गुरुवार, 27 अगस्त 2015

आरक्षण समाप्त करने का नया जादू

गुजरात में नागपुर की प्रयोगशाला है, उस प्रयोगशाला में पहले व्यापक पैमाने पर लूटपाट व नरसंहार किया गया था. अब उसी प्रयोगशाला में दो-तीन महीने की कड़ी मेहनत के बाद पिछड़ों व दलितों के आरक्षण को समाप्त करने के लिए नया प्रयोग शुरू हुआ है. गुजरात की रैली में जानबूझ कर पुलिस लाठीचार्ज व उसके बाद भड़काई गयी हिंसा ने अरबों रुपये की परिसंपत्तियों को नष्ट कर दिया तथा हिंसा करने का जो प्रयोग संघी प्रयोग शाला मुसलमानों के खिलाफ करती आ रही थी, वह अपनी ताकत को पुन: दिखाने के लिए अमादा थी और दिखाया और जिस तरीके से गुजरात पुलिस ने लोगों के घरों में घुसकर महिलाओं, बच्चों, पुरुषों को पीटा तथा संपत्ति को नुकसान पहुँचाया है यही काम पूर्व में मुसलमानों के खिलाफ गुजरात पुलिस ने किया था. गुजरात पुलिस का चरित्र संघ की प्रयोगशाला से निर्मित विचारों से ओत-प्रोत होने के कारण उसने जनता को जगह-जगह मारा पीटा व गोलियां चलाई. इस सब हिंसा और प्रतिहिंसा के बीच संघ आरक्षण को समाप्त करने का कार्य करना चाहती है. अगर पाटीदार जाति ओबीसी में शामिल हो जाती है तो गुजरात में पिछड़े वर्ग के आरक्षण का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा. अगर नहीं हो पाती है तो जैसा हार्दिक पटेल ने कहा है कि पटेल-पाटीदार को आरक्षण नहीं तो किसी को आरक्षण नहीं होना चाहिए.
संघी हिन्दुवत्व से प्रभावित सवर्ण जाति के कुछ तत्व बराबर आरक्षण की मांग कर रहे हैं या आरक्षण समाप्त करने की. इस पूरे आन्दोलन को आरएसएस का वैचारिक समर्थन प्राप्त था, बगैर उसकी मदद के इतना बड़ा आन्दोलन खड़ा करना हार्दिक पटेल के बस की बात नहीं थी.
                     संघ के ऊपर हमेशा एक अवसर को छोड़ कर महाराष्ट्र की चितपावन ब्राह्मण जाति का कब्ज़ा रहा है और आज भी प्रमुख पदाधिकारीगण चितपावन ब्राह्मण जाति के हैं वह किसी भी कीमत पर दलितों व पिछड़ों को आरक्षण नहीं देना चाहते हैं. जब देश के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू की थी तो पूरे देश के अन्दर आरएसएस ने एक तूफ़ान खड़ा कर दिया था और मंडल पर कमंडल लागू करने का कार्य किया था और जब आज कमंडल का ही शासन है तो वह पूरी तरह से देश को मनुस्मृति के दौर में देश को ले जाना चाहती है और उसमें सवर्ण जातियों का शासन हो और बाकी जातियां सेवक की भूमिका में हों ऐसा सामाजिक ढांचा तैयार करने के लिए नागपुर की प्रयोगशाला किसी भी कीमत पर बनाना चाहती हैं उसी का परिणाम है गुजरात में होने वाली हिंसा और पुलिस द्वारा की जा रही प्रति हिंसा, जिससे आरक्षण समाप्त करने की बात को आगे ले जाया जा सके. संघ की प्रयोगशाला का आरक्षण समाप्त करने का नया जादू कितना चल पाता है यह तो वक्त बताएगा.   

सुमन 

बुधवार, 26 अगस्त 2015

मोदी का नया अवतार

गुजरात, प्रधानमंत्री मोदी की वजह से आजकल चर्चित रहता है. पहले आजादी की लड़ाई में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ सफल संघर्ष चलाने वाले महानायक मोहन दास करमचंद गाँधी के कारण चर्चित रहा है आजादी के बाद नेहरु मंत्रीमंडल के उप-प्रधानमंत्री व गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल के कार्यों के कारण चर्चा में रहा है. मोदी जब मुख्यमंत्री थे, मुसलमानों के नरसंहार के समय उनके मूक दर्शक होने के कारण गुजरात चर्चित रहा है. मोदी आरएसएस के प्रचारक रहे हैं और महात्मा गाँधी को किसी भी रूप में न मानने के लिए चर्चित संघ रहा है और गाँधी की हत्या में भी संघ का नाम आया और सरदार पटेल ने संघ के ऊपर प्रतिबन्ध लगा दिया था जो बाद में माफीनामे के बाद उसको सांस्कृतिक गतिविधियाँ करने की छूट मिली थी. आज मोदी गुजरात में चल रहे आन्दोलन को शांति करने के लिए जो अपील की है वह महात्मा गाँधी की फोटो व सरदार पटेल की फोटो के साथ की है. यह उनका नया अवतार माना जाए या राजनीति में सत्ता के शिखर के ऊपर बने रहने के लिए विचारों की तिलांजलि माना जाए. यह नया मुखौटा प्रधानमंत्री पद पर बने रहने के लिए मजबूरी है या जरूरी है.
ज्ञातव्य है कि गुजरात में रिजर्वेशन की मांग कर रही पटेल-पाटीदार कम्युनिटी का आंदोलन हिंसक हो जाने के बाद राज्य के बड़े शहरों में तनाव है। अहमदाबाद और सूरत में असर सबसे ज्यादा है। हालात काबू करने के लिए गांधीनगर से आर्मी की एक टुकड़ी अहमदाबाद बुलवाई गई। इससे पहले कुछ लोगों ने पटरियां उखाड़कर कोयले से लदी एक मालगाड़ी में आग लगाने की भी कोशिश की। वहीं, मंगलवार रात से अब तक हुई हिंसा की वजह से उत्तरी गुजरात के पालनपुर में दो लोगों की मौत हो गई। इस तरह हिंसा के चलते अब तक सात लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीच, केंद्र ने पैरामिलिट्री फोर्सेस की 60 कंपनियां  भेजी हैं।
गुजरात में चल रहे मुसलमानों के नरसंहार के समय न महात्मा गाँधी की बात आई थी और न ही सरदार पटेल ही याद आये थे. आज यह अपील अद्भुत अपील है - महात्मा गांधी और सरदार पटेल की तस्वीरों के साथ गुजरात की जनता को टीवी पर दो मिनट छह सेकेंड के इस संबोधन में मोदी ने कहा, 'मेरी सभी भाइयों और बहनों से विनती है कि उन्हें हिंसा का मार्ग नहीं अपनाना चाहिए। इस समय हमारा एक ही मंत्र होना चाहिए, शांति।'
 'हर समस्या का समाधान बातचीत द्वारा निकाला जा सकता है। लोकतंत्र की मर्यादा का पालन हम सबको करना चाहिए। मैं एक बार फिर गुजरात के सभी भाइयों और बहनों को शांति रखने का आग्रह करता हूं। हिंसा के मार्ग पर चलकर कभी कुछ नही मिलता। हम सब साथ मिलकर बातचीत के जरिए समस्या का समाधान करें।'
यह अपील जब गुजरात में सांप्रदायिक आधार पर अल्पसंख्यकों के साथ ज्यादती हो रही थी उस समय अगर आई होती तो निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मोदी का कद जनता के दिमाग में बढ़ गया होता लेकिन आज जब उनका स्वयं का वोट बैंक हिंसा के ऊपर उतर आया है तब वह शांति का पाठ पढ़ाकर गौतम बुद्ध का सन्देश देने की कोशिश कर रहे हैं और जब अल्पसंख्यकों का नरसंहार चल रहा था तब वह हिटलर की यहूदी विरोधी नीति का अनुसरण कर रहे थे. शायद राजनीति में सब कुछ जायज है. 

सुमन 

मंगलवार, 25 अगस्त 2015

याकूब मेमन के जनाज़े में मुसलमानों की भारी उपस्थिति


मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, याकूब मेमन की अंतिम यात्रा में लगभग 8,000 लोग शामिल हुए। सुप्रीम कोर्ट ने मेमन को 1993 के बंबई बम कांड के षड़यंत्र में शामिल होने का दोषी पाया था। सन् 1993 के 12 मार्च को बंबई के विभिन्न इलाकों में हुए श्रेणीबद्ध बम विस्फोटों में 257 निर्दोष लोग मारे गए थे। मेमन को 30 जुलाई, 2015 को फांसी दे दी गई।
मेमन के जनाज़े में इतनी बड़ी संख्या में लोगों के हिस्सा लेने पर सोशल मीडिया में काफी रोष व्यक्त किया गया और मुसलमानों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया। कुछ लोगों का मत था कि मुसलमान, सुप्रीम कोर्ट द्वारा मेमन को दोषी ठहराए जाने को स्वीकार करना ही नहीं चाहते और कुछ ने तो यहां तक कहा कि जो लोग उसके जनाज़े में शामिल हुएए वे आतंकवादियों के समर्थक व राष्ट्रविरोधी हैं। त्रिपुरा के राज्यपाल तथागत राय ने ट्वीट किया कि मेमन के परिवार वालों को छोड़कर, जो भी लोग जनाज़े में थे, वे सब भविष्य में आतंकवादी बन सकते हैं।
हमें यह समझने की ज़रूरत है कि मेमन की अंतिम यात्रा में इतनी भारी उपस्थिति क्यों रही। इसमें कोई संदेह नहीं कि मुसलमानों के एक तबके में मेमन के प्रति सहानुभूति थी। परंतु इसे आतंकवाद या आतंकवादियों के प्रति समर्थन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। मुसलमानों ने घृणाजनित अपराधों की भेंट चढ़े अपने प्रियजनों का दुख भोगा है। अज़मल कसाब सहित 10 पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 26 नवंबर, 2008 को मुंबई पर आतंकी हमला किया था। इनमें से नौ आतंकवादियों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया और अज़मल कसाब को जिंदा गिरफ्तार कर लिया गया। मुंबई के मुस्लिम संगठनों ने घोषणा की कि उन कब्रिस्तानों, जिनमें लावारिस लाशों को दफनाया जाता है, के दरवाजे इन आतंकियों के लिए बंद रहेंगे क्योंकि वे इस्लाम के सच्चे अनुयायी नहीं थे।
यह पहली बार नहीं है कि लोगों ने किसी अपराधी के प्रति सहानुभूति के चलते, उसके अंतिम संस्कार में भाग लिया हो। विभिन्न जातियों व धर्मों के लोग, बाहुबलियों की अंतिम यात्रा में शामिल होते रहे हैं। जिन लोगों ने फूलनदेवी के अंतिम संस्कार में भाग लिया था,वे सब आवश्यक रूप से उन लोगों के प्रति असंवेदनशील नहीं थे जो फूलनदेवी द्वारा डाली गई डकैतियों में मारे गए थे। उन्हें शायद केवल यह याद था कि फूलनदेवी स्वयं भी जातिगत दमन का शिकार थीं, यद्यपि उन्होंने इससे मुकाबला करने का गलत रास्ता चुना। वे उन्हें परिस्थितियों का शिकार व्यक्ति मानते थे और शायद फूलनदेवी के अपने दमनकर्ताओं के विरूद्ध हिम्मत से लड़ने के प्रशंसक थे.यद्यपि हो सकता है कि वे फूलनदेवी के प्रतिरोध के तरीके से सहमत न रहे हों। उस समय किसी ने यह नहीं कहा कि फूलनदेवी के अंतिम संस्कार में, उनके परिवारजनों को छोड़कर, जिन लोगों ने भाग लियाए वे सभी भविष्य में डकैत बन सकते हैं। मुंबई में गैंगस्टर वरदराजन मुदलियार के अंतिम संस्कार में धारावी के निवासियों, विशेषकर तमिलों, ने बड़ी संख्या में भाग लिया। परंतु क्या हम यह कह सकते हैं कि वे हत्या की सुपारी लेने वाले एक डॉन की मौत का शोक मना रहे थे?
बाल ठाकरे की शवयात्रा में करीब 12 लाख लोग शामिल थे। उनकी अंतिम यात्रा इतनी बड़ी थी कि दो किलोमीटर की दूरी तय करने में उसे पांच घंटे लग गए और पुलिस को व्यवस्था बनाए रखने के लिए मुंबई के बड़े हिस्से में ट्राफिक बंद करना पड़ा। जस्टिस मादोन आयोग ने भिवंडी, जलगांव और महाड में 1970 में हुए सांप्रदायिक दंगों में बाल ठाकरे की भूमिका की निंदा की थी। श्रीकृष्ण आयोग ने अपनी रपट में कहा था कि बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद, सुलगती मुंबई में बाल ठाकरे इस तरह निकले 'जैसे कोई दिग्गज जनरल अपनी सेना का नेतृत्व करते हुए निकलता है'। यह अलग बात है कि मुसलमानों और गैर.महाराष्ट्रियनों के बारे में भड़काऊ भाषण देने और दंगों में एक जनरल की तरह अपने सैनिकों का नेतृत्व करने के लिएए बाल ठाकरे पर कभी कोई मुकदमा नहीं चल सका। बाल ठाकरे के सैनिक, उनके हर आदेश को आंख बंद कर मानते थे.ट्रेड यूनियन नेताओं की हत्या कर दो, गैर.महाराष्ट्रियनों के विरूद्ध हिंसा करो,सिनेमा हालों और मीडिया के दफ्तरों पर हमला करो आदि। ठाकरे गर्व से कहते थे कि वे लोकशाही ;प्रजातंत्रद्ध में नहीं बल्कि'ठोकशाही' ;हिंसा और दादागिरी में विश्वास रखते हैं। और ये ठोकशाही वे तब करते थे जब उन्हें जे़ड प्लस सुरक्षा प्राप्त थी। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मुंबई में 1992.93 में हुए दंगों में 900 लोग मारे गए थेए जिनमें से 575 मुसलमान थे, 275 हिंदू व 50 अन्य थे। जस्टिस श्रीकृष्ण आयोग ने बाल ठाकरे को मुंबई दंगों का दोषी ठहराया था।
कानून से टकराने वालों के प्रति सहानुभूति
जो लोग कानून से टकराते हैं या उसका उल्लंघन करते हैंए उनके प्रति सहानुभूति के मुख्यतः तीन कारण होते हैं। पहलाए संबंधित व्यक्ति के परिवारजनों, चाहे वे उसकी हरकतों को अनुचित ही क्यों न मानते हों, की उसके प्रति सहानुभूति हो सकती है और उसके अंतिम संस्कार में भाग लेना, उनका मानवीय कर्तव्य तो बनता ही है। दूसरे, कब.जब लोग ऐसे व्यक्ति द्वारा, उनके जीवन में लाए गए परिवर्तन से प्रभावित रहते हैं और उसके द्वारा किए गए अपराधों को वीरतापूर्ण कार्य मानते हैं। इनमें से अधिकांश लोग वे होते हैं जिनकी सामाजिक.आर्थिक पृष्ठभूमि उसी व्यक्ति जैसी होती है और सामान्यतः वे दमित जातियों या नस्लीय समूहों या अल्पसंख्यक समुदायों जैसे हाशिए पर पड़े वर्गों से संबंधित होते हैं। वे स्वयं को कानून की चहारदिवारी के भीतर रहते हुए, अपने दमन और शोषण का प्रतिरोध करने में असहाय और असमर्थ पाते हैं और इसलिए वे समझ सकते हैं कि उस व्यक्ति के सामने, कानून से टकराने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। उन्हें यह भी लगता है कि उस व्यक्ति ने उनके दमनकर्ताओं का प्रतिरोध किया। जिन लोगों ने फूलनदेवी के अंतिम संस्कार में हिस्सा लिया, उनकी सोच शायद ऐसी ही कुछ रही होगी। अक्सर ऐसे व्यक्ति अपनी लूट का कुछ हिस्सा अपने दमित समुदाय के लोगों में बांटते हैं और इस कारण भी उन्हें उनका समर्थन मिलता है। उदाहरणार्थ, मुंबई का माफिया डॉन अरूण गवली, जो कि एक ओबीसी समुदाय से था,दगड़ी चाल के रहवासियों के बीच काफी लोकप्रिय था। उसी तरहए वरदराजन, धारावी के तमिलों के बीच खासा लोकप्रिय था। इनमें से अधिकतर, तमिल अनुसूचित व पिछड़ी जातियों के थे और दमित व शोषित थे।
हाशिए पर पड़े तबकों के कानून से भिड़ने वाले लोगों को रॉबिनहुड की तरह देखा जाता है। निःसंदेह, वे दमन और शोषण के ढांचे को उखाड़ फेंक नहीं पाते परंतु उनके कारण, दमित और शोषित लोगों को कुछ हद तक सम्मान और गरिमा का अनुभव होता है। उन्हें ऐसा लगता है कि उनके पास भी प्रतिरोध करने की ताकत है और कभी.कभी उन्हें आर्थिक लाभ भी होता है जैसे उनकी मज़दूरी में कुछ वृद्धि हो जाती है, उन्हें सामंती दमनकर्ताओं की बेगार नहीं करनी पड़ती और कब.जब वह व्यक्ति ही उन्हें कुछ रोज़गार दे देता है। हाशिए पर पड़े समुदायों के कानून से टकराने वाले लोगए बहुत लंबे समय तक खुलकर काम नहीं कर पाते और अंततः या तो उन्हें जंगलों में शरण लेनी पड़ती है और या वे वर्चस्वशाली श्रेष्ठि वर्ग के हितों की रक्षा के लिए काम करने लगते हैं। तस्कर, उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने लगते हैं और भू.माफिया, बिल्डरों का हित साधने लगता है।
मुस्लिम युवा
भेदभाव, शैक्षणिक व रोज़गार के अवसरों का अभाव व सांप्रदायिक हिंसा ने कुछ मुस्लिम युवाओं को बागी बनाया। उनके पवित्र प्रतीकों और विश्वासों ;जैसे यह दावा कि देश में 3,000 मस्जिदें,मंदिरों को तोड़कर बनाई गई हैं और उनके विरूद्ध क्रूर बलप्रयोग व हिंसाए उनकी मानसिकता पर गहरा प्रभाव डालते हैं और कभी.कभी उन्हें अमानवीय बना देते हैं।
मुज़फ्फरनगर के एक दंगा पीडि़त ने जब अपनी गांव की मस्जिद को आग में राख होते हुए देखा तो वह बच्चे की तरह फूट.फूटकर रोने लगा। उसने इस लेखक से कहा कि जिस गांव में उसकी मस्जिद जला दी गई, वह वहां कभी लौट नहीं पाएगा। उसने कहा कि गांव वापिस जाने का कोई मतलब नहीं रह गया है और वहां लौटने से उसके आत्मसम्मान और गरिमा को गहरी चोट पहुंचेगी। हरियाणा के बल्लभगढ़ के अटाली गांव में मुसलमानों को उस स्थान पर छत बनाने नहीं दी गई जहां वे पिछले 50 सालों से नमाज़ पढ़ रहे थे। और इस तरह के अनेक उदाहरण हैं। देश भर में इस तरह की कई घटनाएं हुई हैं। मुसलमानों को 'लवजिहाद' करने का दोषी ठहराया जाता हैए उन्हें आतंकवादी बताया जाता है, उन्हें उनकी खानपान की आदतें बदलने पर मजबूर किया जाता है और हिंदू संगठनों के कई नेता उन्हें यह याद दिलाते रहते हैं कि गुजरात और मुजफ्फरनगर फिर से हो सकते हैं। स्वाधीन भारत में मुंबई, भिवंडी, अहमदाबाद, मेरठ, अलीगढ, मुरादाबाद, गोधरा, सीतामढ़ी, भागलपुर, नेल्ली व अन्य स्थानों पर हुए दंगों में कम से कम 40,000 लोगों की जानें जा चुकी हैं। जिन लोगों ने अपनी जानें गंवाईं, उनके परिवारजनों को न्याय मिलने की कोई उम्मीद नहीं है और जब तीस्ता सीतलवाड जैसी मानवाधिकार कार्यकर्ता, गुजरात के सन 2002 के दंगा पीडि़तों को न्याय दिलवाने की पहल करती हैं तो राज्यतंत्र उन्हें जेल में डालने की कोशिश में जुट जाता है और उन्हें देश का दुश्मन बताया जाता है।
निःसंदेहए देश के कई बड़े अपराधी मुसलमान थे व हैं। इनमें हाजी मस्तान, करीम लाला, दाउद इब्राहिम व टाईगर मेमन जैसे लोग शामिल हैं। हम यह भी नहीं कहते कि जिन मुस्लिम युवकों पर पुलिस आतंकवादी होने का आरोप लगाती है, वे सभी निर्दोष हैं। परंतु साथ ही, यह मानना भी भूल होगी कि चूंकि पुलिस उन्हें आतंकवादी मानती है इसलिए वे आतंकवादी हैं। बड़ी संख्या में निर्दोष युवकों को आतंकी होने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया जाता है, उन्हें सालों तक ज़मानत नहीं मिलती और वे जेलों में सड़ते रहते हैं। बाद में अदालतें उन्हें निर्दोष बताकर बरी कर देती हैं। वे जब वापस आते हैं, तब तक उनके जीवन के सुनहरे साल निकल चुके होते हैं। कई बार उनकी पढ़ाई अधूरी छूट जाती है और उनका रोज़गार जाता रहता है। जब समुदाय को ऐसा लगता है कि उसे न्याय नहीं मिलेगा,तो कई युवक अपने स्तर पर, कानून की हदों से बाहर जाकर प्रतिशोध लेने के लिए निकल पड़ते हैं। उनके इस कदम से समुदाय का बड़ा हिस्सा असहमत नहीं होता और कुछ लोग उनसे सहानुभूति भी रखते हैं।
सांप्रदायिक हिंसा के पीडि़तों को सांप्रदायिक राजनीति का विरोधी होने का दावा करने वाली'धर्मनिरपेक्ष पार्टियों' जैसे कांग्रेस, राजद, सपा आदि के शासन में भी न्याय नहीं मिला। इसके अलावा, हिंदू राष्ट्रवादी संगठन और भाजपा नेता, लगातार सार्वजनिक विमर्श में सांप्रदायिकता का रंग घोलते आ रहे हैं। अपनी जातिगतए भाषायी व सांस्कृतिक विभिन्नता और अलग.अलग राजनैतिक वफादारियों के बावजू़द, पूरा मुस्लिम समुदाय ऐसा महसूस करता है कि वह निशाने पर है और चाहता है कि कोई ऐसा शक्तिशाली नेता उभरे, जो उन्हें राजनैतिक दृष्टि से एक करे व सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक न्याय दिलवाए।
मजलिस.ए.इत्तेहादुल मुस्लीमीन के नेता अकबरूद्दीन ओवैसी, इस स्थिति का लाभ उठाकर मुसलमानों के 'मजबूत नेता' और उसके एकमात्र प्रवक्ता के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे हैं। वे बहुत होशियारी से इस तरह की बातें करते हैं जो कानून या संविधान के विरूद्ध नहीं होतीं परंतु जिनकी मदद से वे मुस्लिम समुदाय की अन्याय का शिकार होने की भावना का लाभ उठा सकते हैं। वे हर उस पार्टी का विरोध करते हैं जो मुस्लिम समुदाय का समर्थन पाने की कोशिश करती है। वे केवल हैदराबाद तक सीमित अपनी पार्टी को अखिल भारतीय विस्तार देना चाहते हैं और सभी मुसलमानों का समर्थन हासिल करने के इच्छुक हैं। उन्हें लगता है कि वे देश की सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और मुसलमानों के हित के लिए काम करने वाले संगठनों का स्थान ले लेंगे। अगर पूरा मुस्लिम समुदाय किसी मुस्लिम पार्टी का समर्थक बन जाता है तो इससे एक ओर हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों को लाभ होगा तो दूसरी ओर, मुसलमानों की अशरफ बिरादरियों ;जातियोंद्ध के राजनैतिक श्रेष्ठिवर्ग को। सांप्रदायिक एजेंडे के आधार पर मुसलमानों को एक करने का प्रयास, संविधान में निहित समानता व सामाजिक न्याय और आर्थिक.शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों के सशक्तिकरण के एजेंडे को हाशिए पर धकेल देगा और उसे अप्रासंगिक बना देगा।
जनाज़े में भीड़
याकूब मेमन की अंतिम यात्रा में उमड़ी भीड़ को इस पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। यह मानना मूर्खता होगी कि जो लोग जनाज़े में शामिल थे, वे 12 मार्च 1993 के बम धमाकों.जिनमें 257 लोगों ने अपनी जानें गंवाई थीं.को उचित मानते हैं या उन्हें इन बम धमाकों के पीडि़तों से कोई सहानुभूति नही है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिन लोगों ने याकूब मेमन की अंतिम यात्रा में भाग लिया, वे सभी ये चाहते हैं कि बंबई श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों के याकूब मेमन सहित सभी दोषियों को उनके किए की सज़ा मिलनी चाहिए। परंतु उनका यह भी मानना है कि मेमन, मौत की सज़ा का हकदार नहीं था और ऐसे कई गैर.मुसलमान भी हैं, जिनकी यही मान्यता थी। कुछ लोग, जो मौत की सज़ा के खिलाफ हैं, उनका यह तर्क था कि याकूब मेमन ने आत्मसमर्पण किया था और जांच एजेंसियों को षड़यंत्र और षड़यंत्रकर्ताओं के बारे में सारी जानकारियां दी थीं इसलिए उसे कम सज़ा दी जानी चाहिए थी। दूसरी ओर, जो लोग मौत की सज़ा के पक्षधर हैं उनका  तर्क था कि 257 लोगों की मौत के लिए जि़म्मेदार अपराधियों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जानी चाहिए और चूंकि याकूब षड़यंत्रकारियों में शामिल था, इसलिए वह मौत की सज़ा का हकदार था। स्पष्टतः, जब मेमन को फांसी दिए जाने के समर्थकों और विरोधियों . दोनों में मुसलमान व हिंदू शामिल थे तब केवल मुसलमानों को दोषी ठहराने का क्या अर्थ है।
अगर हमें भारत के स्वप्न को जिंदा रखना है तो सभी भारतीयों को एक होकर ऐसी संस्थाओं का निर्माण करना होगा जो समुदाय, जाति, राष्ट्रीयता, नस्ल, लिंग व भाषा आदि का विचार किए बगैर, सब के साथ न्याय करें। हमें ऐसी संस्थाओं का निर्माण करना होगा जो सामाजिक व शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े वर्गों को . चाहे वे किसी भी जातिए धर्म, लिंग या नस्ल के हों . आगे बढ़ने में मदद करें और हमें ऐसी संस्थाओं का निर्माण भी करना होगा जो किसी लिंग, जाति, समुदाय या धर्म विशेष के लोगों के साथ हो रहे अन्याय को अनदेखा न करें। हमारे देश की सरकारें ऐसी होनी चाहिए जो जनता के प्रति जवाबदेह और जि़म्मेदार हों। अपराधों में कमी लाने का एक ही तरीका है.न्यायपूर्ण समाज का निर्माण। ज़ुल्म और उत्पीड़न से केवल 'नायकों' का जन्म होता है और हिंसा व प्रतिहिंसा के दुष्चक्र का। अगर न्याय नहीं होगा तो सज़ाएं चाहें कितनी भी कड़ी क्यों न हों, यह क्रम जारी रहेगा।
-इरफान इंजीनियर

