि मजदूर-किसान

पार्टी का गठन क्रांति के जरिए भारत

को राष्ट्रीय आजादी दिलाना था।

मिरजकर को 10 वर्षों की सजा दी

गई लेकिन राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय

दबाव से मेरठ कैदियों को 1933 मंे

रिहा कर देना पड़ा।

पार्टी का पुनर्गठन, 1930 के

दशक का दौर

एस.एस. मिरजकर अपने इंटरव्यू

में बताते हैं कि जब वे सभी मेरठ जेल

में बंद थे तो बाहर संगठन की हालत

खराब हो गई थी। पार्टी बिखरी स्थिति

में आ गई और संकीर्णतावाद हावी हो

गया। कांग्रेस के प्रति नकारात्मक रूख

अपनाया गया हालांकि कांग्रेस के

दक्षिणपंथी तत्वों ने भी प्रतिक्रियावादी

रूख अपनाया था।

बाहर रणदिवे और एस.वी. देशपांडे

थे। उन्होंने दुस्साहसिक गतिविधियां कीं।

वे पार्टी संगठन पर हावी हो गए थे। वे

दोनों ही अच्छे पढ़े-लिखे साथी थे लेकिन

राजनीति और संगठन में उनके रूख

के कारण पार्टी को भारी नुक्सान उठाना

पड़ा। देशपांडे ने उसी दौरान अपनी

अलग पार्टी, ‘बोल्शेविक पार्टी’ बना ली।

मिरजकर के अनुसार, 1929 में

रणदिवे ने अचानक ही मजदूर हड़ताल

का अनावश्यक आवाहन किया। इससे

मालिकों को ही फायदा हुआ और

मजदूर संगठन टुकड़ों में बिखर गया।

पार्टी के पुनर्गठन के दौरान पहले

डॉ. अधिकारी फिर मिरजकर और फिर

सोमनाथ लाहिरी महासचिव बनाए गए

लेकिन वे सभी थोड़ी देर के लिए रहे।

फिर पी.सी. जोशी महासचिव बनाए गए।

इस बीच मिरजकर फिर गिरफ्तार कर

लिए गए और यरवदा जेल में रखे

गए। पार्टी ने कांग्रेस तथा अन्य संगठनों

के साथ राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की लाईन

अपनाई। इसमें मिरजकर की सक्रिय

भूमिका रही। 1934 में ‘यंग वर्कर्स

लीग’ के लिए मिरजकर तथा अन्य

साथियों ने एक ऑफिस का इंतजाम

किया। उसी वर्ष मिरजकर ने मजदूर

हड़ताल का नेतृत्व किया और उन्हें

तीन वर्षों के लिए जेल में बंद कर

दिया गया।

मिरजकर ने अन्य साथियों के साथ

मिलकर कांग्रेस के साथ संयुक्त मोर्चा

बनाने के तरीकों की खोज आरंभ की।

विश्वयु़( के संदर्भ में मिलजुल कर

लड़ने और प्रशिक्षण देने की बात की

गई।

संयुक्त मोर्चे में मिलकर काम करने

के सिलसिले में मिरजकर जयप्रकाश

नारायण, मीनू भसानी, अशोक मेहता

और युसुफ मेहरअली से भी मिले।

देवली कैम्प में

1940 में एस.एस. मिरजकर फिर

गिरफ्तार हो गए और इस बार उन्हें

देवली कैम्प भेज दिया गया। यह कैम्प

अजमेर-मरवारा ;आजकल राजस्थानद्ध

में ठीक रेगिस्तान के बीच स्थित था।

वहां मिरजकर को कैम्प नं. 2 में रखा

गया था। वहां लगभग 200 कैदी थे

जिनमें करीब 160 कम्युनिस्ट थे।

करीब 30 सोशलिस्ट भी थे।

देवली में मिरजकर के अलावा एस.

ए. डांगे, बी.टी. रणदिवे, सोली

बाटलीवाला, पाटकर, बी.पी.एल. बेदी,

रजनी पटेल तथा अन्य कई साथी थे।

वहां से फिर कुछ को दूसरे कैम्प में

ट्रांसफर कर दिया गया। इस पर बी.

टी. आर. ने फिर दुस्साहसवादी सुझाव

दिया। मिरजकर के अनुसार रणदिवे ने

पत्थर फेंकने, पिटाई करने, प्रदर्शन

करने वगैरह का सुझाव दिया। यदि

फायरिंग हो जाए और कुछ लोग मारे

जाएं तो कोई बात नहीं! अगले दिन से

प्रतिरोध’ आरंभ किया जाए।

इस पर मिरजकर ने कहा कि इस

सुझाव पर वोट लिया जाए। वोट में

रणदिवे प्रस्ताव खारिज कर दिया गयाः

कमिटि में उसे केवल दो मत मिले

और कैदियों में मुश्किल से 15-20

समर्थन में थे। यह सारा काम मिरजकर

ने ही संगठित किया।

मिरजकर बताते हैं कि 1942

की लाईन मूलतः देवली कैम्प के कुछ

साथियों की पहल पर आई थी। इसे

फिर पार्टी ने स्वीकार कर लिया। लेकिन

मिरजकर के अनुसार, यह लाइन

त्रुटिपूर्ण थी।

टी.यू. और पार्टी संघर्ष में

मिरजकर ने एटक को व्यापक

जनरूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा

की। उन्होंने बम्बई के म्युनिसिपल

मजदूरों को संगठित किया। आर.एस.

निम्बकर म्युनिसिपल वर्कर्स यूनियन

के महासचिव हुआ करते थे। 1928

में डांगे, मिरजकर, घाटे इ. ने बंबई के

कपड़ा मिल मजदूरों की हड़ताल

संगठित करने का निर्णय लिया। इसी

बीच कांग्रेस के अंदर का सोशलिस्ट

ग्रुप मजदूर किसान पार्टी में रूपांतरित

हो गया।

उस वक्त ‘‘गिरणी कामगार

महामंडल’’ नामक मजदूर संस्था थी।

इसी में मिरजकर तथा अन्य ने काम

करना आरंभ किया। पहले दादर के

कस्तूरचंद मिल मजदूरों ने हड़ताल

कर दी। दस दिनों के अंदर यह आम

हड़ताल में बदल गई। संयुक्त हड़ताल

में एन.एम. जोशी भी शामिल हो गए।

जोशी ने काफी हद तक पैसों का

इंतजाम कर दिया।

1927 में बंबई में पहली बार

‘लेनिन दिवस’ मनाया गया और चौपाटी

में आम सभा आयोजित की गई। इसी

वर्ष दो अमरीकी मजदूर नेताओं-

साक्को और वान्जेटी पर झूठे आरोप

लगाकर फांसी दिए जाने के विरोध में

बंबई में अभियान चला जिसमें

मिरजकर सक्रिय रहे। उन्होंने अन्य के

साथ मिलकर एक पुस्तिका प्रकाशित

और वितरित की।

भारत में पहली बार 1927 में

मजदूर-किसान पार्टी ने व्यापक पैमाने

पर मई दिवस मनाया। विभिन्न सड़कों

से होते हुए मजदूरों का एक बड़ा जुलूस

लाल झंडों के साथ निकाला गया। उसी

समय मिलों के मजदूर काम से बाहर

निकल रहे थे। इसलिए जुलूस में

हजारों लोग शामिल हो गए। ‘क्रांति’

साप्ताहिक का विशेषांक निकाला गया

जिसे मिरजकर, फिलिप स्प्रैट तथा अन्य

साथियों ने सड़कों पर बेचा। एन.एम.

जोशी भी शामिल हुए। विशाल आम

सभा को मिरजकर तथा अन्य साथियों

ने संबोधित किया।

1928 के बंबई मिल मजदूर

हड़ताल ने भारत में वर्ग-संघर्ष को

व्यापक पैमाने पर प्रेरित किया।

मजदूर-किसान पार्टी द्वारा 1927

में साइमन कमिशन के बायकाट संबंधी

आंदोलन के नेताओं में थे।

साइमन कमिशन के खिलाफ

कम्युनिस्ट पार्टी, मजदूर-किसान पार्टी

तथा युवा सम्मेलन ने 50 हजार से

भी अधिक का जुलूस निकाला। उसमें

कमिशन के सात सदस्यों ;‘साइमन

सेवन’द्ध के सात पुतले जलाए गए।

मिरजकर इसमें बड़े ही सक्रिय रहे।

साइमन कमिशन का इतना व्यापक

बायकाट कर दिया गया कि कमिशन

बंबई में प्रवेश भी नहीं कर पाया और

सीधे पूना चला गया। इसके दौरान

विद्यार्थी आंदोलन बड़े पैमाने पर

उभरकर आया।

1946 में बंबई में भारतीय

नौसैनिकों का सुप्रसि( विद्रोह हुआ।

इसके समर्थन में बंबई के मजदूरों ने

व्यापक आंदोलन छेड़ दिया जिसमें

मिरजकर की सक्रिय भूमिका रही।

मिरजकर ने भा.क.पा. की दूसरी

कांग्रेस ;1948द्ध में भाग लिया। इसमें

वे कंट्रोल कमिशन में चुने गए।

मदुरै ;1953-54द्ध में वे केंद्रीय

समिति में चुने गए।

1950 के दशक में वे एटक के

अध्यक्ष चुने गए। साठ के दशक के

मध्य में संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन छिड़

गया। बंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन में

वामपंथ के बहुमत मिला। 3 अप्रैल

1958 को एस.एस. मिरजकर बंबई

के मेयर चुने गए। वे उस वक्त एटक के

अध्यक्ष थे। उन्हें मेयर के रूप में काफी

कठिन समस्याओं का सामना करना

पड़ा जब सोशलिस्टों ने 5/रू. डी.ए.

बढ़ाने के प्रश्न पर मजदूरों को भड़काने

की कोशिश की वामपंथी समिति की

कारपोरेशन में लगातार मजदूरों के वेतन

बढ़ाए। लेकिन सरकार से उसे कोई

मदद नहीं मिली। अगला डी.ए. पूरी

तरह बढ़ाना कठिन हो गया। सोशलिस्टों

ने हड़ताल करवा दी जो खिंचती चली

गई। एस.ए. डांगे और एस.एम. जोशी

ने हस्तक्षेप किया। मिरजकर के साथ

मिलकर समस्या सुलझाई गई।

मिरजकर ने अपने कार्यकाल में जनता

के पक्ष में कई कदम उठाए।

उनकी मृत्यु 15 फरवरी 1980

को हो गई। उनकी मृत्यु का शोक व्यापक

तौर पर मनाया गया जिसमें लगभग

सभी टेªड यूनियनें और पार्टियां शामिल

हुई। वे अत्यंत ही सम्मानित कम्युनिस्ट

एवं मजदूर नेता थे।

अनिल राजिमवाले

आजादी के महानायक

रविवार, 6 सितंबर 2020

बिहार में महागठबंधन सरकार बनेगी-अतुल कुमार अंजान.

 बिहार में महागठबंधन सरकार बनेगी-अतुल कुमार अंजान राष्ट्रीय सचिव भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी 


पिछले  कुछ दिनों से कामरेड अतुल कुमार अंजान की तबियत खराब होने के कारण

बिहार चुनाव की प्रभावी तैयारियों में कमी महसूस की जा रही थी लेकिन खुदा बड़ा कारसाज है कामरेड अतुल कुमार अंजान के स्वास्थ्य में अचानक तेजी से सुधार हो रहा है और बिहार चुनाव में उनके सक्रिय रुप से भाग लेने की सम्भावनाएं बढ गई है जिससे विपक्षी खेमे के ऊपर विपरीत प्रभाव पड रहा है।

कामरेड अतुल कुमार अंजान का हिन्दी भाषी प्रदेशों में विशेष प्रभाव है। 

हिन्दी भाषी क्षेत्रों में अतुल कुमार अंजान बहुत ही प्रभावी वक्ता है।

शनिवार, 5 सितंबर 2020

जनरल हबीबुल्ला रामेंद्र वर्मा हमीदा हबीबुल्लाह करंजिया रमेश सिन्हा बिशन कपूर और भैय्याजी की फोटो

1974 मेें ब्लिट्ज के संपादक  आर के करंजिया लखनऊ आए उस अवसर का एक फोटो है। जनरल हबीबुल्ला  रामेंद्र वर्मा हमीदा हबीबुल्लाह करंजिया रमेश सिन्हा बिशन कपूर  और भैय्याजी

शुक्रवार, 4 सितंबर 2020

शापुरजी सकलतवाला एक महान योद्धा-अनिल राजिमवाले

 -अनिल राजिमवाले 

वैसे तो शापुरजी सीधे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य नहीं थे

लेकिन भारतीय मजदूर एवं कम्युनिस्ट आंदोलन के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण

भूमिका रही। इसलिए यहां उनकी जीवनी विस्तार से प्रस्तुत कर रहे है।

शापुरजी भारत के बड़े औद्योगिक घराने टाटा परिवार से जुड़े हुए थे।

उनका जन्म बंबई में 28 मार्च 1874 को पारसी परिवार में हुआ था। वे अपनी मां के परिवार के जरिए टाटा परिवार से संबंधित थे। उनकी माता जेरबाई जे.एल. टाटा की बहन थीं। सकलतवाला

परिवार 1830 के दशक से ही बंबई का जाना-माना पारसी परिवार था।

उनके पिता दोराबजी प्रसिद्ध व्यापारी थे। परिवार जरथुष्टवादी था।

शापुरजी की पढ़ाई बंबई के सेन्ट जेवियर स्कूल और काॅलेज में हुई थी।

वे असाधारण प्रतिभा के विद्यार्थी थे

और वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में आगे

रहते थे।

1890 के दशक में बंबई में फैले प्लेग महामारी में शापुरजी ने प्रसिद्ध 

रूसी डाॅक्टर हाफ्किन की बड़ी सहायता की। काॅलेज छोड़ने के बाद वे उद्योग के कामों में शामिल हो गए। वे तीन वर्षों तक मध्य भारत के जंगलों में लोहा, कोयला, लाइमस्टोन इत्यादि की

खोज में घूमते रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि अपने मामा जे.एन. टाटा की

देखरेख में उन्होंने टाटा आयरन एंड स्टील लिमिटेड ;आगे चलकर टिस्को  की स्थापना में प्रमुख भूमिका अदा की।

बिहार और उड़ीसा के जंगलों में लोहा अयस्क की खोज के दौरान वे आम आदिवासियों, ग्रामीणों और मजदूरों के संपर्क में आए। एक मौके पर उन्होंने पाया कि पुलिस ने आदिवासियों को डराकर बंधक के रूप में पुलिस थाने

में बंद कर रखा है। वे सीधे पुलिस स्टेशन गए। बातचीत के दौरान उनकी नजर थाने की चाबी पर पड़ी। मौका

पाते ही चाबी अपने कब्जे में कर ली

और पुलिसवालों को थाने में बंद कर दिया। उनका खाना-पीना बंद कर दिया। पुलिसवालों को एक-एक कर

तभी छोड़ा जब उन्होंने ग्रामीणों को रिहा किया। पुलिस ने गांववालों को

डरा रखा था कि ‘अंग्रेज’ आ रहे हैं!

यह वह दौर था जब राष्ट्रीय चेतना का विकास हो रहा था। उनकी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की राजनीति में दिलचस्पी

बढ़ती जा रही थी और कभी-कभी अंग्रेजों से उनका टकराव भी हो जाया

करता। इसलिए उन्हें 1905 में टाटा के प्रतिनिधि के रूप में इंगलैंड भेजा शापुरजी सकलतवालाः टाटा उद्योग से कम्युनिज्म तक

दिया गया। वह वर्ष भारतीय राजनीति में अत्यंत सक्रियता का वर्ष था।

बंग-भंग तथा अन्य आंदोलन चल रहे थे।

इंगलैंड में वास्तव में इंगलैंड में ही शापुरजी सकलतवाला का राजनैतिक जीवन

आरंभ होता है। वे उदारवादी से

ब्रिटिश-विरोधी बन गए। पहले कुछ महीने उन्होंने टाटा के मैनचेस्टर आॅफिस

में काम किया। उसके बाद वे लंदन आए। वहां उनके परिवार ने उन्हें

नेशनल लिबरल क्लब का सदस्य बना

दिया। वहां उनकी मुलाकात आजादी

के आंदोलन से जुड़ी कई हस्तियों से

हुई। वहां उनकी मुलाकात लाॅर्ड मोर्ले

से भी हुई जो मिन्टो के साथ ‘मोर्ले-मिन्टो

सुधार’ प्रस्तावों से जुड़े हुए थे मोर्ले के

साथ उनकी तीखी बहस हो गई जिसका

परिणाम यह हुआ कि सकलतवाला ने

लिबरल क्लब से इस्तीफा दे दिया।

उनके लिए यह क्लब अर्थहीन था।

सकलतवाला धीरे-धीरे ‘इंडिपेंडेंट

लेबर पार्टी’ ;आर.एल.पी.द्ध के संपर्क में

आए। वे 1910 में इसके सदस्य बन

गए। वहां उनकी मुलाकात रजनी पाम

दत्त ;आर.पी.डी.द्ध से हुई जो आगे

चलकर ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के नेता

बने।

आई.एल.पी. का वामपंथ मैक्डोनल्ड

और स्नोडेन के दक्षिणपंथ से संघर्ष

कर रहा था। पार्टी को दूसरी इंटरनेशनल

से दूर रखने में वामपंथ को सफलता

मिली।

1920 मंे सकलतवाला, वाल्टन

न्यूबोल्ड, एमिली बन्र्स और आर.पी.

डी. की कमिटि आई.एल.पी. में बनाई

गई जिसका उद्देश्य था तीसरी

;कम्युनिस्टद्ध इंटरनेशनल से संब(ता

पर विचार करना। इन लोगों ने ‘कमिटि

फाॅर थर्ड इंटरनेशनल’ की ओर से एक

बुलेटिन ‘द इंटरनेशनल’ का प्रकाशन

आरंभ किया। मैक्डोनल्ड ने चाल चली

और प्रस्तावित किया कि आई.एल.पी.

न दूसरी, न तीसरी इंटरनेशनल में

बल्कि मध्यमार्गी ढाई इंटरनेशनल’ में

शामिल हो!

आई.एल.पी. का वामपंथ 1921

में कम्युनिस्ट पार्टी के एकता अधिवेशन

;कांगेसद्ध में शामिल हो गया।

लंदन में उन्होंने डर्बीशायर की एक

महिला मिस मार्श से शादी कर ली जो

अंत तक उनके साथ रहीं।

ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के गठन में

सकलतवाला ने सक्रिय हिस्सा लिया।

वे 1921 के सम्मेलन में शामिल

नहंीं हो पाए लेकिन समर्थन का पत्र

भेजा।

टेªड यूनियन आंदोलन में

सकलतवाला ने टेªड यूनियन

आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया। वे

लगातार इंगलेंड के विभिन्न हिस्सों और

मजदूर बस्तियों का दौरा करते रहे

और श्रमिकों को संगठित करते रहे।

उनके नाम से ही मजदूरों की भीड़ जुट

जाया करती। वे टेªन में जमीन पर ही

सो जाया करते। वे जनरल वर्कर्स

यूनियन तथा क्लक्र्स और कोआॅपरेटिव

यूनियनों में थे।

ब्रिटिश संसद में

वे 1922 में लंदन के बैटरसी

नाॅर्थ चुनाव क्षेत्र से चुने गए। वे टेªड्स

काउंसिल के कम्युनिस्ट उम्मीदवार के

रूप में लेबर पार्टी के समर्थन से लड़े।

1923 में वे थोड़े से मतों से पराजित

हो गए। लेकिन उनका वोट 9.1ø

बढ़ गया। 1924 में वे पुनः निर्वाचित

हुए और उनका वोट प्रतिशत फिर बढ़

गया। इस बार सकलतवाला ब्रिटिश

कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के रूप

में लड़े।

शापुरजी सकलतवाला ब्रिटिन के

मजदूरों के बीच सबसे लोकप्रिय नेताओं

में एक थे।

ब्रिटेन की पार्लियामेंट में

सकलतवाला ने एक से बढ़कर एक

भाषण दिए। वे लगातार मजदूरों और

भारतीय जनता के आजादी के संघर्षों

की आवाज उठाते रहे उन्होंने खुलकर

ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पाखंड का

पर्दाफाश किया। भारत की सबसे शोषित

और कुचली जनता, भूखे-नंगे बच्चों,

औरतों तथा मर्दों की स्थिति के लिए

उन्होंने पूरी तरह ब्रिटिश शासन को

जिम्मेदार ठहराया। सकलतवाला ने

ब्रिटिश संसद में कहा कि ब्रिटिश सरकार

भारत की जनता का अपमान कर रही

है।

सकलतवाला ने ब्रिटिश संसद में

अपने भाषण ;25 नवंबर 1927द्ध

के दौरान ‘अर्ल’ विन्टरटन को याद

दिलाया कि 25 साल पहले उन्हें

;सकलतवाला कोद्ध भारत में एक श्वेत

डाॅक्टर से प्लेग संबंधी बातचीत करने

जाने से श्वेतों के क्लब में रोका गया

था। आखिरकार उन्हें पिछले दरवाजे

से बेसमेंट में जाने दिया गया। क्या

ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्त ‘इंडियन

स्टैच्यूटरी कमिशन’ इसमें बदलाव ला

पाएगा?

शापुरजी सकलतवाला ने ब्रिटिश

संसद में पूछा कि क्या ब्रिटेन को इसी

तरह का कमिशन फ्रांस के लोगों की

स्थिति ‘जानने’ के लिए भेजने की

हिम्मत है और क्या यह पूछने की

हिम्मत है कि फ्रांसीसियों का अपने ही

देश में शासन चलाना आता है या नहीं?

शायद सकलतवाला आधुनिक युग

के प्रथम सांसद ;एम.पी.द्ध थे जिन्होंने

खुलकर ब्रिटिश राजतंत्र पर संसद के

अंदर आक्रमण किया। उन्होंने

कहाः‘‘कुछ ही परिवार शाही शासकों

की वैसे ही सप्लाई करते हैं जैसे कुछ

बिस्कुट फैक्टरियां समूचे योरप में

बिस्कुट की सप्लाई करती

हैं।’’;1926द्ध

उन्होंने अंग्रेजों से भारत छोड़कर

चले जाने को कहा। उन्होंने कानपुर

वोल्शेविक षड्यंत्र मुकदमों का प्रश्न

उठाया।

नेहरू के अनुसार, सकलतवाला

ने लगातार भारत की आजादी की

वकालत की। उन्होंने भारत में मजदूरों

के टेªड यूनियन अधिकारों का सवाल

उठाया। ये सकलतवाला ही थे जिन्होंने

भारत में टेªड यूनियन एक्ट बनाने का

सवाल इंगलैंड में उठाया। इससे पहले

1920 में ही वे भारत के सेक्रेटरी

आॅफ स्टेट मान्टेग्यू से मिले और भारत

में टेªड यूनियन कानून बनाने पर जोर

दिया।

लंदन में सकलतवाला का घर

भारत की आजादी के आंदोलन का

एक केंद्र बन गया। सकलतवाला,

श्रीनिवास अय्यंगर और मौलाना

मोहम्मद अली ने लंदन कांग्रेस कमिटि

का गठन किया।

सकलतवाला को भारत आने या

अमरीका जाने का वीसा नहीं दिया गया,

जबकि वे ब्रिटिश एम.पी. थे!

टाटा कंपनी से इस्तीफा

टाटा परिवार के होते हुए भी

सकलतवाला उसके कारोबार में ज्यादा

दिनों तक नहीं रह पाए। लंदन में टाटा

के एक फर्म में, जिसकी अधिकृत पूंजी

40 लाख पाउंड थी, सकलतवाला

डिपार्टमेंटल मैनेजर थे। सकलतवाला

ने महसूस किया कि वहां पदासीन रहते

हुए वे मजदूर वर्ग के मुक्ति तथा पूंजीवाद

की तीखी आलोचना नहीं कर सकते

थे। दोनों बातें साथ-साथ ज्यादा देर

नहीं चल सकती थीं।

सकलतवाला ने 1925 में अपने

पद से इस्तीफा दे दिया। बाद के दिनों

में वे अक्सर गरीबी की स्थिति में एक

छोटे-से फ्लैट में परिवार सहित रहने

लगे।

1926 में सारे ब्रिटेन में मजदूरों

का विशाल विद्रोह फूट पड़ा और आए

दिन हड़तालें होने लगीं। सकलतवाला

इस मजदूर आंदोलन की अगली पांतों

में बने रहे।

सकलतवाला की भारत यात्रा,

1927

इस यात्रा की योजना काफी समय

से बन रही थी। सकलतवाला को

1925 में ही भारत आना था और

कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापना सम्मेलन

का उद्घाटन करना था। लेकिन उन्हें

आने की इजाजत अंग्रेज सरकार ने

नहीं दी। उन्होंने कानपुर सम्मेलन को

शुभकामना संदेश भेजा। 1927 में

उन्होंने ब्रिटिश प्रधानमंत्री को एक कड़ी

चिट्ठी लिखी। इसमें उन्होंने याद

दिलाया कि वे ब्रिटिश संसद के सदस्य

हैं और इसके अलावा एक नागरिक की

हैसियत से भी उन्हें अपने विचार रखने

और उन्हें प्रचारित करने का अधिकार

है। ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य

होने के नाते उनके साथ अन्य पार्टियों

के सदस्यों से अलग भेदभाव करने

सरकार को कोई अधिकार नहीं है।

सरकार को एक एम.पी. के कार्यकलापों

में दखल देना बंद करना चाहिए।

आखिर इंगलैंड की सरकार को

मजबूर होकर उन्हें पासपोर्ट देना पड़ा

और वे भारत की यात्रा पर निकल

पड़े।

वे 14 फरवरी 1927 को जहाज

से बंबई पहुंचे भारत में सकलतवाला

का भारी स्वागत किया गयाा। बहुत

कम ही लोगो ंको ऐसा स्वागत किया

गया हो। ऐसोसिएटेड प्रेस आॅफ इंडिया

ने 1 जनवरी 1927 को लाहौर से

लिखा कि अखिल भारतीय कम्युनिस्ट

सम्मेलन का दूसरा अधिवेशन 17 से

20 मार्च ;1927द्ध को लाहौर में

होगा और इसकी सकलतवाला द्वारा

अध्यक्षता करने की संभवना है।

किन्हीं कारणों से वह अधिवेशन

नहीं हो पाया।

मद्रास के ट्राम-वे मजदूरों की

यूनियन को एक पत्र में उन्होंने कहा

कि मैं अपनी मातृभूमि की यात्रा करने

और पुराने मित्रों से मिलने भारत आया

हूं।

बंबई में उनके स्वागत के लिए

एक व्यापक समिति का गठन किया

गया। इसमें सरोजिनी नायडू और बी.

जी. हॅर्निमन थे। स्वागत समिति ने

मजदूर बस्तियों और मिल इलाकों में

उनकी सभाओं का आयोजन किया।

उनके भाषणों एवं संबोधनों की भाषा

सरल और सीधी हुआ करती। उन्होंने

अनिल राजिमवाले

शेष पेज 12 परभारत के मजदूरों से कहा कि विश्व के

अन्य मजदूरों के समान वे भी विश्व

का प्रकाश और समृ(ि हैं। 18 जनवरी

1927 को शापुरजी सकलतवाला का

कावसजी जहांगीर हाॅल में सार्वजनिक

सम्मान किया गया। वहां असाधारण

भीड़ इकट्ठा हो गई और पूरा हाॅल

ऊपर से नीचे तक खचाखच भरा हुआ

था। लगातार तालियों की गड़गड़ाहट

के बीच सरोजिनी नायडू ने उनकी

भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा कि वे

13 वर्षों बाद भारत वापस आए हैं।

इस पर श्रोताओं के बीच से किसी ने

कहाः ‘‘पांडवों के समान’’! इतना सम्मान

था उनका। तालियों की तुमुल

गड़गड़ाहट के बीच सकलतवाला दो

धंटे तक बोलते रहे।

हाॅर्निमन, ब्रेल्की, शौकत अली तथा

अन्य ने उनका स्वागत किया।

16 जनवरी को बंबई प्रदेश कांग्रेस

कमिटि ने एक ‘गार्डन पार्टी’ में

सकलतवाला और श्रीनिवासन अय्यंगर

का स्वागत किया। 21 जनवरी

;1927द्ध को वे अहमदबाद पहुंचे।

स्वयं सरदार वल्लभभाई पटेल ने स्टेशन

शापुरजी सकलतवालाः टाटा उद्योग से कम्युनिज्म तक

पर उनका स्वागत करते हुए उन्हें माला

पहनाईं। उस वक्त सरदार पटेल गुजरात

प्रदेश कांग्रेस कमिटि के अध्यक्ष थे। वे

गांधी आश्रम गए। 22 जनवरी को

कांग्रेस द्वारा आयोजित एक विशाल रैली

को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट

उद्देश्य न अपनाने के लिए कांग्रेस की

आलोचना की। उन्होंने इस बात पर

जोर दिया कि कांग्रेस पूर्ण स्वराज का

ध्येय अपनाए और इसमें

मजदूरों-किसानों का सहयोग ले।

सकलतवाला ने गांधीजी तथा

सरोजिनी नायडू, अली बंधु, नेहरू

इत्यादि को ‘काॅमरेड’ कहकर संबोधित

किया।

कलकत्ता में उनका भारी स्वागत

हुआ। वे वी.वी. गिरी के साथ खड़गपुर

गए। सकलतवाला ले टाटा आयरन एंड

स्टील कंपनी ;टिस्कोद्ध के प्रबध्ंान को

एक कड़ी चिट्ठी लिखते हुए इस बात

का विरोध किया कि टाटा प्रबध्ंान इस्पात

उत्पादन से आए हुए धन का प्रयोग

मजदूरों की हड़ताल तोड़ने के लिए

कर रहा है। उन्होंने लिखा कि वे मजदूरों

की समस्याओं का अध्ययन करने 25

तारीख को जमशेदपुर पहुंच रहे हैं।

उन्हें खड़गपुर में आम सभा करने

की इजाजत नहीं मिली।

कलकत्ता में उनका सार्वजनिक

स्वागत किया हालांकि अंग्रेज सदस्यों

और कुछ अन्य ने इसका विरोध किया।

बंबई कारपोरेशन ने बहुमत से उनके

स्वागत का विरोध किया। लेकिन मद्रास

कारपोरेशन ने उनका पुरजोर स्वागत

किया।

मद्रास आगमन

सकलतवाला 24 फरवरी

1927 को मद्रास पहुंचे। उन्होंने

टेक्सटाइल और रेलवे मजदूरों की आम

सभाओं को संबोधित किया। कारपोरेशन

ने भी उनका नागरिक अभिनंदन किया।

सत्यमूर्ति के सभापतित्व में उन्होंने

ट्रिप्लिकेन ‘बीच’ पर सभा को संबोधित

किया। फिर गोखले हाॅल मंे बु(िजीवियों

को कम्युनिज्म के उद्देश्यों पर संबोधित

किया।

सिंगारवेलु लगातार उनके साथ रहे

और उनका कार्यक्रम तैयार करते रहे।

उन्होंने और थिरू कल्याणसुंदरम ने

उनके भाषणों का तमिल में अनुवाद

किया।

सकलतवाला की मद्रास यात्रा ने

बु(िजीवियांे, मजदूरों और कम्युनिस्टों

में जोश भर दिया।

सकलतवाला ने 1927 में मद्रास

में आयोजित एटक के अखिल भारत

अधिवेशन में भी भाग लिया। अधिवेशन

ने सकलतवाला का खूब अभिनंदन

किया। सकलतवाला ने भारत की

आजादी का पुरजोर समर्थन किया।

दिल्ली यात्रा में मोतीलाल नेहरू

तथा अन्य कई राष्ट्रीय नेताओं ने उनका

स्वागत किया। उनकी अध्यक्षता में

सकलतवाला का स्वागत करते हुए आम

सभा की गई।

बंबई में मुस्लिम समुदाय एक

विशाल सभा आयोजित की गई जिसमें

6 हजार से भी अधिक लोग शामिल

हुए।

इस बीच 1927 मे गांधीजी और

सकलतवाला के बीच पत्राचार भी चला।

8 अप्रैल 1927 को

सकलतवाला बंबई से लंदन के लिए

चल पड़े। भारत यात्रा के दौरान लोगों

ने उन्हें 14 हजार 3 सौ रूपए इकट्ठा

करके दिए। अपनी भारत यात्रा के

दौरान उन्होंने भारत की आजादी,

मजदूर वर्ग की भूमिका और कम्युनिज्म

के विचारों का खूब प्रचार किया। अंग्रेजी

दैनिक ‘अमृत बाजार पत्रिका’ तथा

अन्य अखबारों में उनके बारे में खूब

लेख एवं संपादकीय तथा खबरें

प्रकाशित हुर्इं।

भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन को

उनकी यात्रा से बड़ी सहायता मिली।

इंगलैंड वापस लौटने पर

सकलतवाला सक्रिय राजनैतिक कार्यों

में फिर लग गए। भारत में दिए गए

भाषणों तथा गतिविधियों के कारण वापस

इंगलैंड लौटने पर अंग्रेज सरकार ने

उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया।

मार्च-अप्रैल 1936 में वे

आॅक्सफोर्ड मजलिस के वार्षिक ‘डिनर’

में मुख्य अतिथि के रूप में आनेवाले

थे। लेकिन एकाएक उनकी मृत्यु लंदन

में 16 जनवरी 1936 को 62 वर्ष

की उम्र में हो गई।

उनकी मृत्यु पर जवाहरलाल नेहरू,

ज्याॅर्जी दिमित्रोव, एस.ए ब्रेल्वी ;बाॅम्बे

क्रांॅनिकलद्ध, इवान माइस्की ;राजदूतद्ध,

लान्स्बरी, क्लीमेंट एटली, कांग्रेस

सोशलिस्ट पार्टी, सुभाषचंद्र बोस, हैरी

पाॅलित और विश्व भर के अन्य महत्वपूर्ण

व्यक्तियों एवं संगठनों ने अपना शोक

प्रकट किया।

शापुरजी सकलतवाला एक महान योद्धा थे।

शनिवार, 29 अगस्त 2020

सोम नाथ लाहिडी क्रान्ति के महानायक

-अनिल राजिमवाले 

का. सोमनाथ लाहिडी


का जन्म 1

सितंबर 1909 को बंगाल में हुआ

था। वे रामतनु लाहिरी के परिवार से थे

जो ईश्वरचंद्र विद्यासागर के समकालीन

थे।

उन्हें कलकत्ता के प्रेसिडेन्सी काॅलेज

से विज्ञान में बी.एस.सी. की डिग्री मिली।

उनका मुख विषय रसायन शास्त्र था

जिसमें वे बहुत तेज थे। वे पढ़ने में बड़े

ही मेधावी थे। 12 वर्ष की उम्र में वे

असहयोग और खिलाफत आंदोलनों

से बड़े ही प्रभावित हुए। वे 1930 के

सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल

हुए। वे सुप्रसि( क्रांतिकारी और स्वामी

विवेकानंद के भाई भूपेंद्रनाथ दत्त के

संपर्क में आए। उनसे ही उन्होंने

माक्र्सवाद सीखा। 1930 में एम.एस.

सी. पढ़ते तक उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी

और कांग्रेस में शामिल हो गए।

सोमनाथ लाहिरी ने कलकत्ता के

मजदूरों को संगठित करना आरंभ किया।

उन्होंने ट्राम मजदूरों के बीच काम

करना शुरू किया। 1931 में ईस्ट

बंगाल रेलवे वर्कर्स यूनियन का गठन

किया। वे ही 1933 में जमशेदपुर के

‘टिस्को’ मजदूरों की प्रथम यूनियन के

संगठनकर्ता थे।

1931 आते-आते सामनाथ की

मुलाकात अब्दुल मोमिन से हुई। उन

दोनों ही ने कांग्रेस के काराची अधिवेशन

में भाग लिया। वहां उन्होंने भगतसिंह,

सुखदेव और राजगुरू को फांसी दिए

जान के विरोध में निकाले गए प्रदर्शन

में भाग लिया।

कम्युनिस्ट आंदोलन में

मेरठ षड्यंत्र केस ;1929-32द्ध

में भारत के सर्वोच्च 32 कम्युनिस्ट

नेता पकड़े गए। बाहर रह गए

कम्युनिस्टों ने विभिन्न तरीकों से

कम्युनिस्ट गतिविधियां बरकरार रखने

की कोशिश की। कलकत्ता में 1930

में अखिल बैनर्जी, रानेन सेन, अवनी

चैधरी और रमेन बसु ने ‘कलकत्ता

समिति’ का गठन किया। जल्द ही

अब्दुल हलीम और सोमनाथ लाहिरी

भी शामिल हो गए।

1933 में सारे देश के पैमाने पर

कम्युनिस्ट पार्टी का पुनर्गठन किया जाने

लगा। इसके लिए विशेष सम्मेलन

बुलाया गया जिसकी पहल प्रमुखतः

पी.सी. जोशी, गंगाधर अधिकारी, इ. ने

की। ‘कलकत्ता समिति’ की ओर से

इसमें सोमनाथ लाहिरी, अब्दुल हलीम

और रानेन सेन उपस्थित हुए।

1935 में वे पार्टी केंद्र में काम

कम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी-21

सोमनाथ लाहिरीः संविधान सभा के सदस्य

करने बंबई चले गए। एस.एस. मिरजकर

की गिरफ्तारी के बाद सोमनाथ लाहिरी

भा.क.पा. के थोड़े समय के लिए

महासचिव बनाए गए।

1936 में उन्हें बंबई की एक

मजदूर ‘चाल’ से गिरफ्तार कर लिया

गया जहां वे छिपे हुए थे। उनके साथ

तेजा सिंह ‘स्वंततर’ और दर्शन सिंह

‘कैनेडियन’ भी गिरफ्तार कर लिए गए।

वे लाहौर ले जाए गए और कुख्यात

लाहौर किला जेल में रखे गए। उन्हें

फिर 1939 में गिरफ्तार किया गया।

बंकिम मुखर्जी के बाद सोमनाथ

बंगाल में मजदूरों के बीच सबसे

लोकप्रिय वक्ता थे। वे 1935 से

1948 के बीच कंेद्रीय समिति के

सदस्य रहे। 1948-50 के दौरान

वे पाॅलिट ब्यूरो में रहे।

1938 में बंकिम मुखर्जी और

मुजफ्फर अहमद के साथ

1938-39 में वे अखिल भारतीय

कांग्रेस कमिटि के सदस्य रहे। सुभाषचंद्र

बोस की कांग्रेस अध्यक्षता के दौरान वे

कांग्रेस के अंदर ‘वाम एकीकरण समिति’

;लेफ्ट कन्साॅलिडेशनद्ध के सदस्य बनाए

गए। वे 1938 और 1939 के

दौरान बंगाल प्रादेशिक कमिटि की

कार्यकारिणी के सदस्य थे।

उन्होंने गांधी जी के समर्थन में

पार्टी द्वारा आयेाजित एक आमसभा में

;1944द्ध उनासे भूख हड़ताल न

करने की अपील की! उन्होंने गांधी जी

को ‘हमारे पिता और हमारे गुरू’ कहा।

यह पी.सी. जोशी द्वारा गांधीजी को

‘राष्ट्रपिता’ कहने से पहले की बात है।

सुभाषचंद्र बोस के होते हुए भी बंकिम

मुखर्जी और सोमनाथ लाहिरी की सलाह

बड़ा महत्व रखती थीं।

1940 में सरकार में कम्युनिस्टों

को गिरफ्तार करना शुरू किया। लाहिरी

तथा अन्य को कलकत्ता तथा

आस-पास के औद्योगिक क्षेत्रों से बाहर

जाने का आदेश दिया गया। रिहाई के

बाद वे अंडरग्राउंड चले गए और दो

साल गुप्त रहे। पाबंदी हटने के बाद वे

1943 में कलकत्ता कारपोरेशन लेबर

सीट से लड़े और भारी मतों से जीत

गएऋ उन्हें 10 हजार वोट मिले जबकि

उनके प्रतिद्वंद्वी को केवल दो हजार।

उन्होंने ए.आई.एस.एफ. में भी सक्रिय

भूमिका अदा की। उन्होंने विद्यार्थियों

की सभाओं में भाषण दिए।

1944 में उन्होंने म्युनिसिपल

कारपोरेशन के ऐतिहासिक सफाई

कर्मचारियों के हड़ताल का नेतृत्व किया।

उन्होंने जूट मजदूरों के बंीच 15 वर्षों

तक काम किया। मो. इस्माईल,

चतुरअली तथा अन्य के साथ उन्होंने

बंगाल की सबसे अच्छी यूनियन, ट्राम

मजदूर यूनियन का गठन किया।

1945 में वे बीमार हो गए, फिर

भी ट्राम और कारपोरेशन मजदूरों का

नेतृत्व करते रहे।

सोमनाथ लाहिरी मजदूरों के

एकमात्र दैनिक अखबार ‘स्वाधीनता’

;बंगलाद्ध के सम्पादक थे।

संविधान सभा में

संविधान सभा के चुनाव हुए। इसका

उद्देश्य था भारत का संविधान तैयार

करना। संविधान सभा ने भारत की

पहली ‘अंतरिम सरकार’ का गठन किया

जिसके प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू

बनाए गए।

इस संविधान सभा में एकमात्र

कम्युनिस्ट सदस्य सोमनाथ लाहिरी थे

जो बंगाल से चुने गए थे। वे ‘कलकत्ता

एंड सब-अर्बन लेबर’ चुनाव क्षेत्र से

लड़े थे। उनके अलावा बंगाल से छह

अन्य कम्युनिस्ट उम्मीदवार भी थे।

चुनाव से पहले सोमनाथ लाहिरी के

घर पर गुंडों ने हमला करके घर

तहस-नहस कर दिया। इसकी

कार्रवाईयों में उन्होंने अत्यंत सक्रियता

से भाग लिया। संविधान सभा के सदस्य

के रूप में उन्होंने एक प्रस्ताव के जरिए

मांग की कि एक अस्थाई सरकार का

गठन किया जाय जो व्यस्क मताधिकार

के आधार पर एक नई संविधान सभा

का गठन करे। इस प्रस्ताव पर विचार

नहीं किया गया क्योंकि इसे अध्यक्ष ने

‘आउट आॅफ आॅर्डर’ करार दे दिया।

जनवरी 1947 में सोमनाथ

लाहिरी ने एक प्रस्ताव के जरिए सबको

आश्चर्य में डाल दिया। उन्होंने बजट

में संशोधन प्रस्तावित किए जिसमें मांग

की गई कि मंत्रियों और अफसरों के

वेतन में कटौती की जाय तथा साथ ही

निम्नतर स्टाॅफ के वेतन में बढ़ोतरी की

जाय। साथ ही उन्होंने मांग की कि

स्वयं संविधान सभा के सदस्यों के

अलाउंस इत्यादि में कटौती की जाय

और वे आम सदस्यों की तरह रहें।

जाहिर है उनकी मांगे नहीं मानी

गई।

उन्होंने मूलभूत अधिकारों पर अपने

गंभीर विचार प्रकट किए। प्रेस की

आजादी का उल्लेख तक नहीं किया

गया है। उन्होंने सरदार पटेल के राजद्रोह

संबंधी विचारों का विरोध करते हुए

कहा कि इंगलैंड में भी अधिक अधिकार

हैं। यदि पटेल की चले तो विरोध का

कोई भी स्वर, खासकर समाजवादी

विचार, कुचल दिया जाएगा।

उनका नाम स्टीयरिंग कमिटि के

13 सदस्यों में थाऋ केवल 11 का ही

चुनाव होना थाऋ सोमनाथ लाहिरी और

लक्ष्मीनारायण साहु ने अपने नाम वापस

ले लिए।

सोमनाथ ने संविधान सभा में

नागरिकों को सरकार के मुकाबले कम

अधिकार प्रदान किए जाने का कड़ा

विरोध किया। हर अधिकार के पीछे

एक शर्त लगा दी गई है।

अपने एक भाषण में सोमनाथ

लाहिरी ने पं. नेहरू को भारत की जनता

की आत्मा को ‘स्वाधीनता’ के संपादक

के रूप में उन्होंने पत्रकारिता में नई

रूझान पैदान की। कम्युनिस्ट पत्रकारिता

और सामान्य प्रत्रकारिता में नए आयाम

खुले। उनकी देखरेख में कई नए

पत्रकार प्रशिक्षित हुए।

आजादी के बाद

देश की आजादी के बाद पार्टी

अत्यंत कठिन दौर से गुजरी। देश

सांप्रदायिक दंगों तथा अन्य समस्याओं

से ग्रस्त था। पार्टी ने आजादी का स्वागत

किया। गांधी जी की हत्या कर दी गई।

लेकिन जल्द ही पार्टी पर संकीर्ण

दुस्साहिक आत्मघाती ‘बी.टी.आर.

लाईन’ हावी हो गई। पार्टी बिखर गई।

इस संकट से उबरने में उसे कुछ समय

लग गया।

पार्टी को सही रास्ते पर लाने में

सोमनाथ लाहिरी की बड़ी भूमिका रही।

वे पं. बंगाल की असेम्बली में 1957

में चुने गए। वे 1977 तक एम.एल.

ए. बने रहे। 1967 और 1969 में

वे राज्य सरकार में बनी सरकार में

मंत्री बने, वे सूचना और स्थानीय

प्रशासन के मंत्रालय को संभाल रहे

थे। वे 1973 में प. बंगाल के पी.ए.

सी. ;पब्लिक अकाॅउन्ट्स कमिटिद्ध के

अध्यक्ष नियुक्त हुए।

वे असाधारण रूप से प्रखर वक्ता

थे। वे दूसरे कई नेताओं से ऊपर थे।

उनकी लेखनी बहुत ही शक्तिशाली थी।

उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या ;30

जनवरी 1948द्ध के संबंध में

स्वाधीनता में लिखाः ‘‘शोक नहीं,

क्रोध’’। वे बहुत ही सादा रहते और

विविध प्रकार की दिलचस्पी रखतेः

फिल्म, कवित, संगीत, उपन्यास, इ.।

वे खुद कहानियां और उपन्यास लिखा

करते।

उन्होंने निखिल चक्रवर्ती के साथ

मिलकर काफी काम किया था। आजादी

के आंदोलन के अंतिम दिनों में सारे

दिन की पत्रकारों द्वारा रिपोर्टिंग के बाद

जब सभी ‘स्वाधीनता’ के दफ्तर पहुंचे

तो सोमनाथ लाहिरी ने पूछा कि

दिन-भर की घटनाओं की सबसे विशेष

बात क्या है? निखिल ने कहा कि पहली

बार उन्होंने लोगों को गोली चलाने

वाली पुलिस की ओर भागते देखा।

लाहिरी ने तुरंत कहाः ‘‘यही , यही है

सबसे खास बात! लोगों का डर खत्म

हो गया है। यही जन-विद्रोह का लक्षण

है और पूरी-पूरी रिपोर्टिंग होनी चाहिए।’’

चीनी आक्रमण के बारे में

1962 के चीनी आक्रमण के

संदर्भ में सोमनाथ लाहिरी ने कालांतर

साप्ताहिक के जनवरी 1963 के अंक

में बड़ा ही सुंदर लेख लिखा। उन्होंने

कहा कि हम हर साल गणतंत्र बचाने

का संघर्ष आगे बढ़ाते हैं। ‘‘एकता और

संघर्ष’’ की नीति उसी का एक अंग है।

लेकिन चरम कठमुल्लापन यह सब

भूलकर और साथ ही पंचशील एवं

गुटनिरपेक्षता त्यागकर काली शक्तियों

की सहायता में उतर आया। उन्होंने

लिखा, चीन ने भारत पर आक्रमण कर

दिया। प्रतिक्रियावाद के खेमे में खुशी

की लहर दौेड़ गई। बाहर से चरम

वामपंथ ने वह कर दिखाा जो देश के

अंदर चरम दक्षिणपंथ नहीं कर पाया

था। हमने देश की रक्षा के लिए उचित

कदम उठाए। भारत की राष्ट्रीय भावना

मरी नहीं। हमें प्रधानमंत्री तथा जनता

की सच्ची भावना के पीछे गोलबंद होना

चाहिए।

हम देश का निर्माण अपने तरीके

से करेंगे। हम शांति के लिए लड़ेंगे।

सम्मानजनक शांति हमारे गणतंत्र का

प्रमुख उद्देश्य होगा। संुदर शब्दों में प्रकट

करने के लिए बधाई दी। नेहरू ने

कहा था कि किसी भी प्रकार के दबाव

का जनता द्वारा विरोध होगा। लाहिरी

ने कहा कि असली बात अमल है।

अभी भी अंग्रेज मौजूद हैं और उनकी

छाया का असर कई घटनाओं पर पड़

रहा है। अंग्रेज अलग ही किस्म का

संविधान चाहते हैं और इसके लिए

दबाव बनाए हुए हैं।

सोमनाथ लाहिरी ने रोजगार, भूमि

के राष्ट्रीयकरण, इ. के संदर्भ में मूलभूत

अधिकारों संबंधी महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत

किए।


सोमनाथ लाहिरी न सिर्फ ‘स्वाधीनता’ बल्कि अन्य पार्टी अखबारों से भी जुड़े

हुए थे, जैसे ‘नेशनल फ्रंट’, ‘न्यू एज’, इ. सत्तर के दशक में ‘न्यू एज’ के लिए

नियमित लिखा करते थे।

उन्होंने ‘कलियुगेर गल्प’ नाम से बंगला में कहानियांे का संकलन लिखा।

उन्होंने ‘साम्यवाद’ नामक माक्र्सवाद और समाजवाद पर बंगला में प्रथम पुस्तक

लिखी। उन्होंने लेनिन की रचना ‘राज्य और क्रांति’ का बंगला अनुवाद किया।

दिलीप बोस ने ही प्रो. हीरेन मुखर्जी को सोमनाथ लाहिरी से मिलाया था।

सोमनाथ लाहिरी की पत्नी बेला बोस की मृत्यु उनसे दो वर्ष पूर्व ही हुई थी।

लाहिरी इससे बहुत विचलित हुए थे। उस दौरान उन्होंने अपनी एकमात्र कविता

लिखी जो बाद में ‘कालांतर’ में प्रकाशित हुई। सोमनाथ 1961,1964 और

1968 में भा.क.पा. की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य थे।

उस जमाने में तथा आजादी के बाद भी भवानी सेन जेसे प्रभावशाली व्यक्तित्व

भी हुआ करते थे लेकिन सोमनाथ लाहिरी का अपना अलग ही प्रभाव था। वे

जनसभा में प्रभावशाली तो थे ही वे माक्र्स संबध्ंाी सेमिनारों में भी उतने ही

असरदार हुआ करते।

उनकी मृत्यु 19 अक्टूबर 1984 को हो गई। उनकी मृत्यु का शोक

व्यापक तौर पर मनाया गया। कलकत्ता वि.वि. के वाइस -चांसलर और अन्य े भी

शोक सभा में हिस्सा लिया।

सोमवार, 24 अगस्त 2020

ज्योतिषियों का पोंगापंथ और शनि के अंधविश्वास-



शनि को लेकर पोंगापंडितों ने तरह-तरह के मिथ बनाए हुए हैं और इन मिथों की रक्षा में वे तरह-तरह के तर्क देते रहते हैं। शनि से बचने के उपाय सुझाते रहते हैं। कुछ अप्सा पहले स्टार न्यूज के एक कार्यक्रम में एक ज्योतिषी ने कहा शनि का फल सबके लिए एक जैसा नहीं होता। कुंडली में अवस्था के अनुसार शनि का फल होता है।

      शनि के सामाजिक और व्यक्तिगत प्रभाव के बारे में जितने भी दावे ज्योतिषियों के द्वारा किए जा रहे हैं वे सभी गलत हैं और सफेद झूठ है। ज्योतिष में ग्रहों के नाम पर फलादेश का सफेद झूठ तब पैदा हुआ जब हम विज्ञानसम्मत चेतना से दूर थे।आज हम विज्ञानसम्मत चेतना के करीब हैं । ऐसी अवस्था में ग्रहों के प्राचीन काल्पनिक प्रभाव से चिपके रहना गलत है ।  


  शनि इस ब्रह्माण्ड में एक स्वतंत्र ग्रह है,उसकी स्वायत्त कक्षा है । भारत के ज्योतिषी यह बताने में असमर्थ रहे हैं कि शनि की पृथ्वी से कितनी दूरी है ? शनि का प्रभाव कैसे पड़ता है ? शनि के बारे में हमारी परंपरागत जानकारी अवैज्ञानिक है। हमें इस अवैज्ञानिक जानकारी से मुक्ति का प्रयास करना चाहिए।


   शनि एक ग्रह है। यह सच है। लेकिन इसका पृथ्वी पर रहने वाले मनुष्यों पर प्रभाव  होता है यह धारणा गलत है। बुनियादी तौर पर किसी भी ग्रह का मनुष्य के भविष्य या भाग्य के साथ कोई संबंध नहीं है।

     शनि काला है न गोरा है,राक्षस है न शैतान है, वह तो ग्रह है। उसकी कोई मूर्ति नहीं है। शनि के नाम पर जो शनिदेवता प्रचलन में हैं वह पोंगापंथ की सृष्टि हैं। जिस दिन मनुष्य ने ग्रहों को देवता बनाया, उनकी पूजा आरंभ की,उनके बारे में तरह-तरह के मिथों की सृष्टि की उसी दिन से मनुष्य ने ग्रहों को अंधविश्वास , भविष्य निर्माण और विध्वंस के गोरखधंधे का हिस्सा बना दिया। उसके बाद से हमने ग्रहों के सत्य को जानना बंद कर दिया।

     शनि का सत्य क्या है ? शनि इस ब्रह्माण्ड का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह है। शनि में अनेक वलय बने हैं। अनेक वलय या रिंग के कारण शनि दूर से देखने में बेहद खूबसूरत लगता है। शनि के अलावा गुरू,नेपच्यून, यूरानस ग्रह में ही रिंग या वलय हैं।    स्टार न्यूज़ ने बताया शनि की दूरी  एक अरब 32 करोड़ किलोमीटर है। यह गलत है। नासा के अनुसार शनि की पृथ्वी से दूरी है 120,540 किलोमीटर। शनि ,सूर्य की परिक्रमा करता रहता है। सूर्य से शनि की परिक्रमा करते हुए दूरी 1,514,500,000 किलोमीटर से लेकर 1,352,550,000 किलोमीटर के बीच में रहती है।

    

     शनि के बारे में यह मिथ है कि उसकी गति धीमी है,सच यह है कि शनि तेज गति से सूर्य की परिक्रमा करता है,ग्रहों में शनि से ज्यादा तेज गति सिर्फ गुरू की है। ब्रह्माण्ड का शनि  एक चक्कर 10 घंटे 39 मिनट में पूरा करता है। यानी इतने समय का उसका एक दिन होता है। जबकि पृथ्वी को चक्कर पूरा करने में 24 घंटे लगते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि शनि पर बड़े पैमाने पर गैस भंडार हैं। लेकिन उन्हें सतह पर देखना संभव नहीं है। इसके अलावा पानी,अमोनिया,लोहा,मिथाइन आदि के भंडार हैं। शनि पर हाइड्रोजन और हीलियम गैसें भी हैं। 


     वैज्ञानिकों को अभी तक शनि पर किसी भी किस्म के जीवन के संकेत नहीं मिले हैं। शनि पर मौसम में अनेक किस्म का अंतर मिलता है शनि की  सर्वोच्च शिखर पर तापमान माइनस 175 डिग्री सेलसियस तक रहता है। शनि पर पृथ्वी की तुलना में वजन बढ़ जाता है, 100 पॉण्ड वजन बढ़कर 107 पॉण्ड हो जाता है। शनि में कई रिंग या वलय हैं। सात बड़े रिंग हैं। ये वलय शनि से काफी दूर हैं। सात बड़े रिंग के अलावा सैंकड़ों छोटे वलय भी हैं। शनि पर वलय का पता 16वीं सदी में इटली के वैज्ञानिक गैलीलियो ने किया था।

    शनि के प्रभाव के बारे में यदि ज्योतिषी बातें करते हैं तो शनि के  उपग्रहों के प्रभाव के बारे में बातें क्यों नहीं करते ? कभी ज्योतिषियों ने शनि के उपग्रहों का विस्तार से वर्णन क्यों नहीं किया ? शनि की मैगनेटिक धरती हमारी पृथ्वी से 10 गुना ज्यादा शक्तिशाली है। सन् 1973 में अमेरिका ने शनि और गुरू की वैज्ञानिक खोज का काम किया है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि भारत के किसी भी संस्कृत विश्वविद्यालय में आधुनिक वेधशाला नहीं है और नहीं आधुनिक अनुसंधान की किसी भी तरह की व्यवस्था है।  किसी भी ज्योतिषी ने अभी तक कोई आधिकारिक रिसर्च ग्रहों पर नहीं की है। पुराने ज्योतिषी ग्रहों के बारे में अनुमान से जानते थे उनके सारे अनुमान गलत साबित हुए हैं। सिर्फ पृथ्वी से विभिन्न ग्रहों की दूरी को ही लें तो पता चल जाएगा कि पुराने ज्योतिषी सही हैं या आधुनिक विज्ञान सही है। आशा है इंटरनेट पर उपलब्ध ग्रहों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी को कृपया पढ़ने की कृपा करेंगी। सिर्फ अंग्रेजी में नाम मात्र लिख दें हजारों पन्नों की जानकारी घर बैठे मुफ्त में मिल जाएगी,आज जितनी जानकारी ग्रहों के बारे में विज्ञान की कृपा सें उपलब्ध है उसकी तुलना में एक प्रतिशत जानकारी भी प्राचीन और आधुनिक ज्योतिषी उपलब्ध नहीं करा पाए हैं।


   आज विज्ञान से हमें पता चला है कि किस ग्रह पर किस रास्ते से जाएं, जाने में कितना समय लगेगा,कितनी दूरी पर ग्रह स्थित है, जाने-आने में कितना खर्चा आएगा, वैज्ञानिक खोज रहे हैं कि ग्रहों पर जीवन है या नहीं,इस संदर्भ में क्या संभावनाएं हैं, ये बातें हम पहले नहीं जानते थे। विज्ञान यह भी बताता है कि ग्रहों को खोज निकालने का तरीका क्या है,ग्रहों का अनुसंधान क्यों किया जा रहा है। इन सारी चीजों को पारदर्शी ढ़ंग से विज्ञान के जानकारों से कोई भी व्यक्ति सहज ही जान सकता है।  

           भारत में ज्योतिषी ग्रहों के प्रभाव के जितने दावे करते रहते हैं वे सब गलत हैं। सवाल उठता है अंतरिक्ष अनुसंधान के यंत्रों के बिना ग्रहों को कैसे जान पाएंगे ? ज्योतिष हमें ग्रहों फलादेश बताता है इसका अनुमान से संबंध है, इसका सत्य से कोई संबंध नहीं है। वह फलादेश है। फलादेश विज्ञान नहीं होता। विज्ञान को दृश्य से वैधता प्राप्त करनी होती है। जो चीज दिखती नहीं है वह प्रामाणिक नहीं है।विज्ञान नहीं है।

     असल में ज्योतिषी लोग आधुनिक रिसर्च का अर्थ ही नहीं समझते। ऐसे में ज्योतिष और विज्ञान के बीच संवाद में व्यापक अंतराल बना हुआ है। ज्योतिषी लोग सैंकड़ों साल पहले रिसर्च करना बंद कर चुके थे। वे वैज्ञानिक सत्य को वराहमिहिर के जमाने में ही अस्वीकार करने की परंपरा बना दी गयी थी।  तब से वैज्ञानिक ढ़ंग से ग्रहों को देखने का काम ज्योतिषी छोड़ चुके हैं। ज्योतिष के अधिकांश विद्वान बुनियादी वैज्ञानिक तथ्यों को भी नहीं मानते। मसलन सूर्य पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है या पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है,इस समस्या पर ज्योतिष और विज्ञान दो भिन्न धरातल पर हैं। ज्योतिषी ज़वाब दें वे किसके साथ हैं विज्ञान के या परंपरागत पोंगापंथ के? ज्योतिषी यह भी बताएं कि ग्रहों का प्रभाव होता है तो यह बात उन्होंने कैसे खोजी ? इस खोज पर कितना खर्चा आया ? पद्धति क्या थी ?  ग्रहों का प्रभाव होता है तो सभी ग्रहों का प्रभाव होता होगा ? ऐसी अवस्था में सिर्फ नौ ग्रहों के प्रभाव की ही चर्चा क्यों ? बाकी ग्रहों को फलादेश से बाहर क्यों रखा गया ? अधिकांश  टीवी चैनलों पर  अंधविश्वास के प्रचार की आंधी चली हुई है।यहां एक नमूना पेश है।

   ‘स्टार न्यूज’ वाले अंधाधुंध अंधविश्वास का प्रचार करते रहे हैं। अंधविश्वास के प्रचार का  नमूना है दीपक चौरसिया के द्वारा 11जून 2010 को पेश किया गया कार्यक्रम। इस कार्यक्रम का शीर्षक था ‘शनि के नाम पर दुकानदारी’। इस कार्यक्रम में ज्योतिषी, तर्कशास्त्री,वैज्ञानिक सबको बुलाया गया,सतह पर यही लग सकता है कि ‘स्टार न्यूज’ वाले संतुलन से काम ले रहे हैं। लेकिन समस्त प्रस्तुति का झुकाव शनि और अंधविश्वास की ओर था।


       सवाल किया जाना चाहिए क्या अंधविश्वास और विज्ञान के मानने वालों को समान आधार पर रखा जा सकता है ? क्या अंधविश्वास और विज्ञान को संतुलन के नाम पर समान आधार पर रखना सही होगा ? क्या इस तरह के कार्यक्रम अंधविश्वास की मार्केटिंग करते हैं ? क्या यह शनि के बहाने ‘स्टार न्यूज’ की दुकानदारी है ? क्या इस कार्यक्रम में शनि के बारे में तथ्यपूर्ण और वैज्ञानिक जानकारियों का प्रसारण हुआ ? क्या इस तरह के कार्यक्रम अंधविश्वास को बढ़ावा देते हैं ? आदि सवालों पर हमें गंभीरता के साथ विचार करना चाहिए।


   ‘स्टार न्यूज’ के इस कार्यक्रम में एंकर दीपक चौरसिया अतार्किक सवाल कर रहे थे। एंकर जब अतार्किक सवाल करता है तो वह कुतर्क को बढ़ावा देता है। बक-बक को बढ़ावा देता है। सही सवाल करने पर सही जवाब खोज सकते हैं। दीपक चौरसिया का प्रधान सवाल था ‘शनि के नाम पर दुकानदारी हो रही है या नहीं’,कार्यक्रम में भाग लेने वाले प्रत्येक व्यक्ति से यह सवाल पूछा गया जाहिरा तौर पर जबाब होगा ‘हां’, अगला सवाल था  शनि से ड़रना चाहिए या नहीं ? उत्तर था ‘नहीं’। पहले सवाल के जबाब में वक्ताओं ने शनि के नाम पर दुकानदारी का विरोध किया। दूसरे सवाल के जवाब में कहा शनि से नहीं डरना चाहिए।

            कायदे से देखें तो इन दोनों सवालों में ‘स्टार न्यूज’ वालों की शनि भक्ति और आस्था छिपी है। ये दोनों सवाल यह मानकर चल रहे हैं शनि है, रहेगा और शनि को मानो। सिर्फ शनि के धंधेबाजों से बचो, शनि से डरो मत ,शनि को मानो। पूरे कार्यक्रम में दीपक चौरसिया एकबार भी यह नहीं कहते कि शनि पूजा मत करो,शनि को मत मानो, शनि अंधविश्वास है, उनकी चिंता शनि के नाम पर हो रही दुकानदारी और भय को लेकर थी। एंकर द्वारा शनि की स्वीकृति अंधविश्वास का प्रचार है।

     ‘स्टार न्यूज’ ने कार्यक्रम के आरंभ में शनि की पूजा के विजुअल दिखाए गए । पूजा के विजुअल प्रेरक और फुसलाने का काम करते हैं।मोबलाईजेशन करते हैं। ये विजुअल शनि अमावास्या के पहले वाली रात को प्राइम टाइम में दिखाए गए हैं। इस कार्यक्रम में मौजूद ज्योतिषियों ने ज्योतिष के बारे में,शनि के बारे में जो कुछ भी कहा उसे अंधविश्वास की कोटि में ही रखा जाएगा।

     मजेदार बात यह हैकि ज्योतिषियों को अपनी पूरी बात कहने का अवसर दिया गया और वैज्ञानिकों को आधे-अधूरे ढ़ंग से बोलने दिया गया और कम समय दिया गया। एक वैज्ञानिक जब शनि के बारे में वैज्ञानिक तथ्य रखने की कोशिश कर रहा था तो उसे बीच में ही रोक दिया गया।

     समूचे कार्यक्रम में एंकर की दिलचस्पी शनि के बारे में वैज्ञानिक जानकारियों को सामने लाने में नहीं थी। बल्कि वह तो सिर्फ यह जानना चाहता था कि शनि के नाम पर जो दुकानदारी चल रही है ,उसके बारे में वैज्ञानिकों की क्या राय है ? वे कम से कम शब्दों में राय दें।

     एंकर कोशिश करता रहा कि वैज्ञानिक विस्तार के साथ न बोल पाएं। एक वैज्ञानिक ने कहा शनि का समाज पर कोई प्रभाव नहीं होता,दूसरे ने कहा शनि पूजा के नाम पर भय पैदा किया जा रहा है,अंधविश्वास फैलाया जा रहा है। तीसरे वैज्ञानिक ने कहा शनिपूजा अपराध है। बालशोषण है। शनि के नाम पर बच्चों से भिक्षावृत्ति कराई जा रही है। यह अपराध है।

      इस बहस का सबसे मजेदार पहलू था एक ज्योतिषी द्वारा शनि ग्रह पर अपनी किताब को दिखाना, इस किताब के कवर पेज पर जो चित्र था उसके बारे में ज्योतिषी-लेखक ने कहा यह शनि का चित्र है,इसका तुरंत वैज्ञानिकों ने प्रतिवाद किया और कहा यह शनि ग्रह का फोटो नहीं है। ज्योतिषी एक क्षण के लिए बहस में उलझा लेकिन वैज्ञानिकों के खंडन के सामने उसके चेहरे की हवाईयां उड़ने लगीं।

    असल बात यह कि ज्योतिषी यह तक नहीं जानता था कि शनि ग्रह देखने में कैसा है ? शनि को इमेज मात्र से नहीं पहचानने वाले ज्योतिषी को शनि का कितना ज्ञान होगा आप स्वयं कल्पना कर सकते हैं ? इसके विपरीत पैनल में मौजूद वैज्ञानिकों को अपनी पूरी बात कहने का मौका ही नहीं दिया गया। दीपक यौरसिया का सवाल था शनि से डरना चाहिए या नहीं ? एक ही जवाब था नहीं। सवाल डरने का नहीं है।

   सवाल यह है कि शनि को विज्ञान के नजरिए से देखें या अंधविश्वास के नजरिए से देखें ? विज्ञान के नजरिए से शनि एक ग्रह है,उसकी अपनी एक कक्षा है। स्वायत्त संसार है। वैज्ञानिकों के द्वारा सैंकड़ों सालों के अनुसंधान के बाद शनि के बारे में मनुष्य जाति की जानकारी में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। इसके लाखों चित्र हमारे पास हैं। शनि में क्या हो रहा है उसके बारे में उपग्रह यान के द्वारा बहुत ही मूल्यवान और नई जानकारी हम तक पहुँची है।

     इसके विपरीत ज्योतिषियों ने विगत दो -डेढ़ हजार साल पहले शनि के बारे में ज्योतिष ग्रंथों में जो अनुमान लगाए थे वे अभी तक वहीं पर ही अटके हुए हैं।

       कार्यक्रम में शनि के बारे में नई जानकारियों को सामने लाने में एंकर की कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह बार-बार ज्योतिषियों से काल्पनिक बातें सुनवाता रहा। ज्योतिषियों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए कि उनके पास शनि के बारे में क्या नई प्रामाणिक जानकारियां हैं ?

     मैंने ज्योतिषशास्त्र का औपचारिक तौर पर नियमित विद्यार्थी के रूप में संस्कृत के माध्यम से 13 साल प्रथमा से आचार्य तक अध्ययन किया है और ज्योतिषशास्त्र के तकरीबन सभी स्कूलों के गणित-फलित सिद्धान्तकारों को भारत के श्रेष्ठतम ज्योतिष प्रोफेसरों के जरिए पढ़ा है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि सैंकड़ों सालों से ग्रहों के बारे में ज्योतिष में कोई नयी रिसर्च नहीं हुई है।

     ज्योतिषियों की ग्रहों के नाम पर अवैज्ञानिक बातों के प्रचार में रूचि रही है लेकिन रिसर्च में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं रही है। जब सैंकड़ों सालों से फलित ज्योतिष से लेकर सिद्धान्त ज्योतिष के पंड़ितों ने ग्रहों को लेकर कोई अनुसंधान ही नहीं किया तो क्या यह ज्योतिषशास्त्र की  असफलता और अवैज्ञानिकता का प्रमाण नहीं है ? हम जानना चाहेंगे कि जो ज्योतिषी ग्रहों के सामाजिक प्रभाव के बारे में तरह-तरह के दावे करते रहते हैं वे किसी भी ग्रह के बारे में किसी भी ज्योतिषाचार्य द्वारा मात्र विगत सौ सालों में की गई किसी नई रिसर्च का नाम बताएं ? क्या किसी ज्योतिषी ने कभी किसी ग्रह को देखा है ? ज्योतिष की किस पुरानी किताब में ग्रहों का आंखों देखा  वर्णन लिखा है ? सवाल उठता है जब ग्रह को देखा ही नहीं,जाना ही नहीं,तो उसके सामाजिक प्रभाव के बारे में दावे के साथ कैसे कहा जा सकता है।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी