बुधवार, 30 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --9

बन्धु, खाना पैक कर दो
    मैंने अस्थिकलश यात्रियों से भोजन करने का जैसे ही आग्रह किया, वे थोडा सा झिझके, मुझे सेवा भारती के तत्कालीन जिला प्रमुख और संघ के एक पदाधिकारी तुरंत एक तरफ ले कर गए, बहुत ही प्यार से उन्होंने मेरे कंधे पर हाथ रखा, मेरे द्वारा किए गए इस शानदार आयोजन की भूरि-भूरि प्रशंसा की, मेरे काम को देर तक सराहने और मेरी संघ और राष्ट्र के प्रति निष्ठा पर अतीव प्रसन्नता जाहिर करने के बाद वे अत्यंत ही धीमी आवाज में बोले-बन्धु, आप तो हमारे समाज की विषमता से परिचित ही है, संघ के सारे प्रयासों के बाद भी अभी तक हिन्दू समाज समरस नहीं हो सका, हम तो आप जब भी चाहोगे तब आपके साथ आपके ही घर पर एक ही थाली में बैठकर खाना खा लेंगे, पर आज हमारे साथ साधु संत और अन्य लोग भी हैं, वे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि हमने उन्हें किसी वंचित समुदाय के घर का खाना खिला दिया है, वे नाराज हो कर यात्रा छोड़कर वापस चले जाएँगे, मुझे काटो तो  उस वक्त खून नहीं निकले, मैं स्तब्ध था, मेरे मस्तिष्क में विचारों की कई आँधियाँ एक साथ चल रही थी, मेरे जबान पर कोई शब्द ही नहीं आ रहे थे, जिससे मैं उन्हें अपनी परिस्थिति बता पाता, न मैं कुछ बोल पा रहा था और न ही उनके द्वारा दिए जा रहे तर्कों कुतर्कों को ही मैं सुन पा रहा था लेकिन उनके आखिरी वाक्य मुझे आज तक याद रह गए है-आप ऐसा करो कि खाना पैक करके गाड़ी में रखवा दो, अगले गाँव में कार्यक्रम के बाद सबको बैठाकर खिला देंगे मतलब साफ था कि वे बिना यह बताए कि यह मुझ दलित स्वयंसेवक के घर का बना खाना है, इसे चुपचाप सबको अगले गाँव में खिला दिया जाएगा। मेरी स्थिति उस वक्त बड़ी विचित्र हो गई थी, मैं अपने ही घर में हार महसूस कर रहा था, बिना कुछ किए ही मेरे पिताजी जीतते प्रतीत हो रहे थे, मैं उलझन में था कि पिताजी के सवालों का क्या जवाब दूँगा कि क्यों नहीं खाना खाया उन लोगों ने? फिर भी दिल कड़ा करके मैंने खाना पैक करवाना शुरू करवाया, घरवालों ने कारण पूछा तो मैंने कह दिया कि अगले गाँव भगवानपुरा में एक और कार्यक्रम है, पहले ही बहुत देरी हो गई है, इसलिए वहीं जाकर खाएँगे खाना, जैसे तैसे यह कह कर मैंने उस वक्त तो अपना पिंड छुड़वा लिया पर मन का सारा उत्साह जाता रहा, जाति से हीन होने का भाव हावी होने लगा, बार-बार यही सोच उभर कर आने लगी कि मेरे साथ यह क्या हो रहा है? संघ के लोग मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं? मैं एक अनुशासित स्वयंसेवक, जुनूनी कारसेवक, जिला कार्यालय प्रमुख अगर मेरे साथ ही ऐसा छुआछूत, तो मेरे अन्य समाज बंधुओं के साथ कैसा दुर्व्यवहार हो रहा होगा? उस दिन पहली बार मैंने एक हिन्दू से परे हट कर सिर्फ निम्न जातिय दलित के नजरिए से सोचना शुरू किया, मैं जितना सोचता था, उतना ही उलझता जाता था सही बात तो यह है कि वह रात मेरे जीवन की सबसे लम्बी रात थी, बीतने का नाम ही नहीं लेती थी आँखों ही आँखों में गुजारी वह रात और कल का सूरज तो और भी भयंकर उदित होने जा रहा था, उसकी तो शायद मैंने कल्पना भी नहीं की थी।
और उन्होंने खाना फेंक दिया
    आज मेरे लिए कयामत का दिन था, कल की रात अभी बीती ही थी कि सुबह का भयावह सूरज अपनी तेज किरणों के साथ उपस्थित था, मेरे साथी स्वयंसेवक पुरुषोत्तम क्षत्रिय जो की अस्थि कलश यात्रा के साथ ही चल रहे थे, घर आ पहुँचे, वे मेरे अम्बेडकर छात्रावास के दिनों के पड़ोसी भी थे, कवि होने के नाते अच्छे दोस्त भी। हम लोग आजाद नगर शाखा में साथ साथ जाते थे, हर बात एक दूसरे को साझा करते थे, गहरी मित्रता थी, वे सुबह खीर की केतली लेकर लौटे थे, उन्होंने जो कुछ मुझे बताया, वह अविश्वसनीय और अकल्पनीय था, उनके द्वारा दी जा रही सूचना मेरे दिमाग पर हथौड़े मारने जैसी थी। पुरुषोत्तम जी ने बताया कि आपके यहाँ से ले जाई गई खीर, पूरी भगवानपुरा मोड़ पर सड़क किनारे फेंक दी गई और रात को खाना वैध शर्मा के यहाँ बनवा कर देर रात खाया गया, मुझे कहा गया है कि मैं आपको यह बात नहीं बताऊँ लेकिन मैं झूठ नहीं बोलना चाहता, आपके खाने को खाया नहीं गया बल्कि फेंक दिया गया, मैंने पुरुषोत्तम जी से साफ कहा कि कुछ भी हो लेकिन संघ के स्वयंसेवक इतने जातिवादी और निकृष्ट नहीं हो सकते हैं, आप मजाक करने के लिए इतना बड़ा सफेद झूठ नहीं बोल सकते हैं? उन्होंने कहा कि यकीन नहीं होता है तो चल कर देख लो, कुछ ना कुछ तो अवशेष वहाँ मिल ही जाएँगे हम दोनों दोस्त साईकिल पर सवार हुए और भगवानपुरा मोड़ पर पहँुचे, जाकर देखा, पुरुषोत्तम सही साबित हुए, वाकई मेरे घर से गया खाना सड़क किनारे बिखरा हुआ था, जिसे चील, कौव्वे, कुत्ते, चींटिया बिना किसी भेदभाव के लगभग चटकर चुके थे, यह मेरे बर्दाश्त के बाहर था। उस शाम अस्थि कलश यात्रा ब्राह्मणों की सरेरी पहँुचने वाली थी, मैंने वहा जाकर खुल कर बात करने का निश्चय कर लिया था, अब बहुत हो चुका था, निर्णायक जंग का वक्त आ पहँुचा था, लड़ाई शुरू हो गई थी, सिर्फ घोषणा बाकी थी।
कहीं कोई सुनवाई नहीं
    शाम को मैं अत्यंत आक्रोश के साथ ब्राह्मणों की सरेरी पहुँचा, मैंने अस्थि कलश यात्रियों से इस शर्मनाक घटनाक्रम के बारे में सफाई माँगी, उन्होंने भोजन फेंकने की घटना से साफ इनकार कर दिया, जब मैंने उन्हें बताया कि पुरुषोत्तम जी ने मुझे यह जानकारी दी है तब उन्होंने यह तो स्वीकार किया कि भोजन लिए गाड़ी में पीछे बैठे व्यक्ति के हाथ से भगवानपुरा के मोड़ पर जब गाड़ी स्पीड में मुड़ी तो खाना गिर गया, अब भला गिरा हुआ खाना कैसे खाते? इसलिए वैद जी के घर पर रात में खाना बनवा कर खाना पड़ा मैं उनके शब्दों और उनके चेहरे के भावों के बीच फंसे हुए सच को साफ-साफ देख पा रहा था, ये परम पूज्य भाई साहब सफेद झूठ भी कितनी आसानी से बोल रहे हैं। मुझे पक्का यकीन हो गया कि वे सरासर असत्य बोल रहे हैं। अगर खाना किसी के हाथ से गिरता तो सड़क के बीचों बीच गिरता, सड़क के किनारे पर जा कर कैसे गिरा खाना? दूसरे अगर पूरी गिरती तो खीर बची रहती और अगर खीर गिरती तो केतली पर मोच के निशान आते, मगर खीर और पूरी दोनों ही फेंके गए थे जान बूझ कर, उन्होंने पूरे होशोहवास में एक दलित स्वयंसेवक के घर से आया खाना फेंक दिया था, अब इस गलती को गलती मानने के बजाए अजीब से कुतर्क देने पर तुले हुए थे उनके झूठ और जूठ को सच के रूप में स्थापित करने की कोशिश से मेरा दिल फट गया, मुझे अत्यंत लज्जा और अपमान का अहसास हुआ, मैंने महसूस किया कि संघ के लोगों ने सिर्फ मेरे घर का बना खाना ही नहीं फेंका बल्कि मुझे भी दूर फेंक दिया है। मेरे सामने वह सारा समय और घटनाक्रम चलचित्र की भाँति गतिशील था, जब मैं अपनी पूरी क्षमता लगा कर संघ के काम को बढ़ाने पर तुला हुआ था। मैं उस मौके को याद कर रहा था, जब मैं रामजी के नाम पर शहीद होने के लिए घर से भाग गया था अगर मैं अयोध्या पहँुचने में सफल हो जाता और सरयू पुल पर पुलिस की गोली का शिकार हो जाता तो क्या वे मेरी लाश को भी छूते, मेरी मृतदेह घर भी पहँुचाई जाती या खाने की ही तरह सरयू में फेंक दी जाती? मैंने खुद से सवाल किया कि क्या मैं इसी हिन्दू राष्ट्र के लिए मरने मारने पर उतारू हूँ, जिसमें मेरा स्थान ही नहीं है। मेरी औकात क्या है? मेरी अपनी पहचान क्या है? मैं क्या हूँ? आखिर कौन हूँ मैं? एक रामभक्त कारसेवक हिन्दू या शूद्र अछूत जिसके घर का बना खाना भी स्वीकार नहीं। हिन्दू राष्ट्र की ध्वजा फहराने वालों के साथ मैं अपने को किस पहचान के साथ खड़ा करूँ?
       बहुत सोचा पाया कि हिन्दू वर्ण व्यवस्था में शूद्र और जाति व्यवस्था में अछूत हूँ मैं अवर्ण मैं भले ही स्वयंसेवक था लेकिन पूरा हिन्दू नहीं था इसलिए मेरी स्वीकार्यता नहीं थी इसीलिए मुझे विस्तारक बनने की तो सलाह दी गई थी लेकिन प्रचारक बनने से रोक दिया गया था बस, अब मुझे खुद को जानना है, अपने साथ हुए हादसे के कारणों को खोजना है और उन कारणों को जड़ से मिटा देना है। मैंने इस अन्याय और भेदभाव के खिलाफ नागपुर तक अपनी आवाज बुलंद करने का निश्चय कर लिया मैं अस्थि कलश यात्रा के साथ चल रहे नेताओं से लेकर संघ के विभिन्न स्तर के प्रचारकों के पास गया मैंने कोई भी जगह और स्तर नहीं बाकी रख छोड़ा, जहाँ अपनी व्यथा नहीं पहँुचाई हो लेकिन सुनवाई कहीं भी नहीं होती दिखी, तब मैंने माननीय सर संघचालक रज्जू भैय्या तक भी अपनी गुहार लगाई। उन्हें पत्र लिखा, सारी बात लिखी और कहा कि आपके संगठन के स्थानीय ठेकेदार नहीं चाहते हैं कि मैं अब और एक भी दिन हिन्दू के नाते रहूँ और काम करूँ, लेकिन संघ के नक्कारखाने में मुझ तूती की आवाज को कौन सुनता? वहाँ भी किसी ने नहीं सुना सही बात तो यह थी कि सुनना ही नहीं था, जिन-जिन भी संघ प्रचारकों और पदाधिकारियों से मैं मिला, उन्होंने इसे एक बहुत छोटी सी बात कह कर टाल दिया, उल्टे मुझे ही नसीहतें मिलीं कि इस बात को छोड़कर मैं सकारात्मक काम में मन लगाऊँ पर मैं मानने को कतई तैयार नहीं था कि यह छोटी सी बात है, तब भी नहीं और आज भी नहीं, छुआछूत और भेदभाव किसी भी इन्सान की जिन्दगी में छोटी सी बात नहीं होती है, सिर्फ हिन्दू राष्ट्र के निर्माताओं के लिए यह छोटी सी बात हो सकती है।
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

रविवार, 27 जुलाई 2014

मोदी युग की पहली कविता -----------

कारगिल -कारगिल ------------के अपराधियों से जोड़ा खाने वाले.
अपराधियों ने नौजवानों को मरवा दिया था
आज वहीअपराधी
शहीद - शहीद चिल्ला रहे है
यानी पहले शहीद कराओ
-फिर फूल चढाओ
फिर अपराधियों से हाथ मिलाओ
फिर ताबूत में कमीशन खाओ
फिर स्मारक बनवाओ
उसमे भी कमीशन खाओ
राष्ट्र प्रेम की अलख जगाओ
फिर चिल्लाओ कश्मीर मांगोगे
तो फिर सीना चीर देगे
संदेश भेजोगे कश्मीर सुंदर
आजाद मुल्क बनाओ
रक्षा क्षेत्र में एफ डी आई
अमरीका की गुलामी
गुजरात में
फट्टा के साथ
हवाला की सलामी
हिन्दू की एकता में
आरक्षण का विरोध
धर्म के नाम पर
धार्मिक गुलामी
सहारनपुर में सद्भाव
काठ में दंगा
लखनऊ में चेलो से
हुरदंगा
वोट के लिए सब चंगा
गाजा की ख़ुशी
यू. एन में दुखी
बर्लिन में
सेतुवा
जिनपिंग से
हलुवा
जरूरत है
तो बाप
नही है तो
देगे श्राप
यही इनका
राष्ट्र प्रेम
राष्ट्रप्रेमी है
बाकी सभी देश
द्रोही है
खुद का बाप
गाँधी नही
हिटलर है
संसद में
गाँधी
बाहर गोडसे की
आंधी
आजादी युद्ध में
अंग्रेज भक्त
आज बड़े
स्वतंत्रता सेनानी
कायरो की ज़मात
देश रक्षक
है यही
नोट -सभी संघी मित्रो से अनुरोध है कि कविता में कामा फुल स्टॉप सही करने का कष्ट करे
सादर

उन्ही का कापीराइट युक्त
सुमन

लो क सं घ र्ष !