सोमवार, 24 अगस्त 2015

कोहिनूर जैसा प्याज



साभार
सन 2019 में भारत के किसी मोहल्ले का एक दृश्य। एक घर में मोहल्ले की चार-पांच महिलाएं बैठी पारंपरिक ढंग से गपिया रही हैं। गपियाने के लिए उन्हें न किसी मुद्दे की तरकार थी, न किसी किसी प्रसंग की। उनकी गपगोष्ठी तो राह चलते भी हो जाया करती थी। दो या तीन महिलाओं को बाजार जाना हो, तो वे पूरे रास्ते में ही इस पुनीत कार्य को अंजाम दे देती थीं। इसके लिए उन्हें न तो संसद जैसी कार्यप्रणाली की जरूरत थी, न पक्षी-विपक्षी सांसदों की, जो एक सुर में तो जैसे बोलना ही नहीं जानते। हल्ला-गुल्ला, शोर-शराबा मचाने के लिए ही जैसे संसद जाते हों। बाकी जगह शोर-शराबा मचाने पर जैसे रोक लगी हुई हो। 
हां, तो बात हो रही थी एक घर में महिलाओं के गपियाने की। तो आपके बता दें कि गपियाने के लिए बैठी महिलाओं के बीच शीशे के एक केस में रखा लगभग एक सौ पचहत्तर ग्राम का लाल सुर्ख प्याज अपने भाग्य पर इतरा रहा था। एक महिला ने प्याज को प्यार से निहारते हुए कहा, 'बहन! कितने में पड़ा यह कोहिनूर जैसा प्याज?'
प्याज की मालकिन ने इतराते हुए कहा, 'दीपो की मम्मी...दो सौ तीस रुपये पाव बिक रहा है इन दिनों प्याज। पौने दो सौ ग्राम प्याज का दाम हिसाब लगाकर देख लो। दुकानदार तो हमें लूट ही लेता...वह तो कहो, मेरी चतुराई काम आ गई। मैंने दुकानदार को डपट दिया। हमें कोई नंगा भूखा समझ रखा है क्या? हफ्ते में एकाध दिन हम भी पचास ग्राम प्याज खाते हैं। ठीक..ठीक बताओ। तब जाकर उस नासपीटे ने प्याज के सही दाम लगाए। सल्लू के पापा तो..तुम जानती ही हो बहिनी..एकदम चुगद हैं। आटे भरी बोरी समझो उनको..जिसको जिधर उठाकर रख दिया, तो वैसे ही पड़े रहते हैं। तीन-पांच तो उन्हें जैसे आता ही नहीं है। मेरी बात पर तो सल्लू के पापा बस बिटर-बिटर खड़े मेरा मुंह ताकते रहे।' यह कहकर महिला सांस लेने के लिए रुकी।
दीपो की मम्मी कुछ बोलने का प्रयास करें, उससे पहले ही मिसेज गुप्ता बोल बैठीं, 'प्याज भी तो देखो...कितना सुर्ख है! लगता है, नासिक वाला है। एक बात कहूं, नासिक वाले प्याजों में एक अजीब-सी गंध आती है। मुझे तो उत्तर प्रदेश वाले प्याज ही अच्छे लगते हैं। मैं तो दो महीने पहले दो सौ पंद्रह ग्राम प्याज लाई थी। नासपीटे दुकानदार ने उत्तर प्रदेश वाला बताकर नासिक का प्याज थमा दिया।' 
मिसेज गुप्ता की बात पूरी हो पाती इससे पहले ही मिसेज चौहान बोल उठीं, 'चल झूठी कहीं की...साल में दो बार ही दीपावली और होली पर तेरे घर में प्याज आता है। कहती है कि दो महीने पहले प्याज लाई थी। यह तो हम लोग हैं, जो हर हफ्ते प्याज खाना अफोर्ड कर सकते हैं।'
दरअसल मिसेज गुप्ता और मिसेज चौहान में दो दिन पहले ही बच्चों को लेकर खूब झगड़ा हुआ था। ऐसे में मिसेज गुप्ता को नीचा दिखाने का अवसर भला मिसेज चौहान कैसे चूक जातीं। यह गप गोष्ठी की एक और खासियत थी। आते वक्त तो सब बड़े प्रेम भाव से पगी हुई रहती हैं, लेकिन जब जाती हैं, तो परनिंदा रस का आस्वादन करके ही। इसके बिना तो जैसे गपगोष्ठी पूरी ही नहीं होती है।
'हां...हां, तू ही तो मोहल्ले में सबसे बड़ी धन्ना सेठ है। बाकी सब भिखारी बसे हैं। दो महीने पहले ही तो दीपावली थी। मैंने इसमें गलत क्या कहा था। अरे, भूल गई जब तेरा बड़ा दामाद आया था, तो प्याज की पहली परत तुझे उधार दी थी। तब से आज तक उधार तो वापस कर नहीं सकीं। बड़ी आई है... हर हफ्ते प्याज खाने वाली।' इतना कहकर मिसेज गुप्ता उठी और अपने घर चली गईं।
तभी अंदर से मर्दाना आवाज आई, 'तुम्हारी यह प्याज प्रदशर्नी कब तक चलेगी? इतनी देर से प्याज खुले में रखा है। कहीं सड़ गया, तो समझ लेना। तलाक देकर ही छोड़ूंगा।' प्याज की मालकिन ने शो केस सहित प्याज उठाया और यह कहते हुए अंदर रख दिया, 'बहन! अब आप लोग चलें, मुझे काफी काम करना है।' इसी के साथ वह महिला गप संगोष्ठी खत्म हो गई।
- अशोक मिश्र
mo-- 9811674507

रविवार, 23 अगस्त 2015

गाँधी की दुकान में गोडसे का सामान

देश में  खादी आश्रम की दुकानों पर बाबा रामदेव की कंपनी के माल बिकने लगे हैं. " खादी एक वस्त्र नहीं, विचार है " कहकर देश के अन्दर गाँधी आश्रमों की एक बड़ी श्रृंखला खादी व कुटीर उद्योगों की एक बड़ी संस्था कायम हुई थी. आज उसका उपयोग विचार शून्यता के इस दौर में गाँधी की हत्या करने वाले गोडसे समर्थक रामदेव कर रहे हैं और गाँधी आश्रम में उनके द्वारा अत्याधुनिक मशीनों द्वारा उत्पादित सामग्री की बिक्री की जा रही है, वहीँ, दूसरी ओर सार्वजानिक क्षेत्र की कंपनी जीवन बीमा निगम को नए कानून व आदेशों के तहत पूरे व्यापार को प्राइवेट सेक्टर में दिया जा रहा है. जिसका सबूत यह है कि पेंशन कारोबार में 90 प्रतिशत की गिरावट से चितिंत जीवन बीमा उद्योग ने क्षेत्र में समान अवसर उपलब्ध कराने की मांग की है।यह मांग नहीं पूरी होनी है और अंत में एल आई सी का सारा कारोबार धीरे-धीरे निजी बीमा कंपनियों के हाथ में चला जायेगा.
रामदेव अन्य बाबाओं की तरह बड़े व्यापारी हैं.  व्यापारी होना एतराज की बात नहीं पर कर चोरी करना, जमीनों के सौदों में हेरफेर करना और राजस्व न चुकाना, ये जरूर एतराज की बातें हैं, जिस पर तुर्रा यह है कि  रामदेव, सोनिया-राहुल पर दोष मढ़ते रहते हैं. मंशा यह जताना रहती है कि चूंकि वे हिंदू हैं, योगगुरु हैं इसलिए विदेशी मूल की सोनिया गांधी को यह रास नहीं आता.  परेशान करने के मकसद से उन के यहां छापे डलवाए जाते हैं. 
         कुल मिलाकर वर्तमान सरकार सार्वजानिक क्षेत्र को घाटे में पहुंचा कर बड़े-बड़े उद्योगपतियों को किसी भी तरह से सौंप देना चाहती है. उसी मंशा के तहत नागपुर मुख्यालय की विचारधारा के तहत योग गुरु के प्रोडक्ट्स गाँधी आश्रम पर बिकवाकर गोडसे की विचारधारा को पूरे देश में फैलाया जा रहा है. गाँधी की हत्या को हत्या न मानकर वध का रूप दिया जा रहा है. ब्रिटिश साम्राज्यवाद को परस्त करके महानायक के रूप में गाँधी उभरे थे इसीलिए ब्रिटिश समर्थक लोगों ने उनकी हत्या कर दी थी. गाँधी से सहमत होना, असहमत होना यह विचारों के मतभेद का कारण
हो सकता है लेकिन हत्या करना फासिस्टों की निशानी है, क्या देश फासिज्म की तरफ बढ़ रहा है. गोडसे नायक होंगे, ब्रिटिश साम्राज्यवाद के पक्षधर लोग आज अमेरिकी साम्राज्यवाद के अंधभक्त हैं.

सुमन 

शनिवार, 22 अगस्त 2015

लफ्फाजों की महाभारत

महाभारत  के नायक
उफ़ा में भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ ने मिलकर दोनों पक्ष सभी लंबित मुद्दों पर चर्चा के लिए सहमति बनी , जिसमें भारत और पाकिस्तान ने मुम्बई आतंकी हमले से संबंधित मुकदमे में तेजी लाने का निर्णय, दिल्ली में मिलेंगे भारत-पाकिस्तान के NSA डीजी BSF और DGMI की बैठक, दोनों पक्षों ने 15 दिनों के भीतर एक-दूसरे के मछुआरों और उनकी नौकाओं को छोड़ने का निर्णय, मुंबई हमले के वॉयस सैंपल मुहैया कराएंगे व नवाज शरीफ ने पीएम मोदी को दिया सार्क सम्मेलन में आने का न्योता दिया.
दो तीन दिन से लगातार दाउद से लेकर कश्मीर के अलगाववादी नेताओं की नजरबंदी और फिर नजरबंदी को वापस लेना तथा अलगाववादी नेताओं की जेलों से रिहाई आदि का हाई प्रोफाइल ड्रामा देश की जनता को देखने को मिल रहा है. न पाकिस्तान दाउद को भारत को सौंपने जा रहा है न ही भारत पाकिस्तान से अच्छे सम्बन्ध रखना चाहता है. अगर भारत-पाकिस्तान के सम्बन्ध अच्छे हो जायेंगे तो तथाकथित राष्ट्रवादी देशभक्तों की दुकाने अपने आप बंद हो जाएँगी, लेकिन ड्रामा चल रहा है इस ड्रामे का अंत अगर हो जाता है तो दोनों देशों के राष्ट्रवादी एक इंच जमीन न देने का नारा लगाने वाले लोगों की राजनीति समाप्त हो जाएँगी. चुनाव में कई दलों को इस नाटक से वोट का प्रतिशत बढ़ता है इसलिए यह सब होता रहता है. हिंदी साहित्य में भी अगर पकिस्तान और कश्मीर न होता तो आधी कवितायेँ नहीं लिखी जाती और बहुत सारे लोग कवि बनने से वंचित रह जाते. पिछली एनडीए सरकार में कारगिल की घुसपैठ या युद्ध या सीमापार फायरिंग कुछ भी नाम दे, नूराकुश्ती का ही परिणाम था और राष्ट्रवादियों ने ताबूत घोटाला कर डाला था. देश की जनता का ध्यान हटाने के लिए यह सब होता रहता है और लफ्फाजों का युद्ध मीडिया में घमासान रूप से जारी रहता है.
वहीँ, उग्र हिन्दुवत्व वाला दल शिवसेना के नेता संजय राउत ने कहा कि'दाऊद का भजन बंद करो, अगर आप में हिम्मत है तो पाकिस्तान में घुसो और उसे पकड़ कर लेकर आइए।' यह दल हमेशा उग्र राष्ट्रवाद की बात करता है लेकिन देश बकी एकता और अखंडता को नुकसान पहुंचाने के लिए कोई कोर-कसर नही छोड़ता है. कभी भाषा के नाम पर, कभी प्रान्त के नाम पर यह अपने देश के नागरिकों के खिलाफ भी तलवारें भांजता रहता है. 
 यह सब हाई प्रोफाइल ड्रामा जान बूझकर जनता का ध्यान दूसरी तरफ करने के लिए किया जाता है वहीँ, दूसरी तरफ सरकार कॉर्पोरेट सेक्टर को फायदा पहुंचाने के लिए जो काम कर रही होती है, उसकी तरफ लोगों का ध्यान न जाए और उसकी बहस संसद में भी न होने पाए उसके लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती है. यह सरकार सोमवार को पेट्रोलियम क्षेत्र की सरकारी कंपनी इंडियन ऑयल कार्पोरेशन (आइओसी) में अपनी 10 प्रतिशत हिस्सेदारी का विनिवेश करने जा रही है. सरकार का कहना है कि इससे सरकारी खजाने में 9,500 करोड रुपये आने की उम्मीद है. सरकार ने इंडियन ऑयल कार्पोरेशन में अपनी 10 प्रतिशत हिस्सेदारी बेचने के लिये 387 रुपये का न्यूनतम शेयर मूल्य तय किया. इससे पहले किये गये तीन विनिवेश से 3,000 करोड रुपये जुटाये गये. सरकार ने चालू वित्त वर्ष के दौरान विनिवेश से 69,500 करोड रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है. इस तरह से सार्वजानिक क्षेत्र को सस्ते दामों पर उद्योगपतियों को बेचने का काम जारी है जिसकी चर्चा न इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में है न प्रिंट मीडिया में है. सरकार में स्थापित नेतागण पाकिस्तान से लफ्फाजी की महाभारत करते रहते हैं और एक विशेष प्रकार का उन्माद जनता में पैदा करते हैं ताकि जनता उनके द्वारा किये जा रहे कार्यों के सम्बन्ध में सोचने व समझने की स्तिथि में न रह जाए यही आतंकवाद के नाम पर सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है. लफ्फाजी की महाभारत ज़ारी रहेगी, कॉर्पोरेट सेक्टर जनता से जल,जंगल, जमीन छीनता रहेगा. सरकार उसकी गुलामी करती रहेगी. 

सुमन 

बुधवार, 19 अगस्त 2015

आओ ! मेरे देश को लूट लो

 भूटान, ब्राज़ील, नेपाल, जापान, यूनाइटेड स्टेट्स, म्यांमार, ऑस्ट्रेलिया, फिजी, सेशेल्स, मारीशस, श्रीलंका, सिंगापुर. फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, चाइना, मंगोलिया, साउथ कोरिया, बांग्लादेश, उज्बेकिस्तान. कज़ाकिस्तान, रूस, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, तजाकिस्तान व यूएई में यह नारा लग  चूका है कि भारत में मजदूर सस्ते हैं और वहां न्यूनतम मजदूरी 5000 से 9000 रुपये में इंजीनियर मिल सकते हैं. जल, जंगल, जमीन भी सस्ते दरों पर मिल जायेंगे, हवा-पानी, नदी-नाला सब प्रदूषित कर दोगे कोई कार्यवाई नहीं होगी, चाहे जितना मुनाफा कमाओ और लूट कर अपने मुल्क ले जाओ. हम इसमें आपकी मदद करेंगे. आम जनता के शरीर में कोई बूँद खून की नहीं बचे लेकिन हम आपके मुनाफे में कोई कमी नहीं होने देंगे. मेक इन इंडिया नारे को साकार करना है. इन सब बातों के विरोध में भारतीय मजदूर वर्ग 2 सितम्बर को अपनी 12 सूत्री मांगों के समर्थन में आम हड़ताल करेगा.
सरकार बोलती कुछ है, और करती कुछ है. श्रम मेव जयते का नारा लगाने वाली सरकार श्रमिकों के अधिकार को खत्म करना चाहती है. सरकार नया श्रम कानून लाकर मजदूरों का हक छीनने की योजना बना रही है.यह बातें एटक के  पदाधिकारी विद्यासागर गिरि ने कही. न्यूनतम वेतन को देश भर में 15,000 रु महीना किया जाए, जो फिलहाल अभी विभिन्न राज्यों में 5,000  से लेकर 9,000 रु तक है. विनिवेश और श्रम कानूनों में बदलाव का विरोध करेंगी यूनियन विरोधी व कर्मचारी विरोधी नीतियों तथा सरकार की वायदा खिलाफी की पोल खोलने के लिए मैदान में उतर गए है; सरकार श्रम कानून को कमजोर कर कॉरपोरेट हाउस को फायदा पहुंचाना चाहती है. आजाद भारत के 68 वर्ष के संघर्ष को सरकार एक झटके में खत्म कर रही है. मजदूरों के पीएफ का पैसा शेयर बाजार में लगाया जा रहा है. हर यूनियन विकास का पक्षधर है, लेकिन मेहनतकश की कीमत पर कॉरपोरेट का विकास स्वीकार नहीं. विरोधी व कर्मचारी विरोधी नीतियों तथा सरकार की वायदा खिलाफी की पोल खोलने के लिए मैदान में उतर रहे है. मजेदार बात यह है कि सरकार व नागपुर मुख्यालय का अनुवांशिक संगठन भारतीय मजदूर संघ से सम्बद्ध यूनियनें भी हड़ताल में शामिल हो रही हैं. दुनिया भर के कॉर्पोरेट सेक्टर को देश के अन्दर आमंत्रित कर रोजगार के अवसर तो बढाए जा सकते हैं किन्तु मजदूर को सम्मानजनक जीने लायक वेतन नहीं दिलाया जा सकता है इसीलिए श्रम कानूनों में परिवर्तन किये जा रहे हैं और कृषि योग्य जमीनों का अधिग्रहण कर किसान से मजदूर बनाने की प्रक्रिया बड़ी तेजी से जारी है जबकि इसके पूर्व में विभिन्न सरकारों का यह नारा था " मजदूर से बना किसान, बढ़ गयी उसकी शान " किन्तु वर्तमान सरकार किसान को भूमिहीन कर मजदूर बना देना चाहती है ताकि कॉर्पोरेट सेक्टर को पढ़े लिखे मजदूर से लेकर अनपढ़ मजदूर सस्ते दामों पर मिल सके. बातें बड़ी-बड़ी हैं जनता की भलाई के लिए अभी तक कोई कानून नहीं बना पाए हैं. सीधे-सीधे देश को दुनिया भर के कॉर्पोरेट सेक्टर की गुलामी के लिए सभी कानूनों में संशोधन या समाप्त करने का सिलसिला जारी है. इन सब बातों से यही लगता है कि आओ दुनिया के धनपतियों मेरे देश को लूट लो, असली नारा यही है.


सुमन 

मंगलवार, 18 अगस्त 2015

देश में झूठ - विदेश में झूठ - चुनाव में झूठ

उनसे कह दो, गुजरे हुए गवाहों से- झूंठ तो बोले, मगर झूंठ का सौदा न करे ===== जिसे यूएई की राजधानी में बनने वाला पहला मंदिर बताकर सरकार द्वारा प्रचारित किया जा रहा है इस ऐतिहासिक फैसले के लिए मोदी ने यूएई सरकार का शुक्रिया अदा किया, बताया जा रहा है कि इस मंदिर के लिए जमीन तो वर्ष 2013 में ही एक अरब शेख ने दान दी थी।
टाइम्स ऑफ इंडिया की 9 जुलाई 2013 की खबर के अनुसार, एक निवेश कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, नाज़ेम-अल-कुदसी के निमंत्रण पर स्वामीनारायण संप्रदाय मंदिर के अधिकारियों ने अबूधाबी का दौरा भी किया था।
 विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने ट्वीट किया था, ‘भारतीय समुदाय की लंबी प्रतीक्षा खत्म हुई। प्रधानमंत्री की यात्रा पर यूएई सरकार ने अबू धाबी में एक मंदिर बनाने के लिए जमीन आबंटित करने का फैसला किया।’ उन्होंने लिखा, ‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस ऐतिहासिक फैसले के लिए यूएई नेतृत्व का शुक्रिया अदा किया।’
 दुबई में शिव और कृष्ण मंदिर के अलावा अक्षरधाम की स्वामीनारायण संस्था का सत्संग भवन, गुरुद्वारा और गिरजाघर भी हैं.दुबई का पहला हिंदू मंदिर 1958 में बना था और यह एक मस्जिद के निकट है.
देश में झूठ, विदेश में झूठ, चुनाव में झूठ शायद नागपुर मुख्यालय की यही आदर्श और नैतिकता है. दुबई में मंदिर जमीन को लेकर सोशल मीडिया में भक्तों द्वारा तरहत-तरह की कहानियाँ लिखी जा रही हैं. जबकि वास्तविकता इसके विपरीत है. दुबई में भी जाकर बांग्लादेश की प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति बता आये हैं. वहीँ, जेडीयू नेता के. सी. त्यागी ने कहा कि कल देर रात तक वो दुबई में थे, आत्मा उनकी बिहार में पड़ी हुई थी. और वो दुबई से बिहार के मतदाताओं को राजनीतिक रिश्वत देने के लिए आरा पहुंचे. चुनाव में तरह-तरह की अफवाहों और झूठ बोले गए जिनका वास्तविकता से कोई मतलब ही नहीं था. बिहार में चुनाव शुरू हो रहे हैं सवा लाख करोड़ रुपये का विशेष पैकेज देने की बात शुरू कर दी जबकि यह पैकेज कहाँ और कैसे खर्च होगा उसका कोई प्लान भारत सरकार के पास नहीं है. बस काम चल रहा है किसी तरह से . सरकार चल रही है किसी तरह से.

सुमन 

सोमवार, 17 अगस्त 2015

आचार्य धर्मेंद्र ने स्वतंत्रता दिवस को काला दिवस बताया

स्वतंत्रता दिवस पर चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय में संगोष्ठी विवाद में विहिप के वरिष्ठ सदस्य  आचार्य धर्मेंद्र ने स्वतंत्रता दिवस को काला दिवस बताया  .बृहस्पति भवन में "बलिदानों की अपूर्व गाथा" विषय पर आयोजित संगोष्ठी में  आचार्य धर्मेंद्र विशिष्ट अतिथि के तौर  थे। 
आचार्य धर्मेंद्र ने क्रांतिवीरों के योगदान पर बोलने से पहले स्वतंत्रता दिवस को काला दिवस बताकर सबको चौंका दिया। लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन को बकवास बताते हुए तीखे शब्दों का प्रयोग किया। कहा कि नरेंद्र मोदी सवा सौ करोड़ की बात कर हिदुओं का मनोबल तोड़ता हैं। पाकिस्तान, अनुच्छेद 370, गोहत्या और राम मंदिर पर एक शब्द नहीं बोलता, ऐसा व्यक्ति देश को डुबो देगा। 
आचार्य धर्मेंद्र के जाने के बाद मुख्य अतिथि संगीत सोम ने मंच संभाला। कहा कि धर्मसेवकों को राजनीति से दूर रहते हुए समाज को दिशा देनी चाहिए।लेकिन जब काग्रेस  का शासन  हो तो उसको उखाड़ने का इन धर्म सेवको की मदद ली जाए
 इस तरह से रंगे सियारों  ने अपनी खाले उतरनी शुरू कर दी यह वही लोग है  जो धर्मसेवक का  बिल्ला लगा कर  अंग्रेजो की मुखबिरी किया  करते थे और आज अमरीकी की गुलामी करने के लिए देश को उस दिशा में ले जाना चाहते है 
विहिप आर  आर एस का एक अनुसांगिग संगठन है  इसका भी देश की आज़ादी  की लड़ाई से कोई सम्बन्ध  नही रहा  है हाँ! आज जरुर  इस संगठन  के लोग देश भक्ति - राष्ट्रभक्ति का प्रमाणपत्र   जारी  करने  का कार्य कर रहे है -अपना प्रणामपत्र  अमरीका व इजरायल   के पास गिरवी रख आए है 

----सुमन
लो क सं घ र्ष !

रविवार, 16 अगस्त 2015

रवीन्द्रनाथ ठाकुर का पत्र 'जनगण मन'

(आज कुछ मित्रों ने बहुत हैरत में डालनेवाला सवाल किया कि क्या यह सच है कि ‘जनगण मन’ गीत रवीन्द्रनाथ ने वर्ष 1911 में जाॅर्ज पंचम के भारत आगमन पर उनकी स्तुति में लिखा था; केवल यही नहीं, उन्होंने ख़ुद यह गीत उनके समक्ष गाया भी था? इस सवाल ने न केवल मुझे डरा दिया बल्कि एक बार फिर से अफ़वाह की ताक़त का एहसास कर दिया। मैं लोगों की आँखों पर पड़े झूठ के पर्दे को हटाने के उपक्रम में सुविख्यात रवीन्द्र साहित्य विशेषज्ञ पुलिनविहारी सेन को इसी संदर्भ में लिखी रवीन्द्रनाथ की एक चिट्ठी का उल्लेख करना चाहता हूँ। मित्रों से मेरा निवेदन है कि इसे आप अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ ताकि कुहासे की धुंध छँटे और रवि बाबू पर से इस तोहमत का साया दूर हो सके।  -- उत्पल बैनर्जी)

प्रियवर,

तुमने पूछा है कि ‘जनगण मन’ गीत मैंने किसी ख़ास मौक़े के लिए लिखा है या नहीं। मैं समझ पा रहा हूँ कि इस गीत को लेकर देश में किसी-किसी हलक़े में जो अफ़वाह फैली हुई है, उसी प्रसंग में यह सवाल तुम्हारे मन में पैदा हुआ है। फ़ासिस्टों से मतभेद रखने वाला निरापद नहीं रह सकता, उसे सज़ा मिलती ही है, ठीक वैसे ही हमारे देश में मतभेद को चरित्र का दोष मान लिया जाता है और पशुता भरी भाषा में उसकी निन्दा की जाती है -- मैंने अपने जीवन में इसे बार-बार महसूस किया है, मैंने कभी इसका प्रतिवाद नहीं किया। तुम्हारी चिट्ठी का जवाब दे रहा हूँ, कलह बढ़ाने के लिए नहीं। इस गीत के संबंध में तुम्हारे कौतूहल को दूर करने के लिए।

एक दिन मेरे परलोकगत मित्र हेमचन्द्र मल्लिक विपिन पाल महाशय को साथ लेकर एक अनुरोध करने मेरे यहाँ आए थे। उनका कहना यह था कि विशेष रूप से दुर्गादेवी के रूप के साथ भारतमाता के देवी रूप को मिलाकर वे लोग दुर्गापूजा को नए ढंग से इस देश में आयोजित करना चाहते हैं, उसकी उपयुक्त भक्ति और आराधना के लिए वे चाहते हैं कि मैं गीत लिखूँ। मैंने इसे अस्वीकार करते हुए कहा था कि यह भक्ति मेरे अंतःकरण से नहीं हो सकेगी, इसलिए ऐसा करना मेरे लिए अपराध-जैसा होगा। यह मामला अगर केवल साहित्य का होता तो फिर भले ही मेरा धर्म-विश्वास कुछ भी क्यों न हो, मेरे लिए संकोच की कोई वजह नहीं होती -- लेकिन भक्ति के क्षेत्र में, पूजा के क्षेत्र में अनधिकृत प्रवेश गर्हित है। इससे मेरे मित्र संतुष्ट नहीं हुए। मैंने लिखा था ‘भुवनमनोमोहिनी’, यह गीत पूजा-मण्डप के योग्य नहीं था, यह बताने की ज़रूरत नहीं है। दूसरी ओर इस बात को भी स्वीकार किया जाना चाहिए कि यह गीत भारत की सार्वजनक सभाओं में भी गाने के लिए उपयुक्त नहीं है, क्योंकि यह कविता पूरी तरह हिन्दू संस्कृति के आधार पर लिखी गई है। ग़ैरहिन्दू इसे ठीक से हृदयंगम नहीं कर सकेंगे। मेरी कि़स्मत में ऐसी घटना एक बार फिर घटी थी। उस साल भारत के सम्राट के आगमन का आयोजन चल रहा था। राज सरकार में किसी बड़े पद पर कार्यरत मेरे किसी मित्र ने मुझसे सम्राट की जयकार के लिए एक गीत लिखने का विशेष अनुरोध किया था। यह सुनकर मुझे हैरानी हुई थी, उस हैरानी के साथ मन में क्रोध का संचार भी हुआ था। उसी की प्रबल प्रतिक्रियास्वरूप मैंने ‘जनगण मन अधिनायक’ गीत में उस भारत भाग्यविधाता का जयघोष किया था, उत्थान-पतन में मित्र के रूप में युगों से चले जा रहे यात्रियों के जो चिर सारथी हैं, जो जनगण के अंतर्यामी पथ परिचायक हैं, वे युगयुगांतर के मानव भाग्यरथचालक जो पंचम या षष्ठ या कोई भी जाॅर्ज किसी भी हैसियत से नहीं हो सकते, यह बात मेरे उन राजभक्त मित्र ने भी अनुभव की थी। क्योंकि उनकी भक्ति कितनी ही प्रबल क्यों न रही हो, उनमें बुद्धि का अभाव नहीं था। आज मतभेदों की वजह से मेरे प्रति क्रोध की भावना का होना, दुश्चिन्ता की बात नहीं है, लेकिन बुद्धि का भ्रष्ट हो जाना एक बुरा लक्षण है।

इस प्रसंग में  और एक दिन की घटना याद आ रही है। यह बहुत दिन पहले की बात है। उन दिनों हमारे राष्ट्रनायक राजप्रासाद के दुर्गम उच्च शिखर से प्रसादवर्षा की प्रत्याशा में हाथ फैलाए रहते थे। एक बार कहीं पर वे कुछ लोग शाम की बैठक करने वाले थे। मेरे परिचित एक सज्जन उनके दूत थे। मेरी प्रबल असहमति के बावजूद वे मुझे बार-बार कहने लगे कि मैं यदि उनके साथ नहीं गया तो महफि़ल नहीं जमेगी। मेरी वाजिब असहमति को अंत तक बरक़रार रखने की शक्ति मुझे विधाता ने नहीं दी। मुझे जाना पड़ा। जाने के ठीक पहले मैंने निम्नांकित गीत लिखा था --
‘‘मुझे गाने के लिए न कहना ...’’
इस गीत को गाने के बाद फिर महफि़ल न जम सकी। सभासद बुरा मान गए।

बार-बार चोट खाकर मुझे यह समझ में आया कि बादलों की गति देखकर हवा के रुख़ का अनुसरण कर सकें तो जनसाधारण को खु़श करने का रास्ता सहज ही मिल जाता है, लेकिन हर बार वह श्रेयस्कर रास्ता नहीं होता, सच्चाई का रास्ता नहीं होता, यहाँ तक कि चलतेपुर्ज़े कवि के लिए भी वह आत्मा की अवमानना का पथ होता है। इस मौक़े पर मनु के एक उपदेश की याद आ रही है जिसमें उन्होंने कहा है -- सम्मान को ज़हर-जैसा मानना, और निंदा को अमृत-जैसा मानना। इति।

10.11.1937                                    शुभार्थी
                                 रवीन्द्रनाथ ठाकुर
श्री  विनीत तिवारी  के सौजन्य  से

शनिवार, 15 अगस्त 2015

गणवेश धारियों को पुंछ सीमा पर जाना चाहिए

आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री ने विदेश नीति के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा. एक तरफ पाकिस्तान से वार्ता शुरू हो रही है वहीँ, आज के दिन पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर के पुंछ जिले के चार सेक्टरों में उसके सुरक्षा बलों की ओर से भारतीय चौकियों और रिहायशी इलाकों को निशाना बनाकर की गई भीषण गोलीबारी और मोर्टर बम दागने से एक सरपंच सहित तीन नागरिकों की मौत हो गई और पांच अन्य घायल हो गए। 
   लोकसभा चुनाव के समय गणवेश धारी नेतागण कुर्ता-धोती पहनकर एक के बदले चार मारने की लम्बी-चौड़ी शेख चिल्ली स्टाइल में बातें किया करते थे और आज जब वह लोग सत्ता में हैं तो सारी बंदूकें व हेकड़ी भूल गए हैं और खिसियानी बिल्ली की तरह उनका राष्ट्रवाद और देश भक्ति गायब हो चुकी है और वह कुछ कह पाने की स्तिथि में नहीं रह गए हैं. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने शनिवार की सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को शुभकामना संदेश भेजा। दोनों देशों के बीच 23 अगस्त को नई दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार स्तर की बातचीत होने जा रही है। अगर यूपीए की सरकार होती तो सारा गणवेश धारी नेता जोर-जोर से चिल्ला रहा होता कि पाकिस्तान से बात नहीं होगी पहले बदला लिया जायेगा.
                                        जुलाई में 19 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया गया, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई और 14 अन्य घायल हो गए। सरकार ने लोकसभा में बताया था कि 26 जुलाई तक जम्मू-कश्मीर में अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तान ने 192 बार संघर्ष विराम का उल्लंघन किया है।नागपुर मुख्यालय 1925 से गण वेश धारियों को लाठी सिखाना, तलवार सिखाना जैसे प्रशिक्षण देता रहा है किन्तु आजादी की लड़ाई में उनकी तलवारें जंग खा रही थी और एक भी विदेशी शासक के ऊपर तलवार नहीं चल पायी उनके हाथ और दिल अंग्रेजों का नाम सुनकर काँप उठते थे. देश के अन्दर वह वर्ग विशेष की राष्ट्र भक्ति व देश भक्ति का प्रमाण पत्र मांगते हुए वैमनस्यता फैला कर बहुसंख्यक आबादी को उग्र बना कर वोटों की मंडी में अपना बहुमत प्राप्त करते हैं. आज जब जरूरत है कि वह गण वेश धारी अपनी राष्ट्र भक्ति व देश भक्ति का प्रदर्शन पुंछ सीमा पर करें. वोटों के लिए आतंकवाद की राजनीती के तहत इस बार 14 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर ) आई बी की सूचनाओं पर आतंकवादी मुठभेड़ में मारे नहीं गए और न ही रेलवे स्टेशन, एरोड्रम जैसे स्थानों को उड़ाने की धमकी या सूचना नहीं प्रसारित की गयी क्यूंकि इस बार चुनाव नहीं होना है और नागपुर मुख्यालय को इस तरह की अफवाहों से कोई फायदा नहीं होना है इसलिए सब कुछ शांत रहा. 

सुमन