मंगलवार, 28 जुलाई 2015

मोदी, आतंकवाद और भारतीय मुसलमान

अपनी अमरीका यात्रा के ठीक पहले, अन्तर्राष्ट्रीय समाचार चैनल सीएनएन के फरीद ज़कारिया को दिए अपने एक साक्षात्कार में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि भारत के मुसलमान, भारत के लिए जियेगें और मरेंगे और वे भारत का कुछ भी बुरा नहीं करेंगे। इसके बाद, गत 8 जुलाई को, कजाकिस्तान में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मध्य एशिया और भारत की साँझा इस्लामिक विरासत की चर्चा की और कहा कि यह विरासत, अतिवादी ताकतों और विचारों को हमेशा खारिज करेगी। प्रधानमंत्री ने फरमाया कि भारत और मध्य एशिया, दोनों की इस्लामिक विरासत प्रेम और समर्पण के सिद्धांतों पर आधारित और इस्लाम के उच्चतम आदर्शों  ज्ञान, पवित्रता, करुणा और कल्याण से प्रेरित है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने भी यह दावा किया कि भारतीय मुसलमान देशभक्त हैं और इस्लामिक स्टेट (आईएस) उन्हें आकर्षित नहीं कर सका है।
इन्हीं मोदी ने सन 2001 में दावा किया था कि ‘‘सभी मुसलमान आतंकवादी नहीं होते परन्तु सभी आतंकवादी मुसलमान होते हैं’’। गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर अपने चुनाव अभियानों में उन्होंने इस जुमले का जमकर इस्तेमाल किया था। सन 2002 के मुसलमानों के कत्लेआम के बाद, गुजरात का मीडिया मुस्लिम और इस्लाम विरोधी उन्माद भड़काने में लगा था। मोदी ने इस उन्माद को कम करने की कोई कोशिश नहीं की। उन्होंने काफी बाद में ‘‘सद्भावना उपवास’’ रखे परन्तु यह कहना मुश्किल है कि वे कितनी ईमानदारी और निष्ठा से उपवास कर रहे थे। मोदी ने दंगाईयों की वहशियाना हिंसा को औचित्यपूर्ण ठहराया था। उनके अनुसार, दंगे, साबरमती एक्सप्रेस के एस-6 कोच में आगजनी की घटना - जिसे उन्होंने किसी भी जांच के पहले ही मुसलमानों का षड़यंत्र निरुपित कर दिया था - की प्रतिक्रिया थे।
गुजरात में मुसलमानों के नरसंहार के बाद, मोदी ने ‘गुजरात के गौरव’ को पुनस्र्थापित करने के लिए ‘गौरव यात्रा’ निकाली थी। उनका कहना था कि धर्मनिरपेक्षतावादियों द्वारा 2002 के दंगों के लिए सभी गुजरातियों को दोषी ठहराने से गुजरात के गौरव को चोट पहुँची है। मोदी के मुख्यमंत्रित्वकाल में, गुजरात की पुलिस ने अनेक मुसलमानों को सीमा के उस पार के आतंकी संगठनों से जुड़े आतंकवादी बताकर गोलियों से भून डाला था। सोहराबुद्दीन और इशरत जहां की हत्या की जांच हुई और इस मामले में गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह सहित कई पुलिस अधिकारी आरोपी बनाये गए।
प्रधानमंत्री मोदी यह स्पष्ट नहीं कर रहे हैं कि भारतीय मुसलमानों के उनके अलग-अलग, बल्कि
विरोधाभासी आंकलनों में से किसे वे सही मानते हैं। उनकी मुसलमानों के बारे में असली, ईमानदार राय क्या है? या, क्या उनकी सोच बदल गयी है? यदि हाँ, तो उन्हें ऐसी कौनसी नई जानकारी प्राप्त हुई है, जिसके चलते उनकी सोच में परिवर्तन आया है?
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने पुलिस महानिदेशकों, महानिरीक्षकों और केंद्रीय पुलिस संगठनों के मुखियाओं के सम्मेलन को संबोधित करते हुए नवंबर 2014 में कहा था कि आईएस, भारतीय उपमहाद्वीप में पैर जमाने की कोशिश  कर रही है और अलकायदा ने गुजरात, असम, बिहार, जम्मू कश्मीर व बांग्लादेश  की बड़ी मुस्लिम आबादी को देखते हुए, भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी शाखा स्थापित कर दी है।
भारतीय मुसलमान और आतंकवाद
उपरलिखित प्रश्नों के उत्तर चाहे जों हों, इसमें कोई संदेह नहीं कि वैष्विक आतंकी नेटवर्कों में भारतीय मुसलमानों की उपस्थिति और भागीदारी बहुत कम है। भारत में 14 करोड़ मुसलमान रहते हैं। दुनिया में इंडोनेशिया को छोड़कर इतनी संख्या में मुसलमान किसी अन्य देश में नहीं रहते। इसके बावजूद, भारतीय सुरक्षाबल और गुप्तचर एजेंसियां अब तक केवल चार ऐसे भारतीय मुस्लिम युवाओं की पहचान कर सकी हैं, जिन्होंने आईएस के स्वनियुक्त इस्लामिक खलीफा अबुबकर बगदादी द्वारा शुरू किए गए युद्ध में हिस्सा लिया है। ये चार युवक हैं अरीब मज़ीद, शाहीन तनकी, फरहाद शेख और अमन टण्डेल।
इन चार युवकों के अतिरिक्त, समाचारपत्रों की खबरों के अनुसार, बैंगलुरू में रहने वाले, भारतीय बहुराष्ट्रीय कंपनी के एक 24 वर्षीय कर्मचारी मेंहदी मसरूर बिस्वास पर आरोप है कि वह अपने ट्विटर हैंडल के जरिए, आईएस के आतंकी मिशन का प्रचार कर रहा था और बगदादी के नेतृत्व वाली सेना में भर्ती होने के लिए युवकों को प्रेरित कर रहा था। मंेहदी को चैनल 4 को दिए गए उसके एक साक्षात्कार केे आधार पर पकड़ा गया।
अब इसकी तुलना 90 देशों के 20,000 विदेशियों से कीजिए, जो बगदादी की सेना में भर्ती हुए हैं। नेषनल काउंटर टेरोरिज्म सेंटर के निदेशक निकोलस रासम्यूसेन के अनुसार, इनमें से 3,400पश्चिमी  राष्ट्रों से हैं। अमेरिका की नेशनल इंटेलिजेंस के निदेशक जेम्स क्लेपर के अनुसार, इनमें 180 अमेरिकी, 130 केनेडियन, 1200 फ्रांसीसी, 600 ब्रिटिश, 50 आस्ट्रेलियाई और 600 जर्मन शामिल हैं। इसके मुकाबले, भारत से मात्र चार और बांग्लादेश से मात्र 6 लोगों को आईएस का युद्ध लड़ने का दोषी पाया गया है। 
वैष्विक आतंकी संगठनोें में क्यों शामिल नहीं होते भारतीय?
हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों ने कभी इस प्रश्न  पर विचार नहीं किया कि आखिर क्या कारण है कि भारत के 14 करोड़ मुसलमानों में से आईएस में केवल चार भर्ती हुए। इस प्रश्न पर विचार करने की बजाए, वे यह आरोप लगाने में जुटे रहते हैं कि सभी मुसलमान आतंकवादी हैं। भारतीय मुसलमान देषभक्त हैं और भारत के हितों के खिलाफ नहीं जाएंगे, ये बातें मूलतः मुस्लिम-बहुल देशों की यात्राओं के दौरान कहीं गईं या विदेशी मीडिया से बातचीत में। और इनका उद्धेष्य अपनी ेउदारवादी छवि प्रस्तुत करना था।
जो भी हो, मूल प्रश्न यह है कि भारतीय मुसलमान, वैष्विक आतंकी संगठनों की ओर आकर्षित क्यों नहीं हुए? आईए, हम कुछ संभावित कारणों की चर्चा करें।
1.    भारतीय मुसलमानों का धार्मिक नेतृत्व मुख्यतः दारूल उलूम देवबंद और कुछ अन्य मदरसों जैसे नदवातुल उलेमा, लखनऊ से आता है। दारूल उलूम देवबंद का देश भर में फैले हजारों छोटे मदरसों और मकतबों पर नियंत्रण है। देवबंद के उलेमाओं के संगठन जमायत उलेमा-ए-हिन्द ने दिल्ली के रामलीला मैदान में हजारों मौलवियों और विद्यार्थियों की मौजूदगी में आतंकवाद के विरूद्ध फतवा जारी किया था। उन्होंने आतंकवाद को जड़मूल से उखाड़ फेंकने की शपथ भी ली थी। दारूल उलूम के रेक्टर हबीबुर रहमान के अनुसार, ‘‘इस्लाम हर तरह की अन्यायपूर्ण हिंसा, शान्ति भंग, खून खराबा, हत्या और लूटपाट का निषेध करता है और किसी भी स्वरूप में इनकी अनुमति नहीं देता।‘‘ जमायत ने लखनऊ, अहमदाबाद, हैदराबाद, कानपुर, सूरत, वाराणसी और कोलकाता में मदरसों के संचालकों की बैठकें और सम्मेलन आयोजित कर अपने आतंकवाद विरोधी संदेश  को उन तक पहुंचाया। जमायत ने एक ट्रेन बुक की, जिसमें उसके सदस्य और समर्थक देश भर में घूमे और शांति  और आतंकवाद-विरोध का संदेश फैलाया।
2.    इस्लाम, भारत में मुख्यतः शांतिपूर्ण ढंग से फैला है। भारत में इस्लाम पहली बार 7वीं सदी में केरल के तट पर अरब व्यवसायियों के साथ पहुंचा। इसका नतीजा यह है कि मुसलमान आज भी स्थानीय परंपराओें का पालन करते हैं औेर स्थानीय संस्कृति में घुलेमिले है। उनकी व गैर मुस्लिमों की सांस्कृतिक विरासत एक ही है। उदाहरणार्थ, लक्षद्वीप के मुसलमान मातृवंषी परंपरा का पालन करते हैं और केरल के मुसलमानों के लिए ओणम उतना ही बड़ा त्यौहार है, जितना कि गैर मुसलमानों के लिए। अमीर खुसरो ने होली पर रचनाएं लिखी हैं, मौलाना हसरत मोहानी नियमित रूप से मथुरा जाते थे और उन्हंे भगवान कृष्ण से बेइंतहा प्रेम था। रसखान ने भगवान कृष्ण पर कविताएं रची हैं, बिस्मिल्ला खान की शहनाई भगवान शिव को समर्पित थी और दारा शिकोह ने उपनिषदों का फारसी में अनुवाद किया था। ये हमारे देश की सांझा सांस्कृतिक परंपराओं के कुछ उदाहरण हैं, जिन्हें समाप्त करने की असफल कोशिश अंग्रेजों ने साम्प्रदायिक आधार पर देश को विभाजित कर की।
    भारत में इस्लाम के प्रभाव में वृद्धि मुख्यतः समावेशी  सूफी परंपराओं के कारण हुई, जिनकी ओर समाज के वंचित और हाशिए पर पड़े वर्ग सबसे अधिक आकर्षित हुए। सूफी (और भक्ति) संतों का मूलधर्म प्रेम था। वह्दतुलबूजूद (संसार में केवल एक ईश्वर है) और सुल्हकुल (पूर्ण शांति ) - ये सूफी परंपरा के मूल सिद्धांत थे। सूफी केवल ब्राह्यशांति की बात नहीं करते बल्कि अंतर्मन की शांति पर भी जोर देते थे। निजामुद्दीन औलिया रोज सुबह राम और कृष्ण के भजन गाया करते थे।
    कई नगरों और गांवों में ताजियों के जुलूस के दौरान हिन्दू महिलाएं आरती उतारती हैं। इस तरह की सांझा सांस्कृतिक जड़ों के चलते, भारतीय मुसलमानों के दिमागों में जेहाद का जहर भरना नामुमकिन नहीं तो बहुत मुष्किल जरूर है।  भारतीय मुस्लिम चेतना पर सूफी मूल्यों का गहरा प्रभाव है। एक आम भारतीय मुसलमान, अरब और दूसरे देषों के मुसलमानों की संस्कृति और अपनी संस्कृति में कुछ भी समानता नहीं पाता। वहाबी-सलाफी इस्लामिक परंपराओं को ‘‘सही परंपराएं‘‘ सिखाने के नाम पर फैलाने के लिए काफी संसाधन खर्च किए गए और गहन प्रयास हुए परंतु ये परंपराएं आज भी बहुत सीमित क्षेत्र में प्रभावी हैं। अलबत्ता हिन्दू राष्ट्रवादियों और उनके विमर्ष के मजबूत होते जाने से भारतीय मुसलमानों के अरबीकरण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है।
    इसके विपरीत, कुछ पष्चिमी देशों में मुसलमानों में अलगाव का गहरा भाव है। उनमें से अधिकांश  एशियाई मूल के हैं और पष्चिमी संस्कृति में घुलमिल नहीं पाते। एशियाई मूल के लोग अपने समुदायों के बीच रहना पसंद करते हैं। युवाओं का सांस्कृतिक अलगाव, ‘सभ्यताओं के टकराव‘‘ के सिद्धांत के वशीभूत नस्लवादी शक्तियों द्वारा इस्लाम को निशाना बनाए जाने व ईराक और अफगानिस्तान के खिलाफ युद्ध में पष्चिमी सेनाओं की भागीदारी के कारण, इस्लामवादियों के लिए अपनी सेना में पष्चिमी देशों के युवकों को भर्ती करना अपेक्षाकृत आसान है।
3.     भारतीय मुसलमानों द्वारा की गई आतंकी गतिविधियों के लिए मुख्यतः प्रतिशोध की भावना जिम्मेदार है। 12 व 18 मार्च 1993 को मुंबई के झवेरी बाजार व अन्य स्थानों पर बम हमले, 28 जुलाई 2003 को इसी शहर के घाटकोपर में बेस्ट बस में बम धमाके और 11 जुलाई 2006 को लोकल ट्रेनों में हुए बम धमाके, वे कुछ आतंकी घटनाएं हैं जिनमें मुस्लिम युवक शामिल थे। परंतु इनमें से अधिकांश का उद्धेष्य मुंबई में 1992-93 के दंगों और सन्  2002 के गुजरात कत्लेआम का बदला लेना था। दिनांक 12 मार्च 1993 के बम धमाकों के  दोषी पाए गए कई आरोपियों ने मुकदमे के दौरान अपने बयानों में बताया कि उन्होने इस षड़यंत्र में हिस्सा इसलिए लिया था क्योंकि उन्होंने मुंबई में 1992-93 के दंगों में अपने प्रियजनों को मरते देखा था। न्यायमूर्ति श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रपट (1998) में साम्प्रदायिक दंगों और बम धमाकों के परस्पर संबंध को इन शब्दों में व्यक्त किया था, ‘‘सिलसिलेवार बम धमाके, अयोध्या व बंबई के दिसंबर 1992 व जनवरी 1993 के घटनाक्रम की प्रतिक्रिया थे।‘‘  मुस्लिम युवकों के गुस्से और निराशा के भाव का कुछ पाकिस्तानी एजेसिंयों ने दुरूपयोग किया।
    परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि कई अन्य मुस्लिम देशों की तुलना में, भारतीय प्रजातंत्र बहुत बेहतर ढंग से काम कर रहा है। यद्यपि न्यायप्रणाली धीमी गति से काम करती है परंतु तीस्ता सीतलवाड जैसे मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के अथक प्रयासों से गुजरात दंगों के पीडि़तों को न्याय मिला है। कुछ अपराधियों को अदालतों ने सजा सुनाई हैं और वे अब जेल में हैं। इशरत जहां और सोहराबुद्दीन मामलों के आरोपियों पर मुकदमे चल रहे हैं। मानवाधिकार संगठनों के कड़े रूख के चलते, सुरक्षा बलों द्वारा फर्जी मुठभेड़ों में निर्दोषों को मार गिराने की घटनाओं में तेजी से कमी आई है। चूंकि भारत में पीडि़तों को न्याय मिलने की उम्मीद रहती है इसलिए वे प्रतिशोध की आग में नहीं जलते और यही कारण है कि आईएस को यहां से अपनी सेना के लिए लड़ाके नहीं मिल पा रहे हैं।
    यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए प्रजातांत्रिक स्पेस घटता जा रहा है। हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों को लग रहा है कि अब सैयां कोतवाल हो गए हैं और इसलिए वे बिना हिचक के मुसलमानों पर बेसिरपैर के आरोप लगा रहे हैं, उनका मताधिकार छीनने की मांग कर रहे हैं, उन्हें पाकिस्तान जाने को कह रहे हैं और मदरसों को आतंकवाद के अड्डे बता रहे हैं। अगर यही कुछ चलता रहा तो मुसलमानों को आईएस और अन्य आतंकवादी संगठनों के चंगुल से लंबे समय तक दूर रखना संभव नहीं होगा।
-इरफान इंजीनियर

रविवार, 26 जुलाई 2015

इस्लामवादी आतंकवाद: परदे के पीछे की राजनीति



इस्लाम के नाम पर
पिछले कई सालों में विश्व ने इस्लाम के नाम पर हिंसा और आतंकवाद की असंख्य अमानवीय घटनाएं झेली हैं। इनमें से कई तो इतनी क्रूरतापूर्ण और पागलपन से भरी थीं कि उन्हें न तो भुलाया जा सकता है और ना ही माफ किया जा सकता है। इनमें शामिल हैं ओसामा.बिन.लादेन द्वारा औचित्यपूर्ण ठहराए गए 9/11 के हमले में 3,000 निर्दोष व्यक्तियों की मृत्यु, पेशावर में स्कूली बच्चों पर हमला, बोकोहरम द्वारा स्कूली छात्राओं का अपहरणए चार्ली हेब्दो पर हमला व आईसिस द्वारा की गई घिनौनी हत्याएं। ये सभी घोर निंदा की पात्र हैं और सारे सभ्य समाज को शर्म से सिर झुकाने पर मजबूर करती हैं।
9/11 के बाद से एक नया शब्द समूह गढ़ा गया 'इस्लामिक आतंकवाद'। यह इस्लाम को सीधे आतंकवाद से जोड़ता है। यह सही है कि इस्लामवादी आतंक एक लंबे समय से जारी है और कैंसर की तरह पूरी दुनिया में फैल रहा है। इस्लाम के नाम पर लगातार हो रही हिंसक व आतंकी घटनाओं के चलते ऐसा प्रतीत होता है कि इनका संबंध इस्लाम से है। यही बात अमरीकी मीडिया लंबे समय से प्रचारित करता आ रहा है और धीरे.धीरे अन्य देशों के मीडिया ने भी यही राग अलापना शुरू कर दिया है। एक बड़ा साधारण.सा प्रश्न यह है कि अगर इन घटनाओं का संबंध इस्लाम से है, तो ये मुख्यतः तेल उत्पादक देशों में ही क्यों हो रही हैं?
समाज के व्याप्त भ्रम को और बढ़ाते हुएए कई लेखकों ने यह तर्क दिया है कि इस्लाम में सुधार से यह समस्या हल हो जायेगी। कुछ का कहना है कि इस्लाम को अतिवादी प्रवृत्तियों से मुक्ति दिलाने के लिए 'धार्मिक क्रांति' की आवश्यकता है। यह कहा जा रहा है कि इस्लाम पर उन कट्टरपंथी तत्वों का वर्चस्व स्थापित हो गया है जो हिंसा और आतंक में विश्वास रखते हैं। इसलिए इस्लाम में सुधार से हिंसा समाप्त हो जाएगी। सवाल यह है कि कट्टरपंथियों के पीछे वह कौनसी ताकत है, जिसके भरोसे वे इस्लाम की एक शांतिपूर्ण धर्म के रूप में व्याख्या को खारिज कर रहे हैं। क्या वह ताकत इस्लाम है? या इस्लाम का मुखौटा पहने कोई और राजनीति यह मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि इन दिनों दुनियाभर में इस्लाम के नाम पर जिस तरह की हिंसा हो रही हैए वह मानवता के इतिहास का एक कलंकपूर्ण अध्याय है और इसकी न केवल निंदा की जानी चाहिए वरन् इसे जड़ से उखाड़ने के प्रयास भी होने चाहिए।
इस्लामवादी आतंकी, मानवता के शत्रु बने हुए हैं। परंतु आवश्यकता इस बात की है कि हम इस पूरे मुद्दे को गहराई से समझने की कोशिश करें और केवल ऊपरी तौर पर जो नजर आ रहा है, उसके आधार पर अपनी राय न बनायें। हम यह समझने का प्रयास करें कि इसके पीछे कौनसी शक्तियां हैं। हमें इस बात पर भी विचार करने की आवश्यकता है कि क्या केवल सैंद्धान्तिक सुधार से 'तेल की राजनीति' से मुकाबला किया जा सकेगा.उस राजनीति सेए जिसे चोरीछुपे कुछ निहित स्वार्थ समर्थन दे रहें हैं क्योंकि वे किसी भी तरह अपने लक्ष्यों को हासिल करना चाहते हैं। जरूरत इस बात की है कि हम उस राजनीति को पहचानें और बेनकाब करेंए जिसने इस्लाम के नाम पर इस तरह की हिंसक प्रवत्तियों को जन्म दिया है।
मौलाना वहीदुद्दीन खान, असगर अली इंजीनियर और अन्यों ने उस दौर में इस्लाम का मानवतावादी चेहरा दुनिया के सामने रखा जब आतंकवाद, दुनिया के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में फैल रहा था और अत्यंत क्रूरतापूर्ण व कुत्सित आतंकी कार्यवाहियां अंजाम दी जा रही थीं। इस्लाम की मानवतावादी व्याख्याएं आखिर मुख्यधारा में क्यों नहीं आ पा रही हैं? क्या कारण है कि कट्टरपंथी तत्वए इस्लाम के अपने संस्करण का इस्तेमाल, हिंसा और अमानवीय कार्य करने के लिए कर रहे हैं और इस्लाम के उदारवादी.मानवतावादी संस्करण हाशिए पर खिसका दिए गए हैं? ऐसा नहीं है कि कुरान की अलग.अलग व्याख्याएं नहीं की जा रही हैं,ऐसा भी नहीं है कि तर्कवादी आंदोलन हैं ही नहीं। परंतु दुनिया के तेल के भंडारों पर कब्जा करने की राजनीति ने आतंकवादियों का उत्पादन करने वाली फैक्ट्रियां स्थापित कर दी हैं और उदारवादियों व मानवतावादियों की आवाज़ पूरी तरह से दबा दी गई है। आर्थिक.राजनैतिक कारकों के चलते, इस्लाम का मानवतावादी संस्करण कमजोर पड़ गया है।
वर्चस्वशाली राजनैतिक ताकतें, धर्म की उस व्याख्या को चुनती और बढ़ावा देती हैं जो उनके राजनैतिक.आर्थिक एजेंडे के अनुरूप होती हैं। कुरान की आयतों को संदर्भ से हटाकर उद्धृत किया जाता है और हम इस्लाम के मुखौटे के पीछे छुपे राजनीतिक उद्देश्यों को देख नहीं पाते। कुछ मुसलमान चाहें जो कहें परंतु सच यह है कि आतंकवाद और हिंसा,इस्लाम की समस्या नहीं है। समस्या है सत्ता और धन पाने के लिए इस्लाम का उपयोग किया जाना। हमें कट्टरवाद.आतंकवाद, जिसे इस्लाम के नाम पर औचित्यपूर्ण ठहराया जा रहा है, के उदय और उसके मजबूत होते जाने के पीछे के कारणों को समझना होगा। क्या कारण है कि जहां 'काफिरों को मार डाला जाना चाहिए' की चर्चा चारों ओर है वहीं'सभी मनुष्य एक दूसरे के भाई हैं' और 'इस्लाम का अर्थ शांति है' जैसी इस्लाम की शिक्षाओं को कोई महत्व ही नहीं मिल रहा है।
आतंकवाद की जड़ें पश्चिम एशिया के तेल भंडारों पर कब्जा करने की राजनीति में हैं। अमरीका ने अलकायदा को समर्थन और बढ़ावा दिया। पाकिस्तान में ऐसे मदरसे स्थापित हुए, जिनमें इस्लाम के वहाबी संस्करण का इस्तेमाल 'जिहादियों' की फौज तैयार करने के लिए किया गया ताकि अफगानिस्तान पर काबिज़ रूसी सेना से मुकाबला किया जा सके। अमरीका ने अलकायदा को 800 करोड़ डॉलर और 7,000 टन हथियार उपलब्ध करवाए,जिनमें स्टिंगर मिसाइलें शामिल थीं। व्हाईट हाउस में हुई एक प्रेस कान्फ्रेंस में अलकायदा के जन्मदाताओं को अमरीकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन ने अमरीका के संस्थापकों के समकक्ष बताया। ईरान में प्रजातांत्रिक ढंग से निर्वाचित मोसाडेग सरकार को 1953 में उखाड़ फेंका गया। उसके साथ ही वह घटनाक्रम शुरू हुआ, जिसके चलते इस्लाम की हिंसक व्याख्याओं का बोलबाला बढ़ता गया और उसके उदारवादी.मानवतावादी चेहरे को भुला दिया गया। मौलाना रूमी ने 'शांति और प्रेम को इस्लाम के सूफी संस्करण का केंद्रीय तत्व निरूपित किया था।' फिर क्या हुआ कि आज वहाबी संस्करण दुनिया पर छाया हुआ है। इस्लाम का सलाफी संस्करण लगभग दो सदियों पहले अस्तित्व में आया था परंतु क्या कारण है कि उसे मदरसों में इस्तेमाल के लिए केवल कुछ दशकों पहले चुना गया। अकारण हिंसा और लोगों की जान लेने में लिप्त तत्वों ने जानते बूझते इस्लाम के इस संस्करण का इस्तेमाल किया ताकि उनके राजनीतिक लक्ष्य हासिल हो सकें।
इतिहास गवाह है कि धर्मों का इस्तेमाल हमेशा से सत्ता हासिल करने के लिए होता आया है। राजा और बादशाह क्रूसेड, जिहाद और धर्मयुद्ध के नाम पर अपने स्वार्थ सिद्ध करते आए हैं। भारत में अंग्रेजों के राज के दौरान अस्त होते जमींदारों व राजाओं ;दोनों हिंदू व मुस्लिम के वर्ग ने मिलकर सन 1888 में यूनाइटेड इंडिया पेट्रिआर्टिक एसोसिएशन का गठन किया और इसी संस्था से मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा उपजे। सांप्रदायिक शक्तियों ने घृणा फैलाई जिससे सांप्रदायिक हिंसा भड़की। यूनाइटेड इंडिया पेट्रिआर्टिक एसोसिएशन के संस्थापक थे ढाका के नवाब और काशी के राजा। फिर हम मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जैसे सांप्रदायिक संगठनों के उभार के लिए हिंदू धर्म व इस्लाम को दोषी ठहरायें या उस राजनीति को, जिसके चलते अपने हितों की रक्षा के लिए इन राजाओं.जमींदारों ने इस्लाम व हिंदू धर्म का इस्तेमाल किया। इस समय हम दक्षिण एशिया में म्यान्मार और श्रीलंका में बौद्ध धर्म के नाम पर गठित हिंसक गुटों की कारगुजारियां देख रहे हैं।
अगर हम थोड़ा भी ध्यान से देखें तो हमें यह समझ में आएगा कि इस्लामवादी आतंकवाद मुख्यतः तेल उत्पादक क्षेत्र में उभरा है उन देशों.जैसे इंडोनेशिया.में नहीं जहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है। आतंकवाद के बीज, तेल की भूखी महाशक्तियों ने बोये हैं न कि किसी धार्मिक नेता ने। मौलाना वहाबी की व्याख्याए जो सऊदी अरब के रेगिस्तानों में कहीं दबी पड़ी थी, को खोद निकाला गया और उसका इस्तेमाल वर्तमान माहौल बनाने के लिए किया गया। अगर हम आतंकवाद के पीछे की राजनीति को नहीं समझेंगे तो यह बहुत बड़ी भूल होगी। राजनीतिक ताकतें और निहित स्वार्थी तत्व,धर्म के उस संस्करण को चुनते हैं जो उनके हितों के अनुरूप हो। कुछ लोग लड़कियों के लिए स्कूल खोल रहे हैं और उनका कहना है कि वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि कुरान ज्ञान को बहुत महत्व देती है। दूसरी ओर, उसी कुरान और इस्लाम के नाम पर कुछ लोग स्कूल जाने वाली लड़कियों को गोली मार रहे हैं। आतंकवादी समूह तो धर्म के अपने संस्करण पर भी बहस नहीं करना चाहते और ना कर सकते हैं। उन्हें तो बस उन चंद जुमलों से मतलब है जो उनके दिमागों में ठूंस दिए गए हैं और जिनने उन्हें बंदूक और बम हाथ में लिए जानवर बना दिया है।
हिंदू धर्म के नाम पर गांधीजी ने अहिंसा को अपना प्रमुख आदर्श बनाया। उसी हिंदू धर्म के नाम पर गोडसे ने गांधीजी के सीने में गोलियां उतार दीं। इस सब में धर्म कहां है? वर्तमान में जो इस्लामवादी आतंकी दुनिया के लिए एक मुसीबत बने हुए हैं, उन्हें अमरीका द्वारा स्थापित मदरसों में प्रशिक्षण मिला है। ऐसी भी खबरें हैं कि आईसिस आतंकियों के पीछे भी अमरीका हो सकता है। साम्राज्यवादी काल में भी राजनीति पर अलग.अलग धर्मों के लेबिल लगे होते थे। साम्राज्यवादी ताकतें हमेशा सामंतों को जिंदा रखती थीं। अब चूंकि तेल उत्पादक क्षेत्रों के मुख्य रहवासी मुसलमान हैं इसलिए इस्लाम का उपयोग राजनैतिक लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए किया जा रहा है। यह विडंबना है कि मुसलमान अपनी ही संपदा.काले सोने.के शिकार बन रहे हैं।
 -राम पुनियानी

रविवार, 19 जुलाई 2015

सिंध-गंगा का मिलन हो- इंजिनियर अली

 इंजीनियर अली का साक्षात्कार करते हुए 
पाकिस्तान के कराची स्तिथ शहर के बाशिंदे तथा आइडियल कॉलेज ऑफ़ टेक्नोलॉजी के प्राचार्य श्री इंजिनियर अली बाराबंकी आये हुए हैं . उनसे एक साक्षात्कार पाकिस्तान के सन्दर्भ में लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर सिंह सुमन ने लिया जो इस प्रकार है :

प्रश्न : पाकिस्तानी आवाम भारत के सम्बन्ध में क्या सोचती है ? 

उत्तर : पाकिस्तान में असल में दो तबके हैं एक वह तबका जो 1947 के बाद विभाजन का दर्द लेकर गया था और दूसरा तबका वहां पहले से रह रहे लोगों का है . दोनों तबकों की राय अलग अलग है. भारत से गए लोगों की एक राय यह है कि दोनों मुल्कों की सरहदें एक हों, "सिंध-गंगा का मिलन हो " क्योंकि वह भारत को भी अपना मुल्क समझते हैं.खानदानो का बंटवारा हो गया है. आधा खानदान एक तरफ है आधा दूसरी तरफ यह अस्वाभाविक है कि दरिया और समंदर का मिलन न हो . मै पाकिस्तान में पैदा हुआ 60 वर्षों के बाद अब अपने पुरखों के वतन को देखने का मौका मिला.
                   अब जब मै चला जाऊंगा तो फिर तड़पता रह जाऊंगा. अपने पुरखों के वतन को देखने के लिए. हम लोग शादी-ब्याह, ख़ुशी-गम , बीमारी-अजारी में शिरकत नहीं कर पाते हैं और एक दुसरे को देखने के लिए तड़पते रह जाते हैं . जहाँ तक हमारी तरह के अवाम की जातीय राय है कि भारत की अवाम बहुत मिलनसार, बहुत मोहब्बत करने वाले लोग, भाईचारे के जज्बे से लबरेज लोग हैं एक बात समझ में नहीं आती कि दोनों हुकूमतें आपस में एख्तिलाब क्यों रखती हैं ? दोनों मुल्कों के अवाम के दिल एक साथ धड़कते हैं. इसमें मजहब का कोई अमल दखल नहीं, लेकिन इनके जज्बात को हुकूमतें नहीं समझती. वहां पुराने मुकामी लोगों की राय है की भारत बहुत अच्छा मुल्क है यहाँ कानून की बालादस्ती है, भाईचारा है, मोहब्बत है, उनकी राय मेरी राय से अलग नहीं है. मेरी इस मुल्क के बारे मे इसलिए राय है कि मेरे तमाम रिश्तेदार इस मुल्क में बसते हैं और वह भारत के तमाम हालात से अगाही हासिल होती रहती है और हम लोगों की राय से पुराने बाशिंदे लोग परिचित होते रहते हैं इसके अलावा प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से भी वह मुतासिर होते हैं. लेकिन कुछ भारतीय फिल्मो को देखने के बाद वहां लोग समझते हैं कि भारत में गुंडाराज है हालाँकि ऐसा नहीं है.
               पाकिस्तान के बाशिंदों को यह कहानी समझाई गयी है कि कश्मीर उनका है इसलिए कश्मीर उनको मिलना चाहिए किन्तु कश्मीर के सम्बन्ध में एक तबके की राय है कश्मीर अगर पाकिस्तान में होता तो वह अपनी बदहाली को रोता जैसे कुछ वर्षों पूर्व पूर्वी पाकिस्तान की हो गयी थी और जिन्हें पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश होना पड़ा था. 

प्रश्न 2 : पाकिस्तान में अवाम के लोग सामान्यता कितनी शादियाँ करते हैं ?
  
उत्तर : सामान्य जन एक शादी करते हैं किन्तु बढेरा ( जमींदार और सरमायादार ) कई शादियाँ करते हैं और शादी के बगैर कई खवातीन रखते हैं.

प्रश्न 3: पाकिस्तान में सामान्यत : कितने बच्चे एक व्यक्ति के होते हैं ?

उत्तर : गुरबत के कारन आम अवाम के ज्यादा बच्चे होते हैं लेकिन मिडिल क्लास में एक बेटा, एक बेटी या एक बेटा दो बेटी होती हैं . उच्च तबके में जैसे बढेरा, वह खानदान में की गयी शादी से एक या दो, तीन बच्चे पैदा करता है अन्य खवातीन से वह शादी तो करता है किन्तु बच्चे पैदा नहीं होने देता है. 

प्रश्न 4: मजहब के हिसाब से पाकिस्तान में कितने लोग जीते हैं ?

उत्तर : अख्सरियत शदीद मजहबी जज़्बात तो रखती हैं लेकिन इस्लाम के बारे में कोई जानकारी नहीं रखती है. जो उनके बड़े करते आ रहे हैं वाही यह कर रहे हैं. 

प्रश्न 5: इस्लाम अमन. प्यार, इंसानियत का मज़हब है ? लेकिन क्या ऐसा आचरण पाकिस्तान में देखने को मिलता है ?

उत्तर : बिलकुल हकीकत यही है कि इस्लाम अमन, प्यार, इंसानियत का मज़हब है बल्कि यूँ कहा जाए कि हर मज़हब अमन, इंसानियत, प्यार का मजहब है लेकिन पाकिस्तान में मज़हब के ठेकेदार मुल्लाओं की अलग-अलग जंग है यह इनकी जातीय जंग है जो मज़हब की आड में खेली जा रही है. मुल्ला आपस में एक दुसरे को काफिर कहते हैं. जबकि दुनिया का कोई मज़हब के नाम पर इंसानियत के खिलाफ हरगिज़ नहीं जा सकता है. मज़हब के नाम पर मुल्लाओं की ठेकेदारी है. मज़हब के नाम पर मासूम बच्चों का कत्लेआम पेशावर स्कूल में किया गया क्या यही इस्लाम है या यूँ समझिये पाकिस्तानी शायर की जुबान से-

 है जाम के शीशा कोई महफूज़ नहीं है 
पत्थर भी मेरे दौर के अबदाद तलब हैं 

मुल्क के हालात वहां की शायरी में देखिये

अपने असलाफ अपनी झूठी अना के लिए 
नस्ल-ए-आदम में तफरीक करते रहे 
अब गिरोहों में खलक-ए-अल्लाह बंट गई
जाति है कौम है मुल्क है रंग है 
एक आदम की औलाद में जंग है 
एक भाई ऐश में मदहोश है 
दुसरे भाई पर ज़िन्दगी तंग है 
एक भाई सर से लहू है रंग 
दुसरे भाई के हाथ में संग है 
ऐसे भी गम चेहरे पर लिखे हुए 
डॉ ज़फर आलम, इंजिनियर अली और रणधीर सिंह सुमन

 लोकसंघर्ष पत्रिका के सितंबर 2015 अंक में प्रकाश्य

बुधवार, 15 जुलाई 2015

दाना धरै, पछोरन बाँटै, कहाँ सिखै

बघेली, बुदेली, मालवी और हिंदी की कविताओं से सराबोर एक शाम 
यूँ तो काव्य पाठ या रचना पाठ आदि का आयोजन होता ही रहता है और आजकल इन आयोजनों में भी श्रोताओं की अधिक संख्या तभी होती है जब या तो कोई ग्लैमरस नाम जुड़ा हो या या फिर कार्यक्रम उपरांत सहभोज का आयोजन हो। इन अर्थों में मध्य प्रदेश की प्रगतिशील लेखक संघ की इंदौर इकाई द्वारा 6 जुलाई 2015 को काव्यपाठ का आयोजन आम होते हुए भी कुछ खास था। यहाँ अलग-अलग बोलियों की मिठास थी और शब्दों में रचा-बसा श्रम का सौंदर्य भी।
हिंदी के रचनाकार अंग्रेजी के प्रचलन और प्रभुत्व की शिकायत करते अक्सर मिलते हैं। अंग्रेजी के बढ़ते साम्राज्य ने हिंदी को संपन्न करने के बजाय प्रदूषित अधिक कर दिया है। उनकी शिकायत निराधार भी नहीं लेकिन यह अक्सर भुला दिया जाता है कि जो व्यवहार अंग्रेजी ने हिंदी के साथ किया है, लगभग वैसा ही व्यवहार हिंदी भी अपनी बोलियों के साथ कर रही है। नतीजा ये हो रहा है कि बोलियाँ नष्ट हो रही हैं। ऐसे में इंदौर की मालवी बोली की ज़मीन पर बघेली, बुंदेली के कवियों को मालवी और हिंदी के कवियों का एकसाथ कार्यक्रम रखना एक साहसभरा काम था लेकिन जिन्होंने इसे सुना उनके लिए वह एक स्मरणीय विरल अनुभव था।
इंदौर के प्रीतम लाल दुआ सभागृह में सर्वश्री शिवशंकर मिश्र ‘‘सरस’’(सीधी), बाबूलाल दाहिया (सतना) ने बघेली में, महेष कटारे ‘‘सुगम’’ (बीना), प्रेमप्रकाश चौबे (कुरवाई) ने बुंदेलखंडी में, महेन्द्र सिंह (भोपाल) ने हिन्दी एवं नरहरि पटेल (इंदौर) ने मालवी में अपनी कविताओं का पाठ कर श्रोताओं को अलग-अलग बोली-भाषा की कविता की सामथ्र्य से परिचित करवाया।
शिवशंकर मिश्र ‘‘सरस’’ ने काव्यपाठ की शुरुआत के पहले बघेलखण्ड की जानकारी देते हुए बताया कि बघेलखण्ड के ग्रामीण क्षेत्र में बघेली अभी जीवित है और व्यवहार की भाषा है। इसका राग श्रमराग है, क्योंकि बघेलखंड मेहनतकशों, किसानों, आदिवासियों और दलितों का क्षेत्र है। वहाँ अभी भी जंगल, कंकड़ीली-पथरीली खेती की ज़मीन, महुआ, कोदों और मोटा अनाज होता है। लोग दिनभर की कमरतोड़ मेहनत के बाद शाम को वापस लौटते हैं। पूरे बघेलखंड की रचनाओं में विरोध का स्वर मिलता है। बघेली में श्रृंगार की रचनायें बहुत कम मिलेंगी। सरसजी ने बताया कि बुंदेलखंड नृत्यप्रधान, मालवा चित्रप्रधान और बघेलखंड गीतप्रधान क्षेत्र हैं। वहां तन के काले मन के गोरे आदिवासियों के लोकगीतों में अभी भी सामन्ती विरोध, अन्याय और शोषण का स्वर दिखता है। बोलियाँ ही हमारी मातृभाषा हैं। सरसजी की रचनाएँ सीधे-सादे वाक्यों से गहरे अर्थ ग्रहण करती हैं -
‘बहत-बहत कहाँ चले गयन, सहत-सहत कहाँ चले गयन।
हम कहें चोर, कहन लुच्चा। कहत-कहत कहाँ चले गयन।
शासन प्रणाली पर वार करते हुए कहते हैं -
काहे का लोकतंत्र तुहूं नहीं जनते काहे का लोकतंत्र हमूं नहीं जानी,
केखे खातिर स्वतंत्र तुहूं नही जनते केखे खातिर स्वंतंत्र हमूं नहीं जानी,
धीरे-धीरे जहर मिली एक दिन, धीरे-धीरे मरैं परी सबका
उज्जर साँपे के मंत्र तुंहु नहीं जनते उज्जर साँपे के मंत्र हमूु नहीं जानी।
आज के दौर में बढ़ते दोगलेपन को निशाना बनाकर उन्होंने आगे सुनाया -
अइसन चुपरैं अइसन चाटैं कहा सिखे, दाना धरैं पछोरन बांटै कहां सिखे
कुछ दिन पहिले कुछु दिन बाद मा अतना अन्तर, मुँहु जोरैं अउ मन से काटैं कहाँ सिखे।
बाबूलाल दाहिया (सतना) ने बताया कि मध्य प्रदे की चार मुख्य बोलियों में से बघेली भी एक है और यह अपने आप में किसी भी भाषा की भाँति संपन्न है। बोलियाँ ही नहीं, ग़रीबों की जि़ंदगी भी इस विकास की भेंट चढ़ती जा रही हैं। इससे ‘विकास’ शब्द अपने आप में भय पैदा करने वाला बन गया है। इस विकास में प्रकृति और ग़रीब आदमी के पिसने की पीड़ा का दर्द उनकी इस कविता में व्यक्त्त होता है -
कउन तरक्की का खुला रामदई के द्वार, सहमे-सहमे सब थमे जंगल, नदी, पहार।
इतने संघर्ष के बाद मिली तथाकथित आजादी किसकी आजादी है, दाहियाजी अपनी कविता में इस तरह व्यक्त्त करते हैं -
सब के आजादी घरै आई कहाँ, पाट पायन बीच कै खाई कहाँ।
एक तो अक्कास से बातैं कराथै, एक कै छान्हिब अबै छाई कहाँ।
दे की समसामयिक समस्या पर गाँव के लोगों की आम चर्चा को ही उन्होंने कविता में ढाला है -
मोदीजी बिदेस बस घुमिहें, आपन भासन खूब सुनैहें,
उनके माथै रामदई कै, अच्छे दिन कबहूँ ना अइहैं।
झूंठ का नारा लगावा ना लगी, जीभ मा तारा लगावा ना लगी।
ईंट सगली खत गईं दीवाल की जब, तब वमा गारा लगाबा ना लगी।
बुंदेली बोली को उसके तंज के लिए जाना जाता है। कुरवाई जि़ला विदिषा के प्रेमप्रकाष चैबे ने एक बुंदेलखंडी और दूसरी हिन्दी कविता का पाठ किया। उनकी कविता ‘पूछा मेरी बिटिया ने’ पिता-पुत्री के सुंदर और कोमल संबंध का भावुक दृष्य खींचती है। साथ ही उन्होंने बदलते गाँवों में पथभ्रष्ट हो रहे युवाओं पर भी प्रभावी बुंदेली रचना सुनायी-
बेटा, तुम जे का कर रये हो, हमने सुनी खेत बेच रये हो
रात-रात भर दारू पी रये, कै रये आम सभा कर रये हो।
महेष कटारे ‘सुगम’ (बीना) बुंदेलखंडी बोली में ग़ज़ल कहने वाले पहले रचनाकार हैं। उन्होंने बुंदेली में करीब तीन हज़ार ग़ज़लें लिखीं हैं। सुगमजी ने बुंदेली की पहली ग़ज़ल ‘‘पंच सबई पथरा हो जेहें, ऐसो नईं जानत्ते’’ से अपना पाठ शुरू किया। आगे उनकी कविताओं की एक-एक पंक्ति ने बुंदेली के तिरछे तेवरों के आस्वाद से श्रोताओं को परिचित करवाया -
ऐसे कबै मुकद्दर हुइहैं, सबरे दूर दलिद्दर हुईहैं,
जित्ते लंबे पाँव हमारे, उत्ते बड्डे चद्दर हुइहैं।
दूर-पास के शहरों से वातानुकूलित कारों से गाँव देख-घूमकर गाँव की तारीफ़ करने वालों को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने कहा -
कभऊँ गांव में आकै देखो तो जानें, दो दिन इतै बिता के देखौ तो जानें,
मोड़ी-मोड़ा गाँवन के स्कूलन में, अपने कभऊँ पढ़ा के देखौ तो जानें।
ग़रीब किसान-मज़दूर के लिए सूखे का अर्थ क्या होता है, ये उनकी इन सरल पंक्तियों में घनीभूत तरह से व्यक्त होता है -
जा सूखा की साल रामदई, बन गई है जंजाल रामदई,
मैंगाई मंगरे पै चढ़ कें, ठोकत फिर रई ताल रामदई।
प्रशासनिक सेवा से पदमुक्त होकर सामाजिक समस्याओं के हल ढूँढ़ने के लिए निकले महेन्द्र सिंह (भोपाल) ने हिन्दी में अपनी कविताओं के ज़रिये दे के मौजूदा हालात के लिए जि़म्मेदार लोगों को चेताते हुए कहा -
यूं गिर के काम करने के पहले ये सोच लो, गर दे ना रहा तो सियासत ना रहेगी,
तुम जैसी अलालत औ वहम बांट रहे हो, पस्तादमों में चलने की ताक़त ना रहेगी।
झूठे दिखावे, दंभी और मेहनतकशों का खून चूसने वाले लोगों के रहते समाज में बदलाव लाने की चिंता महेन्द्रजी इन शब्दों में करते हैं -
जो ज़ंजीरों को जेवर की तरह पहन इतराता हो,
बदलावों की सूरत क्या जब ऐसा कठिन समाज मिले।
इज़्ज़त की रोटी मेहनत की खोज तलक ले जानी थी,
इतनी जरा सी बात से नाकिश  दौलतमंद नाराज मिले।
चंद पूँजीपतियों और प्रषासन की घालमेल की ओर इषारा करती उनकी इस कविता को भी श्रोताओं ने बहुत सराहना दी -
ये जमीं मिल गयी, आसमाँ मिल गया, चंद लोगों को सारा जहाँ मिल गया,
ना हिले ना डुले बस इशारों में ही, जो जहाँ चाहिए था, वो वहाँ मिल गया।
इसी बीच विनीत तिवारी ने झाबुआ के रचनाकार महिपाल भूरिया को याद किया जिनका पिछले दिनों निधन हो गया। महिपाल भूरिया भील आदिवासी समुदाय से थे और उन्हें उच्च अध्ययन का अवसर मिला था। उन्होंने भीली भाषा के क़रीब दो हज़ार गीतों का संग्रह कर उन्हें अंग्रेजी में अनुवाद भी किया था। सभा ने उन्हें भरे मन से याद किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे श्री नरहरि पटेल का इप्टा और प्रलेसं से 1950 के ज़माने से संबंध रहा है जब ज़ोहरा सहगल और पापाजी (पृथ्वीराज कपूर) अपने नाटक लेकर इंदौर आते थे। नरहरि जी ने मालवी की लोकधुनों को आधार बनाकर अनेक गीत लिखे हैं। अध्यक्षीय वक्तव्य के तौर पर नरहरि जी ने अपने चंद मालवी गीत और एक मालवी ग़ज़ल तरन्नुम में सुनायी जिसने मालवी की मिठास का परिचय अतिथि कवियों को दिया।
प्रगतिषील लेखक संघ, इंदौर इकाई के तत्वाधान में हुआ ये कार्यक्रम अपने आप में अनूठा था जिसे लोगों ने बहुत सराहा। दर्शक जो बैठे तो सबसे अंतिम कविता के पाठ तक अपनी जगह से हिले भी नहीं। यूँ तो शहर में क्षेत्रीय/आंचलिक बोली मालवी और निमाड़ी पर आधारित कार्यक्रम होते हैं लेकिन एक साथ इतनी आंचलिक बोलियों के रचनाकारों और वो भी शब्दों और कलम के जरिये सीधी मार करने वाली कविताओं का पाठ लोगों को बहुत पसंद आया। आभार इंदौर प्रलेसं के अध्यक्ष श्री एस.के.दुबे ने ज्ञापित किया और कार्यक्रम का संचालन ख्यात कवि श्री ब्रजेश कानूनगो ने किया। कार्यक्रम में अनुराधा तिवारी, आलोक खरे, सरोज कुमार, रषिकेस कृष्ण शर्मा, शोभना जोशी, कामना शर्मा, होल्कर काॅलेज के प्रिंसिपल श्री अरुण खेर, रवीन्द्र व्यास, अषोक दुबे, राजकुमार कुम्भज, केशरी सिंह चिड़ार, अरविंद पोरवाल, प्रमोद बागड़ी, अजय लागू,शशांक जैन, दीपिका, सारिका श्रीवास्तव और साथ ही अनेक अन्य श्रोताओं की उपस्थिति रही।

- सारिका श्रीवास्तव

सोमवार, 13 जुलाई 2015

'जन गण मन अधिनायक' नहीं है किंग जार्ज के बारे में

हमारे राष्ट्रगान पर चल रही बहस का कोई अंत दिखलाई नहीं दे रहा है। एक लंबे समय से ये कोशिशें चल रही हैं कि जन गण मन के मुकाबले वंदे मातरम को देश का बेहतर राष्ट्रगान साबित किया जाए। जन गण मन के प्रति लोगों के मन में सम्मान भाव को कम करने के लिए बार.बार यह कहा जाता रहा है कि यह गीत इंग्लैंड के बादशाह जार्ज पंचम की शान में लिखा गया था। गत 7 जुलाई को राजस्थान विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए भाजपा नेता कल्याण सिंह ने इस मुद्दे को फिर से उछाला। जिस समय बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी, कल्याण सिंह उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने राष्ट्रीय एकता परिषद को यह वचन दिया था कि मस्जिद की रक्षा की जाएगी परंतु उन्होंने अपने वचन का पालन नहीं किया। कल्याण सिंह ने कहा कि हमारे राष्ट्रगान में अधिनायक शब्द जार्ज पंचम के लिए इस्तेमाल किया गया है और इसलिए राष्ट्रगान की पहली पंक्ति को 'जन गण मंगल गाये' कर दिया जाना चाहिए।
कल्याण सिंह ने इस सुधार की मांग करते हुए यह दोहराया कि वे गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर का बहुत सम्मान करते हैं। भाजपा नेता का यह दावा और उनकी मांग, दोनों ही तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। जो मांग वे कर रहे हैंए वह अनुचित और अकारण है। यह धारणा कि जन गण मन जार्ज पंचम की शान में लिखा गया था,तत्समय अखबारों में छपी खबरों पर आधारित है, जो कि सही नहीं थीं। 20वीं सदी की शुरूआत में, देश के अधिकांश समाचारपत्र ब्रिटिश.समर्थक थे और उनमें काम करने वाले पत्रकारों का भारतीय भाषाओं का ज्ञान सीमित था। इसी कारण इस तरह की गलत धारणा बनी।
जन गण मन को राष्ट्रगान के रूप में इसलिए अपनाया गया क्योंकि वह देश के बहुवादी चरित्र को प्रतिबिंबित करता है।'अधिनायक' शब्द जार्ज पंचम के लिए प्रयुक्त किया गया हैए यह गलत धारणा तत्कालीन अंग्रेजी समाचारपत्रों ने फैलाई थी। सन् 1911 में जब जार्ज पंचम भारत आए तब बंगाल के विभाजन के निर्णय को ब्रिटिश सरकार द्वारा वापिस लिए जाने के लिए कांग्रेस, उन्हें धन्यवाद देना चाहती थी। बंगाल के विभाजन के निर्णय को रद्द करने के लिए ब्रिटिश सरकार को मजबूर होना पड़ा था। यह स्वदेशी आंदोलन की पहली बड़ी सफलता थी और भारत के साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष का पहला कदम। सन् 1905 में प्रारंभ हुए स्वदेशी आंदोलन की मांग थी कि बंगाल के विभाजन का निर्णय वापिस लिया जाए। 26 दिसंबर 1911 को कांग्रेस के अधिवेशन के पहले दिन दो गीत गाए गए। एक रबीन्द्रनाथ टैगोर रचित जन गण मन और दूसरा जार्ज पंचम की यात्रा के अवसर पर रामानुज चौधरी नामक एक अज्ञात सज्जन द्वारा रचित गीत।
उस समय के अंग्रेजी समाचारपत्र इस तरह की घटनाओं की रिपोर्टिंग करने में न तो बहुत गंभीर रहते थे और न तथ्यों की बहुत परवाह करते थे। यही कारण है कि अंग्रेजी अखबारों में यह छपा कि टैगोर का गाना जार्ज पंचम की शान में था। टैगोर,असल में, किसकी ओर संकेत कर रहे थेए यह भाषाई प्रेस के एक टिप्पणीकार ने स्पष्ट कियारू 'उनका गीत मनुष्यों के भाग्यविधाता की स्तुति में था न कि जार्ज पंचम की स्तुति में, जैसा कि एंग्लो.इंडियन मीडिया ने प्रस्तुत किया है'। जब अंग्रेजों के प्रति वफादार उनके एक मित्र ने रबीन्द्रनाथ टैगोर से जार्ज पंचम की स्तुति में एक गीत रचने को कहा तो वे बहुत नाराज हुए क्योंकि वे ब्रिटिश शासन के खिलाफ थे। उन्होंने जार्ज पंचम की बजाए मनुष्यों के भाग्यविधाता को समर्पित गीत लिखा। जब ब्रिटिश मीडिया में इस आशय की खबरें छपीं कि उन्होंने जार्ज पंचम की स्तुति में गीत लिखा है और उनकी कई व्यक्तियों ने निंदा की तब टैगोर ने लिखाए 'मानव के भाग्य का वह महान विधाता, जो हर युग में मौजूद रहा है,किसी भी स्थिति में जार्ज पंचम या जार्ज द्वितीय या कोई भी जार्ज नहीं हो सकता। मेरे उस'वफादार मित्र' को भी यह बात समझ में आ गई क्योंकि सम्राट के प्रति उसकी वफादारी चाहे जितनी रही होए उसमें बुद्धि की कमी नहीं थी।' यह गीत जल्दी ही बहुत लोकप्रिय हो गया और उसके अंग्रेजी अनुवाद 'मॉर्निंग सांग ऑफ इंडिया' को भी बहुत प्रसिद्धी मिली। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज ने इसे राष्ट्रगान के रूप में अपनाया और गांधीजी ने कहा, 'इस गीत ने हमारे राष्ट्रीय जीवन में स्थान बना लिया है।' सांप्रदायिक तत्व, वंदे मातरम को तरजीह देते हैं क्योंकि उन्हें जन गण मन पसंद नहीं है। और इसका कारण यह है कि जन गण मन में बहुवाद का संदेश निहित है। वे इस गीत को बदनाम करने के बहाने और मौके ढूंढते रहते हैं।
आरएसएस और हिंदुत्व परिवार, जन गण मन के मुकाबले वंदे मातरम को कहीं अधिक पसंद करते हैं। वंदे मातरम का पहला छंद लिखने के बाद, बंकिमचंद्र चटोपाध्याय ने अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में उसे विस्तार दिया। इस गीत का अधिकांश हिस्सा देवभाषा संस्कृत में है और कुछ पंक्तियां बांग्ला में। इस गीत को ब्रिटिश विरोधी प्रदर्शनों के दौरान गाया जाता था परंतु इसके मूल हिंदू स्वर के बारे में कोई संदेह नहीं होना चाहिए। धर्मनिरपेक्ष आंदोलन से जुड़े एक तबके ने ब्रिटिश विरोधी अभियानों के दौरान इसका इस्तेमाल किया। हिंदुत्ववादी इसे इसलिए पसंद करते हैं क्योंकि उसका मूल स्वर हिंदू है। साम्प्रदायिक दंगों के दौरान वंदे मातरम के नारे लगाए जाते हैं जिसका प्रतिउत्तर मुसलमानों द्वारा अल्लाहो अकबर का नारा बुलंद कर दिया जाता है। यह गीत हिंदुत्व आंदोलन के लक्ष्यों के इस अर्थ में भी अनुरूप है कि वह राष्ट्र को दुर्गा के रूप में देखता है। भारतीय राष्ट्र की विविधता और उसका बहुवाद, जो कि उसकी मूल पहचान हैं, इस गीत में कहीं दिखलाई नहीं देतीं। जन गण मन, वंदे मातरम और सारे जहां से अच्छा वे तीन राष्ट्रीय गीत थे, जिनमें से एक को राष्ट्रगान बनाया जाना था। जन गण मन, भारत की समृद्ध विविधता को प्रतिबिंबित करता था और अधिकांश राज्यों को स्वीकार्य था। इस कारण उसे राष्ट्रगान के रूप में चुना गया। वंदे मातरम के पहले दो छंदों को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया। संघ परिवार इस गीत का उपयोग अल्पसंख्यकों को डराने धमकाने के लिए कर रहा है। यह गीत अपने साम्राज्यवाद.विरोधी संदेश के साथ.साथ अल्पसंख्यक.विरोधी भावनाओं का वाहक भी बन गया है। यही कारण है कि आरएसएस और उसके साथी संगठन, इस गीत पर बहुत जोर दे रहे हैं।
यह प्रचार कि जन गण मन जार्ज पंचम की स्तुति में लिखा गया था, गलत इरादे से किया जा रहा है और यह सच पर आधारित नहीं है। यह सांप्रदायिक ताकतों के राजनैतिक एजेंडे का हिस्सा है।
यहां यह महत्वपूर्ण है कि सभी मुसलमानों की वंदे मातरम के बारे में एक राय नहीं है। जानेमाने संगीतकार ए.आर. रहमान ने वंदे मातरम की अत्यंत सुंदर और मनमोहक धुन तैयार की है। शाही इमाम, जिन्होंने इसका विरोध किया था,भाजपा के करीबी रहे हैं और वह पार्टी चुनावों में वोट पाने के लिए उनका इस्तेमाल करती आई है। यहां तक कि पिछले लोकसभा चुनाव में उन्होंने फतवा जारी कर मुसलमानों से यह कहा था कि वे भाजपा को वोट दें। पूरे गीत को यदि मुस्लिम नहीं गाना चाहते तो इसे पूरी तरह अनुचित नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसमें कई हिंदू देवी.देवताओं की स्तुति है। परंतु यहां यह बताना समीचीन होगा कि इस गीत के केवल शुरूआती दो छंदों को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया है और इस तथ्य के प्रकाश में, मुसलमानों के लिए भी स्थिति बदल जाती है। हिंदुत्ववादियों के दोहरे मापदंड भी इस विवाद में खुलकर सामने आए हैं। सन् 1998 में, जब उत्तरप्रदेश सरकार ने इस गीत का गायन स्कूलों में अनिवार्य करने का निर्णय लिया था तब अटल बिहारी वाजपेयी ने इसका विरोध किया था।
-राम पुनियानी

शनिवार, 11 जुलाई 2015

नरम हिंदुत्व और गरम हिंदुत्व


वर्तमान एनडीए सरकार की नीति है- सांस्कृतिक आयोजनों पर पानी की तरह पैसा बहाओ, कुबेरपतियों की कंपनियों को टैक्स में छूट दो और समाज कल्याण के बजट को घटाते जाओ। इस प्रक्रिया के चलते, समाज के दमित व शोषित वर्ग यदि भूख, कर्ज और आत्महत्या के दुष्चक्र में फंसते जा रहे हैं तो सरकार की बला से। कार्पोरेट घरानों और कुछ अरबपति परिवारों की जेबें भरना ज्यादा जरूरी है।
नरम हिंदुत्व और गरम हिंदुत्व दोनों का उद्देष्य हाशिए पर खिसकते जा रहे वंचित वर्गों  को ‘‘अपनी संस्कृति पर गर्व’’ करना सिखाना और उनमें ‘‘फील गुड’’ के भाव को मजबूती देना है। ‘‘इंडिया शाईनिंग’’ व ‘‘फील गुड’’ अभियानों से भाजपा को 2004 के लोकसभा चुनाव में कोई फायदा नहीं हुआ था और भारत की जनता ने इस अभियान और उसे चलाने वालों को सिरे से खारिज कर दिया था। परंतु यह सरकार उसी पुरानी शराब को नई बोतल में पेश कर रही है। लोगों से कहा जा रहा है कि वे अपनी लड़की के साथ सेल्फी लें और गर्व महसूस करें, योग करें और खुश हों, सड़कों पर झाड़ू लगाएं और आल्हादित हो जाएं।
सामाजिक क्षेत्र के लिए बजट में कटौती
सन् 2014-15 के बजट में सामाजिक क्षेत्र को, कुल बजट का 16.3 प्रतिषत हिस्सा आवंटित किया गया था। सन् 2015-16 में यह आवंटन घटकर 13.7 प्रतिशत रह गया। ताजा बजट में महिला एवं बाल विकास के लिए आवंटन, पिछली बार की तरह, कुल बजट का मात्र 0.01 प्रतिशत है। लैंगिक बजट के लिए आवंटन 4.19 प्रतिशत से घटकर 3.71 प्रतिशत रह गया है। सन् 2014-15 के पुनर्रीक्षित बजट अनुमानों के लिहाज से, सन् 2015-16 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के आवंटन में 49.3 प्रतिशत व लैंगिक बजट में 12.2 प्रतिशत की कमी आई है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में लैंगिक बजट, 17.9 प्रतिशत कम हो गया है। लड़कियों की शिक्षा को प्रोत्साहन देने की सरकारी घोषणाओं के बाद भी, स्कूल शिक्षा के लिए लैंगिक बजट में 8.3 प्रतिशत की कमी आई है। ‘‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’’ अभियान बड़े जोरशोर से चलाया गया परंतु इस अभियान के लिए बजट में केवल 100 करोड़ रूपए का प्रावधान किया गया है। समन्वित बाल विकास कार्यक्रम (आईसीडीएस), जिससे लगभग 10 करोड़ महिलाएं और बच्चे लाभांवित होते हैं, का बजट आधा कर दिया गया है। सन् 2014-15 में इस मद में रूपए 18,108 करोड़ का प्रावधान किया गया था, जो कि सन् 2015-16 में घटकर 8,245 करोड़ रह गया। पेयजल और साफ-सफाई संबंधी योजनाओं के लिए बजट प्रावधान, 12,100 करोड़ रूपए से घटाकर 6,236 करोड़ रूपए रह गया।
कुल मिलाकर, सामाजिक क्षेत्र के लिए आवंटन में 1,75,122 करोड़ रूपए की कमी आई। इसमें से 66,222 करोड़ रूपए सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के लिए दिए जाने वाले अनुदान को घटाकर, 5,900 करोड़ रूपए पिछड़ा क्षेत्र अनुदान कोष को आवंटन में कमी कर और 1,03,000 करोड़ रूपए खाद्य सुरक्षा योजना को लागू न कर बचाए गए। इससे महिला और बाल विकास, कृषि (जो देश की 49 प्रतिशत आबादी के जीवनयापन का जरिया है), सिंचाई, पंचायती राज,शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास व अनुसूचित जाति/जनजाति कल्याण से संबंधित कार्यक्रम प्रभावित होंगे। स्वास्थ्य के बजट में 17 प्रतिशत की कमी की गई। सन् 2015-16 के बजट में अनुसूचित जाति विशेष घटक योजना के लिए रूपए 30,852 करोड का प्रावधान किया गया और आदिवासी उपयोजना के लिए रूपए 19,980 करोड का। ये दोनों योजनाएं अनुसूचित जातियों व जनजातियों के विकास और कल्याण के लिए बनाई गई हैं और इनका उद्देष्य यह है कि इन वर्गों की भलाई की योजनाओं पर बजट का लगभग उतना ही हिस्सा खर्च किया जाए, जितना इन वर्गों का देश की कुल आबादी में हिस्सा है। अनुसूचित जातियां, देश की कुल आबादी का 16.6 प्रतिशत हैं जबकि अनुसूचित जनजातियों का कुल आबादी में हिस्सा 8.5 प्रतिशत है। सन् 2015-16 के बजट में विशेष घटक योजना के लिए कुल बजट का केवल 6.63 प्रतिशत हिस्सा उपलब्ध करवाया गया है।
स्कूली शिक्षा व साक्षरता के लिए आवंटन, 2014-15 में 51,828 करोड़ रूपए से घटाकर 2015-16 में 39,038 करोड़ रूपए कर दिया गया है। इसी अवधि में उच्च शिक्षा विभाग के लिए आवंटन, 16,900 करोड़ रूपए से घटाकर 15,855 करोड़ रूपए और सर्वशिक्षा अभियान के लिए 28,258 करोड़ से घटाकर 22,000 करोड़ रूपए कर दिया गया है। मध्याह्न भोजन योजना भारत सरकार की एक अत्यंत महत्वपूर्ण योजना है। इसके लिए सन् 2014-15 में 13,215 करोड़ रूपए आवंटित किए गए थे, जो कि सन् 2015-16 में घटकर 9,236 करोड़ रूपए रह गए। आवंटन में वास्तविक कमी, इन आंकड़ों से कहीं ज्यादा है क्योंकि पिछले एक वर्ष में रूपए की कीमत में कमी आई है। माध्यमिक शिक्षा के लिए आवंटन 8,579 करोड़ रूपए से घटकर 6,022 करोड़ रूपए रह गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का आवंटन जस का तस है जिसका अर्थ यह है कि वास्तविक  अर्थ में उसमें कमी आई है। तकनीकी शिक्षा के लिए आवंटन में 434 करोड़ रूपए की कमी की गई है। भारतीय विज्ञान शिक्षा व अनुसंधान संस्थान का बजट 25 प्रतिषत घटा दिया गया है।
सरकार ने अमीरों द्वारा चुकाए जाने वाले संपत्तिकर को समाप्त कर दिया है और इस कर से होने वाली 8,325 करोड़ रूपए की वार्षिक आमदनी की प्रतिपूर्ति के लिए आम जनता पर अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढ़ा दिया है। पिछले बजट की तुलना में, इस बजट में सरकार को अप्रत्यक्ष करों से होने वाली आमदनी में रूपए 23,383 करोड़ की वृद्धि हुई है।
उच्च जातियों की संस्कृति
जहां एक ओर सामाजिक क्षेत्र पर होने वाले खर्च और कार्पोरेट टैक्सों में कमी की जा रही है वहीं हिंदू समुदाय की उच्च जातियों के श्रेष्ठी वर्ग की संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अपने खजाने के मुंह खोल दिए हैं। योग, जिसका मूल स्त्रोत ब्राह्मणवादी धर्मशास्त्र, उपनिषद व पतंजलि जैसे दार्षनिक ग्रंथ हैं और जिसे मुख्यतः मध्यम वर्ग के लोग करते आए हैं, को भारत के ‘‘साॅफ्ट पाॅवर’’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सुझाव पर दिसंबर 2014 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने भारत द्वारा प्रस्तुत एक प्रस्ताव को अपनी मंजूरी दी, जिसके तहत 21 जून को ‘‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’’ घोषित किया गया। इस साल 21 जून को सैन्य व पुलिसकर्मियों और स्कूल व कालेज के विद्यार्थियों को इकट्ठा कर, दिल्ली के राजपथ पर एक बड़ा कार्यक्रम किया गया। यह आयोजन लगभग उतना ही भव्य था, जितना की गणतंत्र दिवस पर किया जाता है। इस कार्यक्रम को गिनीज बुक आॅफ वल्र्ड रिकार्डस में जगह मिली। गिनीज बुक कहती है ‘‘भारत में दिल्ली के राजपथ पर 21 जून 2015 को प्रथम अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा आयोजित कार्यक्रम में 35,985 व्यक्तियों ने एक साथ योग किया, जो कि दुनिया की सबसे बड़ी योग क्लास थी।
‘‘यह कार्यक्रम दिल्ली के केंद्र में स्थित प्रसिद्ध राजपथ के 1.4 किलोमीटर लंबे हिस्से में आयोजित किया गया। मुख्य मंच पर चार प्रशिक्षक योग कर रहे थे और उनकी तस्वीरों को 32 विशाल एलईडी स्क्रीनों के जरिए वहां मौजूद लोगों को दिखाया जा रहा था ताकि वे प्रशिक्षकों के साथ-साथ योग कर सकें। कार्यक्रम की शुरूआत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के भाषण से हुई। भाषण के बाद उन्होंने भी इस योग प्रषिक्षण में हिस्सा लिया। कार्यक्रम में (लगभग) 5,000 स्कूली बच्चे, 5,000 एनसीसी के कैडिट, 5,000 सेना के जवान, 1,200 महिला पुलिस अधिकारी, 5,000 केंद्रीय मंत्री व अन्य विशिष्ट जन, 5,000 राजनयिक व विदेशी नागरिक और विभिन्न योग केंद्रों के 15,000 सदस्यों ने भाग लिया। यह सुनिष्चित करने के लिए कि सभी प्रतिभागी ठीक ढंग से विभिन्न आसन करें, आयुष मंत्रालय ने कार्यक्रम से दो माह पहले उन्हें किए जाने वाले आसनों का वीडियो उपलब्ध करवाया ताकि वे अभ्यास कर सकें।’’
इस कार्यक्रम के प्रचार का जिम्मा केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को सौंपा गया, जिसने इस पर 100 करोड़ रूपए खर्च किए। आयुष मंत्रालय ने इसके अतिरिक्त 30 करोड़ रूपए खर्च किए। कार्यक्रम के इंतजाम और सुरक्षा आदि पर कितना खर्च हुआ, इसके संबंध में कोई आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2013 में इलाहाबाद में आयोजित कुंभ पर 1,151 करोड़ रूपए खर्च किए गए, जिसमें से 1,017 करोड़ रूपए केंद्र सरकार ने उपलब्ध करवाए और 134 करोड़ रूपए राज्य सरकार ने खर्च किए। नासिक में 2015 में आयोजित होने वाले कुंभ मेले पर संभावित खर्च रूपए 2,380 करोड़ है। अर्थात दो वर्षों में कंुभ मेले के आयोजन पर होने वाला खर्च दो गुना से भी अधिक हो गया है। नासिक में सुरक्षा इंतजामों के लिए 15,000 पुलिसकर्मियों की ड्यूटी लगाई जाएगी। पानी की सप्लाई के लिए 145 किलोमीटर लंबी पाईप लाईने बिछा दी गई हैं। करीब 450 किलोमीटर लंबी बिजली की लाईनों से 35 पाॅवर सब स्टेशनों के जरिए 15,000 स्ट्रीट लाईटों तक बिजली पहुंचाई जाएगी।
संस्कृत, जो आज भारत के किसी भी हिस्से में बोलचाल की भाषा नहीं है, को बढ़ावा देने के लिए एनडीए सरकार धरती-आसमान एक कर रही है। बेशक, उन लोगों को संस्कृत अवश्य सीखनी चाहिए जो हिंदू दर्शन या धार्मिक गं्रथों को पढ़ना चाहते हैं या उन पर शोध करना चाहते हैं। परंतु आम लोगों को संस्कृत सिखाने की कोई आवष्यकता नहीं है। वैसे भी, प्राचीन भारत में संस्कृत, नीची जातियों का दमन करने के उपकरण के तौर पर इस्तेमाल की जाती थी। जो शूद्र संस्कृत बोलता था, सजा के तौर पर उसकी जीभ काटी जा सकती थी। अगर कोई शूद्र संस्कृत सुन लेता था तो उसके कान में पिघला हुआ सीसा डाला जा सकता था और अगर कोई शूद्र संस्कृत पढ़ता था तो उसकी आंखे निकाली जा सकती थीं। एनडीए सरकार भारी रकम खर्च कर संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन को प्रोत्साहन दे रही है। कंेद्रीय मानव संसाधान मंत्रालय ने शैक्षणिक सत्र 2013-14 के अधबीच में, केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन की जगह संस्कृत को तीसरी अनिवार्य भाषा बना दिया। यह इस तथ्य के बावजूद कि संस्कृत पढ़ाने के लिए न तो पर्याप्त संख्या में अध्यापक उपलब्ध थे और ना ही पाठ्यपुस्तकें थीं। थाईलैंड में 28 जून से 2 जुलाई 2015 तक आयोजित विश्व संस्कृत सम्मेलन में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के नेतृत्व में 250 सदस्यों के भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने हिस्सा लिया। इनमें से 30, आरएसएस से जुड़े संस्कृत भारती से थे।
नरम हिंदुत्व और गरम हिंदुत्व
सरकार करदाताओं के धन का इस्तेमाल, नरम हिंदुत्व को बढ़ावा देने के लिए कर रही है। भाजपा के कई नेता, जिनमें मंत्री और सांसद शामिल हैं, गरम हिंदुत्व के झंडाबरदार बने हुए हैं। वे गैर-हिंदू धर्मावलंबियों के विरूद्ध आक्रामक भाषा का इस्तेमाल कर रहे हंै और उनके खिलाफ नफरत फैला रहे हैं। गरम हिंदुत्व का लक्ष्य है देष को गैर-हिंदुओं से मुक्त कराना या कम से कम उन्हें दूसरे दर्जे का नागरिक बनाकर, मताधिकार से वंचित करना। हिंदू राष्ट्र की स्थापना के लिए गरम हिंदुत्ववादी, युद्ध करने के लिए भी तैयार हैं। अलग-अलग बहानों से, जिनमें गौवध, लवजिहाद, हिंदुओं के पवित्र प्रतीकों का अपमान, धर्मपरिवर्तन आदि शामिल हैं, दंगे भड़काए जा रहे हैं। साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, साध्वी निरंजन ज्योति व गिरिराज सिंह जैसे लोग दिन-रात जहर उगल रहे हैं।
दूसरी ओर, नरम हिंदुत्व का उद्देष्य मीडिया, शिक्षा संस्थाओं और बाबाओं की मदद से धार्मिक-सांस्कृतिक विमर्ष पर हावी होना और ऊँची जातियों के हिंदुओं का सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करना है। धार्मिक-सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने की इस कोशिश से भारत की धार्मिक प्रथाओं, विष्वासों, सांस्कृतिक परंपराओं और जीवन पद्धति की विविधता प्रभावित हो रही है। हिंदू धर्म के मामले में भी केवल उसके ब्राह्मणवादी संस्करण को प्रोत्साहित किया जा रहा है। हिंदू धर्म में सैंकड़ों पंथ और विचारधाराएं समाहित हैं, जिनमें लोकायत, नाथ व सिद्ध जैसी परंपराएं तो शामिल हैं ही, सभी जातियों, संस्कृतियों और परंपराओं के सैंकड़ों भक्ति संतों की शिक्षाएं भी उसका हिस्सा हैं। क्यों न डाॅ. बाबा साहेब अंबेडकर द्वारा प्रतिपादित नवायान बौद्ध धर्म को प्रोत्साहित किया जाए? क्यों न जैन और सिक्ख धर्म की शिक्षाओं का प्रसार किया जाए?
दरअसल, नरम हिंदुत्व और गरम हिंदुत्व के लक्ष्य एक ही हैं। और केवल सामरिक कारणों से ये दो अलग-अलग रणनीतियां इस्तेमाल की जा रही हैं। नरम हिंदुत्व उन लोगों के लिए है जिन्हें हिंसा और आक्रामक व अशिष्ट भाषा रास नहीं आती।
नरम और गरम हिंदुत्व एक दूसरे के पूरक हैं।  प्रधानमंत्री मोदी ने तब तक गरम हिंदुत्व का इस्तेमाल किया जब तक वह उनके लिए उपयोगी था और अब उन्होंने नरम हिंदुत्व का झंडा उठा लिया है। एनडीए सरकार के शासन में आने के बाद बाबू बजरंगी और माया कोडनानी जैसे दोषसिद्ध अपराधी जमानत पर जेलों से बाहर आ गए हैं और एनआईए की वकील रोहिणी सालियान ने आरोप लगाया है कि उन्हें यह निर्देष दिया गया है कि वे मालेगांव बम धमाकों के आरोपी कर्नल पुरोहित, दयानंद पांडे और साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के विरूद्ध चल रहे मुकदमें में नरम रूख अपनाएं और यह भी कि एनआईए नहीं चाहती कि वे यह मुकदमा जीतें। नरम हिंदुत्ववादियों के सत्तासीन होने से गरम हिंदुत्ववादियों के हौसले बुलंदियों पर हैं और वे दिन पर दिन और हिंसक और आक्रामक होते जा रहे हैं। उन्हें कानून का कोई डर नहीं है। प्रधानमंत्री, गिरीराज सिंह व साक्षी महाराज जैसे लोगों की कुत्सित बयानबाजी की निंदा नहीं करते-मौनं स्वीकृति लक्षणं। नरम हिंदुत्व का एक लाभ यह है कि यह उन लोगों में, जो धीरे-धीरे गरीबी के दलदल में और गहरे तक धसते जा रहे हैं, गर्व का झूठा भाव पैदा करता है। परंतु यह खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगा और जल्दी ही लोगों को यह समझ में आ जाएगा कि गरीबी, बेकारी और भूख इस देश की मूल समस्याएं हैं और उनसे मुकाबला किए बगैर, आम जनता का सही मायने में सशक्तिकरण संभव नहीं है।
-इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 10 जुलाई 2015

आइपीएस अफसर ने सरकारी गवाह--------------------------

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कर्णाटक मुहकमत के आला अफसर आइपीएस  अलोक कुमार का नाम सुर्ख़ियों में है.करोड़ों रुपये गबन के मामले में तो अफसरों के नाम बारहा आते रहते है और इसी के चलते अफसरान माजुल भी किये जाते है.लेकिन फिर से दुबारा रुजू भी किये जाते है.ऐसे कई अफसर है जिन्होंने बेशर्मी की हद्द पार की हुयी है. अलोक कुमार अब लॉट्री कुमार बन चूका है.करोड़ों के लॉट्री घोटाले का सरदार अलोक कुमार  के खिलाफ  सबूत हासिल हो चुके है खैर  अब तो अलोक कुमार ने नौकरी से हाथ धो लिया है.लेकिन आइपीएस जब आयजीपी बन कर अपने फराईज़ को अंजाम देता रहता है किस तरह का ज़ुल्म भी करता है इस तरफ ना तो मीडिया देखती है ना कोई इंसानी हुकूक की तंज़ीम इस पर बात करना पसंद करती है.आजीपी के ऊँचे ओहदे पर फ़ाइज़ होकर किस तरह की जेहनियत भी ये अफसर रखता है इसका पर्दा फाश तब हुआ जब हुबली सिमी मामले में गिरफ्तार सतरा और अदालत से बाइज्जत रिहाशुदा  नौजवानों में से एक सादिक समीर ने हाल ही में मुनक्कद प्रेस कोन्फेरेंस के दौरान इस बात का खुलासा किया के कैसे आजीपी अलोक कुमार ने झूट मुठ का मुकद्दमा बना कर फंसाया और धमकी भी दी के अगर तू सरकारी गवाह बन कर दीगर अफरादों के खिलाफ गवाही नहीं देगा तो तुझे भी इस केस में मुलव्विस किया जाएगा.लेकिन सादिक समीर ने ये कहा के मै किसी को भी नहीं जानता तो कैसे झूटी गवाही दूँ.....
मामला एहि नहीं रुका समीर सादिक ने इंकार किया तो पहले छोड़ दिया गया.फिर अचानक एक दिन रात साढ़े बारा  बजे न्यू गुरुपणपाल्ल्या जहा पर सादिक समीर रिहाइश पजीर है उस इलाके को सीज़ किया गया सौ डेढ़ सौ पोलिस तैनात कर पुरे मोहोल्ले की नाका-बंदी की गयी.बिजली को भी निकाला गया और समीर के घर पर सर्च लाइट मारे गए.और एक बड़ी जीप में आयजीपी  आइपीएस अलोक कुमार पूरी मीडिया को लेकर तशरीफ़ लाये और घर पर रेड किये उस वक़्त बीवी और छोटी बच्ची के साथ समीर सादिक मौजूद थे.घर में एक तरह का खौफ का माहोल था पुरे मोहोल्ले में भी एक खौफ का माहोल बनाया गया.देखिये कैसे माहोल बनाकर गिरफ्तारी अमल में लायी जाती है.ताके अवाम भी सोचने पर मजबूर हो जाती है के जो शख्स हमारे दरमियान था वो आतंकवादी ही था....!!
गिरफ्तारी अमल में आई.फिर तहकीकात भी शुरू हुयी.जब के पहले से अलोक कुमार को ये मालुम था के समीर सादिक का इस केस से कोई ताल्लुक नहीं.फिर पूछताछ के दौरान अलोक कुमार ने दबाव और धमकी शुरू की के छोड़ देता हूँ अगर तू इनके खिलाफ गवाही देगा तो...फिर वही समीर सादिक ने दौराया ''मै किसी को भी नहीं पहचानता तो कैसे इनके खिलाफ गवाही दू....समीर सादिक के घर से मज़हबी किताबों को बतौर सबूत बरामद किया गया था और इसी को मुल्क के खिलाफ पढ़ाई जानेवाली किताब ऐसा  दस्तावेज होने की बात को दर्ज किया गया.इन किताबों में खास कर दुआओं की किताबे हदीस,कुरानी आयात,तारीखे इस्लाम बुजुर्गों के वाक़ियात ,सीरत उन नबी की किताबे मौजूद थी.लेकिन यहां पर पूछनेवाला कौन था.'' आगे समीर सादिक ने ये भी बात कही के मै किस बात पर उनसे ऐतजाज करता मै खुद इतना डर गया था की मुझे क्या करना या किया जा रहा समझ में नहीं आ रहा था.पूरा मोहल्ला खौफ  के साये में था...पुलिस की चहल पहल कई दिनों तक चलती रही...तक़रीबन आठ साल बाद रिहाई नसीब हुयी....तब तक पूरा खत्म हो चूका था....आज भी लोग सलाम का जवाब भी देना मुनासिब नहीं समझते......रिश्तदारों ने तो कब के ताल्लुक काट दिए है...रोजी रोटी का मसला  इम्तेहान बन कर आन पढ़ा है.बच्चों के साथ कैसे ज़िन्दगी गुज़ार दूँ......बताईये कहते कहते सादिक समीर सय्यद रो पड़े...उनके आंसुओं ने इस मिल्लत की बेहिसी को एक बार फिर उजागर कर दिया.लेकिन कोई फायदा नहीं.इसलिए यंहा आंसुओं और जज़्बातों की कोई कदर नहीं.....सिर्फ पैसा बोलता है...
रियासत में दहशत गर्द सरगर्मियों के इलज़ाम में गिरफ्तारी के बाद अदालत से बाइज्जत बरी किये गए  सय्यद सादिक समीर ने यहा अपनी प्रेस कोन्फेरेंस  के दौरान रियासत के आइपीएस अफसर अलोक कुमार का भण्डा फोड़ करते हुए कहा के इन्हे २००८ में  जब रियासत में सिमी तंज़ीम के ज़रिये   दहशतगर्दाना सरगर्मियों के इलज़ाम में गिरफ्तार किया गया तो इसके बाद आइपीएस अलोक कुमार ने  इन पर दबाव डाला था के गिरफ्तार शुदा दीगर मुल्ज़िमींन  के खिलाफ वो गवाही दे के ये लोग भी सिमी तंज़ीम के ज़रिये रियासत में दहशतगर्दाना सरगर्मियां चला रहे है इन्होने बताया के सीआइडी महकमा के डीआइजी के हैसियत से इनकी कयादत में ही इस मामले की जांच शुरू हुयी थी,इन्हे भी इस केस में गिरफ्तार किया गया और फिर दबाव डाला जाने लगा के वो गिरफ्तार शुदा दीगर मुल्ज़िमींन  के खिलाफ अदालत में गवाही दे.लेकिन जिन लोगों के बारे में कुछ नहीं जानता था इनके खिलाफ गवाही देने से इन्होने साफ़ इंकार कर दिया.सादिक समीर ने कहा के गैर कानूनी तरीके से इक्कीस  फ़रवरी२००८ से २५ फ़रवरी तक इन्हे कस्टडी में रखा गया इनकी रिहाइश गाह पर जो इस्लामी अदब पर मबनी किताबे ज़ब्त की गयी इन किताबों को दुश्मन मवाद   किताबे करार देकर मीडिया में उछाला गया जब के  ये सारी किताबे खुले   बाज़ार   में दस्तयाब  किताबे  थी इनमे  ऐसा  कोई  मवाद नहीं था जिसे  मुल्क  ए  दुशमन  करार  दिया जाता  ना  ही इसमें  कोई  जिहादी  मवाद था अदालत ने भी   बाद में वाज़ेह  कर  दिया के  इस  मामले में गिरफ्तार ज़्यादा  तर अफ़राद डॉक्टर्स इंजीनियर्स और छोटे मोटे ताजिर थे अदालत ने तमाम गिरफ्तार शुदा  सतरा अफ़राद को बेगुनाह करार दिया गया इसके बावजूद अबतक सिर्फ चार अफरादों को रिहा किया गया.बकिया अफ़राद के खिलाफ दीगर रियासतों में मुकद्दमे दर्ज है.बगैर किसी नाकर्दा गुनाह इन अफरादों को अपनी ज़िन्दगी के आठ साल जेल में गुज़ारने पड़े.और अब इनकी ज़िन्दगी बर्बाद हो चुकी है.समाज में जो इज्जत थी इसे बिलावजह नीलाम कर दिया गया.अब लोग हमसे राबिता रखने या मामिलात करने से घबरा रहे है इस मौके पर इन्होने कहा के हम तमाम सतरा  अफ़राद को इल्ज़ामात से बरी करार दिए जाने के धारवाड़ फर्स्ट अडिशनल सेशन कोर्ट  के फैसले के खिलाफ रियासती हुकूमत अब दुबारा अपील दाखिल ना करे अब हममे कानूनी जंग लड़ने की मजीद ताकत नहीं है
- इक़बाल अहमद जकाती

गुरुवार, 9 जुलाई 2015

अफ्तार पार्टी, ईद में शाखा लगाने की जि़द और मुस्लिम तंजींमों का मोतियाबिंद


                                                    
आरएसएस फूले नहीं समा रही है कि देश की राजधानी दिल्ली में उसने अफतार पार्टी का आयोजन किया तथाकथित ’’भेड़ मुसलमान’’ शामिल भी होगए. अब उसके हौसले लखनउ फतह करने के हैं. कोई बेसमझ भी बता सकता है कि इसके पीछे क्या कुछ चल रहा है. 87 बरस पहले गुलाम हिंदोस्तान में जिस संगठन की पैदाइश ही बर्बर मुस्लिम विरोध और अंग्रेजों के तलुवे चाटने से हुई हो उसका अचानक रोज़ेदार मुसलमानों के रोज़े अफ़तार करवाने के लिए जज़्बा फूट पड़ना सत्ता के गलियारों में ख़ुद के लिए रहे सहे विरोध को भी दरकिनार करने के अलावा कुछ भी नहीं है. विकास के झूठे वादे, बड़बोले नौटंकी बाजों की लनतरानियांे, बयानबाजि़यों के गुब्बारे की हवा अब निकल चुकी है, ऐसे सूरतेहाल में बिहार के चुनाव में संघी ब्रिगेड का सूपड़ा साफ़ होना तय है सो बिहार फिर यूपी चुनावों में आरएसएस की नैया के खेवनहार आज की तारीख़ में-हमेशा से दुत्कारे और लतियाए गए, उपेक्षित, सेकेंड क्लास ’’बेचारे मुसलमान’’ ही बाक़ी बचे हैं दूसरा और कोई नहीं-इसलिए उन्हें साधने के लिए ही (अचानक नहीं) ये अफतार प्रेम फूट पड़ा है.
ग़ौरतलब है कि तथाकथित मुस्लिम नेताओं को तो वो पहले ही अपने अश्वमेघ रथ में साध चुके हैं बची ’’निरीह’’ जनता तो उसका क्या है फि़रक़ों में बंटी, आपस में ही लड़वाई जारही बिना दिमाग के ’’भेड़ों’’ की ’’जाहिल भीड़’’ को अपनी तरफ हांकना क्या कोई मुश्किल काम है? सो अफतार फिर ईद मिलन के बहाने कुछ कबाब, वबाब, खजूर, बिरयानी, शरबत जैसा थोड़ कुछ परोस कर अपने जेब में इन्हें ठूंस लिया जाए. याद कीजिए 21 जून अंतर्राष्ट्रीय योगादिवस पर मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड सेक्रेटरी रहमानी का मीडिया के सामने गुर्राना, इस्लाम को ख़तरे में दिखाते हुए हिंदोस्तानी मुसलमानों को सड़कों पर उतारने का दावा करना, उसके सेके्रटरी रहमानी का मुल्क भर के सभी मस्जिदों और मज़हबी तंज़ीमों के साथ चिटठी बाज़ी करना कि आज ’’भारतीय दीन’’ ख़तरे में है जैसा ख़ूब बवाल मचाया गया. और उसके सुर में सुर मिलाते हुए कई दूसरी स्वयंभू मज़हबी तंजीमें भी बोर्ड के साथ गलबहियां गिल हो गईं. ज़रा ये भी याद कीजिए ज़फ़रसरोश वाला जैसे मौक़ापरस्त सरकारी चाटुकार की के़यादत में इन्हीं स्वयंभू मज़हबी नेताओं का संघी ब्रिगेड के ’’पीएम’’ की कुर्सी में बैठे ’’मोहरे’’ के साथ पिछले दरवाज़े से चोरों की तरह मुलाकात करना, संविधान की धज्जियां बिखेरने वाले को अच्छी सरकार चलाने वाले (सबसे बुरे आमानवीय, गरीब, आदिवासी, दलित, महिला व अल्पसंख्यक विरोधी सरकार को) ’’सुशासन’’ कहकर उसकी पहली सालगिरह की बधाई देना, यही नहीं अपनी मौक़ापरस्ति की इंतेहा करते हुए आम हिंदोस्तानी मुसलमान के वक़ार और उसके नागरिक हक़ों का चुपके से सौदा भी कर लिया, जिसकी ख़बर वे आज भी आम मुसलमान को नहीं होने देना चाहते. मगर चालचलन, और चाटुकार गतिविधियों से इनकी बदबुदार कारगुज़ारियां सबको साफ़ दिखाई पड़ रही हैं. खुद को मुसलमान कहने/समझने वाले हर हिंदोस्तानी को अब ये यक़ीन करना ही होगा कि ये तंज़ीमें और इनके कारकुन (कार्यकर्ता)अब बेइमान, रिश्वतख़ोर, मौक़ापरस्त और मज़हबफ़रोश हो गए हैं अब ये हमारे किसी काम के नहीं रहे. ये हमंे अपनी बढ़ती तांेद के लिए चारा, अपनी दाढ़ी का रंगीन खि़ज़ाब और अपने घी चुपड़े पराठे-बोटी का सिर्फ़ ज़रिया ही मानते हैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं. इनके अंदर न ईमान बचा है न इंसानियत और न एक जिम्मेदार नागरिक का वक़ार. अगर ये सच नहीं है तो आप ख़ुद ही सोचें कि जब मुसलमान अपने नाम और पहचान की वजह से बेइज्जति, अत्याचार और शोषण का शिकार होता है ये तंजीमें उसके साथ क्यों नहीं खड़ी होतीं.? जब उसके नागरिक हक़, झूठे शक और साजि़श की बिना पे छीने जाते हैं ये तंजीमें मुंह लपेटे कहां छिपी रहती हैं? जब उसके घरों, गुमटियों को आग के हवाले किया जाता है, उसे घर से बेघर किया जाता है, (गुजरात, मुजफफरनगर, शामली, त्रिलोकपुरी, अटाली) मुसलमान होने के नाते ज़लीलोख़्वार किया जाता है उसे सरेआम ज़लील किया पीटा जाता है,कत्ल कर दिया जाता है (मौलाना ख़ालिद मुजाहिद, काशिफ़, शाहिद आज़मी, मोहसिन शेख़, एजाज़, हुसैन) इन तंज़ीमों के मुंह से आह क्यों नहीं निकलती? उसे दहशतगर्द बता/प्रचारित करते हुए बरसों बरस जेलों में प्रताडि़त किया जाता है, उसका परिवार इंसाफ़ की गुहार लगाता ग़रीबी, बेरोज़गारी, अपमान की जिं़दगी गुज़ारता है इनके कानों में जुं क्यों नहीं रेंगती,? अदातल से बेगुनाही का सर्टिफि़केट लेकर जब वो बाहर आता है उसके/परिवार के लिए इनकी जुबान सेे मुबारकबाद के बोल क्यों नहीं फूटते.? सोचिए और बताइये आपके होश संभालने के बाद से अबतक कितनी बार? कब, किस मुददे पर? इन्होंने आम गरीब मुसलमानों के इंसानी, नागरिक हक़तलफ़ी के खि़लाफ़ आवाज़ उठाई है? सड़कें जाम की हैं? कोई प्रतिनिधि मंडल भेजा हो? या सरकारों पे दबाव बनाने जैसा देशव्यापी कोई आंदोलन छेड़ने की घोषणा भी की हो?? नहीं न?? तो फि़र आज अचानक इस्लाम पे ख़तरे के नामपे आरएसएस जैसी फासिस्ट, देशविरोधी तंज़ीम से झूठी लड़ाई लड़ने का दिखावा करते हुए अंदरूनी समझौते के तहत उसे फ़ायदा पहंुचाने के लिए हम आम मुसलमानों का इस्तेमाल क्यों कर रहे हैं? अबतक कहां थे ये सब?
एक ताज़ा खबर के मुताबिक़ दिल्ली की ख़ाली होने जा रही एक राज्यसभा सीट के लिए ’’जीमयतुल उलेमा हिंद’’ अपना दावा पेश करने का मुतालबा करने जा रही है. बेशक जम्हुरियत में सभी मज़हबी अक़ायद का सम्मान और प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होना चाहिए मगर किस बिना पर? ये तंज़ीम और इसके कारकुन  ख़ुदको हिंदोस्तान की बड़ी मज़हबी जमात का दावा कर रहे हैं-? आज अटाली के 150 मुसलमान परिवार आरएसएस के गुंडों की दबंगई से बेगुनाह होते हुए भी अपने घरों से बेघर कर दिए गए बल्लभगढ़ में अपने रिश्तेदारों के यहां पनाह लिए हुए हैं क्या इनमें से किसी ने उनसे मुलाकात की ज़हमत उठाई? कोई गया इनसे पूछने कि वे अफ़तार और सहरी का इंतेजाम कैसे कर रहे हैं? उनके बच्चे और उनके तन पे मैले चिकट कपड़े कैसे बदले जाएंगे जबकि उनका सबकुछ पुलिस की मौजूदगी में जला दिया, लूट लिया गया है, पहले वे  कई हफते थाने के अहाते में रहे, जैसे तैसे अपने घर पहंुचे तो उन पर पाबंदियां लगा दी गई कोई दुकानदार उन्हें सामान नहीं देता, न कोई दूध या अनाज देता. फिर भी वे खामोशाी से चुपचाप रह रहे थे तब भी उनपे हथियारों से लैस आरएसएस के मुख़्तलिफ़ संगठनों की भीड़ ने दोबारा जानलेवा हमला किया जैसे तैसे पुलिस ने उन्हें गांव के बाहर किया आज वे किस हाल में हैं ये पूछने किसी जमात या बोर्ड जैसी तंज़ीमों के कारकुन को फुरसत नहीं है. आरएसएस जिनकी गोद में ये सारे मज़हबी ठेकेदार आज दुबक चुके हैं जो बचे हैं वे जगह तलाश रहे हैं ये राज्य/केंद्र सरकार से उन आरोपी गंुडों की गिरफतारी की मांग क्यों नहीं कर रहे हैं ताकि अपराधियों में क़ानून का डर बैठे और बेचारे गरीब मुसलमान रमज़ान की आखि़री इबादत अपने घरों में इंसानी, नागरिक की तरह सुकुन से ईद मनाने की तैयारी करें. मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के वो रहमानी जो मुल्क भर की मस्जिदों इमामों और उनकी तंजीमों को सूर्य नमस्कार के खिलाफ लोगों को भड़काने की चिट्ठी लिख सकते हैं तो अपने चहेते प्रधानमंत्री, गृहमं़त्री, सीएम को चिटठी लिखकर क्यों नहीं ललकार रहे कि 24 घंटों के अंदर अटाली के नामजद अपराधियों की गिरफतारी नहीं हुई तो वे दिल्ली की सड़कें जाम करेंगे.? जीमयते उलेमाए हिंद क्यों नहीं ललकार रही राज्य और केंद्र सरकार को कि यूपी में मुसलमानों के नागरिक हकों को छीनना बंद करें वर्ना वे बेमुददत भूख हड़ताल करेंगे (माहे रहमजान भी है जंतर मंतर पे आएं टेंट लगाएं बैठे यहीं अफतार सहरी करें और नमाजें अदा करें)? दिल्ली में जहां इन सभी तंज़ीमों के एसी पू्रफ़ दफतर मौजूद हैं में खजूरी खास के ( 90फीसदी मुस्लिम आबादी) राजीव पार्क में जहां बरसों से ईद और बकरीद की नमाजें होती रही हैं इस बार 17,18,19 जुलाई को आरएसएस की 40 यूनिट की शाखायें लगेंगी और इसी दौरान महापंचायत का आयोजन किया जाएगा’’ जैसी घोषणा की जा चुकी है (सेक्युलर संगठन और लेफ्ट पार्टी का प्रतिनिधि मंडल स्थानीय पुलिस प्रशासन से इसे रोकने की गुहार लगा चुका है.) मुसलमानों की सबसे बड़ी मज़हबी तंज़ीम होने का दावा करने वाली जीमयत उलेमा हिंद इसे रोकने के लिए दिल्ली, केंद्र सरकार को संविधान पर अमल करने को मजबूर क्यों नहीं कर रही? मूप.बोर्ड तो बतौर नागरिक सड़कों पे उतरने का ऐलान  कर सकती है? आज दिल्ली के ही खजुरी खास, त्रिलोकपुरी, मदनपुरखादर, ओखला, सीलमपुर जाफराबाद, बवाना जैसे आधा सैकड़ा इलाके के मुसलमान दहशत में हैं कि शबेकद्र और ईद अमनो सकून से गुजर जाए. दिल्ली से सिर्फ 20 किलोमीटर की दूरी पे अटाली गांव से संघी जाटों ने मुसलमान आबादी को खदेड़ कर बाहर भगा दिया गया है. वे अपने गांव, घर वापिस लौटना चाहते हैं मगर उनकी हिफ़ाज़त की जिम्मेदारी/गारंटी सरकार, पुलिस प्रशासन लेने को तैयार नहीं है. ऐसे में सबसे बड़े होने और मुसलमानों के दमपर संसद में पहुंचने का दावा पाले ये तंज़ीमें सीना तान के अपने चहेते आरएसएस से बात क्यों नहीं कर रही हैं? क्यों नहीं उन सभी 150 परिवारों को अपनी जिम्मेदारी पे उनके गांव घर में पहुंचा रही? क्यों नहीं केंद्र और हरियाणा सरकार पे संविधान पर अमल करने की ताईद कर रही हैं ? उन्हें ये क्यों नहीं बता रही है कि संविधान को न मानने वाला देशद्रोही होता है? अफ़सोस.......ये ऐसा कुछ भी नहीं करेंगे. ये इस्लाम के नाम पे खाने और सिर्फ बातें बनाने वाले लोग हैं अमल करने वाले नहीं. इन्होंने अपने ज़ाती, सियासी मफ़ाद की ख़ातिर आरएसएस के सामने घुटने टेक दिए हैं.
लेकिन मुल्क में अमन और इंसाफ़ का परचम लहराने के लिए, संविधान के मुताबिक राज्य केंद्र सरकारों को चलने पे मजबूर करने के लिए और अपने नागरिक हक़ लेने के लिए हमें ही पहलक़दमी करनी होगी. उठ खड़ा होना होगा-उनके सबके साथ, जो हमारे नागरिक और मज़हबी हक़ों पे हमला होने पर हमारे साथ खड़े होते रहे हैं अपनी मेहनत, अपने माल और कई बार अपनी इज्जत और जान पर खेल कर भी.
याद कीजिए बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद इसकी मुख़ालफ़त में उठने वाली पहली आवाजें मुसलमानों की नहीं अमनो इंसाफ़पसंद, सेक्यूलर हिंदुओं की रही है. जब गुजरात हुआ तब से अब तक मुतास्सरीन मुसलमानों के पुरसे से लेकर हर तरह की मदद करते हुए, कत्लेआम के जिम्मेदार अपराधियों को अदालत तक घसीटने वाले सामाजिक कार्यकर्ता वकील, छात्र नौजवान ज्यादातर हिंदु ही रहे हैं. एडवोकेट मुकुल सिंहा, आईपीएस संजीव भटट, शबनम हाशमी, गौहर रज़ा, तीस्ता सीतलवाड़ हर्षमंदर, प्रो.त्रिपाठी,रेबेका जान, वृंदा ग्रोवर,  जैसे सैंकड़ों लोग आज भी पर्दे के पीछे लगे हुए हैं मजलूम मुसलमानों को इंसाफ दिलाने के लिए.हाशिमपुरा,मुजफफरनगर,शामली,गोपालगढ,धुले,मालेगांव,नांदेड,जलगांव,त्रिलोकपुरी,अटाली, अब टीकरी. इसाइयों पे उनकी इबादतगाहों पे होने वाले सभी छोटे बड़े हमलों के खिलाफ़ यही लोग इनकी तंज़ीमें हमेशा पेश पेश रही हैं बग़ैर किसी ख़ौफ़ के, बिना किसी लालच या दबाव के.
हम सभी आम मुसलमानों को अब एक जागरूक शहरी और देश के जिम्मेदार नागरिक की भूमिका में आना ही होगा. ज़ुल्म कहीं भी हो किसी पे भी हो हमें उसके खि़लाफ़ उठने वाली आवाज़ों में अपनी आवाज़ मिलानी ही होगी. गूज़रे 67 बरसों में ऐसा न करके हमने ख़ुद को और अपनी आने वाली पीढि़यों को हाशिए में धकेल लिया है. जब दलितों की बेटियों के सरेआम कपड़ें उतार पिटाई की जाती रही हम ख़मोश रहे क्योंकि हम दलित नहीं थे. जब आदिवासीयों को नक्सली कहकर सरकार और उसकी पुलिस एनकाउंटर करती रही हम ख़मोश रहे क्योंकि हम आदिवासी नहीं थे. जब मज़दूरों, किसानों पे मालिकों और सरकारों की पुलिस लाठी और गोलियों की बारिश करती रही हम ख़ामोश रहे क्योंकि उन मज़दूरों से हम अपना कोई नाता नहीं समझते थे. हमारे मोहल्ले, पड़ौस में, आपसी झगड़ों में, रास्तों में, काम की जगह पे, बसों में ट्रेनों में कहीं भी हम मज़लुम पक्ष के साथ खड़े नहीं हुए शायद किसी मसलेहत के तहत हम ख़ामोशी लगाते गए और ऐसा करते हुए हम ख़ुद को ही हाशिए पे ले जाते रहे-और आज हमारा पड़ौसी बच्चा जिसे हमने अपने बच्चे की तरह प्यार की छांव में बड़ा किया वही हमर्पे इंटपत्थर, तलवार, फरसे, लाठी और तमंचे से वार करता है हमें मां बहन कहकर बड़ा हुआ नौजवान ही सरेआम हमारे दुपटटे खींचता है हम बेबस मज़लूमों की तरह अपने ही मुल्क में शरणार्थी की जिंदगी जीने को मजबूर कर दिए गए और इसमें सबसे बड़ा हाथ हमारी मज़हबी तंज़ीमों उनके कारकूनों हमारे मज़हबी और सियासी लीडरों का रहा है कि जिन्होंने हमें हर जगह ज़लीलो ख़्वार किया है. अपने घटिया मफ़ाद की खातिर हमें ज़ालिमों के बाड़ों में तन्हा छोड़ दिया. आवाज़ उठाने पे मज़हब विरोधी होने के फ़तवों का डर हमारे अंदर बिठा दिया. हमें अपना बंधुआ मजदूर बना लिया और ख़ुद उन ख़ूनी ताक़तों सियासी लीडरों के साथ शामें रंगीन करते रहे, दावतें उड़ाते रहे, अपने बच्चों और रिश्तेदारों के लिए हर सुविधा बुक करते रहे, सिर्फ हमारे नाम पर, हमारे जबान न खुलने देने, विरोध न होने देने की जमानत देकर...!
अभी भी वक़्त है हम संभल जाएं और आंख, कान खोलकर देखने सुनने लगे और कोई भी फैसला करने, उसपे चलने से पहले अपनी आगामी पीढ़ी, क़ौम, मिल्लत और मुल्क का फ़ायदा सोचें.. तब हम धीरे धीरे ’’इनकी’’ बंधुआ मज़दूरी से आज़ाद हो सकते हैं वर्ना किताबे हिदाया और ख़त्मेरसुल(सअव) के बाद भी अगर हम जाहिल रहे तो ख़ुदा का क़ुरआन में खुला वादा है हमारे ज़लीलोख़्वार होने में वो हमारी मदद को नहीं आएगा........!
-जुलैख़ा जबीं

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

आपातकाल कुछ दिलचस्प पहलू

अटल बिहारी बाजपेई की दुर्गा
ब्रिटेन के चार बार प्रधानमंत्री रहे विलियम ग्लेड्सटन ;1809.1898 से पूछा गया कि देश के विभिन्न राजनीतिज्ञों से उनके कैसे संबंध हैं? इस पर उन्होंने जवाब दिया कि राजनीतिज्ञों से संबंध, स्वयं एवं अपनी पार्टी के हितों को ध्यान में रखकर बनाये जाते हैं।
लगभग यही बात हमारे देश पर भी लागू होती है। आपातकाल के संदर्भ में यदि राजनीतिज्ञों के पारस्परिक संबंधों का विश्लेषण किया जाए तो एक अजीबोगरीब चित्र उपस्थित होता है।
जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में अनेक नवयुवकों ने आपातकाल का विरोध किया था और जेल की यंत्रणा भी भोगी थी। इनमें लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव आदि शामिल हैं। इनमें लालू प्रसाद यादव तो कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं और अब ऐसे लक्षण स्पष्ट नजर आ रहे हैं कि बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव की जोड़ी, कांग्रेस से हाथ मिलाकर विधानसभा चुनाव लड़ेगी।
आपातकाल के दौरान एक लोकप्रिय नारा था 'संजय, विद्या, बंसीलाल- आपातकाल के तीन दलाल'। इनमें से विद्याचरण शुक्ल ने भारतीय जनता पार्टी के टिकिट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा था। संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी, जो आपातकाल की प्रबल समर्थक रहीं, वे बरसों पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो चुकी हैं और भाजपा की टिकिट पर चुनाव लड़ती हैं। वे वर्तमान में मंत्री भी हैं। यह इस तथ्य के बावजूद कि वे आपातकाल की प्रबल समर्थक थीं और शायद आज भी हैं ;उन्होंने पिछले वर्षों में कभी भी आपातकाल के विरोध में कुछ नहीं कहा। विद्याचरण तो आपातकाल में सूचना एवं प्रसारण मंत्री थे। उनका काम ही था आपातकाल को सही ठहराना। वे एक शक्तिशाली मंत्री थे और इंदिरा गांधी के काफी नजदीक थे। आपातकाल की ज्यादतियों की जांच करने के लिए जो आयोग बना था उसके समक्ष अपना बयान देते हुए उन्होंने आपातकाल में हुई अनेक ज्यादतियों की जिम्मेदारी खुद पर ली थी। बाद में राजीव गांधी से मतभेदों के कारण उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और विश्वनाथ प्रताप सिंह का दामन थामा। इस दरम्यान भी उन्होंने कभी आपातकाल की निंदा नहीं की। इस तथ्य के बावजूद भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें लोकसभा के छत्तीसगढ़ के एक संसदीय क्षेत्र से टिकिट दिया थाए यद्यपि वे चुनाव जीत नहीं पाए।
इसी तरहए बंसीलाल आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के सर्वाधिक नजदीकी राजनेता समझे जाते थे। बाद में उन्होंने भी कांग्रेस छोड़ दी और एक दौर ऐसा भी आया जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर हरियाणा में सरकार बनाई। बंसीलाल ने भी शायद कभी भी आपातकाल की निंदा नहीं की।
इस तरह आपातकाल का विरोध करने वालेए कांग्रेस . जिसने आपातकाल लागू किया था के साथ हो लिए और जिन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था, वे आपातकाल के सर्वाधिक तीखे विरोधी राजनीतिक दल भाजपा के साथ चले गए। इससे ही ग्लेड्सटन का वह कथन सही साबित होता है कि राजनैतिक नेता अपना नजरियाए सिद्धांतों और आदर्शों के आधार पर नहीं बल्कि अपने संकुचित हितों से तय करते हैं।
आपातकाल के बाद जो चुनाव हुए उनमें इंदिरा जी और कांग्रेस की हार हुई। उसके बाद मोरारजी भाई के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनी। इस सरकार का क्या हश्र हुआ, यह किसी से छुपा नहीं है। तीन साल से भी कम समय में इंदिरा.विरोधी सरकार का पतन हो गया। पतन दो कारणों से हुआ। आज की भारतीय जनता पार्टी, उस समय जनसंघ के नाम से जानी जाती थी। आपातकाल में हुए चुनावों के बाद सभी पार्टियों ने मिलकर एक दल बनाया और अपनी.अपनी पुरानी पार्टियों को भंग कर दिया। जनसंघ ने भी ऐसा ही किया परंतु जनसंघ के बहुसंख्यक सदस्य राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे इसलिए मधु लिमये और अन्य समाजवादियों ने मांग की कि जनसंघ के ऐसे सदस्य, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हुए हैंए  संघ से अपना नाता तोड़ें। परंतु यह बात जनसंघ के नेतृत्व को मंजूर नहीं थी। इस मतभेद के कारण जो मिलीजुली पार्टी थी वह समाप्त हो गई।
उस समय की मंत्रिपरिषद के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण सदस्य चौधरी चरणसिंह थे। चरणसिंह की जिद के कारण ही इंदिरा जी को गिरफ्तार किया गया था। उस समय कुछ लोगों का यह मत था कि इंदिरा जी को गिरफ्तार नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि ऐसा करके उन्हें जिंदा शहीद बना दिया जायेगा जिसका वे पूरा लाभ उठाने की कोशिश करेंगी। परंतु चरणसिंह की जिद के कारण इंदिरा जी की गिरफ्तारी हुई। उन्हीं चरणसिंह ने सबसे पहले जनता पार्टी से अपना नाता तोड़ा और कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बन गए। थोड़े समय के बाद कांग्रेस ने चरणसिंह से अपना समर्थन वापिस ले लिया। यह भी दिल्ली में पहली बार बनी गैर.कांग्रेसी सरकार के पतन का एक प्रमुख कारण था।
इस प्रकार जिन लोगों ने इंदिरा जी को तानाशाह कहा, जिन्होंने उन्हें प्रजातंत्र.विरोधी कहा, वे स्वयं देश को एक स्थायी सरकार नहीं दे सके। सन् 1980 के चुनाव में इंदिरा जी पूरे दमखम से जीतकर आईं और प्रधानमंत्री बनी। इस घटनाक्रम से आम लोगों को काफी निराशा हुई। यदि गैर.कांग्रेसी सरकार, देश को एक स्थायी और जनहितैषी शासन दे पाती तो शायद देश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव आता। परंतु ऐसा नहीं हो पाया।
जहां तक आपातकाल लगाने का सवाल है, इसमें कोई शक नहीं कि इसका मुख्य उद्देश्य इंदिरा जी का प्रधानमंत्री पद बचाना था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश ने इंदिरा जी के चुनाव को अवैध घोषित कर दियाए जिसके कारण उनका इस्तीफा देना जरूरी हो गया था। उनके चुनाव को प्रसिद्ध समाजवादी नेता राजनारायण ने चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति जगमोहन सिन्हा ने उनके विरूद्ध लगाए गए 14 आरोपों में से दो सही पाए। जो आरोप सही पाए गए उनमें से पहला था सरकारी खर्च से भाषण के लिए मंच बनवाना और दूसरा यह कि इंदिरा जी के चुनाव एजेंट यशपाल कपूर सरकारी नौकरी में थे। हाईकोर्ट ने उन्हें 20 दिन का समय सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने के लिए दिया। इस दरम्यान उन्होंने अपील की और सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के निर्णय को पलट दिया। इस तरह इंदिरा जी प्रधानमंत्री के पद पर कायम रहीं। इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 को देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की थी। उस समय आपातकाल का विरोध करने वालों की पहली पंक्ति में जो लोग शामिल थे, वे आज कांग्रेस के साथ हैं और जिन्होंने आपातकाल का समर्थन किया था, उनमें से कई भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुए हैं, जिसके तत्कालीन अवतार जनसंघ ने पूरे दमखम से आपातकाल का अफवाहबाजी फैला कर  विरोध किया था।
 प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रामचंद्र गुहा, अपनी किताब 'इंडिया ऑफ्टर गांधी' में लिखते हैं कि आपातकाल लगाने की जिम्मेदारी इंदिरा जी के साथ जयप्रकाश नारायण की भी थी। दोनों ने प्रजातांत्रिक संस्थाओें में अपनी आस्था नहीं दिखाई। हाईकोर्ट के फैसले के एकदम बाद इंदिरा जी का इस्तीफा मांगना उचित नहीं था' वहीं उनका इस्तीफा मांगने के कारण इंदिरा जी द्वारा जनप्रतिनिधियों को गिरफ्तार कर जेल में डालना भी उचित नहीं था।
-एल.एस. हरदेनिया

रविवार, 28 जून 2015

अमरीका, लोकतंत्र, आतंकवाद व धार्मिक अतिवाद


  बहुत से पाठकों को यह शीर्षक ही बड़ा अटपटा लगेगा लेकिन यह इस निबन्ध की एक पड़ताल का विश्लेषण करने का प्रयास है। जो अमरीका के आतंकवाद, लोकतंत्र व धार्मिक अतिवाद के गठजोड़ पर आधारित है। वर्षों के बड़े प्रोपेगंडा के कारण बहुत से लोग यह मानने लगे हैं कि अमरीका संसार में लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी व प्रोत्साहक है और संसार में हर दशा में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना चाहता है धार्मिक अतिवाद व आतंकवाद के विरोध में लड़ी जा रही लड़ाई का पड़ताल करें और यह भी देखने का प्रयास करें कि भारत में उसकी क्या भूमिका रही है।
    वर्षों की अंदेखी, उदासीनता व हाशिए पर रहने के बाद दक्षिण एशिया का क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय पटल पर तेजी के साथ उभरा है। इस क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान, बंग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल व मालदीप आते हैं। तेल के बड़े भण्डारों व सामरिक महत्व के कारण खाड़ी के देश अधिक महत्वपूर्ण माने जाते रहे। तत्पश्चात अमरीका, योरोपीय यूनियन, चीन व जापान जैसे महत्वपूर्ण देशों ने दक्षिण एशिया की ओर देखना शुरू किया और 9/11 की घटना के बाद तो अमरीका का ध्यान पूरे तौर पर इस ओर हुआ। ‘‘आतंकवाद’’ से अमरीका ने सहयोगी देशों की सहायता से इस पूरे क्षेत्र को शक्ति संरचना कर अपने काबू में करना शुरू किया और पाकिस्तान व अफगानिस्तान में यह काफी हद तक सफल भी रहा। साथ ही उसने भारत के अपने रिश्तों को भी मजबूत करने का पूरा प्रयास किया जिससे कि चीन के प्रभाव को भी रोका जा सके।
    चोम्सकी, जो वर्तमान संसार में सबसे सम्मानित बुद्धिजीवी माने जाते हैं, 2013 के अपने लेख में कहते हैं कि अमरीका विश्व की सबसे बड़ी आतंकी शक्ति का संचालन कर रहा है। चोम्सकी अमरीकी नागरिक हैं तथा प्रख्यात एम0आई0टी0 मेसोच्यूसेट इंस्टीटयूट आॅफ टेक्नोलाॅजी में वर्षों से प्रोफेसर रहे हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अमरीकी व्यवस्था हमेशा कुछ विरोधी व भिन्न मतावलंबितयों को भी बरदाश्त करती रही है जिससे कि संसार को दिखाया जा सके कि अमरीका में असहमति को कितना सम्मान दिया जाता है। इससे मुझे अपने अमरीकी प्रवास में 2006-07 की एक घटना याद आती है हाऊज (अमरीकी राष्ट्रपति का कार्यालय/ आवास) के सामने टेंट लगाये थे या प्लेकार्ड लिए बैठे थे। सबसे अगली कतार में एक अमरीकी महिला एक बड़ा सा पोस्टर लिए बैठी जिस को उस समय मेकअप में दिखाया था और बड़े-बड़े अक्षरों में उसके नीचे लिखा था ‘‘विश्व का सबसे बड़ा आतंकवादी’’। अमरीकी स्वार्थो पर हमला नहीं करती। चोक्सी व हरमेन का यह भी मानना है कि तीसरी दुनिया में जो भी क्षेत्र अमरीका के प्रभाव में हैं वहाँ वहाँ आतंक का जमावड़ा है। इन विद्वानों ने दस्तावेजों के साथ यह दिखाया है कि किस प्रकार लातेनी अमरीका के गरीब देशों में कठपुतली शासक अमरीका के समर्थन से आतंक के द्वारा अवामी इच्छाओं का दमन करते रहे हैं। वह यह निष्कर्ष निकालते हैं कि आज भूमंडलीय स्तर पर जितना भी आतंकवाद है। अमरीकी विदेशी नीति का परिणाम है। मेकार्ड व स्टाई बर जैसे विशेषज्ञों का यह मानना है कि 9/11 घटना से पहले भी व बाद में भी अमरीका अल कायदा को धन व हथियारों से सीरिया, लीबिया, बोसनिया, चेचेनिया, इरान जैसे अनेकों देशों में अपनी कार्यवाही के लिए सहायता देता रहा हैं ध्यान देने की बात यह है कि ये सभी देश अमरीका के समर्थक नहीं रहे हैं। कहा जाता है कि विश्व में 74 प्रतिशत देशों में जहाँ आतंकी तरीकों को प्रशासनिक सहमति हासिल है, अमरीका की कठपुतली सरकारें हैं। क्या यह मजाक नहीं लगता कि जो महाशक्ति दुनिया में सुबह से शाम तक शांति की बात करती हो, गले-गले तक आतंकी गतिविधियों में लिप्त रहती है।
    अमरीका के द्वारा लोकतंत्र व लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रोत्साहन देने के दावों की कलई कई बार खुल चुकी है। एक बार फिर इस की पड़ताल कर ली जाये। यदि हम दुनिया का नक्शा उठा कर देखें तो पाते हैं कि लातीनी अमरीका के देशों से लेकर,
मध्यपूर्व, दक्षिणी अफ्रीका तथा दक्षिणी एशिया के देशों तक अमरीका की सहायता से लोकतंात्रिक सरकारों का तख्ता पलट कर तानाशाही सत्ता को कभी सफलता पूर्वक और कभी असफल प्रयासों का सहारा लिया गया है। यहाँ पर कुछ विशिष्ट उदाहरणों के द्वारा इस बात को प्रमाणित किया जा रहा है।
    अमरीका का हमेशा कहना रहा है कि वह लोकतांत्रिक तरीकों से चुनी गई सरकारों को कभी नहीं हटाने का प्रयास करेगा चाहे वह कोई वामपंथी सरकार क्यों न हो। 1970 में दक्षिणी अमरीका के देश चिली में डाॅ. एलेन्डे की वामपंथी सरकार अंतर्राष्ट्रीय पर्यवेक्षण में होने वाले चुनाव के द्वारा बनाई गई लेकिन उस को बहुत दिन चलने नहीं दिया गया और सी आईए के द्वारा उस का तख्ता पलट कर फौजी शासन स्थापित कर दिया गया जिस ने इस के विरोध में होने वाले जन आन्दोलन को कुचल दिया। ऐसा ही कुछ निकारागुआ में भी किया गया। 1984 में पारदर्शी चुनाव के द्वारा वहाँ पर एक प्रगतिशील वामपंथ की ओर झुकाव वाली सरकार का गठन किया गया लेकिन अमरीका को निकारागुआ की क्यूबा व सोवियत यूनियन से दोस्ती अच्छी नहीं लगी। अमरीका को इस बात का डर भी खाये जा रहा था कि कहीं निकारागुआ का उदाहरण दूसरे शोषित लातीनी अमरीका के देशों को वामपंथ की ओर न मोड़ दे। अमरीका ने निकारागुआ के लिए ऐसे हालात पैदा कर दिए कि उसे अपना ध्यान व संसाधन अपनी सुरक्षा में लगाना पड़ गया और इस प्रकार आर्थिक संकटों से जूझती हुई सरकार को गिरा दिया गया। क्यूबा पर तो लगातार अमरीकी प्रयास जारी रहा। फोडेल कास्त्रो को मारने का कई बार प्रयास भी किया गया। लेकिन क्यूबा की वामपंथी सरकार को गिराया नहीं जा सका।
    यह सूची इतनी लम्बी है कि दर्जनों पन्ने सियाह हो जाएँगे इस लिए निम्न संक्षिप्त सारणी के द्वारा यह बात आगे बढ़ाई जा रही है  जिस से पाठकों को यह अन्दाजा भली भाँति हो जाएगा कि विश्व के अनेक क्षेत्रों में लोकतंत्र का गला घोंट कर तानाशाहों को किस प्रकार मजबूत किया गया और उनकी सत्ता को कैसे जायज़ ठहराया गया
1    लातीनी अमरीका:
    पिनोशेट (चिली), नोरेगा (पनामा),
    डुवेलियर (हैती), बेनजे़र (बोलेविया)
2    ऐशिया:
    ओमान, कतर, बहरैन के शेख
    सऊदी अरब के बादशाह
    सुहारतों (इण्डोनेशिया)
    जि़याउलहक़ व मुशर्रफ़ (पाकिस्तान)
    बादशाह रज़ाशाह पहेलवीं (ईरान)
3    अफ्रीका:
    बादशाह हसन (मोराक्को)
    गफ्फार नुमैरी (सुडान)
    होसनी मुबारक (मिश्र)
    द0 अफ्रीका के नस्लवादी शासक
4    योरोप:
    फ्रानको (स्पेन)
    सालाज़ार (पुर्तगाल)    

    तुर्की व यूनान की फ़ौजी सत्ता इन तथा इन जैसे अनेक दूसरे उदाहरणों से यह प्रमाणित हो जाता है कि अमरीकी लोकतंत्र का मुखौटा कितना महीन है और लोकतंत्र को आगे बढ़ाने के इस के दावे कितने खोखले हैं वरना फौजी शासकों, बादशाहों तथा नस्लवादी शासकों को सभी प्रकार के समर्थन देकर उन की सत्ता को बचाना क्या अर्थ रख सकता है। जाहिर है अपने आर्थिक, राजनैतिक व सामरिक हितों के सामने लोकतंत्र की कोई कीमत नहीं है। सऊदी अरब व ईरान के निर्मम व जालिम बादशाहों को वर्षों तक अमरीका ने बचाया क्योंकि वे उस की कठपुतली थे। ईरान के अवाम ने बादशाह के विरोध में बगावत किया, कुरबानी दी और उसे खदेड़ दिया। यह अलग बात है कि ईरान में चुनाव वो करवाती है लेकिन लोकतंत्र पर लगाम है। सऊदी अरब में बादशाहत अब भी बनी हुई है, अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है, महिलाओं की हालत बहुत खराब है तथा धार्मिक कट्टरता ने अवाम, विशेष कर अल्पसंख्यकों को पैरों के नीचे दबा रखा है लेकिन अमरीका के आर्थिक व सामरिक हित सर्वाेपरि हैं।
    अजीब विडंबना है कि संसार भर में आतंकवादी गतिविधियों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में अमरीका का हाथ देखा जा सकता है और इस्लाम के नाम पर होने वाली आतंकी गतिविधियों में तो सीधे अमरीका की भूमिका देखी जा सकती है। चूँकि अमरीका के आर्थिक व सामरिक हितों को सब से अधिक खतरा इस्लामी चरमपंथियों से था इस लिए उस ने विश्व मीडिया शक्ति को इस्लामी आतंकवाद का डर दिखाने को लगा दिया। बहुतों को इस बात पर विश्वास भी हो गया कि मुस्लिम आतंकवाद विश्व शांति के लिए सब से बड़ा खतरा है। जब हकीकत यह है कि मुस्लिम आतंकवाद विश्व आतंकवाद का केवल एक छोटा सा अंशमात्र है। अमरीका के सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री प्रोफेसर चाल्र्स कुर्ज़मैन ने अपने अध्ययन ष्ज्ीम उपेेपदह डंतजलते रू ॅील जीमतम ंतम ेव मिू उनेसपउ ज्मततवतपेजेघ्ष् के द्वारा यह स्थापित किया है कि मुस्लिम आतंकवाद को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया। उन्होंने यह सवाल भी किया कि हमने इस बात पर क्यों विश्वास किया कि उनकी संख्या बहुत बड़ी है और हम इतना क्यों डरे हुए थे। पिछले पाँच वर्षों की घटनाओं ने प्रोफेसर कुर्जमैन की बात को सही साबित कर दिया। आज पूरे योरोप व अमरीका में प्ेसंउवचीवइपं अर्थात इस्लाम का डर जीवन की एक हकीकत बन चुका है और समाज के दिन प्रतिदिन जीवन में देखा जा सकता है।
    तथाकथित मुस्लिम या इस्लामी आतंकवाद की ताकत व फैलाव चाहे जितना हो लेकिन आज यह स्थापित हो चुका है कि इसके पीछे काफी हद तक इस्लाम की वह चरमपंथी व्याख्या है जो साम्राजी के नाम से जानी जाती है और जिसका प्रमुख स्रोत सऊदी अरब है जो साम्राजी विचारधारा को ही सच्चा इस्लाम मान कर उसके प्रचार व प्रसार पर अरबों डालर खर्च करता रहा है। अब इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि पाकिस्तान व अफगानिस्तान के तालिबान से लेकर नाइजीरिया के अलशबाब व बोकोहरम व इराक-सीरिया के इस्लामिक स्टेट (आई0एस0) तक सभी विचारधारा से प्रोत्साहित होते हैं। योरोप व अमरीका सहित समूचे विश्व में सऊदी पेट्रोडालर की सहायता से मस्जिदों व मदरसों पर कब्जा किया जा रहा है और वहीं से साम्राजी विचारधारा को ही सही इस्लाम के रूप में प्रसारित व प्रचारित किया जा रहा है। कैसा मज़ाक है, कि वह अमरीका जो सुबह से शाम तक इस्लामी आतंकवाद की रट लगाए रहता है, मुस्लिम संसार में अपने को ही गले से लगाये हुए हैं। बादशाहत, धार्मिक अतिवाद व पूँजीवाद के इस अजीबों गरीब मिश्रण को अमरीका ही
साध सकता है। संतोष की बात यह है कि अपने सभी प्रयासों के बावजूद समूचे विश्व की आबादी का एक छोटा सा हिस्सा ही इस विचारधारा के प्रभाव में है लेकिन जिस तेजी के साथ यह फैल रहा है शांति के लिए बड़ा खतरा बन सकता हैं।
        यह हम कैसे भूल जाएँ कि अफगानिस्तान में सोवियत रूस के विरोध में अमरीका ने ही तालीबान को प्रोत्साहन व समर्थन दिया था और पाकिस्तान के फौजी शासकों के द्वारा उन के मदरसों को बढ़ावा मिला था। भारत में हिन्दुत्व व चरमपंथी हिन्दु शक्तियों के पीछे भी अप्रत्यक्ष रूप से अमरीका को देखा जा सकता है। भारत के मजदूर-किसान-दलित-आदिवासी की एकता आदि को तोड़ने के लिए जिस प्रकार से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा उस के अनुषंगी संगठन लगे हुए हैं उसे कोई भी देख सकता है। स्वदेशी व भारतीयता का गला फाड़ फाड़ कर नारा लगाने वालों की जब केन्द्र में सत्ता स्थापित हुई तो कारपोरेट सेक्टर के हित ही देशहित हो गये और सांप्रदायिक तनाव के धुएँ में असली मुद्दों को छुपाने का प्रयास हो रहा है। पूँजीवादी फासीवाद हमारे देश में दस्तक दे रहा है। हमें इतिहास से सबक लेकर यह नहीं भूलना चाहिए कि फासीवाद लोकतांत्रिक चुनावों के कंधों पर चढ़ कर ही आता रहा है। हिटलर व मुसोलनी इस के उदाहरण हैं। लोकतंत्रीकरण व लोकतंात्रिक मुकाबला कर सकती है। एक व्यक्ति ही सब कुछ कर देगा, यह सोच ही  फासीवाद व तानाशाही की ओर उठा पहला कदम है जिसके लिए हमें सचेत रहना है।        
 -प्रो0 नदीम हसनैन
        मोबाइल: 09721533337
 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

शुक्रवार, 26 जून 2015

महात्मा गांधी की हत्या सबसे पहली आतंकी वारदात

वरिष्ट पत्रकार सुभाश गताडे से आतंकवाद के मुद्दे पर की गई बातचीत के अंश
                                                                                                    -राजीव यादव
 देश में आतंकवादी घटनाओं की शुरुआत कहाँ से मानते हैं?

    अगर आजाद भारत की बात करें तो मेरी समझ से महात्मा गांधी की हत्या सबसे पहली आतंकी घटना है, और वहीं से कमसे कम भारत के सन्दर्भ में आतंकवाद की शुरूआत मानी जा सकती है। ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ भारत की अवाम के संघर्ष के नेता गांधी जिन्होंने साम्प्रदायिक राजनीति की निरन्तर मुखालिफत की एवं समावेशी राजनीति की हिमायत की, उनकी हत्या में नाथूराम गोड्से ने भले ही गोली चलाई हो, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उसके लिए लम्बी साजिश रची गई थी, जिसमें हिन्दुत्ववादी संगठनों का हाथ था। गांधी की हत्या को लेकर एक बात अक्सर भुला दी जाती है कि उन्हें मारने के लिए इसके पहले इन्हीं संगठनों की तरफ से कई कोशिशें हुई थीं, और इस आखरी कोशिश में वे कामयाब हुए।
     यह जो आतंकवाद है यह कितना देशी है और कितना वैश्विक है?
    मेरे खयाल से यह प्रश्न बहुत प्रासंगिक नहीं है। आतंकवाद के देशी रूप भी
हो सकते हैं और उसके वैश्विक रूप भी हो सकते हैं, मूल बात यह समझने की है कि आप उसे किस तरह परिभाषित करते हैं। यूँ तो आतंकवाद को कई ढंग से परिभाषित किया जा सकता है, राज्यसत्ता द्वारा निरपराधों पर किए जाने वाले जुल्म-अत्याचार को भी इसमें जोड़ा जाता है, मगर इसकी अधिक सर्वमान्य परिभाषा है जब राजनैतिक मकसद से कोई समूह, कोई गैर राज्यकारक अर्थात नानस्टेट एक्टर हिंसा या हिंसा के तथ्य fact of violence का इस्तेमाल करे और निरपराधों को निशाना बनाए। इसके तहत फिर हम साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित जैसे हिन्दुत्ववादी गिरोहों की हिंसक कार्रवाइयों को भी समेट सकते हैं या किसी जिहादी संगठन द्वारा निरपराधों को निशाना बना कर की गई कार्रवाई को भी देख सकते हैं या किसी जियनवादी गिरोह द्वारा फिलिस्तीनी बस्ती में मचाए कत्लेआम को भी देख सकते हैं या किसी ब्रेविक द्वारा अंजाम दिए गए मासूमों के कत्लेआम को भी समेट सकते हैं।
    मोदी के आने के बाद आतंकवाद की राजनीति और संस्थाबद्ध होगी या रुकेगी। रुक जाने का सन्दर्भ यह है कि क्या वह दूसरी राजनीति करेंगे?
    मोदी जो हिन्दुत्व की लहर पर सवार होकर प्रधानमंत्री बने हैं, उनके सत्तारोहण को हम बहुंसंख्यकवाद की राजनीति की जीत के तौर पर देख सकते हैं। यह भी स्पष्ट है कि आजादी के बाद पहली दफा हिन्दुत्व की ताकतों को अपने बलबूते सत्ता सँभालने का मौका मिला है, जिसे एक तरह से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र के एजेण्डे की बढ़ती स्वीकार्यता के तौर पर व्याख्यायित किया जा रहा है। आजादी के बाद यह पहली दफा हुआ है कि संसद में अल्पसंख्यक समुदायांे का न्यूनतम प्रतिनिधित्व है, यहाँ तक कि सत्ताधारी पार्टी के सांसदों में भारत के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय से एक भी  प्रतिनिधि नहीं है। अब इस समूची परिस्थिति में जाहिर है कि ऐसी ताकतें-जो हिन्दुत्ववादी संगठनों से ताल्लुक रखती थीं, उस विचार से प्रेरित थी, मगर साथ ही साथ आतंकी घटनाओं में मुब्तिला थीं-उनकी रणनीति में फर्क अवश्य आएगा। एक तो वह कोशिश करेंगी कि उनके जो तमाम कार्यकर्ता जेल में बन्द हैं, उन्हें रिहा करवाया जाए, उनके खिलाफ जारी केस को कमजोर किया जाए और फिर उन्हें नए अधिक वैध एवं स्वीकार्य रूपों में पेश किया जाए। दूसरी यह भी सम्भावना है कि चूंकि राज्यसत्ता में उनके विचारों के हिमायती बैठे हों, वह और अधिक आक्रामक हों, आतंकी घटनाओं को खुद अंजाम दें मगर उसका दोषारोपण अल्पसंख्यक समुदायों पर अधिक निर्भीकता से करें। आप चाहें नांदेड़ में संघ कार्यकर्ताओं द्वारा अंजाम दी गई आतंकी घटना (अप्रैल 2006) को देखें या मालेगांव की घटना (सितम्बर 2006 और सितम्बर 2008) को देखें हम बार-बार यही पाते हैं कि उनकी लगातार कोशिश रहती आई है कि खुद घटना को अंजाम दो, मगर उसे इस ढंग से डिजाइन करो कि अल्पसंख्यक पकड़ में आएँ। दूसरी तरफ इस्लामिक ताकतों का वह हिस्सा-जो आतंकी घटनाओं में मुब्तिला रहा है-वह नई बदली हुई परिस्थितियों में नए ध्रुवीकरण को अंजाम देने या मजबूती दिलाने के लिए कुछ आततायी कार्रवाइयों को अंजाम दे सकता है। हाल के समय में इस्लामिक स्टेट के नाम पर जो सरगर्मी बढ़ी है या अल कायदा की तरफ से भारत में अपना पैर जमाने की जो कोशिशें की जा रही
हैं, वह भी असर डालेंगी। कुल मिला कर आनेवाला समय ऐसे सभी लोगों, समूहों के लिए चुनौती भरा होगा जो हर किस्म के आतंकवाद-फिर चाहे राज्य आतंकवाद हो या गैर राज्यकारकों द्वारा अंजाम दिया जा रहा आतंकवाद हो (जिसका महत्वपूर्ण हिस्सा विशिष्ट धर्म से अपने आप को प्रेरित कहते हुए हिंसा को अंजाम देना होता है)-की मुखालिफत करते हैं और एक आपसी सद्भावपूर्ण समाज की रचना चाहते हैं।
    क्या कानूनों के सेलेक्टिव प्रयोग से इससे शिकार लोगों में राज्य के प्रति नफरत पैदा हो रही है?
    1950 में जब संविधान निर्माताओं ने देश की जनता को संविधान सौंपा तो यह संकल्प लिया गया था कि जाति, वर्ग, धर्म, नस्ल, जेण्डर आदि आधारों पर अब किसी के साथ भेदभाव नहीं होगा, कानून के सामने सभी समान होंगे। आजादी के साठ साल से अधिक वक्त गुजर जाने के बाद हम इन संकल्पों एवं वास्तविकता के बीच गहरे अन्तराल से रूबरू हैं, जब हम पाते हैं कि दमित, शोषित, उत्पीडि़त समुदायों एवं लोगों पर महज इसी वजह से कहर बरपा हो रहा है कि वह संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों की बहाली के लिए प्रयासरत है और ऐसे लोग, तबके जो सत्ता एवं सम्पत्ति के इदारों पर कुंडली मार कर बैठे हैं, उनके प्रति राज्यसत्ता का रुख नरम है। जाहिर है कि इस दोहरे व्यवहार से जनता के व्यापक हिस्से में राज्य के प्रति गुस्सा बढ़ रहा है।
    आतंकवाद की राजनीति के आर्थिक आधार क्या हैं? क्या यह वैश्विक आर्थिक मंदी से जुड़ा हुआ है?
    आतंकवाद को महज आर्थिक मंदी से जोड़ना नाकाफी होगा, वह इस वजह से भी इन दिनों बलवती जान पड़ता है क्योंकि परिवर्तनकामी ताकतें एवं आन्दोलन कमजोर पड़ रहे है। अस्सी के दशक के उत्तरार्द्ध में सोवियत संघ के बिखराव की शुरूआत एवं अन्ततः उसके विघटन ने समाजवाद के विचार एवं प्रयोग को जो जबरदस्त क्षति पहुँचाई है और पूँजीवाद की अंतिम जीत को प्रचारित किया है, उसने भी दुनिया में तरह-तरह के नस्लवादी आन्दोलनों, आतंकी समूहों के फलने फूलने का रास्ता सुगम किया है। जरूरत इस बात की दिखती है कि जनता के हालात में आमूलचूल बदलाव चाहने वाली ताकतें नए सिरेसे संगठित हों, एक समतामूलक राजनीति को मजबूती प्रदान करें तो हम साथ ही साथ इन दिनों सर उठाए आतंकवाद को हाशिए पर जाता देख सकते हैं।
      सजा होने की सम्भावना आतंकवादी घटनाओं में बहुत कम है ऐसा लगता है कि न्यायिक प्रक्रिया बहुत धीरे चलाई जा रही है ताकि आरोपियों को अधिक समय तक जेल में रखा जा सके। इस पर आप क्या सोचते हैं?
    अगर राज्यसत्ता इच्छाशक्ति का परिचय दे तो आतंकवादी घटनाओं में भी मुकदमे तेजी से चलाए जा सकते हैं और दोषियों को दंडित किया जा सकता है। ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे मसलों पर राज्यसत्ता में बैठे लोग-या तो अपने एकांगी विचारों के चलते या ढुलमुल रवैयों के परिणाम स्वरूप सख्त रुख अपनाने से बचते हैं, जिसके चलते ऐसे मुकदमे सालों साल चलते हैं। अगर यौन अत्याचार के मसले को लेकर स्पीडी ट्रायल की बात की जा सकती है तो आतंकी घटनाआंे के मामले में भी हमें इसी किस्म की माँग करनी चाहिए, ताकि असली दोषी को सजा हो और मूलतः निरपराध जेल की यातना से बचें। आप अक्षरधाम आतंकी हमले को देखें जिसे लेकर बारह साल तक कइयों को जेल में सड़ना पड़ा और अन्ततः सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सभी बेदाग बरी हुए। अदालत का कहना था कि इन लोगों पर ‘आतंकवाद की धाराओं के तहत मुकदमा चलाने का निर्णय बिना दिमाग के लिया गया था। ध्यान रहे कि वर्तमान प्रधानमंत्राी उन दिनों गुजरात में गृह मंत्रालय का कार्यभार सँभाल रहे थे। अब अगर स्पीडी ट्रायल होता तो उनकी बेगुनाही जल्दी सामने आती और उन्हें तथा उनके परिवारजनों को इतना अधिक समय दुख में नहीं गुजारना पड़ता।
    खुफिया एजेंसियों की निष्पक्षता के बारे में बार-बार सवाल उठता रहा है, देश में आई.बी. और रॉ में अल्पसंख्यकों को जाने से रोका जा रहा है इसको कैसे देखा जाए। क्या इनको सही प्रतिनिधित्व मिल जाने से समस्याएँ हल हो जाएगी?
    देश की खुफिया एजेंसियों के कामों में निष्पक्षता को सुनिश्चित करना हो, उसमें अल्पसंख्यक समुदायों के आगमन को रोकने के मसले को सम्बोधित करना हो तो यह बहुत जरूरी है कि उसके कामों में पारदर्शिता लाई जाए और उन्हें जनता के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। कुछ समय पहले पश्चिमी एशियाई मामलों के जानकार एवं वर्तमान उपराष्ट्रपति डाॅ. हामिद अन्सारी ने रिसर्च एण्ड एनलिसिस विंग अर्थात ‘रॉ’ द्वारा आयोजित आर एन कॉव स्मृति व्याख्यान में इसी मसले को उठाया था। डाॅ. अन्सारी का
कहना था कि गुप्तचर एजंेसियों के संचालन में अधिक निगरानी एवम् जवाबदेही की आवश्यकता है। उनके मुताबिक यह जनतांत्रिक समाजांे का तकाजा होता है कि बेहतर शासन के लिए वह ऐसी प्रक्रियाओं को संस्थागत करें जिसके अन्तर्गत गुप्तचर एजेंसियों को संसद के सामने जवाबदेह बनाया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया था कि ‘‘राज्य के गुप्तचर और सुरक्षा ढाँचे’’ को लेकर अब तक सिर्फ कार्यपालिका और राजनैतिक देखरेख होती रही है, जिसमें इसके दुरुपयोग की सम्भावना बनी रहती है। इनमें जवाबदेही के अभाव की चर्चा के सन्दर्भ में उन्होंने कारगिल प्रसंग का जिक्र किया जिसमें गुप्तचर एजेंसियों की बड़ी नाकामी सामने आई थी। ध्यान रहे कि आधिकारिक तौर पर कारगिल पर पाकिस्तानी आक्रमण की खबर पहली दफा गुप्तचर एजेंसियों की तरफ से नहीं बल्कि उस इलाके मंे अपने मवेशी चराने के लिए ले जाने वाले गड़रियों से हुई थी। देश की सुरक्षा को जोखिम में डालने वाली इतनी बड़ी लापरवाही के बावजूद किसी भी गुप्तचर  अधिकारी को दण्डित नहीं किया गया था और विभिन्न एजेंसियों ने एक दूसरे पर दोषारोपण करके मामले की इतिश्री कर दी थी।
    हिंदुत्व से उपजे आतंकवाद की सच्चाई क्या है?
    जैसा कि मैं पहले ही चर्चा कर चुका हूँ कि आजाद भारत की पहली आतंकी कार्रवाई को हिन्दुत्ववादी आतंकी गोड्से एवं उसके गिरोह ने अंजाम दिया था यह धारा भले ही मद्धिम हुई हो, लेकिन दबी नहीं है। इस तथ्य से भी बहुत कम लोग वाकि़फ है कि बँटवारे के वक्त राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दो कार्यकर्ता बम बनाते वक्त कराँची के अपने मकान में मारे गए थे और ट्यूशन पढ़ाने के लिए लिए गए उपरोक्त मकान में विस्फोटकों का जखीरा बरामद हुआ था। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में बने जीवनलाल कपूर कमीशन ने गांधी हत्या की साजिश के लिए प्रत्यक्ष सावरकर को जिम्मेदार ठहराया था। कहने का तात्पर्य यह है कि अपने आप को ‘चरित्र निर्माण के लिए प्रतिबद्ध कहलाने वाले’ हिन्दुत्ववादी संगठन भी वक्त पड़ने पर आतंकवाद का सहारा लेते रहे हैं। 90 के दशक के उत्तरार्द्ध में हम पाते हैं कि इसे नए सिरेसे उभारा जा रहा है और अधिक स्वीकार्यता प्रदान करने के लिए उसे ‘इस्लामिस्ट आतंकवाद’ की प्रतिक्रिया के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है। दूसरी अहम बात यह है कि हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व समानार्थी नहीं है (अधिक स्पष्टीकरण के लिए सावरकर की बहुचर्चित किताब ‘हिन्दुत्व’ को देखा जा सकता है), जिस तरह इस्लाम और राजनैतिक इस्लाम को समानार्थी नहीं कहा जा सकता, वही हाल हिन्दुइज्म अर्थात हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व का है। यह फर्क स्पष्ट करना इसलिए जरूरी है क्योंकि जबभी हिन्दु आतंकवादी गिरफ्तार होते हैं या उसकी चर्चा होती है, संघ परिवारी संगठनों की तरफ से हल्ला किया जाता है कि आप धर्मविशेष को बदनाम कर रहे हैं। यह सर्वथा गलत है। इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई की तमाम घटनाएँ इस बात को प्रमाणित करती हंै कि हिन्दुत्व आतंकवाद एक परिघटना है, जो भारत के सेक्युलर एवं जनतांत्रिक स्वरूप के लिए जबरदस्त खतरा बन कर उपस्थित है। जाहिर है कि जो बात अक्सर प्रचारित की जाती है कि हिन्दू आतंकी नहीं हो सकता, यह बात तथ्यों से परे है। जिस तरह हर समुदाय में अच्छे बुरे लोग होते हैं, वही हाल आतंकवाद से प्रभावित होने को लेकर भी देख सकते हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए कि देश का कानून सभी के लिए समान हो, किसी आतंकी को इसलिए नहीं बक्शा जाए कि वह विशिष्ट समुदाय से है, किसी आतंकी गिरोह के सरगनाओं, मास्टरमाइंडों को इसलिए न बचाया जाए कि वह बहुसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। अपराध सिर्फ अपराध होता है, उसके किसी खास समुदाय द्वारा अंजाम देने से उसकी तीव्रता कम नहीं होती है।
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 लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित