शुक्रवार, 22 जुलाई 2016

आतंक के कैंसर में जकड़ी दुनिया

हमारी वर्तमान दुनिया की एक बड़ी त्रासदी यह है कि भारी संख्या में मासूम लोग आतंकवाद की भेंट चढ़ रहे हैं। आतंकवाद से मुकाबला करने के लिए सुरक्षा आदि के उपायों पर जो भारी खर्च हो रहा हैए वह भी पूरी तरह से अनुत्पादक है। इससे भी बड़ी मुसीबत यह है कि आतंकवाद को धर्म से जोड़ दिया गया है। लगभग दो सप्ताह पहले ;जुलाई 2016,अमरीका के ओरलैंडो स्थित पल्स क्लब में 49 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। इस भयावह घटना की दो व्याख्याएं की जा रही हैं.पहला, यह जिहादी आतंकवाद है और दूसरा, यह एक ऐसे व्यक्ति की करतूत है जो समलैंगिकों से घृणा करता था। एक टिप्पणीकार ने लिखाए 'ऐसा लगता है कि वह इस्लामिक कट्टरतावाद और समलैंगिकों के प्रति घृणा दोनों से प्रेरित था' 'आतंकवाद या समलैंगिकों से घृणा उत्तर है 'दोनों।
एक अन्य घटना में आईएस द्वारा बगदाद में किए गए एक बम धमाके में 119 लोग मारे गए। गत एक जुलाई को बांग्लादेश में 28 लोगों की हत्या कर दी गई। जिन लोगों ने अपनी जानें गंवाई, उन्हें विदेशी बताया जा रहा है। कुछ रपटों के  अनुसार, आतंकवादी हमलावर आईएस से नहीं बल्कि जमात.उल.मुजाहिदीन से जुड़े हुए थे। एक टिप्पणीकार का कहना है कि इन दिनों आईएस और अलकायदा में भारतीय उपमहाद्वीप में अपने खूनी पंजे फैलाने की प्रतियोगिता चल रही है। बांग्लादेश में इस्लामिक अतिवाद की जड़ें जमायत.ए.इस्लामी और उसकी कट्टरवादी विद्यार्थी शाखा इस्लामी छात्र शिबिर में हैं।
इन सारी विद्धवंसात्मक गतिविधियों में क्या समानता है? सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि ये सब इस्लामवादी आतंकवाद से जुड़ी हुई हैं। इस्लामवादी आतंकवाद शब्द 9/11 की त्रासदी के बाद से प्रचलन में आया है परंतु यदि हम थोड़ी गहराई से पड़ताल करेंगे तो हमें इन घटनाओं की पृष्ठभूमि में कई अन्य कारक भी नज़र आएंगे। ओरलैंडों की घटना का संबंध अमरीका की गन संस्कृति से है। इस घटना के बाद अमरीकी कानून निर्माताओं को भी यह लगने लगा है कि आग्नेय अस्त्र रखने संबंधी कानूनों में परिवर्तन किया जाना चाहिए। ओरलैंडों की घटना भयावह थी परंतु इससे मिलती.जुलती छोटी.मोटी घटनाएं अमरीका में होती रहती हैं और उनका इस्लामिक आतंकवाद से कोई संबंध नहीं होता। हां, बगदाद के आतंकी हमले का संबंध निश्चित तौर पर इस्लामिक स्टेट से था।
जहां तक बांग्लादेश में हो रहे आतंकी हमलों का प्रश्न हैए ऐसा प्रतीत होता है कि वे बांग्लादेश की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय कट्टरवादी तत्वों की करतूते हैं। वहां लंबे समय से हत्याओं और आतंकी हमलों का दौर चल रहा है। कई प्रगतिशील.धर्मनिरपेक्ष व उदारवादी ब्लॉग लेखकों और हिन्दुओं की हत्याएं हो चुकी हैं। बांग्लादेश में हो रही आतंकी घटनाओं का संबंध किसी बाहरी संगठन से नहीं है बल्कि वे वहां के राज्य और समाज की राजनीति में बढ़ती कट्टरता को नियंत्रित करने में असफलता का परिणाम है। पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत.तीनों में कट्टरता और सांप्रदायिकता बढ़ रही है और इससे अतिवाद को प्रोत्साहन मिल रहा है।
पाकिस्तान में ज़िया.उल.हक के शासनकाल में इस्लामिक कट्टरवाद को आधिकारिक मान्यता मिली। अपनी तानाशाही स्थापित करने के लिए ज़िया.उल.हक ने सामंती ताकतों और मुल्लाओं के साथ गठजोड़ किया और मौलाना मौदूदी ;देवबंदी इस्लाम, के सिद्धांतों को प्रोत्साहन दिया। इस प्रक्रिया को पाकिस्तान का इस्लामीकरण कहा जाता है। इस इस्लामीकरण के केंद्र में था सामाजिक व्यवहार और नियमों को शरिया की मौलाना मौदूदी की व्याख्या के अनुरूप गढ़ने की कोशिश। वहां सामंती.दकियानूसी सोच को बढ़ावा दिया गया और महिलाओं व नागरिक स्वतंत्रताओं का दमन किया गया। भारत में धर्म के नाम पर राजनीति, सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा के रूप में सामने आई, जिनके शिकार धार्मिक अल्पसंख्यक बने। इसी विचारधारा का एक दूसरा पहलू है हिन्दुत्वादी संगठन, जो मालेगांवए मक्का मस्ज़िद ;हैदराबाद, अजमेर और समझौता एक्सप्रेस धमाकों के लिए ज़िम्मेदार बताए जाते हैं। सांप्रदायिक.कट्टरवादी विचारधारा का लक्ष्य है शरिया या अतीत की महान परंपराओं के नाम पर देश पर पूर्व.आधुनिक, सामंती मूल्य लादना, जो जाति,वर्ग व लिंग के आधार पर भेदभाव को मान्यता देते हैं।
जहां तक अलकायदा और आईएस के आतंकवाद का सवाल हैए उसकी जड़ें कच्चे तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने की राजनीति में हैं और इसमें अमरीका की नीतियों ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। अमरीका ने पाकिस्तान में ऐसे मदरसों की  स्थापना करवाई जिनमें विद्यार्थियों के दिमाग में कट्टरवादी वहाबी इस्लाम के मूल्यों को ठूंस.ठूंस कर भरा गया। इन मदरसों में विद्यार्थियों को सिखाया गया कि काफिरों को मारना ही जिहाद है। इस तरह के संगठन यह मानते हैं कि उनसे असहमति रखने वालों को जिन्दा रहने का हक नहीं है। उन्होंने साम्यवाद का विरोध किया, अफगानिस्तान पर सोवियत कब्ज़े के खिलाफ संघर्ष किया और अब वे काफिरों की हत्या को अपना धर्म मानते हैं। पाकिस्तान के इस्लामीकरण की जो प्रक्रिया ज़िया.उल.हक के शासनकाल में शुरू हुई थी, उसे अलकायदा और उसके साथी संगठनों ने जारी रखा। अलकायदा ने आईएस की विचारधारात्मक नींव का निर्माण किया। हिलेरी क्लिन्टन ने इस सब में अमरीका की भूमिका की अत्यंत सारगर्भित व्याख्या की है। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि अमरीका, कई तरीकों से आतंकवादी समूहों का समर्थन करता आ रहा है।
वर्तमान समय में दो प्रकार के आतंकवाद हमारी दुनिया को खौफज़दा किए हुए हैं। एक का उद्देश्य है
पूर्व.आधुनिक मूल्यों की पुनर्स्थापना। इनमें शामिल हैं पाकिस्तान व बांग्लादेश ;मौलाना मौदूदी, भारत ;हिन्दुत्व और म्यांमार व श्रीलंका। म्यांमार और श्रीलंका में बौद्ध धर्म की एक विशिष्ट व्याख्या का इस्तेमाल,हिंसा को उचित ठहराने के लिए किया जा रहा है। दूसरे प्रकार का आतंकवाद वह है जिसे तेल के संसाधनों पर कब्ज़ा करने की वैश्विक राजनीति से समर्थन और सहयोग मिल रहा है। यह त्रासद है कि दोनों ही प्रकार के आतंकवादए धर्म, विशेषकर इस्लाम, के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे धर्म के आधार पर अपनी कुत्सित हरकतों को उचित बताते हैं।
हर धर्म में कई धाराएं होती हैं। जैसे इस्लाम में जहां एक ओर उदारवादी व समावेशी सूफी परंपरा है, तो दूसरी ओर वहाबी कट्टरता भी है। उसी तरह हिन्दू धर्म में भक्ति परंपरा है, तो ब्राह्मणवाद भी है। अमरीका ने पश्चिम एशिया में अपने राजनीतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए इस्लाम के वहाबी संस्करण का इस्तेमाल किया। ज़िया ने अपनी तानाशाही स्थापित करने के लिए मौदूदी का सहारा लिया। हिन्दू राष्ट्रवाद.हिन्दुत्व ने अपने राजनीतिक एजेंडों की पूर्ति के लिए नव.ब्राह्मणवाद को अपना हथियार बनाया। विभिन्न धर्मों की अलग.अलग धाराओं के अस्तित्व में बने रहने से कोई खास समस्या नहीं होती। समस्या तब होती है जब राजनैतिक शक्तियां अपने लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए इनमें से एक या अधिक धाराओं का इस्तेमाल करना शुरू कर देती हैं। इस तथ्य को यदि हम समझ लेंगे तो हम आतंकवाद से सफलतापूर्वक मुकाबला करने की ओर एक कदम बढ़ा लेंगे। हमें यह समझना होगा कि आतंकवाद,दरअसलए धर्म का केवल लबादा ओढ़े हुए है। उसके असली उद्देश्य राजनैतिक हैं। 
  -राम पुनियानी

मंगलवार, 19 जुलाई 2016

देश की जनता को मत मारो

जम्मू एंड कश्मीर में चार पांच दिन से अखबार, इन्टरनेट व अन्य सूचना माध्यमो पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है. सरकार कश्मीरी अवाम के साथ कैसा सुलूख कर रही है. वह अघोषित आपातकाल के पहले जो सूचनाएं आयीं थी उसके हिसाब से लगभग 40 लोग मारे जा चुके हैं, सौ से ज्यादा लोगों की आखें फूट चुकी हैं. संसद में चर्चा भी हो चुकी है. समाधान नदारद है. मोदी सरकार के पास समस्या के समाधान का कोई रास्ता नहीं है. असमंजस की स्तिथि है, भारतीय जनता मर रही है अलगवावादी ताकतों से भारतीय जनता पार्टी चुनाव में गठजोड़ कर चुकी है लेकिन समस्या का समाधान करने के लिए कोई भी पक्ष आगे नहीं आ रहा है. एक दुसरे के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप लगाये जा रहे हैं. नकली देशभक्त पाकिस्तान को गालियाँ बकना प्रारंभ कर दिए हैं. स्तिथि यह है कि पकिस्तान जब अपने वहां  कुछ कर नहीं पाता है तो वह कहता है की भारत की वजह से ऐसा हुआ है और यह नकली राष्ट्रवादी जब कुछ नहीं कर पा रहे हैं तो शक की सुई पकिस्तान की तरफ कर देते हैं और पैर छूने भी पकिस्तान जाते हैं. 
अभी हाल में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि जिन क्षेत्रों में अफस्पा लागू है वहां भी सेना या पुलिस द्वारा  ज्यादा हिंसक ताकत का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर में अब तक के 1528 फर्जी मुठभेड़ों की जांच करने को भी कहा है. 
 आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स ऐक्ट देश के अशांत क्षेत्रों में सेना को विशेष अधिकार देता है. इसके तहत सेना लोगों को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकती है. किसी भी जगह छापे मार सकती है. और इस दौरान जवाबी कार्रवाई में हथियारों का इस्तेमाल भी कर सकती है.
  वहीँ, महबूबा मुफ्ती की सरकार बनाते समय प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट रूप से कहा था कि जम्मू कश्मीर से AFSPA नहीं हटाया जायेगा लेकिन वहीँ त्रिपुरा में  मई 2015 में  AFSPA  कानून हटाने  के बाद उग्रवादी घटनाएं , हत्या, घायल, सुरक्षाकर्मियों की हत्या, अपहरण, मुठभेड जीरो रहा है.  जून 2015 तक का ये आंकड़ा त्रिपुरा का है. इसे मुख्यमंत्री मानिक सरकार ने पूर्वोत्तर राज्य के मुख्यमंत्रियों के एक सम्मेलन के दौरान पेश किया है. उनका कहना था कि राज्य से अफसपा वापस लेने के बाद आतंकवाद संबंधित घटनाओं में अप्रत्याशित कमी आई है. 
    इसलिए आवश्यक यह है कि भारतीय जनता के ऊपर, दुश्मन की सेनाओ के ऊपर बलप्रयोग करने वाली भारतीय सेना को अविलम्ब हटाकर सीमा पर पहुँचाया जाए और जनता से चुनी हुई सरकार संवाद कायम करे और त्रिपुरा की भांति अफस्पा कानून हटा कर जम्मू एंड कश्मीर की सिविल पुलिस को कानून व्यवस्था का कार्य सम्पादित करने दिया जाए. आपातकाल लगा कर अनावश्यक बल प्रयोग कर भारत की किसी भी क्षेत्र की जनता को दबाया नहीं जा सकता है. जनता लोकतान्त्रिक है, शांतिप्रिय है उसका नाजायज फायदा इन फ़ासिस्ट शक्तियों को नहीं उठाना चाहिए. 

सुमन 

रविवार, 17 जुलाई 2016

गाँव समाप्त होना ---किसान समाप्त

सुप्रसिद्ध साहित्यकार शिवमूर्ति
बाराबंकी। पहले बडे़ आदमी शेर, हिरन, चीता, भालू आदि का शिकार करते थे और अब वहीं लोग कारपोरेट सेक्टर बनकर आदमियों का शिकार करते है। शिकार का स्वरूप बदला है आदमी को मजबूर किया जा रहा है कि वो स्वयं हत्या कर ले। आज किसान इस व्यवस्था का शिकार है और इसी लिए वो आत्महत्या करने के लिए मजबूर है।
    यह बात लोक संघर्ष पत्रिका के किसान अंक को प्रसारित करते हुए हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार शिवमूर्ति ने कहा कि तेली, नाई, भड़भुजें व्यवस्था का शिकार होकर गांव से पलायन कर रहे है। किसानों को जब तक उनकी फसलों का लाभकारी मूल्य नहीं दिया जाता है तब तक गांवों को बचाया नहीं जा सकता है। गांव समाप्त होने का मतलब किसान की समाप्ति है।
    उत्तर प्रदेश किसान सभा के प्रदेश उपाध्यक्ष सुरेश त्रिपाठी ने कहा कि प्रेम चन्द्र लिखा है कि किसान कर्र्जे में पैदा होता है, कर्जे में ही जिन्दगी गुजारता हैं और कर्जे में ही मर जाता है। किसान के पक्ष में पूंजीवादी नेताओं ने यह किया है कि किसान कर्जे में पैदा हो, कर्जे में ही जिन्दगी जिये और कर्जा न अदा होने पर आत्महत्या करले। श्री त्रिपाठी ने कहा कि स्वामीनाथन कमेटी की रिपोर्ट लागू की जाये तथा किसानों को दस हजार रूपये मासिक पेंशन दी जाये।
    इस अवसर पर डा0 अशोक गुलशन, श्याम सुन्दर दीक्षित, अजय सिंह, डा0 कौसर हुसैन, बृजमोहन वर्मा ने सम्बोधित किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता छिब्बन रिजवी तथा कार्यक्रम का संचालन रणधीर सिंह सुमन ने किया। इस अवसर पर विनय दास, अम्बरीश अम्बर, जियालाल, डा0 उमेश चन्द्र वर्मा, दलसिंगार, गिरीश चन्द्र, नीरज वर्मा, सत्येन्द्र यादव, पुष्पेन्द्र सिंह, विनय कुमार सिंह, राजेन्द्र सिंह, मुनेश्वर वर्मा सहित सैकड़ों लोग उपस्थित थे।

गुरुवार, 14 जुलाई 2016

कैराना पलायन



उत्तरप्रदेष, जहां अगले वर्ष चुनाव होने वाले हैं, में भाजपा ने हाल में राज्य के षामली जिले के कैराना नामक कस्बे से बड़े पैमाने पर पलायन का मुद्दा उठाया। पार्टी के सांसद हुकुम सिंह के अनुसार, ‘‘कई हिंदू परिवारों को एक विषेष समुदाय की ‘धमकियों’ के चलते कैराना छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है’’। उन्होंने 346 ऐसे परिवारों की सूची भी जारी की जिन्हें मजबूर होकर कैराना से पलायन करना पड़ा। एक दिन बाद ही उन्होंने अपने वक्तव्य में आंषिक संषोधन करते हुए कहा कि जो 346 हिंदू परिवार कैराना से अपने घरों को छोड़कर पलायन कर गए हैं ‘‘वे एक विषेष समुदाय के आपराधिक तत्वों द्वारा दी जा रही धमकियों और जबरिया वसूली से परेषान थे’’। उन्होंने कहा, ‘‘मुद्दा सांप्रदायिक नहीं है...यह हिंदू और मुस्लिम की बात नहीं है। सूची पूरी तरह ठीक नहीं भी हो सकती है। यह कानून व्यवस्था का मुद्दा है।’’ सांसद ने कहा कि मुकीम काला और फुरहान जैसे ‘मुस्लिम आपराधिक गिरोह’ पष्चिमी उत्तरप्रदेष में एक बड़ी मुसीबत बन गए हैं। उन्होंने यह भी कहा कि, ‘‘स्थानीय आपराधिक तत्वों ने एक पार्टी विषेष के संरक्षण में कैराना में अपनी जड़ें जमा ली हैं।’’ अपनी बात को बार-बार बदलते हुए अंत में सांसद ने कहा कि एक स्थानीय मुस्लिम गैंगस्टर, जिसे समाजवादी पार्टी सरकार का संरक्षण प्राप्त था, द्वारा दी जा रही धमकियों और ज़बरिया वसूली के कारण पलायन हुआ था।
इस सूची के जारी होने के बाद इलाहाबाद में एक विषाल आमसभा को संबोधित करते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित षाह ने कहा कि केवल उनकी पार्टी ही उत्तरप्रदेष में समाजवादी पार्टी को पराजित कर सकती है। उन्होंने लोगों का आह्वान किया कि वे कैराना को ‘हल्के’ में न लें। भाजपा के कई राष्ट्रीय पदाधिकारियों और कंेद्रीय मंत्रियों ने मीडिया को वक्तव्य जारी कर यह कहा कि कानून और व्यवस्था के इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि अगर पलायन की बात सही है तो राज्य सरकार को उपयुक्त कार्यवाही करनी चाहिए। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजिजू ने वर्तमान सरकार के कार्यकाल में उत्तरप्रदेष में कानून और व्यवस्था के बिगड़ते हालात की बात कही। मेनका गांधी ने कहा कि उत्तरप्रदेष में न तो विकास हो रहा है और ना ही लोग सुरक्षित हैं। उन्होंने यह भी कहा कि समाजवादी पार्टी की सरकार को नित बढ़ते अपराधों के ग्राफ के बावजूद षर्म नहीं आ रही है।
इसके पहले, समाजवादी पार्टी सरकार की राज्य में बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाओं में वृद्धि के लिए कटु आलोचना की गई थी। यहां यह महत्वपूर्ण है कि भाजपा उत्तरप्रदेष में लवजिहाद की बात करती रही है। पार्टी के अनुसार लवजिहाद का अर्थ है मुस्लिम पुरूषों द्वारा मासूम हिंदू लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फंसा कर उनसे विवाह कर लेना। इन युवतियों को मुसलमान बना लिया जाता है व इस तरह देष में मुसलमानों की आबादी को बढ़ाने और हिंदुओं की आबादी को घटाने का षड़यंत्र चल रहा है। ‘हिंदुओं के पलायन’ और लवजिहाद, दोनों अभियानों का उद्देष्य मुसलमानों का दानवीकरण करना है। भाजपा समाज को यह संदेष देना चाहती है कि मुसलमान, आतंकवादी और असामाजिक तत्व हैं जिनसे हिंदुओं की रक्षा की जानी आवष्यक है और केवल भाजपा ही हिंदुओं की रक्षा करने में सक्षम है।
उदाहरण के लिए, 23 अगस्त, 2014 को आयोजित पार्टी की एक बैठक को संबोधित करते हुए उत्तरप्रदेष भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने कहा कि यह आष्चर्यजनक परंतु सत्य है कि उत्तरप्रदेष में होने वाले हर 100
अपराधों मंे से 71 महिलाओं के विरूद्ध होते हैं और इस तरह के अपराधों में 99.99 प्रतिषत आरोपी मुसलमान होते हैं। उत्तरप्रदेष सरकार पर मुस्लिम अपराधियों और असामाजिक तत्वों को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए वाजपेयी ने कहा कि जहां उत्तरप्रदेष सरकार लवजिहादियों का बचाव कर रही है वहीं लवजिहाद के पीड़ितों को पुलिस द्वारा परेषान किया जा रहा है और उनकी हत्याएं हो रही हैं।
अपने चुनाव अभियानों के दौरान भाजपा नेता बार-बार ‘एक विषेष समुदाय’ (मुसलमान) को सांप्रदायिक दंगों, आतंकवाद और गुंडागर्दी के लिए ज़िम्मेदार बताती आई है। उत्तरप्रदेष में एक उपचुनाव के ठीक पहले, अगस्त 2014 में भाजपा विधायक संगीत सोम ने कहा, ‘‘एक विषेष समुदाय के युवक हिंदू लड़कियों के साथ छेड़छाड़ करते हैं। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि हिंदू लड़कियां स्वतंत्रतापूर्वक कहीं आ जा भी नहीं सकतीं।’’ योगी आदित्यनाथ ने भी इसी तरह के वक्तव्य जारी कर मुसलमानों का दानवीकरण किया और उन्हें सांप्रदायिक दंगों के लिए दोषी ठहराया। सन 2016 में उपचुनावों के प्रचार के दौरान मुसलमानों को गुंडा और आतंकवादी बताया गया और ज़ोर देकर यह कहा गया कि हिंदुओं का पलायन रोका जाना आवष्यक है और उन्हें सम्मान से जीने का अवसर मिलना चाहिए। कैराना के भाजपा सांसद ने इसी क्रम में कहा कि मुस्लिम अपराधी, षांतिप्रिय हिंदू नागरिकों को चैन से नहीं रहने देंगे। ऊपरलिखित वक्तव्यों में से प्रत्येक भारतीय दंड संहिता की धारा 153-ए के तहत अपराध है। यह धारा विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच षत्रुता या नफरत फैलाने को अपराध घोषित करती है। परंतु इनमें से अधिकांष मामलों में न तो कोई एफआईआर दर्ज की गई और ना ही संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कोई कार्यवाही हुई। ज़ाहिर है कि इससे भाजपा नेताओं का मनोबल बढ़ता है और वे और ज़ोरषोर से अपने राजनैतिक लाभ के लिए मुसलमानों का दानवीकरण करने और उन्हें हिंदुओं की घृणा का पात्र बनाने के अभियान में जुट जाते हैं।
अपराध और उसके संरक्षक
भाजपा और उसका नेतृत्व, असत्यों, अर्धसत्यों और तोड़े-मरोड़े गए तथ्यों के आधार पर मुस्लिम समुदाय का प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से दानवीकरण करता आ रहा है।
कुछ पत्रकारों ने उन 346 हिंदू परिवारों की सूची की पड़ताल की जो सांसद हुकुम सिंह के अनुसार कैराना छोड़कर चले गए थे। ‘मिली गजेट’ द्वारा भेजे गए पत्रकारों के एक दल ने पाया कि सूची में चार मृत व्यक्तियों के नाम षामिल हैं और 68 ऐसे व्यक्तियों के भी, जो बहुत पहले कैराना छोड़कर चले गए थे। इसमें 20 ऐसे परिवारों के नाम षामिल थे जो अब भी कैराना में रह रहे थे। इससे स्पष्ट है कि ये आरोप एक योजनाबद्ध तरीके से लगाए गए थे ताकि अगले साल उत्तरप्रदेष में होने जा रहे विधानसभा चुनाव के पहले समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत किया जा सके। इंडियन एक्सप्रेस और टाईम्स आॅफ इंडिया ने भी इस सूची की जांच की और पाया कि सूची में षामिल कुछ लोग मर चुके हैं और कुछ बेहतर अवसरों की तलाष में कैराना छोड़कर चले गए हैं। जो लोग षहर छोड़कर चले गए थे उनमंे से कुछ ने कहा कि उन्होंने मुज़फ्फरनगर दंगों के दौरान इलाके मंे फैले तनाव के कारण कैराना छोड़ा। उन्हें डर था कि इस तरह के वातावरण में वे अपनी रोज़ी-रोटी नहीं कमा पायेंगे। षामली के जिला प्रषासन ने भाजपा सांसद द्वारा जारी सूची में षामिल 346 परिवारों में से 119 के बारे में पता लगाया। इस जांच से पता चला कि 68 परिवार, 10 से 15 वर्ष पहले रोजगार, व्यवसाय या बच्चों की षिक्षा की खातिर कैराना छोड़कर चले गए थे। प्रषासन की जांच में यह भी सामने आया कि उनमें से कई लोग अब इस दुनिया में नहीं हैं और कुछ अब भी कैराना में ही रह रहे हैं। यह भी बताया गया कि भाजपा के कार्यकर्ता भी सूची में षामिल नामों के बारे में भ्रम की स्थिति में हैं। हिंदू संतों के एक समूह ने मुख्यमंत्री को उनके द्वारा की गई जांच की रपट सौंपी, जिसमें यह कहा गया था कि कैराना से बड़े पैमाने पर पलायन होने के कोई सबूत नहीं हैं।
भाजपा का यह दावा आधारहीन है कि सत्ताधारी समाजवादी पार्टी, मुकीम काला गैंग को संरक्षण दे रही है।  काला को अक्टूबर 2015 में एसटीएफ द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया था। अपराधियों का कोई धर्म नहीं होता और ना ही वे किसी धर्म व धार्मिक समुदाय से प्रेरित होते हैं। सच यह है कि मुकीम काला के षिकार व्यक्तियों में मुसलमान भी बड़ी संख्या में हैं। अपराधी केवल धन की तलाष में रहते हैं, उन्हें इस बात से कोई लेनादेना नहीं होता कि उनका षिकार किस धर्म का है।
यह दिलचस्प है कि लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान, भाजपा का नारा था ‘सब का साथ, सब का विकास’। परंतु भाजपा ने कभी अल्पसंख्यक समुदाय के उन लोगों की चर्चा नहीं की जिन्हें विभिन्न कारणों से अपने रहवास का स्थान छोड़कर अन्य स्थानों में बसना पड़ा। पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व और केंद्रीय कैबीनेट मंत्री, 346 हिंदू परिवारों के कथित पलायन से इतने उद्वेलित हो गए कि अपनी जुबान पर नियंत्रण ही खो बैठे। परंतु षायद उन्हें यह ध्यान नहीं था कि ओडिसा के कंधमाल में 2007 व 2008 में हुए दंगों के बाद 50,000 ईसाईयों को अपने घरों से पलायन करना पड़ा था। सन 2013 में उत्तरप्रदेष में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद, 50,000 मुसलमानों को अपने घर छोड़कर भागना पड़ा था और वे मुज़फ्फरनगर और षामली जिलों में जानवरों जैसा जीवन बिताने पर मजबूर हैं। आज भी षामली और मुज़फ्फरनगर में 63 राहत षिविरों में 5,200 मुसलमान परिवार रह रहे हैं। इनमें से कई कैराना में स्थापित षिविरों में भी हैं। ये परिवार अपने घर-गांव वापस जाना इसलिए नहीं चाहते क्योंकि उन्हें डर है कि वहां उनके जानोमाल को खतरा होगा। सन 2002 में गुजरात मंे हुए दंगों के बाद, उनके घरों से खदेड़े गए या भागे मुसलमानों में से डेढ़ लाख आज भी अपने घर नहीं लौट सके हैं। असम में सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाओं के बाद सैंकड़ों मुसलमान कठिन परिस्थितियों में जी रहे हैं।
विभिन्न राज्यों में अपराधियों के गिरोह और धर्म के स्वनियुक्त रक्षकांे के समूह खुलेआम कानून का उल्लंघन करते रहते हैं परंतु अगर वे हिंदू समुदाय के हैं तो भाजपा या तो चुप रहती है या  हिंदू राष्ट्रवादी उनकी हरकतों को औचित्यपूर्ण ठहराने का कोई न कोई बहाना ढूंढकर उन्हें राजनैतिक संरक्षण प्रदान करते हैं। उदाहरणार्थ, दादरी में मोहम्मद अखलाक को घर में गौमांस रखने के बेजा आरोप में पीट-पीटकर मार डाला गया। भीड़ को स्थानीय गौसंरक्षकों ने हिंसा के लिए उकसाया था। इस तरह के समूह पूरे देष में हैं और गौरक्षा के नाम पर वे खुलेआम कानून का मखौल उड़ाते हुए ज़बरिया वसूली, हिंसा और हत्याएं कर रहे हैं। भाजपा षासित हरियाणा में अवैध वसूली करने वालों ने पांच लोगों की जान ले ली। इसी तरह की घटना 19 मार्च, 2016 को झारखंड के लातेहार जिले में हुई, जहां दो मुस्लिम पषुपालकों को, जो आठ भैंसो को बाज़ार में बेचने ले जा रहे थे, एक पेड़ पर फांसी दे दी गई। मध्यप्रदेष में 15 जनवरी, 2016 को हरदा जिले के खिड़किया रेलवे स्टेषन पर कुषीनगर एक्सप्रेस के सामान्य डिब्बे में सवार एक मुस्लिम दंपत्ति पर गौरक्षा समिति के सदस्यों  ने तब हमला कर दिया जब उन्होंने उनके सामान की तलाषी पर आपत्ति उठाई। गौरक्षा समिति के सदस्यों का कहना था कि वे गौमांस ले जा रहे थे। इस तरह के अपराधों से देष के विभिन्न हिस्सों में भय का वातावरण पैदा हो रहा है और इससे जनित असुरक्षा के चलते अल्पसंख्यक वर्ग के सदस्य सुरक्षित स्थानों में पलायन कर रहे हैं।
एक अन्य भाजपा षासित राज्य छत्तीसगढ़ मंे असामाजिक तत्व, आदिवासियों के बीच काम कर रहे कार्यकर्ताओं पर हमले कर रहे हैं। ऐसी ही एक कार्यकर्ता सोनी सोरी पर एसिड फेंका गया था। हरियाणा के एक गांव में देर रात एक दलित परिवार के घर में आग लगा दी गई जिसमंे दो छोटे बच्चे जलकर मर गए और उनके माता-पिता को गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। भाजपा षासित राज्यों में हो रही इस तरह की घटनाओं का केंद्र सरकार की छवि पर असर न पड़े, इस प्रयास में विदेष राज्यमंत्री जनरल व्ही.के. सिंह ने कहा कि ‘‘अगर कोई एक कुत्ते को पत्थर मार दे तो उसके लिए सरकार ज़िम्मेदार नहीं है’’। हिंसक भीड़ द्वारा की गई हत्याओं के लिए संबंधित राज्य सरकार को नहीं तो और किसे दोषी ठहराया जाएगा? विषेषकर तब, जब ऐसे तत्वों को सरकार का संरक्षण प्राप्त हो।
जहां सांसद हुकुम सिंह कथित पलायन के लिए सांप्रदायिक घृणा को ज़िम्मेदार बताने के अपने आरोप से पीछे हट गए, वहीं उनकी पार्टी के सदस्य समाजवादी पार्टी सरकार पर हमले करने के दौरान ‘‘एक विषेष प्रकार के अपराधियों’’ का हवाला देने से नहीं चूकते। भाजपा विधायक संगीत सोम ने हिंदुओं के पलायन के विरोध में कैराना से कंधला तक पदयात्रा निकालने की घोषणा की थी। इस कार्यक्रम को उन्होंने सांसद हुकुम सिंह के हस्तक्षेप के बाद रद्द कर दिया। पार्टी के एक नेता ने दावा किया कि भाजपा, प्रदेष में और ‘कैरानाओं’ की तलाष कर रही है। पार्टी के एक नेता ने 14 जून को 63 परिवारों की सूची जारी की, जो, उनके अनुसार कंधला छोड़ कर चले गए थे।
कुल मिलाकर पार्टी किसी भी तरह षामली में सांप्रदायिक धु्रवीकरण करना चाहती है। पार्टी के नेता मुज़फ्फरनगर जिले के विभिन्न गांवों में नफरत फैलाने वाले भाषण देते रहे हैं। लोकसभा के 2013 के चुनाव के दौरान, षामली जिले के राजहर गांव में भाषण देते हुए भाजपा के प्रदेषाध्यक्ष ने मुज़फ्फरनगर हिंसा का हवाला देते हुए कहा कि ‘‘हमें अपने अपमान का बदला लेना ही होगा’’।
निष्कर्ष
अगर भाजपा चुनाव में लाभ पाने के लिए समाज का धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण करना जारी रखेगी तो भारत उस ओर ही बढे़गा, जिसकी कामना जेएनयू में कथित रूप से लगाए गए नारे में की गई थीः ‘‘भारत के टुकड़े-टुकड़े होंगे इंशाल्लाह’’। जो लोग प्रजातंत्र से प्रेम करते हैं उन्हें दृढ़ता से इन तत्वों से मुकाबला करना चाहिए।

  -रेशल डिसिल्वा       

बुधवार, 13 जुलाई 2016

मोदी -राजनाथ शर्म करो ----------------------

शर्म कभी नहीं आएगी
केंद्र सरकार को अरुणाचल प्रदेश मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है. कोर्ट ने नाबाम तुकी की सरकार को हटाने के केंद्र के फैसले को असंवैधानिक करार दिया है, और उसे तत्काल बहाल करने को कहा है. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा कि अगर घड़ी की सूई को पीछे ले जाना होगा तो ले जाएंगे. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की बीजेपी सरकार के फैसले को पलट दिया है. अरुणाचल प्रदेश की नाबाम तुकी सरकार को हटाने के केंद्र के फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए 15 दिसंबर 2015 की स्थिति लागू करने को कहा है. अरुणाचल पर सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला 331 पन्नों का है 
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, ''गवर्नर का काम केंद्र सरकार के एजेंट की तरह काम करना नहीं है। उन्हें संविधान के तहत काम करना होता है।''
- ''9 दिसंबर के बाद अरुणाचल असेंबली के सभी फैसले रद्द किए जाते हैं।''
- कोर्ट ने 16-17 दिसंबर को बुलाए गए विधानसभा सत्र को भी असंवैधानिक करार दिया।
 - किसी राज्य में मौजूदा सरकार को हटाकर पुरानी सरकार बहाल करने का सुप्रीम कोर्ट का यह पहला आदेश है।
- जस्टिस ए.के. माथुर ने  कहा, 'जिस तरह से पॉलिटिक्स गंदी हो रही है, नेता सरकार बनाने के लिए हॉर्स ट्रेडिंग करते हैं। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का ये फैसला ऐतिहासिक है।'
 जस्टिस जे एस केहर की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान बेंच ने अपने ऐतिहासिक फैसले में आदेश दिया कि विधानसभा में 15 दिसंबर 2015 से पहले की स्थिति बहाल रहेगी। 9 दिसंबर 2015 को दिए गए गवर्नर के आदेश पर लिए गए विधानसभा के सभी फैसले रद्द किए जाते हैं।
- जस्टिस केहर ने कहा, "9 दिसंबर 2015 को गवर्नर ने विधानसभा का सत्र 14 जनवरी 2016 से पहले 16 दिसंबर 2015 को ही खत्म करने आदेश दिया था। यह आर्टिकल 163 का (संविधान का आर्टिकल 174 पढ़ा जाए) वॉयलेशन है। लिहाजा, यह फैसला अमान्य है।"
- "दूसरा यह कि 16 से 18 दिसंबर 2015 तक चले अरुणाचल प्रदेश विधानसभा के 6th सेशन में कार्यवाही के लिए गवर्नर का आदेश देना आर्टिकल 163 का (संविधान का आर्टिकल 175 पढ़ा जाए) वॉयलेशन है। लिहाजा, इस फैसले को भी अमान्य किया जाता है।"
- "तीसरा यह कि गवर्नर के 9 दिसंबर 2015 के आदेश पर अरुणाचल प्रदेश विधानसभा द्वारा लिए गए सभी फैसले और उठाए गए कदम खारिज किए जाते हैं।"
- आखिर में बेंच ने कहा, "तीनों फैसलों को देखते हुए प्रदेश में 15 दिसंबर 2015 से पहले की स्थिति बहाल करने का आदेश दिया जाता है।"
उत्तराखंड के बाद अरुणांचल प्रदेश में केंद्र सरकार द्वारा सत्ता परिवर्तन कराये जाने के सम्बन्ध मेंमाननीय उच्चतम न्यायलय का फैसला आ जाने के बाद नरेन्द्र दामोदर मोदी व गृह मंत्री राजनाथ सिंह को कोई शर्म नहीं महसूस हो रही है. यह दोनों फैसले आने के बाद केंद्र में सत्तारूढ़ दल को तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए. न्यायपालिका के यह फैसले मील का पत्थर हैं और सरकार के खिलाफ महाआदेश है. सरकार में उच्च पदों पर बैठे हुए लोगों को न्यायपालिका डंडेबाजी नहीं करेगी फैसला ही दे सकती है. शर्म तो नरेन्द्र मोदी, राजनाथ सिंह और उनकी कैबिनेट में शामिल सुप्रीम कोर्ट में कार्यरत अधिवक्ताओं को आनी चाहिए.  इस फैसले के बाद भारत में लोकतंत्र व संविधान और मजबूत हुआ है.

सुमन
लो क सं घ र्ष !

मंगलवार, 12 जुलाई 2016

क्या अशोक के बौद्ध धर्म स्वीकार करने और अहिंसा को बढ़ावा देने से भारत कमज़ोर हुआ?


सांप्रदायिक राजनीति अपना एजेंडा लागू करने के लिए अतीत के इस्तेमाल में सिद्धस्त होती है। भारत के
मध्यकालीन इतिहास को पहले ही तोड़ा-मरोड़ा जा चुका है। मुस्लिम राजाओं को विदेशी आक्रान्ता व हिन्दुओं के पीड़क के रूप में प्रस्तुत किया जाना आम है। और अब, प्राचीन इतिहास को तोड़-मरोड़ कर ब्राह्मणवाद को बौद्ध धर्म से श्रेष्ठ सिद्ध करने का अभियान चल रहा है।
इस अभियान के अंतर्गत सांप्रदायिक ताकतों ने सम्राट अशोक पर निशाना साधा है। नोबेल पुरस्कार विजेता अमृत्य सेन के अनुसार, हमारे देश के दो सबसे महान शासक थे अषोक और अकबर। आरएसएस के अनुषांगिक संगठन वनवासी कल्याण परिषद की राजस्थान शाखा के एक प्रकाशन के अनुसार, अशोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने और अहिंसा को बढ़ावा देने से विदेशी आक्रांताओं के लिए भारत पर हमला करना और उस पर विजय प्राप्त करना आसान हो गया। प्रकाशन में यह भी कहा गया है कि अशोक के नेतृत्व में बौद्ध धर्मावलंबियों ने राष्ट्रविरोधी भूमिका अदा की। उन्होंने यूनानी आक्रांताओं की मदद की ताकि वे ‘‘वैदिक धर्म’’ का नाश कर बौद्ध धर्म को उसकी खोई प्रतिष्ठा फिर से दिलवा सकें। यहां जिसे वैदिक धर्म बताया जा रहा है, वह, दरअसल, ब्राह्मणवाद है।
यह दिलचस्प है कि इस लेख में कहा गया है कि बौद्ध धर्म अपनाने के पहले तक अशोक एक महान शासक थे। इसके विपरीत, अधिकांश इतिहासविदों और चिंतकों का मानना है कि अशोक की वे मानवीय नीतियां, जिन्होंने उन्हें महान बनाया, उनके द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने के बाद ही अस्तित्व में आईं। अषोक के बारे में जो भ्रम फैलाया जा रहा है उसके कई आयाम हैं, जिन्हें ब्राह्मणवादी हिंदू धर्म की राजनैतिक आवष्यकताओं के अनुरूप गढ़ा गया है। इनमें से बसिरपैर की एक मान्यता यह है कि भारत हमेशा से राष्ट्र रहा है। तथ्य यह है कि भारत स्वाधीनता संग्राम के दौरान राष्ट्र-राज्य के रूप में उभरा। इसके पहले तक भारत में रियासतें और साम्राज्य थे। इन रियासतों और साम्राज्यों की सीमाएं निष्चित नहीं होती थीं और किसी रियासत या राज्य का आकार उसके शासक के साहस, महत्वाकांक्षा और सैन्य शक्ति सहित अन्य कारकों के आधार पर घटता बढ़ता रहता था। कई बार कुछ शासकों को अपने राज्य से पूरी तरह से हाथ धोना पड़ता था। अशोक के शासन के पहले भी सिकंदर ने भारत पर आक्रमण किया था। उस दौर में राजाओं द्वारा दूसरे शासकों की भूमि को हड़पने के प्रयास बहुत आम थे। प्राचीन भारत में मौर्य एक बड़ा साम्राज्य था।
भारतीय उपमहाद्वीप पर कई राजवंषों का शासन रहा है। परंतु ऐसा कोई शासक नहीं है जिसने आज के संपूर्ण भारत पर  शासन किया हो। तो फिर अशोक को निशाना क्यों बनाया जा रहा है? अशोक, मौर्य वंश  के शासक बिंदुसार के
उत्तराधिकारी थे। चंद्रगुप्त मौर्य ने इस साम्राज्य की नींव रखी थी और अशोक ने कलिंग (आज का ओडिसा) को साम्राज्य का हिस्सा बनाया था। कलिंग के युद्ध में भारी हिंसा हुई थी और इस खून-खराबे ने अशोक पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाने का निर्णय ले लिया। इस तरह एक आक्रामक व असंवेदनशील शासक के मानवतावादी व्यक्ति में बदलने की प्रक्रिया अशोक द्वारा बौद्ध धर्म अपनाने से शुरू हुई। उन्होंने लोगों की भलाई के लिए कई कदम उठाए। ब्राह्मणवादी रूढ़ियों का विरोध किया और अपने महल के दरवाज़े, अपने साम्राज्य के उन लोगों के लिए खोल दिए जिन्हें किसी भी प्रकार की कोई परेशानी थी। बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित होकर उन्होंने एक ऐसे राज्य का निर्माण किया जो सहृदय और जनता का संरक्षक था।
उनके विचार और उनकी नीतियां उनके शिलालेखों से जानी जा सकती हैं, जो देश के कई हिस्सों में स्तंभों और चट्टानों पर उत्कीर्ण हैं। इन शिलालेखों से पता चलता है कि ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी में अशोक ने ऐसी नीतियां अपनाईं जो लोगों के प्रति प्रेम और सहानुभूति से प्रेरित थीं और जिनसे कोई भी प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। यह महत्वपूर्ण है कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी अशोक ने समाज की विविधता को खुले दिल से स्वीकार किया। उनका एक शिलालेख कहता है कि शासक को अपनी प्रजा की आस्थाओं में विविधता को स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने बौद्ध धर्म को विष्व धर्म बनाया। उन्होंने अपने विचार तलवार के ज़ोर पर नहीं बल्कि षब्दों और तर्कों से फैलाए। उनका संदेष था कि दुनिया में कष्ट और दुःख कम करने के लिए हमें षांति, सहिष्णुता और खुलेपन की नीतियां अपनानी होंगी। इन कारणों से अशोक को महान बताया जाता है। इसके उलट, लेख में कहा गया है कि अशोक, बौद्ध धर्म अपनाने के पहले तक एक महान षासक थे।
भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में अशोक से बड़े साम्राज्य पर किसी ने शासन नहीं किया। उनका धम्म शासक और प्रजा दोनों के लिए नैतिक संहिता का निर्धारण करता है। अषोक अपने प्रजाजनों से यह अपेक्षा करते थे कि वे भी नैतिकता के पथ पर चलेंगे। उनके षिलालेख 12 में जो लिखा है उसकी प्रासंगिकता आज भी है और हमें उसके षब्दों को याद रखना चाहिए। इस षिलालेख में सार्वजनिक जीवन में सहिष्णुता और सभ्य व्यवहार अपनाने की बात कही गई है। यह षिलालेख ‘‘वाणी के संयम’’, ‘‘अपने धर्म की तारीफ न करने’’ और ‘‘दूसरे के धर्म की निंदा न करने’’ की बात कहता है (सुनील खिलनानी, इंकारनेषन्सः इंडिया इन 501 लाईव्स, पृ. 52)। ‘‘उन्होंने बौद्ध धर्म को अपने प्रजाजनों पर नहीं लादा। उनकी षांति, दूसरों पर आक्रमण न करने और सांस्कृतिक विजय की नीतियों के कारण वे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक चरित्र हैं’’ (आरएस षर्मा, एन्षियेंट इंडिया, एनसीईआरटी, 1995, पृ. 104)। वे उसी सांस्कृतिक व राजनैतिक बहुवाद के प्रतीक थे जो गांधी और नेहरू की
विचारधारा के केंद्र में थी। चार सिंहों का उनका प्रतीक, भारतीय मुद्रा में अंकित है और उनका चक्र, भारतीय राष्ट्रीय ध्वज का भाग है।
अशोक के षासन को कभी कोई सैन्य चुनौती नहीं मिली। वे 50 से भी अधिक वर्षों तक षासक रहे। 205 ईसा पूर्व में यूनानी सम्राट एन्टियोकस ने उत्तर-पष्चिम से आक्रमण किया और पंजाब व अफगानिस्तान सहित कुछ उत्तर-पष्चिमी हिस्सों पर कब्ज़ा कर लिया। अशोक को असली चुनौती बाहरी आक्रांताओं से नहीं बल्कि उनके साम्राज्य के अंदर से मिली। बौद्ध   धर्म के बढ़ते प्रसार पर ब्राह्मणवादी प्रतिक्रिया उनके लिए सबसे बड़ी समस्या थी। अशोक ने धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान जानवरों की बलि देने पर प्रतिबंध लगा दिया था। इससे ब्राह्मणों की आय में कमी आई। बौद्ध धर्म के प्रसार के कारण वर्ण और जाति व्यवस्था कमज़ोर पड़ी। जिस धार्मिक धारा को सांप्रदायिक ताकतें वैदिक धर्म बता रही हैं वह दरअसल तत्समय में प्रभावकारी ब्राह्मणवाद था।
इन कारकों के चलते अशोक के साम्राज्य में प्रतिक्रांति हुई। प्रतिक्रांति का नेतृत्व किया अशोक के पोते बृहद्रथ के सेनापति पुष्यमित्र षुंग ने, जो कि एक ब्राह्मण था। उसने सम्राट को मौत के घाट उतार दिया और अशोक के साम्राज्य के सिंध के हिस्से में षुंग वंष के षासन की स्थापना की। इस प्रतिक्रांति के परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म उसके मूल देष से गायब हो गया। अंबेडकर लिखते हैं, ‘‘सम्राट अशोक ने जानवरों की बलि देने पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। इसके कारण लोगों ने धार्मिक कर्मकांड संपन्न करवाने के लिए ब्राह्मणों को बुलाना बंद कर दिया। ब्राह्मण पुरोहित बेरोज़गार हो गए। उनका महत्व और सम्मान भी कम हो गया। इसलिए ब्राह्मणों ने मौर्य सम्राट बृहद्रथ के विरूद्ध पुष्यमित्र षुंग के नेतृत्व में विद्रोह किया। षुंग एक सामवेदी ब्राह्मण था और बृहद्रथ की सेना का सेनापति भी’’ (राइटिंग एंड स्पीचेस, खंड-3, पृ. 167)।
आठवीं शताब्दी के बाद से षंकर ने बुद्ध की विचारधारा के खिलाफ वैचारिक लड़ाई जारी रखी। बुद्ध कहते थे कि यही दुनिया असली दुनिया है और हमें इसी पर अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। षंकर कहते थे कि यह दुनिया एक माया है। शंकर की विचारधारा ने अंततः ब्राह्मणवाद को देश में पुनस्र्थापित कर दिया और 1200 ई. के बाद बौद्ध धर्म यहां से पूरी तरह गायब हो गया। फिर अषोक के षासनकाल को आलोचना का विषय क्यों बनाया जा रहा है? अषोक के बौद्ध धर्म अपनाने से ब्राह्मणवाद को बहुत बड़ा धक्का लगा। ब्राह्मणवाद, हिंदू धर्म पर हावी था। अषोक, अहिंसा और बहुवाद में विष्वास करते थे। ये दोनों ही मूल्य हिंदू राष्ट्रवादी एजेंडे के खिलाफ हैं, जिसकी  राजनीति का हिंसा अभिन्न भाग होती है। हिंदू राष्ट्रवादी भी ब्राह्मणवादी मूल्यों को बढ़ावा देना चाहते हैं। तो जहां एक ओर दलितों को संघ परिवार के झंडे तले लाने के प्रयास हो रहे हैं, वहीं बौद्ध धर्म पर हल्ला बोला जा रहा है और सामाजिक पदक्रम को बनाए रखने के सघन प्रयास हो रहे हैं। बौद्ध धर्म जातिविहीन समाज का प्रतीक था। वह बहुवाद और षांति का पैरोकार था। हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा अषोक पर हमला, दरअसल, इन्हीं मूल्यों पर हमला है। यह कहा जा रहा है कि अषोक के बौद्ध धर्म ग्रहण करने से ‘भारत’ कमज़ोर हुआ। सच यह है कि उस समय भारत अस्तित्व में ही नहीं था। मौर्य एक साम्राज्य था राष्ट्र-राज्य नहीं। साम्राज्य बनते-बिगड़ते रहते हैं। अहिंसा की नीति अपनाने के बाद भी मौर्य साम्राज्य 50 वर्षों तक बना रहा। उसे कमज़ोर किया ब्राह्मणवादियों ने। प्राचीन भारत के इतिहास के लेखन के काम में संघी इतिहासविदों की घुसपैठ का लक्ष्य अशोक और उन जैसे अन्य   शासकों के महत्व को कम करना और उन्हें बदनाम करना है।
. -राम पुनियानी

         

सोमवार, 11 जुलाई 2016

स्वर्ग को नरक बना दिया

जम्मू एंड कश्मीर में भाजपा और पीडीपी सरकार ने बुरहान वाणी के सशस्त्र बालों द्वारा मारे जाने के बाद स्तिथ को नियंत्रण में लाने के लिए बल प्रयोग किया जा रहा है. जिसमें अब तक 23 लोग मारे जा चुके हैं. 400 से ज्यादा लोग घायल हैं. दस जिलों में कर्फ्यू लगा हुआ है. पूरे राज्य में इन्टरनेट मोबाइल सेवाएं बंद कर दी गयी हैं. केंद्र सरकार ने शांति कायम करने के लिए सीआरपीऍफ़ की 20 कम्पनियाँ और भेजी हैं. दक्षिण कश्मीर के त्राल शहर में शनिवार को वानी की अंत्येष्टि में 20,000 से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया.
सरकार ने वादा किया कि सुरक्षा बलों की ओर से अनुचित ढंग से बल प्रयोग किया गया है तो उसकी जांच होगी। सरकार ने वादा किया कि सुरक्षा बलों की ओर से अनुचित ढंग से बल प्रयोग किया गया है तो उसकी जांच होगी।
बुरहान वानी के एनकाउंटर के सम्बन्ध में सामाजिक कार्यकर्ता कविता कृष्णन ने कहा कि कथित एनकाउंटर पर शर्म आनी चाहिए। कविता ने कहा कि मैं कह रहूी हूं कि जो मरा है उस पर बाद में चर्चा होगी लेकिन कोई मरे उस पर जांच जरूर होनी चाहिए। उन्होंने कहा बाबा साहेब ने कहा था कि अगर सशस्त्र बल का प्रयोग किसी की हत्या के लिए किया जाए उस पर FIR दर्ज होनी चाहिए और जांच होना चाहिए। ताकि यह पता चलाया जा सके कि बाकई इस तरह का एनकाउंटर आत्मरक्षा के लिए उठाया गया कदम था।
अगर फिरदौस बर्रूए-जमीनस्तो, हमीनस्त, हमीनस्त, हमीनस्तो। अगर पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो यहीं है, यहीं है, यहीं है। फिरदौसी के इस कथन के अनुसार यूँ तो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी और लाल किले तक को यह उपमा दी गई है.  
लेकिन वस्तुस्तिथि यह है कि उस जमीन को अब स्वर्ग से नरक में तब्दील कर दिया गया है और सरकार चाहे जो तर्क दे या पकिस्तान विवाद की बात करे. पकिस्तान से मिलने वाली सीमाओं पर हमेशा शांति बनी रहती है सिर्फ जम्मू एंड कश्मीर की सीमा पर हमेशा अशांति का महाल बना रहता है. मकबूल बट की फांसी के बाद से हमेशा नए-नए आइकॉन पैदा होते हैं बुरहान वानी 15 साल की उम्र से हिंसा के रास्ते पर चल निकला और हम घाटी में अर्ध सैनिक बल को बढाते चले जा रहे हैं राजनीतिक समाधान का प्रयास नहीं किया जा रहा है. जब प्रदेश में भाजपा और पीडीपी की निर्वाचित सरकार है. उसके जनप्रतिनिधि जनता को समझाने में सफल क्यों नहीं हो रहे हैं. वहीँ, मुख्य सवाल यह भी है कि अर्ध सैनिक बलों का काम सीमा पर है व नागरिक क्षेत्रों में सिविल पुलिस का काम क्यों कर रही है. हिंसा पर चल रहे नौजवान को आप बल से ही रास्ते पर नहीं ला सकते हैं. नौजवानों को नयी जिंदगी देने की दिशा में कोई बात सरकारी स्तर पर नहीं हो पा रही है. जनता और सरकार के बीच संवादहीनता की स्तिथि है. ताकत से जनता को नहीं जीता जा सकता है और सत्तारूढ़ भाजपाई कश्मीरियों से मोहब्बत ही नहीं कर सकते हैं. यह उनके वैचारिक चिंतन का दुष्परिणाम है. सरकार को चाहिए की बलों की ज्यादतियों की जांच कराकर दण्डित करें तथा नौजवानों को प्यार से उनके समस्याओं का समाधान ढूँढें. बल प्रयोग से स्तिथि बिगडती जाएगी. दोनों तरफ की हिंसा में स्वर्ग को नरक बना दिया है.

सुमन 

गुरुवार, 7 जुलाई 2016

मानव जाति का हत्यारा टोनी ब्लेयर

भारत की जनता पर ईस्ट इंडिया कंपनी से लेकर इंग्लैंड सरकार ने जो अत्याचार किये थे. वह मानवजाति के लिए कलंक है और उसमें नर पिशाचों की आश्चर्यजनक भूमिका दिखाई देती है. दुनिया में अपने को उच्च समझने वाले यूरोपीय लोगों ने मानव जाति के ऊपर कैसे-कैसे अत्याचार किये. 
                ईराक में सद्दाम हुसैन को फांसी व जनता का नरसंहार इंग्लैंड, अमेरिका और उसकें दोस्त देशों ने किया और 6 लाख से अधिक लोगों को मार डाला था लेकिन जब चिलकॉट जांच समिति की रिपोर्ट आई है तो जिन आधारों के ऊपर ईराक में नरसंहार किया था. वह सब गलत पाए गए. आज भी लाखों विधवाएं बेसहारा हैं.
 इराक़ युद्ध में शामिल होने के फ़ैसले की जांच के लिए गठित चिलकॉट जांच समिति अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सरकार ने सद्दाम हुसैन की तरफ से दिख रहे ख़तरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया और अप्रशिक्षित सैनिकों को युद्ध में भेजा दिया गया.
रिपोर्ट में कहा गया है कि युद्ध में शामिल होने के फ़ैसले का एक कारण यह बताया गया कि इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन के पास सामूहिक विनाश के अस्त्र है, जिनके चलते वह बड़ा खतरा पैदा कर सकते है लेकिन यह अनुमान पूरी तरह अतिरंजित था।
समिति की रिपोर्ट आने के बाद टोनी ब्लेयर के खिलाफ इंग्लैंड में जगह-जगह प्रदर्शन शुरू हो गए हैं तो वहीँ ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने 2003 के इराक़ युद्ध में मारे गए लोगों के परिवार से माफी मांगी है हालांकि उन्होंने यह स्वीकार किया कि वो परिवार उन्हें न कभी भूलेंगे और न माफ़ करेंगे. उन्होंने इस बात को स्वीकार किया कि खुफिया सूचनाएं ग़लत थीं और युद्ध के बाद की योजना खराब थी. इसी के बाद से दुनिया के अन्दर आतंकवाद की एक लहर आई जिसने भी इंसानी खून को बहा रहे हैं  लेकिन इसकी शुरुवात अमेरिकी साम्राज्यवाद ने शुरू की थी और पूरी दुनिया में आतंकवादी और नर पिशाच की भूमिका में पहले इंग्लैंड और अब अमेरिका और इंग्लैंड दोनों के चेहरे दिखाई देते हैं.इन देशों की खुशहाली का राज  मानव रक्त की नदियाँ बहा देने में छिपा हुआ है. साम्राज्यवाद का असली चेहरा एक खूनो दैत्य का चेहरा होता है जो पूरी दुनिया के अन्दर मानव जाति का रक्त पीने के लिए हमेशा लालायित रहता है और आज भी साम्राज्यवाद मानव रक्त को बहाकर मुनाफे को बढ़ा रहा है. दुनिया में आतंकवाद समाप्त करने के लिए ईराक युद्ध व सद्दाम हुसैन की फांसी के जिम्मेदार राष्ट्राध्यक्षों को  पकड़ कर युद्ध अपराधी की तरह मुकदमा चला कर सजा-ए-मौत देनी चाहिए जिससे दुनिया के अन्दर शांति कायम हो सके नहीं तो विभिन्न देशों के राष्ट्राध्यक्ष जो हथियार सौदागरों के एजेंट की भूमिका में हैं वह अपने हतियारों का प्रदर्शन करने के लिए इसी तरह नरसंहार करते रहेंगे और उसके प्रतिशोध में आतंकवाद जारी रहेगा. 

सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 6 जुलाई 2016

उघरहिं अंत न होइ निबाहू....


लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥ 
  
जो लोग साधु का भेष धारण करके संसार के लोगों को ठगते हैं जिनके भेष को देखकर संसार उनको पूजता है, परन्तु अंत में एक दिन उनका कपट सबके सामने आ ही जाता है, जिस प्रकार कालनेमि, रावण और राहु का कपट सबके सामने आया था उसी तरह से   नागपुरी मुख्यालय के गोबिल्सों ने देश में लोकतंत्र का अपहरण कर लिया है अब उनकी कलाई खुलने लगी है औरअब वह हर मोर्चे पर पराजित नजर आ रहे हैं.

                                        उत्तर प्रदेश से भारतीय जनता पार्टी के पास 71 लोकसभा सदस्य हैं. पूरे प्रदेश से 80 लोकसभा सदस्य चुने जाते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर जातीय समीकरण बैठाने के लिए केन्द्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल किया गया है. इस कार्य के विश्लेषण से यह लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी व भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित जैन शाह को मीडिया द्वारा पैदा किये हुए जादू के ऊपर विशवास नहीं रह गया है.
जिन नारों और जिन घोषणाओं के आधार पर उत्तर प्रदेश से 71 लोकसभा सदस्यों का चुनाव जीता जाना एक सम्मोहन पूर्ण स्तिथि का होना था. अब न वो वायदे रहे न वो नारे रहे और सम्मोहन भी टूटा है. ऐसी स्तिथि में जब नरेन्द्र दामोदर मोदी और अमित जैन शाह की कार्यकुशलता आ चुकी है तो उनका विशवास पूरी तरह से खंडित हो रहा है. 
             उनके पास संघ द्वारा अफवाहों को उड़ाने की मशीन और उसके पश्चात प्रदेश में सांप्रदायिक उन्माद के अलावा कोई बात बची नहीं है. महंगाई, बेरोजगारी, शोषण, अत्याचार को रोकने की दिशा में मोदी सरकार एक कदम भी आगे नहीं बढ़ी है और उसके विपरीत रेलवे के किराए में जिस तरीके से आये बढ़ोत्तरी की जा रही है वह एक तरह से लूट की किस्म का अपराध भी है. आत्महत्या कर रहे किसान को मोदी सरकार को देने के लिए कुछ नहीं बचा है तो विदेशी कंपनियों द्वारा किसानो से जबरदस्ती पैसा लेकर फसल बीमा योजना जरूर करायी जा रही है. सरकार के पास बीमा के अतिरिक्त कोई बात नहीं है वैसे भी संघ के स्वयं सेवक ज्यादातर जीविकापार्जन करने के लिए बीमा एजेंट रहे हैं तो उनका सिर्फ एक ही उद्देश्य है कि वर्तमान में भूखे मर जाओ और मरने के बाद वारिसों को धन मिलेगा और तुमको स्वर्ग. 
      देश के कल्याणकारी स्वरूप को बदल कर कॉर्पोरेट सेक्टर के मुनाफे को बढाने के लिए केंद्र की सरकार कटिबद्ध है जुलाई में सरकारी कर्मचारियों की हड़ताल की घोषणा की जा चुकी है इस बदहाली की स्तिथि में गेरुआ या भगवा आतंकियों के लिए नया मुखौटा फिलहाल नहीं मिल पा रहा है. 

सुमन 

क्या आरएसएस कार्यकर्ताओं को सरकारी सेवाओं में नियुक्त किया जाना चाहिए?

एक पुराना विवाद एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है। आरएसएस से संबद्ध उम्मीदवारों को कथित रूप से सरकारी नौकरियों में नियुक्त न किए जाने पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह ने 16 जून, 2016 को कहा, ‘‘भारत सरकार ने कोई ऐसा आदेश (सरकारी कर्मचारियों के आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने को प्रतिबंधित करते हुए) जारी नहीं किया है और यदि ऐसा कोई पुराना आदेश है तो हम उसका पुर्नावलोकन करेंगे।’’ आरएसएस के प्रचार प्रमुख मनमोहन वैद्य पहले ही कह चुके हैं कि ‘‘आरएसएस के सदस्यों की सरकारी सेवाओं में नियुक्ति पर प्रतिबंध अन्यायपूर्ण और गैर-प्रजातांत्रिक होगा। इस तरह के प्रतिबंधों से आरएसएस के काम पर कोई असर नहीं पड़ता और ना ही उससे स्वयंसेवकों का मनोबल गिरता है।’’
शासकीय सेवकों के लिए किसी भी राजनैतिक संगठन की गतिविधियों में भाग लेना प्रतिबंधित है। आरएसएस स्वयं को सांस्कृतिक संगठन बताता है और इसी बहाने से कुछ राज्य सरकारों ने शासकीय सेवकों को आरएसएस की गतिविधियों में हिस्सा लेने की अनुमति प्रदान की है। गुजरात में जब जनवरी 2000 में राज्य सरकार ने यह अनुमति दी, तब इसका व्यापक विरोध हुआ जिसके चलते राष्ट्रपति ने इस पर आपत्ति उठाई। इसके पष्चात, श्री वाजपेयी ने गुजरात भाजपा को यह निर्देश दिया कि यह अनुमति वापस ले ली जाए। सन 2006 में मध्यप्रदेश की शिवराज सिंह चैहान सरकार ने शासकीय सेवकों को संघ की गतिविधियों में भाग लेने की इजाज़त दे दी।
भारतीय संविधान और संसदीय प्रजातंत्र का यह मूलभूत सिद्धांत है कि शासकीय सेवकों को पूरी तरह से निष्पक्ष और राजनीति-निरपेक्ष होना चाहिए। आरएसएस ने पहले ही राज्यतंत्र के विभिन्न हिस्सों में घुसपैठ बना ली है और उसके स्वयंसेवक राज्य और केंद्र सरकारों में विभिन्न पदों पर हैं। इसके अतिरिक्त, समाज की मानसिकता में इस तरह का परिवर्तन कर दिया गया है कि पुलिस और प्रशासन के अधिकारी अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा के प्रति या तो आंखे मूंदे रहते हैं या हमलावरों का साथ देते हैं। सांप्रदायिक दंगों की जांच के लिए नियुक्त अनेक जांच आयोगों ने अल्पसंख्यकों के कत्लेआम में आरएसएस व पुलिस व प्रषासनिक अधिकारियों की मिलीभगत की ओर संकेत किया है। ज़ाहिर है कि अगर शासकीय सेवकों को आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने की खुली छूट दे दी जाएगी तो इससे शासकीय सेवाओं का पूरी तरह से सांप्रदायिकीकरण हो जाएगा।
आरएसएस के इस तर्क का क्या कि वह एक राजनैतिक संगठन नहीं है बल्कि हिंदू राष्ट्र के निर्माण के प्रति प्रतिबद्ध एक सांस्कृतिक संगठन है। यह दावा अपने आप में परस्पर विरोधाभासी है। जब राष्ट्र निर्माण एक राजनैतिक प्रक्रिया है, तब यह संगठन भला किस तरह केवल सांस्कृतिक संगठन होने का दावा कर सकता है। आरएसएस की गतिविधियां राजनीति के क्षेत्र में उसके हस्तक्षेप और उसकी राजनैतिक शाखा भाजपा पर उसके पूर्ण नियंत्रण से किसी के मन में भी यह संदेह बाकी नहीं रह जाना चाहिए कि संघ कोई सांस्कृतिक संगठन न होकर शुद्ध राजनैतिक संगठन है। ज्ञातव्य है कि आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक, भाजपा की जिला इकाईयों से लेकर केंद्रीय कार्यकारिणी तक में संगठन महासचिव के रूप में नियुक्त किए जाते हंै। ऐसा ही भाजपा के पूर्व अवतार जनसंघ के मामले में भी किया जाता था और इस व्यवस्था का विरोध करने पर जनसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष बलराज मधोक को अपने पद से हाथ धोना पड़ा था। आरएसएस एक राजनैतिक संगठन है जो अपने विभिन्न अनुषांगिक संगठनों के ज़रिए काम करता है। इनमें से कई संगठन स्वयं को अराजनैतिक बताते हैं परंतु वे सब आरएसएस के राजनैतिक लक्ष्य को हासिल करने में रत हैं।
षुरूआत में आरएसएस केवल राजनैतिक कार्यकर्ताओं-जिन्हें वह स्वयंसेवक कहता है-को प्रशिक्षण देने का काम करता था। सन 1952 से उसने राजनैतिक संगठनों का गठन करना शुरू किया। पहले भारतीय जनसंघ बना और फिर भाजपा। इसके पहले, सन 1936 में संघ ने राष्ट्रसेविका समिति और 1948 में एबीपी का गठन किया था। जनसंघ पर आरएसएस का पूर्ण नियंत्रण था। सन 1998 में आरएसएस ने केंद्रीय मंत्रिमंडल के गठन में सीधे हस्तक्षेप किया था। यहां तक कि आरएसएस के निर्देश पर जसवंत सिंह के स्थान पर यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्री नियुक्त किया गया था। लालकृष्ण आडवाणी द्वारा जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताए जाने पर आरएसएस ने उनका खुलकर विरोध किया था।
सन 1978 में उच्चतम न्यायालय में दाखिल  शपथ पत्र में आरएसएस के दो बड़े नेताओं बाला साहब देवरस और राजेन्द्र सिंह ने कहा था, ‘‘आरएसएस न तो धार्मिक और ना ही परोपकारी संस्था है परंतु उसके लक्ष्य संस्कृति और देशभक्ति से जुडे हुए हैं। यद्यपि आरएसएस वर्तमान में एक राजनैतिक दल नहीं है परंतु उसके लक्ष्य राजनीति से मिलते-जुलते हैं। वर्तमान में आरएसएस का संविधान उसे एक नीति के तहत राजनीति में सक्रिय भागीदारी करने की इजाज़त नहीं देता...कल यह नीति बदल सकती है और आरएसएस रोजमर्रा की राजनैतिक गतिविधियों में राजनैतिक दल की तरह हिस्सेदारी कर सकता है क्योंकि नीतियां स्थायी नहीं होती और ना ही अपरिवर्तनीय होती हैं।’’
किसी संगठन की प्रकृति का आंकलन हम किस आधार पर करें? उसके दावे के आधार पर या उसकी गतिविधियों के आधार पर? आरएसएस का यह दावा कि वह एक सांस्कृतिक संगठन है, आधारहीन है। वह प्रत्यक्ष व परोक्ष तरीकों से और रिमोट कंट्रोल का इस्तेमाल कर राजनीति में भागीदारी करता है। उसके स्वयंसेवक महात्मा गांधी और पास्टर स्टेन्स की हत्या में शामिल थे और बाबरी मस्जिद के ध्वंस में उनकी भूमिका थी। यहां यह महत्वपूर्ण है कि जनता पार्टी से दोहरी सदस्यता के मुद्दे पर जनसंघ अलग हो गया था। वाजपेयी ने बड़े गर्व से यह घोषणा की थी कि वे पहले  स्वयंसेवक हैं और बाद में  प्रधानमंत्री। हाल में इसी मुद्दे पर उनकी आलोचना किए जाने पर केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था ‘‘हम ही आरएसएस हैं।’’
आरएसएस के विभिन्न अनुषांगिक संगठन, समाज के अलग-अलग तबकों में काम करते हैं और उनका मुख्य उद्देष्य समाज की विचार प्रक्रिया पर नियंत्रण स्थापित करना है। सरस्वती शिशु मंदिरों में बच्चों को प्रशिक्षण दिया जाता है तो शाखाओं में बौद्धिकों के ज़रिए स्वयंसेवकों को राजनीति का पाठ पढ़ाया जाता है। अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के ज़रिए संघ अपने विभिन्न अनुषांगिक संगठनों की गतिविधियों पर नज़र रखता है और उनके बीच समन्वय करता है। वह मनसा, वाचा, कर्मणा राजनैतिक है।
सत्ता में न रहते हुए भी संघ विभिन्न तरीकों से राजनीति पर नियंत्रण रखता है। इस समय तो अनेक राज्य सरकारें व केंद्र सरकार भी उसके नियंत्रण में है और दिल्ली से लेकर राज्यों तक उसका एजेण्डा जोरशोर से लागू करने में जुटी र्हुइं हंै। अगर सरकारी कर्मचारियों को संघ की गतिविधियों में भागीदारी करने की अनुमति दे दी जाएगी तो इससे विघटनकारी ताकतें ओर मज़बूत हांेगी और भारतीय संविधान के अनुरूप शासन का संचालन मुष्किल हो जाएगा। यह जानते हुए भी कि इस तरह की अनुमति दिया जाना कानूनन वैध नहीं है, कई सत्ताधारी लोग शासकीय सेवकों को आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेेने की इजाज़त देने और आरएसएस के कार्यकर्ताओं को शासकीय सेवाओं में नियुक्ति देने की वकालत कर रहे हैं।
इस सिलसिले में जो कुछ कहा जा रहा है वह कानूनी दृष्टि से अवैध है और भारतीय संविधान के अनुरूप नहीं है।
-राम पुनियानी
 

सोमवार, 4 जुलाई 2016

आमि निर्दोष-1

      उनीदे शहर ने सुबह की अंगड़ाई ली। वह लौटी तो बड़बड़ाती आ रही थी- ‘हाय किसी ने उसकी नहीं सुनी। पन्द्रह अगस्त से एक दिन पहले ही मार डाला।....काहे का पन्द्रह अगस्त है.....हमारा तो जी खराब हो गया। जैसे अंग्रेज थे ऐसे ही ये हैं...’अखबार मेरी ओर उछालकर बोली- ‘लो पढ़ लो। आपका कानून कहता है कि मरने वाला झूठ नहीं बोलता। इसीलिए डाइंग डिक्लरेशन पर भरोसा करते हैं न? तो इस पर किसी ने भरोसा क्यों नहीं किया? फाँसी के तख्ते पर भी उसने यही कहा-मैं निर्दोष हूँ। वह भी तो मरने जा रहा था। अरे, जल्लाद तक काँप उठा। पर आपके कानून का कलेजा नहीं पसीजा।’ वह चाय लेने चली गई। जिस तरह वह ‘आपका कानून’ कह कह गई थी उससे मैं चैंका जरूर। लेकिन पिछले चार दिन से धनंजय चटर्जी को फाँसी के मामले में उसने अपना जो क्षोभ और उत्तेजना प्रकट की थी उसे देखते हुए मैंने न उलझना ठीक समझा।
अंततः छीन ली गईं धनंजय की साँसें।
अगस्त 15, 2004।
    कोलकाता। चैदह साल पहले एक किशोरी से दुष्कर्म और हत्या के दोषी धनंजय चटर्जी को शनिवार सुबह यहाँ अलीपुर सेन्ट्रल जेल में फाँसी दे दी गई। धनंजय के बूढ़े माता-पिता और उसकी पत्नी ने खुद को अपने घर में कैद रखा और उसका शव लेने नहीं आए। बेटे की मौत की खबर पाकर उसके पिता बंशीधर चटर्जी और माँ बेला रानी देवी की तबियत बिगड़ गई।
दो शब्द
    फाँसी के तख्ते से उसने कहा- ‘‘मैं निर्दोष हूँ।’’ उसकी चीत्कार की प्रतिध्वनि हजारों मील दूर मैंने भी सुनी। कोर्ट-कचहरी और थाने-चैकियों में कानून के मकड़जाल में फँसे अनगिनत साधारण लोगों की वह चीत्कार थी। इस पुस्तक में काश्मीरा सिंह, शमसुद्दीन, अमित और मुस्तकीम से आप मिलेंगे। वे सब उसकी आह में आह मिला रहे थे।
    स्वतंत्रता की 57वीं सालगिरोह से एक दिन पूर्व ही उसे फाँसी दी गई थी। वह न तो ईसा और सुकरात की तरह महान दार्शनिक था और न ही सरदार भगत सिंह की तरह महान क्रान्तिकारी था। उसने अपने जीवन में कोई ऐसा काम भी नहीं किया था जिसके लिए समाज उसे आदरपूर्वक याद करता। वह स्थापित राज्य सत्ता के लिए कोई गंभीर चुनौती भी नहीं था। वह पाप-पुण्य का पुतला साधारण नागरिक था। उसे हमारे देश के न्याय तंत्र ने बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध का दोषी पाया था।
    वह धनंजय चटर्जी था।
    धनंजय चटर्जी से मेरा कोई परिचय, सम्बन्ध या सरोकार उसके जीते जी नहीं रहा। परन्तु 15 अगस्त 2004 की प्रातः मरणोपरान्त वह मेरे घर और मित्रों की चर्चा में मुख्य अतिथि था। वह चर्चा ही इस पुस्तक की प्रस्तुति है जहाँ धनंजय के हवाले से आपको हमारे न्यायनिकेतनों के हाल चाल की झलक भी मिलेगी।
    मेरा विनम्र प्रयास है कि तंत्र के क्रूर हाथों प्रजा को प्राप्त हो रही पीड़ा हमारे उन प्रभुओं तक पहुँचे और उसके जीवन के प्रति सम्मान का भाव न्याय के केन्द्र में प्रतिष्ठित हो, यही इस कृति का अभीष्ट है।
    हाँ, साहित्य के शिल्प की दृष्टि से इस पुस्तक में दोष हो सकते हैं। मानवीय सम्वेदनाओं, सामाजिक सरोकारों और यथार्थ की जो सशक्त अभिव्यक्ति कवि और लेखक कर सकते हैं, वह मुझ जैसे साधारण अधिवक्ता के लिए कहाँ संभव है! इसलिए शास्त्रीय साहित्यिक मापदण्डों पर जहाँ जो भी त्रुटि हो उसे किसी बालक की तोतली बोली के दोष मानकर क्षमा कर दें।
क्रमशः..........
-मधुवन दत्त चतुर्वेदी

लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2016 अंक में प्रकाशित