सोमवार, 24 नवंबर 2014

मुसलमानों की राजनैतिक लामबंदी बदलता स्वरूप भाग.2

पिछले भाग में हमने देखा कि किस तरहए स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के मुस्लिम नेताओं ने मुसलमानों को धार्मिक.सांस्कृतिक मुद्दों पर लामबंद किया। परंतु चूंकि देश का विभाजन सांप्रदायिक आधार पर हुआ था इसलिए मुसलमानों द्वारा उनकी विशिष्ठ संस्कृति की बात करते ही हिंदू राष्ट्रवादी, इस्लामिक राज्य का हौव्वा खड़ा करने लगते थे। मुसलमानों की धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान की रक्षा के प्रयास को 'हिन्दू' संस्कृति पर हमले और उसके अस्तित्व के लिए खतरे के तौर पर देखा जाता था। इस सब के चलते,सन् 1980 के दशक में देश में सांप्रदायिक हिंसा में जबरदस्त तेजी आई। कांग्रेस, बाबरी मस्जिद को नहीं बचा सकी और मुसलमानों को लगा कि वह पार्टी उनके धार्मिक.सांस्कृतिक प्रतीकों की रक्षा करने में भी असफल है। अतः वे कांग्रेस से दूर होने लगे। क्षेत्रीय पार्टियों ने सुरक्षा के मुद्दे पर मुसलमानों को अपने पक्ष में लामबंद किया। परंतु वे समुदाय को एकसार मानते रहे एवं इन पार्टियों ने समुदाय की विविधतापूर्ण संस्कृति और उसके अलग.अलग तबकों के विविध हितों पर ध्यान नहीं दिया। सुरक्षा का मतलब सिर्फ यह था कि भविष्य में सांप्रदायिक दंगे नहीं होंगे। परंतु पूर्व में हुई सांप्रदायिक हिंसा के शिकार हुए लोगों को न्याय दिलवाने की बात ये पार्टियां नहीं करती थीं और ना ही यह गारंटी देने को तैयार थीं कि हिंसा दोहराई नहीं जाएगी। मोटे तौर पर, देश के पश्चिमी और उत्तरी हिस्सों में परिद्रश्य कुछ ऐसा ही था।
सुरक्षा के मुद्दे की वापसी
बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद मुसलमानों की संस्कृति और धर्म के ठेकेदार कांग्रेस से दूर हो गए। समुदाय ने शिक्षा और जीवनयापन से जुड़े मुद्दों पर ध्यान देना शुरू कर दिया। ऐसा लगता था कि आगे बढ़ने का यही एक रास्ता है। परंतु गुजरात के सन 2002 के मुस्लिम कत्लेआम के बाद, सुरक्षा की चिंता एक बार फिर महत्वपूर्ण बन गई, विशेषकर उत्तर भारत में। मुस्लिम मतदाता धीरे.धीरे कांग्रेस की ओर लौटने लगे। जहां सन् 2002 तक हिंदू राष्ट्रवादियों की नीति बड़े और भयावह दंगे कराकर मुसलमानों को निशाना बनाने  की थी वहीं 21वीं सदी के पहले दशक में, खुफिया एजेंसियों का इस्तेमाल मुसलमानों को निशाना बनाने और उन्हें राष्ट्रद्रोही, आतंकवादी और देश का दुश्मन सिद्ध करने के लिए किया जाने लगा। राजनैतिक संरक्षण प्राप्त गुजरात पुलिस के अधिकारी कभी भी कुछ मुस्लिम युवकों को मार डालते थे और उन्हें ऐसा आतंकी बताते थे जो हिंदू नायक नरेन्द्र मोदी की हत्या करना चाहते थे। खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों की कार्यवाहियों में सन् 2004 में इशरत जहां और जावेद शैख मारे गए तो 2005 में सोहराबुद्दीन शैख व कौसर बानो, 2006 में सोहराबुद्दीन का मित्र तुलसीराम प्रजापति, जमाल सादिक और कई अन्य। इन हत्याओं,जिन्हें 'मुठभेड़' बताया जाता था, के बाद मीडिया के जरिए मुस्लिम समुदाय के चेहरे पर कालिख पोतने की भरपूर कोशिश की जाती थी। इस तरह की फर्जी मुठभेड़ें कांग्रेस शासन में भी हुईं जिनमें से एक थी बाटला हाउस मुठभेड़। हर आतंकी हमले के बाद.फिर चाहे उसके शिकार मुसलमान ही क्यों न रहे हों.बड़ी संख्या में निर्दोष मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार कर लिया जाता था। उत्तर भारत में मुसलमान धीरे.धीरे कांग्रेस की तरफ आने लगेए विशेषकर उन राज्यों मेंए जहां की राजनीति द्विधुर्वीय थी और कांग्रेस और भाजपा के अतिरिक्त कोई तीसरी शक्ति अस्तित्व में ही नहीं थी। सन् 2004 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तरप्रदेश में 9 सीटें जीतीं और सन् 2009 में 15।
हालिया चुनाव में कांग्रेस मुसलमानों के केवल एक हिस्से को ही अपनी ओर आकर्षित कर सकी और वह भी धार्मिक.सांस्कृतिक मसलों को लेकर नहीं बल्कि उनकी सुरक्षा और बेहतरी के वायदों के बल पर। कांग्रेस सरकार ने मुसलमानों के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के अध्ययन के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जिसे सच्चर समिति के नाम से जाना जाता है। सच्चर समिति ने यह पाया कि मुसलमानों की सामाजिक.आर्थिक स्थिति बहुत खराब है और वे अन्य सभी समुदायों से काफी पीछे हैं। कांग्रेस सरकार ने अल्पसंख्यकों के लिए प्रधानमंत्री का 15 सूत्रीय कार्यक्रम भी लागू किया परंतु इसे लागू करने में भारी कोताही बरती गई।
मुस्लिम समुदाय के नेतृत्व के एक हिस्से ने पिछड़े मुसलमानों ही नहीं बल्कि सभी मुसलमानों को आरक्षण दिए जाने की मांग की और यह दावा किया कि पूरा मुस्लिम समुदाय ही पिछड़ा और भेदभाव का शिकार है। यह सही नहीं था। उदाहरण के लिए, अशरफ मुसलमान.ऊँची जातियों से धर्मपरिवर्तन कर बने मुसलमान.जैसे सैयद और पठान व व्यापारिक समुदाय जैसे बोहरा और मेमनए अन्य मुसलमानों की तुलना में कहीं अधिक पढ़े.लिखे और संपन्न थे। इसके अतिरिक्त, पूरे समुदाय को आरक्षण देना, धर्म के आधार पर भेदभाव करना होता जो कि संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 द्वारा प्रतिबंधित है। आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र की कांग्रेस सरकारों ने तकनीकी रूप से पिछड़ेपन के आधार पर परंतु व्यावहारिक तौर पर लगभग पूरे समुदाय को, आरक्षण प्रदान कर दिया। परंतु अदालतों ने पहले आंध्रप्रदेश और बाद में महाराष्ट्र सरकार के निर्णयों को रद्द कर दिया।
कांग्रेस, समुदाय के युवकों को खुफिया एजेंसियों से बचाने में असफल रही। कांग्रेस उन पुलिस अधिकारियों को सजा भी नहीं दिलवा सकी जिन्होंने फर्जी मुठभेड़ों में निर्दोष मुस्लिम युवकों की जान ली। फर्जी मुठभेड़ों का सिलसिला तब रूका जब कुछ साहसी व्यक्तियों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने ऐसी मुठभेड़ों में शामिल पुलिस अधिकारियों की पहचान कर उन्हें सजा दिलवाने की कोशिशें शुरू कीं। समुदाय के युवक गुस्से से उबल रहे थे और इस बारूद को एक तीली दिखाने भर की देर थी। मजलिस इत्तेहादुल मुसलमीन ने इसी गुस्से का लाभ उठाया। समुदाय को निशाना बनाए जाने के साथ ही शुरू हुआ राष्ट्रीय राजनीति में नरेंद्र मोदी का उदय। उन्होंने विकास का वायदा कर सत्ता पाने में सफलता हासिल कर ली। मोदी का प्रचारतंत्र चाहे कुछ भी कहे परंतु मुसलमान जानते हैं कि मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने का अर्थ है मुसलमानों को हिंदू राष्ट्र में दूसरे दर्जे के नागरिक बनाए जाने की गंभीर आशंका। हर लोकसभा चुनाव में सदन में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व घटता जा रहा है। जहां 1947 में यह 13.1 प्रतिशत था वहीं 16वीं लोकसभा में यह घटकर 4 प्रतिशत ;22 सांसद रह गया। यह तब जबकि मुसलमान कुल आबादी का लगभग 15 प्रतिशत हैं।
धर्मनिरपेक्ष पार्टियों से मोहभंग
निर्दोष मुस्लिम युवकों को निशाना बनाया जा रहा थाए समुदाय की बेहतरी की योजनाएं लागू नहीं की जा रही थीं और हिंदू राष्ट्रवादी दिन प्रति दिन और आक्रामक होते जा रहे थे। ऐसे में मुसलमानों का सभी 'धर्मनिरपेक्ष' पार्टियों से मोहभंग होने लगा। मौलाना मदनी और जमायत उलेमा.ए.हिंद, जो कि कांग्रेस के प्रति झुकाव रखते थे, तक ने यह प्रचार शुरू कर दिया कि कांग्रेस केवल हिंदू राष्ट्रवाद का डर दिखाकर मुसलमानों के वोट कबाड़ रही है। मौलाना मदनी और जमायत ने देश भर में कई सभाएं कीं जिनका एक ही संदेश था और वह यह कि केवल मुसलमानों को डराकर उनके वोट हासिल नहीं किए जा सकते। उनके वोट केवल उनकी भलाई के लिए सकारात्मक कदम उठाकर हासिल किए जा सकते हैं। ये कदम क्या होने चाहिए, इस बारे में इन सभाओं में कुछ भी नहीं कहा जाता था। इनमें मुसलमानों की न्यूनतम मांगे पूरी करने की मांग की जाती थी और वे थीं सन् 2006 के मालेगांव बम धमाकों के सिलसिले में आरोपी बनाए गए मुस्लिम युवकों की तुरंत रिहाई क्योंकि राष्ट्रीय जांच एजेंसी ;एनआईए ने उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं पाया था। इसके अलावा, स्वामी असीमानंद के इकबालिया बयान से साफ था कि इस घटना के पीछे हिंदू राष्ट्रवादी थे। उनकी अन्य मांगों में शामिल था निर्दोष मुस्लिम युवकों को फंसाने वाली खुफिया एजेंसियों के अधिकारियों के विरूद्ध कार्यवाही और नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में मुसलमानों के लिए आरक्षण। इमाम बुखारी ने कांग्रेस का साथ दिया परंतु मुसलमानों में बुखारी की पैठ कतई उतनी नहीं है जितनी कि समझी या मानी जाती है। और यह बात एक के बाद अनेक चुनावों में साबित हुई है।
जहां'धर्मनिरपेक्ष पार्टियां' असफल हो गई थीं और मुसलमानों का उनसे मोहभंग हो गया था वहीं मुसलमानों की बहुलता वाले राजनैतिक दलों की स्थापना करने का दबाव बढ़ रहा था। सन् 2008 में मोहम्मद अय्यूब नाम के एक मुस्लिम सर्जन ने उत्तरप्रदेश में पीस पार्टी की स्थापना की। सन् 2012 के विधानसभा चुनाव में इस पार्टी ने चार सीटें जीतीं। जल्दी ही पीस पार्टी, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, दिल्ली, मध्यप्रदेश,राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा व छत्तीसगढ़ में फैल गई। मुसलमानों के अधिकांश वोट पीस पार्टी को मिलने लगे। केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग मुसलमानों के बीच लोकप्रिय थी।
मालेगांव में बम धमाकों के बाद मुफ्ती इस्माईल की लोकप्रियता बढ़ने लगी। समुदाय में जबरदस्त गुस्सा था क्योंकि मुसलमानों को लगता था कि उनके युवकों को बम धमाकों के मामले में झूठा फंसाया गया है। मालेगांव नगर निगम के सन् 2007 के चुनाव के पहलेए तीसरी महाज या तीसरा मोर्चा बनाया गया और वह कांग्रेस व एनसीपी विरोधी लहर के चलते नगर निगम में सत्ता में आ गया। मुफ्ती इस्माईल ने सन् 2009 का विधानसभा चुनाव जनसुराज्य शक्ति पार्टी के टिकट पर लड़ा और कांग्रेस उम्मीदवार व तत्कालीन विधायक शैख रशीद को हरा दिया। परंतु बाद में मुफ्ती ने एनसीपी की सदस्यता ले ली। पिछले विधानसभा चुनाव में मुफ्ती इस्माईल को कांग्रेस उम्मीदवार शैख रशीद के हाथों हार झेलनी पड़ी। इसका मुख्य कारण यह था कि मुफ्ती ने अपने वायदे पूरे नहीं किए।
महाराष्ट्र में एमआईएम व मुस्लिम.बहुल पार्टियों का उदय
महाराष्ट्र में एमआईएम के उदय को इसी पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए। मजलिस.ए.इत्तेहाद.अल. मुसलमीन की स्थापना 1927 में हैदराबाद के तत्कालीन शासक को सलाह देने और उनका समर्थन करने के लिए हुई थी। यह सभी मुस्लिम पंथों और बिरादरियों का मिलाजुला संगठन था। रजाकारों की हार और हैदराबाद के भारतीय संघ में विलय के बाद, एमआईएम सन् 1957 तक निष्क्रिय रही। इस साल उसे सुल्तान सलाउद्दीन ओवैसी ने पुनर्जीवित किया 'ताकि आपके ;मुसलमान तबको  को राजनैतिक बल मिल सके'। सन् 1960 में एमआईएम ने हैदराबाद नगर निगम की 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और इनमें से 19 पर जीत हासिल की। 1967 में एमआईएम के तीन उम्मीदवार विधानसभा सदस्य चुने गए। आंध्रप्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी के उदय के बाद, एमआईएम ने यह भविष्यवाणी की कि हैदराबाद के गैर.मुस्लिम वोट, तेलुगूदेशम और कांग्रेस के बीच बंट जाएंगे। एमआईएम अपने भड़काऊ वक्तव्यों के लिए जानी जाती है। उसे सन् 1984 के आम चुनाव में 35 प्रतिशत मुस्लिम मत प्राप्त हुए और तब से लेकर आज तक वह चुनावों में जीत हासिल करती आई है। एमआईएम ने पिछले कुछ वर्षों में एमआईएम.भीम एकता का नारा देकर दलित मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयास भी किया है।
तेलंगाना के बाहर, एमआईएम ने अपनी पहली बड़ी जीत नांदेड़ नगर निगम चुनाव में हासिल की। नांदेड़ में मुसलमान, आबादी का लगभग 30 फीसदी हैं और सन 2012 में हुए चुनाव में एमआईएम ने 81 में से 11 सीटें जीतीं। यह औरगांबाद, मालेगांव आदि के निर्दोष मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी और उन्हें आतंकवाद संबंधी मामलों में फंसाए जाने की प्रतिक्रिया थी। हालिया विधानसभा चुनाव में औरगांबाद केंद्रीय सीट से इम्तियाज़ ज़लील और मुंबई की बायकुला सीट से वारिस पठान की जीत भी इन्हीं कारणों से हुई।
निष्कर्ष
महाराष्ट्र के दो चुनाव क्षेत्रों में एमआईएम की विजय के बाद एक मुस्लिम युवक ने इन पंक्तियों के लेखक से कहाए ' हम हिंदू राष्ट्रवादियों के बढ़ते प्रभाव से डरते नहीं हैं, हम सभी परिणाम झेलने को तैयार हैं। जो कुछ हो चुका है उससे बुरा कुछ नहीं हो सकता। अब हमें अपनी मांगे मनवानी ही होंगी'। एमआईएम की आक्रामक और भड़काऊ राजनीति की जीतए दरअसल, सभी ' धर्मनिरपेक्षष् पार्टियों की हार है। ये पार्टियां न तो राज्य में कानून के शासन की रक्षा कर सकीं और ना ही राज्य का हिंदूकरण रोक सकीं। एमआईएम, दरअसल, मोदी की भाजपा की प्रतिकृति है। जिस तरह मोदी बहुसंख्यक समुदाय के युवकों  की महत्वाकांक्षाओं को भुना रहे हैं उसी तरह एमआईएम मुस्लिम युवकों की इच्छाओं.आकांक्षाओं से खेल रही है। एमआईएम मुस्लिम युवकों को 'मुस्लिम राजाओं के गौरवशाली इतिहास' के झूठे अहंकार से भर रही है। मीडिया हमें बताती है कि मोदी अब सांप्रदायिक एजेण्डे पर नहीं चल रहे हैं। उन्हें उसकी जरूरत भी नहीं है। लोग यह जान गए हैं कि उनका ब्रांड क्या है और योगी आदित्यनाथ व मोदी के अन्य चेले सांप्रदायिक और भड़काऊ बातें कहने में जरा भी नहीं सकुचाते। परंतु हम सब को समझ लेना चाहिए कि अंततः यह सांप्रदायिक प्रतियोगिता भारत के संवैधानिक प्रजातंत्र को ही निगल लेगी। जो लोग भारतीय संविधान,कानून के राज, उदारवादी मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता के प्रति प्रतिबद्ध हैं, उनकी यह जिम्मेदारी है कि वे भारत के लोगों को यह समझाएं कि देश को आज एक स्वस्थ्य नागरिक आंदोलन की जरूरत है जो अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करे और जिसकी विविधता और बहुवाद में पूरी आस्था हो।
-इरफान इंजीनियर

शनिवार, 22 नवंबर 2014

गुजरात की जेलों में कैदियों की दुर्दशा

किसी देश में कानून की हुकमरानी को परखने के लिए उसकी जेलों में बंद कैदियों के साथ किए जाने वाले व्यवहार से बेहतर कोई कसौटी नहीं हो सकती। यह सही भी है क्योंकि कैदी के हाथ, पैर, ज़बान हर चीज़ जेल प्रशासन के अधीन हो जाता है। ऐसी ही स्थिति में  अधिकार प्राप्त व्यक्ति या समूह के आचरण की पहचान होती है। लोकतंत्र में हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि आपका आचरण कानून की मंशा के अनूरूप हो। लेकिन क्या ऐसा वास्तव में है?
हिरासत में मौत की घटनाएं, कैदियों के साथ मारपीट, अन्य प्रकार की शारीरिक एंव मानसिक यातनाओं की खबरें इसे नकारती हैं। अगर कैदी पर आतंकवादी या माओवादी गतिविधियों में लिप्त होने का आरोप है तो कुछ भी असम्भव नहीं। जेल में उन्हें किस प्रकार यातनाएं दी जाती हैं उसकी ताज़ा मिसाल अहमदाबाद जेल है जहां आतंकवाद के आरोप में बंद कैदियों ने 15 अक्तूबर से अनशन शुरू कर दिया।
इन कैदियों का आरोप है कि फरवरी 2013 से उन्होंने सूरज की रोशनी नहीं देखी। उनके बैरक में ही बने अंडा सेल में उन्हें कैद रखा जाता है और दिन में थोड़े समय के लिए सेल से बाहर बैरक में निकाला जाता है जहां सूर्य के प्रकाश का प्रवेश भी वर्जित है। इन विचाराधीन कैदियों को जेल में समाचार पत्रों और पत्रिकाओं की सुविधा को समाप्त कर दिया गया। घर से आने वाले जिन पत्रों को सेंसर के बाद उन्हें दिया जाता था वह भी जेल प्रशासन ने बंद कर दिया। दूरस्थ शिक्षा प्रणाली के तहत पढ़ने वाले लड़कों की लाइब्रेरी की सुविधा पर भी विराम लगा दिया गया। कुल मिलाकर ऐसी परिस्थिति उत्पन्न कर दी गई जिसमें कैदियों के लिए अपना मानसिक संतुलन बनाए रख पाना भी बड़ी चुनौती हो जाती है। अहमदाबाद जेल में फरवरी 2013 के सुरंग कांड
के बाद से ही यह स्थिति बनी हुई थी। इस बीच लड़कों ने कई बार जेल प्रशासन से इस अमानवीय व्यवहार को बंद करने और जेल मैनुअल लागू करने की बात की लेकिन इसका सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। हौसला डाट नेट के अनुसार जेल प्रशासन ने पहले तो अनशन करने वालों के खिलाफ हत्या के प्रयास का मुकदमा
दर्ज कर दमन करने की कोशिश की। लेकिन अनशन जारी रहा। कुछ कैदियों के बिगड़ते स्वास्थ को देख कर जेल प्रशासन ने गृहविभाग को पत्र लिख कर स्थिति से अवगत कराया। अंत में यह अनशन 24 अक्तूबर को तब समाप्त हुआ जब एडिशनल चीफ सेक्रेटरी एसके नन्दा ने इन कैदियों की मांगों को स्वीकार करते हुए दिन में एक बार दो-दो या तीन-तीन की संख्या में कैदियों को बाहर निकालने का आश्वासन दिया। इस पूरे घटनाक्रम को देखने के बाद यह तो स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि मामला प्रशासनिक नहीं राजनीतिक है।
साबरमती जेल सुरंग कांड जिसकी लम्बाई, चैड़ाई और गहराई क्रमशः 220 फीट, 4 फीट और 7 फीट बताई गई और कहा गया कि उसकी खुदाई में चम्मच, टूथ ब्रश, थाली, लुंगी आदि औज़ारों का प्रयोग किया गया, जो अपने आप में एक बड़ा सवाल है। इसके अलावा इस खुदाई से निकलने वाली मिट्टी का आयतन आठ से नौ
हज़ार क्यूबिक फीट होता है जिसे किसी घास के नीचे छुपा देना किसी चमत्कार से कम नहीं हो सकता।
बम धमाकों के कैदियों के साथ इस तरह की साजि़शें पहले भी होती रही हैं। आजमग़ढ़ के सलमान पऱ तिहाड़ जेल में हमला, बिहार के दरभंगा निवासी कतील सिद्दीकी की पुणे जेल में हत्या, जेल प्रशासन द्वारा अन्य कैदियों को उनके साथ हिंसा करने के लिए उकसाने का ही नतीजा थी। खालिद मुजाहिद की फैज़ाबाद पेशी से लौटते हुए मौत जिसे परिजन और मानवाधिकार एंव सामाजिक संगठन हत्या मानते हैं तो इस संदर्भ में सबसे
चर्चित घटना है।
लखनऊ जेल में आतंकवाद के आरोप में विचाराधीन कैदी नौशाद को जेल के एक बड़े अधिकारी ने आतंकवाद के एक अन्य आरोपी तारिक कासमी पर हमला करने के लिए प्रेरित करने का प्रयास किया था। नौशाद ने यह आरोप लगाते हुए अपने अधिवक्ता को एक पत्र भी लिखा था। तारिक कासमी ने बाद में इस आरोप की पुष्टि भी की थी। इतना ही नहीं उसी जेल में बंद पाकिस्तानी कैदियों से भी उन्हें लड़ाने कोशिश उक्त अधिकारी ने की थी, जिससे दो देशों के बीच कटुता उत्पन्न होने का भी खतरा पैदा हो सकता था। जाहिर है ये घटनाएं इस ओर
इशारा करती हैं कि राज्य अपने अधीन रह रहे कैदियों को जेल मैन्यूअल के मुताबिक उनके वाजिब अधिकार भले न देता हो लेकिन वह उनके नाम पर अपनी राजनीतिक जरूरतों को जरूर पूरा करने की फिराक में रहता है। देश के अंदर भी और बाहर भी।
आज जबकि ह्यूमन राइट्स चार्टर में भी कैदियों के अधिकारों को परिभाषित किया गया है। दुनिया के सभी लोकतांत्रिक देशों में जेल मैनुअल का प्रावधान है, जिसके तहत उन्हें जेल में कई तरह के अधिकार दिए गए हैं।
भारत में अंग्रेज़ों का बनाया हुआ जेल मैनुअल है जो निश्चित रूप से भारतीय कैदियों के दमन के मकसद से तैयार किया गया था। लेकिन भारत की जेलों में कैदियों को उतने भी अधिकार पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, जो अंग्रेज गुलाम भारत के कैदियों को देते थे। देश की आज़ादी के सिपाहियों को अंग्रज़ों की जेलों में इस प्रकार की यातनाएं नहंीं दी जाती थीं हालांकि उनका शुमार अंग्रेज़ सरकार दुश्मन और गद्दार के तौर पर ही
करती थी। क्या यह मान लिया जाए कि जेलों के मामले में हमारी समझ और सभ्यता अभी उस ज़माने के अंग्रेज़ों के स्तर तक नहीं पहुंची है।
-मसीहुददीन संजरी

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

औरंगाबाद के आरोपी गुजरात बम विस्फोट मामले में 3 आरोपी आरोप मुक्त

 

 मुंबई : आठ मई, 2006 को एटीएस ने औरंगाबाद के निकट एक टाटा सुमो और इंडिका कार से हथियार और विस्फोटक बरामद गिए थे। जिसमें आर्थर रोड जेल में बंद तीन आरोपियों को एक साजिश के तहत अहमदाबाद बम विस्फोट में भी अभियुक्त बना दियागया था और उसकी सूचना आरोपियों तथा उनके वकीलों को नहीं दी गयी .
फरवरी 2006 के विस्फोट की साजिश में उनकी कथित संलिप्प्ता के लिए अफरोज पठान , बिलाल अहमद उर्फ बिलाल कातिब  और मुस्तफा सैय्यद को अहमदाबाद की मेत्रोपोलियन अदालत ने आरोप मुक्त कर दिया था यह तीनो आरोपी औरंगाबाद के मामले में मई 2006 से कारगार में निरुद्ध थे . जमियत उलमा जो एक सामाजिक धार्मिक संगठन है तथा बेगुनाह मुस्ली नवजवानों को विभिन्न आतंकवादी गतिविधियों में निरुद्ध नवजवानों की रिहाई में मदद करता है ने अपने वकील शाहिद नदीम को इस केस पर काम करने के लिए नियुक्त किया इस सम्बन्ध में शहीद नदीम ने अहमदाबाद पुलिस से सूचना अधिकार अधिनियम के तहत सूचनाएं मांगी किन्तु गुजरात पुलिस ने इस बिनाह पर सूचना देने से इनकार कर दिया कि जांच में उनको सम्मिलित नहीं किया जा सकता है और जांच प्रभावित हो सकती है . अधिवक्ता डी डी पठान ने अहमदाबाद की अदालत से सभी कागजात कानूनी तौर से प्राप्त किये इन तीनो आरोपियों को अहमदाबाद की अदालत में 12 जून को पहली बार पेश किया गया . गुजरात ए टी एस ने साक्ष्यों के अभाव में अंतर्गत धरा 169 सी आर पी सी के तहत प्रार्थना पत्र दिया जिस पर न्यायलय ने इन तीनो आरोपियों को आरोप मुक्त करने का आदेश दे दिया इसके पूर्व गुजरात मामले में मोहम्मद इलियास मेनन व कांसटेबल कमलेश भगोरा को पहले ही न्यायलय आरोप मुक्त कर चुकी है .

तीनो आरोपियों को गुजरात पुलिस ने कहा था कि उन्हें एक आतंकी संगठन का समर्थन प्राप्त है जो राष्ट्र के खिलाफ युद्ध छेड़ने और एक प्रतिबंधित संगठन के साथ सहयोग कर रही है, आपराधिक षड्यंत्र के आरोप में गिरफ्तार किया गया था . औरंगाबाद मामले में चार अन्य अभियुक्त  शकील आमिर, आकिफ बियावानी , असलम कश्मीरी और सय्येज़ ज़ाबिहुद्दीन उर्फ अबू जुन्दल  सामना कर रहे हैं गुजरात मामले में निशान जुन्दल  मुंबई में 26/11 के आतंकी हमलों में एक प्रमुख संदिग्ध है और 26 नवंबर 2008 को मुंबई में 166 लोग मारे गए हैं, जो पाकिस्तानी आतंकवादियों के एक हैंडलर के रूप में वर्णित किया गया था
  
शाहिद नदीम ने बताया कि आरोप मुक्त करने के आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि प्राप्त करने के लिए प्रार्थनापत्र दे दिया गया है , जिसकी नक़ल औरंगाबाद मामले में मकोका अदालत में दाखिल की जाएगी.  जिससे इन आरोपियों की बेगुनाही साबित हो सकेगी .















गुरुवार, 20 नवंबर 2014

मानव शरीर पर हाथी का सिर!


पौराणिक कथाओं का जादूभरा संसार
बचपन में जो चीजें मुझे सबसे अच्छी लगती थीं उनमें से एक थी पौराणिक कथाएं सुनना। मैं उस दुनिया में खो जाता था जिसमें भगवान हनुमान, अपनी श्रद्धा के पात्र श्रीराम के भाई लक्ष्मण की जान बचाने के लिए हवा में उड़कर जड़ीबूटी लेने जाते हैं, भगवान राम, पुष्पक विमान में यात्रा करते हैं और जब भगवान गणेश के पिता, उनका सिर काट देते हैं तब उनके धड़ पर हाथी का सिर लगाकर उन्हें पुनर्जीवित किया जाता है। इन सब बातों पर मैं कोई प्रश्न नहीं उठाता था। मैं आसानी से यह स्वीकार कर लेता था कि कर्ण, अपनी माँ के कान से पैदा हुआ था और गांधारी के गर्भ से निकले पिंड को सौ भागों में बांटकर, सुरक्षित रख देने से कौरव पैदा हुए थे। ये सभी कल्पनाएं इतनी रंगीन और मन को लुभाने वाली थीं कि उन पर शंका करने का मेरा कभी मन ही नहीं हुआ। मैं जब बड़ा हुआ तो विज्ञान से मेरा साबका पड़ा। और फिर करीब एक दशक तक मैं मेडिकल कॉलेज की कठिन पढ़ाई से गुजरा। इस नये ज्ञान ने मुझे मेरे पौराणिक नायकों की कथाओं पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया। शनैः शनैः मुझे यह समझ में आया कि तथ्य और फंतासी, इतिहास और पुराण अलग.अलग चीजें हैं। उस कल्पना की सुंदरता और उन कथाओं की मनमोहकता अब भी मेरे हृदय के किसी कोने में जीवित है परंतु वह मेरी दुनियावी सोच व समझ की निर्धारक नहीं है।
मेडिकल कॉलेज में पढ़ाई के दौरान, मुझे यह समझ में आया कि मानव शरीर कितना जटिल है। हम रक्त समूहोंए शरीर की प्रतिरक्षा प्रणालियों, ऊतकविकृतिविज्ञान व जैवअनुकूलन आदि के बारे में जानते हैं। अगर हम भगवान गणेश के हाथी के सिर वाली कथा पर तार्किकता से विचार करें तो हम कई प्रश्नों से घिर जाएंगे। अगर किसी का सिर, उसके धड़ से अलग कर दिया जाए तो वह कितने मिनिट जीवित रह सकता है? सिर में ही मस्तिष्क होता है जो हमारे शरीर की सारी गतिविधियों, जिनमें श्वसन और दिल का धड़कना शामिल है,को नियंत्रित करता है। प्रश्न यह है कि कोई व्यक्ति, जिसका सिर काट दिया गया हो, कितने वक्त तक अपने कटे हुए अंग के प्रत्यारोपण का इंतजार कर सकता है और वह भी हाथी के सिर का। मनुष्य और हाथी के शरीर की प्रतिरक्षा प्रणालियों में क्या अंतर हैं? एक मनुष्य की किडनी के दूसरे मनुष्य में प्रत्यारोपण के पहले सैंकड़ों टेस्ट किए जाते हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि दानदाता की किडनी को प्राप्तकर्ता का शरीर स्वीकार करेगा या नहीं। मोदी के अनुसार, प्राचीन भारत में अंग प्रत्यारोपण की ऐसी तकनीक उपलब्ध थी जो आज भी विज्ञान हमें सुलभ नहीं करा सका है।
गर्भ से निकले हुए पिंड को क्या सौ भागों में विभाजित किया जा सकता है? निषेचित डिंब ;फर्टिलाईज्ड ओवमद्ध को सौ भागों में विभाजित करने के लिए कितने उच्च दर्जे की माइक्रोसर्जरी की आवश्यकता पड़ेगी?क्या गर्भाशय, कान के पास हो सकता है? मुझे यह पक्का विश्वास है कि ये सारे प्रश्न उन डाक्टरों के दिमाग में आए होंगे, जिन्हें उनके अस्पताल के उदघाटन के अवसर परए प्रधानमंत्री का भाषण सुनने का सौभाग्य मिला। उन्होंने अपने भाषण में कहा, 'हमारे देश ने एक समय चिकित्साशास्त्र में जो उपलब्धियां हासिल की थीं उन पर हम गर्व महसूस कर सकते हैं। हम सबने महाभारत में कर्ण के बारे में पढ़ा है। अगर हम थोड़ी गहराई से सोचें तो हमें यह समझ में आएगा कि कर्ण अपनी मां के गर्भ से पैदा नहीं हुआ था। इसका अर्थ यह है कि उस समय अनुवांशिकी विज्ञान था। तभी कर्ण अपनी मां के गर्भ के बाहर जन्म ले सका .हम सब भगवान गणेश की पूजा करते हैं। उस समय कोई न कोई प्लास्टिक सर्जन रहा होगा जिसने मानव शरीर पर हाथी का सिर फिट कर दिया और प्लास्टिक सर्जरी की शुरूआत की'।
मुझे उम्मीद है कि जिस अस्पताल का उदघाटन प्रधानमंत्री ने किया, वहां के डाक्टरों का इस तरह की चमत्कारिक शल्य चिकित्सा करने का इरादा नहीं है और वे मनुष्य के धड़ पर जानवरों के सिर लगाने व निषेचित डिंब को सौ टुकड़ों में बांटने जैसे अभिनव प्रयोग नहीं करेंगे। इस देश में कई ऐसे लोग होंगे जो प्रधानमंत्री द्वारा भारत के अतीत का महिमामंडन करने से बहुत प्रसन्न हुए होंगे। प्रधानमंत्री चाहे जो भी कहें या सोचें, सत्य यही है कि प्राचीन भारत, पशुपालक समाज रहा होगा या उसमें खेतीबाड़ी की शुरूआत भर हुई होगी। मनुष्य ने आखेट कर अपना पेट भरना बंद किया ही होगा। जाहिर है कि तथ्य, प्रधानमंत्री की सोच से मेल नहीं खाते।
इन कहानियों के सही होने की कोई संभावना नहीं है। महाभारत और रामायण में जो कुछ बताया गया है उसे व्यवहार में लाना असंभव है। हमारी दुनिया ने भौतिकी, खगोल.विज्ञान, फिजियोलॉजी आदि में कल्पनातीत प्रगति की है परंतु आज भी मोदी जिन 'गौरवपूर्ण उपलब्धियों' की बात कर रहे हैंए उनका सपने में भी सच होना संभव नहीं है। विज्ञान ने पिछली कुछ सदियों में बहुत तेजी से प्रगति की है और आज का मानव समाज कुछ सौ सालों पहले के समाज की तुलना में बहुत ज्यादा जानता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्राचीन भारत की कुछ उपलब्धियां थीं, जिन्हें हमें रेखांकित करना चाहिए और प्राचीन भारतीयों के ज्ञान और उनकी तार्किक कार्यशैली पर प्रकाश डालना चाहिए। इनमें से कुछ का संबंध चरक संहिता व सुश्रुत संहिता से है। ये दोनों पुस्तकें चिकित्साशास्त्र और शल्यक्रिया की तकनीकों के बारे में हैं। आर्यभट्ट के खगोल विज्ञान में योगदान को भुलाया नहीं जा सकता और ना ही इस तथ्य को नजरअंदाज किया जा सकता है कि शून्य का आविष्कार भारत में हुआ था। महत्वपूर्ण यह है कि हम देश में ऐसी तार्किक सोच का विकास करें, जिससे हम ज्ञान की अगली सीढि़यां चढ़ सकें और ऐसी तकनीकों व तरीकों को सीख सकें जिनसे हमारे वर्तमान वैज्ञानिक ज्ञान में वृद्धि हो सके।
ऐसा नहीं है कि इस तरह की पौराणिक कल्पनाएं केवल भारत तक सीमित रही हों। सभी पुरातन सभ्यताओं में दिलचस्प मिथक रहे हैं। मिस्त्र में प्रागैतिहासिक काल के क्लियोपेट्रा के किस्सों से हमें पता चलता है कि संभवतः अन्य मिस्त्र वासियों की तरह, क्लियोपेट्रा कई ऐसे भगवानों में आस्था रखती थीं जिनके सिर, जानवरों के थे। उदाहरणार्थ, हैड्जवर का सिर लंगूर का था और एन्यूबिस का लोमड़ी का। अगर मोदी और उनके कुल के अन्य सदस्य मिस्त्र की इन प्राचीन आस्थाओं के बारे में जानते होते तो शायद वे अब तक यह कहने लगते कि प्राचीन भारत ने मिस्त्र तक अपने ज्ञान का निर्यात किया। वे कहते कि क्या यह मात्र संयोग है कि हमारे भगवान गणेश की तरह के देवता अन्य सभ्यताओं में भी थे? क्या यह भी प्लास्टिक सर्जरी का मामला है या कल्पना की उड़ान?  मिस्त्र और चीन की पौराणिक कथाओं में इस तरह के अनेक काल्पनिक चरित्र हैं।
हम केवल आशा कर सकते हैं.और ईश्वर से प्रार्थना भी.कि सत्ताधारी, इन फंतासियों का अध्ययन करने के लिए सरकारी धन का दुरूपयोग न शुरू कर दें। एक आम आदमी यह विश्वास कर सकता है कि भगवान राम पुष्पक विमान में यात्रा करते थे या कोई और व्यक्ति उड़ने वाली कालीन पर बैठकर पलक झपकते ही कहीं से कहीं पहुंच जाता था। परंतु यदि वे लोग इन बातों पर विश्वास करने लगेंगे जो सत्ता में है तो इस बात की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि जनता के पैसे का इस्तेमाल इन फंतासियों पर 'शोध'  करने के लिए किया जाने लगेगा। पाकिस्तान में जिया.उल.हक के शासनकाल में बाकायदा संगोष्ठी आयोजित कर इस बात पर विचार किया गया था कि देश में बिजली की कमी को जिन्नात की सहायता से कैसे पूरा किया जा सकता है। देश में ऐसा वातावरण बना दिया गया था कि सारा ज्ञान पहले से ही हमारी पवित्र धार्मिक पुस्तकों में मौजूद है। आश्चर्य नहीं कि संगोष्ठी में एक 'वैज्ञानिक' का 'शोधपत्र' इसी पर आधारित था कि जिन्नात अक्षय ऊर्जा के स्त्रोत हैं और उनका इस्तेमाल कर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि पाकिस्तान में बिजली की कोई कमी ही न रह जाए। हमें उम्मीद है कि पाकिस्तान सरकार ने जिन्नात पर शोध के लिए सरकारी धन आवंटित नहीं किया होगा। वैसे भी, विज्ञान का संबंध किसी धर्म या देश से नहीं होता। हिंदू विज्ञान और मुस्लिम विज्ञान जैसी कोई चीज नहीं होती।
व्यक्तिगत स्तर परए देश के लोग यह विश्वास करने के लिए स्वतंत्र हैं कि पुराणों में लिखा एक.एक शब्द सत्य है। परंतु अगर सरकार का मुखिया यह मानने लगेगा कि फंतासी ही इतिहास है तो मुश्किल हो जाएगी। इससे वैज्ञानिक और तार्किक सोच को गहरा धक्का लगेगा। पौराणिक कथाओं, धर्म और राजनीति का मिश्रण हालात को और खराब कर देगा। विभिन्न पौराणिक कथाओं के बीच अपनी.अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का संघर्ष शुरू हो जाएगा। हम तो यही चाहेंगे कि वह दिन कभी न आए जब जिन्नात बिजली का समस्या का हल करें और गणेश जी की प्लास्टिक सर्जरी हो।
- राम पुनियानी

