रविवार, 12 अगस्त 2018

जनता की कठिनाईयों को दूर करना ही कानून का मकसद- वाई.एस. लोहित

कार्यक्रम बोलते हुए अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन

आईएएल राष्ट्रीय महासचिव श्री वाईएस लोहित बोलते हुए
बाराबंकी।  इण्ड़ियन एसोसिएशन आफ लायर्स के तत्वाधान में आयोजित कानून जनता की कठिनाईयो और निदान विषय पर विचार गोष्ठी कार्यक्रम शांति पैलेस निकट बाबा बारात घर बड़ेल चौराहा में आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत करते हुये मुख्य अतिथि इण्डियन एसोसिएशन आफ लायर्स के राष्ट्रीय महासचिव वाई0एस0 लोहित ने कहा कि जनता ही इस देश की मालिक है। जनता की कठिनाईयो को दूर करना ही कानून का मकसद है। क्योकि कानून जनता के लिये है, जनता कानून के लिये नही! भारतीय संविधान की प्रस्तावना मे ही सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय को लक्ष्य घोषित किया गया है। जबकि इस देश की आजादी के पहले ब्रिटिश राज में न्याय दिलाना उद्देश्य नही था। बल्कि यह कहा जाता था कि यह जरुरी नही कि न्याय हो किन्तु न्याय की प्रक्रिया ही चलनी चाहिये। महामंत्री सुरेश चन्द्र त्रिपाठी ने कहा कि देश मे कानून का प्रथम स्त्रोत संविधान है। जो कानून संविधान संपन्न नही या जनहित में नही है उन्हे समाप्त किया जाना चाहिये। जनता अपने संघर्षो के बल
पर जनहित के कानून बनवा सकती है। उपाध्यक्ष व पूर्व विधायक परमात्मा सिंह ने कहा कि यदि संसद, विधानसभा देशहित या जनहित मे कानून बनाने मे और लागू करने मे असफल रही तो जनता कानून बनवा लेगी। और कानून देश और जनता के लिये है।
श्री परमात्मा सिंह बोलते हुए
कार्यक्रम में मौजूद अधिवक्तागण
इसके अतिरिक्त वरिष्ठ अधिवक्ता रणधीर सिंह सुमन, जिला बार पूर्व अध्यक्ष गोण्डा रवि प्रकाश त्रिपाठी, जिला टैक्स बार एसोसिएशन अध्यक्ष पवन कुमार वैश्य, बृजमोहन वर्मा, पूर्व महामंत्री नरेन्द्र वर्मा, भारत सिह यादव, संजय गुप्ता आदि ने भी गोष्ठी मे अपने विचार व्यक्त किये। कार्यक्रम का संचालन अधिवक्ता विभव मिश्रा व अध्यक्षता उपेन्द्र सिंह ने की। कार्यक्रम में नीरज वर्मा, पुष्पेन्द्र यादव, राजेन्द्र बहादुर सिंह राणा, तारिख खान, संजय सिंह, मलखान सिंह, प्रदीप सिंह, सरदार भूपिन्दर पाल सिंह, दिनेश वर्मा, कर्मवीर सिंह, प्रेमचन्द्र वर्मा, अभय सिंह, वीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव, विजय प्रताप सिंह, गौरी रस्तोगी, गिरीश चन्द्र, कुश कुमार, अशोक वर्मा, रामकुमार वर्मा, आनन्द सिंह, बालकृष्ण वर्मा, निर्मल वर्मा, रोशन वर्मा, हरि सिंह आदि अधिवक्ता मौजूद रहे।

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

तब और अब

तब और अब
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र आन्दोलन हुआ और कुलपति ने कुछ छात्रों को निष्कासित कर दिया प्रधानमंत्री नेहरू इलाहाबाद जनपद से ही सांसद होते थे निष्कासित छात्र रेल से बिना टिकट दिल्ली रवाना हो गए थे रास्ते में टिकट पूछने पर यह बता देते थे कि प्रधानमंत्री से मुलाकात करने के लिए जा रहे हैं
दिल्‍ली पहुंचने पर दूसरे दिन सुबह मुलाकात होना तय हुआ जब निष्कासित छात्र वहाँ पहुँचे तो वहां विभिन्न प्रकार के नाश्ते लगे हुए थे भूखे छात्रों ने जल्दी से जल्दी नाश्ता करने लगे और रास्ते के लिए जेब में भी रखना शुरू कर दिया कि नेहरू निकले और बगैर रुके कहा जाओ पढो और चले गए
जब छात्र इलाहाबाद पहुँचे स्टेशन पर विश्व विद्यालय के लोग मौजूद थे और ले जाकर तुरंत निष्कासन वापस ले लिया
अब
लखनऊ विश्वविद्यालय में कुछ छात्रों का निष्कासन होता है मुख्यमंत्री की नाक के छात्र प्रवेश के आंदोलन हो रहा होता है लाठीचार्ज होता है उल्टे मुकदमे राजभवन की देखरेख में कायम हो रहे हैं छात्रों का प्रवेश हो का समर्थन करने के कारण विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रोफेसर रुपरेखा वर्मा पर भी मुकदमा दर्ज करने का आदेश दिया जा रहा है
मेरा प्रोफेसर रुपरेखा वर्मा से कोई विशेष संबंध नहीं रहा है लेकिन जब मुझे हार्ट अटैक हुआ और लारी कार्डियोलॉजिस्ट सेंटर में भर्ती था तब प्रोफेसर रुपरेखा वर्मा मुझे देखने गई थी और मुझसे कहा था कि वकील साहब मेरे पास कुछ हजार रुपये है जब आपको जरूरत हो हम तुरंत रुपए भेजवा दूंगी
मुझे आवश्यकता नहीं पडी इसलिए रुपए नहीं मंगवाए थे
ऐसी महान शिक्षाविद के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की कार्रवाई सिर्फ योगी मोदी सरकार में ही संभव है

शनिवार, 23 जून 2018

संघी गिरोह देश की अर्थ व्यवस्था को कर रहा नष्ट

बाराबंकी। बढ़ती हुई मंहगाई, बेरोजगारी, डीजल-पेट्रोल के बढ़ते दाम, किसानो की फसलो का लाभकारी मूल्य न मिलना, संघी गिरोह द्वारा राष्ट्रीकृत बैको की खुलेआम लूट, संम्प्रादायिक विचारो के कारण धर्म विशेष के लोगो की पीट-पीटकर हत्या, आवारा पशुओ द्वारा किसानो की फसलो को नष्ट किये जाने के विरोध में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा गांधी भवन में एक दिवसीय धरना दिया गया। धरने को सम्बोधित करते हुये पाटी के राज्य परिषद सदस्य रणधीर सिह सुमन ने कहा कि संघी गिरोह देश की अर्थ व्यवस्था को नष्ट कर रहे है। जिनके दुष्परिणाम स्वरुप किसानो, मजदूरो, नवजवानो को भुगतना पड़ रहा है। मोदी सरकार के आने के बाद किसी भी क्षेत्र मे कोई विकास नही हुआ है। पार्टी के जिला सचिव बृजमोहन वर्मा ने कहा कि किसानो को उनकी फसल का लाभकारी मूल्य नही दिया जा रहा है। और फसलो को छुट्टा साड़ो से अलग चरवाया जा रहा है। पार्टी के सहसचिव शिवदर्शन वर्मा ने कहा कि सरकार किसान और मजदूर विरोधी है। पार्टी के नेता प्रवीण कुमार ने कहा कि रोज-रोज डीजल-पेट्रोल बढ़ाकर जनता को भुखमरी की ओर बढ़ा रहे है। धरना सभा का संचालन अखिल भारतीय किसान सभा के अध्यक्ष विनय कुमार सिंह ने किया। अध्यक्षता विनोद कमार यादव ने की। धरने में मुनेश्वर बक्श वर्मा, दिग्विजय सिंह, अमर सिंह, गिरीश चन्द्र, वीरेन्द्र कुमार, कैलाश चन्द्र, सहजराम, राजेश सिंह, शिवराम, महेन्द्र यादव, रामलखन वर्मा, मुसाहिद अली, रामनरेश वर्मा आदि मौजूद रहे।

मंगलवार, 19 जून 2018

संघ, विहिप जैसे संगठनों के कारण भारत में अल्पसंख्यकों और दलितों की दशा खराब

अमरीकी सरकार द्वारा गठित एक आयोग ने अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कहा है कि देश में जारी भगवाकरण अभियान के शिकार मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और दलित हिंदू हैं।
वाशिंगटन : अमरीकी सरकार द्वारा गठित एक आयोग ने आरोप लगाया है कि भारत में पिछले साल धार्मिक स्वतंत्रता की स्थितियों में गिरावट जारी रही और हिंदू राष्ट्रवादी समूहों ने गैर हिंदुओं और हिंदू दलितों के विरुद्ध हिंसा, धमकी और उत्पीड़न के माध्यम से देश के भगवाकरण की कोशिश की।
यूएस कमीशन फॉर इंटरनेशनल रिलीजियस फ्रीडम (यूएससीआईआरएफ) ने अपनी नवीनतम रिपोर्ट में भारत को अफगानिस्तान, आजरबैजान, बहरीन, क्यूबा, मिस्र, इंडोनेशिया, इराक, कजाकिस्तान, लाओस, मलेशिया और तुर्की के साथ खास चिंता वाले टीयर टू देशों में रखा है।
यूएससीआईआरएफ ने कहा, ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), विश्व हिंदू परिषद जैसे हिंदू राष्ट्रवादी संगठनों द्वारा गैर हिंदुओं और हिंदुओं के अंदर निचली जातियों को अलग-थलग करने के लिए चलाए गए बहुआयामी अभियान के चलते धार्मिक अल्पसंख्यकों की दशा पिछले दशक के दौरान बिगड़ी हैं।’
    उसने अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता पर अपनी नवीनतम रिपोर्ट में कहा है कि इस अभियान के शिकार मुसलमान, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और दलित हिंदू हैं।
उसने कहा, ‘ये समूह अपने विरुद्ध हिंसक कार्रवाई, धमकी से लेकर राजनैतिक ताकत हाथ से चले जाने तथा मताधिकार छिन जाने की बढ़ती भावना से जूझ रहे हैं। भारत में 2017 में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थितियों में गिरावट जारी रही है।’
यूएससीआईआरएफ ने कहा, ‘बहुसांस्कृतिक और बहुधार्मिक समाज के रूप में रहा भारत का इतिहास अब धर्म पर आधारित राष्ट्रीय पहचान की बढ़ती बहिष्कार करने की अवधारणा के खतरे से घिर गया है। इस साल के दौरान हिंदू राष्ट्रवादी समूहों ने गैर हिंदुओं और हिंदू दलितों के विरुद्ध हिंसा, धमकी और उत्पीड़न के माध्यम से देश का भगवाकरण करने की कोशिश की।’
उसने कहा कि करीब एक तिहाई राज्य सरकारों ने गैर हिंदुओं के विरुद्ध धर्मांतरण रोधी और  गोहत्या रोधी कानून लागू किए, भीड़ ने ऐसे मुसलमानों और दलितों के विरुद्ध हिंसा की जिनके परिवार पीढ़ियों से डेयरी, चमड़ा, बीफ के कारोबार में लगे हैं तथा उन्होंने ईसाइयों के विरुद्ध भी धर्मांतरण को लेकर हिंसा की।
रिपोर्ट के अनुसार, गोरक्षकों की भीड़ ने वर्ष 2017 में कम से कम 10 लोगों की हत्या कर दी। घर वापसी के माध्यम से गैर हिंदुओं को हिंदू बनाने की खबरें सामने आईं।
धार्मिक अल्पसंख्यक समूहों के खिलाफ भेदभाव के तौर पर विदेशी चंदा लेने वाले एनजीओ पर पंजीकरण नियमों का बेजा इस्तेमाल किया गया।
रिपोर्ट कहती है कि पिछले साल धार्मिक स्वतंत्रता की दशाएँ बिगड़ने के साथ ही कुछ सकारात्मक बातें हुईं। उच्चतम न्यायालय ने कई ऐसे निर्णय किए जिससे धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा हुई।

-अमरीकी रिपोर्ट
लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2018 अंक में प्रकाशित

जनगीतों का विजन : हर नारे में महाकाव्य सृजन की प्रतिश्रुति

कविता के वितान में महाकाव्य को सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। हालाँकि बदलते जीवन सन्दर्भ तथा गद्य के विकास के साथ अब महाकाव्य का स्थान उपन्यास ने ले लिया है। रैल फॉक्स ने लिखा है कि ‘‘उपन्यास आधुनिक युग का महाकाव्य  है।’’ बावजूद इसके महाकाव्य की सर्वश्रेष्ठता के भाव पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा। अपने उदात्त भावों तथा बड़े विजन के कारण महाकाव्य की महत्ता यथार्थ रूप में न सही भावरूप में अभी भी बनी हुई है। मुक्तिबोध अपनी कविता ‘‘मुझे कदम कदम पर चौराहे मिलते हैं’’ में कहते हैं- 

मुझे भ्रम होता है कि 
प्रत्येक पत्थर में चमकता हीरा है, 
हर एक छाती में आत्मा अधीरा है, 
प्रत्येक सुस्मित में विमल सदानीरा है, 
मुझे भ्रम होता है कि 
प्रत्येक वाणी में महाकाव्य की पीड़ा है। 

     प्रतीक रूप में ही सही मुक्तिबोध महाकाव्य की सर्वश्रेष्ठता स्वीकार करते हैं हालाँकि उन्होंने स्वयं कोई महाकाव्य नहीं रचा। इसी तरह तुर्की के प्रसिद्ध कवि नाजिम हिकमत अपनी कविता में महाकाव्य का प्रतीक रूप में प्रयोग करते हैं- 

पढ़ना किसी महाकाव्य की तरह, 
सुनना किसी प्रेमगीत की तरह, 

लेकिन ठीक इसके उलट अपनी छोटी सी रचना विधान में जनगीतों ने बड़े विजन और उदात्त भावों को सृजित किया है। स्वप्न, यथार्थ, परिवर्तनकामी चेतना, पीड़ा-दुख, संघर्ष, उत्साह, उल्लास का जो सन्दर्भ जनगीतों में है वह महाकाव्यों के विस्तृत कलेवर के बावजूद कमतर दृष्टिगत होता है। माहेश्वर के चर्चित गीत की पंक्तियाँ हैं- 
‘‘सृष्टि बीज का नाश न हो हर मौसम की तैयारी है। हर नारे में महाकाव्य के सृजन कर्म को बारी है।’’ नारा वैसे भी गंभीर आचार्यों का जनगीतों के लिए आरोपित शब्द है। कविता नहीं है, यह तो नारे बाजी है। दूसरी तरफ महाकाव्य सृजित करने की प्रतिश्रुति है, न विडम्बना, लेकिन हजारों कण्ठों में रचे बसे नारे इतिहास के खास मुकाम पर जो रोल अदा करते हैं या किए हैं बड़ी से बड़ी कविता, महान कविता ईर्ष्या करे। कवि की सार्थकता जनता की जुबान पर चढ़ना और नारे बनने में है। यह अलग बात है कि आपके लिए कविता समाज बदलने का उपकरण हो। मात्र सौन्दर्य 
बोधी तराने न हों। जब भी आप साहित्य को बड़े तथा मानवीय सरोकारों से जोड़कर देखेंगे तो सहज ही आपके निष्कर्ष जनगीतों में मौजूद नारों तथा उसमें निहित महा काव्यात्मक औदात्य के पक्ष में होंगे। 
माहेश्वर के गीत को पहले देखा जाए। अपने लघु कलेवर में बड़ा विजन, शाश्वत संघर्षों के मूल्य तथा परिवर्तन कारी चेतना को अद्भुत तरीके से माहेश्वर ने पिरोया है। परत-दर परत गीत महान मानवता के पक्ष में क्रमशः नई जमीन और नये भाव विन्यासों से मेल करता है। पहली ही पंक्ति नये समाज सृजन की बुनियाद रखती है :- 
सृष्टि बीज का नाश न हो हर मौसम की तैयारी है, 
कल का गीत लिये होठों पर आज लड़ाई जारी है। 

‘सृष्टि बीज’ एक तरह से गीत की आधार रेखा है और कल का स्वप्न तथा आज का संघर्ष परिवर्तनकारी चेतना की प्रतिश्रुति। गीत के अगले चरण पर पहुँचने से पहले सृष्टि बीज शब्द तथा भाव की अर्थ व्याप्ति पर गौर करना चाहिए। यही वह सूत्र है जो गीत को बड़े विजन के साथ जोड़ देता है। बेहतर कल के लिए आज का संघर्ष, सृष्टि बीज को बचाते हुए। हैं न अद्भुत भाव तथा सोच। गीत के अगले बंद में माहेश्वर इस संघर्ष को शाश्वत संघर्ष, बेहतर दुनिया के लिए जोड़ देते हैं। ध्वंस और निर्माण जवानी की निश्छल किलकारी। ध्वंस और निर्माण शाश्वत सत्य हैं। इसलिए यह समझ संघर्ष में उतरने की प्ररेणा भी देता है वहीं इस बात की ओर संकेत भी करता है कि सिर्फ ध्वंस ही काम्य नहीं है बल्कि ध्वंस के बाद निर्माण भी हमारा ही कार्यभार है। लेकिन जवानी, युवा, निश्छलता, किलकारी, हताशा तो एक साथ निराशा के विरुद्ध समाज परिवर्तन में लगे लोगों के लिए बेहद जरूरी उपकरण हैं। जवानी की निश्छल किलकारी और परचम, परचम चमकता बूढ़ा सूरज। एक तरफ युवा जोश तो दूसरी तरफ ज्ञान अनुभव की थाती। दोनों के समवेत संघर्ष से ही नये समाज का निर्माण संभव है। 
जंजीरों से क्षुब्ध युगों के प्रणयगीत ही रणभेरी पंक्ति तो निश्चय ही गीत को महाकाव्यात्मक औदात्य प्रदान करती है। शायद माहेश्वर इसीलिए लिखते हैं कि हर नारे में महाकाव्य के सृजनकर्म की बारी है। इस रूप में जनगीत अपनी छोटी सी रचना विधान में बड़े विजन का सृजन करते हैं। निश्चय ही यह महाकाव्य तो नहीं लेकिन महाकाव्यात्मक तो है ही। 
इसीक्रम में शंकर शैलेन्द्र की प्रसिद्ध और चर्चित रचना ‘तू जिंदा है तो जिंदगी की जीत में यकीन कर’, के विजन स्वर्ग को धरती पर उतारने की बात होनी चाहिए। हजारों लोग आज भी इस गीत को गुनगुनाते रहते हैं। स्कूलों कालेजों में चर्चित समूहगान है यह गीत। स्वर्ग एक मिथकीय परिकल्पना है। बकौल गालिब-हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल को खुश रखने को ‘गालिब’ ये खयाल अच्छा है।
  जो भी हो लेकिन स्वर्ग, दुख विहीन समाज तथा जीवन का बड़ विजन है। शंकर शैलेन्द्र पहले ही साफ कर दे रहे हैं अगर कही हो स्वर्ग तो। इसलिए स्वर्ग को धरती पर उतार लाने का विजन धरती को स्वर्ग जैसा बनाने का स्वप्न मात्र है। समस्याहीन तथा दुखहीन जीवन। दरअसल जन गीतों में वर्णित चित्रित जीवन संधर्ष तथा लक्ष्य स्पष्ट रूप से आजादी समानता से लैस महान मानवीय समाज की रचना है। इस क्रम में स्वर्ग जैसा विजन  सहज भी है और शानदार भी। शंकर शैलेन्द्र इसे धरती पर उतार लाने का अह्वान करते हैं। गम और सितम के चार दिनों से पार जाने की शदियों से चली आ रही जद्दो जहद को वह स्वर देते हैं। 
बड़े स्वप्न-विजन और उसके लिए सतत् संघर्ष। नाउम्मीदी के दुश्चक्र से बाहर आना, एक जुटता उत्साह, उल्लास तथा प्रयत्न जनगीतों की महत्वपूर्ण विशेषता है। यही कारण है कि ये गीत आज भी हमारे कण्ठहार बने हुए हैं। ऐसा नहीं है कि जन गीतों में अपने समय के कटु यथार्थ का चित्रण नहीं है या गीतकार यथार्थ से मुंह चुराते हैं बल्कि अन्य कविताओं के मुकाबले यहाँ यथार्थ की तीव्रता कहीं ज्यादा ही है। श्ांकर शैलेन्द्र स्पष्ट शब्दों में लिखते हैं कि- 
बुरी है आग पेट की बुरे हैं दिल के दाग ये। या ‘जुल्म के महल’, ‘भूख और रोग के स्वराज’ तो असामानता और उत्पीड़न का कटु सत्य और यथार्थ है। जिसके लिये वे स्वर्ग को जमीन पर उतारने के संघर्ष का एहसास करते हैं। इस रूप में जीवन का भयावह शोषण उत्पीड़न से भरा मंजर और इससे मुक्ति के लिए धरती को स्वर्ग में बदलने की तीव्र आकांक्षा। जनगीत का यही काव्य सौन्दर्य है। शंकर शैलेन्द्र ने अत्यन्त कुशलता से रचा है। यथार्थ और स्वप्न-विजन का द्वन्द्व। बेहतरी के लिए संघर्ष गीत का केन्द्रीय भाव है। 
राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम के दौर में लिखे साहिर लुधियानवी के चर्चित गीत का उल्लेख इस सन्दर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। साहिर बड़े शायर हैं। उनकी परिकल्पना और विजन महान है। भयावह यथार्थ और परिकल्पित स्वप्न के द्वन्द्व पर रचा गया उनका गीत यह सुबह कभी तो आएगी, अपने सम्पूर्ण रचना विधान में महाकाव्यात्मक है। साहिर आश्वस्त हैं कि यह सुबह कभी तो आएगी और यह भी कि यह सुबह हमी से आयेगी हम अर्थात शोषित पीड़ित जन। वे एक तरफ अपने समय के भयावह यथार्थ तथा दुख को याद करते हैं, भयानक शोषण उत्पीड़न की रात को रखते हैं दूसरी तरफ यह विश्वास भी व्यक्त करते हैं कि सुबह आएगी कभी तो आएगी। उनको यकीन है कि जब दुख के बादल पिघलेंगे और जब एक अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाई जाएगी और यह संघर्षों से एक दिन संभव होगा। 
साहिर अनोखी दुनिया की बुनियाद उठाने से पहले अपने समय के भयावह यथार्थ को रखते हैं। यही वह संदर्भ है जहाँ से नई दुनिया के रचना की जरूरत बनती है। यथार्थ चित्रण के क्रम में वे सारा ध्यान पीड़ित मानवता पर रखते हैं। खासकर मजदूरों, किसानों स्त्रियों की स्थिति पर। भूख गरीबी, लाचारी शोषण उत्पीड़न पर उनकी निगाह ठहरती है और वहीं से वह एक अनोखी दुनिया का विजन लेकर चलते हैं। मांग रखते हैं या उसकी बुनियाद उठाने की बात करते हैं। एक सुबह ऐसी जिसमें वर्तमान की अंधेरी रात डूब जाएगी। वे वर्तमान के भयावह यथार्थ वर्णन करते हैं। इंसानों का मोल मिट्टी से भी गया बीता है। उनकी इज्जत सिक्कों से तौली जा रही है। दौलत के लिए स्त्रियों की अस्मत बेची जा रही है। चाहत को कुचला जा रहा है। औरत को बेचा जा रहा है। भूख और बेकारी का साम्राज्य फैला है। दौलत की इजारेदारी में मानवता कैद है। एक तरफ मजबूर बुढ़ापा धूल फांक रहा है तो दूसरी तरफ बचपन गंदी गलियों में भीख मांगने पर विवश है। हक की आवाज उठाने वालों को सूली पर चढ़ाया जा रहा है। फांकों की चिंता में हैं और सीने में दोजख की आग लगी हुई है। अर्थात यह दुनिया पूरी तरह भयावह लूट और शोषण अन्याय के हजारों सन्दर्भों से पटी पड़ी है। अंधेरी रात बहुत ही भयानक है लेकिन इसी भयानक यथार्थ के बीच साहिर उम्मीद बनाये रखते हैं। शोषण विहिन समाज का महान विजन सामने रखते है। हमें आश्वस्त करते है। यह शोषण की, उत्पीड़न की, लूट की रात एक दिन खत्म होगी। सुबह तो आएगी और हमीं से आएगी। साहिर एक तरफ भयावह यथार्थ को देखते हैं तो दूसरी तरफ उससे मुक्ति के प्रति आशा व्यक्त करते हैं। यह आस्था और विश्वास आज अत्यन्त सारवान है। यथार्थ के तीखे सन्दर्भ और उससे मुक्ति के लिये संघर्ष को पूरी शक्ति के साथ साहिर ने अपने कालजयी गीत में पिरोया है। 
इसी तरह शशि प्रकाश का एक गीत है। बेहद स्वप्न दर्शी और विजनरी। नई दुनिया का ख्वाब। इस ख्वाब को हम ही पूरा करेंगे। यह हमारा ऐतिहासिक कार्यभार है। गीत के बोल है- 

दुनिया के हर सवाल के हम ही जवाब हैं, 
आंखां में हमारी नई दुनिया के ख्वाब है। 

शशि प्रकाश मेहनतकश अवाम की महान संघर्ष गाथा को पहले चंद पंक्तियों में रखते हैं जो कुछ दुनिया में सुन्दर है, महान है, वह हम मेहनतकश श्रमिकों की रचना है। दुनिया का निर्माण श्रमजीवी वर्ग ने ही किया है। 

  इन बाजुओं ने दुनिया बनायी है, 
  काटा है जंगलों को बस्ती बसाई है, 
  जांगर खटा के खेतों में फसलें उगाई है, 
  सड़कें निकाली है, अटारी उठाई है, 
  ये बांध बनाये हैं फैक्ट्री बनाई है।  

हमने अपनी मेहनत से दुनिया को गढ़ा है लेकिन हमीं इस दुनिया में सबसे ज्यादा शोषण-उत्पीड़न के शिकार हुए हैं। दुनिया में जो भी बदसूरत हैं वह मुट्ठी भर शोषकों तथा उसकी व्यवस्था की देन है। लेकिन जो दुनिया को बना सकते हैं, वही एक जुट संघर्ष से शोषण और उत्पीड़न को समाप्त करेंगे। यही स्थायी ख्वाव हमारी आँखों में है। शोषण मुक्त समाज का स्वप्न। 
दरसल हमेशा से जनगीतों को राजनैतिक विचारों की उद्रणी, लाउड पोयट्री, भावों की गहराई का अभाव, उथलापन आदि आरोप लगाकर बड़े कलेवर की कृतियों महाकाव्य आदि तथा प्रोजियन फार्म की कविताओं के मुकाबले कम महत्व का माना जाता रहा है। जबकि जनगीतों को आन्तरिक बुनावट, कथन, यथार्थ बोध और सबसे ऊपर महान तथा बड़ा विजन तथा उसका व्यापक फलक किसी तरह से कमतर नहीं है। जनगीतों की अपार लोकप्रियता तथा सफलता और इससे भी आगे बढ़कर एक साथ बड़े जन समूह को उद्वेलित प्रेरित करने की शक्ति उसे अलग से रेखांकित करने की मांग करती है। जहाँ तक भावों विचारों की गहराई तथा कलात्मकता की बात है वह भी कविता के किसी फार्म के मुकाबले कमतर भी नहीं है। बस गंभीरता का लबादा फेंककर जन गीतों के आन्तरिक सौन्दर्य को नया पाठ रचना होगा। यदि कविता की सार्थकता महाकाव्य होने में है तो जनगीतों की सार्थकता नये समाज के विजन को हकीकत में बदलने वाले संघर्षों के प्रेरक बनने में है।     

      
-राजेश मल्ल 
लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2018 अंक में प्रकाशित

