शनिवार, 17 अक्तूबर 2020

गोवा की आजादी की लड़ाई में कम्युनिस्ट नेता डॉ.टी वी कुन्हा का योगदान

 डॉ.टी वी कुन्हा या ब्रगांसा

चित्र:T.b. cunha.jpg

- अनिल राजिमवाले

‘‘गोवन राष्ट्रवाद के पिता’’ केरूप में जाने जाते हैं। उनका जन्म 2अप्रैल 1891 को गोवा के सालसेत तालुका के चांदोर नामक गांव में हुआ था।  उनके  पिता  वकील  थे।  उनकापरिवार  धनिकों  में  गिना  जाता  था।त्रिस्ताव  की  स्कूली  शिक्षा  पुर्तगालीमाध्यमिक शिक्षा प्रणाली के मुताबिक‘लेसेवे’  में  हुई।  पढ़ाई  का  माध्यमपुर्तगाली भाषा थी। उच्च शिक्षा के लिएत्रिस्ताव  पांडिचेरी  चले  गए  जोफ्रांसीसियों के अधीन था। इसलिए वहांपढ़ाई का माध्यम फ्रांसीसी था। त्रिस्तावने फ्रेंच भाषा में बी.ए. की पढ़ाई पूरीकी। उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरीकरके पैरिस जाने का निर्णय लिया।1912  में  21  वर्ष  की  उम्र  में  वेपैरिस चले गए।फ्रांस में समाजवाद के संपर्क मेंफ्रांस में वे आगे चलकर समाजवादके संपर्क में आए। त्रिस्ताव में सर्बोनयूनिवर्सिटी  में  दाखिला  लिया  औरइलेक्ट्रिकल  इंजीनियरिंग  में  डिग्रीहासिल की। पैरिस में वे सुप्रसि( लेखकरोम्यां रोलां के ग्रुप के संपर्क में आए।इसके जरिए वे भारत की आजादी तथाविशेषतौर पर गोवा की मुक्ति का संदेशफैलाते  रहे।  योरप  के  लोगों  कोजलियांवाला बाग की घटनाओं से अपनेलेखन के जरिए अवगत कराने वाले वेही थे।फ्रांस  की  सोशलिस्ट  पार्टी  प्रथमविश्यु( से पहले द्वितीय इंटरनेशनलसे संबंधित थी। यु( की समाप्ति केबाद  वैचारिक-राजनैतिक  संघर्ष  केफलस्वरूप उसी के अंदर से कम्युनिस्टपार्टी का उदय हुआ।इस बीच कुन्हा सोवियत रूस होआए। उन्हें वहां की क्रांतिकारी घटनाएंदेखने  को  मिलीं।  उन्होंने  पैरिस  मेंआजीविका के लिए शिक्षक का कामकरना  आरंभ  किया।  उन्होंने  लिखनेका काम भी ले लिया। वे ‘क्लार्ते और‘लुमानिते’ नामक अखबारों में लिखनेलगे। ‘लुमानिते’ पहले सोशलिस्ट पार्टीऔर फिर कम्युनिस्ट पार्टी का दैनिकमुखपत्र बना।त्रिस्ताव  कुन्हा  की  मुलाकातसुप्रसि( लेखक और नोबेल पुरस्कारविजेता बदब्राउन से हुई। उनके अनुरोधपर कुन्हा ने महात्मा गांधी की जीवनीका फ्रेंच भाषा में अनुवाद किया। उसवक्त फ्रांस में गांधीजी के आंदोलन कीबड़ी चर्चा थी। उनके अनुवाद की हेनरीने बड़ी तारीफ की। इस प्रकार फ्रेंचभाषा पर उनकी पकड़ काफी मजबूतकम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी-27डॉ. टी.बी. कुन्हाः ‘‘गोवा के राष्ट्रवाद के पिता’’हो  गई  थी।  रोम्यां  रोलां  ने  अन्य  केसाथ  मिलकर  ‘साम्राज्यवाद-विरोधीलीग’ की स्थापना की। कुन्हा उसकेसदस्य बन गए।फ्रेंच कम्युनिस्ट पार्टी कीस्थापनाः हो ची-मिन्ह से मुलाकात25  दिसंबर  1920  को  फ्रेंच सोशलिस्ट पार्टी का सम्मेलन तूर्स मातोवर्स ;ज्वनते में आरंभ हुआ। इसमें वियतनाम के भावी नेता हो ची-मिन्ह भी उपस्थित थे। वे पढ़ने के लिए पैरिस आए थे और जीविका के लिए विभिन्नकाम किया करते।इस  कांग्रेस  के  दौरान  बहुमत कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में शामिल होनेके पक्ष में था। मार्सेल काशिन, सुवाराइन,फ्रांसार्ड और लोरिए के नेतृत्व में उसनेलेनिन का समर्थन किया। तीन-चौथाई प्रतिनिधियों ने ‘कम्युनिस्ट इंटरनेशनल का फ्रेंच सेक्शन’ स्थापित किया जो आगे  चलकर  1921  में  फ्रेंच कम्युनिस्ट पार्टी बन गया। ‘लुमानिते’अखबार भी इनके पास आ गया।यहां  डॉ.  कुन्हा  की  मुलाकात  होची-मिन्ह से हुई। दोनों के बीच काफी बातचीत हुई। आगे चलकर कुन्हा भी फ्रेंच कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए।इस  प्रकार  एक  गोवा  और  दूसरा वियतनाम का क्रांतिकारी फ्रेंच कम्युनिस्टपार्टी में साथ काम करने लगे। पुर्तगालकी  कम्युनिस्ट  पार्टी  की  स्थापना1921 में की गई। इस प्रकार दोनोंही  देशों  के  कम्युनिस्ट,  तथा  अन्य प्रगतिशील लोग गोवा की आजादी केसंघर्ष का समर्थन करने लगे। 1925में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापनाकी गई।भारत में वापसीटी.बी. कुन्हा 14 वर्ष फ्रांस में रहे।वे 1926 में भारत लौटे। उन्होंने गोवामें ‘कोमिस्साओ दो कोंग्रस्सो दे गोवा’;गोवा कांग्रेस कमिटिद्ध की स्थापना की।कुन्हा नेहरू से मिले और इस संबंध मेंचर्चा की। उसे भारत से जोड़ा गया।कम्युनिस्ट  पार्टी  स्थापित  करने  कीकोशिश  नहीं  की  गई  क्योंकि  इससेपुर्तगालियों का दमनचक्र तेज हो जाता।कुन्हा को कांग्रेस की कार्यसमितिमें  शामिल  किया  गया।  गोवा  कांग्रेससमिति  भूमिगत  काम  कर  रही  थी।लेकिन उन्हें कांग्रेस से उचित सहायतानहीं  मिली।  वे  बंबई  चले  गए  जहांगोवा से कई लोग रहा करते थे। वहांउन्होंने  संगठन  बनाने  का  काम  शुरूकिया।बंबई  में  गोवा  से  मडकईकर,नारायण पालेकर, ज्यॉर्ज वाझ, जेराल्डपरेरा,  मारियो  रॉड्रिग्ज,  काशीनाथतेंदुलकर, इत्यादि उपस्थिति थे। एम.एन. रॉय का भी प्रभाव था। बेलगांव केरॉयवादी  गोवा  में  अध्ययन  मंडलियांसंगठित करते। 1937 में मडकईकरने ‘गोमांतक हिंदू युवक संघ’ का गठनकिया जिसका नाम बाद में बदलकर‘गोमांतक तरूण संघ’ कर दिया गया।वे कसरत और शस्त्रास्त्रों की ट्रेनिंगदिया करते।पुर्तगाल की जेल में18 जून 1946 को राममनोहरलोहिया को गोवा में गिरफ्तार कर लियागया। उन्होंने गोवा आंदोलन की ओरसबका ध्यान खींचा। कुन्हा ने उनकीतब तक की एक विशालतम आमसभाआयोजित की लेकिन खुद एक दिनबाद  ही  आ  पाए।  उस  दिन  व्यापकसत्याग्रह आयोजित किया। कुन्हा बंबईसे गोवा आ गए थे। उन्होंने लोहियाकी गिरफ्तारी के विरोध में भाषण दिया।इस जुर्म में उन्हें मडगांव में गिरफ्तारकर लिया गया। पहले तो उन्हें गोवाके अग्वाडा जेल में अंधेरी नम कोठरीमें रखा गया। फिर पुर्तगाल भेज दियागया।बंबई में बड़ी संख्या में गोवन लोगरहा करते थे। 1950 में उनकी संख्याएक लाख थी। 1945 में डॉ. कुन्हाने ‘गोवन यूथ लीग’  की स्थापना की।जेराल्ड परेरा, जोआकिम डायस तथाअन्य इसमें शामिल हुए।उसी  वक्त  टी.बी.  कुन्हा  ने  एकपुस्तक  लिखी  जिस  शीर्षक  था‘‘डीनैशनलाइजेशन       ऑफगोवन्स’’;1944द्ध,  अर्थात  उनकाराष्ट्रीय  हक  छीने  जाने  की  समस्या।उन्होंने पुर्तगली अत्याचारों का वर्णनकिया। इसके अलावा उन्होंने कुछ अन्यपुस्तिकाएं  भी  लिखीं।  उनमें  एक  थी‘‘फोर हेड्रेड ईयर्स ऑफ फॉरेन रूल’’।पुर्तगालियों  को  उन्हें  जेल  भेजने  काएक और मौका मिल गया। अन्य बहानेभी थे। उन्हें पुर्तगाल के ‘‘पैनिश’’ जेलमें रखा गया। उन्हें आठ वर्ष की कठोरश्रम  की  सजा  दी  गई।  पुर्तगाल  कीकम्युनिस्ट पार्टी के कई नेता भी उसजेल में बंद थे। कुन्हा प्रथम नागरिकव्यक्ति  थे  जिन  पर  सैनिक  ट्रिब्यूनलद्वारा मुकदमा चलया गया। उन्हें कोर्ट-मार्शल किया गया था।‘‘पैनिश’’  एक  प्रकार  कायातना-शिविर था। उस समय पुर्तगालपर सालाजार नामक फासिस्ट तानाशाहका शासन था। उसका फौजी खुफियाविभाग  ‘पिडे’  ;च्प्क्म्द्ध  कहलाता  था।’पिडे’ का ढांचा नाजी गेस्टापो के समानबनाया  गया  था।  उसने  भयानकअत्याचार करते हुए हजारों बंदियों औरलोगों की हत्या की।ऐसे  ही  यातना-शिविर  में  टी.बी.कुन्हा  को  1950  तक  रख  गया।इसके विरोध में सारे योरप और विश्वभरमें विरोध आंदोलन चल पड़ा। साथ हीएमनेस्टी  इंटरनेशनल  ने  भी  आवाजउठाई और सहायता की। फलस्वरूप उन्हें रिहा कर दिया गया। लेकिन उन्हें पुर्तगाल की राजधानी लिस्बन में हीसीमित कर दिया गया और बाहर जानेकी इजाजत नहीं थी। इसलिए उन्हें दोसाल लिस्बन में ही बिताने पड़े। वहांके कम्युनिस्टों ने उनकी बड़ी सहायताकी।  उनके  लिए  एक  पासपोर्ट  काइंतजाम  कर  दिया।  उसके  सहारे  वेलिस्बन से निकलकर पैरिस चले गए।वहां  उनके  बहुत-सारे  जान-पहचानके  लोग  थे।  फ्रेंच  भाषा  पर  महारथहासिल थी इसलिए वहां रहने में कोईपरेशानी नहीं हुई।कुन्हा 4 सितंबर 1953 को बंबईवापस आ गए। 1946 से 1953के बीच परिस्थिति काफी बदल चुकीथी।  आंदोलन  में  फूट  पड़  चुकी  थीऔर कई गुट काम कर रहे थे। बंबईमें कई दफ्तर खुल गए। डॉ. कुन्हा नेइन  सबको  इकट्ठा  करने  का  कामआरंभ किया। वे ही इसके लिए सबसेसक्षम  थे।  सभी  गुटों  में  उनका  बड़ासम्मान था।कुन्हा ने सबों को इकट्ठा करके‘गोवा ऐक्शन कमिटि’ का गठन किया।इसमें गोवन पीपल्स पार्टी के नारायणपालेकर, ज्यॉर्ज वाझ और जेराल्ड परेराभी शामिल थे। कुन्हा ने काफी कामकिया।  उन्होंने  ‘आजाद  गोय’  नामकएक अखबार रोमन कोंकणी लिपि मेंप्रकाशित  किया।  बेलगांव  से  फुर्तादो‘फ्री गोवा’ नामक अखबार चला रहे थेजिसका संपादन डॉ. कुन्हा करने लगे।13 जुलाई 1954 को उन्होनेभारतीय जनता का एक वक्तव्य के जरिएआवाहन  किया  कि  गोवा  भारत  काअभिन्न अंग है, इसलिए भारतीय जनताको गोवा मुक्ति संघर्ष कर सक्रिय समर्थनकरना चाहिए और हर तरह से उसकीसहायता करनी चाहिए।दादरा-नगर हवेली का मुक्ति संग्रामगोवा  मुक्ति  आंदोलन  का  एकमहत्वपूर्ण पड़ाव है दादरा-नगर हवेलीका मुक्ति संघर्ष। यह महाराष्ट्र- गुजरातकी सीमा पर स्थित है और गोवा कीतुलना में बहुत छोटा है। इसकी मुक्तिपर विचार करने के लिए गोवन पीपल्सपार्टी और भा.क.पा. की संयुक्त बैठकेंबंबई में हुईं। इसमें मिरजकर ने पहलकी। दादरा और नगर-हवेली पिछड़ेआदिवासी क्षेत्र के बीच थे और बंबईसे मात्र 80 किमी की दूरी पर। अत्यंतपिछड़े सामंती, आदिवासी तथा पुर्तगालीशासन ने जनता पर भयंकर अत्याचारकिए।  1953  में  डहाणू  में  अ.भा.किसान  सभा  के  अधिवेशन  में  यहयोजना अधिक मजबूत हुई। यह तयपाया  गया  कि  वरली  आदिवासियों,किसानों  और  साधारण  जनता  कोगोलबंद कर पुर्तगालियों से दादरा-नगरहवेली मुक्त कराई जाए। वहां सशस्त्रआक्रमण  की  योजना  भा.क.पा.  तथागोवन पी.पी. के नेतृत्व में बनी।कुछ  कांग्रेसियों  ने  यूनाइटेड  फ्रंटऑफ गोवन्स गठित किया और मोरारजीदेसाई  की  सहायता  से  वे  दादरा  मेंप्रवेश कर गए। लेकिन इस कार्रवाईका  मुख्य  निशाना  था  आंदोलन  कीमुख्यधारा से ध्यान हटाना और उसमेंफूट डालना।टी.बी. कुन्हा पं. नेहरू से मिले औरसेना तथा पुलिस भेजने का अनुरोध किया। मोरारजी देसाई की कार्रवाई से पुलिस सतर्क हो चुकी थी। नगर हवेली की जनसंख्या लगभग 40 हजार थी।भा.क.पा.  के  कैप्टन  गोले,  पालेकर,वाज, इ. कम्युनिस्टों के नेतृत्व में धनइकट्ठा किया गया। वे सभी कुन्हा से मिले और काम तेज हो गया।23  जुलाई  1854  को  गोवन पीपल्स पार्टी तथा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी  के  दस्ते  नगर-हवेली  में  प्रवेशकर गए। गोदावरी परूलेकर भी काफीसक्रिय थीं। तीन दिशाओं से आक्रमणकिया गया। गोवन पीपल्स पार्टी ने 43गांवों पर कब्जा कर लिया।एक अन्य पार्टी आजाद गोमंतक पार्टी  ने मोरारजी देसाई तथा आर.एस.एस.की मदद से पीपल्स पार्टी को न सिर्फ रोकने की कोशिश की बल्कि उन केनेताओं की गिरफ्तारियां तक करवाईं।राजधानी सिलवासा के गिर्द तनाव बढ़नेलगा। भा.क.पा./जी.पी.पी. के ज्यॉर्ज वाजको पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया औरसिलवासा की जेल में बंद कर दिया।दादरा-नगर हवेली की मुक्ति केसमारोह में 15 अगस्त को डॉ. टी.बी.कुन्हा को झंडोत्तोलन के लिए बुलायागया।  वहां  पहुंचने  पर  उन्हें  स्थितिसमझ में आई। उन्होंने कहा कि जबतक जी.पी.पी. के कार्यकर्ता रिहा नहींहोते तब तक झंडोत्तोलन नहीं करेंगे।आश्वासन मिलने पर ही उन्होंने झंडाफहराया।लेकिन कैदियों को आसानी से रिहानहीं  किया  गया।  इस  प्रकारमुक्तियो(ाओं को एक ओर पुर्तगालियोंसे लड़ना पड़ा तो दूसरी ओर मोरारजीकी बंबई सरकार से।डॉ. टी.बी. कुन्हाः ‘‘गोवा के राष्ट्रवाद के पिता’’‘दमन’  में  सत्याग्रह  करने  का निर्णय गुजरात की कम्युनिस्ट पार्टी नेलिया। दिउ में भी पार्टी ने यही निर्णयलिया। पुर्तगाल की सरकार अफ्रीका से सैनिक गोवा स्थानांतरित करने लगीःउनके  द्वारा  अत्यंत  बर्बर  एवं  क्रूर1200 अतिरिक्त अफ्रीकी सैनिक वहां लाए गए।गोवा तथा अन्य पुर्तगाली उपनिवेशोंमें सशस्त्र संघर्ष तथा सत्याग्रह संबंधी तैयारियों के संबंध में अक्टूबर 1954में भा.क.पा. की एक बैठक बेलगांव मेंहुई।8  जून  1955  को  पणजी  केगवर्नर पैलेस पर ध्वजस्तंभ पर पांचयुवा  कम्युनिस्टों  ने  तिरंगा  फहराया।उन्हें  पकड़  लिया  गया  और  थाने  मेंउनकी जमकर पिटाई की गई। फिरउन्हें अधमरे हालत में सीमा पर छोड़दिया  गया।  इसके  बाद  सुप्रसि(सत्याग्रह आरंभ हो गया।गोवा मुक्ति आंदोलन के ‘पितामह’डॉ. टी.बी. कुन्हा की मृत्यु 20 सितंबर1958 को बंबई में हो गई। जयप्रकाशनारायण उनकी अर्थी संभालने वालों मेंएक  थे।  25  वर्षो  बाद  उनकास्मृति-कलश पणजी लाया गया जहांउसे आजाद मैदान में रखा गया है। वेगोवा सत्यागह के वक्त स्वयं ही सीमापारउपस्थित थे। उनका निधन गोवा कीमुक्ति ;1961 से पहले ही हो गया।उनकी याद में भारत सरकार नेएक डाक टिकट भी जारी किया। उनके नाम से गोवा में शिक्षण संस्थाएं भी हैं।उनकी एक प्रतिमा उनके पुश्तैनी गांव कुएलिम, कान्सिउलिम, में स्थापितकी गई है। वहां एक खेल परिसर भीउनके  नाम  से  स्थापित  किया  गया।2011 में गोवा की मुक्ति की स्वर्णंजयंती  के  अवसर  पर  उनका  चित्र भारतीय संसद में अनावरित किया गया।पणजी  का  एक  प्रमुख  मार्ग  ‘‘टी.बी.कुन्हा’’ रोड है। विश्व शांति परिषद ने1959  में  जनगणों  के  बीच  शांतिऔर मित्रता बढ़ाने में उनके योगदानके लिए मृत्यु-उपरांत स्वर्ण-पदक प्रदानकिया।

बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

किसान विरोधी सरकारों को किसान उखाड़कर हिन्द महासागर में फेंक देगा-रणधीर सिंह सुमन

 



 बाराबंकीः मोदी के नेतृत्व में केेन्द्र सरकार ने किसानों से सम्बंधित जिन काले कानूनों का निर्माण किया है उससे किसानों के धान का मूल्य न्यूनतम मूल्य से कम होकर 900/- रूपये प्रति कुंटल आ गया है वहीं प्रदेश सकरार द्वारा धान खरीद की कोई व्यवस्था अभी तक नहीं की गयी है। जिससे बड़े खादद्यान्न व्यापारी कम दामों पर धान खरीदकर गोदामों को भर रहे हैं जिसका खामियाजा उपभोक्ताओं को आगे चलकर उठाना होगा।
देश व्यापी किसान आंदोलन के तहत आल इण्डिया किसान सभा की प्रदर्शनकारियों में सगठन के राज्य कार्यकारिणी सदस्य रणधीर सिंह सुमन ने सम्बोधित करते हुए कहा कि किसान विरोधी सरकारों को किसान उखाड़कर हिन्द महासागर में फेंक  देगा। गांधी के किसान आन्दोलन से ब्रिटिश साम्राज्य वाद का सूरज अस्त होे गया था।
किसान सभा जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कहा कि इस किसान विरोधी सरकार के खिलाफ निरंतर आन्दोलन चलाया जायेगा वहीं संगठन के उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा कि जिला प्रशासन किसानों की उपजाऊ जमीन छीनने के लिए बाराबंकी विकास प्राधिकरण बनाकर किसानों की जमीन छीनने की साजिश रच रहा है।
 

 भारतीय कम्युनिष्ट के जिला सचिव बृज मोहन वर्मा ने कहा कि केन्द्र सरकार द्वारा बनाये गये किसानों के सम्बंध में काले कानूनो से जो भयानक बेरोजगारी फैलेगी उसका कोई अन्त नहीं होगा। पार्टी के सहसचिव डा0 कौसर हुसैन ने कहा कि यह सरकार किसान मजदूरों की विरोधी सरकार है और महंगाई का बोल-बाला हो गया है और बेरोजगारी बढ़ रही है।


आल इण्डिया किसानसभा का प्रदर्शन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी कार्यालय सेे चलकर छाया चौराहा ,बस अड्डा से चलकर जिलाधिकारी कार्यालय तक नारे लगाते हुए आया। प्रदर्शनकारियों में महेन्द्र यादव, अध्यक्ष स्टूडेन्ट फेडरेशन ,आशीष शुक्ला ,अध्यक्ष ,यूथ फेडरेशन ,गिरीश चन्द्र, वीरेेन्द्र वर्मा, रामनरेश वर्मा, नीरज वर्मा, श्याम सिंह, अंकुल वर्मा, राजेन्द्र बहादुर सिंह, राज कुमार काशीराम, संदीप तिवारी, दीपक शर्मा, सर्वेश यादव, गाजी अमान आदि प्रमुख लोग थे।

शनिवार, 10 अक्तूबर 2020

मोदी सरकारसे किसानों का भला नहीं -राजेन्द्र यादव

 

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय का उद्घाटन आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश महासचिव राजेन्द्र यादव पूर्व विधायक ने किया .इस अवसर पर मुखविर राज और आजादी के महानायक -1 तथा लोकसंघर्ष पत्रिका के विशेष अंक का विमोचन भी किया ने किया .
आल इण्डिया किसान सभा के प्रदेश महासचिव राजेन्द्र यादव पूर्व विधायक ने प्रेस कान्फ्रेन्स को सम्बोधित करते हुए कहा कि ‘ मोदी सरकार किसानों के सम्बंध में जिन कानूनों का निर्माण किया है उससे किसानों का कोई भला नहीं होने वाला है । ” मण्डी समाप्त हो जाने के बाद किसानों को न्यूनतम लागत मूल्य मिलने के बजाय 1,200 रूपये प्रति कुन्टल धान खरीदने के लिए कोई तैयार नहीं है और आवश्यक वस्तु अधिनियम से अनाज को बाहर कर बड़े पूंजीपतियों को सस्ते दामों पर खाद्यान्न खरीद कर स्टॉक करने का जो लाइसेन्स मिल गया है उससे शहरी उपभोक्ताओं को भी महंगे दाम पर खाद्यान्न खरीदना पड़ेगा । सरकार ने संविदा खेती की अनुमति देकर गांव में रहने वाले 80 प्रतिशत गरीब पिछड़े लोगों से बटाईदारी का हक छीन लिया है । कार्पोरेट सेक्टर के लोग गांव में छोटे और मंझौले किसान जो लोगों के खेत बटाई पर लेकर जीविकोपार्जन करते थे उनका जीविकोपार्जन का साधन छीन लिया है । श्री यादव ने प्रेस कान्फ्रेन्स को सम्बोधित करते हुए कहा कि बाराबंकी जिला प्रशासन ने आज से कुछ वर्ष पूर्व बाराबंकी विकास प्राधिकरण बनाकर बाराबंकी के किसानों की जमीन छीनने का प्रयास किया था , जिसका विरोध आल इण्डिया किसानसभा के पदाधिकारी होने के नाते गांव – गांव जाकर विरोध कर उस प्रस्ताव को रद्द कराया था लेकिन योगी सरकार के आने के बाद जिला प्रशासन के अधिकारी किसानों की जमीन को छीनने के लिए बाराबंकी विकास प्राधिकरण का प्रस्ताव तैयार किया है जिसका किसानसभा भरपूर विरोध करेगी और किसानों की एक इंच जमीन भी प्राधिकरण को नहीं देने देंगे । वि सान सभा आने वाले दिनो में किसानों की जमीन बचाने के लिए आन्दोल । का रास्ता अख्तियार करेगी।भारतीय कम्युनिस्टपार्टी के इस कार्यक्रम के अवसर पर पार्टी के राज्य परिषद सदस्य रणधीरसिंह सुमन ,पार्टी के जिला सचिव ब्रजमोहन वर्मा ,सह सचिव डॉ कौसर हुसेन ,शिव दर्शन वर्मा ,किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ,उपाध्यक्ष प्रवीन कुमार ,गिरीश चन्द्र ,वीरेंद्र कुमार ,अमर सिंह ,महेंद्र यादव ,आशीष शुक्ला,रमेश वर्मा ,मुनेश्वर ,रामदुलारे यादव ,श्याम सिंह एडवोकेट ,अंकुल वर्मा सहित सैकड़ों लोग थे .प्रतिरोध प्रदर्शन किया गया

गुरुवार, 8 अक्तूबर 2020

अरूणा आसफ अली: 1942 की गौरवशाली नेत्री -अनिल राजिमवाले

 
अरूणा आसफ अली का जन्म 16
जुलाई 1909 को कालका में एक
बंगाली ब्राह्मो समाज परिवार में हुआ
था। उनके माता-पिता श्रीमती और श्री
गांगुली ज्यादा समय बंगाल में नहीं
रहे। गांगुली कालका रेलवे जलपान
गृह के इंचार्ज थे।
अरूणा दो बेटियों और तीन बेटों
में सबसे बड़ी थीं। अरूणा और उससे
छोटी पूर्णिमा की आरंभिक पढ़ाई लाहौर
के ‘कॉन्वेंट ऑफ सैक्रेंड हार्ट’ में हुई।
उस वक्त उनके पिता पत्रकार बन चुके
थे। स्कूल में अरूणा को ‘इरीन’ नाम
से पुकारा जाता था। अरूणा आध्यात्मिक
बन गईं और ‘रहस्यमय’ तथा ‘अदृश्य’
में विश्वास करने लगीं। वे रोमन
कैथोलिक चर्च से गहरे रूप से प्रभावित
हुईं। एक समय तो वह ‘नन’ बनने
का भी सोचने लगी। जब उसने अपना
फैसला माता-पिता को बताया तो उन्हें
बहुत धक्का लगा। उसे बड़ी डांट पड़ीं।
उन्होंने उसे नैनीताल भेज दिया और
एक प्रोटेस्टेंट स्कूल में भर्ती कर दिया।
वहां गांगुली ने एक होटल खेल लिया
था।
अरूणा पुस्तकें बहुत पढ़ा करतींः
क्लासिक्स, कविता, उपन्यास, दर्शन,
राजनीति, इत्यादि। उसने माता-पिता
के दबाव से शादी से इंकार कर दिया
और पश्चिमी प्रभाव में मुक्त जीवन
व्यतीत करना चाहती थी। अपना खर्चा
खुद चलने के लिए वह आसफ अली
घर से निकल पड़ी और कलकत्ता चली
गईं। वहां वह गोखले मेमोरियल स्कूल
फॉर गर्ल्स में पढ़ाने लगीं। वे उच्चतर
पढ़ाई के लिए इंगलैंड जाना चाहती थीं
लेकिन अब जीवन में एक नया मोड़
आ गया।
जीवन में मोड़
अरूणा अपनी बहन पूर्णिमा के साथ
गर्मी की छुट्टियां बिताने इलाहाबाद
गई हुई थी। पूर्णिमा का विवाह बनर्जी
से हुआ था। वहां आसफ अली आए
हुए थे जो बनर्जी के मित्र थे। वे एक
युवा बैरिस्टर थे जो दिल्ली में प्रैक्टिस
कर रहे थे। वे उस वक्त मुस्लिम लीग
में शामिल थे। अरूणा और आसफ
अली परस्पर नजदीक आए। उनके
विवाह पर माता-पिता तथा अन्य को
खासी अपात्तियां थीं, खासकर
हिन्दू-मुस्लिम का प्रश्न। आसफ अली
41 वर्ष के और अरूणा 19 की थी।
उन दोनों ने सारे विरोध के बावजूद
सादगी से विवाह कर लिया।
राजनीति मेंः जेल की यात्रा
आरंभ में अरूणा को राजनीति में


कोई दिलचस्पी नहीं थीऋ यहां तक कि
वह खद्दर और उसे पहनने वालों का
मजाक भी उड़ाया करती।
लेकिन इसी बीच गांधीजी का
नमक सत्याग्रह आरंभ हो गया। इसमें
आसफ अली शामिल हो गए। उन्होंने
सत्याग्रह में भाग लिया और जेल भी
गए। इसका अरूणा पर गहरा प्रभाव
पड़ा। उसने 1857 के विद्रोह संबंधी
गर्मागर्म भाषण भी दिया। दिल्ली के
चीफ कमिश्नर ने अच्छे व्यवहार और
राजनीति में हिस्सा न लेने की गारंटी
मांगी। अरूणा ने इंकार कर दिया और
उन्हें जेल में बंद कर दिया गया। उन्हें
लाहौर महिला जेल एक साल के लिए
भेज दिया गया। गांधी-इर्विन पैक्ट में
बाकी सभी तो रिहा कर दिए गए लेकिन
अरूणा को जेल में ही रखा गया। इस
पर दूसरों ने भी जेल से बाहर जाने से
इंकार कर दिया। गांधीजी और अंसारी
ने बीच-बचाव किया और तभी बाकी
बाहर निकले।
आखिरकार अरूणा को छोड़ा गया।
उनका भारी स्वागत हुआ। खान अब्दुल
गफ्फार खान भी मिलने आए।
1932 में उन्हें फिर गिरफ्तार
किया गया। जब उन्होंने 200/रु. दंड
देने से इंकार कर दिया तो पुलिस
उनकी कीमती साड्यिं उठा ले गई!
अरूणा ने भूख हड़ताल कर दी। वे
बीमार पड़ गई। उन्हें अम्बाला जेल
भेजा गया। दिल्ली और अम्बाला जेल,
दोनों जगह स्थिति खराब थी। अरूणा
को अम्बाला जेल में अकेले सेल में
रखा गया।
फिर वे राजनीति से दस साल दूर
रहीं। वे मुख्यतः अपने पति के लिए
राजनीति में आई थीं। कभी-कभी ऑल
इंडिया वीमेंस कॉन्फ्रेंस के सम्मेलनों में
हिस्सा लेतीं।
द्वितीय विश्वयु( में अपनी इच्छा
के विपरीत भारत को घसीटने के विरोध
में 1940 में गांधीजी ने सविनय
अवज्ञा आंदोलन शुरू कर दिया। गांधी
जी ने अरूणा आसफ अली को भी
सत्याग्रही के रूप में चुना।
यहां यह उल्लेख करना उचित होगा
कि 1938-39 में जब कम्युनिस्ट
और बोस समर्थक दिल्ली कांग्रेस के
बहुमत में आ गए तो अरूणा देशबंधु
गुप्त-आसफ अली ग्रुप की समर्थक
थी।
अरूणा आसफ अली को दिल्ली में
फिर गिरफ्तार कर लिया गया और
लाहौर महिला जेल भेज दिया गया। वे
अकेले रहना चाहती थीं इसलिए ‘सी’
क्लास मांगा और उन्हें मिला। सेल को
उन्होंने अच्छी तरह सजाया। सूत
कातना उन्हें विशेष पसंद नहीं आया।
अत्यंत सादा खाना मिलता। वे कैदियों
की बड़ी सहायता करतीं। हर सप्ताह
मीटिंग करके वे पूरे सप्ताह की खबरें
महिलाओं को सुनाया करतीं।
कभी-कभी अरूणा को ए.आई.एस.
एफ. तथा अन्य विद्यार्थी मीटिंगों में
बोलने के लिए बुलाया जाता। उन्होंने
उन दिनों दिल्ली महिला लीग भी गठित
किया।
1942 का कांग्रेस अधिवेशनः
इतिहास में नाम दर्ज
जेल से रिहा होने के बाद अगस्त
1942 में आसफ अली और अरूणा
दोनों ही अखिल भारतीय कांग्रेस
अधिवेशन, बंबई में भाग लेने गए।
आसफ अली महत्वपूर्ण कांग्रेसी थे।
अरूणा काफी मिलनसार और खुश थी
और सबों से मिल रही थीं। वे लोकप्रिय
हो रही थीं। किसी को भी इस बात का
जरा भी अंदाज नहीं था कि अगले ही
दिन अरूणा आसफ अली का नाम
इतिहास में दर्ज होने वाला है।
9 अगस्त 1942 की सुबह ही
सारे प्रमुख कांग्रेस नेता गिरफ्तार कर
लिए गए। सुनते ही अरूणा बोरीबंदर
दौड़ गईं जहां से गिरफ्तार सदस्यों को
लेकर ट्रेन चलनेवाली थी। पुलिस ने
उन्हें स्टेशन के अंदर जाने से रोक
दियाः ‘‘आपकी गिरफ्तारी का कोई
वॉरन्ट नहीं है।’’ वे जबर्दस्ती प्लेटफॉर्म
पर चली गईं और गांधीजी, नेहरू वगैरह
को गंभीर मुद्रा में देखा।
ट्रेन खुलने पर अरूणा घर लौट
आईं। वे गुस्से से उबल रही थीं। उन्होंने
कहा, जन-विद्रोह को कुचलने के लिए
‘‘पर्ल हार्बर’’ किस्म के तरीके अपनाए
जा रहे हैं। कांग्रेस ने अब तक कोई
विशिष्ट तरीका आंदोलन का तय नहीं
किया था, इसलिए अस्रूणा को समझ
में नहीं आ रहा था कि क्या किया
जाए?
आखिरकार, वे सुप्रसि( ग्वालिया
टैंक मैदान चली गईं जहां मौलाना
आजाद झंडा फहराने का काम करने
वाले थे। लेकिन वे उपस्थित नहीं थे।
उसी समय अरूणा ने एक पुलिस
अफसर को अनखुला झंडा उतार देने
का आदेश देते सुना। इस समारोह की
अध्यक्षता अरूणा आसफ अली ही करने
वाली थीं। अरूणा ने आगे बढ़कर झंडा
फहरा दिया। तुरंत पुलिस ने आंसू गैस
छोड़ा। लेकिन इकट्ठा भीड़ भागने के
बजाय जुलूस की शक्ल में बदल गई
और कांग्रेस भवन की ओर गई। लोग
बड़े गुस्से में थे।
अरूणा आसफ अली ने जो तिरंगा
फहराया था उसे दस मिनटों के अंदर
ही ब्रिटिश सार्जेन्ट ने कुचल दिया।
उसी वक्त अरूणा ने प्रण कियाः ‘‘मैं
ब्रिटिश शासन का नाश करके ही दम
लूंगी।’’ बाद में लोगों पर लाठी-चार्ज
और फायरिंग हुई।
अरूणा दिल्ली लौट आई। वे किसी
भी समय गिरफ्तार हो सकती थीं। इससे
‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव लागू करने में
बाधा पहुंच सकती थी। उन्होंने
विद्यार्थियों तथा अन्य लोगों को
आंदोलित किया। वे अंडरग्राउंड हो गईं।
दिल्ली में आंदोलन संगठित कने के
बाद वे ढाई वर्षों तक जगह-जगह
विभिन्न छद्म वेशभूषा में छिपती घूमती
रहीै। वे एक गुप्त क्रांतिकारी का जीवन
व्यतीत करने लगीं।
अंग्रेजों द्वारा इनाम घोषित
अरूणा के गायब होते ही अंग्रेज
सरकार ने उन्हें पकड़ने के लिए
5000/रु. का इनाम घोषित कर
दिया। लेकिन वे पकड़ में नहीं आ रही
थीं। एक पुलिस अफसर ने अपने बॉस
से कहा कि हम नौ लोग उसे खोज रहे
हैं लेकिन दिल्ली के नौ लाख लोग
उसे बचा रहे हैं। वे सभी जगह थीं और
कहीं भी नहीं! वे पुलिस के कई बार
छका चुकी थीं।
कांग्रेस कार्यसमिति प्रस्ताव का
खंडन
राजनैतिक कैदियों की रिहाई के
बाद 1945 में कलकत्ता में कांग्रेस
की कार्यसमिति ;वर्किंग कमिटिद्ध की
बैठक में 1942 और अहिंसा पर एक
प्रस्ताव पास किया गया। वाइसराय ने
कांग्रेस पर हिंसा का सहारा लेने का
आरोप लगाया था। साथ ही अरूणा
आसफ अली की ओर इशारा करते हुए
वाइसराय ने कहा कि कार्यसमिति के
एक सदस्य की पत्नी ने हिंसा का सहारा
लेकर सरकार के यु( संबंधी तैयारियों
को भीतरघात करने की कोशिश की।
अरूणा आसफ अली ने कांग्रेस
कार्यसमिति के प्रस्ताव और कांग्रेस
अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद
के प्रेस वक्तव्य के कुछ अंशों पर आपत्ति
जताई। अरूणा आसफ अली और
अच्युत पटवर्धन ने अपने वक्तव्य में,
जो ‘‘भारत में किसी जगह’’ से जारी
किया गया था, कहा कि 11 दिसंबर
1945 के अपने प्रस्ताव के प्रथम
पैरा में यह कहना कि प्रमुख कांग्रेसियों
की गिरफ्तारियों के बाद अनियंत्रित
भीड़ ने स्वतःस्फूर्त ढंग से कार्रवाई की,
’ पूरी तरह सही नहीं है’। अरूणा ने
कहा कि उस वक्त बंबई में विभिन्न
प्रांतों के कई जिम्मेदार लोग उपस्थिति
थे। इसमें से कई गांधीजी के अहिंसा
के सि(ांत के अनुयायी थे। हमने
समय-समय पर जो उचित समझा,
जनता को निर्देश दिए। ये निर्देश कांग्रेस
के निर्णयों के अनुरूप ही किए गए।
अनिल राजिमवाले
अरूणा आसफ अली
शेष पेज 12 पर
12 मुक्ति संघर्ष साप्ताहिक 11 - 17 अक्टूबर, 2020
गांधीजी का अहिंसा का सि(ांत उचित
होते हुए भी व्यावहारिक रूप में ही लागू
किया जा सकता है। सेना और पुलिस
का दमन कई बार कठिन परिस्थिति
पैदा कर देता है। हमने कार्यसमिति के
प्रस्ताव का पूरा पालन किया है। अरूणा
ने कहा कि कार्यसमिति ने पिछले तीन
वर्षों की घटनाओं को कम करके आंका
है।
अरूणा आसफ अली का खुले में
आना
25 जनवरी 1946 के अरूणा
के खिलाफ वांरट वापस ले लिया गया
हालांकि निचले अधिकारी इससे अवगत
नहीं थे। चार दिनों बाद उन्हें कलकत्ता
में ‘अमृत बाजार पत्रिका’ के एक
रिपोर्टर ने उनसे बातचीत की। वे महात्मा
गांधी से मिलना चाहती थीं जो अभी
संभव नहीं था।
कलकत्ता में स्वागत
कलकत्ता प्रथम शहर था जिसने
लंबे अर्से बाद अरूणा को सुना। देशबंधु
पार्क में बड़ी सभा हुई जहां अरूणा का
अरूणा आसफ अलीः 1942 की गौरवशाली नेता
भाषण हुआ। जिस प्लेटफॉर्म पर वे खड़ी
थीं उसे न्यू थियेटर के आर्ट डायरेक्टर
सौरेन सेन ने बनाया था। वहां एक
शहीद स्मारक भी बनाया गया।
प्लेटफॉर्म और स्मारक दोनां ही 1942
के आंदोलन की भावनाओं को व्यक्त
का रहा था।
एक घंटे तक अरूणा आसफ अली
हिन्दुस्तानी, अंग्रेजी और बंगला में
बोलती रहीं। उन्होंने लॉर्ड वैवेल की
तीखी आलोचना करते हुए कहा कि
भारतीय खुद अपनी आजादी की तारीख
तय कर लेंगे। उन्होंने भारतीयों से
आजादी की लड़ाई जारी रखने का
आवाहन किया।
31 जनवरी 1946 को वे
कलकत्ता से दिल्ली के लिए चलीं।
स्टेशन पर विदा करने के लिए बड़ी
भीड़ थी। उन्होंने नेहरू के अनुरोध पर
इलाहाबाद में ‘ब्रेक जर्नी’ की। रास्ते में
जगह-जगह लोग उन्हें देखने आए।
इलाहाबाद स्टेशन पर खुद नेहरू
स्वागत के लिए आए। दिल्ली के रास्ते
में एक जगह पंजाब रेजीमेंट के सैनिक
भी मिलने आए। गाजियाबाद में उनके
पति आसफ अली साढ़े तीन वर्षों बाद
मिले। दिल्ली में बड़ी भीड़ इकट्ठा हो
गई। बाद में उन्होंने मजदूरों को
संबोधित किया।
उनका घर जो करोल बाग में था
और जिसे सरकार ने जब्त कर लिया
था, उन्हें वापस मिल गया। उनकी छोटी
कार ‘बेबी ऑस्टिन’ पुलिस ने बेच दी
थी, उसका पैसा भी उन्हें दे दिया गया।
गांधीजी से मुलाकात
फरवरी 1947 में वे गांधीजी से
मिलने वर्धा गईं। नागपुर में 30 हजार
लोगों को संबोधित किया। गांधीजी के
बारे में उन्होंने कहा कि उन्होंने ही
महिलाओं को निडर और बहादुर बनाया
और मुक्ति संग्राम में शामिल किया।
गांधीजी से कांग्रेस के पुनर्गठन संबंधी
चर्चा हुई। कई सवालों पर मतभेद भी
थे। लेकिन अरूणा उन्हें ‘राष्ट्रपिता’
और हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक
मानती थीं और बहुत सम्मान करती
थीं।
फरवरी 1946 में बंबई में हुए
नाविक विद्रोह से वे काफी प्रभावित हुईं।
इसका नेतृत्व कम्युनिस्टों ने किया था।
वैसे वे कम्युनिस्टों की आलोचक रहीं
लेकिन धीरे-धीरे उनमें परिवर्तन आ
रहा था। इस प्रश्न पर उनका गांधीजी
से काफी मतभेद रहा और दोनों के
बीच काफी बहस भी हुई।
आजादी के बाद
1946 के बाद अरूणा आसफ
अली वामपंथ की ओर तेजी से झुकने
लगीं। 1947-48 में वे दिल्ली प्रदेश
कांग्रेस कमिटि की अध्यक्ष चुनी गईं
लेकिन 1948 में उन्होंने कांग्रेस छोड़
दी और सोशलिस्ट पार्टी में शामिल हो
गई। 1950 में उन्होंने लेफ्ट
सोशलिस्ट ग्रुप बनाया। रजनी पाम दत्त
और इदेटाटा नारायणन के साथ वे
मास्को गईं।
1953 में अरूणा आसफ अली
और उनका लेफ्ट सोशलिस्ट ग्रुप
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो
गया।
दिल्ली में उन्होंने टेक्सटाइल
मजदूरों के बीच ‘मार्क्सवादी अध्ययन
मंडलियां’ बनाईं। 1953-54 की
मदुरै ‘तीसरी पार्टी कांग्रेस’ में अरूणा
आसफ अली भा.क.पा. की केंद्रीय
समिति ;सी.सीद्ध में चुनी गई।
महिला आंदोलन में
1950 के दशक के आरंभ में
अरूणा महिला आत्मरक्षा समिति ;प.
बंगालद्ध के संपर्क में आईं। वे समिति
के चौथे प. बंगाल प्रादेशिक सम्मेलन
;1952द्ध में मुख्य अतिथि थीं। वे
1953 में कोपेनहेगन जाने वाले
महिला प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थीं।
अरूणा आसफ अली एन.एफ.आई.
डब्ल्यू ;नेशनल फेडरेशन ऑफ इंडियन
वीमेन या भारतीय महिला फेडरेशनद्ध
की संस्थापक सदस्य थीं। 1967 में
उन्हें इसका अध्यक्ष चुना गया और
इस पद पर वे 1986 तक बनी रहीं।
1956 में सुप्रसि( ‘खुश्चेव
रिपोर्ट’ जारी हुई जिसमें स्तालिन-काल
की ज्यादतियों का वर्णन और विशेलषण
किया गया था। इन जानकारियों और
घटनाओं से उन्हें बड़ी निराशा हुई और
उन्होंने भा.क.पा. से त्यागपत्र दे दिया।
लेकिन वे भा.क.पा. के साथ अंत तक
बनी रहीं।
दिल्ली की मेयर
1958 में अरूणा आसफ अली
दिल्ली की मेयर चुनी गईं। दिल्ली
म्युनिसिपल कारपोरेशन की 80 सीटों
के सदन में न कांग्रेस को बहुमत मिला
न ही जनसंघ को। भा.क.पा. को आठ
सीटें मिलीं। भा.क.पा. ने कांग्रेस को
प्रस्तावित किया कि वह अरूणा आसफ
अली को समर्थन दे। जवाहरलाल नेहरू
से बातचीत करने से वे सहमत हो
गए। अरूणा कारपोरेशन की सदस्य
नहीं थीं। इस प्रकार भा.क.पा. और
कांग्रेस के समर्थन से वे मेयर बन गई।
इसी समय ;1958द्ध बंबई के
मेयर भी एक कम्युनिस्ट ही थे-एस.
एस. मिरजकर।
‘लिंक’ और ‘पैट्रियट’ अखबार
1958 में कई वामपंथियों,
कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों की सहायता
से ‘लिंक’ नामक एक वामपंथी
साप्ताहिक अंग्रेजी में प्रकाशित किया
जाने लगा जिसके प्रमुख संगठनकर्ता
थे अरूणा आसफ अली और ई.
नारायण। आगे चलकर ‘लिंक हाउस’
से भारत का प्रथम वामपंथी दैनिक
अखबार के ‘पैट्रियट’ छपने लगा। इसमें
भी अरूणा आसफ अली की महत्वपूर्ण
भूमिका रही।
1992 में उन्हें पदम-विभूषण से
सम्मानित किया गया। मृत्योपरांत
1997 में उन्हें ‘भारत रत्न’ से
विभूषित किया गया।
अरूणा आसफ अली की मृत्यु 29
जुलाई 1996 को 87 वर्ष की आयु
में दिल्ली में हो गई।

मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का मूल्यांकन! *राजेश


      राष्ट्रीय शिक्षा नीति(एन.इ.पी.) -2020 के नये ड्राफ्ट को  संसद में लोकतांत्रिक तरीके से चर्चा किए बगैर कैबिनेट की मंजूरी मिल गई है।फिरभी इस शिक्षा नीति को समाज के उच्च और उच्च-मध्यम वर्ग हिस्से में बड़ा समर्थन मिला है।बहुत सारे सरकार के आलोचक भी इस शिक्षा नीति का समर्थन करने में पीछे नहीं हटे। शशि थरूर ,योगेंद्र यादव , चंद्रबाबू नायडू समेत चर्चित पत्रकार जैसे राजदीप देसाई, ध्रुव राठी, आकाश बनर्जी ,एन.खान जैसे लोग भी कुछ पहलुओं को छोड़कर ज्यादातर बातों का समर्थन किए हैं।अफसोस है कि इसका प्रभाव देशभर में हर स्कूल ,कॉलेज, विश्वविद्यालय ,छात्र ,छात्रा, शिक्षक और पूरे समाज पर पड़ने वाला है,लेकिन वहाँ घोर चुप्पी है।इसका कारण जनता की शिक्षा नीति के प्रति अज्ञानता और प्रभुत्वशाली शासक वर्ग का जोर-शोर से प्रचार  बता देने वालों की तो कमी नहीं है । लेकिन  इसका सबसे बड़ा कारण  है जन-जन के बीच इस जनविरोधी शिक्षा नीति सहित तमाम  देशविरोधी, जनविरोधी,दमनकारी काले कानूनों,नीतियों व अध्यादेशों  पर  विचार-विमर्श चलाते हुए व्यापक लोकतांत्रिक, प्रगतिशील जनगोलबंदी,जनसंगठन तैयार  करने  मेंं कमीयां है।इसलिए जरूरी है कि पहले नीतियों की असलियत की समझ बना ली जाये और प्रभुत्वशाली शासक वर्ग के जनविरोधी कामों का पर्दाफाश किया जाय।

     वर्ष 1968 व 1986 के बाद तथाकथित आज़ाद भारत के इतिहास में  राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 तीसरी शिक्षा नीति है।  दूसरी शिक्षा नीति के वक्त  'शिक्षा मंत्रालय' का नाम बदलकर 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय' किया गया था । लेकिन इस बार 'मानव संसाधन विकास मंत्रालय' का नाम बदलकर 'शिक्षा मंत्रालय' रख दिया गया है । शिक्षा नीति के पहले शैक्षणिक  ढांचा में 6 वर्ष की उम्र से लेकर 18 वर्ष की उम्र तक 10+2 की प्रणाली थी लेकिन अब 5+3+3+4 का नया शैक्षणिक ढांचा  बनाया जाएगा। जिसमें तथाकथित प्राईवेट पब्लिक स्कूल की तरह मात्र 3 वर्ष की उम्र के बच्चे स्कूल प्रणाली में शामिल और अनुशासित किए जाएंगे। पहले इस बाल्यावस्था देखभाल व शिक्षा( ईसीसीई) को आंगनबाड़ी महिलाएं  को घर-आंगन मेंं जाकर करने का जिम्मा सौंपा गया था। अब  स्कूल के अंदर ही बाल-वाटिका में   ईसीसीई करने को  आगनबाड़ी महिलाओं को सौंपा जाएगा।  शुरुआती 5 साल की पढ़ाई को फाउंडेशनल स्टेज(कक्षा2 तक), फिर आगे 3वर्ष की पढ़ाई को प्रीपरेटरी(तैयारी) स्टेज(कक्षा3से लेकर 5तक) और आगे 3वर्ष की पढ़ाई को माध्यमिक(मीडिल)चरण (कक्षा6-8)और आगे 4वर्ष की पढ़ाई  कक्षा9-12 तक को सेकेंडरी-स्टेज कहा गया है। फाउंडेशनल स्टेज   में परीक्षाएं नहीं होगीं, परीक्षाएं प्रिपेयरेट्री स्टेज यानी क्लास टू से शुरू होंगी। क्लास टू से बच्चों को इच्छा अनुसार मातृभाषा में भी पढ़ने का व्यवस्था होगी। क्लास 6 से 8 तक कंप्यूटर कोर्स , वोकेशनल (सिलाई, माली, बढ़ाई, रसोई, आदि), टेक्निकल कोर्स ,गणित ,विज्ञान, कला विषयों के साथ कोई भारतीय भाषा पढ़ा जा सकता है । अंतिम सेकेंडरी स्तर की पढ़ाई में दो बार बोर्ड परीक्षा प्रणाली से एग्जाम होगा। इसमें साइंस ,आर्टसाइंस का बंटवारा समाप्त कर दिया जाएगा। इसमें विदेशी भाषा भी पढ़ने का अधिकार होगा। ग्रेजुएशन अब 3 वर्षीय कोर्स की जगह 4 वर्षीय होगा , जिसमें बीए, बीएससी, बीकॉम का बंटवारा नहीं होगा। फर्स्ट ईयर के बाद ग्रेजुएशन सर्टिफिकेट , सेकंड ईयर के बाद डिप्लोमा का सर्टिफिकेट ,थर्ड ईयर के बाद डिग्री (नौकरी के योग्यता वाली )और फोर्थ ईयर में रिसर्च की डिग्री मिल जाएगी। पीजी यानि परास्नातक 1 से 2 वर्ष का होगा । एमफिल को समाप्त करके अब सिर्फ पीएचडी रखा जाएगा । इस बार के शिक्षा नीति में भी दोहराया गया है कि जीडीपी का 6% खर्च किया जाएगा । अब प्राइवेट स्कूलों के फीस को फिक्स करने की भी बात है। 108 पेज के   इस शिक्षानीति को पढ़ने के पहले भी शिक्षा नीतियों को पढ़ा जा चुका है।पता यही चलता है कि यह भी कोई नई शिक्षा नीति नहीं है।यह भी  ऐतिहासिक निरंतरता की अगली कड़ी भर है।


      हम देख रहें हैं कि इस शिक्षा नीति में व्यवसायिक शिक्षा(वोकेशनल कोर्स) और आनलाईन शिक्षा का बड़ा गुणगान किया गया है । चर्चा है कि देश में व्यवसायिक शिक्षा से कुशल कामगार (स्किल्ड लेबर )बढ़ेंगे और इससे विदेशी पूंजी निवेश  बढ़ेगा और भारत का आर्थिक विकास  तेज हो जाएगा ।लेकिन क्या देश में कुशल मजदूरों की कमी है? तब कुशल कामगार बेरोजगारी की मार क्यों झेल रहे हैं ? दरअसल उत्पादन में  पूंजीनिवेश में आ रही कमी का  तो बड़ा कारण कुल मांग  (aggregate demand ) में आयी कमी  है । और मांग की कमी का कारण मेहनतकश जनता की घट चुकी क्रयशक्ति  है। कुशल और अकुशल हर तरह के मजदूरों की छंटनी हो रही है।बेरोजगारी चरम पर है।50 फीसदी बी.टेक इंजीनियरिंग भी बेरोजगार हैं। दुनिया में  आर्थिक मंदी जिसे (भारत में बड़ी उदारता से अर्थव्यवस्था का स्लोडाउन बोला जा रहा है )के कारण पूंजीपति वर्ग भारी पैमाने पर दो काम करने पर आमादा है- पहला मजदूरों कर्मचारियों की छंटनी, दूसरा मजदूरी कम करते हुए वेतन की कटौती ।इन्हीं दो तरीकों से पूंजीपति वर्ग की रक्त पिपासु अति मुनाफा कमाने की हवस पूरी होती है । जिसके लिए काफी कानूनी और मजदूर संगठनों का विरोध का सामना करना पड़ता है लेकिन इस बार करोना के संकट ने  इसे भी आसान बना दिया। पिछले पांच-छह महीने के अंतराल में 45 करोड़ मजदूर की बेकार हो गए। प्राईवेट शिक्षक , फैक्टरियों ,शहरों के कुशल-मजदूर  गाँव-देहात में ही तथाकथित अकुशल मजदूरी खोजने लगे।


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020  के 24वें अध्याय के पेज नं.97 पर  कहा गया है कि  वैश्विक महामारी, संक्रामक रोगों से नई परिस्थितियां और वास्तविकताओं में नई पहल लेने  है ।इसके लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म , ऑनलाइन शिक्षा, वर्चुअल लैब ,कंप्यूटररिंग,डिजिटल इंडिया अभियान आदि की चर्चा की गई है। हम देख रहे हैं कोरोना संकट के इस दौर में अनलॉक डाउन मेंं बच्चों के पढ़ाई के लिए ऑनलाइन शिक्षा की शुरुआत हो चुकी है और बच्चे कितना पढ़ रहे हैं सभी लोग जानते हैं । उनकी परीक्षाएं भी शुरू हो गई हैं। पढ़ाई के लिए कौन लोग  ₹ 5000 -₹20000 का एंड्रॉयड मोबाइल खरीदेंगे?क्या वे लोग जो समय पर ₹500 फीस बच्चों का नहीं दे पाते? यदि  कुछ ने खरीद भी लिया तो हर महिने ₹200 का इंटरनेट के लिए रिचार्ज कहां से भरवां पाएंगे? यदि कुछ ने भरवा लिया भी तो क्या आनलाईन कक्षाओं  के लिए हमेशा इंटरनेट नेटवर्किंग भी ठीक रहेगा?उक्त हानियों को कम करने के लिए  निःशुल्क इंटरनेट,कम्प्यूटर, मोबाईल का लाभ देते हुए औपचारिक शिक्षा पर कोई ध्यान  ही नहीं । सीखने के सामाजिक, भावनात्मक व साइकोमोटर आयामों को सिकोड़कर  क्या  इस तरह से बच्चे घर बैठे शिक्षा, ज्ञान, समझ हांसिल कर पाएंगे या स्कूल के फीस के साथ होम ट्यूशन का भी अतिरिक्त बोझ उठाने के लिए मजबूर हो जाएंगे? एक आकलन के अनुसार देश के केवल 8% परिवार हैं जिनके यहां इंटरनेट, कंप्यूटर की पहुंच है । इतने सीमित दायरे मेंं इंटरनेट या कंप्यूटर की पहुंच और वह भी उनके घर में नहीं बल्कि पड़ोस में दुकान पर, कस्बे के साइबर कैफे के जरिए या स्कूल में यानी 8 फ़ीसदी भी बमुश्किल है। वर्ष2017-18 एन.एस.एस. की रपट बताती है कि मध्य प्रदेश में ग्रामीण स्तर पर कंप्यूटर 2.3 और शहर स्तर पर 17.2 फीसदी थे और इंटरनेट ग्रामीण स्तर पर 9.7 फ़ीसदी और शहरी स्तर पर 35.4 फ़ीसदी थे। जब कंप्यूटर और इंटरनेट की पहुंच इतनी कम है तो किस आधार पर हमारे देश की सरकार ऑनलाइन शिक्षा से गुणवत्ता बढ़ाने का दावा ठोक रही है। यानी  12वीं कक्षा तक जिन मेहनतकश लोगों के  90 फ़ीसदी बच्चे स्कूली  शिक्षा से बाहर  (बहिष्करण)होते थे  तो अब स्कूली शिक्षा से उनके बच्चों का बहिष्करण और बढ़ जाएगा, और राष्ट्रीय शिक्षा नीति  'राष्ट्रीय बहिष्करण नीति' साबित होगा। यानी कुछ खास लोग ही शिक्षा ले पाएंगे।  शिक्षा अब  मुट्ठीभर अभिजात्य वर्गों तक केंद्रित हो जाएगी। एकलव्यों का जो अंगूठा मांगना पड़ जाता था , अबतो एकलव्य तैयार ही नहीं होगें।दूसरे तरफ शिक्षा  से भरपूर मुनाफा बटोरने का  अवसर मोबाईल,कम्प्यूटर, इंटरनेट कम्पनियों को मिल गया।एक अनुमान से शिक्षा का  यह धंधा एक लाख करोड़ रूपये का है।शिक्षा के नाम पर यह  धंधा सिर्फ प्राईवेट स्कूलों के अभिभावकों के जरिये ही नहीं  सरकारी विद्यालयों में दीक्षा, स्वयम् व स्वयंप्रभा जैसे  ई-लर्निंग कार्यक्रमों, अभियानों के नाम पर टबलेट्स,कम्प्यूटर, मोबाइलों की सरकारी धन से खरीद-परोख्त के जरिये(जो अप्रत्यक्ष रूप से जनता का ही पैसा है)भी सम्पन्न होगा। कोरोना महामारी के बाद तथाकथित नई परिस्थितियों में छात्रों, शिक्षकों व समाज को कितना बड़ा लाभ होगा यह तो वक्त बताएगा लेकिन इसका अतिलाभ(सुपरप्राफिट) तो पक्का है कि सबसे पहले साम्राज्यवादी देशों और उनके दलाल नौकरशाह पूंजिपतियों को जायेगा।


    कितना दोहरापन हैं जिस  देश में तक्षशिला, नालंदा ,विक्रमशिला और वल्लभी जैसे प्राचीन विश्वस्तरीय शिक्षण संस्थान रहे हैं ।जहां शिक्षा को सामाजिक सरोकार का विषय था न कि मुनाफाखोरी के धंधे का ।आज शिक्षा नीति में बार-बार प्राचीन भारतीय संस्कृति की बात करने वाले  ही शिक्षा को बहुराष्ट्रीय कंपनियों और साम्राज्यवादी लोगों के लूट का धंधा बनाने पर तुले हुए हैं। 

  दरअसल प्राचीन भारतीय संस्कृति के नाम पर ये प्राचीन जातिआधारित सामंंती संस्कृति की परम्परा   और प्राचीन जातिविरोधी सामंती संस्कृति की परम्परा के बीच भी विभेद करते हैं। (जबकि उस वक्त दोनों परंपरा के बीच  काफी संवाद और बहस रहा है।)इसीलिए तो  इस तथाकथित राष्ट्रीय शिक्षा नीति में  चरक,सुश्रुत, आर्यभट्ट, बराहमिहिर, भास्कराचार्य, ब्रह्मगुप्त, चाणक्य, चक्रपाणि दत्ता, माधव,पाणिनि, पतंजलि, नागार्जुन, गौतम, पिंगला, शंकरदेव, मैत्रेयी, गार्गी और थिरुवल्लूवर जैसे महान विद्वानों का जिक्र किया गया है लेकिन गौतम बुद्ध, महावीर स्वामी, चर्वाक का  कही जिक्र तक नहीं है।नया शिक्षा शास्त्र देने वाले गौतम बुद्ध को कैसे भुलाया जाये,जिन्होंने कार्य-कारण सम्बंध की व्याख्या दी और बताया कि किसी भी बात की सत्यता के लिए तर्क की कसौटी पर कसो। इसीतरह जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर स्वामी  भी जाति के साथ पितृसत्ता के खिलाफ थे।चर्वाक ने ग्रंथ लिखा कि किसी भी चीज को पहले देखो,जानो,समझो तब कोई निष्कर्ष या परिणाम निकालो।उन्होंने ज्ञान तक पहुंचने की एक पूरी पध्दति को स्थापित किया।दुनिया को समझने का एक नजरिया दिया।





 राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अध्याय 6 के पेज नंबर 39 में समतामूलक और समावेशी शिक्षा- सभी के लिए अधिगम तथा अध्याय 14 में पेज में उच्च शिक्षा में क्षमता और समावेशन को मुख्य विषय बनाया गया है शुक्र है कि समता शब्द आया समरसता नहीं । अध्याय 6 के 20 बिंदुओं को पढ़ने से लफ्फाजी  और धूर्तता का साजिश समझ में आती है ।समता से दूरी बनाने के लिए ही  समतामूलक,समानता व समावेशन की  लफ्फाजियां की गई है। देश में 90 फ़ीसदी मेहनतकश आबादी जिसमें  सबसे ज्यादा एससी,एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग के हैं उन्हें स्कॉलरशिप और यदि नहीं तो शैक्षणिक लोन (कर्जखोरी) लेने की व्यवस्था की जाएगी । क्या समानता और समावेशी शिक्षा का लक्ष्य बनाने वालों को नहीं पता कि भारत में हजारों वर्षों से सामंती ,भूस्वामी वर्ग और अंग्रेजों के बाद बड़े दलाल पूंजीपति  वर्ग ने मिलकर  देश की सारी संपत्ति पर  मालिकाना बनाए रखा है और आज प्राइवेट हो या सरकारी नौकरियों में उसी की कब्जेदारी है। अधिकांश प्राइवेट स्कूल, कॉलेजों का मालिक भी वही हैं। उन्हीं के  एक पाकिट में लक्ष्मी और दूसरे में सरस्वती निवास करती हैं । सरकार  क्यों नहीं "एक समान स्कूल प्रणाली" के तहत सभी प्राइवेट स्कूलों को खत्म करके उनको अपने कब्जे में लेकर उनका भी सरकारीकरण कर देती है? समानता को यदि लक्ष्य बना ही लिए हैं तो क्यों नहीं भूमि-क्रांति संपन्न करके पहले भूमि में समानता लाने पर जोर देते हैं? आखिर क्यों राजनेताओं, अफसरों के बेटों को वहीं पढ़ने भेजा जाता, जिस प्राईमरी स्कूलों में मजदूर-किसानों के बेटे  पढ़ने को बाध्य हैं?आखिर क्यों नहीं वजीफा और लोन (कर्ज)के चक्कर में छात्रों, अभिभावकों को फंसाने के बजाय  "चाहे हों मजदूर की संतान, या हों राष्ट्रपति की संतान! शिक्षा हो एकसमान !!"   नारे को हकीकत में बदला जा सकता है? यदि इतनी रहमदिल सरकारें  हैं तो 73 वर्षों में आर्थिक-समानता क्यों नहीं ला दिये या इसका अबसे भी प्रयत्न करते या करने देते?  दरअसल   इस शिक्षा नीति के जरिए "केजी से पीजी तक समानता और भेदभाव से मुक्ति" के संवैधानिक-सिद्धांतों को नकारकर  अर्ध्दसामंती-अर्ध्दऔपनिवेशिक समावेशन की विकृत धारणा को लागू करने की कोशिश की जा रही है । आखिर शिक्षा के लिए छात्र कर्ज लेगा तो कर्जा लेने के लिए गिरवी रखने की जमीन कहां से आएगी? यह उत्पीड़ित और शोषित मेहनतकश वर्ग का  मजाक नहीं तो क्या है? और यदि कोई किसी तरह से कर्ज ले भी लिया तो वह वापस करने के लिए रोजगार की गारंटी कौन देगा? दरअसल शैक्षणिक-कर्जखोर बनाना भी शासक वर्ग का नई शिक्षा नीति के नाम पर एक नया नहीं पुराना ही धंधा है , जिसे रिजर्व बैंक ने भी घाटे का सौदा बताया था। इसलिए ध्यान रहे गैरबराबरी और भेदभाव को कर्जखोरी और वजीफा से खत्म नहीं किया जा सकता, यह व्यवस्थाजनित समस्या है और इसे व्यवस्था-परिवर्तन से ही खत्म किया जा सकता है। इस व्यवस्था परिवर्तन का पहला कार्यक्रम होगा -भूमिक्रांति । दुनिया के क्रांतियों का इतिहास बतलाता है गैरबराबरी वाले समाज में भूमि क्रांति के जरिए मुट्ठीभर सामंती-भूस्वामियों और दलाल पूंजीपतियों के मालिकाने की मोनोपोली को  नेस्तनाबूद किया जा सकता है और सचमुच में स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे वाला नया जनवादी भारत निर्माण हो सकता है,जिसमें एकसमान शिक्षा व स्वास्थ्य प्रणाली के तहत सर्वसुलभ निःशुल्क शिक्षा व चिकित्सा सम्भव हो सकती है।लेकिन अभी  हमारे समाज में   ज्यादातर शिक्षा का उद्देश्य   'अपने आप से मतलब रखें',  'पढ़-लिखकर कमाऊपूत  बन जाने'- तक सीमित है।  अभी भी मौजूदा व्यवस्था में ही जुगाड़-पानी लेने की जुगत की होड़ मची हैं।ऐसे में धारा के विरुद्ध चलकर असली शिक्षा के उद्देश्य को चुनना चाहिए।  'उत्पीड़ितों का शिक्षाशास्त्र' नामक किताब में पाब्लो फ्रेरा ने  कहा है, शासक वर्ग के द्वारा लोगों को मौजूदा व्यवस्था का हिस्सा बनाए रखने के लिए शिक्षा का इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल शिक्षा का उद्देश्य समाज के लोगों की आजादी और मुक्ति होनी चाहिए इसका मतलब है लोगों को शिक्षा का इस्तेमाल अपने आसपास की जिंदगी को समझने और इसमें बदलाव लाने के लिए करना चाहिए।"

शुक्रवार, 2 अक्तूबर 2020

सुप्रसिद्ध कम्युनिस्ट वी.सुब्बैय्या-अनिल राजिमवाले

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भारत  से  अंग्रेजों  के  1947  में चले  जाने  के  बाद  भी  देश  के  कुछ थोड़े-से हिस्सों पर फ्रांसीसियों तथा पुर्तगालियों का कब्जा बना रहा। फ्रेंच इंडिया भारत अर्थात  पांडिचेरी,करइक्कल ;तमिलनाडु, यानाम ;आंध्र,माहे ;केरल और चंदननगर ;प. बंगाल पर फ्रांसीसियों का अधिकार था। उन्हें1954 में ही जाकर आजाद किया जा  सका।  फ्रेंच  इंडिया  की  मुक्ति आंदोलन  के  नेता  थे  एक  सुप्रसिद्ध  कम्युनिस्ट  वी.सुब्बैय्या ̧।  यह  इतिहास बड़ा दिलचस्प है।फ्रेंच  भारत  का  कुल  क्षेत्रफल186  वर्गमील  था  और  जनसंख्या19वीं सदी के अंत में 1,75,000थी।फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ;‘लारॉेयल  कम्पागीन  दे  फ्रांस  देस  इंदेसओरिएन्ताल’ ने 1 सितंबर 1666को  अपने  पैर  जमाए।  पांडिचेरी  पर फ्रांसीसी शासन स्थापित करने का काम फ्रान्क्वा  मार्टिन  ने  1674  तथा1706 में बीच किया। 1789 की फ्रांसीसी क्रांति के अंतिम वर्षोंं में यह इलाका  अंग्रेजों  के  हाथों  में  आ  गया और फिर फ्रांसीसियों को 1871 के पैरिस कम्यून के प्रभाव में फ्रेंच भारत को  10  कम्यूनों  में  विभाजित  किया गया। उनकी अपनी म्युनिसिपैलिटी और मेयर हुआ करते।आगे चलकर फ्रेंच भारत को फ्रेंच संसद  में  एक  प्रतिनिधि  भेजने  काअधिकार मिला। सुब्बैया फ्रेंच पार्लियामेंट में चुने जाने वालों में से एक थे। फिर भी भारतीयों को अधिकतर अधिकार प्राप्त  नहीं  थे  और  छोटी-छोटी  बातों को लेकर उन पर दमन किया जाता था।आरंभिक जीवन वरदराजुलू  कैलाश  सुब्बै ̧या  का जन्म  7  फरवरी  1911  को  हुआ था। उनके दादा कोट्टईकुप्पम में पुलिस अफसर  थे  और  पिता  बिजनेस  में।सुब्बै ̧या  की  स्कूली  शिक्षा  पहले  तो‘पेतित सेमिनेयर’ में माध्यमिक शिक्षाके रूप में हुई ;1917-23द्ध। फिर1923-28  में  कॉलेज  काल्वे;पांडिचेरीद्ध में हाई स्कूल शिक्षा हुई।सितंबर 1927 में महात्मा गांधीइलाज के बाद कड्डालोर ;तमिलनाडुद्धआए। वे दक्षिण भारत का दौरा कर रहेथे। सुब्बै ̧या उस वक्त पांचवे फॉर्म मेंथे।  वे  साइकिल  से  पांडिचेरी  सेकड््डालोर  अपने  दो  मित्रों  के  साथगए।  उन्हें  वाई.एम.सी.ए.बिल्डिंग  मेंप्रार्थना के वक्त लोगों को संबोधित करतेहुए देखा।कुछ महीनों बाद कांग्रेस का मद्रासकम्युनिस्ट नेताओं की जीवनी-25वी. सुब्बै ̧याः फ्रेंच भारत की मुक्ति के नेताअधिवेशन दिसंबर 1927 में हुआ।किसी तरह सुब्बै ̧या को मां की अनुमतिमिली  और  वे  अपनी  मित्र  के  साथमद्रास  चले  गए।  इन  घटनाओं  नेसुब्बै ̧या  के  राजनैतिक  एवं  राष्ट्रीयविचारों के विकास में मदद की।1928  में  जवाहरलाल  नेहरूरचित  सोवियत  रूस  संबंधी  पुस्तकप्रकाशित  हुई  जिसे  पढ़कर  उन्हें  नईदृष्टि मिली। उन्होंने रूसी क्रांति औरलेनिन संबंधी सिंगारवेलु के लेख भीपढ़े तथा कई अन्य पुस्तकें भी।विद्यार्थी आंदोलन मेंजब सुब्बै ̧या काल्वे कॉलेज में छठेफॉर्म  में  थे  तब  1928  में  उन्होंनेविद्यार्थियों  की  एक  हड़ताल  मद्रासविश्वविद्यालय  की  मैट्रिक  परीक्षा  कीट्रेनिंग के निम्न स्तर के विरोध में संगठितकी। हड़ताल तीन सप्ताह चली। सुब्बै ̧याको छह महीनों के लिए बाहर निकालदिया  गया  तथा  21  अन्य  को  भी।सुब्बै ̧या  ने  इस  पर  अभिभावकों  कीऐसोसिएशन बनाई। वे फ्रांसीसी पुलिसके रिकॉर्ड में दर्ज कर लिए गए।सुब्बै ̧या ने 1929 में ‘म्यूचुअलब्रदरहुड’  के  नाम  से  एक  साहित्यिकऔर वाद-विवाद समिति का गठन भीकिया। 1930 में उन्होंने ‘यूथ लीग’बनाई।  1931में  काल्वे  कॉलेज  मेंओल्ड ब्वायज ऐसोसिएशन का गठनकिया गया।जल्द ही सुब्बै ̧या ‘आत्म-सम्मानआंदोलन’ के संपर्क में आए।फ्रेंच भारत में ‘यूथ लीग’ कासंगठनवापस  लौटकर  सुब्बै ̧या  ने  फ्रेंचभारत में ‘यूथ लीग’ का गठन आरंभकिया जिसमें बड़ी संख्या में युवा शामिलहुए।प्रथम  युवा  सम्मेलन  1931  मेंऔर दूसरा 1932 में आयोजित कियागया। उसी दौरान कुछ मजदूर परिवारोंके युवाओं ने ‘रामकृष्ण रीडिंग रूम’की स्थापना की। बाद में सुब्बै ̧या इसकेअध्यक्ष बने।फ्रांसीसी साम्राज्यवादी शासन केतहत संगठन और विचार-स्वातंत्र्य परकाफी दमन था। मसलन, किसी भीसभा या खेलकूद क्लब के नियमों मेंराजनीति पर बात करने संबंधी पाबंदीथी।रामकृष्ण  रीडिंग  रूम  के  सदस्यसुब्रमण्य भारती के देशभक्तिपूर्ण गीतोंतथा भजनों के जरिए लोगों तक राष्ट्रीयभावनाएं पहुंचाया करते।1931 में उन्हें एक बीमा कंपनीमें ब्रांच मैनेजर का काम मिल गया।हरिजन सेवक संघपांडिचेरी में हरिजन सेवक संघ कीस्थापना की गई जिसके सुब्बै ̧या सचिवबने। साथ ही करइक्कल में भी इसकीएक  शाखा  खोली  गई।  अरंगस्वामीनाइकर,  मौरिस  क्लारियन,  डी.दोरइराज, कृष्ष्णस्वामी पिल्लै, इ. इसकेमहत्वपूर्ण व्यक्ति थे।इस  बीच  गांधीजी  17  फरवरी1934 को पांडिचेरी आए। पहले तोउन्होंने अपना कार्यक्रम श्री अरबिन्दोके  उपलब्ध  नहीं  होने  के  कारण  रद्दकर दिया था। वे दक्षिण भारत की यात्रापर थे। वे कुन्नूर में ठहरे हुए थे जहांबहुत  ठंड  थी।  सुब्बै ̧या  उन्हें  मनानेवहां गए। वहीं वे बंगले के एक कमरेमें ठहरे। ठंड के मारे उनके बुरा हालथा  लेकिन  देखा  कि  गांधीजी  एकसाधारण खटिया पर खुले में सोए हुएथे!वे  गांधीजी  के  साथ  पैदल  घूमनेगएऋ गांधीजी इतनी तेज चला करतेथे कि एक नौजवान के लिए भी उनकेसाथ चलना कठिन हो गया। वहां ठक्कर बाबा भी थे जो अ.भा. हरिजन सेवकसंघ के सचिव थे। सुब्बै ̧या ने कहा कि आप  श्री  अरबिन्दो  का  कार्यक्रम  रद्द किए जाने पर कैसे समूचे पांडिचेरी का कार्यक्रम रद्द कर सकते हैं? गांधी जीने तुरंत स्वीकार कर लिया।ओडियन सलाई  मैदान  में  हजारोंलोगों  के  सामने  गांधीजी  का  भाषण हुआ। पांडिचेरी के गवर्नर ज्यॉर्जेस बूकेने इस कार्यक्रम में काफी सहायता की।उन्होंने दूर से गांधीजी के ‘दर्शन’ किए वे उनके प्रशंसक थे।रामकृष्ष्ण  रीडिंग  रूम  और  फ्रेंच इंडिया यूथ लीग ने हरिजन सेवक संघक के साथ मिलकर हरिजन बच्चों और वयस्कों  के  लिए  बस्तियों  में  रात्रि पाठशालाओं की स्थापना की। नालियांसाफ करना, गंदे बच्चों को नहलाना,इत्यादि गतिविधियां आयोजित की गईं।विद्याथियों ने बस्तियों के स्कूलों मेंपढ़ाने का काम किया।सुब्बै ̧या हरिजनों, खेतिहर मजदूरोंऔर टेक्सटाइल मजदूरों के संपर्क मेंआए तथा उन्हें उनके बीच काम करनेलगे।इस  दौरान  सुब्बै ̧ा  वेल्लोर  जेलजाया  करते  जहां  बड़ी  संख्या  मेंराजनैतिक कैदी रखे गए थे, और उन्हेंचिट्ठियां और संदेश पहुंचाया करते।अमीर हैदर खान से मुलाकातसुब्बै ̧या जुलाई 1934 में मद्रासमें अमीर हैदर खान और सुंदरै ̧या सेमिले। सारी रात बैठकर मद्रास प्रदेशमें  कम्युनिस्ट  पार्टी  की  स्थापना  परविचार किया गया। इंजीनियरिंग कॉलेजके कुछ विद्यार्थियों के साथ मिलकर विश्व कम्युनिस्ट आंदोलन का साहित्य इकट्ठा करने का काम किया। धीरे-धीरेसुब्बै ̧या  मार्क्सवाद  की  ओर  झुकनेलगे।ट्रेड यूनियन आंदोलन में पांडिचेरी  में  ट्रेड  यूनियन  बनाना गैर-कानूनी था। जुलाई 1934 सेसुब्बै ̧या ने गुप्त रूप से मुदलियारपेट,अरिनकुप्पम तथा अन्य स्थानों पर रातमें मजदूरों के बीच रहते हुए ट्रेड यूनियन बनाना  शुरू  किया।  जून  1934  में मासिक पत्रिका ‘‘स्वदान्थिरम’ उन्होंनेआरंभ किया। इसकी 8000 से भीअधिक प्रतियां छपती थी और पांडिचेरीके  अलावा  मद्रास,  श्रीलंका,  दक्षिणअफ्रीका, मलाया, बर्मा तक जाती थी।‘स्वदान्थिरम’ ने पांडिचेरी में मजदूरवर्ग के प्रचारक और संगठनाकर्ता कीभूमिका  अदा  की।  इसमें  महाकविसुब्रमण्य  भारती  की  कविताएं  भीप्रकाशित होतीं।इस  बीच  सुब्बै ̧या  का  संपर्कशक्तिशाली फ्रांसीसी ट्रेड यूनियन संगठनसी.जी.टी. ;‘कोनफेडराशियों गेनेराल दुत्रावेल’-श्रमिकों का व्यापक संघद्ध केसाथ हुआ। इससे पांडिचेरी के मजदूरआंदोलन को बड़ी सहायता मिली।4 फरवरी 1935 को पांडिचेरीके सवाना मिल्स ;बाद में स्वदेशी कॉटनमिल्सद्ध में असीमित कार्यकाल के विरोधमें हड़ताल हो गई। उन दिनों पांडिचेरीमें तीन टेक्साटाइल मिलें थीं जिनमेंसूर्योदय  से  सूर्यास्त  तक  काम  चलाकरता। श्रमिकों के बच्चे सिर्फ रविवारके ही अपने माता-पिता को देख पाते।सवाना मिल्स के मजदूरों ने दसघंटे  कार्य  दिवस  की  मांग  करते  हुएतथा  वेतन  बढ़ाने  एवं  महिलाओं  कारात्रि कार्य बंद करने को लेकर हड़तालकी।मिल का मालिक बालोत था जिसनेलॉक-आउट  कर  दिया।  वह  रोजसायरन  बजवाता  था  ताकि  मजदूरवापस आ जाएं। इस तरह 84 दिनबीत गए लेकिन मिल कमिटि नहीं झुकी।मजदूरों को गांवों से सहायता मिल रहीथी। आखिर मजदूर नेताओं को बुलाकर29  अप्रैल  1935  को  समझौताकिया  गया।  पांडिचेरी  के  इतिहास  मेंपहली बार मजदूरों का कार्यदिवस तयकिया  गया,  10  घंटे।  मजदूरों  कादैनिक वेतन तीन आना से 6 आनाकिया गया और गर्भवती महिलाओं कोएक महीने की छुट्टी तथा उस दौरानआधा वेतन तय किया गया।इस  सफलता  के  फलस्वरूपपांडिचेरी  का  ट्रेड  यूनियन  आंदोलनअधिक सक्रिय हो उठा। कोडियर मिलऔर गोबले मिल ;अब भारती मिल्सद्धके  प्रबंधन  को  भी  ये  ही  शर्तें  लागूकरनी पड़ी ताकि मजदूर हड़ताल नकर दें।सुब्बै ̧या  के अलावा इस आंदोलनके नेताओं में थे-दुबॉय डेविड, अलामोर,पेरियानायस्वामी, सुब्बारायुलु, इ.।3 जून 1935 को पांडिचेरी मेंपहली  बार  मजदूरों  की  मीटिंग  हुई।इसकी अनुमति के लिए सुब्बै ̧या  कोबड़ी कोशिशें करनी पड़ी। फ्रेंच रिटायर्डफौजी  अफसर  बाबोलोने  ने  भी  इसेसंबोधित किया। पांडिचेरी में आम सभाकी अनुमति आमतौर पर नहीं दी जातीथी।सुब्बै ̧या  ने  पांडिचेरी  के  मजदूरआंदोलन तथा फ्रांस से उसके संबंधोंका  विस्तृत  वर्णन  ‘स्वदान्थिरम’  मेंप्रकाशित किया।17 अक्टूबर 1936 को सुब्बै ̧याजवाहरलाल नेहरू, सत्यमूर्ती और के.कामराज को विलुपुरम से पांडिचेरी कारमें लाए। उस वक्त पांडिचेरी में मुश्किलसे चार या पांच कारें हुआ करतीं जोधनी लोगों की थी। यह कार नानै ̧याभागवथर की थी जो व्यापारी थे लेकिनराष्ट्रीय आंदोलन से सहानुभूति रखाकरते।  मॉरिस  क्लैरियन  एक  अन्यव्यापारी थे तथा हरिजन सेवक संघ केअध्यक्ष थे। उनकी कार में गांधीजी कोलाया गया था।जब वी.वी. गिरी और गुरूस्वामीमद्रास  से  पांडिचेरी  आए  तो  फ्रेंचअधिकारियों ने उन्हें उसी दिन ;10मई 1936द्ध को दोपहर डेढ़ बजे तकपांडिचेरी छोड़ने का आदेश दिया। वेफ्रेंच  भारत  के  मजदूरों  का  सम्मेलनसंबोधित करने आए थे। यह इस बातके बावजूद कि सुब्बै ̧या ने अनुमति लेली थी। अनुमति नहीं मिलने पर उन्होंनेतथा  अन्य  नेताओं  ने  मजदूरों  सेसीमापार ब्रिटिश भारत के गांव ;पेरम्बईद्धके  मैदान  में  इकट्ठा  होने  को  कहा।बड़ी सभा हुई जिसकी अध्यक्षता लैम्बर्टसरवने ने की।इस  बीच  1936  में  फ्रांस  मेंअनिल राजिमवालेवी. सुब्बै ̧याश्10मुक्ति संघर्ष साप्ताहिक4  - 10 अक्टूबर, 2020पॉपुलर फ्रंट ;जन मोर्चाद्ध चुनाव जीतगया और उसने सरकार गठित की।यह घटना कई मायनों में पांडिचेरी कीजनता के लिए अनुकूल साबित हुई।मजदूर संघर्षः मशीनगनों सेसामना1936  के  जुलाई  महीने  मेंपांडिचेरी  में  ऐतिहासिक  मजदूरआांदोलन हुआ। पुलिस ने मशीनगनतथा  अन्य  हथियार  विलियानूर  तथाकड्डालोर के मार्गांं पर तैनात कर दिए।बिना वजह गोलियां चलाई जाने पर12 मजदूरों की मौत हो गई। गुस्से मेंमजदूरों ने सवाना मिल को आग लगादी। सुब्बै ̧या और वी. रामनाथन किसीतरह भाग निकले।फ्रांस के प्रधानमंत्री लियोन ब्लूमसे  तुरंत  हस्तक्षेप  की  मांग  की  गई।मद्रास में बड़ी विरोध सभाएं की गई।30 जुलाई 1936 की इन दुखदघटनाओं का सवाल फ्रेंच संसद में फ्रेंचकम्युनिस्ट  पार्टी  के  गैब्रिल  पेरी  नेउठाया। फ्रांस की पॉपुलर फ्रंट सरकारने तुरंत हस्तक्षेप किया।गवर्नर सोलोनियाक ने बातचीत केलिए गिरी को मद्रास से बुलाया। उनकेसाथ गुरूस्वामी भी आए। बातचीत केदौरान सुब्बै ̧या इतने गुस्से में थे किगवर्नर  द्वारा  दिया  गया  सॉफ्ट  डिं्रकउन्होंने पीने से इंकार कर दिया। फिरसोलोनियाक और गिरी ने उन्हें किसीतरह मनाया।30 जुलाई 1936 की घटनाओंने पांडिचेरी में मुक्ति आंदोलन की नईमंजित का आरंभ किया।समझौतों में पहली बार काम केघंटे घटाकर आठ घंटे किया गया औरअन्य कई मांगें मानी गई।फ्रांस मेंनेहरू की सलाह पर सुब्बै ̧या फ्रांसकी सरकार से मिलने मार्च 1937 मेंपैरिस  के  लिए  चल  पड़े।  उनकीअनुपस्थिति में एस.वी. घाटे और एस.आर. सुब्रमण्यम ने पांडिचेरी में कामसंभाला। नेहरू उन्हें लगभग हर सप्ताहपत्र  लिखते  रहे  और  उन्हें  ढेर-सारेपरिचय पत्र दिए।फ्रांस में साम्राज्यवाद-विरोधी लीगके  प्रमुख  फ्रान्क्वा  जुर्दान,  मार्क्स  केपोते  लोन्गेवेन,  क्लीमेंस  दत्त,  पिएरेकोत, मैडम आंद्रे वायली तथा अन्यकई हस्तियों से उनकी मुलाकात हुई।वहां  कम्युनिस्ट  पार्टी  के  गैब्रिल  पेरीतथा विभिन्न ट्रेड यूनियनों के नेताओंसे मुलाकात हुई। पेरी को 1941 मेंहिटलर  की  फौजों  ने  फ्रांस  में  गोलीमार दी।सुब्बै ̧या के पांडिचेरी में मित्र, माहेके माधवन मिशेलोत, जो हरिजन सेवकसंघ में भी थे, पैरिस के सर्बोर्न यूनिवर्सिटीके छात्र थे और 1937 में पैरिस मेंलगभग हर शाम दोनों साथ-साथ घूमनेजाया करते। माधवन फ्रेंच कम्युनिस्टपार्टी के सदस्य बन गए, अंडरग्राउंडआंदोलन में शामिल हो गए और बादमें नाजियों द्वारा मारे गए।मैडम लुई मोरिन से सुब्बै ̧या की1938 से ही पांडिचेरी और दिल्लीसे मित्रता थी। उनका पैरिस का घरभारतीयों  के  लिए  खुला  रहता।  वहांइंदिरा गांधी भी आया करतीं।सुब्बै ̧या  ने  फ्रेंच  भारत  कीराजनैतिक परिस्थितियों पर पैरिस केइंडियन स्टूडेंट्स ऐसोसिएशन के समक्षभाषण दिया। डॉ. केसकर इसके अध्यक्षथे। क्लिमेंस दत्त ने सुब्बै ̧या को फ्रेंचकम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव मौरिसथोरे से मिलाया। मई दिवस के समारोहमें भाग लेने का और पॉपुलर फ्रंट कीसरकार का कामकाज देखने का भीमौका मिला।सुब्बै ̧या  फ्रांस  के  औपनिवेशिकमामलों के मंत्री माउरी मूतेत से मिले।फ्रेंच इंडिया के लिए लेबर कोड तैयारहुआ,  जो  आदेश  बना।  सुब्बै ̧या  काएक उद्देश्य पूरा हुआ। आदेश से मजदूरऔर  ट्रेड  यूनियन  आंदोलन  संगठितकरने  में  बढ़ावा  मिला।  1  जनवरी1938 से 8 घंटे का कार्यदिवस लागूहो गया।वापसी पर स्वागत6 जुलाई 1937 को पांडिचेरीपहुंचने पर सुब्बै ̧या का भारी स्वागतकिया गया जिससे वे आश्चर्य - चकितरह गए। बहुत सारे नेता पहुंचे थे। रोडपर दोनों और हजारों लोग झंडे लेकरखड़े थे। 800 लोग लाल बैंड पहनेयूनिफॉर्म में थे। हजारों महिलाएं खड़ीथीं।नई पार्टी की स्थापनानेहरू  की  सलाह  से  अगस्त1937  में  सुब्बै ̧या  ने  पांडिचेरी  मेंमहाजन  सभा  की  स्थापना  की  जोकांग्रेस का ही एक रूप था। इसमें यूथलीग, रीडिंग रूम, हरिजन सेवक सभा,ट्रेड यूनियनों इ. के लोग शामिल हुए।लियों सेंट ज्यां की मदद से करइक्कलमें भी इसकी शाखा खोली गई। माह केअंत  में  इसका  सम्मेलन  पांडिचेरी  मेंकिया गया। सभा में हैंडलूम का प्रचारकरने  घर-घर  जाकर  बेचा  जिसकानेतृत्व सुब्बै ̧या ने किया।1937  में  चुनाव  हुए  लेकिनसरकार द्वारा धोखाधड़ी के फलस्वरूपमहाजन सभा को बहुमत नहीं मिलनेदिया गया।फलस्वरूप  पंचायत  स्तर  परसमानांतर जन सरकारों या प्रशासनका गठन किया जाने लगा।1938  में  सुब्बै ̧या  कांग्रेस  केहरिपुरा अधिवेशन में शामिल हुएऋ वहसूरत के पास ताप्ती नदी के किनारेसंपन्न हुआ। नेहरू से खूब बातें हुईं।वापसी पर वे शहीद रामै ̧या संबंधीतथा अन्य मुद्दों पर गिरफ्तार कर लिएगए और अत्यंत खराब हालात में जेलमें रखे गए। रिहा होने पर उन्हें पांडिचेरीसे बाहर कर दिया गया।द्वितीय विश्वयु( के दौरान फ्रेंचभारत1939 में द्वितीय विश्वयु( छिड़गया जो 1945 तक चला। 1940में फ्रांस नाजी जर्मनी के कब्जे में आगया। नतीजन फ्रांस का फ्रेंच भारत सेसंबंध टूट गया। इसका परिणाम यहहुआ  कि  गवर्नर  बोविन  का  प्रशासनव्यावहारिक  रूप  से  भारत  में  ब्रिटिशसरकार के नियंत्रण में आ गया।पांडिचेरी में यु(-विरोधी आंदोलनने जोर पकड़ा।वेल्लोर में गिरफ्तारीविश्वयु( के दौरान सुब्बै ̧या मद्रास,तंजौर तथा अन्य जगहों में सक्रिय थे।जनवरी  1941  में  उन्हें  गिरफ्तारकरके वेल्लोर सेंट्रल जेल में बंद करदिया  गया।  वहां  400  कम्युनिस्टगिरफ्तार  थे  जिसमें  एस.वी.  घाटे,जीवानंदम,   ए.के.   गोपालन,बालदंडायुधम,  इ.  शामिल  थे।  कईकांग्रेस तथा अन्य भी थे जिनमें पट्टभिसीतारमै ̧या, के. कमराज, एन.संजीवरेड्डी, इ. थे।कैदियों ने विभिन्न कमिटियां बनाईं।9 सदस्यों की एक स्टैंडिंग कमिटि भीबनाई गई जिसके मेयर सुब्बै ̧या बनाएगए। कम्युनिस्ट तथा राष्ट्रीय साहित्यछिपाकर अंदर लाया जाता। 19 दिनोंतक भूख- हड़ताल भी चली।सितंबर 1942 में सभी को रिहाकर दिया गया।कम्युनिस्ट पार्टी का गठनजेल से रिहा होने के बाद सुब्बै ̧यापांडिचेरी में कम्युनिस्ट पार्टी गठित करनेमें  लग  गए।  इसके  अलावा  वेकरइक्कल, माहे और चंदननगर भीगए। चंदननगर में वे कालीचरण घोष,तिनकोरी मुखर्जी, भवानी मुखर्जी तथाअन्य  साथियों  से  मिले।  उन्होंने  जूटमजदूरों को भी संबोधित किया।सुब्बै ̧या ने फ्रांस के नाजी-विरोधीप्रतिरोध आंदोलन से संपर्क स्थापितकिया। जनरल डी गॉल ने लंदन में1943  में  ‘फ्री  फ्रेंच  सरकार’  कीस्थापना की थी। इसका केंद्र ओरान,एल्जियर्स,  स्थानांतरित  होने  के  बादभी उनका संपर्क स्थापित हो गया था।वहां  ‘कॉम्बैट’  ;लड़ाईद्ध  नामकनाजी-विरोधी संगठन कायम किया गयाथा।आदिसेन, एल्जियर्स में फ्रेंच कॉलेजके प्रोफेसर, पांडिचेरी के थे और सुब्बै ̧याके मित्र थे। फ्री फ्रेंच सरकार ने उन्हेंमार्च  1944  में  ‘कॉम्बैट’  संगठितकरने पांडिचेरी भेजा जिसका अध्यक्षसुब्बै ̧या को बनाया गया, प्रो. लैम्बर्टसरवने महासचिव। हाईकोर्ट के फ्रांसीसीजज,  पांडिचेरी  सशस्त्र  सेनाओं  केकमान्दान्त  आउगे  तथा  अन्य  इसकेसदस्य थे।राष्ट्रीय जनतांत्रिक मोर्चे कागठनयु( की समाप्ति के बाद जनवरी1946 में कम्युनिस्ट पार्टी की पहलपर  सभी  प्रगतिशील  और  देशभक्तशक्तियों को एक मंच पर लाकर ‘राष्ट्रीयजनतांत्रिक मोर्चे’ ;एन.डी.एफद्ध का गठनकिया गया।26   जून   1946   कोम्युनिसिपैलिटियों के चुनाव हुए। साथही कोंसेल गेनेराल’ ;प्रतिनिधि सभा याअसेम्बलीद्ध के चुनाव भी हुए। एन.डी.एफ. को 44 में से 34 सीटें प्रतिनिधिसभा में मिलीं।नवंबर 1946 के फ्रेंच पार्लियामेंटके  चुनाव  में  फ्रेंच  इंडिया  से  एन.डी.एफ. के प्रो. लैम्बर्ट सरवने चुने गए।वी.  सुब्बै ̧या  और  करइक्कल  केपक्किरीस्वामी पिल्लै फ्रेंच पार्लियामेंटके  ऊपरी  चेम्बर  ;जैसे  हमारी  राज्यसभाद्ध ‘‘काउंसिल ला रिपब्लिक’’ केलिए  26  जनवरी  1947  को  चुनेगए।9 अगस्त 1947 को पांडिचेरीमें ‘भारत छोड़ो’ दिवस मनाया गया।जब भारत की आजादी की घोषणाकी गई तो फ्रेंच सरकार ने कहा किइसका फ्रेंच भारत पर कोई असर नहींपड़ेगा। वी.सुब्बै ̧या की पहल पर 15अगस्त का दिन पांडिचेरी तथा अन्यफ्रेंच क्षेत्रों में बड़े धूमधाम से मनायागया।15  अगस्त  1947  कोचंदननगर के लोगों ने फ्रेंच प्रशासकको  भगाकर  तिरंगा  फहराया  औरसांकेतिक तौर पर प्रशासन अपने हाथोंमें ले लिया। आगे चलकर चंदननगरने जनमत संग्रह हुआ जिसके बाद 2मई 1950 को सत्ता हस्तातंरण केइरादे  की  घोषणा  की  गईऋ  2  मई1952 को वास्तविक हस्तांतरण हुआ।14 जनवरी 1950 को पुलिसने सुब्बै ̧या के घर पर छापा मारा। वहींकम्युनिस्ट पार्टी तथा फ्रेंच इंडियन लेबरस्टोर’ भी था। कई गिरफ्तार कर लिएगए। पूरा इलाका सील कर दिया गया।सुब्बै ̧या अंडरग्राउंड थे। ब्रिटिश भारतमें भी उनके खिलाफ वारंट था। सारेपांडिचेरी में दमन का दौर चल पड़ा।माहे में शांतिपूर्ण जनविद्रोह हुआ।इस बीच ‘पांडिचेरी विलयन समिति’का गठन किया गया। जून 1953 मेंघायलों  से  लदा  हुआ  एक  जहाजइंडोचाइना से पांडिचेरी आया। उसमेंअधिकतर फ्रेंच सैनिक थे। 1954 मेंवियतनाम में दिएन बिएन फू की लड़ाईमें फ्रांसीसी सैनिकों की बुरी तरह पराजयहुई।  इन  घटनाओं  से  फ्रेंच  इंडिया,खासकर  पांडिचेरी  में  प्रशासकों  मेंपस्त-हिम्मती छा गई और आम जनतामें खुशी की लहर दौड़ गई।भारत में विलयन का संघर्षजनवरी 1954 के आरंभ में फ्रेंचइंडिया के भारत में विलयन का संघर्षआरंभ हो गया। सुब्बै ̧या, सरवने तथाअन्य ने सारे मतभेद भुलाकर व्यापकमोर्चा बनाने की अपील की। वी. सुब्बै ̧याके नेतृत्व में मुक्ति समिति गठित कीगई।  सुब्बै ̧या  भा.क.पा.  की  केंद्रीयसमिति से मिलने दिल्ली गए। 7 अप्रैल1954 से मुक्ति के लिए सीधा सघ्ांर्षआरंभ करना तय पाया गया। 100से भी अधिक प्रेस वालों को सुब्बै ̧याऔर अजय घोष ने संबोधित किया।सभी कम्यूनों और गांवों में शांतिपूर्णआंदोलन फैल गया। पार्टी ने सशस्त्रवालंटियर दस्ते संगठित किए। मेजरजयपाल सिंह की देखरेख में पांडिचेरीसीमा पर शस्त्रास्त्रों की ट्रेनिंग दी जानेलगी।मन्नादिपेट ;थिरूबुवावाइद्ध कम्यूनप्रथम था जिसने आजाद होने की घोषणाकर दी। पुलिस से हथियार छीन थानेपर राष्ट्रीय झंडा फहराया गया। वहांआजाद  सरकार  की  घोषणा  की  गईऔर स्वागत में विशाल जुलूस निकला।इसके बाद अन्य कम्यूनों ने एक-एककरके ख्ुुद को आजाद घोषित कर दिया।पांडिचेरी पर तिरंगाअप्रैल  1954  में  पहली  बारपांडिचेरी पर तिरंगा फहराया गया औरभारत के साथ विलयन की मांग कीगई। कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस तथा अन्यने  जुलूस  निकाले।  फ्रेंच  सरकार  नेसाइगोन ;वियतनामद्ध से आए सैनिकमैदान  में  उतरे।  फ्रेंच  इंडिया  कीकम्युनिस्ट पार्टी ने आंदोलन तेज करदिया। फ्रेंच थोड़ा-थोड़ा करके अपनीसैन्य शक्ति और तैयारियां बढ़ा रहे थे।9  अगस्त  1954  को  पूर्णहड़ताल रही। नेहरू और मेंदेस-फ्रांसे;फ्रेंच प्रधानमंत्रीद्ध ने शांतिपूर्वक सत्ताहस्तांतरण करना तय किया।18  अक्टूबर  1954  को  फ्रेंचइंडिया  के  178  म्युनिसिपलकाउंसिलर्स और असेम्बली प्रतिनिधियोंमें से 170 ने भारत के साथ फ्रेंचइंडिया के विलयन की घोषणा की। चारोंओर खुशी छा गई। 21 अक्टूबर 54को  समझौता  हुआ  और  1  नवंबर1954 को सत्ता हस्तांतरित हो गई।पांडिचेरी   में   भारत   केकाउंसुल-जनरल  केवल  सिंह  तथाअन्य  कोट्टकुप्पम  में  मुक्ति  कैम्प  मेंसुब्बै ̧या  से मिलकर उन्हें घटनाओं सेअवगत कराते रहे।यहां से सुब्बै ̧या को सजे हुए रथ में  उनकी  माता  और  पत्नी  के  साथ बिठाकर पांडिचेरी ले जाया गया।आजादी के बादसुब्बै ̧या  1964-69  तक पांडिचेरी में विधानसभा में कम्युनिस्ट ग्रुप  के  नेता  रहे।  1969-73  मेंपांडिचेरी  में ए.आई.ए.डी.एम.के. के साथ बनी मिली-जुली सरकार में वे कृषिमंत्री रहे। उनकी पत्नी सरस्वती सुब्बै ̧याभी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की विधायक रहीं।1993  में  उनकी  मृत्यु  के  बादउनकी मूर्ति नेल्लीथेन में स्थापित कीगई।  उनके  घर  का  प्रयोग  समाजशास्त्रीय शोध के लिए किया जा रहाहै।  भारत  सरकार  ने  उनकी  याद  मेंस्टाम्प जारी किया। वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के सदस्य भी रहे।वे स्वतंत्रता आंदोलन के ताम्रपत्र प्राप्तकर्ता भी थे।उनकी मृत्यु 10 सितंबर 1993को पांडिचेरी में हो गई।

गांधी प्रतिमा के समक्ष उपवास कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने योगी से मांगा इस्तीफा



भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने आज 2अक्टूबर को गांधी जयंती के अवसर पर गांधी प्रतिमा पर माल्यार्पण करने के बाद उपवास रखकर हाथरस,बुलंदशहर,बलरामपुर,आजमगढ़ में हुए बलात्कार सहित प्रदेश में व्याप्त जंगलराज के विरोध में सरकार के रवैए के खिलाफ नारेबाजी करते हुए मुख्यमंत्री योगी से इस्तीफे की मांग की गई।

 

इस अवसर पर सभा को संबोधित करते हुए राज्य परिषद सदस्य - रणधीर सिंह सुमन ने कहा योगी राज में प्रदेश बलात्कार और अपराध में देश में एक नंबर पर पहुंच गया है,जिलासचिव - का.बृजमोहन वर्मा ने कहा हाथरस में बलात्कार और हत्या के बाद वहां के जिलाधिकारी और एस पी ने बिल्कुल तानाशाही रवैया अपनाया इसके बाद भी अपने पद पर बने हुए हैं,ऐसे में एस आई टी का गठन बिल्कुल बेमानी है,निष्पक्ष जांच के लिए दोनों अधिकारियों को सस्पेंड किया जाए,रिटायर्ड जजों की समिति बनाई जाए,अखिल भारतीय किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने कृषि कानून2020 को किसानों के गले का फंदा और जमीन छीनने का हथकंडा बताया,उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा योगी और मोदी जो कहते है काम उसके बिल्कुल उल्टा करते है,2करोड़ रोजगार देने का वादा कर रोजगार छीना, बेटी बचाओ नारा देकर बलात्कारियों को बचा रहे हैं,का.मुनेश्वर ने कहा मोदी जी कहते है 70साल में कांग्रेस ने कुछ नहीं किया जबकि जो सरकारी संपत्ति बेंच रहे हैं,वह पूर्व सरकार द्वारा ही बनाई गई है।इस अवसर पर सह सचिव डॉ कौसर हुसैन,अखिल भारतीय नौजवान सभा अध्यक्ष आशीष शुक्ला, महामंत्री नीरज वर्मा, अध्यक्ष आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन महेंद्र यादव,कोषाध्यक्ष अंकित यादव, सर्वेश यादव,प्रतीक शुक्ला,दीपक शर्मा,पवन पांडे,भूपेंद्र प्रताप सिंह, दिग्विजय सिंह,एड.श्याम सिंह,एड.अंकुल वर्मा,दीपक वर्मा,अमरसिंह,राम नरेश,मो.कासिफ आदि लोग उपस्थित रहे।

सोमवार, 28 सितंबर 2020

संघी आजादी की लड़ाई में शामिल नहीं थे-बृज मोहन वर्मा

 अखिल भारतीय नौजवान सभा ने शहीद भगत सिंह की मनाई जयंती 

आज दिनांक 28 सितम्बर को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बाराबंकी कार्यालय पर शहीद- ए- आजम भगत सिंह के जन्मदिवस पर अखिल भारतीय नौजवान सभा द्वारा गोष्ठी का आयोजन किया गया व माल्यार्पण कर जयंती मनाई गई, इस अवसर पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के जिला -सचिव का. एड. बृजमोहन वर्मा ने कहा आज के समय में सरदार भगत सिंह सहित आजादी की लड़ाई के क्रांतिकारियों के विषय मे जानकारी और उनके विचारों को जनता तक पहुंचाना जरूरत बन गया है क्योंकि इस समय भा ज पा सरकार देश व प्रदेश में है उनके पूर्व संगठन आज़ादी की लड़ाई में कभी शामिल नहीं रहे,और  आजादी के क्रान्तिकारियों के बारे में भ्रामक बातें फैला रहे है और शिक्षा का भगवाकरण कर अपना काला इतिहास स्वर्णिम बताने का प्रयास कर रहे हैं।सह सचिव का. शिव दर्शन वर्मा ने कहा कि भगत सिंह की फांसी के मुकदमे में संघ के  शादीलाल और शोभा सिंह ने गवाही दी थी,और अंग्रेज़ सरकार का वकील सूर्य नारायण शर्मा संघ का पदाधिकारी था।अखिल भारतीय किसान सभा के जिलाध्यक्ष विनय कुमार सिंह  ने कहा कि संघ ने आज़ादी कि लड़ाई में भाग तो नहीं लिया और इनके मूल संगठन संघ के लोग सावरकर आदि अंग्रेजों के वफादार बने रहे आज भी आर एस एस का कोई भी पदाधिकारी अंग्रेजों के खिलाफ बोल नहीं सकता,उपाध्यक्ष प्रवीण कुमार ने कहा शहीद भगत सिंह मार्क्स और लेनिन से प्रभावित थे उन्होंने जेल में  कई किताबें भी लिखी,यह भी लिखा कि दुनिया में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति शुरू हो चुकी है,वह देश से भागेंगे लेकिन भारत पर शासन पूंजीवा दियों का होगा जनता  को अपने अधिकारों के लिए सरकारों से लड़ना होगा,अखिल भारतीय नौजवान सभा के जिलाध्यक्ष आशीष कुमार शुक्ला ने सरदार भगत सिंह के जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा की सरदार भगत सिंह का नारा था की हुक्मरानों से मांग करो, ना मिले तो छीन लो,उपाध्यक्ष संदीप तिवारी ने कहा नौजवानों की सबसे बड़ी समस्या बेरोजगारी  है ,देश में बेरोजगारी आज़ादी के बाद सबसे ज्यादा है,लेकिन मौजूदा सरकारें देश को बेंचने में लगी है ,महामंत्री नीरज वर्मा ने कहा सरकार भगत सिंह रोजगार गारंटी योजना लागू करे,कोरोना काल में स्कूलों  में फीस की वसूली पर सरकार रोंक लगाए इस अवसर पर गिरीश चन्द्र,वीरेंद्र वर्मा,शैलेन्द्र मिश्रा, दलसिंगार,कैलाश चंद्र, महेंद्र यादव,प्रतीक शुक्ला,दीपक शुक्ला,पवन पांडे,आशीष वर्मा,लवकुश वर्मा,अंकित यादव,सर्वेश यादव,सौरभ वर्मा,अभिषेक पाल,राहुल रावत,घनश्याम,मुनींद्र कुमार,श्याम नाथ मिश्रा आदि लोग उपस्थित रहे।


शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

अमीर हैदर खान अप्रीतम कम्युनिस्ट योद्धा


अमीर हैदर खान का जन्म झेलम नदी के किनारे रावलपिंडी के कालियान
सीलियान गांव में ;अब पाकिस्तान में 2 मार्च 1900 को हुआ था। वे पांच ही वर्ष के थे जब उनके पिता चलबसे। पिता की मृत्यु बाद मां की दूसरी शादी हो गई और अमीर हैदर का जीवन अधिक कठिन हो गया। सौतेले पिता
के अत्याचारों के अलावा एक बार उसकी मां ने उसे थप्पड़ जड़ दिया। अमीर हैदर घर से भाग निकला और
गोजरखान रेलवे स्टेशन पहुंच गया। वहां से वह बिना टिकट पेशावर चला गया। वह भूखा-प्यासा था। वह पेशावर
कैन्टोमेंट अपने भाई शेर अली से मिलने गया जो उसे देख चकित रह गया। वह उसे वापस गांव ले आया। उसे पढ़ने का मौका ही नहीं मिल रहा था। गांव के मौलवी उससे सारा काम कराते लेकिन पढ़ाने से बचते। मौलवी ने उसे चकरा भेज दिया, वहां खाना अच्छा मिलता लेकिन पढ़ाई नहीं मिलती। वह पढ़ाई का प्यासा था। वह अपनी पुस्तक और थैला लेकर चकरा से निकलकर एक गांव की मस्जिद में चला गया जहां एक हाफिज ने उसे कुछ धार्मिक शिक्षा दी। वहां बहुत कम खाना मिला करता, मात्र एक-चौथाई चपाती। हैदर अक्सर ही भूखे पेट रहा करता। कई मस्जिदों से होता हुआ वह 20 मील आगे बेवाल मुंशी देवीदत्त के स्कूल पहुंचा। उनकी मृत्यु के बाद
गोजरखान से ट्रेन पकड़ कलकत्ता 4 दिनों बाद पहुंचा। टिकट चेकर ने बड़ी सहायता की। स्टेशन पर उसे बिना टिकट पकड़ लिया गया लेकिन पेशाब करने के बहाने भाग निकला। वहां वह अपने भाई से मिला। वहां रहने और
पढ़ने लगा लेकिन पाया कि वह अफीम का अड्डा था। बंबई में इस बीच वह अपने गांव और फिर बंबई हो आया। वहां फौज में भर्ती की कोशिश की। अपनी खोली से भाग कर जहाज साफ करने का काम करने लगा जिसके लिए कुछ पैसे मिलते थे और फुटपाथ पर सोने लगा। उसका मित्र जिसने काम दिलवाया था, बिंदूलाल हिन्दू था और दोनों दोस्त बन गए। डबल शिफ्ट में भी काम करता था। कभी-कभी जहाज की चिमनी के अंदर उतरकर भी सफाई करनी पड़ती थी। अंदर गर्म पानी पहले भरा जाता और फिर निकाल दिया जाता। इसलिए अंदर बहुत गर्म हुआ करता। सारा बदन काला हो जाया करता, हाथ-पैर पर फफोले निकल आते। उन्हें सीढ़ियों से उतारा जाता। खांसीं या कफ और पाखाना तक काला हो जाया करता। ये सारे कामकाजी बच्चे ‘दादाओं’ के कंट्रोल में हुआ करते। वे समाज के विभिन्नि परिवारों के परित्यक्त बच्चे थे। उन्हें खाना कम और नशीले पदार्थ अधिक खिलाये जाते। चोरी करना आम बात थी। बीमार पड़ने पर बिंदू ने उसे अफीम खिलाई और वह ठीक हो गया। कई चोटें आईं। कुछ समय बाद दोनों ‘दादागिरी’ करके पैसे कमाने लगे लेकिन हैदर को यह बात अच्छी नहीं लगी और उसने काम छोड़ दिया। हैदर ने एक मर्चेट शिप में मजदूर का काम ले लिया। उस समय प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था। जहाज बंबई से चल पड़ा और बसरा पहुंचा। वहां कई भारतीय सैनिक भी थे। एक दिन बालोच रेजीमेंट को बगदाद पर आक्रमण करने का आदेश मिला लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ भावना फैल चुकी थी। रेजीमेंट ने आगे जाने से इंकार कर दिया। वे सभी गिरफ्तार कर लिए गए। हैदर का जहाज पूरे एक साल बसरा में रहा। फिर जहाज वापस बंबई
लौटा। एक-दूसरे जहाज पर घूस देने के बाद उसे फायरमैन का काम मिला। शंघाई, बसरा, फिर बंबई।
एक अन्य छोटे जहाज में हैदर लंदन पहुंच गया। इसमें चावल था। लंदन पहुंचकर एक अन्य जहाज लिया। लेकिन उसका ‘सारंग’ अत्याचारी था। हैदर ने विद्रोह का नेतृत्व किया। उस व्यक्ति की जगह एक नया ‘सारंग’ इन्हीं साथियों में से चुना गया। तीन सप्ताह बाद जहाज न्यूयॉर्क पहुंचा। वहां से 45 दिनों की यात्रा के बाद वे रूस
व्लीदीवोस्तोक पहुंचे। इस प्रकार विभिन्न जहाजों पर काम और विश्वभर की यात्राएं उनका जीवन बन गया। इस बीच उन्होंने पीने के पानी के सवाल पर एक जहाज पर विद्रोह कर दिया जो सफल रहा। इसी बीच 1917 में रूसी क्रांति हो गई।
अमरीकी नागरिकताः सैनिकों के सार्वजनिक नीलामी का आंदोलन आखिरकार अमीर हैदर अमरीका
में रह गए। नाविकों की यूनियन की मदद से 1921 में उन्हें अमरीकी नागरिकता मिल गई। युद्ध  के बाद
स्थिति बुरी थी, भूतपूर्व सैनिक तथा कई अन्य अब भीख मांगने पर मजबूर थे।
एक दिन हैदर की मुलाकात जेम्स और हडसन से हुई। उन्होंने भूतपूर्व सैनिकों की ‘‘सार्वजनिक नीलामी’’ करने
का आंदोलन चलाया। यह बोस्टन से शुरू हुआ। भारी भीड़ इक्ट्ठा हो गई जिनमें अधिकतर बेरोजगार युवा थे।
हडसन, जेम्स और हैदर को भीड़ ने घेर लिया।हडसन ने भीड़ को संबोधित किया फिर उन्होंने हैदर से पहला आदमी नीलामी को लाने के लिए कहा। हैदर वह आदमी ले आए। उसका नाम फ्रैंक था। वह 20 साल का था और कबाड़ इकट्ठा करने का काम करता था। रात में पेड़ों के नीचे सो जाया करता। किसी ने कहा एक शाम का खाना दूंगा, किसी ने कहा दो शाम! किसी ने रहने की जगह भी।
फ्रैंक ने पूछा, कोई है जो मुझे नाश्ता भी दे दे? एक महिला सामने आई और हामी भरी। उसके पास ढेर सारी
बिल्लियां थीं उनकी देखभाल के लिए आदमी चाहिए था। वह उसे लिमोसीन कार में बिठाकर ले गई।
हैडली नीलामी के लिए दूसरा आदमी था।
नीलामी की खबरें सारे अमरीका में आग की तरह फैल गईं। फिर नीलामी न्यूयॉर्क में होनी थी। अधिकारीगण जाग गए और पुलिसवालों की छुट्टियां रद्दकरके नीलामी रोकने की तैयारियां आरंभ हो गई। नीलामी न्यूयॉर्क के ब्रियां पार्क के लेन ;गली नं. 42 में होनी थी।
पुलिस ने सारा इलाका घेर लिया।तनातनी चलती रही और भूतपूर्व सैनिकों पर लाठीचार्ज किया गया। हैदर, हडसन और अन्य ने पुलिस की चेतावनी नहीं
मानी। हैदर वहां एक गुप्ता नामक भारतीय व्यक्ति से मिले और उन्होंने बिजनेस शुरू करने का असफल प्रयास किया। फिर हैदर रेलवे में भर्ती हो गए। मालिकों के गुर्गों ने उन्हें रोकने की कोशिश भी की। आखिर मुक्केबाजी में हैदर ने उन्हें रोकने वाले जॉन की खूब अच्छी धुनाई करके हरा दिया। वे हीरो बन गए।
समाजवाद से परिचय
वहां उनकी मुलाकात फ्रैंक नामक  व्यक्ति से हुई जिसने उन्हें क्रांति और समाजवाद के बारे में बताया। हैदर के विचार बदलने लगे। फिर वे एक एविएशन कंपनी में काम करने लगे। उन्होंने ब्रिटिश लेबर पार्टी के वक्ता
मॉर्गन जॉन की सार्वजनिक सभा में रंगभेद तथा भारत की आजादी के प्रश्न पर खिंचाई की। जॉन को हॉल के पिछले रवाजे से भागना पड़ा। भारतीयों ने भांगड़ा नाचना शुरू कर दिया। एक अमेरिकन जिसने पहला सवाल किया था वह हैदर से मिलने आया। हाथ मिलाने के बाद उसने अपना नाम ब्राउन बताया और हैदर से वर्कर्स पार्टी के ऑफिस आने का निमंत्रण दिया। उनकी  मुलाकात गदर पार्टी वालों से भी हुई जिनका अखबार भी उन्होंने बेचा।
कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय में डेट्रॉयट में अमीर हैदर वर्कर्स पार्टी कार्यालय गए। अमरीकी कम्युनिस्ट पार्टी
पर पाबंदी लगने के बाद उसका नाम वर्कर्स पार्टी कर दिया गया था। वहां मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के फोटो
लगे हुए थे। वहां उनकी मुलाकात पार्टी नेता ओवेन से हुई। वर्कर्स पार्टी ने रूस में ‘‘पूर्व के मेहनतकशों की यूनिवर्सिटी’’ में पढ़ने के लिए सात सदस्यों का चुनाव किया
जिनमें अमीर हैदर खान, कलकत्ता के शमसुल हुदा और गदर पार्टी के पांच लोग शामिल थे। उन्हें दस्तावेज देने
के बाद न्यूयॉर्क में केंद्रीय समिति कार्यालय में पार्टी सचिव लूथर फोर्ड से मिलने का आदेश दिया गया। न्यूयॉर्क
से मॉस्को जाने का ‘इंतजाम’ किया गया।
कई देशों और कई दिनों की जहाजी यात्रा के बाद वे सभी ट्रेन से 20 मार्च 1926 को ओडेसा से मास्को पहुंचे।
हैदर का नाम बदलकर ‘सखारोव’’ कर दिया गया और यूनिवर्सिटी में भर्ती किया गया। वहां पहले उन्होंने रूसी
सीखी। हैदर को कई सोवियत नेताओं, विभिन्न देशों के कम्युनिस्टों, क्लिमेंस दत्त, राजा महेंद्र प्रताप, इत्यादि से
मिलने और उन्हें सुनने का मौका मिला। ‘‘पूर्व के मेहनतकशों का विश्वविद्यालय’’ अमीर हैदर खान की पढ़ाई और ट्रेनिंग आरंभ हो गई। वे मास्को में कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के कार्यालय भी गए और वहां भारतीय सेक्शन के
इंचार्ज लोहानी से मिलने का प्रयत्न किया पर असफल रहे।
1927 में अमीर हैदर सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बन गए। फिर लाल फौज के एक सीनियर अफसर की देखरेख में वे तथा अन्य 10 दिनों की सोवियत यात्रा पर निकले। मास्को में ढाई वर्ष रहने के बाद हैदर पूरी तरह बदल चुके थे। अगले दिन कॉमिन्टर्न हेडक्वार्टर में इब्राहिमोव उनसे मिले।
जहाज बंबई पहुंचा। साथ में अली मर्दान भी थे जिनका एक कमरा ‘खोली’ बंबई में था, मदनपुरा में कॉमिन्टर्न ने अमीर हैदर को डांगे से मिलने के लिए कहा था। उस समय बंबई में कपड़ा मिल मजदूरों की हड़ताल चल रही थी और डांगे इसके नेता थे। हैदर की मुलाकात पी.सी. जोशी से हो गई और उन्होंने बताया कि डांगे कहां मिलेंगे। हैदर
मजदूर-किसान पार्टी के दफ्तर गए जहां डांगे मिल गए। ‘‘मैं डांगे से मिलना चाहता हूं’’ हैदर ने कहा। ‘‘मैं ही डांगे
हूं’’, डांगे ने जवाब दिया। दोनों ने हाथ मिलाया। उनके साथ बेन ब्रैडले और एस.वी. घाटे से भी मुलाकात हो
गई। हैदर ने कॉमिन्टर्न के दस्तावेज
सौंपे। उन्होंने कहा कि वे 14 वर्षों
वाद भारत लौटै हैं। कॉमिन्टर्न और
भारतीय कम्युनिस्टों के बीच संबंध
कायम होने चाहिए।
इस बीच वे रावलपिंडी के नजदीक
अपने गांव गए और बीमार मां को देख
आए। वापस बंबई लौटने पर वे घाटे से
मिले जो उस वक्त पार्टी के महासचिव
थे। लाल बावटा यूनियन ऑफिस में
यूनियन फंड देने के लिए मजदूरों की
लंबी कतारें लगी हुई थी।
आर्थिक तंगी चहुं ओर थी। जोशी
डांगे परिवार के साथ रहा करते, डांगे
यूनियन के महासचिव थे, मिरजकर
की स्थिति भी अच्छी नहीं थी।
गिरणी कामगार यूनियन ने
आत्मरक्षा यूनिटें बनाईं। ‘‘रेड गार्ड्स’’
गठित किए गए जिनकी लाल वर्दी थी
अनिल राजिमवाले

और जिन्हें ठीक से प्रशिक्षित किया गया
था।
गिरणी कामगार यूनियन के नेतृत्व
में हड़ताल समाप्त होने के बाद
सांप्रदायिक तत्वों ने मजदूरों को
विभाजित करने के लिए बंबई तथा
अन्य जगहों में ‘‘दंगे’’ शुरू कर दिया।
इनका सामना करने में ‘‘रेड गार्ड्स’’
और अमीर हैदर ने महत्वपूर्ण भूमिका
अदा की।
कॉमिन्टर्न के ‘प्रतिनिधि’
पूर्व के विश्वविद्यालय’ से निकाले
गए एक साथी ‘‘वारिस’’ हैदर से
मिलने बंबई आए और एम.एन. रॉय
का पत्र लाया। इसमें रॉय ने भारतीय
कम्युनिस्टों को सहायता की पहल की
और कॉमिन्टर्न की कार्यकारिणी में
खाली स्थान पर किसी को भेजने का
प्रस्ताव रखा। अन्यथा रॉय को ही
नामजद करने को कहा।
हैदर ने वारिस को घाटे से
मजदूर-किसान पार्टी के दफ्तर में
मिलाया। वारिस ने पत्र देते हुए कहा
अमीर हैदर खानः रोमांच भरा जीवन
कि वे जवाब वापस जाते समय ले
जाएंगे। घाट, डांगे और अन्य ने उत्तर
में रॉय से कहा कि आपकी गतिविधियों
से हमें हानि पहुंची है और हम कॉमिन्टर्न
की कार्यकारिणी में किसी को भी नहीं
भेज सकते। हैदर एम.एन. रॉय तथा
वारिस पर बहुत बिगड़े।
जनरल मोटर्स में यूनियन
अमीर हैदर जनरल मोटर्स में अच्छा
काम कर रहे थे और उनकी तनख्वाह
भी बढ़ रही थी। इस बीच पी. सी.
जोशी की सलाह से उन्होंने वहां यूनियन
बनाना शुरू किया। जोशी, ब्रैडले तथा
अन्य ने मजदूरों की सभा को संबोधित
किया।
अमीर हैदर पार्टी को सक्रिय बनाने
के लिए घाटे, डांगे, डॉ. अधिकारी तथा
अन्य की बैठकों में भी शामिल हुए।
गोवा में
इस बीच हैदर पर वारंट जारी हो
गया। मेरठ षड्यंत्र ;1929-33द्ध में
उनका भी नाम था लेकिन वे भाग
निकले। मास्को चले गए। सुहासिनी
चट्टोपाध्याय एवं अन्य की सहायता
से वे गोवा पलायन कर गए। उनका
नाम अब फ्रांसिस्को फर्नान्डिज था। वहां
से वे नेपल्स ;इटलीद्ध होते हुए हैम्बर्ग
;जर्मनीद्ध पहुंच गए। वहां से वे मास्को
चले गए। एक बार फिर भारत का
चक्कर लगाकर वे सोवियत पार्टी की
कांग्रेस और कॉमिन्टर्न की गतिविधियों
में शामिल हुए। वहां हैदर पर काफी
भरोसा किया जा रहा था।
1931 में बंबई में पार्टी बिखरी
पड़ी थी। बी.टी. आर तथा कुछ अन्य
साथी अवास्तविक काम कर रहे थे।
कॉमिन्टर्न के नाम पर कुछ संदेहास्पद
तत्व घुसपैठ कर रहे थे। छोटे-छोटे
कम्युनिस्ट गुट अपने ढंग से कॉमिन्टर्न
तक पहुंचने का प्रयास कर रहे थे।
अमीर हैदर पर पुलिस का दबाव
बढ़ रहा था। वे मद्रास चले गए और
सुहासिनी की मदद से रहने लगे। हैदर
‘शंकर’ के नाम से रहने लगे।
दक्षिण भारत के कम्युनिस्ट
आंदोलन में अमीर हैदर की भूमिका
दक्षिण भारत, विशेषकर मद्रास
प्रेसीडेंसी में कम्युनिस्ट आंदोलन को
पुनः जीवित करने में अमीर हैदर खान
की विशेष भूमिका रही। उन्हें मेरठ षड्यंत्र
केस में शामिल करने का प्रयत्न किया
गया था लेकिन आखिरकार उन्हें दो
वर्ष मद्रास में सीमित रखा गया। उन्होंने
मद्रास में ‘शंकर’ के नाम से काम करना
आरंभ किया।
मद्रास में उनकी देखरेख में इसी
दौरान यंग वर्कर्स लीग का गठन किया
गया। यह 1932 की बात है। इसे
अंग्रेजों द्वारा तोड़ने का प्रयत्न किया
गया। 1932 में उन्हें डेढ़ वर्ष की
सजा मिली जिसे बाद में मद्रास
प्रेसीडेंसी की सीमाओं में रहने के आदेश
में बदल दिया गया।
अमीर हैदर के काम के फलस्वरूप
कई ग्रुप बने और कई कम्युनिस्ट तैयार
हुए। राजावादिवेलु, उनके भाई भाणिकम
तथा अन्य ने मजदूरों और विद्यार्थियों
को संगठित किया।
इनमें से एक थे पी. सुंदरैय्या नामक
एक कांग्रेसी जिनकी हैदर से जेल में
मुलाकात हुई थी। उन्होंने मद्रास और
आंध्र में कम्युनिस्ट पार्टी के गठन में
सहायता की। श्रीनिवासन रेड्ड्ी, के.
भाष्यम, ए.एस.के. तथा अन्य ने हैदर
का साथ दिया और कई उनके प्रभाव
में आए। 1936 में एस.वी. घाटे भी
आ गए।
इन सबने मिलकर मद्रास लेबर
प्रोटेक्शन लीग गठित किया और मई
दिवस मनाया एस.ए. डांगे ने तमिलनाडु,
सेल्फ-रेसपेक्ट समधर्म सम्मेलन का
उद्घाटन त्रिचिरापल्ली में 1 नवंबर
1936 को किया। इनमें से कई
कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए।
मद्रास में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी
उफ्तर 2/65 ब्रोडवे ;वास्तव में एक
अत्यंत संकरी गली!द्ध में सक्रिय हो गया
जिसके प्रमुख कर्ता-धर्ता कम्युनिस्ट
ही थे। नेहरू भी वहां आए। रामचंद्र
रेड्डी ;सुंदरैय्या के भाईद्ध,
बालदंडायुधम, सी.एम. ;सी.
सुब्रमणियमद्ध, इत्यादि इकट्ठा हो गए।
घाटे ने अंग्रेजी मासिक न्यू एज
निकालना शुरू किया। फिर तमिल
साप्ताहिक जनशक्ति प्रकाशित होने
लगा। पी. राममूर्ति ने ‘टॉडी ;ताड़ीद्ध
टैपर्स यूनियन’ का नेतृत्व किया।
1936 में एम.एन. रॉय मद्रास
पहुंचे और सिंगारवेलु के घर गए। बाद
में वे होटल में रहने लगे। तब तक वे
कॉमिन्टर्न और कम्युनिस्ट आंदोलन से
अलग हो चुके थे। सिंगारवेलु ने उनके
विचार मानने से इंकार कर दियाः रॉय
एक नई पार्टी बनाना चाहते थे।
इस बीच अमीर हैदर ने सेलम,
राजामुन्ड्री, अम्बाला तथा कई अन्य
जेलों की यात्रा की।
सी.एस.पी. कार्यालय में कई दफ्तर
काम कर रहे थे- पार्टी के प्रदेशिक,
जिला और स्थानीय कार्यालय, विभिन्न
ट्रेड यूनियनों के दफ्तर इ. थे। पांडिचेरी
के वी. सुब्बैय्या अमीर हैदर के संपर्क
में थे और अकसर ही मद्रास आया
करते थे।
मद्रास जेल में अमीर हैदर सुभाष
बोस और मुकुंदलाल सरकार के संपर्क
में आए। हैदर को जुलाई 1934 में
रिहा किया गया।
रामगढ़ कांग्रेस में, 1940
अमीर हैदर को 1939 में बंबई
प्रदेश कांग्रेस कमिटि का सदस्य बना
लिया गया।
वे कांग्रेस के रामगढ़ अधिवेशन के
लिए डेलीगेट चुने गए। सुहासिनी ने
उन्हें खर्च के लिए 50/-रु. दिए थे,
वह किसी ने पॉकेट मार लिए। उनके
मित्र उन्हें सुप्रसि( कलाकार जद्दन
बाई के पास ले गए और उन्होंने
100/रु. दिए। उनका फिल्मी दुनिया
में बड़ा नाम और संपर्क था। वे वामपंथी
एवं कम्युनिस्ट आंदेलन के संपर्क में
भी थीं। वे गौहर बाई की उत्तराधिकारी
थीं।
हैदर कांग्रेस के बाद पी.सी. जोशी
और डॉ. अधिकारी से मिले। हैदर ने
बंबई के चौपाटी में यु(-विरोधी सभा
में भाषण दिया। सभा में ही वे गिरफ्तार
किए गए। वहां डांगे, मिरजकर तथा
अन्य साथी पहले से ही बंद थे। हैदर
फिर नासिक जेल भेज दिए गए। वे
14 जुलाई 1942 को रिहा किए
गए।
आजादी से ठीक पहले वे रावलपिंडी
अपने गांव चले गए और पढ़ाने का
काम करने लगे। एक स्कूल स्थापित
करने के लिए उन्होंने 1946 में वहीं
जमीन खरीदी।
आजादी के बाद
1947 में भारत की आजादी और
देश के विभाजन के बाद वे पाकिस्तान
में अपने गांव में रह गए। उस वक्त वे
रावलपिंडी में थे। उन्होंने वी.डी. चोपड़ा
से पार्टी ऑफिस का चार्ज ले लिया।
उन्होंने पार्टी ऑफिस पर लाल झंडा
फहराया। वे गांव से काम और शिक्षा
की खेज में आनेवाले युवाओं के लिए
खाना बनाकर खिलाते और उनकी
मदद करते। उन्हें रावलपिंडी जेल में
सांप्रदायिकता फैलाने के आरोप में बंद
कर दिया गया। वे 15 महीने बंद रहे।
1950 के मई दिवस की सभा के
बाद फिर गिरफ्तार कर लिए गए। उन
पर ‘रावलपिंडी षड्यंत्र केस’ चलाया
गया। उन्हें लाहौर जेल स्थानांतरित
कर दिया गया। वहां सज्जाद जहीर,
फैज अहमद फैज, वगैरह लोग मिले।
फिर मियांवली जेल भेजा गया। मार्शल
अय्यूब खां की तानाशाही के दौरान वे
1958 में फिर गिरफ्तार कर लिए
गए।
1964 में हैदर ने अय्यूब खां के
खिलाफ फातिमा जिन्ना का समर्थन
किया लेकिन अय्यूब चुनाव जीत गए।
अमीर हैदर खान को पाकिस्तान
में कई बार गिरफ्तार किया गया क्योंकि
वे वहां जनतंत्र बहाल करने के लिए
लड़ रहे थे। फलस्वरूप उनका स्वास्थ्य
काफी खराब हो गया।
वे भारत में साथियों से मिलना चाहते
थे। लेकिन भारत के लिए पासपोर्ट के
उन्हें दस साल लड़ना पड़ा। वे लगभग
1988 के आसपास भारत आए और
भा.क.पा. हेडक्वार्टर ‘अजय भवन’ में
करीब सात महीने रहे। उन्हें भा.क.पा.
की राष्ट्रीय परिषद ने विशेष तौर पर
सम्मानित किया। वे मई दिवस समारोह
में भी शरीक हुए।
पाकिस्तान लौटने पर एक दिन एक
बस पकड़ने की कोशिश में वे गिर पड़ेऔर उन्हें गंभीर चोटें आईं। उनका
इलाज मेडिकल इंस्टीच्यूट में हुआ। सारे
इलाज के बावजूद उनकी 26 दिसंबर
1989 को रावलपिंडी में मृत्यु हो
गई। उनका शोक भारत और पाकिस्तान
में व्यापक तौर पर मनाया गया।
पाकिस्तान के अखबारों और टी.वी. में
काफी जगह मिली। सारे प्रगतिशील
और वामपंथी हलकों में उन्हें याद किया
गया। विभिन्न पार्टियों के लोगों ने उन्हें  श्रध्यानजलि अर्पित की। भारत में भी उन्हें
व्यापक तौर पर याद किया गया।
अमीर हैदर खान अद्वितीय
क्रांतिकारी और कम्युनिस्ट थे।


 -अनिल राजिमवाले

शनिवार, 19 सितंबर 2020

कामरेड रोजा देशपांडे का निधन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी बाराबंकी ने शोक व्यक्त किया


मुंबई: वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता और लोकसभा के पूर्व सदस्य रोजा देशपांडे का बुढ़ापे के कारण शनिवार दोपहर यहां उनके आवास पर निधन हो गया।


देशपांडे, 9 1वर्षीय , भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापकों में से एक, श्रीपाद अमृत डांगे की बेटी थीं।


वह एक बेटे और एक बेटी से बचे हैं।


देशपांडे ने संयुक्ता महाराष्ट्र आंदोलन (महाराष्ट्र राज्य के निर्माण के लिए आंदोलन) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के सदस्य के रूप में गोवा मुक्ति संघर्ष में हिस्सा लिया था।


1974 में, वह बॉम्बे दक्षिण मध्य निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुनी गईं।


उन्होंने कामकाजी महिलाओं के लिए मातृत्व अवकाश का लाभ प्राप्त करने के लिए एक अभियान का नेतृत्व किया था, और विभिन्न केंद्रीय और राज्य सरकार की समितियों में श्रम समस्याओं, विशेष रूप से महिला श्रमिकों की सेवा की।


महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने उनके निधन पर शोक व्यक्त किया।

 

शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

मोदी के नाम वीडियो वाइरल कर पूर्व विधायक पुत्र ने आत्महत्या की


 सूरज न बदला चांद न बदला न बदला  भगवान

 कितना बदल गया इंसान


 मोदी जी प्रधानमंत्री

 हम लोग क्या करें केसीसी भी  बैंक नहीं बना रही है बताइए हम लोग कैसे जिएं पित्र पक्ष की चतुर्दशी व  आज अमावस्या भी है माता पिता को प्रणाम करते हुए बड़े बाबा कोटवा धाम को प्रणाम करता हूं एवं अपने समस्त  पूर्वजों को प्रणाम करते हुए अपने दिल की बात करता हूं बात अच्छी लगे तो लाइक कर दीजिएगा या शेयर कर दीजिएगा हमने तो आपको चुना था आपने हमको दुत्कार दिया ऐसा न करें इसका परिणाम जनता आपको देगी। आप मन की बात करते हैं हम आपसे दिल की बात कर रहे हैं: आज लोग भटक रहे हैं मैं भटक रहा हूं जनता भी भटक रही है।

एक आम आदमी की तरह से बात कर रहा हूँ।

दिल की बात  अपने दोस्तों से साझा कर रहा हूं इसमें कोई पार्टी की बात नहीं है दिल की बात कर रहा हूं।

जय हिंद।

जय भारत। यह वीडियो वाइरल करने के बाद संजय शुक्ला पुत्र स्वर्गीय शेष नारायण शुक्ला के बेटे ने आत्महत्या कर ली है।

बाराबंकी मैं आत्महत्याओं का दौर जारी है योगी मोदी सरकार को दृष्टि दोष के कारण नहीं दिखता है।

मुंशीगंज बाराबंकी