रविवार, 26 जून 2016

मंडल के बाद का भारत और पिछड़ा वर्ग

  देश में हर साल 7 अगस्त ‘सामाजिक न्याय दिवस’ के रूप में मनाया जा रहा है। 7 अगस्त सन् 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट को लागू करने का आदेश दिया था। मंडल आयोग की रिपोर्ट में प्रमुख रूप से 13 अनुसंशाओं का वर्णन है जिसमें अभी तक दो अनुसंशाएँ ही लागू हो पाई हैं। भारतीय संविधान के भाग-3 में वर्णित मौलिक अधिकार  के अनु. 16(4) के तहत OBC को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत आरक्षण तथा अनु. 15(4) के अनुसार शिक्षण संस्थानों में 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है। अतः मंडल कमीशन की अनुसंशाएँ आकाश से टपक कर खजूर में लटक गई हैं। बीते 22 सालों में देश की परिस्थितियों में कई राजनैतिक, आर्थिक तथा सामाजिक बदलाव हुए हैं। दलित-पिछड़ों का राजनैतिक उभार अब ग्राम पंचायत से लेकर संसद तक परिलक्षित होता है, बावजूद इसके मंडल कमीशन की सभी संस्तुतियों का लागू न होना एक संदेह को जन्म देता है। आखिर कौन सी मजबूरियाँ हैं जिन्होंने आबादी के सबसे बड़े हिस्से को उसके वाजिब राजनैतिक, आर्थिक तथा शैक्षिक अधिकारों से वंचित कर रखा हैं? आरक्षण और सामाजिक न्याय कैसे एक-दूसरे के पूरक है? मंडल कमीशन ने कैसे जाति-आधारित शोषित समाज को एक बड़े वर्ग के रूप में परिवर्तित कर दिया? इन सबकी पड़ताल करना जरूरी हो जाता है।
    भारत को आजादी मिलने के बाद पिछड़े तबकों (ST/SC/BC/Minoritis) ने अपने हक-हकूक के लिए आवाज उठाना शुरू कर दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के ऊपर काफी दबाव था कि वे देश के शोषित तबके को उसका वाजिब हक प्रदान करें। डॉ. भीमराव अंबेडकर अपने अथक प्रयासों से देश के दलितों और आदिवासियों के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान कर गए,  लेकिन ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ के लिए संविधान  में एक आयोग के गठन की संभावना के अलावा और कुछ नहीं था। संविधान का अनु. 340 पिछड़े वर्गों की दशाओं के विश्लेषण के लिए एक आयोग की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
    अनु. 340(1)- राष्ट्रपति भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर सामाजिक तथा शिक्षित दृष्टि से पिछड़े वर्गों की दशाओं, वे जिन कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, उनके अन्वेषण के लिए और उन कठिनाइयों को दूर करने तथा उनकी दशा सुधारने हेतु संघ या किसी राज्य द्वारा जो उपाय किए जाने चाहिए, उनके बारे में सिफारिश करने के लिए, आदेश द्वारा एक आयोग नियुक्त कर सकेगा जो ऐसे व्यक्तियों से मिलकर बनेगा जिसे वह ठीक समझे और ऐसे आयोग की नियुक्ति वाले आदेश में आदेश द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया परिनिश्चित की जाएगी।
    अनु. 340(2)- इस प्रकार नियुक्त आयोग स्वयं को निर्देशित विषयों का अन्वेषण करेगा और राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देगा, जिसमें उसके द्वारा पाए गए तथ्य उपवर्णित किए जाएँगे और जिसमें ऐसी सिफारिशें की जाएँगी जिन्हें आयोग उचित समझे। अनु. 340(3)  राष्ट्रपति द्वारा इस प्रकार दिए गए प्रतिवेदन की एक प्रति, उस पर की गई कार्रवाई को स्पष्ट करने वाले ज्ञापन सहित, संसद के प्रत्येक सदन में रखा जाएगा। अतः प्रतिशत अनु. 340 के अनुदेश के तहत 1953 में काका कालेलकर के नेतृत्व में एक ‘बैकवर्ड क्लासेस कमीशन’ का गठन हुआ जो ‘पिछड़े’ वर्गों व जातियों की पहचान करेगा, भारत के समस्त समुदायों की सूची बनाएगा और उनकी समस्याओं का निरीक्षण करेगा तथा उनकी बेहतरी के लिए कुछ ठोस प्रस्ताव लाएगा, ऐसे प्रावधान उसमें किए गए। काका कालेलकर आयोग ने अपनी रिपोर्ट 1955 में केंद्र सरकार को सौंप दी लेकिन स्वनामधन्य समाजवादी प्रधानमंत्री नेहरू ने इसे लागू करना आवश्यक नहीं समझा। काका कालेलकर के ऊपर भी यह आरोप लगता है कि उन्होंने जान-बूझ कर ऐसी सिफारिशें प्रस्तुत कीं जो केंद्र सरकार को रास नहीं आईं। हालाँकि राज्य सरकारों को ये अथारिटी मिल गई कि वे स्वयं पिछड़े वर्गों की सूची तैयार करें और इन्हें ‘विशेष अवसर की सुविधा’ प्रदान करें। (स्रोत- भारतीय संविधान, डी.डी. बसु)
    काका कालेलकर कमीशन की नाकामियों के चलते दूसरे ‘बैकवर्ड क्लासेस कमीशन’ के गठन की जरूरत पड़ी। 1 जनवरी 1979 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के समय राष्ट्रपति के आदेशानुसार बी.पी. मंडल की अध्यक्षता में दूसरा ‘बैकवर्ड क्लासेस कमीशन’ का गठन हुआ जिसके अन्य सदस्य आर.आर. भोले, दीवान मोहनलाल, एल.आर. नाईक तथा के. सुब्रमण्यम थे। पूरे देश में यह आयोग ‘मंडल आयोग’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। मंडल कमीशन ने दिसंबर 1980 में अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी।
    मंडल कमीशन के प्रमुख उद्देश्य थे- सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को चिह्नित करने के लिए मानकों को निश्चित करना, उनकी प्रगति के लिए महत्वपूर्ण अनुसंशाओं को प्रस्तावित करना, उनकी दशा सुधारने हेतु पदों और नियुक्तियों में आरक्षण क्यों जरूरी है, इसका निरीक्षण करना और कमीशन द्वारा प्राप्त तथ्यों को रिपोर्ट के रूप में प्रस्तुत करना। सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को चिह्नित करने के लिए मंडल कमीशन ने कुल 11 मानकों को अपनाया जिन्हें प्रमुखतया 3 समूहों में वर्गीकृत जा सकता है- सामाजिक, शैक्षिक तथा आर्थिक। इस प्रकार मंडल कमीशन ने 1931 की जनगणना के अनुसार 52 प्रतिशत पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की अनुसंशा की। (नोट- इस 52 प्रतिशत पिछड़े वर्ग की आबादी में अल्पसंख्यकों की कुल आबादी 16.6 प्रतिशत का 52 प्रतिशत अल्पसंख्यक पिछड़े वर्ग को भी कुल आरक्षण 27 प्रतिशत में समाहित किया गया)। यहाँ मंडल कमीशन की प्रमुख अनुसंशाओं का उल्लेख किया जा सकता है-
    अनु. 15(4) और 16(4) के तहत 50 प्रतिशत आरक्षण की सीलिंग है औरSC/ST को उनकी आबादी के अनुपात में 22 प्रतिशत मिला हुआ है। अत प्रतिशत कमीशन OBC  के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण प्रस्तावित करता है।  अनु. 15(4) और अनु. 29(2) (अल्पसंख्यकों को सरंक्षण) राज्य के ऊपर कोई वैधानिक प्रतिबन्ध नहीं करता यदि वह सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान बनाए। इसी तरह अनु. 16(4) राज्य को नहीं रोकेगा यदि राज्य राजकीय नौकरियों तथा नियुक्तियों में सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व न होने से पदों तथा नियुक्तियों में उनके लिए आरक्षण की अनुसंशा करे।
    - सरकारी नौकरियों में शामिल OBC   उम्मीदवारों को प्रोन्नति में भी 27 प्रतिशत आरक्षण मिलना चाहिए। केंद्र और राज्य सरकारों के अधीन चलने वाली वैज्ञानिक, तकनीकी तथा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए OBC   वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाय।
    - OBC  की आबादी वाले क्षेत्रों में वयस्क शिक्षा केंद्र तथा पिछड़े वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए आवासीय विद्यालय खोले जाएँ। OBC छात्रों को रोजगारपरक शिक्षा दी जाय।
    - OBC की विशाल आबादी जीविका के लिए पारंपरिक तथा जातिपरक पेशों में लगी हुई है। इनकी दयनीय आर्थिक हालत को देखते हुए इन्हें संस्थागत वित्तीय, तकनीकी सहायता देने तथा इनमें उद्यमी दृष्टिकोण विकसित करने के लिए वित्तीय,  तकनीकी संस्थाओं का समूह तैयार किया जाय।
    - प्रत्येक जातिपरक पेशे के लिए सहकारी समितियाँ गठित की जाएँ जिनके तमाम कार्यकर्ता, कर्मचारी और अधिकारीगण उसी जातिगत पेशे से जुड़े होने चाहिए।
    - जमींदारी प्रथा को खत्म करने के लिए भूमि सुधार कानून लागू किया जाय क्योंकि पिछड़े वर्गों की बड़ी जमात जमींदारी प्रथा से सताई हुई है।
    - सरकार द्वारा अनुबंधित जमीन को न केवल ST/SC  को दिया जाये बल्कि OBC  को भी इसमें शामिल किया जाय। OBC के कल्याण के लिए राज्य सरकारों द्वारा बनाई गई तथा चलाई जा रही तमाम योजनाओं, कार्यक्रमों को लागू करने के लिए केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को वित्तीय सहायता प्रदान की जाय। केंद्र और राज्य सरकारों में OBC  के हितों की सुरक्षा के लिए अलग मंत्रालय-विभाग स्थापित किए जाएँ। आयोग की अनुसंशाओं का क्या परिणाम निकला, उन्हें कहाँ तक लागू किया गया, इसकी समीक्षा 20 वर्ष के बाद की जाय। 1990 में जब प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन को लागू किया तो उच्चवर्णीय बुर्जुआ ताकतों को अपने राजनैतिक-आर्थिक वर्चस्व में एक जोर का झटका लगा नतीजन इन प्रतिक्रियावादी ताकतों ने वी.पी. सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया। इन ताकतों ने आरक्षण विरोधी आन्दोलन पूरे देश में चलाया जिसका नेतृत्व देश के कथित एलीट, उच्चकुलक, सामंत, डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षकों ने किया। इसी समय देश में दो महत्वपूर्ण राजनैतिक तथा आर्थिक बदलाव हुए। धार्मिक उन्माद को पूरे देश में इतना प्रचारित-प्रसारित किया गया कि कमंडल के आगे मंडल कमजोर पड़ गया। राजनीति का धार्मिक आधार पर धु्रवीकरण कर दिया गया अर्थात हिन्दू बनाम मुसलमान। लेकिन असलियत कुछ और थी, धर्म आधारित राजनीति का नेतृत्व हमेशा प्रभु वर्ग ने किया है जो हर धर्म का सबसे ऊपरी तबका होता है, अर्थात धर्म के निचले पायदान में पाए जाने वाले लोगों का राजनैतिक व्यवस्था के निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में कोई योगदान नहीं रहता। उनका इस्तेमाल धार्मिक उन्माद फैलाने में, भिन्न-भिन्न धार्मिक पहचान के आधार पर एक दूसरे को लड़ाने में किया जाता है। यदि मंदिर-मस्जिद विवाद से दुष्प्रभावित समूहों के आँकड़े ईमानदारी से इकट्ठे किए जाएँ तो सबसे ज्यादा निम्नवर्णीय-सर्वहारा लोग ही होंगे। इस प्रकार सामंती ताकतों तथा प्रभु वर्ग ने अपने वर्चस्व को बनाए रखने के लिए पूरे प्रयास किए। दूसरा महत्वपूर्ण बदलाव आर्थिक था- देश में उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण को खुशी-खुशी लाया जाता है। पब्लिक सेक्टर का डि-रेगुलराइजेशन आरम्भ हो जाता है। शिक्षा तथा स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण विषयों को आम बजट में कोई खास जगह नहीं दी जाती है। इन दोनों का तेजी से निजीकरण शुरू हो जाता है। देश की निजी कंपनियों को अपार प्रोत्साहन दिया जाता है और उन्हें किसानों से कई गुना अधिक सब्सिडी दी जाती है। पब्लिक सेक्टर तथा सरकारी संस्थानों के निजी हाथों में चले जाने से वहाँ आरक्षण का कोई स्कोप ही नहीं बचता है, अतः देश की प्रतिक्रियावादी ताकतों ने अपने निजी हितों के सरंक्षण में देश की प्रगति पर कुठाराघात कर दिया। जबकि इन प्रतिक्रियावादी ताकतों को आरक्षण को दक्षिण अफ्रीका में लागू “।AFFIRMATIVE ACTIONß के रूप में देखना चाहिए। जब दक्षिण अफ्रीका में अश्वेतों ने अपने अधिकारों के लिए आन्दोलन शुरू किया और राजनैतिक,  आर्थिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक यानी हर क्षेत्र में हिस्सेदारी की माँग की तो वहाँ के बुर्जुआ वर्ग ने स्वयं बढ़कर उन्हें आर्थिक, राजनैतिक तथा शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण दे दिया। दक्षिण अफ्रीका में अश्वेत बहुसंख्यक हैं अतः उनके हक-हकूक को किनारे करना देश को पतन के रास्ते पर ले जाना है। देश की प्रगति के लिए सभी देशवासियों की प्रगति आवश्यक है, आज वहाँ श्वेत तथा अश्वेत दोनों मिलकर देश की उन्नति में लगे हुए हैं। दक्षिण अफ्रीका को सन् 1992 में आजादी मिली और आज वह अफ्रीका महादेश के एक विकसित देश के रूप में उभर रहा है। लेकिन भारत ने वो मौका खो दिया। यहाँ का अल्पसंख्यक, बुर्जुआ वर्ग अपने टूटते वर्चस्व को बचाने के लिए अपना अंतिम प्रयास कर रहा है और देश को पूँजीवादी शक्तियों के हाथ बेचने के लिए तैयार बैठा है।
    इन्हीं प्रतिक्रियावादी ताकतों ने नब्बे के दशक में देश को धार्मिक उन्माद की भट्टी में झोंक दिया, और चली आ रही मिश्रित अर्थव्यवस्था की ‘शाक थेरेपी’ कर पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में बदल दिया। इन्होंने मंडल कमीशन की रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी कि यह रिपोर्ट पूरी तरह ‘असंवैधानिक’ है। 1992 में इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार केस में नौ जजों की खंड-पीठ ने मंडल कमीशन रिपोर्ट की असंवैधानिकता को पूरी तरह से खारिज कर दिया और सरकार को निर्देश दिया कि ‘राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ को क्रियान्वित करे। 1 फरवरी 1993 को 5 सदस्यों वाले आयोग का गठन हुआ, जिसके प्रथम चेयरमैन जस्टिस आर.एन. प्रसाद बने। इंदिरा साहनी केस ने दो आवश्यक मुद्दों की तरफ ध्यान खींचा- 1- पिछड़े वर्ग को, हिन्दू धर्म के अन्दर की अनेक जातियों को उनके पेशे, गरीबी, स्थान विशेष में निवास करना और अशिक्षा के कारण चिह्नित किया जा सकता है। 2- पिछड़ा वर्ग में आने के लिए क्रीमी लेयर का प्रावधान कर दिया। यदि पहले मुद्दे की तरफ देखा जाय तो कोर्ट इस बात को मानता है कि पिछड़े वर्गों को हिन्दू धर्म के अन्दर देखा जा सकता है, यानी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि पिछड़े वर्ग में आने वाली जातियाँ हिन्दू धर्म को मानने वाली हैं। ऐसा इसलिए कि इस वर्ग को आरक्षण उनके पेशे, गरीबी, स्थान विशेष में निवास करना और अशिक्षा के कारण दिया गया है, न कि उनकी धार्मिक पहचान के आधार पर। इस मुद्दे पर और भी बहस की जरूरत है। दूसरा मुद्दा ‘मलाई की परत’ का है जो बुर्जुआ वर्ग की पिछड़े वर्गों के खिलाफ एक साजिश थी। क्योंकि मंडल कमीशन की रिपोर्ट में कहीं भी ‘मलाई की परत’ का उल्लेख नहीं है। अतः क्रीमी लेयर का बंधन लगाकर बुर्जुआ वर्ग ने देश के बहुसंख्यक सर्वहारा वर्ग के बीच बन रही एकता को तोड़ दिया। मंडल कमीशन की दूसरी सिफारिश ‘केंद्र और राज्य सरकारों के अधीन चलने वाली वैज्ञानिक, तकनीकी तथा प्रोफेशनल शिक्षण संस्थानों में दाखिले के लिए व्ठब् वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27  प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाय’ को, केंद्रीय संस्थानों में 2007 में लागू किया गया। लेकिन विश्वविद्यालयों तथा अन्य एलीट शिक्षा संस्थानों में जातिवादी प्रशासन के वर्चस्व के चलते इसे पूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सका। एक आंकडे के मुताबिक पूरे देश के केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में OBC  कोटे से मात्र 2 प्रोफेसर हैं। देश के विभिन्न मंत्रालयों, अन्य स्वायत्तशासी संस्थाओं तथा पब्लिक सेक्टर में OBC  क्लास-1 नौकरियों में 4.69 प्रतिशत, क्लास-2 में 10.63 प्रतिशत, क्लास-3 में 18.98 प्रतिशत तथा क्लास-4 में 12.55 प्रतिशत हंै। इन दो अनुसंशाओं के अतिरिक्त अन्य अनुसंशाओं मसलन भूमि सुधार तथा OBC को आर्थिक रूप से सबल बनाने के लिए केंद्र-राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित अनुदान आदि को ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया। मंडल कमीशन की अनुसंशाओं को लेकर देश के प्रमुख राजनैतिक दलों का क्या रवैया रहा, इसे जानना भी जरूरी है। प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस ने पिछड़े वर्ग को राजनैतिक चारे के रूप में इस्तेमाल किया है। 1992 में जब कमीशन की सिफारिशों को लागू किया गया तो कांग्रेस की तत्कालीन नरसिम्हा राव सरकार ने इसका श्रेय लेने की कोशिश की। क्रीमी लेयर के बंधन के खिलाफ कुछ नहीं किया गया। OBC  वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए विश्वविद्यालयों में 27 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जाय’ को केंद्रीय संस्थानों में 2007 में लागू किया गया तो सामान्य वर्ग के लिए 27 प्रतिशत अतिरिक्त सीटों को बढ़ा दिया गया तथा OBC वर्गों के छात्र-छात्राओं के लिए 27  प्रतिशत आरक्षण लागू करने के लिए अवधि निश्चित की गई। कहीं-कहीं तो इसे 2012 तक नहीं लागू किया जा सका। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में यह 2011 में लागू हुआ। 2012 के पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने 4.5 प्रतिशत का अल्पसंख्यकOBC  कार्ड खेला लेकिन असफल रही। दूसरी प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी भाजपा धर्म आधारित सांप्रदायिक राजनीति करती है। उसने मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई। प्रमुख वामपंथी दल माकपा तो अभी तक OBC को ‘सामाजिक तथा आर्थिक रूप से पिछड़ा मानती है और क्रीमी-लेयर के बंधन का समर्थन करती है (माकपा का प्रेस वक्तव्य, 17 मई, 2006)। पश्चिम बंगाल में माकपा की 34 साल तक सरकार रही लेकिन OBC  को एक वर्ग के रूप स्वीकार नहीं कर पाई जिससे माकपा के चाल, चरित्र और चेहरे में उच्चवर्णीय-उच्च वर्गीय ठसक देखी जा सकती है। माकपा ने 2011 में OBC के लिए 17 प्रतिशत आरक्षण लागू किया जिसमें सभी मुसलमानों को ‘पिछड़े वर्ग’ के रूप में देखा गया है। अन्य राजनैतिक दल जिनका नेतृत्व दलित-पिछड़ा वर्ग के लोगों के हाथों में है, उन्होंने मंडल कमीशन को राजनैतिक औजार के रूप में इस्तेमाल किया है। हालाँकि पिछले साल बिहार के चुनाव में इन दलों के महागठबंधन ने कमंडल ताकतों को परास्त किया है। देश का सर्वहारा वर्ग निरादर तथा गरीबी से ग्रसित है। वर्तमान  समय की जरूरत है कि ST/SC  के आरक्षण के साथ OBC  की राजनैतिक-आर्थिक उन्नति के लिए मंडल कमीशन की रिपोर्ट को पूर्णतया प्रतिशत लागू किया जाय। OBC आरक्षण का विस्तार सभी सामाजिक तथा शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों तक होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार OBC  के रिजर्वेशन के लिए क्रीमी लेयर के रूप में जो आर्थिक रेखा खींच दी गई है वह संविधान के महत्व को कम कर रही है तथा ये पूरी तरह से अ-संवैधानिक है।
    ‘क्रीमी-लेयर’ शब्द न तो संविधान और न ही मंडल कमीशन की रिपोर्ट में अंकित है इसलिए क्रीमी-लेयर की कटेगरी को पूरी तरह से खत्म कर देनी चाहिए।ST औरSC कमीशन की भाँति OBC आरक्षण के कार्यान्वयन की देख-रेख हेतु संसदीय सब-कमेटी बने। राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग कोST और  SC कमीशन की तरह पूर्ण संवैधानिक शक्तियाँ प्रदान की जाएँ जिससे OBC हेतु आरक्षण के साथ खिलवाड़ करने वाले को कड़ी से कड़ी सजा मिल सके और चेयरमैन के पद पर अवकाश प्राप्त न्यायाधीश की जगह राजनीति, शिक्षा या मीडिया क्षेत्र के महत्वपूर्ण लोगों की नियुक्ति हो। आरक्षण के दायरे का विस्तार निजी क्षेत्रों में किया जाए, जिसमें प्रमुख रूप से लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ मीडिया में और NGOs में दलित-पिछड़ों की भागीदारी को सुनिश्चित किया जाय। राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन हो तथा उसमें आरक्षण के सिद्धांत को पूरी तरह से लागू किया जाना चाहिए। देश के सभी धार्मिक संस्थानों का सरकारीकरण कर दिया जाय, पुजारी पद के लिए ओपन कम्पटीशन हो। जाति-आधारित जनगणना जल्द से जल्द करवाई जाए। जिससे सभी शोषित तबकों के बीच मजबूत गठजोड़ हो। यही गठजोड़ बुर्जुआ, पूँजीवाद, सामंतवाद तथा जातिवाद से लड़कर सामाजिक क्षेत्र में मानववाद तथा आर्थिक क्षेत्र में समाजवाद को पुनः प्रतिस्थापित करेगा।

को उनकी आबादी के अनुपात में 22 प्रतिशत मिला हुआ है। अत प्रतिशत कमीशन OBC  के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण प्रस्तावित करता है।  अनु. 15(4) और अनु. 29(2) (अल्पसंख्यकों को सरंक्षण) राज्य के ऊपर कोई वैधानिक प्रतिबन्ध नहीं करता यदि वह सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान बनाए। इसी तरह अनु. 16(4) राज्य को नहीं रोकेगा यदि राज्य राजकीय नौकरियों तथा नियुक्तियों में सामाजिक तथा शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व न होने से पदों तथा नियुक्तियों में उनके लिए आरक्षण की अनुसंशा करे।
 -अनूप पटेल
मोबाइल: 09999277878
लोकसंघर्ष  पत्रिका  के जून अंक 2016  में प्रकाशित

शनिवार, 25 जून 2016

भारतीय उच्च शिक्षा: मंडल में घुसा कमंडल

शिक्षा जीवन के लिए अमूल्य वस्तु है, इसके बिना जीवन अधूरा है। हमारे देश में तीन प्रकार की शिक्षा प्रणाली है, प्राइमरी स्तर, माध्यमिक स्तर और उच्च शिक्षा। हम यहाँ भारतीय उच्च शिक्षा की स्थिति-परिस्थिति के बारे में विस्तृत विश्लेषण करेंगे कि कैसे इस देश की लगभग 55 प्रतिशत ओबीसी जनसंख्या को उच्च शिक्षा से बाहर कर दिया गया! सवाल सबके मन में यही उठता है, कि संविधान में आरक्षण का प्राविधान है फिर भी ऐसा कैसे हो सकता है कि बहुजनों को उच्च शिक्षा से वंचित कर दिया जाय? जब मैंने इस समस्या पर विधिवत अध्ययन किया, तो मुझे पता चला कि भारत के आजाद होने के बाद यहाँ के सरकारी तंत्र और राजनैतिक तंत्र में एक जाति का प्रभुत्व हो गया, वह है “ब्राह्मण”। यह देश की सबसे वर्चस्ववादी जाति है। यह अपने हितों के अनुसार अपने आप को बदलने में माहिर है।
    एक सोची समझी चाल के तहत, इस ब्राह्मणवाद ने “बहुजनों” को आरक्षण देने से मना कर दिया। लेकिन तमाम प्रयासों और संघर्षों के बाद, “बहुजनों” को सन् 1993 में सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान किया गया।  लेकिन उच्च शिक्षा में आरक्षण न होने के कारण इनका उच्च शिक्षा में प्रतिनिधित्व न के बराबर था। बहुजन बुद्धिजीवियों और छात्रों ने सड़कों पर आन्दोलन किया। कई आन्दोलन होने के बाद, 2006 में सरकार ने उच्च शिक्षा पर एक कानून पारित किया जिसमें “बहुजनों” के लिए भी 27 प्रतिशत सीटें प्रवेश में आरक्षित कर दी गईं और इसके साथ ही “मानव संसाधन विकास मंत्रालय” ने एक दिशा निर्देश जारी किया कि ओ.बी.सी. वर्ग को भी उच्च शिक्षा में आरक्षण दिया जाय लेकिन इस दिशा निर्देश में एक शब्द जोड़ दिया गया कि-"The reservation will implement at level of Assistant Professor" इसमें कहीं भी यह नहीं लिखा है कि ओ.बी.सी. को “एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर” के स्तर पर आरक्षण नहीं देना है। "Assistant Professor" शब्द होने के कारण, उच्च शिक्षा संस्थानों के कर्ता-धर्ता, यथास्थितिवादी मनीषियों ने मान लिया कि ओ.बी.सी. को “एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर” स्तर पर आरक्षण नहीं देना है।
     इसके साथ ही अगर हम सरकारी आँकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि बहुजनों को 27 प्रतिशत में से केवल 12 प्रतिशत नौकरियाँ ही मिली हैं। इसका सीधा सा मतलब यह है कि “बहुजनों” को सरकारी तंत्र में आने से रोका गया है। अगर SC और ST को मिला दिया जाय तो कुल मिलाकर 30 प्रतिशत नौकरियाँ इस देश की 85 प्रतिशत जनसंख्या को मिली हैं। बाकी 70 प्रतिशत नौकरियाँ इस देश के 15 प्रतिशत सवर्णों को मिली हैं जिसमें सबसे अधिक अनुपात ब्राह्मणों का है। आरक्षण के बिना ही, ये लोग इस देश के शासन तंत्र पर कब्जा किए हुए हैं। आज देश में जिस तरह का राजनैतिक समीकरण बना हुआ है उसमें कुछ लोग आरक्षण के पक्ष में है और कुछ इसके विरोध में। आर.एस.एस. के अगुवा मोहन भागवत जी कहते हैं कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए। मैं भी कहता हूँ कि समीक्षा इस बात की जरूर होनी चाहिए कि आरक्षित सीटों पर किन लोगों को नौकरियाँ दी गई हैं या किन लोगों ने जानबूझ कर आरक्षित लोगों को आने नहीं दिया। आज उन लोगों की पहचान करनी चाहिए जो आरक्षित सीटों पर नौकरियाँ कर रहे हैं और उनकी पहचान करने के बाद उन्हें जेल में डाला जाना चाहिए। इसके साथ ही एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा है कि आखिर क्यों ओ.बी.सी. का सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व नहीं हो पा रहा है? इसकी समस्या कहाँ पर है? मैं इस लेख के माध्यम से कहना चाहता हूँ कि इस सारे खेल में एक कानूनी दाँवपेंच है जिसके तहत यह सबकुछ हो रहा है और इस कानूनी दावपेंच के अनुसार ओ.बी.सी. की सीटों को सामान्य वर्ग में परिवर्तित कर दिया जाता है। “Department of Personnel and Training” के नियमानुसार किसी ओ.बी.सी. सीट को सामान्य वर्ग में परिवर्तित किया जा सकता है लेकिन आप उसी पोस्ट को सामान्य वर्ग में परिवर्तित कर सकते हैं जिसका सम्बन्ध " Scientific” पोस्ट से हो और इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि अगर आप किसी भी आरक्षित सीट को सामान्य वर्ग में परिवर्तित करते हैं तो इसके पहले सम्बंधित विभाग को “Department of Personnel and Training” को सूचित करना जरूरी होता है। किन्तु इसका ठीक उल्टा हो रहा है। विभागों में बैठे बड़े-बड़े मनीषियों ने इसका गलत फायदा उठाया है। वह ओ.बी.सी. सीट पर विज्ञापन तो निकालते हैं लेकिन दो साल तक इस सीट को नहीं भरते हैं। फिर इसके बाद इसी सीट को सामान्य वर्ग में परिवर्तित कर देते हैं। अगर हम  सरकारी तन्त्र के विभागों पर नजर डालें तो हमें पता चलेगा कि इस देश में कई सारे विभागों में ओ.बी.सी. सीटों को सामान्य में बदल दिया गया है। इसी का परिणाम यह हुआ है, कि आज कई क्षेत्र ऐसे हैं, जहाँ ओ.बी.सी. प्रतिनिधित्व न के बराबर है।
    अगर हम इस देश की उच्च शिक्षा पर नजर डालें तो पता चलता है कि ओ.बी.सी. की हालत बहुत ही खराब और सोचनीय है। देश के कई ऐसे विश्वविद्यालय हैं, जहाँ आज भी ओ.बी.सी. वर्ग से कोई “एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर” नहीं है। अगर हम इस देश के तीन प्रमुख विश्वविद्यालयों को देखें जिनमें बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय और हैदराबाद विश्वविद्यालय हैं। इन तीनों विश्वविद्यालयों में ओ.बी.सी. वर्ग स्थिति बहुत ही बुरी है। आर.टी.आई. के द्वारा प्राप्त की गई जानकारी के अनुसार जवाहलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कुल प्रोफेसरों की संख्या 600 के ऊपर है, लेकिन उसमें मात्र 26 असिस्टेंट प्रोफेसर ओ.बी.सी. वर्ग से हैं। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मात्र 2 असिस्टेंट प्रोफेसर ओ.बी.सी. वर्ग से हैं जबकि कुल प्रोफेसरों की संख्या 600 के ऊपर है। हैदराबाद विश्वविद्यालय में लगभग 30 असिस्टेंट प्रोफेसर ओ.बी.सी. वर्ग से हैं। ये तीनों विश्वविद्यालय उच्च शिक्षा के मामले में ख्याति हासिल किए हुए हैं लेकिन इन तीनों विश्वविद्यालयों में ओ.बी.सी. वर्ग से एक भी “एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर” नहीं है।इसका अर्थ यह है कि सविंधान में जो नियम या प्रावधान हैं उनकी सरेआम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। इसी कारण देश के कई विश्वविद्यालयों में आज भी ओ.बी.सी. सीटें खाली हैं। जैसे कि विशाखा भारती विश्वविद्यालय में 50, हरिसिंह गौर विश्विद्यालय में 45, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय में 44, पुडुचेरी विश्वविद्यालय में 34, तेजपुर विश्वविद्यालय में 33, असम विश्वविद्यालय में 32, दिल्ली विश्वविद्यालय में 32, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 32 ओबीसी प्रोफेसरों के पद खाली हैं। इन सीटों के खाली रखने के पीछे यह तर्क दिया जाता है कि ओ.बी.सी. के अभ्यर्थी इसके लायक नहीं हैं। इस देश में हजारों बुद्धिजीवी हैं जिनमें से कुछ ने इस मामले को बहुत गंभीरता से लिया है जबकि दूसरे लोगों ने इसे सिरे से नकार दिया है। प्रो. योगेन्द्र यादव ने हमेशा इस मुद्दे को लोगों के सामने रखा है। उन्होंने ओ.बी.सी. को उच्च शिक्षा में कैसे लाया जाय इसके लिए, अथक प्रयास किए हैं। सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद भी जब ओ.बी.सी. वर्ग का
प्रतिनिधित्व उच्च शिक्षा में नहीं हो पाया, तब सन् 2008 में, मिनिस्ट्री ऑफ ह्यूमन रिसोर्सेज डेवलपमेंट ने एक लेटर सभी आई.आई.टी. के लिए लिखा। जिसमें यह साफ  किया गया है कि- “reservation of 15%  [7% and 27% for SCs] STs and OBCs shall apply in full] including for the post of associate professors and professors-.” इसका मतलब यह कि सभी आई.आई.टी. में ओ.बी.सी. वर्ग को असिस्टेंट प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर स्तर पर भी आरक्षण दिया जाएगा। इसके बावजूद अभी तक ओ.बी.सी. वर्ग का पूर्ण प्रतिनिधित्व इन संस्थानों में नहीं हो पाया है। ओ.बी.सी. आरक्षण पर “OBC Parliament Committee" ने अपनी रिपोर्ट संसद को मार्च 2015 में सौंपी जिसमें यह पाया गया कि ओ.बी.सी. की हालत उच्च शिक्षा में बहुत ही सोचनीय है। इस देश के जम्मू केंद्रीय विश्वविद्यालय में 16.30 प्रतिशत, कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय में 4.40 प्रतिशत, पंजाब  केंद्रीय विश्वविद्यालय में 20.13 प्रतिशत, तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में 19.19 प्रतिशत, हेमवतीनंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में 5.24 प्रतिशत, दिल्ली केंद्रीय विश्वविद्यालय में 22.70 प्रतिशत, राजीव गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय में 7.00 प्रतिशत, विश्व भारती विश्वविद्यालय में 22.45 प्रतिशत ओ.बी.सी. छात्र-छात्राओं का प्रतिनिधित्व है। इसमें सबसे दयनीय हालत कश्मीर केंद्रीय विश्वविद्यालय में 4.40 प्रतिशत, और हेमवतीनंदन बहुगुणा केंद्रीय विश्वविद्यालय में 5.24 प्रतिशत, की है। ये आंकड़े एक इशारा करते हैं कि व्यवस्था में बैठे हुए लोगों ने ओ.बी.सी. वर्ग को उच्च शिक्षा में जाने से रोकने के लिए षड्यंत्रपूर्ण प्रयास किया है और आज भी कर रहे हैं। अगर हम भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की बात करें, तो पता चलता है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान दिल्ली में 21.52 प्रतिशत, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर में 18.90 प्रतिशत, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मुंबई में 24.70 प्रतिशत, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खरगपुर में 25.49 प्रतिशत, एन.ई.टी. कुरुक्षेत्र में 24.26 प्रतिशत, एन.ई.टी. श्रीनगर में 17 प्रतिशत, आई.आई.एस.इ.आर. कोलकता में 14.87 प्रतिशत और आई.आई.एस.इ.आर. पुणे में 23.69 प्रतिशत ओ.बी.सी. छात्रों का प्रतिनिधित्व है। अगर हम केंद्रीय विश्वविद्यालयों और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों को तुलनात्मक रूप से देखते हैं तो पाते हैं कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में ओ.बी.सी. वर्ग का प्रतिनिधित्व थोड़ा ठीक है। लेकिन दोनों में समानता यह है कि ओ.बी.सी. का 27 प्रतिशत आरक्षित कोटा अभी तक नहीं भरा गया है। ओ.बी.सी. सामाजिक न्याय को लेकर कई सांसद समय-समय पर संसद में यह मुद्दा उठाते रहते हैं, लेकिन इस मुद्दे पर कोई बहस नहीं करना चाहता है। सब लोग दो मिनट की बात सुनकर टाल देते हैं।                       
ओ.बी.सी. का  प्रतिनिधित्व उच्च शिक्षा में नहीं होने के कारण, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, हैदराबाद विश्वविद्यालय और अन्य केंद्रीय विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राओं ने “United Forum Of OBC” बनाया है। इस संगठन को रूप-रेखा देने में दिलीप, मुलायम सिंह, राजेश कुमार, विशम्भर, अनूप, आलोक कुमार और कई छात्रों की अहम् भूमिका रही है। इस संगठन का उद्देश्य यह है कि ओ.बी.सी. को कैसे संगठित किया जाए और एक वर्ग के रूप में उसे कैसे स्थापित किया जाए? सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जाति का जो जहर ओ.बी.सी. वर्ग में आ चुका है उस जहर को कैसे खत्म किया जाय? क्योंकि जातीय अलगाव के कारण यह वर्ग संगठित नहीं है। इस देश के ब्राह्मणवाद ने हिन्दू समाज को संभवतः इसीलिए इतनी जातियों में बाँट दिया कि ये कभी संगठित होना चाहें भी तो न हो सकें और ब्राह्मणवादी वर्चस्व का किला इनके शोषण की नींव पर सलामत खड़ा रहे।
    इसी वजह से जो लोग इस देश की कार्यकारी व्यवस्था में बैठे हुए हैं, ओ.बी.सी. की सीटों को सामान्य वर्ग में परिवर्तित कर देते हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि केंद्रीय सरकारी नौकरियों में ओ.बी.सी. का प्रतिनिधित्व सिर्फ 12 प्रतिशत है। जबकि 1990 में जब ओ.बी.सी. आरक्षण लागू नहीं हुआ था, तब इस समुदाय का प्रतिनिधित्व लगभग 10 प्रतिशत था जो आरक्षण मिलने के बाद मात्र 2 प्रतिशत बढ़ा है। यह इस बात की ओर संकेत करता है कि बड़े पैमाने पर, एक सोची समझी चाल के तहत ओ.बी.सी. को सरकारी तंत्र और उच्च शिक्षा में आने से रोकने के प्रयास किए जा रहे हैं। आज ओ.बी.सी. की यह हालत, ओ.बी.सी. छात्रों के मन में एक सवाल खड़ा करती है कि यह व्यवस्था “आखिर क्यों ओ.बी.सी. को आगे नहीं बढ़ने देना चाहती है?” दरअसल बात यह कि इस देश में ओ.बी.सी. बहुसंख्यक है जिसका प्रतिशत 55 प्रतिशत से 60 प्रतिशत है। यथास्थितिवादी, वर्चस्ववादी शक्तियों को इस बात का डर है कि कहीं ओ.बी.सी. इस व्यवस्था में आ गया तो सिस्टम में बैठे मठाधीशों का परंपरागत वर्चस्व टूट जाएगा और उनके द्वारा बनाई गई व्यवस्था का अंत हो जाएगा। बहुसंख्यक वर्ग को देश की व्यवस्था से बाहर रखना एक लंबे समय तक सुलगकर होने वाली क्रांति का संकेत है क्योंकि पिछड़ा वर्ग अब जाग रहा है और राजनैतिक रूप से वह सक्षम हो चुका है।

-आलोक कुमार
मोबाइल: 08460931297

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून 2016 में प्रकाशित

शुक्रवार, 24 जून 2016

पुलिस महानिदेशक फेल

बाराबंकी जनपद में एबीपी न्यूज़ के जिला संवाददाता सतीश कश्यप की पिटाई कोतवाली नगर में पुलिस वालों ने कर दी. पत्रकार सतीश कश्यप ने कथित अपराधी की लिखित शिकायत जिला प्रशासन से की थी जिसपर कोतवाली पुलिस ने उन्हें बुलाकर पिटाई कर दी. विभिन्न पत्रकार संगठनो के लोग कोतवाली गए, जिला प्रशासन के अधिकारीयों से मिलकर प्रत्यावेदन दिए. जिला पंचायत बाराबंकी के सभागार में एक विशाल एकता बैठक भी की. जिला प्रशासन से फिर मिले. जिला प्रशासन कोई कार्यवाई नहीं करना चाहता है. यह रहस्य और राज है जिसकी परते खुलनी बाकी हैं. पत्रकार दुनिया को न्याय दिलाने का दम भरते हैं लेकिन खुद के मामले में बेदम नजर आ रहे हैं. पुलिस कह रही है कि जांच के बाद प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखी जाएगी जबकि कानून कहता है कि प्रथम सूचना रिपोर्ट तुरंत दर्ज करो फिर उसके बाद विवेचना करने का अधिकार पुलिस को होता है. उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक सैयद जावीद अहमद का दावा था कि प्रत्येक व्यक्ति की प्रथम सूचना रिपोर्ट अवश्य दर्ज की जाएगी.
                      एबीपी न्यूज़ के जिला संवाददाता सतीश कश्यप की पिटाई के मामले में पुलिस महानिदेशक फेल हैं और पत्रकारों को अखिलेश सरकार शायद यह सन्देश देना चाहती है कि हैसियत में रहो हमारे विज्ञापनों से तुम्हारा अखबार चलता है. अगर कोई दरोगा पुलिस हंसी-हंसी में पिटाई कर दे तो उसका बुरा मत मानो और आंसू पोंछ कर फिर समाचार संकलन शुरू कर दो. 
उत्तर प्रदेश की बिगडती हुई कानून व्यवस्था का मुख्य कारण प्रदेश के नौजवान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का पुलिस व्यवस्था के ऊपर कोई नियंत्रण न होना. अगर उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार वापस नहीं आती है तो उसकी साड़ी जिम्मेदारी वर्तमान पुलिस तंत्र की है. कानून और न्याय का राज समाप्त हो गया है जिसकी चाहो प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखो जिसकी चाहो न लिखो. यह बात आये दिन दिखाई देती है किसी का उत्पीडन करना हो तो पुलिस को मिलाकर आप सब कुछ कर सकते हैं. 

सुमन 

मंगलवार, 21 जून 2016

योग के झूठ से देश को बचाओ

करीब सवा दो हज़ार साल से पतंजलि द्वारा इजाद की गयी स्वास्थ्य सुधार की एक पद्यति योग इस देश में चल रही है. शारीरिक कसरत का यह तरीका देश के अवाम के लिए कभी नहीं रहा है, क्यूंकि वे शारीरिक परिश्रम करते हैं और जो शारीरिक श्रम करते हैं, वे सभी शुद्र घोषित होते थे, जो समाज के सभी संसाधनों से वंचित रखे जाते हैं. शूद्रों को छोड़कर व्यापारी, क्षत्रिय और ब्राहमण चूँकि कोई शारीरिक श्रम नहीं करते रहे हैं, इसलिए स्वास्थ्य उन्ही की सबसे बड़ी समस्या बना रहा है. स्तिथि आज भी इससे अलग नहीं है. तीनो तथाकथित उच्च वर्णों का श्रम न करने के कारण बीमारियों से लड़ना कठिन रहा है. उनके स्वास्थ्य के लिए यह हिन्दू आनुष्ठानिक कसरत का तरीका इजाद किया गया, लेकिन इस योग ने इस देश को कितना स्वस्थ किया, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए.
            भारत में कैंसर तक का इलाज करने का दावा करने वाले योगकर्मी क्या कभी देश को यह बताएँगे कि उन्होंने कितनो को स्वस्थ बनाया कि वे ओलंपिक खेलों में उस तरह सफल हो सके, जिस तरह योग से दूर का भी रिश्ता न रखने वाले दरिद्र देश इथोपिया के खिलाड़ी स्वर्ण-पदक जीतते हैं ? दौड़ने, कूदने, तैरने जैसी प्रतियोगिताएं के लिए भी योग सिखाने के नाम पर अरबों रुपये कमाने वाले रामदेव किसी को जीतने लायक स्वस्थ क्यों नहीं बना पाए ?
   योग से अकूत सम्पदा बनाने वालों से पूछना जाना चाहिए कि उनके शिविरों में वे ही मध्यवर्गीय क्यों आते हैं, जिनकी तोंद नहीं सम्हलती और चर्बी संतुलित भोजन के बावजूद बढती रहती है ? किसी तोंदवाले रिक्शा चालक या मजदूर को क्या किसी ने देखा है ? वे मध्यवर्गीय और उच्च वर्गीय लोग जिनके आसन गद्दियाँ या काउच होते हैं, किसी जिमखाने में नहीं जाते. उन्हें योग आसान लगता है और थोडा अध्यात्मिक संतोष भी मिलता है. उन्हें थोड़े से योग से स्वास्थ्य लाभ एवं धार्मिक पुण्य मिलने का भी सुख तत्काल मिलता है, जिसकी उन्हें जरूरत होती है. जिमखाना में अध्यात्मिक सुख कहाँ मिल सकता है ?
   योग के थोथेपन की यह चर्चा इसलिए जरूरी है कि सत्ता में बैठे बड़े-बड़े लोग भी इस अर्थहीन और उच्च वर्ग को लुभाने वाली कसरत की वास्तविकता नहीं जानते और योग शब्दे से वे अध्यात्मिक आतंक महसूस करते हैं. आठवीं सदी के बाद से इस देश को घोर धर्मभीरु बना दिया गया है और जैसे वह धर्म के दूसरे कर्मकांडों से डरता है, योग लाभ की क्रिया से भी डरना सीख लेता है. इस देश में हिन्दू महिलाएं जैसे सत्यनारायण की कथा में जाकर सुख पाती हैं, ठीक वैसे ही वे योग शिविरों में पाती हैं. योग शिविर में भर्ती होने की फीस अगर लम्बी-चौड़ी है तो इस मध्यवर्गीय महिला को वर्गीय संतोष भी मिल जाता है.
        इन सारे मामलों को तार्किक नजरिये से नहीं देखा गया है. एक समय वृंदा करात ने रामदेव के व्यापार की शुचिता को लेकर काफी कडवी बहस छेड़ी थी लेकिन तब भी उन्होंने योग पर सवाल नहीं उठाया था. यह गनीमत है कि कभी मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह ने इस धंधे को चुनौती दी. उम्मीद है कि आने वाले दिनों में योग नाम के छद्म की तटस्थता से पड़ताल की जाएगी. 

- सुप्रसिद्ध साहित्यकार मुद्रारक्षस की कलम से

रविवार, 12 जून 2016

आन्दोलन से झण्डे बनते है न कि झण्डो से आन्दोलन


आन्दोलन से झण्डे बनते है न कि झण्डो से आन्दोलन।

      यह विचार भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के राष्ट्रीय महासचिव राकेश ने लोक संघर्ष पत्रिका के प्रधान सम्पादक डा0 रामगोपाल वर्मा की याद में श्रृद्धांजलि सभा में अपने उद्बोधन के दौरान व्यक्त किए।

      उन्होंने ने कहा कि आज देश में जन मुद्दों को लेकर आन्दोलन नहीं हो रहे है बल्कि जन मुद्दों से भटकाने के लिए आन्दोलन किये जा रहे है। यह साम्राज्यवादी सोच की समझी बूझी रणनीति है वह चाहते है कि देश में विचार शून्य माहौल उत्पन्न कर दिया जाय ताकि उनके उत्पाद बिक सके।

      श्री राकेश ने कहा कि डा0 राम गोपाल वर्मा उस पीढ़ी के साम्यावादी विचारधारा के व्यक्ति थे जो अपने विचारों के बल पर समाज में फैली विसंगतियों एवं सामाजिक दुराव को दूर करने के लिए जीवन भर संघर्ष करते रहे। उनको सच्ची श्रृद्धांजलि हम उनके विचारों को क्रियान्यवित करके ही दे सकते है ताकि सामाज व देश का उद्धार हो सके।

      श्रृद्धांजलि सभा में अपने विचार रखते हुए साम्यवादी विचारों की ताल्लुक रखने वाले डा0 श्याम बिहारी वर्मा ने कहा कि वर्ष 1991 में मनमोहन सिंह द्वारा जिस प्रकार देश की आर्थिक नीतियों में बदलाव किया गया उससे देश अब तेजी के साथ दो समाजों में बट रहा है। एक शोषित समाज व दूसरा शोषणकर्ता। वर्तमान में मौजूद एनडीए सरकार जिसका नेतृत्व नरेन्द्र मोदी कर रहे है और शान से कह रही है कि देश बदल रहा है जबकि वास्तविकता यह है कि देश साम्राज्यवादी शक्तियों के आगे गुलामी की ओर बढ़ रहा है।

      सभा की अध्यक्षता कर रहे लोक संघर्ष पत्रिका के मुख्य सलाहकार एवं सुप्रसिद्ध अधिवक्ता मुहम्मद शुऐब ने कहा कि हमे परम्परावादी नहीं बनना चाहिए बल्कि विचारों के संघर्ष को तेज करना चाहिए।

      शोक सभा में बृजमोहन वर्मा, डा0 कौसर हुसैन, राजनाथ शर्मा, बृजेश कुमार दीक्षित, हुमायुं नईम खान, मचकुन्द सिंह और राम प्रताप मिश्रा, सै0 इमरान रिजवी, डा0 उमेश वर्मा, मोहम्मद तारिक खान, अतीकुर्रहमान अंसारी, विनय कुमार सिंह, गुरू शरण दास, अजय सिंह, प्रवीण कुमार, पुष्पेन्द्र कुमार सिंह, नीरज वर्मा, मुनेश्वर वर्मा, गिरीश चन्द्र, सत्येन्द्र कुमार आदि ने अपनी श्रृद्धांजलि अर्पित की।शोक सभा का संचालन रणधीर सिंह सुमन ने किया।

शुक्रवार, 3 जून 2016

हाय-हाय करिए, मथुरा नरसंहार

मथुरा में आजाद भारत विधिक वैचारिक सत्याग्रही संगठन ने 15 मार्च 2014 को जिला प्रशासन से दो दिन की अनुमति लेकर जवाहर बाग़ में अपना डेरा जमाया था. जवाहर बाग़ में स्तिथ जिला उद्यान अधिकारी कार्यालय, पौध शाला, कर्मचारियों से सम्बंधित आवास थे. इस संगठन के लोगों ने जिला उद्यान अधिकारी कार्यालय से लेकर पूरे जवाहर बाग़ पर कब्ज़ा कर लिया था जो 270 एकड़ में फैला हुआ था जिले के कप्तान, जिला मजिस्ट्रेट ने कभी कार्यवाई नहीं की और एक तरह से जिला प्रशासन व सत्याग्रहियों के नेता राम वृक्ष यादव से अघोषित सांठ-गाँठ थी. दो पुलिस अधिकारी शहीद हो गए, 22 लोग सरकार की निगाह में मारे गए. मुख्य सवाल यह है कि इस तरह की कब्जेदारी कराने वाले अधिकारीयों, कर्मचारियों के खिलाफ कोई कार्यवाई संभव नहीं है न जिला प्रशासन या सरकार ऐसी कोई कार्यवाई करने की मंशा रखती है. 
          अब हाय-हाय करने से कोई फायदा नहीं. आने वाले कल में फिर इसी तरह से राजनीतिक संरक्षण के आधार पर काम करते रहेंगे. कानून, न्याय, लोकतंत्र व सुरक्षा जैसे शब्द कागजी बने रहेंगे और जब फिर कभी जरूरत होगी तो सारे शब्दों को अलग रखकर नरसंहार की मुद्रा में आ जायेंगे. जितनी भी इस तरह की बड़ी घटनाएं होती हैं उसमें अपने बचाव में सरकार यह कहकर फुर्सत पाने की कोशिश करती है कि खुफिया एजेंसियां फेल हो गयी हैं जबकि वास्तविकता यह है कि अवैध कब्जा पिछले दो वर्षों से चल रहा था। बावजूद इसके संबंधित विभाग ने इन कब्जेधारियों के खिलाफ कोई भी कार्यवाही नहीं की। स्थानीय लोगों की मानें तो इस कब्जे के पीछे समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता का है। स्थानीय सपा नेता ने इस जवाहर बाग में कब्जेधारियों को अपनी मदद दे रखी थी।
                       अगर माननीय उच्च न्यायलय का कब्ज़ा हटाने का आदेश न होता तो मथुरा जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय के बगल में  स्तिथ जवाहर बाग़ से कब्ज़ा हटाने का कोई मामला मुद्दा ही नहीं था.
         प्रदेश में सशक्त लोगों ने अपनी-अपनी पार्टी की सरकारों में गैंग बनाकर जल, जंगल, जमीन की लूट का काम करते हैं. सरकारी जमीनों को कब्ज़ा करते हैं और सरकार उनकी मदद करती है. राजनीतिक दलों के  संगठन पर बालू, मौरंग ठेकेदार, माफिया, स्मगलर्स, नकली खादों के व्यापारी, मिलावटी सामानों के विक्रेता आदि का अब कब्ज़ा होता है. जिला प्रशासन उन्ही की इच्छा और आकांक्षा के अनुसार कार्य करता है. जिला प्रशसन अगर कानून के हिसाब से कार्य कर रहा होता तो इन सत्याग्रही संगठन की हिम्मत ही नहीं पड़ती जवाहर बाग़ में जाने की. 

सुमन 

शनिवार, 21 मई 2016

क्रांतिकारी भगत सिंह और स्वाधीनता आंदोलन



                                                                                                        विभिन्न कारणों से इतिहास हमेषा से बहस-मुबाहिसों का विषय रहा है। हाल में भगत सिंह को लेकर जो बहस छिड़ी है, उसे भी इसी रूप में देखा जाना चाहिए। ताज़ा विवाद, अतीत को देखने के हमारे नज़रिए से जुड़ा है और विष्व स्तर पर आतंकवाद के उभार के संदर्भ में ‘आतंकवाद’ षब्द के बदलते हुए अर्थ से उपजा है। एक टीवी टॉक षो, जो संजीदा बहसों से ज्यादा षोर-षराबे और अर्थहीन विवादों के लिए जाना जाता है, में संचालनकर्ता ने ख्यात इतिहासविद् बिपिन चंद्र और उनकी पुस्तक ‘‘इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेन्डेन्स’’ पर हल्ला बोला। इन जनाब को यह आपत्ति थी कि इस पुस्तक में भगत सिंह और उनके साथियों को आतंकवादी बताया गया है। उन्होंने पुस्तक के लेखकों को कांग्रेस के ‘‘दरबारी इतिहासविद्’’ बताया और उन पर यह आरोप जड़ दिया कि उन्होंने जानते-बूझते देषभक्तों पर कीचड़ उछाला है। इसके बाद, भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर ने फरमाया कि पुस्तक में षहीदों को अपमानित किया गया है और केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी तुरतफुरत इस निष्कर्ष पर पहुंच गईं कि यह महान स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के बलिदान की ‘‘अकादमिक हत्या’’ है।
यह पुस्तक 28 साल पहले प्रकाषित हुई थी और आज भी इस विषय पर सबसे लोकप्रिय और प्रमाणिक पुस्तक है। यह सही है कि इसमें प्रफुल्ल चाकी, खुदीराम बोस, मदनलाल ढींगरा, सचिन सान्याल, भगत सिंह और रासबिहारी बोस जैसे क्रांतिकारियों को ‘‘क्रांतिकारी आतंकवादी’’ कहा गया है। बिपिन चंद्र और उनके साथी इतिहासविदों ने ‘‘क्रांतिकारी आतंकवादी’’ षब्द का प्रयोग इसलिए किया क्योंकि स्वाधीनता के लिए अपनी जान न्योछावर करने वाले ये युवा स्वयं को यही मानते थे। गांधीजी द्वारा इन क्रांतिकारियों की आलोचना पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उनमें से एक, भगवतीचरण वोहरा, ने लिखा, ‘‘इस तरह देष में आतंकवाद का जन्म हुआ। यह क्रांति का एक दौर है-एक आवष्यक और अपरिहार्य दौर। केवल आतंकवाद, क्रांति नहीं है परंतु आतंकवाद के बिना क्रांति अधूरी है...आतंकवाद, दमितजनों में यह आषा जगाता है कि वे उन पर हो रहे अत्याचारों का प्रतिषोध ले सकते हैं और अत्याचारियों से मुक्ति पा सकते हैं। इससे ढुलमुल लोगों में साहस और आत्मविष्वास का संचार होता है, इससे षासक वर्ग की श्रेष्ठता का आभामंडल टूटता है और पराधीन राष्ट्र के लोगों का सम्मान दुनिया की निगाहों में बढ़ता है। आतंकवाद, किसी राष्ट्र की स्वतंत्रता पाने की तीव्र इच्छा का सबसे ठोस सुबूत है’’ (भगवतीचरण वोहरा की पुस्तक ‘‘फिलॉसफी ऑफ बोम्ब’’ से)।
यह अलग बात है कि आगे चलकर क्रांतिकारियों के इस समूह की विचारधारा में भी बदलाव आया, जो रामप्रसाद बिस्मिल की ‘‘रिवाल्वर और पिस्तौलें रखने की इच्छा’’ को त्यागने और इसके स्थान पर ‘‘खुले आंदोलन’’ में भाग लेने की सलाह से जाहिर है। भगत सिंह के विचार भी समय के साथ बदले और सन 1929 तक वे इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके थे कि व्यक्तिगत बहादुराना कार्यवाहियों की जगह मार्क्सवाद और व्यापक जनांदोलन क्रांति की सही राह हैं। सन 1931 में जेल से अपने साथियों को दिए गए अपने संदेष में उन्होंने आतंकवाद की रणनीति की अपनी सूक्ष्म समझ को लोगों के सामने रखा। जो लोग भगत सिंह और उनके साथियों के लिए आतंकवादी षब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति कर रहे हैं, उन्हें यह जान लेना चाहिए कि क्रांतिकारी स्वयं को आतंकवादी ही बताते थे। उस समय आतंकवाद को नीची निगाहों से नहीं देखा जाता था। सन 2001 के बाद से दुनिया के तेल संसाधनों पर कब्ज़ा ज़माने की वैष्विक प्रतिद्वंद्विता के चलते आतंकवाद का वीभत्स स्वरूप सामने आया।
‘‘इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेन्डेन्स’’ का प्रथम संस्करण 1988 में प्रकाषित हुआ था। इसके लगभग एक दषक बाद से बिपिन चंद्र ने भगत सिंह के बारे में कई मौकों पर लिखा परंतु उन्होंने उनके लिए आतंकवादी षब्द का इस्तेमाल नहीं किया। भगत सिंह के प्रसिद्ध लेख ‘‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’’ की अपनी भूमिका में बिपिन चंद्र लिखते हैं, ‘‘भगत सिंह न केवल भारत के महानतम स्वाधीनता संग्राम सेनानियों में से एक थे वरन वे क्रांतिकारी समाजवादी भी थे और भारत के सबसे पहले मार्क्सवादी विचारकों और सिद्धांतकारों में षामिल थे।’’ बिपिन चंद्र के सहलेखकों ने ज़ोर देकर कहा कि बिपिन चंद्र, भगत सिंह को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखते थे और पुस्तक के बिपिन चंद्र द्वारा लिखित अध्यायों में भगत सिंह की लोकप्रियता की विस्तृत चर्चा की गई है। बिपिन चंद्र ने लिखा है कि भगत सिंह पूरे देष में बहुत लोकप्रिय थे और उन्हें फांसी दिए जाने की खबर सुनने के बाद लाखों लोगों ने उस दिन भोजन नहीं किया।
ऐसा लगता है कि स्मृति ईरानी और उनके कुनबे के अन्य सदस्य, पुस्तक में आतंकवादी षब्द के इस्तेमाल के बहाने इस पुस्तक को पाठ्यक्रम से बाहर करने की मंषा रखते हैं और इसका असली कारण यह है कि यह पुस्तक भारत की सांप्रदायिक राजनीति का पैना विष्लेषण करती है। पुस्तक पढ़ने से यह साफ हो जाता है कि मुस्लिम और हिंदू, दोनों वर्गों के सांप्रदायिक तत्वों ने स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। इन लोगों ने ब्रिटिष-विरोधी राष्ट्रवादी आंदोलन से दूरी बनाए रखी। यह एक ऐसा तथ्य है जिसे सांप्रदायिक ताकतें छुपाना चाहती हैं और भगत सिंह के लिए आतंकवादी षब्द का इस्तेमाल जैसे बेसिरपैर के मुद्दे पर अपनी छातीयां पीटकर स्वयं को देषभक्त सिद्ध करना चाहती हैं।
संघ परिवार के कुछ अन्य सदस्यों का कहना है कि यह पुस्तक केवल नेहरू और देष में वामपंथ पर केंद्रित है। जाहिर है कि या तो उन्होंने इस पुस्तक को ठीक से पढ़ा-समझा नहीं है या फिर वे जानबूझकर ऐसी आधारहीन बातें कर रहे हैं। पुस्तक को ध्यान से पढ़ने पर किसी को भी यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह पुस्तक साम्राज्यवाद-विरोधी आंदोलन के सभी पहलुओं पर प्रकाष डालती है। अंग्रेज़ों के खिलाफ जिन भी षक्तियों और समूहों ने लड़ाई लड़ी, उन सबको इस पुस्तक में समुचित स्थान दिया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गांधी और नेहरू, स्वाधीनता संग्राम के अनन्य नेता थे और इसलिए उनका प्रमुखता से जिक्र आना स्वाभाविक है। परंतु यह पुस्तक इस आंदोलन की आंतरिक धाराओं से भी पाठक को परिचित करवाती है। यह पुस्तक भगत सिंह, सूर्यसेन व अन्य क्रांतिकारियों के साथ पूरा न्याय करती है और ब्रिटिष-विरोधी आंदोलन में उनकी भूमिका को पर्याप्त महत्व देती है। पुस्तक में सुभाषचंद्र बोस, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, मोहम्मद अली जिन्ना, बाबासाहब अंबेडकर आदि सभी को उचित संदर्भ में प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक यह बताती है कि आम लोगों को इस आंदोलन से कैसे जोड़ा गया। इस आंदोलन के विभिन्न चरणों, उसके सम्मुख प्रस्तुत चुनौतियों और उसमें समय के साथ आए परिवर्तनों का पुस्तक में गंभीर विष्लेषण किया गया है।
दरअसल, बिपिन चंद्र और उनके साथियों का फोकस व्यक्तियों या स्वाधीनता आंदोलन के महानायकों के आपसी टकराव पर न होकर विचारधाराओं और परिघटनाओं पर है। बिपिन चंद्र के सहलेखकों का कहना है कि ‘‘इंडियाज़ स्ट्रगल फॉर इंडिपेन्डेन्स’’ स्वाधीनता संग्राम में उदारवादियों, समाजवादियों, साम्यवादियों आदि सभी राजनैतिक प्रवृत्तियों की भूमिका का संतुलित प्रस्तुतिकरण करती है। पुस्तक 1857 के स्वाधीनता संग्राम से लेकर गदर पार्टी, इंडियन नेषनल आर्मी, स्वदेषी व भारत छोड़ो आंदोलन, किसानों, ट्रेड यूनियनों आदि के आंदोलनों, जाति-विरोधी व देषी रियासतों के नागरिकों के आंदोलनों सहित स्वाधीनता संग्राम के सभी पक्षां के साथ न्याय करती है। इस पुस्तक में दादाभाई नोरोजी से लेकर बिरसा मुंडा, लोकमान्य तिलक  गांधीजी, सरदार पटेल, जयप्रकाष नारायण और अरूणा आसफ अली आदि सभी की भूमिका को समुचित महत्व दिया गया है।
आज आतंकवाद षब्द का अर्थ बदल गया है और प्रोफेसर बिपिन चंद्र अब इस दुनिया में नहीं हैं। इसलिए उनके सहलेखक, अन्य इतिहासविदों के साथ विचारविमर्ष कर इन महान स्वाधीनता संग्राम सेनानियों के लिए ‘‘उग्रवादी क्रांतिकारी’’ या अन्य कोई उपयुक्त षब्द चुन सकते हैं। भाजपा, अपने राजनैतिक एजेंडे को लागू करने के लिए इतिहास से खिलवाड़ करती आई है। ताज़ा घटनाक्रम से यह साफ है कि वह स्वाधीनता आंदोलन पर केंद्रित इस बहुमूल्य पुस्तक से छुटकारा पाने का प्रयास कर रही है क्योंकि यह पुस्तक हिंदुत्ववादी ताकतों की कथित देषभक्ति का पर्दाफाष करती है और यह बताती है कि इन षक्तियों ने स्वाधीनता संग्राम में कोई भूमिका अदा नहीं की।


रविवार, 15 मई 2016

मोदी सरकार के दो साल :टूटे वायदे और विघटनकारी एजेंडा




मोदी सरकार के दो साल के कार्यकाल की समीक्षा के मुख्यतः दो पैमाने हो सकते हैं। पहला, चुनाव अभियान के दौरान किए गए वायदों में से कितने पूरे हुए और दूसरा, भारतीय संविधान में निहित बहुवाद और विविधता के मूल्यों की रक्षा के संदर्भ में सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा। मोदी सरकार के दिल्ली में सत्ता संभालने के बाद लोगों को यह उम्मीद थी कि अच्छे दिन आएंगे, विदेशों में जमा काला धन वापिस आएगा और रोज़गार के अवसर बढ़ेंगे। इनमें से कुछ भी नहीं हुआ। आवश्यक वस्तुओं के दाम आसमान छू रहे हैं और गरीबों के भोजन ‘रोटी-दाल’ में से दाल इतनी मंहगी हो गई कि मध्यम वर्ग के परिवारों के लिए भी उसे खरीदना मुश्किल हो गया है। बेरोज़गारी जस की तस है और हम सब के बैंक खातों में जो पंद्रह लाख रूपए आने थे वे कहीं दिखलाई नहीं दे रहे हैं। जहां तक बहुप्रचारित विदेश नीति का प्रश्न है, किसी को यह समझ में नहीं आ रहा है कि भारत सरकार की विदेश नीति आखिर है क्या। हां, प्रधानमंत्री नियमित रूप से विदेश जाते रहते हैं और दूसरे देशों के नेताओं के साथ उनकी तस्वीरें अखबारों की शोभा बढ़ाती रहती हैं। पाकिस्तान के मामले में सरकार कभी बहुत कड़ा रूख अपनाती है तो कभी अत्यधिक नरम। नेपाल, जिसके साथ हमारे दोस्ताना संबंध थे, भी हम से दूर हो गया है।
‘‘अधिकतम शासन-न्यूनतम सरकार’’ (मैक्सिमम गर्वनेंस-मिनिमल गर्वमेंट) का नारा खोखला साबित हुआ है। सारी शक्तियां एक व्यक्ति के हाथों में केंद्रित हो गई हैं और उस व्यक्ति में तानाशाह बनने के चिन्ह स्पष्ट नज़र आ रहे हैं। कैबिनेट व्यवस्था की सर्वमान्य परंपराओं को दरकिनार कर, प्रधानमंत्री ने सब कुछ अपने नियंत्रण में ले लिया है। देश में सांप्रदायिक द्वेश बढ़ा है, सौहार्द कम हुआ है और शैक्षणिक संस्थाओं की स्वायत्तता में घटी है।
यह पहली बार है कि जब भाजपा, लोकसभा में सामान्य बहुमत के साथ केंद्र में सत्ता में आई है। और यह साफ है कि वह अपने हिंदुत्ववादी एजेंडे को लागू करने पर आमादा है। मोदी के सत्ता संभालते ही संघ परिवार के विभिन्न अनुषांगिक संगठन अतिसक्रिय हो गए। पुणे में मोहसिन शेख नामक एक सूचना प्रोद्योगिकी कर्मी की हिंदू राष्ट्रसेना के कार्यकर्ताओं ने खुलेआम हत्या कर दी। संघ परिवार के सदस्य संगठनों ने हर उस व्यक्ति और संस्थान को निशाना बनाना शुरू कर दिया और उसके खिलाफ घृणा फैलानी शुरू कर दी जो सत्ताधारी दल के एजेंडे से सहमत नहीं था। केंद्र में मंत्री बनने के पहले, गिरिराज सिंह ने कहा कि जो लोग मोदी को वोट देना नहीं चाहते उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। पार्टी की एक अन्य नेता साध्वी निरंजन ज्योति ने उन लोगों को हरामजादा बताया जो उनकी पार्टी की नीतियों से सहमत नहीं थे। सत्ताधारी दल और उसके पितृसंगठन आरएसएस से जुड़े सभी व्यक्तियों ने एक स्वर में धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध विषवमन करना षुरू कर दिया और हमारे शक्तिशाली प्रधानमंत्री चुप्पी साधे रहे। यह कहा गया कि प्रधानमंत्री से आखिर यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे हर छोटी-मोटी घटना पर प्रतिक्रिया व्यक्त करें। ऐसा लगता है कि उनकी चुप्पी सोची-समझी और आरएसएस के ‘‘श्रम विभाजन’’ का भाग थी। यह बार-बार कहा जाता है कि जो लोग घृणा फैला रहे हैं वे मुट्ठीभर अतिवादी हैं जबकि सच यह है कि वे लोग शासक दल के प्रमुख नेता हैं।
हिंदुत्व की राजनीति, पहचान से जुड़े मुद्दों पर फलती-फूलती है। इस बार गौमाता और गौमांस भक्षण को बड़ा मुद्दा बनाया गया और इसके आसपास एक जुनून खड़ा कर दिया गया। इसी जुनून के चलते, दादरी में मोहम्मद अख़लाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और देश के अन्य कई स्थानों पर हिंसा हुई। उसके पहले, दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्या कर दी गई थी। दादरी की घटना ने पूरे देश का ध्यान बढ़ती हुई असहिष्णुता की ओर खींचा और कई जानेमाने लेखकों, वैज्ञानिकों और फिल्म निर्माताओं ने उन्हें मिले पुरस्कार लौटा दिए। इसे गंभीरता से लेकर देश में तनाव को कम करने के प्रयास  करने की बजाए, पुरस्कार लौटाने वालों को ही कटघरे में खड़ा किया गया। यह कहा गया कि वे राजनीति से प्रेरित हैं या पैसे के लिए ऐसा कर रहे हैं।
जल्दी ही यह स्पष्ट हो गया कि यह सरकार शैक्षणिक संस्थाओं में घुसपैठ करना चाहती है। प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थाओं में चुन-चुनकर ऐसे लोगां की नियुक्तियां की गईं जो भगवा रंग में रंगे हुए थे। गजेन्द्र चौहान को भारतीय फिल्म व टेलीविजन संस्थान का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। उनकी नियुक्ति का विद्यार्थियों ने कड़ा विरोध किया परंतु उसे नज़रअंदाज कर दिया गया। हैदराबाद केंद्रीय विष्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन को निशाना बनाया गया। स्थानीय भाजपा सांसद बंगारू दत्तात्रेय ने केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री से यह शिकायत की कि विष्वविद्यालय में राष्ट्रविरोधी और जातिवादी गतिविधियां चल रही हैं। मंत्रालय के दबाव में विष्वविद्यालय ने रोहित वेमूला और उनके साथियों को होस्टल से निष्कासित कर दिया और उनकी छात्रवृत्ति बंद कर दी। इसी के कारण रोहित ने आत्महत्या कर ली।
शैक्षणिक संस्थाओं के संबंध में सरकार की नीति का देशव्यापी विरोध हुआ। फिर जेएनयू को निशाना बनाया गया और कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर देशद्रोह का झूठा आरोप मढ़ दिया गया। जिन लोगों ने राष्ट्रविरोधी नारे लगाए थे उन्हें गिरफ्तार तक नहीं किया गया। इस तथ्य को नज़रअंदाज़ किया गया कि केवल नारे लगाना देशद्रोह नहीं है। एक छेड़छाड़ की गई सीडी का इस्तेमाल जेएनयू के शोधार्थियों को फंसाने के लिए किया गया। उन पर देशरोह का आरोप लगाए जाने से राष्ट्रवाद की परिभाषा पर पूरे देश में बहस छिड़ गई।
आरएसएस के मुखिया ने एक दूसरा भावनात्मक मुद्दा उठाते हुए कहा कि युवाओं को भारत माता की जय का नारा लगाना चाहिए। इसके उत्तर में एमआईएम के असादुद्दीन ओवैसी ने कहा कि अगर उनके गले पर छुरी भी अड़ा दी जाए तब भी वे यह नारा नहीं लगाएंगे। आरएसएस के एक अन्य साथी बाबा रामदेव ने आग में घी डालते हुए यह कहा कि अगर संविधान नहीं होता तो अब तक लाखों लोगां के गले काट दिए गए होते। यह समझना मुश्किल नहीं है कि यह कितनी भयावह धमकी थी।
कुल मिलाकर, पिछले दो सालों में संघ के प्रचारक मोदी ने देश को हिंदू राष्ट्र बनने की ओर धकेला है और भारतीय राष्ट्रवाद को गंभीर क्षति पहुंचाई है। सच्चा भारतीय राष्ट्रवाद उदार है और उसमें अलग-अलग धर्मों और जातियों व अलग-अलग विचारधाराओं के लोगों के लिए स्थान है। इसके विपरीत, सांप्रदायिक राजनीति भावनात्मक मुद्दों को उछालने में विष्वास रखती है जिनमें गौमांस, राष्ट्रवाद और भारत माता की जय जैसे मुद्दे शामिल हैं। इस सरकार के कार्यकाल के अभी दो साल बाकी हैं। अभी से यह स्पष्ट दिखलाई पड़ रहा है कि सरकार का एजेंडा विघटनकारी है और इसकी नीतियां आम लोगों के हित में नहीं हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत, समावेशी प्रगति की राह पर चले और लोगों के बीच सद्भाव और प्रेम हो। परंतु ऐसा होता नहीं दिख रहा है।
-राम पुनियानी

शुक्रवार, 13 मई 2016

जे.एन.यू विवाद से निकला प्रतिरोध - संभावनायें और सीमायें

- जावेद अनीस
इस समय देश में जो कुछ भी हो रहा है उसे सामान्य नहीं कहा जा सकता है, राष्ट्रवाद बनाम देशद्रोह  पर बहस छिड़ी है और संघ के राष्ट्रवाद की परिभाषा को थोपने की कोशिश की जा रही है, एक तरह से इसके आधार पर विपरीत विचारधारा और आवाजों को देशद्रोही के तमगे से नवाजा जा रहा है. इसकी आंच ने सियासत और मीडिया के साथ समाज को भी अपने घेरे में ले लिया है. इतिहासकार रोमिला थापर इसे धार्मिक राष्ट्रवाद और सेक्युलर राष्ट्रवाद के बीच की लडाई मानती हैं. इस पूरे विवाद के केंद्र में देश के सबसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों में से एक जेएनयू है जिसे एक अखाड़ा बना दिया गया है.

पूरे विवाद की शुरुआत बीते नौ फरवरी को हुई जब अतिवादी वाम संगठन डीएसयू के पूर्व सदस्यों द्वारा जेएनयू परिसर में अफजल गुरू की फांसी के विरोध में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया और कुछ टी.वी. चैनलों द्वारा दावा किया गया कि इसमें कथित रूप से भारत-विरोधी नारे लगाये गये हैं. बाद में जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. कुछ दिनों बाद उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य की भी गिरफ्तारी हुई. कन्हैया को छह महीने की सशर्त अंतरिम ज़मानत मिल चुकी है.ज़मानत के बाद जिस तरह से कन्हैया कुमार ने अपना पक्ष रखते हुए लगातार संघ परिवार और मोदी सरकार को वैचारिक रूप से निशाना बनाया है उससे कन्हैया के शुभचिंतकों के साथ-साथ उनके विरोधी भी हैरान है और उनकी गिरफ्तारी को बड़ी भूल बता रहे हैं,  उनकी जोशीली और सटीक तकरीर इतनी असरदार दी थी कि टी.वी. चैनलों द्वारा इसका प्रसारण कई बार किया गया और उनकी बातों को देश के सभी हिस्सों में सुना-समझा गया. इधर लेफ्ट वालों को लग रहा है कि उन्हें एक नया सितारा बन गया है तो दूसरी तरफ संघ के लोग उन्हें चूहा भी कह रहे हैं.
इस पूरे प्रकरण में एआईएसएफ  के सदस्य कन्हैया कुमार की हड़बड़ी में की गयी गिरफ्तारी,कुछ चैनलों की भूमिका और वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों की इस पूरे मसले में तत्परता ने कई सवाल खड़े किये हैं, कोई इसे लाल गढ़ कहे जाने वाले जेएनयू पर भगवा नियंत्रण की कवायद बता रहा है तो  कोई कह रहा है कि यह सब रोहित के मसले से ध्यान हटाने के लिए किया गया है, कुछ लोग इसे संघ परिवार  की नयी परियोजना बता रहे हैं जो संघ के राष्ट्रवाद के परिभाषा के आधार पर जनमत तैयार करने की उसकी लम्बी रणनीति का एक हिस्सा  है और  जिसका टकराव स्वंत्रता आन्दोलन से निकले “आधुनिक भारत की विचार से है. कुछ भी हो इन सबके बीच आज देश दो धड़ों में बंटा हुआ साफ़ नजर रहा है. यह एक वैचारिक लड़ाई है जो भारत को एक सेक्युलर और उग्र हिन्दू राष्ट्र के आधार पर देखने वालों के बीच है.  
   “देशद्रोह” एक नया अस्त्र

हमारे देश में अंग्रेज सरकार ने 1870 में एक कानून बनाया था जिसे सैडीशन लॉ कहा जाता है. इसका भरपूर इस्तेमाल उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल नेताओं के खिलाफ किया. आजादी के बाद भी इसे भारतीय संविधान में शामिल कर लिया गया. इस कानून के तहत अगर किसी व्यक्ति पर राष्ट्रद्रोह का केस दर्ज होता है तो उसे आजीवन कारावास हो सकती है. आजादी के बाद की सरकारों ने भी इस कानून का खासा दुरुपयोग किया है. जेएनयू में भी मोदी सरकार पर इसी तरह के आरोप लग रहे हैं, जेएनयू वाले मामले में बीजेपी सांसद महेश गिरी और एबीवीपी की शिकायतों के बाद दिल्ली पुलिस ने विवादित कार्यक्रम के सिलसिले में वहां के छात्रों पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया,आरोप था कि डीएसयू के पूर्व सदस्यों ने राष्ट्रविरोधी नारे लगाये थे. इसके सबूत में कुछ वीडियो भी दिखाए गये जिसके बाद बाकायदा मीडिया ट्रायल शुरू हो गया, पूरे देश में ख़ास तरह का माहौल बनाया गया और वामपंथियों, बुद्धिजीवियों व इसके खिलाफ आवाज उठाने वाले दूसरे विचारों,आवाजों को देशद्रोही साबित करने की होड़ सी मच गयी,जेएनयू जैसे संस्थान को देशद्रोह का अड्डा साबित करने की कोशिश की गयी, सोशल मीडिया पर “शट डाउन जेएनयू” का हैश टैग चलाया गया. हालांकि बाद में खुलासा हुआ कि जेएनयू के छात्रों पर देशद्रोह के आरोप लगाने के लिये जिन सात वीडियो का इस्तेमाल किया गया उनमें से दो वीडियो फर्जी थे और उनके साथ छेड़छाड़ की गयी थी.

सरकार में बैठे लोगों का रिस्पोंस भी ऐसा था जैसे वह जेएनयू नहीं कोई दुश्मन देश हो, जिस मसले को यूनिवर्सिटी के स्तर पर ही सुलझाया जा सकता था उसे एक राष्ट्रीय संकट के तौर पर पेश किया गया. मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि देश कभी भी भारत मां का अपमान सहन नहीं करेगा. गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने बयान दिया कि ''यदि कोई भारत-विरोधी नारे लगाता है,देश की एकता एवं अखंडता पर सवालिया निशान लगाता है तो उन्हें बख्शा नहीं जाएगा. उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.'' राजनाथ ने तो यह दावा भी कर डाला कि जेएनयू की घटना को हाफिज सईद का समर्थन था, बाद में इस बयान को लेकर उनकी और उनके विभाग की खासी किरकरी भी हुई.
दरअसल जेएनयू हमेशा से ही संघ परिवार के निशाने पर रहा है इसके कई कारण है, जेएनयू एक ऐसी जगह है जहाँ संघ लाख कोशिशों के बावजूद अपनी विचारधारा को जमा नहीं पाया है और यहाँ हमेशा से ही वाम,प्रगतिशील,लोकतान्त्रिक विचारों को मानने वालों का दबदबा है. वैचारिक रूप से संघ को जिस तरह की खुली चुनौती जेएनयू से मिलती है वह देश का कोई दूसरा संस्थान नहीं दे पाता है. जेएनयू का अपना मिजाज है, एक खुला माहौल है, जहाँ सभी विचारों को फलने-फूलने का स्वभाविक मौका मिलता है,यहाँ के दरवाजे भेड़चाल और अंधभक्ति के लिए बंद है,किसी भी विचारधारा को अपनी जगह बनाने के लिए बहस मुहावसे की रस्साकशी से गुजरना पड़ता है और संघ विचारधारा के लोग इसमें मात खा जाते हैं, इसलिए जेएनयू के खिलाफ लगातार दुष्प्रचार किया जाता रहा है, पिछले साल 'पांचजन्य' में “दरार का गढ़” नाम से कवर स्टोरी आई थी जिसमें कहा गया था कि जेएनयू नक्सली गतिविधियों का मुख्य केंद्र है और यहां देश को तोड़ने वालों का एक तबका तैयार हो रहा है। भाजपा नेता सुब्रमïण्यम स्वामी भी जेएनयू पर कई बार सवाल उठाते हुए इसे देशद्रोहियों का अड्डा  बता चुके हैं.

दूसरा कारण जेएनयू कैम्पस का सामाजिक और राष्ट्रीय चरित्र है,यह एक ऐसा संस्थान है जहाँ लगभग 60 फीसदी स्टूडेंट दलित, आदिवासी, पिछड़े वर्ग,अल्पसंख्यक और गरीब वंचित समुदायों से आते हैं, यहाँ हर राज्य का कोटा तय है और पिछड़े जिलों से आने वाले विद्यार्थियों को प्राथमिकता दी जाती है. यह जेएनयू ही है जहाँ ये बच्चे तमाम बाधाओं को पार करते हुए केवल अपनी प्रतिभा के बल पर इतने सस्ते में उच्च शिक्षा की सुविधाएं पा रहे हैं. इधर जेएऩयू के बहाने विश्वविद्यालयों को मिलने वाली सब्सिडी पर सवाल खड़े किये जा रहे हैं और इस बहाने उच्च शिक्षा के निजीकरण की वकालत भी हो रही है.   मोहनदास पाई जो कि इंफोसिस के पूर्व सीएफओ (चीफ फाइनेंस आफिसर) और एचआर हेड रहे हैं इसी तरह का सवाल उठाकर कहते हैं कि "पुराकालीन या अतिवादी वाम को सब्सिडी देने के लिए करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल को किसी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता."
मामला केवल जेएनयू का नहीं है, मोदी सरकार के आने के बाद से शैक्षणिक संस्थानों के वैचारिक स्वायत्तता पर काबू पाने और इनका भगवाकरण करने का जो सिलसिला शुरू हुआ था  जेएनयू उसी की एक कड़ी है, इससे पहले एफटीआईआई,आईआईएमसी और हैदराबाद युनिवर्सिटी में ऐसे प्रयास किये जा चुके हैं. हैदराबाद यूनिवर्सिटी में रोहित वेमुला के आत्महत्या के बाद से संघ और मोदी सरकार कटघरे में आ गये थे, उनके हिंदुत्व की परियोजना में दलितों के इतेमाल के कोशिशों पर पानी फिरता दिखाई पड़ने लगा था क्योंकि पूरे देश में अम्बेडकरवादी संगठनों और विद्यार्थी संघ के खिलाफ मुखर तरीके से लामबंद होकर प्रतिरोध करने लगे थे. रोहित ने जाति के सवाल को एजेंडे पर ला दिया था जिस पर संघ किसी भी टकराहट से बचता है और हमेशा बैकफुट पर जाने को मजबूर होता है. जेएनयू प्रकरण ने उन्हें एक ऐसा मौका दे दिया जिससे वे एजेंडे पर आये जाति के सवाल को बायपास करते हुए अपने पुराने पिच पर वापस लौट सकें और यह पिच है “राष्ट्रवाद साम्प्रदायिकता” का. इसी पिच पर जेएनयू प्रकरण के बहाने संघ ने अपने सबसे बड़े वैचारिक प्रतिद्वंदी वामपंथ को निशाने पर लिया है और जिसका इरादा पूरे वामपंथ को देशद्रोही के तौर पर पेश करना है. 
निशाने पर वामपंथ ?

भारतीय राजनीति में वामपंथ हाशिये पर है,यह कई धड़ों में बंटा हुआ है और यह धड़े एक दूसरे को कुछ खास पसंद भी नहीं करते हैं, इनका काफी समय अपने आप को एक दूसरे से ज्यादा असली और सही साबित करने में बीतता है, मुख्य रूप से दो विभाजन है एक तरफ वो अतिवादी समूह है जो देश के दूर-दराज के इलाकों में हथियारबंद होकर राज्य के खिलाफ लड़ रहे हैं और एक दिन इसी तरह से पूरे देश को जीत लेने का सपना पाले हुए है, दूसरी तरफ पूरी तरह से संसदीय राजनीति में रमा वामपंथ है, इसके अलावा बड़ी संख्या में ऐसे छोटे समूह या व्यक्ति हैं जो अपने आप को स्वतंत्र मानते हैं इन्हें असंगठित वाम भी कह सकते हैं.

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ)  भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का छात्र संगठन है.सीपीआई इस देश की सबसे पुरानी कम्युनिस्ट पार्टी है और यह किसी भी तरह से अतिवादी नहीं है,9 फरवरी को जेएनयू  में जो कार्यक्रम हुआ एआईएसएफ उसके आयोजन में शामिल नहीं थी और ना ही जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने ऐसा कोई नारा लगाया था, जिन आजादी वाले नारों की बात की जा रही थी उसकी भी पोल खुल चुकी है यह नारे भूख, गरीबी, बेरोजगारी, पूंजीवाद आदि से आजादी को लेकर थे और दिखाए गये वीडियो क्लिप में इनके साथ छेड़छाड़ की गई थी.ऐसे में सवाल उठाना लाजिमी है कि इस तथाकथित आयोजन में जो लोग सीधे तौर पर शामिल थे उनको छोड़ कर सबसे पहले कन्हैया कुमार को क्यों गिरफ्तार किया गया, ऐसा करने के पीछे वास्तविक मंशा क्या थी? क्या यह मुख्यधारा के वाम को राष्ट्रद्रोही के तौर पर प्रचारित करने की साजिश नहीं थी? जिस तरह से इस मामले में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) के राष्ट्रीय सचिव  डी राजा को घेरने की कोशिश की गयी उससे भी इस आशंका को बल मिलता है,सबसे पहले भाजपा सांसद महेश गिरि द्वारा ट्वीटर पर डी राजा की बेटी की एक फोटो शेयर करते हुए दावा किया गया कि देश के खिलाफ नारेबाजी में वह शामिल थीं, इसी कड़ी में बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव एच राजा का बयान आया कि अगर डी राजा देशभक्त हैं तो उन्हें कम्युनिस्टों से कहना चाहिए कि वे जेएनयू में राष्ट्र विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए उनकी बेटी की गोली मारकर हत्या कर दें. इन सबके बाद पूरे वामपंथ और उदारवादियों को देशद्रोही साबित करने की एक मुहिम सी चल पड़ी, झूठ फैलाने के इस काम में पूरी मशिनरी को लगा दिया गया जिसमें मीडिया के एक हिस्सा भी शामिल है. इस कवायद का एक मकसद वामपंथ और संघ विचारधारा को चुनौती देने वाली अन्य आवाजों की छवि जनमानस में देशद्रोही के रूप में स्थापित करना था इसका कुछ असर होता भी दिखाई पड़ रहा था.

मार्च के पहले सप्ताह में आयोजित भारतीय जनता युवा मोर्चा के दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन के समापन भाषण में वित्तमंत्री अरूण जेटली ने वामपंथ पर हमला करते हुए कहा था कि जब-जब देश के सामने चुनौतियां आई हैं राष्ट्रवादी विचारधारा का मुकाबला साम्यवादी विचारधारा से हुआ है, उन्होंने यह भी कहा कि जेएनयू मामले में हमारी वैचारिक जीत हुई है, वहां देश तोड़ने के नारे लगे थे ऐसे में भाजपा की जिम्मेदारी बनी कि हम अपनी राष्ट्रीय जिम्मेदारी को आगे बढ़ाएं और उसमें हमारी विजय भी हुई है, विजय इस मायने में कि जो लोग देश के टुकड़े-टुकड़े का नारा लगाते हुए जेल गए, वो जब जेल से बाहर आए तो उन्हें जयहिन्द और तिरंगे के साथ भाषण देना पड़ा.

अरूण जेटली इसे भले ही अपनी वैचारिक जीत बता रहे हों लेकिन बिना किसी पुख्ता सबूत के कन्हैया कुमार की हड़बड़ी में की गयी गिरफ्तारी एक ऐसी गलती थी जिसके खामियाजे का उन्हें अंदाजा भी नहीं था,फिर जो कुछ भी पटियाला हाउस कोर्ट में हुआ और वहां हमले में शामिल तथाकथित वकीलों की स्टिंग ऑपरेशन व भाजपा के बड़े नेताओं के साथ उनकी तस्वीरों ने किये-धरे पर पानी सा फेर दिया. इसने पूरा पासा ही पलट दिया और जेल से वापस आने के बाद कन्हैया कुमार ने जिस आक्रमकता और तीखे तरीके से भाजपा, मोदी सहित पूरे संघ परिवार की विचारधारा पर हमला बोला वह दक्षिणपंथी खेमे के लिए निश्चित रूप से अप्रत्याशित रहा होगा. उन्होंने वाम को अपने ही खिलाफ एक ऐसा नेता दे दिया, जो वामपंथ के पारंपरिक “टर्मिनालाजी” से परहेज करता है,“लाल” और “नीले” को जोड़ने की बात करता है और जिसकी बातें आम जनता को समझ में आ रही हैं.

कन्हैया का उभार

कोर्ट में हमले के बाद जेएनयू परिसर में कन्हैया कुमार पर दोबारा हमले की कोशिश हुई है, हमलावर जेएनयू का छात्र नहीं है, उसका कहना था कि वह कन्‍हैया को 'सबक सिखाना' चाहता था. भाजपा के बड़े नेताओं और संघ परिवार के दूसरे संगठनों की तरफ से बौखलाहट में किये जा रहे जुबानी हमले देखते ही बन रहे हैं,उसके खिलाफ अफवाहें गढ़ने, दुष्प्रचार करने का काम भी बहुत जोर शोर से किया जा रहा है. लेकिन कन्हैया पर सबसे दिलचस्प हमला तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह से देखने को मिला है. एक तरफ संघ के सरकार्यवाह सुरेश भैयाजी जोशी का बयान आया कि देश में सुर-असुर की लड़ाई चल रही है और इसमें जीत हमारी होगी तो दूसरी तरह संघ विचारक मनमोहन वैद्य ने कन्हैया को चूहा बताया.

आखिरकार एक ग्रामीण और मध्यमवर्गीय पृष्टभूमि से आये इस 28 साल के नौजवान के अन्दर ऐसी क्या बात है कि सरकार पर काबिज होने और पूरे देश में अपने वैचारिक वर्चस्व के बावजूद भी वे उससे डरे हुए नजर आ रहे हैं और उन्होंने एक तरह से उसे ही अपना सबसे बड़ा 'टारगेट' बना लिया है,  दरसल बिना ठोस सबूतों के कन्हैया की गिरफ्तारी का दावं उल्टा पड़ गया, जमानत पर छूटने के बाद कन्हैया ने जो निडरता और वैचारिक दृढ़ता दिखाई है और जिस तरह से उनका नायकों की तरह स्वागत किया गया है इससे उनका कद बढ़ गया है, दक्षिणपंथियों ने एक तरह से दूसरे खेमे के एक नौजवान को हीरो बना दिया है. जेल से आने के बाद जिस तरह से कन्हैया ने पूरे देश को संबोधित किया है, दिल से कही गयी उनकी बातों में गहराई, मुहावरेदार भाषा व देसीपन, संजीदगी और हास्यबोध की मिलावट के साथ विरोधियों पर हमला करने के अंदाज ने उन्हें आकर्षण के केंद्र में ला दिया है उस भाषण में वह बातें थीं जो मौजूदा राजनीति के बड़े नेताओं में देखने को नहीं मिलती हैं, फिर कन्हैया ने जमानत मिलने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी सहित संघ को जिस तरह से आड़े हाथों लिया, उसने उन्हें मोदी और संघ विरोधियों का चहेता बना दिया और एक झटके में ही वे हिन्दुतत्ववादी राजनीति के खिलाफ एक चहेरा बन कर उभर गये.  

लेकिन ऐसा नहीं है कि संघ परिवार के हाथ कुछ नहीं लगा है, उन्हें एक और विभाजन की रेखा मिल गयी है और इसका नाम है “राष्ट्रवाद”. राष्ट्रवाद अब उनके लिए धुर्वीकरण का नया हथियार है जिसका इस्तेमाल आने वाले दिनों में चुनावी और वैचारिक राजनीति दोनों में देखने को मिलेगा. इस साल असम और पश्चिम बंगाल में जो चुनाव होने वाले हैं, वहां इस हथियार का चुनावी परीक्षण किया जाएगा. वैचारिक राजनीति में तो यह काम कब का शुरू हो गया है और पूरे देश में अंधराष्ट्रवाद की ऐसी हवा बना दी गयी है कि अगर आप सेना द्वारा देश के एक हिस्से में औरतों के साथ किये गये बलात्कार पर सवाल उठाते हैं तो आप को देशद्रोही घोषित किया जा सकता है और आप की पिटाई भी हो सकती है, अगर कोई शायर या कवि सरकार के खिलाफ अपनी रचना के माध्यम से आवाज उठाता है तो एक राष्ट्रीय टीवी चैनल द्वारा उसे देशद्रोही होने का फ़तवा सुना दिया जाता है.सोसायटी अगेंस्ट कनफ्लिक्ट एंड हेट(सच) नाम की संघ की एक करीबी संस्था है, “सच” का कहना है कि वह देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में मोदी सरकार के खिलाफ तैयार किए जा रहे माहौल के खिलाफ अभियान चलाएगी, और इस काम में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवादी सोच रखने वाले छात्रों, शिक्षकों व बुद्धिजीवियों को जोड़ा जाएगा.

संभावनायें और सीमायें

इस पूरे वैचारिक विभाजन में जो दूसरी तरफ खड़े थे उनमें और ज्यादा स्पष्टता आई है. इस दूसरे छोर पर वाम, दलित,आदिवासी, अल्पसंख्यक खड़े हुए हैं और अब ये एक दूसरे के करीब भी आ रहे हैं. थके और लगातार अपना प्रभाव खोते जा रहे भारतीय वामपंथ को पहले रोहित वेमुला  और उसके बाद  जेएनयू विवाद ने अपनी खोल से बहार आने का मौका दिया है. पिछले सालों में उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित चेतना का जिस तरह से उभार देखने को मिला है वह नया,निडर और जुझारू है, यह सामाजिक बदलाव की मांग कर रहा है और परम्परागत दलित आंदोलनों से अलग नज़र आ रहे है,जातिवादब्राह्मणवाद के खिलाफ यह नया उभार संघ को विचलित कर रहा है और वे नीले, लाल व अल्पसंख्यकों के गोलबंदी की किसी भी संभावना से खौफ खाते हैं.  

जाति के सवाल पर भारतीय वामपंथ की अस्पष्ट सोच और वर्ग पर केन्द्रित रहते हुए आर्थिक मसलों पर ही सबसे ज्यादा जोर देना उसकी सबसे बड़ी कमजोरी रही है,सामाजिक मसलों पर उनकी यह उदासीनता ही है जो उन्हें बहुजन–दलित ताकतों के निशाने पर लाती है. इसी तरह से परम्परागत  बहुजन–दलित ताकतों की आर्थिक व सांप्रदायिकता जैसे मसलों पर ढुलमुल व अस्पष्ट सोच देखने को मिलती रही है.
लेकिन इधर कुछ आत्मस्वीकृतियां और बदलाव भी देखने को मिल रहे हैं, हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित वेमुला व अम्बेडकर स्टूडेंटस एसोसिएशन के साथियों द्वारा “मुजफ्फरनगर अभी बाकी है” जैसी फिल्म दिखाया जाता है और याकूब मेनन की फासी का विरोध भी किया जाता है, इधर जेएनयू में कन्हैया 'नीला' और 'लाल' में मेल की बात कर रहे हैं, जेल से निकलने के बाद कन्हैया जातिवादब्राह्मणवाद के मुद्दे को अपने भाषणों के केंद्र में रखते हुए रोहित वेमुला का जिक्र करना नहीं भूलते हैं, जातिवादब्राह्मणवाद के खिलाफ इस स्पष्ट सोच का दूसरी तरफ से स्वागत भी किया जा रहा है, कन्हैया ने एक तरह से लाल और नीले रंग को राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया है. अब देखना यह है कि इस प्रतीक को धरातल पर उतारने के लिए दोनों तरफ से क्या प्रयास किये जाते  हैं. वामपंथ को भारतीय समाज को देखने–समझने के अपने पुराने वैचारिक ढांचे और रणनीति में बदलाव करते हुए जातिवादब्राह्मणवाद के खिलाफ एक स्पष्ट द्रष्टिकोण सामने लाना होगा, बहुजन-दलित संगठनों को भी वामपंथ के प्रति अपने द्रष्टिकोण को व्यापक करने की जरूरत है. भारत में ब्राह्मणवाद और पूँजीवाद के खिलाफ लड़ाई एक दूसरे के साथ आये बिना अधूरी है, यह एक लम्बी लड़ाई है जिसके सांझा प्रतीक बाबा साहेब अम्बेडकर और शहीद भगत सिंह ही होंगें l
निश्चित रूप से कन्हैया और रोहित वेमुला नई उम्मीद,अपेक्षाओं और संघर्षों के प्रतीक बन चुके हैं  लेकिन क्या भारत के वामपंथी और अंबेडकरवादी ताकतें खुद को इतना बदल पायेंगें कि वहां कन्हैया और रोहित को एक साथ अपने में समा सकें. यकीनन इसका जवाब भविष्य के गर्भ में है लेकिन बदलाव की एक लड़ाई तो छिड ही चुकी है और इस बार यह लडाई अन्दर और बाहर दोनों तरफ  होने वाली है. 
 - जावेद अनीस