सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

मोदी साहब लूट ऐसी होनी चाहिए , जनता के शरीर पर खाल भी न रहे

मोदी साहब लूट ऐसी होनी चाहिए कि जनता के पास उसके शरीर पर खाल भी न रहे. इसी उद्देश्य से यह प्रस्ताव किया गया है कि हर बैंकिंग ट्रांजैक्शन पर सिर्फ 2% टैक्स लगाया जाए तो सरकार की इनकम में जबर्दस्त बढ़ोतरी होगी। 
इसका सीधा-सीधा यह उद्देश्य है कि बड़े उद्योगपति जो टैक्स चुराने का काम करते हैं और उनका सारा व्यापार बैंक के खातों से अलग रहकर होता है. उनके ऊपर कइस तरह के कानून का कोई असर नहीं होगा. असर आम जनता या मेहनतकश जनता के ऊपर होगा. अगर वह अपने बच्चे की फीस के लिए बैंक अकाउंट से 10000 रुपये निकलेगी तो उसका दो प्रतिशत 200 रुपये सरकार के खाते में चला जाए अगर वह बीमार है तो एक लाख रुपये निकालने पर 2000 रुपये सरकार के खाते में तुरंत चला जायेगा यह योजना मोदी सरकार की है. इसकी रूप रेखा नागपुर में बैठे हुए अर्थशास्त्रियों की है. 
        यह सरकार ब्लैक मनी को बढ़ावा देने के लिए तथा देश की नब्बे प्रतिशत आबादी की मेहनत की कमाई को छीनने के लिए इस तरह का जजिया कर लगाने की सोच रही है. अगर जिंदा रहना है तो इस तरह के कराधान आपको अदा करना है. 
जज़िया एक प्रतिव्यक्ति कर है, जिसे एक इस्लामिक राष्ट्र द्वारा इसके गैर मुस्लिम पुरुष नागरिकों पर जो कुछ मानदंडों को पूरा करते हों, पर लगाया जाता था. मोदी सरकार देश के हर व्यक्ति पर इस तरह का कानून लागू कर नया जजिया कर लागू करना चाहती है.
अच्छे दिनों की चाहत में भेडियों की जमात में खरगोश फंस गए हैं. अब देखना है कि खरगोशों की क्या हालत होगी. तुलसीदास की यह सोच इस समय बखूबी लागू होती है. विभीषण भी अफीम के नशे में है. जग नहीं सकता है.
लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा॥
मन महुँ तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥

वहीँ, देश के अन्दर जाति और धर्म के मामले कॉर्पोरेट सेक्टर के पैसे से उठाये जाते हैं जिससे बहुसंख्यक जनता जाति और धर्म के मामलों में फंसी रहे और कसाई अपने काम खाल उतारने का ख़ूबसूरती व बेधड़क तरीके से करते रहे. 


सुमन 

रविवार, 7 फ़रवरी 2016

आत्महत्यायें किसान कर रहा है और छूट उद्योगपतियों को

        स्वामी सहजानन्द सरस्वती, राहुल सांस्कृत्यायन, जयबहादुर सिंह  भातखण्डे राय, जैसे किसान नेताओं के आन्दोलन से जमीनदारी का खात्मा हुआ और देश की बहुसंख्यक आबादी के हिस्से में जमीन आयी थी।                                            
                                  यह उद्गार व्यक्त करते हुए किसान सभा के प्रदेश महासचिव व पूर्व विधायक राजेन्द्र यादव ने कहा कि देश में किसान आत्महत्यायें कर रहा है और छूट उद्योगपतियों को दी जा रही है।
                             सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि किसान जब तक संघर्ष की राह में नहीं उतरेगा तब तक देश और दुनिया में बदलाव सम्भव नहीं है। किसान सभा इस काम को पूरा करेगी।
                                                      पार्टी के सहसचिव रणधीर सिंह सुमन ने कहा कि किसानों की एकता को तोड़ने के लिए विभिन्न राजनैतिक दल उद्योगपतियों से पैसा लेकर राजनीति व धर्म को बढ़ावा देते हैं। चुनाव में किसान की बात होती है और चुनाव के बाद उद्योगपतियों की बात होने लगती है।
                                                      डा0 कौसर हुसैन ने कहा कि यह सरकार किसान के जल, जंगल, जमीन को छीन लेना चाहते हैं और उद्योगपतियों को मुनाफा दिलाने के लिए प्रधानमंत्री विदेश यात्रा कर रहे हैं।
                                                           सम्मेलन को डा0 उमेशचन्द्र वर्मा सहित कई लोगों ने सम्बोधित किया। सम्मेलन में विनय कुमार सिंह को अध्यक्ष व सत्येन्द्र कुमार को महामंत्री, कोषाध्यक्ष पुष्पेन्द्र कुमार, मंत्री नीरज वर्मा, रामनरेश वर्मा, मुनेश्वर वर्मा तथा उपाध्यक्ष में दलसिंगार, गिरीशचन्द्र को बनाया गया।
    इस अवसर पर किसान सभा के महासचिव ने एक कलेण्डर का विमोचन भी किया।


शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

डॉलर की मौत, नए मनुष्य का जन्म

डॉलरब्रिटिश साम्राज्यवाद की ताकत पौंड थी जिसकी बदौलत उसके राज्य का सूरज अस्त नहीं होता था जिसका सीधा अर्थ यह था कि इंग्लैंड के राज्य में सूरज कहीं न कहीं उसकी रोशनी से प्रकाशमय होता था. उसकी मुद्रा पौंड में गिरावट आई और डॉलर ने ताकत ली. इंग्लैंड से ताज अमेरिका चला गया. अमेरिकी साम्राज्यवाद का ताज आज दुनिया में शासन का एक प्रमुख अस्त्र है. बहुत सारी सरकारें उस ताज की बदौलत अपने-अपने देशों में राज कर रही हैं. उसकी चापलूसी में अपने देश में नागपुरी मुख्यालय उसके गीत गाने में लगा रहता है. गीत गुनगुनाता रहता है. आज कल जो मुख्य गीत गुनगुनाया जा रहा है 'आतंकवाद खत्म कर दो, आतंकवाद ख़त्म कर दो'.ये नकली गीत नए मुखौटों के साथ गाया जा रहा है. सभी जानते हैं की आतंकवाद का सरगना अमेरिका और उसका साम्राज्यवाद है. उसकी चेलाही नागपुर मुख्यालय करता है. पहले नागपुर ब्रिटिश साम्राज्यवाद के गीत गाता था और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद के गीत गाता है लेकिन वह नहीं भूला है अपने बाप एडोल्फ़ हिटलर को और उसकी मानवता को शर्मसार करने वाली कत्लेआम की घटनाएं.
           विश्व परिद्रश्य बदल रहा है. डालर दुनिया में अपना शासन स्थापित करने में असमर्थ हो रहा है. डॉलर के ख़त्म होने का मतलब है कि सम्पूर्ण मानवता के खिलाफ जारी एक युद्ध की समाप्ति. इस काम में चीन, ईरान सहित जो आर्थिक समझौते और मानवता को अमेरिकी साम्राज्यवाद से बचाए रखने के लिए जो रास्ते खोजे जा रहे हैं उसी के सन्दर्भ में अमेरिकी-जर्मन विद्वान, इतिहासकार और रणनीतिक जोखिम परामर्शदाता विलियम एंगडाह्ल ने ‘न्यू ईस्टर्न आउटलुक’ पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख में कहा है:
“कभी-कभी वैश्विक राजनीति में युगांतरकारी परिवर्तन ऐसी घटनाओं से आरम्भ होते हैं जिनकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता| चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की हाल ही की तेहरान यात्रा ऐसी ही एक घटना है| इन वार्ताओं के परिणाम यह दिखाते हैं कि शांतिपूर्ण आर्थिक विकास में विश्वास रखने वाले देशों के यूरेशियाई स्वर्ण त्रिकोण की जीवानाधारी तीसरी भुजा अब पा ली गई है|”  
                एंगडाह्ल ने यह निष्कर्ष व्यक्त किया है: “रेशम मार्ग की योजना में यह लक्ष्य निर्धारित है कि रेलवे इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास इस तरह किया जाएगा ताकि इससे नए स्वर्ण-खनन कार्य को मदद मिले जो यूरेशियाई सदस्य देशों  की मुद्राओं की पीठ मजबूत करेगा| अब ईरान अपने अभी तक अछूते पड़े स्वर्ण-भंडारों के साथ भी इस योजना में शामिल हो जाएगा तो कर्ज में डूबी, अतिशय स्फीति से ग्रस्त डालर प्रणाली के लिए एक घातक सकारात्मक विकल्प पैदा हो जाएगा जो शांति और विकास के लिए कृतसंकल्प है|”
वह कहते हैं: “ईरान और चीन के बीच नवीनतम व्यापर समझौतों के बाद ‘चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर’ का जीवनदायक महत्व और भी बढ़ गया है”|
डॉलर की मौत का मतलब है. सम्पूर्ण मानवता को नया जीवन. हमारे देश में डॉलर की मौत का मतलब है नागपुर मुख्यालय की मौत. इसका स्वभाव रहा है पहले ब्रिटिश साम्राज्यवाद के जूतों में पोलिश करना और अब अमेरिकी साम्राज्यवाद के जूतों की चमक को बढाने के लिए नरम ओठों से उसको चमकाना.

सुमन 

गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

लोकसंघर्ष पत्रिका का विशेष अंक 2016

लोकसंघर्ष  पत्रिका  का विशेष  अंक

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

पुलिस है या गणवेशधारी

दिल्ली में आरएसएस मुख्यालय के सामने छात्र-छात्रों के प्रदर्शन पर दिल्ली पुलिस ने चापलूसी में जमकर लाठी चार्ज किया इस लाठी चार्ज में पुलिस के साथ-साथ संघी व अराजक तत्व भी छात्र-छात्रों को पीटने में आगे थे.
इस सम्बन्ध में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर मिस्टर बी.एस. बस्सी ने कहा कि छात्र-छात्रों के प्रदर्शन में उकसावेपूर्ण  कार्यवाई के कारण बल प्रयोग करना पड़ा. लोकतंत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शन कार्यों के ऊपर लाठी चार्ज या बल प्रयोग करना कानून और संविधान का स्पष्ट उल्लंघन है. छात्र अगर उकसावे पूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे तो क्या बस्सी साहब और उनकी पुलिस लाठी चार्ज व बल प्रयोग संघी गुंडों के साथ करके भारतीय संविधान व कानून व्यवस्था को गंगा स्नान कराकर पवित्र गाय बना रहे थे.  लोकतंत्र में और वर्तमान सरकार में जिम्मेदारीपूर्ण पदों पर बैठे हुए लोग अपनी जिम्मेदारियों का संविधान व कानून के हिसाब से पालन नहीं कर रहे हैं. चापलूसी कर सत्तारूढ़ दल के नेताओं को खुश करने की जो प्रक्रिया है वह लोकतंत्र और संविधान के लिए घातक है. उकसावे में आकर क्या पुलिस बल जनता को मार डालेगा. उकसावे में आकर क्या वह संविधान और कानून को छोड़ कर गुंडागर्दी की स्तिथि में आ जायेगा. बस्सी साहब का यह बयान निश्चित रूप से दुर्भाग्यपूर्ण है. रिटायरमेंट के बाद और कुछ पाने की इच्छा और आकांक्षा इस तरह के कार्यों को करने के लिए प्रेरित करती है.   

संघी गुण्डों और संघी पुलिस की एकता का अदभुत नजारा और झूठ के दोनों कारखाने इस एकता को नकार रहे हैं।

दिल्ली पुलिस ने पिछले वर्ष 2015 में 10 निरीक्षकों समेत करीब 490  कर्मियों को निलंबित किया गया और इसके साथ ही भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों के खिलाफ शुरू की गई, सतर्कता जांच की संख्या में 55 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार निलंबित किए गए अधिकारियों में 90 उप-निरीक्षक, 46 सहायक उप-निरीक्षक, 97 हेड कांस्टेबल और 247 कांस्टेबल शामिल हैं। अगर सावधानीपूर्वक दिल्ली पुलिस के सम्पूर्ण क्रियाकलापों की जांच की जाए तो उसका और भयानक चेहरा सामने आएगा. उकसावेपूर्ण कार्यवाई की बात कहकर बचाव करना कहीं से उचित नहीं है.
संघी अपने को पुलिस के साथ होने पर बहुत बहादुर समझते है. पहले यह ब्रिटिश पुलिस के साथ यही काम करते थे और अब दिल्ली पुलिस के साथ. मुखबिरी इनका मुख्य पेशा रहा है. बटेश्वर इनका मुख्य चेहरा है मुख्य पहचान है.  
 
सुमन 

मंगलवार, 26 जनवरी 2016

कश्मीरी पंडितों की बदहाली का राजनीतिकरण


                                      राजनीति एक अजब-गजब खेल है। इसके खिलाड़ी वोट कबाड़ने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। इन खेलों से हमें संबंधित खिलाड़ी की राजनैतिक विचारधारा का पता तो चलता ही है, इससे हमें यह भी समझ में आता है कि इस खेल में किस तरह घटनाओं को तोड़ा-मरोड़ा जाता है और एक ही घटना की किस तरह परस्पर विरोधाभासी व्याख्याएँ की जाती हैं।कश्मीरी पंडितों के मामले में भी ऐसा ही कुछ हो रहा है।
                                      अपने चुनाव अभियान के दौरान, भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी ने कई ऐसी बातें कहीं जो या तो तथ्यात्मक दृष्टि से गलत थीं या फिर घटनाओं की सांप्रदायिक व्याख्या पर आधारित थीं। उन्होंने कहा कि देश  के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को सबसे बड़ी चोट तब पहुंची जब कश्मीरी पंडितों को कश्मीर घाटी से पलायन करना पड़ा। उन्होंने यह दावा भी किया कि इसके पीछे अब्दुल्ला (शेख, फारूख व उमर) थे। यह बात उन्होंने 28 अप्रैल, 2014 को एक जनसभा में कही। जवाब में फारूख और उमर अब्दुल्ला ने कहा कि कश्मीरी पंडितों के पलायन के समय कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था और भाजपा नेता जगमोहन, राज्य के राज्यपाल थे। उस समय केन्द्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी, जिसे भाजपा बाहर से समर्थन दे रही थी। तीनों अब्दुल्लाओं में जमीन-आसमान का फर्क है। उनकी भूमिकाएँ अलग-अलग रही हैं। वे तीनों घर्मनिरपेक्षता के पैगम्बर भी नहीं हैं। परन्तु घाटी से पंडितों के पलायन के लिए केवल उन्हें जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
                                                 सच यह है कि सांप्रदायिकता, हमेशा से भारतीय उपमहाद्वीप का अभिशाप रही है और इसका सबसे त्रासद नतीजा था भारत का विभाजन, जिसमें लाखों लोगों ने अपनी जानें गवाईं और अपने घरबार और धंधा-रोजगार खो बैठे। सांप्रदायिकता के दानव के कारण ही सीमा के दोनों ओर रहने वाले लाखों लोगों को अपनी जन्मभूमि से सैंकड़ों मील दूर, अनजान शहरों और गांवों में स्थानीय लोगों और सरकार के रहमोकरम पर बसना पड़ा। सांप्रदायिकता के कारण षहरों के अंदर भी पलायन की प्रवृत्ति बढ़ी है। मुंबई में 1992-93 और गुजरात में 2002 के दंगों के बाद, हजारों लोगों ने अपने घरबार छोड़कर ऐसे मोहल्लों में बसने का निर्णय लिया जहां उनके समुदाय के लोगों का बहुमत था। इससे कई शहरों में एक ही समुदाय के लोगों की बस्तियां बस गईं। मुम्बई में मुंबरा और अहमदाबाद में जुहापुरा ऐसी बस्तियों के उदाहरण हैं।
                                                   कश्मीरी पंडितों के घाटी से पलायन के मूल में है विभाजन के बादकश्मीर के महाराजा का स्वतंत्र बने रहने का निर्णय। इसके बाद, पाकिस्तान कबायलियों ने कश्मीर  पर हमला कर दिया, शेख अब्दुल्लाह ने पाकिस्तान की बजाए भारत के साथ विलय पर जोर दिया और कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने भारत के साथ संधि पर हस्ताक्षर कर दिए। शेख अब्दुल्ला ने मुस्लिम-बहुल पाकिस्तान की बजाए हिन्दू-बहुल भारत को इसलिए चुना क्योंकि उन्हें यह दृढ़ विश्वास था कि गांधी और नेहरू के नेतृत्व में भारत में धर्मनिरपेक्षता जीवित रहेगी और फूले-फलेगी। सांप्रदायिक तत्वों द्वारा गांधी जी की हत्या, संविधान के अनुच्छेद 370 को रद्द करने के लिए फिरकापरस्त ताकतों द्वारा दबाव बनाए जाने जाने आदि के चलते कश्मीर  की स्वायत्ता  पर प्रश्न  उठाए जाने लगे।
                                                  यह महत्वपूर्ण है कि अनुच्छेद 370, कश्मीर के भारत में विलय का आधार था। इस अनुच्छेद के अंतर्गत रक्षा, संचार, मुद्रा और विदेशी मामलों को छोड़कर सभी मसलों में निर्णय लेने की कश्मीर की विधानसभा को पूरी स्वायत्ता  थी। सांप्रदायिक ताकतें इस स्वायत्ता के विरूद्ध थीं और चाहती थीं कि भारत सरकार सेना का इस्तेमाल करकश्मीर की स्वायत्ता को समाप्त कर दे और उस पर जबरन कब्जा कर ले। इस तरह की बातों से शेख अब्दुल्ला को बहुत धक्का लगा और उन्हें लगने लगा कि कहीं उन्होंने कश्मीर का भारत के साथ विलय कर गलती तो नहीं कर दी। यह भारत के साथ कश्मीर के अलगाव की शुरूआत थी। पाकिस्तान ने इस अलगाव की भावना को जमकर हवा दी, जिससे इसने खतरनाक मोड़ ले लिया। शुरूआती दौर में कश्मीरियों की अतिवादिता, कश्मीरियत की अवधारणा पर आधारित थी। कश्मीरियत, बौद्ध धर्म, वेदान्त और सूफी परंपराओं का मिलाजुला स्वरूप है। सन् 1985 में मकबूल भट्ट को फाँसी दिए जाने के बाद और कश्मीर घाटी में अलकायदा के लड़ाकों के घुसपैठ के चलते, इस अतिवाद का स्वरूप बदल गया। इसने सांप्रदायिक स्वरूप ग्रहण कर लिया। नतीजे में हिन्दू पंडित, अतिवादियों के निशाने पर आ गए।
                          सन् 1990 के पहले भी पंडित घाटी से पलायन कर चुके थे। यह पलायन विभाजन के समय हुए दंगों और षेख अब्दुल्ला द्वारा लागू किए गए भू-सुधारों के चलते हुआ था। यह दिलचस्प है कि कश्मीर के हिन्दू नागरिक, पहले बौद्ध बने और बाद में सूफी संतों के प्रभाव में आकर उन्होंने इस्लाम अपनाया। हिन्दुओं को 15वीं सदी के बाद से पंडित कहा जाने लगा। यह तब हुआ जब अकबर ने कश्मीर पर विजय प्राप्त की और हिन्दुओं को प्रशासनिक पदों पर नियुक्त किया। अकबर उनकी विद्वता से इतना प्रभावित हुआ कि उसने उन्हें पंडित की उपाधि से नवाजा।
कश्मीरी अतिवाद के सांप्रदायिकीकरण के कारण पंडितों को घाटी से पलायन करने पर मजबूर होना पड़ा। कश्मीरी अतिवादी, कश्मीरियत की जगह इस्लामवाद के पैरोकार बन गए। मोदी और उनके जैसे लोग कहते हैं कि कश्मीरी पंडितों को मुस्लिम अतिवादियों द्वारा घाटी से योजनाबद्ध तरीके से भगाया गया। जबकि सच यह है कि घाटी में रहने वाले बहुसंख्यक मुसलमान, कश्मीरी पंडितों को किसी भी तरह से सताए जाने के सख्त खिलाफ थे और हैं।
कश्मीरी आतंकवादियों ने हिंदुओं को तो अपना निशाना बनाया ही परंतु उन्होंने मुसलमानों को भी नहीं बख्शा। कष्मीर में आतंकी हमलों में घायल हुए और मारे गए लोगों के संबंध में आंकड़ें इस तथ्य के गवाह हैं। कश्मीर घाटी के विभिन्न भागों में रहने वाले हजारों मुसलमानों को भी रोजगार की तलाश में पड़ौसी हिमाचलप्रदेश  में जाना पड़ा क्योंकि आतंकवाद के कारण कश्मीर का पर्यटन उद्योग पूरी तरह से ठप्प हो गया था। आज भी कश्मीर के 40,000 मुसलमान दिल्ली में शरणार्थी शिविर में रह रहे हैं। वे आसपास के राज्यों में कुली आदि का काम कर अपना पेट पाल रहे हैं। द टाईम्स आॅफ इंडिया (05 फरवरी 1992) में छपी एक रपट कहती है कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 1990 से अक्टूबर 1992 के बीच, आतंकवादियों ने कश्मीर घाटी में कुल मिलाकर 1585 व्यक्तियों की हत्या की। इनमें से 982 मुसलमान थे, 218 हिन्दू, 23 सिक्ख और 363 सुरक्षाबलों के जवान।
पंडितों के घाटी से बड़े पैमाने पर पलायन, कश्मीर की सर्वधर्मसमभाव की लंबी परंपरा के लिए गहरा धक्का था। परंतु हमें यह याद रखना होगा कि अतिवादियों ने सभी समुदायों के लोगों को नुकसान पहुंचाया, केवल हिन्दुओं को नहीं। पंडित इतने आतंकित हो गए थे कि उन्होंने 1986 में ही घाटी से पलायन करने का निष्चय कर लिया था। परंतु बहुवादी संस्कृति में विश्वास  करने वाले जानेमाने कश्मीरियों द्वारा घटित ‘‘सद्भावना मिशन’’ की अपील पर इस निर्णय को टाल दिया गया। सन् 1990 तक कश्मीर में आतंकवाद और बढ़ चुका था। उस समय जगमोहन, जो आगे चलकर भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में मंत्री बने, कश्मीर के राज्यपाल थे। बलराज पुरी अपनी पुस्तक कश्मीर(ओरिएन्ट ब्लैकस्वान, 1993) में लिखते हैं कि जगमोहन ने सद्भावना मिशन के एक पंडित सदस्य को दबाव डालकर जम्मू में बसने के लिए मजबूर किया। जगमोहन का उद्देश्य  सद्भावना मिशन को भंग करवाना था और वे उसमें सफल भी रहे।
                                     बलराज पुरी ने मार्च 1990 में कहा, ‘‘मैंने यह पाया कि कश्मीरके आम मुसलमानों को पंडितों से न कोई बैर था और ना ही कोई शिकायत थी। वे तो केवल यह चाहते थे कि सेना व अन्य सुरक्षाबलों द्वारा कश्मीर में किए गए मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोपों की निष्पक्ष जांच हो।’’ उसी दौर में हिन्दू सांप्रदायिक तत्व पंडितों को डराने में लगे हुए थे। ‘‘जम्मू और दिल्ली में यह गलत सूचनाएं फैलाई जा रही हैं कि कश्मीर में बड़ी संख्या में हिन्दू मंदिरों और पवित्र स्थलों को अपवित्र या नष्ट कर दिया गया है। यह पूरी तरह से गलत है। यह आश्यचर्यजनक है कि सरकार को यह क्यों नहीं सूझा कि वह दूरदर्शन  से कहे कि कश्मीर के मंदिरों पर एक फिल्म बनाकर उसका प्रसारण किया जाए ताकि लोगों को सच्चाई का पता चल सके’’ (भारतीय प्रेस परिषद, 1991)।
कुल मिलाकर, घाटी से पंडितों का पलायन, कश्मीरियो के अलगाव से जनित अतिवाद, सन् 1990 के दशक के अंत में इस अतिवाद के साम्प्रदायिकीकरण, हिन्दू साम्प्रदायिक संगठनों द्वारा पंडितों के मन में डर बिठाने और राज्यपाल जगमोहन के दबाव का दुर्भाग्यपूर्ण नतीजा था। इसमें अब्दुल्लाओं की कोई भूमिका नहीं थी।
कश्मीर के प्रसिद्ध कवि कल्हन अपनी पुस्तक ‘राजतरंगिणी’ में लिखते हैं कि कश्मीर को बल से नहीं बल्कि केवल पुण्य से जीता जा सकता है। हमें कश्मीर  के इस प्राचीन कवि की सीख की याद सरकार में बैठे उन लोगों को दिलानी चाहिए जो कष्मीर के संबंध में नीतियां बनाते हैं। किसी एक राजनैतिक दल या नेता को दोष देने से कुछ हासिल नहीं होगा। जब हम इस भयावह त्रासदी की बात करते हैं तो हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इसके पीछे वैष्विक आतंकवाद, अमरीका की विश्व के तेल संसाधनों पर कब्जा करने की लिप्सा आदि का भी योगदान रहा है।
-राम पुनियानी


शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

जाति ने फिर जातिवाद किया

जबरदस्ती जाति बदल रहे है
 भा जा पा के  नेता सुब्रमण्यन स्वामी ने हैदराबाद यूनिवर्सिटी के दलित छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी के मामले में विरोध प्रदर्शन कर रहे छात्रों  की तुलना कुत्तों से की है।स्वामी   ने फिर  अपनी  जाति को पहचान कर जातिवाद किया और अपनी जाति को बढ़ाने का प्रयास कर रहे है लेकिन कुत्ते की उपमा देकर कुत्ते की वफ़ादारी का अपमान कर रहे है
                                          वही छात्र रोहित वेमुला की खुदकुशी मामले में हैदराबाद पुलिस ने विद्यार्थी परिषद के नेता सुशील कुमार के खिलाफ केस दर्ज किया है. बीते साल अगस्त महीने में सुशील ने वेमुला और उनके चार दोस्तों के खिलाफ पुलिस में शिकायत की भी थी, वहीं सुशील ने यह कहकर मामले को नया मोड़ दे दिया है कि रोहित और उसके दोस्त याकूब मेमन के लिए नमाज पढ़ रहे थे. विद्यार्थी परिषद के छात्र नेता सुशील कुमार ने कहा, 'रोहित वेमुला और उसके साथी स्टूडेंट्स मुंबई धमाकों के आरोपी याकूब मेमन के लिए नमाज पढ़ते थे.' सुशील ने कहा कि सुसाइड करने वाले रोहित और चार अन्‍य के खिलाफ उन्होंने पिछले साल पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी. अफवाहबाजी की मशीन  ने नई अफवाह  फैलाई .                          
                                          सुशील कुमार ने फेसबुक पर रोहित और उसके दोस्तों को 'गुंडे' कहकर संबोधित किया था, जिसके बाद वह अपने दोस्तों के साथ विद्यार्थी परिषद के इस नेता से मिलने पहुंचा था. सुशील ने बताया कि इसी दौरान उन पर हमला किया गया, जिसके बाद वह अस्पताल में भर्ती हो गए. हालांकि, मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक वह दो दिन बाद अस्पताल में भर्ती हुए थे, जब उनका एपेंडिक्स का ऑपरेशन हुआ था. लेकिन सुशील की मानें तो वह उसी रात अस्पताल पहुंच गए थे.झूठ की पराकाष्ठा को पार करते हुए यह ड्रामा किया ,जो इनकी पुरानी फितरत है आज़ादी के बाद यह लोग बराबर इस हिकमत अमली  का प्रयोग दंगे फ़ैलाने  में करते रहे है
                                                           दत्तात्रेय ने ईरानी को लेटर लिखा था कि हैदराबाद यूनिवर्सिटी में राष्ट्र विरोधी गतिविधियां चल रही हैं और इसमें शामिल छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की जाए। इसके बाद मंत्रालय ने इस बारे में यूनिवर्सिटी को 4 रिमाइंडर भेजे थे। 

इनका असली चेहरा दलित ,पिछड़ा विरोधी है वह सामने आ रहा है 
-रणधीर सिंह सुमन

बुधवार, 20 जनवरी 2016

गांधी ही निशाने पर है

                      
  अमरीकी सम्राज्यवाद   ने जो जहर पाकिस्तान में बोया था उसका असर बराबर दिखाई दे रहा  है। आज भी इन आतंकवादियों  को हथियार कौन दे रहा है? यह बात जगजाहिर  है जिसने अफगानिस्तान में सोवियत संघ को परास्त करने के लिए आतंवादी संगठनों का निर्माण किया था  उन्ही ताकतों की हथियार सप्लाई है  अब यह छात्रो को भी नही बक्स रहे है पश्चिमोत्तर पाकिस्तान के अशांत खैबर-पख्तूनख्वा प्रांत में भारी हथियारों से लैस आतंकवादियों ने बाचा खान प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में घुसकर छात्रों और शिक्षकों पर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दीं जिससे कम से कम 25 लोगों की मौत हो गई और करीब 50 अन्य लोग घायल हो गए।  आतंकी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने पेशावर के पास स्थित बाचा खान विश्वविद्यालय पर हमले की जिम्मेदारी ली है। यह वही आतंकी संगठन है, जिसने 2014 में पेशावर के आर्मी स्कूल पर हमला करके कई मासूम बच्चों को मौत की नींद सुला दिया था।              
                 यूनिवर्सिटी में आज  को बाचा खान की पुण्यतिथि मनाई जा रही थी।  20 जनवरी 1988 के दिन खान अब्दुल गफ्फार खान (बाचा खान) का निधन हो गया था। 1987 में भारत ने उन्हें भारत रत्न की उपाधि भी दी थी। सीमांत गांधी भी कहे जाने वाले ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान ताउम्र उदार और गांधीवादी रहे। वह भारत के बहुत क़रीब रहे।
                                         हमेशा गाँधी के विचार ही निशाने पर रहे है .  बाचा  खान  को सीमांत गाँधी कहा  जाता था हमारे यहाँ गाँधी को मार  डाला गया था और  अब जब  आज सीमांत गाँधी नही रहे तो उनके नाम की यूनिवर्सिटी  के बच्चो  को  मार डाला गया  है  आतंकवादी या सम्प्रदायिक   ताकते  यही करती है यहाँ ये ताकते कमजोर  है इसलिए दंगे कर अपनी मानव रक्त पिपाशा  को शांत  करती है इस हमले जितनी निंदा की जाए वह कम  है साम्राज्यवाद का अंत ही  आतंकवाद का अंत होगा  .          -
-रणधीर सिंह सुमन       

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

नागपुर के मुंह पर पट्टी बंधी


पठानकोट हमले से ठीक पहले आतंकियों द्वारा अगवा किए गए पंजाब पुलिस के एसपी सलविंदर की कहानी का सच क्या है, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) उनके पॉलिग्राफ टेस्ट के जरिए यह जानने की कोशिश कर रही है। कोर्ट की मंजूरी के बाद मंगलवार को सलविंदर को पॉलिग्राफिक टेस्ट किया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक सलविंदर का एम्स में ब्रेन मैपिंग टेस्ट भी करवाया जा सकता है। सलविंदर उस रात 'पेमेंट' लेने गए थे? जानकारों के मुताबिक, पॉलिग्राफ टेस्ट कराने के फैसले का मतलब ही यह है कि संबद्ध व्यक्ति पर शक ही नहीं, बल्कि अब वह बड़े शक के घेरे में आ चुका है और जांच में सहयोग नहीं कर रहा है।
               अगर यह एस पी इस्लाम  धर्म का होता तो नागपुर और उसके चेले अग्निबाण चला रह होते  .   देश द्रोही बताने के लाखो प्रमाण पत्र छपे रह गए है नाम किसका लिख दिया जाय .हल्ला मचाने वोट नही बढना है इसलिए चुप्प है .मोदी की पाकिस्तान यात्रा के बाद अजहर मसूद की गिरफ़्तारी का हल्ला भी उनके चेलो ने मचाया लेकिन शनि की दशा होने के कारण कोई टोटका कम नही आ रहा है अब मिडिया ही कह रहा है कि 'पाकिस्‍तान में आजाद घूम रहा है जैश-ए-मोहम्‍मद प्रमुख मसूद अजहर, गिरफ्तारी के दावे झूठे '  वही मोदी साहब विकास   की पुडिया ले जाकर असम में खोल रहे है हैदराबाद की कोई याद  नही रखना चाहते है दलित ने ही तो आत्महत्या की है चित्पावन नही मरा है . वही अब भी कहा जा रहा है कि  पाकिस्तान से दोस्ती अमरीकी आका  के कहने से होगी या दोनों देशो की सरकारों की  ईमानदारी के प्रयासों से होगी लेकिन माला जपनी है जपा जा रहा है जापका एक अंश यह भी है -केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह साथ ही उन्होंने उम्मीद जताई कि पाकिस्तान इस हमले के गुनाहगारों के खिलाफ कार्रवाई करेगा। इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि शायद इस बार कुछ कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि आतंकवाद समूची दुनिया के लिए समस्या है। पाकिस्तान भी आतंकवाद का एक अड्डा है। इसलिए उस पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी है। 
            पट्टी तो खुलनी ही है  झूठ और अफवाहबाजी से देश नही चलता है गद्दारी तो कर सकते  हो देश नही चला सकते हो  धर्म  के आधार पर विभाजन करवाया -गाँधी को गोली मारी -दंगे करवाए अब क्या करोगे ?
-रणधीर  सिंह सुमन

सोमवार, 18 जनवरी 2016

नकली राष्ट्रवादियों ने बलि चढ़ा दी


दिल्ली मेंआल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के    प्रदर्शनकारियो  को गिरफ्तार कर लिया गया है 



                                                          सेंट्रल यूनिवर्सिटी,हैदराबाद  से पीएचडी कर रहे रोहित वेमुला (26) ने नकली राष्ट्र भक्तो की प्रताड़ना  से आजिज आकर रविवार को आत्महत्या  ली थी  . केंद्रीय मंत्री बंडारू दत्तात्रेय के एक लेटर के बाद रोहित समेत पांच स्टूडेंट्स के यूनिवर्सिटी हॉस्टल में जाने पर बैन लगाया गया था। केंद्रीय मंत्री दत्‍तात्रेय ने ही दलित स्कॉलर्स पर कार्रवाई के लिए एचआरडी मिनिस्टर स्मृति ईरानी को लेटर लिखा था। यूनिवर्सिटी ऑफ हैदराबाद के वाइस चांसलर अप्पा राव ने पांच दलित  छात्रो के खिलाफ कार्यवाही की थी जिससे यह छात्र खुले आसमान के नीचे रहने के लिए मजबूर थे  इसलिए उनके खिलाफ भी भी केस दर्ज हुआ है।
                                मामला यह था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद  के एक सदस्य ने इन छात्रों पर मारपीट करने का आरोप लगाया था.यूनिवर्सिटी की  जांच में यह आरोप बेबुनियाद पाया गया .विश्वविद्यालय के नए कुलपति और उनकी कार्यपरिषद को ‘राष्ट्रवादी’ दबाव  के आगे बौनी थी
                                  पांचो छात्र अम्बेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन के सदस्य थे. संगठन ने  यूनिवर्सिटी में ‘मुज़फ्फरनगर बाकी है’ नाम की एक फिल्म के प्रदर्शन के दौरान हुए हमले के विरोध में एक जुलूस निकाला था.   इस संगठन ने याकूब मेमन की फाँसी के मामले में मृत्युदंड का विरोध किया था. इस कारण इस संगठन को राष्ट्रविरोधी ठहराया जा रहा था.
                              यह आत्महत्या कथित नकली राष्ट्रवादियो की   प्रताड़ना  का परिणाम है अगर देश नही चेता तो यह नकली देश भक्त शिक्षा संस्थानों में अल्पसंख्यको, दलितों  व पिछडो  पढने लिखने से वंचित कर देगे .नौकरी न मिलने पाए इसलिए आरक्षण खत्म कर देगे --इनके हिन्दुवत का असली चेहरा यही है -यही इनकी असली जीवन शैली है .इनका इतिहास है कि जब आज़ादी की लड़ाई के  समय  जनता  शहीद भगत सिंह को अंग्रेजो  की फांसी से बचाने की कोशिश  कर रही  थी  तब यह देश विभाजन  करा रहे थे .इनकी  नकली राष्ट्र भक्ति दंगे करा कर मानव बलि  ही लेती है

--रणधीर  सिंह सुमन
लो क सं घ र्ष !
एचसीयू के एक दलित छात्र ने हॉस्टल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। यह छात्र यहां से पीएचडी कर रहा था। पुलिस ने बताया कि इस छात्र का नाम रोहित है और यह उन पांच दलित छात्रों में से एक है जिनको दिसंबर में यूनिवर्सिटी ने निलंबित कर दिया था। - See more at: http://www.patrika.com/news/crime/hcu-student-ended-his-life-in-hostel-after-getting-disappointed-from-the-administration-1162102/#sthash.bXHADqhP.dpuf
एचसीयू के एक दलित छात्र ने हॉस्टल में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। यह छात्र यहां से पीएचडी कर रहा था। पुलिस ने बताया कि इस छात्र का नाम रोहित है और यह उन पांच दलित छात्रों में से एक है जिनको दिसंबर में यूनिवर्सिटी ने निलंबित कर दिया था। - See more at: http://www.patrika.com/news/crime/hcu-student-ended-his-life-in-hostel-after-getting-disappointed-from-the-administration-1162102/#sthash.bXHADqhP.dpuf

शनिवार, 16 जनवरी 2016

मोदी जी देश को सोमालिया मत बनाइये

मजदूर किसानो के लिए या बहुसंख्यक जनता के लिए हमारे प्रधानमन्त्री के पास कुछ नहीं है. जिसमें किसानो के सम्बन्ध में उनके पास कोई योजना नहीं है लाखों किसान आत्महत्याएं कर चुके हैं उसकी तरफ ध्यान न देकर अब कंपनियों को खोलने व बंद करने के लिए 10000 करोड़ रुपये का फण्ड कैपिटल गेन में छूट तथा क्रेडिट गारंटी स्कीम की योजनायें शुरू की हैं.
कंपनियों में काम करने वाले लोगों को श्रम कानूनों व अन्य कानूनों से पूरी तरह मुक्त रखा जायेगा. बेरोजगारों की मंदी में एक इंजिनियर को आप चाहे 10 हजार रुपये दे या 5 हजार कोई पूछने वाला नहीं होगा. उनके यहाँ किसी भी श्रम कानून को लागू नहीं किया जायेगा. उनके द्वारा कुछ भी किया जाए उसके लिए उन्हें लाइसेंस नहीं लेना होगा. पैसा जनता का हो, मुनाफा कंपनी का हो. मजदूरों का शोषण हो. सरकार से कोई लेना देना नहीं होगा. पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप हो इसका अर्थ है कि सरकारी उद्यमों को भी उद्योगपतियों को सौंप देना. पैसा जनता से इकठ्ठा करने के लिए किसी भी तरह का वादा करना और वादे को पूरा न करना उसके लिए कोई कानून नहीं होगा.  जब चाहो कंपनी खोल लो, जब चाहो कंपनी में लगा जनत का पैसा डुबोकर कंपनी बंद कर दो. कंपनियों को कोई टैक्स न देना पड़े और वह प्राकृतिक संसाधनों से लेकर मानव संसाधन तक का दोहन करते रहो, उसमें सरकार की कोई दखलंदाजी न हो. कंपनियों को सस्ता कर्ज व तीन साल तक टैक्स में छूट दी जाएगी तथा सरकारी योजनाओं का भी लाभ उनको दिया जायेगा. यह है स्टार्ट अप योजना. कंपनी फ्लॉप शो हो जाए तो भी सरकार उसकी मदद करेगी.
मेक इन इंडिया का नारा भारत के लिए नहीं है. उसी तरह स्टार्ट अप भारत के लिए नहीं है. इसका मुख्य उद्देश्य है. विदेशी कंपनियों को यहाँ के प्राकृतिक संसाधन व मानव संसाधन की खुली लूट कराना. बहुसंब्ख्यक जनता को न तो मेक इन इंडिया से कोई फायदा होना है और न ही स्टार्ट अप से.
देश की नदियों, जलाशय, भूगर्भ जल व हवा को उद्योगपतियों ने जिस तरीके से प्रदूषित किया है उसकी भरपाई हाजारों-हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी नहीं हो पा रही है. चाहे गंगा हो या कावेरी साफ़ नहीं कर सकते हैं. उद्योगों का सारा कचरा जल को गन्दा करने में ही इस्तेमाल होता है. उसी तरह इन से निकल्लने वाली गैसों से हवा प्रदूषित होती है. कोई कानून काम नहीं करता है. जमीन के अन्दर मौजूद जल को जिस तरह से निकाल कर उद्योगपति इस्तेमाल कर रहे हैं और मुनाफा कमा रहे हैं उसके ऊपर कोई रोक नहीं है. हमारे और आप के हिस्से का हवा पानी, जमीन उद्योगपतियों को देने का किसी भी सरकार को हक़ नहीं है. हमारे मोदी प्रधानमन्त्री बनने के बाद जनता के प्रधानमंत्री मालूम ही नहीं होते हैं वह मल्टी नेशनल कंपनियों व उद्योगपतियों को ही फायदा पहुंचाने में उनका अंकगणित लगा रहता है. इसी तरह सोमालिया को मल्टी नेशनल कंपनियों ने बर्बाद कर दिया था.

सुमन