शनिवार, 26 जुलाई 2014

भारत: समुदायों का संघ

गत 25 जून को महाराष्ट्र की मंत्रिपरिषद ने मराठा समुदाय को 16 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का निर्णय लिया। मराठा,राज्य की आबादी के लगभग 32 प्रतिशत हैं और यह आरक्षण, कुनबी मराठाओं को ओबीसी की हैसियत से पहले से ही मिल रहे आरक्षण के अतिरिक्त होगा। मंत्रिमंडल ने यह निर्णय भी लिया कि 50 पिछड़ी मुस्लिम जातियों को भी 5 प्रतिशत आरक्षण दिया जायेगा। मुसलमान, राज्य की आबादी का 10.6 प्रतिशत हैं और यह आरक्षण ओबीसी की सूची में शामिल मुस्लिम जातियों को मिल रहे आरक्षण के अतिरिक्त होगा। वर्तमान में जुलाहा, मोमिनए अंसारी, रंगरेज, तेली, नक्कासी, मुस्लिम काकर, पिंजारी और फकीर जातियों के मुसलमानों को ओबीसी की हैसियत से आरक्षण मिल रहा है। इस नए 21 प्रतिशत आरक्षण के साथ, राज्य में शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का प्रतिशत बढ़कर 73 हो गया है। बंबई उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर कर, मराठाओं को दिए गए 16 प्रतिशत आरक्षण को कई आधारों पर चुनौती दी गई है, जिनमें से प्रमुख यह है कि मराठा, शैक्षणिक या सामाजिक दृष्टि से पिछड़े नहीं हैं। महाराष्ट्र के 17 मुख्यमंत्रियों में से 10 मराठा थे। वर्तमान में राज्य विधानसभा के 288 सदस्यों में से 152 मराठा हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मराठा,राजनैतिक व सामाजिक दृष्टि से प्रभुत्वशाली हैं। वे बड़ी संख्या में सहकारी शक्कर मिलों,सहकारी बैंकों और व्यवसायिक शिक्षण संस्थानों का संचालन कर रहे हैं। यहां तक कि यह मराठी राज्य, मराठा राज्य बन गया है।
संविधान के अनुच्छेद 16 ;4 के अनुसार राज्य ,नागरिकों के उन पिछड़े वर्गों के सदस्यों को नियुक्तियों या पदों में आरक्षण दे सकता हैए जिन्हें सरकारी सेवाओं में उपयुक्त प्रतिनिधित्व प्राप्त नहीं है।
यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या मराठा और 50 मुस्लिम जातियां, सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं? मंत्रिमंडल ने मराठा समुदाय के बारे में निर्णय, नारायण राणे समिति की रपट के आधार पर लिया जबकि मुस्लिम समुदायों को आरक्षण देने का आधार बनी डाक्टर एम. रहमान की अध्यक्षता में नियुक्त अध्ययनदल की रपट। दरअसल, मराठाओं में इतनी उपजातियां हैं कि उन्हें एक समुदाय कहना ही गलत है। मराठा समुदाय के दो मुख्य हिस्से हैं.किसान उपजातियां व योद्धा उपजातियां। पहले, कुनबी कहलाते हैं और दूसरे शायनावकुली। योद्धा उपजातियों का प्रभुत्व अधिक है। दोनों अपनी अलग पहचान कायम रखे हुए हैं और उनके आपस में वैवाहिक संबंध नहीं होते। अतः उपजातियों के इन दोनों समूहों को एक समुदाय मानकर, उसे पिछड़ेपन की कसौटी पर कसना ही गलत है।
यह दिलचस्प है कि अध्ययन दल ने जिन 50 मुस्लिम जातियों को पिछड़ा बताया या माना है, उनके नाम न तो अध्ययन दल ने सार्वजनिक किए और ना ही सरकार ने। ये वे समुदाय हैं जिन्हें नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 5 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध होगा। जहां मराठा समुदाय के सभी सदस्यों को आरक्षण का लाभ मिलेगा वहीं 50 पिछड़ी मुस्लिम जातियों के उन सदस्यों को यह लाभ नहीं मिलेगा, जो कि क्रीमिलेयर में आते हैं। राज्य के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने मीडिया के साथ बातचीत में कहा कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं बल्कि पिछड़ेपन को बनाया गया है। मुख्यमंत्री ने यह स्पष्ट नहीं किया कि पिछड़ेपन को नापने के लिए किन मानकों का इस्तेमाल किया गया है। जहां तक अध्ययन समूह का सवाल है, उसकी रपट सन् 2001 की जनगणना,सन् 2006 की सच्चर समिति रपट और सन् 2009 में टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सांइसेज के प्रोफेसर अब्दुल शब्बन द्वारा किए गए एक अध्ययन के आंकड़ों का संकलन मात्र है। तीनों रपटों में न तो पिछड़े मुस्लिम समुदायों के नाम बताए गए हैं और ना ही उनका अलग से अध्ययन किया गया है। उदाहरणार्थ, इनमें से किसी रपट में नक्षबंदी, बेग, मीर,ए हकीम, मुल्ला, हैदरी, नूरी, उस्मानी इत्यादि समूहों के शैक्षणिक स्तर, साक्षरता, जीवनयापन का जरिया, रोजगार, सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व, आमदनी का स्तरए लैंगिक अनुपात, बैंक ऋण व स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आदि के संबंध में अलग से कोई आंकड़े नहीं दिए गए हैं। सारे आंकड़े सम्पूर्ण मुस्लिम समुदाय के हैं। जो चित्र इन रपटों से उभरता है वह निश्चय ही निराशाजनक है। बच्चे स्कूल की पढ़ाई पूरी नहीं कर रहे हैं और इसका कारण गरीबी व बाल मजदूरी है। यद्यपि मुसलमानों की साक्षरता दर 78.1 है तथापि उनमें से केवल 2.2 प्रतिशत ग्रेजुएट हैं। मुस्लिम महिलाओं में ग्रेजुएशन करने वालों का प्रतिशत मात्र 1.4 है। शहरों और गांवों में रहने वाले मुसलमानों में से लगभग 60 प्रतिशत गरीबी की रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। मुसलमानों की कार्य सहभागिता दर ;आबादी का वह हिस्सा जो या तो कोई काम कर रहा है अथवा ढूंढ रहा हैद्ध केवल 32.4 प्रतिशत है और महिलाओं के मामले तो यह 12.7 प्रतिशत मात्र है। महाराष्ट्र काडर में कोई आईएएस अधिकारी मुसलमान नहीं है और पुलिस बल में केवल 4.4 प्रतिशत मुसलमान हैं। इस परिस्थिति में यह समझना मुश्किल है कि मंत्रिमंडल इस निर्णय पर कैसे पहुंचा कि पूरे मुस्लिम समुदाय नहीं वरन् केवल 50 मुस्लिम जातियों को आरक्षण की जरूरत है।
आरक्षण की राजनीति
आरक्षण के जरिए, राज्यए शनैः शनैः समाज में व्याप्त गैर.बराबरी को दूर करने के अपने संवैधानिक दायित्व को पूरा करता है। आरक्षण के जरिए यह सुनिश्चित किया जाता है कि समाज के उस वर्ग के नागरिकों, जिन्हें ऐतिहासिक कारणों से आगे बढ़ने के उपयुक्त व पर्याप्त अवसर नहीं मिले,को ऐसे अवसर उपलब्ध कराए जाएं ताकि जो क्षति उन्हें हुई है उसकी पूर्ति हो सके। परंतु महाराष्ट्र सरकार के आरक्षण संबंधी हालिया फैसले का इस संवैधानिक दायित्व की पूर्ति से कोई लेना.देना नहीं है। आरक्षण,दरअसल, सत्ताधारी पार्टी द्वारा किसी जाति या समुदाय के वोट कबाड़ने के लिए उसे आकर्षित करने का जरिया बन गया है। शरद पवार ने तो मीडिया से यह तक कह दिया कि अगर सत्ताधारी दल चुनाव में लाभ उठाने के लिए भी आरक्षण देता है तो इसमे गलत क्या है। मुसलमान लगभग पिछले 30 सालों से सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में अपने लिए आरक्षण की मांग करते आ रहे हैं। परंतु उनकी मांग की अब तक अनसुनी होती आई है। 16वें आम चुनाव में भाजपा.शिवसेना.आरपीआई गठबंधन द्वारा महाराष्ट्र की 48 में से 42 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल कर लेने के बाद कांग्रेस को यह समझ में आया कि जनता उसके साथ नहीं है। और इसलिए उसकी सरकार ने मराठाओं को आरक्षण देने का फैसला किया। मुसलमानों की कुछ जातियों को आरक्षण देने का उद्देश्य भी उनके पिछड़ेपन को समाप्त करना नहीं है बल्कि मराठा समुदाय को दिए गए आरक्षण को औचित्यपूर्ण सिद्ध करना है। दरअसल, शक्तिशाली मराठा समुदाय को खुश करने के सरकारी प्रयास में मुसलमान अनायास ही लाभांवित हो गए हैं। वरना, क्या कारण है कि अगर सरकार मुसलमानों के एक तबके को आरक्षण देना चाहती थी तो इस तबके की पहचान के लिए आवश्यक प्रयास क्यों नहीं किए गए।

पहचान की राजनीति व कांग्रेस और भाजपा की धर्मनिरपेक्षता
जब भारत के संविधान का निर्माण हुआ था तब उसकी उद्देशिका में'धर्मनिरपेक्षता' शब्द नहीं था। परंतु धर्मनिरपेक्षता, संविधान के मूल ढांचे का हिस्सा थी। संविधान के अनुच्छेद 14, 15 व 16 में प्रत्येक नागरिक को समानता की गारंटी दी गई है,भले ही उसका धर्म या जाति कोई भी हो। इसी तरह, अनुच्छेद 19 के अंतर्गत दी गई स्वतंत्रताएं भी समस्त नागरिकों को हासिल हैं। अनुच्छेद 25 देश के सभी रहवासियों को अंतर्रात्मा की स्वतंत्रता व अपनी पसंद के किसी भी धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। जो एकमात्र अधिकार धार्मिक समुदायों को है वह यह है कि वे धार्मिक मामलों का स्वयं प्रबंधन कर सकते हैं और धर्मार्थ या धार्मिक प्रयोजन से संस्थाओं की स्थापना व उनका प्रबंधन कर सकते हैं। अनुच्छेद 27 कहता है कि किसी भी व्यक्ति को किसी धर्म विशेष या धार्मिक संस्था को प्रोत्साहन देने के लिए टैक्स देने पर मजबूर नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 28ए राज्य द्वारा पूर्णतः वित्तपोषित शैक्षणिक संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा का निषेध करता है।
यह स्पष्ट है कि संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार व स्वतंत्रताएंए व्यक्तियों को उपलब्ध हैं न कि समुदायों या जातियों को। हां, संवैधानिक अधिकारों व स्वतंत्रताओं से लैस नागरिक, अपनी सामाजिकए सांस्कृतिक या धार्मिक आवश्यकताओं  की पूर्ति के लिए एकसाथ मिलकर किसी संस्था का गठन कर सकते हैं। परंतु किसी भी स्थिति में, व्यक्तियों को उपलब्ध अधिकार व स्वतंत्रताएंए उनके समूह को स्थानांतरित नहीं हो सकतीं, चाहे वह समूह धार्मिक हो, नस्लीय, जातिगत या भाषायी। संविधान की यह मान्यता है कि ये समूह स्थायी नहीं है और इनकी दीवारें इतनी ऊँची नहीं होतीं कि कोई इन्हें लांघ न सके। सरल शब्दों में हम कहें तो एक धर्म का व्यक्ति जब चाहे किसी दूसरे धर्म को अपना सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि कोई धार्मिक समूह,स्थायी संस्था नहीं है। उसके पुराने सदस्य उसे छोड़कर जा सकते हैं और नए सदस्य उसमें शामिल हो सकते हैं। हां, इस स्थिति के कुछ अपवाद भी हैं जैसे महिलाएं, बच्चे, अनुसूचित जाति व जनजातियों के सदस्य या शैक्षणिक व सामाजिक दृष्टि से पिछड़े वर्ग या ऐसे लोग जिन्हें सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय से वंचित रखा गया हो। ऐसे सभी नागरिक, सामूहिक रूप से कुछ अधिकारों के तब तक पात्र हैं जब तक कि वे कमजोर, सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े व भेदभाव के शिकार बने रहते हैं। इस तरह के वर्गों को आरक्षण व अन्य कल्याण कार्यक्रमों से लाभांवित होने का अधिकार है।
परंतु राजनैतिक दल अपने संकीर्ण लाभ के लिए इस संवैधानिक सिद्धांत की अवहेलना करते हैं। यह सुनिश्चित करने की बजाय कि हर व्यक्ति को वे स्वतंत्रता,मिलें, जिनका वह पात्र है और किसी को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय से वंचित न किया जाए, राजनैतिक दल जाति, समुदाय या नस्ल पर आधारित समूहों के हितों को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं। इससे इन समूहों को अपनी अलग पहचान को मजबूती देने में लाभ नजर आने लगता है और उनमें कट्टरता बढ़ती है। श्रेष्ठी वर्ग को जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र या नस्ल के आधार पर अलग पहचान को मजबूती देने में मदद करने के लिए राजनैतिक दल, सरकारी संसाधनों व सत्ता का दुरूपयोग करते हैं और जाति या समुदाय के आधार पर लोगों को उपकृत कर अपना हितसाधन करते हैं। कांग्रेसए समाजवादी पार्टी व बसपा जैसे राजनैतिक दलए जो कि स्वयं को 'सेक्युलर'बताते हैं,आर्थिक व राजनैतिक लाभों का वितरण मुख्यतः जाति के आधार पर करना चाहते हैं,जिसमें उनकी पंसदीदा जाति को उसकी पात्रता से अधिक हिस्सा मिले। दूसरी ओर, भाजपा, लाभों, पदों व अवसरों के वितरण का आधार धर्म को बनाना चाहती है।
इस प्रक्रिया में ये पार्टियां भारत को धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा व नस्ल पर आधारित समुदायों के महासंघ में परिवर्तित कर रही हैं.एक ऐसे महासंघ में, जिसमें विभिन्न समुदायों को अलग.अलग विशेषाधिकार प्राप्त हों। कुछ लोग यह मांग करते हैं कि मराठाओं को अधिक अधिकार व लाभ मिलने चाहिए,य कुछ अन्य चिल्ला.चिल्लाकर कहेंगे कि मुसलमानों को अन्य समुदायों की तुलना में अधिक सुविधाएं मिलनी चाहिए तो कुछ अन्य का दावा होगा कि हिन्दुओं का देश के संसाधनों पर अधिक अधिकार है। तथ्य यह है कि ये सभी वर्ग मिलकर हमारे संविधान का मखौल बना रहे हैं और कानून के राज को कमजोर कर रहे हैं। जाहिर है कि ऐसे वातावरण में जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली संस्कृति का बोलबाला हो जाता है। उस समुदाय या जाति को अधिक तवज्जो मिलती है जिसकी आबादी अधिक है या जिसके सदस्यों का राजनीति में ज्यादा दखल है। विभिन्न समुदायों के बीच अधिक से अधिक लाभ पाने की प्रतियोगिता भी चलती रहती है जिसके कारण विवाद और हिंसा होते हैं। क्या ही अच्छा हो कि हमारे राजनेता लोगों को समुदायों के तौर पर देखने की बजाए यह सुनिश्चितत करने का प्रयास करें कि हर व्यक्ति को समानता व समान अवसर का अधिकार मिले। और अगर राजनेता ऐसा नहीं करते तो क्या प्रजातंत्र की अन्य संस्थाएं सभी के लिए न्याय सुनिश्चित करने के लिए आगे आयेंगी?
 -इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --8

पुलिस वाले लाठियाँ लिए टूट पडे़
    मैं इस उपद्रव बनाम आन्दोलन का हिस्सा था और कुछ हद तक अगुवाई में भी था, इसलिए थोड़ी बहुत देर तो पथराव में भागीदार रहा, फिर जब आस पास के लोग छँटने लगे तो मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ कि अकेले ही पत्थर फेंक रहा हूँ, कहीं पुलिस की लाठी गोली का शिकार हो गया, तो भय का अहसास हुआ इधर-उधर देखा, सामने ही भीमगंज स्कूल था, दौड़कर उसमंे घुस गया और बच्चों के बीच छिप कर बैठ गया, काफी देर तक बाहर से गोलियाँ चलने की आवाजें आती रही, पता चला कि कफ्र्यू लगाने की घोषणा की जा चुकी है, अब शायद बाहर जाना संभव नहीं हो पाएगा, तब चिंता हुई, क्या करूँ, कैसे बाहर जाऊँगा, पर यह सोच कर शांत रहा कि इतने सारे बच्चों को भी तो पहँुचाया जाएगा, उन्हीं के साथ चला जाऊँगा।
    उपद्रव के शांत होते ही पुलिस की सुरक्षा में बच्चों को घर पहँुचाने का इंतजाम किया गया, पुलिस और शिक्षकों ने मिल कर सब बच्चों को बाहर निकाला, मैं भी अन्य बच्चों के साथ-साथ बाहर तक आया, ज्यों ही गली में पहँुचा, पाँच छह पुलिसवाले लाठियाँ लिए मुझ पर टूट पड़े, मैं समझ ही नहीं पाया कि इतने विद्यार्थियों में उन्होंने मुझ अकेले को ही कैसे पहचान लिया? मैं भी तो शेष बच्चों की तरह ही दुबला पतला किशोर था, उन्होंने कैसे जाना कि मैं स्टूडेंट नहीं उपद्रवकारी हूँ। मैं उस वक्त अपने ललाट पर तिलक और केसरिया पट्टी जो सिर पर बाँध रखी थी, उसे तो भूल ही चुका था, पुलिसकर्मी मुझ पर धुआँ धार लाठियाँ फटकार रहे थे, मैं गिरते पड़ते आगे-आगे भाग रहा था और वे पीछे-पीछे। अनगिनत लाठियों के वार से उठे दर्द से बिलबिलाता, पुलिस से बचता बचाता मैं भाग कर किसी तरह मानिकनगर होकर महात्मा गाँधी अस्पताल पहँुच गया, जहाँ पर सैंकड़ों की तादाद में आक्रोशित हिन्दू खड़े थे, दोनों मृतकों की लाशें वहाँ पहँुच चुकी थी, कई सारे घायल लोग भी वहाँ लाए जा रहे थे, मैं भी लहूलुहान था, मेरा भी प्राथमिक उपचार किया गया, वहाँ से मुझे संघ कार्यालय पहँुचाया गया, जहाँ पर कफ्र्यू के अगले पाँच दिनों तक मेरी चोट खाई पीठ की मालिश की गई, पंचमुखी बालाजी रिको एरिया के महंत लाल बाबा प्रेमदास महाराज भी हमारे साथ थे और भी लोग थे, किसी तरह वे बुरे दिन बीते, दर्द निवारक गोलियों से दर्द गया तो घर की याद आई, गाँव लौट कर आया, इस पूरे घटनाक्रम से मन में अजीब सा महसूस होने लगा, लगने लगा कि किसी न किसी दिन या तो पुलिस के हाथों अथवा विधर्मी लोगों के हाथों मारा जाऊँगा, हालाँकि उन दिनों बहुत बेचैनी थी फिर भी संघ के प्रतिष्ठा और समर्पण में कोई कमी नहीं आई थी, संघ कार्य को भगवान का काम मानने की प्रवृति इतनी हावी थी कि आरएसएस के खिलाफ एक भी शब्द मुझे बर्दाश्त नहीं होता था, मेरे पिताजी जो कि जन्मजात कट्टर किस्म के कांग्रेसी थे, जो मुझे खाकी नेकर और काली टोपी पहने शाखा में जाते वक्त अक्सर रोकते थे और टोकते हुए कहते थे-यह तुम्हारी बनिया बामन पार्टी कभी हम किसानों और नीची जात वालों की सगी नहीं होगी, ये मियाओं से लड़ाने के लिए हमें काम में लेते हैं, खुद तो लड़ नहीं सकते, डरपोक हैं। मुझे अपने पिताजी की बातों में कांग्रेसी शाख की बू आती थी, मुझे लगता था कि वे भी जातिवाद और मुस्लिम तुष्टिकरण की ओछी और घिनौनी राजनीति के एक मोहरे मात्र हैं, उनको राष्ट्रभक्ति का तनिक भी ज्ञान नहीं है, वरना भला भारत माता की सेवा में लगे एक पवित्र और राष्ट्रवादी संगठन के खिलाफ वे ऐसी बातें कह सकते हैं? मैंने उनकी कभी भी इस मामले में बात नहीं मानी, पहली बार आरएसएस की चड्डी पहनने से लेकर अयोध्या भाग जाने और अब जिला मुख्यालय से बुरी तरह से पिटकर आने तक के हर मौके पर वे विरोध में कर रहे थे। वैसे तो वे शुरू से ही मेरे शाखा में जाने के विरोधी ही थे, कभी कभार बहुत नाराज हो जाते तो मुझे और आरएसएस दोनों को ढेर सारी अश्लील गालियाँ देते। मुझे बुरा तो बहुत लगता, मन होता था कह दूँ कि मुझे दे दो गालियाँ पर संघ को क्यों देते हो? पर सच बताऊँ तो कभी इतनी हिम्मत नहीं हो पाई, सो मन ही मन कुढ़ता रहता था। शायद वे चाहते थे कि या तो मैं पढूँ अथवा खेतों में काम में मदद करूँ, पर मैं सोचता कि-मैं और खेतों में काम? मैं संघ जैसे महान संगठन का स्वयंसेवक, राष्ट्र निर्माण में निमग्न और वे चाहते हैं कि मैं मानव निर्माण की इस फैक्टरी को छोड़ कर उनके साथ भेड़ें चराऊँ? मैं प्रचारक बनने की क्षमता वाला इन्सान चरवाहा बन जाऊँ, नहीं बाबा नहीं, यह कभी भी नहीं होगा, मैंने ठान लिया था कि संघ कार्य जिन्दगी में कभी भी नहीं छोडूँगा, परम पूज्य डाक्टर केशव बलिराम हेडगेवार जी ने कहा था कि संघ का कोई भी स्वयंसेवक होता या नहीं होता, वह काम करे या नहीं करे सदैव ही स्वयंसेवक बना रहता है, इसलिए मैं तो सदा सदा स्वयंसेवक बना रहूँगा और सक्रिय ही रहूँगा। पिताजी और घर वाले कुछ भी सोचें या कहें, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, वैसे भी उन जैसे कांग्रेसियों को कभी संघ का ईश्वरीय काम समझ में न तो आया है और न ही आएगा, हम पिता पुत्र के बीच का रिश्ता भी कांग्रेस-आरएसएस के बीच के रिश्ते जैसा रूप लेता जा रहा था, उनका टोकना और चेताना जारी था और मेरी नहीं मानने और अधिकाधिक संघ कार्य में जुटे रहने की जिद जारी थी।
 जब मेरे गाँव आई अस्थि कलश यात्रा
    अयोध्या में मरे कारसेवकों और भीलवाड़ा में मारे गए रतन लालों को हुतात्मा (शहीद आत्मा) घोषित किया जा चुका था, अब उनकी हड्डियों की कलश यात्रा गाँव-गाँव घुमाई जा रही थी, साधु-संत, संघ, विहिप के पदाधिकारी गण और नौजवान स्वयंसेवक इस यात्रा में साथ चल रहे थे, गाँव-गाँव घूमते हुए मेरे गाँव भी आ पहँुची रामभक्तों की अस्थि कलश यात्रा, रात के 9 बजे मेरे गाँव पहँुचने पर यात्रा का हमने भव्य स्वागत किया, हम युवाओं ने अपनी दलित बस्ती को फूल पत्तियों की बन्दनवार से सजाया, ढोल, थाली, मांदल और शंख बजाते हुए नाचते गाते हुए हमने यात्रा का ‘न भूतो ना भविष्यति’ सत्कार किया। सभा हुई, अयोध्या के राम जन्मस्थल पर मुल्ला यम सिंह सरकार की पुलिस द्वारा की गई बर्बरता पर एक फिल्म का प्रदर्शन किया गया और बाद में संतों और अन्य हिन्दू नेताओं ने भीलवाड़ा में हुए पुलिसिया अत्याचार का बेहद मार्मिक वर्णन किया, मजे की बात यह थी कि उस दिन हुए उपद्रव के दौरान इनमंे से एक भी व्यक्ति को कोई चोट नहीं पहँुची थी लेकिन ऐसा आँखों देखा हाल प्रस्तुत किया कि मौजूद लोगों की ऑंखें भर आईं, हालाँकि मैं खुद भीलवाड़ा में पुलिस जुल्म का शिकार हुआ था, लेकिन इतने मार्मिक अंदाज में मैं भी इस बात को नहीं रख पाता, जितने अच्छे तरीके से उन लोगों ने रखा, जो वहाँ उस रोज मौजूद ही नहीं थे, शायद यही ट्रेनिंग है जो संघ में सीखनी पड़ती है, विद्वान लोग जल्दी ही सीख जाते हंै, वैसे भी इस देश में भूख पर भाषण भूखे इन्सान से ज्यादा अच्छा वे लोग देते हैं जिनका पेट भरा होता है, यहाँ भी वही हो रहा था, हृदय को छू लेने वाले भाषण ‘हिन्दुवः सोदरा सर्वे ‘मतलब कि’ हिन्दू-हिन्दू भाई भाई के नारे लगाए गए, हिन्दू समाज में फैली असमानता की सामाजिक विकृति पर प्रहार किया गया, हिन्दू एकता और संगठित रहने पर बल देते हुए तथा सभी वंचित समुदायों के समाज जनों को गले लगाने के आह्वान के साथ सभा का समापन हुआ।
    सभा की समाप्ति पर मैंने सब लोगों से अपने घर भोजन करने का आग्रह किया, हमने अपने घर पर खीर पूरी का भोजन सबके लिए तैयार किया था, जब खाना बन रहा था, तब भी आदतन पिताजी ने टोका टोकी की थी कि-‘क्यों खाने का सामान खराब कर रहे हो, ये लोग यहाँ नहीं खाने वाले हैं, पाखंडी हैं सब, बोलते कुछ हैं और करते कुछ और ही हैं, इनके अन्दर हमारे लिए जहर भरा हुआ है। मैं जल भुन गया, पहली बार मैंने अपनी तमाम ताकत बटोर कर आखिर प्रतिवाद कर ही दिया-आप क्या जानते हैं संघ के बारे में? मैं पाँच साल से उनके साथ हूँ, उनके सबसे बड़े कार्यालय का प्रमुख हूँ, कितने ही स्वयंसेवकों के घर जा कर मैंने खाना खाया है, हमारे संघ में आपके गाँव की तरह छुआछूत और जाति भेदभाव नहीं चलता है, यह सब आपकी कांग्रेस की देन है, पिताजी बोले-‘बेटा कांग्रेस तो हम नीची कौम के लिए माँ का पेट है, तुम इसे कभी नहीं समझोगे। अच्छी बात है अगर तुम्हारी संस्था में सब जातियाँ बराबर हो गई है, तो बनाओ खाना मुझे भी उन्हें खिला कर खुशी होगी, हम बाप बेटे के बीच में यह एक प्रकार का युद्ध विराम था मैं भी राजी और वे भी नाराज नहीं, खाना तैयार था और अब खाने वाले भी तैयार होने वाले थे। मैं बेहद प्रसन्नता और विजयी मुद्रा में भाग-भाग कर काम कर रहा था मैं अपनी जिन्दगी में पहली और आखिरी बार शायद इस अस्थि कलश यात्रा के उसी दिन नाचा भी और गाया भी। मैंने ही आज की सभा का संचालन भी किया था ,मेरे उत्साह और हर्ष की कोई सीमा नहीं थी, मुझे लग रहा था कि मेरे घर रामभक्त नहीं बल्कि साक्षात् भगवान श्री राम पधार रहे हैं ठीक वैसे ही जैसे शबरी के बेर खाने उसकी झोंपडी चले गए थे राम। मैं मन ही मन इसलिए भी खुश था कि आज अपने कांग्रेसी पिता को मैं गलत साबित करने जा रहा था, मैंने उनके प्रभुत्व वाले कांग्रेसी गाँव में हिन्दुत्व का झंडा गाड़ दिया था आज की इस श्रद्धांजलि सभा का सफल आयोजन हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की दिशा में बढ़ता हुआ सफल कदम था, मैंने अपने घर के मुख्य दरवाजे पर आज ही दो स्टीकर लगाए थे-गर्व से कहो हम हिन्दू हैं और बड़े भाग्य से हम हिन्दू हैं।
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

मंगलवार, 22 जुलाई 2014

गुजरात पुलिस - देश का गौरव

मोदी ने कहा था कि गुजरात की पुलिस- देश का गौरव है किन्तु उच्चतम न्यायलय द्वारा आतंकी मामलों ने आ रहे निर्णयों से यह साबित हो रहा है कि गुजरात पुलिस पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर एक संप्रदाय विशेष के लोगों को विभिन्न आतंकी घटनाओ में फंसा दिया था . जिसमें कथित आतंकियों को दस दस साल से अधिक समय से कारागार में बिताने पड़े और उनकी छवि खराब हुई , जीवन नष्ट हुआ . 
17 जुलाई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में, 'दोहरे बम विस्फोटों' सूरत बम विस्फोट में कथित संलिप्तता के लिए अक्टूबर 2008 में एक टाडा अदालत ने दोषी करार दिया और सजा सुनाई थी, उन सभी ग्यारह व्यक्तियों को बरी कर दिया गया है 1993 के विस्फोटों में सभी अभियुक्त जेल गए थे  उन सभी लोगों को उच्चतम न्यायलय ने बरी कर दिया है.
 कांग्रेस के पूर्व मंत्री मोहम्मद सुरती सहित ग्यारह व्यक्तियों, सुप्रीम कोर्ट ने निर्दोष पाया और बरी कर दिया यहां तक ​​कि  हथियारों की बरामदगी संतोषजनक ढंग से व ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित नहीं किया . इस तरह की स्थिति में सजा नहीं दी जा सकती है.
 सुप्रीम कोर्ट ने 2002 अक्षरधाम आतंकी मामले में गुजरात पुलिस निर्णय पारित किया है. अक्षरधाम में जांच डीजी वंजारा और जीएल सिंघल के (नकली) मुठभेड़ विशेषज्ञ टीम द्वारा आयोजित किया गया. बरी करते हुए 16 मई 2014, पर सभी छह अक्षरधाम मामले में मौत की सजा सुनाई थी, जो तीन सहित आरोपी, सुप्रीम कोर्ट ने यह अक्षरधाम मामले की जांच का आयोजन किया जिसके साथ अक्षमता के लिए गुजरात पुलिस की खिंचाई की. न्यायमूर्ति ए.के. की बेंच पटनायक और जस्टिस वी गोपाल गौड़ा ने कहा कि 
सही जांच स्तर से पोटा, विशेष न्यायालय (पोटा) और पुष्टि द्वारा आरोपियों को सजा और सजा देने के तहत आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए राज्य सरकार द्वारा मंजूरी देने के लिए, विभिन्न चरणों में इस मामले के विचारण में प्रतिकूलता उच्च न्यायालय द्वारा एक ही की.  सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबका मौलिक अधिकार है और इस देश के नागरिकों के बुनियादी मानवाधिकारों के ऐसे घोर उल्लंघन हमारे सामने प्रस्तुत किया गया. हम हाथ जोड़कर बैठने के लिए पैसा नहीं दे सकते.
राष्ट्र की अखंडता और सुरक्षा से जुड़े इस तरह के एक गंभीर प्रकृति के मामले की इसके बजाय इतने सारे कीमती जान लेने के लिए जिम्मेदार वास्तविक अपराधियों को जेल भेजने की जगह पुलिस ने  निर्दोष लोगों को पकड़ लिया और उनको गंभीर आरोपों में निरुद्ध किया और बाद में सजा कराई .
सूरत में बरी किए जाने के मामले विस्फोटों और अक्षरधाम मामलों गुजरात पुलिस वर्षों में फंसाने के लिए निर्दोष लोगों को टाडा और पोटा जैसे तथाकथित 'आतंक कानूनों' के साथ दुर्व्यवहार किया गया है कि कैसे दिखा. कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के 2002 में पोटा के लागू होने का विरोध किया था और भाजपा राजग सरकार पारित कानून लाने के लिए संसद के संयुक्त सत्र आयोजित करने के लिए मजबूर किया गया था का नेतृत्व किया. यह इसके पहले पोटा के रूप में बुरा था, जो टाडा, अधिनियमित किया था यह भी याद रहे कि कांग्रेस टाडा का विरोध किया था, हालांकि सभी लोकतांत्रिक ताकतों ने इन काले कानून और अलोकतांत्रिक कानून को लागू होने से रोकने के लिए कांग्रेस के प्रयासों की सराहना की थी. "आतंकवाद" "कानून" से नहीं रोका जा सकता है क्योंकि टाडा और पोटा जैसे कठोर कानून भी दुरुपयोग किया जा सकता है! टाडा के दुरुपयोग से हजारों निर्दोष व्यक्तियों, श्रमिकों के हजारों किसानों को जेल जाना पड़ा था और 1989 में भाजपा ने भी टाडा को समाप्त करने के अभियान का नेतृत्व किया था. 
लेकिन सत्ता में आने के बाद,  भाजपा राजग पोटा अधिनियमित और गुजरात में निर्दोष सैकड़ों मुसलमानों के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया और दो ​​समुदायों विभाजित किया.  झारखंड, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गरीब आदिवासियों की तरह अन्य राज्यों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और पोटा के तहत गिरफ्तार किया गया यहाँ तक उनको भी गिरफ्तार किया गया जो सत्तारूढ़ दल का हिस्सा थे जैसे वाइको ,यह इसलिए पोटा का विरोध और लोकतंत्र का लबादा पहनने के लिए कांग्रेस ने अपना रुख बदला 
यह कि टाडा और पोटा दोनों  निरस्त कर दिया गया है  यह की कई निर्दोष लोगों को अभी भी देश भर की जेलों में सड़ना पड़ रहा है. क्यों है.

सुमन 
लो क सं घ र्ष !

नोट  http://www.truthofgujarat.com/supreme-court-exposes-gujarat-polices-blatant-abuse-terror-laws-like-pota-tada/#more-4848 
का संक्षिप्त अनुवाद गूगल की मदद से किया गया है .

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --7

अम्बेडकर छात्रावास में विचारधारा भ्रष्ट हो जाएगी
    गाँव से जो संघ के साथ सफर शुरू हुआ, वह तहसील मुख्यालय मण्डल होते हुए जिला स्तर भीलवाड़ा तक पहुँच गया, भीलवाड़ा शहर में मैं अम्बेडकर आवासीय छात्रावास का छात्र था, पर वहाँ भी आरएसएस के ही गुणगान करता था, चूँकि मैं नेकर पहन कर रोज शाम शाखा में जाता था, इसलिए कुछ सीनियर छात्र मुझे चड्डा साहब कह कर भी चिढ़ाते थे, लेकिन मुझमें श्रेष्ठता का भाव इतना प्रबल हो चुका था कि मैं अपने आगे सब को हीन मानता था, मुझे लगता था कि ये तुच्छ लोग अभी जानते नहीं हैं कि मैं कितनी महान ईश्वरीय कार्य योजना का हिस्सा हूँ, जिस दिन जान जाएँगे, ये सब लोग नतमस्तक हो जाएँगे। मैं अपनी ही धुन में सवार था, दलित और आदिवासी समुदाय के कई अन्य छात्र जो मेरे साथ हाॅस्टल में रहते थे, मैं उन्हें हिन्दुत्व की विचारधारा के बारे में जानकारियाँ देता था, उनमें से दो चार को तो मैं शाखा में ले जाने में भी सफल रहा, लेकिन वे जल्दी ही भाग छूटे, उन्हें संघ के ड्रेस और तौर तरीके पसंद नहीं आए फिर भी मैं डटा हुआ था, इस बीच भीलवाड़ा के नगर प्रचारक जी का आगमन हमारे छात्रावास में हुआ, मैं तो बहुत खुश था कि प्रचारक महोदय हमारे द्वार आ रहे हैं, वे वाकई आए, उन्होंने अम्बेडकर छात्रावास के स्टूडेंट्स के रंग ढंग देखे और मुझसे बोले-आपको यहाँ नहीं रहना चाहिए, इस अम्बेडकर छात्रावास में तो आपकी विचार धारा ही भ्रष्ट हो जाएगी। अब मैं विचारधारा को बचाने के लिए अम्बेडकर छात्रावास छोड़कर आरएसएस के जिला कार्यालय पहँुच गया था, जहाँ पर जल्दी ही मुझे जिला कार्यालय प्रमुख का दायित्व मिल गया, मुझमें शुद्धता और श्रेष्ठता का भाव और सघन हो गया, मुझे अपने हिन्दू होने पर बड़ा गर्व पैदा हो गया था, मैं खुद को सौभाग्यशाली मानता था, मानू भी क्यों नहीं क्योंकि मेरे मन में समाया हुआ था कि हम हिन्दुओं ने ही दुनिया को सभ्यता सिखाई, हमने अंक और दशमलव दिया, हमारे वेद ईश्वरीय हैं, जिनके मुकाबले ज्ञान में विश्व के सभी धर्म ग्रन्थ बौने दिखाई पड़ते हैं, हमारे यहाँ हर प्राणी में भगवान माने गए और नारियों को देवियाँ, ऐसी महानतम संस्कृति का हिस्सा होना सबसे अधिक पुण्य और गर्व का ही तो काम है, उन दिनों हिंदी हिन्दू हिन्दुस्थान-माँग रहा है सकल जहान  जैसे नारे लगा कर सीना फूल जाता था, संघ से पूरी तरह से सराबोर हो जाने के कारण किसी और विचार के लिए मेरे दिमाग में जगह ही नहीं बची थी। इसीलिए मनुस्मृति पर गर्व करना तो आ गया पर भारत का संविधान किस चिडि़या का नाम है, यह पता ही नहीं था, उन दिनों मैंने महाराणा प्रताप का यशोगान तो खूब गाया, पर भीलू राना पूंजा के बारे में कुछ भी नहीं जाना। मीरा के प्रेम और भक्ति के पद पायोजी म्हे तो राम रतन धन पायो तो याद रहा पर संत रैदास से जान पहचान ही नहीं हो सकी, खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झाँसी वाली रानी थी, की कीर्ति पताका तो फहराई, लेकिन कौन थी झलकारी बाई, कुछ पता नहीं लगा, अगर जाना भी तो वंचितों का यही इतिहास, जिसमें राम को जूठे बैर खिलाती शबरी, द्रोणाचार्य को श्रद्धावनत होकर अँगूठा काट कर देता गुरु भक्त एकलव्य, सीना चीरकर स्वामिभक्ति का प्रदर्शन करते हनुमान, कपडे़ धोते धोबी, जूते बनाता चर्मकार, सफाई करता स्वच्छकार यानी कि वही प्राचीन जाति व्यवस्था और वही पुश्तैनी कर्म!
    उन दिनों मेरे आदर्श अम्बेडकर, फुले, कबीर या बुद्ध नहीं थे, क्योंकि इन्हें तो जाना ही नहीं, जिन्हें जान पाया वे राष्ट्रनायक थे सावरकर, तिलक, गोखले और हेडगेवार तथा गुरूजी गोलवलकर ये ही आदर्श थे और ये ही मेरी प्रेरणा के स्रोत थे, नगर प्रचारक जी ने सही ही कहा था कि अगर मैं अम्बेडकर छात्रावास में टिक जाता तो शायद मेरी विचारधारा जल्दी ही भ्रष्ट हो जाती।
आचार्य रजनीश, आरएसएस और मैं
    विचारधारा की चूल हिलने की शुरुआत मेरे संघ कार्यालय में रहते हुए अनायास ही हो गई, उन्हीं नगर प्रचारक महोदय के साथ एक दिन मैं तीरथ दास जी नामक स्वयंसेवक के घर गया, जो हाल में ओशो रजनीश से प्रभावित होकर संघ कार्य में शिथिलता बरतने लगे थे, हम उन्हें समझाने और वापस सही रास्ते पर लाने गए, हमें लगा कि वे वैचारिक विचलन के शिकार हो गए हैं, उनसे नगर प्रचारक जी ने लम्बी बातचीत की, लेकिन वे टस से मस भी नहीं हुए, आते वक्त उन्होंने एक अखबार ओशो टाइम्स भेंट किया, जो प्रचारक जी ने तो हाथ में भी नहीं लिया पर मैं ले आया और जिला कार्यालय में बैठ कर पढ़ने लगा, प्रचारक जी को यह सहन नहीं हुआ, उन्होंने ओशो टाइम्स मेरे हाथों से छीनकर फेंकते हुए कहा-यह आदमी विचारों में भटकाव लाता है, गुमराह कर देता है, इसको जिन्दगी में कभी मत पढ़ना।
    मैं स्तब्ध रह गया, मेरे मन में यह सवाल उठा कि पढ़ने से विचारधारा में भटकन कैसे आ सकती है? इस एक घटना ने मेरी रुचि ओशो के साहित्य में जगा दी, मैंने चोरी छिपे ओशो टाइम्स पढ़ना शुरू कर दिया और इस तरह मेरे मस्तिष्क की अन्य खिड़कियाँ भी खुलने लगी और संघ की पवित्र और शुद्ध विचारधारा अंततः भ्रष्ट होने लगी।
गुलमंडी क्या पाकिस्तान में है ?
    मेरे प्रचारक बनने का सपना भले ही धराशायी हो गया था और थोड़ा बहुत ओशो को भी पढ़ने लगा था, मगर संघ, राष्ट्र निर्माण और हिन्दुत्व से मोह बरकरार था, अम्बेडकर छात्रावास छोड़ देने के बाद पूरी तरह से आरएसएस के जिला कार्यालय में रहते हुए एक निष्ठावान स्वयंसेवक के तौर पर मैं अब भी कार्यरत था। किसी विकल्प या वैकल्पिक विचारधारा के बारे में सोचने जितना खुलापन अभी नहीं आ पाया था इसलिए हिन्दू राष्ट्र के निर्माण हेतु रात दिन लगा हुआ ही था, अयोध्या की पहली कारसेवा की असफलता के बावजूद देश भर में राम मंदिर बनाने के लिए हिन्दू जन मानस में उबाल आया हुआ था, संघ परिवारीय संस्थाएँ मंदिर बनाओ या गद्दी छोड़ो आन्दोलन चला रही थीं। 12 मार्च 1992 का दिन था, हम राम मन्दिर निर्माण की माँग को लेकर एक विशाल जुलूस सांगानेरी गेट भीलवाड़ा से प्रारम्भ करके मुस्लिम बहुल इलाके गुलमंडी में होते हुए जिला कलेक्टर कार्यालय तक ले जाना चाहते थे, हजारों की तादाद में उत्साही रामभक्त सिर पर भगवा पट्टी बांधकर सौगन्ध राम की खाते हैं, के नारे लगाते हुए दूधाधारी मन्दिर के बाहर खड़ेे थे। हालाँकि प्रदेश में भाजपा का राज था, ौरों सिंह शेखावत मुख्यमंत्री थे और बंशी लाल पटवा भीलवाड़ा के विधायक, मतलब यह कि प्रदेश में अपनी ही सरकार थी, लेकिन पुलिस वाले रास्ता रोके खड़े थे, जुलूस आगे नहीं बढ़ने दिया जा रहा था।
    उस दिन शुक्रवार था, जुम्मे की नमाज और हमारे जुलूस का वक्त लगभग एक ही होने की वजह से पुलिस को कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती नजर आ रही थी, इसलिये प्रशासन हम आन्दोलनकारियों को समझाने की कोशिश में लगा था, पुलिसया रिपोर्टों ने दोनों समुदायों के बीच भिडंत की आशंका जताई थी, पुलिस ने राम के भक्तों से रास्ता बदल देने का आग्रह किया, पर स्टेट में संघ की ही सत्ता थी, इसलिए हम तो बेखौफ थे पुलिस जरुर दबी हुई सी थी, उनके आला अधिकारियों ने हमारे बड़े नेताओं से खूब मिन्नतें की, हम कहाँ मानने वाले थे। हमने रास्ता बदलने से यह कह कर साफ इंकार कर दिया कि हमारा जुलूस गुलमंडी में क्यों होकर न जाएँ, वह क्या पाकिस्तान में है? हमने कहा-जाएँगे तो उधर से ही, चाहे जो हो जाएँ। अभी पुलिस और रामभक्तों में तकरार चल ही रही थी कि जुलूस के पीछे से पथराव शुरू हो गया, स्थितियाँ बिगड़ती देखकर पुलिस को लाठी चार्ज करना पड़ा, घुड़सवार पुलिस ने रामभक्तों को निर्ममता से कुचला, फिर भी स्थिति बेकाबू ही बनी रही, हालात और बिगड़े तो हवाई फायर हुए और अंततः कई राउंड गोलियाँ बरसाई गई, जिसमें दो लोग शहीद हो गए। एक खामोर के रतन लाल थे तो दूसरे भीलवाड़ा के रतन लाल, एक सेन थे तो दूसरे जैन, दोनों का ही राम जन्मभूमि आन्दोलन और इस उपद्रव से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं था, हकीकत तो यह थी कि भीलवाड़ा निवासी रतन लाल जैन डेयरी में रात्रिकालीन ड्यूटी करके लौटे थे और दिन के वक्त घर में आराम कर रहे थे, धाय धाय की आवाजों से जगे और बाहर यह देखने निकले कि हो क्या रहा है, इतने में पुलिस की एक गोली उनकी छाती में समा गई, दूसरे खामोर गाँव के निवासी रतन लाल सेन बाजार में खरीददारी करने आए हुए थे और पुलिस की गोली के शिकार हो गए, लेकिन संयोग से दोनों ही मरने वाले हिन्दू थे, इसलिए दोनों को शहीद घोषित करके उनका अस्थि कलश निकाले जाने की घोषणा तुरत फुरत ही कर दी गयी।
    हालाँकि दोनों ही मृतकों का राम जन्मभूमि और संघ परिवार से कोई लेना देना नहीं था, उन्होंने दुर्घटनावश ही अपने प्राण खोए थे मगर फिर भी उन्हें शहीद का दर्जा मिल गया, अच्छा हुआ कि दोनों मरने वाले हिन्दू थे, इसलिए ‘शहीद’ हो गए, मुसलमान होते तो ‘ढेर‘ हो जाते।
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित

रविवार, 20 जुलाई 2014

पिछले जन्म के पाप पीछा नही छोड़ रहे है


पिछले जन्म  के पाप प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर मोदी का पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। गुजरात में हिन्दू , मुस्लिम आर्थिक अपराधियों का समूह सदैव उनकी सरकार का समर्थन करता रहा है क्यूंकि उसके द्वारा किये जा रहे अपराधों को संरक्षण राज्य सरकार का मिलता रहा है।  तुलसी, सोहराबुद्दीन एनकाउंटर का राज हिन्दू- मुस्लिम एकता नहीं थी बल्कि मोदी सरकार की तरफ से वसूली अभियान के हिसाब किताब में बेईमानी करने की सजा दी गयी थी  
नव भारत टाइम्स के अनुसार गुजरात में हवाला के जरिए 5 हजार 395 करोड़ रुपये के लेन-देन का पता लगाया है और इस मामले में 79 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र जारी किए गए हैं। अधिकारियों ने इसे देश का सबसे बड़ा हवाला घोटाला करार दिया है जांच अधिकारियों के मुताबिक राज्य में हवाला के जरिए सोना और प्रॉपर्टी के लेन-देन का धंधा किया जा रहा था। इस काम के लिए पिछले साल दिसंबर और इस साल जनवरी, फरवरी में सूरत में आईसीआईसीआई बैंक के दो ब्रांच का इस्तेमाल किया गया।
अहमदाबाद में ईडी के अधिकारियों ने बताया कि इस मामले की जांच आईसीआईसीआई बैंक द्वारा सूरत में दर्ज कराई गई एफआईआर के बाद शुरू हुई।
इस मामले में शुक्रवार को 79 आरोपियों के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल किए गए हैं। मामले के तीन मुख्य आरोपियों में से 2 को गिरफ्तार कर लिया गया है और एक अभी भी फरार है।
इनमें से अफरोज हसन फट्टा को दो महीने पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था और मदन जैन को गुरुवार को गिरफ्तार किया गया। एक अन्य मुख्य आरोपी बिलाल हारून गिलानी अभी फरार है।
आपको बता दें कि अफरोज फट्टा हीरा कारोबारी हैं और पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान नरेंद्र मोदी के साथ उनकी फोटो आने के बाद काफी विवाद हुआ था।
कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी पर सूरत के हवाला कारोबारी अफरोज फट्टा से करीबी रिश्ते होने का आरोप लगाया था। कांग्रेस ने मोदी के विकास यात्रा के दौरान मंच पर अफरोज के साथ मोदी एक की तस्वीर भी रिलीज की थी। इससे पहले मार्च में ईडी(एनफोर्समेंट डायरेक्टॉरेट) ने सूरत में अफरोज के घर पर छापा मारकर 700 करोड़ रुपए जब्त किए थे। 
राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ का हिन्दुवत्व वादी चेहरा यही है।  इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है।  अगर देश के अन्दर आर्थिक अपराधियों को समूल रूप से नष्ट कर दिया जाए तो हिन्दुवत्व की प्रयोगशाला अपने आप नष्ट हो जाएगी।
-सुमन 

शनिवार, 19 जुलाई 2014

मोदी की 2014 विजय: भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव


सामाजिक आंदोलनों के लिए आगे का रास्ता
सन् 2014 के आम चुनाव, इसके पहले के चुनावों से कई मामलों में भिन्न थे। मोदी की दिल्ली की गद्दी की ओर की यात्रा के हर कदम के पहले भारी प्रचार हुआ। जब वे भाजपा की चुनाव प्रचार अभियान समिति के प्रमुख बने तब इसका जमकर ढिंढोरा पीटा गया। वही सब कुछ तब हुआ जब वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित किए गए। चुनाव प्रचार अभियान भी जबरदस्त था। मोदी ने अपने प्रचार में सोशल मीडिया का जमकर उपयोग किया। सैंकड़ों लोगों ने दिन-रात सोशल मीडिया में उनकी ओर से मोर्चा संभाला। उन्होंने अपनी छवि के निर्माण के लिए अमरीकी एजेंसी एप्को की सेवाएं हासिल कीं1। औपचारिक रूप से चुनाव प्रचार शुरू होने के बहुत पहले से ही मोदी का अभियान शुरू हो गया था। उन्हें जनता के सामने ‘विकास’ के पर्यायवाची के रूप में प्रस्तुत किया गया। गुजरात के सन् 2002 के कत्लेआम में उनकी भूमिका को ‘क्लीन चिट’ के नाम पर दबा दिया गया। इस बार आरएसएस, खुलकर मोदी के समर्थन में सामने आया और पोलिंग बूथ से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक उसके स्वयंसेवक सक्रिय हो गए। ‘‘इस बार, 2014 के चुनाव में, राष्ट्रवादी संगठन ने अपने सभी कार्यकर्ताओं और स्वयंसेवकों-जिनकी संख्या 10 लाख से ज्यादा है-अपनी 40 हजार से अधिक स्थानीय इकाईयों, जिन्हें शाखा कहा जाता है, के अतिरिक्त, अपनी विचारधारा से सहानुभूति रखने वालों और समान विचारधारा वाले लोगों को भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी के समर्थन में मिशनरी भाव से जुट जाने को कहा।’’इस चुनाव में पहली बार संघ परिवार की एक सदस्य भाजपा अपने बल पर बहुमत हासिल कर सत्ता में आ सकी। यह आरएसएस के लिए एक बड़ी सफलता है जो अलग-अलग रास्तों से हिन्दू राष्ट्र के अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए सन् 1925 से काम कर रहा है।

पृष्ठभूमि
मोदी एक प्रशिक्षित आरएसएस प्रचारक हैं और हिन्दू राष्ट्रवाद के रास्ते हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के प्रति प्रतिबद्ध हैं।3 सन् 1980 के दशक से कई वैष्विक व स्थानीय कारकों के चलते, दकियानूसी मध्यमवर्ग, छोटे उद्योगपतियों, समृद्ध किसानों और धनी पेशेवरों के वर्गों का उदय हुआ। ये सभी वर्ग यथास्थितिवाद की राजनीति के हामी थे। इसी दौरान वैष्विकरण का जाल फैल रहा था और श्रमिक आंदोलनों पर हमले बढ़ रहे थे। इसी दौर में आरएसएस व विहिप ने धार्मिकता का झंडा उठा लिया।शाहबानो के बहाने आरएसएस ने धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ तीखा संघर्ष प्रारंभ कर दिया। वह छद्म धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों का तुष्टिकरण जैसी शब्दावली का इस्तेमाल करने लगा। इस सब के बीच शुरू हुई आडवाणी की रथयात्रा।4 यही वह समय था जब देश, अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए आरक्षण व श्रमिकों के अधिकारों जैसे मुद्दों में उलझा हुआ था। महिलाओं और आदिवासियों के अधिकारों की चर्चा भी हो रही थी। जिस देश के लोगों की मूलभूत
आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो रही थीं और जहां कमजोर वर्गों के मानवाधिकारों की रक्षा एक कठिन कार्य बना हुआ था; वहां संघ परिवार ने हिन्दुओं के एक तबके की पहचान से जुड़े मुद्दों को समाज के लिए सबसे महत्वपूर्ण बनाने का षड़यंत्र शुरू कर दिया। इसके साथ ही, धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध दुष्प्रचार शुरू हुआ, इतिहास का तोड़ा-मरोड़ा गया संस्करण जनता के सामने परोसा जाने लगा और पीडि़तों को दोषी बताया जाने लगा। आडवाणी की रथयात्रा ने अल्पसंख्यकों के विरूद्ध नफरत को और बढ़ावा दिया और हिंसा की कई घटनाएं हुईं।
राममंदिर अभियान का एक प्रमुख नतीजा यह हुआ कि मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दे पृष्ठभूमि में चले गए। रोटी, कपड़ा और मकान के मसले गौण हो गए व सामाजिक-राजनीतिक एजेण्डा के केन्द्र में आ गए पहचान से जुड़े मुद्दे। आरएसएस ने अपनी सांप्रदायिक राजनीति को जमकर हवा देनी शुरू की और इसी के हिस्से के रूप में आदिवासी क्षेत्रों में ईसाईयों के विरूद्ध हिंसा में तेजी से बढ़ोतरी हुई। यह मात्र संयोग नहीं है कि यह वही क्षेत्र हैं जहां बड़े औद्योगिक घराने अपने उद्योग स्थापित करना चाहते हैं और इसके लिए उन्हें आदिवासियों की जमीनों पर कब्जा करने या प्राकृतिक संसाधनों को लूटने में कोई संकोच नहीं है। 
संघ परिवार और हिन्दू राष्ट्रवाद का एजेण्डा
आरएसएस की शुरूआत, आजादी के आंदोलन के दौरान एक ऐसे संगठन के रूप में हुई जो महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन के खिलाफ था, भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा का विरोधी था और प्राचीन हिन्दू राजाओं व पशुपालक आर्यों के युग और हिन्दू धर्मग्रन्थों के महिमामंडन में विष्वास रखता था। आरएसएस की स्थापना उन लोगों ने की जो दलितों के उनके भू-अधिकार हासिल करने के आंदोलन और ब्राह्मणवाद के खिलाफ समाज में उठ रहे स्वर को दबाना चाहते थे। गैर-ब्राह्मणों के आंदोलनों के प्रणेता थे जोतिबा फुले और डाक्टर अंबेडकर। जैसे-जैसे आम लोग स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ते गए, ऊँची जातियों के श्रेष्ठी वर्ग को यह आशंका होने लगी कि समाज पर उसका प्रभुत्व खतरे में है। अंततः, इन्हीं वर्गों ने आरएसएस की स्थापना की। इस संगठन ने अपनी शाखाएं आयोजित करनी शुरू कीं और अपना एक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम तैयार किया, जिसका मूलभाव यह था कि भारत अनादिकाल से हिन्दू राष्ट्र है। आरएसएस को स्वाधीनता आंदोलन में सभी धर्मों के लोगों की भागीदारी नहीं भाती थी। उन्होंने लड़कों और युवाओं को स्वयंसेवक के रूप में प्रशिक्षित करना शुरू किया। ये लोग यह शपथ लेते थे कि वे हिन्दू राष्ट्र के लिए काम करेंगे। वे स्वाधीनता आंदोलन में हिस्सेदारी नहीं करते थे। आरएसएस की स्थापना चितपावन ब्राह्मणों ने की थी और वह केवल पुरूषों का संगठन है।
आरएसएस ने अपने अधीन कई संगठनों की स्थापना की। इनमें शामिल थी राष्ट्रसेविका समिति, जो कि महिलाओं के लिए है। ज्ञातव्य है कि इसके नाम में ‘स्वयं’ शब्द गायब है। आरएसएस, पुरूषों के प्रभुत्व वाला पितृसत्तात्मक संगठन है। उसकी यह मान्यता है कि महिलाओ का समाज में दोयम दर्जा है और उन्हें पुरूषों के अधीन ही रहना चाहिए। आगे चलकर आरएसएस ने अपनी छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का गठन किया। उसके बाद उसने हिन्दू महासभा के साथ मिलकर भारतीय जनसंघ बनाया, जो कि वर्तमान भाजपा का पूर्व अवतार है। उसने विश्व हिन्दू परिषद का निर्माण किया जिसका उद्देश्य हिन्दुओं के विभिन्न पंथों को आरएसएस के नियंत्रण में लाना था। उसने आदिवासियों का हिन्दूकरण करने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम की स्थापना की और सड़कों पर गुंडागर्दी के लिए बजरंग दल बनाया। इसी तरह, दुर्गावाहिनी आदि जैसे कई संगठन स्थापित किए गए।
इसी तरह आरएसएस ने अपने विचारों का प्रसार-प्रचार करने के लिए भी कई संस्थाएं और संगठन स्थापित किए। इनमें शामिल हैं साप्ताहिक पाञ्चजन्य व आर्गेनाइजर और आदिवासी क्षेत्रों में एकल विद्यालय व अन्य क्षेत्रों में सरस्वती शिशु मंदिर। संघ ने विभिन्न क्षेत्रों में ब्राह्मणवादी मूल्यों की स्थापना कर अपनी वैचारिकी को मजबूती दी। स्वयंसेवकों ने राज्य के तंत्र, पुलिस, सेना व नौकरशाही में गहरे तक घुसपैठ कर ली।
वैचारिक घुट्टी
अपनी शाखाओं के द्वारा संघ, अल्पसंख्यकों के विरूद्ध घृणा फैलाने लगा। उसने धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों और भारतीय संविधान का भी विरोध करना शुरू  कर दिया। उसने संचार के लगभग हर माध्यम का प्रयोग किया। उसने ‘आईटी मिलन’ आयोजित कर सूचना प्रौद्योगिकी पेशेवरों में अपनी पैठ स्थापित कर ली। संघ परिवार ने सोशल मीडिया का भी अत्यंत प्रभावकारी ढंग से इस्तेमाल किया। इस सब का नतीजा यह हुआ कि समाज पर पुरातनपंथी और दकियानूसी सोच हावी हो गई। आरएसएस ने हिन्दुत्व शब्द को भी लोकप्रिय बनाया। हिन्दुत्व, दरअसल, जातिगत व लैंगिक पदानुक्रम के ब्राह्मणवादी मूल्यों पर आधारित राजनीति का नाम है। विभ्रम के शिकार कई लोग, हिन्दुत्व को ‘जीवन पद्धति’ बताते हैं।
सन् 1960 व 1970 के दशक में, देश में हिंसा की छुटपुट घटनाएं हुईं। इनके चलते धार्मिक समुदायों का ध्रुवीकरण हो गया और साम्प्रदायिक पार्टी की शक्ति में वृद्धि की जमीन तैयार हो गई। सन् 1980 के दशक में, जैसे-जैसे राममंदिर आंदोलन जोर पकड़ता गया वैसे-वैसे हिंसा बढ़ने लगी। उत्तर भारत के कई
शहरों में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई। परंतु बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने के बाद हुई हिंसा अभूतपूर्व थी। मुंबई, भोपाल और सूरत जैसे शहरों में हुई हिंसा की भयावहता और क्रूरता को शब्दों में बयान करना मुश्किल है। गोधरा ट्रेन आगजनी के बहाने गुजरात में भड़काई गई हिंसा ने देश का सिर शर्म से झुका दिया।
मोदी, गुजरात हिंसा और उसके बाद
गोधरा के बाद हुई हिंसा इस बात का उदाहरण थी कि राज्य, किस प्रकार, सक्रिय रूप से हिंसा को प्रोत्साहन दे सकता है। उसके पहले तक देश में जब भी सांप्रदायिक हिंसा होती थी, पुलिस व राज्यतंत्र या तो मूकदर्शक  बना रहता था अथवा दंगाईयों का साथ देता था। परंतु गुजरात में मोदी के नेतृत्व में राज्यतंत्र ने हिंसा को खुलकर बढ़ावा दिया। यद्यपि यह दावा किया जाता है कि गुजरात दंगों की जांच के लिए नियुक्त विशेष  जांच दल ने मोदी को क्लीनचिट दे दी है तथापि उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त न्यायमित्र राजू रामचंद्रन ने यह मत व्यक्त किया है कि एसआईटी की रपट के आधार पर मोदी के विरूद्ध मुकदमा चलाया जा सकता है।हिंसा के बाद गुजरात सरकार ने पीडि़तों के पुनर्वास की अपनी जिम्मेदारी से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया। धार्मिक अल्पसंख्यकों को समाज के हाषिए पर पटक दिया गया। अहमदाबाद में बड़ी संख्या में अल्पसंख्यक अपने मोहल्लों में सिमटने पर मजबूर कर दिए गए, उनके नागरिक व राजनीतिक अधिकारों को कुचल दिया गया और वे दूसरे दर्जे के नागरिक बना दिए गए। अक्सर यह प्रचार किया जाता है कि मोदी राज में गुजरात तेजी से विकसित हुआ।  तथ्य यह है कि गुजरात, हमेश से विकसित राज्य रहा है। वाइबे्रण्ट गुजरात शिखर बैठकों के जरिये, गुजरात में भारी भरकम निवेश  होने के दावों में कोई दम नहीं है। निवेश के वायदे तो बहुत हुए परंतु उनमें से कम ही जमीन पर उतर सके। गुजरात, सामाजिक विकास के मानकों में अन्य राज्यों से काफी पिछड़ा हुआ है। रोजगार सृजन की दर बहुत नीची है व प्रति व्यक्ति व्यय बहुत कम है। पिछले डेढ़ दशक में गुजरात में लैंगिक अनुपात तेजी से गिरा है और गर्भवती महिलाओं का हीमोग्लोबिन का स्तर बहुत नीचा है।
हिन्दुत्व: चुनावी रणनीति
आरएसएस, चुनाव मैदान में शनैः शनैः उतरा। सन् 1984 के चुनाव में उसने गांधीवादी समाजवाद का नारा दिया और उसे लोकसभा में केवल दो सदस्यों से संतोष करना पड़ा। वहां से शुरू कर, सन् 1996 के चुनाव में उसके 120 सांसद चुनकर आए और वह सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। परंतु कोई भी अन्य दल उसके साथ हाथ मिलाने को तैयार नहीं था और उसकी सरकार गिर गई। ‘तीसरा मोर्चा’ बनाने के कुछ असफल प्रयासों के बाद, भाजपा, राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) बनाने में सफल हो गई। परंतु बदले में उसे राममंदिर, संविधान के अनुच्छेद 370 की समाप्ति व समान नागरिक संहिता जैसे अपने मूल मुद्दे छोड़ने पड़े। परंतु यह रणनीति पार्टी के लिए उपयोगी सिद्ध हुई और एनडीए ने लगभग छह वर्षों तक शासन किया। इस दौरान उसने पाठ्यपुस्तकों का सांप्रदायिकीकरण कर दिया और आरएसएस के कार्यकर्ताओं को सरकारी सेवा में घुसपैठ करने की पूरी छूट मिल गई। संघ के एजेण्डे वाले कई एनजीओ को जमकर सरकारी सहायता उपलब्ध करवाई गई। इस सब से आरएसएस के प्रभावक्षेत्र में जबरदस्त वृद्धि हुई और जीवन के सभी क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति स्पष्ट नजर आने लगी।चूंकि हिन्दुत्व परिवार यह जानता था कि वह अपने बल पर कभी सत्ता में नहीं आ सकता, इसलिए उसने ‘विकास के गुजरात माॅडल’ को सामने रखा और हिंदुत्व के एजेण्डे को पीछे।
 हिन्दू राष्ट्र का एजेण्डा
मोदी, हिन्दुत्व के एजेण्डे के आक्रामक चेहरे का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने खुलेआम यह कहा है कि वे हिन्दू राष्ट्रवाद में यकीन करते हैं। दरअसल, हिन्दू राष्ट्रवाद उस सांप्रदायिक फासीवाद का मुखौटा मात्र है जो आरएसएस और मोदी देश पर लादना चाहते हैं। आरएसएस और मोदी के समर्थक एक ओर कार्पोरेट सेक्टर व उसके मध्य स्तर के कर्मचारी हैं तो दूसरी ओर, सूचना प्रौद्योगिकी-एमबीए युवा वर्ग भी उनसे प्रभावित है। मोदी ने गुजरात में यह दिखा दिया है कि वे उद्योगपतियों के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोल सकते हैं। इससे कार्पोरेट सेक्टर बहुत प्रभावित है और मोदी के नाम का जाप कर रहा है। कार्पोरेट मीडिया बिना कोई जांच पड़ताल केे उनके विकास के नारे का गुणगान कर रहा है। गुजरात में समाज कल्याण की योजनाओं को लगभग ठप्प कर दिया गया है, जिसके कारण समाज का गरीब तबका परेशान हाल है। जहां तक अल्पसंख्यकों का सवाल है, सच्चर कमेटी की सिफारिशों  के आधार पर शुरू की गईं केन्द्रीय योजनाओं को गुजरात में लागू नहीं किया जा रहा है। मुस्लिम विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति देने के लिए केन्द्र सरकार द्वारा जो धनराशि  राज्य को भेजी जा रही है उसे साल-दर-साल वापस लौटाया जा रहा है। यह कहना गलत नहीं होगा कि मोदी, धार्मिक अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए किसी भी प्रकार की योजना लागू किए जाने के खिलाफ हैं।
वे कारपोरेट जगत, मध्यम वर्ग, व्यापारियों और आरएसएस समर्थकों की पसंद हैं। इनमें से हर एक वर्ग मोदी को अलग-अलग तरीके से देखता है और तीनों को वे उपयोगी नजर आते हैं। कारपोरेट जगत मानता है कि मोदी उन्हें देश के प्राकृतिक संसाधनों को खुलकर लूटने की इजाजत देंगे। मध्यम वर्ग को यह मालूम है कि मोदी का शासन इस बात की गारंटी है कि राज्य, वंचित वर्गों और धार्मिक अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए आवश्यक सामाजिक परिवर्तन नहीं होने देगा। आरएसएस ने आडवाणी को दो कारणों से त्याग दिया है। पहला, उनका यह वक्तव्य कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष नेता थे और दूसरा यह कि उनकी आयु बहुत अधिक हो गई है। भाजपा का असली नियंत्रक आरएसएस है और वह जानता है कि मोदी एक ऐसे स्वयंसेवक हैं जो निर्ममतापूर्वक देश में हिन्दू राष्ट्र ला सकते हैं।
  कांग्रेश  शासित प्रदेशो  में अधिक हिंसा हुई है। यह भी कहा जाता है कि इससे यह सिद्ध होता है कि भाजपा, सांप्रदायिक नहीं है।कांग्रेश  शासनकाल में देश भर में अनेक दंगे हुए हैं। ये दंगे सांप्रदायिक संगठनों द्वारा भड़काए जाते हैं और कांग्रेस सरकारें निश्चित तौर पर इन दंगों को नियंत्रित न करने के लिए दोषी ठहरायी जा सकती हैं। अधिकांश  दंगा जांच आयोगों की रपटों से यह साफ है कि हिंसा की योजना बनाने से लेकर उसे अंजाम देने तक का काम सांप्रदायिक संगठन करते हैं और कांग्रेस का नेतृत्व या तो असहाय हो उन्हें देखता रहता है या अपरोक्ष रूप से उनकी मदद करता है। परंतु हमें यह याद रखना चाहिए कि एक पार्टी के बतौर भाजपा की किसी और पार्टी से तुलना न तो की जानी चाहिए और ना ही की जा सकती है। भाजपा केवल एक राजनीतिक दल नहीं है। वह आरएसएस की राजनैतिक शाखा है जिसका एजेण्डा धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक भारत के एजेण्डे के विरूद्ध है। यह भारतीय राष्ट्रवाद के विरूद्ध है, उन लोगों के सपनों के खिलाफ है जिन्होंने भारत को एक राष्ट्र का स्वरूप देने में भूमिका निभाई और गांधी, भगत सिंह व अंबेडकर की विचारधारा के भी विरूद्ध है। 
चुनाव 2014
हालिया आमचुनाव के नतीजे बहुत दिलचस्प हैं। लगभग 31 प्रतिशत वोट प्राप्त कर भाजपा-मोदी, 282 लोकसभा सीटें जीतने में सफल हो गए हैं। निःसंदेह, मोदी इस चुनाव के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्व बनकर उभरे हैं। यह बार-बार कहा जा रहा है कि धर्म और जाति के बंधनों को तोड़कर, मतदाताओं ने उन्हें इसलिए समर्थन दिया क्योंकि वे ‘‘विकास के पुरोधा’’ हैं। यह दावा किस हद तक सही है? सबसे पहली बात तो यह है कि मोदी को बड़े उद्योगपतियों का जबरदस्त समर्थन प्राप्त था। उनके चुनाव अभियान में पैसा, पानी की तरह बहाया गया। इसके अतिरिक्त, लाखों आरएसएस कार्यकर्ताओं ने भाजपा को जीत दिलाने के लिए जमीनी स्तर पर दिन-रात पसीना बहाया। इस तरह, मोदी की जीत के दो स्तंभ थेः पहला कारपोरेट घराने और व दूसरा आरएसएस। मोदी ने बार-बार दोहराया कि यद्यपि वे भारत की स्वतंत्रता के लिए अपनी जान न्योछावर नहीं कर सके परंतु वे स्वतंत्र भारत के लिए सब कुछ करेंगे। यह उन कई झूठों में से एक है जो उन्होंने अपनी छवि को चमकदार बनाने के लिए गढ़े थे।
हम सब जानते हैं कि वे आरएसएस-हिन्दुत्व की उस राजनैतिक विचारधारा के हामी हैं, जिसने भारत के
स्वाधीनता संग्राम में कभी हिस्सा नहीं लिया। संघ-भाजपा-हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद, स्वाधीनता आंदोलन के राष्ट्रवाद से बिल्कुल भिन्न है।
गांधी और स्वाधीनता संग्राम का राष्ट्रवाद, भारतीय राष्ट्रवाद था जबकि मोदी परिवार का राष्ट्रवाद, हिन्दू राष्ट्रवाद है। यह जिन्ना के मुस्लिम राष्ट्रवाद की तरह, एक प्रकार का धार्मिक राष्ट्रवाद है।  मुस्लिम लीग का मुस्लिम राष्ट्रवाद और हिन्दू महासभा-आरएसएस का हिन्दू राष्ट्रवाद, परतंत्र भारत में दो समानांतर राजनैतिक धाराएं थीं। स्वाधीनता संग्राम के दौरान संघ और उसके साथी, आजादी की लड़ाई की आलोचना किया करते थे क्योंकि वह समावेशी  भारतीय राष्ट्रवाद पर आधारित थी। इसलिए, मोदी और उनके जैसे लोगों का देश की स्वतंत्रता के लिए अपनी जान न्योछावर करने का तो कोई प्रश्न ही नहीं था।
मोदी की जीत के कई कारण हैं। इनमें शामिल हैं हमारी चुनाव प्रणाली, मोदी की आक्रामक शैली , कांग्रेस की कमजोरियों का लाभ उठाने में उनकी सफलता, जनता से संवाद स्थापित करने की उनकी असाधारण क्षमता और राष्ट्रपति प्रणाली की तर्ज पर चलाया गया चुनाव अभियान। इसके मुकाबले, कांग्रेस का प्रचार अभियान अत्यंत फीका था और यूपीए सरकार पर भ्रष्ट होने और अनिर्णय का शिकार होने के आरोप थे। कांग्रेस की साख को गिराने का काम अन्ना हजारे के आंदोलन से शुरू हुआ, जिसे आरएसएस का समर्थन प्राप्त था। इस आंदोलन को केजरीवाल आगे ले गए और उन्होंने कांग्रेस की जीत की संभावनाओं को धूमिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। केजरीवाल ने भाजपा के भ्रष्टाचार के बारे में काफी देर से बोलना शुरू किया और वह भी काफी हिचकिचाहट के साथ। ऐसा क्यों हुआ, यह कहना मुष्किल है। अन्ना, जिन्हें दूसरा गांधी बताया जा रहा था, मंच पर अपनी भूमिका निभाकर अदृष्य हो गए। केजरीवाल ने भ्रष्टाचार के खिलाफ अपने सामाजिक आंदोलन को राजनैतिक दल की शक्ल दे दी। इससे सभी सामाजिक आंदोलनों की साख और उनके असली इरादों पर प्रश्नचिन्ह लगा। आप का भ्रष्टाचार विरोधी प्रचार, मुख्यतः कांग्रेस पर केन्द्रित था। आप ने इस तथ्य को नजरअंदाज किया  कि भ्रष्टाचार हमारी सामाजिक व्यवस्था में गहरे तक पैठी विकृतियों का नतीजा है। यह भी तथ्य है कि भ्रष्टाचार वही कर सकता है जो सत्ता में हो और समाज का वह वर्ग, जो जल्द से जल्द अमीर बन जाना चाहता है, भी भ्रष्टाचार के लिए उतना ही दोषी है जितना कि भ्रष्ट मंत्री या अधिकारी। आप ने 400 से अधिक उम्मीदवार खड़े किए, जिनमें से अधिकांष ने अपनी जमानतें गवां दीं। इनमें से कई उम्मीदवार ऐसे थे जिनकी जनता में बहुत उजली छवि थी और जिन्होंने सामाजिक बदलाव के लिए अथक और कठिन संघर्ष किए थे। आप ने कांग्रेस की साख को गिराने में महती भूमिका निभाई। उसने भाजपा को भ्रष्टाचार के विरूद्ध लड़ने वाले दल के रूप में स्वयं को प्रस्तुत करने में मदद की। आप ने काफी बाद में भाजपा के भ्रष्टाचार के बारे में बात करनी शुरू की। 
जहां तक ‘विकास’ के एजेण्डे का सवाल है, मोदी ने गुजरात कत्लेआम में अपनी भूमिका निभाने के बाद, जल्दी ही गुजरात के विकास के नारे का दामन थाम लिया। गुजरात के विकास का मिथक, अरबपति उद्योगपतियों के प्रति राज्य सरकार की उदारता पर आधारित था। गुजरात सरकार से मिल रहे लाभों के बदले, उद्योगपतियांे ने 2007 से ही ‘‘मोदी को प्रधानमंत्री होना चाहिए’’ के मंत्र का अनवरत जाप शुरू कर दिया था। जहां गुजरात में धार्मिक अल्पसंख्यकों को समाज के हाशिए पर पटक दिया गया और उन्हें दूसरी श्रेणी का नागरिक बना दिया गया वहीं गुजरात के विकास के किस्से देशभर में गूंजने लगे। दूसरे राजनीतिक दलों और अध्येताओं ने लंबे समय तक इन दावों को चुनौती नहीं दी। जब गुजरात के समााजिक-आर्थिक सूचकांकों व अन्य आंकड़ों का आलोचनात्मक विष्लेषण किया गया तब गुजरात के विकास का सच सामने आया; परंतु तब तक बहुत देर हो चुकी थी। इस सच को आमजनों तक पहुंचाने के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा था।
सतही तौर पर देखने से ऐसा लग सकता है कि मोदी का चुनाव अभियान केवल विकास के एजेण्डे पर आधारित था। परंतु यह सच नहीं है। मोदी ने सांप्रदायिकता और जाति के कार्ड को जमकर खेला। यह काम अत्यंत कुटिलता से किया गया। उन्होंने भारत से मांस के निर्यात की आलोचना की और उसे पिंक रेव्युलेशन बताया। इसका उद्देश्य मुस्लिम अल्पसंख्यकों को गौहत्या से जोड़ना था। इस तरह, उन्होंने एक आर्थिक मुद्दे को सांप्रदायिक मुद्दे मंे बदल दिया। मोदी बार-बार बांग्लाभाषी मुसलमानों के विरूद्ध बोलते रहे। उन्होंने अपनी अनेक जनसभाओं में कहा कि असम की सरकार एक सींग वाले गेंडे को मारकर, बांग्लादेशी घुसपैठियांे के लिए जगह बना रही है। उन्होंने यह भी कहा कि बांग्लादेशी  घुसपैठियों को 16 मई को अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर भारत से प्रस्थान करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ये सारी बातें उनके चुनाव प्रचार के सांप्रदायिक चेहरे को उजागर करने के लिए काफी हैं। भाजपा के प्रवक्ता कई बार कह चुके हैं कि जहां बांग्लाभाषी हिन्दू शरणार्थी हैं, वहीं बांग्लाभाषी मुसलमान घुसपैठिए हैं। उनकी पार्टी के नेता अमित शाह ने मुजफ्फरनगर में ‘प्रतिशोध’ की बात कही और गिरीराज सिंह ने यह चेतावनी दी कि मोदी के विरोधियों को पाकिस्तान चले जाना चाहिए।
अगर हम उन क्षेत्रों पर नजर डालें जहां भाजपा ने विजय प्राप्त की है तो अत्यंत चिंताजनक तथ्य सामने आता है। ऊपर से देखने पर तो प्रतीत होता है कि भाजपा की विजय के पीछे विकास का वायदा था परंतु इस जीत में धार्मिक धु्रवीकरण की भूमिका को नकारना बचपना होगा। भाजपा को उन्हीं क्षेत्रों में अधिक सफलता मिली है जहां सांप्रदायिक या आतंकवादी हिंसा के कारण, सांप्रदायिक धु्रवीकरण हुआ है। महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार व असम-इन सभी राज्यों में अलग-अलग समय पर व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई है। इसके विपरीत, तमिलनाडु, बंगाल और केरल, जो सांप्रदायिक हिंसा से तुलनात्मक रूप से मुक्त रहे हैं, वहां भाजपा अधिक सफलता अर्जित नहीं कर सकी है। इस मामले में उड़ीसा एक अपवाद है, जहां ईसाई-विरोधी कंधमाल हिंसा के बावजूद, नवीन पटनायक की पार्टी ने अपनी पकड़ बनाए रखी है।
सांप्रदायिक हिंसा व आरएसएस-भाजपा-मोदी की जीत के अंतर्संबंध का गहन अध्ययन आवश्यक है। इसी तरह, सांप्रदायिक व आतंकवादी हिंसा के कारण होने वाले सांप्रदायिक धु्रवीकरण का भी अध्ययन किया जाना चाहिए। यह मात्र संयोग नहीं है कि विकास के मिथक से देश के केवल उन हिस्सों के मतदाता प्रभावित हुए जहां पिछले कुछ वर्षों में हिंसा हुई थी। सांप्रदायिक हिंसा की जांच करने वाले अधिकांश आयोगों ने दंगों के लिए संघ की मशीनरी को जिम्मेदार ठहराया है।यद्यपि मोदी ने खुलकर जाति का कार्ड नहीं खेला परंतु उन्होंने प्रियंका गांधी के ‘नीच राजनीति’ के आरोप को तोडमरोड़ कर, ‘नीच जाति’ में परिवर्तित कर अपनी जाति का ढिंढोरा पीटने का अवसर ढंूढ लिया। उन्होंने अपनी जाति घांची का बार-बार नाम लिया ताकि वे नीची जातियों के मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकें।
मोदी की जीत के क्या मायने हैं? मुंबई, गुजरात, मुजफ्फरनगर और ढेर सारी अन्य जगहों में हुए सांप्रदायिक दंगों ने हमारे समाज के एक हिस्से में गहरे तक असुरक्षा का भाव भर दिया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं के कठिन संघर्ष के बावजूद, हमारी न्यायिक प्रणाली बहुत धीमी गति से काम कर रही है और पीडि़तों को न्याय नहीं मिल सका है।
अपराधी यह दावा करते घूम रहे हैं कि वे निर्दोष हैं और उन्हें क्लीन चिट मिल गई है। मोदी की इस जीत में कई चीजें पहली बार हुई हैं। यह भी पहली बार हुआ है कि एक ऐसा व्यक्ति, जिसपर कत्लेआम में भागीदारी का आरोप है, देश की सत्ता के शीर्ष पर बैठेगा। ऐसे में भारतीय प्रजातंत्र का क्या भविष्य है? भारतीय संविधान के मूल्य कितने सुरक्षित रह सकेंगे? क्या मोदी, हिन्दू राष्ट्रवाद के अपने मूल एजेण्डे को त्यागेंगे? क्या वे उस विचारधारा से अपने को अलग करंेगे, जो उनकी राजनीति का आधार है? या वे अपने आकाओं को हिन्दू राष्ट्र भेंट में देंगे? इन प्रष्नों का सही उत्तर देने के लिए कोई ईनाम नहीं है।  
मोदी का व्यक्तित्व: एकाधिकार-फासीवादी
आमचुनाव में नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से उनकी तुलना एक ओर रिचर्ड निक्सन, मार्गरेट थैचर व रोनाल्ड रीगन से की जा रही है तो दूसरी ओर हिटलर से। हिटलर से उनकी तुलना की कई विष्लेषकों ने कड़े शब्दों में निंदा की है। उनका कहना है कि न तो मोदी, हिटलर हैं और ना ही 2014 का भारत, 1930 का जर्मनी है। इन विष्लेषकों का कहना है कि प्रथम विश्वयुद्ध में हार के बाद, जर्मनी एक बहुत कठिन दौर से गुजर रहा था। सन् 1920 के दषक के अंत में आई  विश्वव्यापी मंदी ने जर्मनी में हालात को बद से बदतर बना दिया था। यही वे परिस्थितियां थीं, जिनमें हिटलर और उसकी नरसंहार की राजनीति का उदय हुआ। हिटलर के उदय के पीछे एक कारक यह भी था कि जर्मनी में प्रजातंत्र कमजोर था व केवल 30 प्रतिशत मत हासिल कर नाजी वहां सत्ता में आ गए थे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि दो अलग-अलग कालों में, दो अलग-अलग देशों की राजनैतिक परिस्थितियां कभी एकदम एक-सी नहीं हो सकतीं। परंतु यह भी सच है कि कभी-कभी उनमें अंतर बहुत सतही होते हैं जबकि समानताएं मूलभूत होती हैं। यह सही है कि भारत को उस तरह का अपमान बर्दाश्त नहीं करना पड़ा है जैसा कि जर्मनी को प्रथम  विश्वयुद्ध में करना पड़ा था। परंतु यह भी सच है कि पिछले कुछ वर्षों में अन्ना हजारे के आंदोलन से शुरू कर, अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी आदि ने देश  की जनता में राजनैतिक व्यवस्था व शासक दल के प्रति गहरे अविष्वास के भाव को जन्म दिया है। इस मोहभंग को अत्यंत योजनाबद्ध तरीके से उत्पन्न किया गया। अन्ना के आंदोलन के पीछे वही आरएसएस था, जो मोदी के उदय के पीछे है। निरंतर दुष्प्रचार और आम लोगों की भागीदारी से व्यापक आंदोलन चलाकर, अन्ना हजारे ने वर्तमान व्यवस्था के प्रति गंभीर अविष्वास व आक्रोष का माहौल पैदा किया। शासक दल की विष्वसनीयता को गहरी चोट पहुंचाई। केजरीवाल ने नागरिक समूहों की सहायता से शासक दल की विष्वसनीयता को और गिराया।
जहां तक प्रजातंत्र का सवाल है, भारत में प्रजातंत्र अभी भी विकास के दौर में है। वह पूरी तरह से परिपक्व नहीं हुआ है। एक ओर प्रजातंत्र के प्रति जागरूकता बढ़ रही है और लोग पहले से कहीं अधिक संख्या में मत दे रहे हैं-जो कि एक सकारात्मक परिवर्तन है-तो दूसरी ओर, शासन के वेस्टमिंसटर माॅडल ने भारतीय प्रजातंत्र के प्रातिनिधिक चरित्र को कमजोर किया है। जर्मनी में नाजी केवल 30 प्रतिषत वोट पाकर सत्ता में आ गए थे। सन् 2014 में भारत में भाजपा केवल 31 प्रतिषत वोट हासिल कर लोकसभा में बहुमत प्राप्त करने और अपनी सरकार बनाने में सफल हो गई है! भारतीय प्रजातंत्र को दूसरा खतरा जातिगत व लैंगिक पदानुक्रम से है। इस पदानुक्रम के चलते, महिलाओं और दलितों के साथ अन्याय हो रहा है परंतु समाज का इस ओर बिल्कुल ध्यान नहीं है। राज्यतंत्र का सांप्रदायिकीकरण भी भारतीय प्रजातंत्र के लिए खतरा है। इसके चलते, धार्मिक अल्पसंख्यक नियमित रूप से हिंसा के शिकार हो रहे हैं और उन्हें न्याय नहीं मिल रहा है। देश के विभिन्न इलाकों में हुए बम धमाकों के बाद, बड़ी संख्या में निर्दोष युवकों को गिरफ्तार कर उनकी जिंदगियां और कैरियर बर्बाद कर दिये गए। यद्यपि अदालतें उन्हें बरी कर रही हैं परंतु इस प्रक्रिया में लंबा समय लगता है और तब तक ऐसे युवकों का जीवन तबाह हो चुका होता है। इसके समानांतर, अल्पसख्यंकों के दानवीकरण की प्रक्रिया भी चल रही है और कुछ क्षेत्रों में उन्हें दूसरे दर्जे के नागरिक का जीवन बिताने पर मजबूर होना पड़ रहा है।
हिटलर, यहूदियों और संसदीय प्रजातंत्र के प्रति अपनी घृणा को सार्वजनिक व खुले रूप में व्यक्त करता था। मोदी यद्यपि ऐसा नहीं करते तथापि वे ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ के हामी हैं और हिन्दू राष्ट्रवाद की मूल अवधारणाओं में से एक यह है कि केवल हिन्दुओं को ही देश का नागरिक होने का हक है। ‘विदेशी  धर्मों’ जैसे इस्लाम व ईसाईयत के मानने वालों को हिंदू राष्ट्र के लिए खतरा समझा जाता है। आरएसएस के सबसे प्रसिद्ध विचारक एमएस गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ए बंच आॅफ थाॅट्स मंे हिन्दू राष्ट्रवाद को परिभाषित किया है। मोदी इसी विचारधारा में यकीन करते हैं और यह विचारधारा, हिटलर की विचारधारा से काफी हद तक मिलती-जुलती है। हिटलर द्वारा यहूदियों के कत्लेआम को जायज व प्रशंसनीय ठहराते हुए, मोदी के वैचारिक गुरू, गोलवलकर लिखते हैं, ‘‘...अपने राष्ट्र और संस्कृति की शुद्धता को बनाये रखने के लिए जर्मनी ने अपने देश को यहूदियों से मुक्त कर दुनिया को चौका दिया। यह राष्ट्रीय गौरव का उच्चतम प्रकटीकरण था। जर्मनी ने यह दिखा दिया है कि जिन नस्लों व संस्कृतियों के बीच मूलभूत अंतर होते हैं, उन्हें एक राष्ट्र के रूप में संगठित करना संभव नहीं है। इससे हिन्दुस्तान बहुत कुछ सीख सकता है, लाभांवित हो सकता है’’।
मोदी ने ठीक यही गुजरात में किया, जहां करीब 2,000 लोगों को अत्यंत क्रूरता से मौत के घाट उतार दिया गया और मुसलमानों का एक बड़ा तबका अपमान और वंचना सहने पर मजबूर कर दिया गया। मुसलमानों को उनके मोहल्लों में कैद कर दिया गया है, जहां नागरिक सुविधाओं का नितान्त अभाव है। 
एक जर्मन प्रतिनिधिमंडल, जिसने अप्रैल 2010 में गुजरात की यात्रा की थी, के एक सदस्य ने कहा था कि उसे यह देखकर बहुत धक्का लगा कि हिटलर के राज में  जर्मनी और मोदी के राज में गुजरात में कितनी समानताएं हैं। यहां यह याद दिलाना समीचीन होगा कि गुजरात में स्कूली पाठ्यपुस्तकों में हिटलर का एक महान राष्ट्रवादी के रूप में महिमामंडन किया गया है। मोदी और हिटलर की समानताएं यहीं खत्म नहीं होतीं। हिटलर की तरह, मोदी को भी कारपोरेट धनकुबेरों का पूरा समर्थन प्राप्त है। हिटलर की तरह, मोदी भी धार्मिक अल्पसंख्यकों से घृणा करते हैं और उन्होंने यह स्वयं स्वीकार किया है कि वे हिन्दू राष्ट्रवाद में विश्वास रखते हैं। धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति उनके रवैये व उनके व्यक्तित्व का अत्यंत सटीक वर्णन, मनोविश्लेशक आशीश  नंदी ने किया है। आशीश नंदी ने मोदी का साक्षात्कार, गुजरात कत्लेआम के काफी पहले लिया था। वे लिखते हैं ‘‘...मुझे मोदी का साक्षात्कार लेने का अवसर प्राप्त हुआ...उसके बाद मेरे मन में तनिक भी संदेह नहीं रह गया कि वे एक पक्के व विशुद्ध फासीवादी हैं। मैंने कभी ‘फासीवादी’ शब्द का प्रयोग गाली के रूप में नहीं किया। मेरे लिए वह एक बीमारी है जिसका संबंध व्यक्ति की विचारधारा के साथ-साथ उसके व्यक्तित्व व उसके प्रेरणास्त्रोतों से भी है।’
जहां 1930 के जर्मनी और 2014 के भारत में बहुत अंतर हैं वहीं उनमें बहुत सी समानताएं भी हैं। हिटलर और मोदी की पृष्ठभूमि अलग-अलग है परंतु दोनों की राजनीति, सम्प्रदायवादी राष्ट्रवाद पर आधारित है। दोनों चमत्कारिक नेता हैं और दोनों ‘दूसरे’ का दानवीकरण करने में दक्ष हैं। दुनिया के सबसे बड़े प्रजातंत्र का भविष्य डावांडोल है। यदि हमें संभावित खतरों से बचना है तो हमें यह सुनिष्चित करना होगा कि देश  में कानून का राज हो, सबको न्याय मिले और प्रजातांत्रिक व मानवाधिकार आंदोलनों को मजबूत किया जाए। हमें ऐसे सामाजिक आंदोलनों को बढ़ावा देना है जो समावेशी  हों और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व के मूल्यों में न केवल दृढ़ विष्वास रखते हों बल्कि उनकी स्थापना के लिए संघर्ष करने को उद्यत भी हों।

मोदी के सत्ता में आने के बाद
मोदी को प्रधानमंत्री की गद्दी संभाले अभी कुछ ही हफ्ते बीते हैं परंतु अभी से उनका असली एजेण्डा देश  के सामने आने लगा है। हिन्दू दक्षिणपंथी तत्व आक्रामक हो उठे हैं और खुलकर हिंसा कर रहे हैं। राज्यतंत्र अपने पूर्वाग्रह छिपाने का प्रयास तक नहीं कर रहा है। केरल के एक कालेज के प्राचार्य और छःह छात्रों को मोदी का चित्र, हिटलर और ओसामा के साथ लगाने के बाद, गिरफ्तार कर लिया गया है। गोवा में एक व्यक्ति को पुलिस ने मोदी के खिलाफ फेसबुक पर टिप्पणी करने के कारण हिरासत में ले लिया। मोदी की चुनावी विजय के बाद जो हिंसा हुई और हो रही है, वह आने वाले समय का संकेत है। बालठाकरे और शिवाजी के रूपांतरित चित्र, सोशल वेबसाईटों पर अपलोड होने के कुछ समय बाद ही पुणे में अल्पसंख्यकों पर योजनाबद्ध हमले शुरू हो गए (मई 2014) जिसके दौरान एक सूचना प्रौद्योगिकी पेशेवर को सिर्फ इसलिए जान से मार डाला गया क्योंकि उसकी दाढ़ी बड़ी हुई थी और वह पठानी सूट पहने था। संघ परिवार के सदस्यों ने अपने हिन्दुत्ववादी एजेण्डे को लागू करने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। वे मांग कर रहे हैं कि धारा 370 समाप्त की जाए, समान नागरिक संहिता लागू हो और राममंदिर का निर्माण शुरू हो। नागरिक अधिकार संगठनों को कुचलने के प्रयास  शुरू हो गए हैं। उन संगठनों को निशाना बनाया जा रहा है जो पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन और आदिवासियों के अधिकारों के अतिक्रमण का विरोध कर रहे हैं। जो एनजीओ बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा स्थानीय रहवासियों को बेदखल करने और पर्यावरण को हानि पहुंचाने का विरोध कर रहे हैं, उन्हें निशाना बनाया जा रहा है। जिन एनजीओ पर पहले यह आरोप लगाया जाता था कि वे विदेशी कंपनियों के इशारे पर काम कर रहे हैं, उनके बारे में ही अब यह कहा जा रहा है कि वे इन कंपनियों द्वारा भारत में निवेश की राह में बाधक बन रहे हैं।
मोदी ने अपने हाथों में सत्ता का केन्द्रीकरण शुरू कर दिया है। भारत सरकार के सचिवों से कहा गया है कि वे सीधे मोदी को रिपोर्ट करें। केबिनेट व्यवस्था को कमजोर किया जा रहा है। हिन्दुत्ववादी अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पर बैठाया जा रहा है। कई पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है और आरएसएस का अनुशांगिक संगठन, शिक्षा बचाओ आंदोलन ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। कई प्रकाशक इतने आतंकित हो गए हैं कि उन्होंने अपनी पूर्व में प्रकाशित  किताबों का पुनर्वालोकन शुरू कर दिया है। इनमें मेघा कुमार की पुस्तक ‘‘कम्युनलिज्म एण्ड जेंडर वायलेंसः अहमदाबाद सिन्स 1969’’ शामिल है।

नई सरकार और सामाजिक आंदोलन
चुनाव में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद, समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों के लिए संघर्षरत व्यक्तियों और संगठनों ने प्रजातांत्रिक अधिकारों और उदारवादी मूल्यों की रक्षा के लिए नई रणनीति बनाने पर विचार शु रू कर दिया है। एक एकाधिकारवादी शासक धीरे-धीरे देश पर हिन्दू राष्ट्र का एजेण्डा लाद सकता है, यह खतरा अब स्पष्ट नजर आ रहा है। मोदी सरकार के पहले महीने ने ही आने वाले दिनों के बारे में कई आशंकाओं को जन्म दिया है। ऐसा स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि यह सरकार प्रजातांत्रिक अधिकारों के लिए खतरा है। प्रजातांत्रिक अधिकारों और स्वतंत्रताओं की रक्षा करने के लिए कई नागरिक समाज समूह एक दूसरे से हाथ मिला रहे हैं। इस पर भी विचार किया जा रहा है कि किस तरह एक ऐसे ऐसे समाज के निर्माण के हमारे सपने को पूरा किया जा सकता है जिसमें अभिव्यक्ति व आस्था की स्वतत्रंता हो और हमारी विविधता का सम्मान भी। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए सामाजिक क्षेत्र में कार्यरत समूहों को एकजुट होना होगा।
सन् 1992-93 की मुंबई हिंसा से सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ संघर्ष की आवश्यकता रेखांकित हुई थी। सन् 2002 के गुजरात कत्तेलाम और 2008 के कंधमाल हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया कि सांप्रदायिक तत्वों के खिलाफ संघर्ष अनिवार्य व अपरिहार्य है। ये नागरिक समूह मिलकर उस धुरी की स्थापना कर सकते हैं जो समाज के कमजोर वर्गों के मानवाधिकारों की रक्षा का केन्द्र बन सके। सामाजिक संगठनों को एक मंच पर लाया जाना आवश्यक है। अगर संसद कोई  दमनकारी कानून बनाती है या राज्य तंत्र नागरिकों के किसी समूह के साथ भेदभाव करता है तो इसके विरोध में सड़कों पर उतरने से लेकर अदालतों के दरवाजे खटखटाने तक हर संभव उपाय करना होगा।
यह साफ है कि हम चाहे अभिव्यक्ति की आजादी के लिए लड़ रहे हों या फिर महिलाओं के अधिकारों के लिए पर्यावरण की रक्षा के लिए, या अल्पसंख्यकों के अधिकारों की खातिर-हम सब को एक होना होगा। और यह काम हर शहर, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर होना चाहिए। वामपंथी पार्टियों को जनता से संबंधित मुद्दों को गंभीरता से लेना होगा और सामाजिक आंदोलनों को अपना समर्थन व सहयोग उपलब्ध करवाना होगा। तभी हम अपने प्रजातंत्र और प्रजातांत्रिक अधिकारों को सुरक्षित रख सकेंगे।
-राम पुनियानी

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

राज्यमंत्री फरीद महफूज किदवई के विरोध में उतरे ग्रामीण



बाराबंकी। वन राज्यमंत्री पर कुछ ग्रामीणों ने एक व्यक्ति की पुश्तैनी जमीन कब्जाने का आरोप लगाते हुए गुरुवार को कलक्ट्रेट में धरना दिया। धरना दे रहे लोगों ने मुख्यमंत्री को संबोधित अपनी मांगों का ज्ञापन डीएम को सौंपा है।
कोतवाली क्षेत्र के ग्राम मंझपुरवा के निवासी सत्येंद्र यादव के नेतृत्व में धरना दे रहे ग्रामीणों का आरोप है कि वन राज्यमंत्री फरीद महफूज किदवई ने पिछले वर्ष फर्जी कागजों के आधार पर उनकी खेती योग्य पुश्तैनी जमीन कब्जा करने की कोशिश की थी। इसके विरोध में कलेक्ट्रेट और विधानसभा के सामने धरना-प्रदर्शन करने पर जमीन बच सकी थी। कहा कि 14 जुलाई 2014 को वे लोग खेतों में धान लगाने की तैयारी कर रहे थे तभी कोतवाली पुलिस आई और बाबूलाल यादव को पकड़ ले गई। पुलिस ने धमकी दी की अपने खेतों में काम करना बंद करो और ये जमीन वन राज्यमंत्री के नाम कर दो। यदि ऐसा नहीं किया तो गंभीर परिणाम भुगतना पड़ेगा। प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमंत्री को संबोधित अपनी मांगों का ज्ञापन डीएम को सौंपा है। इस मौके पर हनुमान प्रसाद, सौरभ वाजपेयी, धर्मेंद्र कुमार, रामलखन यादव, सुरेंद्र यादव, रामकिशोर, राजदेव, संदीप, रामअधार, अर्जुन आदि मौजूद रहे।
वहीं फरीद महफूज किदवई के प्रतिनिधि अहमद सलमान का कहना है कि राज्यमंत्री की छवि धूमिल करने के लिए धरना-प्रदर्शन कर प्रशासन को गुमराह किया जा रहा है। जबकि वास्तव में ये भूमि राज्यमंत्री किदवई के परिवार की है और इस जमीन पर इसी परिवार का कब्जा है।
अमर उजाला से साभार

गुरुवार, 17 जुलाई 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम ---6

हिन्दू राष्ट्र की ओर..
    मेरी जल्दी ही पदोन्नति हो गई, मैं मुख्य शिक्षक से कार्यवाह बना दिया गया, दोनों ही नियुक्तियाँ जबानी ही थी, किसी प्रकार का लिखित आदेश नहीं, जब स्वयंसेवकों को ही सदस्यता की कोई रसीद या पहचान पत्र देय नहीं है तो पदाधिकारियों को भी उसकी क्या जरुरत है? मैंने पूछा था इस बारे में भी तो जवाब मिला कि संघ में इस प्रकार की कागजी खानापूर्ति के लिए समय व्यर्थ करने की परम्परा नहीं है।
    खैर, कार्यवाह बनने के बाद मेरी जिम्मेदारियों में प्रखण्ड (ब्लॉक) स्तरीय बैठकों में भाग लेना भी शामिल हो गया, जब मैं पहली बार दो दिवसीय बैठक में भाग लेने तहसील मुख्यालय मण्डल गया, तो साथ में बिस्तर, गणवेश, लाठी और खाने के लिए थाली कटोरी भी साथ ले जानी पड़ी। किराया भी खुद देना पड़ा और बैठक का निर्धारित शुल्क भी चुकाना पड़ा। रात का खाना भी घर से बाँधकर ले गया। दूसरे दिन भोर में तकरीबन 5 बजे विसल की आवाज से नींद खुली, नित्यकर्म से निवृत होने के बाद संस्कृत में प्रातः स्मरण
मधुर समवेत स्वरों में दोहराया गया, प्रातःकालीन शाखा लगी, दिन में पूरे प्रखण्ड में आरएसएस के काम का प्रगति प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया। भोजन और बौद्धिक सत्र चले, अलग-अलग समूहों में बैठकर राष्ट्र की दशा और दिशा पर गंभीर चर्चा हुई, इस दो दिन के एकत्रीकरण से मुझे स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का राष्ट्र निर्माण का कार्य ‘मानवीय’ न होकर  ‘ईश्वरीय’ कार्य है, इसमंे काम करने का अवसर बिरले और नसीब वाले लोगों को ही मिलता है, संघ कोई संस्था नहीं है, यह तो व्यक्ति निर्माण का कारखाना है। जिससे हम जैसे संस्कारवान युवाओं का निर्माण हो रहा है, जिला स्तर से आए प्रचारक जी और संघ चालक जी ने बहुत ही प्रभावी उद्बोधन दिया, उनका एक-एक वाक्य मुझे वेद वाक्य लगा, कितने महान और तपस्वी लोग है ये, जिन्होंने अपना जीवन राष्ट्र सेवा में समर्पित कर दिया, मैंने भी मन ही मन निश्चय कर लिया कि अपना जीवन भी संघ के पवित्र उद्देश्यों को पूरा करने में लगाऊँगा। मैंने जीवन व्रती प्रचारक बनने की ठान ली।
हमें प्रचारक चाहिए विचारक नहीं
    घर परिवार त्याग कर सन्यासी की भाँति जीवन जीते हुए राष्ट्र सेवा में स्वयं को समर्पित करने के लिए पूर्णकालिक प्रचारक बनने की अपनी इच्छा को मैंने संघ के जिला प्रचारक जी के समक्ष रखा, उनके द्वारा दिए गए लम्बे जवाब में से दो बातें अब तक मुझे जस की तस याद है।
मैं: भाई साहब मैं प्रचारक बनना चाहता हूँ।
जिला प्रचारक: बन्धु, आपके विचार तो बहुत सुन्दर हैं, लेकिन दृष्टि समग्र नहीं है, आज उत्साह में हो तो प्रचारक बन जाना चाहते हो, लेकिन हमारा समाज काफी विषम है, कल कोई आपसे नाम पूछेगा, गाँव पूछेगा और अंततः समाज (जाति) भी पूछेगा और अगर उन्हें पता चला कि ये प्रचारक जी तो वंचित (दलित) समुदाय से आए हैं, तो उनका व्यवहार बदल सकता है, तब अपमान का घूँट भी पीना पड़ेगा, मुझे मालूम है, आप यह नहीं सह पाओगे, दुखी हो जाओगे, प्रतिक्रिया करने लगोगे, वाद विवाद होगा, इससे संघ का काम बढ़ने के बजाए कमजोर हो जाएगा, इसलिए मेरा सुझाव है कि आप प्रचारक नहीं विस्तारक बन कर थोड़ा समय राष्ट्र सेवा में लगाओ।
    जिला प्रचारक के इस जवाब से मैं बहुत दुखी हुआ, मुझे अपने निम्न समाज में पैदा होने पर कोफ्त होने लगी, पर इसमें मेरा क्या कसूर था? यह कैसी विडम्बना थी कि मैं अपना पूरा जीवन संघ के ईश्वरीय कार्य हेतु समर्पित करना चाहता था, लेकिन मेरी जाति इसमें आड़े आ रही थी, पर यह सोच कर मैंने खुद को तसल्ली दी कि महर्षि मनु के विधान के मुताबिक हम सेवकाई करने वाले शूद्र समुदाय हैं, अभी सम्पूर्ण हिन्दू समाज में हमारी स्वीकार्यता नहीं बन पाई है, खैर, कोई बात नहीं है, संघ सामाजिक समरसता के लिए प्रयासरत तो है ही, जल्दी ही वह वक्त भी आ जाएगा, जब मेरे जैसे वंचित समुदाय के स्वयंसेवक भी पूर्णकालिक प्रचारक बन कर अपना जीवन राष्ट्र सेवा में लगा पाएँगे, ये वे दिन थे जब मैंने लिखना शुरू कर दिया था, मैं शुरू शुरू में उग्र राष्ट्रभक्ति की कविताएँ लिखता था, मैंने एक हस्तलिखित पत्रिका ‘हिन्दू केसरी’ का पाकिस्तान मिटाओ अंक भी निकाला था, स्थानीय समाचार पत्रों में राष्ट्र चिंतन नाम से स्तम्भ लिखने लगा था, कई शाखाओं में गणवेश धारण किए हुए जाकर बौद्धिक दे आया था मैंने खुद को हिंदूवादी बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रखी थी, फिर भी मैं महसूस करता था कि मुझे वह स्वीकार्यता नहीं मिल पा रही है, जिसका मैं हकदार था, लेकिन उस दिन प्रचारक बनने के सवाल पर जो उनकी दूसरी बात थी, उसने मुझे अपनी औकात दिखा दी, प्रचारक जी ने मेरे सिर की तरफ इशारा करके मेरी बुद्धिजीविता का मखौल उड़ाते हुए साफ तौर पर कह दिया कि-आप जैसे ज्यादा सोचने वाले लोग केवल अपनी गर्दन के ऊपर-ऊपर मजबूत होते है, शारीरिक रूप से नहीं, वैसे भी संघ को ‘प्रचारक’ चाहिए, जो नागपुर से कही गई बात को वैसा का वैसा हिन्दू समाज तक पहँुचाए, आप की तरह के सदैव सवाल करने वाले विचारक हमें नहीं चाहिए और इस तरह मैं विचारक से प्रचारक बनते बनते रह गया।
-भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित