शनिवार, 20 दिसंबर 2014

एशियाई हुस्न की तस्वीर है मेरी ग़ज़ल। मशरिकी फ़न में नई तामीर है मेरी ग़ज़ल -2

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कहीं-कहीं व्यंग्य इतना संवेदनात्मक है कि पाठक को रुला दे, बिल्कुल के.पी. सक्सेना के गद्य जैसा। ऐसी अनुभूतियों को कविता में लाने का कारण हृदय को टूटने से बचाने का अंतिम उपाय होता है, और कहीं-कहीं इतना तीव्र कि घृणा से थूकने पर मजबूर कर दे, निजाम और परिदृश्य पर। उदाहरण स्वरूपः-
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है,
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है।
भटकती है हमारे गाँव में गूँगी भिखारन-सी,
ये सुबहे फरवरी बीमार पत्नी से भी पीली है।

और
सुरा और सुंदरी के शौक में डूबे हुए रहबर,
दिल्ली को रंगीलेशाह का हम्माम कर देंगे।

        दिल्ली हमारी राजनैतिक, प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र है जिसे रंगीलेशाह प्रतीक से भोग-विलास में डूबी हुई  बताया गया है। रजनीश या ‘ओशो’ जो कि भारत के आध्यात्मिक  गुरुओं में शुमार होते हैं। उनके आश्रम में ‘भोग से योग तक’ के पर्दे में होने वाले व्यभिचार को अदम ने अपने कई शेरों में निशाना बनाया है-
डाल पर मजहब की पैहम खिल रहे दंगों के फूल,
सभ्यता रजनीश के हम्माम में है बेनकाब।
अथवा,
‘प्रेमचंद’ की रचनाओं को, एक सिरे से खारिज करके,
ये ओशो के अनुयायी हैं, कामसूत्र पर भाष्य लिखेंगे। 
दोस्तों अब और क्या तौहीन होगी रीश की।
ब्रेसरी के हुक पे ठहरी चेतना रजनीश की।।
मोहतरम यूँ पाँव लटकाए हुए हैं कब्र में।
चाहिए लड़की कोई सोलह कोई उन्नीस की।।

    कहा जाता है अदम ‘ओशो’ का आश्रम अपनी आँखों से देखकर आए थे। अदम उसी प्रकार ‘पीड़ा से परिहास’ करते हैं जिस प्रकार ग़ालिब जैसे उर्दू के बड़े शायरों ने अपनी शायरी में किया है। भूख अदम के यहाँ सबसे बड़ा सच है। भूख तमाम ज्ञान की जननी है। बुद्ध को भी ज्ञान भूख से मिला। भूख उनकी हर ग़्ाज़ल में आई है, अपने उसी भयानक रूप में जिस रूप में वह भारत की सत्तर फीसदी आबादी का सत्य रही है। शायद इसीलिए अदम के बहुत से शेरों में भूख बार-बार चीखती है:-
इन्द्रधनुष के पुल से गुजरकर उस बस्ती तक आए हैं।
जहाँ भूख की धूप सलोनी चंचल है बिंदास भी है।।
कहीं पर भुखमरी की धूप तीखी हो गई शायद,
जो है संगीन के साए की चर्चा इश्तहारों में,
जुल्फ, अँगड़ाई, तबस्सुम, चाँद, आईना, गुलाब,
भुखमरी के मोर्चे पर ढल गया इन का शबाब।
भुखमरी की जद में है या दार के साये में है,
अहले हिंदुस्तान अब तलवार के साए में है।
शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून,
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को।

    भूख क्रांति का कारण बनेगी यह विश्वास भी शायर को है-
सत्ता के जनाजे़ को ले जाएँगे मरघट तक।
जो लोग भुखमरी के आगोश में आए हैं

    इसीलिए वे भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलने की बात करते हैं-
भूख के एहसास को शेरो-सुखन तक ले चलो।
या अदब को मुफलिसों की अंजुमन तक ले चलो।

इसीलिए उन्हें गर्म रोटी की महक पागल कर देती है। गंध की कितनी मादक अनुभूति है, ऐसी भी प्रगतिशील कविता कहीं होगी क्या?
गर्म रोटी की महक पागल बना देती मुझे।
पारलौकिक प्यार का मधुमास लेकर क्या करें

    अदम गँवई-गँवार के अगुवा, अलमबरदार कवि हैं, इसलिए वे श्रम की महत्ता जानते हैं। उन्हें किसान के श्रम की फिक्र भी है और झोंपड़ी से राजपथ का रास्ता हमवार करने की कोशिश भी है। माक्र्सवादियों ने श्रम की गरिमा और महिमा बखान की है। “माक्र्स ने बताया कि जब श्रम अलगाव का रूप अख्तियार कर लेता है तब श्रमिक और श्रम के बीच एक विरोध की स्थिति ज़रूर बनती है। लेकिन ऐसा तब नहीं होता जब श्रम रचनात्मक होता है और जब उन वस्तुओं का उत्पादन करता है जिनमें मनुष्य अपने को वस्तुरूपांतरित और व्यक्त करता है। इसके अलावा मनुष्य कलाकृतियों में ही नहीं बल्कि श्रम में भी आनंद ले सकता है। पूँजी में माक्र्स ने श्रमिक के काम में मिलने वाले सुख के बारे में लिखते हुए कहा कि श्रम ‘ऐसी क्रिया है जो उसकी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को खुलकर सक्रिय होने का अवसर देती है’।”6 दुनिया में जो कुछ भी सुंदर है वह श्रम से निर्मित हुआ है। किन्तु मेहनतकश को जब उसके श्रम के एवज में भुखमरी के सिवाय कुछ नहीं मिलता तो अदम की शायरी अपने चिर-परिचित अंदाज में कहती है-
वो जिसके हाथ में छाले हैं पैरों में बिवाई है।
उसी के दम से रौनक आपके बँगलों में आई है।

    यहाँ तक सभ्यता का निर्माण भी घीसू के पसीने से ही हुआ है-
न महलों की बुलंदी से न लफ्जों के नगीने से।
तमद्दुन में निखार आता है घीसू के पसीने से

    गाँव के अमानुषिक वातावरण, गरीबी, भुखमरी, भ्रष्टाचार, शोषण, दमन सबको देखने की बारीक निगाह अदम में है इसीलिए वे जनकवि हैं। सरयू नदी  की बाढ़ का कैसा जीवंत चित्र है, इस शेर में जो हश्र (प्रलय) का प्रभाव  पैदा कर रहा है-
कितनी वहशतनाक है सरयू की पाकीजा कछार।
मीटरों लहरें उछलतीं हश्र का आभास है

    गाँव के बारे में महानगरों में बैठकर आँकड़े जुटाने और बनाने वाले लोगों को यह खबर नहीं है कि कितने लोग गाँव छोड़कर शहरों की ओर कमाने निकल गए हैं। विस्थापन की यह पीड़ा और लाचारी कैसी होती है, यह महानगरीय अफसरशाही और मध्यवर्गीय हिप्पोक्रेसी की पहुँच से दूर की बात हैः-
तुम्हारी फाइलों में गाँव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आँकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।
हमारे गाँव का ‘गोबर’ तुम्हारे लखनऊ में है,
जवाबी ख़त में लिखना किस मोहल्ले का निवासी है।

    सिर्फ एक प्रतीक के रूप में प्रेमचंद के किसान जीवन पर लिखे गए महाकाव्यात्मक उपन्यास ‘गोदान’ के पात्र ‘गोबर’ का प्रयोग करने मात्र से शेर कितना प्रभावी और वजनदार हो गया है। पूरे गोदान का सत्व ही इसमें निचुड़कर आ गया है। अपसंस्कृति, साहित्यकारों की खेमेबाजी और हवाई साहित्य, सांप्रदायिकता, लालफीताशाही, पूँजीवादी व्यवस्था के प्रति आक्रोश, क्रांतिधर्मी चेतना और राजनैतिक अगुवाकारी की विफलता से जन-सामान्य में उपजा संत्रास अदम की ज़लों का बीज-भाव है। सर्वत्र विद्रोह और नकार, प्रतिरोध और मुक्ति की कामना उनके शेर-शेर में व्यंजित होती है:-
जनता के पास एक ही चारा है बगावत।
ये बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में।।

    क्रांति की यह उद्दाम चाह जीवन में तमाम मानसिक और भावनात्मक यातनाओं से गुजरने के बाद पैदा होती है। यही हिन्दी ग़्ाज़ल का मिजाज भी रही है, दुष्यंत भी ‘यातनाओं’ के अँधेरे में सफर करते थे। यह अँधेरा अदम के यहाँ और स्पष्ट है लेकिन, प्रकाश के साथ अचेतन मन में प्रज्ञा कल्पना की लौ जलाती है। सहज अनुभूति के स्तर में कविता जन्म पाती है-
उठाता पाँव है विज्ञान संशय के अँधेरे में।
अचानक उस अँधेरे में ही बिजली कौंध जाती है
    धर्म, इतिहास और शास्त्र का नकार बहुत कड़े शब्दों में है। शायद दलितों के हवाले से-
वेद में जिनका हवाला हाशिये पर भी नहीं,
वे अभागे आस्था विश्वास लेकर क्या करें।
लोकरंजन हो जहाँ शंबूक वध की आड़ में,
उस व्यवस्था का घृणित इतिहास लेकर क्या करें।

    दलित-विमर्श पर संग्रह में एक अकेली लंबी नज़्म ‘चमारों की गली’ भी है, जिस पर आगे चर्चा होगी। कुछ ग़्ाज़लों के शेर भी दलित-चिंतन की ओर ले जाते हैं मसलन-
अंत्यज कोरी पासी हैं हम, क्यूँ कर भारतवासी हैं हम।
छाया भी छूना गर्हित है, ऐसे सत्यानासी हैं हम।

    कुल मिलाकर अदम की  ज़लें उस हिंदुस्तान का साफ नफीस आईना हैं जहाँ रहकर उन्होंने अपनी ग़्ाज़ल को रवानी दी है और जिन पर मुख्तसर चर्चा पर्याप्त नहीं है। उनकी शायरी को कविता की मुख्य धारा की चर्चा में शामिल करना बहुत जरूरी है क्योंकि-
दिल लिए शीशे का देखो संग से टकरा गई।
बर्गे गुल की शक्ल में शमशीर है मेरी
ग़ज़ल

    अदम की ग़ज़ल सम्पूर्ण मानवता की ग़ज़ल है।
कत्आत और नजमें
    कत्आ हिन्दी में मुक्तक के आस-पास ठहरता है। “यह भी रुबाई की तरह चार मिसरों में होता है और इसके दूसरे और चैथे मिसरे समान रदीफ-काफिये के होते हैं। यह रुबाई से इस तरह भिन्न है कि ग़ज़ल की सभी बहरों में कहा जा सकता है। अगर क़ते का पहला शेर मतला बन जाए तो पहले दूसरे और चैथे मिसरे का रदीफ काफिया एक ही हो जाता है। कई बार कोई एक भाव दो मिसरों में न समा पाने पर उसे क़तेे में बखूबी व्यक्त किया जा सकता है। इसे ग़्ाज़ल के रंग में कहकर उसके साथ ही लिखा पढ़ा जा सकता है।”7 ‘समय से मुठभेड़ में चैदह क़ते हैं। इनमें भी सर्वहारा की हिमायत शायराना रंग-ढंग में मिलती है-
रोटी के लिए बिक गई धनिया की आबरू।
‘लमही’ में प्रेमचंद का ‘होरी’ उदास है।

    शायर की जो ग़्ाज़लें गैर मुकम्मल रह जाती हैं वे कते की शक्ल अख्तियार कर लेती हैं। लेकिन इनमें भी अदम का तेवर कमजोर नहीं पढ़ा है-
भुखमरी की रुत में नग्में लिख रहे हैं प्यार के,
आज के फनकार भी हैं दोगले किरदार के।
दोस्तों इस मुल्क में जम्हूरियत के नाम पर,
सिक्के कितने दिन चलेंगे एक ही परिवार के।।

    नज़्मों में ‘चमारों की गली’ नज्म अधिक मजबूत है क्योंकि इसमें दलित-चिंतन के साथ एक कथानक भी है। ‘हथियार उठा लंे’ दस पदों की एक पोस्टर-छाप राजनैतिक रचना है। इसकी निस्बत ‘गाँव का परिवेश’ कहीं अच्छी रचना है।
    ‘चमारों की गली’ दलितों के शोषण और सामंती सवर्ण जातियों द्वारा उन पर ढाए गए जुल्मों का बयान करने वाली रचना है। पचपन पदों वाली इस रचना में कृष्णा नाम की एक दलित लड़की की करुण कहानी है जिसके साथ गाँव ही के ठाकुर ने बलात्कार किया है, और पुलिसिया दमन का सामना भी पीडि़त और उसके परिवार को करना पड़ रहा है। कहते हैं यह रचना अदम के गाँव में घटी एक घटना पर आधारित है जिस पर पुलिस, मीडिया और प्रशासन का ध्यान नहीं गया था। ठाकुरों की सामंती ठसक और पुलिस की नपुंसक, भ्रष्ट छवि को उजागर करती यह रचना अपनी भाषा, शैली और कथ्य में भी ठोस है। रचना के पहले ही बंद में एक विशिष्ट ओज है-
आइये महसूस करिए जिंदगी के ताप को।
मैं चमारों की गली तक ले चलूँगा आप को।।

    दलित लड़की कृष्णा के लिए उन्होंने यूरोपीय नवजागरण काल के प्रसिद्ध चित्रकार लिओनार्दो द विंची के प्रसिद्ध चित्र ‘मोनालिसा’ का बिम्ब प्रयोग किया है जो अपनी सादगी के बावजूद चित्रकला के इतिहास में कालजयी रचना है-
चल रही है छंद के आयाम को देती दिशा।
मैं इसे कहता हूँ सरयू पार की मोनालिसा।।
-संतोष अर्श
क्रमस:
लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

एशियाई हुस्न की तस्वीर है मेरी ग़ज़ल। मशरिकी फ़न में नई तामीर है मेरी ग़ज़ल

गोंडा में  लोकसंघर्ष  पत्रिका के कार्यक्रम में हाथ में पीछे पत्रिका लिए है 



‘समय से मुठभेड़’ करती सरयू पार की मोनालिसा

    अपनी ग़ज़ल के प्रति यह एतमाद और फ़ख्ऱ भरा शेर कहने वाले रामनाथ सिंह ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लों में सचमुच एशियाई कविता की भाव-धारा और हिन्दी की संवेदनशील आक्रामकता अपने वास्तविक रूप में दिखती है। ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें जिस समय से मुठभेड़ कर रही हैं, वह समय कविता में प्रतिरोध की जिस क्षमता की माँग करता है ‘अदम गोंडवी’ की ग़ज़लें उस प्रतिरोधात्मक भाषा की शक्ति से भरी-पूरी हैं। यह क्षमता हिन्दी के बहुत कम कवियों के पास रही है, शायद इसीलिए ‘अदम गोंडवी’ कबीर, मुक्तिबोध, नागार्जुन और धूमिल की परंपरा के कवि हैं। वही कबीर सी फक्कड़ मस्ती और सच कहने का हुनर जो बड़ी साधना के बाद, जीवन के कटु यथार्थ से दो-दो हाथ करने के बाद हासिल होता है, अदम के शेरों में मिलती है। जनवादी कविता जन की कसौटी पर कसी जाने के बाद अपने-आपको प्रासंगिक और प्रमाणित करने के लिए जन के बीच में उतरती है, इसलिए समकालीन कविता में ‘अदम गोंडवी’ की लोकप्रियता उन्हें सच्चे अर्थों में जनकवि की पदवी प्रदान  करती है।
छंद के रूप में ग़ज़ल को अपना लेना आसान है लेकिन इसे साधना बोधा के शब्दों में ‘तरवारि की धारि पै धावनो’ है। हिन्दी में ग़ज़ल कहने की परंपरा भारतेन्दु ही से प्रारम्भ हो जाती है। हिन्दी के निराला जैसे बड़े कवि भी-
‘खुला भेद विजयी कहाए हुए जो,
लहू दूसरों का पिए जा रहे हैं।

    जैसी ग़ज़लें कहने से अपने आपको नहीं रोक पाए हैं। यह सिलसिला शमशेर और त्रिलोचन से होते हुए दुष्यंत तक पहुँचता है। दुष्यंत की ग़ज़लों से हिन्दी में ग़ज़ल को स्वीकृति मिल जाती है। ‘अदम गोंडवी’ ने दुष्यंत के विनम्र प्रतिरोध को धार और आक्रामकता के साथ व्यंग्य का जो दर्प दिया है, वह उन्हें हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ ग़ज़लकार घोषित करता है। ‘‘एक ज़माना था जब आशिक और माशूक़ा की मुहब्बत भरी गुफ्तगू को ग़ज़ल कहा जाता था। हुस्न, इश्क और साकी-शराब की रसीली अभिव्यक्ति उसकी भाव-भूमि हुआ करती थी, जिससे परे जाकर दूसरी भाव-भूमि पर ग़ज़ल कहना ग़ज़लकारों के लिए दुस्साहस भरा कार्य हुआ करता था। ऐसी स्थिति में नई क्रांति की प्रस्तावना किसी भी कवि के लिए संभव नहीं थी। सच तो यह है कि ग़ज़ल के रूप में उसी कलाम को स्वीकार किया जाता था जो औरतों के हुस्न और जमाल की तारीफ करे। यहाँ तक कि जो हिन्दी की ग़ज़लें हुआ करती थीं उसमें उर्दू ग़ज़लों का व्यापक प्रभाव देखा जाता था। यही कारण था जब पहली बार शमशेर ने पारंपरिक रूमानी संस्कार से उठकर ग़ज़ल रचना की तो डॉक्टर रामविलास शर्मा ने यह कहकर खारिज़ कर दिया कि ग़ज़ल तो दरबारों से निकली हुई विधा है, जो प्रगतिशील मूल्यों को व्यक्त करने में अक्षम है।” 1 ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें रामविलास शर्मा जी की उस बात को ही खारिज़ कर देती हैं।  क्योंकि ये ग़ज़लें कविता की उस प्रगतिशीलता की पराकाष्ठा को छूती हैं जिसे बड़े पैमाने का प्रगतिशील साहित्य अपनी प्रगतिशीलता की चादर ओढ़कर भी नहीं छू पाता। “किताबी माक्र्सवाद सिर्फ उन्हें आकृष्ट कर सकता है, जिनकी रुचि ज्ञान बटोरने और नया दिखने तक है। पर जो सचमुच बदलाव चाहते हैं और मौजूदा व्यवस्था से बुरी तरह तंग और परेशान हैं, वे अपने आस-पास के सामाजिक भ्रष्टाचार और आर्थिक शोषण के खिलाफ  लिखना ज़रूर चाहेंगे। वे सचमुच के सर्वहारा हैं, जिनके पास खोने को न ऊँची डिग्रियाँ और ओहदे हैं, न प्रतिष्ठित जीवन शैली। अदम इन्हीं धाराओं के शायर हैं।” 2 अदम किताबी माक्र्सवादी नहीं हैं, यह उन्होंने अपनी कविता और जीवन दोनों से सिद्ध किया है। विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता मुक्तिबोध प्रभृति कवियों को भी पीछे छोड़ देती है। अदम का एक-एक शेर यथार्थवादी प्रगतिशील कविता की आबरू है। ग़ज़ल कहने की ज़मीन (मीटर और व्याकरण) होती है, लेकिन अदम ज़मीन (धरती) पर पाँव जमा कर ग़ज़ल कहते हैं शायद तभी उनकी ग़ज़लों का एक संग्रह ‘धरती की सतह पर’ नाम से प्रकाशित हुआ।
    ‘समय से मुठभेड़’ की ग़ज़लें मनुष्य और यथार्थ के बीच के संबंध को बहुत सहजता से व्यक्त करती हैं। इन सहज सम्बन्धों को व्यक्त करने के लिए बड़े-बड़े दार्शनिकों और समाज शास्त्रियों को बड़ी मशक्कत करनी पड़ी है, लेकिन अदम का एक शेर इन्हें तरलता के साथ बेरोक-टोक हमारे हृदय पर तारी कर देता है। अदम बार-बार साहित्यकारों को ज़मीन की ओर लौटने के लिए कहते हैं-
अदीबों ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ ।
मुलम्मे के सिवा क्या है फलक के चाँद तारों में ।।

    ग़ज़ल उर्दू का छंद है और जाहिरी तौर पर उर्दू से ही हिन्दी में दाखिल हुआ है। ‘ग़ज़ल एक संकेतात्मक कविता है। यह गागर में सागर भरने की कला है। ग़ज़ल के संक्षिप्त कलेवर में प्रतीकों के माध्यम से वह बात कही जा सकती है जिसके लिए एक लंबी नज़्म दरकार है। इस तरह कुछ निश्चित प्रतीकों की सीमा में बँधकर भी ग़ज़ल में व्यापकता है। प्रभाव ग़ज़ल का गुण विशेष है, क्योंकि प्रेम, समर्पण और करुणा ग़ज़ल की आत्मा है, इनकी अभिव्यक्ति के लिए कोमल, सरस शब्दों का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है। शब्द केवल अर्थ के लिहाज से ही नहीं, ध्वनि में भी कोमल होने चाहिए। गीतात्मकता ग़ज़ल का प्राण है। शब्दों के सही रख-रखाव, बन्दिशों की चुस्ती, और अनुभूति के तीखेपन के साथ एक खास रंग होता है ग़ज़ल का, जिसके बिना ग़ज़ल निष्प्राण देह है। तग़ज़्जुल से शेर में जीवन का संचार होता है।”3 अदम ने ग़ज़ल की इस क्लासिक परिभाषा को तोड़ा ज़रूर है लेकिन ग़ज़ल उनकी ग़ज़लों में मौजूद है। उर्दू में ग़ज़ल शब्द की उत्पत्ति को ग़ज़ल से माना गया है जिसका अर्थ है प्रेमियों का आत्मीय वार्तालाप। अदम की ग़ज़लें गुफ्तगू  करती हैं लेकिन, महबूब से नहीं हाकिमों से, मुख्तारों से, पूँजीपतियों से और आततायी सत्ता से। उनकी ग़ज़ल यहाँ प्रतीकों और मुहावरों में तो शास्त्रीयता का निर्वाह करती है लेकिन लीक से हटकर तीखेपन के साथ! उर्दू की ग़ज़लगोई  की  ग़ज़ल बरकरार रखते हुए। वे हिन्दी की ग़्ाज़ल में दुष्यंत के उत्तराधिकारी बनकर आए थे। “दुष्यंत ने अपनी ग़्ाज़लों से शायरी की जिस नई ‘राजनीति’ की शुरुआत की थी, अदम ने उसे मुकाम तक पहुँचाने की कोशिश की है जहाँ से एक-एक चीज बगैर किसी धुँधलके के पहचानी जा सके। यह शायरी, एक अर्थ में, सचमुच शायरी कम है सीधी बात कहीं अधिक है। इस रूप में यह एक ऐसी आपदधर्मी कला है, जो आग की लपटों के बीच धूँ-धूँ जलती बस्तियों को बचाने के लिए आगे आती है।”4
    नई भाषा, रचाव और मुहाविरेदानी के साथ ग़्ाज़ल की मुलायमियत को आक्रामक तेवर में तब्दील कर अदम हिन्दी ग़्ाज़ल परंपरा का विकास तो करते हैं लेकिन परंपरा भंजक बनकर। उसका अनुसरण करके नहीं। रवीन्द्र प्रभात हिन्दी और उर्दू ग़्ाज़ल की परंपरा में भेद करते हुए इस प्रकार टिप्पणी करते हैं-“उर्दू ग़्ाज़ल मुख्यतः प्रेम-भावनाओं का चित्रण है। अच्छी ग़्ाज़लें वही समझी जाती हैं, जिसमें इश्को-मुहब्बत की बातें सच्चाई के साथ लिखी जाएँ, जबकि हिन्दी ग़्ाज़लकार इस परिभाषा को नहीं मानते। इनका उर्दू ग़्ाज़लकारों से सैद्धान्तिक मतभेद है।’’ नचिकेता का मानना है कि ‘हिन्दी ग़्ाज़ल उर्दू ग़्ाज़लों की तरह न तो असम्बद्ध कविता है और न इसका मुख्य स्वर पलायनवादी है, इसका मिजाज समर्पणवादी भी नहीं हैं। ज़हीर कुरैशी का मानना है कि-‘हिन्दी प्रकृति की ग़्ाज़लें आम आदमी की जनवादी  अभिव्यक्ति हैं, जो सबसे पहले अपना पाठक तलाश करती हैं।’ जबकि ज्ञान प्रकाश विवेक का कहना है कि हिन्दी कवियों द्वारा लिखी जा रही ग़्ाज़ल में शराब का जिक्र नहीं होता, जिक्र होता है गंगाजल में धुले तुलसी के पत्तों का, पीपल की छाँव का, नीम के दर्द का, आम-आदमी की तकलीफों का। हिन्दी भाषा में लिखा जा रहा हर शेर जिंदगी का अक्स होता है। बहुत नज़दीक से महसूस किए गए दर्द की अभिव्यक्ति होता है।”5 लेकिन क्या इन परिभाषाओं से अदम की शायरी मेल खाती है? गंगाजल के विषय में वे क्या कहते हैं?-
गंगाजल अब बुर्जुआ तहज़ीब की पहचान है।
तिश्नगी को वोदका के आचमन तक ले चलो।।

    बगैर उर्दू की मुहाविरेदानी के गजल  कही जा सकती है। स्वयं अदम ने ही शुद्ध हिन्दी में ग़्ाज़लें कही हैं:-
मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की।
ये समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की।।

    लेकिन, उनकी प्रभावी ग़्ाज़लें वही हैं जिनमें उर्दू गजल का लबो-लहज़ा है। यह बात और है कि उनकी भाषा क्लिष्ट नहीं होने पाती है। ‘प्रेमचंदी हिन्दुस्तानी’, जो गँवई-गँवार की, आम-अवाम की  भी भाषा है अपने रचाव और अनुभूति की तीव्रता से व्यंग्य की मारक क्षमता बढ़ाती है।
    ‘समय से मुठभेड़’ संग्रह में तिरसठ गजलें  हैं, चैदह कत्आत हैं और तीन लंबी नज़्में हैं-
(क)-हथियार उठा ले
(ख)-चमारों की गली, और
(ग)-गाँव का परिवेश
    सर्वप्रथम हम ग़्ाज़लों पर चर्चा करेंगे फिर क़त्आत और नज़्मों पर। ग़्ाज़लें प्रायः छोटी और मध्यम बहर की हैं। एक ग़्ाज़ल कुछ लंबी बहर की भी है-
कहीं फागुन की दिलकश शाम फाकों में गुजर जाए।
मेरा दावा है इसके हुस्न का जादू उतर जाए।।
तखय्युल में तेरे चेहरे का खाक़ा खींचने बैठे।
बड़़ी हैरत हुई जब अक्स रोटी के उभर आए।।

    किन्तु यह भी मध्यम बहर की ग़्ाज़ल ही कही जाएगी। लंबी बहर की ग़्ाज़लें उर्दू में फिराक, इकबाल जैसे शायरों  ने लिखी हैं। उदाहरण के लिए लंबी बहर का एक शेर द्रष्टव्य है-
मैं फासला हूँ मुझे मिटा दो कि मेरे मिटने से दिल मिलेंगे,
मैं जब तलक दरमियाँ रहूँगा न फस्ले-गुल में भी गुल खिलेंगे।
-फिराक गोरखपुरी

    अदम के यहाँ पहले तो व्यवस्था पर चोट है फिर श्रम की महत्ता है। किसान, मजदूर की पक्षधरता है। जनता (सर्वहारा) की शक्ति पर यकीन है क्योंकि वे प्रतिबद्ध माक्र्सवादी हैं। क्रांति करने के लिए वे हथियार उठाने तक के लिए तैयार हैं। सबसे मारक है व्यंग्य, जो तिलमिलाने पर मजबूर करता है। व्यंग्य इसलिए भी मजबूत है क्योंकि उनकी कर्मभूमि अवध है और मातृभाषा अवधी है। अवधीभाषी अच्छे व्यंग्य करते हैं क्योंकि अवधी भाषा अपने सामान्य वार्तालाप में ही व्यंग्यात्मक है। व्यंग्यात्मकता अदम के शेरों में चिंगारी की तरह व्याप्त है। उदाहरण के लिए कुछ शेर देखे जा सकते हैं-
जो डलहौजी न कर पाया वो ये हुक्काम कर देंगे,
कमीशन दो तो हिंदुस्तान को नीलाम कर देंगे।
    कुछ राजनैतिक और अत्यंत चर्चित व्यंग्यात्मक शेर-
काजू भुने प्लेट में व्हिस्की गिलास में,
उतरा है रामराज विधायक निवास में।
पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत,
इतना असर है खादी के उजले लिबास में।

यथा
कोई भी सरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले,
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है।

-संतोष अर्श
क्रमस:
लोकसंघर्ष पत्रिका  के दिसम्बर 2014 के अंक में प्रकाशित

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

उबर, पूंजीवाद, प्रतिद्वंद्विता और इजारेदारी

उबर कांड ने दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक में एक भारी हलचल पैदा की है। सारी दुनिया में अभी इस कंपनी का शोर है। मात्र चार साल पहले सैन फ्रांसिस्को में यात्रियों को बड़ी और आलीशान गाडि़यों की सुविधा आसानी से मुहैय्या कराने के उद्देश्य से बनायी गई इस कंपनी ने देखते ही देखते सारी दुनिया के पूरे टैक्सी बाजार पर अपना प्रभुत्व कायम कर लेने का आतंक पैदा कर दिया है। अब तक 50 देशों के 230 शहर में इसने अपने पैर पसार लिये हैं और हर हफ्ते इसके दायरे में एक नया शहर आता जा रहा है। चार साल पहले की इस मामूली कंपनी की आज बाजार कीमत 40 बिलियन डालर कूती जा रही है।
उबर और ऐसी ही सिलिकन वैली की दूसरी तमाम कंपनियों के इस विश्व.प्रभुत्व अभियान ने दुनिया में प्रतिद्वंद्विता बनाम इजारेदारी की पुरानी बहस को फिर एक बार नये सिरे से खड़ा कर दिया है। दिल्ली की सत्ता के गलियारों में गृह मंत्रालय और परिवहन मंत्री के परस्पर.विरोधी बयानों में भी कहीं न कहीं, सूक्ष्म रूप से ही क्यों न हो, उसी वैचारिक द्वंद्व की गूंज सुनाई देती है।
व्यापार और वाणिज्य की दुनिया में यह एक अनोखे प्रकार का घटनाक्रम है। मार्क्स ने पूंजीवाद के तहत पूंजी के संकेंद्रण को पूंजीवाद की नैसर्गिकता बताया था। सामान्य तौर पर मार्क्स के उस कथन की 'बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है' की तरह के मतस्य.न्याय से तुलना की जाती रही है। इसके मूल में संकेन्द्रण की प्रक्रिया को दर्शाने वाला मार्क्स का यह कथन था कि संपत्तिहरणकारियों का संपत्तिहरण होता है। लेकिन आज जिस प्रकार कुकुरमुत्तों की तरह विश्व इजारेदारी कायम करने वाली ढेर सारी कंपनियों का कोलाहल सुनाई दे रहा हैए इस प्रकार के नये परिदृश्य का इससे कोई भान नहीं होता था। इस लिहाज से यह एक बिल्कुल नयी परिघटना प्रतीत होती है . जिसे आज के अर्थशास्त्री'नेटवर्किंग एफेक्ट' ;इंटरनेट की संतानें बताते हैं। इंटरनेट के तानेबाने से उत्पन्न एक नयी सामाजिक परिघटना। इसीकी रोशनी में इजारेदारी बनाम प्रतिद्वंद्विता की बहस ने भी आज एक नया आयाम ले लिया है।
पूंजीवादी अर्थशास्त्री आज तक प्रतिद्वंद्विता को पूंजीवाद की सबसे बड़ी आंतरिक शक्ति, उसकी आत्मा बताते रहे हैं। पूंजीवाद के निरंतर विकास और उसकी सामाजिक प्रासंगिकता का तथाकथित प्रमुख स्रोत य बाजार का मूल तत्व। इसके बरक्श पूंजीवाद के पैरोकार इजारेदारी को हमेशा एक सामाजिक बुराई, एक विचलन के तौर पर देखते हैं,जो उनके अनुसार पूंजीवाद की आंतरिक गतिशीलता काए उसकी आत्मा का हनन करती है और व्यापक समाज का भी अहित करती है। अमेरिका सहित सभी विकसित पूंजीवादी देशों के संविधान में इजारेदारी को रोकने के कानूनी प्राविधान है और गाहे.बगाहे इन प्राविधानों का अक्सर प्रयोग भी किया जाता रहा है। भारत में भी उन्हीं की तर्ज पर बदस्तूर एमआरटीपी एक्ट बना हुआ है।
अमेरिकी इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं जब राज्य की ओर से सीधे हस्तक्षेप करके आर्थिक इजारेदारियों को तोड़ने के कदम उठाये गये। अमेरिकी राष्ट्रपति थियोडर रूजवेल्ट को तो इतिहास में'ट्रस्ट बस्टर' अर्थात 'इजारेदारी भंजक' की ख्याति प्राप्त हैए जिन्होंने 1901.1909 के अपने शासन काल में 44 अमेरिकी इजारेदार कंपनियों को भंग किया था। अमेरिका में सबसे पहला इजारेदारी.विरोधी कानून शरमन एंटी ट्रस्ट एक्ट 1850 में बना था। उसके बाद क्लेटन एंटी ट्रस्ट एक्ट और फेडरल ट्रेड कमीशन एक्ट ;1914द्धए रॉबिन्सन.पैटमैन एक्ट ;1936, तथा सेलर.केफोवर एक्ट ;1850,ध आदि कई कानून बने। अमेरिका में कंपनियों की इजारेदाराना हरकतों को लेकर हमेशा अदालतों में कोई न कोई मुकदमा चलता ही रहता है।
लेकिनए आज वेंचर कैपिटल के सहयोग से कुकुरमुत्तों की तरह अमेरिकी गराजों से विश्व विजय पर निकलने वाली इन नये प्रकार की इजारेदाराना कंपनियों के सिलसिले में यह सवाल उठाया जा रहा है कि क्या सचमुच इजारेदारी पूंजीवाद की आंतरिक ऊर्जा को सोखती है और समाज का अहित करती है? आज की दुनिया की सबसे बड़ी माने जानी वाली कंपनियां माइक्रसोफ्ट, गूगल, एपल, फेसबुक आदि सब रास्ते के छोकरों का ऐसा करिश्मा है जिसकी पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। और आज इन कंपनियों की स्थिति यह है कि इनसे सारी दुनिया की सरकारें एक स्तर पर खौफजदा होने पर भी कोई इनसे आसानी से किनारा करने के लिये भी तैयार नहीं है। सबके लिये'न निगलते बने न उगलते बने' वाली स्थिति बनी हुई है। खुद अमेरिका में भी यही हाल है। पिछले दिनों अमेरिकी अदालतों में माइक्रोसोफ्ट,गूगल आदि को लेकर जितने भी मुकदमे चले, उन सबमें न्यायाधीशों ने इन कंपनियों के बारे में कोई साफ राय देने में अपने को लगभग असमर्थ पाया है। इनपर रोक, या इन्हें भंग करने के बजाय अधिकांश फैसलें इन्हें आगे एहतियात बरत कर चलने की हिदायत देने तक सीमित रहे हैं। इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है गूगल पर इजारेदारी कायम करने के लिये चलाये गये मुकदमे का परिणाम। इसमे गूगल को सिर्फ डांट पिला कर छोड़ दिया गया। जानकारों का कहना है कि उससे गूगल के काम करने के ढंग में जरा सा भी फर्क नहीं आया है।
सारी दुनिया में इंटरनेट और मोबाइल के जरिये भुगतान करने की सुविधा उपलब्ध कराने वाली कंपनी पे पॉल के संस्थापक पीटर थियेल की अभी इसी सितंबर महीने में किताब आई है . जीरो टू वन ;नोट्स आन स्टार्ट्स अप ऑर हाउ टू बिल्ड द फ्यूचर,। थियेल ही है जिसने जुकरबर्ग के फेसबुक में सबसे पहले निवेश किया था। अपनी इस किताब में थियेल ने प्रतिद्वंद्विता के प्रति सामान्य तौर पर अर्थशास्त्रियों और सरकारों के अति.आग्रह को लताड़ते हुए कहा कि यह सोच कि प्रतिद्वंद्विता से ग्राहक को लाभ होता हैए इतिहास के कूड़े पर फेंक देने लायक सोच है। प्रतिद्वंद्विता सफलता की नहीं विफलता की द्योतक है। किसी भी समस्या के समाधान के 'एकमात्र' हल को प्राप्त करना ही सफलता है और इसीलिये इजारेदारी में ही समाज का हित है।
मार्क्स ने पूंजीवाद के तहत उत्पादन के साधनों के क्रांतिकारण की जिस लगातार और अनिवार्य प्रक्रिया की बात कही थी, थियेल लगभग उसी बात को थोड़े दूसरे अंदाज में, नाक को घुमा कर पकड़ने के अंदाज में कह रहा है। कम्युनिस्ट घोषणापत्र में कहा गया था कि 'उत्पादन के औजारों में क्रांतिकारी परिवर्तन और उसके फलस्वरूप उत्पादन संबंधों में, और साथ.साथ समाज के सारे संबंधों में क्रांतिकारी परिवर्तन के बिना पूंजीपति वर्ग जीवित नहीं रह सकता। .उत्पादन प्रणाली में निरंतर क्रांतिकारी परिवर्तन, सभी सामाजिक अवस्थाओं में लगातार उथल.पुथल, शाश्वत अनिश्चयता और हलचल . ये चीजें पूंजीवादी युग को पहले के सभी युगों से अलग करती है। सभी स्थिर और जड़ीभूत संबंधए जिनके साथ प्राचीन और पूज्य पूर्वाग्रहों तथा मतों की एक पूरी श्रंखला होती हैए मिटा दिये जाते हैं, और सभी नये बननेवाले संबंध जड़ीभूत होने के पहले ही पुराने पड़ जाते हैं। जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है, जो कुछ पावन है, वह भ्रष्ट हो जाता हैए और आखिरकार मनुष्य संजीदा नजर से जीवन की वास्तविक हालतों को, मानव मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है।'
घोषणापत्र में व्यक्त यह सचाई आज और भी प्रकट रूप में हमारे सामने हैं। प्रतिद्वंद्विता को पूंजीवाद की पवित्र आत्मा मानने वाले पूंजीवादी अर्थशास्त्री उसके अंदर की खोजपरकता ;पददवअंजपअमदमेेद्ध में निहित बाजार पर इजारेदारी कायम करने की प्रवृत्ति पर पर्दादारी करते हैं और पूंजीवाद को आर्थिक जनतंत्र के साथ, बहुलता के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा बताते हैं। पूंजीवाद के सबसे उल्लेखनीय प्रवक्ता जोसेफ शुम्पेतर ने '30 के दशक में ही नयी खोज के जरिये बाजार पर कब्जा करने के सच को लक्षित किया था, लेकिन पीटर थियेल ने तो अपनी किताब के जरिये पूंजीवाद के तहत इजारेदारी का पूरा शास्त्र ही रच दिया है। वे अपनी किताब में उद्यमियों को प्रतिद्वंद्विता की नहीं, इजारेदारी कायम करने की सीख देते हैं। उसकी दृष्टि में'रतिद्वंद्विता तो पराजितों का राग है। आप यदि टिकाऊ मूल्य पैदा और प्राप्त करना चाहते हैं तो इजारेदारी कायम करो।'
'जीरो टू वन' के प्राक्कथन की पहली पंक्ति ही है .' व्यापार में हर क्षण सिर्फ एक बार घटित होता है। अगला बिल गेट्स ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं बनायेगा। अगला लैरी पेज या सर्गे ब्रिन सर्च इंजन नहीं बनायेगा। और अगला जुकरबर्ग सोशल नेटवर्क तैयार नहीं करेगा। आप यदि इन लोगों की नकल कर रहे हैं तो आप उनसे कुछ नहीं सीख रहे हैं।'
आज सिलिकन वैली की गूगल, माइक्रोसोफ्ट की तरह की तमाम कंपनियों के बीच भी कभी.कभी प्रतिद्वंद्विता के जो चिन्ह दिखाई देते हैंए वे बेहद कमजोर से चिन्ह हैं। सचाई यह है कि सिलिकन वैली की तमाम कंपनिया उन क्षेत्रों से अपने को धीरे.धीरे हटा लेती हैए जिन क्षेत्रों में एक कंपनी ने बढ़त हासिल कर ली है। और जो दूसरे उपेक्षित क्षेत्र, जिनकी ओर अभी दूसरों का ध्यान नहीं गया है, उन पर अपने को केंद्रित करती है। विश्व विजय में उतर रहे उबर की तरह के नये रणबांकुरे भी अभी किसी भी क्षेत्र में सीधे ताल ठोक कर किसी पहले से स्थापित कंपनी से प्रतिद्वंद्विता के लिये काम नहीं कर रही है। इस मामले में उनकी दृष्टि हमारे'एक और ब्रह्मांड'के नायक राधेश्याम जैसी ही है, जिसने स्थापित ब्रांडों से टकराते हुए अपना ब्रांड बनाने के बजाय 'किसी निर्जन या उजड़े हुए पथ पर ही अपनी बांसुरी की तान छेड़ना श्रेयस्कर समझा। प्रसाधन के आधुनिक क्षेत्र के बजाय पुरातन, आयुर्वेद के क्षेत्र का चयन किया। आज की चकदक पैकिंग में आयुर्वेदिक उत्पाद . रॉक की थाप पर 'रघुपति राघव राजा राम'. आधुनिकता की प्रक्रिया में पूर्व.आधुनिक सम्मोहन की छौंक का उत्तर.आधुनिक सौन्दर्यशास्त्र.पुरातन के इंद्रजाल पर टिका एक सर्वाधुनिक रास्ता।'
फेसबुक को देखिये। छात्रों के एक समूह के बीच आपसी संपर्कों के उद्देश्य से तैयार किया गया सोशल नेटवर्किंग साइट रातो.रात सारी दुनिया में अरबों लोगों के बीच संपर्कों का साइट बन गया। यह एक खास सामाजिक परिस्थिति की उपज भी है। जब तक व्यापक पैमाने पर लोगों के हाथ में मोबाइल फोन या टैब्लेट, कमप्यूटर न होए तब तक इसप्रकार के पूरे संजाल और उसपर आधारित इन नयी इजारेदारियों की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
समग्र रूप से आज विश्व अर्थनीति की परिस्थितियां किस दिशा में जा रही है, उसका एक ब्यौरा मिलता है सन माउक्रोसिस्टम्स के सह.संस्थापक,कमप्यूटर तकनीक के क्षेत्र के एक बादशाह विनोद खोसला की 11 जून 2014 की'फोर्ब्स' पर लगायी गयी पोस्ट से। चीज़ें जिस गति से बदल रही है, वास्तव में उसका आसानी से अंदाज भी नहीं लगाया जा सकता है ।
विनोद खोसला कमप्यूटर की दुनिया का एक विश्वप्रसिद्ध नाम है, जिसने कमप्यूटर की जावा प्रोग्रामिंग की भाषा और नेटवर्क फाइलिंग सिस्टम को तैयार करने में प्रमुख भूमिका अदा की थी। आज उनकी कंपनी खोसला वेंचर्स सूचना तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में एक हैं। अपनी इस पोस्ट,
The Next Technology Revolution Will Drive Abundance And Income Disparity;अगली तकनीकी क्रांति समृद्धि और आमदनी में असमानता लायेगी की शुरूआत ही वे इस बात से करते हैं कि आगे आने वाले समय में और भी बड़ी.बड़ी तकनीकी क्रांतियां होने वाली हैंए लेकिन जिस एक चीज का मनुष्य पर सबसे अधिक असर पड़ेगा, वह है ऐसी प्रणालियों का निर्माण जिनमें मनुष्य की विचार करने की शक्ति से कहीं ज्यादा गहराई से विचार करने कीए निर्णय लेने की क्षमताएं होगी। विचारशील मशीन, जिसे दूसरे शब्दों में कृत्रिम बुद्धि कहा जाता हैए उसमें जटिल से जटिल विषयों पर निर्णय लेने में समर्थ तकनीकी प्रणाली के निर्माण की दिशा में बड़ी तेजी से काम चल रहा है। उदाहरण के तौर परए पांच साल पहले तक गाड़ी चलाना कमप्यूटर के लिये एक बेहद कठिन चीज समझी जाती थी, लेकिन अब यह एक सचाई बन चुकी है।
खोसला लिखते हैं कि इस बात पर बिना मगजपच्ची किये कि क्या.क्या संभव है, कम से कम इतना जरूर कहा जा सकता है कि सृजनात्मकता के क्षेत्र में,भावनाओं और समझदारी के क्षेत्र मेंए मसलन,श्रोताओं को मुग्ध करने वाली संगीत की सबसे अच्छी बंदिश, पाठकों के मन को छूने वाली प्रेम कहानी या अन्य रचनात्मक लेखन में तो यह प्रणाली बहुत ही कारगर साबित होगी, क्योंकि उसके पास श्रोताओं और पाठकों को छूने वाले तमाम पक्षों और संगीत तथा लेखन के अब तक के विकास की पूरी जानकारी होगी।
इस विषय पर आगे और विस्तार से जाते हुए खोसला बताते हैं कि मनुष्य की श्रम.शक्ति और मानवीय विचारशीलता की जरूरत जितनी कम होगी, पूंजी की तुलना में श्रम शक्ति की और विचारशील मशीन की तुलना में मनुष्य के विचारों की कीमत उतनी ही कम होती जायेगी। 'प्रचुरता और आमदनी में बढ़ती हुई विषमता के युग में हमें पूंजीवाद के एक ऐसे नये संस्करण की जरूरत पड़ सकती है जो सिर्फ अधिक से अधिक दक्षता के साथ उत्पादन पर केन्द्रित न रह कर पूंजीवाद के अन्य अवांछित सामाजिक परिणामों से बचाने के काम पर केन्द्रित होगा।'
अपने इस लेख में खोसला ने विचारवान मशीन के निर्माण के उन तमाम क्षेत्रों की ठोस रूप में चर्चा की हैं जिनमें खुद उनकी कंपनी तेजी से काम कर रही है और जिनके चलते खेतिहर मजदूरों, गोदामों में काम करने वाले मजदूरों,हैमबर्गर बनाने वालों, कानूनी शोधकर्ताओं,वित्तीय निवेश के मध्यस्थों तथा हृदय रोग और ईएनटी रोग के विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों आदि की कोई जरूरत नहीं रह जायेगी। इनके कामों को मशीनें कहीं ज्यादा दक्षता के साथ कर दिया करेगी।
उनका साफ कहना है कि अतीत के आर्थिक इतिहास में, हर तकनीकी क्रांति से जहां कुछ प्रकार के रोजगार खत्म हुए तो वहीं कुछ दूसरे प्रकार के रोजगार पैदा हुए। लेकिन आगे ऐसा नहीं होगा। 'आर्थिक सिद्धांत मुख्य रूप से कार्य.कारण के बजाय अतीत के अनुभवों पर टिके होते हैंए लेकिन यदि रोजगार पैदा करने के मूल चालक ही बदल जाए तो उसके परिणाम बिल्कुल अलग होसकते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से तकनीक आदमी की क्षमताओं को बढ़ाती और तीव्र करती रही है, जिससे मनुष्य की उत्पादनशीलता बढ़ी है। लेकिन यदि किसी भी ख़ास काम के लिये बुद्धि और ज्ञान, इन दोनों मामलों में बुद्धिमान मशीन आदमी से श्रेष्ठ बन जाती है तो कर्मचारियों की कोई जरूरत ही नहीं रह जायेगी और इसके चलते आदमी का श्रम दिन प्रति दिन सस्ता होता जायेगा।' उनकी राय में कोई भी आर्थिक सिद्धांत बेकार साबित होगा यदि उसमें अतीत की तकनीकी क्रांतियों और इन नयी विचारशील मशीनी तकनीक के बीच के फर्क की समझ नहीं होगी।
इस सिलसिले में खोसला कार्ल मार्क्स को उद्धृत करते हैं .'इतिहास की गाड़ी जब किसी घुमावदार मोड़ पर आती है तो बुद्धिजीवी उससे झटक कर औंधे मूंह गिर जाते हैं।' अर्थशास्त्रियों का अतीत के अनुभवों को अपना अधिष्ठान बनाने का ढंग भविष्य के लिये वैध साबित नहीं होगा । एक नये कार्य.कारण संबंध से पुराने,ऐतिहासिक परस्पर.संबंध टूट सकते हैं। जो लोग कमप्यूटरीकरण से रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव का हिसाब.किताब किया करते हैं, और अब भी कर रहे हैं,वे इस बात को समझ ही नहीं रहे हैं कि आगे तकनीक क्या रूप लेने वाली है और उनके सारे अनुमान अतीत के अनेक'सत्यों' की तरह झूठे साबित हो सकते हैं।
खोसला की तरह पीटर थियेल ने भी अपनी किताब में इजारेदारी के पक्ष में यही दलील दी है कि इजारेदारी से दुनिया में एक बिल्कुल नये प्रकार की समृद्धि पैदा होती है। इजारेदारी के तहत होने वाली खोजों से जिन्दगी नये रूप में संवरती है। 1911 में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने जब ट्रस्ट विरोधी कानून के जरिये स्टैंडर्ड ऑयल कंपनी को 34 अलग.अलग कंपनियों में विभाजित कर दिया था, उस फैसले में भी इस तथ्य को नोट किया गया था कि 1880 से तेल के व्यापार पर एकाधिकार बनाये रखने वाली इस कंपनी ने अतीत में कुछ ऐसे काम भी किये है जिनसे उपभोक्ता का और पूरे समाज का भला हुआ था। मसलन, इसी कंपनी ने केरोसिन तेल को इजाद किया जो जलकर चमकता हैए लेकिन उसमें विस्फोट नहीं होता, जबकि बाकी सभी ज्वलनशील तेल में चमक के साथ ही विस्फोट हो जाता है। उस कंपनी ने शोध कार्य और दूसरी ढांचागत सुविधाओं के विकास में अच्छा खास निवेश किया था। उसीने कई प्रकार की चिकनाई वाले तेल भी विकसित किये। ये सारे काम तेल के क्षेत्र में इजारेदारी और भारी पूंजी की उपलब्धता के बिना संभव नहीं हो सकते थे।
इन्हीं तमाम तथ्यों की रोशनी में खोसला ने अपनी पोस्ट में साफ कहा है कि वे पूंजीवाद के कट्टर समर्थक है और इसी नाते वे साफ शब्दों में कहते हैं कि आज जो कुछ चल रहा हैए उसे अबाध गति से और भी तेजी के साथ चलने दिया जाना चाहिए। खोसला की इस पोस्ट पर पिछले दिनों अपने ब्लाग में इस लेखक ने एक टिप्पणी की थी। उसमें हमने श्रम का कोई मूल्य न रह जाने वाले उनके कथन के पहलू पर यह बुनियादी सवाल उठाया था कि यदि किसी समाज में श्रम शक्ति का मूल्य नहीं रहता तो फिर पूँजी का भी क्या मूल्य रह जायेगा ?श्रमिक और पूँजीपति का अस्तित्व परस्पर निर्भर है । यदि पूँजीपति की भूमिका उत्पादन के काम में ख़त्म हो जाती है तो श्रमिक की तरह ही उसके अस्तित्व का भी कोई कारण बचा नहीं रह जाता है। अगर कुछ बचा रह जाता हैए तो वह है, राज्य की भूमिका । ऐसे में हमारा यह निष्कर्ष था कि समाज के अंदर वर्गीय अन्तर्विरोधों के अंत के साथ राज्य के वर्गीय चरित्र का भी लोप हो जाता है । हमने पूछा था, क्या सचमुच, एक शोषण.विहीन, राज्य.विहीन समाज के निर्माण का मार्क्स का यूटोपिया आदमी की जद के इतना क़रीब है?
बहरहाल, तेजी के साथ कुकुरमुत्तों की तरह पनप रही नाना प्रकार की इजारेदारियों और तमाम सामाजिक संबंधों में आने वाले भूचाल को देखते हुए पिटर थियेल और बिनोद खोसला जिस साफगोई के साथ पूंजीवाद के सच का बयान कर रहे हैं,उससे कम्युनिस्ट घोषणापत्र से लिये गये उपरोक्त उद्धरण की उस बात की एक साफ झलक मिलती है जिसमें कहा गया था कि' जो कुछ भी ठोस है वह हवा में उड़ जाता है,जो कुछ पावन है, वह भ्रष्ट हो जाता है, और आखिरकार मनुष्य संजीदा नजर से जीवन की वास्तविक हालतों कोए मानव मानव के आपसी संबंधों को देखने के लिए मजबूर हो जाता है।' थियेल और खोसला जिस संजीदगी से जीवन की मौजूदा वास्तविक स्थिति को देख पा रहे हैंए वह पारंपरिक अर्थशास्त्रियों की दृष्टि पर छाये हुए कोरे भ्रमों से पूरी तरह मुक्त है। थियेल साफ कहता है कि अमेरिकी प्रतिद्वंद्विता को एक मिथक बना दे रहे हैं और इस बात का श्रेय लेते है कि वे इसके जरिये समाजवाद से रक्षा कर रहे हैं। सच यह है कि पूंजीवाद और प्रतिद्वंद्विता दो विरोधी चीजें हैं। पूंजीवाद पूंजी के संचय पर टिका हुआ हैए लेकिन वास्तविक प्रतिद्वंद्विता की परिस्थिति में तो सारा मुनाफा प्रतिद्वंद्विता की भेंट चढ़ जायेगा।'
थियेल साफ कहता है कि पेटेंट देने के काम के जरिये सरकार का एक विभाग भी तो इजारेदारी कायम करने के काम में ही लगा हुआ है।
'इकोनोमिस्ट' पत्रिका के एक ताजा अंक में, इजारेदारियों से आच्छादित इस पूरे आर्थिक परिदृश्य के वृत्तांत के अंत में अमेरिकी सिनेटर जॉन सरमैन के इस कथन को उद्धृत किया गया है कि'हमें उत्पादन, परिवहन और जीवन की जरूरत की किसी भी चीज के विपणन के लिये शहंशाह की कामना नहीं करनी चाहिये, भले वे हमारे लिये चीजों को कितना भी आसान क्यों न बनाते हो।' इसप्रकारए सरमैन अभी भी, वही पुराना पूंजीवाद और प्रतिद्वंद्विता, पूंजीवाद और जनतंत्र तथा पूंजीवाद और बहुलतावाद वाला राग ही अलाप रहे हैए जबकि जो सच सामने आरहा है वह इन सबके सर्वथा विपरीत है। पूंजीवाद की नैसर्गिकता प्रतिद्वंद्विता में नहीं,जनतंत्र में नहीं और न ही बहुलतावाद में है। पूंजीवाद का अन्तर्निहित सच है इजारेदारी, तानाशाही और एकरूपता। इसीलिये यह सभ्यता के सच्चे जनतंत्रीकरण के रास्ते की एक पहाड़ समान बाधा है और, इसीलिये यह आश्चर्य नहीं है कि अमेरिका के खास हलकों में चीन का शासनतंत्र आजकल काफी ज्यादा चर्चा में हैं ! दिल्ली की सत्ता के गलियारे में भी उबर पर पाबंदी के फौरन बाद उतनी ही जोरदार आवाज में इस कदम के पीछे विवेक की कमी की आवाज का उठना भी अस्वाभाविक नहीं है। पूंजीवादी विकास का रास्ता सिर्फ और सिर्फ इजारेदारियों के जरिये ही आगे बढ़ सकता है।
-अरुण माहेश्वरी

क्या सभी भारतीय रामज़ादे हैं ?

भारत में साम्राज्यवाद.विरोधी आंदोलन के दौरान, महात्मा गांधी देश के शीर्षतम नेता के रूप में उभरे और उन्हें राष्ट्रपिता का दर्जा दिया गया। गांधीजी के लिए राष्ट्रपिता शब्द का इस्तेमाल सबसे पहले सुभाषचंद्र बोस ने सन् 1944 में अपने एक रेडियो भाषण में किया था। बाद में, बहुसंख्यक भारतीयों ने इस नामकरण को स्वीकार किया और अपनाया। कहने की आवश्यकता नहीं कि मुस्लिम और हिंदू सांप्रदायिक तत्वों ने गांधीजी को कभी राष्ट्रपिता नहीं माना। उन अधिकांश भारतीयों ने गांधीजी को राष्ट्रपिता के रूप में स्वीकार किया जो उनके नेतृत्व में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन में भागीदार थे और जो देश के सभी लोगों को एक करने में गांधीजी की भूमिका से प्रभावित थे।
भारत को 'निर्माणाधीन राष्ट्र' निरूपित किया गया न कि सदियों से अस्तित्व में रहा राष्ट्र, जैसा कि धार्मिक राष्ट्रवादी मानते थे। मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों के लिए मुस्लिम राष्ट्र स्थापित हुआ था 8वीं सदी ईस्वी में सिंध में मोहम्मद.बिन.कासिम के शासनकाल में। हिंदू सांप्रदायिक तत्वों की दृष्टि में भारत हमेशा से हिंदू राष्ट्र था।  गांधीजी ने सभी भारतीयों के बीच बंधुत्व का भाव विकसित करने के लिए महती प्रयास किए और इसलिए हिंदू.मुस्लिम एकता उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। यह तार्किक भी था,क्योंकि तत्कालीन भारत में ये ही दो मुख्य धार्मिक समुदाय थे। गांधीजी ने सभी धर्मों के नैतिक मूल्यों को अपनाया और वे विभिन्न धार्मिक समुदायों के लोगों को 'भारतीय' पहचान के झंडे तले लाने में सफल रहे। उनके प्रयासों का सांप्रदायिक ताकतों ने पूरी ताकत से विरोध किया और इस विरोध की अंतिम परिणिति थी सन् 1948 में उनकी हत्या।
उनकी हत्या के बाद भी संप्रदायवादियों का घृणा.आधारित प्रचार और देश को बांटने वाली गतिविधियां जारी रहीं। हां, समय के साथ उनका रूप बदलता गया। अधिकांश मुस्लिम संप्रदायवादी पाकिस्तान चले गए। जो भारत में रह गए, उनमें से उभरे अकबरउद्दीन ओवैसी जैसे लोग, जो हिंदुओं के खिलाफ घृणा फैलाने का काम करते रहे। इसके समानांतर, हिंदू सांप्रदायिक संगठनों ने इतिहास का सांप्रदायिकीकरण करना जारी रखा। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा लिखित भारत के इतिहास को मान्यता दी, जिसमें मुस्लिम राजाओं का दानवीकरण किया गया था और मुसलमानों को विदेशी बताया गया था। इसको आधार बनाकर कई मिथक खड़े किए गए। इस दानवीकरण का चरम था यह नारा कि 'बाबर की औलाद, जाओ कब्रिस्तान या पाकिस्तान'। इसी श्रृंखला में एक ताजा बयान यह है कि जो लोग अपनी पहचान को भगवान राम से जोड़कर नहीं देख सकते वे हरामजादे हैं और यह देश केवल रामजादों का है। सभी अन्य लोगों के साथ अजनबियों जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए।
इस बयान को आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत के उस हालिया वक्तव्य के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने फरमाया था कि हम सब हिंदू हैं और यह देश हिंदुस्तान है। इसका अर्थ यह है कि भगवान रामए हिंदुस्तान अर्थात भारत के प्रतीक हैं और शायद इसलिए, केंद्रीय मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति ने कहा कि 'मोदी ने यह मंत्र दिया है कि न तो हम रिश्वत लेंगे और न दूसरों को लेने देंगे। अब आपको यह तय करना है कि आप किसे चुनेंगे.रामजादों को या हरामजादों को'। यहां यह याद रखना प्रासंगिक होगा कि भारतीय संविधान इस देश को केवल इंडिया या भारत कहता है।
जहां विपक्ष ने साध्वी को मंत्रिमंडल से हटाए जाने की मांग की और उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही पर जोर दिया वहीं भाजपा यह कहकर उनका बचाव किया कि उन्होंने अपने कथन के लिए माफी मांग ली है और वे अभी.अभी मंत्री बनी हैं और दलित परिवार से हैं। विपक्ष का तर्क यह है कि उन्होंने भारतीय संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ ली है और उनका बयान, न केवल घृणा फैलाने वाला और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच बैरभाव बढ़ाने वाला है वरन् वे भारतीय संविधान का उल्लंघन करने की दोषी भी हैं। विपक्ष का कहना है कि उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 153.ए के तहत मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इस धारा के अंतर्गत दोषी पाए जाने पर तीन साल तक के कारावास की सजा हो सकती है। इस धारा के अंतर्गत मुकदमा चलाने के लिए सरकार की अनुमति आवश्यक है। यद्यपि हमारे देश में सभी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है परंतु यह स्वतंत्रता किसी को भी घृणा फैलाने की इजाजत नहीं देती। धारा 153.ए उन लोगों को अपराधी ठहराती है जो धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देते हैं या ऐसे कार्य करते हैं जिनसे देश की एकता पर विपरीत प्रभाव पड़ता हो। इस धारा के अंतर्गत हमारे देश के कई नेताओं पर मुकदमा चलाया जा सकता है। इनमें से कुछ हैं अकबरउद्दीन ओवैसी, राज ठाकरे, प्रवीण तोगड़िया और वरूण गांधी। ये सभी समय.समय पर 'दूसरे समुदाय' के विरूद्ध अनर्गल प्रलाप करते रहे हैं। इस तर्क में कोई दम नहीं है कि चूंकि साध्वी ज्योति दलित हैं इसलिए उन्हें क्षमा कर दिया जाना चाहिए। दरअसल,वे संघ की विचारधारा में पूरी तरह घुलीमिली हैं। इस तर्क की भी कोई प्रासंगिकता नहीं है कि सोनिया गांधी ने 'मौत के सौदागर' शब्द का प्रयोग किया था। उन्होंने इस शब्द का प्रयोग, सांप्रदायिकता के राजनैतिक इस्तेमाल की ओर इशारा करते हुए किया था न कि किसी विशेष धार्मिक समुदाय के संदर्भ में।
यद्यपि ऊपर से देखने पर ऐसा लगता है कि भाजपा नेतृत्व साध्वी के इस बयान से सहमत नहीं है परंतु सच यह है कि इस तरह के विचार और बयान, संघ परिवार की राजनीति से ही उपजते हैं और वही राजनीति, भाजपा को सत्ता में लाई है। भाजपाए संघ परिवार के हिंदू राष्ट्रवाद के एजेण्डे को लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। इस तरह की घृणा फैलाने वाली बातों और विभाजनकारी एजेण्डे का मुकाबला हम कैसे करें? हम सब को याद है कि अकबरउद्दीन ओवैसी को अपने भड़काऊ भाषणों के कारण कड़े विरोध और निंदा का सामना करना पड़ा था। इस सिलसिले में डाक्टर प्रवीण तोगड़िया कुछ दिनों के लिए जेल की मेहमानी भी कर चुके हैं। डाक्टर तोगड़िया उत्तेजक और भड़काऊ भाषा के इस्तेमाल में सिद्धहस्त हैं। एक वीडियो में उन्होंने यह बताया है कि कैसे अपने मुस्लिम पड़ोसियों पर टमाटर फेंककर उनसे छुटकारा पाया जा सकता है। परंतु वे अब तक सजा से बचते आए हैं। साध्वी ज्योति के वक्तव्य से मिलती जुलती बात उत्तरप्रदेश के भाजपा नेता रामप्रताप चौहान ने आगरा में 21 नवंबर 2013 को आयोजित शंखनाद रैली में कही थी परंतु उस पर मीडिया ने कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। इस सबसे यही पता चलता है कि साध्वी का वक्तव्य, संघ परिवार की सोच को ही प्रतिंबिबित करता है।
भाजपा का नेतृत्व दुविधा में है। संसद में और दुनिया को दिखाने के लिए उसे 'विकास' का मुखौटा पहनना पड़ता है। दूसरी ओरए अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए उसे अपने पितृसंगठन व उससे जुड़े अन्य संगठनों और पार्टी के भीतर के कई तत्वों के विघटनकारी एजेण्डे पर भी चलना पड़ता है। इसलिए बहुत होशियारी से पार्टी एक ओर साध्वी से माफी मंगवा देती है तो दूसरी ओर इस तरह की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए कुछ नहीं करती। जहां भी चुनाव होने वाले होते हैं वहां पार्टी अपने इस विभाजनकारी एजेण्डे का इस्तेमाल वोट पाने के लिए करती है।
प्रश्न यह है कि भारतीय राष्ट्र का पिता कौन है.गांधी या राम? राम एक पौराणिक चरित्र हैं जिनपर बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धा करते हैं। वे अयोध्या के राजा थे। रामकथा के प्रचलित संस्करण की डॉक्टर अंबेडकर द्वारा की गई आलोचना, साम्प्रदायिक जुनून के शोरगुल में गुम सी हो गई है। अपनी पुस्तक 'रिडल्स ऑफ हिन्दुइज्म' में अंबेडकर ने कहा है कि राम लैंगिक और जातिगत ऊंचनीच के समर्थक थे। राम ने शंबूक का वध किया था जोकि एक शूद्र था और तपस्या कर रहा था। इसकी अंबेडकर ने कड़ी आलोचना की है। इसी तरह, राम द्वारा अपनी गर्भवती पत्नी सीता को घर से निकालने का प्रसंग भी अत्यंत गंभीर है। अंबेडकर, राम द्वारा बलीराजा की हत्या का मुद्दा भी उठाते हैं। बली, दलित.बहुजनों के लोकप्रिय राजा थे और उन्हें राम ने पीछे से हमला कर मारा था। राम के बारे में इसी तरह के कई मुद्दे पेरियार रामासामी नाईकर ने भी उठाए थे।
जहां यह दावा किया जाता है कि हम हमेशा से हिंदू राष्ट्र रहे हैं वहीं सच यह है कि भारत,गांधीजी के नेतृत्व में चलाए गए साम्राज्यवाद.विरोधी आंदोलन के कारण राष्ट्र.राज्य के रूप में उभरा। इसलिए यह कहना कि सभी भारतीय रामजादे हैं कोरी बकवास है। निःसंदेह, अनेक हिन्दू राम के पूजक हैं परंतु भारतीय के रूप में गांधी हमारे राष्ट्रपिता हैं। राम, हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रतीक हैं जबकि गांधी भारतीय राष्ट्रवाद के।
सन् 2014 में मोदी के सत्ता में आने के बाद से आरएसएस बैखोफ होकर अपना एजेन्डा लागू कर रहा है। उन लोगों को डराया.धमकाया जा रहा है जो भारतीय संविधान और स्वाधीनता आंदोलन के मूल्यों के पैरोकार हैं। रामजादे को भारतीयता का पर्यायवाची बताने के प्रयासए दरअसल, उन ताकतों को मजबूती देने की कोशिश है जिन्होंने गांधीजी की हत्या की और इस दुष्टतापूर्ण कार्य का जश्न मनाया। वह हमारे स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों पर पहला हमला था।
-राम पुनियानी

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकार



सेंटर फॉर सोसायटी एण्ड सेक्युलरिज्म ;सीएसएसएसद्धए मुंबई ने काठमाण्डू में आयोजित पीपुल्स सार्क रीजनल कन्वर्जेन्स मीट में 24 नवंबर 2014 को 'दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकार' विषय पर सत्र का आयोजन किया।  इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य, दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के उल्लंघन की प्रकृति को समझना और जनसंगठनों का ऐसा मजबूत गठजोड़ खड़ा करना था, जिससे इन उल्लंघनों से मुकाबला करने के लिए पहले से विद्यमान व्यवस्था को और शक्तिशाली बनाया जा सके और इसके लिए नए तंत्र विकसित किए जा सकें। दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों के घोषणापत्र का मसविदा तैयार करने की प्रक्रिया का शुभारंभ भी इस सत्र के एजेण्डे में शामिल था।
भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका व बांग्लादेश से आए लगभग 40 प्रतिनिधियों ने इस सत्र में भागीदारी की। सत्र की शुरूआत सभी उपस्थित प्रतिभागियों के परिचय से हुई। तत्पश्चात, सीएसएसएस के निदेशक इरफान इंजीनियर ने सत्र के आयोजन के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर विमर्श की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि दक्षिण एशिया में अल्पसंख्यक वर्गों में चेतना का उदय साम्राज्यवादी दौर में हुआ जब हमारे विदेशी शासकों ने बड़ी संख्या में लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान जाने पर मजबूर किया ताकि उन्हें सस्ता श्रम उपलब्ध हो सके। आबादी के इस स्थानांतरण से देशों की सीमाएं बदलीं और नई राजनीतिक व्यवस्थाओं ने जन्म लिया। विभिन्न क्षेत्रों में नए लोगों के बसने का एक प्रभाव यह हुआ कि दक्षिण एशिया के एक देश में जो समुदाय बहुसंख्यक था वह दूसरे देश में अल्पसंख्यक बन गया। इससे परिस्थितियां जटिल होती गईं।
अल्पसंख्यकों द्वारा उनके अधिकारों की मांग को राज्य अपनी सत्ता के लिए चुनौती मानता आया है। यद्यपि अल्पसंख्यकों की स्थिति में सुधार के लिए नेहरू.लियाकत सहित कई समझौते हुए परंतु शीतयुद्ध के काल मेंए दक्षिण एशिया, साम्राज्यवादी हितों के टकराव और हिंसा व षडयंत्रों का केंद्र बनकर उभरा। इससे विभिन्न समुदायों के बीच आपसी बैरभाव तो बढ़ा हीए धार्मिक कट्टरता में भी तेजी से वृद्धि हुई और क्षेत्र की सुरक्षा और शांति को खतरा पैदा हो गया। इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए अल्पसंख्यक, जो दक्षिण एशिया में पहले से ही हाशिए पर थे।
सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज के हर्षमंदर ने अपने मुख्य वक्तव्य में कहा कि अल्पसंख्यक समुदायों और सरकारों के आपसी रिश्ते सहज और सामान्य नहीं हैं। अल्पसंख्यकों को यह लगता है कि वे वंचना के शिकार हैं। धार्मिक पहचान, समाज को विभाजित कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता का मूल तत्व यह है कि हम विविधता का सम्मान करें और समानताएं ढूंढना बंद करें। यही दक्षिण एशिया और यूरोप में धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का फर्क है। यूरोप में धर्मनिरपेक्षता, वहां के समाज में घुलमिल जाने के रूप में परिभाषित की जा रही है। इसका एक उदाहरण है फ्रांस में पगड़ी व हिजाब पहनने पर प्रतिबंध। उन्होंने कहा कि राज्य के दमन और विविधता की उपेक्षा के कारण, लोग उस देश में स्वयं को सुरक्षित समझते हैं जहां उनके समुदाय का बहुमत हो। दक्षिण एशिया की विविधता ने उसकी संस्कृति को समृद्ध किया है। परंतु समृद्ध संस्कृति के साथ.साथ यह भी जरूरी है कि किसी भी देश में अल्पसंख्यक स्वयं को सुरक्षित समझें और बिना आतंक या डर के अपना जीवनयापन कर सकें। हर एक को यह स्वतंत्रता होनी चाहिए कि वह किसी भी धर्म का पालन करे या कोई भी धर्म न माने या नास्तिकता में विश्वास रखे। यही सच्चा प्रजातंत्र है। दुर्भाग्यवश,दक्षिण एशिया में प्रजातंत्र की इस मूल आत्मा का हनन हो रहा है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचला जा रहा है। बर्मा जैसे कई देशों में तो मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चर्चा करना तक प्रतिबंधित है। ऐसे मुद्दों पर चर्चा के लिए गुप्त बैठकें आयोजित करनी पड़ती हैं क्योंकि सरकार किसी भी प्रकार की मतविभिन्नता को क्रूरता से कुचल देती है।
इसके बाद,विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने अपने.अपने देशों में अल्पसंख्यकों की स्थिति का विवरण दिया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि श्री मंदर द्वारा व्यक्त की गई चिंताएं एकदम सही थीं। अल्पसंख्यकों की समस्या का चरित्र मूलतः राजनैतिक है और प्रजातांत्रिक अधिकारों में अल्पसंख्यकों के अधिकारों को उपयुक्त व पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए। अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बढ़ने का एक कारण है आक्रामक बाजार.आधारित अर्थव्यवस्था,जो कि मध्यम वर्ग की मानसिकता पर गहरा प्रभाव डाल रही है। श्रेष्ठी वर्ग यह चाहता है कि हाशिए पर पटक दिए गए लोगों और अल्पसंख्यकों की कीमत पर समाज में उसका वर्चस्व बना रहे। इसलिए यह आवश्यक है कि पूंजीवाद जैसी विचारधाराओं पर हल्ला बोला जाए जो कि अमीरों और गरीबों के बीच की खाई को औरचौड़ा कर रही हैं। बाजार.आधारित अर्थव्यवस्था से असंतुलित विकास हो रहा हैए जो समावेशी नहीं है। बांग्लादेश से आए मोइनुद्दीन ने कहा कि बांग्लादेश में कई धार्मिक,नस्लीय व सैक्स.आधारित अल्पसंख्यक समूह हैं। देश में हिजड़ा समुदाय एक महत्वपूर्ण अल्पसंख्यक समुदाय है। अल्पसंख्यकों को ढेर सारी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि बांग्लादेश में हिंदू आबादीए जो कि सन् 1947 में 27 प्रतिशत थीए घटकर 10 प्रतिशत रह गई है। देश में अल्पसंख्यकों को अपने रहवास के इलाकों से पलायन करने पर मजबूर किया जा रहा है।
श्रीलंका के के.के. बालकृष्णन ने कहा कि वहां की आबादी में 72 प्रतिशत हिस्सा सिंहलियों का है जबकि 12.13 प्रतिशत तमिल, 8 प्रतिशत मुसलमान और लगभग 7 प्रतिशत भारतीय तमिल हैं,जो कि मुख्यतः वहां के बागानों में काम करते हैं। श्रीलंका में अल्पसंख्यकों के साथ नस्ल व वर्ग के आधार पर भेदभाव किया जाता है। भारतीय तमिलों के भी हाल बेहाल हैं।
पाकिस्तान में स्थिति और भी खराब है। वहां अल्पसंख्यकों की अर्थव्यवस्था और विकास में तनिक भी हिस्सेदारी नहीं है। नौकरशाही में अल्पसंख्यकों की भागीदारी न के बराबर है। यद्यपि पाकिस्तान में सरकारी नौकरियों में अल्पसंख्यकों के लिए 5 प्रतिशत पद आरक्षित हैं तथापि उन्हें कभी जिम्मेदार व ऊँचे पदों पर नियुक्त नहीं किया जाता। उन्हें अक्सर महत्वहीन पद दिए जाते हैं। विभाजन के दौरान, जिस समय दोनो देशों से हिंदुओं और मुसलमानों का बड़े पैमाने पर पलायन हो रहा था, उस समय अल्पसंख्यकों ने पाकिस्तान में रहने का निर्णय इसलिए किया क्योंकि उन्हें उस धरती से प्यार था, जिसमें वे पले.बढ़े थे। केवल वे ही हिंदू पाकिस्तान छोड़कर जा सके जो धनी थे और जिनके पास एक नए स्थान पर जिंदगी शुरू करने के लिए आवश्यक संसाधन और योग्यता थी। दमनकारी जाति व्यवस्था और अमानवीय अछूत प्रथा के कारण भील और कोली समुदायों की बड़ी आबादी ने पाकिस्तान छोड़कर भारत न जाने का निर्णय किया। आज भी 80 लाख भील और कोली पाकिस्तान में रह रहे हैं। परंतु भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य देशों की तरह, पाकिस्तान में भी उनके साथ जाति के आधार पर भेदभाव होता रहा और उन्हें शिक्षा व अन्य क्षेत्रों में समान अवसर नहीं मिले। इस भेदभाव का एक सुबूत यह है कि जहां हिंदू आबादी का 80 प्रतिशत अनुसूचित जातियां हैं,वहीं अर्थव्यवस्था, प्रशासन, संसद आदि में उनका प्रतिनिधित्व मात्र 20 प्रतिशत है। स्पष्टतः, अल्पसंख्यकों की राजनीति में भागीदारी को रोकने की कोशिश की जा रही है। अगर सत्ता और राजनैतिक प्रक्रिया में उन्हें आनुपातिक प्रतिनिधित्व दिया जाना है तो अल्पसंख्यक समुदायों को संसद में अधिक सीटें दी जानी चाहिए।
परंतु जब हम अल्पसंख्यकों और उनके अधिकारों की चर्चा करते हैं तब यह जरूरी है कि हम अल्पसंख्यक समुदायों को एकाश्म न मानें और ना ही हम उन्हें ऐसा समूह समझें, जिसकी आवश्यकताएं, महत्वाकाक्षाएं और अनुभव एक ही हैं। जाति की तरहए लिंग भी भेदभाव का आधार है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को विवाह करते समय इस्लाम अपनाने पर मजबूर किया जाता है। वहां बलात्कार आम है और ये महिलाओं के लिए मानसिक और शारीरिक यंत्रणा का सबब बनते हैं। अतः अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर कोई भी चर्चा तब तक पूरी नहीं होगी जब तक कि उसमें लैंगिक न्याय की बात शामिल न हो। अल्पसंख्यकों के अधिकारों के किसी भी घोषणापत्र को लागू करते समय यह ध्यान में रखा जाना होगा कि उसमें महिलाओं के अधिकारों के लिए उचित स्थान हो।
पाकिस्तान की तरह,भारत में भी अल्पसंख्यक समुदाय की महिलाओं को हजार दुःख हैं। उनके साथ भी बलात्कार और शारीरिक शोषण की घटनाएं बहुत आम हैं। मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से सामने आयी। जब मुसलमानों के खिलाफ हिंसा हो रही थी तब उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने उसे रोकने के लिए पर्याप्त और उचित कदम नहीं उठाए। यहां तक कि मुस्लिम समुदाय के विधायक भी मूकदर्शक बने रहे।
टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज,मुंबई के प्रोफेसर रानू जैन ने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों के प्रति नीतियों पर बहस होनी चाहिए क्योंकि वे काफी हद तक अस्पष्ट हैं। उदाहरणार्थ, अल्पसंख्यक समुदाय को ही परिभाषित नहीं किया गया है। नतीजे मेंए उच्चतम न्यायालय यह तय कर रहा है कि कौन.सा समुदाय अल्पसंख्यक है और उस समुदाय को अल्पसंख्यकों के लिए नियत सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे शक्तिशाली समुदायों को जोड़तोड़ करने का मौका मिल रहा है। भारत में इसी अस्पष्टता का लाभ उठाकर जैनियों और पारसियों ने भी अपने.अपने समुदायों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिलवा दिया है और उन्हें राज्य द्वारा हर किस्म का प्रोत्साहन दिया जा रहा है। यद्यपि यह सही है कि जैनियों और पारसियों की आबादी कम है परंतु यह भी सच है कि दोनों समुदाय विकसित,शिक्षित और समृद्ध हैं और उन्हें उन अल्पसंख्यक समुदायों की कीमत पर सुविधाएं उपलब्ध करवाई जा रही हैं, जो पिछड़े, गरीब और अशिक्षित हैं। भारत में अमीरों और गरीबों के बीच भारी अंतर है। मुट्ठीभर रईस यह जानते भी नहीं कि गरीबों को किस तरह की हिंसा, भेदभाव और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। संपन्न वर्ग तो बस अपनी ताकत में बढ़ोत्तरी करना चाहता है। मीडिया और शिक्षा व्यवस्था का इस हद तक सांप्रदायिकीकरण हो चुका है कि ये दोनों संस्थाएं अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों के प्रति संवेदनशील नहीं हैं। निराशा के इस घनघोर अंधेरे में सच्चर समिति की रपट, आशा की किरण बनकर उभरी थी परंतु उसकी अधिकांश सिफारिशों को आज तक लागू नहीं किया गया है। ऐसे में जरूरी है कि अल्पसंख्यकों की चिंताओं पर खुलकर चर्चा की जाए और ऐसे नियम.कानून बनाए जाएं जिनसे सांप्रदायिक आधार पर भेदभाव रूक सके। साथ हीए सांप्रदायिक हिंसा पर नजर रखे जाने की भी जरूरत है। भारत के अल्पसंख्यकों की समस्याओं के बारे में कश्मीर से आए बशीर अहमद ने एक महत्वपूर्ण बात कही। कश्मीर में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वे जिस इलाके में रहते हैंए वहां पर हिंदू पंडित अल्पसंख्यक हैं।  उन्होंने कहा कि घाटी से पंडितों का पलायन दुर्भाग्यपूर्ण है। वे वहां से इसलिए चले गए क्योंकि उनके मन में असुरक्षा का भाव घर कर गया था। उन्होंने कहा कि जब हम अल्पसंख्यकों के संबंध में नीतियों के निर्माण पर चर्चा करें तब हमें अल्पसंख्यकों के अंदर के अल्पसंख्यकों का भी ध्यान रखना होगा।
सत्र के अंत में पाकिस्तान से आए करामत अली और इरफान इंजीनियर ने पूरी चर्चा का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया और भविष्य की कार्यवाही की रूपरेखा बताई। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यकों को विधानमंडलों और निर्णय लेने वाली संस्थाओं में तो पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिलना ही चाहिएए आर्थिक नीतियों और विकास की प्रक्रिया के निर्धारण में भी उनकी भूमिका होनी चाहिए। अल्पसंख्यकों को यह हक मिलना चाहिए कि वे अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकें और अपनी पहचान को सुरक्षित रख सकें। सांप्रदायिक हिंसा और कत्लेआम को रोकने के लिए कानून बनाए जाने चाहिए और उन्हें कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। अकेले भारत में स्वतंत्रता से लेकर अब तक सांप्रदायिक दंगों में लगभग 40,000 लोग मारे जा चुके हैं। परंतु बहुत कम दोषियों को सजा मिल सकी है। अतः यह आवश्यक है कि पूरे दक्षिण एशिया में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाओं की निष्पक्ष जांच करने के लिए एक आयोग का गठन किया जाए। जो लोग हिंसा के कारण अपने गांवए घर छोड़ने पर मजबूर कर दिए जाते हैं वे शिक्षा और रोजगार से तो मेहरूम होते ही हैंए उनमें मजहबी कट्टरता भी बढ़ती है। अगर अल्पसंख्यकों को सुरक्षा दी जाए और सत्ता में उनकी हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए तो कट्टरपंथी तत्व कमजोर पड़ेंगे और धार्मिक पहचान के आधार पर ध्रुवीकरण कम होगा।
इस सत्र में हुई चर्चा के आधार पर अल्पसंख्यक अधिकारों के घोषणापत्र की अवधारणा पर विचार करने हेतु एक मसविदा समिति का गठन किया गया जिसमें इरफान इंजीनियर,रानू जैन, हर्षमंदर, करामत अली व बशीर अहमद शामिल हैं। सम्मेलन में यह मांग की गई कि सार्क देशों को दक्षिण एशिया आयोग की नियुक्ति करना चाहिए जिसमें हर सार्क देश से एक.एक पुरूष और महिला प्रतिनिधि शामिल हो और जो क्षेत्र में अल्पसंख्यकों की स्थिति पर नजर रखे।
-नेहा दभाड़े

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

भाजपा का दलित प्रेम अर्थात दलितों का ब्राह्मणीकरण



    पिछले लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने कई दलित नेताओं जैसे राम विलास पासवान और रामदास अठावले के साथ गठजोड़ किया था। उस ने उदित राज को अपनी पार्टी में शामिल करके दलितों में अपनी घुस पैठ बढ़ाई थी। चुनाव परिणाम से सिद्ध हुआ कि इसमें उसे आशातीत सफलता मिली थी। उत्तर प्रदेश में तो वह सभी 18 आरक्षित सीटें जीत गई थी। इससे प्रोत्साहित होकर और वर्तमान उपचुनावों के मद्देनजर उस ने दलितों को आकर्षित करने का अभियान तेज कर दिया है। इस हेतु उसने कई रणनीतियाँ अपनाई हैं। पहली रणनीति उनकी हिन्दू पहचान को उभारने की है और उन्हें बड़े हिन्दू समूह का हिस्सा बनाने की है। इसके लिए उसने राजनीति के संप्रदायीकरण की प्रक्रिया के अंतर्गत दलितों को मुसलमानों से लड़ाने की नीति अपनाई है। उसने दलितों के मुसलमानों के साथ सामान्य विवादों को हिन्दू-मुस्लिम झगड़े का रंग देने का काम किया है। उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद हिन्दू-मुस्लिम टकराव की घटनाओं में से लगभग 70 घटनाएँ दलित मुस्लिम टकराव की थीं। इन में मुख्य मुरादाबाद जिले के कांठ गाँव की लाउड स्पीकर वाली घटना, सहारनपुर में सिख- मुस्लिम फसाद की घटना थी, जिस में हिन्दुओं की तरफ से सब से अधिक दलित ही गिरफ्तार हुए थे तथा अन्य दलित लड़की और मुस्लिम लड़का या मुस्लिम लड़की और दलित लड़का वाली घटनाएँ शामिल हैं। इस प्रकार कम से कम उत्तर प्रदेश में तो भाजपा ने हिन्दू मुस्लिम फसाद के मामलों में दलितों को हिन्दू पक्ष का एक प्रमुख हिस्सा बना लिया है। इससे पहले भी भाजपा बाल्मीकियों, खटिकों और जाटवों का हिन्दू-मुस्लिम फसाद में इस्तेमाल करती रही है।
    भाजपा ने दलितों को आकर्षित करने के लिए दूसरा हथियार उनके ब्राह्मणीकरण का अपनाया है। इसके द्वारा उस ने उन दलित उपजातियों में अपनी घुसपैठ बढ़ाई है जो अभी भी कट्टर हिन्दू हैं और दलितों की बड़ी उपजातियों के विरोध में रहती हैं। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में चमार/जाटव दलितों की सब से बड़ी उपजाति है और पासी, बाल्मीकि, धोबी और खटिक छोटी उपजातियाँ हंै। परम्परा से यह छोटी उपजातियाँ चमार/जाटव उपजाति से प्रतिस्पर्धा और प्रतिरोध में रही हैं। इसीलिए ये उपजातियाँ राजनैतिक तौर पर भी इस बड़ी उपजाति से प्रतिस्पर्धा में रही हैं। बसपा का सब से बड़ा आधार चमार/जाटव उपजाति रही है और यह छोटी उपजातियाँ बसपा के साथ थोड़ी हद तक ही जुडी थीं। यह उपजातियाँ बसपा से प्रतिक्रिया में भाजपा अथवा समाजवादी पार्टी के साथ रही हैं। दलितों के सामाजिक विभाजन का असर उन के राजनैतिक जुड़ाव पर भी दिखाई देता है। उत्तर प्रदेश में पिछले विधान सभा चुनाव में यह उप जातियाँ सपा की तरफ गई थीं और मायावती से रुष्ट हो कर चमार/जाटव वोटर भी सपा की तरफ गए थे। पूर्व में कांग्रेस और भाजपा भी इन जातियों को सीमित सीमा में अपनी पार्टी में समाहित करने में सफल रही हैं। मायावती की गलत नीतियों के कारण इन उपजातियों में यह धारणा पनप गई थी कि बसपा केवल चमारों/जाटवों की पार्टी है और इस का लाभ केवल उन्हीं तक सीमित है। इस आरोप में काफी सच्चाई भी है। अतः ये उप जातियाँ बसपा की जगह दूसरी पार्टियों में अपना स्थान ढूँढ़ती रही हैं और इधर बसपा से लगभग अलगाव में चली गई हैं, जिस का खामियाजा मायावती को 2012 और 2014 के चुनाव में भुगतना पड़ा। यही स्थिति रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया के समय में थी। देश के दूसरे राज्यों में भी इसी प्रकार का सामाजिक और राजनैतिक विभाजन है। महाराष्ट्र में महार दलितों की सब से बड़ी उपजाति है और चम्भार और ढेड छोटी उपजातियाँ हैं। वहाँ पर उसी प्रकार का सामाजिक और राजनैतिक विभाजन है। आन्ध्र प्रदेश में भी माला और मादिगा में सामाजिक और राजनैतिक विभाजन है। कर्नाटक में भी ऐसा ही उपजाति बँटवारा है। भाजपा की इन उपजातियों में काफी समय से पैठ रही है।
दलितों के इस राजनैतिक और सामाजिक बँटवारे का कारण राजनैतिक आरक्षण भी है। वर्तमान संयुक्त मताधिकार प्रणाली के अंतर्गत आरक्षित सीटों पर वही दलित जीत पाता है जो सवर्ण जातियों का वोट प्राप्त कर सकता है। चूँकि सवर्ण वोट सवर्ण राजनैतिक पार्टियों के पास रहता है अतः वे जिस को चाहते हैं वह ही जीत पाता  है। यह व्यवस्था दलित पार्टियों की सब से बड़ी कमजोरी है। अतः यह देखा गया है कि अधिकतर आरक्षित सीटें सवर्ण पार्टियों द्वारा ही जीत ली जाती हैं। इसीलिए सवर्ण पार्टियाँ अपने स्वामीभक्त और हलके फुल्के दलितों को खड़ा करके आरक्षित सीटें जीत लेती हैं और दलित पार्टियों के अच्छे से अच्छे उम्मीदवार हार जाते हैं। इसी कुचक्र में डॉ. अंबेदकर को दो  बार हार का मुँह देखना पड़ा था। दरअसल अलग मताधिकार के अंतर्गत दलितों को राजनैतिक  स्वतंत्रता का जो अधिकार मिला था उसे
गांधी जी ने अनुचित दबाव में पूना पैक्ट के अंतर्गत छीन लिया जिस का खामियाजा आज तक दलित भुगत रहे हैं। अब दलित राजनैतिक तौर पर बड़ी सवर्ण पार्टियों के गुलाम हैं और इस ने दलितों के अन्दर एक स्वार्थी और लम्पट तबके को पैदा कर दिया है जो चुनाव तो दलितों के नाम पर जीतता है परन्तु वफादारी सवर्ण आकाओं की निभाता है। भाजपा ने भी इस चुनाव में इसी व्यवस्था का लाभ फायदा उठाया है और सब से अधिक आरक्षित सीटें जीती हैं और आगे भी काफी आशान्वित है।
    दरअसल दलितों में शुरू से ही दो प्रकार की सांस्कृतिक विचारधारा पनपती रही हैं। एक हिन्दू धर्म और ब्राह्मणवाद के खिलाफ और दूसरी उसकी पक्षधर/पुराने समय में भक्ति आन्दोलन और वर्तमान में अम्बेडकरवाद के प्रभाव में कुछ उपजातियाँ भक्ति आन्दोलन के प्रभाव में ब्राह्मणवाद के विरोध में खड़ी हुई थीं और कुछ उपजातियाँ हिन्दू धर्म के दायरे में ही रहीं। पंजाब में आदि-धर्म आन्दोलनउत्तर प्रदेश में आदि-हिन्दू आन्दोलन, आंध्र में आदि-आंध्र, तमिलनाडु में आदि-द्रविड़ आन्दोलन और बंगाल में नमोशूद्र आन्दोलन इसके प्रमुख आन्दोलन रहे हैं। बीसवीं सदी में डॉ. अंबेदकर के प्रभाव में हिन्दू धर्म के खिलाफ एक देश व्यापी आन्दोलन चला जिस की परिणति 1956 में हिन्दू धर्म का त्याग और बौद्ध धम्म का स्वीकार है। एक तरफ हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धम्म ग्रहण करने वालों की संख्या में बहुत बड़ी वृद्धि हो रही है वहीं दूसरी ओर दलितों की छोटी उपजातियों का ब्राह्मणीकरण हो रहा है।
    हाल में आर.एस.एस. ने दलितों की छोटी हिन्दू उप-जातियों को पटाने के लिए तीन पुस्तकों का विमोचन किया है जिस में कहा गया है कि खटिक, बाल्मीकि और चमार पूर्व में क्षत्रिय जातियाँ थीं परन्तु मुसलमानों ने उन्हें अपना गुलाम बनाकर प्रताडि़त किया और नीच बना दिया और भाजपा उन्हें फिर से क्षत्रिय बनाकर सम्मान दे रही है। इस से कुछ दलित उपजातियों के भाजपा के जाल में फँसने की पूरी सम्भावना है क्योंकि एक तो वे अभी तक हिन्दू बनी हुई हैं और दूसरे वे बड़ी उपजातियों से प्रतिक्रिया में रहती हैं। इसके अलावा वर्तमान चुनाव प्रक्रिया से भाजपा उन्हें आरक्षित सीटें जितवाकर राजनैतिक लाभ भी पहुँचाने की स्थिति में है। इस हालत के लिए दलितों की राजनैतिक पार्टियाँ भी काफी हद तक जिम्मेदार हैं जिन्होंने इन उपजातियों को उचित प्रतिनिधित्व न देकर भाजपा को उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करने का अवसर दिया है, जिस से हिंदुत्व मजबूत हुआ है। एक तरीके से जातिवादी राजनीति भी हिंदुत्व को ही मजबूत करती है क्योंकि
धर्म की राजनीति जाति को माध्यम  बनाकर वोटों का ध्रुवीकरण करती है।
    अतः दलितों को जाति की राजनीति के स्थान पर मुद्दों की राजनीति को अपनाना होगा जो जाति को तोड़कर दलितों और गैर दलितों को एकजुट कर सकती है। हिंदुत्व दलितों के लिए सब से बड़ा खतरा है क्योंकि हिंदुत्व वर्ण व्यवस्था का पक्षधर है जो जाति व्यवस्था को मजबूत करता है। जाति व्यवस्था शोषण की व्यवस्था है जिस का सबसे बड़े शिकार दलित ही हैं। अतः दलितों को आर.एस.एस. द्वारा जाति उच्चीकरण के नाम पर फेंके जा रहे हिंदुत्व के जाल में फँसने से बचना होगा। उन्हें जाति की राजनीति के स्थान पर मुद्दों की राजनीति को अपनाना होगा। उन्हें अपने फायदे के लिए हिंदुत्ववादी ताकतों के साथ जाति के नाम पर सौदा करने वाले दलित नेताओं से भी बचना होगा। उनकी मुक्ति तो डॉ. अंबेदकर के जाति विनाश के आन्दोलन को मजबूत करने से ही संभव है न कि जाति को सुदृढ़ करने से। धर्म आधारित हिंदुत्व की जातिवादी राजनीति उन्हें गुलामी की ओर ही ले जाएगी, मुक्ति की ओर नहीं। उन्हें डॉ. अंबेदकर के भारत में जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की स्थापना के लक्ष्य को पूरा करने में अग्रणी भूमिका निभानी होगी।
- एस.आर.दारापुरी
 मोबाइल: 09415164845

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

अलीगढ़ विश्वविद्यालय, राजा महेन्द्र प्रताप और धु्रवीकरण के प्रयास

सांप्रदायिक राजनीति के झंडाबरदारों को न केवल धार्मिक आधार धु्रवीकरण करवाने की कला में महारत हासिल है वरन् वे इसके नए-नए तरीके भी ईजाद करते रहते हैं। मुजफ्फरनगर में इसके लिए ‘लव जिहाद’ का इस्तेमाल किया गया तो अलीगढ़ में अतुलनीय गुणों के धनी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह के नाम का उपयोग इसी उद्देष्य से किया जा रहा है।
भाजपा और उसके साथी संगठनों ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के केम्पस में राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की याद में एक कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की। विश्वविद्यालय के कुलपति ने आयोजकों के कुत्सित इरादों को नाकामयाब करने के लिए यह घोषणा कर दी कि   विश्वविद्यालय स्वयं अपने इस पूर्व छात्र के स्वाधीनता संग्राम में योगदान पर सेमीनार का आयोजन करेगा। भाजपा ने इस जानेमाने व्यक्तित्व का दुरूपयोग करने का इरादा इसलिए बनाया क्योंकि उनकी मृत्यु के दशकों बाद भी आम लोगों के मन में उनके प्रति बहुत सम्मान का भाव है। ठीक इसी मौके पर यह मुद्दा क्यों उठाया गया, इस प्रश्न का उत्तर दिलचस्प है। महेन्द्र प्रताप की 29 अप्रैल 1979 को मृत्यु हो गई थी। इतने वर्ष बाद, भाजपा को अचानक उनकी याद आ गई क्योंकि उसे लगा कि उनकी जाट और हिंदू पहचान का उपयोग, पार्टी अपने राजनीतिक खेल के लिए कर सकती है। महेन्द्र प्रताप अप्रितम स्वाधीनता संग्राम सेनानी, पत्रकार और लेखक थे। वे मानवतावादी थे और धार्मिक व राष्ट्रीय सीमाओं से परे, दुनिया के सभी देशों का महासंघ बनाने के विचार से प्रेरित थे। वे माक्र्सवादी थे और सामाजिक सुधार और पंचायतों के सशक्तीकरण के पक्षधर थे। वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम सेनानी संगठन के अध्यक्ष थे। वे पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने काबुल में सन् 1915 में भारत की निर्वासित सरकार बनायी थी। यहां यह याद रखना प्रासंगिक होगा कि इसके काफी वर्षों बाद, सन् 1929 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भारत की पूर्ण स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य घोषित किया। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा गठित निर्वासित सरकार को हुकूमत-ए-मुख्तर-ए-हिंद कहा जाता था। इस सरकार के मुखिया महेन्द्र प्रताप थे, मौलवी बरकतउल्लाह इसके प्रधानमंत्री और मौलाना औबेदुल्ला सिंधी आतंरिक मामलों के मंत्री थे।
स्वाधीनता के बाद, राजा महेन्द्र प्रताप सिंह ने 1957 के लोकसभा चुनाव में मथुरा लोकसभा क्षेत्र में अटल बिहारी वाजपेयी को पराजित किया था। यह तथ्य कि वे तत्कालीन भारतीय जनसंघ के नेता वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़े और जीते ही इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि वे सांप्रदायिक ताकतों के धुर विरोधी थे। यह विडंबना ही है कि ऐसे व्यक्ति को योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा नेता अपनी संकीर्ण राजनीति के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं। योगी आदित्यनाथ ने दावा किया है कि अगर राजा महेन्द्र प्रताप ने अपनी जमीन दान न दी होती तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) आज अस्तित्व में न होता। यह दावा तथ्यों के विपरीत है। एएमयू के पूर्ववर्ती ‘‘मोहम्मडन एंग्लो ओरिएन्टल काॅलेज’’ की स्थापना सन् 1886 में हुई थी और इसका भवन, ब्रिटिश  केन्टोरमेंट की लगभग 74 एकड़ जमीन को खरीदकर बनाया गया था। इसके काफी बाद, सन् 1929 में, प्रताप ने अपनी 3.04 एकड़ भूमि, जिसे तिकोनिया ग्राउण्ड कहा जाता है, एएमयू को दान दी। इस जमीन का उपयोग एएमयू के सिटी हाईस्कूल के खेल के मैदान के रूप में किया जाता है। उन्होंने सन् 1895 में इस काॅलेज में दाखिला लिया था परंतु वे वहां अपनी स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी नहीं कर सके। उन्होंने 1905 में इस काॅलेज को छोड़ दिया। सन् 1920 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएन्टल काॅलेज (एमएओ), अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय बन गया और यह विश्वविद्यालय आज भी राजा महेन्द्र प्रताप सिंह को अपना पूर्व छात्र मानता है। सन् 1977 में एमएओ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने पर आयोजित समारोह में एएमयू के तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर ए.एम. खुसरो ने राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का सम्मान किया था।
जिस समय एएमओ की स्थापना हुई थी, उस समय राजा महेन्द्र प्रताप सिंह का जन्म भी नहीं हुआ था अतः उनके द्वारा इस संस्था को कोई जमीन दान दिए जाने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। हां, यह जरूर है कि महेन्द्र प्रताप के पिता मुरसान के राजा घनश्याम सिंह ने इस काॅलेज के होस्टल में एक कमरे का निर्माण करवाया था जो आज सर सैय्यद हाॅल (दक्षिण) का कमरा नंबर 31 है।
भाजपा की मांग है कि एएमयू को राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जयंती उसी तरह मनानी चाहिए जिस तरह वहां विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैय्यद अहमद खान की जयंती मनाई जाती है। आरएसएस और भाजपा के नेताओं ने ऐसा करने के लिए एएमयू के कुलपति पर दबाव बनाया। कुलपति का तर्क यह था कि एएमयू अपने हर पूर्व छात्र या दानदाता की जयंती नहीं मना सकता, यद्यपि वह, विश्वविद्यालय के निर्माण में उनकी भूमिका का सम्मान करता है। प्रताप के विश्वविद्यालय के निर्माण में योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए यूनिवर्सिटी में सर सैय्यद के चित्र के बगल में महेन्द्र प्रताप का चित्र भी लगाया गया है।
गत 17 नवंबर को उत्तरप्रदेश  भाजपा अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी और महासचिव स्वतंत्र देव सिंह अलीगढ़ पहुंचे और उन्होंने पार्टी की जिला इकाई को यह निर्देष दिया कि महेन्द्र प्रताप की जयंती मनाने के लिए एएमयू के प्रांगण में कार्यक्रम आयोजित किया जाए। राजा महेन्द्र प्रताप सिंह, जाट नेता भी माने जाते हैं। आम धारणा यह है कि एएमयू एक मुस्लिम संस्थान है। सांप्रदायिक ताकतों द्वारा जाटों और मुसलमानों के बीच विवाद पैदा कर, मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक दंगे भड़काएं गए थे। अब, भाजपा एक जाट राजा का महिमामंडन कर इस तनाव को बढ़ाना चाहती थी। यह एक सुनियोजित चाल थी जिसके तहत  भाजपा, इलाके के एक सम्मानित व्यक्ति को अपनी राजनीति का अंग बना लेती और अगर राज्य सरकार इस समारोह के आयोजन पर रोक लगाती तो उस पर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने का आरोप जड़ दिया जाता।
इस षड़यंत्र को विफल करने के लिए एएमयू के कुलपति लेफ्टिनंेट जनरल जमीरउद्दीन शाह ने यह प्रस्ताव किया कि राजा महेन्द्र प्रताप सिंह की जयंती को मनाने के लिए एएमयू, भारत के स्वाधीनता संग्राम में उनकी भूमिका पर एक सेमिनार का आयोजन करेगा। यह एक स्वागत योग्य पहल थी। इससे कम से कम कुछ समय के लिए विवाद टल गया। अगर कुलपति यह प्रस्ताव नहीं करते तो भाजपा का इरादा एएमयू के मुख्य द्वार पर रैली करने का था जिससे तनाव बढ़ने और हिंसा भड़कने की संभावना होती।
इस घटनाक्रम के कई सबक हैं। पहला तो यह कि भाजपा अपनी सांप्रदायिक राजनीति के हित साधने के लिए राष्ट्रीय नेताओं के नाम का इस्तेमाल कर रही है, फिर चाहे वे सरदार पटेल हों, स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी या इस मामले में राजा महेन्द्र प्रताप। इन नेताओं के जीवन के केवल उस पक्ष को प्रचारित किया जा रहा है जिससे सांप्रदायिक ताकतों को लाभ मिले। महेन्द्र प्रताप एक मार्क्सवादी थे परंतु उन्हें केवल एक जाट नेता बताया जा रहा है। वे धर्म के नाम पर की जाने वाली राजनीति के खिलाफ थे और यह इससे स्पष्ट है कि उन्होंने भारतीय जनसंघ के तत्कालीन नेता अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ चुनाव लड़ा और वाजपेयी को पराजित किया था।
दूसरा यह कि भाजपा और उसके साथी, व्यक्तियों की केवल धार्मिक पहचान को प्रमुखता देने का षड़यंत्र रच रहे हैं चाहे वह हिंदू हों या मुसलमान। मुजफ्फरनगर में जाटों को लव जिहाद के नाम पर हिंदुत्ववादी झंडे के नीचे लाने का प्रयास किया गया। हिंदू धार्मिक पहचान को ‘दूसरी’ धार्मिक पहचान के विरूद्ध खड़ा किया जाता है जो मुस्लिम और कभी-कभी ईसाई होती है। यही खेल दिल्ली के कुछ हिस्सों में भी खेला जा रहा है जहां दलितों को मुसलमानों के खिलाफ भडकाया जा रहा है। इस तरह दो वंचित समुदायों को ‘उनके धर्म’ या आस्था से जुड़े किसी भी मुद्दे के बहाने एक दूसरे से लड़वाया जा रहा है।
सांप्रदायिक राजनीति न केवल आम लोगों को उनकी धार्मिक पहचान से जोड़ने की कोशिश  कर रही है वरन् जानीमानी हस्तियों के साथ भी ऐसा ही किया जा रहा है, जैसा कि राजा महेन्द्र प्रताप के मामले में किया गया। तीसरा सबक जो हमारे समाज को सीखना चाहिए वह यह है कि सांप्रदायिक शक्तियां विभिन्न धार्मिक समुदायों को एक-दूसरे से लड़वाने के लिए मुद्दों की तलाश  में हैं। जहां इन ताकतों का शीर्ष  नेतृत्व सभी प्रकार की हिंसा पर रोक की बात करता रहता है वहीं इसी नेतृत्व के चेले चपाटी सांप्रदायिकता की आग को भड़काने के उपाय ढूंढते रहते हैं।
इस माहौल में हम सब को सावधान रहने और धैर्य व समझदारी से काम करने की जरूरत है। हमें यह समझना होगा कि महेन्द्र प्रताप जैसे लोग प्रेम, शान्ति और वैशिविक मानवतावाद के पैरोकार थे न कि किसी धर्म या जाति के नेता। केवल धार्मिक पहचान के आधार पर हमारे राष्ट्रीय नेताओं का वर्गीकरण करना घोर अनैतिक है चाहे फिर वे नेता किसी भी धर्म के क्यों न हों।
-राम पुनियानी
        


बुधवार, 3 दिसंबर 2014

जन विकास की पुख्ता आधारशिलाएँ

 भारत में विकास, सार्वजनिक नीतियों,  राजकाज तथा लोक कल्याण आदि विषयों के बारे में सोच कुछ गहरी विसंगतियों से भरा हुआ है। उसका एक बहुधा नजर आने वाला पक्ष है आर्थिक तथा सामाजिक पक्षों को अलग-अलग करके, कभी कभार तो विरोधी या प्रतिद्वंद्वी रूप में देखना। इस प्रवृत्ति का नतीजा है कि आर्थिक विकास या कल्याण को सामाजिक विकास या कल्याण से अलग करके देखा और पेश किया जाता है। भारत में आर्थिक विकास को प्राथमिकता दी गयी है। धारणा हैं कि आर्थिक विकास एक तो सामाजिक विकास का रास्ता खोलेगा, दूसरे आर्थिक विकास (यानी ऊँची, सम्पूर्ण तथा प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय) के ऊँचे और तेजी से बढ़ते स्तर के कारण राजकीय राजस्व या आमदनी का ऊँचा स्तर सुलभ हो पाएगा। इस आधार पर राज्य सामाजिक सेवाओं सुविधाओं, सुरक्षा की उपलब्धता में तेजी से इजाफा कर पाएगा। इस तरह माना गया कि एक ओर निजी ऊँची आमदनी तथा दूसरी ओर राज्य द्वारा दी गई सामाजिक सेवाओं का तेजी से प्रसार सारे देश के सामाजिक विकास को लगातार नई ऊँचाइयाँ देता रहेगा। इस तरह यह निष्कर्ष निकाला गया कि आर्थिक विकास सामाजिक विकास का रास्ता भी प्रशस्त करता है। परिणाम स्वरूप विकास के इन दो पक्षों या पहलूओं में कोई मूलभूत या दूरगामी अन्तरविरोध नहीं माना गया। भारत की पाँच साला विकास योजनाओं और सालाना बजटों पर इस सोच की गहरी छाप दिखाई देती है।
    हम आजादी के सात दशक पूरे करने जा रहे हैं। विकास रणनीति, योजनाओं, आर्थिक और सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों के कारण आज भारतीय अर्थ व्यवस्था और सामाजिक स्थिति में कड़वे मीठे, सीमित तथा व्यापक फैलाव वाले परिवर्तनों के सत्य को झुठलाया नहीं जा सकता है। हर साल बजट दर बजट कुछ नई आर्थिक सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों का एक मिश्रण देश में लागू किया जाता है। आमतौर पर इन नीतियों और कार्यक्रमों की समीक्षा में केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों की भूमिका का साझा आकलन किया जाता है। राज्य सरकारों के कामों-नीतियों में जिस तरह भिन्नता नजर आती है, उसी तरह केन्द्र द्वारा भी अपने संसाधनों के प्रादेशिक आवंटन में एक सीमा तक गैर बराबरी का पुट साफ नजर आता है। आवंटन में सबसे बड़ी गंभीर तथा अनुचित असमानता गाँवों तथा शहरों के बीच देखी जाती है। किन्तु देश ने अब तक यह देखा है कि एक ओर जहाँ भारत की बहुआयामी विविधता और विषमताएँ  बढ़ रही हैं, तो दूसरी ओर कुल मिलाकर विकास इन दोनों पैमानों पर काफी नाकाफी भी रहा है।
    इस स्थिति को समझने की कोशिशों का पहला बिन्दु हमें यह नजर आता है कि आर्थिक और सामाजिक विकास को अलग अलग समझना अवास्तविक है। साथ ही आर्थिक विकास की वैशाखी पकड़ कर सामाजिक विकास की ओर बढ़ सकने की परिकल्पना से सामाजिक जीवन के दोनों ही पहलू आहत हुए हैं। खास बात यह है कि इस बिलगाव के असर में आर्थिक तरक्की को प्रधानतः प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय के रूप में देखा गया है आयके समाज के विभिन्न तबकों, समूहों, वर्गों में न्यायपूर्ण और समुचित वितरण की इतनी घोर उपेक्षा की गई कि वितरण की विषमता के विस्तृत होते विष को भी शिरोधार्य कर लिया गया। वास्तव में यह सम्पन्न और सशक्त लोगों के क्षुद्र और संक्रीर्ण हितों और लोभ की वेदी पर करोड़ों नागरिकों की कई पीढि़यों की न्यूनतम मानवीय जरूरतों की आहुति देने जैसा दुष्कर्म साबित होता जा रहा है। सन् 1990 तक सामाजिक शक्ति, क्षमताओं, प्रभाव और सम्पत्ति पर अत्यधिक आधिपत्य जमाये तबकों को आर्थिक एकांगी विकास की बागडोर देते हुए भी उन पर लोकतांत्रिक राज्य का नेतृत्व अपने महावती उत्तरदायित्व का अंकुश रखने की कोशिशों में लगा रहा। इन प्रयासों को असफल करने के बाद तो सन् 1990 के बाद शक्ति सम्पत्ति के शीर्षस्थ तबकों ने सामाजिक विकास को पूरी तरह हासिये पर डाल दिया। रोटी, कपड़ा, मकान की मांग अधर में लटक गई। अब बिजली पानी, सड़क भी आन्दोलनों के मुद्दे बन गए। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, पोषण, स्वच्छता के बदले महानगरों में तेजी से बढ़ती राष्ट्रीय आय सम्पन्नों के अरमान राज्य के केन्द्र बन गए। देसी परदेसी कम्पनियों के हाथों में अभूतपूर्व केन्द्रीकरण हुआ किन्तु न तो राजकीय राजस्व अनुपात बढ़ पाया और न ही उसका सामाजिक विकास के लिए आवंटन बढ़ा। निरपेक्ष रूप से सामाजिक कामों के लिए धन  बढ़ाया गया किन्तु राजकोषीय आवंटन वृद्धिमान आमदनी, उसके स्वरूप, उससे जुड़ी तकनीकों, प्रबंधन व्यवस्था, उसमें बढ़ते सेवाओं के अनुपात और उससे जुड़ी निजीकरण प्रक्रिया आदि के चलते दलितों, वंचितों, आदिवासियों तथा प्रदूषित समावेशन के शिकारों आदि की स्थिति बदतर होती गई। सकल,  वास्तविक राष्ट्रीय आय में विश्व में तीसरे नम्बर पर आया भारत मानव विकास के तुलनात्मक प्रतिमानों की कसौटी पर विश्व में 134वें पायदान पर आ टिका। अब तो आर्थिक और सामाजिक सुधार दोनों पर ग्रहण लग गया है, जाहिर है दर्जनों सुन्दर गुलदस्तों नुमा नौकरशाही तथा नेताओं, छुटभैय्यों की जमात द्वारा नियंत्रित संचालित कार्यक्रम अपने घोषित मकसदों से दूर भटकते गये। युद्धों में मध्यकालिक सेनाओं द्वारा की गई लूट की तरह अब सरकारी अमला और राजनैतिक दलाल दोनों हाथों सामाजिक विकास के लिए बांटी गयी राशि को बटोर रहे हैं। मनरेगा, शिक्षा का अधिकार, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, आवास योजनाएँ जिन्हें सच्चे विकास पथ से भटके राजनीतिज्ञों के नाम पर प्रचारित करना बेहद घटिया अलोकतांत्रिक मजाक है। खाद्य अधिकार, आदि अपने घोषित उद्देश्यों के बरक्स पूरी तरह बौने हैं। अतः सामाजिक तथा आर्थिक नीतियों और कार्यक्रमों के बीच की दीवारों को गिराकर समग्र, सर्वांगीण, सर्व समावेशी, सामाजिक विकास नीतियों और कार्यक्रमों का श्री गणेश होना चाहिए। आर्थिक, तकनीकी, प्रादेशिक ग्रामीण, शहरी आदि सभी प्रकार के विकास आपस में एक दूसरे से अलग-अलग नहीं किए जा सकते। इसी तरह शिक्षा, सुपोषण, स्वास्थ्य, स्वच्छता, महिलाओं, बच्चों-वृद्धों की जरूरतों को संभालती सामाजिक सुरक्षा सेवाएँ आदि भी एक पूरे समवेत पैकेज के रूप में एक निश्चित समय सीमा में सबको और केवल नाम दिखाऊ नहीं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराने की गारंटी ही आर्थिक और सामाजिक विकास की एक बरण हुई गंगा यमुना को सदनीरा रूप में प्रवाहित कर सकती है।
    इन चर्चाओं में आंकड़ों की खेती उगाना जन चेतना और अधिकारों के लिए जूझने की तैयारी के रूप में निरर्थक ही साबित होती है। अभी हालिया चुनाव में किस तरह इन कागजी कार्यक्रमों और आम आदमी की कल्पना से कोसों दूर मोटे-मोटे करोड़ों अरबों की राशियों को बखानते आंकड़े प्रभावहीन साबित हुए यह बताने की जरूरत नहीं है। केन्द्र तथा राज्य सरकारों के विभिन्न सामाजिक सेवाओं पर राजस्व खर्च सन् 1990-91 में कई हजार करोड़ रूपयों के लगभग था। महंगाई, जनसंख्या वृद्धि, नई सेवाओं आदि के चलते यह खर्च सन् 2012-13 में लगभग 105 लाख करोड़ रूपये अनुमानित है। यदि यह करीब सत्रह गुणा वृद्धि कुछ गुणात्मक बदलाव का संकेत देती तो भारत के सामाजिक परिदृश्य का कायाकल्प हो गया होता। अतः असली कसौटियाँ हैं-एक अल्पकाल में इन सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाकर उन्हें गारंटी सहित सर्व सुलभ करनी, दूसरे इन सेवाओं की प्रति उपयोगकर्ता पर्याप्त मात्रा तथा तीसरे इन सेवाओं की लोगों की विभिन्न जरूरतों के अनुरूप उपयुक्तता।
    यदि ऐसा किया जाता है तो आर्थिक प्रगति के साथ साथ सामाजिक विकास की गाड़ी भी चल पड़ेगी। किन्तु इन सब सामाजिक सेवाओं की जरूरत संयुक्त रूप से होती है और इनकी उपलब्धता सबसे पहली प्राथमिकता के रूप में हमारे साढ़े छः लाख गाँवों के लिए होनी चाहिए। इनमें कुछ की अनुपलब्धता बाकी की सेवाओं की प्रभावशीलता घटा देती है और हमारे नागरिकों को दुष्प्रभाव्यता ग्रसित बना देती है। इन दिनों लोगों की उम्मीदों का बयान अच्छे दिनों के इन्तजार के रूप में हो रहा है। अतः आज के ग्रामीण भारत के सामाजिक विकास के एजेण्डे के नीचे बताए गए बारहों बिन्दुओं पर एक साथ पक्का, पुख्ता, तीन सालों में पूरा होने वाला कार्यक्रम लागू किया जाना चाहिए। इस 10 जुलाई को हमारे देश के 70 प्रतिशत ग्रामीण केन्द्र और राज्यों के बजट से द्वादश नियामतों के एक समग्र पैकेज की प्रतीक्षा करेंगे। ये हैं:-
1. सारे गाँव में नालियों और पानी की निकास व्यवस्था युक्त पक्की सड़कें। 2. मुख्य बाहरी सड़क से जोड़ती सड़क। 3. शौचालय 4. पेयजल 5. प्राथमिक स्कूल भवन 6. चिकित्सा और स्वास्थ्य केन्द्र  7. पंचायत के नियंत्रण में पक्का गोदाम 8. पंचायत का कम्प्यूटरयुक्त दफ्तर। 9. चारागाह 10. ऊर्जा आपूर्ति व्यवस्था।
11 बैंक 12. सार्वजनिक सभा स्थल और खेल का मैदान जिससे कि जब हम आजादी की 70वीं जयंती मना रहे हों तब सारा भारत इन नागरिक सुविधाओं सेवाओं युक्त हो जाए तो हमारा स्वराज्य रामराज्य की नींव डाल देगा।
 -कमल नयन काबरा
 मोबाइलः 09013504389       
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
दिसम्बर --2014