साइबर परिप्रेक्ष्य में संघ

हिंदू राष्ट्रवाद ने हर नागरिक के मन को किसी न किसी रूप में प्रभावित किया है, यह प्रक्रिया राममंदिर आंदोलन के बाद से चल रही है, मोदी सरकार बनने के साथ इन दिनों चरम पर है। इसके पहले अटल बिहारी सरकार बनने के समय भी इसके मध्यवर्ती उभार को देख सकते हैं लेकिन आक्रामक ढ़ंग से हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्रवाद और मोदी की महानेता की जो इमेज इसबार सामने आई है वैसा व्यापक असर पहले कभी नहीं देखा गया। चुनौती यह है कि ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की इमेज को कैसे समझें। तदर्थ उपकरणों  के जरिए इसे समझना मुश्किल है, यह प्रचलित समाजविज्ञान के नजरिए से भी पकड़ में नहीं आ सकती। साथ ही प्रेस क्रांति के संदर्भ में रचे गए साम्प्रदायिकता विरोधी विचारधारा के संदर्भ में भी इसके समाधान नहीं खोजे जा सकते। इसे समझने के लिए नए युग के साइबर परिप्रेक्ष्य की जरूरत है।
        ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदूराष्ट्र’ का नया संदर्भ वर्चुअल रियलिटी रच रही है। साइबर संचार रच रहा है। इसलिए वर्चुअल रियलिटी की प्रक्रियाओं की सटीक समझ के आधार पर ही इसके समूचे वैचारिक तानेबाने को खोला जाना चाहिए। सवाल यह है सारे देश में ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की 
आंधी कैसे आई उसकी प्रक्रिया क्या है उसने किस तरह के दार्शनिक मॉडल का इस्तेमाल किया इत्यादि सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करने की जरूरत है।
    ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ अचानक पैदा हुई विचारधारा नहीं है। यह पहले से थी और इसका सौ साल से भी पुराना इतिहास है, इस विचार के इतिहास में वे भी शामिल हैं जो आरएसएस में रहे हैं और वे भी शामिल हैं जो आरएसएस में नहीं रहे हैं। 19वीं  सदी के पुनरुत्थानवाद में इस विचारधारा के बीज बोए गए थे। जिनकी ओर हमने कभी कोई विचारधारात्मक संघर्ष नहीं चलाया। हमने नवजागरण के सकारात्मक पक्षों पर ध्यान केद्रिंत किया लेकिन उसके नकारात्मक पक्ष पर ध्यान ही नहीं दिया। राजा राममोहन राय के सकारात्मक विचारों पर नजर गई लेकिन नकारात्मक विचारों को छिपाए रखा। उसी तरह दयानंद सरस्वती के आर्य समाज और उसके समाजसुधारों और खड़ी बोली हिंदी के विकास से संबंधित योगदान की भूरि-भूरि प्रशंसा की लेकिन हिंदुत्ववादी विचारों की अनदेखी की। इसी तरह बाल गंगाधर तिलक, मदनमोहन मालवीय आदि के स्वाधीनता  संग्राम में योगदान को महत्व दिया लेकिन उनके हिंदुत्ववादी विचारों की अनदेखी की। कहने का आशय यह कि ‘हिंदुत्व’ ‘गोरक्षा’ और ‘हिंदूराष्ट्र’ की अवधारणा हाल-फिलहाल की तैयारशुदा विचारधाराएँ नहीं हैं। ये भारतीय समाज में पहले से मौजूद रही हैं। इससे यह मिथ टूटता है कि ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदूराष्ट्र’ का विचार सिर्फ आरएसएस की देन है।
आरएसएस ने  पहले से मौजूद इन दोनों विचारों को अपने सांगठनिक वैचारिक ढांचे में शामिल किया और मनमाना विस्तार दिया। यह सच है वामपंथी, 
धर्मनिरपेक्ष विचारकों ने बड़े पैमाने पर आरएसएस का मूल्यांकन किया, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद आदि की परंपरा का विवेचन भी किया लेकिन वे यह बताने में असमर्थ रहे कि हिंदुत्व और राष्ट्रवाद का विचार आम जनता के दिलो-दिमाग में कैसे घुसता चला गया धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र, संविधान, सरकारें आदि इसे रोकने में असफल क्यों रहीं। ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदूराष्ट्र’ के विचारों की आम जनता में आज जो गहराई तक मौजूदगी नजर आती है उसकी प्रक्रियाओं को दार्शनिक तौर पर खोले बिना यह समझ में नहीं आएगा कि आखिरकार ये विचार जनता में इतनी गहराई तक कैसे पहुँचे, कहने का आशय यह कि विचार की आलोचना से विचार का सतही रूप समझ में आता है लेकिन उसकी जनता में पैंठ को देखकर उसका असली रूप समझ में आता है।
       ‘हिंदुत्व’ और ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष ताकतें तदर्थ भाव से वैचारिक संघर्ष करती रहीं, लेकिन उसका सफाया नहीं कर पाईं, जबकि हर स्थान और संरचना में उनका दखल था। इसका अर्थ यह है संरचना पर कब्जा कर लेने या कानून बनाने से कोई भी प्रचलित विचार मरता नहीं है। धर्मनिरपेक्षतावादी इस संघर्ष के जरिए अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे थे, हर बार के चुनावों में जनसंघ-भाजपा की हार पर खुश हो रहे थे, धर्मनिरपेक्ष ताकतों की विजय पर जश्न मना रहे थे, लेकिन विगत 70 सालों में धर्मनिरपेक्ष प्रचार अभियान अंत में वहीं आकर पहुँचा जहाँ पर वह 1947 में था, सन् 1947 में जो घृणा हमारे मन में थी वही घृणा आज भी हमारे मन में है, मुसलमानों, पाक के निर्माण आदि के खिलाफ जो घृणा 1947 में थी, वह आज भी है, इससे यह पता चलता है कि हम नौ दिन चले अढाई कोस।
कहने का आशय यह कि देश की धर्मनिरपेक्ष आत्मा तो हमने बना ली लेकिन उसके अनुरूप शरीर नहीं बना पाए, शरीर के अंग नहीं बना पाए। शरीर और अंगों के बिना आत्मा का चरित्र वायवीय बन जाता है। उल्लेखनीय विगत 70 सालों में साम्प्रदायिक ताकतों ने अपने प्रयोगों के जरिए एक ही चीज पैदा की है वह है अशांति! अशांति के बिना वे अपना विकास नहीं कर सकतीं। उनके सारे एक्शन अ-शांति पैदा करने वाले होते हैं। संघियों के प्रयोग सिर्फ प्रचार तक ही सीमित नहीं रहे हैं बल्कि शरीर, राजनीति, सेंसरशिप, दंगे और दमन तक इनका क्षितिज फैला हुआ है। इन सबके कारण वे समाज को शांति से रहने नहीं देते। इन सबका असर यह हुआ कि धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक भारत का तानाबाना और ढाँचा लगातार क्षतिग्रस्त हुआ है। मसलन् जब कभी दंगा होता है तो हम उसे संपत्ति, जानो-माल के नुकसान या कानून-व्यवस्था की समस्या से ज्यादा देखते ही नहीं हैं, हम यह नहीं देखते कि इससे भारत का धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक शरीर क्षतिग्रस्त हुआ है। हमने भारत की आत्मा को एकदम वायवीय बना दिया है। दिलचस्प बात यह है कि भारत की बातें सब करते हैं, लेकिन भारत के लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष शरीर के अंगों की बात कोई नहीं करता। अंगों के बिना शरीर का कोई अर्थ नहीं है।
       भारत के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष शारीरिक अंगों के बिना भारत की आत्मा वायवीय है, अमूर्त है, अप्रासंगिक है। साम्प्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता के संघर्ष में अनेक लोग मारे गए, अनेक किस्म के विचारों का भी अंत हुआ। बार-बार कहा गया सचेत रहो। लेकिन सचेत रहो के आह्वान ने हमें अंत में कहीं का नहीं छोड़ा, हम क्रमशः अचेत होते चले गए, जनता में सचेत रहो के आह्वान को पहुँचाने में असफल रहे, असफल क्यों रहे इसका कभी वस्तुगत मूल्यांकन नहीं किया। आज सत्तर साल बाद हकीकत यह है कि आम आदमी की जुबान, बोली, अभिव्यंजना शैली आदि में साम्प्रदायिक लहजा घुस गया है। कायदे से व्यक्ति को धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक बनना था लेकिन हुआ एकदम उलटा। आज हम सबके कॉमनसेंस में साम्प्रदायिक विचारों और नारों ने गहरी पैठ बना ली है। हम सबको योग, भगवानराम, कृष्ण, राधा, सीता, हिंदुत्व, राष्ट्रवाद आदि के निरर्थक प्रपंचों में उलझा दिया गया है। व्यक्ति को हमने लोकतंत्र धर्मनिरपेक्षता के अनुरुप पूरी तरह नए रुप में तैयार ही नहीं किया, हम ऊपर से मुखौटे लगाकर उसे धर्मनिरपेक्ष बनाते रहे, लोकतांत्रिक बनाते रहे, उसके व्यक्तित्वान्तरण के सवालों को कभी बहस के केन्द्र में नहीं लाए, सवाल यह है व्यक्ति को पूरी तरह बदले बगैर यह कैसे संभव है कि भारत लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष हो जाए, हमने रणनीति यह बनायी कि व्यक्ति जैसा है, वैसा ही रहे, थोड़ा बहुत बदल जाए तो ठीक है, जो हिदू है वह हिंदू रहे, जो मुसलमान है वह मुसलमान रहे, जो ईसाई है वह ईसाई रहे, बस इससे हमें सद्भाव का पाखंडी मार्ग मिल गया। हमने व्यक्ति के कपड़े बदले, जीवन के साजो-सामान बदले, समाज का ऊपरी ढाँचा बदला, कल-कारखाने बनाए, सड़कें बनाईं, नई-नई गगनचुम्बी इमारतें बनाईं, नए कानून बनाए, लेकिन व्यक्ति को नहीं बदला। यही वह जगह है जहाँ पर भारत हार गया, भारत वायवीय बन गया, बिना शरीर के अंगों का देश बन गया। आधुनिक भारत को 
आधुनिक मनुष्य भी चाहिए, इस सामान्य किंतु महत्वपूर्ण बात को हम समझ ही नहीं पाए, लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष भारत की परिकल्पना को आधुनिक मनुष्य बनाए बगैर साकार करना संभव नहीं है, यही वह बिंदु है जहाँ से साम्प्रदायिक ताकतों ने समाज के जर्रे-जर्रे पर हमला किया और उसे अपने साँचे में ढालने में उनको सफलता मिली।
       आधुनिक शरीर अंग रहित भारत वस्तुतः साम्प्रदायिक भारत है, हम लाख दावा करें कि भारत धर्मनिरपेक्ष है, उसकी जनता धर्मनिरपेक्ष है, लेकिन वास्तविकता इसके एकदम विपरीत है, आप आँकडों की रोशनी में, मतदाताओं के मतदान की प्राथमिकताओं, प्राप्त मतों के आधार पर लाख तर्क दें और कहें कि भारत धर्मनिरपेक्ष है तो यह बात गले नहीं उतरती, क्योंकि आधुनिक भारत के अनुरूप आधुनिक व्यक्ति के निर्माण के काम को हमने अपने एजेण्डे पर कभी नहीं रखा, इसका परिणाम यह निकला कि आज धर्मनिरपेक्ष सपने, प्राथमिकताएँ और मूल्य संकट में हैं, सभी धर्मनिरपेक्ष दल अपने को असहाय महसूस कर रहे हैं, उनके पास इसका कोई उत्तर नहीं है।
बुनियादी सवाल यह है कि 70 साल तक भारत धर्मनिरपेक्ष था तो फिर एकदम हिंदुत्ववादी ताकतें सत्ता पर काबिज क्यों हो गईं, क्यों जीवन के हर क्षेत्र में उनका व्यापक प्रभाव बना हुआ है  यह महज मोदी सरकार के आने के साथ घटित परिघटना नहीं है, मोदी का चुनाव जीतना एक घटना मात्र है, यह संभव है कि आगामी 2019 का लोकसभा चुनाव मोदी-भाजपा हार जाएँ, सारे देश में क्रमशः उनकी राज्य सरकारें भी खत्म हो जाएँ लेकिन क्या इससे भारत को धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक मान लेंगे, क्या धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र का संबंध सिर्फ चुनावी हार-जीत तक ही सीमित है यह लोकतंत्र धर्मनिरपेक्षता को अति सरलीकृत रुप में देखना होगा। हमें लोकतंत्र के चुनावी गणित के दायरे के बाहर जाकर गंभीरता से साम्प्रदायिकता के चरित्र को समझने की कोशिश करनी होगी।
      हमारे यहाँ संविधान सब मानते हैं, लेकिन संविधान के अनुरूप सही शारीरिक अंगों या संरचनाओं को हम निर्मित ही नहीं कर पाए, जो संरचनाएँ निर्मित की हैं वे 
धर्म, धार्मिक पहचान और जनदवाब की दासी है। उन संरचनाओं के आदेशों को कोई नहीं मानता। हमें संविधान चाहिए, बिना संवैधानिक संरचनाओं के आदेशों के अनुपालन के बिना, हमें व्यक्ति चाहिए लेकिन संविधान के ढाँचे ढला व्यक्ति नहीं चाहिए, बल्कि परंपरा में ढला व्यक्ति चाहिए, धर्म में ढला व्यक्ति चाहिए, कानून चाहिए लेकिन धर्मानुकूल कानून चाहिए। संविधान के पालन का अर्थ है संवैधानिक संरचनाओं का निर्माण और उनके आदेश का पालन, कानून 
विधान के अनुरूप आचरण, संविधान में वर्णित लोकतांत्रिक धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के अनुरूप नए व्यक्ति के रूप में नागरिक की पहचान का निर्माण करना। इन सब पर 
ध्यान केन्द्रित करने के बजाय साम्प्रदायिक धर्मनिरपेक्ष ताकतों ने संविधान को तो माना, लेकिन व्यवहार में लोकतंत्र, व्यक्ति के जीवन में लोकतंत्र, परिवार में लोकतंत्र, धर्म में लोकतंत्र, राजनीति में लोकतंत्र, जाति में लोकतंत्र आदि को अस्वीकार किया। कागज पर अभिव्यक्ति की आजादी को माना लेकिन उसकी असली स्प्रिट से परहेज करते रहे।
दिलचस्प आयरनी यह है कि हमारे देश में लोकतांत्रिक संविधान है, लोकतांत्रिक संरचनाएँ हैं, लेकिन व्यक्ति के जीवन में अंदर-बाहर लोकतंत्र नहीं है। व्यक्ति के अंदर-बाहर लोकतंत्र का अभाव ही वह बिंदु है जहाँ से साम्प्रदायिक ताकतें अपनी ऊर्जा लेती हैं और अपने सामाजिक आधार को निरंतर बढ़ाती रही हैं, इसका दुष्परिणाम यह निकला है कि सभी दलों में अ-लोकतांत्रिक व्यक्ति मान्य और ताकतवर बना है। अलोकतांत्रिक व्यक्ति का आदर्श प्रतिनिधि चरित्र हैं गुंडे, दलाल, समानांतर सत्ता केन्द्र, अवैध सत्ता केन्द्र आदि।
     अंगों के बिना शरीर की अवधारणा के अनुसार यदि साहित्य को देखें तो बहुत ही भयावह तस्वीर नजर आएगी, कहने को साहित्य खूब लिखा जा रहा है, लेकिन उसमें सारवान अंतर्वस्तु और सृजन के तत्व का अभाव है। रूढ़ विषयों पर स्टीरियो टाइप लेखन जमकर हो रहा है, इसलिए साहित्य प्रभावहीन होकर रह गया है। इसी तरह हिंदी में साहित्यकार है, लेकिन उनकी जीवन और उसके गंभीर सवालों में कोई दिलचस्पी नहीं है। उसने ठीक से विश्वदृष्टि का निर्माण तक नहीं किया है। वह लिखने के नाम पर लिख रहा है, बिना विश्वदृष्टि के लिख रहा है, समाज में किसी भी वर्ग या समुदाय या लिंग के साथ लगाव पैदा किए बगैर लिख रहा है, ऐसी स्थिति में साहित्यकार समाज में रहकर भी अपनी पहचान नहीं बना पाया है।
मोदी सरकार आने के पहले कहने के लिए सामूहिकता का खूब ढोल पीटा गया, कहा गया सोनिया गांधी हरेक फैसले लेती रही हैं, मनमोहन सिंह पर थोपती रही हैं, वे तो उनके आदेशों का पालन करते रहे हैं, मोदीजी पीएम बनेंगे तो यह सब नहीं होगा, फैसले सामूहिक तौर पर मंत्रिमंडल लेगा, लेकिन व्यवहार में हुआ एकदम उलटा, प्रधानमंत्री कार्यालय में सभी मंत्रालयों की शक्ति संकेन्द्रित होकर रह गयी। यहाँ तक कि भाजपा के द्वारा राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने के बाद राष्ट्रपति भवन के फैसले लेने का अधिकार भी पीएम ने अपने पास रख लिया। सामूहिक फैसले न लेने का क्लासिक उदाहरण है नोटबंदी का फैसला। यह फैसला अकेले पीएम का था, उनके कॉकस के लोगों के अलावा इसके बारे में कोई पहले से नहीं जानता था। जबकि यह फैसला लेना था रिजर्व बैंक को लेकिन पीएम ने बैंक पर अपना फैसला थोप दिया। कहने का आशय यह कि मोदी के सत्ता में आने के बाद मंत्रिमंडल की सामूहिक फैसले लेने, स्वायत्त और लोकतांत्रिक विवेक के आधार पर काम करने की शक्तियाँ घटी हैं। अब मंत्रिमंडल में अलोकतंत्र सर्कुलेशन में है, पीएम निष्ठा चरम पर है, इसने लोकतंत्र को अपाहिज बना दिया है। सत्ता के सर्कुलेशन को रोक दिया है, अब सत्तातंत्र में सिर्फ वही चीज गतिशील है जिसकी पीएम ने अनुमति दी है। पीएम की अनुमति के बिना कोई चीज गतिशील नहीं हो सकती। उसने लोकतंत्र की स्पीड को रोक दिया है।
अंगों के बिना शरीर की धारणा से संचालित होने के कारण सिर्फ एक ही चीज पर बल है वह है प्रचार की सघनता और उन्माद। हम अब सब समय प्रचार की सघन अनुभूतियों में ही डूबते-उतराते रहते हैं, हम भूल गए कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, अभिव्यक्ति की आजादी आदि का भी जीवन में कोई महत्व है। हम सबके जेहन में संघ, मोदी, हिंदुत्व, हिंदू राष्ट्रवाद के प्रचार को सघनता के साथ उतार दिया गया है। हरेक व्यक्ति बिना जाने माने बैठा है कि मोदीजी सही कर रहे हैं, सवाल करो कि क्या सही कर रहे हैं तो उसके पास न तो कोई तथ्य होते हैं, न प्रमाण होता है, लेकिन वह माने बैठा है कि मोदीजी सही कर रहे हैं। यहाँ तक कि जघन्य हत्याकांडों की खबरों तक से व्यक्ति अब विचलित नहीं होता, उसे मोदी की चुप्पी से कोई परेशानी नहीं है बल्कि वह मोदी की चुप्पी पर भी मोदी के पक्ष में तर्कों का पुलिंदा लेकर खड़ा है। हालात की गंभीरता देखें कि 
आधारकार्ड को संवैधानिक प्रावधानों, सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों की अवहेलना करके हर चीज से जोड़ दिया गया उसको भी चुपचाप स्वीकार कर लिया गया। अलोकतांत्रिक प्रक्रिया का इतना सघन प्रभाव पहले कभी महसूस नहीं किया गया।
      सांगठनिक संरचनाएं और मॉडल का चरित्र। मोदी सरकार आने के बाद समूचे समाज का नए सिरे से वर्गीकरण किया जा रहा है, शहरों का नया वर्गीकरण हो रहा, नए सिरे से सामाजिक समुदायों के वर्गीकरण की दिशा में सरकार कदम उठाने जा रही है, आरक्षण को भी नए वर्गीकरण के नजरिए से परिभाषित करने की कोशिश हो रही है, इसी प्रकार नागरिक पहचान, ग्राहक पहचान, क्रय-विक्रय, बैंक से आदान-प्रदान आदि सब क्षेत्र में नए किस्म के वर्गीकरण या केटेगराइजेशन ने जन्म ले लिया है। कहने का आशय यह कि जीवन के हर क्षेत्र में केटेगराजेशन हो रहा है। इस क्रम में नए पदबंधों का उदय हुआ है। सवाल उठता है इस तरह के वर्गीकरण की जरूरत क्यों पड़ी। यह असल में चीजों, घटनाओं, देश, पड़ोस, निजी कार्य-व्यापार आदि को सीधे सपाट क्रम में देखने के नजरिए की दिशा में ठेलने की प्रक्रिया है। इस तरह देखने का अर्थ यह है कि चीजों, घटनाओं आदि को एपीसोड के रूप में देखना, इसमें एक एपीसोड खत्म होता है तो दूसरा शुरू हो जाता है, यही पद्धति हिंदू राष्ट्रवाद के परिप्रेक्ष्य पर भी लागू होती है, उनके सभी एक्शन एपीसोड के रूप में आते हैं, एक एपीसोड़ खत्म तो दूसरा शुरू, दूसरा खत्म तो तीसरा शुरू आदि आदि। इस तरह के एपीसोड लगातार यही संदेश देते हैं कि आप अपने घर या स्कूल में नहीं हैं बल्कि लगातार किसी एपिसोड में व्यस्त हैं। कभी समुदाय, कभी धर्म, कभी स्त्री या कभी मोदी या कभी हिंदुत्व या कभी लवजेहाद, कभी गऊ-गुंडई आदि के एपीसोड में व्यस्त रहते हैं। आप एक घटना या स्तर से बाहर निकलते हैं तो दूसरी घटना आकर घेर लेती है। ये सभी सेगमेंट कभी वायनरी, कभी चक्राकार और कभी लाइनर भाव से घटित होते रहते हैं। हम इनमें से किसी न किसी में बंधने के लिए मजबूर हैं। आप चाहें तो अपने नजरिए के अनुसार सेगमेंट या सर्किल बदल सकते हैं। मसलन आपको लवजेहाद यूपी में नापसंद है लेकिन गोवा में पसंद है।
      आरएसएस जैसे साम्प्रदायिक संगठन अपने को चक्राकार रूप में संगठित करते हैं, वे आंतरिक से बाह्य की ओर उन्मुख होते हैं। इस काम को वे सिलसिलेबार स्थानीय गतिविधियों के जरिए संपन्न करते हैं। इस समूची प्रक्रिया का लक्ष्य है आदिम समूह के रुप में हिंदू समाज को संगठित करना। चीजों को नए वर्गीकरण में करके देखना, रखना और संपन्न करना स्वयं में आदिम समाज की प्रवृत्ति है, उसी की देन है। इस प्रक्रिया में कम्युनिकेशन बहुत प्रभावशाली होता है। लेकिन इस समूची प्रक्रिया का सबसे विलक्षण सच यह है कि आधुनिक राज्य के शासन में नए वर्गीकरण को समाज में बरकरार रखना असंभव है। क्योंकि सत्तातंत्र की कार्यप्रणाली को वर्गीकृत ढ़ंग से नहीं चलाया जा सकता है। क्योंकि आधुनिक राज्य और समाज की बुनियाद में वर्गीकरण का निषेध काम करता है।
      वास्तविकता यह कि है भारत की व्यवस्था एकीकरण और एकीकृत भाव से चलती रही है। यह ग्लोबल सिस्टम का अंग है। इसके कारण वह सभी किस्म के विभाजनकारी वर्गीकरणों को तोड़ने के लिए प्रतिबद्ध है, वह विभाजनकारी ताकतों के बनाए लक्ष्यों को तोड़ने के लिए, उनको अपदस्थ करने के लिए भी वचनवद्ध है। यही वजह है साम्प्रदायिकता के साथ 
आधुनिक राज्य का निरंतर अंतर्विरोध बना रहता है।
           आरएसएस ने एक नायकत्व का जो मॉडल चुना है वह पशुचेतना और पशुदृष्टि पर आधारित है। यह मॉडल प्राचीन समाजों में सक्रिय रहा है। पशुदृष्टि का गहरा संबंध पशु स्प्रिट से है। हरेक पशु की स्प्रिट अलग होती है लेकिन कुछ चीजें साझा हैं मसलन पशु अति चौकन्ना होकर हर तरफ नजर रखता है, केन्द्र पर नजर रखता है, हर चीज को एकल सर्किल में रखकर देखता है, ठीक वैसे ही आरएसएस भी देखता है। इसके गर्भ से ही केन्द्रीकृत सत्ता, केन्द्रीकृत संगठन की अवधारणा का जन्म हुआ है। आरएसएस की प्रकृति में जो लोग लोकतंत्र और विकेन्द्रीकरण खोज रहे हैं वह गलती कर रहे हैं, आरएसएस का लोकतंत्र और विकेन्द्रीकरण से कोई संबंध नहीं है, यह उसके बुनियादी मॉडल का हिस्सा ही नहीं है। वह जब भी जहाँ पर भी काम करता है केन्द्रीकृत ढंग से काम करता है। उसके काम करने की शैली द्वैतपूर्ण और वायनरी है। मसलन् वह कहता है लोकतंत्र की, करता है अधिनायकवाद की। कहता है राममंदिर की, करता है सामाजिक विभाजन की। यह काम वह क्रमबद्ध ढंग से करता है। मसलन इसबार यदि गऊरक्षा, लवजेहाद के मसले केन्द्र में हैं तो अगली बार सत्ता में वे जब आएँगे तो नए विभाजनकारी मुद्दों के साथ आएगे, वे गऊरक्षा और लवजेहाद पर बातें नहीं करेंगे, जैसे पहले उन्होंने धारा 370 राममंदिर आदि के मसले उठाए लेकिन बाद में उनको छोड़ दिया और नए मसले चुन लिए।
    कहने का आशय यह कि आरएसएस का मानना है जब भी सत्ता में आओ नए मसले के साथ आओ, पुराने को छोड़ दो। इस क्रम में वे अपने हिंदुत्व नामक वर्गीकरण को नहीं छोड़ते या मुसलमानों के बारे में अपनी धारणाओं का परित्याग नहीं करते। वर्गीकरण और वर्गीकृत सोच उनके मॉडल का अंतर्ग्रथित हिस्सा है। उनके वर्गीकरण में केन्द्रीकरण का निषेध शामिल नहीं है। यही वजह है कि आज पीएम कार्यालय में समूची सत्ता का केन्द्रीकरण करके रख दिया गया है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि संघ के बनाए वर्गीकरण अनुदार होते हैं और स्थानीयता पर निर्भर होते हैं। पुराने समाज में जिस तरह पिता, बॉस, शिक्षक आदि का चेहरा केन्द्र में होता था, लेकिन आधुनिक समाज में यह अप्रासंगिक हो जाता है। आधुनिक समाज में हम विभिन्न किस्म के सर्किलों और वर्गीकृत समूहों में बँट जाते हैं, लेकिन इन सभी वर्गीकृत और बँटे हुए सर्किलों का एक चेहरा होता है, उस चेहरे पर सबकी नजर होती है। इसी तरह संघ का भी एक प्रधान चेहरा होता है जिस पर सबकी नजर होती है। इस समय वह चेहरा नरेन्द्र मोदी हैं। पहले अटल बिहारी वाजपेयी थे। इसलिए वर्गीकरण में बँटे लोगों की नजर शून्य या आकाश की ओर नहीं प्रधान चेहरे पर टिकी होती है। यही है पशुदृष्टि जो 
प्रधान पर नजर रखती है लेकिन पशुचेतना की तरह काम करती है। कहने को समाज में विभिन्न स्तरों पर अनेक सत्ताकेद्र हैं लेकिन इन सबके ऊपर एक ही केन्द्र है, एक ही व्यक्ति है जो समूची सत्ता, सोच और आचरण का प्रतिनिधित्व करता है।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी 
लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2018 अंक में प्रकाशित

गिरोहबन्द बलात्कार की बर्बरता

जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिला के हीरानगर के रसाना गाँव की आठ साल की नाबालिग बच्ची आसिफा को अगवा करके जो बर्बरता की गई, वह इस धरती पर किसी भी सभ्य इंसान को झकझोर देने और शर्मिन्दा कर देने के लिए काफी है। इस बदतर हालत में भी विकसित हो जाने में यकीन करने वालों की कमी नहीं। उस बच्ची को एक पवित्र मंदिर में बंद करके भूखा रखा गया, नशीली दवाएँ खिलाई गइंर् और पांच दिनों तक जिस बच्ची को अपने शरीर का ज्ञान तक नहीं, उसके साथ गिरोहबंद बलात्कार किया गया, बेशरमी से हत्या कर दी गयी और उसकी कुचली हुई लाश को एक जंगल में फेंक दिया गया ताकि उसके मुस्लिम बकरवाल समुदाय को डराकर उस इलाके की जमीन से बेदखल कर दिया जाए और भी घिनौना तब हुआ जब जम्मू बार एसोसिएशन के हिन्दू एकता मंच के सदस्य और संघ परिवार से जुड़े दूसरे गिरोहों ने गिरोहबन्द बलात्कारी दरिन्दों के पक्ष में एक जुलूस निकाला, जिसका नेतृत्व बीजेपी के मंत्री कर रहे थे। प्रदर्शनकारी इस अमानवीय करतूत को राष्ट्रवादी उपलब्धि दिखाने के लिए राष्ट्रीय झंडा तिरंगा फहरा रहे थे। 
जब इस देश को जनवरी में आसिफा के साथ घटी घटना का पता चला तब गिरोहबंद बलात्कारियों के समर्थन में हिन्दुत्व कट्टरपंथियों ने प्रदर्शन किया, उन्हीं दिनों एक 17 वर्षीय लड़की की त्रासद दास्तान भी सामने आई, जिसका उत्तर प्रदेश के उन्नाव विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर ने 4 जून 2017 को बलात्कार किया था और इसके बाद विधायक के तीन साथियों द्वारा उसका अपहरण करके उसके साथ गिरोहबंद बलात्कार किया था। यह घटना तब उजागर हुई जब लड़की ने 9 अप्रैल 2018 को योगी आदित्यनाथ के आवास के सामने खुद को जलाने की कोशिश की। उसी दिन उसके पिता की न्यायिक हिरासत में मौत हो गई थी। उन्हें सेंगर के भाई के नेतृत्व में सेंगर समर्थकों ने बुरी तरह मारा था क्योंकि उन्होंने एफआईआर वापस लेने से इन्कार कर दिया था। पुलिस ने हमलावरों को गिरफ्तार करने के बजाए पीड़ित लड़की के पिता को ही न्यायिक हिरासत में ले लिया जहाँ उनकी मौत हो गई। इसके बाद भड़के गुस्से, आक्रोश के नतीजे में ही जाकर सेंगर के नाम पर एक बकायदा एफआईआर दर्ज हुआ और सीबीआई ने उसे पूछताछ के लिए हिरासत में लिया।
      उपर्युक्त दोनां घटनाओं के बाद एक बार पुनः लोगों के बीच मीडिया ने लड़कियों-बच्चियों के साथ बलात्कार की अनेकानेक खबरों की बाढ़ ला दी। धीरे 
धीरे ऐसी खबरों के लोग आदी (भ्ंइपजनंस) होते दिखाई देने लगे। 
बीजेपी यानी बलात्कार जनद्रोही पार्टी :- तथाकथित हिन्दुत्ववादी मनुवादी राष्ट्रवादी बीजेपी द्वारा बहुप्रचारित ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का दूसरा पक्ष कितना स्याह, डरावना है इसे समझने के लिए उनके निम्नलिखित करतूतों को भी स्मरण करना चाहिए जिसमें बीजेपी के 21 बलात्कारी नेताओं के मामलों का पता चलेगा-

1. मई 2013 में बीजेपी प्रवक्ता और नेता मधु चव्हाण के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा दर्ज है। 
2. मार्च 2017 में मध्य प्रदेश के भाजपा नेता भोजपाल सिंह का बीपीएल कार्ड के वादे पर दलित महिला से बलात्कार की शिकायत दर्ज की गई थी।
3. बीजेपी के पूर्व विधायक विजय माली के खिलाफ पिछले साल फरवरी में बलात्कार के मामले में शिकायत दर्ज की गई। 
4. गुजरात के कच्छ जिले में बीजेपी के चार स्थानीय नेताओं ने 24 वर्षीय महिला के साथ कथित तौर पर गिरोहबंद बलात्कार किया था। बाद में उन्होंने उससे वेश्यावृत्ति कराने व ब्लैकमेल करने जैसा भी कुकृत्य किए।
5. गुजरात से भाजपा के एक विधायक जयेश पटेल के खिलाफ जो बड़ोदरा में निजी मालिकाने वाली पारूल यूनिवर्सिटी के संस्थापक अध्यक्ष हैं, एक 22 वर्षीय नर्सिंग छात्रा के साथ बलात्कार का मामला दर्ज है। यह घटना जून 2016 की है। 
6. गुड़गांव के भाजपा विधायक उमेश अग्रवाल और उनके दो साथियों पर बलात्कार, हमला करना, ड्रग देना, 
अपराधिक धमकी और उत्पीड़न के कथित अपराधों का आरोप है। मई 2015 में एक होटल में 30 वर्षीय महिला के साथ ये घटना अंजाम दी गई थी।
7. कर्नाटक में भाजपा के पूर्व मंत्री हालरप्पा को जून 2010 में बलात्कार के आरोपों में गिरफ्तार किया गया।
8. नवम्बर 2013 में भाजपा विधायक डी0एन0 जीवराज के खिलाफ अपहरण और बलात्कार का मामला दर्ज है। 
9. एक कॉरपोरेटर और भाजपा की मीरा-भयंदर इकाई के महासचिव और म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन की वार्ड समिति के अध्यक्ष अनिल भोसले पर एक 44 वर्षीय महिला के साथ बलात्कार और अप्राकृति यौन दुराचार का आरोप है। 
10. मध्य प्रदेश के एक स्थानीय भाजपा नेता और उसके पांच साथियों पर एक आदिवादी लड़की को अगवा करके उसके साथ गिरोहबंद बलात्कार करने का आरोप है। घटना दिसम्बर 2016 की है। 
11. जुलाई 2013 में म0प्र0 के पूर्व भाजपा मंत्री पर बलात्कार का आरोप है।
12. गुजरात में एक स्थानीय भाजपा नेता अशोक मकवाना को 29 मई को इंडिगो एयरलाइंस की गोआ-अहमदाबाद उड़ान के दौरान 13 वर्षीय एक लड़की के साथ यौन-हिंसा में गिरफ्तार किया गया। 
13. अगस्त 2014 में मध्य प्रदेश के भाजपा नेता तथा पांच अन्य लोगों पर असम की एक नाबालिग लड़की के साथ कथित यौन उत्पीड़न और तस्करी का आरोप है। 
14. सितम्बर 2016 की घटना में पूर्व भाजपा नेता प्रमोद गुप्ता को पांच साल पुराने बलात्कार के मामले में अदालत ने कारावास की सजा सुनाई है। 
15. दिल्ली के तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन के खिलाफ कथित बलात्कार का मामला सामने आया था जो 1996 का है। 
16. भाजपा कार्यालय में कार्यरत महिला ने पार्टी के अंदर स्थानीय भाजपा नेता के भतीजे के खिलाफ बलात्कार का आरोप लगाया था। यह घटना 2012 की है। 
17. एक भाजपा नेता को बेटी के साथ बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। पंजाब के अंजला की एक लड़की ने कहा था कि उसके पिता ने उसके साथ बलात्कार किया था। लड़की के पिता भाजपा के नेता अशोक तनेजा को गिरफ्तार किया गया था।
18. जून 2013 में एक बलात्कार के मामले में मोदी ने राजस्थान के सांसद और मंत्री निहाल चंद को तलब किया था।
19. छत्तीसगढ़ भाजपा विधायक और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री कृष्णमूर्ति पर बलात्कार का आरोप लगा था। उनके सहयोगी के घर उस महिला का मृत शव पाया गया।
20. अक्टूबर 2016 में बंगलुरू में एक महिला ने भाजपा नेता के खिलाफ बलात्कार का मामला दर्ज कराया था। महिला चित्र दुर्ग की है। 
21. जुलाई 2016 में भाजपा नेता हरक सिंह रावत के खिलाफ बलात्कार के मामले की शिकायत दर्ज की गई थी। 
उपर्युक्त 21 तथ्य वे हैं जो समाचार बन गये इसके अलावा ऐसे अनगिनत तथ्य चुप्पी के कारण गुम हैं। लेकिन यह तो स्पष्ट है कि ‘बेटी-बचाओ, बेटी-पढ़ाओ’ के जुमले वालों से ही बेटियाँ असुरक्षित हैं। भाजपा के मई 2014 में सत्ता में आने के बाद बलात्कार की घटनाओं में इजाफा होता जा रहा है। एनसीआरबी की क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक 2010 से 2016 के बीच प्रति एक लाख आबादी पर बलात्कार की घटनाएँ और उनकी दर इस प्रकार है-
     स्रोत-क्राइम इन इण्डिया रिपोर्ट्स ऑफ एनसीआरबी
देशद्रोह का ठप्पा लगाकर देशभक्त बनने वाले मनुवादी फासीवादियों द्वारा अनायास ही अंधविश्वास-निर्मूलन प्रचारक, वैज्ञानिक, तर्कशील नरेन्द्र दाभोलकर, कलबुर्गी, कामरेड गोबिन्द पन्सारे, पत्रकार गौरी लंकेश हत्या कर दी गई। इनकी विचारधारा ही सामंती व साम्राज्यवादी किस्म की है जो मानवद्रोही है। लेकिन इस तथ्य को भी नहीं भूलना चाहिए कि बलात्कारी मानसिकता के लोग सिर्फ भाजपा में ही नहीं सभी पार्टियों, संस्थानों, धार्मिक स्थलों पर मौजूद हैं। गिरोहबंद बलात्कार व हत्या की फेहरिस्त बहुत लम्बी है। यह कोई पहली या आखिरी घटना नहीं हैं। लेकिन इन यौन हिंसाओं का समाधान क्या है? फांसी की सजा, बधियाकरण, कड़े-कानून, कठोर पुलिस-प्रशासन या संत-साधुओं के शरण में जाकर आत्मशुद्धि?
दुःख, गुस्से, आ़क्रोश व प्रतिरोध की आवाजों के बीच बलात्कार तथा यौन हिंसा के वास्तविक कारणों 
आधारों उसके समूल नाश के उपाय तथा इसके लिए उपस्थित कार्यभारों के 
सम्बन्ध में गम्भीर चर्चा-संवाद की आवाज उतनी मजबूत नहीं है जबकि इसकी जरूरत सबसे ज्यादा है। बलात्कार के सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक और वैचारिक आधारों पर विचार करने से पहले बलात्कार क्या है और इसके खत्म होने की शर्त जानना जरूरी है। 
‘‘बलात्कार किसी खास किस्म की यौन-विकृति का परिणाम भर नहीं है बल्कि यह महिलाओं के खिलाफ समाज में जारी हिंसा का ही चरम रूप है। बलात्कार स्त्री के खिलाफ एक ऐसी आक्रामक एवं हिंसात्मक प्रतिशोध की कार्यवाही है, जिसमें वह स्त्री के शरीर, मन, संवेदना तथा चेतना अर्थात सम्पूर्ण अस्तित्व को मनमाने तरीके से रौंदता और लांक्षित करता है। जिसका प्रत्यक्ष या प्रच्छन्न उद्देश्य एक मनुष्य के रूप में उसकी गरिमा और आत्मसम्मान को तार-तार कर देना, उसकी औकात बताना, उसे उसकी हद को तोड़ने के लिए दण्डित करना और उसे भविष्य के लिए चेतावनी देना होता है।’’
महिलाओं के खिलाफ हिंसा और उनके अस्तित्व को रौंदने वाली बलात्कार जैसी जघन्य घटनाओं को रोकने की आवश्यक शर्त है कि पहले महिला 
विरोधी सामाजिक, सांस्कृतिक व वैचारिक कारणों के असली बुनियादी राज्य व्यवस्था को समझा जाये। महिलाओं पर जारी यौन-हिंसा की समाप्ति सड़ चुकी व्यवस्था की समाप्ति से ही सम्भव है जो ऐसे अपराधियों को जन्म देती है, प्रोत्साहित करते हुए जायज ठहराती है। 

-राजेश
लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2018 अंक में प्रकाशित

कर्नाटक चुनाव

इस बार यह कीर्तिमान कर्नाटक के हिस्से में आया। 55 घंटे में ही सरकार गिर गई। येदुरप्पा ने विधानसभा के पटल पर मत विभाजन का सामना किए बिना ही उसी राज्यपाल को अपनी सरकार का त्याग पत्र सौंप दिया जिसने उन्हें 55 घंटे पहले मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई थी। येदुरप्पा ने इस तरह से अपने पूर्व के दावे के उलट यह स्वीकार कर लिया कि उनके पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त विधायकों का समर्थन नहीं था। यह बात राज्यपाल महोदय को पता थी, कर्नाटक और देश की जनता भी जानती थी। राजनैतिक दायरों में यह आम धारणा थी कि सरकार बनाने के लिए भाजपा हर अनैतिक कदम उठाने से गुरेज नहीं करेगी। इसमें भी किसी को शक नहीं था कि महामहिम ने बहुमत सिद्ध करने के लिए जो 15 दिन का समय दिया था उसमें भाजपा विधायकों की खरीद फरोख्त करेगी। कांग्रेस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले गई। एक नहीं दो बार। पहले सुप्रीम कोर्ट ने महामहिम के फैसले में टाँग अड़ाने से इनकार कर दिया। शपथ ग्रहण की औपचारिकता पूरी हो गई। कांग्रेस दूसरी बार सुप्रीम कोर्ट गई। खरीद फरोख्त का हवाला दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत सिद्ध करने की समय सीमा घटा दी। वह समय सीमा शनिवार को शाम चार बजे खत्म होनी थी। कर्नाटक के राज्यपाल वाजूभाई वाला ने कभी मोदी के लिए गुजरात में अपनी सीट छोड़ी थी। हमेशा वफादार रहे थे। कर्नाटक में उसी वफादारी की नवीनीकरण का समय था। सदन के पटल पर मत विभाजन के समय स्पीकर की भूमिका अहम हो सकती थी। परंपरा के हिसाब से दसवीं बार विधान सभा के लिए चुने गए कांग्रेस के रघुनाथ विश्वनाथ देशपांडे प्रोटेम स्पीकर बनने के हकदार थे। चूंकि देशपांडे से भाजपा के हक में बेइमानी की उम्मीद नहीं की जा सकती थी इसलिए परंपरा से इतर जाते हुए वाजूभाई वाला ने तीसरी बार चुनकर सदन में जाने वाले के०जी० बुपय्यह को प्रोटेम स्पीकर बना दिया। बुपय्यह इससे पहले येदुरप्पा सरकार में स्पीकर रह चुके थे और उन पर येदुरप्पा की सरकार को बचाने के लिए विपक्ष के कई विधायकों को निलम्बित करने का आरोप लग चुका है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की वजह से समय हाथ से निकला जा रहा था। पहला विकल्प विधायकों की खरीद का था। समय कम था इसलिए इस काम की शुरूआत ही उच्चतम स्तर से कर दी गई। खुद येदुरप्पा और जनार्दन रेड्डी विधायकों को फोन करके आफर देने लगे। सरकारी मशीनरी का भी इस्तेमाल हुआ। काम जल्दी में निपटाना था। कांग्रेस और जनता दल (एस) अपने विधायकों को बचाने में लगे रहे। कहीं रिसॉर्ट की बुकिंग कैंसिल तो कही फ्लाइट नहीं उड़ी। इस बीच विधायकों की बोली 150 करोड़ और मंत्री पद तक पहुँच गई। येदुरप्पा और जनार्दन रेड्डी के बोली लगाने वाले आडियो टेप भी आ गए। बात नहीं बनी। विश्वास मत हासिल कर पाना असम्भव हो गया इसलिए मत विभाजन से पहले ही येदुरप्पा और उनके विधायक राष्ट्रगान बजने के दौरान ही सदन छोड़कर चले गए। राष्ट्रगान के सम्मान में फिल्म थिएटरों में खड़े होने की वकालत करने वालों को यह अंदाजा ही नहीं हुआ कि राष्ट्रगान बज रहा है। सत्ता हाथ से निकली तो उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि राष्ट्रगान को राष्ट्रवाद और देशभक्ति का मानक उन्हीं लोगों ने बनाया था। फिर भी अब डैमेज कंट्रोल की बारी थी। हार को जीत बताने की बारी। त्यागपत्र को नैतिक आधार देने के प्रयास किए जाने लगे। कुछ अपवाद के साथ इस दौरान मीडिया ने सत्ता के पक्ष में “धूर्तबाजी को अकलमंदी और आपराधिक लम्पटई को बहादुरी” बताने वाला अपना पूर्व का रवैया कायम रखा। लोकतांत्रिक मूल्यों का चीरहरण करते हुए त्यागपत्र देने को मीडिया ने मास्टर स्ट्रोक बना दिया। यह नहीं बताया कि गोल अपनी ही पोस्ट में मार ली गई है। नया अभियान शुरू किया गया। कांग्रेस जनता दल सेक्युलर के गठबंधन को अनैतिक बताने में पूरी ऊर्जा लगा दी गई। हालाँकि गोवा, मेघालय और मणिपुर में इसका व्यवहार कर्नाटक का ठीक उलटा था। देश को यह बताने की सर तोड़ कोशिश होने लगी कि जनादेश इस 
गठबंधन को नहीं मिला है। 
कर्नाटक भाजपा के लिए अहम था। उत्तर पूर्व के बाद दक्षिण भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करवाने के लिए वह किसी भी हद तक जाने को तैयार थी। कांग्रेस के लिए भी भाजपा के विजय रथ को रोकना चुनौती थी। गोवा, मणिपुर, मेघालय में सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद भाजपा ने उसे सत्ता से बाहर कर दिया था। नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के मनोबल का भी सवाल था। राहुल गांधी की अध्यक्षता में कांग्रेस पहला चुनाव लड़ रही थी। 2019 को सामने रख कर देखें तो दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए कर्नाटक काफी अहम हो जाता है। यह दक्षिण का गेट है। इसीलिए भाजपा का जोर इस बात पर है कि वह चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है तो वहीं कांग्रेस मत प्रतिशत की बात करती है। चुनाव का गणित भी कुछ अलग होता है। कांग्रेस को इस चुनाव में 38 प्रतिशत मत मिले हैं जबकि भाजपा का मत प्रतिशत 36.2 रहा है। लगभग दो प्रतिशत का अंतर सीटों में बड़ा अंतर लेकर आता है। यह अंतर यहाँ भी मौजूद है मगर उलटा। भाजपा को 104 सीटों पर जीत मिली है जबकि कांग्रेस को मात्र 78 सीटों पर ही संतुष्ट होना पड़ा। जनता दल (एस) 18.3 प्रतिशत मतों के साथ 37 सीटें जीतने में सफल रही। 224 विधायकों वाली कर्नाटक विधान सभा के लिए 222 घोषित परिणामों में एक सीट निर्दलीय विधायक को और एक अन्य छोटे स्थानीय दल (कर्नाटका प्रगन्यावंथा जनता पार्टी) को मिली है। समाजवादी पार्टी ने भी इस चुनावी समर में अपने प्रत्याशी उतारे थे। सपा के 24 प्रत्याशियों को कुल 10,385 वोट मिले जिसे प्रतिशत में बदल कर पढ़ लेना आसान नहीं है। पार्टी को सबसे अधिक 3,471 मत नरसिम्हा राजा सीट पर मिले। कई स्थानों पर प्रत्याशी 100 का आँकड़ा भी नहीं पार कर पाए। वहीं बसपा जनता दल (एस) के साथ गठबंधन में थी, 18 सीटों पर चुनाव लड़ी, कोल्लेगल की सीट पर जीत भी दर्ज किया लेकिन उसके अलावा कहीं पर जमानत नहीं बचा पाई। बसपा को कुल 1,08,592 मतों (71792 कोल्लेगल सीट पर) के साथ 0.3 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। 28 प्रत्याशियों को कुल 23,441 मत प्राप्त हुए जिसमें अधिकतम 3,311 वोट देवर हिप्पर्गी सीट से आसिफ को मिले। यह सीट भाजपा ने 3,353 वोटों के अंतर से जीती। इसी तरह जनता दल यू को 23 सीटों पर कुल 41,638 वोट मिले जिसमें कुंडगोल सीट पर मिलने वाले 7,318 वोट शामिल हैं। स्वराज इंडिया ने भी इस चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई। 10 सीटों पर चुनाव लड़ी। मेलूकोटे सीट पर 73,779 मतों के साथ दूसरे नम्बर पर रही लेकिन कुल 79,400 मत ही प्राप्त कर पाई। इसी तरह शिवसेना को 34 सीटो पर 13,790 तो आरपीआई को 8 सीटों पर 10,465 वोट मिले। अगर गौर से देखा जाए तो साफ मालूम होता है कि वोटों का धु्रवीकरण भाजपा, कांग्रेस और जनता दल एस गठबंधन के पक्ष में हुआ। हिंदुत्व के आधार पर ध्रुवीकरण का फायदा केवल भाजपा को मिला जबकि धर्मनिर्पेक्षता के नाम पर होने वाली गोलबंदी दो ध्रुवी रही और यह गोलबंदी उतनी मजबूत भी नहीं थी। ऐसा शिवसेना और दूसरे हिंदुत्ववादी दलों को मिलने वाले वोटों से स्पष्ट होता है जबकि दूसरी तरफ देखें तो एसडीपीआई को तीन सीटों पर 45,781 मत प्राप्त हुए। यहाँ यह बात अहम हो जाती है कि जब एमआईएम उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ती है तो समाजवादी पार्टी उसका विरोध इस आधार पर करती है कि इससे सेक्युलर वोटों का बिखराव होगा। यही तकलीफ दिल्ली में आम आदमी पार्टी को रहती है। इन्हीं बुनियादों पर एमआईएम को भाजपा का एजेंट भी घोषित कर दिया जाता है। लेकिन कर्नाटक चुनाव नतीजे साफ जाहिर करते हैं कि इन दोनों दलों का वहाँ कोई नेटवर्क नहीं था फिर बिना किसी तैयारी के उनके वहाँ चुनाव में कूदने को क्या नाम दिया जाए। यही बात स्वराज इंडिया, एनसीपी या 18 सीटों पर 81,191 वोट पाकर सभी सीटों पर जमानत गंवा देने वाली भारत की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पर भी लागू होती है। इस बात में कोई शक नहीं कि अगर थोड़ा और समझदारी से काम लिया जाता तो परिणाम काफी भिन्न भी हो सकते थे। इसे केवल चुनाव में हासिल होने वाले मतों के आधार पर नहीं देखा जा सकता बल्कि समझदारी से काम लेने पर जो वातावरण तैयार हो सकता था उससे परिदृश्य काफी कुछ बदला हुआ होता। 
कर्नाटक चुनाव प्रचार भी बहुत खास था। इस चुनाव में प्रधानमंत्री के अलावा भाजपा शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और विधायकों का कर्नाटक में जमावड़ा रहा। प्रधानमंत्री द्वारा चुनावी सभा को सम्बोधित करते हुए कई बार जनता को आभास कराने का प्रयास किया गया कि कांग्रेसी परिवार को देश के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले वीर क्रान्किरियों की कोई परवाह नहीं थी। वैसे भी भाजपा सरकार जब से सत्ता में आई है वह लगातार यह जताने का प्रयास करती रही है कि कांग्रेस सेना और सेना के अधिकारियों का सम्मान नहीं करती थी। स्वभाविक है कि उनके निशाने पर सबसे अधिक पंडित नेहरू होते हैं क्योंकि संघ भाजपा ने आजादी के दो बड़े नेताओं पंडित नेहरू और सरदार पटेल को दो खानों में बाँट दिया है। बार-बार यह जताने का प्रयास करते रहे हैं (उनके पैमाने के हिसाब से) कि पटेल के मुकाबले नेहरू कुछ कम राष्ट्रवादी या देशभक्त थे। प्रधानमंत्री ने कई बार अपने पद की गरिमा को दाँव पर लगाकर भी पंडित नेहरू में कमियाँ ढूँढने बल्कि कहा जाना चाहिए कि कमियाँ गढ़ने का प्रयास किया है। बीदर की रैली में प्रधानमंत्री ने भगत सिंह का नाम लेकर कहा कि जब वह जेल में थे, मुकदमा चल रहा था तो क्या कांग्रेसी परिवार का कोई व्यक्ति जेल में उनसे मिलने गया। उसके बाद बटुकेश्वर दत्त का नाम लेकर भी यही बात कही कि क्या उनसे जेल, कोर्ट या अस्पताल में कोई मिलने गया। यह आरोप लगाने से पहले प्रधानमंत्री ने बताया कि उन्होंने इतिहास पढ़ा है लेकिन अगर कोई गलती हो तो वह उसमें सुधार कर लेंगे। इतिहास में इसका संदर्भ ढूंढना मुश्किल नहीं है। जिस समय भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त सरीखे क्रान्तिकारी जेल में अनशन कर रहे थे पंडित नेहरू उनसे मिले थे। 9,10 अगस्त 1929 के ट्रिब्यून अखबार में इसका ब्योरा है। जवाहर लाल नेहरू ने अपनी आत्मकथा में भी उन मुलाकातों के बारे में लिखा है। नेहरू देश के लिए कुर्बान होने वाले उन वीर योद्धाओं के बारे में इन शब्दों का प्रयोग करते हैं “मैं नायकों की दुर्दशा देखकर बहुत ज्यादा दुखी हूँ। उन्होंने अपनी जान इस संघर्ष में लगा दी है। मुझे उम्मीद है कि उनका बलिदान सफल होगा”। एक बार वायसराय को चुनौती देते हुए पंडित नेहरू ने भगत सिंह के बारे में कहा “मेरे मन में भगत सिंह जैसे व्यक्तित्व के साहस और बलिदान के लिए श्रद्धा भरी है। भगत सिंह जैसा साहस दुर्लभ है। अगर वायसराय हमसे उम्मीद करते हैं कि कि वे हमें इस आश्चर्यजनक साहस और उसके पीछे के ऊँचे उद्देश्यों की तारीफ करने से रोक सकते हैं, तो वह गलत समझते हैं”। नेहरू ने कांग्रेस बुलेटिन में भगत सिंह द्वारा अदालत के सामने दिया गया बयान भी छापा। अगर प्रधानमंत्री चाहें तो इतिहास की इन घटनाओं से रूबरू हो सकते हैं। राजनैतिक लाभ के लिए पंडित नेहरू पर लांछन लगाने के क्रम में उन्होंने कर्नाटक के सेना अधिकारियों, फील्ड मार्शल करिअप्पा और जनरल के०एस० थिम्मैया का अपमान करने के गंभीर आरोप लगाए। ये आरोप भी पूरी तरह निराधार निकले। वास्तव में देखा जाए तो ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर अगर बात करना आवश्यक भी हो जाए तो एक पूर्व प्रधानमंत्री के मामले में आम चुनावी सभा में कुछ कहना अमर्यादित है। लेकिन अगर वह झूठ और गढ़ा हुआ हो तो प्रधानमंत्री की गंभीरता पर ही सवाल उठना स्वाभाविक है, और ऐसा बार-बार हो रहा है। चार साल तक देश की सरकार चलाने के बाद भी सत्ताधारी दल के पास देश को बताने के लिए उपलब्धियों का टोटा ही है वह जन सरोकार के मुद्दों पर वह बात नहीं करना चाहती। उसे झूठे इतिहास गढ़ने और भावनाओं से खेलने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
कर्नाटक का संदेश और राहुल गांधी की अध्यक्षता मे कांग्रेस की रणनीति बहुत स्पष्ट है। कर्नाटक में जब येदुरप्पा के नेतृत्व में चुनाव लड़ा गया था तो भाजपा की स्थिति इससे कहीं बेहतर थी। इस बार मोदी का करिश्मा और अमित शाह के प्रबंधन के बावजूद उसका मत प्रतिशत और सीटें दोनों घटी हैं। इस चुनाव में मुख्यमंत्रियों, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की पूरी फौज भाजपा ने कर्नाटक में उतार दी थी। पैसों और सरकारी मशीनरी का जम कर इस्तेमाल किया गया। प्रचार अभियान के दौरान चुनाव आयोग ने आँखे बंद रखी थीं। राज्यपाल की सेवा भी उपलब्ध थी। कुछ अपवादों के साथ मीडिया हर सही को गलत और गलत को सही प्रचारित करने को तत्पर था। उसके बावजूद साधारण बहुमत भी नहीं मिला और सरकार बनाकर अपमानित होना पड़ा। फिर भी ढिठाई देखिए, खुद को सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष कहलाने वाला यह कहने से गुरेज नहीं करता है कि अगर विधायकों को छुपाया नहीं गया होता तो वह विश्वास मत प्राप्त कर लेता। दूसरी ओर कांग्रेस जनता दल (एस) के साथ अन्य दलों ने चुनाव प्रचार के दौरान शालीनता बनाए रखी। जनता दल (एस) को बिना शर्त समर्थन देकर आगामी लोकसभा चुनाव के लिए गोलबंदी का मजबूत आधार बना दिया। राहुल के इस संदेश को उत्तर प्रदेश और बिहार में भी खुली आँखों देखा और पढ़ा जा सकता है। आने वाले दिनों में इसे और व्यापकता मिल सकती है। इसी के साथ यह भी गौरतलब है कि फासीवाद के वर्तमान स्वरूप को खाद पानी भी इन्हीं सेक्युलर दलों की वजह से मिली थी। इसने देश को उस जगह ले जाकर खड़ा कर दिया जहाँ चार साल पूरा होने के बावजूद सरकार की उपलब्धियाँ और जन समस्याएँ, महँगाई, बेरोजगारी चुनावी मुद्दा नहीं बन पाईं। भारतीय लोकतंत्र को फिर से पटरी पर लाना है तो संस्थाओं के अलोकतांत्रीकरण और केंद्रीकरण के खिलाफ भी ठोस कार्यनीति के साथ आना होगा। सबसे बढ़कर यह कि खुद अपने अंदर मौजूद और पनप रहे फासीवादी कीटाणुओं को भी नष्ट करना होगा।

-मसीहुद्दीन संजरी
लोकसंघर्ष पत्रिका जून 2018 अंक में प्रकाशित

भगत सिंह ने दी आवाज, बदलो-बदलो देश समाज!

भगत सिंह का जन्म पंजाब प्रान्त के लायलपुर जिले के बंगा गाँव में 27 सितम्बर 1907 को हुआ था। देश विभाजन के पश्चात यह पाकिस्तान में चला गया। भगत सिंह का पैतृक घर भारत के पंजाब प्रान्त के नवा शहर का खटकड़कला गाँव है जहाँ प्रतिवर्ष उनकी शहादत-स्मृति में शहीद मेला लगता है। शहीदे आजम भगत सिंह एक साथ पाकिस्तान, भारत और बांग्लादेश तीनों देशों में याद किए जाते हैं। इसलिए भगत सिंह एक साथ तीनों देशों के इन्कलाब के लिए प्रकाश स्तम्भ हैं।
        20 मार्च 1931 को फांसी दिए जाने के तीन दिन पूर्व ‘रहम की अपील’ के स्थान पर भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव ने पंजाब के गवर्नर के नाम लिखे पत्र में कहा था ‘हम यह ऐलान करते हैं कि एक जंग जारी है .....और तब तक यह जंग जारी रहेगी जब तक मुट्ठी भर ताकतवर लोगों द्वारा भारत की जनता व मेहनतकश लोगों तथा उनकी आमदनी के साधनों की लूट जारी रहेगी....’
वास्तव में देश के मेहनतकश मजदूर-किसान देश के आधार हैं। आमजनता के पक्ष में ऐसे उज्ज्वल भविष्य का खूबसूरत सपना रखना और उस सपने को पूरा करने के लिए अपने जीवन को कुर्बान कर देने का बेखौफ जज्बा क्या दर्शाता है? भगत सिंह के अन्दर एक सच्चे इंसान का आत्म-विश्वास और मानव सभ्यता के इतिहास और विकास पर अटूट भरोसा था। शहीदे-आजम का यह दृढ़संकल्प आज भी पीड़ित जनता और नवजवानों के खून में गर्मी पैदा कर देता है- “वे सोचते हैं कि मेरे शरीर को नष्ट कर इस देश में सुरक्षित रह जाएँगे-यह उनकी गलतफहमी है। वे मुझे मार सकते हैं लेकिन मेरे विचारों को नहीं। वे मेरे शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर सकते हैं, लेकिन मेरी आकांक्षाओं को नहीं दबा सकते...’

सचमुच न ही हमारे देश में अंग्रेज सुरक्षित रह सके और न ही भगत सिंह के विचारों और आकांक्षाओं को दबाया जा सका। उनके जीवनकाल में अंग्रेजों द्वारा ही नही, बल्कि उनके राजनैतिक-वैचारिक भारतीय विरोधियों द्वारा भी उन्हें, उनके साथियों व उनके संगठन को बदनाम करने, आतंकवादी-उग्रवादी कहकर जनता को बरगलाने और उनसे काटने की कोशिश की गई। यह कोशिश शासक वर्गों द्वारा आज भी कई रूपों में जारी है। किन्तु इसका असर उल्टा ही हुआ है। भगत सिंह व उनके साथी जनता के सबसे चहेते और अनुकरणीय चमकते सितारे बनते गए हैं। इधर कुछ वर्षों से भगत सिंह को केसरिया पगड़ी पहनाकर उनका भी भगवाकरण करना फांसीवादी ताकतों की साजिश का ही एक हिस्सा है।

     भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन से लेकर साम्राज्यवादी वैश्वीकरण की मार झेल रहे आज के भारत तक अहिंसात्मक आन्दोलन बनाम क्रांतिकारी हिंसा, गांधीवाद बनाम उग्रवाद-आतंकवाद के मसलों पर काफी गंभीर बहसें हुई हैं। ये बहसें आज तक जारी हैं। भारत का शासक वर्ग जो लाखों पुलिसियों-फौजियों और जन संहारक हथियारों से लैस है, अपनी हिंसा को राष्ट्रीय सुरक्षा का नाम देता है तथा विरोधी आन्दोलनकारियों द्वारा की गई पत्थरबाजी, नारेबाजी तथा किताबें-पत्रिकाएँ रखने, छपने तक को ‘विध्वंसक’ और ‘हिंसक’ मानता है। इसके लिए कई काले कानून बने हैं और अनगिनत लोगों को इसके चलते जेल में डाला गया है। शहीद-ऐ-आजम भगत सिंह का स्पष्ट मानना था कि ‘जब दुनिया सर से पाँव तक हथियारों से लैस है’.....क्रांतिकारियों को झूठे सिद्धांतों के चलते अपने रास्ते से नहीं भटकना चाहिए।’ जनवरी 1930 में लाहौर हाई कोर्ट में दिए अपने बयान में उन्होंने कहा था ‘इंकलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।’ ‘क्रांति’ यानी अन्याय पर आधारित मौजूदा व्यवस्था का आमूल परिवर्तन’ व ‘शोषणविहीन समाज की रचना।’ 
उनका दावा था कि ‘अगर वर्तमान शासन-व्यवस्था उठती हुई जनशक्ति के मार्ग में रोड़े अटकाने से बाज न आई तो क्रांति के इस आदर्श की पूर्ति के लिए भयंकर युद्ध का छिड़ना अनिवार्य है।’ इसका यह मतलब नहीं हो सकता कि ‘भयंकर युद्ध’ पूरी तरह ‘अहिंसक’ होगा जिसमें सिर्फ विचारों की तलवार चलेगी। सांप्रदायिक हिंसा को वे शासक वर्गों की हिंसा मानते हैं जिसमें धर्म का इस्तेमाल किया जाता है। मनुवादी जातीय हिंसा के खिलाफ वे तथाकथित ‘अछूतोंय का आह्वाहन करते हैं-‘सोये हुए शेरों! उठो, और बगावत कड़ी कर दो।’ शहीद भगत सिंह ने कहा था-‘देश का भविष्य नवजवानों के सहारे है।’ किन्तु आज नौजवान भी अक्सर भ्रमित सवालों में फँसे हैं-‘लेकिन चारा क्या है?”
टीवी व अन्य माध्यमों से हमारे जीवन के जर्रे-जर्रे में घुसेड़ी जा रही है साम्राज्यवादी संस्कृति न केवल बनावटी चेतना का निर्माण कर क्रूर प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिवाद व अश्लील उपभोक्तावाद का निर्माण कर रही है बल्कि समग्र रूप से यह जनमानस में निराशा और कुंठा भरकर साम्राज्यवाद को अपराजेय सिद्ध करने की कोशिश कर रही है। संवेदनशीलता इस तरह कुंद हो रही है कि भूख से हुई मौतें, किसानों की आत्महत्याएँ, बच्चियों से बलात्कार और किसी निहत्थे आदमी का ‘मुठभेड़’ के नाम पर कत्ल कर दिया जाना भी आक्रोशित नहीं करता है, विरोध और विद्रोह के लिए नहीं उकसाता। किन्तु क्या सचमुच कोई चारा नही बचा है?.... नहीं! भगत सिंह सहित अनगिनत शहीदों की कतारें हमें दिखा गई हैं कि उनकी शहादत, उनकी कुर्बानी व्यर्थ नहीं गई। उनकी क्रांतिकारी विरासत न केवल जिंदा है, बल्कि साम्राज्यवादियों और उनके पिट्ठू शासकों की आँखों में उंगली डालकर उन्हें जता रही है कि हम जीतेंगे। आज भी शहीद-ए-आजम भगत सिंह व उनके साथियों की शहादत-स्मृति देश के गद्दार और दलाल शासक वर्गों सहित साम्राज्यवाद के खिलाफ आक्रोश को भी तेज करता रहेगा। आइए, हम भी अपनी भूमिका निभाएँ, क्रांतिकारी आन्दोलन विकसित व तेज करने का प्रयास करें! शहीदे-आजम भगत सिंह व साथियों के प्यारे नारे को और तेज और व्यापक रूप में बुलंद करें- इंकलाब जिंदाबाद!

-राजेश 
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

मौजूदा संकट और वाम

मौजूदा सामयिक परिदृश्य बेहद जटिल और चुनौतीपूर्ण है। मजदूरों किसानों के जीवन में तबाही मची हुई है। नोटबंदी, जीएसटी और निरुद्योगीकरण ने बड़े पैमाने पर बेरोजगारी को जन्म दिया है। इस तरह की भयानक बेरोजगारी स्वतंत्र भारत में पहले कभी नहीं देखी गयी। केन्द्र में सत्तारुढ़ भाजपा के नेतृत्ववाली एनडीए सरकार के शासन में विगत तीन सालों में मात्र दो लाख लोगों को रोजगार मिला है। जबकि मोदी सरकार ने हर साल दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा किया था। वहीं दूसरी ओर खेती-किसानी के मोर्चे पर हालात पहले से भी ज्यादा खराब हुए हैं, किसानों को अपनी उपज का न्यूनतम लागत मूल्य भी नहीं मिल रहा है। बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में उत्पादन में गिरावट आई है। बड़े पैमाने पर छोटे कल-कारखाने बंद हुए हैं। बाजार में मुद्रा के चलन में संकुचन महसूस किया जा रहा है।
     समाज में चौतरफा अपराधीकरण की प्रवृत्ति में इजाफा हुआ है। ऐसे में बार-बार यह सवाल उठ रहा है वामपंथी दल कहाँ हैं, कम्युनिस्ट क्या कर रहे हैं? वामदलों की भूमिका को आम जनता आशाभरी नजरों से देख रही है, हर आदमी चाहता है कि वामदलों का मौजूदा परिस्थितियों में राजनैतिक हस्तक्षेप बढ़े, जमीनी स्तर पर इसमें बदलाव आया है कई इलाकों में किसानों और मजदूरों के बड़े संयुक्त संघर्षों में कम्युनिस्ट पार्टियों और उनके जनसंगठनों की सक्रिय भूमिका रही है, मसलन, मध्यप्रदेश, राजस्थान और हाल ही में महाराष्ट्र में किसानों के संयुक्त संघर्षों में हजारों किसानों की शिरकत ने साफ संदेश दिया है कि कम्युनिस्ट पार्टी या वामपंथ का अंत नहीं हुआ है। हाँ, एक बात जरूर है, वामदलों के संघर्षों को मीडिया का जितना कवरेज मिलना चाहिए वह नहीं मिल पा रहा, इसके चलते कम्युनिस्टों के राजनैतिक हस्तक्षेप को आम जनता महसूस नहीं कर पाती है।
       वाम आंदोलन के सामने आज कई स्तरों पर चुनौतियाँ हैं, पहली चुनौती है साम्प्रदायिकता और उससे जुड़े संगठनों की, इन संगठनों ने राष्ट्रीय स्तर पर विशाल सांगठनिक ढांचा खड़ा कर लिया है, 20 से ज्यादा राज्यों में भाजपा की सरकारें और केन्द्र में उनके नेतृत्व में सरकार है, इसके कारण राष्ट्रीय स्तर पर साम्प्रदायिक ताकतों की बढ़त और वर्चस्व को सहज ही देखा जा सकता है। साम्प्रदायिक संगठन बड़े कौशल के साथ आम जनता को गैर-जरूरी मसलों पर उलझाए हुए हैं, मीडिया से लेकर साइबर माध्यमों तक गैर जरूरी मसलों पर प्रौपेगैंडा चल रहा है, यह काम आज जितने नियोजित ढंग से हो रहा है वैसा पहले कभी नहीं देखा गया। आज साम्प्रदायिक ताकतें देश का दैनंदिन एजेण्डा तय कर रही हैं, बहस-परिचर्चा और टॉक शो के विषय तय कर रही हैं, फलतः देश में गैर-जरूरी मसलों पर बहस की कृत्रिम बाढ़ आ गई है, इनमें अधिकांश प्रश्न या घटनाएं वे हैं जो घटित ही नहीं हुए, कहने का आशय यह कि साम्प्रदायिक ताकतें अघटित-घटना को खबर और चर्चा का विषय बना रही हैं, इसने मीडिया के क्षितिज से असली सवालों और समस्याओं को गायब कर दिया है।
वहीं दूसरी ओर समाज का बड़े पैमाने पर अपराधीकरण हुआ है जिसके गर्भ से लंपट बुर्जुआजी, लंपट समाज और लंपट संस्कृति का जन्म हुआ है। सच यह है भारतीय बुर्जुआवर्ग लंपट है। जनता के संसाधनों, कानून और संविधान की अवहेलना का इसके अंदर प्रबलभाव है। यह रीढ़िविहीन लुटेरावर्ग है। इसके सहयोगी वर्ग के रूप में बड़े पैमाने पर लंपट और भ्रष्ट मध्यवर्ग पैदा हुआ है। इस वर्ग के लोग भ्रष्टाचार और सार्वजनिक संपदा की लूट में लुंपेन बुर्जुआजी के सहयोगी हैं। इस वर्ग ने अपनी सत्ता और महत्ता का संस्कृति से लेकर बैंकों तक, राजनीति से लेकर न्यायपालिका तक विस्तार किया है। यह वर्ग मूलतः असंवैधानिक सत्ता केन्द्रों की तरह काम करता रहा है। यही वह वर्ग है जो मोदी शासन की धुरी है। इसी वर्ग ने बैंकों को लूटा है, सिस्टम में भ्रष्टाचार का सामाजिक आधार भी यही वर्ग है।
मौजूदा दौर में लंपट बुर्जुआजी का अर्थव्यवस्था, राजनीति, संस्कृति, मासकल्चर आदि से लेकर सामाजिक नीतियों तक वर्चस्व है। यह फलक बहुत व्यापक है, लेकिन इस रुप में अधिकतर दल या विचारक इसे नहीं देखते। लुंपेन बुर्जुआजी हम सबके जीवन में छोटी छोटी बेईमानी के जरिए दाखिल होता है, हमें अपने रंग में रँग लेता है।
हमारे यहाँ लुंपेन बुर्जुआवर्ग का विकास देश के विभिन्न इलाकों में भिन्न गति से हुआ है। नव्य उदार दौर में नव्य बुर्जुआ, लंपटवाद का विकास तेजगति से होता है। समाजवाद और उदारतावाद का पतन होता है। ये दोनों विचारधाराएँ लंपट बुर्जुआ को पसंद नहीं हैं। फलतः वे इस दौर में हाशिए पर चले गए और देश में साम्प्रदायिकता-पृथकतावाद और आतंकवाद का वर्चस्व बढ़ा। इन तीनों को लंपट बुर्जुआजी ने लंबे समय से पाला पोसा है, इनके जरिए लूट और अव्यवस्था का सिलसिला बनाए रखने में उसे मदद मिली है।
भारतीय बुर्जुआजी शुरू से लोकतंत्र विरोधी और लंपट रहा है। इसकी संविधान विरोधी, लोकतंत्र विरोधी लंबी परंपरा है। राजनीति में इसने अपराध और अपराधीकरण को महिमामंडित किया है। उसके विकास के गर्भ से जो मध्यवर्ग जन्मा वह भी क्रिमिनल और भ्रष्ट है। इसके साथ ही नव्य पूँजीपति का विदेशों की ओर पलायन, बैंकों की लूट, करप्ट नौकरशाही, करप्ट न्यायपालिका, करप्ट राजनेता और उनके पीछे गोलबंद जनता में लंपटगीरी-भ्रष्टाचार 
आपराधिकता वे साझा तत्व हैं, जिनका भाजपा-कांग्रेस दोनों ही अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल कर रहे हैं। ये सब मिलकर अपराधी समाज बनाते हैं, यह समाज नागरिक समाज का विलोम है। आज पूँजीपति वर्ग और अपराधी समाज ही लोकतंत्र, संविधान और स्वतंत्र मीडिया के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मोदी तो उसके वाई प्रोडक्ट हैं। वाम दलों को अपराधीकरण से सबसे बड़ी चुनौती मिल रही है।दिलचस्प बात यह है साम्प्रदायिक-पृथकतावादी और आतंकी संगठनों का अपराधी समाज और उसके ताने-बाने के साथ गहरा संबंध है।
विगत चार सालों में मीडिया को सत्ताधारी दल के अनुकूल ढाल दिया गया है। अब बड़े मीडिया में और खासतौर पर न्यूज टीवी चैनलों में वही चीज दिखाई जाती है जिसको पीएमओ देखना चाहता है। चैनलों से खबरें गायब हैं और उनकी जगह प्रायोजित और अघटित घटना की खबरों का प्रसारण हो रहा है। अब मीडिया का मुख्य काम जनता की राय पेश करना नहीं है बल्कि भाजपा-आरएसएस के लिए माहौल बनाना मुख्य लक्ष्य है। वह उनके पक्ष में दर्शकों, श्रोताओं में संस्कार, स्वीकृति और विनिमय भावना पैदा कर रहा है। यह विनिमय जहाँ एक ओर वैचारिक समर्थक बनाने में मदद कर रहा है वहीं दूसरी ओर मीडिया के लिए मुनाफा भी पैदा कर रहा है।
इस सबके बावजूद देश में सामाजिक शक्ति संतुलन फासीवाद के पक्ष में नहीं है। वे आक्रामक जरूर हैं लेकिन बहुसंख्यक नहीं हैं, आज भी फासीवाद विरोधी ताकतें बहुसंख्यक हैं। आज भी देश में लोकतंत्र के पक्ष में सामाजिक राजनैतिक संतुलन है, हर स्तर पर लोकतांत्रिक शक्तियों के पक्ष में शक्ति संतुलन है। संसद, विधानसभा और न्यायपालिका संविधान के नियमों के तहत काम कर रहे हैं। इसके अलावा विभिन्न वर्गों के बीच में लोकतांत्रिक संगठनों की पकड़ आज भी मजबूत है। उल्लेखनीय है लोकतंत्र में फासीवादी संगठन भी सक्रिय रह सकते हैं। लेकिन जब वे हर क्षेत्र में निर्णायक हो जाएँ तब ही फासीवाद की दस्तक कह सकते हैं। साम्प्रदायिक ताकतों को एकजुट संघर्षों और एकजुट रणनीति और लोकतांत्रिक कार्यनीति के जरिए ही परास्त किया जा सकता है। यही वह प्रस्थान बिंदु है जहाँ से वामदलों की महत्वपूर्ण भूमिका बन सकती है। आज बाजार संकटग्रस्त है, शिक्षा संकटग्रस्त है, न्यायपालिका विवादों में फँसी है, केन्द्र सरकार हर मोर्चे पर असफल हुई है और आम जनता में असन्तोष बढ़ रहा है। इस असन्तोष को राजनैतिक दिशा देने में वामदलों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है और इसकी पूरी संभावनाएँ हैं कि वामदल आने वाले समय में वैचारिक और सांगठनिक तौर पर और अधिक सक्रिय होंगे।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी

लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित

वामपंथी एवं कम्युनिस्ट एकता वक्त की ज़रूरत, जनवादी शक्तियों का साथ वक्त की मांग

पार्टी की कतारों में साथी सवाल पूछ बैठते हैं कि कामरेड बताएँ कि कम्युनिस्ट पार्टियों में उनकी एकता कब स्थापित होगी? या क्यों देश में एक ही कम्युनिस्ट पार्टी नही बन जाती?
मैं इसका जवाब देता हॅू कि ऐसा होगा तो जरूर परन्तु समय लग रहा है। पार्टी कतारों को और देशवासियों को गाँव और शहरों में मोदी राज कचोट रहा है, वह घुन की तरह खा रहा है। वह गरीब शोषित-पीड़ित जनता को बुरी तरह नोच-खसोट रहा है और इसके विपरीत कुबेर पतियों की तिजोरियों को भर रहा है। पूँजीपति वर्ग को छोड़ कर समाज का कोई भी मेहनतकश हिस्सा ऐसा नहीं है जिसके जीवन में इस राज का विपरीत प्रभाव न पड़ा हो। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए पार्टी कतारों और देश में आवाज उठ रही है। मोदी राज के विरुद्ध जनता जवाब भी दे रही है। गोरखपुर एवं फूलपुर के चुनावों ने दिखा भी दिया है। इन नतीजों का समाज में इतना जबरदस्त प्रभाव है कि मोदी राज के शोक सन्देश तक लिखे जा रहे हैं।
कम्युनिस्ट पार्टी का जन्म 1925 में कानपुर में हुआ था। 1964 में बँटवारा हो गया और सी.पी.एम बना ली गई। देश ने और पार्टी कतारों ने एक लम्बा दौर देखा है जिसमें सी.पी.आई और सी.पी.एम. के विचारों के द्वन्द्व खुल कर आम लोगों के सामने आए हैं। आज 2018 में तथा पिछले कुछ वर्षों से यह हालात नही हैं। विचारों में अन्तर तो है परन्तु उसकी कटुतापूर्वक अभिव्यक्ति नहीं है। जन महत्व के अधिकतर प्रश्नों पर समान सोच भी है।
यह समान सोच ही किसी दिन कम्युनिस्ट एकता में सहायक होगी। देश में 2014 से पहले कभी भी पूर्ण बहुमत वाली दक्षिणपंथी साम्प्रदायिक सरकार को केन्द्र में नहीं देखा था। यद्यपि 1977 की जनता पार्टी सरकार में जनसंघ के 2 मन्त्री शामिल थे और फिर 2004 तक 7 वर्षों तक चली श्री अटल बिहारी बाजपेई की सरकार को देश ने देखा था।
वर्तमान दक्षिण पंथी साम्प्रदायिक मोदी सरकार जो काम कर रही है वह भी तो देश ने कभी नहीं देखे थे। उसके कुकृत्यों से देश की आत्मनिर्भर मिश्रित अर्थव्यवस्था को निरन्तर आघात पर आघात लग रहे हैं। यद्यपि इस आत्मनिर्भर मिश्रित अर्थव्यवस्था को हुक्मरानां ने श्रीमती इन्दिरा गांधी के बाद से कमजोर करना शुरू कर दिया था। इसको यदि यूँ कहा जाए कि उक्त कार्य को करने हेतु कांग्रेस एक खच्चर पर बैठकर सफर कर रही थी तो भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार उसी कार्य को सम्पन्न करने हेतु एक अरबी घोड़े पर सवार हो द्रुति गति से सफर कर रही है।
कांग्रेस का खच्चर की गति से चलना स्वाभाविक था क्योंकि आत्मनिर्भर मिश्रित अर्थव्यवस्था के निर्माण में देश और काल की उन परिस्थितियों में श्री जवाहर लाल नेहरू की सोच का योगदान था। इसके विपरीत बी.जे.पी का अरबी घोड़े पर सवार होना भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्र के विकास में किसी भी प्रकार के योगदान के न होने को ही व्यक्त करता है।
उसका रिश्ता न तो आत्मनिर्भर मिश्रित अर्थव्यवस्था से रहा है और न ही आजादी के संघर्ष से प्राप्त देश की मिली जुली आधुनिक सभ्यता एवं धर्मनिरपेक्ष मूल्यों से। वास्तव में भारतीय जनता पार्टी और उसका दिलो-दिमाग, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक असभ्य एवं संस्कृति विरोधी संगठन है।
उसकी पूरी विचारधारा जनतन्त्र विरोधी एवं फासिस्टवादी है। मोदी राज के 4 वर्षों में सामज में इन संगठनों की ओर से जो अभिव्यक्तियॉ हुई हैं वह उक्त बातों को चीख-चीख कर बोल रही हैं। लोकतंत्र एवं जनवाद को सीमित किया जा रहा है, लक्ष्य साधकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर प्राणघाती हमले हो रहे हैं तथा उनके विरुद्ध सरकार की एजेन्सियाँ, सरकार से जुड़ा मीडिया और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ का काडर नफरत का प्रचार कर रहा है। दलितों और आदिवासियों पर बर्बर हमले हो रहे हैं। महिलाओं के विरुद्ध घनघोर अत्याचारों में निरन्तर वृद्धि हो रही है। मजदूरों और किसानों पर गिन-गिन कर हमले किए जा रहे हैं।
मोदी सरकार और उसके प्रवक्ता उनके कारण सुविधानुसार अलग अलग बताते हैं। भारत का लोकतंत्र एव जनवाद एक खतरनाक मोड़ पर पहुँच गया है तथा देश का संविधान दाँव पर लग चुका है। सी.पी.एम एवं कम संख्या में सरकार में शामिल अन्य वामपंथी दल दो राज्यों को गँवा चुके हैं। पहले पश्चिम बंगाल एवं हाल ही में 25 वर्षों के निरन्तर शासन के उपरांत त्रिपुरा पर ऐसा हुआ क्यों? इसका तार्किक जवाब आधिकारिक दस्तावेजों में आंशिक ही मिलता है। संभवतः इसके जवाब कहीं और भी खोजने पड़ेंगें और शासक वाम पार्टियों के उत्तरों को भी निरपेक्ष भाव से समझना पड़ेगा। इसलिए नहीं कि किसी वामपंथी पार्टी का अपमान किया जाए परन्तु इसलिए कि वास्तविक सत्य को जाना जा सके, ताकि भविष्य की राह प्रशस्त हो। जब हम इस नतीजे पर पहुँच चुके हैं कि हमारा लोकतान्त्रिक-जनवादी देश एक खतरनाक मोहाने पर पहुँच चुका है तो हम इन परिस्थितियों को बदलने का उपाय क्या नही सोचेंगें?

सोचेंगें! अवश्य!! और अनिवार्यतः!!!

एक तो विकल्प है कि सारी वामपंथी पार्टियाँ एक हो जाएँ और समस्त जनवादी शक्तियों को एक करें, पर ऐसा निकट भविष्य में संभव नहीं हो सकता क्योंकि पार्टी कार्यक्रम की बंदिश और कुछ पुरानी आदतों के भारी बन्धक भी हैं वामपंथी। शायद इसलिए भी कि जिन पर जिम्मेदारी थी वे मार्क्सवाद द्वारा प्रदत्त विज्ञान के द्वारा विद्यमान ठोस ज़मीनी सामाजिक स्थितियों का विश्लेषण कर उसको देश के सम्मुख पेश करने में असफल रहे। दूसरा भी एक विकल्प है। वह वर्तमान परिस्थितियों में अनिवार्य भी है कि मोदी सरकार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नवउदारवादी और फासिस्ट हमले को निष्फल करने के लिए सभी धर्मनिरपेक्ष, राजनैतिक और जनसंगठनों की यथासंभव लामबन्दी की जाए। समस्त वामपंथियों द्वारा उसकी पहल करनी चाहिए। समय की जरूरत है कि एक लड़ाकू जन प्रतिरोध खड़ा किया जाए। फासिस्ट हमले का मुकम्मल जवाब देने के लिए तमाम धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और वामपंथी ताकतों के एक मंच का निर्माण जरूरी और अनिवार्य है।

-अरविन्द राज स्वरूप 
लोकसंघर्ष पत्रिका अप्रैल 2018 विशेषांक में प्रकाशित