शनिवार, 24 जनवरी 2015

गाँधी की नजरों में आरएसएस

मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद से ही, गांधीजी को इस रूप में प्रस्तुत करने के प्रयास हो रहे हैं, जिससे आरएसएस को लाभ हो। पहले, गांधी जयंती ;2 अक्टूबर से 'स्वच्छता अभियान' की शुरूआत की गई। फिर,यह दावा किया गया कि गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का आरएसएस से कोई लेनादेना नहीं था। अब गांधी से इस आशय का प्रमाणपत्र हासिल करने के प्रयास हो रहे हैं कि 'आरएसएस बहुत अच्छा संगठन है'।
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा हाल ;जनवरी 2015 में गुजरात के गांधीनगर में गांधीजी पर केंद्रित संग्रहालय 'डांडी कुटीर' में आने वाले दर्शकों को एक मल्टीमीडिया प्रेजेंटेशन दिखाया जा रहा है,जिसमें यह बताया गया है कि सन् 1930 में गांधीजी, घनश्यामदास बिरला के साथ, वर्धा में आरएसएस के एक शिविर में पहुंचे थे। गांधीजी, आरएसएस की कार्यप्रणाली से अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने संघ के संस्थापक हेडगेवार से मिलने की इच्छा प्रगट की। यह भी दावा किया गया है कि गांधीजी,अगले दिन, हेडगेवार से मिले भी।
जो कुछ हमें निश्चित तौर पर ज्ञात हैए उससे ये दावे खोखले प्रतीत होते हैं। यह सर्वज्ञात है कि संघ, गांधीजी की राजनीति का घोर विरोधी था। वह असहयोग आंदोलन से आम लोगों को जोड़कर, राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक स्वरूप देने के गांधीजी के प्रयास का भी आलोचक था। इस आंदोलन से देश में व्यापक जाग्रति आई और आमजन ब्रिटिश.विरोधी आंदोलन से जुड़े। यह भारत के 'निर्माणाधीन राष्ट्र' बनने की राह में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर था। संघ,इस भारतीय राष्ट्रवाद का कटु आलोचक था। आरएसएस के संस्थापक, गांधीजी के हिंदू.मुस्लिम एकता स्थापित करने के प्रयास से भी इत्तेफाक नहीं रखते थे। वे असहयोग आंदोलन के भी खिलाफ थे। हेडगेवार ने आगे चलकर लिखाए'महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन के नतीजे में देश का उत्साह ठंडा पड़ गया और जिन सामाजिक बुराईयों को इस आंदोलन ने जन्म दियाए वे अपना डरावना सिर उठाने लगीं'। उनके अनुसारए 'इस आंदोलन के कारण ब्राह्मण, गैर.ब्राह्मण टकराव स्पष्ट सामने आ गया';केशव संघ निर्माता, 1979य सीपी भिसीकर, पुणे,पृष्ठ 7। जिसे हेडगेवार,ब्राह्मण, गैर.ब्राह्मण टकराव बता रहे थे,दरअसल,वह दलितों का भू.अधिकार व सामाजिक गरिमा हासिल करने और जातिगत पदानुक्रम के विरूद्ध संघर्ष था। अस्त होती प्राक्.औद्योगिक सामाजिक व्यवस्था के मूल्यों के प्रति अपनी वफादारी के चलते,हेडगेवार इस आंदोलन के विरोधी थे। गैर.ब्राह्मण आंदोलन तो असल में समाज में जातिगत रिश्तों के यथास्थितिवाद को चुनौती दे रहा था।
हेडगेवार के उत्तराधिकारी गोलवलकर ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की आलोचना इसलिए की क्योंकि वह 'केवल ब्रिटिश.विरोधी' था। वे लिखते हैं, 'क्षेत्रीय राष्ट्रवाद व समान शत्रु के सिद्धांत.जो राष्ट्र की हमारी अवधारणा का आधार हैं, ने हमें हमारे असली हिंदू राष्ट्रवाद की सकारात्मक व प्रेरणास्पद अंतर्वस्तु से वंचित कर दिया    ब्रिटिश.विरोध को देशभक्ति और राष्ट्रवाद का पर्याय माना जाने लगाए इस प्रतिक्रियावादी सोच ने स्वाधीनता आंदोलन, उसके नेताओं और उसके समर्थकों पर विनाशकारी प्रभाव डाला' ;बंच ऑफ थॉट्स,बैंगलोर, 1996, पृष्ठ 138। गांधीजी और भारतीय राष्ट्रवाद की गांधी की अवधारणा व भारत को राष्ट्र.राज्य के रूप में एक करने के उनके संघर्ष के बारे में संघ के ये विचार थे।  
और गांधी संघ को किस नजर से देखते थे ?  चूंकि काफी लंबे समय तक आरएसएस 'चुपचाप' काम करता रहा इसलिये स्वाधीनता आंदोलन के दौरान आरएसएस की भूमिका की विशेष चर्चा तत्कालीन साहित्य में नहीं है। चूंकि संघ, राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल नहीं था इसलिये इस आंदोलन में उसकी भूमिका के बारे में भी हम कुछ कहने की स्थिति में नहीं हैं। परंतु उपलब्ध स्त्रोतों से जो भी जानकारी हमें मिलती है, उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि गांधीजी, आरएसएस के प्रशंसक तो कतई नहीं थे। 'हरिजन' के 9 अगस्त 1942. के अंक में गांधी लिखते हैंए 'मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसकी गतिविधियों के बारे में सुना है। मैं यह भी जानता हूं कि यह एक सांप्रदायिक संगठन है।' उन्होंने यह टिप्पणी'दूसरे' समुदाय के खिलाफ नारेबाजी और भाषणबाजी के संबंध में एक शिकायत के प्रति उत्तर में कही। इसमें गांधी, आरएसएस कार्यकर्ताओं के शारीरिक प्रशिक्षण की चर्चा कर रहे हैं जिसके दौरान कार्यकर्ता ये नारे लगाते थे कि यह राष्ट्र केवल हिंदुओं का है और अंग्रेजों के देश से जाने के बाद हम गैर.हिंदुओं को अपने अधीन कर लेंगे। सांप्रदायिक संगठनों द्वारा की जा रही गुंडागर्दी के संबंध में वे लिखते हैंए 'मैंने आरएसएस के बारे में बहुत सी बातें सुनी हैं। मैंने यह भी सुना है कि जो शैतानी हो रही हैए उसकी जड़ में संघ है,' ;कलेक्टिव वर्क्स ऑफ गांधी, खंड 98, पृष्ठ 320.322।
                    आरएसएस के संबंध में गांधीजी के विचारों का सबसे विश्वसनीय स्त्रोत उनके सचिव प्यारेलाल द्वारा वर्णित एक घटना है। सन् 1946 के दंगों के दौरान, प्यारेलाल लिखते हैं, 'गांधीजी के साथ चल रहे लोगों में से किसी ने पंजाब के शरणार्थियों के एक महत्वपूर्ण शिविर वाघा में आरएसएस के कार्यकर्ताओं की कार्यकुशलता,अनुशासन, साहस और कड़ी मेहनत करने की क्षमता की तारीफ की। गांधीजी ने तुरंत पलटकर कहा, 'पर यह न भूलो कि हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासीवादियों में भी ये गुण थे'. गांधी आरएसएस को तानाशाहीपूर्ण सोच वाला एक सांप्रदायिक संगठन मानते थे।' ;प्यारेलाल, महात्मा गांधी द लास्ट फेज, अहमदाबाद, पृष्ठ 440।
         स्वतंत्रता के बाद, दिल्ली में हुई हिंसा के संदर्भ में ;राजमोहन गांधी, मोहनदास, पृष्ठ 642, 'गांधी जी ने आरएसएस के मुखिया गोलवलकर से हिंसा में आरएसएस का हाथ होने संबंधी रपटों के बारे में पूछा। आरोपों को नकारते हुए गोलवलकर ने कहा कि आरएसएस, मुसलमानों को मारने के पक्ष में नहीं है। गांधी ने कहा कि वे इस बात को सार्वजनिक रूप से कहें। इस पर गोलवलकर का उत्तर था कि गांधी उन्हें उद्धत कर सकते हैं और गांधीजी ने उसी शाम की अपनी प्रार्थना सभा में गोलवलकर द्वारा कही गई बात का हवाला दिया। परंतु उन्होंने गोलवलकर से कहा कि उन्हें इस आशय का वक्तव्य स्वयं जारी करना चाहिए। बाद में गांधी ने नेहरू से कहा कि उन्हें गोलवलकर की बातें बहुत विश्वसनीय नहीं लगीं।'
आज,सत्ता में आने के बाद, आरएसएस, स्वाधीनता आंदोलन की विरासत से स्वयं को किसी भी प्रकार से जोड़ने के लिए बेचैन है। यह तबए जब वह इस आंदोलन से दूर रहा था और उसने इस आंदोलन की इसलिये आलोचना की थी क्योंकि उसमें सभी समुदायों की हिस्सेदारी थी। आरएसएस का लक्ष्य हिंदू राष्ट्र है, ठीक उसी तरह मुस्लिम लीग का लक्ष्य मुस्लिम राष्ट्र था। आज आरएसएस गांधी से प्रमाणपत्र चाहता है। इसलिये उनके कहे वाक्य को अधूरा प्रस्तुत किया जा रहा है। आरएसएस कार्यकर्ताओं के 'अनुशासन और कड़ी मेहनत' के बारे में गांधी के कथन को तो उद्धत किया जा रहा है परंतु उसके बाद जो उन्होंने कहा था अर्थात 'हिटलर के नाजियों और मुसोलिनी के फासीवादियों में भी ये गुण थे', उसकी चर्चा नहीं की जा रही है। दोनों प्रकार के राष्ट्रवादों में जो मूल विरोधाभास हैं उनके चलते आरएसएस के प्रति गांधीजी के दृष्टिकोण के संबंध में किसी प्रकार के संदेह के लिए कोई जगह नहीं है। संघ परिवार चाहे कुछ भी दावा करे, यह मानना असंभव है कि गांधीजी कभी भी आरएसएस जैसे संगठन के प्रशंसक हो सकते हैं।
-राम पुनियानी

बुधवार, 21 जनवरी 2015

मोदी की मेहरबानी से अमरीकियों के गुलाम

एक गुजराती (गाँधी) ने देश को आज़ादी दिलवाई ,दूसरे गुजराती (मोदी) ने पुनः देश को गुलामी की तरफ धक्का देने की शुरूआत कर दी -

पढ़िए कैसे-------------
अमेरिकी सीक्रेट सर्विस को ओबामा के प्रवास के मद्देनज़र निम्नाकित जो सुविधाए दी जा रही है इसे देख कर मुझे अपने आपको आजाद देश का भारतीय कहने में शर्म आ रही है !1) 24 और 25 जनवरी से कोई भी भारतीय सेन्ट्रल दिल्ली में प्रवेश नहीं कर सकेगा ,यहाँ के चप्पे चप्पे पर अमेरिकी सुरक्षा गार्ड ही रहेंगे! 

2) 24 जनवरी से सेन्ट्रल दिल्ली की हर सरकारी ईमारत को बंद रखा जायेगा इन सभी सरकारी इमारतों में अमेरिकी सुरक्षा अधिकारी और स्नाइपर्स तैनात रहेंगे ,मतलब हमारे देश के सरकारी नौकरों की भी अब कोई इज्ज़त नहीं रखा केंद्र सरकार ने!

3) 24 जनवरी से ही इंडिया गेट ,रफ़ी मार्ग ,जनपथ के सभी रास्तों को आम जनता के लिए बंद कर दिया जायेगा ,इन मार्गों पर विदेशी अमरीकीयों का कब्ज़ा होगा !

4) वायुमार्ग भी प्रभावित रहेंगे ,भारतीय थल के साथ इन तीन दिनों तक अमेरिकियो का कब्ज़ा भारतीय आकाश पर भी रहेगा जिससे की अगर ओबामा को आपातकालीन स्थिति में भागना पड़े तो अमेरिकी वायुसेना को कोई दिक्कत ना हो 

5)प्रस्तावित आगरा यात्रा को ध्यान में रखते हुए इस मार्ग पर रुकने खाने पीने के सभी होटल ढाबे बंद करवा दिए जायेंगे !

यानी की हम लोग अपने ही देश में इन तीन दिनों तक मोदी की मेहरबानी से अमरीकियों के गुलाम रहेंगे,  

अब आप थोडा जेहन पर जोर डालिए अब मोदी जी अमेरिका गए थे तो क्या वहां अमेरिका में भी ऐसा स्वागत और सुरक्षा का इन्तेजाम उनके लिए किया गया .....

1) मोदी को एरपोर्ट पर लेने ओबामा तो दूर की बात कोई बड़ा अमेरिकी नेता या अफसर तक नहीं आया....

2) मोदी की गाड़ी एयरपोर्ट से होटल तक बाकी आम अमेरिकी लोगो की गाडियों के बीच ट्राफिक में चल रही थी....


तो भगतों एक बार और ताली बजाओ ....
- यह फेसबुक साभार -

29 सितंबर २०११को जेएफके एयरपोर्ट पर करीब 2 बजे एयर इंडिया की फ्लाइट उड़ान भरने के लिए तैयार थी। उत्तेजित सुरक्षाकर्मियों ने क्रू को प्लेन का दरवाजा खोलने के लिए मजबूर कर दिया और बताया कि वे एक यात्री की तलाशी लेना चाहते हैं। उन्होंने जब प्लेन के भीतर कहा कि वे कलाम की तलाशी लेना चाहते हैं तो एयर इंडिया के अधिकारियों ने विरोध किया और बताया कि वह भारत के पूर्व राष्ट्रपति हैं। इसके बाद उन्होंने थोड़ी नरमी दिखाई, लेकिन कलाम के जूते और जैकेट लेकर चले गए।

देवयानी प्रकरण में अमेरिका ने कूटनीतिक संरक्षण को आंशिक रूप से मानते हुए उनको वीजा 1 दे दिया और  अपने मुल्क से भगा दिया। जिस पर भारत ने अमेरिकी दूतावास के निदेशक स्तर के अधिकारी को संगीता रिचर्ड के अभिभावकों को अमेरिका ले जाने की प्रक्रिया में सहयोग करने के आरोप में भगा दिया और उसको भागने का समय 48 घंटे का दिया है। देवयानी को 12 दिसंबर को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें 250,000 अमेरिकी डॉलर के बांड पर रिहा किया गया था। गिरफ्तारी के बाद कपड़े उतारकर देवयानी की तलाशी ली गयी थी और उन्हें नशेड़ियों के साथ रखा गया था जिससे भारत और अमेरिका के बीच तनातनी बढ़ गई। भारत ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी राजनयिकों के विशेषाधिकार कम कर दिए।

               आज़म खान साहब के साथ क्या-क्या हुआ वह भी पूरी तरीके से देश को बताया नही गया लेकिन जब देवयानी का मामला आया तो विडियो फुटेज से उनकी तलाशी का तरीका सामने आया। हरदीप पूरी, निरुपमा राव के साथ भी बदतमीजियां हुई थी। अब सवाल उठता है कि यह सब होने के बाद आप अमेरिका क्या करने जाते हैं निश्चित रूप से कुछ न कुछ व्यक्तिगत स्तर पर प्राप्ति की कामना अमेरिका यात्रा के लिए यह सब सहने को मजबूर करती है।
 शाहरुख खान को अमेरिका के न्यूयार्क हवाई अड्डे पर रोके रखने पर एसएम कृष्णा ने आज कहा कि किसी भी हस्ती को रोके रखना, और बाद में माफी मांग लेने को अमेरिका ने आदत बना लिया है।
       इससे उनके राष्ट्रविरोधी देशविरोधी गतिविधियों पर तुरंत लगाम लगेगी। अमेरिका कभी भी भारत का स्वाभाविक मित्र नही रहा है और न हो ही सकता है क्यूंकि अमेरिका सम्राज्यवादी मुल्क है और आप साम्राजयवाद पीड़ित।
वे आए तो हमने सिर पे बैठाला हम गए तो लतियाया ......

हरदीप पूरी-------------------------------------------- मीरा शंकर

वे आए तो हमने सर पे बैठाला हम गए तो लतियाया इसी तर्ज पर अमेरिका हमारे देश से व्यवहार कर रहा है। क्या हमारा स्वभाव बन गया है, कि हम उनके लतियाने को भी अपना अहो भाग्य समझें और उलट कर उनके पैर की मालिश करने लगे कि सरकार चोट तो नहीं लगी।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा पहले  भारत की यात्रा पर आये अपने सुरक्षा गार्डों तथा सैन्य अधिकारियों  के साथ हमारे देश ने उनका स्वागत किया, स्वागत गीत गाये। प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया तक उनकी हर एक अदा को प्रमुखता से प्रचारित व प्रसारित किया वहीँ जब हमारे देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी जी गए तो उनके ऊपर अमेरिकी राष्ट्रपति ने शराब गिरा दी थी। तत्कालीन रक्षा मंत्री जार्ज फर्नांडीज जब अमेरिका की यात्रा पर गए तो डलास एअरपोर्ट पर उनकी जामा तलाशी ली गयी और 2003 में रक्षा मंत्री जब ब्राजील जा रहे थे तब भी उनकी तलाशी ली गयी थी और हम आह भी नहीं कर पाए।
 संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत के अस्थायी प्रतिनिधि शीर्ष राजनयिक हरदीप पूरी की ह्यूस्टन एअरपोर्ट पर पगड़ी की तलाशी देने के लिए कहा गया। तलाशी न देने पर उनके साथ बदसलूकी की गयी और एक कमरे में अघोषित रूप से कैद कर लिया गया। उनको तब रिहा किया गया जब उनके साथ चल रहे टी.एस.ए अधिकारीयों ने दखल दिया और अमेरिका में भारत की राजदूत मीरा शंकर की अपमानजनक तरीके से तलाशी ली गयी इन दोनों घटनाओ में हम सिर्फ विरोध दर्ज करा कर रह गए। इसके पूर्व भी भारत के नागरिक उड्डयन मंत्री श्री प्रफुल्ल पटेल से शिकागो के एअरपोर्ट पर बदतमीजी पूर्ण तरीके से पूछताछ की गयी थी।


सुमन
लो क सं घ र्ष !

संदर्भ: पेरिस मुस्लिम धार्मिक और राजनैतिक नेताओं का हस्तक्षेप आवश्यक

अमरीका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर सन 2002 में हुए हमले के बाद शायद यह दूसरी बार है जब आतंकवाद के खिलाफ पूरी दुनिया में एक साथ भर्तस्ना की आवाजें उठीं हैं। इन आवाजों का निशाना मुस्लिम आतंकवादी हैं और कारण है पेरिस में पत्रकारों की सामूहिक हत्या।
इस समय विश्व एक ऐसे दौर से गुजर रहा है जब मुस्लिम आतंकवादियों और  दुनिया के अन्य लोगों के बीच दरार गहरी होती जा रही है। इस मौके पर एक बड़ी व  सुनियोजित पहल की आवश्यकता है। यदि ऐसी पहल न की गई तो दुनिया में हिंसा और प्रतिशोध का एक ऐसा चक्र प्रारंभ हो जायेगा, जिसपर नियंत्रण करना काफी कठिन होगा।
द्वितीय महायुद्ध के पूर्व, हिटलर ने यहूदियों के विरूद्ध घृणा का वातावरण बनाया था। उस वातावरण ने विश्व युद्ध का रूप ले लिया। परंतु उस समय  यहूदियों के विरूद्ध घृणा सिर्फ जर्मनी की सीमाओं तक सीमित थी। अब स्थिति अलग है। यहूदी,दुनिया के बहुत कम देशों में रहते हैं। इनकी आबादी भी बहुत कम है। परंतु शायद ही विश्व का कोई ऐसा देश हो  जहां मुसलमान न रहते हों। इतिहास गवाह है कि घृणा के वातावरण का लाभ निहित स्वार्थ जमकर उठाते हैं। इस तरह की स्थितियां निर्मित न होंए इसकी जिम्मेदारी पूरी दुनिया के नेताओं और विशेषकर संयुक्त राष्ट्र संघ की है।
पेरिस की घटना के बाद फ्रांस की राजधानी में यूरोपीय व अन्य देशों के लोग आए और उन सबने एकजुटता दिखाते हुए अपना आक्रोश प्रकट किया। पेरिस आए सभी नेताओं का स्वागत करते हुए फ्रांस के प्रधानमंत्री ने कहा कि आज यथार्थ में पेरिस, दुनिया की राजधानी बन गया है। अकेले यूरोप से ही 11 प्रधानमंत्री या राष्ट्राध्यक्ष पेरिस के शांतिमार्च में शामिल हुए। अमरीका के अनेक लोग नाराज हैं कि राष्ट्रपति ओबामा पेरिस नहीं गए।
अमरीका के एक प्रसिद्ध पत्रकार ने कहा कि अमरीका का नागरिक होने के नाते मेरी तीव्र इच्छा थी कि पेरिस के शांतिमार्च में ओबामा भी शामिल होते। यहां यह उल्लेखनीय है कि अमरीका के एर्टोनी जनरल ऐरिक होल्डर पेरिस में थे परंतु वे शांतिमार्च में शामिल नहीं हुए। इसी तरह, वहां के विदेश मंत्री उस समय भारत भ्रमण पर थे। अमरीका के कई समाचारपत्रों ने इस मुद्दे को लेकर राष्ट्रपति ओबामा की आलोचना की। 
पेरिस मार्च का एक अद्भुत पहलू यह था कि उसमें एक.दूसरे के जानी दुश्मन.इजराईल के प्रधानमंत्री और फिलस्तीन के राष्ट्रपति.भी शामिल थे। शांतिमार्च के बाद जारी एक संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि यह आवश्यक है कि दुनिया की सरकारें आपस में सहयोग करें और यदि जरूरी हो तो साईबर दुनिया से उन संदेशों को हटाएं जो घृणा और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले हैं। यह भी तय किया गया कि जो लोग दूसरे देशों से आते हैं, उनके कागजातों की काफी बारीकी से जांच की जाए।
जहां दुनिया की सरकारों को यह महसूस हो रहा है कि इस तरह की आतंकवादी ताकतों से मुकाबला करने के लिए एकता की आवश्यकता है वहीं इस बात पर भी जोर देना आवश्यक है कि मुस्लिम राष्ट्रों के राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री और बादशाह इस मुद्दे पर मंथन करें और यह सोचें की उन परिस्थितियों को कैसे टाला जा सकता है, जिनके चलते इस्लामी और गैर.इस्लामी राष्ट्रों या सभ्यताओं के बीच संघर्ष की स्थिति निर्मित हो। यदि ऐसा होता है तो वह द्वितीय विश्व युद्ध से भी ज्यादा विध्वंसकारी होगा।
जिस समय पेरिस में शांतिमार्च चल रहा था उसी समय अमरीका की पुलिस को एक संदेश मिला जिसमें कहा गया था कि 'एक हो जाओ और कानून को लागू करने वाले अधिकारियों की हत्या करो'। इस संदेश में उन देशों के नाम गिनाए गए थे जहां के अधिकारियों की हत्या करने की बात कही गई थी। वे देश हैं अमरीका, फ्रांस,आस्ट्रेलिया और कनाडा। इस संदेश को अमरीका के अधिकारियों ने काफी गंभीरता से लिया।
आवश्यकता इस बात की है कि मुस्लिम क्षेत्रों के राजनीतिक नेताओं के अतिरिक्त वहां के धार्मिक नेता भी इस मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद करें और अपने.अपने देशों के सिरफिरे युवकों के दिमागों को ठीक करने का प्रयास करें। यह सर्वज्ञात है कि किसी भी अन्य धार्मिक समूह की तुलना में,मुसलमान अपने धार्मिक नेताओं की बात काफी गंभीरता से सुनते हैं। होना यह चाहिए कि  धार्मिक नेता अपने.अपने देशों की सीमाओं को लांघकर,किसी एक स्थान पर एकत्रित होकर उन लोगों से सामूहिक अपील करें जो निरर्थक खून बहाने वाली हरकते करते हैं। वे उनसे कहें कि वे अपनी गतिविधियों से बाज आएं वरना सारे मुस्लिम समुदाय पर एक गहन संकट आ सकता है और प्रतिबद्ध मुस्लिम.विरोधी लोग दुनिया की इस मुद्रा का नाजायज लाभ उठा सकते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के विभिन्न देशों में जो कुछ हुआ हैए उससे मुस्लिम युवाओं के मन में आक्रोश और गुस्सा है। सबसे पहले अमरीका व पूंजीवादी देशों के विरूद्ध भावनाएं, ईरान में हुई धार्मिक क्रांति के बाद पैदा र्हुइं। ईरान के शाह का तख्ता पलटकर जब खोमैनी ने वहां की सत्ता संभाली तो उसका मुख्य आधार अमरीका.विरोध था। बाद में ईराक और अफगानिस्तान में जो कुछ अमरीका और उसके सहयोगी राष्ट्रों ने कियाए उसे न सिर्फ मुस्लिम समाज वरन् दुनिया का गैर.मुस्लिम समाज भी कभी नहीं भूल सकता। अमरीका ने पहले तालिबानियों को हथियार दिये ताकि वे अफगानिस्तान से कम्युनिस्टों का शासन समाप्त कर सकें। उसके बाद वे ही तालिबानी अमरीका के लिए भस्मासुर सिद्ध हुए।
ईराक के पास खतरनाक रासायनिक हथियार हैं, यह आरोप लगाते हुए अमरीका ने वहां की स्थिर सरकार को गिरा दिया, सद्दाम हुसैन को फांसी दी और उसके बाद अफगानिस्तान और ईराक के निर्दोष नागरिकों पर हवाई हमले किए। इसी तरह,फिलस्तीन के सवाल पर अमरीका समेत कुछ अन्य देशों का जो रवैया रहा है, उसके कारण भी मुस्लिम दुनिया का एक बड़ा हिस्सा अमरीका से घृणा करता है। एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि जहां कुछ मुस्लिम राष्ट्र अमरीका के जानी दुश्मन हैं वहीं कुछ ऐसे मुस्लिम राष्ट्र भी हैं जो अमरीका के पिछलग्गू हैं। ऐसे राष्ट्रों की सूची में सऊदी अरब भी शामिल है। इन सभी देशों के युवकों और अन्य देशों के मुस्लिम निवासियों में पश्चिमी देशों के विरूद्ध आक्रोश है। इस आक्रोश को प्रगट करने के लिए जिहाद का नारा दिया जाता है। जबकि जिहाद का संबंध हिंसा और बदले की भावना से कदापि नहीं है।
मैं इस समय एक किताब को पढ़ रहा हूं जिसमें जिहाद का वास्तविक अर्थ बताया गया है और उसकी लंबी विवेचना की गई है। यह पुस्तक इस्लाम के एक बड़े विद्वान ने लिखी है। पुस्तक का शीर्षक है 'द ट्रूथ अबाउट जिहाद' ;जिहाद का सच। यह किताब मौलाना याह्या नोमानी ने लिखी है। वे एक सुप्रसिद्ध धार्मिक उर्दू पत्रिका के संपादक हैं। वे सारी दुनिया में कुरान और कुरान के संदेशों का सही विवेचन करते हैं। उन्होंने हाल ही में एक संस्थान की स्थापना की है, जिसमें इस्लाम के विभिन्न धार्मिक पहलुओं पर विचार किया जाता है। इस किताब में जिहाद की जो विवेचना की गई है वह यदि लोगों तक पहुंचाई जाए और खासकर मुस्लिम युवकों के बीच पहुंचाई जाए, तो स्थिति में काफी अंतर आयेगा। इस किताब के लेखक ने बार.बार यह दावा किया है कि इस्लाम का हिंसा और प्रतिशोध से कोई लेनादेना नहीं है। इसी तरह, आतंकवाद के लिए भी इस्लाम में कोई स्थान नहीं है। दो देशों के बीच इस्लाम के नाम पर किसी भी प्रकार की हिंसक गतिविधियां करना, इस्लाम के बुनियादी उसूलों के विरूद्ध है।
-एल.एस. हरदेनिया

सोमवार, 12 जनवरी 2015

क्या यह सिर्फ ट्रेलर है

तो क्या यह सिर्फ ट्रेलर है, पूरी फिल्म 26 जनवरी के आस-पास Displaying rajeev pic.JPGरिलीज होनी है?
कथित तौर पर पाकिस्तान से आने वाली ‘आतंकी नाव’ मामले में सरकार के दावों पर सवाल उठाने वालों को भाजपा ने तीन तरह से कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की है। पहला, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर आप कैसे संदेह कर सकते हैं, क्या ऐसा करने वालों को भारतीय सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों पर भरोसा नहीं है और क्या ऐसा करने से उनका मनोबल नहीं गिरेगा? दूसरा, इन एजेंसियों  ने 26/11 जैसे एक और आतंकी हमले को नाकाम कर दिया जिससे कि देश खुशी-खुशी नव वर्ष का जश्न मना सका। लेकिन ऐसा करने वालों को बधाई देने के बजाए उन पर सवाल उठा कर उन्होंने  साबित कर दिया है कि वे जनता की खुशी से दुखी हैं। तीसरा, ऐसे सवाल उठा कर वे पाकिस्तान की मदद कर रहे हैं क्योंकि उनकी और पाकिस्तान की भाषा एक जैसी है।
भाजपा के इन आरोपों के पीछे की वैचारिकी पर बात करने से पहले जरूरी है कि इस मामले से जुड़े कुछ तथ्यों पर गौर किया जाए। पहला, रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर द्वारा आक्रामक तरीके से उसे पाकिस्तान द्वारा आतंक फैलाने के लिए भेजा गया नौका बताने के बावजूद अधिकृत तौर पर वह नहीं कह पा रहे हैं कि उस नौका में विस्फोटक था
Crew was in touch with Pak army. The Hindu. 6 January 2015½A यानी जिस मुख्य बुनियाद पर उसके आतंकी नाव होने का दावा किया जा रहा है उसके होने पर ही स्पष्टता नहीं है। दूसरा, तमाम दावों के बावजूद कि उसमें चार आतंकी सवार थे जिनकी बातचीत भी इंटरसेप्ट की गई बताई जाती है, अभी तक उस पर चार लोगों के होने या किसी के भी न होने का कोई प्रमाण सुरक्षा एजेंसियां नहीं दे पाई हैं यानी चार लोगों के होने का दावा सिर्फ मौखिक है उसका कोई प्रमाण नहीं है। उनके बहुप्रचारित बातचीत के ‘इंटरसेप्ट’ किए जाने की माजूदा हकीकत भी यही है। तीसरा जब नौका कि अधिकतम स्पीड 10 से 12 नाॅट प्रति किलोमीटर ही हो सकती थी तब उसे क्यों नहीं पकड़ा जा सका क्यांेकि जिन सैन्य जहाजों से उनका पीछा किया जा रहा था कि उनकी स्पीड लगभग 34 नाॅट होती है?
¼was coast guard ship fast enough\ The Hindu. 4 January 2015½A
   चौथा , खबरों के मुताबिक
¼IB sore at being ignored. The Hindu. 6 January 2015½ खुफिया विभाग यानी आईबी को पूरे प्रकरण में नजरअंदाज करके रखा गया। जबकि नियमतः वह सबसे पहला संगठन था जिसे इस मामले में सूचित किया जाना चाहिए था। क्या गुजरात कोस्टल गार्ड ने ऐसा इसलिए किया कि यह कोई आतंकी घटना ही नहीं थी और पूरा मामला ड्रग्स या पेट्रोलियम पदार्थो की तस्करी करने वाले गिरोहों से जुड़ा था जिससे कोस्टल गार्ड अपने स्तर पर निपट सकते थे? और अगर वह आतंकी नाव थी तो फिर आईबी से उसकी जानकारी न शेयर किए जाने की क्या वजह हो सकती है? क्या ऐसा तो नहीं था कि कोस्टल गार्ड आतंकी नौका के प्रयासों को विफल कर देने का अकेले ही श्रेय लेना चाहती थी? लेकिन अगर ऐसा था तो कोस्टल गार्ड को ऐसा कर लेने का आत्मविश्वास किस बुनियाद पर था क्योंकि वे तो ‘मोटीवेटेड’ आतंकी थे जो ‘26/11’ दोहराना चाहते थे। यानी वे पूरी तरह तैयार और अपने मिशन के प्रति समर्पित रहे होंगे और उनके पास कितना हथियार और गोला बारूद था यह कोस्टल गार्ड्स को तो पता हो ही नहीं सकता था क्यांेकि वे उनसे काफी दूर थे। ऐसे में क्या कोस्टल गार्ड्स द्वारा लिया गया ‘बहादुराना’ निर्णय ‘कि हम खुद इससे निपट लेंगे’ स्वाभाविक मानी जा सकती है? दरअसल ऐसा तभी हो सकता है जब मदद के लिए तमाम विकल्पों के मौजूद होने के बावजूद किसी सुरक्षा एजेंसी के लोग यह तय कर लें कि उन्हें पागलपन की हद तक आत्मघाती होते हुए अकेले ही लोहा लेना है और वीरगति को प्राप्त हो जाना है और दूसरा तब जब उसे मालूम हो कि ‘दुश्मन’ वास्तव में ‘दुश्मन’ है ही नहीं। दूसरी सम्भावना के सच होने की सम्भावना इससे बढ़ जाती है कि पहली सम्भावना सच नहीं हो सकती। यानी युद्ध कौशल में प्रशिक्षित कोस्टल गार्ड इस तरह के अनप्रोफेशनल और मूर्खतापूर्ण निर्णय नहीं ले सकते, कम से कम उसके सभी सदस्य तो ऐसा नहीं कर सकते। तो क्या यह भी देश भर में होने वाली उन संदिग्ध आतंकी घटनाओं जैसे ही घटना थी जिसमें एक ही अपराध के लिए अलग-अलग एजेंसियां अलग-अलग मास्रमाइंडों को पकड़ती हैं, जो दरअसल आतंकवाद से निपटने के नाम पर अलग-अलग एजेंसियों के बीच श्रेय लेने के लिए मची होड़ का नतीजा होता है जो पूरे आतंकी घटना में भी इन एजेंसियों की भूमिका को संदिग्ध बना देता है। तो क्या यह भी ऐसा ही मामला था?
     पांचवा, इस घटना को 36 घंटे से ज्यादा समय तक क्यों  गुप्त रखा गया और नए साल के दूसरे दिन ही इसे ब्रेक किया गया। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है कि इनके जो जवाब गृहमंत्रालय ने दिए हैं वो संतोषजनक नहीं हैं। मसलन, इसकी वजह यह बताई गई कि सुरक्षा एजेंसियां इस दरम्यान यह जानकारियां पुख्ता कर लेना चाहती थीं कि आतंकियों के टारगेट्स क्या हैं, वो अपने आकाओं से क्या बात कर रहे हैं और इसीलिए सुरक्षा एजेंसियों ने इस खबर को पहले रक्षामंत्री पर्रिकर और रक्षा सचिव आरके माथुर को दिया जिन्हें बाद में उनसे हरी झंडी मिलने के बाद ही सार्वजनिक किया गया। सवाल उठना लाजिमी है कि इन 36 घंटों में सुरक्षा एजेंसियां आतंकियों के बारे में कौन सी पुख्ता जानकारी इकठ्ठा कर पाईं और वो कहां हैं? क्योंकि इन जानकारियों के आधार पर रक्षामंत्री यह तक दावे के साथ नहीं कह पा रहे हैं कि नौका में विस्फोटक था भी या नहीं। यानी पूरे नाव कथा में 36 घटों का घपला रहस्यमई है। वहीं जब 36 घंटे में कुछ भी महत्वपूर्ण हासिल नहीं हो पाया तब किस आधार पर इसे सार्वजनिक करने की हरी झंडी पहले भी पाकिस्तान से युद्ध करने की बात कर चुके रक्षामंत्री ने दिया? क्या इसकी वजह नए साल का जश्न मना रहे लोगों में आतंकी हमले का डर भर कर उन्हें एक सम्भावित हमले से बचा लेने की वाह-वाही लूटनी थी?
     वहीं जब पुख्ता तथ्य नहीं थे और सवाल गहराने लगे तब अचानक मीडिया माध्यमों में खुफिया सूत्रों के हवाले से ऐसी खबरों की बौछार क्यों होने लगी कि लश्कर ने 26/11 दोहराने के लिए नाव भेजा था और समुद्र मार्ग से वह 200 और आतंकियों को भेजने की फिराक में है। या डूबे नौका में आतंकी जो सिगरेट पी रहे थे उन पर पाकिस्तान में बने होने पता लिखा था या मलवा इसलिए नहीं मिल पा रहा है कि पानी का बहाव पाकिस्तान की तरफ था जिसके कारण मलवा कराची पहंुच गया है। जैसे की मलवा और समुद्र की धाराएं भी ‘राजनीति से प्रेरित’ हो कर पाकिस्तान परस्त हो गई थीं। किसी भी निष्कर्ष तक पहंुचने से पहले इन सभी तथ्यों को नजर में रखना जरूरी होगा।
     अब भाजपा द्वारा उठाए गए सवालों पर आते हैं। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर सवाल उठाना कहीं से भी गलत नहीं है। क्योंकि इस मसले पर लोगों की अपनी-अपनी समझ है। मसलन, मोदी सरकार की वैचारिक अभिभावक संघ परिवार के गुरू गोलवलकर की पुस्तक ‘वी आॅर आवर नेशनहुड डिफाईन’ के मुताबिक राष्ट्रीय सुरक्षा के समक्ष सबसे बड़ा खतरा मुसलमान और इसाई हैं जिन्हें या तो देश से बाहर निकाल देना चाहिए या उन्हें हिंदू बना देना चाहिए। वहीं भाजपा के पूर्ववर्ती अवतार जनसंघ के जमाने में संघ की समझदारी थी कि राष्ट्र की रक्षा के लिए जरूरी है कि लोग दस-बीस बच्चे पैदा करें जिसके लिए उन्होंने नारा दिया था ‘जिनके बच्चे हों दस बीस, उनकी मदद करें जगदीश’। जाहिर है राष्ट्रीय सुरक्षा के उसके इस नजरिए से सभी लोग सहमत नहीं हो सकते। इसलिए वे अपनी समझदारी के हिसाब से सवाल उठा सकते हैं। इसलिए यह कहना कि इस मुद्दे पर सवाल नहीं उठाया जा सकता गलत और अलोकतांत्रिक है। वहीं यह कहना कि ऐसा करने से सुरक्षा एजेंसियों का मनोबल गिर जाएगा भी गलत है। क्योंकि इशरत जहां फर्जी एंकाउंटर से लेकर कई ऐसे उदाहरण हैं जहां सवाल उठने पर गुजरात की मोदी सरकार ने मनोबल गिरने का शोर मचाया था लेकिन जांच के बाद पता चला कि इन फर्जी मुठभेड़ों को मोदी को लाभ पहुँचाने के लिए अंजाम दिया गया जिसमें आईबी अधिकारी राजेंद्र कुमार भी शामिल था और जिसमें कई पुलिस अधिकारी जेल में बंद हैं। जाहिर है अगर जांच नहीं होती तो सच्चाई सामने नहीं आ पाती। दरअसल, खुफिया विभाग पर सवाल उठाना इसलिए भी जरूरी है कि वे अक्सर हिंदुत्ववादी राजनीतिक एजंेडे पर काम करती देखी जाती हैं। जैसा कि खुद आईबी के ज्वाइंट डायरेक्टर रहे मलयकृष्ण धर ने अपनी पुस्तक ‘ओपन सिक्रेट’ में लिखा है कि कैसे बाबरी मस्जिद तोड़ने की साजिशी बैठकें संघ परिवार के लोग उनके घर पर करते थे। वहीं हाल ही में आई राॅ अधिकारी रहे आरके यादव ने भी अपनी पुस्तक ‘मिशन राॅ’ में बताया है कि कैसे उसे मिलने वाले बिना आॅडिट के  पैसे से कई अधिकारी निजी व्यवसाय चलाते हैं और सिर्फ दिल्ली में ही कहां-कहां वे सेक्स रैकेट चलाते हैं। जाहिर है खुफिया एजेंसियों  पर सिर्फ सवाल उठाना ही जरूरी नहीं है उन्हें अन्य देशों की तरह संसद के प्रति जवाबदेह भी बनाने की जरूरत है।
     दूसरा, सुरक्षा एजेंसियों के दावों को बिना परखे उन्हें ‘बहादुरी’ के लिए बधाई नहीं देना कहीं से भी देशविरोधी काम नहीं है और ना यह नए साल का जश्न मनाने वाले लोगों की खुशी में दुख घोलने जैसा है। ऐसे सवाल उठाकर सरकार खुद अपने खिलाफ पैदा हो रहे शक को और पुख्ता कर ही है कि कहीं उसने राजनीतिक लाभ उठाने के लिए तो उत्सवधर्मिता के माहौल में आतंक के हव्वे को मिलाकर राष्ट्रवाद का काॅकटेल नहीं तैयार करना चाह रही थी। जो कि दिल्ली आने से पहले मोदी गुजरात में करते रहे हैं? यह शक चार वजहों से और गहरा जाता है। पहला, उनके पीएमओ में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल के साथ ही पीके मिश्रा जैसे शख्स हैं। जिन पर गुजरात में मोदी को कथित तौर पर मारने आने वाले लोगों को फर्जी मुठभेड़ों में मारने की साजिश में अहम भूमिका माना जाता रहा है। यानी यह पुराना और काफी परखा हुआ आतंक का गुजरात माॅडल है जिसे शायद अब दिल्ली से संचालित किया जा रहा है। दूसरा, ठीक इसी तरह नोएडा से कथित तौर पर दो आतंकी जो ‘नए साल पर दिल्ली को दहलाने आए थे’ भी 19 दिसम्बर को पकड़े गए थे। लेकिन मीडिया को इसकी सूचना 1 जनवरी को दी गई। सवाल उठता है कि आतंक की ‘आहट’ पा जाने भर पर जो सुरक्षा एजेंसियां मीडिया को खबर बे्रक कर देती हैं वो आश्चर्यजनक रूप से नए साल के आने तक क्यों खबर को दबाए रहीं? आखिर नए साल के पहले दिन इस खबर को बे्रक करके ऐसा क्या हासिल हो सकता था जो उसके 19 दिसम्बर के ब्रेक होने से नहीं हो सकता था? यहां यह जानना भी रोचक होगा कि आतंकियों की गिरफ्तारी को सार्वजनिक किये जाने से ठीक एक दिन पहले यानी 31 दिसम्बर को ही गाजियाबाद के एसपी धमेंद्र सिंह यादव ने प्रेस कांफे्रस किया और बताया कि गाजियाबाद में 10 आतंकी घुस आए हैं जिनकी तलाश की जा रही है और यह तलाशी 26 जनवरी तक चलेगा
¼10 terrorists believed to be hiding in Ghaziabad: police. The Hindu 1 January 2015½A जाहिर है यह नए साल का जश्न मना रहे लोगों को आतंक का डर दिखा कर उनमें असुरक्षाबोध भरने के लिए किया गया ताकि लोग इससे उत्तन्न होने वाले सम्भावित दहशत को अपने जश्न के समकक्ष रखकर सोचें। यह डर की राजनीति का एक बहुत ही कारगर और पुराना तरीका है जिसे यूरोप में काफी लम्बे समय से दक्षिणपंथी राजनीति आजमाती रही है- खुश लोगांे या खुशी मनाते लोगों को यह बताना कि अगर हम नहीं होते तो आप की खुशियां छिन जातीं। तीसरा, अगर नौका कथा और नोएडा की कहानी को एक साथ देखा जाए तो कुछ और सवाल उठने लाजिमी हैं। मसलन, गाजियाबाद के एसपी ने यह क्यों कहा कि आतंकवादियों की तलाश 26 जनवरी तक चलेगी। क्या उन्हें पूरा यकीन है कि 26 जनवरी तक आतंकी पकड़ ही लिए जाएंगे? अगर ऐसा है तो किस आधार पर है? वे 26 जनवरी से काफी पहले यानी 12,13,14, या 15, 16 जनवरी तक क्यों नहीं पकड़े जा सकते? या अगर वे 26 जनवरी तक नहीं पकड़े जा सके तो क्या उसके बाद उन्हें पकड़ने का अभियान नहीं चलेगा? क्या देश को उन आतंकियों से खतरा सिर्फ 26 जनवरी तक ही है? उसके बाद वे धमाका नहीं करेंगे? दरअसल इस पूरे मामले में 26 जनवरी का वही मतलब है जो नए साल की पहली तारीख का है, इन दोनों दिनों होने वाले आतंकी हमले या विस्फोट का राजनीतिक और मार्केट वैल्यू ज्यादा होता है। और यह कोई नई परिघटना नहीं है पहले भी होता रहा है। खास तौर से हिंदू त्योहारों के दौरान जब धार्मिक पारा काफी चढ़ा रहता है तब भी इस स्ट्रेटजी का इस्तेमाल होता है। जैसे पिछले साल ही बहुचर्चित लियाकत शाह जो सरकार की सहमति से सरेंडर करने पाकिस्तान से भारत आया था के मामले में हुआ था जिसे दिल्ली पुलिस ने यूपी के गोरखपुर से पकड़ने के बाद दिल्ली में गिरफ्तार दिखा दिया, इस दावे के साथ कि वह होली के दौरान दिल्ली में दहला कर अफजल गुरू की फांसी का बदला लेना चाहता था। जिसके पास से पुलिस ने एक होटल से एके 47 और भारी मात्रा में विस्फोटक बरामद करा दिया था लेकिन गलती यह कर दी थी कि हथियार रखने वाले ने होटल की एंट्री रजिस्टर में अपना पता दिल्ली स्पेशल सेल लिख दिया था जिससे पूरा मामला खुल गया। या फिर जैसा कि 2008 में भी 24 जनवरी के दिन नोएडा में हुआ था जब दो बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को आतंकी बता कर फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था। तो क्या इस साल से फिर राष्ट्रीय त्योहारों के दौरान लगभग हफ्ते भर तक चलने वाले ‘एंकाउंटर सप्ताह’ की वापसी होगी? और क्या इस बार ये ‘आतंकी’ मध्य प्रदेश की खंडवा जेल से कथित तौर पर भागे बताए जाने वाले चार नौजनाव होंगे, जो आश्चर्यजनक तरीके से पूरे देश भर में खुफिया एजंेसियों के मुताबिक ‘देखे’ तो जा रहे हैं लेकिन पकड़े नहीं जा पा रहे हैं? जिनके बारे में आतंक की राजनीति का कोई भी जानकार बता सकता है कि ये लड़के खुफिया एजेंसियों के ही पास हैं। तो क्या सुरक्षा और खुफिया एजंेसियां किसी आतंकी व्यूह रचना की तैयारी मंे हैं? गणतंत्र दिवस के मौके पर आने वाले अमरीकी राष्ट्रपति को ये बताने के लिए कि हम आपके खिलाफ होने वाले हर हमले या उसकी ‘योजना’ को नाकाम कर सकने मे सक्षम हैं।
      इसीलिए इन घटनाक्रमों से संदेह उत्पन्न होना लाजिमी है कि 26 जनवरी तक दिल्ली या उसके आसपास आतंकवाद के नाम पर कोई विस्फोट या फर्जी मुठभेड़ करने की फिराक में खुफिया एजेंसियां लगी हुयी हैं जैसा कि 2008 में भी 24 जनवरी के दिन नोएडा में हुआ था जब दो बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को आतंकी बता कर फर्जी मुठभेड़ में मारा गया था। यानी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि नौका और नोएडा से जो कहानी शुरू हुई है उसमें 26 जनवरी यानी गणतंत्र दिवस जिसमें मुख्य अतिथि के बतौर अमरीकी राष्ट्रपति आ रहे हैं, एक अहम पड़ाव हो। जिसकी सम्भावना इससे भी बढ़ जाती है कि पिछली राजग सरकार के दौरान भी अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्ल्ंिाटन के भारत दौरे की पूर्वसंध्या पर कश्मीर के छत्तीसिंहपुरा गांव में भारतीय सेना की वर्दी पहने और हिंदू धार्मिक नारे लगा रहे लोगों ने 36 कश्मीरीयों को कत्ल कर दिया था। जिसके बारे में क्लिंटन तक का सार्वजनिक तौर पर मानना रहा है कि उसे हिंदुत्वादी आतंकी संगठनों ने अंजाम दिया था। यहां गौरतलब है कि इसमें आरोपी बता कर पकड़े गए सभी लोग निर्दोष साबित हो कर छूट चुके हैं। जाहिर है सुरक्षा एजंेसियों के दावों को बिना जांचे-परखे उन्हें बधाई देना कहीं से भी देशभक्ति नहीं है। क्योंकि देशभक्ति अपारदर्शी और संदिग्ध क्रियाकलापों की बुनियाद पर नहीं निर्मित होती है। चैथा और सबसे अहम कि इस मसले पर सुरक्षा एजंसियांे की भूमिका सदिग्ध इससे भी हो जाती है कि इस मुद्दे पर सरकार के दावों पर सबसे पहले सवाल उठाने वाले इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार प्रवीण स्वामी के खिलाफ ‘देशविरोधी रिपोर्टिंग’ कारण प्रदर्शन किया है।
¼rightwing protest against journalist Pravin Swami over ‘antinational’ news item. Outlook 7 January½Aजाहिर है जिस संगठन पर पूरे देश में मुसलमानों की दाढ़ी-टोपी लगाकर सुरक्षा और खुफिया एजंेसियों के सहयोग से मस्जिदों, ट्रेनों, अदालतों में बम विस्फोट करने के सबूत हों ,वे अगर इस पर सवाल उठाने वालों के खिलाफ बोल रहे हैं तो सरकार पर उठने वाले संदेह और पुख्ता हो जाते हैं। कम से कम इन संगठनों और सरकार की भूमिका को केंद्र मंे रखकर इस प्रकरण में जांच की जरूरत तो इससे जरूर पैदा हो जाती है।
      तीसरे, सरकार के दावों पर सवाल उठाने वालों और पाकिस्तान सरकार दोनों की भाषा और तर्कों  के एक जैसे हो जाने से कोई देश विरोधी या पाकिस्तान परस्त नहीं हो जाता। क्या ऐसे तर्क ‘पाकिस्तान समर्थक’ घोषित कर देने की धमकी जैसे नहीं हैं जिसका मकसद इस डर को दिखा कर सवाल उठाने वालों को चुप कराना है? और क्या यही वजह नहीं है कि पिछले दिनों भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इस मसले पर सवाल उठाने वालों के बारे में कहा कि ऐसा करने वाले भूल गए हैं कि उन्हें भारत में चुनाव लड़ना है पाकिस्तान में नहीं। यानी, अगर भारत में चुनाव लड़ना है तो अनिवार्यतः आपको अंधराष्ट्रवादी, अतार्किक और इस हद तक पाकिस्तान विरोधी होना होगा कि यदि पाकिस्तान के लोग दिन को दिन कहें तो आप को उसे रात कहना होगा? तो क्या भारत को विश्वगुरू बनाने का संघ का रास्ता मूखर्ता की इन्हीं संर्कीण गलियों से हो कर जाता है। और अगर मान लिया जाए कि ये तथ्य पाकिस्तान जो इस मसले पर भारत सरकार पर उसे बदनाम करने का आरोप लगा रहा है, के पक्ष में हैं तो क्या सिर्फ इस वजह से इन तथ्यों को नहीं उठाना चाहिए। दरअसल सच्चाई को सच्चाई की तरह ही लेना चाहिए उसमें नफा नुकसान नहीं देखा जाना चाहिए। मसलन क्या इस बात के लिए नाराज होते समय कि मुम्बई हमलों के मास्टरमाइंड कहे जाने वाले लखवी को जमानत कैसे मिल गई हमें इस बात पर नाराज नहीं होना चाहिए कि समझौता एक्सप्रेस धमाके के मास्टरमाइंड असीमानंद को सिर्फ जमानत नहीं मिली, लखवी के विपरीत वह रिहा भी हो गया। क्योंकि पाकिस्तान सरकार इस मामले में हमसे ज्यादा इमानदार निकली और उसने लखवी की जमानत को चैलेन्ज किया लेकिन हमारी सरकार जिसके मुख्यिा के साथ असीमानंद की तस्वीरें भी सार्वजनिक हो चुकी हैं, ने असीमानंद के मामले में ऐसा नहीं किया। यानी यह नहीं हो सकता कि हमारा मारा जाना सच्चाई हो और उनका मारा जाना अफवाह। दरअसल, सच्चाई सिर्फ सच्चाई होती है। वह भारतीय या पाकिस्तानी और भाजपाई या वामपंथी नहीं होती। और इस समय सच्चाई यही है कि नौका मामले में जो सरकार कह रही है वह सच्चाई नहीं है। 
 
-राजीव कुमार यादव