गुरुवार, 10 मई 2018

हामिद अंसारी, जिन्ना की तस्वीर और एएमयू में हंगामा

हाल (मई 2018) में भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय छात्रसंघ (एएमयूएसयू) की आजीवन सदस्यता प्रदान कर सम्मानित करने हेतु विश्वविद्यालय में आमंत्रित किया गया था। यद्यपि उन्हें पर्याप्त सुरक्षा प्रदान की गई थी परंतु हिन्दू युवा वाहिनी एवं एबीव्हीपी के प्रदर्शनकारी कार्यकर्ता उस भवन के बहुत नजदीक तक पहुंच गए, जिसमें वे ठहरे थे। यह विरोध प्रदर्शन जिसमें शामिल लोग हथियारों से लैस थे, कथित तौर पर अंसारी को खुश करने के लिए जिन्ना की तस्वीर लगाए जाने के विरोध में और यह इस बात पर जोर देने के लिए किया गया था कि एएमयू से जिन्ना की तस्वीर हटाई जाए। इसके बाद, जैसा कि हमेशा होता है, हिंसा हुई। वाहिनी के कुछ कार्यकताओं को गिरफ्तार किया गया परन्तु उनमें से अधिकांश को कुछ समय बाद छोड़ दिया गया। इसके बाद योगी आदित्यनाथ, जो इस हिन्दुत्ववादी संगठन के संस्थापक हैं, के कई बयान आए, जिनमें यह कहा गया था कि तस्वीर हटवाई जाएगी। सुब्रमण्यम स्वामी ने सवाल किया कि एएमयू को सबक कौन सिखाएगा! एएमयू के छात्र, हिन्दू वाहिनी और एबीव्हीपी द्वारा की गई हिंसा के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं।
इस मामले के कई पहलू हैं। पहला यह कि वाहिनी और एबीव्हीपी के हथियारबंद कार्यकर्ता उस भवन के नजदीक कैसे पहुंच गए, जिसमें हामिद अंसारी ठहरे हुए थे। यह उल्लेखनीय है कि अंसारी, जो एक प्रतिष्ठित विद्वान और राजनयिक हैं एवं कई उच्च पदों पर आसीन रहे हैं, को अपमानित करने का कोई मौका छोड़ा नहीं गया है। गणतंत्र दिवस परेड को सलामी न देते हुए उनकी तस्वीर को यह दिखाने के लिए वायरल किया गया था कि वे गणतंत्र दिवस का अपमान कर रहे हैं। हालांकि बाद में पता चला उन्होंने जो किया, वह पूरी तरह कायदे के मुताबिक था क्योंकि केवल राष्ट्रपति ही परेड की सलामी लेते हैं अन्य कोई नहीं। उपराष्ट्रपति पद से अवकाश ग्रहण करने पर आयोजित विदाई कार्यक्रम में मोदी ने अत्यंत अपमानजनक ढंग से, संकेतों में कहा कि वे मुसलमानों से जुड़े मुद्दों पर अधिक ध्यान देते थे। इस तरह, ताजा घटना संघ परिवार द्वारा अंसारी को निशाना बनाए जाने के अभियान की अगली कड़ी है।
सवाल यह उठता है कि जिन्ना की तस्वीर का विरोध करने के नाम पर सशस्त्र प्रदर्शनकारियों का एएमयू परिसर में घुस जाना कैसे उचित ठहराया जा सकता है? क्या यह तस्वीर कल लगाई गई थी? यह तस्वीर सन् 1938 से लगी है, जब एएमयू छात्रसंघ ने जिन्ना को छात्रसंघ की आजीवन सदस्यता प्रदान कर सम्मानित किया था। यह कहा गया कि चूंकि जिन्ना देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार थे, इसलिए वे सम्मान के योग्य नहीं हैं। जिन्ना प्रारंभ में स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल थे। उन्हें उस समिति का अध्यक्ष बनाया गया था जो गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका से वापिस आने पर उनके स्वागत के लिए बनाई गई थी। उन्होंने लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का मुकदमा लड़ा और यह उनकी कानूनी प्रतिभा का ही नतीजा था जिससे तिलक सजा-ए-मौत से बच सके। वे नौजवान क्रांतिकारी भगत सिंह के भी वकील थे और इन सबसे अधिक वे तिलक के साथ हिन्दू-मुस्लिम एकता गठबंधन (लखनऊ 1916) में शामिल थे। भारत कोकिला सरोजनी नायडू ने उन्हें ‘हिन्दू मुस्लिम एकता का संदेशवाहक’ बताया था।
इस कहानी का दूसरा पहलू भी है। वे सन् 1920 में तब राष्ट्रीय आंदोलन से अलग हो गए, जब गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया, जो ऐसा पहला आंदोलन था जिसमें सामान्य भारतीयों ने हिस्सा लिया था। इस आंदोलन ने मानव जाति के इतिहास के सबसे बड़े जनांदोलन का रूप लिया। जिन्ना एक संविधानवादी थे और उनकी राय थी कि सामान्य लोगों को अंग्रेजों के विरूद्ध चल रहे संघर्ष से जोड़न अनुचित है। इसी तरह, उन्होंने खिलाफत आंदोलन में गांधीजी की भूमिका का विरोध किया और धीरे-धीरे उनकी सक्रियता कम होती गई और अंततः वे वकालत करने लंदन चले गए। दूसरी घटना, जिसने जिन्ना, जो मूलतः धर्मनिरपेक्ष थे, के नजरिए को बदल दिया, वह थी मुस्लिम लीग से उनका जुड़ना और उसका नेतृत्व संभालना। अंग्रेजों ने मुस्लिम लीग को मुसलमानों के प्रतिनिधि का दर्जा दिया। यह  ब्रिटिश सरकार का सोचा-समझा कदम था क्योंकि मुस्लिम लीग का गठन नवाबों और जमींदारों ने किया था और उसमें सामंती मूल्य कूट-कूटकर भरे हुए थे। मुस्लिम लीग के नेता के रूप में उनकी भूमिका और मुसलमानों के लिए अलग राष्ट्र (पाकिस्तान) बनाने संबंधी लाहौर प्रस्ताव को उनके समर्थन ने उनकी छवि एक साम्प्रदायिक नेता की बना दी। परन्तु केवल उन्हें ही देश के विभाजन के लिए जिम्मेदार बताना आधुनिक भारत के इतिहास को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करना होगा। विभाजन की नींव अंग्रेजों ने अपनी फूट डालो और राज करोकी नीति के माध्यम से रखी थी। विभाजन के पीछे हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के साम्प्रदायिक तत्व भी थे। सावरकर वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने कहा था कि भारत में दो राष्ट्र हैं - हिन्दू और मुस्लिम। दूसरे शब्दों में, भारत हिन्दुओं का देश है इसलिए इसमें मुसलमानों को हिन्दुओं के अधीन रहना होगा। इसे बाद ही जिन्ना साम्प्रदायिक जाल में फंस गए और उन्होंने तर्क दिया कि यदि इस देश में दो राष्ट्र हैं तो दो देश क्यों नहीं हो सकते? पाकिस्तान क्यों नहीं बनना चाहिए?
जिन्ना की कई जीवनियां लिखी गई हैं और उनके कार्यों की कई प्रकार की व्याख्याएं एवं विवेचनाएं हुईं हैं। पाकिस्तान की संविधान सभा में 11 अगस्त, 1947 के भाषण में उन्होंने कहा था कि वहां जनता अपने-अपने धर्म का पालन करने के लिए स्वतंत्र है और राज्य इसमें कोई दखल नहीं देगा। यह उनकी धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। आडवाणी को अपने जीवन के उत्तरार्ध में, बाबरी मस्जिद के ध्वंस के रूप में धर्मनिरपेक्षता पर सबसे बड़ा प्रहार करने के बाद, यह अहसास हुआ कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे। उन्हें जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष बताने की कीमत अपना राजनैतिक कैरियर खत्म होने के रूप में चुकानी पड़ी और संघ परिवार ने ‘जिन्ना से नफरत करो’ अभियान चलाकर जिन्ना को भारतीय मुसलमानों और पाकिस्तान का प्रतीक बना दिया।
एएमयू के घटनाक्रम का इस्तेमाल हिन्दू राष्ट्रवादी एक तीर से कई निशाने साधने में कर रहे हैं। इनमे से कुछ हैं, हामिद अंसारी, जिन्हें वे धर्मनिरपेक्ष नहीं मानते, को बदनाम कारण। दूसरा, इस मुद्दे का अन्य कई भावनात्मक मुद्दों की तरह बांटने की राजनीति के लिए इस्तेमाल करना और तीसरा, एएमयू परिसर में हैदराबाद विश्वविद्यालय एवं जेएनयू की तरह भय का वातावरण उत्पन्न करना।      
यह माना जा सकता है कि जिन्ना, जिन्हें साम्प्रदायिक शरीर में धर्मनिरपेक्ष आत्माकहा जा सकता है, हमारे देश में विवादों का विषय बनते रहेंगे और संघ परिवार एक के बाद एक विभाजित करने वाले मुद्दे उठाता रहेगा।
 ----राम पुनियानी

गुरुवार, 3 मई 2018

योगी सरकार कानून व्यवस्था बनाये रखने में नाकाम


मोहम्मद समी का शव
योगी सरकार प्रदेश में कानून व्यवस्था को बनाये रखने में असफल हो गयी है इसलिए थानों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नही की जाती है. अपहरण, हत्या, बलात्कार जैसे मामलों की सूचना दर्ज न कर उनको छिपाने का काम किया जा रहा है. 
पूर्व विधायक सरवर अली
          बाराबंकी जनपद के थाना फतेहपुर के प्रमुख कपडा व्यवसायी मोहम्मद समी 20 मार्च को अपनी दुकान बंद कर 7 बजे शाम को अपने घर जा रहे थे कि रास्ते में घात लगाये कुछ लोगों ने उनका अपहरण कर लिया और उनका मोबाइल बंद हो गया तब उनके बड़े भाई मोहम्मद रफ़ी ने थाना फतेहपुर पहुँच कर पुलिस को सूचना दी किन्तु पुलिस के कानों पर जूं तक नही रेंगी और कोई सुनवाई नही हुई तब क्षेत्र के लगभग 50 मोटरसाइकिल सवारों ने आसपास के क्षेत्र में मोहम्मद समी को ढूंढना शुरू कर दिया. 21 मार्च को सूचना मिलती है कि मोहम्मद समी का शव गाँव जाने के रास्ते से विपरीत दिशा में 7 किलोमीटर दूर लोनियनपुरवा के पास पड़ा है. हजारों लोगों के इकठ्ठा हो जाने पर आक्रोश को देखते हुए थाना फतेहपुर बाराबंकी के प्रभारी निरीक्षक अपने लाव-लश्कर के साथ पहुंचे और बगैर पंचनामा कराये लाश को पोस्टमार्टम हाउस भेज दिया. मौके पर प्रभारी निरीक्षक पुलिस ने कोई भी साक्ष्य संकलन की दिशा में कोई कार्य नही किया. मृतक के भाई रफ़ी को थाने पर रोके रखा और पोस्टमार्टम हाउस में पंचनामा कर शव को सील कर तुरंत पोस्टमार्टम कराया. पुलिस ने प्रथम सूचना रिपोर्ट भी दर्ज नही की.
श्याम बिहारी वर्मा
 योगी सरकार की पुलिस की इस कार्य प्रणाली से क्षुब्ध होकर क्षेत्रीय जनता ने कई बार प्रशासनिक व क्षेत्रीय अधिकारियों से मिलकर रिपोर्ट दर्ज कर जांच की मांग की लेकिन सरकार की मंशा के अनुरूप प्रथम सूचना रिपोर्ट अपहरण व हत्या की नही दर्ज की.
मृतक मोहम्मद समी
        जनता के आक्रोश को देखते हुए पूर्व विधायक सरवर अली ने इस घटना के विरोध में व सरकार की नाकामी को लेकर 7 मई को क़स्बा फतेहपुर बाराबंकी में कैंडल मार्च निकालने की घोषणा की और 8 मई को सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने की भी घोषणा की है. 
        वहीँ, बुढ़वल केन यूनियन के पूर्व अध्यक्ष श्याम बिहारी वर्मा ने कहा कि कानून व्यवस्था बनाये रखने में सरकार की जरा सा भी रुचि नही है और सम्बंधित थाने में  अपराधों की रोकथाम का सबसे बढ़िया उपाए यह है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट ही न दर्ज करो.

लोकसंघर्ष पत्रिका प्रगतिशील साहित्य को प्रोत्साहित कर रही है

लोकसंघर्ष पत्रिका का विमोचन करते हुए प्रकाश बाबू
कोल्लम.  स्पोर्ट्स क्लब,  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 23 वें महाधिवेशन के सांस्कृतिक पंडाल में लोक संघर्ष पत्रिका द्वारा प्रकाशित विशेषांक का विमोचन करते हुए भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय परिषद सदस्य साथी प्रकाश बाबू सम्बोधित करते हुए प्रकाश बाबू ने कहा कि लोक संघर्ष पत्रिका हिंदी में प्रगतिशील साहित्य को प्रोत्साहित कर रही है. किसानों मजदूरों के संघर्ष को आगे बढ़ने के लिए निरंतर प्रयत्नशील है. 

सांस्कृतिक पंडाल में बोलते हुए रणधीर सिंह सुमन
                  लोकसंघर्ष पत्रिका के प्रबंध संपादक रणधीर सिंह सुमन ने संबोधित करते हुए बताया कि केरल दुनिया में एक ऐसा राज्य है जहाँ पर 1957 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने चुनाव के माध्यम से सरकार बनाई थी. केरल की पवित्र धरती ने मजदूरों और किसानों को नई उचाईयां दी हैं. देश के अन्दर केरल में कम्युनिस्टों ने एक अच्छी व्यवस्था देकर स्वास्थ्य, शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में अग्रणी कार्य किया है. 
अतुल अंजान लोकसंघर्ष पत्रिका के साथ

इस अवसर पर इंडियन एसोसिएशन ऑफ लायर्स के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य अश्विनी बक्शी, हरियाणा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव दरियाव सिंह कश्यप, उत्तर प्रदेश भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सह सचिव इम्तियाज अहमद पूर्व विधायक, जीतेन्द्र हरि पाण्डेय, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय परिषद् सदस्य आशा मिश्रा, कांति शुक्ला,  डॉ बाल गोविंद वर्मा आदि प्रमुख लोग थे.

गुरुदास दासगुप्ता लोकसंघर्ष पत्रिका के साथ
        सांस्कृतिक पंडाल खचाखच भरा हुआ था. लोकसंघर्ष पत्रिका विशेषांक की प्रतियाँ पार्टी कांग्रेस में आये हुए सभी प्रतिनिधियों को नि:शुल्क भेँट की गयीं तथा जनता में भी नि:शुल्क वितरित की गईं.

सोमवार, 16 अप्रैल 2018

आसिफा के न्यायप्रिय हत्यारे!



      'आसिफा को न्याय' (जस्टिस फॉर आसिफा) की गुहार दिल्ली से संयुक्त राष्ट्र संघ तक गूँज रही है. सामाजिक-नागरिक संगठन आसिफा की सामान्य और मृतावस्था की तस्वीर लगा कर अपने नाम के बैनर-झंडे लहराते हुए, नारे लगते हुए आसिफा को न्याय दिलाने के लिए सड़कों पर उतर पड़े हैं. कठुआ से लेकर दिल्ली और देश के अन्य कई शहरों में प्रतिरोध मार्च और कैंडल विजिल हो रहे हैं. बच्चे भी हिस्सा ले रहे हैं. दिल्ली सरकार की एक महिला अधिकारी 'महिलाओं की सुरक्षा' के सवाल पर भूख हड़ताल पर बैठी हैं. उनका कहना है कि मोदी जब एक झटके में विमुद्रीकरण कर सकते हैं तो महिलाओं की सुरक्षा क्यों नहीं कर सकते! सोशल मीडिया आसिफ़ा को न्याय दिलाने की पोस्टों से पट गया है. अखबारों के स्तंभकार, सामाजिक-राजनीतिक सरोकार रखने वाले बुद्धिजीवी 'आसिफा को न्याय' पर लेख लिख रहे हैं. अंतर्राष्ट्रीय मीडिया पर भी यह प्रमुख खबर बनी है. उत्तर प्रदेश के उन्नाव बलात्कार मामले पर लोगों का आक्रोश जारी था कि जम्मू-कश्मीर की अपहरण, बलात्कार और हत्या की दिल दहला देने वाली यह वारदात सामने आ गई.
   
      ज़ाहिर है, बर्बरता की शिकार हुई आसिफा को पता नहीं था कि देश में न्याय देने के लिए एक न्यायपालिका होती है, जिसमें बड़े-बड़े न्यायधीश, वकील और गवाह सबूतों के आधार पर न्याय करते हैं. उसे पता नहीं था कि दुनियां में संयुक्त राष्ट्र संघ भी है जो न्याय दिलवाता है. आसिफा नहीं जानती थी कि सरकारें बर्बरतापूर्वक मार दी जाने वाली बच्चियों के माता-पिता को कुछ धनराशि देकर न्याय करती हैं. आसिफा को यह भी कहाँ पता था कि देश में 'फासीवाद' आ चुका है; लोग बताएँगे कि उसका वैसा हश्र उसी फासीवाद का नतीज़ा है; और फासीवादी ताकतों को हराना ही आसिफा को न्याय दिलाना है! उसे शायद यह भी नहीं पता चला हो कि मंदिर में उसके साथ 'हिंदू न्याय' किया जा रहा है! आसिफा तिरंगे झंडे के बारे में नहीं जानती होगी, जिसे लहरा कर अदालत से लेकर सड़कों तक 'हिंदू न्याय' का जुलूस निकला गया.
     
      पता नहीं आसिफा को कितना पता था कि वह कितनी मुसलमान है! अलबत्ता उसने छोटी-सी उम्र में यह जरूर जान लिया कि दोजख ज़मीन पर ही है - धरती का स्वर्ग कही जाने वाली ज़मीन पर! दुनिया छोड़ने से पहले उसने यह भी जान लिया कि शैतान अलग से नहीं होता. क़यामत के दिन खुदा आसिफा का क्या न्याय करेगा!    

      रूह अगर कोई चीज़ है तो आसिफा हैरत से सोचती होगी कि उसकी हत्या के तीन महीने बाद अचानक देश भर में इतने लोग और संगठन उसे न्याय दिलाने के लिए आंदोलित हो उठे हैं! अपहरण और हत्या के समय से ही उसके साथ हुए नृशंस कृत्य का प्रतिरोध करने वाले उसके गाँव के युवा वकील तालिब हुसैन अब उसे अकेले नहीं लगते होंगे. परिपूर्ण का अंश रूह पर शायद उम्र का असर नहीं रहता होगा. रूह बन कर आसिफा देख रही होगी कि हिन्दुस्तान और दुनिया कितनी बड़ी और घात-प्रतिघातों से भरी है.
           
      वह अच्छी तरह समझ रही होगी कि यह दुनिया और व्यवस्था उसे न्याय नहीं दे सकती. इस व्यवस्था में जितने भी न्याय हैं - सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय, नागरिक न्याय, मानवीय न्याय, बाल न्याय - उन सबसे उसे बाहर रखा गया. तभी इतना आसान हुआ कि उसके वजूद को बर्बरतापूर्वक कुचल दिया गया और पूरे देश में तीन महीने तक कहीं पत्ता नहीं खड़का. वह समझ रही होगी कि उसे न्याय दिलाने का यह जोश जल्दी ही ठंडा हो जाएगा. अगली वारदात होने पर फिर एक उबाल आएगा और ठंडा पड़ जाएगा. अन्य रूहों के साथ वह समझ गई होगी कि उबलने, ठंडा पड़ने का यह सिलसिला चलते रहना है.
     
      आसिफा को आश्चर्य होता होगा कि ये इतने लोग क्या ढोंग करते हैं? उनकी क्या मजबूरी है? नहीं, ढोंग नहीं करते. वे अपने में सच्चे हैं. आसिफाओं का सारा हिस्सा मार कर वे खुद को न्यायप्रिय दिखाना चाहते हैं. जताना चाहते हैं कि यह सब उनके नाम पर नहीं हो रहा है. रूहों को किसी के प्रति द्वेष नहीं होता. आसिफा मुस्कुरा कर कहेगी - न्यायप्रिय हत्यारे!     
     
      तीन सामान्य सुझाव हैं, ठीक लगें तो : आसिफा को न्याय के बहाने हम यह फैसला कर सकते हैं कि राष्ट्र-ध्वज फिर से केवल राष्ट्रीय मामलों में इस्तेमाल किया जाए. सुप्रीम कोर्ट का 2004 का वह निर्णय वापस ले लिया जाए, जिसमें किसी भी भारतीय नागरिक को किसी भी अवसर पर, किसी भी स्थान पर, किसी भी समय (दिन या रात) सम्मान के साथ तिरंगा फहराने का अधिकार दिया गया था. दूसरे, हम चुप रहना सीखें और अपने से बात-चीत ज्यादा करें. शायद तब हम जान पायें कि हम सब इस व्यवस्था के ही हिस्सेदार और ताबेदार हैं. तीसरी बात, आरएसएस वाले यह समझने की कोशिश करें कि 'हिंदुत्व' का जो पिटारा वे खोले हुए हैं, उसकी समाज, सभ्यता, राष्ट्र, इंसान - किसी के लिए कोई सार्थकता नहीं है. देश की राजनीति कारपोरेट के हाथों में चली गई है. कारपोरेट पूंजीवाद की विष्ठा खाने वाला कोई भी संगठन सत्ता में आ सकता है. लेकिन जब तक मानव सभ्यता की सांस बाकी है, उसका सामाजिक और मानवीय बहिष्कार बना रहेगा.     
     
      शायद आसिफा की रूह को इससे सुकून मिले और उसके अम्मी-अब्बा, भाई-बहनों को सहने की ताकत! बाकी सरकार और कानून-व्यवस्था कुछ न कुछ करेंगी ही. उन्हें अपने होने का धर्म जो निभाना है. जम्मू और कश्मीर में दो मंत्रियों के इस्तीफे हो चुके हैं. अदालती कार्रवाई भी कुछ न कुछ होगी ही.
----प्रेम सिंह







बुधवार, 11 अप्रैल 2018

कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गई


                                    कुछ बस्तियां यहाँ थीं बताओ किधर गईं,
                                   कद्र अब तक तेरी तारीख ने जानी ही नहीं।

    1943, बंगाल का अकाल, अनाज की कमी नहीं लेकिन लोगों को मिला नहीं. तीस लाख लोग भूख से मारे गए लेकिन अंग्रेज सरकार के कान पर जूं तक ना रेंगी। जब ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल से मदद मांगी गई कि बंगाल में लोग भूखे मर रहे हैं तो उन्होंने जबाब भेजा-अच्छा, तो गांधी अब तक क्यों नहीं मरे! उधर दूसरा विश्वयुद्ध दुनिया की राजनैतिक समीकरण बदलने को उतारू था। रूस की क्रांति ने भारत में भी बदलाव की ललक पैदा की।
    ऐसे में कम्युनिस्ट पार्टी ने एक ऐसी संस्था की परिकल्पना की जो देश भर में ना सिर्फ आजादी की अलख जगाए बल्कि सामाजिक बुराइयों अशिक्षा और अंधविश्वास से भी लोहा ले। मनोबल टूटा था लेकिन जिजीविषा बाकी थी। सही अर्थों में सर्वहारा समाज के उत्थान के लिए इप्टा का निर्माण हुआ।
   25 मई 1943 को मुंबई के मारवाड़ी हाल में प्रो. हीरेन मुखर्जी ने इप्टा की स्थापना के अवसर पर अध्यक्षता करते हुए यह आह्वान किया, “लेखक और कलाकार आओ, अभिनेता और नाटककार आओ, हाथ से और दिमाग से काम करने वाले आओ और स्वंय को आजादी और सामाजिक न्याय की नई दुनिया के निर्माण के लिए समर्पित कर दो”। इसका नामकरण प्रसिद्ध वैज्ञानिक होमी जहाँगीर भाभा ने किया था। इसका नारा था, “पीपल्स थियेटर स्टार्स पीपल”। इसे आकार देने में मदद की श्रीलंका की अनिल डि सिल्वा ने। इप्टा का प्रतीक चिह्न बनाया भारत के प्रसिद्ध चित्रकार चित्ताप्रसाद ने। ‘रंग दस्तावेज’ के लेखक महेश आनंद के अनुसार ‘इप्टा यानी इंडियन पीपल्स थिएटर असोसिएशन के रूप में ऐसा संगठन बना जिसने पूरे हिन्दुस्तान में कलाओं की परिवर्तनकारी शक्ति को पहचानने की कोशिश पहली बार की। कलाओं में भी अवाम को सजग करने की अद्भुत शक्ति है जिसे हिंदुस्तान की तमाम भाषाओं में पहचाना गया। ललित कलाएं, काव्य, नाटक, गीत, पारंपरिक नाट्यरूप, इनके कर्ता, राजनेता और बुद्धिजीवी एक जगह इकठ्ठा हुए, ऐसा फिर कभी नहीं हुआ।”
बंगाल कल्चरल स्क्वाड
    बंगाल-अकाल पीड़ितों के लिए राहत जुटाने के लिए स्थापित ‘बंगाल कल्चरल स्क्वाड’ के नाटकों ‘जबानबंदी’ और ‘नबान्न’ की लोकप्रियता ने इप्टा के स्थापना की प्रेरणा दी। मुंबई तत्कालीन गतिविधियों का केंद्र था लेकिन बंगाल, पंजाब, दिल्ली, युक्त प्रांत, मालाबार, कर्णाटक, आंध्र, तमिलनाडु में प्रांतीय समितियाँ भी बनीं। स्क्वाड की प्रस्तुतियों और कार्यशैली से प्रभावित होकर बिनय राय के नेतृत्व में ही इप्टा के सबसे सक्रिय समूह ‘सेंट्रल ट्रूप’ का गठन हुआ। भारत के विविध क्षेत्रों की विविध शैलियों से संबंधित इसके सदस्य एक साथ रहते। इनके साहचर्य ने ‘स्पिरिट ऑफ इंडिया’, ‘इंडिया इम्मोर्टल’, कश्मीर जैसी अद्भुत प्रस्तुतियों को जन्म दिया।
पीसी जोशी और इप्टा
    भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पहले महासचिव पूरन चंद जोशी ने इस बात को समझा कि एक दृढ़ राजनैतिक जागृति का आधार सांस्कृतिक और सामाजिक जागरूकता ही हो सकती है। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव प्रो. अली जावेद कहते हैं, वे बहुत दूरदर्शी आदमी थे। उन्होंने देश भर में योग्य कलाकारों, लोगों को पहचाना और उन्हें इस मूवमेंट से जोड़ने की कोशिश की।
कैफी आजमी और अली सरदार जाफरी
    प्रोफेसर जावेद ने बताया कि कैफी आजमी आजमगढ़ के एक गाँव के रहने वाले थे और लखनऊ आए थे मौलवी बनने के लिए। कानपुर की एक ट्रेड यूनियन के एक मुशायरे में पीसी जोशी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपने साथ जोड़ा। हिंदी के वरिष्ठ लेखक विश्वनाथ त्रिपाठी कहते हैं कि भारत की रचनात्मकता और अभिव्यक्ति पर गांधी के बाद अगर किसी और राजनेता का प्रभाव पड़ा तो वे पी सी जोशी ही थे। इप्टा से पहले उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना में और आजादी के बाद जब दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो उसकी परियोजना और विकास में भी पीसी जोशी का बड़ा योगदान रहा।
मिथक पुरुष
    बलराज सिंह और दमयंती सिंह। विश्वनाथ त्रिपाठी बताते हैं कि उनके परिचितों में राजनेताओं के अलावा सभी भारतीय भाषाओं के रचनाकर्मियों की लंबी सूची थी। वे लोगों में एक मिथक पुरुष की तरह थे। जब वे कम्यून में रहते थे तो हर सुबह वे पार्टी के सभी कार्यकर्ताओं के सिरहाने उन कामों की सूची की एक छोटी सी चिट छोड़ दिया करते जो उस व्यक्ति को उस दिन करने होते। इतने लोगों को जानने के बावजूद वे हरेक के रोजमर्रा के सुख और दुख में शामिल होते।
लेखक अभिनेता भीष्म साहनी
    भीष्म साहनी ने अपने संस्मरण ‘आज के अतीत’ में पीसी जोशी से पहली मुलाकात का जिक्र किया है। साहनी लिखते हैं, ‘वे लापरवाह तरह से कपड़े पहने हुए थे, पैरों में पुरानी चप्पल थी और वे तंबाकू खा रहे थे। मैंने खुद से कहा, बेशक ये वे पीसी जोशी नहीं हो सकते जिनका नाम हरेक की जुबान पर है। लेकिन जब उन्होंने अपना हाथ मेरे कंधे पर रखा तो उनकी आँखों की स्नेहपूर्ण चमक और एक चमकीली मुस्कान ने मेरे सारे शक को दूर कर दिया।’ भीष्म साहनी की बेटी कल्पना साहनी के शब्दों में, ‘पीसी जी अनोखी शख्सियत थे, विनम्र, स्नेहपूर्ण, सरल लेकिन अपने विजन और विचारों में एकदम स्पष्ट।’ बलराज साहनी ने अपने संस्मरण में जिक्र किया है कि पीसी जोशी को जीवन के हर पहलू से गहरा लगाव था। वे हर पल अपनी जानकारी की हदों को बढ़ाने में मशगूल रहते। वे इस पर कत्तई विश्वास नहीं करते थे कि कला को राजनेताओं के हाथ की कठपुतली होना चाहिए। बलराज साहनी ने माना कि ये पीसी जोशी का प्रभावशाली और आकर्षक व्यक्तित्व ही था कि देश भर के कई कलाकार इप्टा से जुड़े और उसके सदस्य बने। इप्टा में कौन थे?
फैज अहमद फैज
    एम. के रैना. लिखते हैं ‘उस दौर में नाटक संगीत, चित्रकला, लेखन, फिल्म से जुड़ा शायद ही कोई वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी होगा जो इप्टा से नहीं जुड़ा था’। यह एक ऐसी संस्था थी जो अपनी राजनैतिक प्रतिबद्धताओं के परे जाकर भी लोगों से जुड़ी।
संगीतकार सलिल चौधरी
    पृथ्वीराज कपूर, बलराज और दमयंती साहनी, चेतन और उमा आनंद, हबीब तनवीर, शंभु मित्र, जोहरा सहगल, दीना पाठक इत्यादि जैसे अभिनेता, कृष्ण चंदर, सज्जाद जहीर, अली सरदार जाफरी, राशिद जहां, इस्मत चुगताई, ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे लेखक, शांति वर्द्धन, गुल वर्द्धन, नरेन्द्र शर्मा, रेखा जैन, सचिन शंकर, नागेश जैसे नर्तक, रविशंकर, सलिल चौधरी जैसे संगीतकार, फैज अहमद फैज, मखदूम मोहीउद्दीन, साहिर लुधियानवी, शैलेंद्र, प्रेम धवन जैसे गीतकार, विनय रॉय, अण्णा भाऊ साठे, अमर शेख, दशरथ लाल जैसे लोक गायक, चित्तो प्रसाद, रामकिंकर बैज जैसे चित्रकार। ये आंदोलन नाटक, गीत और संगीत को थिएटर हॉल की बंद दीवारों के बाहर लोगों के बीच ले आया।
जोहरा सहगल
    इप्टा के सदस्य हर जगह सामाजिक जागरूकता की अलख जगाने के लिए नाटक कर रहे थे- गलियों में, सड़कों पर, ट्रेन में, ट्रकों के ऊपर। इस तरह शुरू हुआ एक ऐसा सांस्कृतिक पुनर्जागरण, जिसने ना सिर्फ कला और संस्कृति में नए आयाम जोड़े बल्कि जो आज भी देश भर में समाज के जागरण के लिए काम कर रहा है। कम्युनिस्ट नेता फिदेल कास्त्रो ने करीब 50 साल तक क्यूबा में एकछत्र राज किया। इस दौरान क्यूबा में कोई दूसरी पार्टी नहीं थी, जो उनकी दावेदारी को चुनौती दे पाती। यह वह दौर भी था, जब दुनिया भर में कम्युनिस्ट शासन ढहते जा रहे थे। लेकिन फिदेल कास्त्रो अपने सबसे बड़े दुश्मन संयुक्त राज्य अमरीका की खुलकर आलोचना करते रहे और लाल झंडे को कभी झुकने नहीं दिया। कास्त्रो ने इंदिरा गांधी को गले लगाया। कास्त्रो के समर्थक उन्हें समाजवाद का सूरमा बताते हैं और एक ऐसा सैन्य राजनीतिज्ञ मानते हैं, जिसने अपने लोगों के लिए क्यूबा को आजाद कराया। क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो पर यह आरोप भी लगते रहे कि उन्होंने क्रूर तरीकों से अपने विपक्षियों को दबाया। साथ ही खराब आर्थिक नीतियों की वजह से क्यूबा की अर्थव्यवस्था को अपंग बना दिया। क्यूबा के तानाशाह फुलखेंशियो बतीस्ता के संयुक्त राज्य अमरीका से घनिष्ठ संबंध थे। फिदेल अलजांद्रो कास्त्रो रुज का जन्म 13 अगस्त 1926 को एक धनी किसान के घर हुआ था. उनकी मां का नाम लीना रुज था, जो उनके पिता की सेविका थीं। लेकिन कास्त्रो के जन्म के बाद उनके पिता ने लीना से शादी कर ली।
फिदेल कास्त्रो के जीवन की नौ बातें
    सैंटियागो के कैथोलिक स्कूलों में कास्त्रो ने अपनी स्कूली पढ़ाई की. इसके बाद की पढ़ाई करने के लिए वे हवाना चले गए। 1940 के दशक के मध्य में हवाना विश्वविद्यालय से लॉ की पढ़ाई करते वक्त ही कास्त्रो राजनैतिक कार्यकर्ता बने। उन्होंने जल्द ही सार्वजनिक वक्ता के रूप में अपनी पहचान बना ली थी और लोग उन्हें सुनना पसंद करने लगे थे।
मार्क्सवाद और अमरीका से टकराव
    सक्रिय राजनीति में आने के बाद कास्त्रो ने क्यूबा सरकार को अपने निशाने पर लिया। इस दौर में राष्ट्रपति रेमन की सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे और कास्त्रो अपने भाषणों में सरकार को घेरने लगे थे। यह क्यूबा में हिंसक विरोध प्रदर्शनों का दौर था, जिसके चलते पुलिस ने कास्त्रो को निशाना बनाना शुरू कर दिया। कास्त्रो डोमिनिकन गणराज्य के दक्षिणपंथी नेताओं के खिलाफ थे। उन्होंने दक्षिणपंथी नेता राफेल ट्रूजिलो की सत्ता को उखाड़ फेंकने का प्रयास किया। लेकिन अमरीकी हस्तक्षेप के बाद यह प्रयास नाकाम रहा। सैंटियागो से सटी मोंकाडा की सैन्य बैरकों पर सशस्त्र हमला करने के जुर्म में कास्त्रो को गिरफ्तार कर लिया गया था। 1948 में कास्त्रो ने क्यूबा के एक धनी नेता की बेटी मिर्ता डियाज बालार्ट से शादी की। उस वक्त क्यूबा में यह चर्चा चली थी कि इस शादी के बाद कास्त्रो देश के कुलीन वर्ग में शामिल हो जाएँगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ बल्कि शादी के बाद कास्त्रो तेजी से मार्क्सवाद की ओर बढ़े। कास्त्रो का मानना था कि क्यूबा की आर्थिक समस्याओं का महज एक ही कारण है, और वह है बेलगाम पूँजीवाद। कास्त्रो कहते थे कि पूंजीवाद का इलाज सिर्फ जन-क्रांति द्वारा ही किया जा सकता है। स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद कास्त्रो ने बतौर वकील काम करने का प्रयास किया। लेकिन इसमें वे सफल नहीं हो पाए और उनके सिर पर लोगों का कर्ज बढ़ने लगा। इस दौरान भी उन्होंने अपनी राजनैतिक सक्रियता बनाए रखी। वे सभी हिंसक प्रदर्शनों में शामिल हुआ करते थे। साल 1952 में क्यूबा के तानाशाह फुलखेंशियो बतीस्ता ने देश में सैन्य विद्रोह करवाया और क्यूबा के राष्ट्रपति कार्लोस प्रियो को सत्ता छोड़नी पड़ी।
आक्रमण की तैयारी
    फुलखेंशियो बतीस्ता के संयुक्त राज्य अमरीका से घनिष्ठ संबंध थे। उन्होंने समाजवादी संगठनों का दमन करना शुरू कर दिया था। यह स्थिति कास्त्रो की मौलिक राजनैतिक मान्यताओं के ठीक विपरीत थीं। इसे चुनौती देने के लिए कास्त्रो ने एक संस्था बनाई, जिसका नाम था ‘द मूवमेंट’। इस संस्था ने भूमिगत रहकर काम शुरू किया, ताकि बतीस्ता की सत्ता को पलटा जा सके। इसी सिलसिले में जुलाई, 1953 में कास्त्रो ने सैंटियागो से सटी मोंकाडा की सैन्य बैरकों पर सशस्त्र हमला किया। इस विद्रोह का मकसद हथियारों को जब्त करना था। लेकिन यह योजना विफल हो गई और कई क्रांतिकारी इसमें मारे गए।
गुरिल्ला युद्ध की रणनीति
    कास्त्रो को 15 साल की सजा सुनाई गई। लेकिन 19 महीने की सजा के बाद कास्त्रो को रिहा कर दिया गया। जेल में अपनी सजा के दौरान कास्त्रो ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया था और वे दिन-रात मार्क्सवादी साहित्य में डूबे रहते थे। यह वह दौर था जब फुलखेंशियो बतीस्ता अपने विद्रोहियों को निपटा रहा था। ऐसे में गिरफ्तारी से बचने के लिए कास्त्रो क्यूबा छोड़ मेक्सिको चले गए। यहीं उनकी मुलाकात नामी क्रांतिकारी चे ग्वेरा से हुई। नवंबर 1956 में कास्त्रो 81 सशस्त्र साथियों के साथ क्यूबा लौटे और साल 1959 में क्यूबा के तानाशाह फुलखेंशियो बतीस्ता को सत्ता से हटाकर फिदेल कास्त्रो ने क्यूबा में कम्युनिस्ट सत्ता कायम की।
विचारधारा
    कास्त्रो के संचालन में बनी क्यूबा की नई सरकार ने गरीबों से वादा किया कि लोगों को उनकी जमीनें लौटा दी जाएँगी और गरीबों के अधिकारों की रक्षा की जाएगी, लेकिन सरकार ने जल्द ही देश में एक पार्टी सिस्टम लागू कर दिया। सैंकड़ों राजनैतिक लोगों को कैद कर लिया गया। कुछ को जेल भेजा गया, तो कुछ को श्रम शिविरों में नजरबंद कर दिया गया। वहीं हजारों की संख्या में मध्यम वर्गीय क्यूबाई नागरिकों को निर्वासन के लिए मजबूर किया गया। साल 1959 में हवाना में दाखिल हुई थी कास्त्रो की क्रांतिकारी सेना। उन्होंने कई बार अपने भाषणों में कहा कि देश में साम्यवाद या मार्क्सवाद नहीं है, बल्कि एक ऐसा लोकतंत्र है, जिसमें सभी को प्रतिनिधित्व की आजादी है। 1960 में फिदेल कास्त्रो ने अमरीकी स्वामित्व वाले सभी व्यवसायों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। जवाब में, वाशिंगटन ने क्यूबा पर कई व्यापारिक प्रतिबंध लगा दिए। क्यूबा इस दौर में एक शीत युद्ध का मैदान बन गया था। कास्त्रो दावा करते थे कि सोवियत संघ और उसके नेता निकिता ख्श्चेव ने उनसे समझौते का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद ही दोनों के बीच संधि हुई और उन्हें सोवियत संघ का समर्थन मिला। दूसरी ओर अमरीका कास्त्रो की सरकार का तख्ता पलट करवाने के लिए क्यूबा के राजनैतिक कैदियों के साथ मिलकर एक निजी सेना बना रहा था।
एक विचित्र घटना...
    कास्त्रो अमरीका के लिए सबसे बड़े दुश्मन बन चुके थे। सीआई के नेतृत्व में एक टीम भी बनाई गई, जिसका मकसद कास्त्रो की हत्या करना था। इसके लिए कास्त्रो के सिगार में विस्फोटक लगाकर उन्हें मारने का तरीका चुना गया। कई ऐसे विचित्र तरीकों की जानकारी सार्वजनिक हुई, जिनके जरिए कास्त्रो की हत्या प्लान की जा रही थी। इस बीच कास्त्रो को और क्यूबा को आर्थिक मदद पहुंचाने के लिए सोवियत संघ ने क्यूबा में पैसा लगाना शुरू किया।
क्यूबा का घाटा
    कमजोर आर्थिक स्थिति के बावजूद कास्त्रो ने अफ्रीका में अपने सैनिकों को भेजा और अंगोला समेत मोजाम्बिक के मार्क्सवादी छापामार लड़ाकों का समर्थन किया, लेकिन 1980 के मध्य तक वैश्विक राजनीति में भारी बदलाव हो गया। यह दौर कास्त्रो की क्रांति के लिए घातक साबित हुआ. इस दौर में मास्को के लिए भी कास्त्रो को प्रभावी ढंग से मदद दे पाना मुश्किल हो गया था और इसके साथ ही क्यूबा की एक बड़ी उम्मीद भी टूट गई। मरते दम तक फिदेल कास्त्रो की लोकप्रियता कायम रही।
कैरेबियन साम्यवाद
    इसके बावजूद 1990 के मध्य तक क्यूबा ने कई प्रभावशाली घरेलू उपलब्धियों को हासिल किया। देश में अच्छी चिकित्सा व्यवस्था को लोगों को मुफ्त मुहैया कराया गया। इसने क्यूबा की शिशु मृत्यु दर को पृथ्वी पर कुछ बड़े विकसित देशों के बराबर ला दिया। बाद के वर्षों में कास्त्रो का रुख विनम्र हो गया।

-प्रगति सक्सेना
बीबीसी संवाददाता
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

भारतीय संसद की वह बुलंद आवाज

साठ और सत्तर के दशक में भारतीय संसद में हीरेन मुखर्जी, नाथ पाई, ज्योतिर्मय बसु और अटल बिहारी वाजपेई के साथ-साथ जिस वक्ता की सबसे ज्यादा धाक होती थी वे थे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के भूपेश गुप्त।
    एक बार मशहूर रंगमंच आलोचक केनेथ टिनेन ने कहा था, अंग्रेज कंजूसों की तरह लफ्जों की जमाखोरी करते हैं, जबकि आयरिश एक शराबी की तरह उन्हें बाहर निकाल देते हैं। भूपेश गुप्त ने अपने जीवन में कभी शराब नहीं पी, लेकिन राज्यसभा में जब भी वे बोलने के लिए खड़े हुए, उनके मुँह से लफ्ज एक आयरिश मैन की तरह ही निकले। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अतुल कुमार अंजान की भूपेश गुप्त से पहली मुलाकात तब हुई जब वे सिर्फ 16-17 साल के हुआ करते थे।
    अंजान बताते हैं, कि मैं आल इंडिया स्टूडेंट फेडेरेशन के एक प्रदर्शन में दिल्ली आया था 1972 में, बोट क्लब पर हुए उस प्रदर्शन में मैंने भूपेश गुप्त को पहली बार बोलते हुए सुना। वहीं मैंने मधु लिमये, अमृतपद डाँगे और नाथ पाईजी को सुना। मैं इन सबसे प्रभावित हुआ, लेकिन सबसे अधिक प्रभावित हुआ भूपेश गुप्त की सिंहगर्जना से, जिसको सुनने से हृदय, शरीर और रोम में कंपन होता था।
    अंजान आगे बताते हैं, क्या शब्द थे उनके! क्या था उनका उच्चारण! उस जमाने में उतनी अंग्रेजी नहीं जानता था लेकिन तब भी लगता था कि वे हमारी ही बात कर रहे हैं। जब वे उठकर जाने लगे तो मैं उनके पास जा कर खड़ा हो गया। उनसे बातचीत की, हाथ मिलाया। उन्होंने अंग्रेजी में पूछा कहाँ से? मैंने कहा लखनऊ से, ये मेरी उनकी पहली मुलाकात थी।
    बाद में तो अतुल अंजान और भूपेश गुप्त का काफी साथ रहा। जब भी वे लखनऊ से दिल्ली आते तो, उन्हीं के घर ठहरते थे। सुबह साढ़े तीन बजे उठ जाते थे भूपेश गुप्त। तभी अखबार वाला धड़ाप की आवाज के साथ अखबार का बंडल फेंक जाता था।
    दैनिक कार्य से निवृत्त होने के बाद वे चार बजे से अखबार पढ़ना शुरू कर देते थे। पाँच बजे से वे राज्यसभा में ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के लिए तैयारी शुरू कर देते थे। एक ही उंगली से अपने पुराने टाइप राइटर पर टाइप करना शुरू कर देते थे। सात साढ़े सात बजे तक उनका काम रोको प्रस्ताव और जीरो आवर में कौन सा सवाल पूछेंगे-इन सब की तैयारी हो जाती थी।
    आठ सवा आठ बजे राज्यसभा के सचिवालय में उनका प्रश्न पहुँच जाता था और ठीक दस बजे वे संसद पहुँच जाते थे। कुल मिलाकर उन्होंने राज्यसभा में 1500 से 2000 के बीच भाषण दिए हैं।
    जब भूपेश बोलते थे तो सभापति तक के बूते की बात नहीं होती थी कि वे उनके भाषण में व्यवधान डालेें या उनसे कहें, योर टाइम इज अप मिस्टर भूपेश गुप्त। जब वे खड़े होते थे तो लोग अपनी कुर्सी से चिपक कर बैठ जाते थे। सुमित चक्रवर्ती मेनस्ट्रीम पत्रिका के संपादक और जाने माने पत्रकार निखिल चक्रवर्ती के बेटे हैं। वे बताते हैं, अबू अब्राहम ने एक बार लिखा था कि जब वे राज्यसभा में पहली बार एक सदस्य की हैसियत से घुसे तो उन्होंने देखा कि भूपेश गुप्त सदन में कोई मामला उठा रहे थे। उनका भाषण कुछ लंबा हो चला था। सभापति ने उनसे गुजारिश की कि मुद्दे पर आइए।
    भूपेश ने जवाब दिया मैं धीरे-धीरे वही कर रहा हूँ। एक मोती से माला नहीं बन जाती। उनको एक-एक कर पिरोने से ही माला बनती है। उनकी एक और अदा होती थी कि अपना भाषण देने के बाद वे अपना हियरिंग एड उतार देते थे। लोग मजाक में कहते थे कि वे ऐसा इसलिए करते थे ताकि उनके भाषण की आलोचना उनके कानों तक न पहुँच सके। एक बार नेहरू के भाषण के दौरान ही उन्होंने अपना हियरिंग एड उतार दिया था। जब नेहरू ने कहा था कि हम में से बहुतों को यह सौभाग्य नहीं प्राप्त है कि हम वह न सुनें जो हम सुनना नहीं चाहते।
    हिरण्मय कार्लेकर हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक रह चुके हैं। उन्होंने भूपेश गुप्त के राजनैतिक जीवन को बहुत नजदीक से देखा है। वे बताते हैं, अगर उनसे बात करनी होती थी तो आपको बहुत जोर से बोलना पड़ता था, क्योंकि वे ऊँचा सुनते थे। दूसरा वे खुले इंसान थे। जो कुछ कहना होता था साफ बोलते थे। तीसरे विवादास्पद बात करने में उन्हें बहुत मजा आता था। एक बात करके वे छोड़ देते थे और फिर देखते थे कि उसका उन लोगों पर क्या असर पड़ रहा है जिनके लिए वह बात कही गई थी।
    भूपेश शराब को हाथ नहीं लगाते थे। सुमित चक्रवर्ती एक किस्सा सुनाते हैं, एक बार नव वर्ष के मौके पर एक महिला ने उनसे कहा कि आज तो कम से कम आप शैरी पी सकते हैं। भूपेश ने जोर से ठहाका लगाते हुए कहा था कि तुम मुझसे वह काम करने के लिए कह रही हो जो मुझसे माओत्से तुंग और निकिता रुशचेव भी नहीं करवा पाए। उन्होंने कितनी बार मुझसे शराब पीने का इसरार किया लेकिन मैंने कभी उनकी बात नहीं मानी।
    मेनस्ट्रीम के पूर्व संपादक निखिल चक्रवर्ती भूपेश गुप्त को उनके लंदन के दिनों से जानते थे। उनकी मौत के बाद उन्होंने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए कहा था, भूपेश संसदीय बहस के लिए बहुत तैयारी करते थे। वे अपने निजी सचिव खुद थे। उनका कमरा हमेशा बेतरतीब रहता था लेकिन वह मेज जिस पर वे काम करते थे, हमेशा साफ सुथरी होती थी। उस जमाने में संसद में ध्यान आकर्षित करने के कई तरीके हुआ करते थे। एक था राजनारायण स्टाइल जहाँ आप मसखरापन कर सांसदों का ध्यान खींचते थे और दूसरा था संजय गांधी स्टाइल जहाँ आप ताकत और ऊँची आवाज के जोर पर अपनी बात मनवाते थे। भूपेश इन दोनों से अलग थे। उन्हें इसलिए सुना जाता था क्योंकि वे हमेशा नाइंसाफी और असमानता के खिलाफ आवाज उठाते थे। भूपेश गुप्त की अकेली संपत्ति उनकी किताबें थी। उनके पास बहुत कम कपड़े होते थे। अगर कोई उन्हें कोई कपड़ा देता भी तो वे उसे किसी जरूरतमंद को बाँट देते थे। कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व नेता मोहित सेन उनके बहुत करीबी थे।
    उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘द ट्रैवलर एंड द रोड’ में लिखा है, जब वे मरे तो उनके बैंक अकाउंट में बहुत कम पैसे थे। उनके पास किताबों, नोटबुक्स और बहुत मामूली वार्डरोब के अलावा कुछ भी नहीं था। मुझे वे बहुत पसंद करते थे और अक्सर हम उनके फिरोज शाह रोड वाले घर से बंगाली मार्केट पैदल जाया करते थे जहाँ वे गोलगप्पे और मिठाइयाँ खाते थे। तीस के दशक से ही वे इंदिरा गांधी से बहुत जुड़े हुए थे और उनके और फिरोज गाँधी के बीच संदेशवाहक का काम करते थे, लेकिन 1977 के बाद से वे उनके सख्त खिलाफ हो गए थे, हालाँकि उन्होंने इमरजेंसी का समर्थन किया था। उसके बाद वे उनसे निजी तौर पर कभी नहीं मिले। भूपेश गुप्त और इंदिरा गांधी की दोस्ती के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। इंदिरा गांधी, उनके होने वाले पति फिरोज गांधी और भूपेश गुप्त ब्रिटेन से एक ही पानी के जहाज से भारत वापस लौटे थे। इंदिरा गांधी की नजदीकी दोस्त पुपुल जयकर ने उन पर लिखी जीवनी में लिखा है, जब इंदिरा गांधी फिरोज गाँधी से शादी के मुद्दे पर अपने पिता जवाहरलाल नेहरू को नहीं मना पाईं तो वे और फिरोज, कम्युनिस्ट नेता और अपने बहुत अच्छे दोस्त भूपेश गुप्त के पास गए। जब भूपेश ने यह सुना तो वे फिरोज की तरफ मुड़ कर बहुत गंभीरता से बोले क्या तुम वफादार रह पाओगे? फिरोज जोर से हँसे और घुटनों के बल बैठ कर बोले, क्या तुम चाहते हो कि मैं वफादारी का प्रण लूँ? भूपेश गुप्ता ने फिरोज गांधी को कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि इंदिरा गांधी की तरफ मुड़ कर पूछा, क्या तुम वास्तव में फिरोज से शादी करना चाहती हो? उनको पता था कि इंदिरा जिद्दी है और उन्हें कोई ताज्जुब नहीं हुआ जब इंदिरा ने कहा कि उनका यही इरादा है। भूपेश ने तब दोनों से कहा कि वे महात्मा गांधी से सलाह लें। इंदिरा गाँधी से निकटता होने के बावजूद दोस्ती कभी भी उनके राजनैतिक विचारों के आड़े नहीं आई। वक्त का तकाजा हुआ तो उन्होंने इंदिरा गांधी पर राजनैतिक हमलों से परहेज नहीं किया।
            अतुल कुमार अंजान बताते हैं, इंदिरा गांधी के साथ उनके संबंध नीतियों के सवाल पर कठोर होते थे। लंदन के अध्ययन काल में दोनों के संबंधों के बीच बहुत जीवंतता और आत्मीयता थी। एक बार मैं उनके निवास स्थान से संसद भवन पैदल जा रहा था। अचानक उनके सामने एक एंबेसडर कार आ कर रुकी। शीशा उतार कर एक महिला बोल रही थी भूपेश... भूपेश, मैंने देखा वह प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। उन्होंने अपनी कार का दरवाजा खोला और उनसे अपनी कार में बैठने का आग्रह करने लगीं। लेकिन भूपेश कार में बैठने में झिझक रहे थे। अंततः वे कार में नहीं बैठे। तब मुझे लगा कि यह सिर्फ एक अद्वितीय सांसद और प्रधानमंत्री के बीच का मामला नहीं है, बल्कि यह बहुत गहरा आत्मीय संबंध है। जब 1980 में अचानक इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी का एक हवाई दुर्घटना में निधन हो गया, तो घोर राजनैतिक विरोधी होते हुए भी भूपेश गुप्त ने संजय गांधी को जिस तरह की भावभीनी श्रद्धांजलि दी, वैसी शायद किसी ने भी नहीं दी। भूपेश गुप्त बोले, कई मौके ऐसे आते हैं जब नियमों को ताक पर रख दिया जाता है। अगर नियमों को ताक पर नहीं रखा गया होता तो 23 जून को हुई दुर्घटना नहीं हुई होती, तो प्रधानमंत्री के बेटे, सत्ताधारी पार्टी के महासचिव और 25 सालों तक मेरे दोस्त रहे फिरोज गांधी के छोटे बेटे और अगर मुझ पर चापलूसी का इल्जाम न लगाया जाए, तो मेरी दोस्त इंदिरा गांधी के बेटे के प्राण नहीं जाते। मैं भरे दिल से यह सब कह रहा हूँ। 1981 में जब भूपेश गुप्त का निधन हुआ और उनके पार्थिव शरीर को अजय भवन लाया गया, तो इंदिरा गांधी स्वयं उन्हें श्रद्धांजलि देने कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्यालय अजय भवन पहुँचीं। उस समय अतुल अंजान भी अजय भवन में मौजूद थे। अतुल बताते हैं, मैंने देखा कि इंदिरा जी आईं थीं। एकदम श्वेत परिधान में थीं...एकदम सफेद। काला चश्मा लगाए हुए थीं। जब वे भूपेश के पार्थिव शरीर के पास आईं तो बहुत देर तक खड़ी रहीं। उनका शरीर शीशे के कास्केड में रखा गया था, जिसमें उनका चेहरा दिखाई दे रहा था। वे अपनी लंबी गर्दन निकाल कर बहुत गौर से भूपेश के चेहरे को देखती रहीं। मैं उनकी बगल में खड़ा था। मैंने देखा कि काले चश्मे के नीचे से टप-टप आँसू बह रहे थे।

-रेहान फजल
बीबीसी संवाददाता
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

समाजवादी समाज के निर्माण के लिए समर्पित भाकपा

भारत की भूमि पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना सम्मेलन उत्तर प्रदेश के कानपुर में 90 साल पहले 26-28 दिसम्बर, 1925 को सम्पन्न हुआ था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के केन्द्रीय सचिव मंडल सदस्य रहे तथा वर्षों तक गहन अनुसंधान के बाद कई खंडों में प्रकाशित पार्टी इतिहास का सम्पादन करने वाले डॉ. गंगाधर अधिकारी ने ‘डाक्युमेंट्स ऑफ दि हिस्ट्री ऑफ दि कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया’ के द्वितीय खंड (1923-1925) में लिखा है कि सबसे पहले कानपुर बोल्शेविक षड्यंत्र केस में गिरफ्तार कम्युनिस्ट गुटों के नेताओं ने, विशेषकर कॉ. एस.ए. डांगे को ऐसा सम्मेलन कराने का विचार आया था। कम्युनिस्ट रहे एस. सत्यभक्त ने इंडियन कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव के नाम पर जारी एक परिपत्र द्वारा देश के विभिन्न शहरों में कार्यरत कम्युनिस्ट गुटों के सदस्यों तथा उन सभी को जिनको पार्टी के कार्यों पर विश्वास था, आग्रह किया था कि वे सभी कानपुर में 26 से 28 दिसम्बर, 1925 को आयोजित इस सम्मेलन में भाग लें। 20 सितम्बर, 1925 को हुई बैठक में इस सम्मेलन के लिए स्वागत समिति का गठन किया गया। उसके अध्यक्ष बने मौलाना हसरत मोहानी और सचिव गणेश शंकर विद्यार्थी। ब्रिटिश कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रूप में वहाँ के पार्लियामेंट में चुने गए एक भारतीय कॉ. शापुरजी सकलतवाला को सत्यभक्त ने इस सम्मेलन की अध्यक्षता करने का आमंत्रण पत्र भेजा था। उनके असमर्थता जताने पर मद्रास के कम्युनिस्ट नेता कॉ. सिंगारावेलु चेट्टीयार को अध्यक्षता के लिए आमंत्रित किया गया। कॉ. सकलतवाला द्वारा भेजे गए संदेश को सम्मेलन में पढ़कर सुनाया गया। कॉ. सिंगारावेलु ने अपने अध्यक्षीय भाषण में पढ़ा-ऐसे समय जबकि कम्युनिज्म के विरोधी लोग इस धरती पर बसने वाले सभी मनुष्यों के लिए दुनिया को ज्यादा से ज्यादा खुशहाल और सुख-सम्पन्न बनाने वाले हमारे लोकोपकारी आंदोलन को कुचलने का प्रयास कर रहे हैं, भारत के हम कम्युनिस्ट भारत की राजनैतिक और आर्थिक स्थिति पर सामान्य रूप से विचार करने आज इस हॉल में एकत्र हुए हैं। हम उम्मीद करते हैं कि इस सम्मेलन में होने वाले विचार-विमर्शों के माध्यम से हमारे देशवासी और हमारे शासक दोनों ही हमारे शांतिपूर्ण आंदोलन को अच्छी तरह समझेंगे तथा हम अपनी इच्छा व्यक्त करते हैं कि सामान्य जनता, खासकर उद्योग-धंधों और कृषि क्षेत्रों के मजदूर, जिनके लाभ के लिए ही यह सम्मेलन हो रहा है, हमारे कार्यों का भली-भाँति मूल्यांकन करेंगे।
    के.मुरुगेसन और सी.एस. सुब्रह्मण्यम द्वारा लिखित, ‘सिंगारावेलु दक्षिण भारत में कम्युनिज्म के अग्रदूत’ अंग्रेजी पुस्तक जिसका हिन्दी अनुवाद श्री कन्हैया द्वारा किया गया, उसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की 50वें वर्षगाँठ के अवसर पर पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित की गई थी। उसे पढ़ने से हम जान पाते हैं कि, सिंगारावेलु दक्षिण में कम्युनिज्म के जनक थे। वे अपने कम्युनिस्ट विचारों को मजदूर-वर्ग के संघर्षों के प्रत्येक कार्य क्षेत्र में, कांग्रेस के आत्मगौरव आंदोलन में और नागरिक मामलों में भी लागू करते थे। 1860 में मद्रास के एक मछेरे परिवार में जन्मे सिंगारावेलु ने कानून की डिग्री हासिल की और हाईकोर्ट में वकालत की। 1902 में इंग्लैंड की यात्रा कर वहाँ विश्व बौद्ध सम्मेलन में भाग लिया। जब वह भारत लौटकर आए, तो उनके घर में ही महाबोधि सोसायटी की बैठक होने लगी। बाद में वे रूस की 1905 की क्रांति के समाचार से प्रेरित हुए, जलियांवाला बाग हत्याकांड और राष्ट्रीय आंदोलन के लिए गांधीजी के आह्वान के बाद मद्रास शहर में नौजवानों के एक दल का नेतृत्व करना शुरू किया। उन्होंने 1922 में कांग्रेस प्रतिनिधि के रूप में गया-अधिवेशन में भी भाग लिया। सिंगारावेलु ने 1923 में मद्रास में हिन्दुस्तान मजदूर-किसान पार्टी की स्थापना की और मद्रास नगर में मई दिवस सभा का आयोजन किया। इतिहास में भारत में आयोजित पहला मई दिवस वही था। दैनिक समाचार पत्र कीर्ति के अनुसार कानपुर में आयोजित कांग्रेस पार्टी के
अधिवेशन पंडाल के पास ही सड़क के दूसरी तरफ विशेष रूप से बनाए गए अस्थायी सभागृह में कम्युनिस्ट पार्टी के सम्मेलन में 300 से ऊपर प्रतिनिधि उपस्थित थे। 25 दिसम्बर को सम्मेलन उद्घाटन अधिवेशन हुआ था। 26 दिसम्बर की शाम को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की विधिवत स्थापना का प्रस्ताव भी था। 27 दिसम्बर को पार्टी संविधान पारित किया गया और केन्द्रीय कार्यकारिणी समिति व पदाधिकारियों का चुनाव हुआ। महाराष्ट्र, बंगाल, लाहौर, उत्तर प्रदेश, पंजाब व मद्रास के कम्युनिस्ट गुटों के प्रतिनिधि शामिल थे। मुजफ्फर अहमद द्वारा 1969 में बंगाली में लिखित पुस्तक अमार जीवन आर. भारतेर कम्युनिस्ट पार्टी के मुताबिक इस सम्मेलन से एस.व्ही. घाटे और जानकी प्रसाद बगरेहट्टा संयुक्त महासचिव चुने गए और घाटे को बम्बई केन्द्रीय कार्यालय संचालन की जिम्मेदारी दी गई। पार्टी का 11 सदस्यीय केन्द्रीय कार्यकारिणी का भी चुनाव हुआ, जिसमें से एक थे कॉ. मुजफ्फर अहमद। बाद में कॉ. मुजफ्फर अहमद ने उसी पुस्तक में, जिसे पार्टी का 1964 में विभाजन के बाद 1969 में लिखा गया था, लिखा कि कानपुर में कम्युनिस्ट सम्मेलन एक बच्चों का खेल था और वे इसे एक शर्मनाक घटना मानते हैं। उन्होंने दावा किया कि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना कानपुर में 26 दिसम्बर 1925 को नहीं, बल्कि ताशकंद में एम.एन. राय के नेतृत्व में 17 अक्टूबर, 1920 को 7 सदस्यों की एक बैठक आयोजित की गई थी। 1964 में बनी सीपीआई (एम) के नेताओं ने उनकी पार्टी का कलकत्ता में सम्पन्न सप्तम पार्टी कांग्रेस (31 अक्टूबर से 7 नवंबर, 1964) में सीपीआई (एम)  के जिस पार्टी कार्यक्रम को पास करवाया गया, उसकी भूमिका में लिखा गया कि सन् 1920 में कम्युनिस्ट पार्टी का गठन हुआ और 1920 के दशक में पार्टी गठित होने के बाद पार्टी गैरकानूनी घोषित हो गई। सीपीआई (एम) के स्थापना वर्ष को 1920 दर्शाते हुए उस पार्टी ने अपने को सीपीआई से अलग दिखाने का प्रयास ही नहीं किया, बल्कि सन 2014 में सीपीआई से अलग होने का 50वीं वर्षगाँठ मनाते हुए इस बात की बहुत खुशी जाहिर की कि उनकी पार्टी को सीपीआई के संशोधनवाद से मुक्ति मिली थी। वहीं अपने लक्ष्य के बारे में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा, पार्टी ऐसे न्यायपूर्ण समाजवादी समाज के लक्ष्य के लिए दृढ़तापूर्वक समर्पित है जो हर किस्म के शोषण और वर्ग, जाति एवं लिंग अंतरों के कारण पैदा होने वाले सामाजिक उत्पीड़न को समाप्त करने के लिए रास्ता साफ करेगी। पार्टी ऐसे समाजवादी समाज के निर्माण के लिए समर्पित है, जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण अंततः समाप्त हो जाएगा। तमाम मतांध और मात्र सिद्धांतवादी एवं मताग्राही सोच एवं संशोधनवादी रूझानों को अस्वीकार करते हुए, पार्टी एक ऐसे नये समाजवादी समाज के लिए रास्ते की रूपरेखा तैयार करने के लिए भारत की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार मार्क्सवादी लेनिनवाद के विज्ञान को लागू करेगी। यह रास्ता सामने उपस्थित विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों और साथ ही हमारे स्वयं के देश की विशेष विशिष्टताओं एवं लक्षणों, इसके इतिहास, परंपरा, संस्कृति, सामाजिक बनावट एवं विकास के स्तर से तय होगा। यह किसी मॉडल पर आधारित नहीं होगा। यह अद्वितीय और विशेषतः इस 21वीं सदी में समाजवाद का भारतीय रास्ता होगा। मुख्य तत्व है उत्पादन के मुख्य साधनों का समाजीकरण। सीपीआई के राजनैतिक प्रस्ताव-2015 में कहा गया कि, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी दृढ़तापूर्वक विश्वास करती है कि अपनी समृद्ध विरासत के साथ जनता के उद्देश्यों के लिए संघर्ष और अभियान से समाजवादी समाज के लिए पथ प्रशस्त करके एक जनविकल्प का निर्माण होगा। समाजवादी हमारा भविष्य है।

-चित्तरंजन बक्शी
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

जेनी मार्क्स

     
    उन्होंने पैसों की समस्या से निपटने के लिए एक गृह उद्योग शुरू किया। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस गृह उद्योग के लिए वे कबाड़ियों की दुकानों से पुराने कोट खरीदकर लातीं और उन्हें काटकर बच्चों के लिए छोटे-छोटे कपड़े बनातीं। इन कपड़ों को वे एक टोकरी में रखकर मोहल्ले में घूम घूमकर बेच आतीं। आज शायद यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि मार्क्स की पत्नी की इसी कर्मठता के कारण ही उन्हें ‘दास कैपिटल‘ जैसा ग्रंथ पढ़ने को मिला।
जेनी मार्क्स की कहानी
    महान दार्शनिक और राजनैतिक अर्थशास्त्र के प्रणेता कार्ल मार्क्स को जीवनपर्यंत घोर अभाव में जीना पड़ा। परिवार में सदैव आर्थिक संकट रहता था और चिकित्सा के अभाव में उनकी कई संतानें काल-कवलित हो गईं। जेनी वास्तविक अर्थों में कार्ल मार्क्स की जीवनसंगिनी थीं और उन्होंने अपने पति के आदर्शों और युगांतरकारी प्रयासों की सफलता के लिए स्वेच्छा से गरीबी और दरिद्रता में जीना पसंद किया।
    जर्मनी से निर्वासित हो जाने के बाद मार्क्स लन्दन में आ बसे। लन्दन के जीवन का वर्णन जेनी ने इस प्रकार किया है “मैंने फ्रेंकफर्ट जाकर चांदी के बर्तन गिरवी रख दिए और कोलोन में फर्नीचर बेच दिया। लन्दन के महँगे जीवन में हमारी सारी जमापूँजी जल्द ही समाप्त हो गई। सबसे छोटा बच्चा जन्म से ही बहुत बीमार था। मैं स्वयं एक दिन छाती और पीठ के दर्द से पीड़ित होकर बैठी थी कि मकान मालकिन किराये के बकाया पाँच पौंड माँगने आ गई। उस समय हमारे पास उसे देने के लिए कुछ भी नहीं था। वह अपने साथ दो सिपाहियों को लेकर आई थी। उन्होंने हमारी चारपाई, कपड़े, बिछौने, दो छोटे बच्चों के पालने, और दोनों लड़कियों के खिलौने तक कुर्क कर लिए। सर्दी से ठिठुर रहे बच्चों को लेकर मैं कठोर फर्श पर पड़ी हुई थी। दूसरे दिन हमें घर से निकाल दिया गया। उस समय पानी बरस रहा था और बेहद ठण्ड थी। पूरे वातावरण में मनहूसियत छाई हुई थी।” और ऐसे में ही दवावाले, राशनवाले, और दूधवाला अपना-अपना बिल लेकर उनके सामने खड़े हो गए। मार्क्स परिवार ने बिस्तर आदि बेचकर उनके बिल चुकाए।
    ऐसे कष्टों और मुसीबतों से भी जेनी की हिम्मत नहीं टूटी। वे बराबर अपने पति को ढाढ़स बंधाती थीं कि वे
धीरज न खोयें।
    कार्ल मार्क्स के प्रयासों की सफलता में जेनी का अकथनीय योगदान था। वे अपने पति से हमेशा यह कहा करती थीं “दुनिया में सिर्फ हम लोग ही कष्ट नहीं झेल रहे हैं।”जेनी मार्क्स
    मित्रों, जेनी ने बहुत मेहनत की, दरिद्र जैसी जिन्दगी जी, फिर भी कार्ल मार्क्स का कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। जेनी की पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत ही शानदार थी। जेनी प्रशिया के अभिजात वर्ग के एक प्रमुख परिवार ैंस्रूमकमस में पैदा हुई थीं।
    इतिहास खुद को दोहराता है , पहले एक त्रासदी की तरह, दूसरे एक मजाक की तरह कोई भी जो इतिहास की कुछ जानकारी रखता है वह ये जानता है कि महान सामाजिक  बदलाव बिना महिलाओं के उत्थान के असंभव हैं । सामाजिक प्रगति महिलाओं की सामजिक स्थिति, जिसमें बुरी दिखने वाली महिलाएँ भी शामिल हैं, को देखकर मापी जा सकती है।
लोकतंत्र समाजवाद का रास्ता है।
    पूँजी मृत श्रम है, जो पिशाच की तरह केवल जीवित श्रमिकों का खून चूस कर जिंदा रहता है, और जितना अधिक ये जिंदा रहता है उतना ही
अधिक श्रमिकों को चूसता है।
    कार्ल मार्क्स के अनमोल विचार ‘दुनिया के मजदूरों एकजुट हो जाओ’ या तुम्हारे पास खोने को कुछ भी नहीं है, सिवाय अपनी जंजीरों के।
    हर किसी से उसकी क्षमता के अनुसार , हर किसी को उसकी जरूरत के अनुसार।
    धर्म मानव मस्तिष्क जो न समझ सके उससे निपटने की नपुंसकता है। शासक वर्ग को कम्युनिस्ट क्रांति के डर से कांपने दो। मजदूरों के पास अपनी जंजीरों के अलावा और कुछ भी खोने को नहीं है। उनके पास जीतने को एक दुनिया है। सभी देश के कामगारों एकजुट हो जाओ।
    सामाजिक प्रगति समाज में महिलाओं को मिले स्थान से मापी जा सकती है। साम्यवाद के सिद्धांत को एक वाक्य में अभिव्यक्त किया जा सकता है सभी निजी संपत्ति को खत्म किया जाये। नौकरशाह के लिए दुनिया महज एक हेर-फेर करने की वस्तु है। इतिहास कुछ भी नहीं करता। उसके पास आपार धन नहीं होता, वह लड़ाइयाँ नहीं लड़ता। वे तो मनुष्य हैं, वास्तविक, जीवित, जो ये सब करते हैं। शांति का अर्थ साम्यवाद के विरोध का नहीं होना है। अगर कोई चीज निश्चित है तो यह कि मैं खुद एक मार्क्सवादी नहीं हूँ। जरूरत तब तक अंधी होती है जब तक उसे होश न आ जाये । आजादी जरूरत की चेतना होती है। मानसिक पीड़ा का एकमात्र मारक शारीरिक पीड़ा है।
    इसलिए पूँजीवादी उत्पादन टेक्नॉलोजी विकसित करता है, और तरह-तरह की प्रक्रियाओं को सम्पूर्ण समाज में मिला देता है पर ऐसा वह सिर्फ संपत्ति के मूल स्रोतों मिटटी और मजदूर को सोख कर करता है।
    पूँजीवादी समाज में पूँजी स्वतंत्र और व्यक्तिगत है, जबकि जीवित व्यक्ति आश्रित है और उसकी कोई वैयक्तिकता नहीं है। बहुत सारी उपयोगी चीजों के उत्पादन का परिणाम बहुत सारे बेकार लोग होते हैं। अमीर गरीब के लिए कुछ भी कर सकते हैं लेकिन उनके ऊपर से हट नहीं सकते।
    अनुभव सबसे खुशहाल लोगों की प्रशंसा करता है, वे जिन्होंने सबसे अधिक लोगों को खुश किया। लोगों की खुशी के लिए पहली आवश्यकता धर्म का अंत है। बिना किसी शक के मशीनों ने समृद्ध आलसियों की संख्या बहुत अधिक बढ़ा दी है। यह बिल्कुल असंभव है कि प्रकृति के नियमों से ऊपर उठा जाए। जो ऐतिहासिक परिस्थितियों में बदल सकता है महज वह रूप है जिसमें ये नियम खुद को क्रियान्वित करते हैं। पूँजी मजदूर की सेहत या उसके जीवन की लम्बाई के प्रति लापरवाह है ,जब तक कि उसके ऊपर समाज का दबाव ना हो। धर्म दीन प्राणियों का विलाप है, बेरहम दुनिया का हृदय है और निष्प्राण परिस्थितियों का प्राण है। यह लोगों का अफीम है।
    समाज व्यक्तियों से नहीं बना होता है बल्कि खुद को अंतर संबंधों के योग के रूप में दर्शाता है, वह सम्बन्ध जिनके बीच में व्यक्ति खड़ा होता है। हमें यह नहीं कहना चाहिए कि एक आदमी के एक घंटे की कीमत दूसरे आदमी के एक घंटे के बराबर है, बल्कि यह कहें कि एक घंटे के दौरान एक आदमी उतना ही मूल्यवान है जितना कि एक घंटे के दौरान कोई और आदमी। समय सबकुछ है, इंसान कुछ भी नहीं वह अधिक से अधिक समय का शव है। पिछले सभी समाजों का इतिहास वर्ग संघर्ष का इतिहास रहा है। कारण हमेशा से अस्तित्व में रहे हैं , लेकिन हमेशा उचित रूप में नहीं।
    जमींदार, और सभी लोगों की तरह, वहाँ से काटना पसंद करते हैं जहाँ उन्होंने कभी बोया नहीं। बिना उपयोग की वस्तु हुए किसी चीज की कीमत नहीं हो सकती। क्रांतियाँ इतिहास के इंजिन हैं । जीने और लिखने के लिए लेखक को पैसा कमाना चाहिए , लेकिन किसी भी सूरत में उसे पैसा कमाने के लिए जीना और लिखना नहीं चाहिए। एक भूत यूरोप को सता रहा है-साम्यवाद का भूत। शायद यह कहा जा सकता है कि मशीनें विशिष्ट श्रम के विद्रोह को दबाने के लिए पूँजीपतियों द्वारा लगाए गए हथियार हैं।
    शासक वर्ग के विचार हर युग में सत्तारूढ़ विचार होते हैं, यानी जो वर्ग समाज की भौतिक वस्तुओं पर शासन करता है, उसी समय में वह उसके बौद्धिक बल पर भी शासन करता है।
    मानसिक श्रम का उत्पाद विज्ञान हमेशा अपने मूल्य से कम आँका जाता है, क्योंकि इसे पुनः उत्पादित करने में लगने वाले श्रम-समय का इसके मूल उत्पादन में लगने वाले श्रम-समय से कोई सम्बन्ध नहीं होता। चिकित्सा संदेह तथा बीमारी को भी ठीक करती है।
    सभ्यता और आमतौर पर उद्योगों के विकास ने हमेशा से खुद को वनों के विनाश में इतना सक्रिय रखा है कि उसकी तुलना में हर एक चीज जो उनके संरक्षण और उत्पत्ति के लिए की गयी है वह नगण्य है ।
    लेखक इतिहास के किसी आन्दोलन को शायद बहुत अच्छी तरह से बता सकता है, लेकिन निश्चित रूप से वह इसे बना नहीं सकता। जबकि कंजूस मात्र एक पागल पूँजीपति है, पूँजीपति एक तर्कसंगत कंजूस है। लोगों के विचार उनकी भौतिक स्थिति के सबसे प्रत्यक्ष उद्भव हैं। जितना अधिक श्रम का विभाजन और मशीनरी का उपयोग बढ़ता है, उतना ही श्रमिकों के बीच
प्रतिस्पर्धा बढती है, और उतना ही उनका वेतन कम होता जाता है।

  साम्यवाद के जन्मदाता कार्ल मार्क्स अपना अमर ग्रंथ ‘दास कैपिटल‘ लिखने में तल्लीन थे। इस कार्य के लिए उन्हें पूरा समय पुस्तकालयों से नोट वगैरह लेने में लगाना पड़ता था। ऐसे में परिवार का निर्वाह उनके लिए एक बड़ी परेशानी बन गया। उन्हें बच्चे भी पालने थे और अध्ययन सामग्री भी जुटानी थी। दोनों ही कार्यों के लिए उन्हें पैसा चाहिए था। इन विकट स्थितियों में मार्क्स की पत्नी आगे आईं।

लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

सामाजिक क्रांति के जनक व्लादिमीर लेनिन


    20वीं सदी के अग्रणी रूसी राजनेता विश्व इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण और प्रभावशाली व्यक्ति थे। बोल्शेविक राजनैतिक दल के संस्थापक के रूप में वे एक सफल रूसी कम्युनिस्ट क्रांतिकारी, राजनीतिज्ञ और राजनैतिक सिद्धांतकार थे। व्लादिमीर लेनिन 1917 से 1924 तक सोवियत रूस की सरकार के प्रमुख थे। उनके प्रशासन के अंतर्गत, रूस और उसके बाद व्यापक सोवियत संघ रूसी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा नियंत्रित एक-पक्ष कम्युनिस्ट राज्य बन गया। 1893 से लेनिन ने रूस के साम्यवादी विचारधारा का प्रचार करना प्रारंभ किया था। लेनिन को कई बार जेल भेजा गया था तथा निर्वासित भी किया गया। ‘प्रलिटरि’ एवं ‘इस्क्रा’ के संपादन के अतिरिक्त 1898 में उन्होंने बोल्शेविक पार्टी की स्थापना की। 1905 की क्रांति के उसके प्रयास असफल रहे किन्तु 1917 में उन्होंने रूस के पुननिर्माण की योजना बनाई और सफल हुए। उन्होंने केरेन्सकी की सरकार पलट दी और 7 नवम्बर, 1917 को लेनिन की अध्यक्षता में सोवियत सरकार की स्थापना हुई। रूस का भाग्यविधाता बनने के बाद लेनिन ने अपने देश को विकसित करने का प्रयत्न किया था। कड़े अनुशासन के साथ देश पर नियंत्रण रखा।
लेनिन रूस के इतिहास में ही नहीं विश्व इतिहास के कर्णधारों में एक अग्रणी नाम है। उन्होंने रूस की काया पलट कर के सारे विश्व को ही आश्चर्य चकित कर दिया। उन्हीं के प्रयत्नों से रूस में समाजवाद की स्थापना हुई थी। मार्क्स के स्वप्न को साकार करने का श्रेय भी लेनिन को ही जाता है। 21 जनवरी, 1924 को इस क्रांतिकारी व्यवस्थापक का स्वर्गवास हो गया लेकिन सोवियत की जनता उनको आज भी अपने साथ मानती है, उनको सँजोकर रखा है उनको अंतिम संस्कार के बजाए पिरामिड की तरह सुरक्षित रखा है। आज भी लेनिन पूरे विश्व में सभी के दिलो में बसे हुए है, उनके सिद्धांतों व आदर्शां को मानते हैं और उनके रास्ते पर चल रहे हैं। लेनिन के सिद्धांतों व आदर्शों के प्रशंसकों की सम्पूर्ण विश्व में कमी नहीं है, अभी भी व्लादिमीर लेनिन सामाजिक क्रांति के प्रेरक है।
    मॉस्को के रेड स्क्वायर में रखा व्लादिमीर लेनिन का पार्थिव शरीर आज भी विश्वभर के पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है।
     व्लादिमीर इल्यीच उल्यानोव (लेनिन) का जन्म 10 अप्रैल, 1870 में उल्यानोव्स्क नगर में हुआ था, यह नगर बोल्वा नदी के तट पर स्थित है। लेनिन 6 भाई बहन थे, इनके पिता का नाम इल्या निकोलायेविन और माता मरीया अलेक्सान्द्रोवना था। लेनिन बचपन से ही बहुत ही होनहार, मजाकिया, खुशमिजाज और साहसी थे। उन्हें तैराकी, स्केटिंग और जोशीले गेम बहुत प्रिय थे इसके अलावा दोस्तों के साथ दूर-दूर तक घूमना फिरना बहुत अच्छा लगता था। पढ़ाई के साथ ही रूस के प्रमुख स्थानों का भ्रमण कर चुके थे। लेनिन ने पाँच वर्ष की उम्र में पढ़ना-लिखना सीख लिया था, नौ साल की उम्र में हाई स्कूल में एडमीशन ले लिया था और 21 साल की अवस्था में कानून की डिग्री प्राप्त कर ली थी। वह बड़ी मेहनत और लगन से पढ़ाई करते थे इस कारण उन्हें हर साल योग्य छात्र होने का अवार्ड भी मिलता था वे अपने सहपाठियो की पढ़ाई लिखाई में हमेशा हेल्प करते थे। उन्हें बचपन से बहुत ज्ञान पिपासा थी, रूस के सभी महान लेखकों की किताबें और रचनाओं को लगातार अध्ययन करते रहते थे। प्रगतिशील रूसी साहित्य के अध्ययन और आस-पास के वातावरण का युवा लेनिन के चरित्र और विचारों के निर्माण पर बहुत प्रभाव पड़ा लेनिन का मन वकालत में नहीं लगता था, बहुत कम समय समारा की जिला कचहरी में देते थे, वे मुख्यतयः गरीब किसानो की ओर से ही अदालत में पेश होते थे उनका सारा समय और बल तो मार्क्सवाद के अध्ययन में लगा रहता और सर्वहारा मेहनतकश वर्ग की भलाई में रहता। लेनिन ने 1892 में मार्क्स और एंगेल की कृतियों के अध्ययन और प्रचार के लिए समारा में प्रथम मार्क्सवादी मंडल संगठित किया और क्रातिकारी विचार रखने वाले युवाओं को मंडल का सदस्य बनाया। 23 साल की उम्र में लेनिन में सरलता, सहृदयता, खुशमिजाजी और विनोद प्रियता तथा स्थिरता, अच्छा ज्ञान, कठोर तार्किक कर्मठता और स्पष्ट विचार अभिव्यक्ति की क्षमता का अद्भुत मिलाप था, लोग उनके भाषण सुनकर फॉलो करने लगते और उनके साथ जुड़कर क्रांति के लिए समर्पित हो जाते।

-डॉ. बाल गोविन्द वर्मा
मोबाइल : 7860778767
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

फ्रेड्रिक एंजिल्स


“अपने दोस्त कार्ल मार्क्स के बाद फ्रेड्रिक एंजिल्स पूरी सभ्य दुनिया में आधुनिक सर्वहारा में सबसे बड़े विद्वान और अध्यापक थे”। ऐसा कहना था आधुनिक युग के एक अन्य महापुरूष और महान क्रान्तिकारी व्लादिमीर लेनिन का। मार्क्स और एंजिल्स ने ही सबसे पहले समाजवाद की व्याख्या की और बताया कि यह कोई सपना नहीं बल्कि आधुनिक समाज में उत्पादक शक्तियों के विकास का अंतिम लक्ष्य और आवश्यक परिणाम है। ऐसे महान क्रान्तिकारी और समाजवादी दार्शनिक फ्रेड्रिक एंजिल्स का जन्म 28 नवम्बर 1820 में जर्मनी के रहाइन प्रान्त में बारेन नामक स्थान पर एक टेक्सटाइल फैक्ट्री के मालिक के घर में हुआ। एंजिल्स का परिवार ईसाई धर्म के प्रोटेस्टेंट पंथ को मानने वाला था। ऐसे में अपने क्रान्तिकारी विचारों के चलते उनके रिश्ते घर से बहुत अच्छे नहीं थे। उनके पिता चाहते थे कि वे अपने पैतृक कारोबार को आगे बढ़ाएँ, इसीलिए उन्हें 18 साल की आयु में व्यापरिक अनुभव प्राप्त करने के लिए ब्रेमेन भेज दिया। ब्रेमेन में 30 साल के प्रवास के दौरान उदारवादी और क्रान्तिकारी कामों में उनकी रुचि बढ़ती गई। कई छोटे वामपंथी विचारकों ने उन्हें आकर्षित किया लेकिन वह संतुष्ट नहीं हुए और हेजेल के दर्शन को अपना लिया। ईसाइयत के खिलाफ आक्रमक रुख ने एंजिल्स को अज्ञेयवादी से नास्तिक बना दिया लेकिन उनके क्रान्तिकारी संकल्प अभी किसी भी दिशा में जा सकते थे। 1842 में वह मोसेस हेस से मिले जिन्होंने उन्हें कम्युनिस्ट बना दिया। उन्होंने एंजिल्स को बताया कि हेलेजियन दर्शन का तार्किक नतीजा साम्यवाद है। एंजिल्स को कविता लिखने का शौक था और अब तक पत्रकारिता के मैदान में भी उन्होंने अपनी पहचान बना ली थी, हालाँकि उनके लेख फ्रेड्रिक ओसवाल्ड के छद्म नाम से कई जर्नलों और अखबारों में छपते थे। उनका मार्क्स से परिचय भी उनके लेखों के माध्यम से ही हुआ। मार्क्स से मुलाकात करने के मकसद से वे दस दिन के लिए पेरिस गए। उसके बाद दोनों क्रांतिकारी यात्रा में 1983 में मार्क्स की मृत्यु तक साथ रहे। अपने इंग्लैंड में प्रवास के दौरान वहाँ की चमक दमक वाली औद्योगिक क्रांति के पीछे अंधकार में डूबी मजदूरों की दुर्दशा पर ‘द कंडीशन आफ वर्किंग क्लास इन इंगलैंड’ नाम से शोध कार्य प्रकाशित किया। एंजिल्स ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मार्क्स के साथ मिलकर कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो और द होली फैमिली लिखा तो वहीं दास कैपिटल के दूसरे और तीसरे भाग का संपादन भी किया। उन्होंने द ओरिजिन आफ द फैमिली, प्राइवेट प्रापर्टी एंड द स्टेट, आउटकम आफ क्लासिकल जर्मन फिलासफी जैसी मशहूर किताबें लिखीं।     
       
 -मसीहुद्दीन संजरी
मो0 09455571488
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

यह सपना अधूरा है अब तक पूँजीवादी व्यवस्था का खात्मा चाहते थे कार्ल मार्क्स

कार्ल मार्क्स का नाम आते ही एक ऐसे व्यक्तित्व की छवि उभरती है, जिसने पूरी दुनिया को वैज्ञानिक समाजवाद का दर्शन दिया। 5 मई सन 1818 को कार्ल मार्क्स का जन्म जर्मनी के एक यहूदी परिवार में हुआ था। इनके परिवार ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था लेकिन जब कार्ल मार्क्स बड़े हुए तब उन्होंने ईसाई धर्म को त्याग कर नास्तिकता की राह अपनाई और पूरे जीवन भर अपने अर्थशास्त्रीय ज्ञान के आधार पर समाजवाद की स्थापना में लगे रहे। उनका आर्थिक-राजनैतिक चिंतन आज भी महत्वपूर्ण है और दुनिया भर के मजदूरों को एकजुट करने का उनका सपना पूरी मानवता के लिए महत्व रखता है। मार्क्स के जीवन को हम देखें, तो आश्चर्य होता है कि पूरी दुनिया में पूँजीवाद के खिलाफ संघर्ष करने वाले ऐसे दार्शनिक को घनघोर आर्थिक मुसीबतों का सामना करना पड़ा। 14 मार्च 1883 को लंदन में कार्ल मार्क्स का निधन हुआ।
    कार्ल मार्क्स ने ‘दास कैपिटल’ जैसी कालजयी कृति की रचना की। कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणा पत्र भी कार्ल मार्क्स ने तैयार किया था। इस घोषणा पत्र को साम्यवादी घोषणा पत्र के रूप में याद किया जाता है, जिसमें पूँजीवादी विसंगतियों के बारे में बताते हुए सर्वहारा लोगों की सत्ता कैसे स्थापित हो, इस पर गंभीर विमर्श किया गया है। कार्ल मार्क्स ने यह घोषणा पत्र फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ तैयार किया था। 1848 में पहली बार यह घोषणा पत्र जर्मन भाषा में ही तैयार हुआ। बाद में तो दुनिया के अनेक देशों की भाषाओं में इसका अनुवाद भी हुआ। मार्क्स का चिंतन आज भी पूरी दुनिया में संघर्षशील बिरादरी को लगातार हौसला प्रदान करता है। समतावादी समाज की रचना की दिशा में मार्क्स का घोषणा पत्र काबिलेगौर है। दुर्भाग्य है कि ऐसे समय में जबकि साम्यवाद पूरी दुनिया का आधार बन सकता था, तब उसकी जगह पूँजीवादी व्यवस्था ने ले ली है। यही कारण है कि पूँजीवादी व्यवस्था ने संघर्षशील मनुष्य के दमन की परिपाटी शुरू कर दी है तथा वर्ग संघर्ष की स्थिति निरंतर बनी हुई है। गरीब और गरीब होता जा रहा है, पूँजीपति और अधिकतम सम्पन्न बनता जा रहा है। विषमता की खाई बढ़ रही है और समाज में विद्वेष भी फैलता जा रहा है। जिसके कारण हिंसा भी बढ़ी है। ऐसी विषम स्थिति के बीच जब हम कार्ल मार्क्स के चिंतन को देखते हैं तो समझ में आता है कि दुनिया को इसी रास्ते से आगे बढ़ना था, लेकिन हर महान सपना बहुत जल्दी तार-तार हो जाता है। वैज्ञानिक समाजवाद भी
धीरे-धीरे हाशिए पर चला गया।
    मार्क्स ने अपने घोषणा पत्र में यही चिंता व्यक्त की थी कि पूरी दुनिया में एक तरफ पूँजीवाद बढ़ रहा है, तो दूसरी तरफ सर्वहारा की समस्या भी बढ़ती जा रही है। दोनों के बीच संघर्ष की स्थिति है। एक मालिक है और दूसरा श्रमिक है। श्रमिक जीवन भर श्रमिक ही बना रहता है। वह अपनी तरक्की नहीं कर पाता।  और दूसरी तरफ मालिक दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता है। यही कारण है कि दोनों के बीच निरंतर संघर्ष की स्थिति बनी रहती है। कोई भी सत्ता जब बड़े पूँजीवादियों के हाथों में चली जाती है तो समाज के छोटे-छोटे लोग प्रभावित होते हैं। ये छोटे दुकानदार भी हो सकते हैं। कास्तकार हो सकते हैं। किसान हो सकते हैं, मजदूर हो सकते हैं। ये सब अंततः शोषित पीड़ित वर्ग में शरीक हो जाते हैं। मार्क्स मजदूर संगठनों पर विशेष जोर देते हैं और उनकी एकता के लिए प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं। इस घोषणा पत्र के बाद सर्वहारा वर्ग में वैश्विक स्तर पर एक चेतना आई और लोग अपने अधिकारों के लिए उठ खड़े हुए। यही कारण है कि 1871 मैं पेरिस में संघर्ष हुआ। 70 दिनों तक मजदूरों ने सत्ता पर अपना एकाधिकार जमाए रखा। तब मार्क्स ने एक लेख लिखा था जिसमें उन्होंने कहा था कि सत्ता पर काबिज होकर ही हम अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकते। सत्ता में सुधार कैसे लाया जाए, इस दिशा में चिंतन करना चाहिए। मार्क्स के दर्शन से प्रभावित होकर रूस में 1917 में मजदूर आंदोलन ने क्रांति का रुप ले लिया और उसका साम्यवादी चेहरा उभर कर पूरी दुनिया के सामने आया, लेकिन कहीं-न-कहीं आंतरिक विफलताओं और सामंजस्य के अभाव के कारण साम्यवादी  स्वप्न तार-तार हो गया। ऐसा किसलिए हुआ, इस पर आज भी मिल-जुलकर के विचार करने की जरूरत है। समाज में पूँजीवादी व्यवस्था खत्म हो, यही मार्क्स के घोषणापत्र का पवित्र लक्ष्य था। लेकिन हम देख रहे हैं इस दिशा में बहुत संतोषजनक प्रगति नहीं हो रही है और अब तो पूरी दुनिया जैसे पूँजीवादी बाजार के खूनी पंजे में ही कैद होकर रह गई है। ऐसे समय में एक बार फिर नए सिरे से मार्क्स को पढ़ने, समझने और समझाने की जरूरत है।                

 -गिरीश पंकज
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लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित