शुक्रवार, 6 मार्च 2015

प्रगतिशील और स्वतंत्र विचारों की नागपुरी हत्या

 कोल्हापुर के साबरमल इलाके में 16 फरवरी, सोमवार की सुबह भाकपा महाराष्ट्र के पूर्व राज्य सचिव, केन्द्रीय कन्ट्रोल कमीशन के सचिव और राष्ट्रीय परिषद सदस्य
    इस हमले का महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों में जोरदार विरोध हुआ और समाज के सभी तबकों से आने वाले जाने माने लोगों एवं बुद्धिजीवियों ने इस हमले की निंदा की। समाज के प्रबुद्ध लोगों ने इसे प्रगतिशील विचारों पर हमला बताते हुए इसकी ना केवल कड़े शब्दों में निन्दा की बल्कि महाराष्ट्र और देश में स्वतंत्र, प्रगतिशील और जन समर्थक विचारों वाले लोगों पर बढ़ रही हमले की इन घटनाओं को महाराष्ट्र और देश के लिए एक खतरे की घण्टी बताया।
    बुद्धिजीवियों ने इस घटना में सरकार की संदिग्ध भूमिका पर सवाल उठाते हुए धर्मान्ध एवं सांप्रदायिक शक्तियों  के बढ़ते हुए आतंक को रेखांकित किया और इस घटना पर गंभीर चिंता व्यक्त की। विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना था कि जिन शक्तियों ने नरेन्द्र दाभोलकर जैसे तर्कशील विचारक के विचारों को खत्म करने की कोशिश की, इस हमले के पीछे भी उन्ही शक्तियों का हाथ है। इसे पूरे सभ्य समाज को शर्मसार करने वाली घटना बताते हुए अनेक प्रबुद्धजनों ने कहा कि गोविंद पानसरे अंधश्रद्धा उन्मूलन, सामाजिक न्याय और जनपक्षीय सवालों के लिए और सांप्रदायिकता के खिलाफ आजीवन लड़ने वाले व्यक्ति हैं और वर्तमान दौर में ऐसे संघर्षशील व्यक्ति पर हमले का अर्थ जनपक्षीय संघर्ष और जनवादी एवं धर्मनिरपेक्ष परंपरा पर हमला है। हाॅल ही में पानसरे जन विरोधी टोल टैक्स के खिलाफ अभियान चला रहे थे जिसके लिए उन्हे कईं बार धमकियाँ भी मिली थीं। इसके अलावा दो दिन पहले ही पानसरे ने एक कार्यक्रम में गांधी के हत्यारे गोड्से और उनका समर्थन करने वाले लोगों की कड़े शब्दों में निन्दा की थी। कार्यक्रम के बाद एक टीवी चैनल को दिये गए साक्षात्कार में उन्होंने पुरजोर शब्दों में प्रतिक्रियावादी आतंक की निन्दा करते हुए कहा था कि जो लोग तर्क का जवाब तर्क से नहीं दे सकते हैं वे ही तर्क का जवाब गोली से देते हैं और अंत में वे भी ऐसे ही किसी उन्मादी द्वारा चलाई गई गोली का शिकार हो गए। इसके अतिरिक्त पानसरे हेमंत करकरे की हत्या पर उनके द्वारा किए गए कुछ खुलासों को लेकर भी दक्षिणपंथियों के निशाने पर थे। राज्य सरकार इस पूरी घटना को केवल उनके टोल टैक्स अभियान से जोड़कर दुनिया के सामने पेश कर रही है। परंतु उसी राज्य में राज ठाकरे ने टोल टैक्स के खिलाफ अभियान चलाया और उत्तर प्रदेश में राकेश टिकैत और कई अन्य राज्यों में विभिन्न लोग ऐसे आंदोलनों की अगुवाई कर चुके हैं लेकिन उन पर कोई ऐसे हमले नहीं हुए। दरअसल यह उन दक्षिणपंथी आतंकवादियों की करतूत है जिनका सच हेमंत करकरे ने उजागर किया था और जिन्होंने दाभोलकर की हत्या की और अभी तक आजाद घूम रहे हैं।
    कामरेड गोविंद पानसरे के द्वारा दक्षिणपंथी ताकतों के खिलाफ चलाए जा रहे अथक अभियानों के कारण ही वे हमेशा प्रतिक्रियावादी संगठनों के निशाने पर रहे हैं। इन घोर दक्षिणपंथी ताकतों और कारपोरेट लूट के बीच व्यावसायिक गठजोड़ भी जगजाहिर है और इस हमले को देखते हुए दोनों के बीच साजिशपूर्ण गठजोड़ से भी इंकार नही किया जा सकता है। इस हमले की विभिन्न राजनैतिक दलों के नेताओं ने कड़ी निन्दा की है। एनसीपी के नेता शरद पवार ने हमले पर नाराजगी जाहिर करते हुए हमलावरों को तुरंत पकड़ने की माँग की। पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चैहान ने इसे दक्षिणपंथी ताकतों द्वारा धर्मनिरपेक्षता और जनवाद पर हमला बताया। इस घटना के बाद महाराष्ट्र और देशभर में प्रगतिशील लोगों में गुस्सा फूट पड़ा और हमले के विरोध में जगह जगह पर प्रदर्शन हुए।
    इस हमले के विरोध में स्वतःस्फूर्त तरीके से पूरा कोल्हापुर शहर बंद हो गया हजारों की भीड़ सड़कों पर उतर आई। 16 फरवरी को कामरेड पानसरे पर हुए हमले के विरोध से फूटे आक्रोश और प्रतिरोध आंदोलनों के साथ ही हिंदुत्ववादी संगठनों पर रोक की मांग से पूरी महाराष्ट्र सरकार हिल उठी है। 16 फरवरी को जहाँ कोल्हापुर बंद हो गया और लोग सड़कों पर उतर आए और लोगों ने गृहमंत्री का घेराव किया तो वहीं 17 फरवरी को भी इस हमले के विरोध में पूरा शहर विरोध प्रदर्शन में भाग लेने के लिए मानो सड़क पर उतर गया था। लडेंगे-जीतेंगे का नारा लिखे कामरेड गोविंद पानसरे की तस्वीर हाथों में लिए हजारों की संख्या में सड़कों पर उतरे लोगों से नगर का सारा जन जीवन ही मानो अस्त व्यस्त हो गया था। इसी प्रकार के प्रदर्शन महाराष्ट्र और देश के अन्य नगरों में भी हुए। मुम्बई में कम से कम तीन स्थानों पर वाम जनवादी दलों और जन संगठनों से जुड़े हुए लोगों ने सड़कों को जाम किया और भाजपा और संघी सरकार के विरोध में नारेबाजी की। 
औरंगाबाद
    औरंगाबाद में पैठण गेट पर प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शन के बाद जिलाधिकारी कार्यालय पर मोर्चा निकाला गया। इस प्रदर्शन में भाकपा के राज्य सचिव भालचंद्र कांगो, राम बाहेती, बुद्धिनाथ बराल, माकपा के पंडित मुंडे, सीटू के उद्धव भवलकर, भारिपा-बहुजन महासंघ के अविनाश डोलस, एड.बी.एच. गायकवाड, एड. रमेश भाई खंडागले, पंडितराव तुपे, पैंथर्स रिपब्लिकन पार्टी के नेता गंगाधर गाडे, आप के साथी सुभाष लोमटे, एड. नरेंद्र कापड़िया, उमाकांत राठौड, अभय टाकसाल, मधुकर खिल्लारे, विनोद फरकाडे., अशफाक सलामी, जयश्री गायकवाड़ समेत सैकड़ों कार्यकर्ता शामिल थे।
पुणे
     कम्युनिस्ट पार्टी नेता गोविंद पानसरे और उनकी पत्नी पर हुए हमले के खिलाफ विभिन्न संगठनों ने जिलाधिकारी कार्यालय के सामने प्रदर्शन किया। इसके बाद एक प्रतिनिधि मंडल ने जिलाधिकारी सौरभ राव को ज्ञापन सौंपा।
    फड़णवीस सरकार मुर्दाबाद, हम सब पानसरे, अपराधियों का सर्मथन करने वाली पुलिस हाय-हाय, जैसे नारों के साथ कार्यकर्ताओं ने पानसरे पर हमले का विरोध जताया। इस दौरान अजीत अभयंकर, सुनिति सुर, प्रा. म. ना. कांबले, अनूप अवस्थी, विठ्ठल सातव, अलका जोशी, किरण मोघे, मुक्ता मनोहर, विद्या बाल, किशोर ढमाले, मनीषा गुप्ते, संतोष म्हस्के, तृप्ति देसाई आदि मौजूद थे। अभ्यंकर ने बताया कि 19 फरवरी को शाम 5 बजे मंडई से रैली निकालकर हमले का विरोध किया जाएगा। इस वक्त गोविंद पानसरे की ‘शिवाजी कोण होता‘ पुस्तक की स्क्रीनिंग भी की जाएगी।
    गोविंद पानसरे पर हुए हमले के विरोध में पूरे महाराष्ट्र में लोगों में गुस्सा फूट पड़ा है और वे सड़कों पर उतर आए सोलापुर, औरंगाबाद, नान्देड़, बीड़, पुणे, नागपुर, अहमदनगर, मुम्बई, नासिक शहर और देहात के अलावा महाराष्ट्र का कोई भी जिला ऐसा नहीं था जहाँ पर इस हमले का प्रतिकार नहीं किया गया हो। कामरेड गोविंद पानसरे पर हमले के विरोध में पूरा कोल्हापुर शहर मानो ठप्प ही हो गया था। शहर में जब महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री पानसरे और उनकी पत्नी उमा पानसरे का हालचाल लेने पहँुचे तो हमले के कारण गुस्साए हजारों लोगों की भीड़ ने उन्हें घेर लिया और सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। इसके अलावा केरल से लेकर जम्मू कश्मीर तक देश के विभिन्न राज्यों में अनेक जन संगठनों ने बयानों द्वारा अथवा सड़क पर उतरकर इस हमले की तीव्र निन्दा की। दिल्ली
    गोविन्द पानसरे पर हुए जानलेवा हमले के खिलाफ पूरे देश में एआईएसएफ द्वारा प्रतिरोध जारी है। इस सिलसिले में महाराष्ट्र सरकार का पुतला फूँककर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय ने प्रतिरोध में एक कड़ी जोड़ी। इसके अलावा एआईएसएफ, एआईवायएफ और भाकपा सहित कई अन्य वाम संगठनों ने दिल्ली के महाराष्ट्र सदन पर प्रदर्शन कर अपने गुस्से का इजहार किया। इस प्रदर्शन का नेतृत्व विश्वजीत कुमार, अमित कुमार, संजीव कुमार राणा, अमीक जमई एवं आनन्द शर्मा ने किया।
    पानसरे की मृत्यु की खबर प्राप्त होने के बाद फिर से लोगों का आक्रोश फूट पड़ा और दिल्ली से लेकर केरल तक विरोध प्रदर्शनों की मानो झड़ी ही लग गई। एआईएसएफ और एआईवायएफ ने नई दिल्ली के नार्थ ब्लाॅक में गृहमंत्रालय पर प्रदर्शन किया जहाँ से उन्हें गिरफ्तार करके संसद मार्ग थाने भेज दिया गया था।        
गोविंद पानसरे व उनकी पत्नी उमा पानसरे पर अज्ञात बंदूकधारियों ने जानलेवा हमला किया। चार दिनों तक जीवन और मृत्यु के बीच जूझते कामरेड गोविंद पानसरे की 20 तारीख को मृत्यु हो गई। हमले के दो दिन बाद जब ऐसा लग रहा था कि पानसरे मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेंगे तो अचानक आस्तर आधार अस्पताल के डाॅक्टरों ने उन्हें आगे के इलाज के लिए मुम्बई के ब्रीच कैंडी अस्पताल ले जाने का फैसला किया। पानसरे को हवाई एम्बुलेंस के द्वारा मुम्बई के ब्रीच कैंडी अस्पताल ले जाया गया। पंरतु मुम्बई पहुँचने पर भी उनकी जान नहीं बचाई जा सकी और एक सांप्रदायिक फासिस्ट हमले में जनवाद और  धर्मनिरपेक्षता के लिए लड़ने वाला एक अथक योद्धा शहीद हो गया।
 -महेश राठी
मोबाइल: 0989153484
लोकसंघर्ष पत्रिका  मार्च 2015  में प्रकाशित

बुधवार, 4 मार्च 2015

उद्देशिका, धर्मनिरपेक्षता व संविधान

केंद्र सरकार द्वारा गणतंत्र दिवस पर जारी एक विज्ञापन पर विवाद खड़ा हो गया था। इस विज्ञापन में संविधान की उद्देशिका की जो छायाप्रति छापी गई थीए उसमें से 'समाजवाद' व 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द गायब थे। इस संबंध में भाजपा नेताओं का स्पष्टीकरण यह था कि वह, मूल संविधान की उद्देशिका की फोटो प्रति थी, जिसमें ये दोनों शब्द नहीं थे।
यह सही है कि 'समाजवाद' व 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द उद्देशिका में 42वें संशोधन के जरिये सन् 1976 में जोड़े गये थे। यह एक रहस्य बना रहेगा कि मूल संविधान की उद्देशिका का विज्ञापन में प्रकाशन सकारण था ;क्योंकि वह वर्तमान शासक दल की विचारधारा से मेल खाती है या फिर ऐसा केवल भूल से हुआ। संभावना यही है कि यह गलती नहीं थी क्योंकि शासक दल, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों में विश्वास नहीं करता और उसने इन संवैधानिक मूल्यों की कई अलग.अलग मौकों पर निंदा की है और मजाक बनाया है। जब प्रधानमंत्री मोदी ने जापान के सम्राट को गीता की प्रति भेंट की थी तब उन्होंने धर्मनिरपेक्षतावादियों का मखौल बनाते हुए कहा था कि वे इस मुद्दे पर तूफान खड़ा कर देंगे और टीवी पर बहसों का तांता लग जायेगा।
गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान और हरियाणा की भाजपा सरकारें, स्कूलों के पाठ्यक्रमों में हिंदू धार्मिक पुस्तकों के अंश शामिल कर रही हैं और सरस्वती वंदना व सूर्य नमस्कार जैसे हिंदू धार्मिक अनुष्ठानों को अनिवार्य बना रही हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 28 व 29 का उल्लंघन है। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन,ऊंची जातियों की परंपराओं को देश पर लादने की कोशिश कर रहे हैं और भाजपा सरकारें इस प्रयास को अनदेखा कर रही हैं। ये संगठन उन सभी कलात्मक अभिव्यक्तियोंए फिल्मों, विचारों व सोच पर हिंसक हमले कर रहे हैं, जिनसे वे सहमत नहीं हैं। वे अल्पसंख्यकों को जबरदस्ती हिंदू बनाने का प्रयास कर रहे हैं और हिंदुओं द्वारा अन्य धर्मों को अंगीकार करने के प्रयासों को बल प्रयोग से रोक रहे हैं। वे वैलेंटाइन डे सहित कई त्योहारों और उत्सवों के विरोधी हैं। वे अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैला रहे हैं, जिसके कारण छोटे.बड़े शहरों में अलग.अलग धर्मों के लोगों के अलग.अलग मोहल्ले बसने लगे हैं। वे हिंदू ऊँची जातियों की खानपान की आदतों को जबरदस्ती पूरे देश पर लादने का प्रयास कर रहे हैं। इस अभियान के तहत वे मवेशियों को ढोने वाली गाडि़यों को जबरदस्ती रोकते हैं, मवेशियों को अपने कब्जे में ले लेते हैं व बूचड़खानों के सामने प्रदर्शन आदि करते हैं। वे चाहते हैं कि देश में विवाह और मित्रता भी हिंदू सामाजिक पदानुक्रम के अनुरूप हों। हिंदू राष्ट्रवादी संगठन, गैर.हिंदुओं के बारे में दुष्प्रचार कर समाज को सांप्रदायिक आधार पर विभाजित कर रहे हैं। अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे युवाओं को उनकी पसंद के जीवनसाथी और मित्र चुनने के अधिकार से भी वंचित करने की कोशिश कर रहे हैं और शिक्षा संस्थानों, मीडिया व खाप पंचायतों आदि की मदद से एक विशिष्ट संस्कृति का प्रचार कर रहे हैं और उसे श्रेष्ठतम बता रहे हैं। यह सब संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ है और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत का उल्लंघन है।
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए सकारात्मक प्रयास, जिसमें उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के साथ.साथ उनकी संस्कृति की रक्षा करना भी शामिल है। भाजपा सरकारए समाज के वंचित तबकों,जो पारंपरिक रूप से जाति.आधारित हिंदू सामाजिक व्यवस्था से बाहर थेए कि बेहतरी के किसी भी प्रयास की विरोधी है। स्वतंत्र बाजार की अवधारणा में विश्वास रखने वाले ये लोगए संसाधनों के बंटवारे का नियंत्रण बाजार के हाथ में देकर, सामंती, जातिगत व लैंगिक ऊँचनीच को बढ़ावा देना चाहते हैं। जब संसाधनों का वितरण बाजार से नियंत्रित होता है तब उससे सबसे अधिक लाभ उन वर्गों को होता है जिनका बाजार पर  प्रभुत्व है। 'मेक इन इंडिया' व 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' आदि जैसे अभियानों के जरिए और श्रम कानूनों में संशोधन कर, नियोक्ताओं के लिए कर्मचारियों को नौकरी से हटाना आसान बना दिया गया है। उद्योगों को बढ़ावा देने के नाम पर पर्यावरणीय मुद्दों की अनदेखी की जा रही है और बड़े व्यवसायिक घरानों को मजदूरों का शोषण करने और किसानों की जमीनों पर जबरदस्ती कब्जा करने की खुली छूट दे दी गई है। इसके लिए एक नये भूमि अधिग्रहण कानून को लागू करने की तैयारी चल रही है जिसके अंतर्गत किसानों को अपनी जमीन मिट्टी के मोल बेचने पर मजबूर होना पड़ेगा। इस तरहए भाजपा समाजवाद की विरोधी भी है।
यद्यपि यह तथ्य है कि'धर्मनिरपेक्ष' व 'समाजवाद' शब्द संविधान सभा द्वारा स्वीकृत संविधान की उद्देशिका के हिस्से नहीं थे परंतु प्रश्न यह है कि क्या स्नातक परीक्षा पास करने के बाद, आप किसी से यह कहते हैं कि आपकी शैक्षणिक योग्यता 12वीं है ? क्या आप अपने ड्रायविंग लायसेंस या पासपोर्ट पर अपने बचपन की फोटो चिपकाते हैं
इसी तरह, हमने, एक लंबी लड़ाईए जिसमें हजारों लोगों ने अपना जीवन खपा दिया, हजारों ने शारीरिक कष्ट भोगे और अपनी जानें गंवाईं, के बाद स्वतंत्रता हासिल की है। हम आज एक प्रजातांत्रिक, समाजवादी,धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र हैं। क्या अब हम अपने अतीत का कोई चित्र निकालकर यह घोषणा कर सकते हैं कि हम हिंदू राष्ट्र हैं और हमारा संविधान यह नहीं कहता कि हम समाजवादी व धर्मनिरपेक्ष हैं? हिंदू राष्ट्र, अनिवार्यतः धर्मनिरपेक्षता.विरोधी होगा। हम यह देख रहे हैं कि किस तरह हिंदू राष्ट्र की विचारधारा को हिंदू महिलाओं, आदिवासियों, दलितों, श्रमिकों और उदारवादियों पर जबरदस्ती थोपा जा रहा है।
यद्यपि धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी शब्द हमारे संविधान में बाद में जोड़े गये थे तथापि हमारे संविधान निर्माताओं के मन में इस संबंध में कोई संदेह नहीं था कि वे एक धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी संविधान का निर्माण कर रहे हैं। उन्होंने इन शब्दों का इस्तेमाल जानते.बूझते नहीं किया। उस समय धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म का विरोध नहीं तो कम से कम अधार्मिकता अवश्य समझा जाता था। इसके विपरीत, हमारे संविधान निर्माताओं के लिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धार्मिक विश्वासों से दूरी बनाना या उनका विरोध करना नहीं बल्कि अपने पसंद के किसी भी धर्म को मानने, उसका आचरण करने व उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता था। लोकनाथ मिश्र ने संविधान सभा की एक बैठक में पूछा था कि जब अनुच्छेद 19 ;संविधान के अंतिम मसविदे का अनुच्छेद 25,नागरिकों को अपने धर्म का प्रचार करने का अधिकार देता है तब धर्मनिरपेक्ष शब्द का इस्तेमाल संविधान में कैसे किया जा सकता है! दक्षिणपंथी तत्वों के कड़े विरोध के बाद भी, संविधान में किसी भी धर्म को मानने व उसका आचरण करने के साथ.साथ उसका प्रचार करने का अधिकार भी नागरिकों को दिया गया।
एच व्ही कामथ चाहते थे कि उद्देशिका इन शब्दों से शुरू हो ''ईश्वर के नाम पर हम भारत के लोग''। ए थानू पिल्लई ने कामथ के इस संशोधन के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि यह आस्था की स्वतंत्रता के विरूद्ध होगा। रोहिणी कुमार चौधरी, कामथ के संशोधन में एक और संशोधन करना चाहते थे। उनका कहना था कि संविधान इन शब्दों से शुरू होना चाहिएए 'देवी के नाम पर'। पंडित हृदयनाथ कुंजरू ने भी कामथ के संशोधन का विरोध करते हुए कहा कि ईश्वर के नाम से संविधान की शुरुआत करना, ईश्वर को लोगों पर लादने के बराबर होगा और यह संविधान द्वारा हर एक को दी गई विचार, अभिव्यक्ति, आस्था, विश्वास और आराधना की स्वतंत्रता का उल्लंघन होगा। कामथ ने अपने संशोधन प्रस्ताव पर मतदान कराने पर जोर दिया। उसके पक्ष में 41 और विपक्ष में 68 वोट पड़े। इसी तरह, कामथ के संशोधन के अन्य रूपांतरों, जिनमें 'परमेश्वर के नाम पर','सर्वशक्तिमान की कृपा से' से संविधान के शुरुआत करने की बात कही गई थी आदि भी ध्वनिमत से अस्वीकार कर दिए गए। ब्रजेश्वर प्रसाद ने जोर देकर कहा कि धर्मनिरपेक्ष शब्द, संविधान का हिस्सा बनना चाहिए क्योंकि राष्ट्रीय नेताओं ने धर्मनिरपेक्षता पर बहुत जोर दिया था और इससे 'अल्पसंख्यकों' का मनोबल बढ़ेगा।
इस तरहए यद्यपि 'धर्मनिरपेक्ष' शब्द संविधान की उद्देशिका में शामिल नहीं किया गया क्योंकि उस समय उसका अर्थ, आज के उसके अर्थ से बहुत भिन्न था परंतु साथ ही संविधान सभा ने 'ईश्वर के नाम पर' आदि जैसे शब्दों से संविधान की शुरुआत करने के प्रस्ताव को खारिज कर यह संदेश भी दिया कि वह एक मध्यमार्ग पर चलने की इच्छुक है।
इसी तरह, कई संशोधनों द्वारा यह प्रस्ताव किया गया था कि 'समाजवाद'शब्द उद्देशिका में शामिल किया जाए। धर्मनिरपेक्षता की तरह,उस काल में समाजवाद शब्द का अर्थ भी उसके आज के अर्थ से बहुत भिन्न था। उस समय समाजवाद का अर्थ था उत्पादन के सभी साधनों पर राज्य का नियंत्रण और संपत्ति के निजी स्वामित्व का उन्मूलन। उस समय ये नीतियां अपनाना, भारत के लिए संभव नहीं था। मौलाना हसरत मोहानी ने प्रस्तावित किया कि उद्देशिका में भारत को सोवियत संघ की तर्ज पर'भारतीय समाजवादी गणतंत्रों का संघ' कहा जाना चाहिए। शिब्बन लाल सक्सेना के संशोधन प्रस्ताव में अन्य चीजों के अलावा, इन शब्दों को उद्देशिका में शामिल करने की बात कही गई थी.'भारत को सर्वप्रभुता सम्पन्न, स्वतंत्र, प्रजातांत्रिक,समाजवादी गणतंत्र'। ब्रिजेश्वर प्रसाद चाहते थे कि 'भारत को समाजवादी व्यवस्था स्थापित करने के लिए सहकारी राष्ट्रमंडल के रूप में' इन शब्दों से उद्देशिका शुरू हो। परंतु ये सभी संशोधन खारिज हो गए।
संविधान में महिलाओं, बच्चों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों व सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े अन्य वर्गों की बेहतरी के लिए सकारात्मक कदम उठाये जाने से संबंधित प्रावधान शामिल किए गए। संविधान के निर्माताओं ने संविधान के भाग.चार में राज्य के नीतिनिदेशक तत्वों को शामिल किया, जिसमें अन्य चीजों के अलावा यह कहा गया है कि राज्य अपनी नीतियों का इस तरह संचालन करेगा कि 'जिससे  समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो, जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो' ;अनुच्छेद 39 'ख' व 'आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले कि धन और उत्पादन.साधनों का सर्वसाधारण के लिए अहितकारी संकेंद्रण न हो' ;अनुच्छेद 39 'ग'। संविधान पूरी तरह तैयार हो जाने के बाद 25 नवंबर को संविधान सभा में दिये गए अपने भाषण में डॉ. आंबेडकर ने संविधान को 'सामाजिक प्रजातंत्र' का वाहक बताया। उन्होंने कहाए 'हमें अपने राजनीतिक प्रजातंत्र को सामाजिक प्रजातंत्र भी बनाना होगा। राजनैतिक प्रजातंत्र, लंबे समय तक नहीं चल सकेगा,यदि उसका आधार सामाजिक प्रजातंत्र नहीं होगा।'
संविधान सभा ने संविधान में 'समाजवादी' व 'धर्मनिरपेक्षता' शब्दों को शामिल करने की जिम्मेदारी आने वाली पीढि़यों के लिए छोड़ दी। सभा में अपने अंतिम भाषण में डॉ. आंबेडकर ने जैफरसन को उद्धत करते हुए कहाए 'हम हर पीढ़ी को एक अलग राष्ट्र मान सकते हैं,जिसे बहुमत के आधार पर, किसी भी सिद्धांत या मूल्य को अंगीकृत करने का अधिकार होगा। एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी पर किसी भी तरह के बंधन लादने का अधिकार उसी प्रकार नहीं है, जिस प्रकार एक राष्ट्र को दूसरे राष्ट्र के निवासियों पर अपने मूल्य या सिद्धांत लादने का'।
डॉ. आंबेडकर को यह एहसास था कि भारत एक ऐसे संविधान को अंगीकार कर रहा है जो सभी नागरिकों को समान अधिकार देता है जबकि भारत में घोर सामाजिक असमानता व्याप्त है। '26 जनवरी 1950 को हम एक विरोधाभासों से भरे जीवन में प्रवेश करेंगे। राजनीति में समानता होगी परंतु सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता का बोलबाला होगा। राजनीति में हम एक व्यक्ति एक वोट और हर वोट की बराबर कीमत के सिद्धांत को स्वीकार करेंगे। दूसरी ओर,हमारे सामाजिक और आर्थिक ढांचे के कारण, हमारे सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम हर व्यक्ति के मत की समान कीमत के सिद्धांत का उल्लंघन करेंगे। इस तरह के विरोधाभासों के बीच हम कब तक जियेंगे ? कब तक हम अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में समानता नहीं लायेंगे ? अगर हम लंबे समय तक लोगों को सामाजिक और आर्थिक समानता से वंचित रखेंगे तो हम अपने राजनैतिक प्रजातंत्र को खतरे में डालेंगे। हमें इस विरोधाभास को जितनी जल्दी हो सके, उतनी जल्दी खत्म करना होगा। अन्यथा जो लोग असमानता से पीडि़त हैं, वे इस सभा द्वारा कठिन परिश्रम से तैयार किये गए राजनीतिक प्रजातंत्र के ढांचे को तहस नहस कर देंगे।'
हमें डॉ.आंबेडकर के इन प्रबुद्ध वचनों को याद रखना होगा। भारत में जिस तेजी से आर्थिक और सामाजिक असमानताएं बढ़ रही हैं, वह गंभीर चिंता का विषय है। आखिर कब तक हम हिंदुत्व की विचारधारा का प्रयोग कर उन लोगों को, जो समाज के हाशिये पर पड़े हैं और निर्धनता से पीडि़त हैंए यह विश्वास दिलाते रहेंगे कि समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता उनके ;हिंदू हितों के विरूद्ध है। दिल्ली के चुनाव में आप की शानदार विजय का संदेश यही है कि आमजनों को ज्यादा लंबे समय तक ऐसे विकास के मोहजाल में, फंसाकर रखना संभव नहीं होगा, जो केवल कुछ उद्योगपतियों के खजाने भरता हो।
-इरफान इंजीनियर

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

गोविंद पंसारे,गरिमा,मानवाधिकारों व तर्कवाद के योद्धा

गत 20 फरवरी को,जब कामरेड गोविंद पंसारे की मृत्यु की दुखद खबर आई, तो मुझे ऐसा लगा मानो एक बड़ा स्तंभ ढह गया हो.एक ऐसा स्तंभ जो महाराष्ट्र के सामाजिक आंदोलनों का शक्ति स्त्रोत था। मेरे दिमाग में जो पहला प्रश्न आया वह यह था कि उन्हें किसने मारा होगा और इस तरह के साधु प्रवृत्ति के व्यक्ति की जान लेने के पीछे क्या कारण हो सकता है। ज्ञातव्य है कि कुछ दिन पहलेए सुबह की सैर के वक्त उन्हें गोली मार दी गई थी। पंसारे ने जीवनभर हिंदुत्ववादियों और रूढि़वादी सोच के खिलाफ संघर्ष किया। पिछले माह, कोल्हापुर के शिवाजी विश्वविद्यालय में भाषण देते हुए उन्होंने भाजपा द्वारा गोडसे को राष्ट्रवादी बताकर उसका महिमामंडन किया जाने का मुद्दा उठाया था। पंसारे ने श्रोताओं को याद दिलाया कि गोडसे, आरएसएस का सदस्य था। इस पर श्रोताओं का एक हिस्सा उत्तेजित हो गया।
उन्हें'सनातन संस्था' नाम के एक संगठन के कोप का शिकार भी होना पड़ा था। पंसारे का कहना था कि यह संस्था हिंदू युवकों को अतिवादी बना रही है। यह वही संगठन है, ठाणे और गोवा में हुए बम धमाकों में जिसकी भूमिका की जांच चल रही है। पंसारे ने खुलकर इस संस्था को चुनौती दी, जिसके बाद संस्था द्वारा उनके खिलाफ मानहानि का दावा भी किया गया।
डॉ. नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या के कुछ माह बाद, पंसारे को एक पत्र के जरिये धमकी दी गई थी। पत्र में लिखा था'तुमचा दाभोलकर करेन' ;तुम्हारे साथ वही होगा, जो दाभोलकर के साथ हुआ। उन्हें ऐसी कई धमकियां मिलीं परंतु वे उनसे डरे नहीं और उन्होंने मानवाधिकारों और तर्कवाद के समर्थन में अपना अभियान जारी रखा। वे समाज के सांप्रदायिकीकरण के विरूद्ध अनवरत लड़ते रहे। शिवाजी के चरित्र के उनके विश्लेषण के कारण भी पंसारे,अतिवादियों की आंखों की किरकिरी बन गए थे। जब 15 फरवरी को उन पर हमले की खबर मिली तो मुझे अनायास पिछले साल पुणे में उनके द्वारा शिवाजी पर दिये गये भाषण की याद हो आई। खचाखच भरे हाल में पंसारे ने शिवाजी के जीवन और कार्यों पर अत्यंत विस्तार से और बड़े ही मनोरंजक तरीके से प्रकाश डाला था। श्रोताओं ने उनके भाषण को बहुत रूचि से सुना और उनकी बहुत तारीफ हुई।
शिवाजी की जो छवि वे प्रस्तुत करते थेए वह 'जानता राजा' ;सर्वज्ञानी राजा जैसे शिवाजी पर आधारित नाटकों और सांप्रदायिक तत्वों द्वारा शिवाजी के कार्यकलापों की व्याख्या से एकदम अलग थी। सांप्रदायिक तत्व, शिवाजी को एक मुस्लिम.विरोधी राजा के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यह कहा जाता है कि अगर शिवाजी न होते तो हिंदुओं का जबरदस्ती खतना कर उन्हें मुसलमान बना दिया जाता। पंसारे ने गहन अनुसंधान कर शिवाजी का असली चरित्र अपनी पुस्तक 'शिवाजी कौन होता' में प्रस्तुत की। यह पुस्तक बहुत लोकप्रिय हुई। इसके कई संस्करण निकल चुके हैं और यह कई भाषाओं में अनुदित की जा चुकी है। अब तक इसकी लगभग डेढ़ लाख प्रतियां बिक चुकी हैं। अपने भाषण में पंसारे ने अत्यंत तार्किक तरीके से यह बताया कि किस तरह शिवाजी सभी धर्मों का आदर करते थे, उनके कई अंगरक्षक मुसलमान थे, जिनमें से एक का नाम रूस्तम.ए.जमां था, उनके राजनीतिक सचिव मौलाना हैदर अली थे और शिवाजी की सेना के एक.तिहाई सिपाही मुसलमान थे। शिवाजी के तोपखाने के मुखिया का नाम था इब्राहिम खान। उनके सेना के कई बड़े अधिकारी मुसलमान थे जिन्हें आज भी महाराष्ट्र में बडे़ प्रेम और सम्मान के साथ याद किया जाता है।
एक साम्यवादी द्वारा एक सामंती शासक की प्रशंसा! यह विरोधाभास क्यों, इस प्रश्न का उत्तर अपने भाषण में उन्होंने जो बातें कहीं, उससे स्पष्ट हो जाता है। उन्होंने तथ्यों के आधार पर यह प्रमाणित किया कि शिवाजी अपनी रैयत की बेहतरी के प्रति बहुत चिंतित रहते थे। उन्होंने किसानों और कामगारों पर करों का बोझ कम किया था। पंसारे जोर देकर कहते थे कि शिवाजी, महिलाओं का बहुत सम्मान करते थे। वे बताते थे कि किस प्रकार शिवाजी ने कल्याण के मुस्लिम राजा की बहू को सम्मानपूर्वक वापस भिजवा दिया था। कल्याण के राजा को हराने के बादए शिवाजी के सैनिक लूट के माल के साथ राजा की बहू को भी अगवा कर ले आये थे। यह किस्सा महाराष्ट्र में बहुत लोकप्रिय है। परंतु हिंदुत्व चिंतक सावरकर, कल्याण के राजा की बहू को सम्मानपूर्वक उसके घर वापस भेजने के लिए शिवाजी की आलोचना करते हैं। सावरकर का कहना था कि उस मुस्लिम महिला को मुक्त कर शिवाजी ने मुस्लिम राजाओं द्वारा हिंदू महिलाओं के अपमान का बदला लेने का मौका खो दिया था!
पंसारे स्वयं यह स्वीकार करते थे कि शिवाजी की उनकी जीवनी ने उनके विचारों को आम लोगों तक पहुंचाने में बहुत मदद की। वे बहुत साधारण परिवार में जन्मे थे और उन्होंने अपना जीवन अखबार बेचने से शुरू किया था। शिवाजी पर उनकी अत्यंत लोकप्रिय पुस्तक के अलावाए उन्होंने 'अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण',छत्रपति शाहू महाराज, संविधान का अनुच्छेद 370 और मंडल आयोग जैसे विषयों पर भी लेखन किया था। इससे यह साफ है कि उनका अल्पसंख्यकों के अधिकारो,जातिवाद आदि जैसे मुद्दों से भी गहरा जुड़ाव था। वे जनांदोलनों से भी जुड़े थे और कोल्हापुर में टोल टैक्स के मुद्दे पर चल रहे आंदोलन में उनकी अग्रणी भूमिका थी।
कामरेड पंसारे ने स्वयं को मार्क्स और लेनिन की विचारधारा की व्याख्या तक सीमित नहीं रखा। यद्यपि वे प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट थे परंतु शिवाजी, शाहू महाराज और जोतिराव फुले भी उनके विचारधारात्मक पथप्रदर्शक थे। वे यह मानते थे कि शाहू महाराज और फुले ने समाज में समानता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। वे स्वयं भी जातिवाद और धार्मिक अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करते थे और इन विषयों पर अपने प्रबुद्ध विचार लोगों के सामने रखते थे। एक तरह से उन्होंने भारतीय वामपंथियों की एक बहुत बड़ी कमी की पूर्ति करने की कोशिश की। प्रश्न यह है कि साम्यवादी आंदोलन ने जातिगत मुद्दों पर क्या रूख अपनाया ? पंसारे जैसे कम्युनिस्टों ने जाति के मुद्दे पर फोकस किया और दलित.ओबीसी वर्गों के प्रतीकों.जिनमें शाहू महाराज, जोतिराव फुले व आंबेडकर शामिल हैं.से स्वयं को जोड़ा। परंतु दुर्भाग्यवश,वामपंथी आंदोलन ने इन मुद्दों को कभी गंभीरता से नहीं लिया। भारत जैसे जातिवाद से ग्रस्त समाज में कोई भी सामाजिक आंदोलन तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक कि उसमें जाति के कारक को समुचित महत्व न दिया जाए। उनके जीवन से हम यह सीख सकते हैं कि भारत में सामाजिक परिवर्तनकामियों को अपनी रणनीति में क्या बदलाव लाने चाहिए।
पंसारे पर हुए हमले ने डॉ. नरेंद्र दाभोलकर की हत्या की याद फिर से ताजा कर दी है। दक्षिणपंथी ताकतें अपने एजेंडे को लागू करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। उनकी हिम्मत बहुत बढ़ चुकी है। दाभोलकर और पंसारे असाधारण सामाजिक कार्यकर्ता थे। दोनों तर्कवादी थे, अंधविश्वासों के विरोधी थे और जमीन पर काम करते थे। दोनों पर हमला मोटरसाईकिल पर सवार बंदूकधारियों ने तब किया जब वे सुबह की सैर कर रहे थे। दोनों को उनकी हत्या के पहले सनातन संस्था और अन्य दक्षिणपंथी संगठनों की ओर से धमकियां मिलीं थीं।
कामरेड पंसारे की हत्या के बाद पूरे महाराष्ट्र में गुस्से की एक लहर दौड़ गई। राज्य में अनेक स्थानों पर विरोध प्रदर्शन हुए। ये विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रतीक थे कि आमजन उन्हें अपना साथी और हितरक्षक मानते थे। क्या हमारे देश के सामाजिक आंदोलनों के कर्ताधर्ताए कामरेड पंसारे के अभियान को आगे ले जायेंगे? यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
-राम पुनियानी

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

सांप्रदायिक हिंसा 2014.गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना,कर्नाटक व असम

गुजरात
गुजरात में 2014 में 59 सांप्रदायिक घटनाएं हुईं, जिनमें 8 लोग मारे गये और 372 घायल हुए। मई में नरेन्द्र मोदी की आमचुनाव में बड़ोदा से विजय के बाद, अनेक नेताओं द्वारा भड़काऊ वक्तव्य दिये जा रहे थे। इन लोगों के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा कोई कार्यवाही नहीं की जा रही थी। बड़ोदा में उपचुनाव होने थे क्योंकि नरेंद्र मोदी ने इस लोकसभा क्षेत्र से इस्तीफा देकर, वाराणसी का सांसद बने रहने का निर्णय किया था। उपचुनाव में भारी अंतर से जीत सुनिश्चित करने के लिए सांप्रदायिकता की आग को जलाए रखना आवश्यक था। सितंबर में विहिप नेताओं ने यह कहना शुरू किया कि गरबा में मुसलमान युवकों का स्वागत नहीं है। उन्होंने कहा कि गरबे में आने वाले मुस्लिम युवक, हिंदू लड़कियों को अपने प्रेम जाल में फंसा लेते हैं। ये नेता इसे लव जिहाद बताते थे। भडूच जिले के विहिप अध्यक्ष विरल देसाई ने यह घोषणा की कि मुसलमानों के धार्मिक स्थलों पर गरबे का आयोजन किया जायेगा।
विहिप व बजरंगदल के नेताओं द्वारा बिना किसी आधार, के बार.बार मुसलमानों पर यह आरोप लगाने से कि वे गोवध कर रहे हैं, मुस्लिम समुदाय के खिलाफ वातावरण बन गया। विहिप ने अहमदाबाद के सांप्रदायिक दृष्टि से संवेदनशील दरियापुर इलाके में गोवध के खिलाफ प्रदर्शन किया। दंगों से प्रभावित लोगों ने आरोप लगाया कि विहिप और पुलिसकर्मियों के बीच की सांठगांट से हिंसा भड़की। पुलिसकर्मी, विहिप से जुड़े 'गोरक्षकों' को समय.समय पर सूचनाएं देते रहते थे, जिनके आधार पर झूठे आरोप लगाकर निर्दोष मुसलमानों के खिलाफ मनमानी और गैर.कानूनी कार्यवाहियां की जाती थीं। पुलिसकर्मियों और विहिप कार्यकर्ताओं ने नवसारी जिले के मुस्लिम.बहुल ढाबेल गांव में छापा मारा और गोमांस बेचने के आरोप में कुछ लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। अकेले अहमदाबाद शहर में 62'गोरक्षक दल' थे, जिनमें से हर एक के चार.पांच सदस्य थे। ये लोग शहर के प्रवेश बिंदुओं पर डेरा जमा लेते थे और पुलिस के साथ समन्वय कर अपनी बेजा कार्यवाहियों को अंजाम देते थे।
25 मई को दो हिंसक गुटों के बीच पत्थरबाजी हुई,जिसके बाद कई दुकानों और वाहनों में आग लगा दी गई। इस हिंसा में चार लोग घायल हुए। हिंसा की शुरूआत तब हुई जब एक बारात निकलने के दौरान, दो अलग.अलग समुदायों के सदस्यों की कारों में भिडंत हो गई।
बड़ोदा में 25 से 30 सितंबर तक सांप्रदायिक हिंसा हुई। हिंसा की शुरूआत तब हुई जब एक निजी ट्यूशन क्लास के हिंदू मालिक ने एक मुस्लिम पवित्र स्थल का अपमान करते हुए एक फोटो, सोशल नेटवर्किंग साईट पर अपलोड कर दी। क्लास के मुस्लिम विद्यार्थियों ने पुलिस कमिश्नर से इसकी शिकायत की। जब वे शिकायत कर लौट रहे थे तब एक छोटी सी घटना के बाद उनमें और कुछ वकीलों में विवाद हो गया, जो जल्दी ही हिंसा में बदल गया। हिंसा, फतेहपुरा और हाथीखाना इलाकों में फैल गई। पंजरीगर मोहल्ले में ट्यूशन क्लास की इमारत में तोड़फोड़ की गई और दोनों समुदायों की ओर से पत्थरबाजी हुई। वाहनों को जला दिया गया और दुकानों को लूटा गया। 26 सितंबर को हिंसा और भड़क उठी और एक मुस्लिम को चाकू मारकर घायल कर दिया गया। दस अन्य लोग भी घायल हुए।
26 नवंबर को सोमनाथ में शिव पुलिस चौकी के नजदीक, लगभग 8रू30 बजे, हिंसा की शुरूआत हुई। झगड़ा दस रूपए के एक नोट को लेकर प्रारंभ हुआ, जिस पर एक मुसलमान और एक कोली दोनों अपना दावा जता रहे थे। बहसबाजी के बाद हाथापाई शुरू हो गई और मुसलमान युवक के सिर पर किसी ने एक टिफिन बॉक्स दे मारा। इससे उसे चोट आई और उसके सिर से खून बहने लगा। दोनों समुदायों के बुजुर्गों ने हस्तक्षेप किया और लड़ने वालों को अलग.अलग कर अपने.अपने घर भेज दिया। इसके करीब आधा घंटे बादए शांतिनगर के कोली इकट्ठा हो गये और सड़क के उस पार बनी मुस्लिम बस्ती पर पत्थर फेंकने लगे। सड़क पर खड़ी कुछ मोटरसाइकिलों को भी जला दिया गया।
महाराष्ट्र
    महाराष्ट्र में सन् 2014 में साप्रदायिक हिंसा की 82 घटनाएं हुईं, जिनमें 12 लोग मारे गये और 165 घायल हुए। सन् 2014 में महाराष्ट्रए सांप्रदायिक घटनाओं के मामले में उत्तरप्रदेश के बाद दूसरे नंबर पर रहा। अक्टूबर तक वहां कांग्रेस का शासन था और विधानसभा चुनाव के बाद, राज्य में भाजपा ने अपनी सरकार बनाई। घटनाएं छोटी.छोटी थीं परंतु राज्य का कोई क्षेत्र इनसे अछूता नहीं रहा। मुख्यतः यह हिंसा पश्चिमी महाराष्ट्र में केंद्रित थी। सन् 2014 में राज्य में लोकसभा व विधानसभा दोनों ही चुनाव होने थे। एनडीए व यूपीए और यूपीए के अंदर कांग्रेस व एनसीपी के बीच मराठा मतों के लिए धमासान मचा हुआ था। मराठा,महाराष्ट्र की आबादी का लगभग 50 प्रतिशत हैं। यूपीए के समर्थक मुख्यतः मराठा, मुसलमान और महार थे। एनडीए ने ओबीसी व महारों के एक तबके को अपने पक्ष में कर लिया था और वह मराठाओं को अपने साथ लेने के लिए आक्रामक अभियान चला रही थी। मराठाओं को कांग्रेस से तोड़कर भाजपा के साथ लाने के लिए सांप्रदायिकता का खुलकर इस्तेमाल किया गया। कांग्रेस ने इस घोर सांप्रदायिक अभियान का विरोध इसलिए नहीं किया क्योंकि उसे यह डर था कि इससे उसकी छवि मुस्लिम.समर्थक की बन जायेगी व वह हिंदुओं के वोट खो देगी। पार्टी की सरकार ने उन हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की जो मुसलमानों के विरूद्ध जहर उगल रहे थे और छोटे स्तर पर हिंसा भी भड़का रहे थे।
    पुणे में मई की 31 तारीख को धनंजय देसाई नामक व्यक्ति के नेतृत्व में हिंदू राष्ट्र सेना के कार्यकर्ताओं ने बसों में तोड़फोड़ और आग लगानी शुरू कर दी। हिंसा पर उतारू इस भीड़ ने दुकानों और मकानों पर पत्थर फेंके और कई दुकानों को लूटकर उनमें आग लगा दी। पुणे और उसके आसपास स्थित मुसलमानों के धार्मिक स्थलों को भी निशाना बनाया गया। शहर के हुंडेवाणी इलाके में दो मदरसों और दो मस्जिदों पर हमला हुआ। आरोप यह था कि बालठाकरे और शिवाजी को अपमानित करते हुए फेसबुक पर एक पोस्ट किया गया है। लगभग 250 सरकारी बसों को नुकसान पहुंचा। नेशनल कान्फिडेरेशन ऑफ हृयूमन राईट्स आर्गेनाईजेशंस की एक रपट के अनुसार,  फेसबुक पोस्ट और उसके बाद हुए दंगे.दोनों ही पूर्वनियोजित थे। लोनी में इस हिंदुत्व संगठन के 35 हथियारबंद गुंडों ने, जो मोटरसाइकिलों पर सवार थे, रोज बेकरी, बैंग्लोर बेकरी और महाराष्ट्र बेकरी में तोड़फोड़ की। इन तीनों के मालिक मुसलमान थे। रोज बेकरी से 35,000 रूपए नगद लूट लिए गये।
    पुलिस ने हमलावरों के विरूद्ध कड़ी कार्यवाही नहीं की और नतीजे में दो जून को उन्होंने और बड़ा हमला किया। काले पड़ेल, सैय्यद नगर व हादपसर बाजार में कई बेकरियों, दुकानों और होटलों में तोड़फोड की गई और उनमें आग लगा दी गई। बिस्कुट, केक आदि बनाने वाली मशीनों, फ्रीजरोंए टेम्पों,कारों और साईकिलों को टुकड़े.टुकड़े कर जला दिया गया। होटल सहारा के पास स्थित दलित बौद्धों के मकानों पर भी हमला किया गया। नीला बड़ूकोंबे और मारूथी शिंदेबाबा,जो कि दलित हैं, ने कहा कि वे लगभग 50 सालों से उस इलाके में रह रहे हैं और पहली बार उन पर हमला हुआ है। कस्बापेठ में चार हिंदू राष्ट्रवादी कार्यकर्ता, मुसलमान युवकों से हिंसक मुठभेड़ में घायल हो गये। ये लोग एक मस्जिद पर हमला करने आये थे और मुसलमान युवकों ने उनका विरोध किया। इस सिलसिले में छः मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया। हादपसर बाजार क्षेत्र में स्थित नलबंद मस्जिद पर पत्थर फेंके गये। अब्दुल कबीर की फलों की दुकान और अब्दुल रफीक बागवान के केले के गोदाम में आग लगा दी गई। उरूली देवाची में जामा मस्जिद पर हमला हुआ। एक फ्रिजए पानी की टंकी और कुछ अन्य चीजें तोड़ दी गईं। ये सभी हमले 9 से 11 बजे रात के बीच हुए। रात लगभग 9 बजे, 28 वर्षीय मोहसिन शेख नामक युवक, जो शोलापुर का रहने वाला था और आईटी इंजीनियर था, को पीट.पीटकर मार डाला गया। मोहसिन का एक मित्र, जो उसके साथ था, बच गया परंतु मोहसिन, जो कि अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला सदस्य था, की एक अस्पताल में मौत हो गई। दो अन्य मुस्लिम युवक एजाज़ यूसुफ बागवान और अमीर शेख,जो कि वहां मौजूद थे, भी घायल हुए। पुणे के मुसलमान व्यापारियों और दुकानदारों को कुल मिलाकर लगभग 4.5 करोड़ रूपयों का नुकसान हुआ।
तेलंगाना
    हैदराबाद के किशनगंज के सिक्ख छावनी क्षेत्र में 14 मई को सिक्खों के एक धार्मिक झंडे को कुछ अज्ञात लोगों ने जला दिया। इसके बाद लाठियों और तलवारों से लैस सिक्खों ने मुसलमानों के घरों पर हमला किया। यह दूसरी बार था जब झंडे को जलाने के मुद्दे को लेकर हिंसा भड़की और सिक्खों ने मुसलमानों पर हमला किया। तीन मुसलमान मारे गये, जिनमें से दो छुरेबाजी और एक पुलिस की गोली से मारा गया। किशनबाग में लंबे अरसे से हिंदू, मुसलमान और सिक्ख मिलजुलकर, शांतिपूर्ण ढंग से रहते आये थे।
कर्नाटक
    कर्नाटक में कुल मिलाकर 68 सांप्रदायिक घटनाएं हुईंए जिनमें 6 लोग मारे गये और 151 घायल हुए। बीजापुर में नरेंद्र मोदी के शपथ लेने का जश्न मनाने के लिए 26 मई को पूर्व केंद्रीय मंत्री बासवन्ना गौड़ा पाटिल के नेतृत्व में जुलूस निकाला जा रहा था। इसके दौरान हुई हिंसा में 12 लोग घायल हुए। कई लोगों को उनकी इच्छा के विरूद्ध गुलाल लगा दिया गया। इसके बाद हुए विवाद में कई दुकानों और फुटपाथ पर धंधा करने वालों पर हमले हुए। लगभग एक लाख रूपये की संपत्ति नष्ट हो गई और 15 व्यक्ति घायल हुए।
असम
    नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड ;एनडीएफबी के सोनवीजीत धड़े ने पिछले साल लगभग 100 लोगों की हत्यायें कीं, जिनमें बांग्लाभाषी मुसलमान और आदिवासी शामिल थे। केंद्र व राज्य सरकारों ने इस हथियारबंद सेना को खत्म करने के लिए समुचित प्रयास नहीं किए हैं।
    दो मई को नारायण गुरी, बकसा में 72 में से 70 मकानों में आग लगा दी गई। कुल मिलाकर 48 लोग मारे गये और 10 लापता हैं। कुछ लोग अपनी जान बचाने के लिए बैकी नदी में कूद गये। उनके बच्चे नदी में बह गये और उनमें से कई को गोली मार दी गई। इस हमले में जिंदा बचे लोगों के अनुसार यह जनसंहार बोडो लिबरेशन टाईगर्स के पूर्व सदस्यों ने अंजाम दिया था। बोडो टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट में इन लोगों को वनरक्षक नियुक्त किया गया है। इन्हें सरकारी तौर पर बंदूकें उपलब्ध कराई गईं हैं, जिनका इस्तेमाल इस हमले में किया गया। इस हमले के पीछे बोडो टेरिटोरियल कांउसिल के उपप्रमुख खंपा बोरगोयारी का हाथ बताया जाता है जो कि बोडो टेरिटोरियल एरिया डिस्ट्रिक्ट के वन विभाग के प्रभारी हैं। यह जनसंहार गैर.बोडो रहवासियों को सबक सिखाने के लिए किया गया था क्योंकि उन्होंने अत्याचारी प्रशासन के खिलाफ मत दिया था।
    इस हमले का कारण बना बोडो पीपुल्स फ्रंट के विधायक व असम के पूर्व कृषि मंत्री प्रमिला रानी ब्रम्ह का यह बयान कि मुसलमानों ने 16वीं लोकसभा के चुनाव में बोडो पीपुल्स फ्रंट के उम्मीदवार को वोट नहीं दिये। इसके पहले, हरभंगा मतदान केंद्र पर मतदान के दौरान हुई हिंसा के बाद पुलिस द्वारा मुसलमानों के खिलाफ की गई क्रूरतापूर्ण कार्यवाही से हमलावरों को प्रोत्साहन मिला। जब चुनाव के नतीजे घोषित हुए तो पता चला कि गैर.बोडो मतों के कारण, 'सम्मिलित जनगोष्ठिया एक्यामंच' के नाभा उर्फ हीरा सरानिया ने प्रमिला रानी ब्रम्ह को बड़े अंतर से पराजित किया।
    इसके बाद, 23 दिसंबर को एनडीएफबी के सोनवीजीत धड़े के कार्यकर्ताओं ने अंधाधुंध गोलियां चलाकर 78 लोगों की जाने ले लीं। कुल मिलाकर 46 लोग सोनितपुर में मारे गये, 29 कोकराझार में और तीन चिरांग जिले में। आदिवासियों द्वारा जवाबी हमले में चार बोडो भी मारे गये। इस अंधाधुंध गोलीबारी में मारे जाने वालों में से अधिकांश ईसाई आदिवासी थे। उन पर हमला राज्य सरकार द्वारा इस हथियारबंद गिरोह के खिलाफ की गई कार्यवाही का बदला लेने के लिए किया गया।
    कोकराझार जिले के गुंसाई क्षेत्र के माणिकपुर और दीमापुर गांव में आदिवासियों ने कर्फ्यू के दौरान बदले की कार्यवाही करते हुए बोडो निवासियों के कई घरों में आग लगा दी। पुलिस द्वारा हमलावरों को तितरबितर करने के लिए गोली चलाईं गईं जिसमें तीन आदिवासी मारे गये। इनको मिलाकर, सोनितपुर जिले में हिंसा में मारे गये लोगों की संख्या 46 हो गई।
-इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2015

सैंया भये कोतवाल तो अब डर काहे का

पेट्रोल पंप पर कार्यरत एक कर्मचारी पर तत्कालीन वित्तमंत्री की कृपा हुई और आज वह देश का सबसे बड़ा उद्योगपति बन बैठा . सरकार की गोद में बैठ कर बढे हुए अम्बानी समूह हमेशा सरकार को आर्थिक नुकसान पहुँचाने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया है. अभी हाल में जासूसी प्रकरण में उसी कंपनी के कर्मचारी, पत्रकार व पेट्रोलियम मंत्रालय के जूनियर अधिकारी जासूसी में पकडे गए. मामला यह है कि रिलायंस कंपनी अपने शुरुवाती दौर से करों की चोरी से लेकर निम्न कोटि के हथकंडे अपनाती रही. केंद्र में इस सरकार को लाने के लिए इस कंपनी व उसके मीडिया ने भरपूर प्रयास किया है और उसी की बदौलत अम्बानी प्रधानमंत्री की पीठ ठोकते नजर आते हैं .
      "लागत वसूली की पाबंदी" के रूप में पेट्रोलियम मंत्रालय ने रिलायंस के नेतृत्व वाली ठेका कंपनी पर लगभग 15,000 करोड़ रुपये के दंड के लगाने पर लंबित मध्यस्थता कार्यवाही कर रहे हैं। रिलायंस गैस की बिक्री के माध्यम से खर्च कुछ खर्च की वसूली के लिए पात्र है। सरकार  रिलायंस समूह से कितनी वसूली करे वह तय होना अभी बाकी है .
मामला यह है कि के जी बेसिन से 30 हजार करोड़ रुपये की प्राकृतिक गैस की चोरी का आरोप रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) के ऊपर है . यह आरोप ओ एन जी सी ने लगाया है . जिसकी मध्यस्था का मामला भी चल रहा है . रिलायंस समूह के काले कारनामो की जांच अगर की जाए तो हर मामले में टैक्स चोरी से लेकर जासूसी और अपराधिक मामलों में लिप्त लोग हैं, लेकिन कार्यवाई कौन करे . जो भी सत्तारूढ़ दल होता है . वह उनकी मुट्ठी व कृपा की बदौलत सत्तारूढ़ होता है. इन आर्थिक अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि मंत्री अपने घर में क्या कर रहा है और मंत्रालय क्या कर रहा है और कौन सा फैसला कब लिया जायेगा यह जानने के लिए कर्मचारियों और अधिकारीयों की खरीद-फरोख्त भी करते हैं .
  आरआईएल के शैलेश सक्सेना, अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप के ऋषि आनंद, एस्सार ग्रुप के विनय कुमार, केयर्न इंडिया के केके नाइक को भी गिरफ्तार किया है।
       रिलायंस समूह की कोशिश यह है कि सरकार जो भी फैसले करे उसकी जानकारी उसको पहले हो जाए और उसी आधार पर वह अपने समूह को ज्यादा से ज्यादा मुनाफा वसूलने के लिए प्रयास करे . पूर्व में सरकारी नीतियों की जानकारी हो जाने से कुछ जर खरीद नेताओं के माध्यम से नीतियों को बदलने का कार्य करते हैं और रिलायंस समूह के लिए यह सरकार ' सैंया भये कोतवाल तो अब डर काहे का ' वाली स्तिथि है. उसकी  यह भी स्तिथि है कि चोर चोरी से जाए हेराफेरी से बाज नहीं आता है . 

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

सांप्रदायिक हिंसा 2014 : हरियाणा,दिल्ली, जम्मू.कश्मीर, बिहार, राजस्थान

हरियाणा
गुजरे साल, हरियाणा में सांप्रदायिक हिंसा की तीन घटनाएं हुईं, जिनमें से एक मेवात और दो गुड़गांव में हुईं। यद्यपि हरियाणा, खाप पंचायतों और जातिगत संघर्षों के लिए जाना जाता है परंतु वह सांप्रदायिक हिंसा से अपेक्षाकृत मुक्त रहा है। राज्य में कुछ महीनों पहले विधानसभा चुनाव हुए थे और उनमें भाजपा को सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण से बहुत लाभ मिला था। इसके अतिरिक्त, इंडियन नेशनल लोकदल ;आईएनएलडी के मुस्लिम उम्मीदवारए जिन्होंने गुड़गांव लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के तीन मुस्लिम.बहुल विधानसभा क्षेत्रों से दो लाख से अधिक वोट पाये थे, भी मुसलमानों को भड़काने में लगे हुए थे।
दस अप्रैल को गुड़गांव लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र, जो कि राज्य के मेवात इलाके का हिस्सा है, में आईएनएलडी के मुस्लिम समर्थकों और भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक संघर्ष हुआ जिसमें वाजिद नामक मुस्लिम युवक गोली लगने से मारा गया। विवाद की शुरूआत, पुनहाना तहसील के नकनपुर के एक मतदान केंद्र के बाहर हुई। भाजपा कार्यकर्ताओं ने बाद में मेवाती मुसलमानों को निशाना बनाया। क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक ने दावा किया कि वाजिद की मृत्यु सांप्रदायिक हिंसा में नहीं हुई। 
सात जून को एक ओवरलोडेड डंपर, जिसे एक मुस्लिम युवक चला रहा था,की चपेट में आकर एक हिंदू युवक दानवीर कुमार मारा गया। यह घटना गुड़गांव से 15 किलोमीटर दूर तारू नामक कस्बे में हुई। इसके बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। स्थानीय बाजार में एक मुसलमान ने हिंदुओं पर गोलियां चलाईं। स्थानीय निवासियों का दावा है कि कम से कम तीन लोग मारे गये और कई घायल हुये परंतु पुलिस का कहना है कि हिंसा में किसी की मृत्यु नहीं हुई, अपितु सड़क दुर्घटना में जरूर एक व्यक्ति मारा गया। पुलिस उपाधीक्षक सुखबीर सिंह सहित कई पुलिसकर्मी घायल हुए। डंपर के चालक और क्लीनर की जमकर पिटाई की गई और उन्हें गंभीर हालत में एम्स में भर्ती कराया गया। ऐसी अफवाह उड़ा दी गई कि वे दोनों मुस्लिम युवक मर गये हैं। एक मस्जिद को जला दिया गया और कई दुकानों के ताले तोड़कर उन्हें लूट लिया गया। चूंकि विधानसभा चुनाव नजदीक थे इसलिए स्थानीय राजनेताओं ने सांप्रदायिकता की भट्टी को सुलगने दिया। भाजपा सांसद और केंद्रीय मंत्री राव इंदरजीत सिंह, 12 जून को निकट के एक गांव में पहुंचे परंतु उन्होंने सिर्फ हिंदू दंगा पीडि़तों से मुलाकात की और उन्हें यह आश्वासन दिया कि पुलिस उन्हें सुरक्षा देगी। एक दर्जन से अधिक एफआईआर दर्ज की गईं। तारू चारों ओर से मेवाती मुस्लिम गांवों से घिरा हुआ है। ये मेवाती मुसलमान अपनी खाप पहचान पर गर्व करते हैं और गोत्र व्यवस्था के अनुरूप वैवाहिक संबंध करते हैं। कुछ साल पहले तक मेवाती मुसलमान दशहरा,होली और दिवाली जमकर मनाया करते थे।
अगस्त की शुरूआत में, गुड़गांव के बसई गांव में करीब दो दर्जन मुस्लिम परिवार, जो नाई व दर्जी का काम तथा कबाड़ का धंधा करते थे, पर हमले हुए और उन्हें अपना गांव छोड़कर भागना पड़ा। कबाड़ का धंधा करने वालों पर यह आरोप था कि वे आसपास की दुकानों और घरों से सामान चुराते हैं। मुख्य आरोपी अमित को गिरफ्तार कर लिया गया। मुसलमानों पर यह आरोप भी लगा कि वे मवेशियों की तस्करी करते हैं व इस कारण भी सांप्रदायिक तनाव में वृद्धि हुई।
दिल्ली
24 अक्टूबर को पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी इलाके में हुई सांप्रदायिक हिंसा में 20 पुलिसकर्मियों सहित 45 लोग घायल हो गये। पांच घायलों को बंदूक की गोलियां लगीं थीं। करीब चार घंटे तक दंगाई मुसलमानों पर पत्थर फेंकते रहे। जब उन्हें चारों ओर से घेर लिया गया तब मुसलमानों ने पुलिस से मदद की गुहार की परंतु उन्हें जवाब यह मिला कि हमें हस्तक्षेप करने के निर्देश नहीं हैं। अगले दिन, पुलिस, मुसलमानों के घरों में जबरदस्ती घुस गई और कई घरों के दरवाजे तोड़ दिये गये। पुलिसकर्मी अनेक मुस्लिम युवकों को उनके घरों से उठाकर ले गये और उन्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।
त्रिलोकपुरी में अवैध शराब बेचने वालों और ड्रग्स का धंधा करने वालों की भरमार है। नशे में चूर लोग.चाहे वे किसी भी धर्म के हों.सड़कों पर हंगामा करते रहते हैं। दिवाली के कुछ दिन पहले, शराब के नशे में धुत चार लोग एक अस्थायी मंदिर के सामने खड़े होकर आपस में बहस कर रहे थे। इस मंदिर का निर्माण उसी साल हुआ था और उसे माता की चौकी कहा जाता था। इन व्यक्तियों में से एक, जो मुसलमान था,का हाथ गलती से मंदिर के एक हिस्से में लग गया जो थोड़ा सा धसक गया। ऐसा प्रचार किया गया कि उस मुस्लिम व्यक्ति ने जानबूझकर मंदिर को नुकसान पहुंचाया था। इसके बाद, 23 अक्टूबर को माता की चौकी पर लगे लाउडस्पीकर को लेकर विवाद हुआ। पास की एक मस्जिद में प्रार्थना कर रहे मुसलमानों का कहना था कि लाउडस्पीकर बहुत जोर से बज रहा था और उसके कारण उन्हें परेशानी हो रही थी। जल्दी ही दोनो ओर से पत्थरबाजी शुरू हो गई। तब दिल्ली में चुनाव होने ही वाले थे और स्थानीय सांप्रदायिक नेताओं ने घटना को सांप्रदायिक रंग देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अफवाहें फैलाकर हिंसा को और बढ़ावा दिया। ऐसा आरोप लगाया गया कि पूर्व भाजपा विधायक सुनील वैद्य ने यह घोषणा की कि माता की चौकी के स्थान पर एक स्थायी मंदिर बनाया जायेगा। वैद्य ने बाद में कहा कि उन्होंने ऐसी घोषणा नहीं की थी। 24 अक्टूबर को अचानक बहुसंख्यक समुदाय के सैंकड़ों लोग,जिसमें से अधिकांश त्रिलोकपुरी के बाहर के थेए ब्लॉक 20 में घुस गये और घरों पर पत्थर फेंकने लगे। उन्होंने गोलियां भी दागीं। इसके बाद वहां बड़ी संख्या में पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स के जवानों को तैनात किया गया।
इसके अगले दिन, 25 अक्टूबर कोए त्रिलोकपुरी के अन्य ब्लाकों में हिंसा फैल गई। ब्लॉक 15, 20 और 27 इस हिंसा से सबसे गंभीर रूप से प्रभावित हुए। दंगे और लूट की शुरूआत चार बजे सुबह हुईए जब लगभग दो दर्जन लोग ब्लॉक 27 में स्थित एक दुकान, जिसका नाम 'ए.जेड शॉप' था , का दरवाजा तोड़कर उसमें घुस गये और वहां रखे सामान को लूटने के बाद दुकान में आग लगा दी। हिंसा कल्याणपुरी व अन्य आसपास के इलाकों में फैल गई। 24 अक्टूबर की रात को हथियारबंद पुलिसकर्मी ब्लॉक 27 में पहुंचे और मुसलमानों के कई वाहनों में तोड़फोड़ की। बाद में वे संजय कैंप में गये जहां उन्होंने दंगाइयों को ढूंढने के बहाने कई घरों के दरवाजे तोड़कर उनमें प्रवेश किया। उसी दिन रात को पुलिस ने 14 युवकों को गिरफ्तार किया और थाने में उनकी जमकर पिटाई लगाने के बाद उनके विरूद्ध कई मुकदमे कायम कर दिये। 25 अक्टूबर को देर रात इलाके में धारा 144 लगाई गई। अगर यही कार्यवाही 23 तारीख की रात को कर दी गई होती तो शायद हिंसा इतनी न फैलती।
भवाना में ताजि़या ;मोहर्रम के अवसर पर निकाले जाना वाला जुलूसद्ध के खिलाफ लोगों को भड़काने के लिए दो नवंबर को एक महापंचायत बुलाई गई। ईद के ठीक पहलेए 'हिंदू क्रांतिकारी सेना' नामक संगठन ने एक काल्पनिक 'गौवध' का सहारा लेकर भवाना जेजे कालोनी और निकट के भवाना गांव में सांप्रदायिक तनाव फैलाया। पांच अक्टूबर को भवाना गौशाला में एक बैठक के आयोजन की घोषणा करते हुए भड़काऊ पोस्टर जगह.जगह चिपकाए गए थे। बकराईद के बाद से ही यह अफवाह फैला दी गई कि उक्त त्योहार पर कई गायों को काटा गया है। इस बहाने हिंदुओं को मुसलमानों के खिलाफ भड़काया गया। हरियाणा और दिल्ली सहित भवाना के आसपास के इलाकों से बड़ी संख्या में उपद्रवी भवाना पहुंच गये।
महापंचायत का उद्देश्य था भवाना में ताजि़ये न निकलने देना। जेजे कालोनी के रहवासियों ने हमें बताया कि कालोनी के मुसलमानों ने 28 अक्टूबर को आयोजित एक बैठक, जिसमें दोनों समुदायों के नेता और स्थानीय असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस मौजूद थे, में पहले ही यह निर्णय ले लिया था कि जुलूस केवल जेजे कालोनी के अंदर निकाला जायेगा। महापंचायत में कई नेताओं ने निहायत भड़काऊ भाषण दिये और मुसलमानों के खिलाफ जहर उगला। कई वक्ताओं ने कहा कि मुसलमानों का घर पाकिस्तान है और हिंदू, भारत के मूलनिवासी हैं इसलिए जिन मुसलमानों को भारत में रहना है उन्हें हिंदुओं की शर्तों पर रहना होगा। खुलेआम हिंसा की धमकियां भी दी गईं।
नूर.ए.इलाही में गाय के एक शव का इस्तेमाल शांति भंग करने के लिए किया गया। नौ नवंबर को रात लगभग नौ बजे इलाके एक प्रसिद्ध होटल 'नूर.ए.इलाही चिकन कार्नर' के बाहर सड़क पर एक बोरी में गाय का शव पाया गया। जल्दी ही वहां भीड़ इकट्ठी हो गई और यह आरोप लगाया गया कि उस दुकान में चोरी.छुपे गाय का मांस परोसा जा रहा है। सौभाग्यवश, सांप्रदायिक तत्वों के कुत्सित इरादे कामयाब नहीं हो सके क्योंकि स्थानीय रहवासियों ने जबरदस्त एकता का प्रदर्शन किया। इलाके के हिंदू निवासियों ने जोर देकर कहा कि होटल का मालिक एक शरीफ व मज़हबी आदमी है जो किसी भी हालत में अपनी दुकान में गाय का मांस नहीं बिकने देगा।
एक दिसंबर को सुबह.सुबह दिलशाद गार्डन इलाके में सेंट सेबेस्टियन चर्च में आग लगा दी गई। चर्च के पादरी फादर कोएकल का कहना था कि आग जानबूझकर लगाई गई थी, यह इससे स्पष्ट था कि वहां चारों ओर कैरोसीन की बदबू आ रही थी। परंतु स्थानीय थानेदार ने यह कहा कि आग बिजली के शार्ट सर्किट के कारण लगी है। यह इस तथ्य के बावजूद की चर्च की बिजली सप्लाई यथावत बनी हुई थी। चर्च की किताबें, बेंचे व वह स्थान जहां से पादरी उपासकों को संबोधित करते हैंए को नष्ट कर दिया गया। फादर को एकल का कहना था कि चर्च को लगभग डेढ़ करोड़ रूपये का नुकसान हुआ है।
जम्मू.कश्मीर
जम्मू.कश्मीर के कटुआ जिले के बासोहिल कस्बे में 28 जुलाई को भड़की सांप्रदायिक हिंसा में करीब एक दर्जन दुकानें जलाकर राख कर दी गईं और कई लोगों को चोटें आईं। पिछली रात एक नाले में गाय का शव पाये जाने के बाद यह हिंसा भड़की। अफवाहें फैलाई गयीं और हिंदुओं को इकट्ठा कर एक जुलूस निकाला गया। जुलूस में शामिल लोगों ने मुसलमानों की कई दुकानों में आग लगा दी। पत्थरबाजी हुई और वाहनों को नुकसान पहुंचाया गया। हिंसा बानी व महानपुर कस्बों में भी फैल गई।

बिहार
बिहार में जेडीयू व भाजपा का गठबंधन समाप्त होने के बादए सांप्रदायिक हिंसा में अचानक तेजी आ गई। जून से लेकर दिसंबर 2013 तक 87 छोटी.बड़ी हिंसक घटनायें हुईं। 2014 में राज्य में सांप्रदायिक हिंसा की 51 घटनाएं हुईं।
सात अक्टूबर को किशनगंज में एक मंदिर के पास एक जानवर का शव पाए जाने की अफवाह के बाद हिंसा हुई। जलते टायर फेंककर सड़क और रेल यातायात रोकने की कोशिश की गई। दुकानों और कार्यालयों को बंद करवा दिया गया। कस्बे में कर्फ्यू लगाना पड़ा।
राजस्थान
राजस्थान में 2014 में सांप्रदायिक हिंसा की 61 घटनायें हुईं जिनमें 13 लोग मारे गये और 116 घायल हुये।
14 जनवरी को दक्षिणी राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले में हुई सांप्रदायिक हिंसा में तीन लोग ;राजा खान, 20, भंवर सिंह, 50, व दिनेश कुमार, 25  मारे गये व छः घायल हो गये। हिंसा तब भड़की जब आरएसएस के कार्यकर्ता शाम साढ़े सात बजे के करीब अपनी एक बैठक से लौट रहे थे और रास्ते में खड़े कुछ मुस्लिम युवकों ने उन पर कोई टिप्पणी की। दोनों धर्मों के समूह निकट स्थित बस स्टेण्ड पर इकट्ठा हो गये जहां दोनों ओर से गोलियां चलाईं गईं। अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों की लगभग 40 दुकानें और कच्चे घर,आगजनी में नष्ट हो गये।
-इरफान इंजीनियर

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

दोराहे पर ठिठका भारतीय प्रजातंत्र

असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान
मैं अपने इस व्याख्यान की शुरूआत, अपने अभिन्न मित्र डाॅ. अस़गर अली इंजीनियर को श्रद्धांजलि देकर करना चाहूंगा, जिनके साथ लगभग दो दशक तक काम करने का सौभाग्य मुझे मिला। डाॅ. इंजीनियर एक बेमिसाल अध्येता-कार्यकर्ता थे। वे एक ऐसे मानवीय समाज के निर्माण के स्वप्न के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध थे, जो विविधता के मूल्यों का आदर और अपने सभी नागरिकों के मानवाधिकारों की रक्षा करे।
इस संदर्भ में वे उन चंद लोगों में से थे जिन्हें सबसे पहले यह एहसास हुआ कि सांप्रदायिकता की विघटनकारी राजनीति, देश और समाज के लिए कितनी घातक है। उन्होंने सांप्रदायिक हिंसा के कारकों के अध्ययन और विष्लेषण की परंपरा शुरू की। वे हर सांप्रदायिक दंगे का अत्यंत गंभीरता और सूक्ष्मता से अध्ययन किया करते थे। बोहरा समाज, जिससे वे थे, में सुधार लाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। इस्लाम की शिक्षाओं की उनकी व्याख्या के लिए उन्हें दुनियाभर में जाना जाता है। अगर हम एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते हैं जो शान्ति, सद्भाव, सहिष्णुता और करूणा पर आधारित हो, तो हम उनसे बहुत कुछ सीख सकते हैं।
राष्ट्र के रूप में हम आज कहां खड़े हैं? भारतीय प्रजातंत्र के समक्ष कौन-से खतरे हैं और क्या मोदी सरकार के आने के बाद से ये खतरे बढ़े हैं?
आमचुनाव में मोदी की जीत कई कारणों से हुई। उन्हें भारतीय उद्योग जगत का पूर्ण समर्थन मिला, लाखों की संख्या में आरएसएस के जुनूनी कार्यकर्ताओं ने उनके चुनाव अभियान को मजबूती दी, कार्पोरेट द्वारा नियंत्रित मीडिया ने उनका महिमामंडन किया और ‘‘गुजरात के विकास के माॅडल’’ को एक आदर्श के रूप मे प्रचारित किया। समाज को धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत किया गया और अन्ना हजारे, बाबा रामदेव व अरविंद केजरीवाल के आंदोलनों के जरिये, कांग्रेस की साख मिट्टी में मिला दी गई। इस आंदोलन का अंत, आप के गठन के साथ हुआ।
मोदी का ‘अच्छे दिन‘ लाने का वायदा हवा हो गया है। कच्चे तेल की कीमतों में भारी कमी आने के बावजूद, भारत में महंगाई बढ़ती जा रही है। लोगों के लिए अपनी जरूरतें पूरी करना मुष्किल होता जा रहा है। मोदी ने वायदा किया था कि विदेशों में जमा कालाधन, छः माह के भीतर वापस लाया जायेगा और हम सब अपने बैंक खातों में 15-15 लाख रूपये जमा देखकर चकित हो जायेंगे। यह वायदा भुला दिया गया है। जहां तक सुशासन का सवाल है, मोदी की दृष्टि में शायद उसका अर्थ अपने हाथों में सत्ता केंद्रित करना है। केबिनेट प्रणाली की जगह, देश  पर एक व्यक्ति का एकाधिकारी शासन कायम हो गया है। भारत सरकार के सचिवों कोे निर्देश दिया गया है कि वे सीधे प्रधानमंत्री के संपर्क में रहें। मंत्रियों की तो मानो कोई अहमियत ही नहीं रह गई है।
स्वयंसेवी संस्थाओं के लिए आर्थिक संसाधन जुटाना कठिन होता जा रहा है। ‘ग्रीन पीस’ सरकार की इस नीति का प्रमुख शिकार बनी है। पिछली सरकार द्वारा शुरू की गई कल्याण योजनाओं को एक-एक कर बंद किया जा रहा है। वे कुबेरपति, जिन्होंने मोदी के चुनाव अभियान को प्रायोजित किया था, अपने खजाने भरने में जुटे हुए हैं। पर्यावरणीय, सामाजिक और आर्थिक मुद्दों को परे रखकर, उन्हें देश का अंधाधुंध औद्योगिकरण करने की खुली छूट दे दी गई है। नये प्रधानमंत्री को न भूतो न भविष्यति नेता के रूप में प्रचारित किया जा रहा है और उनके चारों ओर एक आभामंडल का निर्माण करने की कोशिश हो रही है।
इन सब नीतियों और कार्यक्रमों से सबसे अधिक नुकसान समाज के कमजोर वर्गों को उठाना पड़ रहा है। ‘श्रम कानूनों मंे सुधार’ के नाम पर श्रमिकों को जो भी थोड़ी-बहुत सुरक्षा प्राप्त थी, उससे भी उन्हें वंचित करने की तैयारी हो रही है। उद्योगपतियों के लिए भूमि अधिग्रहण करना आसान बना दिया गया है। किसानों से येन-केन-प्रकारेण उनकी जमीनें छीनी जा रही हैं। गरीबों के लिए चल रही समाज कल्याण योजनाओं व भोजन और स्वास्थ्य के अधिकार को खत्म करने की तैयारी है।
धार्मिक अल्पसंख्यकों को आतंकित करने का सिलसिला जारी है। एक केंदीय  मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति की हिम्मत इतनी बढ़ गई कि उन्होंने सभी गैर-हिंदुओं को हरामजादे बता दिया। एक अन्य भगवाधारी भाजपा नेता, नाथूराम गोडसे को ‘देशभक्त’ बता रहे हैं और हिंदू महिलाओं से ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं। हिंदुत्ववादी, महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे का महिमामंडन कर रहे हैं। वे हमेशा से गोडसे के प्रशसक थे परंतु नई सरकार आने के बाद से उनकी हिम्मत बढ़ गई है। क्रिसमस पर ‘सुशासन दिवस’ मनाने की घोषणा कर इस त्योहार के महत्व को कम करने की कोशिश की गई। ऐसी मांग की जा रही है कि हिंदू धर्मगं्रथ गीता को देश की राष्ट्रीय पुस्तक घोषित किया जाये। चर्चों और मस्जिदों पर हमले हो रहे हैं। अनेक नेता बिना किसी संकोच या डर के चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे हैं कि हम सब हिंदू हैं और भारत, एक हिंदू राष्ट्र है।
इस सबके बीच नरेन्द्र मोदी चुप्पी ओढ़े हुए हैं। शायद इसलिए क्योंकि जो कुछ हो रहा है, वह भाजपा और उसके पितृ संगठन आरएसएस के एजेन्डे का हिस्सा है। संघ का मूल लक्ष्य देश को संकीर्ण हिन्दू राष्ट्रवाद की ओर ले जाना है। हिन्दू राष्ट्रवाद, मुस्लिम अतिवाद और ईसाई कट्टरवाद से मिलती-जुलती अवधारणा है। इस संदर्भ में यह याद रखना समीचीन होगा कि भारत में ‘धार्मिक राष्ट्रवाद’ की धाराओं का जन्म, भारतीय राष्ट्रवाद के उदय की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। सन् 1888 में सामंतों और राजाओं-नवाबों ने मिलकर युनाईटेड इंडिया पेट्रियाटिक एसोसिएशन का गठन किया। बाद में मध्यम वर्ग और उच्च जातियों का श्रेष्ठि तबका भी इस संगठन से जुड़ गया। इसी संगठन के गर्भ से उत्पन्न हुए मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा, जो अपने-अपने धर्म का झंडा उठाए हुए थे।
हिन्दू महासभा के सावरकर ने सबसे पहले हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना प्रस्तुत की और सन् 1925 में गठित आरएसएस ने इसे अपना लक्ष्य बना लिया। उसने लोगों के दिमागों में यह जहर भरना शुरू किया कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और यहां रहने वाले ईसाई और मुसलमान विदेशी हैं। यह विचार महात्मा गांधी, भगतसिंह व डाॅ. अम्बेडकर की समावेशी राष्ट्रवाद की अवधारणा के धुर विपरीत था।
हमें यह याद रखना चाहिए कि साम्प्रदायिक संगठनों ने स्वाधीनता संग्राम से सुरक्षित दूरी बनाए रखी और जब देश अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त होने के लिए संघर्षरत था तब ये संगठन देश में घृणा फैलाकर दंगे करवाने में जुटे हुए थे। साम्प्रदायिक हिंसा की आग शनैः-शनैः तेज होती गई और इसके कारण राष्ट्र के रूप में हमें भारी नुकसान झेलना पड़ा।  साम्प्रदायिकता के दानव ने ही देश का विभाजन करवाया और नई सीमा के दोनों ओर के करोड़ों लोगों को घोर पीड़ा और संत्रास के दौर से गुजरना पड़ा।
हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों की उनकी फूट डालो और राज करो की नीति को लागू करने में साम्प्रदायिक संगठनों ने काफी मदद की। इनमें हिन्दू और मुस्लिम दोनों धर्मों के साम्प्रदायिक संगठन शामिल थे। आरएसएस की विचारधारा में रचे-बसे उसके प्रचारक नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की हत्या की। यह व्यापक भारतीय राष्ट्रवाद पर हिन्दू राष्ट्रवाद का पहला बड़ा आक्रमण था।
जहां एक ओर आरएसएस ने स्वाधीनता संग्राम को नजरअंदाज किया वहीं दूसरी ओर उसने अपने स्वयंसेवकों को हिन्दू राष्ट्रवाद की संकीर्ण विचारधारा की घुट्टी पिलाई। इन स्वयंसेवकों ने समय के साथ पुलिस, नौकरशाही और राज्यतंत्र के अन्य हिस्सों में घुसपैठ कर ली। आरएसएस ने अपने अनुषांगिक संगठनों का एक बहुत बड़ा ढांचा खड़ा किया। इनमें शामिल हैं अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, वनवासी कल्याण आश्रम, विष्व हिन्दू परिषद व बजरंग दल। संघ के स्वयंसेवकों के परिवारों की महिलाओं ने राष्ट्र सेविका समिति नामक संगठन बनाया।
आरएसएस लगातार ‘पहचान’ से जुड़े मुद्दे उठाता रहा है। ‘गौरक्षा‘ और ‘मुसलमानों के भारतीयकरण‘ के अभियानों के जरिए अल्पसंख्यकों को आतंकित किया जाता रहा है और व्यापक समाज में यह संदेश पहुंचाया जाता रहा है कि मुसलमान, भारतीय नहीं हैं और देश के प्रति उनकी वफादारी संदिग्ध है।
सन् 1980 का दशक आते-आते हिन्दुत्व ब्रिगेड के मुंहजुबानी प्रचार, मीडिया के एक हिस्से के उससे जुड़ाव और इतिहास की स्कूली पाठ्यपुस्तकों के पुनर्लेखन के नतीजे में समाज के बहुत बड़े तबके में मुसलमानों के प्रति संदेह और घृणा का भाव उत्पन्न हो गया। हिन्दुत्ववादी ताकतों ने ही बहुत बेशर्मी से बाबरी मस्जिद को ढहाया। उसके पहले, आडवानी ने रथ यात्रा निकाली, जो अपने पीछे खून की लकीर छोड़ती गई।
इसके बाद साम्प्रदायिक हिंसा में और बढ़ोत्तरी हुई। हिन्दू ‘पहचान‘ को देश की एकमात्र वैध पहचान घोषित कर दिया गया। धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण इतना बढ़ गया कि 1992-93 में मुंबई, सूरत और भोपाल में भयावह खूनखराबा हुआ। गुजरात में सन् 2002 में हुई साम्प्रदायिक विभीषिका के बारे में तो हम सब जानते ही हैं।
सन् 1980 के दशक का अंत आते-आते साम्प्रदायिक ताकतों ने मुसलमानों के अलावा ईसाईयों को भी अपने निशाने पर ले लिया। यह कहा जाने लगा कि वे हिन्दुओं का धर्मपरिवर्तन करवा रहे हैं। आदिवासी इलाकों में हिंसा भड़क उठी और इसके नतीजे में सन् 1999 में पाॅस्टर ग्राहम स्टेन्स और उनके दो मासूम बच्चों को जिंदा जला दिया गया। सन् 2008 में कंधमाल में अनेक निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया।
यह सब उस सोच का नतीजा था, जिसे संघ चिंतक एम. एस. गोलवलकर ने आकार दिया था। उनका दावा था कि भारत हमेश से हिन्दू राष्ट्र है व धार्मिक अल्पसंख्यकों को यहां या तो बहुसंख्यकों की दया पर जीना होगा और या फिर उन्हें नागरिक के तौर पर उनके सभी अधिकारों से वंचित कर दिया जाएगा।
सन् 2014 में भाजपा दूसरी बार सत्ता में आई। इसके पहले, सन् 1998 में वह सत्ताधारी एनडीए गठबंधन का हिस्सा थी। उस समय भाजपा को लोकसभा में बहुमत प्राप्त नहीं था इसलिए वह अपना एजेन्डा खुलकर लागू नहीं कर सकी। परंतु फिर भी उसने सफलतापूर्वक स्कूली पाठ्यपुस्तकों का भगवाकरण किया और पुरोहिताई व ज्योतिष जैसे अवैज्ञानिक विषयों को कालेजों और विष्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल करवाया। उसने हवा का रूख भांपने के लिए संविधान का पुनरावलोकन करने के लिए एक समिति का गठन भी किया।
अब, जबकि भाजपा पूर्ण बहुमत से सत्ता में है, वह बिना किसी लागलपेट के अपना एजेन्डा लागू कर रही है। लगभग सारे राष्ट्रीय संस्थानों में साम्प्रदायिक सोच वाले लोगोें का कब्जा हो गया है। प्रोफेसर के. सुदर्शन राव, जो भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष नियुक्त किए गए हैं, का कहना है कि जाति व्यवस्था से देश बहुत लाभान्वित हुआ है। वे महाभारत और रामायण की ऐतिहासिकता में भी विष्वास करते हैं। यह अलग बात है कि इतिहासविदों की जमात में राव को बहुत सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता। नई सरकार संस्कृत भाषा को प्रोत्साहन दे रही है। ऐसा इस तथ्य के बावजूद किया जा रहा है कि संस्कृत कभी आमजनों की भाषा नहीं रही है।
हमारा संविधान सरकार को यह जिम्मेदारी देता है कि वह वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहन दे। इसके ठीक उलट, सरकार विज्ञान में रूढि़वादी और अतार्किक परिकल्पनाओं को ठूंस रही है। हमें अब बताया जा रहा है कि प्राचीन भारत में 200 फीट लंबे विमान थे और प्लास्टिक सर्जरी होती थी। इस महिमामंडन का उद्धेष्यशायद यह साबित करना है कि भारत, हजारों साल पहले विज्ञान के क्षेत्र में इतना उन्नत था जितना कि आज भी विष्व के विकसित देश नहीं हैं। निःसंदेह, भारत के चरक, सुश्रुत और आर्यभट्ट जैसे प्राचीन वैज्ञानिकों ने विज्ञान के क्षेत्र में कई उपलब्धियां हासिल कीं थीं परंतु यह मानना मूर्खता होगी कि प्राचीन भारतीय विज्ञान, आज के विज्ञान से भी अधिक विकसित था। यह, दरअसल, भारतीयों में श्रेष्ठता का दंभ भरने का बचकाना प्रयास है।
किसी भी प्रजातंत्र के लिए स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्य सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। अपने हिन्दुत्ववादी एजेन्डे के तहत, भाजपा सरकार संविधान से ‘धर्मनिरपेक्ष‘ व ‘समाजवादी‘ शब्दों को हटाने की कवायद कर रही है। उसे अल्पसंख्यकों की आशंकाओं और चिंताओं की तनिक भी परवाह नहीं है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्य गंभीर खतरे में हैं। हम आज इतिहास के ऐसे मोड़ पर खड़े हैं जब भारतीय संविधान के अस्तित्व को ही खतरा पैदा हो गया है।
हम अगर अब भी नहीं जागे तो बहुत देर हो जायेगी। हमें इस खतरे का मुकाबला करने के लिए कई कदम उठाने होंगे। हमें दलितों, महिलाओं, श्रमिकों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के हकों के लिए लड़ना होगा। हमें अपने प्रजातांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए समान विचारों वाले संगठनों के साथ गठबंधन कर, एक मंच पर आना होगा। प्रजातंत्र और धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों में एकता, समय की मांग है। हमें हाथों में हाथ डाल, एक साथ आगे बढ़ना होगा। गैर-सांप्रदायिक राजनैतिक दलों का गठबंधन बनाकर, सांप्रदायिक शक्तियों को अलग-थलग करना होगा।
हिंदू राष्ट्रवाद की संकीर्ण राजनीति, फासीवादी और धार्मिक कट्टरपंथी शासन व्यवस्था का मिलजुला स्वरूप है। इस तरह के सन में प्रजातांत्रिक स्वतंत्रताएं सिकुड़ती जाती हैं। इसकी शुरूआत भी हो गई है। कुछ पुस्तकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और कुछ नई पुस्तकें, जिनमें दीनानाथ बत्रा की किताबें शामिल हैं, को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
अब समय आ गया है कि हम सोशल, प्रिंट व इलेक्ट्रोनिक मीडिया में अपने लिए जगह बनायें। हमें विविधता, बहुवाद और उदारवादी मूल्यों को प्रोत्साहन देना है। ये ही हमें मानवीय, प्रजातांत्रिक समाज का निर्माण करने में मदद करेंगे।
-राम पुनियानी

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता शब्द गायब करना

हवा का रूख भांपने की कवायद 
शब्द केवल शब्द नहीं होते-विशेष कर तब, जबकि वे संविधान जैसी महत्वपूर्ण पुस्तक के हिस्से हों। वे हमारी प्रतिबद्धताओं और हमारे मूल्यों को इंगित करते हैं। हाल में, गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर, मोदी सरकार द्वारा जारी किये गए एक विज्ञापन में प्रकाशित संविधान की उद्देष्यिका से ‘धर्मनिरपेक्ष’ व ‘समाजवादी’ शब्द गायब थे। जब भाजपा नेताओं से इस बाबत पूछा गया तो उनका जवाब था कि विज्ञापन में संविधान की ‘मूल’ उद्देष्यिका छापी गई है। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पलटवार करते हुए कहा कि सन् 1950 में संविधान में ये शब्द नहीं डाले गये तो क्या इसका अर्थ यह है कि नेहरू और आंबेडकर धर्मनिरपेक्ष नहीं थे? उस समय नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे और आंबेडकर, संविधान का मसविदा तैयार करने वाली समिति के मुखिया थे। भाजपा की राजनैतिक सहयोगी शिवसेना के संजय राऊत ने कहा कि इन शब्दों को स्थायी रूप से  संविधान से हटा दिया जाना चाहिये क्योंकि हम न तो धर्मनिरपेक्ष हैं और ना ही समाजवादी। संजय राऊत के राजनैतिक गुरू दिवंगत बाल ठाकरे ने कई बार यह कहा था कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है। इस विज्ञापन में से ये दो महत्वपूर्ण शब्द गायब होने का कड़ा विरोध हुआ। अंततः, केंद्रीय मंत्री अरूण जेटली को यह घोषणा करनी पड़ी कि भविष्य में, सरकार, वर्तमान संविधान की उद्देष्यिका का ही उपयोग विज्ञापन आदि में करेगी।
यह सही है कि समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष शब्द मूल संविधान, जिसे सन् 1950 में लागू किया गया था, का हिस्सा नहीं थे परंतु संपत्ति का समान वितरण व देश के संसाधनों पर समुदाय का मालिकाना हक आदि जैसे समाजवादी मूल्य हमारी नीतियों का महत्वपूर्ण भाग थे। समाजवादी   श ब्द को इसलिये संविधान का हिस्सा बनाया गया क्योंकि यह महसूस किया गया कि यह शब्द हमारी आर्थिक नीतियों के सार को व्यक्त करता है। और यही कारण है कि सन् 1980 में भाजपा ने गांधीवादी समाजवाद को अपनी विचारधारा का हिस्सा घोषित किया।
मोदी सरकार के आने के बाद जो नीतियां लागू की गईं, उनसे यह स्पष्ट हो चला है कि अब देश के
संसाधनों पर कार्पोरेट घरानों का कब्जा होगा। ऐसे भी संकेत हैं कि ऐसी नीतियों और कार्यक्रमों को कमजोर या समाप्त किया जायेगा जो समाज के वंचित व कमजोर वर्गों की रक्षा और बेहतरी के लिए बनाये गये हैं। आश्चर्य  नहीं कि नई सरकार के लिये ‘समाजवादी’ शब्द शर्मिंदगी का सबब बन गया है। नई सरकार के सत्ता संभालने के बाद से राज्य का आर्थिक क्षेत्र में जो भी थोड़ा बहुत दखल था, वह समाप्त किया जा रहा है। यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बड़े उद्योग समूहों ने मोदी के चुनाव प्रचार के लिए धन मुहैय्या कराने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी। मोदी का अत्यंत मंहगा चुनाव प्रचार अभियान लगभग पूरी तरह कार्पोरेट घरानों द्वारा प्रायोजित था।
जहां तक धर्मनिरपेक्षता का प्रश्न  है, वह भारत के संविधान की मूल आत्मा है। संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 में राज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को विस्तार दिया गया है। धर्मनिरपेक्षता हमारे पूरे संविधान में रची बसी है। आपातकाल के भयावह दौर में इन दो षब्दों को उद्देष्यिका में शायद इसलिये जोड़ा गया था क्योंकि तत्कालीन तानाशाह सरकार को यह लगता था कि ऐसा करने से उसके शासन को कुछ वैधता मिलेगी। ये शब्द हमारे संविधान की मूल आत्मा के खिलाफ नहीं हैं बल्कि एक तरह से उसके चरित्र का संक्षिप्तिकरण भर हैं ।
तो फिर विज्ञापन में इन शब्दों को गायब करने का क्या उद्देष्य था? शिवसेना के प्रवक्ता का कहना था कि अगर यह भूल से भी हुआ है तो इस भूल को स्थायी बना दिया जाना चाहिए। मूल मुद्दा यह है कि भाजपा और शिवसेना, धर्मनिरपेक्षता को हमारे राष्ट्र और हमारे राज्य का पथ-प्रदर्शक सिद्धांत मानने को तैयार नहीं हैं। उनका राजनैतिक एजेण्डा बहुवाद, विविधता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा में विष्वास नहीं रखता। शुरूआत से ही वे धर्मनिरपेक्ष-भारतीय राष्ट्रवाद के मुकाबले हिंदुत्व-हिंदू राष्ट्रवाद को वरीयता देते आए हैं। जब भी उन्हें मौका मिला, उन्होंने अपनी इस पसंद को खुलकर व्यक्त किया और सत्ता में आने पर हिंदू राष्ट्र की स्थापना की ओर देश को ले जाने की कोशिश की। हाल के चुनाव में मिली भारी सफलता के बाद उनकी हिम्मत और बढ़ गई है।
ये शब्द संविधान में आपातकाल के दौरान शामिल किये गये थे। आपातकाल के बाद बनी जनता सरकार ने घोषणा की थी कि वह आपातकाल में लिये गये सभी निर्णयों को पलटेगी परंतु उसने इन शब्दों को संविधान की उद्देष्यिका से नहीं हटाया क्योंकि वह जानती थी कि भारत के अधिकांश नागरिकों में इसकी अच्छी प्रतिक्रिया नहीं होगी। यहां हमें यह याद रखना होगा कि वाजपेयी और आडवाणी जैसे भाजपा के दिग्गज इस सरकार का हिस्सा थे। बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, हिंदू राष्ट्र शब्द प्रमुखता से चर्चा में आया। सन् 1998 में एनडीए गठबंधन के शासन में ऐसे संकेत दिये गये कि सरकार संविधान में आमूलचूल परिवर्तन करने की इच्छुक है। परंतु इस प्रस्ताव का इतना कड़ा विरोध हुआ कि एनडीए सरकार ने संविधान पुनर्वालोकन समिति की सिफारिशों को लागू न करने का निर्णय लिया।
अब, जबकि भाजपा को लोकसभा में बहुमत प्राप्त है, इस प्रकार के कदम उठाकर पार्टी हवा का रूख भांपना चाहती है। वह यह जानना चाहती है कि अपने एजेण्डे को लागू करने के लिए वह किस हद तक जा सकती है। हालिया कदम पर हुई कड़ी प्रतिक्रिया और विरोध के बाद सरकार ने यह निर्णय किया है कि वह उद्देष्यिका के उसी संस्करण का प्रयोग करेगी जिसमें धर्मनिरपेक्ष व समाजवादी शब्द हैं। धर्मनिरपेक्ष शब्द को संविधान से हटाने का प्रयास, दरअसल, एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है। भाजपा सरकार पहले से ही संघ परिवार के एजेण्डे को लागू करने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है। संघ बार-बार, लगातार, जोर-जोर से यह कह रहा है कि हम सब हिंदू हैं और यह एक हिंदू राष्ट्र है। इसके साथ ही, गीता को राष्ट्रीय पुस्तक का दर्जा देने की बात भी कही जा रही है। भाजपा के कुछ नेता अल्पसंख्यकों को अपमानित और बदनाम करने में लगे हैं। कुछ लोग मुसलमानों को हरामजादे कह रहे हैं तो कुछ महात्मा गांधी के हत्यारे को देशभक्त बता रहे हैं। दूसरी तरफ, समाज को  धार्मिक आधार पर धु्रवीकृत करने के प्रयास भी जारी हैं। कहीं चर्च में आग लगाई जा रही है तो कहीं आराधनास्थल में मरा हुआ सुअर फेंका जा रहा है। लवजिहाद के नाम पर भी सांप्रदायिकता का कार्ड खेला जा रहा है।
भारतीय संविधान के निर्माताओं ने स्वाधीनता संग्राम के मूल तत्वों, नीतियों और मूल्यों को संविधान का हिस्सा बनाया था। जो लोग संविधान से कुछ शब्दों को हटाने या उनकी आवश्यकता या औचित्य पर बहस की आवश्यकता बता रहे हैं वे भारतीय राष्ट्रवाद के विरोधी हैं और देश को हिंदू राष्ट्रवाद की ओर ले जाना चाहते हैं। उनका भारत के स्वाधीनता संग्राम से जुड़ाव नहीं है। यह केवल किसी शब्द को हटाने या रखने की लड़ाई नहीं है बल्कि यह भारतीय स्वाधीनता संग्राम के मूल्यों और धार्मिक राष्ट्रवाद के बीच संघर्ष है।
-राम पुनियानी

शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

गांधी के अहिंसक जादू ने सारी दुनिया को प्रभावित किया


गौतम बुद्ध के बाद यदि किसी भारतीय ने विश्व के चिंतन को प्रभावित किया है तो उसका नाम है मोहनदास करमचन्द गांधी। जहां गौतम बुद्ध के दर्शन और चिंतन का प्रभाव एशिया महाद्वीप के देशों तक सीमित था वहीं महात्मा गांधी ने दुनिया के सभी महाद्वीपों को प्रभावित किया है। महात्मा गांधी के विचारों ने एशिया के अलावा अफ्रीका, यूरोप और अमरीका को भी प्रभावित किया।
इस तथ्य को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने भारत प्रवास के दौरान भी स्वीकारा। उन्होंने बार-बार कहा कि मैं दो महान व्यक्तियों से प्रभावित हूं-एक महात्मा गांधी और दूसरे अमरीका के डाॅ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर। डाॅ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर स्वयं भी महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे। उन्होंने अमरीका में गांधी की अहिंसक रणनीति के अनुरूप अश्वेतों के साथ होने वाले भेदभाव के विरूद्ध आंदोलन किया था।
महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर नेल्सन मंडेला ने भी दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासियों को वहां के गोरे शासकों की जंजीरों से मुक्त कराया था। उसी तरह अमरीका के डाक्टर मार्टिन लूथर किंग ‘जूनियर’ ने गांधी की अहिंसक रणनीति को अपनाकर वहां के काले लोगों को नागरिकता के वे सब अधिकार दिलाये थे, जो उन्हें प्राप्त नहीं थे। यूरोप के अनेक देशों के अनेक चिंतकों ने यह महसूस किया है कि शान्ति और अहिंसा के रास्ते पर चलकर ही इंसान सुकून का जीवन जी सकता है।
मेरे पास एस किताब है जिसका शीर्षक है
“Mahatma Gandhi as Germans see him” (महात्मा गांधी जर्मनों की नजर में)। यह किताब महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी (अक्टूबर 2, 1969) के अवसर पर प्रकाशित हुई थी। किताब में जर्मनी के 10 जाने माने विद्वानों के विचार शामिल किए गए हैं। किताब की भूमिका पश्चिमी जर्मनी के तत्कालीन चांसलर (चांसलर का पद हमारे देश के प्रधानमंत्री के समकक्ष है) ने लिखी है। विद्वानों के लेखों के साथ किताब में उन ग्रन्थों की सूची प्प्रकाशित की गई है जो गांधी के बारे में जर्मन भाषा मेंप्रकाशित हुए हैं। जर्मन भाषा में गांधी जी के बारे में 112 ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं। सूची के प्रारंभ में लिखा गया है कि सूची में प्रमुख ग्रन्थों को ही शामिल किया गया है।
चांसलर कुर्टजर्ग किसिंगर लिखते हैं ‘‘गांधी दुनिया के उन महान लोगों में से एक हैं जिनने मानव मात्र की सेवा की है और राष्ट्रों के शांतिपूर्ण ढंग से स्वतंत्र रहने के अधिकार के लिये संघर्ष किया है। बुरी तरह से विभाजित यूरोप गांधी के विचारों से प्रभावित है। हम जर्मनी के निवासी, महात्मा गांधी पर उतनी ही श्रद्धा करते हैं जितनी की भारतवासी करते हैं।’’
कुर्टजर्ग अपनी भूमिका में कहते हैं कि कुछ समय पहले जवाहरलाल नेहरू ने टेगौर की जन्मशती के अवसर पर प्रकाशित किताब में लिखा था कि गांधी एक चमकदार प्रकाशपुुंज की तरह भारत के आकाश में चमके थे और उनके प्रकाश से सारे भारतवासी जाग्रत हो उठे थे। वे गांधी की तुलना टैगोर से करते हैं। गांधी का प्रभाव वैसा नहीं था जैसा भूकंप का होता है वरन् उनका प्रभाव वैसा था जैसे पहाड़ों के पीछे से सूर्याेदय का होता है। सच पूछा जाए तो यदि टैगोर एक चिंतक थे तो गांधीजी एक मैदानी व्यक्ति थे। जहां टैगोर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक थे वही गांधी त्याग और सादगी के जीते जागते उदाहरण थे। परन्तु दोनों सच्चे अर्थों में भारतीय थे। ये शब्द एक ऐसे व्यक्ति के हैं जो गांधी के उत्तराधिकारी बने। नेहरू, गांधी के महानतम शिष्य होने के बावजूद अनेक मुद्दों पर गांधी से सहमत नहीं होते थे और विरोधी विचार रखते थे। गुरू-शिष्य का यह नाता भी अद्भुत था। वैसे गांधी ने यूरोप के इतिहास पर तूफानी प्रभाव नहीं डाला था परन्तु उनके विचारों ने यूरोप में एक ऐसी ज्योति जलाई है जो सदियों तक प्रकाश देती रहेगी’’। इस किताब में जर्मनी के महान चिंतकों के विचार शामिल किए गए हैं। इन सब चिंतकों ने गांधी को अपने-अपने नजरिए से समझने और पहचानने का प्रयास किया है। जैसे एक धार्मिक मामलों के विद्वान ने गांधी के व्यक्तित्व के धार्मिक पहलुओं को भारत की उच्च धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं के संदर्भ में समझने का प्रयास किया है। राजनीतिक विषयों के विशेषज्ञ ने गांधी के राजनीतिक विचारों की अपने ढंग से मीमान्सा की है। समाज शास्त्रियों ने जनता पर गांधी के जादुई प्रभाव का विष्लेषण किया है। गांधी के व्यक्तित्व के उस रूप को समझने का प्रयास किया है जो आम लोगों को गांधी के तरफ चुंबक के समान खींचता था। आध्यात्मिक विषयों के ज्ञाता ने पूरे विश्व पर गांधी के आध्यात्मिक प्रभाव को समझाने का ईमानदार प्रयास किया है। किताब में उन बातों को समझने का प्रयास किया गया है जिसके चलते दुनिया ने शांति के लिए एक नया रास्ता खोजने की आवश्यकता महसूस की। लेखकांे ने गांधी को एक आदर्शवादी महानायक के रूप में नहीं समझा परन्तु एक व्यवहारिक आदर्शवादी व्यक्ति माना। इस व्यक्ति को पैदा हुए सौ साल बीत गए हैं। अपने लंबे जीवन में वे जिन समस्याओं से जूझे हैं उनने भी नया रूप धारण कर लिया है। एक दुबले पतले व्यक्ति, जो हमेशा अपने आधे शरीर को सफेद कपड़े से ढंके रहते थे, उससे एक अजीब असाधारण ज्योति निकलकर आम आदमी में नई चेतना का संचार करती रही। उनके विचारों से विश्व  भिन्न-भिन्न तरीकों से प्रभावित हुआ है।
अब इस बात की कल्पना असंभव है कि ताकत से दुनिया की समस्याएं हल हो सकती हैं। एक लंबे अंतराल और अनुभव के बाद विश्व इस नतीजे पर पहुंचा है। जंगल के कानून के दिन लद गए हैं। अनेक पीढि़यों के प्रभावशाली प्रयासों के कारण आम आदमी की दैहिक ताकत अब अप्रासंगिक हो गई है। मानव की इस सोच के विकास में गांधी की अद्भुत भूमिका है। जहां आम आदमी ने गांधी के इस संदेश को अपना लिया है वहीं राष्ट्रों ने अभी तक इसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है। शायद कुछ समय लगेगा जब राष्ट्रों के चिंतन से ‘ताकत’ के उपयोग की बात पूरी तरह से समाप्त हो जायेगी, भले ही ऐसी स्थिति के निर्माण में समय लगे। जर्मनी समेत यूरोप का आम आदमी अब गांधी के इस विचार को आत्मसात करने लगा है। सुकरात ने अपने विचारों की प्रासंगिकता अपनी मृत्यु से सही सिद्ध की थी। उसी तरह गांधी जी ने भी अपनी ‘‘मृत्यु’’ (हत्या) से अपने विचारों की उपयोगिता और प्रासंगिकता सिद्ध कर दी थी।
किताब में शामिल अन्य लेखों के शीर्षक हैं बुद्ध से गांधी, भारत की महान आत्मा, महात्मा गांधी का भारत के धार्मिक इतिहास में स्थान, महात्मा और सविनय आन्दोलन, इतिहास में गांधी की भूमिका और स्थान, गांधी के आध्यात्मिक संदेश की प्रकृति और प्रभाव एवं गांधी जी की धरोहर।
जर्मनी, जिसने दो विश्व महायुद्धों की विभीषिका की त्रासदी भुगती है, शांति और अहिंसा का मतलब समझने लगा है। जर्मनी ने दुनिया के सबसे ज्यादा क्रूर व्यक्ति (हिटलर) के काले कारनामे भुगते हैं। वहां के लोग अब अपने बीच एक और हिटलर पैदा नहीं होने देना चाहते हैं। हिटलर ने जर्मनी को वैचारिक रूप से बांट दिया था। हिटलर ने यहूदियों के प्रति जबरदस्त घृणा पैदा की थी। इतिहास का सबक है कि घृणा पर आधारित मनुष्य और राष्ट्र ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रह सकते हैं। जर्मनी के नागरिक जीना चाहते हैं। इसलिये वे गांधी की तरफ देख रहे हैं। जर्मनी के महान नागरिक अलबर्ट आइंस्टाईन, जिन्हें जर्मनी से इसलिये भागना पड़ा था क्योंकि वे यहूदी थे, ने गांधी की मृत्यु पर कहा था ‘‘आने वाली पीढि़यां विश्वास नहीं करेंगी कि हाडमांस का ऐसा आदमी कभी पैदा हुआ था।’’
गांधी का प्रभाव अफ्रीका महाद्वीप पर अद्भुत था। अफ्रीका के महानतम नागरिक नेल्सन मंडेला सच्चे अर्थों में गांधी के शिष्य थे। दक्षिण अफ्रीका पर मुट्ठीभर गौरों का राज था। ये गोरे शासक वहां के मूल निवासियों पर तरह-तरह के जुल्म करते थे। गोरे शासक इन मूल नागरिकों को इंसान नहीं समझते थे। उनके साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भेदभाव होता था। गांधी जी ने स्वयं उनके हकों के लिये आंदोलन किया था। बाद में वहां पर अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई। इसके नेतृत्व में वहां के मूल निवासियों, जिन्हें काले कहा जाता था, ने एक लंबा संघर्ष किया। इस संघर्ष के प्रमुखतम नेता नेल्सन मंडेला थे। उनका फैसला था कि देश की आततायी सरकार के विरूद्ध अहिंसा के रास्ते से लड़ा जाएगा। एक लंबे समय तक मंडेला और उनका संगठन अहिंसक तरीके से संघर्ष करता रहा। परन्तु जब उनने देखा कि वहां की सरकार दिन प्रतिदिन और क्रूर होती जा रही है और तरह-तरह की ज्यादतियां करती जा रही है तो मजबूर होकर मंडेला को अहिंसा का रास्ता त्यागना पड़ा। ऐसा करने के पहले उनने बापू से क्षमा मांगी थी। अहिंसा का रास्ता त्यागने के बाद उन्होंने कहा था कि वे भले ही अहिंसा का रास्ता त्याग रहे हैं परन्तु उनके नये आंदोलन का स्वरूप ऐसा होगा जिसमें शत्रु तक की हत्या नहीं की जायेगी और न ही किसी इंसान को पीड़ा पहुंचाई जाएगी। उन्होंने लगभग बापू से माफी मांगते हुए कहा कि हिंसक आंदोलन के चार प्रकार हो सकते हैं-पहला तोड़फोड़, दूसरा गुरिल्ला युद्ध, आतंकी गतिविधियां और खुली क्रांति। इनमें से हम सिर्फ तोड़फोड़ का रास्ता अपनाएंगे और कोशिश रहेगी कि एक बूँद खून न बहे। मंडेला अपने वचन पर कायम रहे। वैसे तो जब वे शांतिपूर्ण आंदोलन करते थे तब उनकी और उनके समर्थकों की आयेदिन गिरफ्तारी होती थी। परन्तु आंदोलन का रूप बदल देने के कारण मंडेला और उनके समर्थकों पर जुल्मांे का पहाड़ टूट पड़ा। अपने अनेक समर्थकों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने उन्हें 27 वर्ष तक जेल में रखा। जेल में उन पर तरह-तरह के जुल्म किये गये। उन्हें अनेक बार जेल से छोड़ने का प्रलोभन दिया गया परन्तु वे हमेशा कहते थे कि जब पूरा दक्षिण अफ्रीका एक तरह का जेल है तो अकेले मेरी मुक्ति से क्या होगा। जब तक दक्षिण अफ्रीका पर से गोरी सरकार का साया नहीं हटता है तब तक मेरी मुक्ति बेमानी है। और वे अंततः जेल के बाहर उस समय आए जब पूरे देश  की सत्ता वहां के मूल निवासियों के हाथ में सौंपने का निर्णय हुआ।
इसी तरह, अमरीका के महान नेता डाक्टर मार्टिन लूथर किंग ‘‘जूनियर’’ तो सौ प्रतिशत गांधी के शिष्य थे। वर्षों पूर्व अब्राहम लिंकन ने वहां के काले नागरिकों को गुलामी के अभिशाप से मुक्त कर दिया था उसके बावजूद अमरीका में काले निवासियों के साथ भेदभाव किया जाता था। बसों में, दफ्तरों, सिनेमा हाल में, कारखानों में, ऐसी कोई जगह नहीं थी जहां भेदभाव नहीं होता था। बसों में कुछ सीटों पर लिखा रहता था ‘‘सिर्फ गोरों के लिये’’। एक दिन एक काली महिला गोरों के लिए आरक्षित सीट पर बैठ गई और धमकियों के बावजूद, पुलिस द्वारा ताकत का प्रयोग करने के बाद भी बार-बार उस सीट पर बैठती रही। उसके बाद अमरीका में एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन प्रारंभ हो गया। उस आंदोलन का नेतृत्व किया डा. किंग ने। आज से 50 वर्ष पूर्व डा. किंग के नेतृत्व में अमरीका की राजधानी वाशिनगटन में एक विशाल प्रदर्शन हुआ था। इस प्रदर्शन में लगभग 2 लाख लोगों ने भाग लिया। विशाल जनसमुदाय को संबोधित करते हुए जो भाषण डा. किंग ने दिया था, उसने दुनिया के इतिहास में स्थान बना लिया है। वह भाषण ‘‘आई हेव ए ड्रीम’’ (मेरा एक सपना है) के शीर्षक से सारी दुनिया में प्रसिद्ध है। महात्मा गांधी, डा. किंग के प्रेरणा पुरूष थे। महात्मा गांधी के संदेश को समझने और उसे आत्मसात करने के लिये डा. किंग ने अपनी पत्नी और कुछ प्रमुख सहयोगियों के साथ भारत की यात्रा की थी। अमरीका से रवाना होने के पूर्व उन्होंने कहा था कि मैंने अनेक देशों की यात्रा की है पर मैंने इन सभी देशों की यात्रा एक पर्यटक की हैसियत से की थी, परन्तु भारत मेरे लिये एक तीर्थस्थान है। भारत इसलिए तीर्थस्थल है क्योंकि वह महात्मा गांधी की जन्मभूमि और कर्मभूमि है। इसलिए मैं भारत एक तीर्थ यात्री के रूप में जा रहा हूँ। डा. किंग ने काले लोगों के अधिकारों के लिये अनेक आंदोलन किए। ऐसे ही एक आंदोलन की सफलता के बाद डा. किंग के एक सहयोगी ने कहा कि वे भारत की यात्रा पर क्यों नहीं जाते और स्वयं इतिहास के उन क्षणों को नहीं जीते हैं जिन क्षणों में महात्मा गांधी ने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी। सुझाव के अनुसार वे भारत की यात्रा पर निकल पड़े और 9 फरवरी 1959 को बम्बई पहुंचे। बम्बई से वे दिल्ली पहुंचे, जहां प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनके सम्मान में एक भोज का आयोजन किया। नेहरू के साथ भोज के बाद डा. किंग ने चार घंटे बिताए। भारत के भ्रमण के दौरान हमारे यहां के गरीबों की स्थिति देखकर उनका मन दुःखी हो उठा। उन्हें बताया गया था कि करीब पांच लाख लोग बारह महीने बंबई में खुली आसमान के नीचे सड़कों पर सोते हैं। भारत के लोगों की स्थिति देखकर उन्होंने कहा कि यहां हालत भी बदतर हैं। डा. किंग भारत के दलितों की स्थिति देखकर काफी दुःखी हुए थे। वे एक ऐसे स्कूल में गए थे जहां दलित बच्चे पढ़ते थे। जब वे स्कूल में पहुंचे तो स्कूल के प्राचार्य ने उनका परिचय इन शब्दों में किया था ‘‘ये अमरीका में रहने वाले अछूत हैं’’।
भारत प्रवास के दौरान वे गुजरात में स्थित साबरमती आश्रम गए और वहां कुछ दिन बिताए। वे अनुभव करना चाहते थे कि इस स्थान से कैसे गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े आजादी के आंदोलन का नेतृत्व किया। वे अपने प्रवास के दौरान राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद से मिले। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रसिद्ध गांधीवादी आचार्य कृपलानी से भी भेंट की। साबरमती आश्रम के बारे में उन्होंने लिखा है कि उनने उस स्थान पर एक महान आध्यात्मिक भावना का अनुभव किया। डा. किंग को बताया गया कि कैसे गांधी ने 322 किलोमीटर की पदयात्रा की थी। गांधी जी की इस महान ऐतिहासिक मार्च की चर्चा करते हुए डा. किंग ने अपने सहयोगियों को बताया कि गांधी जी ने मार्च में शामिल अन्य लोगों से कहा था ‘‘यदि तुम्हें पीटा जाता है तो भी पीटने वाले पर हमला न करो। यदि तुम्हारे ऊपर बंदूक चलाई जाती है तो भी कभी हथियार न उठाओ। यदि वे तुम्हें गाली देते हैं तो चुपचाप सुनो। इस सबके बावजूद चलते रहो, हो सकता है मंजिल पर पहुंचने के पहले हम में से कुछ मर जाएं, हम में से अनेकों को जेल भेज दिया जाए। इस सबके बाद भी हम चलते रहें और डा. किंग अंत में कहते हैं, कि वे (गांधी) चलते रहे।
डा. किंग की जीवनगाथा के लेखक लिखते हैं कि भारत की तीर्थयात्रा के बाद वे अनेक गांधीवादियों से ज्यादा गांधीवादी बन गए। वे भारत, गांधी जी के बारे में सब कुछ जानने के लिए आए थे। भारत की यात्रा के दौरान उन्होंने जो भी सुना, देखा, पढ़ा उसके बाद वे महान गांधीवादी बन गए।
-एल.एस. हरदेनिया