सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

राजनीति की वेदी पर इतिहास की बलि


भारत में जातिप्रथा का उदय

भारत में सामाजिक न्याय की राह में जातिप्रथा सबसे बड़ी और सबसे पुरानी बाधा रही है। यह प्रथा अभी भी सामाजिक प्रगति को बाधित कर रही है। जातिप्रथा का उदय कैसे, कब और क्यों हुआए इस संबंध में कई अलग.अलग सिद्धांत हैं। इसी श्रृंखला में सबसे ताजा प्रयास है जातिप्रथा के लिए मुस्लिम बादशांहों के आक्रमण को दोषी बताना। आरएसएस के तीन विचारकों ने अलग.अलग किताबों में यह तर्क दिया है कि मध्यकाल में मुसलमान राजाओं और सामंतों के अत्याचारों के कारण अछूत प्रथा और नीची जातियों की अवधारणा ने जन्म लिया। ये पुस्तकें हैं 'हिंदू चर्मकार जाति', 'हिंदू खटीक जाति' व 'हिंदू वाल्मीकि जाति'।
संघ के नेताओं का दावा है कि हिंदू धर्म में इन जातियों का कोई अस्तित्व नहीं था और वे, विदेशी आक्रांताओं के अत्याचारों के कारण अस्तित्व में आयीं। भैय्यू जी जोशी, जो कि आरएसएस के दूसरे सबसे बड़े नेता हैं, के अनुसारए हिंदू धर्म ग्रंथों में कहीं यह नहीं कहा गया है कि शूद्र, अछूत हैं। मध्यकाल में 'इस्लामिक' अत्याचारों के कारण अछूत और दलित की अवधारणाएं अस्तित्व में आईं वे लिखते हैं, 'चावरवंशीय क्षत्रियों के हिंदू स्वाभिमान को ठेस पहुंचाने के लिए अरब से आए विदेशी हमलावरों, मुस्लिम शासकों और गौमांस भक्षकों ने उन्हें गायों को मारने,उनकी खाल उतारने और उनकी देह को आबादी से दूर फेंकने के घृणास्पद कार्य को करने के लिए मजबूर किया। इस तरह, विदेशी आक्रांताओं ने चर्म.कर्म करने वाली एक जाति का निर्माण किया। वे अपने धर्म पर गर्व करने वाले हिंदू बंदियों को सजा के स्वरूप यह काम करने के लिए मजबूर करते थे।'
सत्य इसके ठीक उलट है। जातिप्रथा की नींव मुसलमानों के देश में आने से कई सदियों पहले रख दी गई थी और अछूत प्रथाए जाति व्यवस्था का अभिन्न अंग थी। आर्य स्वयं को श्रेष्ठ समझते थे और गैर.आर्यों को कृष्णवर्णेय ;काले रंग वालेद्ध व अनासा ;बिना नाक वाले, कहते थे। चूंकि गैर.आर्य लिंग की पूजा करते थे इसलिए उन्हें गैर.मनुष्य या अमानुष्य भी कहा जाता था ;ऋग्वेद, 10वां अध्याय, सूक्त 22.9.। ऋग्वेद और मनुस्मृति में कई स्थानों पर यह कहा गया है कि नीची जातियों के लोगों को ऊँची जातियों के व्यक्तियों के नजदीक आना भी मना था और उन्हें गांवों के बाहर रहने पर मजबूर किया जाता था।  यह कहने का यह अर्थ नहीं है कि ऋग्वेद के समय जातिप्रथा पूरी तरह अस्तित्व में आ चुकी थी। परंतु तब भी समाज को चार वर्णों में विभाजित किया जाता था और मनुस्मृति का काल आते.आते तक यह विभाजन कठोर जाति व्यवस्था में बदल गया।
जाति व्यवस्था में अछूत प्रथा का जुड़ाव लगभग पहली सदी ईस्वी में हुआ। मनुस्मृति, जो दूसरी.तीसरी सदी में लिखी गई है, में उन घृणास्पद सामाजिक प्रथाओं का वर्णन है जिन्हें आततायी जातियां, दमित जातियों पर लादती थीं। मनुस्मृति के लिखे जाने के लगभग 1000 साल बाद अर्थात 11वीं सदी ईस्वी में भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमण हुआ। और यूरोपीय देशों ने तो भारत पर 17वीं.18वीं शताब्दियों में कब्जा करना शुरू किया। इससे यह स्पष्ट है कि जाति प्रथा के लिए विदेशी हमलावरों को दोषी ठहराना कितना बेमानी है।
समय के साथ जाति प्रथा वंशानुगत बन गई। सामाजिक अंतर्संबंधों और वैवाहिक संबंधों का निर्धारण जाति प्रथा से होने लगा। धीरे.धीरे जातिगत ऊँचनीच और कड़ी होती गई। शूद्रों को समाज से बाहर कर दिया गया और ऊँची जातियों के लोगों का उनके साथ खानपान या वैवाहिक संबंध बनाना पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया। जाति प्रथा को बनाए रखने के लिए 'पवित्रता' और 'अपवित्रता' की अवधारणाओं को कड़ाई से लागू किया जाने लगा। शूद्र,अछूत बन गए। इसी कठोर सामाजिक विभाजन का वर्णन मनु के'मानव धर्मशास्त्र' में किया गया है।
आरएसएस के एक प्रमुख विचारक गोलवलकर ने जाति प्रथा का बचाव दूसरे तरीके से किया। 'अगर किसी विकसित समाज को यह एहसास हो जाए कि समाज में व्याप्त अंतर, वैज्ञानिक सामाजिक ढांचे पर आधारित हैं और वे समाजरूपी शरीर के अलग.अलग अंगों की ओर संकेत करते हैं तो सामाजिक विविधता, कोई दाग नहीं रह जायेगी।' ;आर्गनाइजर, 1 दिसंबर 1952, पृष्ठ 7.। संघ परिवार के एक अन्य प्रमुख विचारक दीनदयाल उपाध्याय ने लिखाए 'हमारी अवधारणा यह है कि चार जातियां ;वर्ण. दरअसलए विराट पुरूष के विभिन्न अंग हैं ये अंग न केवल एक दूसरे के पूरक हैं वरन् उनमें मूल एकता भी है। उनके हित, पहचान और संबद्धता एक ही हैं'अगर इस विचार को जिंदा नहीं रखा गया तो जातियां एक दूसरे की पूरक होने की बजाए कटुता और संघर्ष का कारण बन सकती हैं। परंतु यह विरूपण होगा' ;दीनदयाल उपाध्याय, इंटीग्रल हृयूमेनिजम, नई दिल्ली, भारतीय जनसंघ, 1965, पृष्ठ 43।
जाति प्रथा का विरोध करने के लिए हुए सामाजिक संघर्ष और इस प्रथा के अत्याचारों से मुक्ति पाने की कोशिश को अंबेडकर ने क्रांति और प्रति.क्रांति के रूप में प्रस्तुत किया है। वे 'मुस्लिम.पूर्व' काल को तीन भागों में बांटते हैं ;अ ब्राह्मणवाद ;वैदिक काल। ;बद्ध बौद्धकाल जिसमें मगध.मौर्य साम्राज्यों का उदय हुआ और जिसमें जातिगत असमानताओं को नकारा गया। इस काल को वे क्रांति का काल कहते हैं। ;स 'हिंदू धर्म' या प्रति क्रांति का काल,जिसमें ब्राह्मणों का प्रभुत्व फिर से कायम हुआ और जातिगत ऊँचनीच मजबूत हुई।
मुस्लिम शासकों के आगमन के बहुत पहले से भारत में शूद्रों को अछूत माना जाता था और वे समाज के सबसे दमित और शोषित वर्ग में शामिल थे। उत्तर.वैदिक गुप्तकाल के बाद से अछूत प्रथा और जाति व्यवस्था की क्रूरता और उसकी कठोरता में वृद्धि होती गई। बाद में भक्ति जैसे सामाजिक आंदोलनों ने प्रत्यक्ष रूप से और सूफी आंदोलन ने अप्रत्यक्ष रूप से कुछ हद तक जातिगत दमन और अछूत प्रथा की कठोरता में कमी लाई।
संघ परिवार जो कर रहा हैए उसका उद्देश्य सच को दुनिया से छुपाना और अपने राजनैतिक एजेण्डे को लागू करना है।

          -राम पुनियानी

रविवार, 26 अक्टूबर 2014

लोकतंत्र के लिए चुनौती भरे दिन

समझौता एक्सप्रेस, मालेगांव और मक्का मस्जिद में हुए आतंकवादी हमले की आरोपी साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर के साथ, लगभग पांच साल पहले किसी गोपनीय वैठक में अपनी तस्वीर के सार्वजनिक हो जाने से चर्चा में रह चुके राजनाथ सिंह एक बार फिर गलत कारणों से चर्चा मे हैं। बेशक इस बार देश के गृहमंत्री के बतौर, जिन्हें पिछले दिनों तिरुअनन्तपुरम में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यकर्ता संतोष ने सार्वजनिक तौर पर पगड़ी पहनाई। इसकी तस्वीरें देश भर के अखबारों में छपी हैं। संतोष पर 2008 में माकपा के युवा संगठन डीवाईएफआई के कार्यकर्ता विष्णु की हत्या का आरोप है और इन दिनों वह जमानत पर छूटा है।
                                                 इस विवाद से कुछ अहम सवाल उठने लाजिमी हैं जो मौजूदा केन्द्र सरकार की वैचारिक और कार्यनीतिक दिशा का भी आभास करा देते हैं। मसलन हत्या जैसे गंभीर मामले के आरोपी का इतना साहस कैसे हो सकता है कि वह देश के गृहमंत्री तक सार्वजनिक तौर पर पहुंच जाए, उनके सर पर पगड़ी पहनाए और तस्वीरें खिंचवा ले? जबकि गृहमंत्री को जेड प्लस की सुरक्षा मिली हुई है। उनसे किसी अहम शक्सियतों को मिलने के लिए भी काफी मेहनत करनी पड़ती है। तो क्या यह गर्म जोशी भरी मुलाकात इसलिए संभव हो सकी कि राजनाथ सिंह और संतोष दोनों एक ही मातृ संगठन आरएसएस से जुड़े हैं? बहुत हद तक संभव लगने के बावजूद सामान्यतः ऐसा नही होता। क्योंकि किसी संगठन या पार्टी से जुड़े लोगों के संवैधानिक पदों पर पहुंच जाने के बाद अमूमन उनकी तरफ से ही संवैधानिक और सांगठनिक के फर्क को बरता जाता है। और वो अपने को संविधान के प्रति जवाबदेह मानता है न कि अपने संगठन के प्रति।
                                                                       इसीलिए, प्रधानमंत्री या कोई भी मंत्री देश का प्रधानमंत्री या मंत्री होता है। अपनी पार्टी या संगठन का नही। इसलिए इन पदों पर पहुंचने वाले लोग अपने संगठन से जुड़े हत्या जैसे जघन्यतम अपराध के आरोपियों से सार्वजनिक रूप से मिलने से बचते हैं। यह दिखाने के लिए ही सही, लेकिन एक अच्छी परंपरा रही है।
                    इसलिए हत्या आरोपी संघ कार्यकर्ता के हाथों पगड़ी पहनना और मुस्कराते हुए फोटो खिंचवाना, इन दोनों के एक ही संगठन से जुड़े होने के कारण ही संभव नही हो सकता। यह तभी संभव है जब गृहमंत्री संवैधानिक और सांगठनिक के बीच के भेद बरतने की हमारी लोकतांत्रिक परंपरा से असहमत हों। वे दोनों के बीच के अंतर को मिटा देना चाहते हों।
                                                  दरअसल, सरकार के ऊंचे पद पर बैठे लोगों के सोचने के नजरिए में आया यह छोटा लगने वाला बदलाव, वह सबसे अहम बदलाव है जिसे देश सोलह मई के बाद से ही यानी चुनाव परिणामों के घोषित होने से ही महसूस कर रहा है। यह बदलाव सिर्फ किसी एक मंत्रालय तक सीमित नहीं है। इसकी अभिव्यक्ति पूरे देश में हम महसूस कर सकते हैं, जहां संविधान की शपथ लेकर बनी सरकार को संघ
परिवार, जिसका साहित्य भारतीय संविधान को ’पश्चिमी, आधुनिक और अपशकुन’ बताता रहा है, और उसके दूसरे अनुवांशिक संगठनों बजरंग दल और विहिप में रूपान्तरित होते हुए देखा जा सकता है। जहां संविधान के कस्टोडियन यानी जमानतदार न्यायपालिका को अपने हिसाब से ’ठीक’ किया जा रहा है। जहां किसी अमित शाह के किसी हत्याकांड के मुकदमे में अदालत में पेश न होने पर वजह पूछने वाले जज को रातों-रात स्थानांतरित कर दिया जाता है। या फिर किसी प्रतिष्ठित पत्रकार को संघ की ’सांस्कृतिक’ विचारधारा में आकंठ डूबे गुंडों द्वारा सरेआम पीट दिया जाता है। लेकिन इन तमाम घटनाओं पर हम आज तक नही जान पाए कि सरकार की सबसे ऊंची कुर्सियों पर बैठे लोग क्या सोचते हैं? वे अपने ’गुरू भाइयों’ की करतूत से सहमत हैं या असहमत? सार्वजनिक तौर पर ’असहमति’ जता देने और अंदर ही अंदर उनकेे साथ खड़ा होने की रणनीतिक मजबूरी जो पिछले गठबंधन वाली एनडीए सरकार में बनी रहती थी, उसे भी उन्होंने तिलांजलि दे दी है?
                   इन सब मसलों पर हम कुछ भी नही जानते, क्योंकि सरकार की ऊंची कुर्सियां मीडिया से बात नही करतीं। वे एक तानाशाही निजाम की तरह सिर्फ बोलती दिख रही हैं। वह भी सिर्फ एकल माध्यमों जैसे ट्वीटर पर। यानी एक भयानक तरह की चुप्पी है, जो साजिशी और सुनियोजित लगती है। उसमें एक खतरनाक किस्म की सड़ांध हैं। इसे छह दशकों के लोकतंत्र के तमाम बुरे अनुभवों के बावजूद पहली बार ही बिल्कुल स्पष्ट महसूस किया जा रहा है।
                                         लेकिन ऐसा नही है कि वे सिर्फ अराजकतावादियों की तरह परंपराओं को नष्ट कर
रहे हैं। वे नया गढ़ भी रहे हैं। जो उनके स्पष्ट फासीवादी प्रवृत्ति और एजेंडे को पुख्ता करता है। इसीलिए हम पाते हैं कि सरकार के बजाए संघ प्रमुख और उनके लोग खुलकर मीडिया से मुखातिब हो रहे हैं, जो वे अपने को
पहले सिर्फ एक ’सांस्कृतिक’ संगठन होने के तर्क के साथ करने से बचते थे। यानी अलोकतांत्रिक तरीके से चलने वाला संगठन संघ परिवार देश की ड्राइविंग सीट पर बैठ गया है। वह एजेंडा तय कर रहा है कि कौन भारतीय है, इतिहास की पुस्तकों में क्या पढ़ाया जाना चाहिए और किन्हे दुबारा हिन्दू बनाया जाना चाहिए। वहीं जनता द्वारा चुने गए लोग या तो प्रधानमंत्री की तरह कार्पोरेट के ’हरकारों’ की तरह आज दुनिया भर में दौड़ लगा रहे हैं तथा संघ के गुरू भाइयों के जघन्यतम अपराधों को सार्वजनिक तौर पर वैधता दे रहे
हैं, गृह मंत्री की तरह। ये बदलाव इस सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इससे न सिर्फ पूरा देश सांसत
में फंसने जा रहा है बल्कि स्वयं लोकतंत्र के समक्ष भी एक चुनौती उत्पन्न होती दिख रही है। जो जाहिर है भारत के लिए अच्छे दिन नही हैं।
-गुफरान सिद्दीकी

विस्मृत मृतात्माओं की साधना क्यों ?

पांच महीने अभी पूरे हुए हैं और मोदी के प्रचारकों का सुर बदल गया। देखिये कल, 24 अक्तूबर के ‘टेलिग्राफ’ में स्वपन दासगुप्त का लेख - Picky with his symbol (अपने प्रतीक का खनन)।
स्वपन दासगुप्त, मोदी बैंड के एक प्रमुख वादक, चुनाव प्रचार के दिनों में बता रहे थे - गुजरात का यह शेर सब बदल डालेगा। आजादी के बाद से अब तक जीवन के सभी क्षेत्रों में ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता’ का जो नाटक चलता रहा है, उसका नामो-निशान तक मिट जायेगा। इतिहास की एक नयी इबारत लिखी जायेगी।
                                     आज वही दासगुप्ता मोदी विरोधियों को इस बात के लिये लताड़ रहे हैं कि क्या हुआ, मोदी को लेकर इतना डरा रहे थे, कुछ भी तो नहीं बदला। मोदी की राक्षस वाली जो तस्वीर पेश की जा रही थी, अल्पसंख्यकों को डराया जा रहा था, पड़ौसी राष्ट्रों से भारी वैमनस्य की आशंकाएं जाहिर की जा रही थी - वैसा कुछ भी तो नहीं हुआ। बनिस्बत्, अपने राजतिलक के मौके पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री तक को आमंत्रित करके, जापान, अमेरिका सहित सारी दुनिया को आर्थिक उदारवाद की मनमोहन सिंह की नीतियों पर ही और भी दृढ़ता के साथ चलने का आश्वासन देकर और ‘स्वच्छ भारत’ आदि की तरह के अपने प्रचार अभियानों में आमिर खान, सलमान खान को शामिल करके, और तो और, स्वपन दासगुप्त के अनुसार, योगी आदित्यनाथ की जहरीली बातों का खुला समर्थन न करके मोदी ने अपने ऐसे सभी विरोधियों को निरस्त कर दिया है। उनके लेख की अंतिम पंक्ति है - ‘‘ मोदी के आलोचकों को अब उनकी पिटाई के लिए नयी छड़ी खोजनी होगी, पुरानी तो बेकार होगयी है।’’
(Modi’s critics must find a new stick to beat him with. The old one has blunted)
                                           दासगुप्त का यह कथन ही क्या यह बताने के लिये काफी नहीं है कांग्रेस-शासन के दुखांत के बाद, यह ‘कांग्रेस-विहीनता’ का शासन प्रहसन के रूप में इतिहास की पुनरावृत्ति के अलावा और कुछ नहीं साबित नहीं होने वाला !
                                     मार्क्स की विश्लेषण शैली का प्रयोग करें तो कहना होगा - मानव अपना इतिहास स्वयं बनाते हैं पर मनचाहे ढंग से नहीं। वे अतीत से मिली परिस्थितियों में काम करते हैं और मृत पीढि़यों की परंपरा जीवित मनुष्यों के मस्तिष्क पर एक दुरूस्वप्न सी हावी रहती है। ‘‘ऐसे में कुछ नया करने की उत्तेजना में ही अक्सर वे अतीत के प्रेतों को अपनी सेवा में आमंत्रित कर लेते हैं। उनसे अतीत के नाम, अतीत के रणनाद और अतीत के परिधान मांगते हैं ताकि इतिहास की नवीन रंगभूमि को चिर-प्रतिष्ठित वेश-भूषा में, इस मंगनी की भाषा में पेश कर सके।’’
आरएसएस के प्रचारक और गुजरात (2002) के सिंह के जिन प्रतीकों के आधार पर स्वपन दासगुप्त मोदी को एक नये बदलाव का सारथी बता रहे थे, वे ही अब यह कह करे हैं कि ‘‘प्रधानमंत्री मोदी और चुनाव प्रचार के समय का अदमनीय मोदी बिल्कुल भिन्न है। यह नयी मोदी शैली अभी विकासमान है और इसकी कोई चौखटाबद्ध परिभाषा करना जल्दबाजी होगी।’’

(Modi the prime minister has chosen to be markedly different from Modi the indefatigable election campaigner. The style is still evolving and it would be premature to attempt a rigid definition of the new style)


                                       नयी मोदी शैली ! पहले सरदार पटेल, अब गांधी, नेहरू भी - भारत की राष्ट्रीय राजनीति की चिरप्रतिष्ठित वेश-भूषा और मंगनी की पुरानी भाषा की सजावट से तैयार हो रही नयी शैली !
                                                इसमें शक नहीं कि दुनिया के सभी बड़े-बड़े परिवर्तनों की लड़ाइयों को बल पहुंचाने के लिये अतीत के प्रतिष्ठित प्रतीकों का, आदर्शों और कला रूपों का भी प्रयोग होता रहा हैं। वर्तमान की लड़ाई के सेनानियों में एक नया जज़्बा पैदा करने के लिये अनेक मृतात्माओं को पुनरुज्जीवित किया जाता रहा है। भारत की आजादी की लड़ाई का इतिहास तो ऐसे तमाम उदाहरणों से भरा हुआ है। आधुनिक जनतांत्रिक विचारों के साथ ही इसकी एक धारा स्पष्ट तौर पर पुनरुत्थानवादी धारा रही है। लेकिन उस लड़ाई में अतीत के आदर्शों और प्रतीकों का, अनेक मृतात्माओं का उपयोग गुलामी से मुक्ति की लड़ाई को गौरवमंडित करने के उद्देश्य से किया गया था, न कि किसी प्रकार की भौंडी नकल भर करने के लिएय उनका उपयोग अपने उद्देश्यों और कार्यभारों की गुरुता को स्थापित करने के लिये किया गया था, न कि अपने घोषित कार्यभारों को पूरा करने से कतराने के लिये, अपने चरित्र पर पर्दादारी के लियेय उनका इस्तेमाल कुंद की जा चुकी प्राचीन गौरव की आत्मा को जागृत करने के लिए किया गया था न कि उसके भूत को मंडराने देने के लिए, अपने समय को भूतों का डेरा बना देने के लिये।
                                                     गौरवशाली, वीरतापूर्ण राष्ट्रीय आंदोलन की कोख से इस देश में एक पूंजीवादी जनतांत्रिक राज्य की स्थापना हुई। राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व से अबतक इसके विभिन्न चरणों में कई प्रवक्ता पैदा हुए - पंडित नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह। इनके अलावा गैर-कांग्रेस दलों से भी छोटे-बड़े अंतरालों के लिये मोरारजी देसाई, चरण सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, देवगौड़ा, गुजराल और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे प्रवक्ता सामने आएं। यह कहानी, स्वतंत्र भारत में भारतीय पूंजीवाद के विकास की कहानी, पूरे सड़सठ सालों की कहानी है। इतने लंबे काल तक नाना प्रकार के टेढ़े-मेढ़े रास्तों से लगातार धन के उत्पादन, लूट-खसोट और गलाकाटू प्रतिद्वंद्विताओं में तल्लीन हमारा आज का उपभोक्तावादी समाज इस बात को लगभग भूल चुका है कि उसका जन्म आजादी की लड़ाई के दिनों के वीर सेनानियों की मृतात्माओं के संरक्षण में हुआ हैं। राजनीति एक आदर्श-शून्य, शुद्ध पेशेवरों का कमोबेस खानदानी धंधा बन चुकी है।
                                              ऐसे सामान्य परिवेश में, अतीत के सारे कूड़ा-कर्कट को साफ कर देने की दहाड़ के साथ सत्तासीन होने वाले शूरवीर द्वारा अपनी सेवा के लिये मृतात्माओं का आह्वान किस बात का संकेत है ? क्या तूफान की गति से इतिहास का पथ बदल देने का दंभ भरने वालों में सिर्फ पांच महीनों में ही सहसा किसी मृतयुग में पहुंच जाने का अहसास पैदा होने लगा है? वैसे भी, हाल के उपचुनावों और राज्यों के चुनावों के बाद एक सिरे से सब यह कहने लगे हैं कि भाजपा की बढ़त के बावजूद मोदी लहर जैसी किसी चीज का अस्तित्व नहीं रहा है। राजनीति के नाम पर वही सब प्रकार की जोड़-तोड़, सरकारें बनाने-बिगाड़ने की अनैतिक कवायदें, अपराधियों को हर प्रकार का संरक्षण देने की शर्मनाक कोशिशें, एक-दूसरे की टांग खिंचाई की साजिशाना हरकतें, सार्वजनिक धन को निजी हाथों में सौंप देने की राजाज्ञाएं, सीमाओं को लेकर थोथा गर्जन-तर्जन और विश्व पूंजीवाद के सरगना अमेरिका की चरण वंदना। यही तो है, एक शब्द में - राजनीति का मोदी-अमितशाहीकरण !
                                इसीलिये, स्वपन दासगुप्त जो भी कहे, अब इतना तो साफ है कि मोदी का सत्ता में आना किसी आकस्मिक हमले के जरिये बेखबरी की स्थिति में किसी को अपने कब्जे में ले लेना जैसा ही था। वैसा धुआंधार, एकतरफा प्रचार पहले किसी ने नहीं देखा था। अन्यथा, न भ्रष्टाचार-कदाचार में कोई फर्क आने वाला है, न तथाकथित नीतिगत पंगुता में। जब आंख मूंद कर पुराने ढर्रे पर ही चलना है तो क्या सजीवता, और क्या पंगुता ! इस पूरे उपक्रम में यदि कुछ बदलेगा तो, जैसा कि नाना प्रकार की खबरों से पता चल रहा है, पिछली सरकार द्वारा मजबूरन अपनाये गये गरीबी कम करने के कार्यक्रमों में कटौती होगीय भूमि अधिग्रहण कानून में किसानों के हित में किये जारहे सुधारों को रोका जायेगाय और भारत में विदेशी पूंजी के अबाध विचरण का रास्ता साफ किया जायेगा। भारत सरकार गरीबों को दी जाने वाली तमाम प्रकार की रियायतों में कटौती करें, इसके लिये सारी दुनिया के  बाजारवादी अर्थशास्त्री लगातार दबाव डालते रहे हैं। इसीप्रकार भूमि अधिग्रहण के मामले में बढ़ रही दिक्कतों को खत्म करने और बैंकिंग तथा बीमा के क्षेत्र को विदेशी पूंजी के लिये पूरी तरह से खोल देने के लिये भी दबाव कम नहीं हैं। मनमोहन सिंह इन सबके पक्ष में थे, फिर भी विभिन्न राजनीतिक दबावों के कारण अपनी मर्जी का काम नहीं कर पा रहे थे। इसीलिये उनकी सरकार पर लगने वाले ‘नीतिगत पंगुता’ के सभी सच्चे-झूठे अभियोगों में ये सारे प्रसंग भी शामिल किये जाते थे। मोदी सरकार ने इसी ‘नीतिगत पंगुता’ से उबरने के लिये सबसे पहले गरीबी को कम करने वाली योजनाओं की समीक्षा करनी शुरू कर दी है। बीमा क्षेत्र को तो विदेशी पूंजी के लिये खोल ही दिया है, भूमि अधिग्रहण विधेयक के मामले में भी पहले सर्वसम्मति से जो निर्णय लिये गये थे, उन सबको बदलने के बारे में विचार का सिलसिला शुरू हो गया है।
                 चन्द रोज पहले ही प्रकाशित हुई विश्व बैंक की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि सन् 2011 से 2013 के बीच दुनिया में गरीबी को दूर करने में भारत का योगदान सबसे अधिक (30 प्रतिशत) रहा है। खास तौर पर मनरेगा और बीपीएल कार्ड पर सस्ते में अनाज मुहैय्या कराने  की तरह के कार्यक्रमों ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। इन कार्यक्रमों के चलते भारत में मजदूरी के सामान्य स्तर में वृद्धि हुई है। लेकिन भारतीय उद्योग और मोदी सरकार भी सस्ते माल के उत्पादन की प्रतिद्वंद्विता में भारत को दुनिया के दूसरे देशों से आगे रखने के नाम पर मजूरी के स्तर को नियंत्रित रखना चाहती है। ‘श्रमेव जयते’ योजना, पूंजी और श्रम के बीच की टकराहट में सरकार की अंपायर की भूमिका के अंत की योजना, जिसकी घोषणा के दिन को खुद भाजपा के श्रमिक संगठन, भारतीय मजदूर संघ ने भारत के मजदूरों के लिये एक काला दिवस कहा, मोदी उसीकी शेखी बघारने में फूले नहीं समा रहे। हांक रहे हैं - ‘श्रमयोगी बनेगा राष्ट्रयोगी’।
                        इन सारी स्थितियों में, ‘कांग्रेस-विहीन’ भारत सिर्फ चमत्कारों पर विश्वास करने वाले कमजोर लोगों में ही किसी नये विश्वास का उद्रेक कर सकता है। भविष्य के उन कार्यक्रमों के गुणगान में, जिनकी उन्होंने अपने मन में योजनाएं बना रखी है, लेकिन उन पर असल में अमल की कोई मंशा या अवधारणा ही नहीं हैं, ये वर्तमान के यथार्थ के अवबोध को ही खो दे रहे हैं।
                                           ‘स्वच्छता अभियान’ का ही प्रसंग लिया जाए। साफ और स्वच्छ भारत के पूरे मसले को जनता के शुद्ध आत्मिक विषय में तब्दील करके पूरे मामले को सिर के बल खड़ कर दिया जा रहा है। इन्हीं तमाम कारणों से वह समय दूर नहीं होगा, जब यह प्रमाणित करने के लिये इकट्ठे हुए लोग कि हम अयोग्य नहीं है, अपना बोरिया-बिस्तर समेटते हुए दिखाई देने लगेंगे - ‘जो आता है वह जाता है’ का बीतरागी गान करते हुए। स्वपन दासगुप्त मोदी-विरोधियों से मोदी की पिटाई के लिये नयी छड़ी खोजने की बात करते हैं। यह नहीं देखते कि जो पिटे हुए रास्ते पर चलने की पंगुता का शिकार हो, उसे पीटने के लिये किसी छड़ी की जरूरत ही नहीं होगी। मोदी शासन के प्रारंभ में ही उसके दुखांत के बीज छिपे हुए हैं। 

------अरुण माहेश्वरी

बुधवार, 22 अक्टूबर 2014

पिछड़े मुसलमान



लगभग 2 वर्ष पहले मुझे पटना में पिछड़े वर्ग के मुसलमानों के एक सम्मेलन को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया गया था। इस सम्मेलन का आयोजन ‘‘तहरीक-ए-पसमांदा मुस्लिम समाज‘‘ ने किया था। सम्मेलन में लगभग 400 लोग उपस्थित थे। हर वक्ता को केवल तीन-चार मिनट बोलने के लिए कहा गया और संयुक्त राष्ट्र संघ के एक अधिकारी को छोड़कर, अन्य सभी के मामले में इस नियम का पालन हुआ। सम्मेलन 11 बजे सुबहशुरू हुआ और चाय या भोजन अवकाश  के बिना 5 बजे तक चलता रहा। इस प्रकार, लगभग 150 लोगों ने सम्मेलन में भाषण दिया, जिसमें से केवल पांच हिन्दू दलित थे और एक दलितों के बीच काम करने वाला ईसाई सामाजिक कार्यकर्ता था। वक्ताओं ने मुस्लिम नेतृत्व को कोसने के लिए जिस भाषा का इस्तेमाल किया, उसे मैं यहां दोहरा नहीं सकता। उन्होंने कहा कि उनके नेताओं को उनकी बदहाली की कोई परवाह नहीं है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि सभी पार्टियों के मुस्लिम नेता, समुदाय को केवल भावनात्मक मुद्दों पर भड़काने का काम करते आ रहे हैं। इनमें शामिल हैं बाबरी मस्जिद, मुस्लिम पर्सनल लाॅ, शाहबानो व सेटेनिक वर्सेस पर प्रतिबंध जैसे मसले। उनका कहना था कि मुस्लिम पिछड़े वर्गों की हालत, हिन्दू दलितों से भी बदतर है। उन्हें न केवल समाज अछूत मानता है वरन् उनके समुदाय के सदस्य भी उनके साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहते। वक्ताओं में हलालखोर समाज के प्रतिनिधि शामिल थे। इस समाज के सदस्य, सिर पर मैला ढोने का काम करते हैं। मुस्लिम अशरफ, अपवित्रता और पवित्रता की अवधारणाओं में उतना ही विस्वाश -वास करते हैं जितना कि हिन्दू उच्च जाति के लोग। हलालखोरों को भी मस्जिदों में प्रवेश करने से हतोत्साहित किया जाता है और अगर इस समुदाय का कोई सदस्य, परिणामों की परवाह किए बगैर, मस्जिद में घुस भी जाता है तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि वह नमाजियों की सब से आखिर की पंक्ति में खड़ा हो। पिछड़े मुसलमानों की हालत, हिन्दू दलितों से भी खराब है क्योंकि हिन्दू दलितों को कम से कम अनुसूचित जाति के बतौर, संवैधानिक और कानूनी लाभ प्राप्त हैं जबकि सन् 1950 के राष्ट्रपति के आदेष के अनुसार, किसी गैर-हिन्दू, गैर-सिक्ख या गैर-बौद्ध को अनुसूचित जाति के तौर पर अधिसूचित करने पर प्रतिबंध है। इस तरह, वे शैक्षणिक संस्थाओं, सरकारी नौकरियों और संसद व विधानसभाओं में आरक्षण के लाभ से वंचित हैं। इसी तरह, उन्हें अनुसूचित जाति, जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की सुरक्षा भी प्राप्त नहीं है। एक वक्ता, जो सारी मुसीबतों से जूझकर शिक्षा प्राप्त करने में सफल हो गया था, को तब भी अशरफ समुदाय में सम्मान प्राप्त नहीं था। केवल उसकी हलालखोर बिरादरी के सदस्य उस पर गर्व महसूस करते थे। एक हिन्दू नाम का उपयोग कर वह सरकारी नौकरी पाने में सफल भी हो गया था। इस्लाम में अपनी आस्था को उसे अपने दिल के एक कोने में छुपाकर रखना पड़ता था और उसके परिवार का सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन अलग-अलग था।
सम्मेलन में दलित हिन्दू वक्ताओं ने दलित मुसलमानों की हालत पर चिंता और दुःख व्यक्त किया और यह मांग की कि गैर-हिन्दू, गैर-सिक्ख और गैर-बौद्ध दलितों को भी अनुसूचित जाति में शामिल किया जाना चाहिए। यहां यह महत्वपूर्ण है कि अन्य समुदायों को अनुसूचित जाति में शामिल करने से आरक्षण के लाभ और बंट जायेंगे परंतु फिर भी हिन्दू दलित, अपने मुसलमान साथियों की खातिर यह त्याग करने को तैयार थे।
इस सम्मेलन से एक बार फिर यह स्पष्ट हुआ कि मुस्लिम ‘समुदाय’, दरअसल, समुदाय है ही नहीं। इसमें कई अलग-अलग बिरादरियां हैं जैसे हलालखोर, खटीक, तेली, तंबोली, जुलाहा, बागवान, पठान, सैय्यद, शेख इत्यादि। इन मुस्लिम बिरादरियों को मुख्यतः तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है-अशरफ (श्रेष्ठी वर्ग, हिन्दू उच्च जातियों के समकक्ष), अजलफ (ओबीसी के समकक्ष कारीगर वर्ग) व अरज़ल (दलित हिन्दुओं के समकक्ष वे मुस्लिम बिरादरियां जो ‘अपवित्र काम’ करती हैं)। अशरफ, अजलफ और अरज़ल शब्द किसी भारतीय भाषा के शब्द नहीं हैं। ये अरबी के शब्द हैं और इनका इस्तेमाल सल्तनत काल से होता आ रहा है। तब भी इस्लाम के मानने वालों में इतना भेदभाव था कि पिछड़े वर्गों से मुसलमान बनने वालों पर शरियत कानून लागू नहीं होते थे। मदरसे केवल अशरफ और अजलफ मुसलमानों के लिए थे और अरजल बिरादरियों के बच्चों को केवल सूफी संतों और उनकी दरगाहों का सहारा था-वे दरगाहें जहां सबका स्वागत था-हिन्दुओं और मुसलमानों का, दलितों और उच्च जातियों का, महिलाओं और पुरूषों का। जब इस्लाम और ईसाई धर्म, दक्षिण एशिया पहुंचे तब उनका सामना भारत में सदियों से स्थापित जाति व्यवस्था से हुआ। जहां तक ऊँची जातियों की बात है उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था कि शूद्र कौन सा धर्म, परंपराएं या कर्मकांड अपनाते हैं। उन्होंने वैसे भी शूद्रों को अपने समुदाय और समाज से बाहर कर रखा था। अतः उन्हें शूद्रों के इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने से कोई फर्क नहीं पड़ता था। राज्य का मूल चरित्र सामंती था और वह हिन्दू और मुस्लिम श्रेष्ठी वर्ग के हितों का रक्षक था। वह ऊँचनीच और जन्म-आधारित भेदभाव को बनाए रखना चाहता था। आज भी मुस्लिम बिरादरियों की वफादारी, उनकी बिरादरी से जुड़े संगठनों (कुछ-कुछ जाति पंचायतों की तरह) के प्रति होती है। पारिवारिक विवादों के मामले में दारूलउलूम या मुस्लिम विधिशास्त्रीय संस्थाओं की बजाए बिरादरी से जुड़ी संस्थाओं से संपर्क किया जाता है। शैक्षणिक संस्थाएं और वजीफे आदि देने वाले संगठन भी मुख्यतः अपनी-अपनी बिरादरी के सदस्यों के लिए ही होते हैं। बिरादरियों में आपस में ही विवाह होते हैं और बिरादरी से बाहर विवाह बहुत ही कम मामलों में स्वीकार किये जाते हैं। विभिन्न बिरादरियों के बीच रोटी का व्यवहार तो शायद होता भी हो परंतु बेटी का नहीं होता।
मुस्लिम समुदाय इसलिए पिछड़ा है क्योंकि उसकी अधिकांश बिरादरियां सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़ी हैं। परंतु अशरफ बिरादरियों की समाज में अच्छी पकड़ है क्योंकि उनमें से कई गुजरे जमाने में नवाब और जमींदार थे। उसी तरह, गुजरात की तीन व्यवसायी बिरादरियों-बोहरा, कच्छी मेमन व खोजा-भी शिक्षा व रोजगार की दृष्टि से काफी अच्छी स्थिति में हंै। यद्यपि उन्हें भी मुसलमानों के दानवीकरण के कारण भेदभाव का सामना करना पड़ता है परंतु फिर भी अपनी शैक्षणिक, सामाजिक व आर्थिक ताकत के कारण, उन्हें इस भेदभाव से बहुत नुकसान नहीं होने पाता। आधुनिक शिक्षा देने वाली मुसलमानों के जो चंद शैक्षणिक संस्थान हैं, उन पर अशरफों का नियंत्रण है। पहली से चौदहवीं लोकसभा तक केवल पांच पिछड़े मुसलमान सदन के सदस्य बन सके।  यही हालत राज्यसभा और विधानसभाओं की भी है। यद्यपि वर्तमान राज्यसभा में कई मुस्लिम सदस्य हैं परंतु उनमें से एक भी पिछड़े वर्ग का नहीं है। राजनैतिक पार्टियों में भी पिछड़े मुसलमानों का  प्रतिनिधित्व न के बराबर है जबकि पिछड़े मुसलमान, कुल मुस्लिम आबादी के 90 प्रतिशत से भी अधिक हैं। इसके बावजूद, समुदाय का नेतृत्व अशरफों के हाथों में हैं जो पूरे समुदाय का प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं और समुदाय के सदस्यों को सेटेनिक वर्सेस, डच कार्टून, बाबरी मस्जिद और शाहबानो जैसे पहचान से जुड़े मुद्दों में उलझाये रखते हैं। इसके विपरीत, पिछड़े मुसलमानों के अधिवेशन में एक भी वक्ता ने इन मुद्दों की चर्चा नहीं की। वे बेशक इस्लाम से प्यार करते हैं परंतु उनके लिए उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति, सामाजिक न्याय, शिक्षा इत्यादि सबसे महत्वपूर्ण हैं। इस्लाम उनके लिए एक निजी मामला है जिसके नियमों का पालन वे अपने घर की चहारदीवारी में करते हैं। इस्लाम उनके लिए आस्था का प्रश्न  है, राजनैतिक हितों को बढ़ावा देने के लिए भीड़ जुटाने का हथियार नहीं। वे अशरफ मुसलमानों की तुलना में स्वयं को हिन्दू दलितों के अधिक करीब पाते हैं और वे उन लोगों से प्रभावित हैं, जो सामाजिक न्याय की बात करते हैं। उनके लिए उनकी प्राथमिक पहचान ‘दलित’ है, ‘मुसलमान’ नहीं। अन्य मुसलमानों और स्वयं में वे जो चीज एक सी पाते हैं वह है आराधना करने का तरीका और धर्म। इसके अलावा कुछ भी नहीं। अन्य मामलों में वे मुसलमानों की बजाए दलितों के अधिक नजदीक हैं। हाल के आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के एक निर्णय पर हो रही बहस को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। क्या मुस्लिम ‘समुदाय’ शैक्षणिक व समााजिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ वर्ग है? मेरे विचार में, भारत के मुसलमान न तो कोई समुदाय हैं और न कोई वर्ग। काका कालेलकर आयोग और उसके बाद मंडल आयोग ने मुस्लिम पिछड़े वर्गों को सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल किया था।
हमारा संविधान धर्मनिरपेक्ष है और पूरे मुस्लिम समुदाय को आरक्षण देना, धर्म के आधार पर भेदभाव करना होगा। मुसलमानों को आरक्षण देने में कानूनी बाधाएं तो हैं ही परंतु मेरी यह राय है कि ऐसा करना वांछनीय भी नहीं है क्योंकि इससे मुख्यतः वे अशरफ बिरादरियां लाभान्वित होंगी जो पहले से ही सामाजिक-आर्थिक-शैक्षणिक दृष्टि से आगे हैं और जिन्हें आरक्षण की कतई आवश्कता  नहीं है। बोहरा, मेमन और खोजा समुदाय में एक बड़ा शिक्षित मध्यम वर्ग है। ये तीनों समुदाय  गुजरात के हैं और ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में बंबई में बंदरगाह बनने के बाद, पष्चिमी भारत में हुए विकास से लाभांवित हुए हैं। इन समुदायों की युवा पीढ़ी आरक्षण के बिना भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रही है। शिक्षा प्राप्त करने के बाद यद्यपि उनमें से कुछ डाक्टर, इंजीनियर, वकील, चार्टर्ड अकाउंटेंट आदि बतौर काम करते हैं परंतु कुछ अपने पारिवारिक व्यवसाय को चलाना ही बेहतर समझते हैं। मस्जिदों और मदरसों के अलावा, इस समुदाय के सदस्यों ने देश भर में कई शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों व अन्य सार्वजनिक संस्थाओं की स्थापना भी की है। भारत के सभी समुदायों में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीण करने वालों का प्रतिशत 26 है। इसके मुकाबले, 17 प्रतिशत मुसलमान मैट्रिक्यूलेट हंै। परंतु इनमें भी अशरफों, जिनमें बोहरा, खोजा और मेमन शामिल हैं, की संख्या सबसे ज्यादा है। इसी तरह, जो 3.6 प्रतिशत मुसलमान स्नातक परीक्षा पास हैं और 0.4 प्रतिशत, जिन्होंने तकनीकी शिक्षा प्राप्त की है, उनमें भी अशरफों की बहुलता है यद्यपि वे कुल मुस्लिम आबादी का केवल 10 प्रतिशत हैं। ऐसी स्थिति में अगर रकार मुसलमानों की भलाई के लिए कोई सकारात्मक कदम उठाती है तो उसके सभी लाभों पर अशरफ कब्जा कर लेंगे। इसका कारण यह है कि वे पहले से ही शिक्षित हैं और आरक्षण का लाभ उठाना उनके लिए कहीं आसान होगा। इसके विपरीत, पहले से ही पिछड़े अजलफ और अरजल पिछड़े ही बने रहेंगे। बेहतर यह होगा कि सभी मुसलमानों को आरक्षण देने की बजाए, विशिष्ट मुस्लिम समूहो  या बिरादरियों को पिछड़े वर्गों की सूची में शामिल किया जाए ताकि लाभ उन तक पहुंचे जिन्हें उसकी जरूरत है। ऐसा करके हम इस सच्चाई को भी स्वीकार करेंगे कि मुस्लिम समुदाय एकसार नहीं है।
सत्ता में आने के बाद, आंध्रप्रदेश की वाय.एस. राजशे खर रेड्डी सरकार ने कानून बनाकर मुसलमानों को  5 प्रतिशात आरक्षण देने का निर्णय लिया। इस नये कानून को आंध्रप्रदेशा उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और न्यायालय ने उसे असंवैधानिक व समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन बताते हुए रद्द कर दिया। अपने निर्णय में उच्च न्यायालय ने कहा कि आरक्षण का लाभ केवल सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को दिया जा सकता है, किसी धार्मिक समुदाय को नहीं। इसके अलावा, न्यायालय ने यह भी कहा कि आंध्रप्रदेश सरकार के पास ऐसे कोई आंकड़े या तथ्य उपलब्ध नहीं हैं जिनके आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुंच सके कि पूरा मुस्लिम समुदाय पिछड़ा हुआ है। उच्चतम न्यायालय ने आंध्रप्रदेश उच्च न्यायालय के निर्णय को सही ठहराया। इसके बाद, आंध्रप्रदेश सरकार ने मुसलमानों के पिछड़े वर्गों के लिए 4 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की। इस बार ऐसा करने के पहले उसने मुसलमानों के उन वर्गों के सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन के संबंध में आंकड़े इकट्ठे किये। सरकार ने आंध्रप्रदेष पिछड़ा वर्ग आयोग से यह कहा कि वह मुस्लिम समुदाय की सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक स्थिति का अध्ययन करे। इसके बाद सरकार ने पिछड़े वर्गों की सूची में एक नया ‘ई‘ समूह शामिल किया, जिसमें ‘मुसलमानों के सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े समुदाय‘ रखे गए। परंतु आंध्रप्रदेश  उच्च न्यायालय ने इस कानून को भी रद्द कर दिया। न्यायालय ने कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया में सभी प्रासंगिक कारकों का संज्ञान नहीं लिया गया है और कई अप्रासंगिक कारकों का संज्ञान लिया गया है। उच्च न्यायालय ने कहा कि मुस्लिम पिछड़ों के लिए आरक्षण इसलिए भी अवैध है क्योंकि इससे उच्चतम न्यायालय द्वारा कुल आरक्षण पर लगाई गई 50 प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन होता है।
अब समय आ गया है कि हम पिछड़ों को समाज के अन्य वर्गों के समकक्ष लाने के लिए आरक्षण को एकमात्र सकारात्मक कदम मानना छोड़ें। राजनेताओं के लिए आरक्षण देना सबसे आसान होता है क्योंकि इसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त संसाधन नहीं जुटाने होते। केवल एक कानून बनाकर किसी भी वर्ग को आरक्षण दे दो और उसके वोट बटोरो। मुस्लिम पिछड़ों का एक छोटा सा हिस्सा अपनी मेहनत से और निर्यात में हुई वृद्धि के कारण आर्थिक रूप से संपन्न बन गया है। इनमें शामिल हैं वाराणसी के साड़ी बुनकर, मुरादाबाद के पीतल कारीगर और अलीगढ़ के ताला उद्योग व मेरठ के कैंची उद्योग के कुछ व्यवसायी। आरक्षण की बजाए मुस्लिम समुदाय के पिछड़े तबकों को आगे बढ़ने के मौके उपलब्ध कराने के लिए बेहतर यह होगा कि सरकार असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के हितों की सुरक्षा के लिए कड़े कानूनी प्रावधान करे, कारीगरों को कौशल विकास के मौके उपलब्ध कराए और उन्हें अपना व्यवसाय स्थापित करने के लिए आसान शर्तों पर कर्ज दिलवाने की व्यवस्था करे। परंतु इसके लिए यह जरूरी होगा कि संसाधनों का इस्तेमाल कुबेरपतियों के उद्योगों को अनुदान देने की बजाए गरीबों की भलाई के लिए किया जाए। ऐसा सिर्फ एक दूरदृष्टा व उदार नेता ही कर सकता है-वे बौने नहीं जो इस समय हमारे राजनैतिक परिदृष्य पर छाए हुए हैं।
  -इरफान इंजीनियर

बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

किसका विकास ?



प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अक्सर अपनी आमसभाओं आदि में कहते हैं कि वे सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास के प्रति प्रतिबद्ध हैं। उनके कहने का अर्थ शायद यह होता है कि वे सभी भारतीयों के विकास के लिए काम करेंगे,चाहे वे किसी भी धर्म, जाति या नस्ल के हों, चाहे उनकी संस्कृति कोई भी हो व वे देश के किसी भी इलाके में रहते हों। यह सोच सराहनीय है और इस दिशा में प्रयास करने वाले नेता को हम सभी का पूरा समर्थन मिलना चाहिए।
परंतु यदि हम थोड़ी गहराई से सोचें तो दो प्रश्न हमारे मन में उभरेंगे। पहला यह कि क्या हमारे देश के पास इतने संसाधन हैं कि हम सभी 125 करोड़ भारतीयों का विकास सुनिश्चित कर सकें?तथ्य यह है कि हमारे संसाधन अत्यंत सीमित हैं और चाहे हम कितने ही आकर्षक नारे क्यों न लगायें, ऐसा विकास असंभव है जिसका लाभ सभी भारतीयों तक पहुंचे। विकास पर परस्पर विरोधाभासी दावे होना अवश्यंभावी है। जो लोग संगठित हैं और जिनके पास सरकारी तंत्र को प्रभावित करने की ताकत और नौकरशाही तक पहुंच है, वे विकास के फल उन लोगों तक नहीं पहुंचने देंगे जो अपनी आवाज उठाने में सक्षम नहीं हैं। इसलिये सभी का विकास या तो केवल एक पवित्र इरादे की घोषणा है या सहज विश्वासियों को बेवकूफ बनाने का हथियार।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हमारे देश में व्याप्त असमानताओं के परिप्रेक्ष्य में, यदि हम सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास की बात करते हैं तो क्या यह न्यायपूर्ण है?दुनिया के 100, बल्कि 50,सबसे रईस व्यक्तियों में भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है परंतु यह भी सच है कि 20 रूपये प्रति व्यक्ति प्रति दिन से कम की आमदनी पर जीवनयापन करने वाले भारतीयों की संख्या 83.6 करोड़ है। लगभग 20 करोड़ भारतीय,हर रात भूखे सोते हैंए लगभग 21.2 करोड़ कुपोषित हैं और हर वर्ष लगभग 7,000 भारतीय भूख से मर जाते हैं। अगर हम इनमें उन लोगों को जोड़ लें जो कुपोषण.जनित बीमारियों से मरते हैं तो यह संख्या करीब 1 करोड़ हो जायेगी।
सबसे रईस 50 या 100 लोगों के क्लब में भारतीयों की संख्या के बढ़ने से कुछ भारतीय, विशेषकर शहरी मध्यम वर्गए स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं। वे भारत में बढ़ती असमानता की ओर देखना ही नहीं चाहते। वे इस तथ्य की ओर शुतुरमुर्गी रवैया अपनाये रहते हैं कि भारतए मानव विकास सूचकांकों की दृष्टि से, दुनिया के अन्य देशों की तुलना में काफी पीछे है। शिक्षाए स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचए शिशु व बाल मृत्यु दर आदि की दृष्टि से हम बहुत पिछड़े हुये हैं। शुतुरमुर्गी मुद्रा में रेत में सिर गड़ाये हुये शहरी मध्यमवर्ग के भारतीय, ऐसा कुछ भी देखना.समझना नहीं चाहते जो गौरव के उनके भाव को चोट पहुंचाए। जब प्रधानमंत्री मोदी सभी 125 करोड़ भारतीयों के विकास की बात करते हैं तब तकनीकी रूप से वे गरीबों के विकास की बात भी करते हैं। परंतु चूंकि संसाधन सीमित हैं इसलिये प्रश्न यह उठता है कि सभी भारतीयों का विकास करने की उनकी रणनीति क्या है ?सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं? करदाताओं के पैसे का सरकार किस तरह इस्तेमाल करना चाहती है ?
एक रणनीति तो यह हो सकती है कि देश के पिछड़े इलाकों में आधारभूत संरचना का निर्माण किया जाये। इसके लिये संबंधित क्षेत्र के सभी जातियों व समुदायों के लोगों के श्रम का इस्तेमाल हो। ऐसा करने से वहां के निवासियों को विकास का लाभ तो मिलेगा हीए उन्हें रोजगार भी उपलब्ध हो सकेगा। इससे उन लोगों को नये अवसर मिलेंगेए जिन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। इससे भूखों और कुपोषितों के हाथों में कुछ पैसा आयेगा। इस आमदनी से वे जो सामान खरीदेंगे उससे उद्योगों को अपरोक्ष रूप से लाभ होगा। परंतु जब प्रधानमंत्री सब के विकास की बात करते हैं तब उनके दिमाग में स्पष्टतः यह रणनीति नहीं होती।
दूसरी रणनीति यह हो सकती है कि करदाताओं के पैसे और देश के संसाधनों ;जमीनए पानीए जंगल, खनिज व अन्य प्राकृतिक संसाधनद्ध का इस्तेमाल कर भारी.भरकम उद्योग खड़े किए जाएं, जिनसे केवल कुछ लोगों को लाभ हो। इस रणनीति के पैरोकार हमें बताते हैं कि गरीब.मजदूर, किसान,छोटे व्यवसायी व कारीगर . उन्हें उपलब्ध करा,गए अवसरों का उचित इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे और वे उतनी तेजी से विकास की राह पर देश को आगे नहीं ले जा पाएंगे जितनी तेजी से वे लोग ऐसा कर सकेंगे जिनके पास ढ़ेर सारी पूंजी है। जब विकास तेजी से होगा तब रोजगार के अवसर बढेंगे और इससे अपरोक्ष रूप से गरीबों को फायदा होगा। विदेशी निवेशक,भारत को भारी मुनाफा कमाने वाली जगह के तौर पर देख रहे हैं। परंतु वे श्रमिकों पर कम से कम पैसा खर्च करना चाहते हैं और देश के प्राकृतिक संसाधनों,जिनमें जमीन से लेकर स्पेक्ट्रम तक शामिल हैं, का भरपूर दोहन करना चाहते हैं। मुनाफा बढ़ाने के लिए यह जरूरी है कि श्रम पर कम से कम खर्च किया जाए। इसका एक तरीका तो यह है कि इस तरह की आधुनिक, मंहगी तकनीक का इस्तेमाल किया जाए जिससे उद्योगों में कम से कम श्रमिकों की जरूरत पड़े। इस तरह का विकास, रोजगार नहीं लाता। दूसरा तरीका है कि मजदूरी की दर कम से कम रखी जाए।'विकास' की इस दूसरी रणनीति के तहत, राज्य,पूंजीपतियों को मिट्टी के मोल जमीन व अन्य प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध करवाता है और करदाताओं के पैसे से 'विश्वस्तरीय'आधारभूत संरचना वाले कुछ द्वीप तैयार करता है, जिससे पूंजीपतियों को अच्छी सड़कें,फ्लाईओवर,बंदरगाहए बिजली आदि उपलब्ध कराई जा सके। राज्य, गरीबों से उनकी जमीनें जबरदस्ती छीनता है। किसानों को संगठित होकर अपनी जमीन की उचित कीमत पाने के लिए मोलभाव करने का मौका ही नहीं दिया जाता। गरीबों से कहा जाता है कि वे अपनी जरूरत की चीजें जैसे अनाज, खाद,कीटनाशक इत्यादि खुले बाजार से खरीदें क्योंकि अनुदान, अर्थव्यवस्था के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। परंतु निवेशकर्ताओं से यह नहीं कहा जाता कि वे अपने उद्योग लगाने के लिए बाजार मूल्य पर जमीन आदि खरीदें। इस तरह,इस दूसरी रणनीति से केवल और केवल उन लोगों को लाभ होता है जिनके पास अरबों रूपये हैं। राज्य उनका ताबेदार बन जाता है और उन्हें जमीन व देश के अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भरपूर दोहन करने की खुली छूट देता है। इसके साथ ही, श्रम कानूनों में इस तरह के 'सुधार' किए जाते हैं जिससे ट्रेड यूनियनों के लिए श्रमिकों को संगठित करना मुश्किल हो जाता है। गरीबों को उनकी संपत्ति का उचित मूल्य नहीं मिलता और उन्हें कम से कम वेतन पर काम करना होता है। इससे देश में असमानताएं बढ़ती हैं। अपने विदेशी दौरों में प्रधानमंत्री मोदी अपने 'मेक इन इंडिया' नारे से विदेशी कुबेरपतियों को यही लालच दे रहे हैं और मजे की बात यह है कि वे इसे सभी 125 करोड़ भारतीयों का विकास कहते हैं।
गुजरात का विकास
आईए,हम एक नजर डालें नरेन्द्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में गुजरात के कच्छ जिले के कुछ गांवों में हुए विकास पर। वहां के लोगों से मिलने और वहां के हालात देखने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो भी थोड़ा.बहुत विकास हुआ है उससे दलित और मुसलमान अछूते हैं। भाजपा और संघ परिवार से जुड़ा हुआ स्थानीय श्रेष्ठि वर्ग, विकास के अभाव से लोगों का ध्यान हटाने के लिए समय.समय पर साम्प्रदायिक नारे उछालकर एक वंचित समूह को दूसरे वंचित समूह से लड़ाता आ रहा है।
जिले के बानी.पच्छम इलाके के लोग इसे तालुका का दर्जा दिए जाने की मांग लंबे समय से करते आ रहे हैं। 60 हजार की आबादी और 85 गांवों वाला यह इलाका, वर्तमान में भुज तालुका का भाग है। खाबड़ा इस इलाके का सबसे बड़ा गांव है और भारत.पाक सीमा पर स्थित है। खाबड़ा में रॉ, बीएसएफ आदि सहित लगभग सभी सुरक्षा एजेन्सियों के कार्यालय हैं। भुज, इस गांव से लगभग 54 किलोमीटर दूर है और अपने हर काम के लिए गांव वालों को 100 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है। हाल तक, 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा देने के लिए भी भुज जाना पड़ता था जिसके कारण कई विद्यार्थी यह परीक्षा नहीं दे पाते थे। इस साल खाबड़ा में 12वीं की बोर्ड परीक्षा का केन्द्र स्थापित किया गया और यहां से 164 विद्यार्थियों ने परीक्षा दी। गांव के लोगों को लगता है कि उनके साथ अन्याय हो रहा है क्योंकि जहां 10 गांव वाले गांधीधाम को तालुका का दर्जा दे दिया गया है वहीं 85 गांव वाले बानी.पच्छम इलाके को यह दर्जा नहीं दिया जा रहा है। इस इलाके में मुसलमान बहुसंख्यक हैं। वे आबादी का लगभग 85 प्रतिशत हैं। गांववासियों का कहना है कि उनके इलाके को तालुका का दर्जा सिर्फ इसलिए नहीं दिया जा रहा है क्योंकि वहां मुसलमानों की बहुसंख्या है और सरकार, मुसलमानों पर संदेह करती है। यह इस तथ्य के बावजूद कि 1965 और 1971 में पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों में स्थानीय मुस्लिम रहवासियों ने भारतीय सेना की हर तरह से मदद की थी। यहां तक कि वे सैनिकों के साथ पाकिस्तानी बंकरों तक गए थे।
पूरे इलाके में मात्र 72 स्कूल हैं। शिक्षकों के 350 पद खाली पड़े हैं। अधिकतर स्कूलों में मात्र एक शिक्षक है जो पहली से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को पढ़ाता है। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुसार, हर स्कूल में कम से कम पांच शिक्षक होने चाहिए। तीन गांव.उदयी, झामरीवाट और लखाबो.ऐसे हैं जिनमें एक भी स्कूल नहीं है। और यह शायद संयोग मात्र नहीं कि इन तीनों गांवों की पूरी आबादी मुसलमानों की है। इन गांवों में स्कूल खोलने के लिए कई बार मांग उठाई गई परंतु सरकार ने उस पर ध्यान नहीं दिया। इसके विपरीत,लुहाना में मांग करते ही स्कूल खोल दिया गया। मुस्लिम.बहुल इलाकों के स्कूलों के परीक्षा परिणाम बहुत खराब आते हैं।
टूगा गांव के एक शिक्षक मोहम्मद खालिद से हमारी मुलाकात हुई। इस गांव में एक प्राथमिक व एक हाईस्कूल है। यह इलाके के बेहतर स्कूलों में से एक है। जिस प्राथमिक शाला में खालिद पढ़ाते हैं वहां 225 विद्यार्थी और छःह शिक्षक हैं। इन्हें कक्षा एक से लेकर आठ तक के विद्यार्थियों को पढ़ाना होता है। इसके लिए पहली और दूसरी व तीसरी और चौथी  कक्षाओं के विद्यार्थियों को एकसाथ बिठाया जाता है ताकि एक ही शिक्षक उन्हें पढ़ा सके। खालिद यह स्वीकार करते हैं कि स्कूल में पढ़ाई का स्तर बहुत निम्न है और सुविधाओं की बहुत कमी है। परंतु इसके लिए वे मुस्लिम समुदाय में जागरूकता की कमी को दोषी ठहराते हैं। वे कहते हैं कि अगर समुदाय में जागरूकता होती तो लोग स्कूल पर ध्यान देते और कोशिश करते कि वह अच्छी तरह चले। वे इसके लिए मुसलमानों के प्रति भेदभाव को दोषी नहीं ठहराते।
जान कुनरिया गांव में बिजाल डुंगलिया ने भी बताया कि स्कूल ठीक से नहीं चल रहे हैं। उनमें शौचालय तो दूरए पीने के पानी की व्यवस्था तक नहीं है।
अंजर ब्लाक के सिनोगरा गांव में दो स्कूल हैं। इनमें से एक का भवन सन् 2001 के भूकंप में ढह गया था और इसका पुनर्निर्माण कृष्ण पारिणम मंदिर द्वारा करवाया गया है। दूसरी कन्या शाला है। मुसलमान, गांव की आबादी का लगभग 20 प्रतिशत हैं। स्कूल, हिन्दुओं के रहवासी इलाके में हैं यद्यपि मुसलमानों की बस्ती वहां से बहुत दूर नहीं है। उच्च जातियों के बच्चे लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित अंजर में स्थित निजी स्कूलों में पढ़ते हैं और गांव के स्कूल में केवल मुसलमानों और दलितों के बच्चे ही हैं। 220 विद्यार्थियों में से केवल 83 मुसलमान हैं। मुसलमान बच्चों के स्कूल छोड़ने की दर बहुत ज्यादा है। जो बच्चे दाखिला ले लेते हैं उनमें से ज्यादातर या तो स्कूल आते ही नहीं हैं या बहुत कम आते हैं। शिक्षकों की राय थी कि मुस्लिम अभिभावकों में जागरूकता का अभाव है। लड़कियां'बंधानी' का काम करती हैं और लड़के दुकानों आदि में। वे पढ़ना ही नहीं चाहते। मुसलमानों के केवल कुछ घर पक्के हैं और समय के साथ उनके मालिकाना हक की जमीनें कम होती जा रही हैं। दलित अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हैं और इसलिए दलित विद्यार्थियों की स्कूलों में उपस्थिति बेहतर है। लड़कों की तुलना में लड़कियों की उपस्थिति ज्यादा रहती है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी है और कई पद खाली पड़े हैं। लड़कों के स्कूल में सात और लड़कियों के स्कूल में छःह शिक्षक हैं। दोनों स्कूलों में शिक्षकों की कमी के चलते दो या दो से अधिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को एकसाथ बैठाकर पढ़ाया जाता है।
स्वास्थ्य सेवाओं की हालत भी खराब है। मुस्लिम ग्रामीणों का मानना है कि उनके गांव की उपेक्षा इसलिए की जा रही है क्योंकि वहां मुसलमानों का बहुमत है।
-इरफान इंजीनियर

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

गोरिल्ला लड़ाई की तरह है कहानी - रमाकान्त श्रीवास्तव


दमोह। कहानीकारों ने अपना कार्य ईमानदारी से करते हुए अपने समय को कहानियों में जिन्दा रखा है। आज जब सामाजिक मूल्य नष्ट होने की कगार पर हैं तब कहानी का दायित्व और कहानी की आवश्यकता समाज में अधिक है। सामाजिक यथार्थ और सत्यान्वेषण कहानी की जरूरत है। आज की कहानी गोरिल्ला लड़ाई की तरह है जो अपने साथ विपक्ष को शामिल करती हुई उस पर प्रहार करती है उक्त उदगार ख्यात कथा लेखक रमाकान्त श्रीवास्तव ने प्रगतिशील लेखक संघ इकाई दमोह द्वारा आयोजित दो दिवसीय प्रदेश स्तरीय कहानी कार्यशाला में कहानी और समाज पर केन्द्रित विचार - विमर्श के तहत प्रदेश के नवरचनाकारों को सम्बोधित करते हुये अभिव्यक्त किए ।

                इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुये कहानीकार सुबोध श्रीवास्तव ने स्पष्ट किया कि दमोह में उनके कथा लेखन की जड़ है ।यहाँ कथा का अपना इतिहास है ।आज समाज हाशिये पर पहुँचने की स्थिति में है ऐसे हालात में कहानी कार का दायित्व बनता है कि वे अपनी कहानियों के जरिए विसंगतियों के साथ निराकरण को भी सामने लायें क्योंकि कहानी अपने समय का ऐतिहासिक दस्तावेज़ होती है ।
         इस विमर्श में कहानीकार दिनेश भट्ट (छिंदवाड़ा), अनिल अयान (सतना), संजीव माथुर (ग़ाज़ियाबाद) ,दीपा भट्ट (सागर),अनुपम दाहिया (सतना), अक्षय जैन, एवं अमर सिंह ने हस्तक्षेप करते हुए कई अहम् सवाल उठाकर अपनी व् शिविरार्थियों की जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया ।
                इस विमर्श से पूर्व स्वागत भाषण में अध्यक्ष सुसंस्कृति परिहार ने यथार्थवादी प्रथम कहानी "टोकरी भर मिट्टी" के लिये जाने वाले लेखक श्री माधव प्रसाद सप्रे की इस माटी में रचनाकारों का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि पहले की कहानियाँ निद्रा में ले जातीं थीं आज वे जगाने का काम करती हैं। उद्घाटन भाषण देते हुए प्रलेसं दमोह संस्थापक अध्यक्ष सत्मोहन वर्मा ने कथा परम्परा पर अपने विचार रखते हुये कार्यशाला को जरूरी बताया ।
               दूसरे चरण में कहानी की विषय वस्तु और शिल्प पर व्याख्यान युवा कथाकार दिनेश भट्ट ने दिया । श्री भट्ट का मानना था कि कहानी की विषयवस्तु यदि आप जरा से भी संवेदनशील हैं तो वह कहीँ भी मिल सकती है। मूल बात उसके शिल्प की है। जिसका तानाबाना बुनने में आपका अध्ययन, और सूक्ष्म अन्वेषण महत्वपूर्ण होता  है। नन्द लाल सिंह ने परसाई की कहानी "चूहा और मैं" के माध्यम से शिल्प की ओर इशारा करते हुए कहा कि चूहे को आगे क्यों रखा गया, ये समझना कहानी लेखक के मंतव्य  समझने में मदद करता है।  अनिल अयान ने लघु कथा और कहानी के शिल्प पर, संजीव माथुर ने व्यक्तिगत अनुभव की कहानियों और सामाजिक सरोकार की कहानियों के फासले पर और महत्व पर विविध सवाल किये जिस पर रमाकांत जी ने टिप्पणियाँ कीं तथा स्पष्ट तौर पर कहा कि लघु कथाओं में कथ्य महत्वपूर्ण है जबकि कहानी में शिल्प और परिवेश की कसावट भी अत्यंत आवश्यक है। सामाजिक सरोकारों की कहानियाँ यकीनन दीर्घजीवी होती हैं ।
          दूसरे दिन कहानी पाठ का सिलसिला प्रारंभ हुआ कार्यशाला में लिखी गई कहानी "सपनों की उड़ान" से, जिसे सतना से आये नवरचनाकार अंकुर चौरसिया ने प्रस्तुत किया । उपस्थितों ने कार्यशाला की कहानी कहकर इसका स्वागत किया। इसी क्रम में दीपा भट्ट ने "आर्डर", अक्षय जैन ने "टाईपिस्ट मेडम", उमेश दास साहनी ने "पद्मा", अनुपम दाहिया ने "अपने-अपने श्मशान", अनिल अयान ने "एक अनुबंध", अरबाज खान ने "दीवानी", पुरूषोत्तम रजक ने "दया",  आभा भारती ने "वसंत" और ओजेन्द्र तिवारी ने "शिक्षा" कहानी का पाठ किया ।
      रचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हुए वरिष्ठ कथाकार त्रयी ने इन लेखकों को संभावनाशील बताया। रमाकान्तजी ने सुझाव दिया कि विषयवस्तु के चयन में जल्दबाजी नहीं करना चाहिए जब तक कथ्य पक न जाये। कहानी लिखने के बाद कहानी कई बार पाठ होना चाहिए इससे उसकी खामियां सामने आती हैं। कहानी का टुकड़ों में अवलोकन भी गलत है। कहानीकार को अपनी भाषा, अपने मुहावरे, अपनी शैली और विषय वस्तु से जुड़ाव होना जरूरी है। चमकदार शिल्प और नकली आधुनिकता कहानी को अपंग बना देती है। सुबोध श्रीवास्तव ने कहा कि नवरचनाकार ध्यान रखें कि वे कहानी लिखकर सामाजिक कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हैं ।
    समापन सत्र में मिस्र के लेखक युसुफ अल फजई की राजेन्द्र शर्मा द्वारा अनुवादित कहानी "कठपुतली का नाच"  रंगकर्मी राजीव अयाची ने, एवं भीष्म साहनी की कहानी "चीफ की दावत" का पाठ सुसंस्कृति परिहार ने किया। इन मानक कहानियों के पाठोपरांत सुबोध श्रीवास्तव ने "भले लोग", दिनेश भट्ट ने "अंतिम बूढ़े का लाफ्टर डे" एवं रमाकांत श्रीवास्तव ने "साहब, बीबी और बाबाजी" कहानियों का पाठ कर तमाम रचनाधर्मियों को इन कथाओं की खूबियों से अवगत कराया। ये कहानियां सभी की  मार्गदर्शक बनेगी, इसी अपेक्षा के साथ दो दिवसीय कहानी कार्यशाला का समापन हुआ। इस कार्यशाला का सफल संचालन गफूर तायर ने किया। आभार व्यक्त करते हुये सुसंस्कृति परिहार ने इसे दमोह इकाई लिए ही नहीं, बल्कि प्रदेश के लिए भी महत्वपूर्ण आयोजन कहा और तमाम सहयोगियों को धन्यवाद दिया ।
ज्ञातव्य हो, कार्यशाला के मध्यांतर में दक्षेस सिँह व सुसम्मति परिहार ने हरिप्रसाद चौरसिया के निर्देशन में जनगीत गाये। रमेश तिवारी ने बुन्देली गीतों की छटा बिखेरी, वहीं केशू तिवारी ने गजलों से समां बांधा । इँदौर से आये रंगकर्मी लेखक शिवम् कुन्देर ने बांसुरी वादन कर सबका मन मोह लिया ।
                 कार्यक्रम में आनंद श्रीवास्तव ,नरेन्द्र दुबे,  ठा नारायण सिंह, श्रीकांत चौधरी, डा रघुनंदन चिले ,नितिन अग्रवाल ,पीएस परिहार, पुष्पा चिले, भारत चौबे, अभय नेमा, कॄष्णा विश्वकर्मा, वीरेन्द्र दबे, शिखा उमाहिया के साथ महाविद्यालीन छात्र छात्राएं  मौजूद रहे ।
- सुसंस्कृति परिहार

रविवार, 12 अक्टूबर 2014

नेहरू युग के सभी इतिहासविदों द्वारा लिखी किताबों में आग लगा दो


सुब्रमण्यम स्वामी एक ऐसे व्यक्ति हैं जो जब भी बोलते हैं जहर उगलते हैं। दिल्ली में एक कार्यक्रम में बोलते हुये उनने कहा कि नेहरू युग के सभी इतिहासविदों द्वारा लिखी किताबों में आग लगा देना चाहिए।
इस संदर्भ में स्वामी ने विशेष रूप से विपिन चंद्र और रोमिला थापर का नाम लिया। उनका आरोप है कि इस तरह के लेखकों ने अनेक हिंदू राजा.महाराजाओं की उपेक्षा की है। स्वामी दिल्ली में अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना द्वारा आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे। यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा समर्थित एक संस्था है। कार्यक्रम में बोलते हुये अनेक वक्ताओं ने कहा कि मार्क्सवादी,मुसलमान और पश्चिमी इतिहासकारों ने भारत के प्राचीन इतिहास की बहुत उपेक्षा की है।
स्वामी और अन्य वक्ताओं ने इस तरह के अनेक हिंदू राजाओं का नाम लिया जिनका उल्लेख इन इतिहासज्ञों ने नहीं किया है। वक्ताओं ने विशेष रूप से हेमचंद्र विक्रमादित्य का नाम लिया है, जिन्होंने उत्तर भारत में 1556 के द्वितीय पानीपत युद्ध के बाद हिंदू राज्य की स्थापना की थी।
तथाकथित इन इतिहासज्ञों की इस घनघोर हिंसक प्रवृत्ति की सारे देश में आलोचना की गई। प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक हिंदुस्तान टाईम्स ने 9 अक्टूबर को लिखे एक संपादकीय में इस बात पर घोर चिंता प्रगट की है कि हमारे देश में किताबों को सिर्फ इस कारण जलाने की बात की जाए क्योंकि उनमें कुछ ऐसे विचार हैं जो कुछ लोगों को पसंद नहीं हैं। संपादकीय में कहा गया है कि सुब्रमण्यम स्वामी समाचारपत्रों में सुर्खियां जीतने के लिए इस तरह की गैर.जिम्मेदार बात करते हैं। वे आये दिन बुद्धिजीवियों और मुसलमानों पर हमला करते रहते हैं। हिंदुस्तान टाईम्स ने यह मांग की है कि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व को चाहिए कि वह स्वामी पर लगाम लगायें। स्वामी बहुत ही भद्दी और भडकाऊ भाषा में, मुसलमानों,पाकिस्तान, सोनिया गांधी, राहुल गांधी आदि के बारे में निंदापूर्ण बातें कहते रहते हैं। इसी क्रम में उनने नेहरूवियन और वामपंथी इतिहासज्ञों पर हमला किया है। उनका कहना है कि विपिन चंद्र और रोमिला थापर के समान इतिहासज्ञों की किताबों को जला देना चाहिए।
इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े अनेक संगठनों को स्वामी की बात न सिर्फ अच्छी लगती है वरन् वे उनसे सहमत भी होते हैं। इसी सिलसिले में यहां उल्लेख करना होगा कि दीनानाथ बत्रा द्वारा लिखित कुछ किताबों को गुजरात के पाठ्यक्रमों में शामिल किया गया है। दीनानाथ बत्रा भी एक अत्यधिक घनघोर प्रतिक्रियावादी लेखक हैं। वे अखंड भारत की वकालत करते हैं और कहते हैं कि पश्चिमी ढंग से लोगों को अपने जन्मदिन नहीं मनाने चाहिए। चूंकि गुजरात में इनकी पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल कर ली गई हैं इसलिये यह कहना उचित होगा कि इस तरह के विचारों को स्वीकार करने वालो की संख्या काफी ज्यादा है।
स्वामी ने जिन इतिहासज्ञों पर हमला किया है वे दुनिया के महान इतिहासज्ञों में से हैं। इतिहास की दुनिया में उनकी अद्भुत स्वीकार्यता है। इस तथ्य के बावजूद यह दुःख की बात है कि स्वामी उनकी किताबों को जलाने की बात करते हैं। आखिर ये लोग कितनी किताबों को प्रतिबंधित करेंगे। दिल्ली की सरकार और भाजपा के नेताओं को स्पष्ट करना चाहिए कि उनका इस तरह के विचारों से कोई लेना.देना नहीं हैं। न सिर्फ उनको असहमति दिखाना चाहिए बल्कि इस तरह की बेबुनियाद, भड़काऊ बातें कहने के लिए उनके विरूद्ध कार्यवाही भी होना चाहिए।
आज के आधुनिक समाज में विभिन्न नजरियों से इतिहास का विवेचन व मूल्यांकन स्वाभाविक है। यह पाठक पर छोड़ देना चाहिए कि वह किस विवेचन व मीमांसा को स्वीकार करता है। इस तरह की स्वीकार्यता पर किसी प्रकार का बंधन न तो संभव है और ना ही लगाना चाहिए। हमारे जैसे बहुआयामी देश में इस तरह का बंधन संभव नहीं है।
आखिर परस्पर विरोधी विचारों को सहना ही तो हमारे देश की सबसे बड़ी ताकत है। स्वामी के समान लोग जो भारत को एक ही दिशा में ले जाना चाहते हैं और जो किसी भी प्रकार के विरोधी विचार को सहने के लिए तैयार नहीं हैं उनके इस दकियानूसी रवैये से हमारे देश का भारी नुकसान होता है। प्रधानमंत्री को स्पष्ट करना चाहिए कि हम इस तरह के एकतरफा संकुचित विचारों के विरूद्ध हैं। प्रधानमंत्री और उनकी सरकार को स्वामी जैसे संकुचित विचार वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों पर लगाम कसना चाहिए और उन्हें स्पष्ट रूप से बता देना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी की चिंता क्या है। उसका इस तरह के मुद्दों पर रवैया क्या है? हिंदुस्तान टाईम्स ने अंत में अपने संपादकीय में चेतावनी देते हुये कहा है कि यदि सत्ताधारी पार्टी ऐसा नहीं करती है तो वह वास्तव में हमारे देश का भारी नुकसान करेगी।
संघ और भारतीय जनता पार्टी से जुड़े हुये लोगों के रवैये की अमरीका के सर्वाधिक लोकप्रिय समाचारपत्र न्यूयार्क टाईम्स ने भी निंदा की है। अपने 8 अक्टूबर के संस्करण के संपादकीय में न्यूयार्क टाईम्स लिखता है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के युवकों को एक सुनहरे भविष्य का आश्वासन दिया है। शायद वे जानते होंगे कि इस आश्वासन को पूरा करने के लिए उच्च कोटि की शिक्षा और उच्च कोटि के अवसर प्रदान करना आवश्यक है। तभी 25 वर्ष से कम आयु वाले 60 करोड़ भारतीय युवकों को सही दिशा मिलेगी। आज इन युवकों में बुनियादी योग्यताओं की कमी है।
अपने 2014 के घोषणापत्र में भारतीय जनता पार्टी ने कहा था कि राष्ट्र के विकास के लिये और गरीबी के उन्मूलन के लिये शिक्षा ही सबसे बड़ा प्रभावी हथियार है। अब सवाल यह है कि क्या शिक्षा में सुधारों का उपयोग एक प्रबुद्ध शिक्षित नागरिकों की जमात बनाने के लिये ही किया जायेगाघ् क्या इस तरह की जमात को आवश्यक प्रशिक्षण दिया जायेगा या एक विशेष प्रकार की विचारधारा को आगे बढ़ाया जायेगा?
पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी ने राष्ट्र का प्रशासन चलाने के लिए गुजरात मॉडल की सिफारिश की थी। अनेक मतदाताओं ने इसे एक लचीली अर्थव्यवस्था के प्रति प्रतिबद्धता माना था। परंतु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि गुजरात मॉडल में वे पाठ्यपुस्तकें भी शामिल हैं जिन्हें दीनानाथ बत्रा ने लिखी हैं। बत्रा एक ऐसे विद्वान हैं जो भारत को दक्षिणपंथी रास्ते पर ले जाना चाहते हैं।
पिछले फरवरी माह में उनने पेंग्विन पर यह दबाव बनाया कि वह वेंडी डोनीगर जो शिकागो यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं उनकी किताबों का प्रकाशन रद्द किया जाये। क्योंकि बत्रा की राय में उस प्रकाशन ने हिंदू धर्म का अपमान किया है। उसके बाद जून के महीने में गुजरात सरकार ने यह आदेश जारी किया कि गुजरात के पाठ्यक्रम में बत्रा की किताबें शामिल की जायें। बत्रा की किताबों में अनेक ऐसी बातें शामिल हैं जिन्हें गंभीरता से नहीं लिया जा सकता। उनकी किताबों में विद्यार्थियों को सलाह दी गई है कि वे केक और मोमबत्ती के साथ अपना जन्मदिन न मनायें क्योंकि यह गैर भारतीय रीति रिवाज है।
बत्रा विद्यार्थियों से कहते हैं कि वे अखण्ड भारत का नक्शा बनायें। जिस अखण्ड भारत में बांग्लादेश,श्रीलंका,तिब्बत,पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल हैं। बत्रा की यह भी मान्यता है कि प्राचीन भारत में कारें थीं, हवाईजहाज भी थे और अणु अस्त्र भी थे। वे कहते हैं कि विद्यार्थियों को इसका ज्ञान होना चाहिए।
यहां स्मरण दिलाना उचित होगा कि 1999 में जब केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली मिलीजुली सरकार थी उस समय बत्रा को इतिहास की पाठ्यपुस्तकें तैयार करने का उत्तरदायित्व सौंपा गया था। उस समय यह काम अधूरा रह गया था, चूंकि 2004 में भारतीय जनता पार्टी की सरकार चुनाव में अपदस्थ हो गई थी और वह काम अधूरा रह गया था। इसलिए अब बत्रा दावा करते हैं कि केंद्रीय शिक्षा मंत्री स्मृति जूबिन ईरानी ने उन्हें आश्वस्त किया है कि उनकी किताबें शीघ्र ही राष्ट्रीय पाठ्यक्रम का हिस्सा बन जायेंगी।
शिक्षा बहुत महत्वपूर्ण विद्या है यदि इस पर ऐसे लोगों का नियंत्रण हो जाता है जो ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़मरोड़कर पेश करते हैंए जो लगभग तानाशाही के ढंग से यह तय करते हैं कि कौन से सांस्कृतिक रीतिरिवाज भारतीय हैं, जो एक योजना के अनुसार की जाने वाली गतिविधि के द्वारा पड़ोसियों के मन में खतरनाक भावनाओं को जन्म देते हैं। इस तरह की प्रवृत्तियों से देश का भला नहीं होगा न्यूयार्क टाईम्स अंत में लिखता है।
 -एल.एस. हरदेनिया

