मंगलवार, 20 नवंबर 2018

चोर ही चौकीदार है


राफेल घोटाला, नोटबन्दी घोटाला, जी0एस0टी0 घोटाला और अब सी0बी0आई0 जैसी संस्था को नष्ट कर मोदी देश को दिवालिया बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
‘चोर ही चैकीदार’ है, ‘नारे के साथ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी नेे जुलूस निकाला जुलूस में  शामिल लोगों को सम्बोधित करते हुए पार्टी के राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिंह ‘सुमन’ ने यह उद्गार व्यक्त करते हुए कहा कि रिजर्व बैंक आफ इण्डिया को डरा धमकाकर 3.6 लाख करोड़ रूपये लेकर अपनी विदेेश यात्राओं  के मद में  खर्च कराना चाह रहे हैं।

पार्टी के जिला सचिव बृज मोहन वर्मा ने कहा कि पाटी मोदी के भ्रष्टाचारों  का खुलासा करने के लिए बराबर जुलूस प्रदर्शन कर रही है वहीं क्षेत्रीय दल मोदी की मदद के लिए चुप्पी साध रखी है यह देश के लिए खतरनाक सन्देश है। पार्टी के सहसचिव डा0 कौसर हुसेन ने कहा कि सत्तारूढ़ दल अपने भ्रष्टाचारों  को छिपाने के लिए मन्दिर राग अलाप रही है उसको मन्दिर-मस्जिद से कोई लेना-देना नहीं है। सहसचिव शिव दर्शन वर्मा ने कहा कि योगी सरकार किसानों  की धान खरीद मामले में असफल हो चुकी है और किसानों  का धान विचैलिए बारह सौ रूपये कुन्तल खरीद रहे हैं सरकार विचैलिए को फायदा देने के लिए धान खरीद की नौटंकी कर रही है।
किसान सभा जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि किसान समस्याओं  लेकर 29 व 30 दिसम्बर को दिल्ली प्रदर्शन करेगी जिसमें  जिले से काफी संख्या में किसान जायेंगे.
                    जुलूस में राम नरेश वर्मा, दल सिंगार, गिरीश चन्द, अमर सिंह प्रधान, मुनेश्वर बक्स, प्रवीन वर्मा, महेन्द्र यादव, अशोक मौर्य, परमेन्द्र वर्मा, नवीन वर्मा, सहदेव वर्मा, रामविलास, आशीष शुक्ला, राजेन्द्र, बहादुर सिंह, करमवीर सिंह, सरदार भूपेन्द्र पाल सिंह अधिवक्ता गिरीश चन्द, गौरी रस्तोगी आदि प्रमुख कार्यकर्ताओं  ने हिस्सा लिया।

रविवार, 11 नवंबर 2018

मौलाना आज़ाद के पद चिन्हों पर चल कर देशी अंग्रेजों को भगाया जा सकता है

  1.              बाराबंकी -मौलाना आजाद की स्वतंत्रता संग्राम में उनकी  कुर्बानियों  ने देश को आजाद करानेमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है उनके पद चिन्हों पर चल कर देशी अंग्रेजों को भगाया जा सकता है 
  2.                      यह विचार व्क्त करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन नें आज आवाज फाउडेशन बाराबंकी की ओर से आयोजित   भारत रत्न प्रथम शिक्षामंत्री एवम् स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद के  जन्म दिवसके अवसर  देसीआन बैंकवट हाल में सम्बोधित हुए आज़ाद को  हिन्दू-मुस्लिम एकता का अग्रदूत बताया. 
  3. आज़ाद जन्म दिवस सम्बोधित करते हुए वरिष्ठ  आई0पी0एस0 मंजूर अहमद  मुख्य अतिथि ने मौलाना आजाद के बतौर प्रथम शिक्षा मंत्री किये गये कारनामों के उजागर किया तथा शिक्षा हासिल करने  पर जोर देने दिया .  जवाहर लाल नेहरु महाविद्यालय के प्रवक्ता र्डॉ0 राजेश मल्ल ने कहा कि मौलाना आजाद जैसे खुले जहन नेताओं की इस समय भारत को बहुत जरूरत है.
  4.                                              जलसे का संचालन पूर्व सदस्य जिला पंचायत  मो0 मोहसिन ने किया। उक्त कार्यक्रम में मुख्य रूप से इरफान कुरेशी, फरहान वारसी, दानिश खान, जियउर्रहमान नफीस मियाँ, मो0 अकरम, अमरनाथ मिश्रा, कमल भल्ला, संजीव मिश्रा, जलील यार खाँ, उमेर किदवाई, हुमाँयु नईम खाँ, डॉ0 अहमद जावेद, सरदार चरनजीत सिंह , विशाल सिंह, फजल इनाम मदनी ,चौ0 तालिब नजीब, तारिक, जीलानी आदि शहर के सैकड़ो सम्मानित लोग उपस्थित रहे।  जलसे की सदारत शाह अनवर जमाल किदवई ने किया


मंगलवार, 30 अक्तूबर 2018

पूर्व विधायक की स्मृति सभा का हुआ आयोजन


स्वः गजेन्द्र सिंह जो वादा करते उसे पूरा करते थे: फरीद महफूज किदवई

राजनीतिक युग में जनता के सर्व सुलभ राजनेता थे: फवाद किदवई
पूर्व मंत्री बोलते हुए 

बाराबंकी। वर्तमान समय में अब देश में ऐसी सरकारें सत्तारूढ है। जो अपने अल्पसंख्या में रहने वाले नागरिकों के दमन करने पे उतारू है। उनकी यह संविधान विरोधी हरकते देश की एकता और अखण्डता के लिए खतरा है। उक्त विचार स्व0 दादा गजेन्द्र सिंह की स्मृति सभा में पूर्व मंत्री फरीद महफूज किदवई ने व्यक्त किये। पूर्व मंत्री ने स्मृति सभा को संबोधित करते हुए कहा कि स्वः गजेन्द्र सिंह जो वादा करते थे। उसको पूरा करते थे। अब यह बात वर्तमान राजनीतिज्ञो में नहीं है। प्रदेश कांग्रेस कमेटी महासचिव फवाद किदवई ने कहा दादा गजेन्द्र सिंह अपने राजनीतिक युग में जनता के सर्व सुलभ राजनेता थे। वह कर्तव्यनिष्ठ व ईमानदार थे। प्रदेश सरकार में मंत्री प्राप्त दर्जा व पूर्व विधायक परमात्मा सिंह ने कहा कि दादा के साथ हम भी विधायक थे और वे विधानसभा में अपनी बातों को प्रभावशाली तरीके से रखते थे। संजय सेतु के निर्माण की मंजूरी उन्हीं के अथक प्रयासों से हुई थी। इसके अतिरिक्त सभा को पत्रकार तारिक खान, सिटी इण्टर कालेज प्रधानाचार्य विजय प्रताप सिंह, प्रशान्त कुमार मिश्रा, नवीन सेठ, वसीम राईन, बृजमोहन वर्मा, बार पूर्व अध्यक्ष सुरेन्द्र प्रताप सिंह बब्बन, सेल्स ट्रेक्स बार अध्यक्ष पवन वैश्य, हुमाँयू नईम खान, उपेन्द्र सिंह, अनवर जमाल, महंत बी0पी0 दास, राजेश सिंह आदि लोगों ने भी संबोधित किया। सभा का संचालन अधिवक्ता विभव मिश्रा व अध्यक्षता बृजेश कुमार दीक्षित ने की। 
श्री फवाद किदवई मल्यांपर्ण करते हुए 
                   स्मृति सभा में वरिष्ठ अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन, अजय गुरू, श्याम सुन्दर दीक्षित, विनय दास, विनय कुमार सिंह, शिव दर्शन वर्मा, मो0 कदीर, एहशान बेग, जैनुल कदर, विजय प्रताप सिंह, निर्मल वर्मा, पुष्पेन्द्र सिंह, विनोद कुमार यादव, गिरीश, राजेन्द्र सिंह, कर्मवीर सिंह, भूपिंदर पाल सिंह, प्रवीन कुमार, महेन्द्र यादव, डा0 कौशर हुसैन, रईस अहमद, कादरी, आनन्द सिंह, अमर प्रताप सिंह, पूर्णांशु सिंह, नीरज वर्मा, कमल सिंह चन्देल, कलीम किदवई, अख्तर पत्रकार अवधेश आदि मौजूद रहे।

बुधवार, 24 अक्तूबर 2018

प्रधानमंत्री मोदी खुद राफेल घोटाले में संलिप्त है-रणधीर सिंह सुमन

  1.   बाराबंकी। भ्रष्टाचार के कारण आज सी0बी0आई0 मुख्यालय को सील करना पड़ गया है। प्रधानमंत्री मोदी स्ंवय राफेल घोटाले में संलिप्त है। 
  2.                           उक्त आरोप लगाते हुये भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने राष्ट्र व्यापी पार्टी द्वारा द्वारा आयोजित प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुये व्यक्त किये। श्री सिंह ने आगे कहा कि देश मे भ्रष्टाचार अपनी सीमायें तोड़ रहा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कार्यवाही सम्भव ही नही रह गई है।
  3.                             पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई बड़ी मुश्किल है। क्योकि भ्रष्टाचारियो ने धर्म का आवरण ओढ़ रखा है। इसलिये आवश्यक है कि धर्म और राजनीति को अलग-अलग रखा जाये। पार्टी के जिला सहसचिव डा0 कौसर हुसैन ने कहा कि राफेल घोटाले में जैसे उच्चतम न्यायालय ने पूछताछ शुरु की। कि विदेश राज्यमंत्री सीतारमण भ्रष्टाचार को दबाने के लिये पेरिस पहुंच गई। पाटी सह-सचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि नोटबन्दी घोटाला, राफेल घोटाले ने देश की अर्थ व्यवस्था को नष्ट कर दिया है। 
  4.                         
    किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार िंसह ने कहा कि राफेल घोटाले की लडाई आगे तक लड़ी जायेगी। प्रदर्शन में प्रवीण कुमार, मुनेश्वर, गिरीश चन्द्र, वीरेन्द्र कुमार, रामनाथ, गौरी रस्तोगी, राजेन्द्र सिंह राणा, नीरज वर्मा, दल सिंगार, महेन्द्र यादव, रामशंकर शर्मा, बलीराम, रामनरेश, सुरेश, सर्विन्द्र कुमार, रामविलस, कल्लूराम आदि कार्यकर्ता मौजूद रहे।

रविवार, 30 सितंबर 2018

मनुष्यता ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है- डॉ सुभाष राय

 बाराबंकी. मनुष्यता ही मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है मनुष्यता का अभाव सत्ता के शिखर पर बैठे हुए राजनीतज्ञों में है जिस कारण से सामाजिक व्यवस्था नष्ट हो रही है.
             यह उद्गार व्यक्त करते हुए लोकसंघर्ष पत्रिका द्वारा आयोजित महंत गुरुशरण दास श्रद्धांजलि समारोह को संबोधित करते हुए जनसन्देश टाइम्स के संपादक डॉ सुभाष राय ने कहा कि जब मनुष्य को मनुष्य नहीं माना जा रहा था तब जगजीवन दास साहेब ने सतनाम संप्रदाय की स्थापना कर सभी जातियों और धर्मों के लोगों को मनुष्यता के रास्ते पर चलने की राह दिखाई थी और उसी संप्रदाय के प्रथम पावा कमोलीधाम के महंत गुरुशरण दास जी थे. जिनका इस देश के अन्दर सामाजिक एकरूपता को बनाये रखने में महत्वपूर्ण योगदान था. 
                            जनपद के सुप्रसिद्द साहित्यकार डॉ श्यामसुन्दर दीक्षित ने कहा कि  देश और प्रदेश में हिन्दू-मुस्लिम एकता का जो वटवृक्ष चला आ रहा था उसको नया जीवन प्रदान करने में महंत जी की प्रमुख भूमिका रही है. जनेस्मा के प्रोफेसर डॉ राजेश मल्ल ने कहा कि सतनाम संप्रदाय ने विश्व भर में एकता का सन्देश दिया था जो आज भी प्रासंगिक है. पत्रकार तारिक खान ने कहा कि महंत जी इस जनपद के गौरव थे और सांप्रदायिक सौहार्द के लिए महत्वपूर्ण कार्य किया. गाँधी ट्रस्ट के अध्यक्ष राजनाथ शर्मा ने कहा कि महात्मा गाँधी के रास्ते पर चलकर ही इस देश को बचाए और बनाये रखा जा सकता है. जिला बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष बृजेश दीक्षित ने कहा कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था के निंदक भी ब्राह्मणवादी जीवन जीना चाहते हैं इस विसंगति को दूर किया जाना चाहिए. 
         अध्यक्षीय भाषण देते हुए सुप्रसिद्ध कहानीकार शिवमूर्ति ने कहा कि साहित्य में सतनाम साहित्य का महत्वपूर्ण योगदान है और हिंदी साहित्य में सतनाम संप्रदाय के सन्तों ने जो रचनाएं लिखी हैं उन रचनाओं ने हिंदी साहित्य को समृद्ध किया है.
                     श्रद्धांजलि सभा को विनय दास, रणधीर सिंह सुमन, बाबा पत्रकार, बृजमोहन वर्मा, हिसाल बारी किदवई, अजय गुरूजी, श्रवण कुमार, जिला टैक्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष पवन कुमार वैश्य, निशांत द्विवेदी, महंत हरिशरण दास, डॉ एस एम हैदर आदि लोगों ने सभा को संबोधित किया. कार्यक्रम का संचालन विभव मिश्र एडवोकेट ने किया.   

                  श्रद्धांजलि सभा में सुरेन्द्र प्रताप सिंह 'बब्बन', प्रदीप सिंह एडवोकेट, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, भूपिंदर पल सिंह 'शैंकी', अजीत सिंह, शिव दर्शन वर्मा, अमर प्रताप सिंह, गिरीश चन्द्र, डॉ कौसर हुसैन, मो. कदीर, आलम, राहुल दास, अमर सिंह प्रधान, राम नरेश वर्मा, विनोद तिवारी, अवधेश यादव, प्रत्युष कान्त शुक्ला  नीरज वर्मा, सीताकान्त शुक्ला, आशीष कुमार, विनय कुमार सिंह व संत शरण दास एडवोकेट आदि प्रमुख लोग थे.

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

चोर चौकीदार और भगवा कसाईखाना: भाकपा का जुलुस

गली-गली में शोर हैं चौकीदार ही चोर हैं या भगवा कसाई खाना बंद करो जैसे नारे लगाते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जलूस निकाला। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य परिषद के सदस्य रणधीर सिंह  सुमन ने सम्बोधित करते हुए कहा कि नरेन्द्र दामोदर मोदी ने राफेल घोटाले में कमीशन खाया है और सरकार को क्षति पहुंचाने के लिए एच.ए.एल (HAL) को ठेका न दिलवा कर 2019 का चुनाव लड़ने के लिए अपने मालिक से चुनावी चंदा प्राप्त कर लिया है.
            पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन  वर्मा ने कहा कि भगवा पुलिस भगवा कसाई खाने के रुप में तब्दील हो गई है और एक समुदाय विशेष के लोगों को पकड़  कर अलीगढ़ से लेकर बाराबंकी तक एनकाउंटर के नाम पर वध कर रही है. पार्टी के जिला सहसचिव डॉ कौसर हुसेन ने कहा कि मोदी सरकार को हटाने के लिए कम्युनिस्ट पार्टी 2019 तक आन्दोलन चला कर संघर्ष करेगी। पार्टी के जिला सहसचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि इस सरकार में किसान आत्महत्याएं कर रहा है, किसानों को उनकी फसल का लाभकारी मूल्य नहीं मिल रहा है वहीं अधिकारी बाढ राहत घोटाला करके मालामाल हो रहे हैं.
              प्रदर्शनकारियों का नेतृत्व किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह दलसिंगार व गिरीश चन्द्र कर रहे थे. प्रदर्शन में अमर सिंह प्रधान, मुनेश्वर बक्श, रामनरेश वर्मा, प्रवीण कुमार, महेंद्र यादव ने कहा वीरेंद्र कुमार, अशोक मौर्य, सहजराम, सुरेश रैना, दिनेश रावत आदि प्रमुख कम्युनिस्ट नेता शामिल शामिल थे.



1964 का पश्चिम बंगाल दंगा

मेरी पत्रकारिता की जिन्दगी में इस तरह के मामलात अक्सर पेश आए जब मुझे दोहरी जिम्मेदारी का निर्वाह करना पड़ा। अखबार के साथ मिल्लत के मसलां व मामलात में अमली तौर पर हिस्सा लेना पड़ता था। आजाद हिन्दुस्तान में मुस्लिम नेतृत्व के समाप्त हो जाने के पश्चात अखबार के संपादक को ही लोग हर मर्ज की दवा और हर मसले का हल समझने लगे। मुझसे जहाँ तक संभव होता, मुस्लिम समस्याआें को अखबार के माध्यम से और जनता के प्लेटफार्म से पेश करता रहा। 1964 में प0 बंगाल पर भीषण साम्प्रदायिक दंगे का कहर टूट पड़ा। यह कांग्रेसी नेता प्रफुल्ल चन्द्र सेन की हुकूमत का दौर था डॉ0 बी0सी0 राय गुजर गए थे। हुआ यह कि कश्मीर में दरगाह हजरत बल से ‘‘मूए मुबारक’’ (दाढ़ी का बाल) चोरी हो जाने के कारण जम्मु-कश्मीर में गम व गुस्से की आग भड़क उठी। वजीर आजम कश्मीर की हुकूमत को 1952 में समाप्त कर बख्शी गुलाम मुहम्मद को केन्द्र सरकार ने सत्ता सौंप दी थी। अवाम का असल क्रोध बख्शी गुलाम मुहम्मद के खिलाफ था, वही उनका निशाना थे । पूरे कश्मीर में भीषण हिंसा व तबाही की घटनाएं पेश आइंर्। पश्चिम बंगाल में भी हिसात्मक विरोध प्रदर्शन कश्मीर की घटना पर प्रारम्भ हुए, साथ ही पूर्वी पाकिस्तान ( आज का बंगला देश) में जल्द ही हिसात्मक प्रदर्शन व परिणाम स्वरूप साम्प्रदायिक हिंसा का दौर शुरू हो गया, जिसके नतीजे में वहाँ के अल्पसंख्यक हिन्दुआें को भारी जान माल का नुकसान हुआ। पूर्वी पाकिस्तान से पश्चिम बंगाल हिन्दू शरणार्थियां की आमद शुरू हो गयी। कलकत्ते के कुछ अखबारां ने इसे खूब बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, तो कलकत्ते व पास के जिलां की सौहार्द्रता का माहौल बिगड़ने लगा और साल के प्रारम्भ में साम्प्रदायिक घटनाआें के इक्का-दुक्का मामले पेश आए। 
कलकत्ता से मिले हुए बाटा नगर में दंगा भड़क उठा। मुसलमानां के सैकड़ां घर जला दिए गए।
भुवनेश्वर (उड़ीसा) में कांग्रेस का अधिवेशन चल रहा था। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू इसे संबोधित करते हुए बेहोश हो कर गिर पड़े। अफरा-तफरी मच गई। पं0 नेहरू को फौरन दिल्ली ले जाया गया। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री पी0सी0 सेन भुवनेश्वर से उड़े तो रास्ते में साम्प्रदायिक दंगे से जलते हुए बाटा नगर का हवाई नजारा करते हुए कलकत्ता पहँचे। अब साफ दिख रहा था कि पश्चिम बंगाल में बड़े साम्प्रदायिक दंगे का बादल फटने वाला है। दोपहर का वक्त था, मैं अखबार के दफ्तर में व्यस्त था कि एक मुखबिर ने आकर खबर दी कि आज रात ठीक आठ बजे अंटाली के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर फसाद बरपा होगा। यह खबर मिलते ही मैं जकरिया स्ट्रीट खिलाफत कमेटी के दफ्तर मैंं चला गया। जाने से पहले मुल्ला जान मुहम्मद को फोन कर दिया था कि कुछ और लोगां को बुला लें, जरूरी सलाह करनी है। दंगे की खबर सुनकर सभी परेशान हुए और तय पाया कि हम लोग फौरन राइटर्स बिल्डिंग जाकर मुख्यमंत्री से भेंट करें और दंगे को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाने पर जोर डालें।
मेरा प्रस्ताव था कि ऐसी आशंका है कि यह दंगा बड़े सुनियोजित ढंग से बड़े पैमाने पर होगा। यह भी संभव है कि मुसलमानां को दंगाग्रस्त बस्तियां से बचाकर सुरक्षा पूर्ण ढंग से निकालना पड़े तो हम लोग मुख्यमंत्री से प्रार्थना करें कि बचाव के इस कार्य में वह हमें गोरखा पुलिस का विशेष दल उपलब्ध करांएँ। इसी के साथ-साथ हम चार-पाँच ट्रकां का भी प्रबन्ध कर लें वरना ऐन वक्त पर कुछ बनाए नहीं बनेगा। मुल्लाजान ने मेरे इस प्रस्ताव का यह कहते हुए विरोध किया कि वह 1950 ई0 वाली गलती दोबारा नहीं करेंगे कि मुसलमान अपनी बस्तियाँ खालीकर दें और उस पर गैरां का कब्जा हो जाएगा। मीटिंग में मौजूद अन्य व्यक्तियां ने भी मुल्लाजान की बात से अपनी सहमति जताई। मैंने एक बार फिर अपनी बात को दोहराते हुए कहाकि यदि दंगाइयां का हमला इतना तीव्र हुआ कि मुसलमान ठहर न सके तो ऐसी हालत में संवदेनशील क्षेत्रां से असुरक्षा की स्थिति में उन्हें गुजरना होगा और उनको अधिक नुकसान उठाना पड़ेगा, परन्तु मुल्लाजान अपनी राय पर कायम रहे तो मैं खामोश हो गया। हम लोगां का एक शिष्टमंडल मुख्यमंत्री पी0सी0 सेन से मिलने पहुँचा। हमसे पहले कम्यूनिस्ट पार्टियां के लीडर बड़ी संख्या में मुख्यमंत्री से मिलने आए थे और उनसे सख्त शब्दां में दंगे को फैलने से रोकने की मांग कर रहे थे। उनके जाने के बाद हम लोग मुख्यमंत्री से मिले। वह आंखें बंद किए हुए आराम से झूलन कुर्सी पर झूलाझूल रहे थे। उनके मंत्री विजय सिंह नहार पास बैठे थे। हम ने मुख्यमंत्री को सूचना दी कि आज रात 8 बजे कलकत्ते में दंगां का सिलसिला अंटाली जिले से प्रारम्भ होगा। यदि कलकत्ता को बचाना है तो पहले अंटाली को बचाना होगा। वहाँ के थानेदार को इसी समय हटाकर किसी योग्य व मजबूत थानेदार को वहाँ भेजें। पी0सी0 सेन ने हमारी बात सुनने के पश्चात कलकत्ता पुलिस कमश्निर को आदेश दिया कि अंटाली थाना प्रभारी को हटाकर वहाँ दूसरा अफसर तुरन्त भेजो। इस आदेश का पालन अंटाली व कलकत्ता में दंगा भड़ककर शान्ति होने के दो माह पश्चात हुआ। उसी समय मुख्यमंत्री के पास बाटा नगर के दंगा पीड़ित अपनी फरियाद लेकर आ गए, कि ‘‘हमारा घर बार सब लूट मारकर के जला दिया गया है, 250 से अधिक घर जलाए जा चुके हैं। हजारां की संख्या में मुसलमान मर्द, औरतें व बच्चे बेघर व तबाह हो गए थे।
 मगरिब से पहले हम लोग खिलाफत कमेटी के दफ्तर लौट आए। ठीक 8 बजे टेलीफोन की घंटी बजी। मुल्ला जी ने मेरी ओर और मैंने उनकी ओर देखा दोनां को एक साथ यही शंका हुई कि यह दंगा प्रारम्भ होने की खबर होगी। फोन मैंने उठाया तो कोई बदहवास शख्स फरियाद कर रहा था कि अंटाली में दंगाइयां ने बड़े पैमाने पर हमला करके नरसंहार प्रारम्भ कर दिया है, हमें यहाँ से निकालो। उन दिनां अंटाली क्षेत्र में बड़ी मुस्लिम बस्ती आबाद थी और मुसलमानां के रबड़ व चमड़े के बड़े कारखाने वहाँ थे। अब फोन लगातार बज रहा था और उधर से एक ही सदा आ रही थी कि हम लोग दंगाइयां से घिर गए हैं हमको बचाओ। मुल्ला जी ने मंत्री विजय सिंह नहार को फोन किया तो उनका रूखा जवाब आया कि आप को अंटाली के मुसलमानां की चिंता है मगर हमारी ठाकुर बाड़ी को मुसलमानां ने बर्बाद कर दिया है। यह सूखा जवाब मिलने के बाद उन्हांने मुख्यमंत्री पी0सी0 सेन को फोन लगाया। वह राजभवन कम्पाउन्ड में रहते थे। शादी विवाह नहीं किया था लंडूरे थे। बाल-बच्चां के दुख दर्द से अपरिचित थे। उनके आदमी ने फोन पर बताया कि मुख्यमंत्री सो रहे हैं और उन्हें किसी हालत में जगाया नही जा सकता। उधर से मायूस होकर मुल्लाजी ने कहा कि हम लोग अंटाली चलते हैं। मुल्लाजी के पास जीप थी, उसमें जब मैं आगे बैठने लगा तो मुल्ला जी ने मुझे धक्का देकर नीचे उतार दिया और कहा ‘‘तेरे बच्चे हैं, पीछे बैठो’’। मुल्ला जी की यह हमदर्दी वाली बात आज भी मुझे याद है।
जीप जकरिया स्ट्रीट से निकली तो वेलिंगटन स्कवायर से होकर धर्मतल्ला और मौला अली का रास्ता नहीं पकड़ा जो सीधे अंटाली जाता था बल्कि स्पलेनेड, चौरन्गी और पार्क स्ट्रीट होते हुए हम लोग पार्क सर्कस मैदान से अंटाली की ओर मुड़े तो सड़क बन्द थी, पुलिस ने रूकावटें खड़ी कर दी थीं, भारी संख्या में पुलिस फोर्स मार्ग रोके खड़ी थी और सामने पूरा क्षेत्र शोलां की लपेट में था। आकाश सुर्ख हो रहा था। जलती हुई बस्ती से चीख व पुकार साफ सुनाई दे रही थी। हमने आगे बढ़ना चाहा तो पुलिस वालां ने अपनी राइफलें तान ली। एक अफसर ने आगे बढ़कर हमें आगाही दी कि ‘‘वापस चले जाओ वरना गोली चला देंगे। हम बेबस होकर खिलाफत दफ्तर वापस लौट आए। पूरी रात आँखां में कटी, फोन लगातार बजता रहा, दंगा अंटाली से भी आगे फैल रहा था। मजलूम मुसलमान मदद की गुहार लगा रहे थे, हम बेबस थे, कहने के लिए कुछ नहीं था, सिर्फ फरियाद सुनकर फोन रख देते थे, इसी में सुबह हो गयी तो मालूम हुआ कि अंटाली में आबाद पूरी बस्ती जलकर राख हो गई। रबड़ और चमड़े के कारखाने भी जलकर तबाह हो गए। पूरा क्षेत्र मुसलमानां से खाली हो गया। जिसका जहाँ सींग समाया, पनाह ली। हमने बचाव की तैयारी नहीं की थी, मंसूबे के अन्तर्गत दंगे का उद्देश्य मुस्लिम बस्तियां को खाली कराके उस पर कब्जा करना था, ताकि वहाँ अपनां की नयी आलीशान बस्तियाँ बसायी जाएँ। पुलिस पूरी तरह से दंगाइयां का साथ दे रही थी। दूसरे दिन कलकता शहर में दूर-दूर तक दंगा फैल गया और हजारां, लाखां की संख्या में तबाह बर्बाद व बेघर मुसलमान, बूढ़े, महिलाएं व बच्चे जकरिया स्ट्रीट व कोलूटोला के फरयामां पर ठंड के जमाने में पड़ गए जितनी बिल्डिंग थी सब पनाह गज़ीनां (शरणार्थियां) से भर गयी। कलकत्ता शहर में कर्फ्यू लग गया। शरणार्थियां के खाने-पीने के बन्दोबस्त करने के लिए क्षेत्र के सैकड़ां नौजवान मैदान में आ गए। फिर भी पनाहगजीनां की हालत काबिलेरहम थी। भोजन व दवा की सख्त कमी थी। घायलां को अधिकांशतः इस्लामियां अस्पताल ले जाया जाता। दूसरे और तीसरे दिन यह आलम था कि चीटियों की तरह पनाह गजीनां का रैला आ रहा था। चाँदनी क्षेत्र भी खाली होने लगा था।
दंगे के तीसरे दिन ऐसा लग रहा था कि कलकत्ता व उसके समीपवर्ती क्षेत्र मुसलमानां से खाली हो जाएंगे। प्रेस के कारण मेरा व मेरी कार का पास बन गया था। दिन और रात मैं सिर्फ चंद घंटे अखबार के दफ्तर और घर में, बाकी समय खिलाफत दफ्तर में या जहाँ-तहाँ से किसी दंगा पीड़ितां को बचाकर लाने में कट जाता, मुश्किल से दो तीन घंटे सोने को मिलते। एक सुबह आँख अभी खुली ही थी कि कोलूटोला से मुफस्सिर कुरान मौलाना हकीम मोहम्मद जमां हुसैनी का फोन आया, वह अपने मतब में थें, कैनिंग स्ट्रीट, कोलूटोला व चूना गली (फेयर्स लेन) तक पुलिस ने अंधाधुन्ध फायरिंग कर दी। हकीम साहब के फोन पर गोलियाँ चलने की आवाजें आ रही थीं। हमला दो तरफा था। उधर पुलिस गोलियाँ बरसा रही थी और दूसरी ओर सेन्ट्रल एवेन्यू से कोलूटोला में दंगाई बम मारते और आग लगाते बढ़ रहे थे। लोगां ने मौके पर एक मंत्री को भी देखा। किसी तरह दंगाई पस्पा हुए और गोलियाँ चलना भी बंद हुईं। पनाहगजीं बहुत भयभीत हो गए। उनको समझ में नहीं आ रहा था कि अब वह कहाँ जाएं अब कौन-सी जगह सुरक्षित बची है ? मैं उजलत में तैयार होकर खिलाफत दफ्तर भागा। हर ओर अफरा-तफरी व दहशत का आलम था। पुलिस फायरिंग से कई लोग मर गए थे, कई घायल हो चुके थे। कोलूटोला और जकरिया स्ट्रीट के क्षेत्र भी जब पनाहगजीनां के लिए सुरक्षित नहीं रहे तो वह अपना बोरिया-बिस्तर समेटने लग गए। मालूम हुआ कि  बरबाद मुसलमानां के काफिले अब कलकत्ता मैदान में डेरा डालेंगे। इसका मतलब यह था कि कलकत्ते के मुसलमान किधर जांएगे यह किसी को नहीं मालूम। क्या पूर्वी पाकिस्तान कूच करेंगे ? किसी को कुछ नहीं पता था कि मंजिल कहाँ है और बादे हवादिस के थपेड़े उन्हें किधर ले जाएँगे? स्थिति काफी संगीन व मायूसकुन थी।
खिलाफत दफ्तर पहुँच कर मैंने प्रस्ताव रखा कि प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को फोन करते हैं परन्तु वह तो गंभीर रूप से बीमार होकर बिस्तर पर पड़े हुए हैं। इन्दिरागांधी से बात की जाए। उस समय इन्दिरा जी का कोई ओहदा नहीं था। 
              प्रधानमंत्री के घर ट्रेक कॉल बैक की गईं, चन्द मिनट में लाइन मिल गई, फोन इन्दिरा जी ने उठाया। मैंने विस्तार से कलकत्ता के हालात बताकर उनसे निवेदन किया कि कलकत्ते के मुसलमानां को उजड़ने से बचा लीजिए। इन्दिरा जी ने हालात सुनकर काफी चिन्ता व्यक्त की। मैंने कहा कि कलकत्ते को बचाने की एक ही सूरत है कि उसे फौज के सुपुर्द कर दिया जाए क्यांकि दंगा सुनियोजित है और प्रादेशिक हुकूमत खामोश हैं, पुसिल दंगाइयां के साथ मिली हुई है। इन्दिरा जी ने कहा कि घबराइए नहीं अपना फोन नंबर दीजिए, मैं थोड़ी देर में आप को फोन करती हूँ। खिलाफत कमेटी का फोन नम्बर उन्हें दे दिया और पन्द्रह बीस मिनट बाद इन्दिरा जी का फोन आ गया कि कलकत्ता शहर को फौज के हवाले किया जा रहा है। जनरल चौधरी फौरन कलकत्ता के लिए रवाना हो रहे हैं और शाम तक गृह मंत्री गुलजारी लाल नन्दा कलकत्ता पहुँचेगें। दो घंटे के भीतर फौजी दस्ते बैरेकां से निकल पड़े और जनरल चौधरी भी कलकत्ते आ गए। फौज ने शहर का चार्ज लेते ही लाल बाजार पुलिस हेड र्क्वाटर पर कब्जा किया। कुछ पुलिस वालां को फौजियां ने पीट भी दिया। पुलिस की गश्ती गाड़ियां की फौज ने तलाशी लेना शुरू कर दी। कुछ गाड़ियां से बम बरामद होने की भी सूचना मिली। दंगे की तीव्रता इस कद्र थी कि रात तक शहर के कई क्षेत्र जल चुके थे। केन्द्रीय गृह मंत्री गुलजारी लाल नन्दा भी कलकत्ता आ गए थे और अपनी आँखां से शहर का दृश्य देख रहे थे। नन्दा जी ने खिलाफत दफ्तर पहुँच कर मुल्लाजान मुहम्मद को साथ लिया और दौरे पर निकल पड़ें। मुझसे यह गलती हुई कि अपनी खटारा आस्टिन कार खुद चलाकर मैं उनके पीछे हो लिया परन्तु केला बगान में बुरी तरह फंस गया। पूरा क्षेत्र दंगाइयां के कब्जे में था। इमारतें और दुकानें जल रही थीं। फायर ब्रिगेड अपनी पसन्द के अनुसार इमारतां की आग बुझाते फिर रहे थे। बाकी को जलने के लिए छोड़ देते थे। एक स्थान पर सड़क पर जलता हुआ मलबा पड़ा था, मैंने बेवकूफी से जलती हुई लकड़ी के लठ्ठे पर गाड़ी चढ़ा दी गाड़ी फंस गई। अब स्थिति यह हुई कि गाड़ी में बैठे-बैठे मैं जल मरूँ या गाड़ी से बाहर किसी दंगाई के बम का निशाना बनूँ। गाड़ी पर प्रेस लिखा हुआ था, उसे देखकर फायर ब्रिगेड वालां ने मदद की और मेरी गाड़ी को जलते हुए लकड़ी के लठठे से निकाला। अब नन्दाजी के पीछे जाना फजूल था वह न जाने  किधर निकल गए हो। मैंने अपने दफ्तर का रूख कर लिया और पहली लीड स्टोरी इस घटना की बनाकर घर जाकर सो रहा। दूसरी सुबह गृहमंत्री भारत सरकार, गुलजारीलाल नन्दाजी के साथ दौरे पर मुझे निकलना था। उन की गाड़ी में पीछे की सीट पर मुल्ला जी और मैं नन्दा जी के साथ बैठे, आगे की सीट पर विजय सिंह नहार थे। हमारी गाड़ी के साथ न पुलिस और न मिलेट्री की गाड़ी थी। जकरिया स्ट्रीट से निकलकर कालेज स्ट्रीट में चले तो मेडिकल कालेज से आगे बढ़ते ही ईडेन हॉस्पिटल रोड पर दंगाइयां की भीड़ नजर आई जो आग लगा रही थी। पुलिस वाले बंदूकें लिए तमाशबीन बने खड़े थे। नन्दा जी ने यह दृश्य देखा तो बर्दाश्त न कर सके। वह गाड़ी से उतरे और पुलिस को फटकारा कि गोली क्यां नहीं चलाते, फायरिंग हुई, आठ दंगाई हताहत होकर गिरे। चार मौके पर मारे गए और चार घायल हो गए। सामने वाली गली के मोड़ पर मन्दिर था। उसके सामने भी भीड़ जमा थी। नन्दा जी जोश में आकर भीड़ की ओर ललकारते हुए बढ़े तो मैंने और मुल्लाजी ने दौड़कर उन्हें पकड़ा और गाड़ी में बिठाया। गाड़ी आगे बढ़ी तो वैलिंगटन स्क्वायर पार कर के हम एक तंग गली में दाखिल हुए। यह स्मिथ लेन थी और उसी से मिली हुई डाक्टर लेन। दोनां ही इलाके सुनसान थे, दंगाइयां ने पूरा इलाका खाली करा लिया था। यहाँ से चले तो हम लोग खिजिरपुर पहुँचे, वहाँ नजरअली बस्ती में दाखिल हुए तो देखा कि बहुत से लोग घरेलू सामान अपने सिर पर उठाकर भागे चले जा रहे हैं। नन्दाजी समझे कि यह भयभीत मुसलमान है जो घर छोड़कर भाग रहे हैं। मैंने नन्दाजी को बताया कि यह दंगाई है जो लूट का सामान लेकर भाग रहे हैं। इसी दौरान वहाँ पुलिस कमिश्नर आ गए, उनके साथ पुलिस बल भी था नन्दा जी ने उन से कहा कि वह इन दंगाइयां पर गोली चलाए। पुलिस कमिश्नर का जवाब था कि उनके पास रिवाल्वर नहीं है। नन्दा जी यह उत्तर सुनकर तिलमिला गए उनके सब्र का बान्ध टूट रहा था, कहा अब वापस चलते हैं। सब देख लिया। खिजिरपुर से वह सीधे लालबाजार पुलिस हेड क्वार्टर आए और एक घंटे बाद खबर आई कि पुलिस कमिश्नर को हटा दिया गया है।

-तारिक खान
मोबाइल :  9455804309
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2018 में प्रकाशित 

गुरुवार, 20 सितंबर 2018

जनगीतों का सामाजिक सन्दर्भ

डॉ राजेश मल्ल 
साहित्य अपने अन्तिम निष्कर्षों में एक सामाजिक उत्पाद होता है। कत्र्ता के घोर उपेक्षा के बावजूद समय और समाज की सच्चाई उसके होठों  पर आ ही जाती है। ऐसे में जब कविता का मूल भाव समाज परिवर्तन हो तो समाज में निहित द्वन्द्व, अन्त र्विरोध अत्यन्त स्वाभाविक रूप से कविता में घुल-मिलकर प्रवाहित होते हैं। ‘जनगीतों’ का स्वरूप कुछ ऐसे ही बना-रचा हुआ है। सामाजिक अन्तः सम्बन्ध और उनमें निहित असमानता के तनावपूर्ण रूप जनगीतों  के मूल विषय हैं।
जनगीतों में सर्वाधिक गैर बराबरी तथा शोषण और उत्पीड़न के सन्दर्भ चित्रित हुए हैं। लगभग सभी गीतों  का आधार तथा दृष्टि इस बात से परिचालित है कि जो लोग अपने मेहनत से दुनिया का सृजन करते हैं वही समाज में उपेक्षा और उत्पीड़न का शिकार हैं। चूंकि समाज का ताना-बाना, मूलतः एक विशाल शोषणकारी तन्त्र द्वारा संचालित है जिसमें मेहनतकश अवाम के लिए कुछ भी नहीं है और मुठ्ठीभर लोगों  के लिए ‘सब कुछ है।’ इसलिए जनगीतों का इसके विरुद्ध संघर्ष और परिवर्तन का स्वर प्रमुख है। इस रूप में जनगीतों के भीतर एक शोषण और अन्याय से भरे समाज का चित्रण हुआ है तो दूसरी ओर इसके बदलने की बेचैनी का।


समाज अपने व्यापक तथा सीमित दोनों  अर्थों में व्यक्ति, परिवार, जाति समूह गांव, रिश्ते-नाते, देश आदि से बँधा होता है। लेकिन उसके बीच मौजूद असमान रूप तथा उत्पीड़नकारी सम्बन्ध निरन्तर संचालित होते हैं। जनगीतों में मौजूद समाज इस नुक्ते को साफ कर के चलता है कि सारे सामाजिक सम्बन्ध मात्र शोषक-शोषित के बीच बँटे हुए होते हैं। इस रूप में जनगीतों का समाजशास्त्र शास्त्रीय किस्म का समाज नहीं है बल्कि लूट और उत्पीड़न से संचालित समाज है जिसे बदलने की बेहद जरूरत है। लेकिन इसके कथन की शैली तथा रूपकों में भिन्नता एक नये आवर्त और उठान के साथ आता है जिससे एक ताजगी बनी रहती है। इस सन्दर्भ में महत्वपूर्ण तथ्य है कि एक पूरा का पूरा समाज और उसके बुनियादी द्वन्द्व जनगीतों का यह विशेष सामाजिक सन्दर्भ है।
आहृवान’ नाट्य टोला का प्रसिद्ध गीत है जो ‘हमारा शहर’ फिल्म में गाया भी गया है। पूरे गीत में भारतीय समाज के मुख्य तथा अन्य सामाजिक अन्तविर्रोधों को बेहद खूबसूरती से उठाया गया है। प्रत्येक बन्द अलग-अलग सामाजिक गतियों  को चित्रित-वर्णित करते हैं। पहले बन्द में कृषक समाज का चित्र रखा गया है-

अपनी मेहनत से भाई धरती की हुई खुदाई
माटी में बीज बोया, धरती भी दुल्हन बनाई
पसीना हमने बहाया, जमींदार ने खूब कमाया
साहूकार के कर्ज ने हमको गांव से शहर भगाया।
अरे दाने-दाने को मजदूर तरसे जीने की कठिनाई
ऐसी क्यों हे भाई......................।

गीत एक बारगी किसान के मजदूर बनने की प्रक्रिया और गांव से उजड़ने के कारणांे का खुलासा करता है। समस्या उस समाज की है जिसमें जमींदार और साहूकार अभी भी मौजूद हैं और नये तरीके से ‘धरती को दुल्हन’ की तरह अपने पसीने से सजाने वाले किसान को बदहाल बना देते हैं। इसी क्रम में गीत के क्रमशः अपने अगले बन्दों में एक-एक सामाजिक समूह की बिद्रूपताआंे को उठाया गया है तथा-

अपनी मेहनत से भाई, धरती की हुई खुदाई
माटी से गारा बनाया, माही से ईंट बनाई
धनवान को मिली सुविधा, सुख चैन भुलाया हमने
अरे अपना ही रहने का घर नहीं है भाई। यह बिल्डरों  का राज है।
खाने को दाना नहीं पीने को पानी नहीं रहने को घर नहीं पहनने को कपड़ा नहीं। यह कैसा राज है भाई।

इसी क्रम में बुनकरों  की सामाजिक स्थितियों  तथा उनके कर्म की उपेक्षा का चित्र है यथा-

अपनी मेहनत से, रूई को सूत बनाया
उसको चढ़ा पहिये पर, कपड़ा हमने बनाया
कपड़े पर रंग-बिरंगे झालर चढ़ाई हमने
टी0बी0 को अपनाया, माल लिया मालिक ने अरे हम अध नंगे मुर्दाघाट पर कफन की भी महंगाई। ऐसा क्यों है भाई।

किसानों,मजदूरों,बुनकरों,दलितों की विडम्बना पूर्ण स्थितियों के बिदू्रप चित्रों तथा विडम्बना मूलक सामाजिक सन्दर्भो से भरे पड़े हैं जनगीत। बल्कि उनकी रागिनी उनके दुःख पीड़ा की ठंडी लहर सी निर्मित होती है।
जनगीतों का सारा ध्यान मेहनतकश अनाम तथा उसके श्रम की लूट पर टिका हुआ है। ब्रज मोहन के गीत कुछ इस तरह हैं:-

धरती को सोना बनाने वाले भाई रे
माटी से हीरा उगाने वाले भाई रे
अपना पसीना बहाने वाले भाई रे
उठ तेरी मेहनत को लूटे हैं कसाई रे।
मिल, कोठी, कारें, ये सड़कें  ये इंजन
इन सब में तेरी ही मेहनत की धड़कन
तेरे ही हाथों  ने दुनिया बनाई
तूने ही भर पेट रोटी न खाई.........।

कहने का अर्थ यह कि एक ऐसा समाज जो मेहनत कश के अपार श्रम के लूट पर टिका है वह समाज नहीं चल सकता। उसे बदलने की जरूरत है। निश्चय ही यही जनगीतों का महत्वपूर्ण सामाजिक सन्दर्भ है। श्रम जीवी समाज की दुःख, पीड़ा, गरीबी और दुश्वारियों  के चित्रण के साथ जनगीत उस बुनियादी अन्तर्विरोध को उठाते हैं जो मानव समाज को आगे ले जाने में समर्थ हैं अर्थात श्रम और पूंजी का अन्तर्विरोध। शील ने इसे साफ शब्दों में रचा है-

हँसी जिन्दगी, जिन्दगी का हक हमारा।
हमारे ही श्रम से है जीवन की धारा।

ऐसे समाज में जहाँ समस्त श्रमजीवी समाज यथा मजदूर, किसान, दलित स्त्री उत्पीड़ित है उसे बदलने की जरूरत है। यह आकस्मिक नहीं कि जनगीत समाज परिवर्तन के लिए निरन्तर संघर्ष के लिए पे्ररित करते दिखते हैं। इस रूप में जनगीत का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू समाज परिवर्तन तथा एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण विशेष सामाजिक सन्दर्भ है। यहाँ यह भी साफ होना चाहिए कि जनगीत किसी अमीर और व्यक्गित उन्नति का पाठ नहीं रचते बल्कि उनका सारा जोर समाज बदलने का आहृवान, संघर्ष, प्रेरणा और नवीन समाज के स्वप्न से भरा हुआ है।
जनगीत विशुद्ध रूप में सामाजिक हैं उनका ध्येय शोषण पर टिके समाज को बदलकर नये समाज का सृजन है, यही उनका मान है यही लय है और यही छन्द। साहिर का प्रसिद्ध गीत है-यह किसका लहू है कौन मरा। उसकी चन्द पंक्तियों  का उल्लेख जरूरी है:-

हम ठान चुके हैं अब जी में
हर जलियाँ से टक्कर लेंगे
तुम समझौते की आस रखो
हम आगे बढ़ते जाएँगे
हमंे मंजिल आजादी की कसम
हर मंजिल पे दोहराएँगें ।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना तो अपने गीत में एक साथ शोषण तन्त्र के तमाम रूपों  तथा कारणों को चित्रित करते हैं और उसके खिलाफ एक साथ जंग का ऐलान करते हैं। अपने आस-पास बिखरी समस्याओं की पहले वे व्याख्या करते हैं-

यह छाया तिलक लगाये जनेऊ धारी हैं
यह जात-पात के पूजक हैं
यह जो भ्रष्टाचारी हैं।
यह जो भू-पति कहलाता है जिसकी साहूकारी है।
उसे मिटाने और बदलने की करनी तैयारी है।

इसी गीत का अगला बंद है-

यह जो तिलक मांगता, लड़के की धौंस जमाता है। 
कम दहेज पाकर लड़की का जीवन नरक बनाता है। 
पैसे के बल पर यह जो अनमेल विवाह रचाता है। 
उसे मिटाने और बदलने की तैयारी है।
जारी है-जारी है आज लड़ाई जारी है।

संघर्ष के आहृवान का दूसरा मुकाम संघर्ष से नये समाज को प्राप्त करने का है। बल्ली सिंह का प्रसिद्ध गीत है-
ले मशालें  चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के, अब अंधेरा जीत लेंगे लोग मेरे गांव के, पूछती है झोपड़ी और पूछते खेत भी, कब तलक लुटते रहेंगे लोग मेरे गांव के। बिन लड़े कुछ भी नहीं मिलता यहां यह जानकर अब लड़ाई लड़ रहे हैं, लोग मेरे गांव के।
जनगीत कार एक नये समाज रचना के लिए प्रतिबद्ध है। वह समाज जो शोषण-उत्पीड़न से मुक्त बराबरी समानता का हो। मेहनत कश अवाम का हो। गरीब मजदूर किसान की दुश्वारिया जहां न हों, जहाँ स्वास्थ्य शिक्षा की सबके लिए व्यवस्था हो। उसे उम्मीद है कि शोषण का पूरा ढांचा एक दिन गिरेगा। ब्रेख्त के शब्दों में -

एक दिन ऐसा आयेगा
पैसा फिर काम न आयेगा
धरा हथियार रह जायेगा
और यह जल्दी ही होगा
ये ढाँचा बदल जायेगा.........।

इस प्रकार जनगीत बेलौस तरीके से समाज के मुख्य अन्तर्विरोध को उठाते हैं। उनके लिए मेहनत की लूट और पूँजीवादी निजाम महत्वपूर्ण सामाजिक सच्चाई है। लेकिन वे यहीं नहीं रुकते वे इसे बदलने के लिए संघर्ष की हामी भरते हैं। परिवर्तन में आस्था व्यक्त करते हैं। एक लम्बी तथा दीर्घ कालिक संघर्ष को सजाये गीत नये समाज के स्वप्न को धरती पर उतारने के लिए प्रतिबद्ध हैं। श्रम और पूंजी के इस जंग में वे श्रम के सभी पक्षकारों को आमन्त्रित करते हैं-

गर हो सके तो अब कोई शम्मा जलाइए
इस अहले सियासत का अन्धेरा मिटाइए 
अब छोड़िये आकाश में नारा उछालना, 
आकर हमारे कन्धे से कन्धा मिलाइए। 
क्यों  कर रहे हैं आँधी के रुकने का इन्तजार,
ये जंग है, इस जंग में ताकत लगाइए।

-डॉ राजेश मल्ल
मोबाइल: 9919218089
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2018 में प्रकाशित 

मंगलवार, 18 सितंबर 2018

मोब लिंचिंग

गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में भीड़ हिंसा पर बोलते हुए दिल्ली में 1984 के दंगों को याद किया जिसमें हजारों सिखों की जानें गईं। इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों द्वारा की गई हत्या से राजधानी दिल्ली में दंगे भड़के और निर्दोष सिख नागरिकों की जान-माल को अपार क्षति पहुँची। बेशक इसे स्वतः स्फूर्त हिंसा नहीं कहा जा सकता। यह एक सीमा तक प्रायोजित थी जिसमें कथित रूप से कांग्रेस के बड़े नेता किसी स्तर पर लिप्त रहे। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी राजनाथ सिंह के सुर में सुर मिलाते हुए 1984 की हिंसा को याद किया है। इस हिंसा की  हर स्तर पर भर्त्सना की जानी चाहिए। इसमें शक के लिए कोई गुंजाइश नहीं है, लेकिन, इसी सन्दर्भ में एक सवाल जरूर  पैदा होता है। जब गृहमंत्री और मुख्यमंत्री  34 साल पुरानी घटना याद रख सकते हैं तब 12 साल पुरानी  अहमदाबाद की भीड़ हिंसा को याद क्यों नहीं रख सके? क्या 2002 में मुसलमानों की मोब लिंचिंग नहीं हुई? क्या भीड़ ने बिल्डिंग को नहीं जलाया? क्या भीड़ ने एक पूर्व सांसद को जिंदा नहीं जला दिया था। इस हिंसा में भी लोगों की जाने गई थीं। हिंसा का रौद्र रूप देखकर तत्कालीन भाजपा प्रधानमंत्री  अटल बिहारी बाजपेई को अपनी ही पार्टी की प्रदेश सरकार और तब के मुख्यमंत्री  और आज के प्रधानमंत्री नरेन्द्र  मोदी  को  “राजधर्म पालन“ की नसीहत देनी पड़ी थी। राजनाथ सिंह जी इसे क्यों नहीं याद रख पाए? इसका सीधा अर्थ यह है कि वे ‘मोब लिंचिंग या हिंसा‘ के प्रति पक्षपातपूर्ण दृष्टि अपनाना चाहते हैं, समदृष्टि नहीं। इसकी अपेक्षा देश के गृहमंत्री से नहीं की जाती है। भीड़ हिंसा में समाज का कोई भी समुदाय संलिप्त रहता है, तो वह गुनहगार है। माना सांप्रदायिक दंगे देश के लिए कोई नई परिघटना नहीं हैं। आजादी के बाद से लगातार होते रहे हैं। लेकिन, मई 2014 के बाद से जिस प्रकार की भीड़ हिंसा का सिलसिला शुरू हुआ है, वह एक सीमा तक किसी  नई परिघटना या फेनोमेनन से कम नहीं है। या लव जिहाद, गोरक्षा व तस्करी, बालक चोरी, चुटिया काटना, चुड़ैल घोषित करना जैसी घटनाओं ने मोब लिंचिंग में नया आयाम जोड़ा है। देश के विभिन्न भागों में  घटने वाली  इस प्रकार की भीड़ हिंसा में एक खास किस्म का  ‘पैटर्न ‘ नजर आता है। देखिए, पशु तस्करी पहले भी होती रही है, अंतर जातीय व धार्मिक विवाह पहले से होते आ रहे हैं, पार्कों में प्रेमी जोड़ें पहले भी मिलते रहे हैं, लेकिन इस पैमाने की मोब लिंचिंग पहले नहीं रही। मार-पीट जरूर रही, लेकिन, ऐसी  घटनाएँ ‘राष्ट्रीय स्तर‘ का खतरा नहीं बनी थीं। इस खतरे की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा और केंद्र से कहना पड़ा कि मोब लिंचिंग की रोकथाम के लिए कड़े कानून बनाए। सारांश में, मोब लिंचिंग किसी प्रदेश या क्षेत्र विशेष तक सीमित नहीं है बल्कि उत्तरपूर्व से लेकर दक्षिण राज्य तक इसकी चपेट में आ चुके हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए यह घटनाएँ खतरा बन चुकी हैं। यदि सवा अरब का देश ‘भीड़ इन्साफ‘ की गिरफ्त में आता है तो ‘कानून-व्यवस्था के राज‘ की क्या जरूरत है? कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का अस्तित्व ही संकटग्रस्त हो जाएगा। जाहिर है, यह स्थिति देश को पहले अराजकता में
धकेलेगी। इसके बाद तानाशाही या अधिनायकवाद और फासीवाद के दौर शुरू होंगे। 

           पिछले दिनों झारखंड में बंधुआ मुक्ति आन्दोलन के नेता स्वामी अग्निवेश पर भाजपा समर्थक भीड़ ने हमला किया था। उन्हें अध नंगा बना दिया था। स्वामी जी ने इसे भाजपा राज्य द्वारा प्रायोजित घटना बताया है। इसका अर्थ यह है कि ऐसी लिंचिंग के गर्भ में राज्य का हाथ रहता है। इसकी पुष्टि अलवर की ताजा मोब लिंचिंग की घटना से भी उजागर होती है। गाय तस्करी के शक में पहले अकबर खाँ को चंद लोगों ने मारा पीटा और घायल अवस्था में पुलिस उन्हें अपने वाहन में तीन घंटे तक कथित रूप से घुमाती रही। अस्पताल ले जाने के स्थान पर भीड़ हिंसा से पीड़ित अकबर को थाना ले जाया गया। इसके बाद अस्पताल जहाँ उसे डॉक्टर ने मृत घोषित कर दिया। इससे पहले भी इसी जिले में दो और घटनाएँ हो चुकी हैं। राज्य सरकार ने इस मोब लिंचिंग के प्रति अपेक्षित गंभीरता नहीं दिखलाई। उत्तर प्रदेश के  दादरी काण्ड में भी यही हुआ। गोमांस रखने के शक में  भीड़ ने एक मुस्लिम की जान ली। झारखंड में भी ऐसा ही हुआ। हैरत तो यह रही कि जब मोब लिंचिंग के अपराधी जेल से जमानत पर बाहर आये तो मोदी-सरकार के मंत्री ने उनका स्वागत किया। राजस्थान में भी यही हुआ। वसुंधरा-सरकार के मंत्री ने अलवर हिंसा को हलके में लिया। मोब लिंचिंग के प्रति हास्यास्पद नजरिया तो यह रहा है कि जब एक केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि
प्रधानमन्त्री मोदी की लोकप्रियता बढ़ने से  इस तरह की घटनाएँ हो रही हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि गोरक्षक या मोब लिंचिंग मोदी की लोकप्रियता से जलते हैं और अपना नजला गाय के बहाने मुसलमानों पर उतारते हैं! बच्चा चोरी के नाम पर होने वाली मोब लिंचिंग का मोदी, लोकप्रियता के साथ कौन सा रिश्ता हो सकता? यही सवाल लव जिहाद पर लागू होता है। असलियत में, इस तरह की फूहड़ प्रतिक्रियाएँ और अपराधियों को फूल मालाएँ पहनाना दो ही बातों की गवाही देती हैं। एक भाजपा या संघ परिवार के नेतृत्त्व का दिवालियापन, दो भाजपा नेतृत्त्व को इस बात का अहसास हो चुका है कि  गठबंधन की राजनीति के माहौल और सामान्य परिस्थितियों में उसके लिए 2019  के आम चुनावों को जीतना आसान नहीं रहेगा। समाज के चरम
ध्रुवीकरण या असाधारण परिस्थितियों  से ही वह वैतरणी  पार उतर सकता है। इसलिए ऐसी घटनाओं का सिलसिला चलते रहना चाहिए। 2015 का साल याद करें जब  देश में  ‘नॉन टॉलरेंस ‘ का  माहौल बन गया था। समाज के धु्रवीकरण के लिए मोब लिंचिंग या भीड़ हिंसा के नए-नए रूपों को गढ़ा जाता है। कुल माजरा समाज को गरमाए रखने और अफवाहों के हथियारों को जंग लगने से बचाए रखने का है। नफरत की हिंसा को जिलाए रखने के लिए मोब लिंचिंग का ही आसरा है!

 -रामशरण जोशी
  मोबाइल : 9810525019 
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2018 में प्रकाशित

सूबा सरहद में ब्रिटिश प्रोपेगैंडा, मुल्ला और पीर

भारतीय लोगों में फूट डालने के लिए ब्रिटिश इण्डियन हुकूमत ने मजहब और जाति को कामयाबी से इस्तेमाल किया था। बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों का खौफ दिखा कर, अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों का खौफ दिखा कर और एक जाति के लोगों को दूसरी जाति के लोगों का डर दिखाकर अँग्रेजी सरकार उन सभी पर अपनी पकड़ बनाए रखने की कोशिश करती थी।
    सूबा सरहद में अंग्रेजी सरकार को दिक्कत यह थी कि यहाँ मुसलमान इतने ज्यादा बहुसंख्यक थे कि उनको यहाँ के हिन्दू-सिख अल्पसंख्यकों का खौफ दिखाना हास्यास्पद ही होता। सूबा सरहद में मुसलमानों की आबादी 93 प्रतिशत थी। हिन्दू, सिख आबादी सिर्फ 7 प्रतिशत थी। सूबा सरहद में ब्रिटिश हुकूमत के लिए एक बड़ी समस्या यह थी कि सरहदी सूबे में मुसलमानों के बहुसंख्यक होने के बावजूद मुस्लिम लीग की यहाँ कोई मौजूदगी नहीं थी। 93 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले हमारे इस सूबे में खुदाई खिदमतगार तहरीक का जोर था, जो कि पश्तून मुसलमानों की पार्टी थी।
    खुदाई खिदमतगार समाजवादी थे और अँग्रेजी हुकूमत के सख्त खिलाफ थे। जाहिर-सी बात है कि साम्राज्यवादी अंग्रेजों को कांग्रेस की तरह ही इनसे भी खतरा था।
    सरहदी सूबे और कबायली इलाकों के लिए इस्लाम का नाम इस्तेमाल करने में अंग्रेजों को खुदाई खिदमतगारों से बड़ी दिक्कत थी। ये सच्चे मुसलमान थे। कई जगहों पर मदरसे चलाते थे। हिन्दुओं और सिखों के सच्चे दोस्त थे। और, सूबा सरहद में अंग्रेजों के सबसे बड़े दुश्मन भी खुदाई खिदमतगार ही थे।
    दूसरी तरफ, अंग्रेज-परस्त मुस्लिम लीग का सूबे की असेम्बली में एक भी मेम्बर नहीं था। ऐसे में ब्रिटिश हुकूमत के लिए यह जरूरी हो गया था कि सूबे में मुस्लिम लीग को मजबूत किया जाए और खुदाई खिदमतगारों को नुकसान पहुँचाया जाए। उन्होंने ऐसा ही किया।
    सूबा सरहद में पाकिस्तान मूवमेंट असल में ब्रिटिश हुकूमत और खुदाई खिदमतगारों के दरमियान हुई लड़ाई है। खुद को छुपाने के लिए अंग्रेजी हुकूमत ने पर्दे के पीछे रहकर मुस्लिम लीग की हर तरह से मदद की और खुदाई खिदमतगारों को हर तरह से नुकसान पहुँचाया।
    1937 में सूबा सरहद में खुदाई खिदमतगारों की मिनिस्ट्री बनने के बाद सरकारी टाइटल होल्डर लोगों को अपनी फिक्र होने लगी। आम लोग सूबाई मिनिस्ट्री के कामों से खुश होने लगे। सरकारी टाइटल होल्डर लोगों की अहमियत कम होने लगी।
    ब्रिटिश हुकूमत और उसके अफसरों ने सरकारी टाइटल होल्डर लोगों की बेचैनी को समझा। अफसरों के पास यह एक और मौका था, जब वे खुदाई खिदमतगारों के खिलाफ एक और साजिश रच सकते थे। उन्होंने सूबा सरहद की मुस्लिम लीग का कन्ट्रोल अपने इन ‘सर’, ‘नवाबों’, ‘खानबहादुरों’ वगैरह को देने का फैसला किया।
    1937 में सूबा सरहद की सूबाई असेम्बली में मुस्लिम लीग का एक भी मेम्बर नहीं था। 1937 के चुनावों के वक्त वहाँ मुस्लिम लीग का कोई वजूद ही नहीं था। सितम्बर, 1937 में ऐबटाबाद में सूबाई मुस्लिम लीग की बुनियाद रखी गई थी। नौशेरा के मौलाना शाकिरुल्लाह को इसका सदर बनाया गया। वह जमीअत-उल-उलेमा के सदर भी थे। मरदान के मौलाना मोहम्मद शोएब को सेक्रेटरी बनाया गया। वे जमीअत-उल-उलेमा के भी सेक्रेटरी थे। अप्रैल, 1937 में जिस दिन सर साहिबजादा अब्दुल कय्यूम की सूबा सरहद की मिनिस्ट्री भंग हुई, बिल्कुल उसी दिन सूबा सरहद की मुस्लिम लीग की बुनियाद रखी गई।
    एक साल बाद ही, सितम्बर, 1938 में सूबा सरहद की मुस्लिम लीग की लीडरशिप को बदल दिया गया। मौलाना शकिरुल्लाह की जगह ‘खान बहादुर’ सादुल्लाह खान सूबा सरहद की मुस्लिम लीग के रहनुमा बना दिए गए। सूबा सरहद की मुस्लिम लीग ऑल इण्डिया मुस्लिम लीग का सिर्फ नाम-मात्र हिस्सा ही थी, वरना वह स्वतंत्रता से ही काम कर रही थी। सूबाई मुस्लिम लीग पूरी तरह से उन लोगों के कंट्रोल में आ गई, जिनको अंग्रेजी हुकूमत की तरफ से सर, नवाब, खान बहादुर, ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट वगैरह के टाइटल मिले हुए थे।
    एक तो, सर, नवाब, खान बहादुर, ऑनरेरी मैजिस्ट्रेट वगैरह के टाइटल हासिल करने वाली अंग्रेज परस्त सियासी लीडरशिप को अब मुस्लिम लीग का बैनर मिल गया। दूसरा, सूबा सरहद में अपनी मुखालिफ जमातों का मुकाबला करने के लिए ब्रिटिश इण्डियन हुकूमत के पास अब सूबाई मुस्लिम लीग के तौर पर एक सियासी फ्रण्ट मिल गया लेकिन, ब्रिटिश इण्डियन हुकूमत को सूबा सरहद में एक ऐसा मजहबी फ्रण्ट भी चाहिए था, जिसकी आड़ में वह कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधारा को सूबा सरहद और कबायली इलाकों में फैलने से रोक सके।
    अफगानिस्तान के पूरी तरह से आजाद हो जाने के बाद से ही ब्रिटिश इण्डियन हुकूमत सूबा सरहद और कबायली इलाकों को एक बफर जोन (buffer zone) के तौर पर तैयार करने में लगी हुई थी। इसके लिए इस्लाम का इस्तेमाल करना उनको सबसे आसान रास्ता लगता था।
    सूबाई मुस्लिम लीग के तौर पर एक सियासी फ्रण्ट तैयार करने के साथ-साथ एक मजहबी फ्रण्ट भी तैयार किया जाने लगा। खान अब्दुल गफ्फार खान साहिब के सपुत्र और स्वतन्त्रता संग्रामी खान अब्दुल वली खान साहब ने इस पर बहुत विस्तार से लिखा है। जो इसको विस्तार से जानना चाहें, वे उनकी किताब में पढ़ सकते हैं। पश्तो जबान में लिखी उनकी यह किताब इंग्लिश में ‘फैक्ट्स आर फैक्ट्स’ (Facts Are Facts) के टाइटल से मिलती है। इसका उर्दू अनुवाद भी उपलब्ध है।
    खान अब्दुल वली खान साहब ने इण्डिया ऑफिस लाइब्रेरी, लंदन में खुद जाकर सर जॉर्ज कनिंघम की डायरियों का अध्ययन किया और उनसे नोट्स लिखे। जॉर्ज कनिंघम की डायरियों से यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि कैसे उस वक्त की ब्रिटिश इण्डियन हुकूमत ने मजहबी रहनुमाओं को अपने हितों के लिए इस्तेमाल किया।
    सूबा सरहद और कबायली इलाकों में गवर्नर जॉर्ज कनिंघम ने मौलवियों और पीरों के जरिए जो प्रोपेगैंडा किया, उस पर इंग्लिश की एक किताब British Propaganda and Wars of Empire: Influencing Freinds and Foe  भी पढ़ने लायक है, जो क्रिस्टोफर टक और प्रोफेसर ग्रेग कैनेडी ने संपादित की है।
    सर जॉर्ज कनिंघम ब्रिटिश इण्डिया में सूबा सरहद के गवर्नर थे। सूबा सरहद में पाकिस्तान मूवमेंट में उनका बहुत बड़ा रोल था। मुहम्मद अली जिन्नाह सर जॉर्ज कनिंघम की कितनी कदर करते थे, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान बनते ही मुहम्मद अली जिन्नाह ने कनिंघम को बुलाकर पाकिस्तान में सूबा सरहद का पहला गवर्नर नियुक्त किया था।
    ब्रिटिश इण्डियन हुकूमत की तरफ से पूरे इण्डिया में प्रोपेगैंडा-वॉर (प्रोपेगैंडा-जंग) बहुत सालों से जारी था, लेकिन दूसरी संसार जंग में उनको इसकी जरूरत बहुत ज्यादा महसूस हुई। यह प्रोपेगैंडा-वॉर  चल तो पूरे इण्डिया में रही थी, लेकिन यहाँ मैं सिर्फ सूबा सरहद में चली ब्रिटिश प्रोपेगैंडा-वॉर की ही बात करूँगा। वैसे भी, ब्रिटिश इण्डियन हुकूमत को बड़े पैमाने पर हथियारबन्द बगावत का खतरा खासतौर पर सरहदी पश्तूनों से ही था। इसलिए जोरदार प्रोपेगैंडा भी उन्हीं के इलाकों में हुआ।
    प्रोपेगैंडा के लिए सरकार ने रेडियो और मूवीज का भी इस्तेमाल किया और पैम्फलेट्स का भी। रेडियो की समस्या यह थी कि बहुत कम लोगों के पास रेडियो सेट थे। मूवीज की समस्या यह थी कि उन्हें दूर के इलाकों, खास करके पहाड़ी इलाकों में लोगों तक पहुँचाना तकरीबन नामुमकिन था। पैम्फलेट्स की समस्या यह थी कि सूबा सरहद के ज्यादातर लोग पढ़े-लिखे नहीं थे। इसलिए एक रास्ता यह निकाला गया कि मौलवियों और पीरों को सरकारी प्रोपेगैंडा के लिए इस्तेमाल किया जाए, क्योंकि उनका लोगों से सीधा सम्पर्क था।
    सर जॉर्ज कनिंघम ने सूबा सरहद के मौलवियों और पीरों से सम्पर्क करने के लिए ‘खान बहादुर’ कुली खान का इस्तेमाल किया। कुली खान को यह जिम्मेदारी दी गई कि वे उन मौलवियों से भी खुफिया तौर पर सम्पर्क करें, जो खुलेआम सामने आकर हिमायत करने को तैयार नहीं थे।
    कनिंघम ने कुली खान के जरिए सबसे पहले मुल्ला मरवत को भर्ती किया। मुल्ला मरवत पहले खाकसार तहरीक से जुड़े हुए थे। कुली खान ने मुल्ला मरवत को यह यकीन दिला दिया कि इस्लाम की सेवा यही है कि इस्लाम के दुश्मनों के खिलाफ जिहाद किया जाए। इस्लाम के दुश्मन कौन हैं, इस बात का फैसला साम्राज्यवादी ब्रिटिश हुकूमत के अफसर करते थे। मुल्ला मरवत का इस्तेमाल करके जमीअत-उल-उलेमा-ए-सरहद के ओहदेदारों से भी सम्पर्क किया गया। सूबा सरहद के गर्वनर थे सर जॉर्ज कनिंघम, और सर जॉर्ज कनिंघम के डायरेक्ट एजेंट थे कुली खान, और आगे कुली खान के एजेंट थे मुल्ला मरवत। इस तरह उन्होंने सूबा सरहद में मौलवियों और पीरों का एक ऐसा मजबूत गठजोड़ बनाना शुरू किया, जिसको इस्लाम के नाम पर ब्रिटिश हुकूमत के फायदे के लिये इस्तेमाल किया जा सके। कनिंघम ने मौलवियों के तीन वर्ग बनाए। पहले वर्ग में छोटे मौलवी थे। इस वर्ग के मौलवियों के इंचार्ज लोकल ‘खान साहिब’ या ‘खान बहादुर साहिब’ बना दिये गए। जो इनसे बड़े मौलवी थे, उनके इंचार्ज डिप्टी कमिश्नर्ज बना दिये गए। जो बहुत बड़े मौलवी थे, उनका सीधा सम्पर्क गवर्नर कनिंघम से था।
     मिसाल के तौर पर, कनिंघम की तरफ से ‘खान बहादुर’ गुलाम हैदर खान शेरपाओ को 9-10 मौलवियों का इंचार्ज बनाया गया था। ‘खान बहादुर’ गुलाम हैदर खान शेरपाओ पाकिस्तान मूवमेंट का एक बड़ा नाम माने जाते हैं। पाकिस्तान बनने के बाद सूबा सरहद के आठवें गवर्नर बने हयात मोहम्मद खान शेरपाओ उन्हीं ‘खान बहादुर’ गुलाम हैदर खान शेरपाओ के बेटे थे।
    कनिंघम ने लिखा है कि उसने गुलाम हैदर को कहा कि वह हर मुल्ला से निजी तौर पर मिले और उसे इस्लाम के लिए काम करने के लिए तैयार करे। गुलाम हैदर को हिदायत दी गई कि हर मुल्ला को सरकार की तरफ से 45 रुपये दिए जाएँ। उन दिनों 45 रुपये एक छोटे मौलवी के लिये बड़ी रकम हुआ करती थी। कनिंघम ने गुलाम हैदर से यह भी कहा कि मौलवियों को इशारा दे दिया जाए कि अगर उनका काम तसल्लीबख्श हुआ, तो उनको सरकारी पेन्शन भी दी जा सकती है। कनिंघम ने लिखा है कि उसने गुलाम हैदर को 600 रुपये दिए। ये रुपये उन्हीं मौलवियों में बांटे जाने के लिए थे।
    इसी तरह, नौशेरा और पेशावर जिलों के मौलवियों का इंचार्ज डिप्टी कमिश्नर इस्कन्दर मिर्जा को बनाया गया। स्वात, बुनेर, और मरदान के मौलवियों की जिम्मेदारी स्वात रियासत के प्रधानमंत्री हजरत अली की थी। हजरत अली के
अधीन मौलवियों को हर महीने उस वक्त के 15 रुपये दिए जा रहे थे। इसी तरह, बन्नू के मौलवियों की जिम्मेदारी नवाब जफर खान और ताज अली शेरपाओ को दी गई। ताज अली उन्हीं ‘खान बहादुर’ गुलाम हैदर खान शेरपाओ के बेटे थे, जो कनिंघम के खास आदमी थे और उन्हीं के अधीन काम कर रहे थे। 
    डेरा इस्माइल खान के डिप्टी कमिश्नर मोहम्मद असलम को कनिंघम ने 600 रुपये दिए। यह रुपये उस इलाके के तीन मजहबी रहनुमाओं, अमा खेल के फकीर, पीर मूसा जई, और पीर जकूरी को देने के लिए थे। इन तीनों को भी यह कहा गया कि अगर उनका काम तसल्ली बख्स हुआ, तो उनकी पेमेंट बढ़ा दी जाएगी।    खयबेर के मौलवियों की जिम्मेदारी वहाँ के पोलिटिकल एजेंट मिस्टर बेकन की थी। खयबेर में पोलिटिकल एजेंट ने मौलाना अब्दुल बकी को अपने मिशन में शामिल करके उसे 1000 रुपये दिए। मौलवी बरकतउल्ला को कनिंघम ने 1000 रुपये दिए थे। बरकतउल्ला के जरिए बाजौर के 10-12 मौलवी ब्रिटिश हुकूमत के इस मिशन के लिए भर्ती किए गए थे। ऐसा नहीं था कि गवर्नर कनिंघम मौलवियों और पीरों को रुपये बांट कर उन पर अंधा यकीन कर लेता था। बाकायदा जासूसों को उन मौलवियों और पीरों पर नजर रखने के लिये भेजा जाता था। यह सुनिश्चित किया जाता था कि जिस मकसद के लिए ब्रिटिश हुकूमत उन मौलवियों और पीरों पर रुपये लुटा रही थी, वह मकसद पूरा भी हो रहा था या नहीं। यह अँग्रेजी हुकूमत की तरफ से फेंके गये रुपयों का ही कमाल था कि कई ऐसे मौलवी भी अँग्रेजी हुकूमत के तरफदार हो गए, जो पहले अँग्रेजी हुकूमत के खिलाफ थे। दूसरी संसार जंग शुरू होने से ब्रिटिश साम्राज्य को यह डर सताने लगा कि कहीं हालात का फायदा उठा कर सोवियत संघ अफगानिस्तान के रास्ते ब्रिटिश इण्डिया पर हमला न कर दे। तब अंग्रेजी हुक्मरानों के इशारे पर जमीअत-उल-उलेमा ने यह ऐलान किया कि सोवियत संघ अगर अफगानिस्तान पर हमला करता है, तो हर मुसलमान का यह फर्ज है कि वह सोवियत संघ के खिलाफ जिहाद में शामिल हो। इसके लिए उन मौलवियों ने दलील पेश की कि अंग्रेज बाइबिल को मानने वाले हैं, जो कि एक आसमानी किताब है। इस तरह अंग्रेज अहल-ए-किताब हैं। जबकि सोवियत यूनियन के हुक्मरान कम्युनिस्ट हैं, जो न खुदा को मानते हैं और न किसी आसमानी किताब को। इसलिए अंग्रेजों और मुसलमानों को मिलकर काफिर कम्युनिस्टों के खिलाफ लड़ना चाहिए। इसलिए उन मौलवियों और पीरों ने मुसलमानों को ब्रिटिश इण्डियन आर्मी में भर्ती होने के लिए कहा, ताकि काफिर कम्युनिस्ट सोवियत यूनियन के खिलाफ जंग करके इस्लाम की खिदमत की जा जाए।
    इण्डियन नेशनल कांग्रेस के नेता ब्रिटिश इण्डियन हुकूमत की इस बात के लिए मुखालिफत कर रहे थे कि भारतीय नेताओं से पूछे बिना ही भारत को भी संसार जंग में शामिल कर दिया गया था। अक्टूबर, 1939 में इण्डियन नेशनल कांग्रेस ने अपनी सभी आठ सूबाई मिनिस्ट्रीज से इस्तीफा दे दिया। यह एक आत्मघाती कदम था। वाइसराय लिनलिथगोअ और मुहम्मद अली जिन्नाह कांग्रेस के इस कदम से बहुत खुश हुए। जिन्नाह ने तो बाकायदा 22 दिसम्बर, 1939 को ‘डे ऑफ डीलिवरन्स’ ;क्ंल वि क्मसपअमतंदबमद्ध के तौर पर मनाया।
    एक तरफ कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को अंग्रेजी हुकूमत ने कैदखानों में बंद कर दिया गया। दूसरी तरफ सरकार परस्त मौलवियों ने कांग्रेस के खिलाफ भी प्रोपेगैंडा तेज कर दिया। कांग्रेस के जंग के खिलाफ लिए गए फैसले को लेकर इस तरह से प्रोपेगैंडा किया गया, जैसे जंग में शामिल न होना इस्लाम के खिलाफ है। इस तरह सोवियत संघ, कम्युनिस्टों और इण्डियन नेशनल कांग्रेस को इस्लाम का दुश्मन कहकर उनके खिलाफ प्रोपेगैंडा तेज कर दिया गया। खुदाई खिदमतगार भी कांग्रेस के साथ होने की वजह से इस प्रोपेगैंडा का शिकार बना दिए गए।
    भारत में रहते लोगों की कम्युनिस्ट सोवियत संघ से क्या दुश्मनी थी? भारत में रहते लोगों की जर्मनी से क्या दुश्मनी थी? भारत में रहते लोगों की इटली से क्या दुश्मनी थी? भारत में रहते लोगों की अगर दुश्मनी थी, तो साम्राज्यवादी ब्रिटेन से थी, जो पूरे भारत पर अपनी ताकत से कब्जा जमाए बैठा था। जरूरत तो इस बात की थी कि भारत के लोग आपस में एकता रखते और ब्रिटिश साम्राज्य को भारत से उखाड़ फेंकते।
    कनिंघम ने लिखा है कि जमीअत-उल-उलेमा के लोगों ने जून, 1942 में कोहाट जिले का और जुलाई में पेशावर और मरदान का दौरा करके इस्लामिक थीम पर जर्मनी, इटली, और जापान विरोधी प्रोपेगैंडा, और पाकिस्तान थीम पर कांग्रेस विरोधी प्रोपेगैंडा किया।
    अंग्रेज परस्त मुल्ला जो भी पैम्फलेट बाँटते, उसको पहले गवर्नर कनिंघम को दिखा कर मंजूरी लेते। कनिंघम ने खुद लिखा है कि मौलाना मोहम्मद शुऐब और मौलाना मिद्ररूल्लाह उससे मिलने नथियागली आए और उसे उर्दू में एक बड़ा ड्राफ्ट दिखाया, जो कांग्रेस-विरोधी, जापान-विरोधी, और मार्क्सवाद-विरोधी था।
    खान अब्दुल वली खान साहिब ने लिखा है कि अंग्रेजों ने उन मौलवियों के नाम और पते दर्ज करके इस्लाम की मदद की है। पेशावर जिले से वे 24 मौलवी थे, जिनमें से 6 पेशावर शहर से थे, 13 चरसद्दा तहसील से थे, 3 नौशेरा तहसील से थे। 18 मौलवी मरदान और सवाबी से थे। यह पढ़ना शर्मनाक लगता है कि कैसे मजहब के इन तर्जुमानों ने अपना ईमान पॉलीटिकल एजेंटों को बेच दिया और चांदी के चंद सिक्कों के बदले इस्लाम की सौदेबाजी की। इण्डिया के सच्चे बेटों और वतनपरस्तों के खिलाफ उनके झूठे फतवों के सबूत देखना और भी गम की बात है। यह खान अब्दुल वली खान साहिब ने लिखा है।
    जर्मनी की तरफ से सोवियत संघ पर हमले के बाद हालात ऐसे हो गए कि अंग्रेजी हुकूमत को सोवियत संघ का ब्रिटिश इण्डिया या अफगानिस्तान पर हमले का अंदेशा खत्म हो गया। लेकिन जगह-जगह पर ब्रिटिश साम्राज्य को जर्मनी की तरफ से हार का सामना करना पड़ रहा था। इधर ईपी के फकीर हाजी मिर्जाली खान वजीर की तरफ से कबायली इलाके में अंग्रेजों के खिलाफ छेड़ा गया जिहाद लगातार जारी था। उससे अंग्रेजी हुकूमत बहुत परेशान थी। अंग्रेजी हुकूमत को लग रहा था कि अफगानिस्तान में जर्मनी और इटली के एजेंट ईपी के फकीर की मदद कर रहे हैं। इसमें कुछ हद तक सच्चाई भी थी। वैसे, कभी अंग्रेजी हुकूमत को यह भी लगता रहा था कि फकीर की मदद सोवियत संघ कर रहा है।
    अंग्रेजी हुकूमत ने अफगानों पर जोर डाला कि वे जर्मनों को अफगानिस्तान से बाहर निकाल दें। अफगानों ने ऐसा नहीं किया। इसी दौरान सीरिया के शमी पीर की तरफ से कबायलियों को अफगान सरकार के खिलाफ बगावत के लिए उकसाने की बड़ी घटना हुई। अंग्रेजों ने शमी पीर को 25 हजार पाउंड देकर वापस सीरिया भेज दिया। शमी पीर की इस कार्रवाई के पीछे असल में कौन-सी ताकत थी, इसको लेकर लोगों के अलग-अलग विचार हैं। लेकिन इतना जरूर है कि शमी पीर के जाने के बाद अंग्रेजों ने ईपी के फकीर के साथ भी सौदेबाजी करनी चाही। लेकिन यह फकीर बिकने वालों में से नहीं था। ब्रिटिश इण्डिया के कबायली इलाकों और अफगानिस्तान में एक्सिस ताकतों (जर्मन, इटली, और जापान) की तरफ से भी प्रोपेगैंडा बढ़ने लगा। एक्सिस ताकतों की यह कोशिश थी कि कबायली लड़ाकों को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़ने के लिये तैयार किया जाये। अब ब्रिटिश प्रोपेगैंडा मशीनरी ने अपने प्रोपेगैंडा में थोड़ा-सा बदलाव करने का फैसला किया। सूबा सरहद के गवर्नर कनिंघम ने लिखा है कि उसने कुली खान को सलाह दी कि वह कम्युनिस्ट विरोधी प्रोपेगैंडा को थोड़ा बदल दें और ज्यादा जोर जर्मनी और इटली के खिलाफ प्रोपेगैंडा करने पर दें। कम्युनिस्ट सोवियत संघ के खिलाफ प्रोपेगैंडा करते वक्त वे मौलवी कहते थे कि अंग्रेज बाइबिल को मानने वाले हैं, इसलिए अंग्रेज अहल-ए-किताब हैं जबकि सोवियत यूनियन के हुक्मरान कम्युनिस्ट हैं, जो न खुदा को मानते हैं और न किसी आसमानी किताब को। इसलिए अंग्रेजों और मुसलमानों को मिलकर काफिर कम्युनिस्टों के खिलाफ लड़ना चाहिए।
    अब उन्हीं मौलवियों को जर्मनी और इटली के खिलाफ प्रोपेगैंडा करने की हिदायत दी गई। जर्मनी और इटली के लोग भी तो मजहबी अकीदे से वैसे ही थे, जैसे ब्रिटिश थे। वे भी बाइबिल को मानने वाले अहल-ए-किताब थे। अगर वे मौलवी अंग्रेजों की हिमायत इसलिए कर रहे थे कि अंग्रेज अहल-ए-किताब हैं, तो जर्मनी और इटली वाले भी तो अहल-ए-किताब ही थे लेकिन मौलवियों को इससे कोई मतलब ही नहीं था। अंग्रेज अफसरों ने रूसियों को काफिर कहा, तो मौलवियों ने भी रूसियों को काफिर कह दिया। अब जब अंग्रेज अफसरों ने जर्मनों और इटालियनों को इस्लाम के दुश्मन कहा, तो मौलवियों ने जर्मनों और इटालियनों को इस्लाम के दुश्मन घोषित कर दिया।
    वैसे, वक्त-वक्त की बात है। तब कम्युनिस्ट होने की वजह से सोवियत संघ उन मौलवियों के लिए काफिर था। अब एक कम्युनिस्ट मुल्क चीन ही पाकिस्तान का सबसे बड़ा दोस्त है। खैर! मुस्लिम ओट्टोमन एम्पायर को तोड़ने वाले, मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को देश-निकाला देकर उसको कैद में डालने वाले, अफगानों पर जुल्म करने वाले, सूबा सरहद और कबायली इलाकों में पश्तूनों पर खौफनाक अत्याचार करने वाले ब्रिटिश हुक्मरानों को इस्लाम और मुसलमानों के सच्चे खैरख्वाह बताने वाले इन अंग्रेज परस्त मौलवियों और पीरों को बस ब्रिटिश हुकूमत से मिल रहे रुपयों से मतलब था। मजहब का नाम वे बस अपने निजी हितों के लिए इस्तेमाल कर रहे थे।

-अमृत पाल सिंह ‘अमृत’
 मोबाइल : 09988459759
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2018 में प्रकाशित

देवरिया बालिका संरक्षण गृह से उपजे सवाल !

मुजफ्फरपुर (बिहार) से लेकर देवरिया, प्रतापगढ़ (उप्र) तक बालिका संरक्षण गृहों में बेबस, लाचार, अनाथ, विधवा लड़कियों का इस्तेमाल प्रभावशाली लोगों के यौन लिप्सा की पूर्ति के लिए किया जाता रहा। यह सच सामने आ जाने के बाद हर संवेदनशील व्यक्ति शर्मसार महसूस कर रहा है। वैसे इस सभ्य भारतीय समाज का यह विद्रूप चेहरा ना पहली बार दिख रहा है और ना अंतिम बार।
    टीवी चैनल इस घटना को सनसनीखेज के रूप में पेश कर रहे हैं तो पक्ष-विपक्ष के नेता एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। हम ऐसा नहीं मानते कि इसके पहले की सरकार के शासनकाल में महिलाओं की स्थिति बहुत अच्छी थी, लेकिन एक बात साफ है कि शासन-प्रशासन के नाक के नीचे यह सारी घटनाएं घट रही थीं और हमारे देश की सरकार बड़े-बड़े पोस्टर और होल्डरों पर जो बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ का नारा लिख रही है और महिला सशक्तिकरण का दावा कर रही है उस की पोल खुल चुकी है। इस घटनाक्रम के बाद लगता है कि जनता के पैसे से बड़े-बड़े होर्डिंग लगा कर जो हँसते हुए मोदी के चेहरे को दिखाते हुए लिखा जा रहा है कि-बहुत हुआ महिलाओं पर अत्याचार, अबकी बार मोदी सरकार। दरअसल ये जनता को मोदी मुँह चिढ़ाते हुए प्रतीत होते हैं। भाजपा के मई 2014 में सत्ता में आने के बाद से बलात्कार की घटनाओं में साफ तौर पर तेजी से इजाफा हुआ है एनसीआरबी की क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2010 से 2016 के बीच प्रति एक लाख आबादी पर बलात्कार की घटनाएँ और उनकी दर इस प्रकार है-वर्ष 2010 में 22172, वर्ष 2011 में 24206, वर्ष 2012 में 24926, वर्ष 2013 में 33707, वर्ष 2014 में 36735, वर्ष 2015 में 34652 और वर्ष 2016 में 29947 बलात्कार की घटनाएँ हुई, यानी क्रमशः 3.9 प्रतिशत, 4.1 प्रतिशत, 4.3 प्रतिशत, 5.7 प्रतिशत, 6.1 प्रतिशत, 5.7 प्रतिशत 6.9 प्रतिशत की दर से बढ़ोतरी हुई। यह सब साफ-साफ दिखाता है कि वर्षों के दौरान बलात्कार की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा था और एनडीए सरकार के बाद जो भाजपा गठबंधन की राजग सरकार है उसमें भी खासा उछाल आया। गर्भ में ही बच्चियों को मार देने की घटनाएँ हिंदुओं में सबसे ज्यादा हैं जो भाजपा शासित राज्यों में चिंताजनक लैंगिक अनुपात से जाहिर होता है। लैन्सेंट द्वारा 2011 में किए गए एक
अध्ययन के मुताबिक पिछले तीन दशकों में एक करोड़ बीस लाख बच्चियों को जन्म से पहले ही मार दिया गया। लोकसंघर्ष के पिछले अंक में कठुआ में हुए गिरोह बंद बलात्कार पर लिखे मेरे लेख को पाठक जरूर पढ़ें,  जिसमें भाजपा से जुड़े 21 बलात्कारियों का क्रमवार विवरण है।
    केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी के अनुसार देशभर के 9000 बाल संरक्षण गृहों में कुल 233000 बच्चे रहते हैं। इनमें बड़ी संख्या में बच्चियाँ हैं। अधिकांश बालिका गृहों के वही हालत हैं जो मुजफ्फरपुर या देवरिया में सामने आए हैं। इस तरह के तथ्य पहले भी देश के अन्य हिस्सों से आते रहे हैं।
    हाल फिलहाल देवरिया के डीएम और एसपी को सस्पेंड कर दिया गया है और देवरिया बालिका संरक्षण गृह की संरक्षिका गिरिजा त्रिपाठी व उनकी दो पुत्रियों-कनकलता व कंचनलता  त्रिपाठी और उनके पति मोहन त्रिपाठी को हिरासत में लिया जा चुका है। तमाम वामपंथी, दक्षिणपंथी संगठनों  द्वारा कठोर से कठोर कार्रवाई की माँग के लिए मुख्यमंत्री के  पुतला दहन से लेकर चक्का जाम और प्रतिरोध सभाएँ की गई हैं। पूर्व आईपीएस अधिकारी विभूति नारायण राय का कहना है कि ऐसे मामलों में पॉस्को के धारा 19-21 के तहत जाँच के दायरे में आला अधिकारियों और मुख्यमिंत्रयों को भी लाना  चाहिए। इन पर सीधी कार्रवाई करते हुए मुकदमा दर्ज होना चाहिए, लेकिन सीमित कार्रवाई के चलते बच्चियों के यौन शोषण पर चुप रहने वाले अधिकारी और शह देने वाले प्रभावी व्यक्ति गिरफ्त से बच जाएँगे। इसकी आँच योगी-नीतीश तक नहीं पहुँचेगी। एक महिला संगठन का मानना है कि बालिका संरक्षण गृहों में सामाजिक  कार्यकत्रियों की नियुक्ति होनी चाहिए, बिना उनकी भूमिका के बच्चियों पर होने वाले यौन हिंसा को रोकना मुश्किल है।
     देवरिया बालिका संरक्षण गृह  संरक्षिका गिरजा त्रिपाठी  के बहाने हम  उन दुःखद पहलुओं का विश्लेषण प्रस्तुत करेंगे कि आखिर वे कौन से कारक हैं, जहाँ मां-बाप जैसे माने जाने वाले संरक्षिका या संरक्षक ही रक्तपिपासु भक्षकों जैसे बर्ताव करते पाए जा रहे हैं। आखिर बच्चियों की आपबीती सुनकर रूह काँप जाती है। आखिर क्यों मानवता को कंपा देने वाले व्यवहार को सहने के लिए बच्चियाँ मजबूर है? वह इतनी बेबस और लाचार क्यों हैं? इसके लिए शोषक और  शोषित दोनों पक्षों की जाँच, पड़ताल होनी चाहिए।
    प्रथम दृष्टया, गिरजा त्रिपाठी  की ओर रुख करने पर पता चलता है कि उनके पास ‘माँ विंध्यवासिनी महिला प्रशिक्षण एवं समाज सेवा संस्थान के द्वारा देवरिया रेलवे स्टेशन के पास बालिका  संरक्षण गृह, भुजौली कालोनी में वृद्धाश्रम, सलेमपुर (जमुना) में तलाक व विधवा संरक्षण गृह, गोरखपुर (मोहद्दीपुर) में बाल संरक्षण गृह, दत्तक ग्रहण अभिकरण और स्वाध्याय गृह का संचालन होता है। मनरेगा योजना के तहत माँ विंध्यवासिनी संस्थान को महिला मजदूरों के बच्चों को काम करने के दौरान देखभाल करने को पालना गृह योजना के संचालन की भी जिम्मेदारी मिली थी। यह और बात है कि जगह-जगह ऐसे पालना गृह योजना में फर्जी मजदूरों और उनके बच्चों के नाम पर बजट लेने की शिकायत मिलने लगी है, लेकिन इससे स्पष्ट हो जाना चाहिए कि ऐसी संरक्षिका  (या संरक्षक उनके पति) पिछले दसियों साल में बढ़ती बेरोजगारी और मंहगाई के दौर में भी लखपति करोड़पति वर्गों में शामिल रहे। प्रतिष्ठा का लाभ लेकर और लुटेरा वर्ग के चरित्र को साकार करने  वालों की ही तो शासन प्रशासन में  ऊपर तक पकड़ होती है।
    दूसरी ओर बालिका संरक्षण गृह के उन बच्चियों की और रुख करते हैं कि वह उत्पीड़ित या शोषित होने वाली लड़कियां कौन है उनकी स्थिति क्या है?  ये किनकी बेटियाँ हैं? आखिर यह आती कहाँ से है? उनको संरक्षण गृहों में क्यों लाया गया? जब हम इन सवालों का जवाब ढूँढने की कोशिश करते हैं तो पता चलता है कि हमारे देश में हमारे समाज में बेसहारा, बेबस, अनाथ, लाचार, परिवार, समाज से दुत्कारी गई या फेंक दी गई  ऐसी बेटियाँ हैं, जिनका दुनिया में ऐसा कोई नहीं जिसे वे अपना कह सकें।

    सभी लोग आए दिन अखबार पढ़ते होंगे एक नवजात बच्ची सड़क के किनारे पाई गई। अब दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य ऐसी कुछ नवजात बच्चियों पर किसी की नजर पड़ जाती है और पुलिस के सहयोग से इन्हे ऐसे तथाकथित संरक्षण गृहों को पहुँचा दिया जाता है। ऐसे ही भीख माँगने वाली, प्रेमी के साथ घर से भागकर आने के बाद प्रेमी द्वारा धोखा दी जाने वाली, पुलिस द्वारा मुक्त कराई गई वेश्याओं की बेटियों के लिए ऐसे संरक्षण गृह ही अंतिम विकल्प दिखते हैं।कुछ बेटियाँ साम्प्रदायिक, जातिय या अन्य संघर्षरत क्षेत्रों से अनाथ होकर आ जाने को लेकर मजबूर हुई होती हैं। ऐसे गरीब, भूमिहीन, बेबस, लाचार बेटियां की मजबूरी ही सब अत्याचार को घुट-घुटकर पीने सहने को विवश करती रहती है। ऐसे में  औरत ही औरत का दुश्मन है जैसी रूढ़ कहावत को नकारते हुए संरक्षिका और बच्चियों के बीच वर्गीय फर्क को पहचानने की जरूरत है। हकीकत के मां-बाप और उनके बच्चों में कोई वर्गीय विभाजन नहीं दिखता लेकिन यहां संरक्षण गृहों के मालिक और वहाँ के अनाथ, बेबस, लाचार बच्चों के बीच साफ वर्गीय विभाजन है और दोनों के बीच कोई ममता नहीं एक लाभ-हानि या मुनाफे का संबंध है। इसलिए बच्चियों के लिए अच्छे स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ने और अच्छी सरकारी या गैर सरकारी नौकरियों के बारे में सोचा भी नहीं जाता, उन्हें बर्तन मांजने, झाड़ू-पोछा लगाने और देह-व्यापार करने के लायक समझा जाता है। क्या संरक्षण गृहों के मालिक या मालिकिन या आला अधिकारी, राजनेता अपने बच्चे-बच्चियों के लिए ऐसा सोच भी सकते हैं? कभी नहीं! इसीलिए इन बच्चियों के साथ यौन हिंसा का समाधान का रास्ता भी वर्ग संघर्षों के रास्ते से जुड़ जाता है जो सम्पत्तिशाली वर्ग के लिए काफी निर्मम और कुख्यात है। आज भी सर्वहारा (मजदूर) वर्ग  ही इस संघर्ष को सफलता की ओर ले जा सकता है। मेहनतकश मजदूर वर्ग का दर्शन ऐलान करता है कि इन बच्चियों के साथ यौन हिंसा, महिलाओं के व्यापक आबादी पर जारी यौन हिंसा का ही हिस्सा हैं।  बच्चियों-महिलाओं के साथ वर्गीय और पितृसत्तात्मक दोनों तरीकों से होने वाले क्रूर व अशिष्ट शोषण के खिलाफ संघर्ष की चाह रखने वाले लोगों को इसके बुनियादी कारणों को समझना होगा। इसके साथ ही समझ को यहाँ तक ले जानी चाहिए कि महिलाओं पर जारी यौन हिंसा की समाप्ति सड़ चुकी व्यवस्था के समाप्ति से ही संभव है, जो ऐसे अपराधियों को जन्म देती है, प्रोत्साहन देती है और जायज ठहराती है। इससे कम पर समाधान नहीं ढूंढा जा सकता।     
मुजफ्फरपुर के बालिका संरक्षण गृह के मनीष ठाकुर हों या देवरिया की  गिरजा त्रिपाठी हों या प्रतापगढ़ की बालिका गृह की संरक्षिका रमा मिश्रा हों ये सभी समाज के परजीवी वर्ग यानी कि साम्राज्यवाद और सामंतवाद परस्त पूँजीपति या जमींदार वर्ग के ही हिस्से हैं जो जनता के दुश्मन माने जाने चाहिए। ये महिलाओं की लैंगिक वर्गीय शोषण से अति मुनाफा कमाने का धंधा करते हैं। लगातार अपने अति मुनाफे को कायम रखने के लिए वर्गीय व पितृसत्तात्मक शोषण उत्पीड़न को जारी रखते हैं। ध्यान रहे यह वर्गीय और लैंगिक दमन महिलाओं के सपनों, इरादों और राज्य सत्ता के खिलाफ सामाजिक क्रांति को जड़ से खत्म कर देता है। भारतीय समाज में सामंतवाद व पूंजीवादी, साम्राज्यवाद का ऐसा गठजोड़ बन चुका है जो एक मानव द्रोही समाज का निर्माण करता है। यही कारण है कि हर जगह महिलाओं के खिलाफ पुरुष प्रधान मूल्यों, धारणाओं, प्रथाओं, आदतों, संस्कृतियों व विचारधाराओं की सड़न है। पितृसत्ता प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में मौजूदा शोषक शासक वर्ग के हितों में महिलाओं के ऊपर प्रभुत्व, शोषण, उत्पीड़न, दमन और अनेक अपराधों को थोपता है और साथ ही साथ महिला-पुरुष के आपसी वर्गीय एकता को भी तोड़ता है। वर्तमान सत्ता इतनी मानवद्रोही व्यवस्था है जो पितृसत्तात्मक (पुरुष प्रधान) विचार और धारणा को जायज बनाती है।
    हमारे देश में सामंती और ब्रिटिश साम्राज्यवादी व्यवस्था के आपसी गठजोड़ से कायम 200 वर्षों की साम्राज्यवादी गुलामी के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम चला लेकिन
मध्यमवर्गीय पूँजीवादी नेतृत्व के चलते जनवाद-क्रांति संभव नहीं हो पाई। नतीजतन देश में सामंती विचारधारा का निर्मूलन नहीं हो सका। आज भी पुरुष प्रधान सामंती विचारधारा समाज में मौजूद है जो कि महिलाओं का शरीर पुरुषों के लिए लिप्सा को तृप्त करने के लिए ही मानते हैं। उनके अनुसार पुरुषों का सबसे बड़ा पुरुषार्थ यह होता है कि वह एक से अधिकस्त्रियों का भोग करें। ऐसे में महिलाओं द्वारा अनिच्छा जाहिर करने या विरोध करने वाली न्याय पूर्ण दावेदारी के लिए बलात्कार सबक सिखाने वाला एक हथियार है। पुराने समय में राजे महाराजे और नवाबों के जमाने में सैकड़ों स्त्रियों का रनिवास और हरम बनाया जाता रहा। बहुपत्नी विवाह प्रथा प्रभावी रही है। एकनिष्ठता की माँग तो सिर्फ स्त्रियों से की जाती है, पुरुष तो व्यभिचार या बलात्कार के लिए स्वतंत्र हैं।
    वर्तमान भारतीय व्यवस्था में आज भी एक ओर तमाम सड़े-गले, पिछड़े व पितृ सत्तात्मक मध्ययुगीन सामती मूल्य, मान्यताओं को शादी-विवाह, रीति, रिवाजों, उत्सवों में देखते हैं तो दूसरी ओर उन्हीं कार्यक्रमों में पूँजीवादी साम्राज्यवादी अर्थात पश्चिमी संस्कृति से गलबहियाँ भी देख सकते हैं। यह अनायास नहीं है कि टाई-कोट पहनना, अंग्रेजी बोलना, साम्राज्यवादी धुनों पर बंदरों जैसे थिरकना आधुनिकता की पहचान बन चुकी है।
     इस तरह परत-दर-परत अंतर्विरोधों वाला जो जटिल भारतीय समाज का निर्माण हो चुका है उन्हें हल किए बिना सिर्फ बलात्कारियों और उनके संरक्षकों को मृत्यु दंड देना, धार्मिक बनाना या फाँसी दे देना बुनियादी कारणों को खत्म करने की माँग करने की जगह उनके परिणामों से सख्ती से निपटने की माँग भर हैं। महिला पुलिस का संरक्षण या महिला संगठन (जहाँ व्यक्ति केंद्रित या गैर जनवादी, जूनियार्टी, सिनियार्टी, चापलूसी लोग का बोलबाला ही है) की कार्यकत्रियों के संरक्षण भी इस बात की गारंटी नहीं करता कि बच्चियों, महिलाओं के साथ होने वाली यौन हिंसा, शोषण, उत्पीड़न, दमन को रोकने की गारंटी कर देगा क्योंकि सवाल राज्यसत्ता का है। जिसमें तमाम बहुतायत लोग शोषक, शासक वर्गीय विचारों से लैस होते हैं। विषैली वृक्ष की जड़ों को उखाड़ने के बजाए पत्ते तोड़ने से अब काम नहीं चलेगा। महिलाओं के खिलाफ शोषण, उत्पीड़न, दमन जैसी तमाम समस्याओं से मुक्ति का सवाल एक वर्गीय सवाल है और देश में चल रहे विविध वर्ग संघर्षों का जरूरी हिस्सा है। हमें हर तरह के संघर्षों में महिलाओं के लिए हक-हिस्से में, विकास में समान भागीदारी और पितृसत्ता की समाप्ति के लिए राजनीति, अर्थनीति ,विचारधारा और संस्कृति में भी वर्ग संघर्ष को जारी रखना होगा। महिला-पुरुष की सच्ची बराबरी का एहसास तो तभी कराया जा सकता है जब क्रान्ति के जरिए आधार और अधिरचना दोनों में क्रांतिकारी रूपांतरण द्वारा समता व न्याय पर आधारित सचमुच लोकतांत्रिक समाज का निर्माण हो।
       हाल के 27-28 वर्षों में महिलाओं के खिलाफ बढ़ रही नृशंसता, बर्बरता और घृणित यौन हिंसा का प्रमुख कारण है साम्राज्यवादी वैश्वीकरण, निजीकरण व उदारीकरण (स्च्ळ) द्वारा जनित उपभोक्ता वाद! 1991 से नई आर्थिक नीति (स्च्ळ) लागू हो जाने के बाद खुलेआम पतनशील साम्राज्यवादी संस्कृति व सामंती पितृसत्तात्मक संस्कृतियों का गठजोड़ मिलकर रुग्ण, पतनशील, विद्रूप संस्कृति को बढ़ा दिया है। ताकि स्त्री देह से रात दिन अति मुनाफा (सुपर प्रॉफिट) कमाया जा सके। स्त्री देह को माल के रूप में सहज बनाने के लिए वर्तमान राज्यसत्ता द्वारा संचालित मीडिया, फिल्में, अखबार, पत्र-पत्रिकाएं व इंटरनेट  मिलकर ऐसी काल्पनिक स्त्री की  तस्वीर पेश करते हैं जो हर हालत में हर पुरुष को मिलनी चाहिए। जबकि वास्तविक जीवन में अधिकांश भारतीय पुरुषों को ऐसी स्त्री की झलक भी नहीं मिलती। उनके जीवन में उपस्थित स्त्री का बाजार द्वारा प्रायोजित स्त्री से कोई मेल नहीं है। स्त्री को भोग की वस्तु समझने वाला भारतीय पुरुष का पितृसत्तात्मक सामंती मन रात दिन उसे पाने भोगने के लिए बेचैन रहता है। इसके अलावा दूसरा पक्ष यह भी है कि पूँजी की गति महिलाओं की आजादी एवं आत्मनिर्भरता की आकांक्षा और रोजी-रोटी की जरूरतें आज अधिक से अधिक संख्या में औरतों को घर से बाहर निकलने और बाजार में मर्दों से होड़ करने को बाध्य कर रही है। इस तरह वह जाने-अंजाने चुनौती देती है और उसका शिकार  भी बनती हैं। सड़क-चौराहों से लेकर संसद के गलियारों तक ऐसे अपेक्षाकृत स्वतंत्र महिलाओं पर फब्तियाँ कसने वाले हमें मिल जाते हैं। इस प्रकार समाज में एक ऐसी स्त्री विरोधी संस्कृति का निर्माण किया गया है जिसमें स्त्री की स्वतंत्रता, बराबरी, गरिमा और आत्म सम्मान के लिए कोई स्थान नहीं दिखता है। सामंती और पूँजीवादी, साम्राज्यवाद की दोनों संस्कृतियाँ स्त्री को अलग-अलग तरीके से भोगने की वस्तु समझती हैं। साथ ही वे स्त्री पर पुरुष के वर्चस्व को जायज ठहराती हैं। स्त्रियों के खिलाफ बलात्कार तथा यौन उत्पीड़न के अन्य रूप इसी वर्चस्वशाली संस्कृति और विचारधारा के परिणाम हैं। ध्यान रहे ऐसी सड़ी गली पतित संस्कृति व विचारधारा को पैदा करने वाली प्रश्रय देने वाली सड़ चुकी मौजूदा व्यवस्था (राजसत्ता) ही है। इसलिए महिलाओं पर जारी यौन हिंसा की समाप्ति सड़ चुकी व्यवस्था के समाप्ति से ही संभव है जो ऐसे अपराधियों को जन्म देती है, प्रोत्साहन देती है और जायज ठहराती है।
    वर्तमान में लाखों-करोड़ों पीड़ित महिलाएँ, बच्चियाँ मौजूदा सड़ चुकी व्यवस्था के खिलाफ जनांदोलनों में शामिल हो रही हैं, अपनी चुप्पी तोड़ रही हैं और नए समाज के विविध विकल्पों में शामिल होने का प्रयास कर रही हैं-यह एक नई रोशनी है। हमारे देश के मणिपुर, असम, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, काश्मीर, तेलंगाना,  महाराष्ट्र जैसे राज्यों में विविध न्यायपूर्ण आंदोलनों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका-भागीदारी है। हमारे  उत्तर भारत में भी उत्तराखंड में जंगल के पेड़ों की सुरक्षा में महिलाओं द्वारा छेड़ा गया चिपको-आन्दोलन, निर्भया कांड के खिलाफ नई दिल्ली में महिलाओं के साथ उठ खड़ा हुआ जनप्रतिरोध, बीएचयू की छात्राओं की बहादुराना संघर्षों से प्रेरणा मिल रही है। देश में बाबाओं के दुष्चक्र में फंसे हुए समाज के बीच में इक्की-दुक्की लड़कियाँ ही आसाराम बापू और राम रहीम जैसे लोगों को जेल की सलाखों के पीछे धकेल पाती हैं। बालिका संरक्षण गृह की इक्की-दुक्की लड़कियाँ इस अग्रिम  कड़ी में जुड़ेंगी। इरोम शर्मीला, सोनी सोढ़ी, मेधा पाटेकर, तीस्ता सितलवाड़ अब अकेली नहीं रहीं। समाज में बताने की जरूरत है-चुप्पी सबसे बड़ा खतरा है, जिंदा आदमी के लिए!

-राजेश
मोबाइल : 9889231737
लोकसंघर्ष पत्रिका सितम्बर 2018 में प्रकाशित