मंगलवार, 3 मई 2016

नवउदारवादी शिकंजे में आजादी और गांधी



                आरएसएस ने आजादी के संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया; और वह गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार है - ये दो तथ्य नए नहीं हैं। आजादी के बाद से आरएसएस के खिलाफ इन्हें अनेक बार दोहराया जा चुका है। आरएसएस आजादी के संघर्ष में हिस्सेदारी का दावा तो ठोंक कर नहीं करता, अलबत्ता गांधी की हत्या में संलिप्तता को गलत आरोप बताता है। जब से केंद्र में मोदी-सरकार बनी है, सेकुलर खेमा इन दो तथ्यों को जोर देकर लगातार दोहरा रहा है। पिछले कुछ महीनों से उसके इस उद्यम में काफी तेजी आई है। शायद वह सोचता है कि इन दो बिंदुओं को लगातार सामने लाकर वह आरएसएस को देश के लोगों की निगाह में गिरा देगा, जिसका राजनैतिक फायदा उसे मिलेगा। सेकुलर खेमे की इस सोच पर ठहर कर विचार करने की जरूरत है। जिस रूप में और जिस मकसद से सेकुलर खेमा इन दो बिंदुओं को उठा कर आरएसएस पर हमला बोलता है, उसकी आजादी और गांधी, जिनका वास्‍ता वह देता है, के लिए कोई सार्थकता नहीं है। सार्थकता तब होती अगर सेकुलर खेमा गंभीरता और ईमानदारी से सवाल उठाता कि आजादी के संघर्ष से द्रोह और गांधी की हत्या जैसे संगीन कृत्य करने के बावजूद भाजपा नरेंद्र मोदी के सीधे नेतृत्व में बहुमत सरकार बनाने में कैसे कामयाब हो गई? वह इस गहरी पड़ताल में उतरता कि क्या आजादी और गांधी भारतवासियों के लिए वाकई महत्वपूर्ण नहीं रह गए हैं? अगर नहीं रह गए हैं तो उसके क्या कारण हैं? तब सेकुलर खेमा शायद आत्मालोचना भी करता कि यह स्थिति बनने में वह खुद कितना जिम्मेदार है? और अपने से यह प्रश्‍न पूछता कि क्या वह खुद आजादी के मूल्य और गांधी की प्रतिष्ठा चाहता है?
                अपने को किसी भी प्रश्‍न से परे मानने वाला सेकुलर खेमा तर्क दे सकता है कि यह केवल 31 प्रतिशत मतदाताओं के समर्थन की सरकार है; बाकी का भारतीय समाज आजादी और गांधी को मान देने वाला है, जिसे वह आरएसएस के खिलाफ सचेत कर रहा है। यहां पहली बात तो यह कि 31 प्रतिशत नागरिकों का आजादी और गांधी से विमुख होना सेकुलर खेमे के लिए कम चिंता की बात नहीं होनी चाहिए। यह समाज का बड़ा हिस्सा बैठता है। वैचारिक और सांस्थानिक स्तर पर राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभाने वाला सेकुलर खेमा समाज को तेरे-मेरे में बांट कर नहीं चल सकता। बात यह भी है कि क्या सेकुलर खेमा आश्‍वस्‍त कि जिन्होंने भाजपा को वोट नहीं दिया, वे सब आजादी के संघर्ष और गांधी में आस्था रखने वाले लोग हैं? वस्तुस्थिति यह है कि बाकी 69 प्रतिशत मतदाताओं का मत जिन नेताओं और पार्टियों को मिला है, वे सभी नेता और पार्टियां कमोबेस नवउदारवाद के पक्षधर हैं। कहने की जरूरत नहीं कि नवउदारवाद का पक्षधर आजादी के मूल्यों और गांधी का विरोधी होगा। लिहाजा, अगर सवाल यह पूछा जाएगा कि आजादी का विरोध और गांधी की हत्या करने के बावजूद आरएसएस-भाजपा ने बहुमत की सरकार कैसे बना ली, तो कुछ आंच पूछने वालों पर भी आएगी। उस आंच से बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जो तथ्य आप नहीं देखना चाहते, छिपाना चाहते हैं, ऐसा नहीं है कि लोग भी उन्हें नहीं देख रहे हैं।  
                आगे बढ़ने से पहले यह स्पष्ट कर दें कि गांधी को सभी के लिए अथवा किसी के लिए भी मानना जरूरी नहीं है। लेकिन नहीं मानने वालों को बार-बार उनकी हत्या का हवाला देकर राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। गांधी की विरोधी मायावती और दलित अस्मिता के वाहक दलित बुद्धिजीवी उनकी हत्या की कभी दुहाई नहीं देते। यही स्थिति आजादी के मूल्य की भी है। जरूरी नहीं है कि सभी लोग आजादी के संघर्ष और उस दौर में अर्जित मूल्यों का समर्थन करें। लेकिन फिर ऐसे लोगों को आजादी के संघर्ष में हिस्सा नहीं लेने के लिए आरएसएस पर हमला नहीं बोलना चाहिए। 

                पहले आजादी की बात लें। वह गांधी से पहले और ज्यादा महत्वपूर्ण है। पिछले कुछ सालों से गंभीर विद्वानों द्वारा भी ध्यान नहीं दिया जाता कि 1991 के बाद नवसाम्रज्यवादी गुलामी की शुरुआत करने वाली नई आर्थिक नीतियों के लागू किए जाने साथ ही उसके विरोध की एक सशक्त धारा पूरे देश में उठ खड़ी हुई थी। एक तरफ जहां एक के बाद एक संविधान की मूल संकल्पना के विपरीत कानून, ज्यादातर अध्यादेशों के जरिए, पारित व लागू हो रहे थे, दूसरी तरफ वहीं उनका जबरदस्त प्रतिरोध हो रहा था। उसमें मुख्यधारा राजनीति का भी एक स्वर शामिल था। आरएसएस ने भी स्वदेशी जागरण मंच बना कर देश की आजादी को गिरवीं रखने वाली उन नीतियों पर चिंता दर्ज की थी। उस प्रतिरोध का स्वरूप फुटकर और गैर-राजनीतिक था। लेकिन प्रतिरोध की प्रक्रिया में से वैकल्पिक राजनीति की समग्र अवधारणा की शुरुआत भी 1995 आते-आते हो चुकी थी। आजादी की चेतना से लैस नवसाम्राज्यवाद विरोधी इस धारा की कांग्रेस, भाजपा और विदेशी फंडिंग पर चलने वाले एनजीओ गुट से सीधी टक्कर थी। लेकिन जल्दी ही देश की तीसरी शक्ति कहे जाने वाली राजनीतिक पार्टियों और कम्युनिस्ट पार्टियों ने नवउदारवाद के बने-बनाए रास्ते पर चलना स्वीकार कर लिया। देवगौड़ा सरकार के वित्तमंत्री पी चिदंबरम थे। पश्चिम बंगाल में सिंदुर और नंदीग्राम का प्रकरण जगजाहिर है।
                मुकाबला दो नितांत असमान पक्षों के बीच होने के बावजूद नवसाम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष मजबूती और व्यवस्थित ढंग से चल रहा था। हमारे दौर के कई बेहतरीन दिमाग और अनेक युवा उस संघर्ष में अपने कैरियर, यहां तक कि स्वास्थ्य की कीमत पर जुटे थे। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार और उसके बाद दो बार की मनमोहन सिंह सरकार के ताबड़-तोड़ उदारीकरण के बावजूद नवसाम्राज्यवाद विरोध की धारा डटी रही। देश की सभी भाषाओं में नवसाम्राजयवाद विरोधी परचों, फोल्डरों, लघु पत्रिकाओं, पुस्तिकाओं, पुस्तकों की जैसे बाढ़ आ गई थी। तभी इंडिया अगेंस्ट करप्शन, (आईएसी) भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, आम आदमी पार्टी और मुख्यधारा मीडिया ने कांग्रेस का नकली प्रतिपक्ष खड़ा करके और आरएसएस समेत कम्युनिस्टों, समाजवादियों, गांधीवादियों, कारपोरेट घरानों, नागरिक समाज, रामदेव, श्री श्री रविशंकर जैसे तत्वों को साथ लेकर नवसाम्राज्यवाद के बरक्स चलने वाले संघर्ष को नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। अन्ना हजारे द्वारा अनशन तोड़ने के लिए जूस का गिलास मुंह से लगाते ही दूसरी आजादी’, ‘तीसरी आजादीके शोर में नवसाम्राज्यवादी गुलामी की चर्चा राजनीतिक विचारणा से बाहर हो गई; पिछले दो दशकों से पूरे देश में गूंजने वाली आजादी बचाओ, विदेशी कंपनियां भारत छोड़ो, डब्ल्यूटीओ भारत छोड़ो की मुखर आवाजें डूब गईं; वैकल्पिक राजनीति का अर्थ नवउदारवाद की पक्षधर पार्टियों के बीच हार-जीत तक सीमित हो गया; और नवसाम्राज्यवादी गुलामी का शिकंजा और ज्यादा मजबूती के साथ कस गया।
                दरअसल, आजादी का अनादर 1947 में मिलने के साथ शुरू हो गया था। देश का विभाजन आजादी के लिए सबसे बड़ा झटका था। लोगों के लंबे संघर्ष और कुर्बानियों से जो घायल आजादी मिली थी, उसे आगे मजबूत बनाने के बजाय प्रगतिवादी खेमे द्वारा उसे झूठी, अधूरी, समझौतापरस्ती का परिणाम, अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का परिणाम आदि बताना शुरू कर दिया गया। एक नुक्ता यह भी निकाला गया कि आजादी को अहिंसक रास्ते से नहीं, हिंसक रास्ते से हासिल किया जाना चाहिए था। हालांकि इसी दिमाग ने 1857 में जान की बाजी लगा देने वाले लाखों विद्रोहियों को पिछड़ा बता कर उनकी पराजय पर राहत की सांस ली थी। आज भी भारत के बुद्धिजीवी, वे आधुनिकतावादी हों या मार्क्‍सवादी, इस आशंका से डर जाते हैं कि 1857 में विद्रोही जीत जाते तो देश अंधेरे के गर्त में डूबा रह जाता! आरएसएस गांधी वधसे संतुष्ट नहीं हुआ। भारत-विभाजन का विरोध और हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए उसने मरने के बाद भी गांधी को माफ नहीं किया। मुसलमान-मुक्तभारत बनाने यानी देश/समाज को एक बार फिर से तोड़ने की कवायद में लग गया। गांधी के साथ नेहरू व कांग्रेस की बदनामी का निम्नस्तरीय अभियान चलाया। इस तरह वह आजादी के पहले व आजादी के बाद राष्ट्र-निर्माण की जिम्मेदारी से पूर्णतः मुक्त राष्ट्रवादीबन गया।
                देश को आजादी मिलना ही आजाद भारत में जैसे गुनाह हो गया; और आजादी के संघर्ष का नेतृत्व करने वाले गुनाहगार। आजादी की उपलब्धि को कटघरे में खड़ा करने वालों ने दरअसल जनता के संघर्ष का ही तिरस्कार कर डाला। ऐसी अयोग्यजनता जिसने उनकी फेंटेसी का कम्युनिस्ट राष्ट्रया हिंदू राष्ट्रबनाने, वह भी आजादी हासिल किए बगैर ही, के बजाय गलत नेतृत्व का साथ दिया! आजकल ये दोनों पक्ष भगत सिंह को लेकर झगड़ रहे हैं, जिन्होंने अंग्रेजी दासता से मुक्ति को पहला मोर्चा माना था और उस मोर्चे पर जान की कुर्बानी दी थी। इस कदर निन्दित आजादी अवसरवादी और भ्रष्ट नेताओं, व्यापारियों, अफसरों के लिए खुली लूट और छूट का मौका बन गई तो आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए। ऐसे में अंग्रेज ही अच्छे थे’ - यह जुमला लोगों द्वारा अक्सर कहा जाने लगा। आजादी हमारे राष्ट्रीय/नागरिक जीवन का कोई मूल्य ही नहीं है तो आरएसएस के आजादी-द्रोह पर कान न देकर लोगों ने भाजपा की बहुमत सरकार बनवा दी।
                अब गांधी की हत्या की बात लें। सेकुलर, खास कर कम्युनिस्ट, गांधी की हत्या का रणनीतिक इस्तेमाल भले ही करते हों, उनके विचारों की हत्या करने में कांग्रेस के साथ सबसे आगे रहे हैं। आजादी के संघर्ष के दौर में ही उन्होंने गांधी को बूर्ज्‍वा, प्रतिक्रियावादी, साधारण जनता के स्तर पर उतर कर बात करने वाला, अंधविश्‍वास  फैलाने वाला आदि कहना शुरू कर दिया था। कांग्रेस ने आजादी के बाद गांधी को पहले पार्टी और फिर परिवार की सत्ता की ढाल बना दिया। नरसिम्हाराव और मनमोहन सिंह ने नवउदारवाद को गांधी के सपनेके साथ जोड़ दिया। अब भाजपा वह काम कर रही है। मौजूदा दलित कोप गांधी पर है ही। इच्छास्वातंत्र्यवादी (libertarians) सब कुछ स्थगित करके पहले गांधी को निपटाना चाहते हैं। जब से पिछड़ा विमर्श ने जोर पकड़ा है, गांधी उनके पहले निशाने पर आ गए हैं। पिछड़ा विमर्शकार अगर अति उत्साही हुआ तो कहेगा कि गांधी नहीं होता तो ब्राहम्णवाद कब का खत्म हो जाता! यानी गांधी को होना ही नहीं चाहिए था। अंध गांधी-विरोध की यह पराकाष्ठा है कि उनकी हत्या के बाद की समस्याओं के लिए भी उन्हें दोषी ठहराया जाता है। इधर बुद्धिजीवियों के स्तर पर जो कम्युनिस्ट-दलित-इच्छास्वातंत्र्यवादी एका बन रहा है, उसके मूल में तीनों का गांधी-विरोध है। हालांकि इस एका का एक परिणाम अंबेडकर को नवउदारवादी हमाम में खींचने में निकलता है। मुसलमानों में गांधी का सम्मान अभी बना हुआ है। लेकिन कट्टरता के दौर में वह ज्यादा दिनों तक नहीं बना रहेगा। आजादी की तरह गांधी की कद्र भी देश में नहीं बची है। फिर क्यों लोग गांधी की हत्या के लिए आरएसएस का विरोध करेंगे?
                हालांकि किंचित विषयांतर होगा, गांधी की हत्या पर थोड़ी चर्चा और करते हैं। गांधी की हत्या की कई व्याख्याएं हुई हैं। निस्संदेह उनमें लोहिया की व्याख्या अभी तक सबसे अहम है। गांधी की हत्या की उस तरह की व्याख्याओं की अब प्रासंगिकता नहीं बची है। एक साधारण व्याख्या यह हो सकती है कि भारत-विभाजन की घटना के चलते गांधी की हत्या हुई। भारत विभाजन में 10 लाख से ज्यादा लोग मारे गए। उस घटना के चलते अगर एक गांधी भी मारे गए तो कोई आसमान नहीं टूट पड़ा। आजादी के जश्‍न को छोड़ कर वे दंगाग्रस्त इलाकों में घूम रहे थे। वहां कोई दंगाई कुछ दिन पहले ही नाथूराम गोडसे का काम पूरा कर सकता था। गांधी की हत्या करने वाले को अदालत से सजा मिल गई; कानून की भाषा में गांधी को न्याय मिल गया। सरकार ने पूरे सैनिक सम्मान के साथ उनकी शवयात्रा निकाली और भव्य समाधि का निर्माण किया, जहां दुनिया के नेता आकर श्रद्धांजलि देते हैं। कांग्रेस ने गांधी का सरकारीकरण करके उनके अनुयायियों के लिए भी कई मठों का निर्माण कर दिया। जबकि विभाजन के चलते हत्या, बलात्कार, तबाही झेलने वाले करोड़ों लोगों को कोई न्याय नहीं मिला। गांधी, जब तक जीवित थे, खुद इस व्यथा को झेलते थे। लिहाजा, गांधी की हत्या की बार-बार चर्चा का औचित्य नहीं है। बल्कि उनकी हत्या में दोतरफा तसल्ली पाई जा सकती है। पहली, सकारात्मक तसल्ली यह कि गांधी ने उस समय के नेतृत्व के (भारत विभाजन के) खूनी पाप को अपने प्राणों की बलि देकर कुछ न कुछ धोने का काम किया। दूसरी, नकारात्मक तसल्ली यह कि बड़े नेताओं में से कम से कम एक विभाजन की त्रासदी का शिकार हुआ।
                निष्कर्षतः कह सकते हैं कि आरएसएस के आजादी-द्रोह का उद्घाटन करने वाला सेकुलर खेमा खुद आजादी की सच्ची चेतना से परिचालित नहीं है। गांधी की हत्या पर आरएसएस को घेरते वक्त भी उसका गांधी के प्रति सम्मान नहीं होता। आरएसएस से सीख कर बदनाम करने की जो शैली एनजीओ सरगना केजरीवाल ने चलाई है, सेकुलर खेमा उसी तर्ज पर आरएसएस को बदनाम करके सत्ता हथियाना चाहता है। यह शैली आजादी और गांधी दोनों की गरिमा गिराने वाली है।
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       क्या सेकुलर खेमे द्वारा आरएसएस के विरोध से सांप्रदायिकता रुकती या कम होती है? इसकी पड़ताल इसलिए जरूरी है कि सेकुलर खेमे का कहना रहता है कि नवसाम्राज्यवाद की चुनौती से बाद में निपट लेंगे, सांप्रदायिकता से पहले लड़ना जरूरी है। यह सही है कि सेकुलरवादी सांप्रदायिक आरएसएस-भाजपा के पक्के विरोधी हैं। यह अच्छी बात है। लेकिन वे कांग्रेस से लेकर केजरीवाल तक की सांप्रदायिकता के विरोधी नहीं हैं। एक तरफ भाजपा है, जिसका जनाधार इस बार के आम चुनाव के नतीजों के आधार पर अगर एक चौथाई मान लिया जाए तो बाकी तीन-चौथाई की सांप्रदायिकता को पोसना पूरे समाज को सांप्रदायीकरण की प्रक्रिया में शामिल करना है। हमने पिछले 20 सालों में सेकुलर खेमे की सांप्रदायिक राजनीति के खतरे को कई बार रेखांकित किया है। यहां केवल दो उदाहरण देखे जा सकते हैं।
                केंद्र में भाजपा की बहुमत सरकार बनने के बाद दिल्ली में भाजपा को बुरी तरह परास्त करके जब केजरीवाल की सरकार बनी तो सेकुलर खेमे की खुशी का वारापार नहीं रहा। कई कम्युनिस्ट साथी कई सप्ताह तक थिरक-थिरक कर चलते थे। कम्युनिस्टों के एक हाथ में कांग्रेस और दूसरे हाथ में केजरीवाल है। केजरीवाल विदेशी  धन लेकर लंबे समय से समाज सेवाके प्रोफेशन में थे। उस दौरान उन्होंने 1984 के सिख-विरोधी दंगों, 1992 के बाबरी मस्जिद ध्वंस, 2002 के गुजरात कांड जैसी जघन्यतम सांप्रदायिक घटनाओं पर मुंह नहीं खोला। केजरीवाल के एनजीओ-गुरु अन्ना हजारे ने भी, जिन्होंने जंतर-मंतर से पहली प्रशंसा मोदी की की, जिसके प्रति मोदी ने उन्हें आभार का पत्र लिखा। रामदेव, श्री श्री रविशंकर जैसे धर्म, ध्यान, अध्यात्म, योग, आयुर्वेद आदि का व्यापार करने वाले तत्व उनके हमजोली थे। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की व्यवस्था का काम आरएसएस के जिम्मे था। आम आदमी पार्टी बनी तो उसमें सांप्रदायिक व लुंपेन तत्वों की भरमार थी। जब पश्चिम उत्तर प्रदेश सांप्रदायिक दंगों की आग से जल रहा था, तब केजरीवाल दिल्ली फतह होने पर हवन की अग्नि प्रज्चलित करके ईश्‍वर को धन्यवाद दे रहे थे। बनारस में चुनाव लड़ कर उसने मोदी की जीत सुनिश्चित की। इसके लिए बाबा विश्‍वनाथ का दर्शन और गंगाजी में डुबकी लगा कर आशीर्वाद प्राप्त किया। (यह चिंता का विषय है कि चुनाव संहिता लागू होने के बाद उम्मीदवारों के धार्मिक कर्मकांड में शामिल होने पर चुनाव आयोग द्वारा उनकी उम्मीदवारी रद्द नहीं की जाती।)
                जब दिल्ली में दोबारा चुनाव हुए तो शहर में सांप्रदायिक तनाव फैला था। आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय राजनीतिक दलों के चुनाव प्रसारण में कांग्रेस, सीपीआई, सीपीएम और राष्ट्रवादी कांग्रेस के प्रसारणों में दिल्ली षहर में सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने की कोशिशों का प्रमुखता से जिक्र था। साथ ही सांप्रदायिक ताकतों को चुनाव में परास्त करने की अपील थी। भाजपा और आम आदमी पार्टी के प्रसारण में शहर में होने वाली सांप्रदायिक घटनाओं पर एक शब्द भी नहीं था। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदलने की आगे बढ़ कर सहर्ष स्वीकृति दी। मोदी के साथ मिल कर श्री श्री रविशंकर का मजमा जमाया। देश के अल्पसंख्यकों की स्थिति पर तैयार की गई सच्चर समिति की रपट को आए इस साल नवंबर में 10 साल हो जाएंगे। भाजपा और आम आदमी पार्टी को छोड़ कर सभी छोटे-बड़े दलों ने समय-समय पर इस रपट को लागू करने की घोषणा की है। .... यह आलोचना नहीं, केवल तथ्य हैं जो हम पहले भी कई बार रख चुके हैं। ध्यान दिया जा सकता है कि पुराने सेकुलर नेताओं का सांप्रदायिक राजनीति करने का ढेट खुलते-खुलते खुला। लंबे समय तक एक हद तक उन्होंने जनसंघ/भाजपा पर धर्मनिरपेक्षता का दबाव भी बना कर रखा। लेकिन केजरीवाल और उसकी मंडली किसी राजनीतिक विचारधारा, संगठन या संघर्ष से गुजर कर नहीं आए हैं। उनके लिए सांप्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता में भेद नहीं है। सत्ता हथियाने के लिए जो सीढ़ी काम आ जाए!
                दूसरा उदाहरण बिहार का है जहां भाजपा की पराजय पर सेकुलर खेमा तुमुलनाद कर उठा कि जनता ने सांप्रदायिक और ब्राहम्णवादी ताकतों को पटखनी दे दी है। यहां विस्तार में जाए बगैर कुछ तथ्य देखे जा सकते हैं। नितीश कुमार और उनकी पार्टी 16 सालों तक आरएसएस/भाजपा के साथ रहे। 2002 में गुजरात में मुसलमानों के राज्य-प्रायोजित नरसंहार के समय भी यह साथ बना रहा। उस बीच बिहार की बहुत हद तक सेकुलर जमीन में सांप्रदायिकता के बीज बोने का श्रेय जनता दल यूनाइटेड को जाता है। जदयू के वरिष्ठ नेता एनडीए के संयोजक थे। उन्होंने भाजपा का साथ छोड़ने के फैसले का विरोध किया। लिहाजा, सेकुलर खेमे का यह तर्क कि नवसाम्राज्यवाद से बाद में निपट लेंगे, सांप्रदायिकता से पहले लड़ना है, भ्रमित करने वाला है। इससे सांप्रदायिकता पर न रोक लगती है, न वह कम होती है।       
                सेकुलर खेमा जिस नवउदारवाद पर बाद में रोक लगाने की बात करता है, क्या भाजपा के सत्ता में नहीं रहने पर वह ऐसा करेगा? क्या उसकी यह नीयत और पक्का संकल्प है? आज की भारतीय राजनीति का यह यक्ष प्रश्‍न है। इसके उत्तर के बगैर जो राजनीति की जाती है वह अवैध है, जिसे शिष्ट भाषा में सत्ता की राजनीति कहते है। नवउदारवादी दायरे के भीतर सत्ता की राजनीति सांप्रदायिक खेमा करता है या सेकुलर खेमा, इससे खास फर्क नहीं पड़ता। आज के राजनीतिक परिदृश्‍य पर सरसरी नजर डालने से ही यक्ष प्रश्‍न का उत्तर निकल आता है। वर्तमान राजनीति के जो एक्टिव प्लेयर हैं, यानी जिन्हें कम-ज्यादा मुख्यधारा मीडिया कवर करता है, उनकी भूमिका और दिशा नवउदारवादी है। हमने करीब पांच साल पहले कहा था कि संघ की कोख से पैदा मोदी सारी कवायद के बावजूद गुजरात में ही छटपटा कर दम तोड़ सकते हैं। लेकिन कारपोरेट ने उनकी पीठ पर हाथ रखा; वे पीएम हाउस में पहुंच गए। केजरीवाल सीधे कारपोरेट की कोख की पैदाइश हैं। तीसरी शक्ति कही जाने वाले नेताओं पर केंद्रीय स्तर पर भरोसा नहीं किया जा सकता। अपने सामाजिक आधार के चलते वे देश को नवउदारवाद के रास्ते पर कांग्रेस और भाजपा की तरह तेजी से लेकर नहीं चल सकते। इसीलिए कारपोरेट ने अपना नया नेता खड़ा किया है। उसकी पीठ पर सेकुलर खेमे के पहले से मैगसेसे पुरस्कार घराना सहित कारपोरेट घरानों और देश-विदेश के एनजीओ तंत्र का हाथ है। कांग्रेस तक तो गनीमत थी; जिस तरह से सेकुलर खेमा केजरीवाल के साथ जुटा है उससे नीयत और संकल्प तो छोडि़ए, उसकी राजनीतिक समझदारी ही संदेह के घेरे में आ जाती है। वह इधर फिर से काफी खुश हुआ है कि केजरीवाल ने अंतरराष्ट्रीय ख्याति में मोदी को पछाड़ दिया है। राजनीतिक दिवालिएपन की पराकाष्ठा पूरी हो जाती है जब सेकुलर खेमा मोदी के बरक्स केजरीवाल में देश का प्रधानमंत्री देखने लगता है।
                यह सही है कि पिछले करीब तीन दशकों के नवउदारवादी शिकंजे को तोड़ना बहुत कठिन, बल्कि नामुमकिन-सा हो गया है। यह कठिन स्थिति बनने में वैश्विक दबावों की भी बड़ी भूमिका है। ऐसे में लगता नहीं कि इस जटिल समस्या का जल्दी कोई समाधान निकाला जा सकता है। सेकुलर खेमा कह सकता है कि नवउदारवादी दायरे के भीतर राजनीति करना आज की मजबूरी है। वह यह भी कह सकता है, बल्कि कहता है कि भीतर जाए बगैर शिकंजे को नहीं काटा जा सकता। वह भीतर रह कर की गईं अपनी उपलब्धियां भी गिनाता है, जैसे कांग्रेसी राज में हासिल सूचना अधिकार कानून, मनरेगा, आदिवासी जंगल अधिकार कानून, भूमि अधिग्रहण कानून आदि। लेकिन जिन नेताओं को कारपोरेट दायरे के भीतर राजनीति करनी है, जिन बुद्धिजीवियों को संस्थान चलाने हैं, जिन लेखकों-कलाकारों को पुरस्कार लेने हैं, जिन विशेषज्ञों/एनजीओ वालों को सरकारों के सलाहकार बनना है, समितियों में रहना है, जिन अभिनेताओं/खिलाडि़यों को ब्रांड एंबेसडर बनना है - उन्हें कहना चाहिए कि इस तरह की दिखावटी राहतों के साथ नवउदारवादी व्यवस्था जारी रहेगी। जिसका सीधा अर्थ है विश्‍व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्‍व व्यापार संगठन, बहुराष्ट्रीय कंपनियों, कारपोरेट घरानों के डिक्टेट इसी तरह चलेंगे, डुंकेल से लेकर भारत-अमेरिका परमाणु करार जैसे देश की संप्रभुता को गिरवीं रखने वाले समझौते होते रहेंगे, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों का विनिवेश जारी रहेगा, शिक्षा से रक्षा तक समस्त सेवाओं का निजीकरण होगा, खुदरा क्षेत्र में कारफर, टेस्को, वालमार्ट जैसी विदेशी कंपनियां अपना व्यापार फैलाएंगी, बड़े बिजनेस घरानों का कर्ज माफ किया जाता रहेगा, प्राकृतिक संसाधनों की लूट चलेगी, नगरों-गांवों की डूब और वाशिंदों का विस्थापन जारी रहेगा, किसान और छोटे उद्यमी आत्महत्या करते रहेंगे, बेरोजगारों की फौज की गिनती नहीं रहेगी, जमीन और श्रम की लूट और तेज होगी, आर्थिक विषमता की खाई का कोई अंत नहीं रहेगा, पांच सौ के आगे और ज्यादा स्मार्ट सिटी बनाए जाएंगे, नागरिक गरिमा/नागरिक सुरक्षा/नागरिक अधिकारों/अभिव्यक्ति की आजादी की कानूनी गारंटी नहीं रहेगी, नागरिक जीवन में पुलिस/सुरक्षा बलों/माफियाओं का दखल बढ़ता जाएगा ...। हमारे नागरिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, धार्मिक जीवन को कारपोरेट कंपनियों के मातहत करने वाली यह सूची जितना चाहो लंबी हो सकती है।
                कारपोरेट को दोष देना बेकार है। उसे सांप्रदायिक भाजपा से प्रेम नहीं है। वह पिछले तीन दशकों से नेताओं/पार्टियों को उलट-पलट कर देख रहा है। पिछले तीन दशकों में तैयार हुए नागरिक समाज को भी। अगर उसे पक्का भरोसा हो जाएगा कि धर्मनिरपेक्षता की आड़ में नवउदारवाद को खुली छूट रहेगी, वह खुद भाजपा को सत्ता में नहीं आने देगा। उसे यह भरोसा सेकुलर खेमे के बूते ही होगा। नवसाम्राज्यवादी गुलामी से लड़ने वाली सच्ची चेतना को हमेशा हाशिए पर धकेलने का काम उसी के जिम्मे रहना है! कम्युनल खेमे में वह ताकत नहीं है।
 -प्रेम सिंह

पुलिस राज के साये में भारतीय लोकतंत्र

MANIRAM SHARMA's profile photo  भारत के विधि आयोग  की  एक सौ बहत्तरवीं रिपोर्ट 14 दिसम्बर 2001 :एक समीक्षा
भारत के  विधि आयोग ने स्वप्रेरणा से गिरफ़्तारी के विषय में रिपोर्ट तैयार कर विधि एवं न्याय मंत्रालय को प्रस्तुत की थी किन्तु इस पर की गयी कार्यवाही की स्थिति निराशाजनक है .रिपोर्ट में कह गया है कि दिल्ली में मूल अपराध के लिए गिरफ्तार लोगों की कुल संख्या  57,163 है , निवारक निरोध कानून के तहत गिरफ्तार व्यक्तियों की कुल संख्या 39824 है व  50% लोगों को जमानती अपराध के लिए   गिरफ्तार किया गया. अगर हम उत्तर प्रदेश का उदहारण लें तो  निवारक प्रावधानों के तहत गिरफ्तारियां की संख्या मूल अपराधों के लिए की कुल गिरफ्तारी संख्या से बहुत ऊपर है. जबकि निवारक गिरफ्तारियों 4,79,404 हैं, ठोस अपराधों के लिए गिरफ्तारी की संख्या 1,73,634 है. . जमानती अपराधों में गिरफ्तार व्यक्तियों का प्रतिशत 45.13 है.  

 हरियाणा में जमानती प्रावधानों के तहत गिरफ्तारी 94%   है, केरल में यह 71% है, असम में  90%, कर्नाटक में  84.8 %   मध्य प्रदेश में   89% है और आंध्र प्रदेश में यह 36.59% है. दरअसल उक्त सार के अवलोकन से जमानती अपराधों के साथ साथ निवारक गिरफ्तारियों की अनावश्यक रूप से बड़ी संख्या का खुलासा होता है. . यह मुश्किल से ही विश्वास किया जा सकता  है कि इन सब अपराधों में, गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट द्वारा जमानती वारंट जारी किए गए थे. वास्तव में पुलिस द्वारा  उन लोगों की  गिरफ्तारी का बड़ा भाग बिना वारंट के था .  सेमिनार के दौरान कुछ पुलिस अधिकारियों  द्वारा  सुझाव दिया गया था कि उनमें से कुछ की  निवारक कानून के अंतर्गत गिरफ्तारी भले ही थी तो भी  यह समान रूप से परेशानीकारक है. यह आम जानकारी की बात है कि कानून प्रवर्तन अधिकारियों द्वारा ज्यादतियों का अंतिम शिकार गरीब ही  हैं.  नियमित आय और संपत्ति के बिना एक आदमी हमेशा चोरी या कुछ अपराध करने के  संदेह के तहत माना जाता है . इस अर्थ में, "गरीबी (ही) अपराध है" -  जॉर्ज बर्नार्ड शॉ  की उक्ति  गूँजती है .
पुनः अपनी निर्धनता के कारण उनमें से बहुत से व्यक्ति न्यायालय द्वारा निर्धारित जमानत नहीं दे पाने के कारण या जमानत के लिए आवेदन नहीं कर सकने के कारण जेलों की पीड़ा सहन करते हैं.न्यायालयों के ध्यान में ऐसे बहुत से मामले आये हैं जहाँ परीक्षणाधीन व्यक्तियों को जेलों में उस समय से भी अधिक अवधि के लिए जेलों में रखा गया जो कि जिस आरोप के लिए यदि वे दोषी पाए जाते तो भी उसकी दण्ड अवधि से अधिक थीं .

वास्तव में समानता और स्वेच्छाचार एक दूसरे के कट्टर शत्रु हैं एक का सम्बन्ध गणतंत्र में विधि के शासन से है जबकि दूसरा बादशाही सनक और उन्माद से है .जहाँ एक कार्य स्वेछ्चारी है स्पष्ट है कि वह राजनैतिक तर्क और संवैधानिक  कानून दोनों के अनुसार असमान है और इसलिए अनुच्छेद 14 के उल्लंघन में है . अनुच्छेद 14 राज्य के स्वेच्छाचारी कृत्यों पर प्रहार करता है और व्यवहार में औचित्य व समानता सुनिश्चित करता है .तर्कसंगतता का सिद्धांत जिसका कानूनी के साथ साथ दार्शनिक  समानता या गैर स्वेछाचारीपन  आवश्यक  तत्व है जोकि अनुच्छेद 14 में से गुजरने वाली प्रतिछाया है और अनुच्छेद 21 द्वारा स्थापित प्रक्रिया में परिभाषित तर्कसंगता की जांच के प्रश्न का जवाब देने के लिए  अनुच्छेद 14 के अनुरूप होना चाहिए .यह सही , उचित एवं न्यायपूर्ण होनी चाहिए न कि स्वेच्छाचारी ,काल्पनिक या उत्पीडनकारी अन्यथा यह कोई प्रक्रिया नहीं होगी तथा अनुच्छेद 21 की आवश्यकताएं संतुष्ट नहीं होंगी ( मेनका गाँधी बनाम भारत संघ में सुप्रीम कोर्ट ).

रिपोर्ट में आगे कहा है कि एक व्यक्ति की मजिस्ट्रेट से बिना वारंट व आदेश के गिरफ़्तारी नागरिक की स्वतंत्रता पर गंभीर आक्रमण है और वास्तव में  गंभीर मामला है . जब एक व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ्तार किया जाता है तो उसे वारंट से गिरफ्तार किये जाने के समान सामान्य सुरक्षा उपलब्ध नहीं होती है .वारंट के अधीन गिरफ़्तारी में मामले के तथ्यों एवं परिस्थितियों पर न्यायिक अधिकारी द्वारा विचार किया जाता है और व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाने का निर्देश दिया जाना उपयुक्त समझा जाता है जबकि बिना वारंट के पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी पुलिस अधिकारी की व्यक्तिगत संतुष्टी के अधीन रहती है. सुप्रीम कोर्ट ने अजायब सिंह के मामले में 1952 में कहा था कि वारंट जारी करते समय यह स्पष्ट उल्लेख किया जाता है कि कथित व्यक्ति ने अपराध किया है या करना संभावित है अथवा संदिग्ध है .बिना वारंट गिरफ़्तारी के मामलों में इसीलिए 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित करने का प्रावधान रखा गया है ताकि गिरफ्तार किये जाने की कानूनी अधिकृति और अपनाई गयी प्रक्रिया के  संबंध में न्यायिक विचारण हो सके जबकि वारंट के अधीन गिरफ़्तारी में न्यायिक विचारण पहले से ही किया जा चुका होता है .
मेरे मतानुसार आयोग का यह निष्कर्ष सही नहीं है व न्यायाधीशों का स्पष्ट पक्षपोषण है  क्योंकि जिन मामलों में गिरफ़्तारी अनावश्यक होती उनमें भी पुलिस द्वारा अभियुक्त को प्रस्तुत करने पर न तो बिना शर्त छोड़ा जाता हैं और न ही पुलिस आचरण की कोई भर्त्सना की जाती है तथा ऐसे मामलों का भी अभाव नहीं है जहाँ अनावश्यक गिरफ़्तारी के मामलों में मात्र मजिस्ट्रेट ही नहीं अपितु सत्र न्यायधीशों के स्तर तक जमानत से इंकारकर पुलिस के साथ मिलीभगत का खुला खेल खेला जाता है .  स्थिति यह है कि जब कभी अभिरक्षा में भेजने के  निचले न्यायालय के आदेश को उच्च या उच्चतम न्यायालय द्वारा अवैध , अनुचित या अवांछनीय पाया जाता है तो उसे जमानत पर  छोड़ दिया जाता है .बस जो कुछ होता है वह इतना ही है . जिस न्यायिक  अधिकारी ने किसी व्यक्ति को अवैध या अनुचित रूप से अभिरक्षा में भेजकर कर उसकी  स्वतंत्रता में हस्तक्षेप  किया का कुछ भी नहीं बिगड़ता है .

रिपोर्ट में आगे कहा है कि वास्तव में दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पुलिस अधिकारियों को दी गयी गिरफ्तार करने की विस्तृत शक्तियां न्यायालयों को 100 वर्ष से भी अधिक समय से परेशान कर रही हैं .न्यायालय यह कहते रहे हैं कि प्रत्येक गिरफ़्तारी के लिए उचित कारण होना चाहिए .तथ्य यह है कि सरकारें बहुत ही कम मामलों में पुलिस अधिकारियों द्वारा विधि विरुद्ध रोकने (निरुद्ध )के अपराधों में अभियोजन पूर्व स्वीकृति देती हैं . ( राज्य पुलिस सेवा अर्थात उप अधीक्षक से निचले स्तर के पुलिस अधिकारी के अभियोजन हेतु सामान्यतया ऐसी स्वीकृति आवश्यक नहीं है क्योंकि वे राज्यपाल या राष्ट्रपति की शक्तियों के प्रयोग में नियुक्त नहीं होते हैं .)यदि एक पुलिस अधिकारी का इस प्रकार अभियोजन किया जाता है तो चाहे वह सिपाही या उप निरीक्षक या निरीक्षक हो , कुछ अपवादों को छोड़कर ,वे मात्र उसे संरक्षण देने  का ही प्रयास नहीं करेंगे अपितु शिकायतकर्ता को नाना प्रकार से परेशान कर उसे शिकायत वापस लेने को विवश किया जाता है .इस भय को निराधार  एवं निर्मूल नहीं कहा जा सकता है जिसके कारण पुलिस अधिकारियों के अभियोजन का लगभग अभाव रहता है .इस बात को ध्यान रखे बिना कि बहुत सी गिरफ्तारियां अवैध होती हैं फिर भी पुलिस विभाग की शक्ति को चुन्नोती देने का सामान्यतया कोई भी व्यक्ति साहस नहीं करता है .
मेरे मतानुसार यदि एक पीड़ित व्यक्ति किसी राजपुरुष के विरुद्ध परिवाद प्रस्तुत कर भी दे तो उस पर न्यायालयों द्वारा समुचित कार्यवाही नहीं की जाती है .आखिर एक लोकसेवक अपनी बिरादरी के विरुद्ध कार्यवाही से परहेज जो करते हैं .
-मनीराम शर्मा 

गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

लेनिन की स्मृतियां संजोए एक अनूठा संग्रहालय

देश में जिस प्रकार  गांधीजी का अथवा नेहरूजी का नाम आदरभाव तथा आत्मीयता से लिया जाता है, उसी प्रकार श्रद्धा-भक्ति एवं गौरव से रूस के निवासी लेनिन का नाम लेते हैं। सारे देश में स्थान-स्थान पर लेनिन की मूर्तियां और चित्र लगे हैं। रूस में बच्चे-बच्चे की याद में आज भी लेनिन बसते हैं।
लेनिन के स्मारक मन पर गहरी छाप छोड़ते हैं। केंद्रीय लेनिन संग्रहालय एक विशाल भवन में है। इस भवन का निर्माण सन् 1892 में प्राचीन रूसी शैली में हुआ था। इस विशाल भवन में 19 बड़े-बड़े हाल है जिनमें वस्तुओं को देखते-देखते रूस के इतिहास के अनेक पृष्ठ आंखों के सामने खुल जाते हैं। लेनिन की जीवनी के साथ-साथ रूस के राजनीतिक, आर्थिक विकास की कहानी वहां की चीजें अपने आप कह देती हंै।
लेनिन ऐसी शासन व्यवस्था चाहते थे, जिसमें कोई भी किसी का शोषण करने की स्थिति में न रहे। गांधीजी भी भारत में ऐसे ही समाज की स्थापना करने के अभिलाषी थे, लेकिन दोनों के अन्तिम लक्ष्य एक होते हुए भी दोनों के साधनों में बड़ा अन्तर था। गांधीजी ने कभी हिंसा का समर्थन अथवा आह्वान नहीं किया लेकिन लेनिन ने अक्तूबर क्रांति के समय हिंसा की छूट दे दी थी। लेनिन की छोटी से लेकर बड़ी चीजें इस संग्रहालय में सुरक्षित हंै। लेनिन का जीवन बड़ा सादा था और वो अपने देश के करोड़ों किसान-मजदूरों की भांति रहते थे। तिथि क्रम से लेनिन की सारी जीवनी बचपन से लेकर अन्तिम समय तक की चित्रों में प्रस्तुत की गई है। लेनिन का जन्म कब और कहां हुआ, प्रारम्भिक तथा आगे की शिक्षा उन्होंने किस प्रकार पाई, वे क्रांतिकारी कैसे बने, जेल में उनका समय किस तरह बीता, किस तरह उन्होंने रूसी सोशलिस्ट-डेमोक्रेटिक लेबर पार्टी को संगठित करने का प्रयत्न किया—ये सब चित्र एकदम आंखों के सामने घूम जाते हैं।
एक शीशे की अलमारी में लेनिन का ओवरकोट रखा है, देखने में मामूली-सा है, पर ध्यान से देखने पर पता चलता है कि उसका कितना ऐतिहासिक महत्व है। सन् 1918 में लेनिन के जीवन का अन्त करने के लिए जो गोली चलाई गई थी, वह उनके इसी ओवरकोट को पार करके शरीर में प्रविष्ट हुई थी।
गोर्की, जो मास्को से लगभग 35 किलोमीटर की दूरी पर है, अपने अन्तिम 6 वर्षों में लेनिन यहीं पर रहे थे। सन् 1918 से 1924 में लेनिन यहीं पर रहे लेकिन विशेष अवसरों पर मास्को आते-जाते रहते थे। 11वीं कांग्रेस अन्तिम कांग्रेस थी, जिसमें लेनिन ने आखिरी बार भाग लिया। उसके बाद वे बहुत अस्वस्थ हो गये। सन् 1922 के दिनों में कुटुम्बी-जनों तथा राष्ट्र के विशिष्ट व्यक्तियों के साथ लिए गये कुछ चित्र बड़े भावपूर्ण हंै। सन् 1919 में उन्होंने लालसेना के समक्ष जो भाषण दिया उसका रिकार्ड भी सुरक्षित है।
एक पत्र वहां आज भी देखने को मिलता है जिसमें एक मजदूर ने लिखा था, ‘मैं आपको कुछ कपड़ा भेंट करना चाहता हूं। उसमें से आप अपने पहनने के लिए कपड़े बनवा लें।’ उसका आभार मानते हुए बड़ी विनम्रतापूर्वक लेनिन ने वह कपड़ा लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने लिखा कि अपनी निजी आवश्यकता की पूर्ति के लिए वह कोई भेंट स्वीकार नहीं करते।
20 नवम्बर, 1922 को लेनिन ने अन्तिम भाषण दिया। इस भाषण के साथ-साथ उनका कोट, कमीज, जूते, बन्दूक आदि सब ज्यों की त्यों रखे हैं।
एक कमरे में लेनिन की छोटी-सी लाइबे्ररी है, जिसमें अन्य पुस्तकों के बीच कुछ पुस्तकें तुर्गनेव तथा शेक्सपियर की हैै। आखिरी दिनों में वे गोर्की की ‘मेरे विश्वविद्यालय’ पुस्तक पढ़ रहे थे, वह उनकी बड़ी प्रिय कृति थी।  21 जनवरी, 1924 को सायंकाल लगभग 7 बजे लेनिन का देहांत हुआ। चारों तरफ प्रिय नेता के लिए शोक प्रदर्शित किया गया। लेनिन के शव पर मजदूरों ने जो मालाएं अर्पित की थीं, वे भी सुरक्षित रखी हैं।
लेनिन को गए आज इतने वर्ष हो चुके हैं, लेकिन उनके निवास तथा उनकी वस्तुओं को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो वे कहीं किसी सभा में गये हंै, और शीघ्र आ जाएंगे।
- वीणा भाटिया
साभार





सोमवार, 18 अप्रैल 2016

कालियाचक तथ्यान्वेषण रपट (भाग-2)




(पिछले अंक से जारी........)
रैली
तीन जनवरी को सुबह आठ बजे से रैली के लिए लोग इकट्ठे होना शुरू हो गए। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और बच्चे शामिल थे। स्पष्ट है कि अगर आयोजकों का इरादा हिंसा भड़काने का होता तो वे महिलाओं और बच्चों को इकट्ठा नहीं करते। कई महिलाएं और बच्चे सजे धजे हुए थे और नए कपड़े पहने थे।
एक हिंदू प्रत्यक्षदर्शी , जिसका घर कालियाचक पुलिस स्टेशन के नज़दीक है, ने बताया कि रैली करीब सुबह साढ़े नौ बजे शुरू हुई। रैली में शामिल लोग कमलेश  तिवारी के पुतले लिए हुए थे और ‘‘कमलेश  तिवारी को फांसी दो’’, ‘‘नरेन्द्र मोदी जवाब दो’’ व ‘‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’’ के नारे लगा रहे थे। उसने यह भी बताया कि रैली में पाकिस्तान समर्थक नारे नहीं लगाए गए।
लगभग साढ़े दस बजे, 50 से 70 नए लोग रैली की भीड़ में शामिल हो गए। उनके हाथों में लाठियां, पेट्रोल बम और अन्य हथियार थे। उन्होंने कालियाचक पुलिस थाने की चहारदीवारी को तोड़ दिया और अंदर घुसकर थाने में तोड़फोड़ की और थाना प्रभारी राम साहा के साथ दुव्र्यवहार किया। उसके बाद, थाने के प्रांगण में खड़े वाहनों में आग लगा दी गई। ऐसा लगता है कि जिन लोगांे ने थाने पर हमला किया, वे मुआजामपुर के थे और असादुल्ला बिस्बास की माफिया गैंग के सदस्य थे। हमलावर केवल लूटपाट करने वहां आए थे। थाने के अंदर स्थित आरएएफ की बैरक में आग लगा दी गई। गुंडों ने पुलिस स्टेशन के भीतर पेट्रोल बम फेंके। पुलिस थाने पर पत्थर भी फेंके गए, जिनमें से कई आसपास के घरों पर भी लगे। पुलिस थाने के प्रांगण में एक छोटा-सा मंदिर भी है। मंदिर के दरवाजे का ताला तोड़ दिया गया। शायद ऐसा करने वालों का इरादा मंदिर में रखे बर्तनों को चुराना था। प्रताप तिवारी, जो कि उस मंदिर में लगभग 30 साल से पुजारी हैं, ने बताया कि ताला तोड़ा गया परंतु मंदिर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया गया।
प्रत्यक्षदर्शीयों के अनुसार, गुंडों ने पुलिस द्वारा जब्त बियर और खांसी की दवाई की बोतलें, जो थाने में रखीं थीं, खोलकर पी लीं। आसपास की नालियों में बड़ी संख्या में खाली बोतलें पड़ी देखी गईं। कुछ मुसलमानों ने इस लूटपाट को रोकने का प्रयास भी किया परंतु वे उसमें सफल नहीं हो सके क्योंकि हमलावर, पेशेवर अपराधी थे। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि रैली के अगले दिन जब वह स्थानीय मुसलमानों से मिला तो उन्होंने इस बात पर पछतावा व्यक्त किया कि उनकी रैली के दौरान इस तरह की घटना हुई। अब दोनों समुदायों के बीच रिष्ते सौहार्दपूर्ण और सामान्य हैं।
पुलिस स्टेशन के पीछे एक हिंदू मोहल्ला है, जिसमें सड़क के किनारे एक मंदिर बना हुआ है। हमलावरों ने मंदिर की बागड़ की लकडि़यां निकालनी शुरू कीं। उसी समय वहां कुछ हिंदू लड़के आ गए जिन्होंने उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश की। इसके बाद दोनों गुट भिड़ गए। इसी दौरान तनमोय तिवारी नामक एक लड़के के पैर में गोली लगी। तनमोय अब कलकत्ता के एक अस्पताल में इलाज करवा रहा है। हमने मालदा के एडीएम से जब इस बाबत पूछा तो उन्होंने इस बात से इंकार किया कि रैली के दौरन किसी भी पक्ष ने गोलियां चलाईं। हमलावरों ने आसपास की कुछ छोटी दुकानों में भी आग लगा दी और उनका सामान लूट लिया।


घटना का सांप्रदायिकीकरण
भाजपा और हिंदू राष्ट्रवादियों ने रैली के दौरान हुई हिंसा के लिए मुसलमानों को जि़म्मेदार ठहराया और यह कहा कि वे कानून का सम्मान नहीं करते और कट्टरवादी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि सत्ताधारी टीएमसी व अन्य धर्मनिरपेक्ष पार्टियां, वोट बैंक की राजनीति के चलते, मुसलमानों को संरक्षण दे रही हैं। ये तत्व समाज का सांप्रदायिक आधार पर धु्रवीकरण कर हिंदू वोट हासिल करना चाहते हैं। असल में यह हमला एक माफिया द्वारा केवल पुलिस स्टेशन पर किया गया था जिसका उद्देष्य उनके या उनके आकाआंे के खिलाफ दायर प्रकरणों से संबंधित दस्तावेज नष्ट करना था।
हिंदू राष्ट्रवादी पार्टियों ने कई तरह की अफवाहें फैलाईं और झूठ बोले ताकि हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काया जा सके। विहिप के एक स्थानीय नेता गौतम सरकार ने एक पर्चा बांटा जिसमें यह कहा गया कि मुसलमान, हिंदू महिलाओं को परेशान करते हैं। पर्चे में मंदिरों को हुए नुकसान का बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन किया गया जबकि हमने पाया कि मंदिरों को कोई नुकसान नहीं हुआ है। भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर यह प्रचार किया कि कालियाचक की घटना की धर्मनिरपेक्षतावादियों ने इसलिए निंदा नहीं की क्योंकि हमलावर मुसलमान थे।
जो लोग कालियाचक नहीं गए हैं और जिन्होंने पीडि़तों से बातचीत नहीं की है उन्हें ऐसा लग सकता है कि यह हमला एक बहुत बड़ी घटना थी जो कि पष्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था के चरमराने की द्योतक है और टीएमसी सरकार द्वारा मुसलमानों के तुष्टीकरण का नतीजा है। इस घटना को दो समुदायों के बीच सांप्रदायिक हिंसा बताया गया। मुसलमानों के बारे में यह कहा गया कि उन्होंने मंदिरों को नष्ट किया, पुजारी की हत्या की और हिंदू घरों में आग लगाई। इसके विपरीत, हमने पाया कि मंदिरों को छुआ तक नहीं गया है, पुजारी को एक खरोंच तक नहीं आई है और आसपास के घरों को कोई नुकसान नहीं हुआ है।
हिंदू पीडि़तों से चर्चा करने के बाद हम इस नतीजे पर पहुंचे हंै कि यह हमला न तो बहुत बड़ा था और ना ही सांप्रदायिक। अपराधियों और असामाजिक तत्वों ने पुलिस थाने के प्रांगण में खड़े कुछ वाहनों को आग के हवाले कर दिया, आरएएफ के बैरक को जलाकर खाक कर दिया और थाने के दस्तावेज जला दिए। किसी भी प्रकार की हिंसा निंदनीय है। परंतु भारत में पुलिस और पुलिस थानों पर हमले होते रहे हैं। जब भी किसी समूह, संगठन या समुदाय को सरकार से कोई शिकायत होती है तब उसके गुस्से का शिकार पुलिस की गाडि़यां, सरकारी बसें, पुलिसकर्मी और पुलिस स्टेशन बनते हैं। गुजरात में 1984-85 के आरक्षण-विरोधी आंदोलन, हरियाणा के जाट आंदोलन, राजस्थान के गुज्जर आंदोलन और गुजरात के हालिया पाटीदार आंदोलन के दौरान भी पुलिसकर्मियों और पुलिस थानों पर हमले हुए थे।
एडवोकेट असित बरम चैधरी से बातचीत
एक स्थानीय वकील, असित बरम चैधरी, जिनसे हमने मुलाकात की, ने पूरे मुस्लिम समुदाय को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि इस समुदाय के सदस्य अपराधियों को संरक्षण देते हैं और उनकी मानसिकता अलगाववादी है। उन्होंने कहा कि पहले भारत से बड़ी संख्या में गायें बांग्लादेश निर्यात की जाती थीं। जब भारत सरकार ने इस पर रोक लगा दी तब मुसलमानों ने नकली नोट छापने का काम शुरू कर दिया। जब इसके विरूद्ध भी कार्यवाही हुई तो वे अफीम उगाने लगे। उनका कहना था कि अफीम की खेती हथियारबंद लोगों द्वारा बहुत सुनियोजित तरीके से कराई जाती है और इसके व्यापार पर दाउद इब्राहिम का नियंत्रण है। उन्होंने यह भी दावा किया कि दस साल पहले इस क्षेत्र में ‘मुगलिस्तान’ के पोस्टर चिपकाए गए थे जिनमें पष्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार को ‘मुगलिस्तान’ का भाग बताया गया था। उनका यह भी कहना था कि मुसलमान हमेशा अपने आप को मुसलमान पहले और भारतीय बाद में मानते हैं।
टीएमसी नेता मोजाहर हुसैन से बातचीत
मोजाहर हुसैन ने हमें बताया कि पुलिस स्टेशन पर हमला करने वाले अपराधी थे जिनका रैली से कोई लेनादेना नहीं था। उन्होंने तो केवल रैली के आयोजन का इस्तेमाल अपने उद्देष्य को पूरा करने के लिए किया। हमले का उद्देष्य केवल थाने के दस्तावेज जलाना था। उन्होंने यह भी कहा कि अगर पुलिस उन्हें घटना का वीडियो फुटेज दिखाए तो वे हमले में षामिल लोगों की पहचान करने के लिए तैयार हैं ताकि उन्हें उपयुक्त सज़ा दिलवाई जा सके।
एडीएम ने हमें बताया कि कालियाचक में सब कुछ ठीक है और यह भी कि यह हमला सांप्रदायिक नहीं था। उन्होंने जोर देकर कहा कि इलाके में अब शांति है और जिन भी लोगों ने हिंसा की है, उनके विरूद्ध उपयुक्त कानूनी कार्यवाही की जा रही है और आगे भी की जाएगी।
निष्कर्ष
तथ्यान्वेषण दल निम्न निष्कर्षों पर पहुंचा।
1. पुलिस स्टेशन पर हमला, रैली के आयोजकों द्वारा प्रायोजित नहीं था।
2. अपराधियों ने रैली का लाभ उठाते हुए पुलिस थाने पर हमला किया। उनका निशाना हिंदू समुदाय नहीं बल्कि पुलिस थाना और वहां रखे दस्तावेज और रिकार्ड थे। आरएएफ के बैरक भी उनके निशाने पर थे। शायद वे उनकी गैरकानूनी गतिविधियों पर नियंत्रण करने की कोशिश से नाराज़ थे।
3. इस पूरे घटनाक्रम में मीडिया का रोल अत्यंत निंदनीय रहा। कालियाचक पुलिस स्टेशन पर हमला
अपराधियों ने किया था, जो संयोगवश मुसलमान थे। परंतु इसका राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह प्रचार-प्रसार किया गया मानो मुसलमानों ने सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया हो। इस मामले में जी-न्यूज़ की भूमिका बहुत खराब थी।
4. मुसलमानों के दो संगठनों, एहले सुनातुल जमात व इदारा-ए-शरिया के बीच प्रतिस्पर्धा के कारण रैली आयोजित की गई जिसके नतीजे में कालियाचक पुलिस थाने पर हमला हो सका। दोनों संगठन इलाके के मुसलमानों मंे अपनी पैठ बढ़ाना चाहते हैं। अगर हमें सांप्रदायिक राजनीति को पराजित करना है तो इस तरह की प्रतिस्पर्धा से बचा जाना चाहिए। मुसलमानों को धैर्य रखना चाहिए क्योंकि वे जितने ज्यादा उत्तेजित होंगे और हिंसा करेंगे, हिंदू राष्ट्रवादियों को उनके खिलाफ प्रचार करने का उतना ही अधिक मौका मिलेगा। अगर किसी व्यक्ति विशेष  ने पवित्र पैगम्बर के संबंध में कोई अपमानजनक टिप्पणी की भी हो तो उसका मुकाबला कानूनी रास्ते से किया जाना चाहिए ना कि सड़कों पर हिंसा करके। कब जब मुस्लिम संगठन, पवित्र पैगम्बर के प्रति प्रेम और श्रद्धा के कारण नहीं वरन अपने राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने के लिए इस तरह के विरोध प्रदर्शनों  का आयोजन करते हैं।
5. हमने यह पाया कि हिंदू अपने घरों में सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। यहां तक कि तनमोय तिवारी के परिवार वालों के मन में भी मुसलमानों के प्रति कोई कटुता नहीं है।
6. पुलिस स्टेशन पर हमला न तो सांप्रदायिक था और ना ही इससे सांप्रदायिक धु्रवीकरण हुआ। 
7. इलाके में शांति को बढ़ावा देने और दोनों समुदायों के आपसी रिष्तों को मजबूत करने के लिए सकारात्मक प्रयासों की आवष्यकता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस सिलसिले में न तो टीएमसी और ना ही सीपीएम ने कोई कदम उठाए। टीएमसी और सीपीएम के धर्मनिरपेक्ष हिंदू नेता, शांति स्थापना के लिए पहल कर सकते थे परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। हिंदू राष्ट्रवादी, कालियाचक थाने पर हमले की घटना का इस्तेमाल मुसलमानों का दानवीकरण करने और हिंदुओं के मन में उनके प्रति भय उत्पन्न करने के लिए कर रहे हैं। ऐसा बताया जा रहा है कि मानो हिंसक, अपराधी, आतंकवादी व राष्ट्रविरोधी मुसलमान, पूरे हिंदू समुदाय को अपना शत्रु मानते हैं। इस तरह के दुष्प्रचार का धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक शक्तियों द्वारा मुुकाबला किया जाना चाहिए और हिंदू राष्ट्रवादियों के असली चेहरे को बेनकाब किया जाना चाहिए।
8. इलाके के मुसलमानों का यह कर्तव्य था कि जिन लोगों की दुकानें जलाई गईं हैं वे उनसे मिलते और उन्हें प्रतिकात्मक रूप से थोड़ा-बहुत मुआवजा अपनी ओर से देते। परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया। उनका यह कहना है कि वे हिंसा के पीडि़तों से इसलिए नहीं मिले क्योंकि उन्हें डर था कि वे लोग उन्हें हिंसा के लिए दोषी ठहराएंगे।
9. जिन छोटे दुकानदारों का नुकसान हुआ है, सरकार को उन्हें उचित मुआवजा देना चाहिए।
-इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 15 अप्रैल 2016

विद्यार्थियों को जरूरत नहीं है देशभक्ति की तकरीरों की




शिक्षण संस्थाओं में देशभक्ति का भाव जगाने की बात, वर्तमान सरकार के सत्तासीन होने (मई 2014) के तुरंत बाद शुरू हो गई थी। सरकार द्वारा प्रतिष्ठित राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थानों में अनुचित हस्तक्षेप की कई घटनाएं एक के बाद एक हुईं। आईआईटी मद्रास में ‘पेरियार-अंबेडकर स्टडी सर्किल‘ पर प्रतिबंध लगाया गया। केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय की दादागिरी से त्रस्त होकर आईआईटी, बाम्बे के निदेशक प्रोफेसर शेवगांवकर ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसी तरह के अनाधिकार हस्तक्षेप से परेशान होकर आईआईटी, बाम्बे के शासी निकाय के अध्यक्ष प्रोफेसर अनिल काकोड़कर ने भी अपना त्यागपत्र दे दिया था।
फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट आॅफ इंडिया, पुणे का मामला भी लंबे समय तक सुर्खियों में रहा। यहां के विद्यार्थी आरएसएस-भाजपा की विचारधारा में यकीन रखने वाले बी ग्रेड फिल्म कलाकार गजेन्द्र चैहान की संस्थान के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति का विरोध कर रहे थे। विद्यार्थियों ने आठ महीने तक हड़ताल की परंतु जब सरकार अड़ी रही और उसने उनकी मांग पर विचार तक करने से साफ इंकार कर दिया, तब, मजबूर होकर विद्यार्थियों ने अपना आंदोलन वापस ले लिया। इलाहाबाद विश्वविद्यालय और पुणे के फरग्यूसन काॅलेज में भी इसी तरह का घटनाक्रम हुआ। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) व जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के घटनाक्रम ने देश के विद्यार्थी समुदाय को गहरा धक्का पहुंचाया। इन दोनों मामलों में केंद्र सरकार, सत्ताधारी भाजपा और संघ परिवार के उसके साथियों ने राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नारे उछाल कर इन दोनों विश्वविद्यालयों के विद्यार्थियों को बदनाम करने का कुत्सित अभियान चलाया।
एबीवीपी की एचसीयू शाखा के कहने पर स्थानीय भाजपा सांसद ने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री को लिखित में यह शिकायत की कि विश्वविद्यालय परिसर में राष्ट्रविरोधी व जातिवादी गतिविधियां संचालित की जा रही हैं और कहा कि इन पर रोक लगाने के लिए अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एएसए) के खिलाफ कार्यवाही की जानी चाहिए। एबीवीपी ने अपने राजनैतिक एजेंडे के अनुरूप, एएसए द्वारा विश्वविद्यालय में आयोजित कई कार्यक्रमों का विरोध किया था। इनमें शामिल थे उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा पर बनी फिल्म ‘‘मुजफ्फरनगर बाकी है’’ का प्रदर्शन और ‘‘बीफ उत्सव’’ का आयोजन। रोहित वेम्यूला ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा कि उन्होंने इस उत्सव में इसलिए भागीदारी की क्योंकि वे उन लोगों से अपनी एकजुटता दिखाना चाहते थे, जो बीफ का सेवन करते हैं। एएसए ने अफज़ल गुरू को मौत की सज़ा दिए जाने का भी विरोध किया। एएसए का तर्क यह था कि मौत की सज़ा अमानवीय है और किसी भी सभ्य समाज में इसके लिए कोई स्थान नहीं है।
इसके बाद, मंत्रालय के दबाव में, कुलपति ने वेम्यूूला को छात्रावास से निष्कासित कर दिया और उनकी शिष्यवृत्ति  बंद कर दी। इसी ने उन्हें आत्महत्या की ओर धकेला। जेएनयू के मामले में सुनियोजित तरीके से देशभक्ति का मुद्दा उठाया गया। जेएनयू छात्रसंघ द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में कुछ नकाबपोशों ने जबरन प्रवेश कर भारत-विरोधी नारे लगाए। कन्हैया कुमार और उनके दो साथी नारे लगाने वालों में शामिल नहीं थे। यह दिलचशस्प है कि पुलिस अब तक उन लोगों का पता नहीं लगा पाई है जिन्होंने ये निंदनीय नारे लगाए थे। उलटे, पुलिस ने कन्हैया कुमार, अनिरबान भट्टाचार्य और उमर खालिद को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। कुछ टीवी चैनलों में एक ऐसा वीडियो बार-बार दिखाया गया जो नकली था। बाद में यह स्पष्ट हो गया कि जिन छात्र नेताओं को गिरफ्तार किया गया था, उनका भारत-विरोधी नारेबाजी से कोई लेनादेना नहीं था। जिस कार्यक्रम में ये नारे लगाए गए थे, वह अफज़ल गुरू की बरसी पर आयोजित किया गया था। इस मसलेे पर भाजपा के दोगलेपन के बारे में जितना कहा जाए, उतना कम है। भाजपा ने काफी प्रयास कर कश्मीर  में पीडीपी के साथ मिलकर सरकार बनाई है। पीडीपी, अफज़ल गुरू को शहीद मानती है और यह भी मानती है कि उसके साथ न्याय नहीं हुआ। यह स्पष्ट है कि भाजपा, जेएनयू मामले को एक भावनात्मक रंग देने पर आमादा है।
हम सब यह जानते हैं कि जिस तरह के नारे जेएनयू में लगाए गए, वैसे नारे कश्मीर में आम हैं। इसी तरह के अलगाववादी नारे उत्तरपूर्वी राज्यों में भी कई समूहों और संगठनों द्वारा लगाए जाते रहे हैं। जहां तक भारत से अलग होने की मांग का संबंध है, ऐसी ही मांग तमिलनाडु के डीएमके नेता सीएन अन्नादुराई ने भी उठाई थी। वे हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देश  पर लादे जाने के खिलाफ थे। कुल मिलाकर, दुनिया के कई हिस्सों में अलग-अलग देशों में स्वायत्तता या देश  से अलग होने की मांगंे उठाई जाती रही हैं और इन मुद्दों पर आंदोलन भी चलते रहे हैं। परंतु कभी भी उन्हें राष्ट्रद्रोह नहीं बताया गया। कई समूह और राजनैतिक संगठन, सत्ताधारी पार्टी और उसकी सरकार की कटु निंदा करते आए हैं। परंतु यह राष्ट्रद्रोह नहीं है। यह तो एक प्रजातांत्रिक अधिकार है।
भारत में भी कई समूह और संगठन, समय-समय पर स्वायत्तता और अलग देष की मांग करते रहे हैं। किसी भी देष - विषेषकर भारत जैसे विषाल देष - में अलग-अलग तरह की राजनैतिक प्रवृत्तियां होती हैं और उनमें समय के साथ परिवर्तन भी होता है। सवाल यह है कि हम इस तरह के असंतोष का कैसे मुकाबला करें? युवा और विद्यार्थी, हर तरह के विचारों और विचारधाराओं पर बहस और चर्चा करते हैं। आॅल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेषन और कई अन्य विद्यार्थी संगठनों ने ब्रिटिष सरकार के विरूद्ध खुलकर आंदोलन किए परंतु उन्हें राष्ट्रवादियों द्वारा देषभक्ति का लेक्चर नहीं पिलाया गया था। स्वाधीनता संग्राम में जिन देषभक्तों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी, उनमें से अधिकांष गांधी के अनुयायी थे और उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन से प्रेरणा ग्रहण की थी।
उस समय भी कई युवा और विद्यार्थी, मुस्लिम लीग व हिंदू महासभा-आरएसएस की सांप्रदायिक विचारधारा से प्रभावित थे और ऐसे विद्यार्थियों ने कभी राष्ट्रनिर्माण और स्वाधीनता संग्राम के संघर्ष में भाग नहीं लिया। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को 1942 में इसलिए गिरफ्तार किया गया था क्योंकि वे गांधीजी से प्रेरित विद्यार्थियों के एक प्रदर्षन को देख रहे थे। वाजपेयी ने अधिकारियों को एक पत्र लिखकर कहा कि उनका राष्ट्रीय आंदोलन से कोई लेनादेना नहीं है और वे तो एक तमाश बीन की हैसियत से प्रदर्षनस्थल पर मौजूद थे। उन्हें दो दिन के अंदर जेल से रिहा कर दिया गया था।
विष्वविद्यालयों और अन्य षैक्षणिक संस्थानों में विद्यार्थियांे को देषभक्ति की घुट्टी पिलाए जाने की आवष्यकता नहीं है। उनकी षिक्षा और उनका समाज उन्हें स्वमेव देषभक्त बनाता है। जिस तरह की देषभक्ति के पाठ संघ परिवार द्वारा पढ़ाए जा रहे हैं, उनकी न तो कोई ज़रूरत है और ना ही उपयोगिता। जैसा कि जेएनयू व एचसीयू के घटनाक्रम से स्पष्ट है, देषभक्ति के नाम पर समाज को बांटा जा रहा है। देषभक्ति को ‘‘भारत माता की जय’’ के नारे से भी जोड़ दिया गया है। पहले आरएसएस के मुखिया मोहन भागवत ने यह आह्वान किया कि युवाओं को यह नारा लगाना सिखाया जाना चाहिए। इसके बाद, असादुद्दीन ओवैसी ने जो प्रतिक्रिया व्यक्त की, उससे यह स्पष्ट है कि ये दोनों ही नेता इस मुद्दे को भावनात्मक स्वरूप देकर देष को बांटना चाहते हैं। आरएसएस इस मुद्दे पर अत्यंत आक्रामक है। जैसा कि जेहोवा विटनेस के प्रकरण में उच्चतम न्यायालय के निर्णय से स्पष्ट है, संवैधानिक स्थिति यह है कि सभी नागरिकों को राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान करना चाहिए परंतु किसी  गीत का गायन या किसी नारे का लगाया जाना आवष्यक व अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।
देशभक्ति का एक अर्थ है हमारे देश के संविधान और उसके कानूनों का पालन करना। सरकार की आलोचना की तुलना देशद्रोह से नहीं की जा सकती। लोगों पर नारे लादने के वर्तमान प्रयासों का देशभक्ति से कोई संबंध नहीं है। इस अभियान के राजनैतिक उद्देश्य हैं। हमें भागवत, देवेन्द्र फडनवीस और बाबा रामदेव जैसे विघटनकारी तत्वों से सावधान रहना चाहिए जो अनावश्यक मुद्दे उठा कर देश में तनाव फैलाने में जुटे हुए हैं। बाबा रामदेव का वक्तव्य तो अत्यंत डरावना है। अंग्रेज़ी में एक कहावत है ‘‘पेट्रोयट्रिज्म इज द लास्ट रिफ्यूज आॅफ इस्कांड्रेल्स’’ (देशभक्ति लुच्चों की आखिरी पनाहगाह है)। भारत में भी छद्म राष्ट्रवादियों ने अपने राजनैतिक लक्ष्यों को पूरा करने के लिए देशभक्ति की शरण ले ली है।
हमारे शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों को देशभक्ति पर तकरीरों की ज़रूरत नहीं है। वहां स्वतंत्र बहस व आलोचना का वातावरण विकसित किया जाना चाहिए - एक ऐसा वातावरण, जिसमें असहमतियों के स्वरों को दबाया न जाए। वहां भारतीय राष्ट्रवाद और मानवतावाद के मूल्यों को बढ़ावा दिए जाने की ज़रूरत है। भारत माता की जय कहने और राष्ट्रीय ध्वज फहराने से ही कोई देशभक्त नहीं हो जाता है .
-राम पुनियानी

बुधवार, 13 अप्रैल 2016

हमारी लड़ाई सेटजी, फटजी और लाटजी इनके खिलाफ है।

भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) का राष्ट्रीय सम्मेलन 2-4 अक्टूबर 2016 में इंदौर में होना तय हुआ है। उसी तारतम्य में से ये भी तय किया गया कि इप्टा द्वारा इंदौर में प्रतिमाह विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जायेगा। 08 अप्रेल 2016 को इस कड़ी में परिचर्चा के रूप में दूसरे  कार्यक्रम का आयेजन किया गया जिसमें मुख्य वक्ता थे सुबोध मोरे और विषय था ‘‘दलित, वामपंथी और प्रगतिशील आंदोलन की साझा चुनौतियाँ।’’
सुबोध मोरे जनवादी लेखक संघ के सक्रिय सदस्य होने के साथ ही साथ विद्रोही सांस्कृतिक मंच के राष्ट्रीय महासचिव रहे हैं और अभी भी सक्रिय हैं। मूलतः सुबोधजी एक्टिविस्ट कहलाना ही पसंद करते हैं। मुम्बई में जब बस्तियों का विस्थापन हुआ तब उसके खिलाफ चलाए आंदोलन में कॉमरेड सुबोधजी की महत्तवपूर्ण भूमिका रही है। अम्बेडकर साहित्य की गहरी पैठ होने के अलावा सुबोधजी ने दलित रचनाकारों द्वारा रचित रचनाओं का भी गहरा अध्ययन किया है। उन्होंने अनेक नाटकों, जनगीतों का मंचन, प्रदर्शन  किया  चुके हैं उनका इप्टा से पुराना और गहरा रिष्ता है और महाराष्ट्र इप्टा में भी सक्रिय भूमिका है। 
सुबोध मोरे ने अपनी बात शुरु करते हुए कहा कि वाम और दलित आंदोलन दोनों के बीच की दूरी पाटने के लिए एक पुल बनाना जरूरी है। हमें दलित-आदिवासी और शोषितों की लड़ाई मिल कर लड़ना होगी, हमने मुम्बई में इसकी शुरुआत भी की है। हम सन् 1992 से विद्रोही सांस्कृतिक मंच के जरिए हर वर्ष एक बड़़ा सम्मेलन करते हैं जिसमें अम्बेडकरवादी और प्रगतिषील सोच के साहित्यकार, दलित-आदिवासी, युवा, महिलाएं और हर जाति, समाज, धर्म के साहित्य से जुड़े लोग सम्मिलित होते हैं। हमें इस तरह के कार्यक्रम हर क्षेत्र में करने और सबको एक मंच से जोड़कर काम करने की जरूरत है। साथ ही हमें दलित साथियों द्वारा रचित साहित्य को पढ़ने, उस पर विचार करने और उसे विस्तारित करने की जरूरत भी है जिससे लोगों की सोच में बदलाव लाया जा सके।
वामपंथियों को अम्बेडकर, महात्मा फूले जैसे समाज उत्थानकों और विचारकों के विचारों को समझना और लोगों के बीच लाना जरूरी है। कबीर, अम्बेडकर और पेरियार के विचारों को एक करके समझने की जरूरत है। अम्बेडकर हों या ज्योतिबा-सावित्री फूले हों या प्रगतिषील साहित्यकार अन्नाभाऊ साठे इन सबकी इमेज को एक समाज या जाति के दायरे में कैद कर दिया गया है जबकि ये सब विचारक हैं। इनके विचार सारे शोषित तबके के लिए हैं लेकिन उनको जाति या समाज के दायरे में बांधकर सीमित कर दिया गया है। 
दलित विचारक आज के परिदृष्य से गायब कर दिए गए हैं। हम महात्मा फूले, अन्नाभाऊ साठे जैसे विचारकों को याद ही नहीं करते। ज्योतिबा फूले की जयंति अब केवल माली समाज मनाता है। कहने का तात्पर्य केवल वोट बैंक का जरिया बना दिया गया है। 
महात्मा फुले ने उस समय कहा था कि ‘‘हमारी लड़ाई किसानों, संास्कृतिक आजादी, श्रमिकों, शोषितों के लिए है।’’ ‘‘हमारी लड़ाई सेटजी, फटजी और लाटजी इनके खिलाफ है।’’ सेटजी मतलब उस वक़्त का अमीर या पूंजीपति, लाटजी मतलब गरीबों को लूटने वाला, साहूकार और फटजी मतलब ब्राह्मणवाद, वो किसी विशे ष जाति ना होकर सारे सवर्णों के खिलाफ कहा गया था और यही बात 1938 में अम्बेडकर ने मुम्बई रेल्वे मजदूरों के आंदोलन में अपने भाषण में भी कही थी कि मजदूरों के दो शत्रु हैं एक है पूंजीवाद तथा दूसरा ब्राह्मण्यवाद। वामपंथ भी इन्हीं दोनों के खिलाफ लड़ता है। जब दोनों के उद्देष्य समान है तो अलग-अलग संघर्ष क्यों? ये हमें सोचना बहुत आवष्यक है। ‘‘ब्राह्मण्यवाद’’ शब्द, व्यवस्था के खिलाफ है ना कि किसी जाति के लेकिन इस शब्द को बहुत तोड़-मरोड़ करके लोगों के सामने रखा जाता है। हमें चार व्यवस्थाओं सामंतवाद, पूंजीवाद, छुआछूत और पुरुषप्रधान समाज इनके खिलाफ इकट्ठे मिलकर लड़ना होगा, संघर्ष करना होगा।
20 मार्च 1927 को हुए महाड सत्याग्रह की जानकारी देते हुए कॅामरेड सुबोध ने बताया कि महाड के जिस तालाब का पानी पीकर सत्याग्रह किया था, सत्याग्रह के बाद सवर्णों ने उस तालाब में 108 घड़े गौमूत्र डालकर उसे शुद्ध किया और इतना ही नहीं जिन दलितों ने इस सत्याग्रह में भाग लिया था उनके साथ बहुत मारा-पीटी भी की गई। लेकिन महाड के सत्याग्रह में दलित समाज से आर.बी. मौर्य थे तो सुरबन्ना तिपिन्स, सहस्त्रबुद्धे (जिन्होंने मनुस्मृति का दहन किया था) जैसे मध्यम वर्गीय सवर्ण भी उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर साथ खड़े थे। लेकिन ये बातें जन साधारण तक पहुंचती ही नहीं हैं। चाहे अम्बेडकर की बात करें या फूले के आंदोलन की, दोनों के साथ महाराष्ट्र का सवर्ण वर्ग भी साथ रहा है। 
ये महज एक इत्तेफाक था लेकिन सन् 1848 में जब कार्ल मार्क्स का कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो लोगों के सामने आया तब उसी वर्ष 3 जनवरी को भारत के महाराष्ट्र में अछूतों और महिलाओं के लिए ज्योतिबा और सावित्री बाई फूले ने पहला विद्यालय खोला था और इस विद्यालय हेतु जमीन वहां के ब्राह्मण समाज ने ही दी थी।   जब 16 अगस्त 1936 में, तब मुम्बई राज्य हुआ करता था, अम्बेडकर ने अपनी अलग राजनीतिक पार्टी बनाई और उनकी पार्टी से तेरह एमएलए चुनकर आए थे, वो उस समय की बड़ी पार्टी थी। जिसमें से चार ऊंची जाति के लोग थे। उनमें से ही एक श्यामराव पोडेकर उस पार्टी के डिप्टी लीडर थे जो बाद में कम्यूनिस्ट पार्टी में आए, जो किसान सभा के बड़े लीडर हुए। परुलेकर जो आदिवासी सभा के लीडर थे, बाद में कम्यूनिस्ट पार्टी के मेम्बर बनें। 
ये सब बताने का तात्पर्य यह है कि हमें इतिहास से सीखना होगा जिस तरह महाराष्ट्र में जब मजदूरों के विरोध में बिल आया था जो काला कानून के नाम से जाना जाता था या किसानों का संघर्ष हुआ तब, जमींदार प्रथा के खिलाफ कम्यूनिस्टों और बाबा साहेब ने साथ मिलकर इन लड़ाइयों को लड़ा और सफल रहे उसी तरह के सामंजस्य की जरूरत हमें आज बहुत तीव्रता के साथ जरूरत है। दोनों के काम करने के तरीके में अंतर हो सकता है लेकिन उद्देष्य एक हैं। आज जो हमला हो रहा है वह इन दोनों विचारधाराओं पर ही हो रहा है क्योंकि ये सांप्रदायिक ताकतें जानती हैं कि यही दोनों ताकतें उनके खिलाफ अडिग होकर खड़ी रह सकती हैं। ये दोनों शक्तियां हैं जो चुनौती दे सकती हैं। पूंजीवादी ताकतों ने इन दोनों विचारधाराओं के बारे में अनेकों अर्नगल धारणाएं फैलायीं। यही काम उन्होंने बुद्ध और मार्क्सवाद के मध्य भी किया।
आज यदि हम कमजोर पड़े हैं तो उसकी एक वजह ये भी है कि हमें अपने सांस्कृतिक पक्ष को मजबूत करके रखना था जो हम नहीं रख पाए। एक समय था जब इप्टा ने देश में एक बड़ा रोल अदा किया था। फिर एक ऐसा फेज भी आया कि जिसमें सांस्कृतिक पक्ष बहुत कमजोर हो गया। महाराष्ट्र में दलित साहित्य की शुरुआत करने वालों में अन्नाभाऊ साठे, बाबूराव बाबुल का नाम लिया जाता है और ये दोनों ही लोग वामपंथी और अम्बेडकर विचारधारा दोनों के समर्थक रहे हैं जिसका प्रभाव इनके द्वारा रचित साहित्य में स्पष्ट दिखता है। क्योंकि ये दोनों जिस क्षेत्र माटुंगा लेबर केम्प में काम कर रहे थे वहां इन दोनों ही विचारधाराओं का बहुत प्रभाव था। इंदौर के एक पुराने शायर थे ‘‘मजनूं इंदौरी’’, शंकर शैलेन्द्र (जिन्होंने बाद में राजकपूर की फिल्मों के गाने भी लिखे), शाहिर अमर शेख और गवाणकर ये सभी इसी लेबर केम्प में काम करते थे और सांस्कृतिक पक्ष में भी जाने माने नाम हैं। शेख ने इप्टा द्वारा बनाई पहली फिल्म ‘‘धरती के लाल’’ के लिए गीत लिखे और बाद तक इप्टा से जुड़े रहे। अन्नाभाऊ साठे दलित साहित्य संगठन के पहले अध्यक्ष रहे। उन्होंने लाल झंडे के भी गाने लिखे, मजदूरों के भी गाने लिखे और दलित आंदोलन के भी गाने लिखे। वे इप्टा के अॅाल इंडिया के प्रेसीडेन्ट भी रह चुके हैं। इन्होंने अनेक उपन्यास, नाटक, कहानियां, फिल्म पटकथाएं भी लिखीं। मजनूं इंदौरी जो रेल्वे मजदूरों के बीच और ट्रेड यूनियन में काम करते थे जिनकी किताब ‘‘जिंदगी’’ पर आचार्य अतरे और कैफी आजमी ने भूमिका लिखी थी।  सत्तर के दषक के नामदेव ढसाल, दया पवार जैसे साहित्यकारदोनों ही विचारधाराओं से जुड़े रहे हैं। आज शायद ही किसी को याद होगा कि अन्नाभाऊ साठे इप्टा के राष्ट्रीय सदस्य भी रहे हैं।
वर्तमान में रोहित वेमुला के बाद जो राजनीतिक माहौल बना है ये अच्छे संकेत हैं और हमारे लिए दलित और वामपंथी ताकतों को मिलाने का अच्छा अवसर है। हमें उसका फायदा उठाते हुए सक्रिय रूप से काम करते की जरूरत है ऐसा मैं समझता हूं। साथ ही दबे-कुचले और शोषित तबके को लामबंद करने की जरूरत है और रफ्तार हमें और तेज कर देना चाहिए। इस समय हमें कोई भी मौका नहीं चूकना चाहिए। 
यदि हमें इन फासीवादी ताकतों को षिकस्त देनी है तो मिलकर साथ आना होगा। ये फासीवादी ताकतें समरसता की बात करती हैं जिसमें हमारा आस्तित्व ही मिट जाता है, हमारी अस्मिता ही खतम हो जाती है जबकि हम समता की बात करते है। हम आज भी ये नहीं समझते हैं कि ये लड़ाई जातिगत हिन्दू चेतना और सर्वहारा वर्ग के बीच की लड़ाई है। आज भी जाति चेतना, वर्ग चेतना की तुलना में अधिक शक्तिषाली है। हमें इस वर्ग चेतना को जाति चेतना से अधिक शक्तिषाली बनाना होगा।
सत्तासाीन सरकार की नीतियां अब जन साधारण के सामने भी उजागर हो गई हैं। अब लोगों में इतनी राजनीतिक चेतना आ गई है कि वे ये समझने लगे हैं कि वर्तमान सरकार जाति के आधार पर लोगों में फूट डाल रही है। ऐसे लोग जो दलित के नाम पर अपनी रोटियां सेंकने की कोषिष कर रहे हैं लोग अब उनकी इन चालों को समझने लगे हैं।
बाबा साहेब ने उस समय लिखा था कि यदि बीजेपी या संघ सत्ता में आते हैं तो सांप्रदायिक ताकतें तेज हो जायेंगी और ये बात होती आज हम देख भी रहे हैं। भले ही दलित और वामपंथी विचारों के बीच मतभेद हो सकते हैं लेकिन हमें उन मुद्दों पर एक होकर काम करने की सख्त जरूरत है जिनमें हम एकमत हैं। 
पुरस्कार वापसी के सिलसिले में महाराष्ट्र में सबसे पहले पुरस्कार वापस करने वाले साहित्यकार दया पवार ही थे जो कि दलित समाज से ताल्लुक रखते हैं।
भारतीय जन नाट्य संघ, इंदौर की इस बैठक में सवाल-जवाब भी हुए। इप्टा के साथियों महिमा, सूरज, मृगेन्द्र, नितिन, आमिर के साथ साथ वरिष्ठ एवं युवा कॅामरेड एस. के. दुबे, कैलाश  गोठानिया, ब्रजेश  कानूनगो, दुर्गादास सहगल, भवानी सिंह, तपन भट्टाचार्य, सुभद्रा खापर्डे, नेहा, तौफीक की विशेष उपस्थिति रही।

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

जल ही जीवन है जल बिन सब सून



तहसील प्रशासन के इशारे पर हो रहा है पोखरा पोख्रियो व तालाबो पर कब्जा  सारे देश में – सुनील दत्ता   कबीर

आजमगढ़  ---- जल ही जीवन है जल बिन सब सून जनपद के ऐतिहासिक ताल - पोखरों , नदियों के साथ ही पोखरियो , कुँओं पर हो रहे अवैध कब्जो को हटाने के साथ ही जल- संरक्षण के लिए रैदोपुर स्थित दुर्गा जी के मंदिर से लखराव पोखरा संघर्ष समिति व नेशनल लोकरंग एकेडमी  उत्तर प्रदेश के संयुक्त तत्वाधान  लखराव पोखरा संघर्ष समिति के सयोजक व में  एन एल ए के महासचिव सुनील दत्ता के नेतृत्त्व में मौन जलूस निकालकर जिलाधिकारी के माध्यम से महामहिम राज्यपाल उत्तर प्रदेश को ज्ञापन भेजा गया |  रैदोपुर कालोनी से निकल कर पुरानी कलेक्ट्री पुलिस लाइन दीवानी कचहरी नौरोली होते हुए मौन जलूस जिलाधिकारी कार्यालय  पहुचा |
कैम्पस में प्रेस से बातचीत करते हुए एन.एल.ऐ उत्तर  प्रदेश के महासचिव सुनील दत्ता ' कबीर ' ने कहा कि आज पूरा विश्व जल संकट से घिरा हुआ है खासतौर से हमारा देश भारत भी  जिला प्रशासन को अवगत करना चाहता हूँ कि जल संरक्षण के लिए प्रकृति ने इस जनपद को काफी कुछ दिया है | जिले में छोटे - बड़े काफी संख्या में जलाशय मौजूद है | रानी की सराय क्षेत्र में  गंभीरवन  ऐसा क्षेत्र  है यहाँ पर एक बड़ा ताल और छोटे - बड़े सात ताल मौजूद है सैकड़ो बीघे में फैला बडैला का ताल अपने ऐतिहासिक अस्तित्व से लड़ रहा है . दिन - प्रतिदिन यहाँ कब्जा होने से इसका जलमगन भाग काफी कम हो गया है | यह ताल जाड़े के दिनों में प्रवासी पक्षियों का बसेरा भी बनता है , विविध प्रकार की सम्पदाए इसमें होने से स्थानीय लोगो की जीविका का साधन भी है , इसी तरह हजारो बीघे मैं फैला अजमतगढ़ का ताल अपने ऐतिहासिक महत्व को फिर से प्राप्त करने के लिए लड़ रहा है इस ताल से स्थानीय लोगो की जिन्दगी चलती है लेकिन इस ताल पर दबंगो द्वारा लगातार कब्जा होने से यह ताल भी सिकुड़ता जा रहा है | अगर इस ताल का सुन्दरीकरण करा दिया जाए तो इस जनपद के लिए यह एक पिकनिक सपाट बन सकता है | 46 लाख से अधिक आबादी वाले इस जिले में 70% से अधिक लोग गाँव में रहते है बाकि 30% लोग शहर व कस्बे में रहते है दिन बी दिन यहाँ का जलस्तर घटता जा रहा है जबकि यहाँ 400 सरकारी नलकूप - 214835 निजी नलकूप -- 73188निजी बोरिंग करीब 65 हजार इण्डिया मार्का हैण्ड पम्प व 95 हजार देशी हैण्ड पम्प से निरंतर भूजल का दोहन हो रहा है | इसके साथ ही जिले में 2833 पक्के कुए - 3 हजार से अधिक तलब पोखरे है लेकिन शासन - प्रशासन की अनदेखी के कारन इन तलब ताल पोखरों पर लगातार कब्जा होता चला जा रहा है और हमारे जल संरक्षण की समस्या बढती जा रही है जिले के प्राकृतिक संसाधन यहाँ के प्रशासन केउपेक्षा शिकार बना हुआ है | लखराव पोखरा संघर्ष समिति मेहनगर के सयोजक महेंद्र मौर्य ने कहा की पुरे जनपद में कुछ ऐतिहासिक महत्व वाले पोखरे है खासतौर पे मेहनगर में 46 पोखरे है इनमे महत्वपूर्ण हरीबांध पोखरा इस पोखरे लोनी नदी निकलती है , रानी सागर पोखरा , महामंडलेश्वर - ( मधिलाहा ) लखराव पोखरा जिसके बारे में कहा जाता है की इसमें पानी पातळ से आता है कभी इस पोखरे के पानी से घर का पूरा खाना बनता था साथ में बाजार की मिठाईया भी लेकिन आज मेहनगर के इन ऐतिहासिक पोखरों के साथ ही ऐतिहासिक अवंतिकापुरी का पूरा अस्तित्व शासन - प्रशासन की अनदेखी के कारण खतरे में है |
वहीं दूसरी कडी में   सामाजिक कार्यकर्ता शिवम यादव ने इसे प्रशासनिक लापरवाही बताया और इसकी घोर निंदा किया  साथ ही साथ जिला प्रशासन को चेतावनी दिया की इस मामले की जाँच  दस दिन में करके  प्रशासन उचित कार्रवाई करें वरना हम ग्रामीण दोबारा सडक पर उतरने को बाध्य होंगे जिसका जिम्मेदार खुद शासन होगा |
मौन जलूस रामजन्म , वीरेन्द्र राम धर्मेन्द्र मौर्य , न्रेंद्र्भादुर यादव , जगमोहन यादव , मनोज कुमार मो नेहाल , राजकुमार बाबा , कव्ल्धारी यादव , अनुज् यादव हरेन्द्र चौहान , रमाशंकर पाल , दीपचन्द्र मौर्य , सूरत राम , राज कुमार यादव , विश्वनाथ यादव दीना यादव के साथ सैकड़ो आमजन इस जलूस को अपना समर्थन दिए |

गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

कालियाचक तथ्यान्वेषण रपट -भाग-1

तुम्हारी रोज़मर्रा की जिंदगी ही तुम्हारा मंदिर और तुम्हारा धर्म है
-खलील जि़ब्रान (द प्रोफेट)

गत 3 जनवरी 2016 को पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में स्थित कालियाचक पुलिस स्टेशन पर एक भीड़ ने हमला किया। इस घटना की अखबारों में छपी रपटों में बताया गया कि यह मुसलमानों द्वारा किया गया सांप्रदायिक हमला था। पश्चिम बंगाल में भाजपा के एक मात्र विधायक के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल कालियाचक जाना चाहता था परंतु सरकार ने इसकी इजाज़त नहीं दी। चूंकि पश्चिम बंगाल में जल्दी ही विधानसभा चुनाव होने वाले थे, इसलिए सभी पार्टियों ने इस घटना का इस्तेमाल अपने लाभ के लिए करने की पूरी कोशिश की। तृणमूल कांगे्रस ने कहा कि यह हमला सांप्रदायिक नहीं था। शुरूआत में भाजपा ने हमले को सांप्रदायिक बताया और उसके प्रवक्ताओं और पार्टी की बंगाल इकाई के प्रभारी महासचिव सिद्धार्थ नाथ ने कहा कि मीडिया एक ‘बड़ी’ घटना को मात्र इसलिए कवरेज नहीं दे रहा है क्योंकि हमलावर मुसलमान थे। उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्षतावादियों के दोहरे मानदंड हैं। इसके बाद, मीडिया ने इस घटना को बढ़ाचढ़ाकर प्रस्तुत करना शुरू कर दिया और एक स्थानीय घटना को राष्ट्रीय स्तर पर प्रचारित किया गया। भाजपा को जल्दी ही यह समझ में आ गया कि बंगाल में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से उसे लाभ नहीं होगा क्योंकि वहां मुसलमानों की बड़ी आबादी है। बंगाल के रहवासियों में से लगभग 27 प्रतिशत मुस्लिम हैं। भाजपा ने भी बाद में इस बात से सहमति व्यक्त की कि कालियाचक पुलिस स्टेशन पर हमले के पीछे धार्मिक कारण नहीं थे। परंतु उसने तृणमूल कांग्रेस पर यह आरोप लगाना जारी रखा कि वह अपने ‘वोट बैंक’ को बचाने और ‘अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण’ के लिए असामाजिक तत्वों को संरक्षण दे रही है।
आरोपों और प्रत्यारोपों के बीच, सेंटर फाॅर स्टडी आॅफ सोसायटी एंड सेक्युलरिज्म व एएएमआरए की एक संयुक्त टीम ने कालियाचक जाकर स्थिति का अध्ययन करने और उस पर एक रपट तैयार करने का निर्णय लिया। टीम के सदस्यों ने हमले के पीडि़तों, प्रत्यक्षदर्शियो, अफसरों, राजनेताओं व प्रमुख नागरिकों से बात की। टीम ने कालियाचक पुलिस स्टेशन में पदस्थ पुलिसकर्मियों से भी बातचीत करने का प्रयास किया परंतु उन्होंने इंकार कर दिया। जो टीम मालदा और कालियाचक पहुंची उसके सदस्य थे: (1) इरफान इंजीनियर, निदेशक सीएसएसएस, (2) सुभाप्रतिम राय चैधरी, एएएमआरए, (3) नसीम अख्तर चौधरी, एक्षन एड व (4) अनुपम अधिकारी।
पृष्ठभूमि
रेडक्लिफ अवार्ड के अंतर्गत 17 अगस्त, 1947 को अर्थात स्वाधीनता के दो दिन बाद, नक्से  पर एक लाईन खींचकर भारत का विभाजन की दिया गया। यह लाईन खून से खींची गई थी और इस विभाजन के पश्चात, मौत का जो नंगा नाच हुआ उसमें हज़ारों निर्दोषों का खून बहा और लाखों लोग अपने ही देश में शरणार्थी हो गए। मालदा, भारत का हिस्सा बन गया परंतु उसका एक अनुभाग नवाबगंज तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के राजशाही जिले में शामिल कर दिया गया। हिंदू और मुस्लिम शरणार्थियों के सीमा के इस पार से उस पार जाने के कारण इलाके का जनसांख्यिकीय परिदृष्य बदल गया। अब उत्तर मालदा में हिंदुओं का बहुमत है और दक्षिण में मुसलमानों का।
सन 2011 की जनगणना के अनुसार, मालदा जिले की आबादी में मुसलमानों का प्रतिशत 51.27 और हिंदुओं का 47.99 है। जिले में कई जनजातियों और भाषायी समूहों के लोग रहते हैं, जिनमें खोटा, पंजारा, पोलिया, शे रसबादिया व संथाल शामिल हैं। मालदा में रहने वाले अधिकांश बंगाली मुसलमान सुन्नी हैं और एहलेहदीस समुदाय से वास्ता रखते हैं। मालदा के बंगाल से सटे ब्लाॅक कालियाचक-1 में मुसलमानों का प्रतिशत 90 है, जिसमें कई नस्लों व भाषायी समूहों के लोग षामिल हैं। यहां के मुसलमानों में शियाओं और सुन्नियों दोनों की खासी आबादी है।
कालियाचक-1 ब्लाॅक की एक अनूठी भौगोलिक स्थिति है। जो नदियां गंगा के मैदान के पूर्वी भाग को सींचती हैं, उनके बहाव की गति कम होने के कारण वे बड़ी मात्रा में तलछट निक्षेपित कर देती हैं। नदी किनारे रहने वाले समुदाय अपने जीवनयापन के लिए नदी पर निर्भर रहते हैं। फरक्का बांध बनने के बाद से इन समुदायों का रोज़गार और नदी-आधारित अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। इसका कारण था बड़े पैमाने पर भूमि का कटाव। पिछले तीन दषकों में मानिकचैक, कालियाचक-1, 2 व 3 और रतुआ ब्लाॅकों में करीब साढ़े चार लाख लोग बेघर हो गए। इस तरह, कालियाचक की पारंपरिक कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था खतरे में है। मोज़मपुर, जादूपुर, दरियापुर व कालियाचक-1 ब्लाॅक के कुछ अन्य गांवों में मिट्टी के कटाव ने कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को लगभग नष्ट कर दिया है। यहां पर पहले कई तरह की सब्जियां, धान, जूट आदि की खेती होती थी परंतु उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी परत बह गई और ज़मीनें, रेत का ढेर बनकर रह गईं।
कालियाचक के बेघर और बेरोज़गार हो गए लोगों के पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं था कि वे सीमा पार बांग्लादेश के साथ मवेशियों और ड्रग्स के अवैध व्यापार में अपने लिए काम तलाशें। फैन्सीडिल नामक खांसी की एक दवाई, जिसका बांग्लादेश में नशे के लिए इस्तेमाल होता है, भारत से तस्करी के रास्ते वहां भेजी जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में से एक है। बढ़ती तस्करी ने तस्कर-बीएसएफ-पुलिस-आबकारी विभाग-राजनेताओं के एक गठबंधन को जन्म दिया। इसे और मजबूत बनाया इस इलाके में अफीम की खेती की शुरूआत ने। हमें बताया गया कि मुआजामपुर शहर में अपराधियों के दो गिरोह सक्रिय हैं। इनमें से एक का नेतृत्व असादुल्ला बिस्बास के हाथों में है और दूसरे का तुहुर बिस्बास के हाथों में। इन दोनों गिरोहों के बीच अक्सर विवाद होते रहते हैं। असादुल्ला बिस्बास एक समय वाम मोर्चे के साथ थे। अब वे टीएमसी से जुड़ गए हैं। जिस रैली के दौरान पुलिस थाने पर हमला हुआ, उसमें भाग लेने के लिए मुआजामपुर से बड़ी संख्या में लोग आए थे।
तस्कर-बीएसएफ-पुलिस-आबकारी विभाग-राजनेता का गठबंधन, सीमा के दोनों ओर धर्म के राजनीतिकरण को बढ़ावा दे रहा है। शाहबाग आंदोलन के बाद बांग्लादेश  में कट्टरपंथियों ने तार्किकतावादियों पर बड़े पैमाने पर हमले किए और उनके कत्ल भी हुए। हिफाज़त-ए-इस्लाम नामक संगठन, जिसमें जमात-ए-इस्लामी के नेताओं ने घुसपैठ कर ली है, ने बांग्लादेश में तार्किकतावादियों पर हमलों मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हिफाज़त-ए-इस्लाम, बांग्लादेशी राष्ट्रीय पहचान का इस्लामीकरण करना चाहती है।
दूसरी ओर, नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पश्चिम बंगाल में हिंदुत्ववादी शक्तियां आक्रामक हो उठीं। चुनाव के पहले भाजपा की आमसभाओं में तीन मुद्दों पर ज़ोर दिया गया- एक-गुजरात का विकास का माॅडल (जिसका खोखलापन उजागर हो चुका है), दो-शारदा चिटफंड घोटाला व तीन-सांप्रदायिक धु्रवीकरण, जिसे करने के लिए यह प्रचार किया गया कि बंगाल की मुख्यमंत्री ममता दीदी, मुसलमानों को प्रसन्न करने के लिए बांग्लादेशी आंतकवादियों को शरण दे रही हैं। यह भी कहा गया कि मुसलमान, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस पार्टी का वोट बैंक हैं। मुसलमानों के खिलाफ घृणा फैलाने का अभियान शुरू कर दिया गया और खगरागढ़ व अन्य स्थानों पर हुए मामूली बम धमाकों को मुसलमानों की कारगुज़ारी बताया गया। सांप्रदायिक धु्रवीकरण के कारण देगंगा, समुद्रगढ़, काकद्वीप व अन्य कई स्थानों पर सांप्रदायिक तनाव और हिंसा हुई। सांप्रदायिक धु्रवीकरण को बढ़ाने के लिए कई अन्य मुद्दों का भी इस्तेमाल किया गया। इनमें माटुआ, हिंदू शरणार्थी, फुरफुरा शरीफ आदि शामिल थे। बंगाल में सांप्रदायिक धु्रवीकरण अब अपने चरम पर है। असहाय और असुरक्षित महसूस कर रहे मुसलमान, मुल्ला-मौलवियों की शरण में जा रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि मुल्ला-मौलवी, समुदाय को एक करेंगे और एक होकर वे अपनी रक्षा कर सकेंगे। प्रतिगामी, पितृसत्तात्मक सोच मुसलमानों पर हावी हो रही है। मालदा में कुछ मुस्लिम मौलवियों ने एक फतवा जारी कर यह कहा कि मुसलमान लड़कियों को फुटबाल नहीं खेलनी चाहिए। हिंदू खाप पंचायतें भी जाति आधारित प्रथाएं और परंपराएं  थोप रही हैं। उत्तरी 24 परगना जिले के बसीरहाट सबडिवीजन में हिंदू खाप द्वारा यह आदेश जारी किया गया कि एक हिंदू परिवार, जिसने अपने एक मृतक को दफन कर दिया था, का बहिष्कार किया जाए। दोनों समुदायों के बीच सौहार्द और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की लंबी परंपरा खतरे में पड़ती नज़र आ रही है।
पारंपरिक रूप से मालदा, कांग्रेस का गढ़ रहा है। कांग्रेस के नेता एबीए ग़नी खान चौधरी, घर-घर में जाने जाते हैं और उनका इलाके में बहुत सम्मान है। वे मालदा से लोकसभा के लिए कई बार चुने गए। उन्होंने मालदा रेलवे स्टेशन को क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण रेलवे स्टेशन बनाने की कोशिश की। वे सबसे पहले 1957 में विधायक चुने गए और 1972-77  में पश्चिम बंगाल की सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। वे 1980 में मालदा से लोकसभा के लिए चुने गए और उसके बाद से 2004 तक लगातार चुनाव जीतते रहे। सन 2006 में उनकी मृत्यु हो गई। सन 1982 से 1989 तक वे रेल मंत्री थे। ग़नी खान चैधरी के प्रयासों से मालदा में रेलवे ने एक बड़ा कारखाना स्थापित किया। सन 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का गठबंधन था। एबीए ग़नी खान चौधरी की भतीजी मौसम ने यह चुनाव जीता। उन्हें 4.40 लाख वोट प्राप्त हुए जबकि सीपीएम के शैलेन्द्र सरकार को 3.80 लाख वोट ही मिल सके।
सन 2006 के विधानसभा चुनाव में कालियाचक से सीपीएम के विश्वनाथ घोष चुने गए। 1977 से 2006 के बीच सीपीआईएम 1982, 1987, 1991 व 2006 में चुनाव जीती जबकि 1977, 1996 और 2001 में कांग्रेस विजयी रही। इससे यह स्पष्ट है कि जहां तक मालदा संसदीय क्षेत्र का सवाल है, वहां से कांग्रेस लगातार जीतती आ रही है परंतु कालियाचक विधानसभा क्षेत्र में किसी एक पार्टी का वर्चस्व नहीं है और कांग्रेस/तृणमूल कांग्रेस व सीपीआईएम अलग-अलग समय पर यहां से जीतती रही हैं। कालियाचक ब्लाॅक में मुसलमानों का बहुमत है और यह स्पष्ट है कि वे बारी-बारी से दोनों प्रमुख पार्टियों को जिताते आ रहे हैं। ऐसा लगता है कि धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों का कालियाचक के लोगों के राजनैतिक व्यवहार पर विशेष असर नहीं पड़ा है।
कालियाचक में मुसलमानों के संगठन
कालियाचक व मालदा जिले के अन्य ब्लाॅकों में ‘‘अंजुमन एहले सुनातुल जमात’’ सक्रिय है। यद्यपि यह संगठन रूढि़वादी है तथापि वह सांप्रदायिक नहीं है और गैर-मुसलमानों से घृणा करने या उनके प्रति किसी भी तरह का बैरभाव रखने की बात नहीं कहता। इस संगठन के पितृसत्तात्मक दकियानूसीपन परप्रश्न उठाए जा सकते हैं और यह कहना भी गलत नहीं होगा कि ऐसे संगठन मुसलमानों का भला नहीं कर सकते परंतु यह भी सच है कि इस संगठन की मध्यमवर्गीय मुसलमानों में अच्छी पकड़ है। यह वह वर्ग है जो पुरानी धार्मिक परंपराओं का पालन कर सामाजिक हैसियत और सम्मान प्राप्त करना चाहता है। एक अन्य संगठन भी मुसलमानों के बीच सक्रिय हुआ है। इसका नाम है ‘‘इदारा-ए-शरिया’’। जहां अंजुमन, रूढि़वादी सलाफी-वहाबी इस्लाम का प्रचार करता है, जो सूफी संतों की दरगाह पर प्रार्थना किए जाने के खिलाफ है वहीं इदारा-ए-शरिया, बरेलवी परंपरा की हिमायत करती है जो सूफी संतों की दरगाह पर इबादत करने की विरोधी नहीं है और जो देववंदी इस्लाम की तुलना में अधिक समावेशी है। मुसलमानों पर अपनी पकड़ मजबूत करने और अपनी लोकप्रियता को बढ़ाने के लिए इदारा-ए-षरिया ने 1 दिसंबर, 2015 को उत्तरप्रदेश के स्वनियुक्त हिंदू महासभा नेता कमलेश तिवारी द्वारा इस्लाम के पैगम्बर के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां किए जाने के विरोध में रैली का आयोजन करने का निर्णय किया। इस तरह की रैलियां देश के अन्य भागों में भी निकलीं, जिनमें से कई में कमलेश तिवारी को मौत की सज़ा दिए जाने की मांग की गई। किसी न किसी कारण से कालियाचक में होने वाला यह विरोध प्रदर्शन  टलता गया। इस साल ईद-ए-मिलादुन्नबी, जो कि पैगम्बर का जन्मदिन है, 14 दिसंबर, 2015 को थी। तब तक इस टिप्पणी को 24 दिन गुज़र चुके थे। हर साल की तरह, एहले सुनातुल जमात ने इस दिन एक रैली का आयोजन किया, जिसमें करीब एक लाख लोगों ने भागीदारी की। जमात ने इस तरह यह साबित कर दिया कि उसकी जनता पर पकड़ है। यद्यपि देववंदी, मुसलमानों की आबादी का 20 प्रतिषत ही हैं परंतु वे तुलनात्मक रूप से अधिक समृद्ध हैं और मस्जिदों पर उनका नियंत्रण है। अधिकांश सुन्नी इमाम देववंदी हैं।
बरेलवी मूलतः अजलफ हैं, जो कि धर्मांतरण के पहले नीची जातियों के हिंदू थे। इसके विपरीत, देववंदी, ऊँची जातियों के हिंदुओं के धर्मपरिवर्तन करने से अस्तित्व में आए। उन्हें अशरफ भी कहा जाता है। मालदा में अधिकांश बरेलवी गैर-बंगाली हैं और उन्हें खोता मुसलमान कहा जाता है। वे खोता भाषा बोलते हैं जिसके शब्द तो बांग्ला के हैं परंतु उच्चारण हिंदी और उर्दू के समान हैं। खोता मुसलमानों को हाल में बंगाल की राज्य सरकार ने ओबीसी समुदायों की सूची में शामिल किया। खोता मूलतः बिहारी हैं और उनके राज्य में उन्हें खोरता भी कहा जाता है। शायद खोता मुसलमानों में अपनी पैठ बढ़ाने के लिए इदारा-ए-शरिया ने 3 जनवरी, 2016 को विरोध प्रदर्शन  करने की घोषणा की। इसके लगभग एक सप्ताह पहले से इस रैली के संबंध में पर्चे और पोस्टर जगह-जगह चिपकाए गए। इस रैली में कालियाचक और उसके आसपास के गांवों और शहरों केे लगभग एक लाख मुसलमान शामिल हुए।
सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास नहीं
कालियाचक में स्वाधीनता से लेकर आज तक कभी कोई सांप्रदायिक दंगा नहीं हुआ। तीन जनवरी की घटना को भी सांप्रदायिक दंगा नहीं कहा जा सकता। वह किसी प्रकार के सांप्रदायिक धु्रवीकरण का नतीजा नहीं थी और ना ही उसने हिंदुओं और मुसलमानों में सांप्रदायिकता की भावना जागृत की। दोनों समुदायों के लोगों के आपसी संबंध आज भी मधुर बने हुए हैं। हिंसक भीड़ का निशाना न तो हिंदू थे और ना ही वे दो मंदिर जो उसके रास्ते में थे। भीड़ का निशाना था पुलिस स्टेशन। आज भी हिंसा के शिकार व्यक्ति उसी इलाके में रह रहे हैं और उनके पड़ोसी व अन्य लोग उनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण रूख रखते हैं।
-इरफान इंजीनियर

बुधवार, 6 अप्रैल 2016

ममता की जीत - मोदी की जीत

पश्चिम बंगाल विधान सभा के चुनाव का पहला चरण पूरा हो चूका है. जंगल महल क्षेत्र की 18 विधान सभा सीटों पर मतदान हो चूका है. मतदान लगभग 82 प्रतिशत हुआ है. मतदान के प्रतिशत बढ़ने पर तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे हैं. ममता विरोधियों का मानना है कि मतदान प्रतिशत बढ़ने से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को नुकसान होगा. बंगाल के बुद्धिजीवी तबके का मानना है कि वाम मोर्चे के 35 साल के लगातार शासन के बाद जो गुंडागर्दी बढ़ी थी, ममता बनर्जी की पार्टी ने सभी रेकॉर्डों को ध्वस्त करते हुए पांच सालों के अन्दर गुंडागर्दी का नया रिकॉर्ड बना दिया है. विवेकानंद फ्लाईओवर के गिरने के बाद भ्रष्टाचार के संस्थागत होने का परिणाम सामने आया है. यह भी जानकारी में आ रहा है कि हर क्षेत्र की सप्लाई के ऊपर तृणमूल कांग्रेस का कब्ज़ा है. चुनाव में वाम मोर्चा व कांग्रेस एक साथ चुनाव लड़ रहे हैं तो वहीँ तृणमूल कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी एक सोची समझी रणनीति के तहत अलग-अलग चुनाव लड़ रहे हैं. भाजपा जनता को दिखाने के लिए सीधे-सीधे तृणमूल कांग्रेस के ऊपर आरोप-प्रत्यारोप तो करती है लेकिन भाजपा की स्तिथि बंगाल में वोट कटवा पार्टी के रूप में विकसित हो रही है. बंगाल के एक बुद्धिजीवी ने बातचीत में बताया कि भाजपा को वोट देने का मतलब है तृणमूल कांग्रेस की मदद करना.
                                  बंगाल ने विकास हुवा हो या नही लेकिन गुंडागर्दी का उद्दोग जरुर बढ़ा है  माकपा के राज्य सचिव डॉ सूर्यकांत मिश्र ने कहा था  कि पूरे राज्य में अराजकता की स्थिति बनी हुई है. राज्य में गुटों के बीच झड़प और विस्फोट की घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे बम निर्माण ही राज्य का लघु और कुटीर उद्योग बन गया है. बंगाल से राज्यसभा सदस्य रहे अहमद सईद 'मलिहाबादी' ने सीधे तौर पर कहा कि ममता के सरकार में आने का मतलब है की बंगाल के अन्दर मोदी की सरकार को कायम करना है और बंगाल चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस केंद्र में सत्तारूढ़ दल की मदद में रहेगी.तृणमूल कांग्रेस व भाजपा बंगाल में नूराकुश्ती लड़ रही है.
बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के कुशासन के कारण बहुत बुद्धिजीवियों का एक बहुत बड़ा हिस्सा सरकार के विरोध में है और उसकी कोशिश है कि तृणमूल कांग्रेस को आगे सरकार बनाने का मौका न मिले वहीँ, जनता के विभिन्न तबकों से बातचीत के बाद यह बात उभर कर आ रही है कि तृणमूल कांग्रेस का शासन में आना आसान नहीं है और जिस तरह से स्तिथियाँ बदल रहीं हैंउससे लगता है कि छठे चरण तक  का मतदान आते-आते तृणमूल कांग्रेस का मत प्रतिशत कम होते-होते उसको सत्ता से बेदखल कर सकता है.
-सुमन
लो क सं घ र्ष !

बुधवार, 30 मार्च 2016

अफजल को शहीद घोषित करें तो मुख्यमंत्री

किसान सभा के महामंत्री सत्येन्द्र कुमार
बाराबंकी। अफजल गुरू की फांसी की चर्चा करे तो देशद्रोही और शहीद घोषित करें तो मुख्यमंत्री यह केन्द्र सरकार अच्छे दिन आने की नीति का परिणाम है।
    यह उद्गार व्यक्त करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सहसचिव रणधीर सिंह सुमन ने पवैय्याबाद में किसानों की सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि अच्छे दिनों के कारण देश के अन्दर एक लाख किसानों के किसान कर्ज के मकड़जाल में फंसकर आत्महत्यायें कर ली है वही सरकार कार्पोरेट  सेक्टर के लाखों करोड़ों रूपये की कर्ज माफी कर चुकी है किसान मौत के ऊपर राजनीति करके सैन्य राष्ट्रवाद को विकसित किया जा रहा है। किसान जब खेत और खलिहानों में अन्न उत्पादन कर रहा होता है और उसकी वहां मृत्यु होने पर नकली राष्ट्रवादियों के घडि़याली आंसू भी नहीं निकलते हैं।
    किसान जनसभा के संयोजक मुनेश्वर बख्श वर्मा ने कहा कि किसान सभा के नेतृत्व में पूर्व विधायक राजेन्द्र यादव 17 व 19 मई को बाराबंकी में जनजागरण अभियान प्रारम्भ करेंगे और नकली राष्ट्रवादियों के नकाब को जनता के सामने बेनकाब करेंगे।
    सभा को किसान सभा के महामंत्री सत्येन्द्र कुमार, राजेश सिंह आदि ने सम्बोधित किया। संचालन किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने किया सभा के पूर्व रामू एण्ड कम्पनी के नकली राष्ट्रवादियों को बेनकाब करते हुए वाद यंत्रों के साथ गीत गाये।