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2014

प्रो. ग्रोथ से प्रो. बिजनेस: बदले मुखौटों के पीछे वही ढाक के तीन पात

 राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दो की सरकार ने अपने पहले बजट के समर्थन में एक बेबाक सच का सहारा लिया है। डंके की चोट पर कहा है कि ‘प्रो. बिजनेस’ यानी व्यवसाय और व्यवसायी पक्षीय और उनके प्रति सकारात्मक समर्थक-सहायक नीतियों का पालन करके वे गरीबों के पक्ष के, उनके लिए हितकर नतीजे दे सकते हैं। वर्तमान भारत की स्थिति के संदर्भ में उनके इस विचार के समर्थन में हम प्रतिष्ठित, नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के विचार का भी हवाला दे सकते हैं। अभी कुछ अरसे पहले जयपुर की एक ‘साहित्यकार’ की सभा में कहा था कि 16वीं लोकसभा में वे एक व्यवसाय व्यवसायी (प्रो. बिजनेस) समर्थक, किन्तु पंथ निरपेक्ष शासकदल को देखना चाहेंगे। पंथ-निरपेक्षता के प्रमाण खोजने के लिए तो सरकार का सालाना बजट शायद उपयुक्त मंच नहीं हो, किन्तु व्यवसायी व्यवसाय पोषक तत्वों से सन् 2014-15 का केन्द्रीय बजट लबालब भरा हुआ है। ठीक यूपीए दो की नीतियों की तरह ही, ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है: यह एक निरन्तर जारी प्रतिबद्धता की नवीनतम कड़ी भर है। किन्तु फिर भी स्पष्ट नजर आता है कि सोच, प्रतिबद्धता और राजनैतिक, सामाजिक रणनीति का खुल्लमखुला बयान, इसको किसी झाँसेबाजी के शब्दजाल से मुक्त रखना, अपने आप में उल्लेखनीय ही नहीं, प्रसंशनीय भी है। जनता को सच्चाई जानकर निर्णय करने का मौका मिल रहा है। लम्बे अरसे से जीडीपी वृद्धि, निवेश-प्रोत्साहन आदि को भारत के आर्थिक विकास का, यहाँ तक कि सामाजिक समावेशक विकास का जरिया भी बताया जाता रहा है, बिना यह बताए कि यह मूलरूप से व्यवसायों और व्यवसायियों के हितों, उद्देश्यों और स्वार्थों-हितों को बढ़ाने का रास्ता है। गैर बराबरी और व्यापक वंचना की जमीन पर व्यवसाय की आजादी गैर बराबरी के वटवृक्ष को और सींचेगी। अचंभे की बात है कि इसके संभावित अधोगामी प्रभावों द्वारा गरीबों की हित साधना अपेक्षित मानी गयी है बिना व्यवसाय व्यवसायी पक्षधर नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं के अनिवार्य रूप से ऊर्द्ध प्रवाहमान (गशिंग-अप) केन्द्रीयकृत प्रभावों से कोई छेड़छाड़ या उन पर अंकुश लगाए। आखिर छुई-मुई जैसी व्यवसायी, निवेशक, धनीमानी तबकों की अति संवेदी उद्यमिता को अक्षुण्ण रखे बिना जीडीपी यानी बाजाराधारित राष्ट्रीय उत्पादन और उसकी अनिवार्य शर्त बढ़ते निवेश को लगातार बढ़ाये रखना (जो कि प्रत्यक्ष और मूल घोषित उद्देश्य है) संभव नहीं माना गया है। विषमता वर्द्धन, धनियों को और ज्यादा धनी बनाने और राज्य द्वारा इस प्रक्रिया को सबल बनाने की जगह सीधे-सीधे, बड़ी और पहली प्राथमिकता की तरह सबको पर्याप्त, पुख्ता और सम्मानजनक रूप मंे आजीविका की गारन्टी आदि को राजग दो की व्यवसाय और व्यवसायी मित्रता में जगह नहीं मिल पाती है। इन नीतियों में टैक्स कटौती का स्व-घोषित तड़का राज्य की वित्तीय क्षमता को कड़ी संकीर्ण सीमाओं में बांध देती है, खासकर राज्य द्वारा मौद्रिक प्रसार की कड़ी सीमा में बांधने को अपनी पीठ आप ठोकने का कारण मानने के चलते। जाहिर है राज्य अपनी बिना पर सामाजिक सुरक्षा, जन कल्याण तथा और व्यवसायी वर्गों के लिये जीवन की सुख सुविधाएँ और गुणवत्ता सुधारने और उनकी उत्पादन क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र सांकेतिक खर्च कार्यक्रम ही अपने हाथों में ले पाती है। मुख्यतः चलते आ रहे कार्यक्रमों की लकीर पीटते रहने और उन्हें घोषित रूप से घटाने हटाने का साहस नहीं जुटा सकने के कारण हमने ईमानदारी से अपनी नीतियों का रूप खुलकर सार्वजनिक करने के राजग दो के वक्तव्य की प्रशंसा से इस लेख की शुरूआत की थी किन्तु भूलना नहीं चाहिए कि राजनैतिक ईमानदारी की सीमाएँ लांघना भी एक हद तक ही देखा गया है। अनेक बड़े छलावों भुलावों की नींव पर ही तो सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ा गया था। अब किस्तों में हमें उनके पीछे छिपे सचों को उजागर होने की प्रतीक्षा करनी होगी।
    लोकसभा चुनाव के कटु तथा अतिरंजित धुआंधार प्रचार में अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति पेश की गई थी। इस साल की  सरकारी आर्थिक समीक्षा में दिए गए नवीनतम आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी होती है। अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए राजग दो सरकार के बजट को पहला बड़ा बहुमुखी प्रयास माना जा सकता है। देश की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक चुनौतियांे (महंगाई, बेरोजगारी, सामान्य सामाजिक सेवाओं तथा आधारभूत सुविधाओं की गहन अपर्याप्तता) को सभी रेंखांकित करते रहते हैं। इनके दुष्प्रभाव से आम जन दुखी है। आम आदमी की पक्षधर अर्थव्यवस्था की आस लोग दशकों से लगाए हुए हैं। ऐसा तो नहीं हो पाया किन्तु दो भिन्न दिशाओं में चल रही नावों की सवारी करने के लिए मूल स्वरूप राजकीय राजस्व की अपर्याप्तता, विदेशी लेन देन का बढ़ता घाटा, बैंक कर्जों का डूबते खाते में जाना, कर चोरी तथा देश से काले धन का पलायन ने अर्थव्यवस्था के रीढ़ को कमजोर अवश्य कर दिया है। इससे राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर मंे सुस्ती तो आई ही है, इसने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन संचालन की विफलता और कमजोरी को भी प्रकट किया है।
    पिछले, 23-24 सालों से चली आ रही नीतियों ने थोड़े अरसे के लिए अच्छी वृद्धि दर दी जरूर लेकिन फिर वे अनिवार्यतः अपनी मंथर गति और अघोषित गुप्त  गतिविधियों में लिप्त हो गईं। बीते दो तीन दशकों में बड़ी कम्पनियांे को दिन दूना रात चैगुणा मुनाफा हुआ हैं परन्तु मजदूर और आम आदमी की स्थिति दयनीय हुई है। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पिछले तीन दशकों के फैक्टरी उत्पादन में मजदूरी वेतन आदि का अनुपात 40.6 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत के इर्द-गिर्द हो गया हैं 1980 के दशक के मुकाबले इस सदी के पहले दशक में मुनाफों का हिस्सा दो गुणा हो गया है। संगठित रोजगार की ओर किसी का ध्यान नहीं है। पक्के संगठित रोजगार की वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत वृद्धि दर के औसत के साथ मात्र 0.5 प्रतिशत रह गई है। देश में प्रति वर्ष सवा करोड़ युवाओं को रोजगार की आवश्यकता प्रो. ग्रोथ से प्रो. बिजनेस: बदले मुखौटों के पीछे वही ढाक के तीन पात
-कमल नयन काबरा
        राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दो की सरकार ने अपने पहले बजट के समर्थन में एक बेबाक सच का सहारा लिया है। डंके की चोट पर कहा है कि ‘प्रो. बिजनेस’ यानी व्यवसाय और व्यवसायी पक्षीय और उनके प्रति सकारात्मक समर्थक-सहायक नीतियों का पालन करके वे गरीबों के पक्ष के, उनके लिए हितकर नतीजे दे सकते हैं। वर्तमान भारत की स्थिति के संदर्भ में उनके इस विचार के समर्थन में हम प्रतिष्ठित, नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमत्र्यसेन के विचार का भी हवाला दे सकते हैं। अभी कुछ अरसे पहले जयपुर की एक ‘साहित्यकार’ की सभा में कहा था कि 16वीं लोकसभा में वे एक व्यवसाय व्यवसायी (प्रो. बिजनेस) समर्थक, किन्तु पंथ निरपेक्ष शासकदल को देखना चाहेंगे। पंथ-निरपेक्षता के प्रमाण खोजने के लिए तो सरकार का सालाना बजट शायद उपयुक्त मंच नहीं हो, किन्तु व्यवसायी व्यवसाय पोषक तत्वों से सन् 2014-15 का केन्द्रीय बजट लबालब भरा हुआ है। ठीक यूपीए दो की नीतियों की तरह ही, ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है: यह एक निरन्तर जारी प्रतिबद्धता की नवीनतम कड़ी भर है। किन्तु फिर भी स्पष्ट नजर आता है कि सोच, प्रतिबद्धता और राजनैतिक, सामाजिक रणनीति का खुल्लमखुला बयान, इसको किसी झाँसेबाजी के शब्दजाल से मुक्त रखना, अपने आप में उल्लेखनीय ही नहीं, प्रसंशनीय भी है। जनता को सच्चाई जानकर निर्णय करने का मौका मिल रहा है। लम्बे अरसे से जीडीपी वृद्धि, निवेश-प्रोत्साहन आदि को भारत के आर्थिक विकास का, यहाँ तक कि सामाजिक समावेशक विकास का जरिया भी बताया जाता रहा है, बिना यह बताए कि यह मूलरूप से व्यवसायों और व्यवसायियों के हितों, उद्देश्यों और स्वार्थों-हितों को बढ़ाने का रास्ता है। गैर बराबरी और व्यापक वंचना की जमीन पर व्यवसाय की आजादी गैर बराबरी के वटवृक्ष को और सींचेगी। अचंभे की बात है कि इसके संभावित अधोगामी प्रभावों द्वारा गरीबों की हित साधना अपेक्षित मानी गयी है बिना व्यवसाय व्यवसायी पक्षधर नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं के अनिवार्य रूप से ऊर्द्ध प्रवाहमान (गशिंग-अप) केन्द्रीयकृत प्रभावों से कोई छेड़छाड़ या उन पर अंकुश लगाए। आखिर छुई-मुई जैसी व्यवसायी, निवेशक, धनीमानी तबकों की अति संवेदी उद्यमिता को अक्षुण्ण रखे बिना जीडीपी यानी बाजाराधारित राष्ट्रीय उत्पादन और उसकी अनिवार्य शर्त बढ़ते निवेश को लगातार बढ़ाये रखना (जो कि प्रत्यक्ष और मूल घोषित उद्देश्य है) संभव नहीं माना गया है। विषमता वर्द्धन, धनियों को और ज्यादा धनी बनाने और राज्य द्वारा इस प्रक्रिया को सबल बनाने की जगह  सीधे-सीधे, बड़ी और पहली प्राथमिकता की तरह सबको पर्याप्त, पुख्ता और सम्मानजनक रूप मंे आजीविका की गारन्टी आदि को राजग दो की व्यवसाय और व्यवसायी मित्रता में जगह नहीं मिल पाती है। इन नीतियों में टैक्स कटौती का स्व-घोषित तड़का राज्य की वित्तीय क्षमता को कड़ी संकीर्ण सीमाओं में बांध देती है, खासकर राज्य द्वारा मौद्रिक प्रसार की कड़ी सीमा में बांधने को अपनी पीठ आप ठोकने का कारण मानने के चलते। जाहिर है राज्य अपनी बिना पर सामाजिक सुरक्षा, जन कल्याण तथा और व्यवसायी वर्गों के लिये जीवन की सुख सुविधाएँ और गुणवत्ता सुधारने और उनकी उत्पादन क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र सांकेतिक खर्च कार्यक्रम ही अपने हाथों में ले पाती है। मुख्यतः चलते आ रहे कार्यक्रमों की लकीर पीटते रहने और उन्हें घोषित रूप से घटाने हटाने का साहस नहीं जुटा सकने के कारण हमने ईमानदारी से अपनी नीतियों का रूप खुलकर सार्वजनिक करने के राजग दो के वक्तव्य की प्रशंसा से इस लेख की शुरूआत की थी किन्तु भूलना नहीं चाहिए कि राजनैतिक ईमानदारी की सीमाएँ लांघना भी एक हद तक ही देखा गया है। अनेक बड़े छलावों भुलावों की नींव पर ही तो सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ा गया था। अब किस्तों में हमें उनके पीछे छिपे सचों को उजागर होने की प्रतीक्षा करनी होगी।
