शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

आपातकाल कुछ दिलचस्प पहलू

अटल बिहारी बाजपेई की दुर्गा
ब्रिटेन के चार बार प्रधानमंत्री रहे विलियम ग्लेड्सटन ;1809.1898 से पूछा गया कि देश के विभिन्न राजनीतिज्ञों से उनके कैसे संबंध हैं? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि राजनीतिज्ञों से संबंध, स्वयं एवं अपनी पार्टी के हितों को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं।
लगभग यही बात हमारे देश पर भी लागू होती है। आपातकाल के संदर्भ में यदि राजनीतिज्ञों के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण किया जाए तो एक अजीबोगरीब चित्र उपस्थित होता है।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में अनेक नवयुवकों ने आपातकाल का विरोध किया था और जेल की यंत्रणा भी भोगी थी। इनमें लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव आदि शामिल हैं। इनमें लालू प्रसाद यादव तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं और अब ऐसे लक्षण स्पष्ट नजर आ रहे हैं कि बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव की जोड़ी, कांग्रेस से हाथ मिलाकर विधानसभा चुनाव लड़ेगी।
आपातकाल के दौरान एक लोकप्रिय नारा था 'संजय, विद्या, बंसीलाल- आपातकाल के तीन दलाल'। इनमें से विद्याचरण शुक्ल ने भारतीय जनता पार्टी के टिकिट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा था। संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी, जो आपातकाल की प्रबल समर्थक रहीं, वे बरसों पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो चुकी हैं और भाजपा की टिकिट पर चुनाव लड़ती हैं। वे वर्तमान में मंत्री भी हैं। यह इस तथ्य के बावजूद कि वे आपातकाल की प्रबल समर्थक थीं और शायद आज भी हैं ;उन्होंने पिछले वर्षों में कभी भी आपातकाल के विरोध में कुछ नहीं कहा। विद्याचरण तो आपातकाल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। उनका काम ही था आपातकाल को सही ठहराना। वे एक शक्तिशाली मंत्री थे और इंदिरा गांधी के काफी नजदीक थे। आपातकाल की ज्यादतियों की जांच करने के लिए जो आयोग बना था उसके समक्ष अपना बयान देते हुए उन्होंने आपातकाल में हुई अनेक ज्यादतियों की जिम्मेदारी खुद पर ली थी। बाद में राजीव गांधी से मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और विश्वनाथ प्रताप सिंह का दामन थामा। इस दरम्यान भी उन्होंने कभी आपातकाल की निंदा नहीं की। इस तथ्य के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें लोकसभा के छत्तीसगढ़ के एक संसदीय क्षेत्र से टिकिट दिया थाए यद्यपि वे चुनाव जीत नहीं पाए।
इसी तरहए बंसीलाल आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के सर्वाधिक नजदीकी राजनेता समझे जाते थे। बाद में उन्होंने भी कांग्रेस छोड़ दी और एक दौर ऐसा भी आया जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर हरियाणा में सरकार बनाई। बंसीलाल ने भी शायद कभी भी आपातकाल की निंदा नहीं की।
इस तरह आपातकाल का विरोध करने वालेए कांग्रेस . जिसने आपातकाल लागू किया था के साथ हो लिए और जिन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था, वे आपातकाल के सर्वाधिक तीखे विरोधी राजनीतिक दल भाजपा के साथ चले गए। इससे ही ग्लेड्सटन का वह कथन सही साबित होता है कि राजनैतिक नेता अपना नजरियाए सिद्धांतों और आदर्शों के आधार पर नहीं बल्कि अपने संकुचित हितों से तय करते हैं।
आपातकाल के बाद जो चुनाव हुए उनमें इंदिरा जी और कांग्रेस की हार हुई। उसके बाद मोरारजी भाई के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। इस सरकार का क्या हश्र हुआ, यह किसी से छुपा नहीं है। तीन साल से भी कम समय में इंदिरा.विरोधी सरकार का पतन हो गया। पतन दो कारणों से हुआ। आज की भारतीय जनता पार्टी, उस समय जनसंघ के नाम से जानी जाती थी। आपातकाल में हुए चुनावों के बाद सभी पार्टियों ने मिलकर एक दल बनाया और अपनी.अपनी पुरानी पार्टियों को भंग कर दिया। जनसंघ ने भी ऐसा ही किया परंतु जनसंघ के बहुसंख्यक सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे इसलिए मधु लिमये और अन्य समाजवादियों ने मांग की कि जनसंघ के ऐसे सदस्य, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैंए  संघ से अपना नाता तोड़ें। परंतु यह बात जनसंघ के नेतृत्व को मंजूर नहीं थी। इस मतभेद के कारण जो मिलीजुली पार्टी थी वह समाप्त हो गई।
उस समय की मंत्रिपरिषद के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण सदस्य चौधरी चरणसिंह थे। चरणसिंह की जिद के कारण ही इंदिरा जी को गिरफ्तार किया गया था। उस समय कुछ लोगों का यह मत था कि इंदिरा जी को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसा करके उन्हें जिंदा शहीद बना दिया जायेगा जिसका वे पूरा लाभ उठाने की कोशिश करेंगी। परंतु चरणसिंह की जिद के कारण इंदिरा जी की गिरफ्तारी हुई। उन्हीं चरणसिंह ने सबसे पहले जनता पार्टी से अपना नाता तोड़ा और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए। थोड़े समय के बाद कांग्रेस ने चरणसिंह से अपना समर्थन वापिस ले लिया। यह भी दिल्ली में पहली बार बनी गैर.कांग्रेसी सरकार के पतन का एक प्रमुख कारण था।
इस प्रकार जिन लोगों ने इंदिरा जी को तानाशाह कहा, जिन्होंने उन्हें प्रजातंत्र.विरोधी कहा, वे स्वयं देश को एक स्थायी सरकार नहीं दे सके। सन् 1980 के चुनाव में इंदिरा जी पूरे दमखम से जीतकर आईं और प्रधानमंत्री बनी। इस घटनाक्रम से आम लोगों को काफी निराशा हुई। यदि गैर.कांग्रेसी सरकार, देश को एक स्थायी और जनहितैषी शासन दे पाती तो शायद देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव आता। परंतु ऐसा नहीं हो पाया।
जहां तक आपातकाल लगाने का सवाल है, इसमें कोई शक नहीं कि इसका मुख्य उद्देश्य इंदिरा जी का प्रधानमंत्री पद बचाना था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने इंदिरा जी के चुनाव को अवैध घोषित कर दियाए जिसके कारण उनका इस्तीफा देना जरूरी हो गया था। उनके चुनाव को प्रसिद्ध समाजवादी नेता राजनारायण ने चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति जगमोहन सिन्हा ने उनके विरूद्ध लगाए गए 14 आरोपों में से दो सही पाए। जो आरोप सही पाए गए उनमें से पहला था सरकारी खर्च से भाषण के लिए मंच बनवाना और दूसरा यह कि इंदिरा जी के चुनाव एजेंट यशपाल कपूर सरकारी नौकरी में थे। हाईकोर्ट ने उन्हें 20 दिन का समय सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के लिए दिया। इस दरम्यान उन्होंने अपील की और सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के निर्णय को पलट दिया। इस तरह इंदिरा जी प्रधानमंत्री के पद पर कायम रहीं। इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की थी। उस समय आपातकाल का विरोध करने वालों की पहली पंक्ति में जो लोग शामिल थे, वे आज कांग्रेस के साथ हैं और जिन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था, उनमें से कई भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं, जिसके तत्कालीन अवतार जनसंघ ने पूरे दमखम से आपातकाल का अफवाहबाजी फैला कर  विरोध किया था।
 प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रामचंद्र गुहा, अपनी किताब 'इंडिया ऑफ्टर गांधी' में लिखते हैं कि आपातकाल लगाने की जिम्मेदारी इंदिरा जी के साथ जयप्रकाश नारायण की भी थी। दोनों ने प्रजातांत्रिक संस्थाओें में अपनी आस्था नहीं दिखाई। हाईकोर्ट के फैसले के एकदम बाद इंदिरा जी का इस्तीफा मांगना उचित नहीं था' वहीं उनका इस्तीफा मांगने के कारण इंदिरा जी द्वारा जनप्रतिनिधियों को गिरफ्तार कर जेल में डालना भी उचित नहीं था।
-एल.एस. हरदेनिया

रविवार, 28 जून 2015

अमरीका, लोकतंत्र, आतंकवाद व धार्मिक अतिवाद


  बहुत से पाठकों को यह शीर्षक ही बड़ा अटपटा लगेगा लेकिन यह इस निबन्ध की एक पड़ताल का विश्लेषण करने का प्रयास है। जो अमरीका के आतंकवाद, लोकतंत्र व धार्मिक अतिवाद के गठजोड़ पर आधारित है। वर्षों के बड़े प्रोपेगंडा के कारण बहुत से लोग यह मानने लगे हैं कि अमरीका संसार में लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी व प्रोत्साहक है और संसार में हर दशा में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना चाहता है धार्मिक अतिवाद व आतंकवाद के विरोध में लड़ी जा रही लड़ाई का पड़ताल करें और यह भी देखने का प्रयास करें कि भारत में उसकी क्या भूमिका रही है।
    वर्षों की अंदेखी, उदासीनता व हाशिए पर रहने के बाद दक्षिण एशिया का क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय पटल पर तेजी के साथ उभरा है। इस क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान, बंग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल व मालदीप आते हैं। तेल के बड़े भण्डारों व सामरिक महत्व के कारण खाड़ी के देश अधिक महत्वपूर्ण माने जाते रहे। तत्पश्चात अमरीका, योरोपीय यूनियन, चीन व जापान जैसे महत्वपूर्ण देशों ने दक्षिण एशिया की ओर देखना शुरू किया और 9/11 की घटना के बाद तो अमरीका का ध्यान पूरे तौर पर इस ओर हुआ। ‘‘आतंकवाद’’ से अमरीका ने सहयोगी देशों की सहायता से इस पूरे क्षेत्र को शक्ति संरचना कर अपने काबू में करना शुरू किया और पाकिस्तान व अफगानिस्तान में यह काफी हद तक सफल भी रहा। साथ ही उसने भारत के अपने रिश्तों को भी मजबूत करने का पूरा प्रयास किया जिससे कि चीन के प्रभाव को भी रोका जा सके।
    चोम्सकी, जो वर्तमान संसार में सबसे सम्मानित बुद्धिजीवी माने जाते हैं, 2013 के अपने लेख में कहते हैं कि अमरीका विश्व की सबसे बड़ी आतंकी शक्ति का संचालन कर रहा है। चोम्सकी अमरीकी नागरिक हैं तथा प्रख्यात एम0आई0टी0 मेसोच्यूसेट इंस्टीटयूट आॅफ टेक्नोलाॅजी में वर्षों से प्रोफेसर रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमरीकी व्यवस्था हमेशा कुछ विरोधी व भिन्न मतावलंबितयों को भी बरदाश्त करती रही है जिससे कि संसार को दिखाया जा सके कि अमरीका में असहमति को कितना सम्मान दिया जाता है। इससे मुझे अपने अमरीकी प्रवास में 2006-07 की एक घटना याद आती है हाऊज (अमरीकी राष्ट्रपति का कार्यालय/ आवास) के सामने टेंट लगाये थे या प्लेकार्ड लिए बैठे थे। सबसे अगली कतार में एक अमरीकी महिला एक बड़ा सा पोस्टर लिए बैठी जिस को उस समय मेकअप में दिखाया था और बड़े-बड़े अक्षरों में उसके नीचे लिखा था ‘‘विश्व का सबसे बड़ा आतंकवादी’’। अमरीकी स्वार्थो पर हमला नहीं करती। चोक्सी व हरमेन का यह भी मानना है कि तीसरी दुनिया में जो भी क्षेत्र अमरीका के प्रभाव में हैं वहाँ वहाँ आतंक का जमावड़ा है। इन विद्वानों ने दस्तावेजों के साथ यह दिखाया है कि किस प्रकार लातेनी अमरीका के गरीब देशों में कठपुतली शासक अमरीका के समर्थन से आतंक के द्वारा अवामी इच्छाओं का दमन करते रहे हैं। वह यह निष्कर्ष निकालते हैं कि आज भूमंडलीय स्तर पर जितना भी आतंकवाद है। अमरीकी विदेशी नीति का परिणाम है। मेकार्ड व स्टाई बर जैसे विशेषज्ञों का यह मानना है कि 9/11 घटना से पहले भी व बाद में भी अमरीका अल कायदा को धन व हथियारों से सीरिया, लीबिया, बोसनिया, चेचेनिया, इरान जैसे अनेकों देशों में अपनी कार्यवाही के लिए सहायता देता रहा हैं ध्यान देने की बात यह है कि ये सभी देश अमरीका के समर्थक नहीं रहे हैं। कहा जाता है कि विश्व में 74 प्रतिशत देशों में जहाँ आतंकी तरीकों को प्रशासनिक सहमति हासिल है, अमरीका की कठपुतली सरकारें हैं। क्या यह मजाक नहीं लगता कि जो महाशक्ति दुनिया में सुबह से शाम तक शांति की बात करती हो, गले-गले तक आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहती है।
    अमरीका के द्वारा लोकतंत्र व लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रोत्साहन देने के दावों की कलई कई बार खुल चुकी है। एक बार फिर इस की पड़ताल कर ली जाये। यदि हम दुनिया का नक्शा उठा कर देखें तो पाते हैं कि लातीनी अमरीका के देशों से लेकर,
मध्यपूर्व, दक्षिणी अफ्रीका तथा दक्षिणी एशिया के देशों तक अमरीका की सहायता से लोकतंात्रिक सरकारों का तख्ता पलट कर तानाशाही सत्ता को कभी सफलता पूर्वक और कभी असफल प्रयासों का सहारा लिया गया है। यहाँ पर कुछ विशिष्ट उदाहरणों के द्वारा इस बात को प्रमाणित किया जा रहा है।
    अमरीका का हमेशा कहना रहा है कि वह लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी गई सरकारों को कभी नहीं हटाने का प्रयास करेगा चाहे वह कोई वामपंथी सरकार क्यों न हो। 1970 में दक्षिणी अमरीका के देश चिली में डाॅ. एलेन्डे की वामपंथी सरकार अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षण में होने वाले चुनाव के द्वारा बनाई गई लेकिन उस को बहुत दिन चलने नहीं दिया गया और सी आईए के द्वारा उस का तख्ता पलट कर फौजी शासन स्थापित कर दिया गया जिस ने इस के विरोध में होने वाले जन आन्दोलन को कुचल दिया। ऐसा ही कुछ निकारागुआ में भी किया गया। 1984 में पारदर्शी चुनाव के द्वारा वहाँ पर एक प्रगतिशील वामपंथ की ओर झुकाव वाली सरकार का गठन किया गया लेकिन अमरीका को निकारागुआ की क्यूबा व सोवियत यूनियन से दोस्ती अच्छी नहीं लगी। अमरीका को इस बात का डर भी खाये जा रहा था कि कहीं निकारागुआ का उदाहरण दूसरे शोषित लातीनी अमरीका के देशों को वामपंथ की ओर न मोड़ दे। अमरीका ने निकारागुआ के लिए ऐसे हालात पैदा कर दिए कि उसे अपना ध्यान व संसाधन अपनी सुरक्षा में लगाना पड़ गया और इस प्रकार आर्थिक संकटों से जूझती हुई सरकार को गिरा दिया गया। क्यूबा पर तो लगातार अमरीकी प्रयास जारी रहा। फोडेल कास्त्रो को मारने का कई बार प्रयास भी किया गया। लेकिन क्यूबा की वामपंथी सरकार को गिराया नहीं जा सका।
    यह सूची इतनी लम्बी है कि दर्जनों पन्ने सियाह हो जाएँगे इस लिए निम्न संक्षिप्त सारणी के द्वारा यह बात आगे बढ़ाई जा रही है  जिस से पाठकों को यह अन्दाजा भली भाँति हो जाएगा कि विश्व के अनेक क्षेत्रों में लोकतंत्र का गला घोंट कर तानाशाहों को किस प्रकार मजबूत किया गया और उनकी सत्ता को कैसे जायज़ ठहराया गया
1    लातीनी अमरीका:
    पिनोशेट (चिली), नोरेगा (पनामा),
    डुवेलियर (हैती), बेनजे़र (बोलेविया)
2    ऐशिया:
    ओमान, कतर, बहरैन के शेख
    सऊदी अरब के बादशाह
    सुहारतों (इण्डोनेशिया)
    जि़याउलहक़ व मुशर्रफ़ (पाकिस्तान)
    बादशाह रज़ाशाह पहेलवीं (ईरान)
3    अफ्रीका:
    बादशाह हसन (मोराक्को)
    गफ्फार नुमैरी (सुडान)
    होसनी मुबारक (मिश्र)
    द0 अफ्रीका के नस्लवादी शासक
4    योरोप:
    फ्रानको (स्पेन)
    सालाज़ार (पुर्तगाल)    

    तुर्की व यूनान की फ़ौजी सत्ता इन तथा इन जैसे अनेक दूसरे उदाहरणों से यह प्रमाणित हो जाता है कि अमरीकी लोकतंत्र का मुखौटा कितना महीन है और लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के इस के दावे कितने खोखले हैं वरना फौजी शासकों, बादशाहों तथा नस्लवादी शासकों को सभी प्रकार के समर्थन देकर उन की सत्ता को बचाना क्या अर्थ रख सकता है। जाहिर है अपने आर्थिक, राजनैतिक व सामरिक हितों के सामने लोकतंत्र की कोई कीमत नहीं है। सऊदी अरब व ईरान के निर्मम व जालिम बादशाहों को वर्षों तक अमरीका ने बचाया क्योंकि वे उस की कठपुतली थे। ईरान के अवाम ने बादशाह के विरोध में बगावत किया, कुरबानी दी और उसे खदेड़ दिया। यह अलग बात है कि ईरान में चुनाव वो करवाती है लेकिन लोकतंत्र पर लगाम है। सऊदी अरब में बादशाहत अब भी बनी हुई है, अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, महिलाओं की हालत बहुत खराब है तथा धार्मिक कट्टरता ने अवाम, विशेष कर अल्पसंख्यकों को पैरों के नीचे दबा रखा है लेकिन अमरीका के आर्थिक व सामरिक हित सर्वाेपरि हैं।
    अजीब विडंबना है कि संसार भर में आतंकवादी गतिविधियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अमरीका का हाथ देखा जा सकता है और इस्लाम के नाम पर होने वाली आतंकी गतिविधियों में तो सीधे अमरीका की भूमिका देखी जा सकती है। चूँकि अमरीका के आर्थिक व सामरिक हितों को सब से अधिक खतरा इस्लामी चरमपंथियों से था इस लिए उस ने विश्व मीडिया शक्ति को इस्लामी आतंकवाद का डर दिखाने को लगा दिया। बहुतों को इस बात पर विश्वास भी हो गया कि मुस्लिम आतंकवाद विश्व शांति के लिए सब से बड़ा खतरा है। जब हकीकत यह है कि मुस्लिम आतंकवाद विश्व आतंकवाद का केवल एक छोटा सा अंशमात्र है। अमरीका के सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफेसर चाल्र्स कुर्ज़मैन ने अपने अध्ययन ष्ज्ीम उपेेपदह डंतजलते रू ॅील जीमतम ंतम ेव मिू उनेसपउ ज्मततवतपेजेघ्ष् के द्वारा यह स्थापित किया है कि मुस्लिम आतंकवाद को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया। उन्होंने यह सवाल भी किया कि हमने इस बात पर क्यों विश्वास किया कि उनकी संख्या बहुत बड़ी है और हम इतना क्यों डरे हुए थे। पिछले पाँच वर्षों की घटनाओं ने प्रोफेसर कुर्जमैन की बात को सही साबित कर दिया। आज पूरे योरोप व अमरीका में प्ेसंउवचीवइपं अर्थात इस्लाम का डर जीवन की एक हकीकत बन चुका है और समाज के दिन प्रतिदिन जीवन में देखा जा सकता है।
    तथाकथित मुस्लिम या इस्लामी आतंकवाद की ताकत व फैलाव चाहे जितना हो लेकिन आज यह स्थापित हो चुका है कि इसके पीछे काफी हद तक इस्लाम की वह चरमपंथी व्याख्या है जो साम्राजी के नाम से जानी जाती है और जिसका प्रमुख स्रोत सऊदी अरब है जो साम्राजी विचारधारा को ही सच्चा इस्लाम मान कर उसके प्रचार व प्रसार पर अरबों डालर खर्च करता रहा है। अब इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान व अफगानिस्तान के तालिबान से लेकर नाइजीरिया के अलशबाब व बोकोहरम व इराक-सीरिया के इस्लामिक स्टेट (आई0एस0) तक सभी विचारधारा से प्रोत्साहित होते हैं। योरोप व अमरीका सहित समूचे विश्व में सऊदी पेट्रोडालर की सहायता से मस्जिदों व मदरसों पर कब्जा किया जा रहा है और वहीं से साम्राजी विचारधारा को ही सही इस्लाम के रूप में प्रसारित व प्रचारित किया जा रहा है। कैसा मज़ाक है, कि वह अमरीका जो सुबह से शाम तक इस्लामी आतंकवाद की रट लगाए रहता है, मुस्लिम संसार में अपने को ही गले से लगाये हुए हैं। बादशाहत, धार्मिक अतिवाद व पूँजीवाद के इस अजीबों गरीब मिश्रण को अमरीका ही
साध सकता है। संतोष की बात यह है कि अपने सभी प्रयासों के बावजूद समूचे विश्व की आबादी का एक छोटा सा हिस्सा ही इस विचारधारा के प्रभाव में है लेकिन जिस तेजी के साथ यह फैल रहा है शांति के लिए बड़ा खतरा बन सकता हैं।
        यह हम कैसे भूल जाएँ कि अफगानिस्तान में सोवियत रूस के विरोध में अमरीका ने ही तालीबान को प्रोत्साहन व समर्थन दिया था और पाकिस्तान के फौजी शासकों के द्वारा उन के मदरसों को बढ़ावा मिला था। भारत में हिन्दुत्व व चरमपंथी हिन्दु शक्तियों के पीछे भी अप्रत्यक्ष रूप से अमरीका को देखा जा सकता है। भारत के मजदूर-किसान-दलित-आदिवासी की एकता आदि को तोड़ने के लिए जिस प्रकार से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उस के अनुषंगी संगठन लगे हुए हैं उसे कोई भी देख सकता है। स्वदेशी व भारतीयता का गला फाड़ फाड़ कर नारा लगाने वालों की जब केन्द्र में सत्ता स्थापित हुई तो कारपोरेट सेक्टर के हित ही देशहित हो गये और सांप्रदायिक तनाव के धुएँ में असली मुद्दों को छुपाने का प्रयास हो रहा है। पूँजीवादी फासीवाद हमारे देश में दस्तक दे रहा है। हमें इतिहास से सबक लेकर यह नहीं भूलना चाहिए कि फासीवाद लोकतांत्रिक चुनावों के कंधों पर चढ़ कर ही आता रहा है। हिटलर व मुसोलनी इस के उदाहरण हैं। लोकतंत्रीकरण व लोकतंात्रिक मुकाबला कर सकती है। एक व्यक्ति ही सब कुछ कर देगा, यह सोच ही  फासीवाद व तानाशाही की ओर उठा पहला कदम है जिसके लिए हमें सचेत रहना है।        
 -प्रो0 नदीम हसनैन
        मोबाइल: 09721533337
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

शुक्रवार, 26 जून 2015

महात्मा गांधी की हत्या सबसे पहली आतंकी वारदात

वरिष्ट पत्रकार सुभाश गताडे से आतंकवाद के मुद्दे पर की गई बातचीत के अंश
                                                                                                    -राजीव यादव
 देश में आतंकवादी घटनाओं की शुरुआत कहाँ से मानते हैं?

    अगर आजाद भारत की बात करें तो मेरी समझ से महात्मा गांधी की हत्या सबसे पहली आतंकी घटना है, और वहीं से कमसे कम भारत के सन्दर्भ में आतंकवाद की शुरूआत मानी जा सकती है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ भारत की अवाम के संघर्ष के नेता गांधी जिन्होंने साम्प्रदायिक राजनीति की निरन्तर मुखालिफत की एवं समावेशी राजनीति की हिमायत की, उनकी हत्या में नाथूराम गोड्से ने भले ही गोली चलाई हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके लिए लम्बी साजिश रची गई थी, जिसमें हिन्दुत्ववादी संगठनों का हाथ था। गांधी की हत्या को लेकर एक बात अक्सर भुला दी जाती है कि उन्हें मारने के लिए इसके पहले इन्हीं संगठनों की तरफ से कई कोशिशें हुई थीं, और इस आखरी कोशिश में वे कामयाब हुए।
     यह जो आतंकवाद है यह कितना देशी है और कितना वैश्विक है?
    मेरे खयाल से यह प्रश्न बहुत प्रासंगिक नहीं है। आतंकवाद के देशी रूप भी
हो सकते हैं और उसके वैश्विक रूप भी हो सकते हैं, मूल बात यह समझने की है कि आप उसे किस तरह परिभाषित करते हैं। यूँ तो आतंकवाद को कई ढंग से परिभाषित किया जा सकता है, राज्यसत्ता द्वारा निरपराधों पर किए जाने वाले जुल्म-अत्याचार को भी इसमें जोड़ा जाता है, मगर इसकी अधिक सर्वमान्य परिभाषा है जब राजनैतिक मकसद से कोई समूह, कोई गैर राज्यकारक अर्थात नानस्टेट एक्टर हिंसा या हिंसा के तथ्य fact of violence का इस्तेमाल करे और निरपराधों को निशाना बनाए। इसके तहत फिर हम साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित जैसे हिन्दुत्ववादी गिरोहों की हिंसक कार्रवाइयों को भी समेट सकते हैं या किसी जिहादी संगठन द्वारा निरपराधों को निशाना बना कर की गई कार्रवाई को भी देख सकते हैं या किसी जियनवादी गिरोह द्वारा फिलिस्तीनी बस्ती में मचाए कत्लेआम को भी देख सकते हैं या किसी ब्रेविक द्वारा अंजाम दिए गए मासूमों के कत्लेआम को भी समेट सकते हैं।
    मोदी के आने के बाद आतंकवाद की राजनीति और संस्थाबद्ध होगी या रुकेगी। रुक जाने का सन्दर्भ यह है कि क्या वह दूसरी राजनीति करेंगे?
    मोदी जो हिन्दुत्व की लहर पर सवार होकर प्रधानमंत्री बने हैं, उनके सत्तारोहण को हम बहुंसंख्यकवाद की राजनीति की जीत के तौर पर देख सकते हैं। यह भी स्पष्ट है कि आजादी के बाद पहली दफा हिन्दुत्व की ताकतों को अपने बलबूते सत्ता सँभालने का मौका मिला है, जिसे एक तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे की बढ़ती स्वीकार्यता के तौर पर व्याख्यायित किया जा रहा है। आजादी के बाद यह पहली दफा हुआ है कि संसद में अल्पसंख्यक समुदायांे का न्यूनतम प्रतिनिधित्व है, यहाँ तक कि सत्ताधारी पार्टी के सांसदों में भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय से एक भी  प्रतिनिधि नहीं है। अब इस समूची परिस्थिति में जाहिर है कि ऐसी ताकतें-जो हिन्दुत्ववादी संगठनों से ताल्लुक रखती थीं, उस विचार से प्रेरित थी, मगर साथ ही साथ आतंकी घटनाओं में मुब्तिला थीं-उनकी रणनीति में फर्क अवश्य आएगा। एक तो वह कोशिश करेंगी कि उनके जो तमाम कार्यकर्ता जेल में बन्द हैं, उन्हें रिहा करवाया जाए, उनके खिलाफ जारी केस को कमजोर किया जाए और फिर उन्हें नए अधिक वैध एवं स्वीकार्य रूपों में पेश किया जाए। दूसरी यह भी सम्भावना है कि चूंकि राज्यसत्ता में उनके विचारों के हिमायती बैठे हों, वह और अधिक आक्रामक हों, आतंकी घटनाओं को खुद अंजाम दें मगर उसका दोषारोपण अल्पसंख्यक समुदायों पर अधिक निर्भीकता से करें। आप चाहें नांदेड़ में संघ कार्यकर्ताओं द्वारा अंजाम दी गई आतंकी घटना (अप्रैल 2006) को देखें या मालेगांव की घटना (सितम्बर 2006 और सितम्बर 2008) को देखें हम बार-बार यही पाते हैं कि उनकी लगातार कोशिश रहती आई है कि खुद घटना को अंजाम दो, मगर उसे इस ढंग से डिजाइन करो कि अल्पसंख्यक पकड़ में आएँ। दूसरी तरफ इस्लामिक ताकतों का वह हिस्सा-जो आतंकी घटनाओं में मुब्तिला रहा है-वह नई बदली हुई परिस्थितियों में नए ध्रुवीकरण को अंजाम देने या मजबूती दिलाने के लिए कुछ आततायी कार्रवाइयों को अंजाम दे सकता है। हाल के समय में इस्लामिक स्टेट के नाम पर जो सरगर्मी बढ़ी है या अल कायदा की तरफ से भारत में अपना पैर जमाने की जो कोशिशें की जा रही
हैं, वह भी असर डालेंगी। कुल मिला कर आनेवाला समय ऐसे सभी लोगों, समूहों के लिए चुनौती भरा होगा जो हर किस्म के आतंकवाद-फिर चाहे राज्य आतंकवाद हो या गैर राज्यकारकों द्वारा अंजाम दिया जा रहा आतंकवाद हो (जिसका महत्वपूर्ण हिस्सा विशिष्ट धर्म से अपने आप को प्रेरित कहते हुए हिंसा को अंजाम देना होता है)-की मुखालिफत करते हैं और एक आपसी सद्भावपूर्ण समाज की रचना चाहते हैं।
    क्या कानूनों के सेलेक्टिव प्रयोग से इससे शिकार लोगों में राज्य के प्रति नफरत पैदा हो रही है?
    1950 में जब संविधान निर्माताओं ने देश की जनता को संविधान सौंपा तो यह संकल्प लिया गया था कि जाति, वर्ग, धर्म, नस्ल, जेण्डर आदि आधारों पर अब किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा, कानून के सामने सभी समान होंगे। आजादी के साठ साल से अधिक वक्त गुजर जाने के बाद हम इन संकल्पों एवं वास्तविकता के बीच गहरे अन्तराल से रूबरू हैं, जब हम पाते हैं कि दमित, शोषित, उत्पीडि़त समुदायों एवं लोगों पर महज इसी वजह से कहर बरपा हो रहा है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की बहाली के लिए प्रयासरत है और ऐसे लोग, तबके जो सत्ता एवं सम्पत्ति के इदारों पर कुंडली मार कर बैठे हैं, उनके प्रति राज्यसत्ता का रुख नरम है। जाहिर है कि इस दोहरे व्यवहार से जनता के व्यापक हिस्से में राज्य के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है।
    आतंकवाद की राजनीति के आर्थिक आधार क्या हैं? क्या यह वैश्विक आर्थिक मंदी से जुड़ा हुआ है?
    आतंकवाद को महज आर्थिक मंदी से जोड़ना नाकाफी होगा, वह इस वजह से भी इन दिनों बलवती जान पड़ता है क्योंकि परिवर्तनकामी ताकतें एवं आन्दोलन कमजोर पड़ रहे है। अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध में सोवियत संघ के बिखराव की शुरूआत एवं अन्ततः उसके विघटन ने समाजवाद के विचार एवं प्रयोग को जो जबरदस्त क्षति पहुँचाई है और पूँजीवाद की अंतिम जीत को प्रचारित किया है, उसने भी दुनिया में तरह-तरह के नस्लवादी आन्दोलनों, आतंकी समूहों के फलने फूलने का रास्ता सुगम किया है। जरूरत इस बात की दिखती है कि जनता के हालात में आमूलचूल बदलाव चाहने वाली ताकतें नए सिरेसे संगठित हों, एक समतामूलक राजनीति को मजबूती प्रदान करें तो हम साथ ही साथ इन दिनों सर उठाए आतंकवाद को हाशिए पर जाता देख सकते हैं।
      सजा होने की सम्भावना आतंकवादी घटनाओं में बहुत कम है ऐसा लगता है कि न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीरे चलाई जा रही है ताकि आरोपियों को अधिक समय तक जेल में रखा जा सके। इस पर आप क्या सोचते हैं?
    अगर राज्यसत्ता इच्छाशक्ति का परिचय दे तो आतंकवादी घटनाओं में भी मुकदमे तेजी से चलाए जा सकते हैं और दोषियों को दंडित किया जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे मसलों पर राज्यसत्ता में बैठे लोग-या तो अपने एकांगी विचारों के चलते या ढुलमुल रवैयों के परिणाम स्वरूप सख्त रुख अपनाने से बचते हैं, जिसके चलते ऐसे मुकदमे सालों साल चलते हैं। अगर यौन अत्याचार के मसले को लेकर स्पीडी ट्रायल की बात की जा सकती है तो आतंकी घटनाआंे के मामले में भी हमें इसी किस्म की माँग करनी चाहिए, ताकि असली दोषी को सजा हो और मूलतः निरपराध जेल की यातना से बचें। आप अक्षरधाम आतंकी हमले को देखें जिसे लेकर बारह साल तक कइयों को जेल में सड़ना पड़ा और अन्ततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सभी बेदाग बरी हुए। अदालत का कहना था कि इन लोगों पर ‘आतंकवाद की धाराओं के तहत मुकदमा चलाने का निर्णय बिना दिमाग के लिया गया था। ध्यान रहे कि वर्तमान प्रधानमंत्राी उन दिनों गुजरात में गृह मंत्रालय का कार्यभार सँभाल रहे थे। अब अगर स्पीडी ट्रायल होता तो उनकी बेगुनाही जल्दी सामने आती और उन्हें तथा उनके परिवारजनों को इतना अधिक समय दुख में नहीं गुजारना पड़ता।
    खुफिया एजेंसियों की निष्पक्षता के बारे में बार-बार सवाल उठता रहा है, देश में आई.बी. और रॉ में अल्पसंख्यकों को जाने से रोका जा रहा है इसको कैसे देखा जाए। क्या इनको सही प्रतिनिधित्व मिल जाने से समस्याएँ हल हो जाएगी?
    देश की खुफिया एजेंसियों के कामों में निष्पक्षता को सुनिश्चित करना हो, उसमें अल्पसंख्यक समुदायों के आगमन को रोकने के मसले को सम्बोधित करना हो तो यह बहुत जरूरी है कि उसके कामों में पारदर्शिता लाई जाए और उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। कुछ समय पहले पश्चिमी एशियाई मामलों के जानकार एवं वर्तमान उपराष्ट्रपति डाॅ. हामिद अन्सारी ने रिसर्च एण्ड एनलिसिस विंग अर्थात ‘रॉ’ द्वारा आयोजित आर एन कॉव स्मृति व्याख्यान में इसी मसले को उठाया था। डाॅ. अन्सारी का
कहना था कि गुप्तचर एजंेसियों के संचालन में अधिक निगरानी एवम् जवाबदेही की आवश्यकता है। उनके मुताबिक यह जनतांत्रिक समाजांे का तकाजा होता है कि बेहतर शासन के लिए वह ऐसी प्रक्रियाओं को संस्थागत करें जिसके अन्तर्गत गुप्तचर एजेंसियों को संसद के सामने जवाबदेह बनाया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि ‘‘राज्य के गुप्तचर और सुरक्षा ढाँचे’’ को लेकर अब तक सिर्फ कार्यपालिका और राजनैतिक देखरेख होती रही है, जिसमें इसके दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहती है। इनमें जवाबदेही के अभाव की चर्चा के सन्दर्भ में उन्होंने कारगिल प्रसंग का जिक्र किया जिसमें गुप्तचर एजेंसियों की बड़ी नाकामी सामने आई थी। ध्यान रहे कि आधिकारिक तौर पर कारगिल पर पाकिस्तानी आक्रमण की खबर पहली दफा गुप्तचर एजेंसियों की तरफ से नहीं बल्कि उस इलाके मंे अपने मवेशी चराने के लिए ले जाने वाले गड़रियों से हुई थी। देश की सुरक्षा को जोखिम में डालने वाली इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद किसी भी गुप्तचर  अधिकारी को दण्डित नहीं किया गया था और विभिन्न एजेंसियों ने एक दूसरे पर दोषारोपण करके मामले की इतिश्री कर दी थी।
    हिंदुत्व से उपजे आतंकवाद की सच्चाई क्या है?
    जैसा कि मैं पहले ही चर्चा कर चुका हूँ कि आजाद भारत की पहली आतंकी कार्रवाई को हिन्दुत्ववादी आतंकी गोड्से एवं उसके गिरोह ने अंजाम दिया था यह धारा भले ही मद्धिम हुई हो, लेकिन दबी नहीं है। इस तथ्य से भी बहुत कम लोग वाकि़फ है कि बँटवारे के वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो कार्यकर्ता बम बनाते वक्त कराँची के अपने मकान में मारे गए थे और ट्यूशन पढ़ाने के लिए लिए गए उपरोक्त मकान में विस्फोटकों का जखीरा बरामद हुआ था। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में बने जीवनलाल कपूर कमीशन ने गांधी हत्या की साजिश के लिए प्रत्यक्ष सावरकर को जिम्मेदार ठहराया था। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने आप को ‘चरित्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध कहलाने वाले’ हिन्दुत्ववादी संगठन भी वक्त पड़ने पर आतंकवाद का सहारा लेते रहे हैं। 90 के दशक के उत्तरार्द्ध में हम पाते हैं कि इसे नए सिरेसे उभारा जा रहा है और अधिक स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए उसे ‘इस्लामिस्ट आतंकवाद’ की प्रतिक्रिया के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है। दूसरी अहम बात यह है कि हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व समानार्थी नहीं है (अधिक स्पष्टीकरण के लिए सावरकर की बहुचर्चित किताब ‘हिन्दुत्व’ को देखा जा सकता है), जिस तरह इस्लाम और राजनैतिक इस्लाम को समानार्थी नहीं कहा जा सकता, वही हाल हिन्दुइज्म अर्थात हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व का है। यह फर्क स्पष्ट करना इसलिए जरूरी है क्योंकि जबभी हिन्दु आतंकवादी गिरफ्तार होते हैं या उसकी चर्चा होती है, संघ परिवारी संगठनों की तरफ से हल्ला किया जाता है कि आप धर्मविशेष को बदनाम कर रहे हैं। यह सर्वथा गलत है। इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई की तमाम घटनाएँ इस बात को प्रमाणित करती हंै कि हिन्दुत्व आतंकवाद एक परिघटना है, जो भारत के सेक्युलर एवं जनतांत्रिक स्वरूप के लिए जबरदस्त खतरा बन कर उपस्थित है। जाहिर है कि जो बात अक्सर प्रचारित की जाती है कि हिन्दू आतंकी नहीं हो सकता, यह बात तथ्यों से परे है। जिस तरह हर समुदाय में अच्छे बुरे लोग होते हैं, वही हाल आतंकवाद से प्रभावित होने को लेकर भी देख सकते हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि देश का कानून सभी के लिए समान हो, किसी आतंकी को इसलिए नहीं बक्शा जाए कि वह विशिष्ट समुदाय से है, किसी आतंकी गिरोह के सरगनाओं, मास्टरमाइंडों को इसलिए न बचाया जाए कि वह बहुसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। अपराध सिर्फ अपराध होता है, उसके किसी खास समुदाय द्वारा अंजाम देने से उसकी तीव्रता कम नहीं होती है।
 मो0-09452800752
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

मंगलवार, 23 जून 2015

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम-5

    14 जनवरी 2001 वह तारीख है जब डायमण्ड इण्डिया का पहला अंक प्रकाशित हुआ, शुरू-शुरू में लोगों को लगा कि यह कोई हीरा पन्ना विक्रेताओं की पत्रिका है, बिल्कुल व्यावसायिक नाम, लेकिन अन्दर सारी सामग्री बाजार और बाजारीकरण के खिलाफ! इसे जल्दी ही लोकप्रियता हासिल हो गई, हमारी टीम के सहज और देशज लेखन को लोगों ने पसंद किया, हमने कई खोजपरक रिपोर्टें छापीं, घटनाओं परिघटनाओं को दूसरे नजरिए से देखने की तीसरी दृष्टि को जनता ने हाथों हाथ लिया। लोग कहते थे कि जब वे डायमण्ड इण्डिया पढ़ते हैं, तो उन्हें लगता है कि वे हमसे बातें कर रहे हैं, हमने छोटे-छोटे गाँवों तक इसे पहँुचाया, यहाँ भी संघ परिवार से पंगा बरकरार रहा, राजस्थान में आरएसएस का मुखपत्र ‘पाथेयकण‘ गाँव गाँव पहँुचता है, उसमें संघ अपनी विचारधारा के अनुसार सारा प्रोपेगंडा जन-जन तक पहँुचाने में सफल रहता है। किसी ने भी उसको काउन्टर करने की कोशिश नहीं की, लेकिन डायमण्ड इण्डिया ने यह करना शुरू किया, हमने उनके सघन प्रभाव वाले गाँवों में अपने लिए बड़ी संख्या में पाठक ढूँढ़े, लोगों के पास अब दोनों तरह की आवाजें पहँुच रही थीं, इसे एक विकल्प के रूप में भी स्वीकार किया जा रहा था। हमने साम्प्रदायिकता और जातिवाद पर चोट करने में कभी कोताही नहीं बरती। पत्रिका की माँग लगातार बढ़ रही थी, हम उत्साहित थे, हमने ‘डायमण्ड कैसेट्स‘ नाम से एक ऑडियो डिवीजन भी खोल दिया, उस वक्त तक कैसेट्स का बड़ा जोर था, लोग टेप रिकार्ड्स के जरिये इन्हें सुनते-सुनाते थे, हमारा पहला कैसेट निकला भारत पुत्रों जागो। यह एक लम्बा भाषण था, जो मैंने आरएसएस और अन्य हिन्दू एवं मुस्लिम कट्टरपंथियों के खिलाफ दलित आदिवासी युवाओं के एक कैडर कैम्प में दिया था, निसंदेह मेरा भाषण काफी उत्तेजक और भड़काऊ किस्म का था ( मैं भी क्या करूँ संघ से मिले कट्टरता के संस्कार मेरा आज तक पीछा नहीं छोड़ रहे हैं) इस भाषण के कैसेट ने काफी हंगामा मचाया, यह वह दौर था जब संघ परिवार द्वारा देश भर में घुमा घुमा कर विषवमन कर रही दो महिला साध्वियों के भाषण काफी तहलका मचाए हुए थे, मेरे भाषण को उनका जवाब माना गया, मजेदार स्थितियाँ यह थीं कि बहुत सारे चैराहों पर एक तरफ फायरब्रांड हिंदुत्ववादी ऋतम्भरा और उमा भारती के कैसेट्स चीखते थे तो दूसरी तरफ पान की केबिनों पर मेरा कैसेट चिल्लाता था, थक हार कर संघ समर्थकों ने अपने कैसेट्स वापस ले लिए, तो मेरे समर्थकों ने भी मेरा भाषण ‘भारत पुत्रों जागो‘ बजाना बंद कर दिया, इस तरह हमने उग्रपंथी तत्वों को उन्हीं की जबान और भाषा शैली में जवाब दे दिया था, डायमण्ड इण्डिया के जरिये हम मुद्रित अक्षरों के जरिये लड़ाई पहले से ही छेड़े हुए थे।
    मेरे बाकी के साथियों को विचारधारा इत्यादि से ज्यादा मतलब नहीं था, वे तो लोगांे द्वारा मिल रहे रिस्पांस से ही बेहद खुश थे, मगर यह खुशी अस्थाई साबित हुई, आरएसएस का जाल इतना फैला हुआ है कि उसका कई बार तो अंदाजा लगाना ही कठिन हो जाता है, अब तक उन्होंने मेरी हरकतों को या तो नजरंदाज किया था। अथवा उन पर छोटी मोटी प्रतिक्रियाएँ दी थी, लेकिन इस बार उन्होंने संगठित वार किया, उन्हें मालूम था कि डायमण्ड इण्डिया का पूरा समूह सरकारी नौकरीपेशा है, इसलिए उन्होंने हमारे बाकी साथियों को पकड़ना प्रारंभ किया। चूँकि मैं नौकरी छोड़ चुका था, शेष सभी सरकारी सेवा में थे, इसलिए चिंता होना स्वाभाविक ही था। आने वाला समय उनके लिए मुश्किलात भरा हो सकता है, यही सोच कर हमने तय किया कि पैसा तो सभी साथियों का लगा रहेगा लेकिन नाम हटाये जाएँगे, ताकि उन पर कोई विपत्ति ना आ पड़े।
    अब डायमण्ड इण्डिया की पूरी जिम्मेदारी मेरे कन्धों पर ही आ गई थी, लेकिन बाकी साथी भी गाहे बगाहे मदद कर देते थे। दूसरी तरफ संघ परिवार के लोग हमारे प्रकाशन के खिलाफ जगह-जगह आग उगलने लग गए थे, वे लोगांे को सदस्य नहीं बनने के लिए भड़काते रहते थे। उनका एक ही उद्देश्य था कि किसी तरह यह पत्रिका बंद हो जाए। आगे का समय डायमण्ड इण्डिया के लिए काफी कष्टप्रद साबित होने जा रहा था, अब संघी हमारे विचारों की हत्या करने पर उतारू हो गए थे। हमारे खिलाफ ऐसा दुष्प्रचार किया गया कि उसका जवाब देते-देते हमारी जान निकलने लगी। इसी ऊहापोह में अप्रैल का महीना आ गया, इस माह का अंक निकाल कर मैं भीलवाड़ा स्थित ऑफिस में बैठा हुआ अखबार पढ़ रहा था। आज की ‘राजस्थान पत्रिका‘ में एक खबर छपी थी कि राजसमन्द की जनावद ग्राम पंचायत में ‘मजदूर-किसान शक्ति संगठन‘ ने एक जनसुनवाई आयोजित की है, जिसमें लाखों रुपये का घोटाला ग्रामीण विकास के कामों में उजागर हुआ है, मुझे जनसुनवाई की इस अद्भुत तकनीक के बारे में और भी जानने की इच्छा पैदा हुई। खबर के मुताबिक अगले दिन ब्यावर के सुभाष गार्डन में ‘सूचना के अधिकार पर पहला राष्ट्रीय अधिवेशन‘ होने जा रहा था, मैंने इसमें जाने का फैसला किया। कल सुबह जल्दी वहाँ जाना है।
चोरीवाड़ो घणों होग्यो रे,
कोई तो मुंडे बोलो

    6 अप्रैल 2001 को सूचना के अधिकार के पहले राष्ट्रीय अधिवेशन की रिपोर्टिंग करने के लिए पहँुचा। पत्रकार होने के सम्पूर्ण अहंकार के साथ मैं ब्यावर पहँुचा, सोचा कि मीडिया के लिए बैठने के लिए अलग व्यवस्था होगी, लेकिन वहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं था, बड़े से मंच पर बहुत सारे लोग बैठे थे, जिनमें से लोकसभा के अध्यक्ष रहे रवि राय, हिंदी पत्रकारिता के दिग्गज प्रभाष जोशी और राजस्थान के तत्कालीन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को मैं पहचान पाया, बाकी के रंग बिरंगे मंचासीनों को पहली ही बार देखा था। नीचे पंडाल में हजारों लोग मौजूद थे, कई सारे स्टाल लगे हुए थे, जिनमें साहित्य और खाने पीने के सामान बिक रहे थे, मेले का सा दृश्य था।
    मैंने संचालन कर रही टीम के पास पहँुच कर बात करने का प्रयास किया, तीन चार लोग मिलकर मंच चला रहे थे, उनमें एक लड़की भी थी, साड़ी पहने हुए, मैंने उसे अपना परिचय दिया, डायमण्ड इण्डिया की एक प्रति भी दी और प्रेसनोट भेजने का आग्रह किया। उक्त लड़की ने कोई खास रुचि नहीं दिखाई, पत्रिका हाथ में ले ली और हाँ हूँ में जवाब दे कर मुझे वहाँ से टरका दिया। मुझे अजीब सा लगा, पहले तो मैंने उसे ही अरुणा रॉय समझ लिया था, उसके उपेक्षापूर्ण व्यवहार से मुझे निराशा हुई, बाद में पता चला कि उन मोहतरमा का नाम सौम्या किदाम्बी है, जो उस दिन किसी घमंड की वजह से नहीं बल्कि अपनी अतिव्यस्तता और काम के अत्यधिक बोझ के चलते मुझसे शीघ्रातिशीघ्र पिंड छुड़वाने की कोशिश में थीं। बाद के दिनों में इस पहली मुलाकात को याद करके हम लोग काफी हँसे।
    सूचना के अधिकार के इस प्रथम अखिल भारतीय सम्मलेन में शिरकत करना मेरे लिए अच्छा और नया अनुभव था, मैंने प्रचुर मात्रा में वहाँ से साहित्य खरीदा, कई लोगों से मुलाकात की और भीलवाड़ा लौट आया। मई के अंक में हमारी कवर स्टोरी थी ‘चोरीवाड़ो घणों होग्यो रे, कोई तो मुंडे बोलो’ (चोरियाँ और घोटाले बहुत हो गए हैं, कोई तो इनके खिलाफ मुँह खोलो और जोर लगा कर बोलो) दरअसल यह एक बहुत ही शक्तिशाली मारवाड़ी गीत था, जिसे मजदूर-किसान शक्ति संगठन के लोगों ने मंच से गाया था। गीत गाँव के छोटे चोर से लेकर दिल्ली में बैठे बड़े बड़े घोटालेबाजों का पर्दाफाश करते हुए लोगों से अपनी खामोशी तोड़ने का आह्वान करने वाला था, उफ इतनी ताकतवर प्रस्तुति! मेरे लिए इसे सुनना एक युग की यात्रा करने जैसा था, राजस्थानी भाषा की मिठास लिए यह गीत मेरे मन और मस्तिष्क पर कई दिनों तक छाया रहा। इतनी कड़वी हकीकत और नंगी सच्चाई बयान की गई थी कि उसकी प्रशंसा के लिए मेरे पास कोई शब्द ही नहीं थे, जिन महानुभाव की अगुवाई में इसे गाया गया, उनका नाम शंकर सिंह बताया गया था, ब्यावर के ही निकटवर्ती लोटियाना गाँव के निवासी प्रसिद्ध रंगकर्मी। मैं तो इस आदमी के गाने के तौर तरीके का दीवाना होकर लौटा। मन ही मन सोच लिया कि इनसे तो फुरसत से फिर मिलना है, कब, कहाँ और कैसे अभी तय नहीं था, लेकिन मिलन की अदम्य लालसा जरूर गहरे में उतर चुकी थी। इसी अधिवेशन में पहली बार मंच पर अरुणा रॉय को बोलते सुना और निखिल डे को मंच के नीचे से संचालन करते देखा और उनकी आवाज भी सुनी। मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका, कुछ भी हो लेकिन ये लोग बड़े ही पावरफुल अंदाज में अपनी बातें पूरी निर्भीकता से रख रहे थे। मैंने वापस आकर इस
अधिवेशन पर 12 पेज की स्टोरी छापी, उस अंक की 10 कॉपी देव डूंगरी नामक गाँव में भेजी जो कि मजदूर किसान शक्ति संगठन (एमकेएसएस) का मुख्यालय है।
    इसी बीच हमने 11 मई को अपने मित्र घीसूलाल विश्नोई के बुलावे पर दरीबा ग्राम पंचायत की जनसुनवाई कर डाली, जनहित संघर्ष समिति के बैनर तले हुई इस जनसुनवाई में पैनल मेम्बर के रूप में मैं भी शामिल हुआ, हमें कोई आइडिया तो था नहीं कि जनसुनवाई कैसे की जाती है, फिर भी कर डाली, वह भी रात के वक्त! घीसू लाल विश्नोई के घर का चबूतरा ही जन सुनवाई का मंच बन गया, तकरीबन 300 ग्रामीणों की मौजूदगी में तीन घंटे तक यह प्रक्रिया चली। सरपंच बंसीलाल के कार्यकाल में कराये गए विकास कार्यों में हुई अनियमितताओं की परत दर परत पोल खुलने लगी। रात 11 बजे जनसुनवाई खत्म करके जब हम लोग विश्नोई के मकान की छत पर बैठकर खाना खा रहे थे, तब नीचे जनसुनवाई स्थल पर सरपंच समर्थक और सरपंच विरोधी लोगों में लाठी भाटा जंग प्रारम्भ हो गई, जब वे आपस में लड़ लिए तो उन्हें हमारी याद आई। उन्हें अचानक ज्ञान हो गया कि वहाँ के लोग तो वर्षों से मिल जुल कर साथ-साथ रह रहे हैं, पर हम जैसे बाहरी तत्वों की वजह से गाँव वाले परस्पर लड़ रहे हैं, बाद में पुलिस ने आ कर हमें बचाया और वहाँ से बड़ी मुश्किल से भीलवाड़ा पहँुचाया। हालाँकि यह एक जोखिम भरा अनुभव था, लेकिन भ्रष्टाचार के जो मामले उजागर हुए, उनकी विस्तृत रिपोर्ट विकास अधिकारी, पंचायत समिति-सुवाना को कार्यवाही की मांग के साथ हमने भिजवाई, इस रिपोर्ट की एक प्रति मजदूर किसान शक्ति संगठन को भी भेजी गयी।
    सूचना के अधिकार अधिवेशन पर कवर स्टोरी वाला डायमण्ड इण्डिया का अंक और दरीबा ग्राम पंचायत की जनसुनवाई रिपोर्ट जब देवडूंगरी पहँुची तो यह मजदूर किसान शक्ति संगठन के लोगों के लिए कौतूहल और आश्चर्य का विषय हो गया, चर्चा हुई कि हमारे कार्यक्षेत्र में ये कौन लोग थे जो जातिवाद, भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता के खिलाफ इतने मुखर तरीके से आवाज उठाते हुए लिख रहे हैं। मजदूर किसान शक्ति संगठन की सेंट्रल कमेटी ने तय किया कि डायमण्ड इण्डिया निकालने वाले लोगों से कोई कार्यकर्ता जाकर मिले और उनके साथ काम का एक रिश्ता बनाया जाए। दूसरी तरफ हम लोग भी चाह रहे थे कि इन लोगों के साथ मिल कर कुछ काम किया जाए। दोनों तरफ इच्छा थी मिलने मिलाने की, ध्येय भी एक ही था, मंजिल की ओर सफर हम सब लोगों को एक ही तरफ ले जा रहा था, लेकिन राहें अभी तक एक ना थी, अभी तो ढंग से मुलाकात भी नहीं हुई थी, लेकिन मुलाकात होनी ही थी, उसे कौन टाल सकता था।
    खैर, उस वक्त तो बात आई गई हो गई, हम भी अपने आप में मस्त और वे लोग भी अपने काम में व्यस्त, लेकिन मिलन का संयोग जल्दी ही बन गया और एक साम्प्रदायिक घटना की बदौलत हम मिल गए। हुआ यह कि भीलवाड़ा जिले की आसीन्द तहसील मुख्यालय पर स्थित गुर्जर समाज के अंतर्राष्ट्रीय धर्मस्थल सवाईभोज मंदिर परिसर में 400 साल से मौजूद रही एक कलंदरी मस्जिद को आरएसएस से प्रभावित उग्र गुर्जर युवाओं के एक समूह ने ढहा दिया आसीन्द अयोध्या बनने की राह पर था।
आसीन्द बना अयोध्या: बाबरी से बराबरी
   आसीन्द के निकटवर्ती गाँव गोविन्दपुरा में गुर्जर समाज के आराध्य एवं राजस्थान के सुप्रसिद्ध लोकदेवता देवनारायण का भव्य मंदिर बना हुआ है, यहीं पर बगडावत महाभारत हुआ था, जहाँ पर देवनारायण के पूर्वजों ने अपने दुश्मनों से लम्बी लड़ाई लड़ी थी, इस जगह पर कभी किसी मुगल बादशाह ने अपने संक्षिप्त प्रवास के दौरान नमाज अदा करने के लिए एक मस्जिद निर्मित करवाई थी, जो अब तक मौजूद थी। इस बारे में राजस्थानी की प्रख्यात लेखिका स्वर्गीय लक्ष्मी कुमारी चुण्डावत ने अपने विशाल ग्रन्थ‘ बगडावत महाभारत‘ में एक जगह लिखा है कि-‘मुझे सवाईभोज मंदिर समूह के बीचों बीच मस्जिद का होना आश्चर्यजनक लगता है’ मतलब यह है कि मस्जिद के अस्तित्व को सवाईभोज पर प्रामाणिक ग्रन्थ लिखने वाली लेखिका भी स्वीकार कर रही थीं। इस मस्जिद में वर्षों से शायद ही कभी नमाज पढ़ी गई थी, लेकिन वह वहाँ मौजूद थी, लेकिन जैसे-जैसे गुर्जर समाज में राजनैतिक और सामाजिक चेतना आने लगी और उनका भगवाकरण हुआ वैसे-वैसे इस मस्जिद का ढाँचा कतिपय युवाओं को अखरने लगा, वहाँ के लोगो ने इस जीर्ण शीर्ण धर्म स्थल का विध्वंस करने की तैयारी कर ली और मई जून 2001 को एक दिन यह कर भी दिया। मैंने कई बार सवाईभोज मंदिर को देखा था और उस मंदिर समूह के मध्य स्थित उक्त मस्जिद को भी देखा था।
    मुझे जैसे ही मस्जिद को गिरा दिए जाने की खबर मिली, मैं सवाईभोज जा धमका, जब मैं पहँुचा, तब तक मस्जिद पूरी तरह से तोड़ी जा चुकी थी और उसका मलबा पास में ही स्थित तालाबनुमा गड्ढे में डाल कर पानी भर कर उसे छिपा लिया गया था। अब कलंदरी मस्जिद की जगह पर पीर पछाड़ हनुमान (बजरंग बली) की मूर्ति स्थापित की जा चुकी थी, मैंने जल्दी से कुछ फोटो ली और भीलवाड़ा लौट आया। जब इस विध्वंस की खबर मीडिया तक पहँुची और आसीन्द के मुस्लिम समाज ने इसके विरोध में आवाज उठाई, तो देश भर में यह बात फैलने लगी। कई सारे चैनल्स और अखबारों के प्रतिनिधि आसींद पहुँचने लगे, आसींद एक अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा हो गया, उन दिनों प्रतिदिन मैं भी आसींद जाता था। आसीन्द उस वक्त अयोध्या बना हुआ था और कलंदरी मस्जिद बाबरी मस्जिद की बराबरी कर रही थी, हंगामा तो होना ही था। आखिर यहाँ भी एक मस्जिद शहीद की गई थी अयोध्या की ही भाँति। मीडिया का बढ़ता दबाव और प्रशासनिक अदूरदर्शिता के चलते क्षेत्र में भयंकर तनाव फैल चुका था। वैसे भी भीलवाड़ा जिला गुर्जर समाज के लोगों की बहुलता वाला जिला है। वे जो कर दें वह सही माना जाता है, अब यह जो हुआ उसे भी अधिसंख्य लोग मौन स्वीकृति दिए हुए थे, सेकुलर किस्म के लोग भी चुप ही थे, कुछ तो वोट के डर से और कुछ लट्ठ के डर से। कौन पंगा ले? मैं जानता था कि यह कृत्य सम्पूर्ण गुर्जर समाज का नहीं है, इसमें अगुवाई संघ परिवार से जुड़े गुर्जर यूथ की अग्रणी भूमिका रही है। मैंने निश्चय किया कि कोई और बोले या नहीं बोले मुझे इस पर अपनी राय स्पष्ट रखनी होगी। मैं जरुर बोलूँगा, पर सवाल यह था कि किसके सामने?  मैं इसी ऊहापोह में आसींद पहँुचा ही था कि पता चला कि किन्ही मानवाधिकार संगठनांे की एक टीम आई हुई है और डाक बंगले में जिला कलेक्टर के साथ बातचीत करने गई है। मैं भी वहाँ पहँुचा, खिड़की से जो पहला चेहरा दिखा, वह पहचान में आ गया था, अरे ये तो मजदूर किसान शक्ति संगठन वाले लोग हैं, बाद में मिलने और परिचय से पता चला कि यह पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज की फैक्ट फाइंडिंग टीम है, जो मस्जिद गिराई जाने की सच्चाई का पता लगाने पहँुची है। इसमें नीलाभ मिश्र, कविता श्रीवास्तव, निखिल डे और शंकर सिंह इत्यादि लोग शामिल हैं। उनकी खबर पाकर वहाँ पर कुछ अखबारों के प्रतिनिधि और टी.वी. चैनल्स के स्ट्रिंगर्स भी आ गए। जिला कलेक्टर और मीडिया कर्मियों से फ्री होने के बाद हम लोगों ने विस्तृत बातचीत की, मैंने उन्हें बताया कि इस सवाईभोज मंदिर परिसर में सदियों से बिना किसी तकलीफ के यह प्राचीन मस्जिद मौजूद रही है, जिसे अकारण ही तोड़ दिया गया और उस स्थान पर पीरपछाड़ हनुमानजी स्थापित किए जा चुके हैं, मैं इस घटना के तुरंत बाद घटनास्थल पर पहँुचा हूँ।
    मैंने मानवाधिकार संगठनों की इस टोली को वहाँ मस्जिद के होने से सम्बंधित कई दस्तावेज और फोटो उपलब्ध करवाए, क्यांेकि मंदिर ट्रस्ट ने वहाँ कभी भी कोई मस्जिद होने की बात को सिरे से ही नकार दिया था। मैंने यह भी कहा कि आज भी मंदिर परिसर में लक्ष्मी कुमारी चुण्डावत की किताब बिक रही है, उसमें भी इस मस्जिद का जिक्र है। मैंने यह भी कहा कि कलंदरी की इस शहादत का सबसे प्रमुख आरोपी कांग्रेस के एक बड़े नेता का बेहद नजदीकी है, संयोग से ये नेताजी आजकल राजस्थान कांग्रेस के खेवनहार हैं। कभी-कभी जातिवाद का जोर इतना हो जाता है कि जातिहित में लोग अपनी विचार धाराओं का भी त्याग कर देते हैं। सवाई भोज मस्जिद मामले में गुर्जर समाज पूरी तरह एकजुट था, किसी भी पार्टी या विचारधारा से ताल्लुक रखने वाला व्यक्ति क्यों ना हो, वह अपनी जाति के लिए कुर्बान होने को तैयार था। उन दिनों मुझे आसीन्द का यह मंदिर अकाल तख्त की याद दिलाता था, लोग चीखती हुई खाड़कू जबान में धमकियाँ देते थे कि जो भी मस्जिद की बात करेंगे, उन्हें काट डाला जाएगा। मैंने हर बार की तरह इस बार भी किसी की परवाह नहीं की, मैंने सच को उजागर करने की कोशिशंे जारी रखीं और अपनी हैसियत के मुताबिक आवाज भी बुलंद करने की कोशिश की। मैंने मानवाधिकार संगठनों की तथ्यान्वेशी टीम को यह भी बताया कि यहाँ पर कट्टरपंथियों ने ना केवल मस्जिद गिराई है, बल्कि अब इसी इलाके में स्थित बाडिया दरगाह पर हर साल होने वाला उर्स भी नहीं होने दे रहे हैं। मैंने यह भी आशंका प्रकट की कि अगर कोई अल्पसंख्यक भूलवश भी सवाईभोज क्षेत्र में चला जाए तो उसकी जान खतरे में पड़ सकती है, क्योंकि यहाँ पर इस वक्त देश भर से कई बाहुबलियों ने डेरा डाल रखा है और यह बात सच भी थी। किसी आम आदमी को अकेले इस परिसर में जाने से ही भय लगने लगा था, इस दौरान कई मीडियाकर्मी और पुलिसकर्मी उग्र युवाओं के हाथों पिट चुके थे। कुल मिलाकर आतंक का जबरदस्त माहौल था, ऐसे में अकेले ही जूझना पड़ रहा था, अंजाम तो साफ दिखता था पर अंजाम की फिक्र किसे थी। सदैव की तरह वही तसल्ली थी कि जो भी होगा सो देखा जाएगा, हालाँकि कुछ भी हुआ नहीं, मेरी अलोकप्रियता में थोड़ी बढ़ोत्तरी जरूर हो गई और हिन्दू
विरोधी होने का प्रमाणपत्र भी हासिल हो गया। कहते हैं कि कालांतर में सवाईभोज के इस मंदिर के पुजारी दलित हुआ करते थे, आज भी ज्यादातर देवनारायण मंदिरों के पुजारी दलित समुदाय के ही लोग होते हैं, लेकिन पिछले एक दशक से उन्हें मंदिरों से हटाया जा रहा है। ऐसे ही इस सबसे बड़ेे मंदिर से भी दलित बाहर कर दिए गए, अब तो दलित भी इस मंदिर से दूर ही रहते है, कभी कभार कोई भूला भटका मंदिर देखने चला जाए तो वह अलग बात है। हालाँकि दलित पुजारियों के पास राजशाही काल का ताम्रपत्र भी है। आजकल ग्रामीण भारत के कथित धार्मिक स्थल दलितों के भेदभाव के सबसे बड़ेे अड्डे बन गए है।
    कलंदरी कांड के बाद इस जगह को पवित्र करने के लिए किए गए अश्वमेध यज्ञ में दलितों की भागीदारी के सवाल को बहुत ही अपमानजनक तरीके से नकार दिया गया, उन्हें तमाम कोशिशों के बावजूद आहुति मंडप में नहीं बैठने दिया गया। यज्ञ के मुख्य आयोजक खडे़शवरी बाबा ने साफ ऐलान किया कि यज्ञ में अवर्ण और शूद्र वर्ग को नहीं बैठाया जाएगा। मैं इस बात के पक्ष में नहीं था कि दलित यज्ञ में बैठें लेकिन यह एक टेस्ट था जिसके जरिए यह पता लगाना था कि ‘हिन्दू-हिन्दू भाई भाई’ का जाप करने वाले लोग इन धार्मिक रीति रिवाजों में भी दलितों को बराबरी का मौका देते हैं या नहीं। आप आश्चर्य करेंगे कि दलित यज्ञ में बैठने की माँग उठा रहे थे। इसका यहाँ के सारे हिन्दुत्ववादी संगठन विरोध कर रहे थे खुल करके और बाबा तो हम जैसों को श्राप देने पर ही उतारू थे, हमने इस सिद्ध पुरुष माने गए खड़ेशवरी महाराज से बात करने का निश्चय किया और चल पड़े आसीन्द की ओर।
अष्वमेध का घोड़ा
    इन सिद्ध महापुरुष के नाम के आगे श्री श्री 1008 एवं पूज्यपाद लिखा जाता है। इनकी खासियत यह है कि ये वर्षों से खड़े हुए हैं, नीचे नहीं बैठे हैं, मौन भी रहते हैं, इनके भक्त इन्हें दाता कह कर सम्मान देते हंै, इन्होंने आसीन्द के सवाईभोज से लगाकर बनेड़ा तहसील के दांता पायरा गाँव तक जितने भी यज्ञ करवाए हैं, उनसे दलितों को दूर रखने में सफलता पाई है। इनसे मिलने जब हम सब साथी पहँुचे और बाबा जी से बात करनी चाही तो पता चला कि दाता तो कुछ बोलेंगे नहीं फिर भी मिल लो, वे इशारों में ही संकेत देंगे। मैं और जगपुरा वाले गिरधारी जी तथा अन्य साथी इस वार्तालाप हेतु आगे हुए, वाकई बाबाजी तो कुछ भी नहीं बोले, सिर्फ हमें आग्नेय नेत्रों से घूर-घूर कर देखते रहे। उनके भक्तों ने हमारा सामान्य ज्ञान बढ़ाया कि अगर दाता चाहें तो अभी का अभी आप लोगों को यहीं पर ‘भस्म‘ कर सकते हैं। एक बार तो मेरी भी भस्म होने की इच्छा हो आई, मैंने कहा हम यज्ञ में दलितों को शामिल करवा कर जाएँगे या भस्म होकर ही, बिना भस्म हुए यहाँ से जाएँगे नहीं, चाहे तो हमें यज्ञ की आहुति में डाल कर भस्म करें अथवा मन्त्रों के जरिए करें, या तो दलित भी इस यज्ञ का हिस्सा होंगे अथवा हम भस्म होने को तत्पर हंै, खैर, भस्म तो क्या करते बेचारे, खुद ही भस्म भभूत शरीर के चुप खड़े थे, लेकिन इस विवाद का असर अश्वमेध यज्ञ के इस पूरे आयोजन पर पड़ा और ज्यादातर यज्ञ वेदिकाएँ खाली रह गईं, इस तरह कलयुग के अश्वमेध का घोड़ा बीच में ही रुक गया। कथित धार्मिक लोग जो कि वास्तव में अधिकतर पाखंडी थे, उन्हें बहुत बुरा लगा। बाद में इन्हीं महाराज के सानिध्य में दांता पायरा में हुए यज्ञ में भी दलितों के प्रति यही भेदभाव दोहराया गया। यहाँ इन बाबाजी का आश्रम भी बना है, आश्रम के लिए श्रमदान दलितों से करवाया गया। यज्ञ में धुँआ निकालने के लिए लकडि़याँ दलितों से मँगवाई गईं, दलितों के नाम चंदे की रसीदें भी काटी गईं, मगर जब यज्ञ वेदिकाओं में आहुतियाँ देने के लिए युगलों की आवश्यकता हुई तो वे 108 हवनकुंडों में से एक पर भी दलित जोड़े को बिठाने को राजी नहीं हुए। इलाके के ग्रामीण जिला प्रशासन के पास शिकायत लेकर पहँुचे मगर सुनवाई नहीं हुई, तब वे मेरे पास आए, हमारे पहँुचने भर की देर थी, प्रशासन और बाबाजी सब हरकत में आ गए। उन्हें लग गया कि यज्ञ विरोधी तत्व आ गए हैं, आयोजन बिगड़ जाएगा, इसलिए आनन फानन में एक समझौता कमेटी बनाई गई, बनेड़ा उपखंड कार्यालय में समझौता वार्ता हुई, मैंने प्रस्ताव रखा कि 108 में से 8 हवन कुंडों पर दलित युगल बैठेंगे। यज्ञ कमेटी ने इस माँग को सिरे से ही नकार दिया और एक लिखित प्रस्ताव निकाल कर पढ़कर सुनाने लगे, जिसमें लिखा था कि दलितों के लिए अलग हवन कुंड बनाए जाएँगे तथा कोई भी दलित भोजनशाला की तरफ नहीं जाएगा। उपखंड प्रशासन की मौजूदगी में पटवारी द्वारा पढ़े गए इस अपमानजनक प्रस्ताव ने मुझे आग बबूला कर दिया, मैंने प्रशासन को संबोधित करके कहा कि क्या सार्वजनिक स्थल पर किए जा रहे इस आयोजन में इस प्रकार का भेदभाव किया जा सकता है। मैं वहीं अड़ गया कि हमें अब यज्ञ में नहीं बैठना है, हम चाहते है कि ऐसा प्रस्ताव लाने वालों के विरुद्ध अजा, जजा (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया जाए, बात बनने के बजाए बिगड़ गई। प्रशासन ने यज्ञ समिति को साफ कह दिया कि अपना सामान तुरंत समेटो, अब यह यज्ञ नहीं हो सकता। बाद में यज्ञ समिति के लोग यज्ञ में दलितों की भागीदारी के लिए भी राजी हो गए पर दलितों ने इसे स्वीकार नहीं किया, हमारी सिर्फ यही माँग रही कि सार्वजनिक भूमि पर यह यज्ञ नहीं किया जाए।
    अंततः यज्ञ तो हुआ लेकिन किसी व्यक्ति विशेष की खातेदारी जमीन में करना पड़ा। यज्ञ हेतु बनाई गई समिधाएँ और यज्ञ का झंडा बहुत दिनों तक वहीं लहराता रहा, जो बाद में अपने आप ही फट भी गया, परम पूज्य ‘दाता‘ जिला कलेक्टर के पास गए और वहाँ रो पड़े, इससे उनके भक्त काफी भड़क गए। शिवसेना कमांडो फोर्स के जिला प्रमुख ने मुझे भावनात्मक धमकी भरा फोन किया कि पहले के जमाने में राक्षस यज्ञ बिगाड़ देते थे और अब कलियुग में तुम जैसे लोग यज्ञ में विघ्न डालते हैं, आज तुम्हारी वजह से पहली बार दाता की आँखों में आँसू आ गए हैं। मैंने उनकी बात सम्पूर्ण धैर्य के साथ सुनी और बस इतनी सी बात कह कर फोन काट दिया कि-आप मुझे राक्षस कहें या कुछ और मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है, रही बात आपके दाता की आँखों में आए आँसूओं की तो ऐसे लोगों की वजह से देश के मेरे करोड़ों करोड़ दलित भाई बहनों की आँखों में आँसू है। मैं किनके आँसू देखँू और किनके साथ रोऊँ, मुझे किसी दाता या बाबा की आँख के आँसू से ज्यादा चिंता मेरे लोगों की आँखों के आँसुओं की है। यह यज्ञ सरकारी जमीन पर नहीं होगा और कहीं कर लो, हमें कोई दिक्कत नहीं है। इसके बाद यज्ञ समिति के एक संरक्षक और क्षेत्र के नामी गिरामी एक भाजपा नेता की धमकी आई कि इन धर्मद्रोहियों को गोली मार देंगे, हमने उसी भाषा में जवाब भेज दिया कि हमारी बंदूकों में भी गोलियाँ ही भरी हुई हैं, हम कौन भूसा भरे, हाथों पे हाथ धरे बैठे हैं, तैयार हैं हम भी, जब चाहे तब जोर आजमाइश कर लें। उन्हें तो लगा था कि गोली के नाम पर ही हम बेहोश हो जाएँगे, लेकिन जब ईंट का जवाब पत्थर से मिलने की संभावना बनी तो वे महाशय इस पूरी लड़ाई से ही अलग हो गए, कुल मिलाकर उस सार्वजनिक स्थान पर हमने यज्ञ नहीं होने दिया।
   -भँवर मेघवंशी
  ...........शेष अगले अंक में
लेखक की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा
‘हिन्दू तालिबान
मोबाइल: 09571047777
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

रविवार, 21 जून 2015

हाशिमपुरा जनसंहार: भारतीय न्याय व्यवस्था पर उठते सवाल

   22 मई 1987 को उ0प्र0 के मेरठ जिले में हाशिमपुरा मोहल्ले के 42 मुसलमानों का कत्ल हुआ था। पी0एस0सी0 के जवानों ने इस बर्बरता को अंजाम दिया था। इसी घटना को हाशिमपुरा-जनसंहार के नाम से जाना जाता है। इस जनसंहार में जुल्फिकार बाबूद्दीन, मुजीबुर्रहमान, मो0 उस्मान, नसीर अहमद घायल होकर बच गये। पीडि़त परिवार की माताएँ, बच्चे, पत्नियाँ, बुजुर्ग व रिश्तेदार और मोहल्लावासी पिछले 28 वर्षों से न्याय की आस लगाये अभिशप्त जीवन जीने को मजबूर हैं। इतने वर्षों में कितनी सरकारें आईं, कितनी चली गईं। लेकिन बेसब्री से न्याय की आस करने वाले पीडि़त परिवारों व जनपक्षधर लोगों को 22 मार्च 2015 को अदालत ने काफी गहरा धक्का पहुँचाया है क्योंकि इसी दिन दिल्ली के तीस हजारी की अदालत ने सभी 16 आरोपी पी0एस0सी0 पुलिस बलों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया।
    1987 में उ0प्र0 के मेरठ में हिन्दू-मुसलमान दंगे का माहौल बना था। करीब 500 मुसलमान नमाज के बाद मस्जिद के बाहर खड़े थे। तभी सैकड़ों की संख्या में पी0एस0सी0 पुलिस बल आ धमके और करीब 50 मुसलमानों को उठाकर 50-60 किमी दूर एक पुल (ब्रिज) पर ले गए। पी0एस0सी0 बलों ने वहाँ एक-एक को गोली मारकर उनके शवों को नहर में फेंक दिया। बाद में लोग मुरादनगर नहर में सभी शव तैरते हुए पाए थे।
    उक्त घटना में जिन्दा बचे नासिर अहमद बताते हैं कि ‘‘उस वक्त हमारी उम्र 15 वर्ष थी, गोली खाकर लाशों के अम्बार मंे सांस रोककर पड़े रहे थे।’’ मोहम्मद शाहनवाज बताते हैं कि जब उनकी उम्र 5 महीने भर की थी तभी उनके पिता हाजी शमीम अहमद की इसी जनसंहार में मौत हुई, नतीजतन उनकी पढ़ाई नहीं हो सकी। उनकी मां मेहरुन्निशा के पास आठ बच्चे थे। कैसे वह 28 साल गुजारी, कैसे बच्चों को पाला-पोसा, बयां नहीं कर पातीं। सर्वविदित है कि धर्म के नाम पर दंगा-फसाद में गरीब, कारीगर, मजदूर, किसानों यानी आम जनता की जान जाती है लेकिन धर्म की कट्टरपंथी राजनीति की बीज बोने से लेकर साम्प्रदायिक माहौल बनाने वाले राजनेता, मीडिया, पूँजीपति, बड़े-बड़े धर्म के ठेकेदारों का बाल भी बांका नहीं होता। जनसंहार कोई एक बार की घटना हो, ऐसा नहीं हैै। लक्ष्मणपुर दाथे जनसंहार, बथानी टोला जनसंहार, भोपाल गैस त्रासदी में जनसंहार, गुजरात जनसंहार, सैकड़ों जनसंहारों की घटनाएँ तथाकथित आजाद भारत में बदनुमा कलंक हैं। सभी जनसंहारों में दलित, आदिवासी, मुसलमान व महिलाएँ निशाना बनाए गए इसलिए ये आधुनिक भारत के उत्पीडि़त वर्ग हैं।
    आज उत्पीडि़त वर्गों के पक्ष में लड़ने वाले वकील, बुद्धिजीवी, पत्रकार, जनवादी या कम्युनिस्टों पर भी दमनचक्र चलाया जाना आम होता जा रहा है। लगभग सभी जनसंहारों के आरोपी बरी होते जा रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि गरीबों, उत्पीडि़त वर्गों के लिए वह कहावत कहाँ छुप जाता है कि ‘‘कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं, कानून से कोई बच नहीं सकता।’’ इसी तरह लगता है कि फिल्मों के खोजी कुत्ते, मोस्ट वाण्टेड स्पेक्टर, सी0आई0डी0......... जैसे राज्य व्यवस्था के हीरो या पात्र आम आदमी का मजाक उड़ाते हैं और मध्यम वर्ग को भरमाते हैं।
       साम्प्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस नामक एक अच्छी किताब के लेखक व पूर्व आई0पी0एस0 अधिकारी, विभूति नारायण राय के अनुसार ‘‘उस वक्त मेरठ में नियुक्त अधिकांश पुलिस की धारणा में मुसलमान ही दोषी थे। वे लोग मेरठ को मुसलमानों का ‘‘मिनी पाकिस्तान’’ मानते थे और इसीलिए मुसलमानों को सबक सिखाना बहुत जरूरी हो गया था। 28 वर्षों के बाद इस अदालती फैसले पर उनका अपील छपा कि ‘‘मुसलमान उकसावे में न आएँ, धैर्य के साथ कानून पर भरोसा बनाए रखंे। किसी उकसावे में आकर हथियार उठा लेने जैसी कोशिश की कोई आवश्यकता नहीं.....।’’
    फिलहाल, हाशिमपुरा जनसंहार के पीडि़तों सहित मोहल्ला के अधिकांश नागरिकों को 28 वर्षों बाद न्याय की आस को गहराई से धक्का पहुँचा है। फैसले के दूसरे दिन ही हाशिमपुरा के लोगों ने कैण्डल व काले झण्डों के साथ विभिन्न चैराहों से होते हुए जुलूस प्रदर्शन किया। लगातार दस दिनों तक अखबारों में ऐसे विरोध प्रदर्शनों की खबरें छपती रहीं। जुलूस (11 जुलाई 1996) में तीन शिशु (एक मात्र तीन माह का) छः बच्चे और ग्यारह महिलाओं समेत 21 लोगों की नृशंस हत्या सवर्ण जाति की रणवीर सेना ने अंजाम दिया था, इसमें 33 हमलावर नामजद थे। लेकिन 16 वर्ष बाद 16 अप्रैल 2012 को हाईकार्ट ने ‘‘त्रुटिपूर्ण साक्ष्य’’ को आधार बनाकर सभी अभियुक्तों को बरी कर दिया। शंकर बिगहा  जनसंहार (25 जनवरी 1999) मंे पाँच महिलाएँ, सात बच्चे समेत 23 दलित व अति पिछड़ी जातियों की बर्बर हत्या व 14 दीगर लोग जख्मी हुए थे। हमले में हत्यारों ने 10 माह के बच्चे तक को नहीं बख्शा था। इसमें अभियुक्त रणवीर सेना के प्रमुख ब्रम्हेश्वर मुखिया समेत 29 लोग थे। अदालत ने इसमें भी कछुए की चाल से मुकदमा चलाते-चलाते 16 साल बाद सबको बरी कर दिया। गुजरात जनसंहार (2002) के अभियुक्तों का आज तक कुछ नहीं हुआ। ऐसे और भी चर्चित मुकदमे हैं लेकिन इतना ही अभी काफी है।
    सर्वोच्च न्यायालय ने खुद ही स्वीकार किया है कि ‘31 मार्च 2009 तक जिला न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक तीन करोड़ सात लाख से अधिक मुकदमे लम्बित हैं, जिन्हें निपटाने में (अगर कोई नया मुकदमा हाथ में नहीं लिया गया तो) 464 वर्ष लगेंगे। ऐसे में न्याय कैसे मिलेगा? केस लड़ते हुए हौसले पस्त हो जाते हैं, आम आदमी टूट जाता है, उनका घर-खेत, गहना-बिक्खो सब बिक जाता है। कई मुकदमे तो पीढ़ी दर पीढ़ी घिसटते मिल जाएँगे। क्या इसे ही न्याय कहा जाता है? क्या देर से न्याय मिलना भी अन्याय नहीं है?
       सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश श्री आर0एम0 लोढ़ा ने न्याय व्यवस्था के बारे मंे चिन्ता जताया कि ‘‘भारत में न्याय देने की प्रक्रिया खुद में एक सजा बन गई है।’’ सचमुच साल दर साल न्याय के लिए भटकना, तारीख दर तारीख कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाता आम आदमी न्याय व्यवस्था से भला क्षुब्ध क्यों न हो?
अदालतों का वर्गीय-चेहरा कैसा है?
    अदालतों के हजारों-लाखों फैसलों को अभी छोड़ दिया जाय। सिर्फ उपर्युक्त जनसंहारों के फैसलों के आधार पर ही कहा जा सकता है कि फैसले निष्पक्ष नहीं होते। मुकदमे के निस्तारण में होने वाली देरी से एक ओर जहाँ गरीबों का घर-खेती, गहना-पैसे का असीमित खर्च पूरे जीवन को बर्बाद कर देता है, वहीं दूसरी ओर शासक वर्ग के घोटालेबाज, भ्रष्ट, परजीवी रसूखदार (अमीर)े
लोगों को फायदा है। अपने पैसे और पहँुच के चलते वे संगीन से संगीन अपराधों में नामजद होते हुए भी जमानत पर चले जाते हैं और लम्बे समय तक समान्य जीवन का मजा लेते हैं और साथ-साथ अपना शासन भी चलाते हैं। भोपाल गैस काण्ड में न्यायालय अमरीका के पूँजीपति एण्डरसन को सजा नहीं दे पाया, यह न्यायालय का औपनिवेशिक चेहरा है। निठारी काण्ड में नौकर को फाँसी की सजा दी जाती है लेकिन उसके मालिक का नाम तक जिक्र नहीं करना, अमीर वर्गीय चेहरा है। किल्वेनमनी जनसंहार के मामले में ही, जहाँ 42 दलित मजदूरों को जिन्दा जला दिया गया था, मद्रास उच्च न्यायालय ने कहा कि धनी जमींदार जिनके पास कारें तक हैं, ऐसा जुर्म नहीं कर सकते और अदालत ने उन्हें बरी कर दिया। यानी यहाँ अदालत गरीब मजदूरों के पक्ष में खड़ा नहीं हो पाया क्योंकि उसका वर्गीय चेहरा ब्राह्मणवादी-सामंती भी है। सैकड़ों दलितों के हत्यारे रणवीर सेना के प्रमुख ब्रह्मेश्वर सहित सैकड़ों नामजद अभियुक्तों को क्यों सजा नहीं दिया जाता? यहाँ भी क्यों अदालत उच्च वर्ग-जाति का पक्ष लेता रहा?
    हाशिमपुरा जनसंहार हो या 1984 का सिक्ख जनसंहार हो या 2002 का गुजरात जनसंहार सबमें अदालतों का वर्गीय चेहरा हिन्दू साम्प्रदायिकता का पक्षधर साबित होता है।
          देश की संसद में सैकड़ों आपराधिक रिकार्ड वाले बैठते हैं। इनमें से कइयों पर तो संगीन अपराध का आरोप है। स्वच्छता अभियान चलाने वाले खुद प्रधानमंत्री सहित कई मंत्री जमानतों पर छूटकर देश चला रहे हैं। स्वच्छ शासन का वादा करने वाली पार्टी का अध्यक्ष खुद फर्जी एनकाउन्टर जैसे संगीन अपराध में नामजद है। कुछ अपवादस्वरूप बड़े नेता बड़े अधिकारी, पूँजीपति को कभी सजा यदि मिलती भी है तो इस कारण कि सत्ता में उसका कोई विरोध पैदा हो गया या सत्ता के लिए किसी काम का नहीं रहा। कभी-कभी सत्ता में अपनी सरकार नहीं होने या न होने का भी फर्क पड़ता है। जैसे ‘दस्तक’ नये समय की (मार्च-अप्रैल 2015) पत्रिका के सम्पादकीय में जिक्र है कि आई.पी.एस. अफसर सिंघल, आई0पी0एस0 पी.पी. पाण्डेय, डी.जी. बंजारा, आई.जी. गीता जौहरी, जी.एल. गोहिल कई फर्जी मुठभेड़ों में आरोपी थे। मोदी सरकार आते ही एक-एक करके बरी कर दिए गए।
    भंवरी देवी गिरोबहन्द बलात्कार केस, जेसीका लाल हत्याकाण्ड, प्रियदर्शनी मण्टू, हत्याकाण्ड के मामलों से पता चलता है कि फैसले सिर्फ गवाह और सबूतों के
आधार पर ही नहीं लिए जाते हैं, फैसले देने में न्यायाधीश की बड़ी भूमिका होती है। लेकिन वह उसके लिए जवाबदेह नहीं हैं। ये उदाहरण साबित करते हैं कि गरीब कमजोर लोगों के विरुद्ध ताकतवर लोग अपने पक्ष में न्याय खरीद कर उन्हें हमेशा के लिए न्याय से वंचित कर देते हैं। सच है कि गरीब आदमी आज के समय में न्यायालय पर विश्वास नहीं करता।
न्याय पालिका में भ्रष्टाचार
    इकाॅनोमिक जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय न्याय पालिका में 45 प्रतिशत रिश्वतखोरी व्याप्त है। 2002 में देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एस.पी. भरूवा ने कहा था कि उच्च न्यायालय में 20 फीसदी न्यायाधीश भ्रष्ट हैं।
    जस्टिस मार्कण्डेय काटजू के अनुसार, ‘‘उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुछ न्यायाधीशों की ईमानदारी संदेहास्पद है। मुख्य न्यायाधीश को ऐसे संदिग्ध
न्यायाधीशों का तबादला करना चाहिए।’’
    जस्टिस निर्मल यादव पर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश रहते हुए 2008 में 15 लाख की रिश्वत लेने का आरोप लगा। सी.बी.आई. को उनके खिलाफ सबूत मिले।
    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बी0 रामास्वामी ने पद पर रहते हुए भ्रष्टाचार किया। सी.बी.आई. ने उनके घर से काफी रकम बरामद की। संसद में उनके विरुद्ध 1991 में महाभियोग लाया गया जो असफल रहा।
    न्याय पालिका में व्याप्त भ्रष्टाचार के ये चन्द चर्चित उदाहरण हैं। यह समुद्र में तैरते बर्फ की चट्टान का मात्र ऊपर चमकता छोटा हिस्सा है। 2007 में जारी ‘‘ट्रांस्पेरेन्सी इण्टरनेशनल’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘भारत की निचली अदालतों में 2500 रूपये से भी ज्यादा रिश्वत का लेन-देन होता है। जिसे वकीलों, जजों और दलालों के बीच हैसियत के हिसाब से बाँटा जाता है।
न्याय व्यवस्था की जनविरोधी चरित्र की आधारशिला
        तथाकथित आजाद भारत में संविधान निर्माण काम नये भारत के निर्माण के लिए अति आवश्यक कार्य था। इसके लिए यह भी आवश्यक था कि विविध जाति, धर्म, क्षेत्र या लिंग के सभी वयस्क देशवासियों द्वारा एक संविधान सभा का चुनाव होता। इससे व्यापक जनता के बहुमत का प्रतिनिधित्व होता और ऐसी संविधान सभा देश की विशिष्टताओं व जरूरतों के मुताबिक होती। लेकिन ऐसा दुर्भाग्य कहा जाय या जनता के विरुद्ध साजिश कि ऐसा नहीं हुआ। मात्र 13 फीसदी निर्वाचकों द्वारा चुनी गई, अंग्रेजों की मातहती में बनी 1935 की विधानसभा को ही संविधान सभा का रूप दे दिया गया। नतीजतन उन्होंने अपने वर्गीय जरूरतों के हिसाब से संविधान तैयार किया।
         भारतीय न्याय प्रणाली की आधारशिला बनी-1863 की औपनिवेशिक ‘भारतीय दण्ड संहिता’। ब्रिटिश संसद ने भारत पर शासन चलाने के लिए 1858 में ‘भारत शासन अधिनियम’ बनाया। फिर 1861 में ‘भारतीय परिषद अधिनियम’ बनाया। इसके बाद उसने 1892, 1901, 1919 और 1935 का अधिनियम बनाया। ये सभी अधिनियम भारत पर अंग्रेजी-साम्राज्य को सुदृढ़ करने के लिए बनाए गए अर्थात औपनिवेशिक नीति के अनुरूप थे। आखिर इस आधारशिला पर खड़ी न्याय-व्यवस्था किन भारतीय-हितों की रक्षा करेगी या करती?
    सबसे पहले उच्च न्यायालयों की स्थापना 1866 में मद्रास, कलकत्ता और बाम्बे में हुई। फिर 1856 में इलाहाबाद, 1884 में बंगलौर, 1916 में पटना, 1928 में श्रीनगर व जम्मू में उच्च न्यायालय स्थापित हुए। कैसे भूल जाए कि इन्हीं न्यायालयों ने शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरू, सुखदेव, अशफाक उल्ला खां, खुदीराम बोस, करतार सिंह सराभा जैसे असंख्य क्रांतिकारियों, देशभक्तों को फाँसी की सजा दी थी। 1947 की तथाकथित आजादी के बाद भी, ठीक उसी ढर्रे पर न्याय प्रणाली की स्थापना की गई। न्यायालयों का सम्पूर्ण परिवेश अभी भी औपनिवेशिक दासता व सामंती शोषण का बगुला-न्याय ही है।
    अंग्रेजों ने जिस प्रकार अपना साम्राज्य चलाने के लिए शासन के विभिन्न अंगों-पुलिस, रेलवे, सेना इत्यादि को बनाया था उसी तरह न्याय पालिका को भी खड़ा किया था। दुर्भाग्य है कि अभी तक इस औपनिवेशिक ढाँचे से हमें मुक्ति नहीं मिल सकी है।
आज कैसी न्याय पालिका का तकाजा है?
    हाशिमपुरा जनसंहार, लक्ष्मणपुर बाथे, शंकर बिगहा जनसंहार, भोपाल गैस काण्ड जनसंहार पर फैसला दिखलाता है कि तथाकथित भारतीय लोकतंत्र कितना बीमार और खोखला हो चुका है। जरूरत इस बात की है कि एक स्वस्थ लोकतंत्र की लड़ाई विकसित की जाए। आज कानून व संविधान संशोधन के चर्चे जोरों पर हैं। कोई जजों की संख्या बढ़ाने की बात करता है तो कुछ मुकदमों का जल्दी से जल्दी निस्तारण (निपटारा) चाहता है तो कोई अदालत की कार्यवाही स्थानीय भाषा में पूरी करवाना चाहता है। लेकिन क्या इस चर्चा में आम आदमी के लिए कोई जगह है? दरअसल हम भूल जाते हैं कि न्याय व्यवस्था भी कार्यपालिका,
विधायिका की ही तरह राज्य व्यवस्था का अंग है। यह कोई अलौकिक, ईश्वर प्रदत्त, परमपावन संस्था नहीं, बल्कि शासन चलाने के लए मानवनिर्मित संरचना है। जब व्यवस्थापिका और कार्यपालिका भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी हैं, तो न्याय पालिका भला कैसे बची रह सकती है, जबकि तीनों एक ही आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक ढाँचे का संचालन करते हैं।
      हमारे देश पर आज देशी-विदेशी बड़े पूँजीपतियों का गठजोड़ काबिज है। हर जगह उन्हीं की तूती बोलती है। किसी भी समाज में अर्थव्यवस्था का निर्वाध संचालन के लिए उसके अनुरूप ही सम्पूर्ण व्यवस्था, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक शैक्षणिक, प्रशासनिक, न्यायिक-व्यवस्था निर्मित की जाती है। इसलिए न्यायपालिका में कोई भी जनपक्षीय सुधार तभी सम्भव है जब पूरे समाज में आमूल बदलाव हो। एक स्वस्थ, समतामूलक, मानव केन्द्रित और न्यायपूर्ण समाज में ही सबके लिए न्याय सम्भव है।
 -राजेश
मो0 नं0-09889231737
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

शुक्रवार, 19 जून 2015

आतंक के खिलाफ वो 121 दिन

 ‘मौलाना खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस और आई.बी. अधिकारियों की गिरफ्तारी के लिए धरना’ लिखा हुआ रिहाई मंच के काले रंग के बैनर, जिस पर दाढ़ी-टोपी वाले एक शख्स की फोटो लगी थी को हर उस शख्स ने देखा होगा, जो 22 मई से लेकर 19 सितंबर 2013 के बीच यूपी विधानसभा के सामने स्थित
धरना स्थल से गुजरा होगा। यूपी ही नहीं देश के इतिहास में आतंकवाद के नाम पर मारे गए किसी बेगुनाह के न्याय के लिए 121 दिन तक चलने वाला यह सबसे बड़ा अनिश्चित कालीन धरना था।
    18 मई 2013 को शाम में यह खबर आई कि उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए
सिलसिलेवार धमाकों के आरोपी मौलाना खालिद मुजाहिद की फैजाबाद में पेशी के बाद लखनऊ जेल लाते वक्त हत्या कर दी गई है। पूरे प्रदेश में धरने-प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया। क्योंकि खालिद मुजाहिद वह शख्स थे, जिनकी गिरफ्तारी को आर.डी. निमेष जाँच आयोग ने संदिग्ध माना है और उनको आतंकवाद के आरोप में फर्जी फँसाने वाले दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई तक की माँग की है। निमेष आयोग आतंकवाद के नाम पर फर्जी गिरफ्तारी को जाँचने वाला पहला आयोग था, जिसकी रिपोर्ट सरकार ने दबा रखी थी, जिसको रिहाई मंच ने अंदरखाने से प्राप्तकर जनहित में सार्वजनिक कर दिया था। यूपी की इंसाफ पसन्द अवाम के लिए गहरा झटका था कि जिस बेगुनाह को न्याय
दिलाने के लिए उन्होंने 2007-2008 में आजमगढ़-जौनपुर जैसे दूर दराज के जनपदों से लेकर राजधानी लखनऊ तक में विरोध प्रदर्शनों के बल पर तत्कालीन मायावती सरकार को आरडी निमेष जाँच आयोग गठन करने पर मजबूर किया, उसके कहने के बाद कि खालिद निर्दोष है यूपी सरकार ने उसे बरी नहीं किया। जिससे हौसला पाए पुलिस व आई.बी. अधिकारियों ने खालिद की हत्या करवा दी। 19 मई 2013 को जिस खालिद मुजाहिद को आतंकवादी कहा गया था, के जनाजे में 60-70 हजार के हुजूम के नारों ने तय कर दिया कि आखिर आतंकी कौन है?  यूपी सरकार ने इस आपाधापी में मौलाना खालिद मुजाहिद की हत्या की सी.बी.आई. जाँच कराने की बात कह आक्रोश को शांत करने का प्रयास किया। पर सरकार और उसका तंत्र यह नहीं भाँप पाया कि इंसाफ पसन्द अवाम ने अपने शोक को संकल्प में तब्दील कर लिया है और इसी संकल्प के साथ शुरू हुआ खालिद के इंसाफ के लिए रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना।
    121 दिन यानी 4 महीना 1 दिन तक चलने वाले धरने के पहले दिन 22 मई को जब उत्तर भारत में भयंकर गर्मी और लू भरी आधियाँ चल रही थी उस वक्त किसी के
लिए यह भाँपना मुश्किल था कि यह धरना कितने दिनों चलेगा। पर आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसाए गए लोगों के परिजनों, उनके गाँवों, कस्बों, यूपी के विभिन्न शहरों व देश के विभिन्न प्रदेशों के लोगों के इंसाफ लेने के जज्बे ने इसे मजबूती दी। शुरुआती दो महीने तक 24-24 व उसके बाद 48-48
घंटों की भूख हड़ताल का दौर शुरू हुआ। जिसमें परिजन, मानवाधिकार व राजनैतिक संगठनों के नेता, साहित्यकार, पत्रकार, रंगकर्मियों व आम अवाम ने भूख हड़ताल की लंबी श्रृंखला बना डाली। खालिद सिर्फ एक पीडि़त का नाम नहीं था, बल्कि गिरफ्तारी के बाद से वह विरोध प्रदर्शनों की आवाज बन गया था। वह आवाज, जिससे आतंकवाद के नाम पर फर्जी तरीके से मुस्लिम युवाओं को उठाने वाली एटीएस, एसटीएफ ही नहीं, खुफिया एजेंसियाँ भी भय खाती थीं। 12 दिसंबर 2007 को आजमगढ़ से तारिक कासमी और 16 दिसंबर 2007 को मडि़याहूं, जौनपुर से खालिद मुजाहिद को यूपी एसटीएफ ने अगवा करके 22 दिसंबर 2007 को फर्जी तरीके से बाराबंकी से विस्फोटकों के साथ गिरफ्तारी का दावा किया था। लेकिन यह दावा शुरू से ही कटघरे में आ गया क्योंकि इन दोनों को अगवा किए जाते वक्त कई लोगों ने देखा था। लिहाजा उनकी फर्जी गिरफ्तारी के साथ ही आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों की रिहाई के आंदोलन के प्रतीक भी तारिक-खालिद बन गए। यूपी की कचहरियों में हुए धमाकों के बाद बार एसोसिएशनों ने फतवा जारी कर दिया कि आतंक के आरोपियों का मुकदमा नहीं लड़ा जाएगा और न ही लड़ने दिया जाएगा। ऐसे में लखनऊ के
अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब सबसे पहले सामने आए तो वहीं बाराबंकी में रणधीर सिंह सुमन और फैजाबाद में एडवोकेट जमाल ने आतंक के आरोपियों के मुकदमे की वकालत की। सितंबर 2008 में दिल्ली में बाटला हाउस फर्जी मुठभेड़ के बाद जो सिलसिला आजमगढ़ समेत देश के विभिन्न इलाकों से गिरफ्तारियों का शुरू हआ उसके साथ ही पूरे देश में एक सिलसिलेवार आवाज बेगुनाहों की रिहाई के लिए भी उठने लगी। उसी सिलसिले से पैदा हुए आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों की रिहाई के लिए रिहाई मंच ने एक बड़े आंदोलन की रूप रेखा तय की। जिसे हम इसके शुरुआती बयानों में देख सकते हैं कि अब किसी कतील सिद्दीकी को पुणे की यर्वदा जेल में हत्या, किसी इशरत की फर्जी मुठभेड़ में हत्या या फिर ऐसे तमाम बेगुनाहों की हत्याओं का जो सिलसिला खालिद तक पहुँचा, न सिर्फ उसे हम रोकेंगे बल्कि एक कड़ा संदेश आतंकवाद के नाम पर बेगुनाहों को फँसाने वालों को देंगे कि जेलें बेगुनाहों के लिए नहीं, गुनहगारों के लिए हैं।
    इन स्थितियों को भाँपकर 4 जून 2013 को यूपी सरकार के कैबिनेट ने आरडी
निमेष कमीशन की रिपोर्ट को स्वीकार लिया। आंदोलन के वेग को इससे समझा जा सकता है कि चाहें यूपी की बहुचर्चित हाशिमपुरा, मलियाना सांप्रदायिक ंिहंसा हो या फिर मुरादाबाद, कानपुर, बिजनौर दंगों की जाँच कमीशन की रिपोर्टें कई दशकों से सरकारी तहखानों में धूल फाँक रही हैं वहीं निमेष आयोग की रिपोर्ट को एक साल के भीतर स्वीकारा गया, जिसमें दर्जन भर से ज्यादा पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है। बहरहाल, रिपोर्ट स्वीकारने के बाद सपा सरकार ने सोचा कि यह धरना खत्म हो जाएगा। सरकार ने उन मुस्लिम उलेमाओं को फिर से सक्रिय किया जिन्होंने
इसके पहले खालिद के घर जाकर सरकार की तरफ से दिए गए 6 लाख रुपए लेने का
दबाव बनाया, जिसे खालिद के परिजनों ने नकार दिया था। वहीं खालिद के इंसाफ की लड़ाई अब सिर्फ यूपी विधानसभा ही नहीं, बल्कि दो-दो बार जेएनयू छात्रसंघ व अन्य छात्र संगठनों, युवा संगठनों व अन्य प्रदर्शन कारियों द्वारा दिल्ली में यूपी भवन को घेरने तक पहुँच गया था, ने पूरे देश में चल रहे विभिन्न आंदालनों को भी आकर्षित किया। जिन्होंने एक स्वर में रिहाई मंच की आवाज में आवाज मिलाई और सपा सरकार पर सवाल उठाया कि जब आर.डी. निमेष रिपोर्ट को  सरकार ने स्वीकार कर लिया है, यानी उसे सही मान लिया है तो फिर दोषी पुलिस अधिकारियों जिन्होंने अपने को बचाने के लिए खालिद मुजाहिद की हत्या करवा दी, को सरकार गिरफ्तार क्यों नहीं कर रही है।
    मौलाना खालिद की हत्या पर दर्ज एफ.आई.आर. बहुत अहम था। जिसमें हत्या के आरोपियों के बतौर पूर्व डी.जी.पी. विक्रम सिंह, पूर्व एडीजी बृजलाल, मनोज कुमार झा समेत पुलिस के बड़े-बड़े अधिकारियों के साथ ही आईबी अधिकारियों के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ। क्योंकि खालिद को फंसाने का पूरा झूठा षड्यंत्र आई.बी. ने रचा था। इसलिए प्रदर्शनकारियों के निशाने पर खुफिया एजेंसियाँ प्रमुखता से थीं। रिहाई मंच के आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता व जीत इसी बात की है कि इसने आई.बी. समेत खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की आपराधिक व देशद्रोही भूमिका को बहस के केन्द्र में लाया है। इसे धरने के दौरान तख्तियों पर लिखे उन वाक्यों से समझ सकते हैं कि ‘निमेष आयोग से खतरा, आखिर किसको’। प्रदर्शनकारियों के हाथों में आरोपी पुलिस वालों के नाम लिखी वो तख्तियाँ हर वक्त नजर आती थीं, जिन पर उनके गिरफ्तारी की माँग दर्ज थी। जिससे बौखलाए पूर्व डी.जी.पी. के समर्थक व संघ परिवार से जुड़े लोगों ने रिहाई मंच के धरने की मांगों के खिलाफ भी कई बार जी.पी.ओ. लखनऊ पर धरने दिए। अखिलेश सरकार ने यह आश्वासन दिया कि मानसून सत्र में निमेश कमीशन पर कार्रवाई रिपोर्ट लाई जाएगी। पर लगातार सरकार के झूठे वादे जो बेगुनाहों की मौत की वजह तक बन गए, पर अब किसी प्रकार का भरोसा नहीं रह गया था। क्योंकि सपा सरकार ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में यह वादा किया था कि
आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाहों को वह रिहा करेगी, पर सत्ता में आने के बाद वह वादे से मुकर गई। ऐसे में रिहाई मंच ने तय किया कि जब तक सरकार कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाती धरना चलता रहेगा। 20 जून को धरने के तीस दिन होने पर यह धरना राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के सुर्खियों में इस मुद्दे पर होने वाले सबसे बड़े धरने के रूप में आया। धरने का विश्लेषण करते हुए कई समाचार पत्रों ने इसके तीस दिन होने पर परिशिष्ट भी निकाला। धरने में देश के विभिन्न हिस्सों से शामिल होने वाले प्रदर्शनकारियों ने
इसे और सशक्त प्रतिरोध के केन्द्र के रूप में स्थापित किया। दिशा छात्र संगठन का सांस्कृतिक दस्ता हो या फिर जेएनयू के आरडीएफ द्वारा ‘बाटला हाउस’ नाटक का मंचन, ऐसे कई मौके आए जब लखनऊ शहर व बाहर की एक बड़ी बौद्धिक जमात समर्थन में आई। जेएनयू स्टूडेंट यूनियन समेत देश के विभिन्न कोनों से विभिन्न छात्र, राजनैतिक मानवाधिकार संगठन भी समर्थन में लखनऊ पहुँचे। चर्चित डाक्यूमेंट्री फिल्मकार आनंद पटवर्धन, फिल्म निर्देशक अनुशा रिजवी, साहित्यकार नूर जहीर समेत विभिन्न शख्सियतें भी समर्थन में धरने में शामिल हुईं। मानसून आ गया था, पर धरने ने यूपी की सियासत का ताप गर्म कर दिया था। धरने के 50वें दिन इशरत जहाँ फर्जी मुठभेड़ समेत गुजरात में फर्जी मुठभेड़ों और बेगुनाहों के सवाल उठाने वाले जन संधर्श मंच और प्रख्यात लोकतांत्रिक अधिकारवादी टेªड यूनियन नेता मुकुल सिन्हा के सहयोगी अधिवक्ता शमशाद पठान गुजरात से तो वहीं वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमडि़या और हस्तक्षेप के संपादक अमलेन्दु उपाध्याय भी शामिल हुए। धरने के समर्थन में माकपा सांसद मोहम्मद सलीम, माकपा नेता व पूर्व सांसद सुभाषिनी अली, पीयूसीएल नेता कविता श्रीवास्तव, अनहद की शबनम हाशमी भी आईं। उधर सरकार मानसून सत्र बुलाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी, क्योंकि वह अपने वादे से पीछे हटने की फिराक में थी। 15 जुलाई को धरने के समर्थन में 55वें दिन पहुँचकर सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने कहा कि हमारे देश में आईबी, सेक्योरिटी एजेंसी, एटीएस के लोग बेलगाम तरीके से काम कर रहे हैं। वे आम लोगों को निशाना बना रहे हैं। हमारे पास इस बात के उदाहरण हैं। इस खतरनाक माहौल में यह जरूरी है कि इन एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। उनकी देख-रेख के लिए संसदीय कमेटियाँ बनाई जाएँ। उन्हें गृह मंत्रालय के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। लगातार धरने का बढ़ता समर्थन, वह भी रमजान के महीने में, जब मुस्लिम समुदाय धार्मिक जिम्मेदारियों में व्यस्त हो जाता है, सरकार के लिए चुनौती बनता जा रहा था। क्योंकि सरकारी तंत्र यही प्रचार कर रहा था कि धरना मुसलमान चला रहे हैं पर वास्तविकता बिल्कुल इसके उलट थी। जो रमजान के महीने ने प्रमाणित कर दिया। रमजान के महीने में जब सामूहिक दुआ का आयोजन धरने के 60 वें दिन होने वाला था, उसके ठीक दो दिनों पहले सरकार द्वारा रिहाई मंच के मंच को उखाड़ने की बौखलाहट ने साफ कर दिया कि सरकार नीतिगत स्तर पर बढ़ती गोलबंदी से भयभीत
थी। लेकिन सरकार के इस लोकतंत्रविरोधी रवैये ने लोगों के हौसले को और बढ़ा दिया और जैसे ही यह खबर फैली आंदोलन के समर्थक भारी संख्या में धरना स्थल पर पहुँच गए और भारी पुलिस बंदोबस्त के बीच ही सभा आयोजित हुई। वहीं धरने के दौरान दो बार सामूहिक इफ्तार का भी आयोजन हुआ जहाँ आंदोलन के समर्थक प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से पहुँचे। जिन्होंने खुद अपने हाथों से धरनास्थल पर फैली गंदगी जिसे पुलिस के दबाव में नगर निगम के सफाईकर्मियों ने साफ करने से मना कर दिया था, को खुद अपने हाथों में झाड़ू लेकर साफ किया और नमाज पढ़ सकने लायक बनाया। सबसे अहम कि गंदगी साफ करने वालों में शहर के तमाम हकपसंद उलेमा और बुजुर्गवार लोग शामिल थे। वहीं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सरकारी इफ्तार के आयोजन के जरिए इस मसले पर मुसलमानों को गुमराह करने की ‘इफ्तार पाॅलिटिक्स’ विफल हो गई क्योंकि आम अवाम ने रिहाई मंच के इफ्तार को सरकारपरस्त मुस्लिम नेताओं और उलेमाओं
के इफ्तार के समानांतर हकपसंद लोगों का इफ्तार माना। 22 जुलाई को सीपीआई (एमएल) महासचिव दीपांकर भट्टाचार्या धरने के समर्थन में पहुँचे और आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर एक्शन टेकन रिपोर्ट यूपी सरकार से लाने को कहते हुए कहा कि यह कैसा लोकतंत्र बना रहे हैं जहाँ बेगुनाह जेलों में और गुनहगारों का सरकार संरक्षण कर रही है। स्वतंत्रता दिवस यानी 15 अगस्त का दिन इस धरने का एक खास दिन रहा। जब
रिहाई मंच ने तिरंगा फहराया और वहीं पर ‘जिन्हें नाज है हिंद पर वो कहाँ हैं’ विषय पर जनसुनवाई किया। जिसमें आतंकवाद के नाम पर फंसाए गए लोगों के परिजनों खास कर अक्षरधाम हमले के आरोप में फांसी की सजा पाए बरेली के चाँद खान की नग्मा और उनके बच्चे, संकटमोचन कांड के आरोपी वलीउल्लाह के ससुर के अलावा कोसी कलाँ, मथुरा, अस्थान, प्रतापगढ़, फैजाबाद, परसपुर,
गांेडा के साम्प्रदायिक हिंसा से पीडि़त लोग भी शामिल हुए। धरने के 100वें दिन यूपी
विधानसभा पर रिहाई मंच ने हजारों लोगों का एक बड़ा विधान सभा चेतावनी मार्च निकालकर संदेश दिया कि सरकार अपने वादे से पीछे जाएगी तो अवाम सड़कों पर आ जाएगी। इस मार्च में वरिष्ठ पत्रकार सुभाष गताडे, अभिषेक श्रीवास्तव, जाहिद खान आदि शामिल हुए। जहाँ सरकार मानूसन सत्र से भाग रही थी वहीं प्रदेश में मानसून सत्र बुलाकर निमेश कमीशन रिपोर्ट पर कार्रवाई रिपोर्ट लाने की माँग को लेकर पत्र लिखने का अभियान शुरू हुआ। अन्ततः मानसून सत्र बुलाने की अंतिम समय सीमा जब खत्म होने लगी तो हार मानकर सरकार को 16 सितंबर को सत्र बुलाना पड़ा। 15 सितंबर की शाम रिहाई मंच के तत्वावधान में हजारों सामाजिक, राजनैतिक व मानवाधिकार संगठनों के कार्यकर्ताओं ने यूपी विधानसभा पर मशाल मार्च निकालकर सरकार को चेतावनी दी कि वह अपने वादे कोे अमल में लाए। 16 सितंबर को सरकार ने आर.डी. निमेष कमीशन की रिपोर्ट को विधानसभा के पटल पर रखा जिसने साफ कर दिया कि पुलिस और आईबी एक पाॅलिसी के तहत मुस्लिमों को आतंकवाद के झूठे आरोपों में फँसाती है। अब यह बात जुबानी नहीं रही, बल्कि निमेष कमीशन इसका एक प्रमाणित दस्तावेज, जनता के बीच आ गया था। सपा सरकार अपने वादे से फिर पीछे हट गई। उसने उन दोषी पुलिस व आई.बी. अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाई जिन्होंने अपने पास मौजूद खतरनाक विस्फोटकों को तारिक-खालिद के पास से झूठी बरामदगी दिखाकर उन्हें गिरफ्तार किया था। इस बात से आक्रोशित रिहाई मंच के नेताओं ने इसे देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का सरकारी कदम बताते हुए यूपी विधानसभा पर घेरा डालो-डेरा डालो का आह्वान करते हुए अनिश्चित कालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए। 19 सितंबर 2013 को रिहाई मंच के विधानसभा घेरने के आह्वान के बाद सरकार ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया और एक ऐतिहासिक धरने की समाप्ति का दिन 19 सितंबर बना। यह वही दिन था जिस दिन पाँच साल पहले दिल्ली में बाटला हाउस में फर्जी मुठभेड़ हुआ था। रिहाई मंच की मुहिम अनवरत जारी है और ऐसे आंदोलन, नींव की वो ईटें हैं जिस पर हमारा लोकतंत्र खड़ा है।
 -अनिल यादव
मो0-09454292339
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

गुरुवार, 18 जून 2015

हिन्दुत्ववादी सरकार में दलित नरसंहार

 राजस्थान का जाट बाहुल्य नागौर जिला जिसे जाटलैंड कह कर गर्व किया जाता है, आधिकारिक रूप से अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए एक ‘अत्याचारपरक जिला‘ है। यहाँ के दलित आज भी दोयम दर्जे के नागरिक की हैसियत से ही जीवन जीने को मजबूर है। दलित अत्याचार के निरंतर बढ़ते मामलों के लिए कुख्यात इस जाटलैंड का एक गाँव है डांगावास, जहाँ पर तकरीबन 16 सौ जाट परिवार रहते हैं। इस गाँव को जाटलैंड की राजधानी कहा जाता रहा है। यहाँ पर सन 1984 तक तो दलितों को वोट डालने का अधिकार तक प्राप्त नहीं था, हालाँकि उनके वोट पड़ते थे, मगर नाम उनका और मतदान कोई और ही करता था। यह सिर्फ वोटों तक सीमित नहीं था, जमीन के मामलों में भी कमोबेश यही हालात हैं। जमीन दलितों के नाम पर और कब्जा दबंग जाटों का। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 42 (बी) भले ही यह कहती हो कि किसी भी दलित की जमीन को कोई भी गैर दलित न तो खरीद सकता है और न ही गिरवी रख सकता है, मगर नागौर सहित पूरे राजस्थान में दलितों की लाखों एकड़ जमीन पर सवर्ण काबिज हैं, डांगावास में ही ऐसी सैंकड़ों बीघा जमीन है, जो रिकॉर्ड में तो दलित के नाम पर दर्ज है, लेकिन उस पर अनधिकृत रूप से जाट काबिज हैं।
    डांगावास के एक दलित दौलाराम मेघवाल के बेटे बस्तीराम की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन पर चिमनाराम नामक दबंग जाट ने 1964 से कब्जा कर रखा था, उसका शुरू-शुरू में तो यह कहना था कि यह जमीन हमारे पास 1500 रुपये में गिरवी है, बाद में दलित बस्ती राम के दत्तक पुत्र रतना राम ने  न्यायालय की मदद ले कर अपनी जमीन से चिमनाराम जाट का कब्जा हटाने की गुहार करते हुए एक लम्बी लड़ाई लड़ी और अभी हाल ही में नतीजा उसके पक्ष में आया। दो माह पहले मिली इस जीत के बाद दलित रतना राम मेघवाल ने अपनी जमीन पर एक छोटा सा घर बना लिया और वहीं परिवार सहित रहना प्रारम्भ कर दिया। यह बात चिमनाराम जाट के बेटों ओमाराम तथा कानाराम जाट को बहुत बुरी लगी, उसने जे0सी0बी0 मशीन लाकर उक्त भूमि पर तालाब बनाना शुरू कर दिया और खेजड़ी के हरे पेड़ काट डाले। इस बात की लिखित शिकायत रतना राम मेघवाल की ओर  से 21 अप्रैल 2015 को मेड़ता थाने में की गई, लेकिन नागौर जिले के पुलिस महकमे में जाट समुदाय का प्रभाव ऐसा है कि उनके विरुद्ध कोई भी अधिकारी कार्यवाही करना तो दूर की बात है, सोच भी नहीं सकता है, इसलिए कोई कार्यवाही नहीं की गई। इसके बाद दलितों को जान से खत्मकर देने की धमकियाँ मिलने लगीं और यह भी पता चला कि जाट शीघ्र ही गाँव में एक पंचायत बुलाकर दलितों से जबरन यह जमीन खाली करवाएँगे अथवा मारपीट कर सकते हंै, तो इसकी भी लिखित में शिकायत 11 मई को रतना राम मेघवाल ने मेड़ता थाने को देकर अपनी जान माल की  सुरक्षा की गुहार की, फिर भी पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की।
    14 मई 2015 की सुबह 9 बजे के आस पास डांगावास गाँव में जाट समुदाय के लोगों ने अवैध पंचायत बुलाई, जिसमें ज्यादातर वे लोग बुलाये गए, जिन्होंने दलितों के नाम वाली जमीनों पर गैरकानूनी कब्जे कर रखे हैं, इस हितसमूह ने तय किया कि अगर रतना राम मेघवाल इस तरह अपनी जमीन वापस ले लेगा तो ऐसे तो सैंकड़ांे बीघा जमीन और भी है जो हमें छोड़नी पड़ेगी, अतः हर हाल में दलितों का मुँह बंद करने का सर्वसम्मत फैसला करके सब लोग हमसलाह होकर हथियारों, लाठियों, बंदूकांे, लोहे की सरियों इत्यादि से लैश होकर तकरीबन 500 लोगों की भीड़ डांगावास गाँव से 2 किमी दूरी पर स्थित उस जमीन पर पहँुची, जहाँ पर रतना राम मेघवाल और उसके परिजन रह रहे थे। उस समय खेत पर स्थित इस घर में 16 दलित महिला पुरुष मौजूद थे, जिनमें पुरोहित वासनी पादुकला के पोखर राम तथा गणपत राम मेघवाल भी शामिल थे। ये दोनों रतना राम की पुत्रवधू के सगे भाई हैं, अपनी बहन से मिलने आए हुए थे। दलितों को तो गाँव में हो रही पंचायत की  खबर भी नहीं थी कि अचानक सैंकड़ों लोग ट्रैक्टरों और मोटर साईकिलों पर सवार होकर आ धमके और वहाँ मौजूद लोगों पर धावा बोल दिया। उन्होंने औरतों को एक तरफ भेज दिया, जहाँ पर उनके साथ ज्यादती की गई तथा विरोध करने पर उनके हाथ पाँव तोड़ दिए गए, दो महिलाओं के गुप्तांगों में लकडि़याँ घुसेड़ दी गईं, वहीं दूसरी ओर दलित पुरुषों पर आततायी भीड़ का कहर टूट पड़ा। उन्हें ट्रैक्टरों से कुचल-कुचल कर मारा जाने लगा, लाठियों और लोहे के सरियों से हाथ पाँव तोड़ दिए गए, रतना राम के पुत्र मुन्ना राम पर गोली चलायी गई, लेकिन उसी समय किसी ने उसके सिर पर सरिये से वार कर दिया जिससे वह गिर पड़ा और गोली भीड़ के साथ आये रामपाल गोस्वामी को लग गई, जिसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
    जाटों की उग्र भीड़ ने मजदूर नेता पोखर राम के ऊपर ट्रैक्टर चढ़ाया तथा उनकी आँखों में जलती हुई लकडि़याँ डाल दीं, लिंग नोंच लिया। उनके भाई गणपत राम की आँखों में आक वृक्ष का दूध डाल कर आँखंे फोड़ दी गई। इस तरह एक पूर्व नियोजित नरसंहार के तहत पोखर राम, रतना राम तथा पांचाराम मेघवाल की मौके पर ट्रैक्टर से कुचल कर हत्या कर दी गयी तथा गणपत राम एवं गणेश राम सहित 11 अन्य लोगों को अधमरा कर दिया गया। मौत का यह तांडव दो घंटे तक जारी रहा, जबकि घटनास्थल से पुलिस थाना महज साढ़े तीन किमी दूरी पर स्थित है, लेकिन दुर्भाग्य से अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक तथा मेड़ता थाने का थानेदार तीनों ही जाट होने के कारण उन्होंने सब कुछ जानते हुए भी इस तांडव के लिए पूरा समय दिया और जब सब खत्म हो गया तब मौके पर पहँुच कर सबूत मिटाने और घायलों को हटाने के काम में लगे। मनुवादी गुंडों की दादागिरी इस स्तर तक थी कि जब उन्हें लगा कि कुछ घायल जिंदा बचकर उनके विरुद्ध कभी भी सिर उठा सकते है तो उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में मेड़ता अस्पताल पर हमला करके वहाँ भी घायलों की जान लेने की कोशिश की। अंततः घायलों को अजमेर उपचार के लिए भेज दिया गया और मृतकों का पोस्टमार्टम करवा कर उनके अंतिम संस्कार कर दिए गए।
    पीडि़त दलितों के मौका बयान के आधार पर पुलिस ने बहुत ही कमजोर लचर सी एफ0आई0आर0 दर्ज की तथा दूसरी ओर रामपाल गोस्वामी की गोली लगने से हुई मौत का पूरा इलजाम दलितों पर डालते हुए गंभीर रूप से घायल दलितों सहित 19 लोगों के खिलाफ हत्या का बेहद मजबूत जवाबी मुकदमा दर्जकर लिया गया। इस तरह जालिमों ने एक सोची समझी साजिश के तहत कर्ताधर्ता दलितों को तो जान से ही खत्म कर दिया, बचे हुओं के हाथ पाँव तोड़ कर सदा के लिए अपाहिज बना दिया और जो लोग उनके हाथ नहीं लगे या जिनके जिंदा बच जाने की सम्भावना है, उनके खिलाफ हत्या जैसी संगीन धाराओं का मुकदमा लाद दिया गया, इस तरह डांगावास में दबंग जाटों के सामने सिर उठा कर जीने की हिमाकत करने वाले दलितों को पूरा सबक सिखा दिया गया। राज्य की वसुंधरा राजे की सरकार ने इस निर्मम नरसंहार को जमीनी विवाद बताकर इसे दो परिवारों की आपसी लड़ाई घोषित कर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। हालाँकि पुलिस, प्रशासन और राज्य सरकार के नुमाइंदों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि दो पक्षों के खूनी संघर्ष में सिर्फ एक ही पक्ष के लोग क्यों मारे गए तथा घायल हुए हैं, दूसरे पक्ष को किसी भी प्रकार की चोट क्यों नहीं पहँुची है और जब दलितों के पास आत्मरक्षा के लिए लाठी तक नहीं थी तो रामपाल को गोली मारने के लिए उनके पास बन्दूक कहाँ से आ गई और फिर सभी दलित या तो घायल हो गए अथवा मार डाले गए तब वह बन्दूक कौन ले गया। जिससे गोली चलायी गई थी। मगर सच यह है कि दलितों की स्थिति गोली चलाना तो दूर की बात, वे थप्पड़ मारने का साहस भी अब तक नहीं जुटा पाए हैं। 23 मई को एक और घायल गणपत राम ने भी दम तोड़ दिया है, जिसकी लाश को लावारिस बता कर गुपचुप पोस्टमार्टम कर दिया गया।
    नागौर जिला दलित समुदाय के लोगों की कब्रगाह बन गया है, यहाँ पर विगत एक साल में अब तक दर्जनों दलितों की हत्याएँ हो चुकी हैं, इसी डांगावास गाँव में जून 2014 में जाटों द्वारा मदन मेघवाल के पाँव तोड़ दिए गए थे, जनवरी 2015 में मोहन मेघवाल के बेटे चेनाराम की हत्या कर दी गई, बसवानी गाँव की दलित महिला जड़ाव को जिंदा जला दिया गया, उसका बेटा भी बुरी तरह से झुलस गया। मुंडासर की एक दलित महिला को ज्यादती के बाद ट्रैक्टर के गर्म सायलेंसर से दाग दिया गया, लंगोड़ में एक दलित को जिंदा ही दफना दिया गया, हिरड़ोदा में दलित दूल्हे को घोड़ी से नीचे पटक कर जान से मारने का प्रयास किया गया। इस तरह नागौर की जाटलैंड में दलितों पर कहर जारी है और राजस्थान का दलित लोकतंत्र की नई नीरो, चमचों की महारानी, प्रचंड बहुमत से जीत कर सरकार चला रही वसुंधराराजे के राज में अपनी जान के लिए भी तरस गया है। राज्य भर में दलितों पर अमानवीय अत्याचार की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं और राज्य के आला अफसर और सूबे के वजीर विदेशों में ‘ रिसर्जेंट राजस्थान‘ के नाम पर रोड शो करते फिर रहे हंै। कोई भी सुनने वाला नहीं है, राज्य के गृह मंत्री तो साफ कह चुके हैं कि उनके पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं जिससे अपराधियों पर अंकुश लगा सकें।  पुलिस अपराधियों में भय और आम जन में विश्वास’ के अपने ध्येय वाक्य के ठीक विपरीत ’आम जन में भय और अपराधियों में विश्वास’ कायम करने में सफल होती दिखलाई पड़ रही है। जाटलैंड का यह निर्मम दलित संहार संघ के कथित हिन्दुराष्ट्र में दलितों की स्थिति पर सवाल खड़ा कर रहा है।
 -भंवर मेघवंशी
मोबाइल: 09571047777
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

सोमवार, 15 जून 2015

मोदी का मुस्लिम नेताओं से संवाद एक मायाजाल


   
लगभग एक सप्ताह पहले, नरेन्द्र मोदी ने विभिन्न मुस्लिम समूहों के लगभग 30 प्रतिनिधियों से बातचीत की। यद्यपि इस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि कहा जाता है कि मोदी ने इन नेताओं से कहा कि वे उनके लिए हमेशा उपलब्ध हैं। 'आप लोग आधी रात को भी मेरा दरवाजा खटखटा सकते हैं', उन्होंने कहा। जो मुस्लिम नेता मोदी से मिले, उनमें से कई आरआरएस के नजदीक हैं और संघ द्वारा स्थापित 'मुस्लिम राष्ट्रीय मंच' से जुड़े हुए हैं। इस बैठक का खूब प्रचार हुआ परन्तु यह मोदी की अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं के साथ पहली मुलाकात नहीं थी। सवाल यह है कि यह संवाद केवल एक दिखावा था या मुस्लिम समुदाय की समस्याओं को सुलझाने का संजीदा प्रयास। क्या मोदी के शब्दों को गंभीरता से लिया जा सकता है? क्या वे सचमुच देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय की बेहतरी के बारे में चिंतित हैं ? क्या वे देश की बहुवादी संस्कृति की रक्षा करना चाहते हैं ? मुस्लिम समुदाय में भी कई ऐसे नेता हैं जो पुराने अनुभवों को भुला कर एक नयी शुरुआत, एक नया संवाद शुरू करना चाहते हैं। क्या यह संभव है ?
मोदी,आरएसएस के प्रशिक्षित प्रचारक हैं,जिन्हें डेप्युटेशन पर भाजपा में भेजा गया है। उनकी विचारधारा क्या है, वे यह कई बार साफ कर चुके हैं। लोकसभा के 2014 चुनाव के प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि वे जन्म से हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं, इसलिए वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं! वे समय.समय पर आरएसएस के मुखिया से विचार.विनिमय करते रहते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि दोनों के बीच कुछ मामूली मतभेदों के बावजूद, संघ ही भाजपा की नीतियों का अंतिम निर्धारक है। गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर, मोदी ने उनकी राजनीति की प्रकृति एकदम स्पष्ट कर दी थी। उनके मुख्यमंत्रित्वकाल में गुजरात को 'हिन्दू राष्ट्र की प्रयोगशाला' कहा जाता था। उन्होंने गुजरात कत्लेआम को औचित्यपूर्ण ठहराने के लिए न्यूटन के क्रिया.प्रतिक्रिया, के गतिकी के तीसरे नियम का हवाला दिया था। दंगों के बाद पीडि़तों के लिए स्थापित राहत शिविरों को बहुत जल्दी बंद कर दिया गया और मोदी ने उन्हें 'बच्चे पैदा करने वाली फैक्ट्रियां' बताया था।
दंगों के फलस्वरूप, गुजरात के समाज का सांप्रदायिक आधार पर जो ध्रुवीकरण हुआ, उसकी मदद से मोदी ने लगातार तीन चुनावों में विजय हासिल की। दंगों के घाव भरने और दोनों समुदायों के बीच सौहार्द कायम करने की इस बीच कोई कोशिश नहीं हुई। अल्पसंख्यक अपने मोहल्लों में सिमटते गए। अहमदाबाद का मुस्लिम.बहुल जुहापुरा इलाका, मोदी की बाँटनेवाली राजनीति का प्रतीक है। जिन लोगों ने निर्दोषों का खून बहाया था उन्हें महत्वपूर्ण पदों से नवाजा गया। मायाबेन कोडनानी को मंत्री पद मिला। उस दौर में फर्जी मुठभेड़ें आम थीं और इन्हें अंजाम देने वालेए सत्ता के गलियारों में सम्मान की दृष्टि से देखे जाते थे। धीरे.धीरे मोदी ने अपनी भाषा और अपने शब्दों को 'स्वीकार्य' स्वरुप देना शुरू किया। वे हिंदुत्व के जिस अतिवादी संस्करण के प्रणेता थे, उसे 'मोदित्व' कहा जाने लगा। 
सन 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान, एक ओर तो वे विकास की बातें करते रहे तो दूसरी ओर बड़ी चतुराई से सांप्रदायिक सन्देश भी देते रहे। उन्होंने बीफ के निर्यात की निंदा की और उसे 'पिंक रेवोल्यूशन' बताया। इसका उद्देश्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों को बीफ से जोड़ना था। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि असम की सरकारए बांग्लादेशी घुसपैठियों को बसाहट के लिए वहां पाए जाने वाले एक सींग वाले गेंडों को मार रही है। यह बांग्लाभाषी मुसलमानों पर हमला था। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लाभाषी मुसलमानों को 16 मई को . जिस दिन वे देश के प्रधानमंत्री बन जायेंगे . अपना बोरिया.बिस्तर लपेटने के लिए तैयार रहना चाहिए। यह साम्प्रदायिकता फैलाने का खुल्लमखुल्ला प्रयास था। भाजपा के प्रवक्ता लगातार यह कहते रहे हैं कि बांग्लाभाषी हिन्दू शरणार्थी हैं और मुसलमान, घुसपैठिये। सन्  2014 का चुनाव अभियान मोदी के नेतृत्व में चलाया गया था। उनके चेले अमित शाह ने मुजफ्फरनगर का 'बदला' लेने की बात कही तो गिरिराज सिंह ने फरमाया कि जो मोदी के विरोधी हैं, उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
आरएसएस ने पिछले ;2014 चुनावों में अपनी पूरी ताकत झोंक दी ताकि प्रचारक मोदी प्रधानमंत्री बन सकें। सत्ता में आने के बादए परोक्ष व अपरोक्ष ढंग से ऐसे कई सन्देश दिए गए जिनसे विभाजनकारी राष्ट्रीयता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जाहिर होती थी। आरएसएस से सम्बद्ध विभिन्न संगठन, जो अलग.अलग तरीकों और रास्तों से संघ के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए काम करते हैं, आक्रामक होने लगे और उनकी गतिविधियों में तेजी आई। चर्चों और मस्जिदों पर हमले बढ़ने लगे। दक्षिणपंथी ताकतों को यह लगने लगा कि चूंकि अब देश में उनकी सरकार है इसलिए वे चाहे जो करें, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। मोदी के शासनकाल के पहले छह महीनों में मोदी की नाक के नीचे चर्चों पर हमले हुए और वे चुप्पी साधे रहे। उनका मौन तब टूटा जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता और सहिष्णुता के महत्व की याद दिलाई।
हाल ;जून 2015 में दिल्ली के पास अटाली में व्यापक हिंसा हुई जहां एक अधबनी मस्जिद को गिरा दिया गया और सैकड़ों मुसलमानों को पुलिस थाने में शरण लेनी पड़ी। इस तरह की घटनाएं देश में जगह.जगह हो रही हैं और इनसे साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण मजबूत हो रहा है। गैर.हिन्दुओं पर'हरामजादे' का लेबिल चस्पा करने वाली मंत्री महोदया अपने पद पर बनीं हुई हैं और निहायत घटिया नस्लीय टिप्पणी करने वाले भी सत्ता के गलियारों में काबिज हैं। हिन्दुत्व के प्रतीक सावरकर और गोड़से का महिमामंडन किया जा रहा है और बहुवाद के पैरोकार नेहरू की या तो निंदा की जा रही है या उनके महत्व को कम करके बताया जा रहा है। गांधीजी को 'सफाईकर्मी' बना दिया गया है और हिन्दू.मुस्लिम एकता के उनके मूल संदेश को दरकिनार कर दिया गया है। केन्द्र सरकार के संस्थानों में ऐसे लोगों को चुन.चुनकर पदस्थ किया जा रहा है जो पौराणिकता और इतिहास में कोई भेद नहीं करते और जातिप्रथा को उचित ठहराते हैं। इनमें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के नए अध्यक्ष प्रोफेसर सुदर्शन राव शामिल हैं। आरएसएस से जुड़ी शैक्षणिक संस्थाएं सरकार को यह बता रही हैं कि शिक्षा नीति क्या होनी चाहिए और स्कूलों में बच्चों को क्या पढ़ाया जाना चाहिए। हिन्दू संस्कृति को राष्ट्रीय संस्कृति का दर्जा देने की कोशिश हो रही है।
मुस्लिम समुदाय की वास्तविक आवश्यकताएं क्या हैं? उन्हें प्रधानमंत्री से असल में क्या कहना चाहिए? उन्हें सबसे पहले ऐसी नीतियों की जरूरत है जिससे उनमें सुरक्षा का भाव उत्पन्न हो। पिछले तीन दशकों में हुई व्यापक और क्रूर हिंसा ने इस समुदाय पर गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव डाला है। हिंसा के अलावा, मुसलमानों के प्रति घृणा का वातावरण बनाया गया और सामूहिक सामाजिक सोच को इस तरह से तोड़ा.मरोड़ा गया जिससे विघटनकारी विचारधारा को बढ़ावा मिले और मुसलमानों पर निशाना साधा जा सके। और यह सब करने के बादए पीडि़त समुदाय को ही हिंसा का जनक और कारण बताया जाता रहा है! अल्पसंख्यकों के खिलाफ तरह.तरह के दुष्प्रचार हुए और इसके लिए सोशल मीडिया का जमकर उपयोग हुआ। जब तक मुसलमानों के खिलाफ समाज में व्याप्त गलत धारणाएं दूर नहीं की जाएंगी तब तक साम्प्रदायिक हिंसा पर रोक लगाना संभव नहीं होगा।
इस तरहए पूरी व्यवस्था का ढांचागत हिन्दुत्वीकरण किया जा रहा है और बहुवाद, जो कि भारतीय स्वाधीनता आंदोलन का केन्द्रीय तत्व था, की कीमत पर सावरकर.गोलवलकर की विचारधारा का प्रसार किया जा रहा है।
मुसलमानों के लिए दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा है आर्थिक दृष्टि से उनका हाशिए पर पटक दिया जाना। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि एक मुस्लिम युवक जीशान अली खान को खुल्लमखुल्ला यह कह दिया गया कि उसके धर्म के कारण उसे नौकरी नहीं दी जा सकती और एक मुस्लिम लड़की मिशाब कादरी को उसका घर खाली करने के लिए कहा गया क्योकि वह एक धर्म विशेष में आस्था रखती थी। 'सबका साथ सबका विकास' केवल नारा रह गया है और जैसा कि मोदी के सिपहसालार अमित शाह ने किसी और संदर्भ में कहा था, वह केवल एक जुमला था। किसी भी विविधतापूर्ण समाज में वंचित समुदायों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठानाए समाज और राज्य की जिम्मेदारी है। जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब उन्होंने मुस्लिम विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान करने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा भिजवाई गई धनराशि को लौटा दिया था। सच्चर समिति की सिफारिशों की तो अब कोई चर्चा ही नहीं करता। जाहिर है कि 'सबका विकास' इस सरकार के लक्ष्यों में कतई शामिल नहीं है।
मुसलमानों का एक तबका यह तर्क दे रहा है कि मोदी का 'हृदय परिवर्तन' हो गया है और अब वे अपनी पार्टी के सांप्रदायिक तत्वों को दबाने की कोशिश कर रहे हैं और आरएसएस की बात सुनना उनने कम कर दिया है। यह भ्रम जानबूझकर फैलाया जा रहा है और इसे फैलाने वालों में ज़फर सरेसवाला और एसएम मुश्रिफ जैसे लोग शामिल हैं। ऐसा कोई दिन नहीं जाता जब संघ परिवार का कोई न कोई नेता राममंदिर के निर्माण की मांग या धार्मिक अल्पसंख्यकों का अपमान न करे। और यह सब बहुत योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है। घरवापसी और लवजिहाद के नाम पर भी सांप्रदायिकता की आग को सुलगाए रखने की कोशिश हो रही है। जो लोग'हृदय परिवर्तन' की बात कर रहे हैं वे यह नहीं जानते कि आरएसएस द्वारा प्रशिक्षित स्वयंसेवक और प्रचारक, विचारधारा की दृष्टि से कितने कट्टर होते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी जैसे व्यक्ति ने भी प्रधानमंत्री बनने के बाद यह कहा था कि वे आरएसएस के स्वयंसेवक पहले हैं और प्रधानमंत्री बाद में।
कुछ आरएसएस समर्थक मुस्लिम नेता, मोदी के साथ जाना चाहते हैं और मोदी ने उन्हें वायदा किया है कि वे उनके लिए आधी रात को भी उपलब्ध रहेंगे। इन लोगों को यह नहीं भूलना चाहिए कि एहसान जाफरी के साथ क्या हुआ था। वे मोदी से सहायता की भीख मांगते रहे परंतु मोदी शायद बहरे हो गए थे। जाफरी को क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया। मोदी जहां थे, जाफरी उससे थोड़ी ही दूरी पर थे और उस समय आधी रात नहीं हुई थी।
समाज के अन्य वंचित वर्गों की तरह, मुस्लिम समुदाय को भी यह चाहिए कि वह जागे, आत्मचिंतन करे और बहुवाद व प्रजातंत्र के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष करे। मुस्लिम समुदाय को प्रजातांत्रिक ढंग से आंदोलन चलाने होंगे ताकि समुदाय के सदस्यों के नागरिक अधिकार सुरक्षित रह सकें। मूलाधिकारों के उल्लंघन का कड़ाई से विरोध किया जाना चाहिए। इस मामले में वे अंबेडकर से प्रेरणा ग्रहण कर सकते हैं जिन्होंने प्रजातांत्रिक रास्ते पर चलकर दलितों की बेहतरी के लिए काम किया। मुस्लिम समुदाय को चाहिए कि वो गांधी और मौलाना आजाद की राह पर चले, जो विविधता का अपनी दिल की गहराई से सम्मान करते थे न कि केवल दिखावे के लिए। मुसलमानों के लिए बिछाए जा रहे जाल में उन्हें नहीं फंसना चाहिए। खोखले शब्दों की जगह उन्हें संबंधित व्यक्तियों के कार्यों और उसकी विचारधारा पर ध्यान देना चाहिए।
-राम पुनियानी

रविवार, 14 जून 2015

अप्रत्याशित फैसला

कचेहरी धमाकों के आरोपी हकीम तारिक कासमी को 24 अप्रैल 2015 को पुलिस द्वारा लगाए गए तमाम आरोपों में विद्वान जज एसपी अरविंद ने दोषी पाते हुए छः बार उम्र कैद बा मशक्कत, और 50000-50000 रूपया का तीन जुर्माना की सजा सुनाई। ऐसा बहुत कम ही होता है जब पुलिस द्वारा लगाए गए आरोपों को अदालत ने अक्षरशः स्वीकार कर लिया हो। देश के इस बहुचर्चित मुकदमे में, तारिक कासमी और स्व० खालिद मुजाहिद की बेगुनाही साबित करने वाली जस्टिस निमेष आयोग की रिपोर्ट की मौजूदगी में अभियोजन की इतनी बड़ी कामयाबी किसी चमत्कार से कम नहीं है। आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तारियों के बाद यह पहला अवसर था जब तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी (गिरफ्तारी जाहिर किए जाने से दस दिन पहले किए गए अपहरण) के खिलाफ आन्दोलन चला, एफ.आई.आर. दर्ज कराई गई, सी.जी.एम. कोर्ट आजमगढ़ में मुकदमा कायम हुआ, धरने और जन सभाएँ हुईं, अखबारों में गिरफ्तारी दिखाए जाने से पहले दर्जनों खबरें भी छपीं, प्रदेश सरकार ने निमेष आयोग का गठन किया उसकी रिपोर्ट में तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी को
अवैध मानते हुए दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विधि अनुसार कार्रवाई करने की संस्तुति की गई। प्रदेश सरकार ने जन दबाव में इस रिपोर्ट को स्वीकार भी किया और सदन के पटल पर भी रखा लेकिन कार्रवाई रिपोर्ट नहीं लाई। शायद यह आतंकवाद से सम्बंधित पहला मुकदमा था जिसमें प्रत्यक्षदर्शियों ने निमेष आयोग के समक्ष और अदालत में अपनी गवाहियाँ दर्ज करवाईं। अदालत को बताया कि उन्होंने हकीम तारिक और खालिद मुजाहिद को क्रमशः रानी की सराय, आजमगढ़ और मडि़याहू, जौनपुर से 12 दिसम्बर और 16 दिसम्बर 2007 को एस.टी.एफ. के जवानों द्वारा अगवा करते हुए देखा था। दोनों 22 दिसम्बर 2007 को बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार नहीं हुए थे जैसा कि एस.टी.एफ. दावा कर रही है बल्कि उस दिन गिरफ्तारी दिखाई गई थी। क्या निमेष आयोग की रिपोर्ट को मुँह चिढ़ाता बाराबंकी सेशन कोर्ट का यह फैसला उन सवालों का जवाब देता है जो जस्टिस निमेष ने अपनी रिपोर्ट में उठाए थे। यहाँ यह गौर तलब है कि निमेष आयोग के समक्ष प्रस्तुत क्षेत्राधिकारी राजेश पाण्डेय ने अपने शपथपत्र में कहा है “एस.टी.एफ. कार्यालय में एस.टी.एफ. टीम से विचार विमर्ष कर रहा था कि तभी समय करीब 2ः30 बजे द्वारा मुखबिर एस.टी.एफ. टीम के पुलिस उपाधीक्षक एस आनंद, निरीक्षक अविनाश मिश्रा, उपनिरीक्षक विनय कुमार सिंह, उप निरीक्षक धनन्जय सिंह व उप निरीक्षक ओ.पी. पाण्डेय को सूचना मिली कि कुछ संदिग्ध व्यक्ति बाराबंकी रेलवे स्टेशन के पास समय करीब प्रातः 6ः00 बजे आने वाले हैं, जिनके सम्बंध आतंकवादी संगठन से हैं। इनके पास घातक शस्त्र व विस्फोटक पदार्थ भी हैं जो किसी संगीन घटना को अंजाम देने की नीयत से लेकर आ रहे हैं”। (रिपोर्ट-एकल सदस्यीय निमेष जाँच आयोग, पेज-105) इस हलफनामे से स्वतः स्पष्ट होता है कि 22 दिसम्बर को तारिक और खालिद की कथित गिरफ्तारी से पहले इन दोनों के किसी आतंकवादी घटना में शामिल होने के बारे में एस.टी.एफ. को जानकारी नहीं थी। एस.टी.एफ. के अनुसार गिरफ्तारी के बाद उनके पास से हथियार और विस्फोटक बरामद हुए और पूछताछ में यह पता चला कि उनके सम्बंध आतंवादी संगठन हूजी से हैं और वह कचेहरी सीरियल धमाकों में शामिल थे। इस तरह अगर 22 दिसमबर 2007 को इन दोनों की बाराबंकी रेलवे स्टेशन से गिरफ्तारी
संदिग्ध साबित हो जाती है या यह साबित हो जाता है कि एस.टी.एफ. के जवानों ने उन्हें पहले ही अगवा कर लिया था और अपनी गैरकानूनी हिरासत में  यातना का शिकार बनाया था जैसा कि अभियुक्तों का दावा है। ऐसे में हथियारों और विस्फोटकों की बरामदगी से लेकर कचेहरी धमाकों में उनकी संलिप्तता का आरोप खुद ही खारिज हो जाता है और निमेष आयोग की रिपोर्ट में इस गिरफ्तारी को पूरी तरह संदेहास्पद मानते हुए यह संस्तुति कि “अतः उपरोक्त घटना क्रम में सक्रिय भूमिका निभाकर विधि विरुद्ध कार्य करने वाले
अधिकारी, कर्मचारीगण को चिह्नित कर उनके विरुद्ध विधि के अनुसार कार्यवाही करने की संस्तुति की जाती है”। (रिपोर्ट- एकल सदस्यीय निमेष जाँच आयोग, पेज-235)
    जस्टिस निमेष ने आजमगढ़, जौनपुर और बाराबंकी में घटना स्थलों का दौरा किया। स्थानीय लोगों से बात चीत की। अभियोजन पक्ष के 46 और बचाव पक्ष के 25 साक्षीगणों से शपथपत्र लिए इसके अलावा 45 अन्य गवाहों का आयोग की तरफ से परीक्षण किया गया। तारिक कासमी और खालिद मुजाहिद के मोबाइल की लोकेशन उनके बयान और बचाव पक्ष के साक्षीगण द्वारा दिए गए हलफनामे की पुष्टि करती है। मिसाल के तौर पर हकीम तारिक ने अपने हलफनामे में कहा है कि उसे शंकरपुर चेक पोस्ट रानी की सराय जनपद आजमगढ़ के पास से बुधवार के दिन दोपहर में सफेद टाटा सूमो सवार एस.टी.एफ. के अहलकारों ने जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया और लेकर बनारस की तरफ चले गए। उसके बाद शाम को वहाँ से लखनऊ लाए, लखनऊ में रख कर प्रताडि़त किया और 22 दिसम्बर की सुबह बाराबंकी रेलवे स्टेशन लाकर वहाँ से गिरफ्तारी दिखाई। प्रत्यक्षदर्शियों ने भी निमेष कमीशन और बाराबंकी अदालत के सामने अपनी गवाही में इसकी पुष्टि की है। इसके अलावा हकीम तारिक के मोबाइल का लोकेशन भी 12 दिसम्बर को दिन में 12ः23 बजे रानी की सराय यू०पी० (ईस्ट) की है। इस तरह मोबाइल का लोकेशन, अभियुक्त तारिक कासमी का बयान, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान तथा अखबारों में छपी खबरें इस बात की तस्दीक करती हैं कि तारिक कासमी 12 दिसम्बर 2007 को रानी की सराय चेकपोस्ट पर थे और वहीं से उसे अगवा किया गया था। उसके बाद तारिक कासमी का कहना है कि उसी दिन शाम को उसे बनारस से लखनऊ ले जाया गया था। उसके मोबाइल का लोकेशन भी उसके बाद 13 दिसम्बर से 21 दिसम्बर तक का लखनऊ बताता है। तारिक कासमी के परिजनों ने भी रानी की सराय थाने में जो रिपोर्ट लिखवाई थी उसमें साफ कहा गया था कि तारिक का मोबाइल कभी आफ हो जाता है कभी आन। इसलिए उसको सर्वेलांस पर लगा कर पता किया जाए कि तारिक कहाँ है और उसे किन लोगों ने अगवा किया है? लेकिन पुलिस ने यह तकलीफ कभी नहीं उठाई। पुलिस का यह रवैया कोई पहेली नहीं बल्कि साफ संकेत था कि कुछ गलत हो रहा है और चूँकि उसमें बड़े अधिकारियों की भूमिका है इसलिए वह कुछ भी करने में असमर्थ हैं। बहुत कम मामलों में खासकर आतंकवाद से जुड़ी हुई किसी घटना में सिलसिलेवार चार-चार साक्ष्य (अभियुक्त एवं प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, मोबाइल लोकेशन और अखबारों में छपी खबरें) एक दूसरे की पुष्टि करते हुए पाए जाएँ। इसके अलावा रानी की सराय थाने में लिखवाई गई रिपोर्ट और सी.जे.एम. की अदालत में किया गया मुकदमा भी इन साक्ष्यों पर अपनी मुहर लगाता है। लेकिन अदालत ने इतने मजबूत साक्ष्यों को नजरअंदाज करके हकीम तारिक को छः बार उम्रकैद और 50000-50000 रूपये के तीन जुर्माने की सजा सुनाई।
    वास्ताविकता यह है कि जस्टिस निमेष आयोग की रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद से ही उत्तर प्रदेश के पुलिस मुहकमें में हड़कम्प मचा हुआ था। जिस प्रकार से इस केस में अभियुक्तों को गैरकानूनी हिरासत में रख कर प्रताडि़त करने और झूठा मुकदमा बनाने का आरोप प्रदेश के बड़े पुलिस
अधिकारियों पर लगा था और आयोग की रिपोर्ट में उन्हें चिह्नित कर विधि अनुसार कार्यवाही करने की संस्तुति की गई थी इससे उन
अधिकारियों के पसीने छूट गए थे। खालिद मुजाहिद की फैजाबाद से पेशी के बाद लखनऊ वापस जाते हुए बाराबंकी में अचानक होने वाली मौत के बाद भी उन्हीं अधिकारियों पर हत्या का आरोप लगाते हुए रिहाई मंच ने लखनऊ में विधान सभा के सामने अनिश्चित कालीन धरना दिया था जो 121 दिनों तक चला था। धरने के माध्यम से भी इन
अधिकारियों की गिरफ्तारी की माँग लगातार की जाती रही थी और यह आशंका व्यक्त की जा रही थी कि अपनी जान बचाने के लिए निमेष आयोग के अनुसार “विधि विरुद्ध कार्य करने वाले (पुलिस) अधिकारी, कर्मचारीगण” कोई खतरनाक खेल भी खेल सकते हैं या अपने पद और अपने राजनैतिक सम्पर्कों का दुरुपयोग कर सकते हैं। खालिद मुजाहिद की मौत-हत्या को भी इसी नजरिए से देखा गया था और बाराबंकी अदालत के इस फैसले के बाद अखबारों में छपने वाली प्रतिक्रिया में भी इसका अक्स साफ तौर पर देखा जा सकता है। किसी ने इसे राजनैतिक फैसला कहा है तो किसी ने दबाव में दिया गया फैसला। रिहाई मंच ने सीधे तौर पर यह आरोप लगाया कि “इस फैसले ने साफ कर दिया है कि जिस तरीके से सरकार ने बाराबंकी में झूठी बरामदगी दिखाने वाले एसटीएफ के अधिकारियों के अलावा पूर्व डी.जी.पी. विक्रम सिंह पूर्व ए.डी.जी. बृजलाल समेत 42 पुलिस आई.बी.
अधिकारियों को बचाने के लिए निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर एक्शन नहीं लिया अब उसी काम को अदालत द्वारा करवाया जा रहा है”। (जाँच कमीशनों का सियासी खेल हुकूमत को बंद कर देना चाहिए रिहाई मंच, इनकलाब उर्दू, 27 अप्रैल, 2015, पेज-7) जजमेन्ट के पेज नं0-56 व 57 पर माननीय न्यायाधीश ने विवेचनाधिकारी पर अपनी टिप्पणी भी की है जो इस प्रकार है- ‘‘बचाव पक्ष की ओर से विद्वान अधिवक्ता ने अपने विस्तृत तर्कों में विवेचक पी0डब्लू0-8 के सम्बन्ध में यह आरोप लगाया कि विवेचक के द्वारा विवेचना के दौरान सत्यता जानने हेतु उन समाचार पत्रों या पत्रों की जो प्रति अभियुक्त के व्यपहरण के सम्बन्ध में उसे दी गई को विवेचना में सम्मिलित कर कोई जांच नहीं की गई, पर आरोप लगाते हुए कहा कि विवेचन ने निष्पक्ष विवेचना नहीं की बल्कि अभियुक्त के विरुद्ध फर्जी साक्ष्य गठित कर उसे दोषी साबित करने का प्रयास करता रहा। ऐसे विवेचक के द्वारा दिया गया निष्कर्ष साक्ष्य से ग्राह्य नहीं है। जहाँ तक इस सम्बन्ध में मेरी राय है, विवेचक पी0डब्लू0-8 की जिरह की स्वीकृति से जाहिर है कि बचाव पक्ष ने विवेचना के दौरान उसे अभियुक्त के गुम होने या उसे अपहृत कर ले जाने के सम्बन्ध में विवेचक को समाचार-पत्रों की जो कटिंग या उच्चाधिकारियों को प्रेषित पत्रों की जो प्रतियाँ दी गईं, उन्हें विवेचक ने विवेचना में सम्मिलित न करके विवेचना की लापरवाही अवश्य नजर आ रही है।’’
    राजनैतिक कलाबाजियाँ, अदालती दाँव-पेच, पुलिस के हथकंडे, साम्प्रदायिकता, कारपोरेट जगत के कुचक्र और एक आम नागरिक की सीमाएँ यह सब अपनी जगह, बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों ने अपनी आँखों से अपहरण की इस घटना को देखा, पूरे एक सप्ताह तक अखबारों में खबरें पढ़ते रहे, धरनों और प्रदर्शनों में भाग लिया या उसके साक्षी रहे, जिनकी आवाज मीडिया या सरकारी हल्कों तक नहीं पहुँच पाती है, वह इस फैसले के बारे क्या सोच रहे होंगे? वह सीधा साधा नागरिक जो अदालतों को इंसाफ का मंदिर समझता है और जिसने 22 दिसम्बर 2007 को हकीम तारिक और खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी दिखाए जाने से पहले बहुत कुछ देखा, सुना और जाना था उसके मन में इस मंदिर के प्रति अब क्या तस्वीर होगी? माननीय उच्चतम न्यायालय ने निचली अदालतों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर विगत में कई सख्त टिप्पणियाँ की हैं। लेकिन इस मामले का अलग महत्व है। यह मामला गाँव के किसी झगड़े की तरह नहीं है। आजमगढ़ और जौनपुर में कम ही लोग ऐसे होंगे जिन्हें गिरफ्तारी दिखाए जाने के दिन से पहले ही इस बड़े खेल के बारे में जानकारी न हो चुकी रही हो। इस मामले की गूँज विभिन्न माध्यमों से प्रदेश और देश के जागरूक और सामाजिक सरोकार रखने वालों तक भी पहले ही पहुँच चुकी थी। ऐसे में इस फैसले से उन्हें जो आघात पहुँचा होगा उसकी भारपाई कैसे हो पाएगी। इस फैसले को एक व्यक्ति या एक परिवार किस्मत का सितम मान कर सह लेगा लेकिन न्यापालिका पर आस्था को जो चोट पहुँची है उसके जख्म लम्बे समय तक हरे रहेंगे।            
 -मसीहुद्दीन संजरी 
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