    लोकसभा चुनाव के कटु तथा अतिरंजित धुआंधार प्रचार में अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति पेश की गई थी। इस साल की  सरकारी आर्थिक समीक्षा में दिए गए नवीनतम आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी होती है। अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए राजग दो सरकार के बजट को पहला बड़ा बहुमुखी प्रयास माना जा सकता है। देश की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक चुनौतियांे (महंगाई, बेरोजगारी, सामान्य सामाजिक सेवाओं तथा आधारभूत सुविधाओं की गहन अपर्याप्तता) को सभी रेंखांकित करते रहते हैं। इनके दुष्प्रभाव से आम जन दुखी है। आम आदमी की पक्षधर अर्थव्यवस्था की आस लोग दशकों से लगाए हुए हैं। ऐसा तो नहीं हो पाया किन्तु दो भिन्न दिशाओं में चल रही नावों की सवारी करने के लिए मूल स्वरूप राजकीय राजस्व की अपर्याप्तता, विदेशी लेन देन का बढ़ता घाटा, बैंक कर्जों का डूबते खाते में जाना, कर चोरी तथा देश से काले धन का पलायन ने अर्थव्यवस्था के रीढ़ को कमजोर अवश्य कर दिया है। इससे राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर मंे सुस्ती तो आई ही है, इसने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन संचालन की विफलता और कमजोरी को भी प्रकट किया है।
    पिछले, 23-24 सालों से चली आ रही नीतियों ने थोड़े अरसे के लिए अच्छी वृद्धि दर दी जरूर लेकिन फिर वे अनिवार्यतः अपनी मंथर गति और अघोषित गुप्त
गतिविधियों में लिप्त हो गईं। बीते दो तीन दशकों में बड़ी कम्पनियांे को दिन दूना रात चैगुणा मुनाफा हुआ हैं परन्तु मजदूर और आम आदमी की स्थिति दयनीय हुई है। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पिछले तीन दशकों के फैक्टरी उत्पादन में मजदूरी वेतन आदि का अनुपात 40.6 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत के इर्द-गिर्द हो गया हैं 1980 के दशक के मुकाबले इस सदी के पहले दशक में मुनाफों का हिस्सा दो गुणा हो गया है। संगठित रोजगार की ओर किसी का ध्यान नहीं है। पक्के संगठित रोजगार की वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत वृद्धि दर के औसत के साथ मात्र 0.5 प्रतिशत रह गई है। देश में प्रति वर्ष सवा करोड़ युवाओं को रोजगार की आवश्यकता होती है। परन्तु अवसर न मिलने के कारण इनमें से अधिकतर आजीविका विहीन और अभावग्रस्त करोड़ों लोगों की भीड़ में शामिल हो जाते हैं। दुखद है कि सरकार व अधिकारी आर्थिक सामाजिक तथ्यों की आधिकारिक जानकारी होते हुए भी कुछ ठोस सुधारात्मक, सकारात्मक ठोस कदम नहीं उठाते। भारत की सबसे गंभीर समस्या, गैर-बराबरी है। अमानवीय गैर बराबरी के कारण देश की युवा पीढ़ी, बालक एवं वृद्ध फटेहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। देश इस बड़े मानव संसाधन के प्रयासों से संभावित राष्ट्रीय उपलब्धियों से भी वंचित हो रहा है। नेता शासक कम्पनियाँ मात्र राष्ट्रीय आय के कुल योग और औसत में राष्ट्रीय गौरव खोजने में लगे रहते हैं। अनेक समाज विज्ञानी उनके सुर में सुर मिलाते हैं। उन्हें इन करोड़ों नवयुवकों की ज्ञान क्षमता तथा अनुभव में संभावित योगदान दिखाई नहीं देता। नकली और थोथे राष्ट्रवाद में विषमताएँ भरी हुई हैं। उनके दुष्परिणामों की गणना तो दूर कभी उनकी फेहरिस्त भी नहीं बनाई गई। अधिकारी वर्ग किसी बीते जमाने की खुमारी में डूबे स्वप्नदर्शी स्वाभिमानी की तरह हो गए हैं। वे अपने परिवेश की वंचनाओं और कष्टों की घोर उपेक्षा कर रहे हैं।
    खैर, काफी अरसे बाद जनमत ने राजकीय सत्ता की वैधानिक दुर्बलता को दूर किया है। केन्द्र में एक सशक्त राज्य सत्ता की स्थापना हुई है। लोगों ने भाजपा में गहरा विश्वास और अपनी उम्मीदों की पूर्ति को दंाव पर लगाया है। इस परिप्रेक्ष्य मंे हमें 2014-15 के बजट के चरित्र, प्रावधानों और संभावित प्रभावों को देखना चाहिए। आज के परिवेश में गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई और विषमताएँ आपस मंे पूरी तरह गुत्थमगुत्थ हैं। साथ ही यह चतुष्कोण आर्थिक सांस्कृतिक और अन्तर्राष्ट्रीय पटल के सम्बंधों कार्य प्रणाली, शक्ति संतुलन तथा राजकीय नीतियाँ और सुविधाएँ तथा प्रकृति का दुष्परिणाम भी है। हर साल राजकोषीय वित्तीय आवंटन में पुरानी लीक पीटा जाता है। इस वर्ष भी केवल सीमांत, मामूली रद्दोबदल ही किए गए हैं। राजग दो सरकार ने जो बजट पेश किया हैं, उसे देखकर वर्षों से आलोचना और खंडन मंडन में निरंतर, केन्द्रीय सत्ता संचालन के पुराने अनुभवी, अनेक राज्यों की लम्बे समय तक बागडोर सँभालने वाले तथा अपनी स्पष्ट आर्थिक सामाजिक प्रतिबद्धताओं की ताल ठोकने वाले लोग आश्चर्यचकित हैं। उनका कहना है कि बजट से नई सरकार ने अपनी कोई छाप नहीं छोड़ी। वे ऐसा कह रहे हैं तो कोई कारण भी होगा। कारण खोजने के लिए ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है। वर्ष 1970 के बाद से ही देश में असंतुलन अपना पैर फैलाने लगा था। बड़ी राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय पूँजी परस्त बाजार यानी निजी लाभ प्रेरित नीतियाँ मामूली फेरबदल के साथ लगातार अपनी पैठ जमाती गईं। इसका परिणाम यह हुआ कि देश में गैर बराबरी नीति असंतुलित, अनैतिक और अलोकतांत्रिक होने के साथ साथ दीर्घकालीन जनहितों की बलि भी लेता रहा। भारत सरकार ने वित्तीय और विदेशी क्षेत्र को अत्यधिक महत्व दिया, जिससे कृषि और ग्रामीण जीवन की न्यूनतम  जरूरतों की घोर उपेक्षा हुई।
    बाजारोन्मुखी नीतियों को लागू करने के बावजूद विश्व अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति निरंतर कमजोर हो रही है। प्रभावी माँग एवं उत्पादन के स्वरूप के बीच असमान्य समीकरण होने की वजह से कीमतों में लगातार इजाफा हो रहा है। बढ़ती महंगाई पर काबू पाने के तमाम दावे खोखले साबित हो रहे हैं। देश में भ्रष्टाचार, काला धन, मानवीय मूल्यों की हत्या, जघन्य अपराधों का तांडव चल रहा है। राजनीति मूल्यहीन घटिया व्यवसाय फरेबी हो गई है। सालाना बजटों की तरह इस साल का बजट भी पिछली नीतियों को ही आगे बढ़ाता है। वर्ष 2014-15 के बजट में सार्वजनिक व्यय को महज 14 प्रतिशत तक रखा गया। जिसमें करीब दस प्रतिशत
कराधान तथा शेष बजट घाटे का है। यह अनुपात कुछ वर्षों पहले करीब 17 प्रतिशत हो चला था। इसे बढ़ाने के बदले घटाया गया है। इसे पूरा करने के लिए भी विनिवेश (यानी सामाजिक सम्पत्ति कर निजी हाथों में हस्तांतरण तथा दीर्घ स्थायी परिसम्पत्तियों को बेचकर उससे चालू खर्चों पर लगाना यानी असामाजिकता और अदूरदर्शिता का कष्टकर संयोग) द्वारा करीब 435 अरब रूपये की उगाही की तजबीज है। कुल राजस्व में 17.7 प्रतिशत वृद्धि की आशा महंगाई की बढ़ी दर पर टिकी है। जिस पर सरकार नियंत्रण करने में विफल हो रही हैं।
    ये सब कदम है व्यवसाय और व्यवसायिक यानी बिजनेस परस्ती या मित्रता के। ये व्यवसायी, खास तौर पर कारपोरेट व्यवसायी बमुश्किल देश के सर्वोच्च आय और सम्पत्ति तथा शासन पर हावी लोग हमारी जनशक्ति, हमारे जन मन गण के एक प्रतिशत के करीब होंगे। इनकी वर्तमान स्थिति को लगातार मजबूती देते कहकर यह परिकल्पना करना कि 99 प्रतिशत लोगों खास तौर पर करीब तीन चैथाई लोगों का सापेक्ष और निरपेक्ष विकास, सामाजिक समावेशन और शक्तिकरण हो जाएगा बालू का भुतहा महल बनाने जैसा शेख चिल्लीपन है।
    लगता है राजग दो सरकार भी निजी सार्वजनिक साझीदारी (पीपीपी) के जरिए अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के ख्वाब देख रही है। यहाँ तक कि चालू सरकारी स्कूलों तक को व्यापारी वर्ग को सौंपने की तैयारी हो रही है। राज्य के साथ मिलकर अब बड़ी-बड़ी विशाल पूँजी तथा वित्त जुटाने में समर्थ तबके आर्थिक और सामाजिक भूमिका के केन्द्र में हांेगे। परन्तु सरकार भूल रही है कि पीपीपी की बेहिसाब बढ़ोत्तरी ने आय और सम्पत्ति के केन्द्रीयकरण रूपी कुप्रभावों को बढ़ाया है। इससे सामाजिक राजनैतिक शक्ति के वितरण में भी विषमता का दंश बढ़ा है। गृहस्थ, बैंक तथा वित्तीय क्षेत्र की बचत को उधार लेकर बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ राज्य के अधिकारों पर काबिज होती हैं। सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य, यातायात संचार आदि सार्वजनिक सेवाओं को पूर्णतः निजी हाथों में दे दिया है। इस तरह की निजी दुकानों ने सामाजिक समस्याओं की जड़ों को पहले ही अतिरिक्त मजबूती दे दी है। शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र के साम्यकारी रूप से अर्द्धशिक्षित, निजी शिक्षक और व्यापारी कुलपति अपने पैरों तले कुचल रहे हैं। चिकित्सा के नाम पर निर्धन की सम्पत्तियों की कुर्की हो रही है। सरकार ने अपने बजट में इन असमानताओं को दूर करने के कोई प्रयास नहीं किए हैं, बल्कि इन्हें प्रोत्साहित ही किया है।
    लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार भी पूँजीपतियों के हाथों का खिलौना प्रतीत होती है। सारे विकल्प नागनाथ और साँपनाथ के बीच चयन तक सिमट जाते हैं। गैर बराबरीमय भूमंडलीकरण इन असमानताओं को आगे बढ़ाता है।
    सामाजिक सुरक्षा के लिए बीमा व्यवसाय में भी तेज मुनाफे खोजे जा रहे हैं। इसके लिए हवा के झोंकों की तरह इधर उधर भागती सट्टोरी विदेशी वित्तीय पूँजी  को बड़ी भूमिका दी जा रही है। कराधान, कर कानूनों में छिद्र, उनकी उपेक्षा तथा कर कानून और प्रशासन में रिश्वतखोरी से पूँजीपतियों को बच निकलने के कई रास्ते मिल जाते हैं। इन मुट्ठी भर लोगों का राष्ट्रीय आय, सम्पत्ति और सुविधाओं के अकल्पनीय बड़े भाग (लगभग 60 से 70 प्रतिशत तक) पर कब्जा सा हो गया हैं। हमारे आर्थिक वित्तीय नीतिगत सोच पर पश्चिमी देश और उनके द्वारा चयनित स्थानीय पंडितों ने पूरी तरह कब्जा कर रखा है। हम भूल गए हैं कि वर्ष 2008 में धनी पश्चिमी देशों की आर्थिकी कैसे धाराधायी हुई थी। फिर जन  धन की बलि चढ़ाकर उसे उबारा गया था। अफसोस कि पिछले 67 सालों से हर बजट की प्रकृति विषमता वर्धक रही है। लोकतांत्रिक शासक बदल रहे हैं। शासक वर्ग का ब्राण्डनेम बदल रहा है लेकिन असमानता बदस्तूर जारी है। नई सरकार यदि शिक्षा, स्वास्थ्य, सही खान पान, पर्यावरण तथा छोटे उद्योगों के संरक्षण पर ध्यान दे, गरीबों की जमीन को पूँजीपतियों के हाथों से बचाए तो उनके जीवन के कष्ट कम हो सकते हैं। सबके विकास से ही मजबूत अर्थव्यवस्था की परिकल्पना की जा सकती है।   
   -कमल नयन काबरा
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लोकसंघर्ष पत्रिका -सितम्बर अंक में प्रकाशित