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

नागपुरी आतंकवाद का असली चेहरा सामने आया

क्या यह नये आतंकियों को तैयार करने की नर्सरी नहीं है
1925 के जन्मकाल से जो विष बेल समाज में बोई गयी थी उसका असर 30 जनवरी 1948 राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की हत्या के रूप में आया था . तत्कालीन गृह मंत्री पटेल ने नागपुरी आतंकवाद पर प्रतिबन्ध लगा दिया था किन्तु तमाम सारे माफीनामे लिखने के बाद सिर्फ सांस्कृतिक कार्यों को करने की छूट मिली थी . भारत सरकार ने इस आतंकवाद के सम्बन्ध में ध्यान नहीं दिया जिसके फलस्वरूप 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी मस्जिद का ध्वंस नागपुरी आतंकवाद की बड़ी घटना थी . 
      देश के अन्दर नागपुरी आतंकवादियों ने पूरे समाज में एक विष घोल दिया है और हिन्दू समाज के धार्मिक पुरुषों के स्थान पर राजनीती करने वाले तथा अपराधी तथ्यों का एक बड़ा तबका हिन्दू धर्म के मतावलंबियों की आस्था का लाभ उठा कर नये नये मठ व आश्रम खोल कर आतंकी घटनाओ को करने में लग गया है . बम्बई एटीएस चीफ हेमंत करकरे ने बहुत सारे नागपुरी आतंकवादियों को पकड़ कर विभिन्न बम विस्फोटों का पर्दाफाश किया था किन्तु मुंबई आतंकी घटनाओ में उनकी टीम शहीद हो गयी थी किन्तु दुर्भाग्यवश देश की राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी बदली की व्यापारी, अपराधी व चरित्र हीनता की पराकाष्ठा को पीछे छोड़ चुके कथित संतों की एक पूरी जमात तैयार हुई जो देश और प्रदेश की राजनीति की दिशा व दशा तय करने लगी. बड़े-बड़े राजनेता उनके भक्त हो गए . आज हरियाणा के सतलोक आश्रम में कथित संत रामपाल की गिरफ्तारी को लेकर हरियाणा सरकार बनाम रामपाल का युद्ध कई दिनों से चल रहा है . एक दिन का खर्चा लगभग 6 करोड़ रुपये आ रहा है  डीजीपी ने मौत के दावे को झूठा करार दिया है। उन्होंने कहा कि संत के समर्थकों के हमले में 105 पुलिसवाले जख्मी हो गए हैं। उन्होंने बताया कि दो पुलिसवालों को गोलियां लगी हैं। पुलिस महानिदेशक का कहना है कि रामपाल अब भी आश्रम में ही हैं जिन्हें बचाने के लिए कई लोगों को 'बंधक बनाकर' आश्रम में रखा गया है। . काफी लोगों के हताहत होने के समाचार मिल रहे हैं .
हरियाणा की पुलिस मोदी भक्त आज तक के रिपोर्टर नितिन जैन,  मीडिया वालों से मारपीट की और उनके कैमरे भी तोड़ दिए। पुलिस ने घटनास्थल पर रिपोर्टिंग कर रहे टाइम्स नाउ के अलावा एबीपी न्यूज के कैमरे तोड़ डाले। इंडिया न्यूज व अन्य कई चैनलों और अखबारों के पत्रकारों को चोटें आई हैं। डीजीपी की इजाजत से प्रेस भी पूरे वाकये को कवर कर रही थी, तो अचानक पुलिस ने मीडियाकर्मियों पर भी हमला बोल दिया। हमले में कई चैनलों और अखबारों के पत्रकार घायल हो गए हैं। एनडीटीवी के भी छह मीडियाकर्मियों को चोट लगी है। एनडीटीवी के लाइव कवरेज से जुड़े कई उपकरण और कैमरे पुलिसकर्मियों ने तोड़ दिए हैं।
लाठीचार्ज में एनडीटीवी के पत्रकार सिद्धार्थ पांडेय, पत्रकार मुकेश सेंगर, कैमरामैन सचिन गुप्ता, कैमरामैन फ़हद तलहा, कैमरामैन अश्विनी मेहरा और कैमरा सहयोगी अशोक मंडल घायल हुए हैं।पत्रकारों को घटनास्थल से करीब 2 किलोमीटर दूर खदेड़ दिया गया है।
कथित आतंकवादियों को कब्जे में करने की कार्यवाई करने के साथ हरियाणा सरकार मीडिया कर्मियों की पिटाई इस कारण से भी कर रही है कि हमारे हिसाब से चलो अन्यथा यह ट्रेलर पिक्चर में बदल जाएगा . 



सुमन
लो क सं घ र्ष !

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

बाल दिवस पर विशेष-नरेन्द्र मोदी बड़े या मोहन भागवत

नरेन्द्र मोदी की जगह अगर भारत के प्रधानमंत्री आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत होते तो नागपुर से सन्देश सरकार को देने के लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता . अयोध्या में राम मंदिर, संविधान से अनुच्छेद 370 का खात्मा, पूर्ण गौहत्या निषेध के साथ देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित करने में कोई परेशानी या दिक्कत नहीं होती . नरेन्द्र मोदी बड़े हैं या मोहन भगवत ? 
              नागपुर की प्रयोगशाला से नेहरु और पटेल के सम्बन्ध में तरह-तरह की अफवाहबाज़ कहानियां नेट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया प्रचारित की जा रही हैं जबकि वस्तुस्तिथि इसके विपरीत है संघ अपने जन्मकाल 1925 से लेकर 1947 तक इस देश की आजादी की लड़ाई में उसका का कोई योगदान नहीं रहा है. नेहरु , पटेल इस देश की जंग ए आजादी के नायक रहे हैं और महानायक महात्मा गाँधी थे . संघी भक्त नाथू राम गोडसे ने गाँधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी उसका कोई प्रयाश्चित नागपुर न करके केरल के संघी मुखपत्र में नेहरु की हत्या के बाद करता है. आजादी की लड़ाई में भाग न लेकर आज वह सबसे बड़े देश प्रेमी व देश भक्त हैं . इसके विपरीत जो धाराएं आजादी की लड़ाई लड़ रही थी उसमें छोटा व बड़ा बताने का काम संघियों के अलावा किसी के पास नहीं है  आज वह बड़ी बेशर्मी से यह अफवाह फैलाते हैं . अगर देश के प्रधानमंत्री पटेल हुए होते तो देश विकास की नयी उचाईयों पर और आगे बढ़ा होता . यह बात कहकर संघी आजादी की लड़ाई में कोई योगदान न होने के बाद छिपाने की कोशिश करते हैं . संघ प्रशिक्षित कई बड़े नेता ब्रिटिश साम्राज्यवाद के लिए मुखबिरी करने का काम करते रहे हैं . 
            पटेल व नेहरु के बीच कोई विवाद नहीं था. यह वह लोग थे जो मानव के बजाए महा मानव थे.
आई बी एन खबर के पंकज श्रीवास्तव के ब्लॉग में नेहरु पटेल का पत्र व्यवहार प्रकाशित हुआ है जो इस प्रकार है-
1 अगस्त 1947 को पंडित नेहरू ने पटेल को लिखा-'कुछ हद तक औपचारिकताएं निभाना जरूरी होने से मैं आपको मंत्रिमंडल में सम्मिलित होने का निमंत्रण देने के लिए लिख रहा हूं। इस पत्र का कोई महत्व नहीं है, क्योंकि आप तो मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं।'
जवाब में पटेल ने 3 अगस्त को नेहरू के पत्र के जवाब में लिखा-'आपके 1 अगस्त के पत्र के लिए अनेक धन्यवाद। एक-दूसरे के प्रति हमारा जो अनुराग और प्रेम रहा है तथा लगभग 30 वर्ष की हमारी जो अखंड मित्रता है, उसे देखते हुए औपचारिकता के लिए कोई स्थान नहीं रह जाता। आशा है कि मेरी सेवाएं बाकी के जीवन के लिए आपके अधीन रहेंगी। आपको उस ध्येय की सिद्धि के लिए मेरी शुद्ध और संपूर्ण वफादारी और निष्ठा प्राप्त होगी, जिसके लिए आपके जैसा त्याग और बलिदान भारत के अन्य किसी पुरुष ने नहीं किया है। हमारा सम्मिलन और संयोजन अटूट और अखंड है और उसी में हमारी शक्ति निहित है। आपने अपने पत्र में मेरे लिए जो भावनाएं व्यक्त की हैं, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूं।
2 अक्टूबर 1950 को इंदौर में एक महिला केंद्र का उद्घाटन करने गये पटेल ने अपने भाषण में कहा-'अब चूंकि महात्मा हमारे बीच नहीं हैं, नेहरू ही हमारे नेता हैं। बापू ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और इसकी घोषणा भी की थी। अब यह बापू के सिपाहियों का कर्तव्य है कि वे उनके निर्देश का पालन करें और मैं एक गैरवफ़ादार सिपाही नहीं हूं।'
ये सारे पत्र अहमदाबाद के नवजीन प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक 'सरदार पटेल के चुने हुए पत्र (1945-50)' में मौजूद हैं।

सुमन 

गुरुवार, 13 नवंबर 2014

अदम्य शौर्य व साहस के बहाने हत्याएं

अपनी जान जोखिम में डालकर कर्तव्यनिष्ठा की पराकाष्ठा का परिचय देते हुए अदम्य शौर्य व साहस का प्रदर्शन करते हुए आतंकवादियों  द्वारा की जा रही गोलाबारी का मुंहतोड़ जवाब देते हुए तीन आतंकवादियों को मार गिराया गया तथा दो आतंकवादी भागने में कामयाब रहे . बड़ी मात्र में गोला बारूद हथियार व विस्फोटक बरामद जैसी खबरें इलेक्ट्रॉनिक मीडिया व प्रिंट मीडिया पर दिखाई देती हैं . इस तरह की घटनाओ में 95 %  घटनाएं लोगों को घरों से कई-कई महीने पहले पकड़ कर अघोषित जेलों में रखकर प्रताड़ित करने के बाद पुरस्कार, सम्मान , इनाम , आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन, साहस और शौर्य का बखान करने जैसे शब्दों के लिए बराबर हत्याएं की जाती रही हैं. 
   अभी जम्मू और कश्मीर की सीमा पर हुए मछिल फर्जी मुठभेड़ कांड के सैन्य अधिकारीयों को आजीवन कारावास की  सजा सुनाई गयी है . उक्त फर्जी मुठभेड़ की जांच कराने के लिए जम्मू एंड कश्मीर में दो महीने जनता ने आन्दोलन चलाया था और 123 व्यक्तियों ने न्याय पाने के लिए जान दे दी थी तब जाकर जांच हुई थी . नवभारत टाइम्स के मुताबिक अप्रैल 2010 में उत्तरी कश्मीर में तैनात सेना की चार राजपूताना रेजिमेंट की कमान कर्नल डीके पठानिया के पास थी। कर्नल पठानिया ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों और जवानों के साथ एलओसी पर तथाकथित आतंकियों को मार गिराने की साजिश रची, ताकि मुखबिरों के नाम पर आने वाली राशि के साथ-साथ वीरता पुस्कार भी हासिल किया जा सके।
उन्होंने इस काम में सेना की 161 टेरिटोरियल आर्मी के एक जवान अब्बास सैयद हुसैन के अलावा दो स्थानीय नागरिकों बशारत लोन और अब्दुल हमीद की मदद ली। तीनों ने मिलकर बारामूला जिले के नादिहाल-रफियाबाद के तीन युवकों शहजाद अहमद खान, रियाज अहमद लोन और मुहम्मद शफी को सेना में नौकरी दिलाने का लालच दिया और अपने साथ 26 अप्रैल को मच्छल इलाके में ले गए। इसके लिए अब्बास और उसके दोनों साथियों को कथित तौर पर कर्नल पठानिया ने डेढ़ लाख रुपये दिए थे।
जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले में मोहम्मद शफी, शहजाद अहमद और रियाज अहमद को बहला फुसलाकर मच्छल इलाके में लाया गया और तीनों को गोली मार दी गई। बाद में बताया गया कि तीनों पाकिस्तानी आतंकवादी थे, जो भारतीय सीमा में घुसपैठ का प्रयास करते मारे गए। हकीकत में तीनों जम्मू-कश्मीर के ही बारामूला सेक्टर स्थित नदिहल के निवासी थे।
शहजाद, रियाज और मुहम्मद शफी के परिवार वालों नों ने 27 अप्रैल 2010 को उनके लापता होने की रिपोर्ट लिखा दी। इसके बादे 30 अप्रैल को राजपूताना रेजिमेंट की तरफ से मच्छल में पुलिस को सूचित किया गया कि 29 अप्रैल की रात तीन पाकिस्तानी आतंकी मारे गए हैं। पुलिस ने तीनों शव कब्जे में लेकर दफना दिए, लेकिन जब इनकी तस्वीरें अखबारों में आईं तो मामला खुल गया। इस पर प्रदर्शन शुरू हो गए। पुलिस ने अब्बास सैयद और उसके दोनों साथियों को गिरफ्तार कर उनसे पूरी साजिश उगलवा भी ली।
अब्बास ने पुलिस को 4 राजपूताना रेजिमेंट के मेजर उपेंद्र के इसमें शामिल होने की बात बताई। फाइनल रिपोर्ट में पुलिस ने राजपूताना रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर (सीओ) कर्नल डी के पठानिया और मेजर उपेंद्र समेत कुल 11 सैन्यकर्मियों को आरोपी बनाया था। पुलिस की जांच रिपोर्ट आने के बाद सेना ने भी मामले की जांच शुरू कर दी थी। कर्नल पठानिया पर जांच पूरी होने तक कश्मीर से बाहर जाने पर प्रतिबंध लगा दिया, जबकि अन्य सैन्य अधिकारियों और जवानों को निलंबित कर दिया गया। 
न्यायलय का फैसला 
साढ़े चार साल पुराने मछिल फर्जी एनकाउंटर केस में दोषी पाए गए कर्नल समेत सात सैन्यकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने बताया कि सैन्य सेवा से बर्खास्त किए जा चुके इन सैनिकों को सेवा से जुड़ा कोई लाभ भी नहीं मिलेगा।
सेना के मुठभेड़ों की जांच कराना बेहद कठिन कार्य है वहीँ पूरे देश में पुलिस, स्पेशल सेल, एस टी एफ़ तथा ए टी एस जैसे सरकारी संगठन आये दिन मुठभेड़ों के नाम पर फर्जी मुठभेड़ करते रहते हैं तथा बेगुनाह लोगों को गंभीर अपराधों में निर्रुद्ध करने का काम पुरस्कार, सम्मान , इनाम , आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन, साहस और शौर्य का बखान करने जैसे शब्दों के लिए करते रहते हैं जिसकी सुनवाई आसानी से होना संभव नहीं है . 
    उत्तर प्रदेश के कचेहरी सीरियल बम विस्फोट कांड के आरोपी तारिक काशमी व मृतक खालिद मुजाहिद की गिरफ्तारी व आर दी एक्स, डेटोनेटर की बरामदगी की जांच इन्क्वारी एक्ट तहत आर डी निमेष कमीशन ने किया तो पाया की गिरफ्तारी व बरामदगी दोनों संदिग्ध हैं उसके बावजूद भी तारिक काशमी व अन्य सात वर्षों से लखनऊ जेल की स्पेशल सेल में बंद हैं . 

सुमन 


मंगलवार, 11 नवंबर 2014

नेहरू की विरासत पर हमला ?

भारत का विभाजन, महात्मा गांधी की हत्या और जिन भाजपा नेता ने इस लेख को लिखा है, उनका नाम है बी. गोपालकृष्णन। वे लिखते हैंए 'यदि इतिहास के विद्यार्थी यह महसूस करते हैं कि गोडसे ने गलत व्यक्ति पर निशाना साधा तो उन्हें दोषी नहीं ठहराया जा सकता। देश के विभाजन के लिए केवल और केवल नेहरू जिम्मेदार थे।' इस लेख से हम क्या समझें? क्या यह आरएसएस की आधिकारिक राय है? हमेशा की तरहए आरएसएस प्रवक्ता मनमोहन वैद्य ने अपने ही नेता की राय से संघ को अलग कर लिया है। परंतु यह समझना मुश्किल नहीं हैं कि आरएसएस के कुछ लोग नेहरू को गांधी से भी बड़ा खलनायक क्यों मानते हैं।'केसरी' में छपा लेख इसी विचार की अभिव्यक्ति है। इससे पहले कि हम देखें कि देश के विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार था, आइए हम समझने की कोशिश करें कि महात्मा की जगह नेहरू को दोषी ठहराए जाने का उद्देश्य क्या है।
हाल में, नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि स्वरूप,उनके जन्मदिवस 2 अक्टूबर को 'स्वच्छ भारत अभियान' शुरू किया। इसके पीछे दो धूर्ततापूर्ण लक्ष्य थे। पहला,  हिंदू राष्ट्रवाद की राजनीति के लिए गांधी का इस्तेमाल करना और दूसरा, गांधी के योगदान को मात्र साफ.सफाई तक सीमित कर देना। गांधीजी निःसंदेह साफ.सफाई पर जोर देते थे परंतु वे हिंदू.मुस्लिम एकता, राष्ट्रीय एकीकरण, अहिंसा और सत्य के पैरोकार भी थे। साफ.सफाई के बारे में गांधीजी की सोच को जरूरत से अधिक महत्व देने का उद्देश्य, उनके अन्य सिद्धांतों का महत्व कम करना है।
उसी तरह,नेहरू की भारतीय राष्ट्रवाद, बहुवाद, धर्मनिरपेक्षता व वैज्ञानिक सोच के प्रति जबरदस्त प्रतिबद्धता के कारण वे हिंदू राष्ट्रवादियों को पूरी तरह अस्वीकार्य हैं। हिंदू राष्ट्रवाद, इन सभी मूल्यों का धुर विरोधी है। इस लेख का उद्देश्य, नेहरू को विभाजन का दोषी बताकर, उसपर आम जनता और बुद्धिजीवियों की प्रतिक्रिया जानना है।
भारत के साम्राज्यवाद.विरोधी स्वाधीनता संग्राम के तीन स्तंभ थे.गांधी, नेहरू और पटेल। गांधी का कद इनमें सबसे ऊँचा था। उन्होंने ही ब्रिटिश विरोधी, भारतीय राष्ट्रवादी जनांदोलन को खड़ा किया, उसे ठोस जमीन दी और उसके नैतिक पथप्रदर्शक बने। उन्होंने अपनी विरासत, नेहरू और पटेल को सौंपी। हिंदू राष्ट्रवादी,जिनमें हिंदू महासभा और आरएसएस शामिल हैं, हिंदू.मुस्लिम एकता स्थापित करने के गांधी के प्रयास के कटु आलोचक थे। मुस्लिम साम्प्रदायिक धारा की प्रतिनिधि मुस्लिम लीग, कांग्रेस को एक ऐसी पार्टी के रूप में देखती थी जो कि केवल हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करती है। सत्य यह है कि सभी धर्मों के बहुसंख्यक लोग, गांधीजी के नेतृत्व में चल रहे भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के साथ थे। हां, सन् 1940 के बाद सांप्रदायिकता में आए उछाल के कारण मुसलमान शनैः शनैः मुस्लिम लीग की ओर झुकने लगे।
दोनों सांप्रदायिक धाराएं गांधी की आलोचक थीं। हिंदू सांप्रदायिक तत्व उन्हें मुसलमानों के तुष्टीकरण का दोषी बतलाते थे तो मुस्लिम संप्रदायवादी उन्हें हिंदुओं का प्रतिनिधि कहते थे। विभाजन के पीछे कई कारक थे,जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण था अंग्रेजों की'फूट डालो और राज करो' की नीतिए जिसने हिंदू और मुस्लिम, दोनों सांप्रदायिक धाराओं को मजबूती दी। ब्रिटेन का अपना साम्राज्यवादी एजेण्डा था। उसे मालूम था कि अगर भारत एक रहा तो वह एक बहुत बड़ा और शक्तिशाली देश होगा। ब्रिटेन को यह भी अंदाजा था कि आने वाली द्विधुर्वीय दुनिया में, भारत, सोवियत संघ के शिविर में रहेगा। उनकी इस सोच के पीछे कारण यह था कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में एक शक्तिशाली वामपंथी गुट था, जिसका नेतृत्व स्वयं नेहरू करते थे।
विभाजन एक बहुस्तरीय त्रासदी था और उसे केवल एक घटना मानना भूल होगी। वह कई घटनाओं का मिलाजुला नतीजा थी। इसे समझने के लिए हमें एक ओर भारतीय और धार्मिक ;मुस्लिम लीग.हिंदू महासभा, राष्ट्रवादियों के बीच के अंतर को समझना होगा तो दूसरी ओर हमें यह भी देखना होगा कि अंग्रेजों का कुटिल खेल क्या था। तभी हम इस प्रक्रिया को समझ सकेंगे। विभाजन के लिए केवल किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराने से काम चलने वाला नहीं है।
नेहरू की नीतियां, पिछले कई दशकों से अनवरत बहस का विषय बनी हुई हैं। हर राजनैतिक दल व विचारधारा के लोग, इन तीनों की व्याख्या अपने.अपने ढंग से करते रहे हैं। एक तरह से, ये तीनों, आधुनिक भारतीय इतिहास में मील के पत्थर हैं। भारत का विभाजन और गांधी की हत्याए इस अर्थ में आपस में जुड़े हुए हैं कि गोडसे ने गांधी पर मुसलमानों का तुष्टीकरण करने का आरोप लगाया था। गोडसे के विचार, तत्कालीन घटनाक्रम की उसकी अधकचरी समझ पर आधारित थे और उसने उसी समझ को गांधीजी की हत्या का औचित्य बना लिया। गोडसे के विचारों से आज के कई हिंदू राष्ट्रवादी सहमत हैं। इनमें से अधिकांश या तो भाजपा.आरएसएस से जुड़े हुए हैं या उनके आसपास हैं। भाजपा के दिल्ली में सत्ता में आने के बाद से उसके कई नेता,अधिक खुलकर इन मुद्दों की हिंदू राष्ट्रवादी व्याख्या को स्वर दे रहे हैं। परंतु इसमें भी अब एक नया पेंच जोड़ दिया गया है। यह पेंच केरल के एक भाजपा नेता द्वारा आरएसएस के मुखपत्र'केसरी' में लिखे गए एक लेख से जाहिर है। यह लेख, अप्रत्यक्ष रूप सेए कहता है कि नाथूराम गोडसे को महात्मा गांधी की जगह जवाहरलाल नेहरू की हत्या करनी थी क्योंकि लेखक के विचार में, असली दोषी नेहरू थे, गांधी नहीं।
अब तक हिंदू सांप्रदायिक तत्व चिल्ला.चिल्लाकर यह कहते आए हैं कि भारत के विभाजन और मुसलमानों के तुष्टिकरण के लिए गांधी जिम्मेदार थे। अब वे नेहरू को खलनायक बनाना चाहते हैं क्योंकि उन्हें गांधी की जरूरत है.परंतु वह भी केवल 'सफाई पसंद नेता के रूप में' न कि सत्य और अहिंसा में अटूट विश्वास रखने वाले महान राष्ट्रपिता बतौर। हिंदू संप्रदायवादी चाहे कितनी ही कोशिश क्यों न करें वे नेहरू पर कब्जा नहीं कर सकते क्योंकि नेहरू ने स्वाधीनता के बाद लंबे समय तक भारतीय राष्ट्रवाद' बहुवादए उदारवाद और विविधता के मूल्यों को मजबूती देने का काम किया। यही वे मूल्य हैं जो दुनिया के सबसे बड़े जनांदोलन,भारतीय राष्ट्रीय आंदोलनए का आधार थे। आश्चर्य नहीं कि आरएसएस अपने ही मुखपत्र में प्रकाशित लेख से कन्नी काट रहा है। वैसे भी, यह लेख एक मुखौटा है, जिसका उद्देश्य संघ परिवार के असली इरादों और सोच को छुपाना है।
-राम पुनियानी

शनिवार, 8 नवंबर 2014

मुसलमानों की राजनैतिक लामबंदी: बदलता स्वरूप


स्वतंत्रता के बाद से,भारत में, राजनीतिज्ञों ने मुसलमानों को अपने पक्ष में करने के लिए पारंपरिक रूप से मुख्यतः तीन श्रेणियों के मुद्दों का उपयोग किया है.सुरक्षा,धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान व मुसलमानों को देश की समृद्धि में उनका वाजिब हक दिलवाना। हाल में महाराष्ट्र में हुए विधानसभा चुनाव में आल इंडिया मजलिस.इत्तिहादुल.मुसलमीन के उम्मीदवारों की विजय ने यह साबित किया है कि एक चौथे मुद्दे का उपयोग भी मुस्लिम मतों को पाने के लिए किया जा सकता है और वह है, हिन्दू राष्ट्रवादियों का मुकाबला करने के लिए धार्मिक आधार पर एक होना। अलग.अलग समय पर इन मुद्दों का उपयोग, बदलती हुई रणनीतियों के तहत किया जाता रहा है। ये हैं 1. चुनावी राजनीति से दूरी बनाना 2. उन राजनैतिक पार्टियों की सदस्यता लेना, जिनमें मुसलमानों का बहुमत नहीं है व 3. मुसलमानों की अपनी राजनैतिक पार्टियां बनाना।
राजनैतिक रणनीतियां 
पाकिस्तान में बसने के लिए भारत छोड़ने से पहले,मौलाना मौदूदी ने कहा था कि यदि भारत के मुसलमान अपने अधिकारों पर जोर देंगे तो उनके प्रति हिन्दुओं का पूर्वाग्रह बढ़ेगा। अतः, उनकी यह सलाह थी कि मुसलमानों को सरकार और प्रशासन से दूर ही रहना चाहिए ताकि हिन्दू राष्ट्रवादी आश्वस्त रहें कि उनके मुकाबिल मुस्लिम राष्ट्रवादी ताकतें लामबंद नहीं हो रही हैं। मौलाना के अनुसार, यही वह एकमात्र रास्ता था जिसके जरिए मुसलमान, इस्लाम के संबंध में बहुसंख्यक समुदाय के पूर्वाग्रहों को दूर करने में सफल हो सकते थे। साम्प्रदायिक राष्ट्रवादियों की दृष्टि में समाज में या तो किसी सम्प्रदाय का वर्चस्व हो सकता है या वह पराधीन हो सकता है। उन्हें बीच का यह रास्ता दिखता ही नहीं है कि दो समुदायों के सदस्य,मिलजुलकर,शांतिपूर्वक रह भी सकते हैं। यही समस्या मौलाना मौदूदी के साथ थी। मौलाना मौदूदी के पाकिस्तान जाने के बाद, उनके द्वारा स्थापित जमायते इस्लामी ने चुनावी राजनीति में भाग नहीं लिया। परंतु मौलाना की सलाह उन मुसलमानों के लिए किसी काम की नहीं थी जो कि अपनी रोजाना की जिंदगी की जरूरतों को पूरा करने की जद्दोजहद में लगे हुए थे।
देवबंदी उलेमाओं के संगठन जमायत उलेमा.ए.हिन्द ने हमेशा पाकिस्तान का विरोध किया। जमात ने कांग्रेस के नेतृत्व में चल रहे स्वाधीनता आंदोलन का इस उम्मीद में समर्थन किया कि स्वाधीन भारत में मुसलमानों को उनके धर्म का पालन करने की आजादी होगी और उनके पर्सनल लॉ से कोई छेड़छाड़ नहीं की जायेगी। जमायत का यह मानना था कि मुस्लिम सांस्कृतिक पहचान के लिएए गैर.मुस्लिम साथी देशवासी उतना बड़ा खतरा नहीं हैं जितने कि अंग्रेज। कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद में आस्था ने जमायत को यह विश्वास करने का और मजबूत आधार दिया। राजनैतिक व्यवस्था में मुस्लिम समुदाय को उसका वाजिब हिस्सा दिलवाने में जमायत की कोई रूचि नहीं थी। उसकी रूचि केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ को संरक्षित रखने में थी। दूसरी ओर,जिन्ना और अन्य मुस्लिम राष्ट्रवादियों का लक्ष्य मुसलमानों को सत्ता में उनका वाजिब हक दिलवाना था और वे आधुनिक विचारों का स्वागत करते थे। जहां देवबंदी उलेमा मुसलमानों की एक विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान बनाना और उसकी रक्षा के लिए समुदाय को एक रखना चाहते थे,वहीं जिन्ना और मुस्लिम राष्ट्रवादी, मुसलमानों को एक अलग राजनैतिक समुदाय और अलग राष्ट्र मानते थे।
भारत के स्वतंत्र होने के बाद, जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आजाद जैसे लोगों के सत्तासीन होने के कारण मुसलमान अपनी सुरक्षा को लेकर आश्वस्त थे। वैसे भीए विभाजन के दौर में हुए दंगे शांत होने के बाद से,सुरक्षा, मुस्लिम नेताओं के लिए चिंता का कोई बड़ा मुद्दा नहीं थी। उस समय जोर इस बात पर था कि अल्पसंख्यक तभी सुरक्षित रह सकते हैं जब उन्हें बहुसंख्यकों का सद्भाव हासिल हो। जो मुसलमान भारत में रह गए थे उनमें मुख्यतः कारीगर, मजदूर, भूमिहीन किसान और पिछड़ी जातियां थीं और उनके लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि वे सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में अपने वाजिब हिस्से की मांग उठा सकते हैं। जमायत और मुस्लिम राजनैतिक नेताओं ने मुसलमानों को उनकी धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे को लेकर कांग्रेस का साथ देने के लिए राजी कर लिया। इस मुद्दे के तीन भाग थे.पहला यह कि भारतीय राज्य,मुस्लिम पर्सनल लॉ में हस्तक्षेप नहीं करेगा, दूसरा, उर्दू भाषा को प्रोत्साहन देने के प्रयास किए जाएंगे और तीसरा, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक चरित्र से छेड़छाड़ नहीं की जाएगी। सन 1990 के दशक में इस सूची में एक और मुद्दा जुड़ गया और वह था बाबरी मस्जिद की रक्षा का.जिसे अंततः सन् 1992 में ढ़हा दिया गया।
मुस्लिम नेतृत्व, समुदाय की शैक्षणिक और आर्थिक उन्नति के लिए कुछ भी करने का इच्छुक नहीं था। वह केवल मुसलमानों की धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रखना चाहता था और इसके लिए वह समुदाय के गौरवपूर्ण अतीत का गुणगान करता रहता था। इसमें शामिल था भारत को महान बनाने में मुस्लिम शासकों का योगदान, ताजमहल जैसी इमारतें और स्वाधीनता संग्राम में समुदाय की हिस्सेदारी। नेतृत्व के सामने एक चुनौती यह थी कि मुस्लिम समुदाय अत्यंत विविधतापूर्ण था। इसमें अनेक पंथ और बिरादरियां थीं। इसके अतिरिक्तए भाषाई, सांस्कृतिक व नस्लीय अंतर भी थे और कई अलग.अलग परंपराएं और रीतिरिवाज भी।
कांग्रेस के भीतर का मुस्लिम नेतृत्व इस तथ्य पर ध्यान नहीं दे रहा था कि मुसलमानों और गैर.मुसलमानों के बीच के सांस्कृतिक अंतर पर जोर देने और मुसलमानों की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान का निर्माण करने की कोशिश से, हिन्दू राष्ट्रवादी मजबूत हो रहे थे। उस समय महात्मा गांधी की हत्या में उनका हाथ होने और स्वाधीनता संग्राम में हिस्सेदारी न करने के कारण, हिन्दू राष्ट्रवादी समाज के हाशिए पर थे। वे शनैः.शनैः आमजनों के बीच यह प्रचार करने लगे कि मुसलमानों द्वारा अपनी विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान को मजबूती देने से अलगवावादी प्रवृत्ति बढ़ेगी। जबकि तथ्य यह है किधार्मिक.सांस्कृतिक स्वतंत्रता के आश्वासन ने ही देवबंदी उलेमाओं को मिलेजुले भारतीय राष्ट्रवाद की ओर आकर्षित किया था और उन्हें विभाजन व मुस्लिम लीग के साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद का विरोध करने के लिए प्रेरित किया था। देवबंदी उलेमाओं का प्रयास यह था कि वे संस्कृति का इस्तेमाल एक धार्मिक समुदाय को राजनैतिक समुदाय के रूप में पुनर्परिभाषित करने के लिए करें और राजनैतिक व्यवस्था में अपना वाजिब हक मांगें। हिन्दू राष्ट्रवादियों ने मुसलमानों का दानवीकरण शुरू कर दिया। वे कहने लगे कि मुसलमानए मूलतः अलगाववादी हैं, वे पाकिस्तान के प्रति वफादार हैं और बहुपत्नी प्रथा का इस्तेमाल कर अपनी आबादी को इतना बढ़ा लेना चाहते हैं कि उनकी संख्या हिन्दुओं से अधिक हो जाए और वे भारत को इस्लामिक राज्य में बदल सकें। कांग्रेस इस बेजा प्रचार का मुकाबला करने की अनिच्छुक व इसमें असमर्थ थी। बल्कि कांग्रेस को लगता था कि अगर मुसलमान असुरक्षित महसूस करेंगे तो वे मजबूर होकर उसके साथ जुड़ेंगे। कांग्रेस ने मुसलमानों को शिक्षा, बैंक कर्जों,सार्वजनिक नियोजन,सरकारी ठेकों इत्यादि में बराबरी के अवसर दिलवाने के लिए कोई प्रयास नहीं किए और ना ही यह कोशिश की कि सरकारी कल्याणकारी योजनाओं के लाभ मुसलमानों तक पहुंचें। इस दिशा में पहली बार कुछ अनमने से प्रयास सन् 2006 में सच्चर समिति की रपट आने के बाद किए गए और इन प्रयासों का मुख्य लक्ष्य भी प्रचार पाना था। नौकरशाहों ने मुसलमानों के लिए बनाई गई विशेष कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने में पर्याप्त दिलचस्पी नहीं दिखाई और मुसलमानों को बहुत कम वास्तविक लाभ मिला।
सन् 1961 के जबलपुर दंगों ने पहली बार मुसलमानों की कांग्रेस के प्रति आस्था को झकझोरा। नेहरू के हस्तक्षेप के बाद भी मुसलमानों के खिलाफ हिंसा जारी रही। उस मुस्लिम नेतृत्व, जो अपनी विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान बनाने की कोशिशों में लगा हुआ था, के लिए जबलपुर दंगे एक चेतावनी थे। परंतु उन्होंने उसे नजरअंदाज कर दिया। सन् 1952 के चुनाव में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों को,  बिहार,उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और संपूर्ण भारत में मुस्लिम उम्मीदवारों को मिले मतों का क्रमश:64,72,56 व 57 प्रतिशत हिस्सा प्राप्त हुआ। सन् 1957 के चुनाव में कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों को इन्हीं राज्यों व संपूर्ण भारत में सभी मुस्लिम उम्मीदवारों को मिले मतों के क्रमश: 65, 58, 51 व 52 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। सन् 1962 में यह प्रतिशत क्रमश: 52,47, 52 व 52 रह गया। सन् 1967 में कांग्रेस को मिलने वाले मुसलमानों के मतों में भारी कमी आई और इन तीन राज्यों और संपूर्ण भारत में क्रमश: उसे केवल 39, 36, 47 और 40 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। सन् 1960 के दशक के अंत में देश में कांग्रेस के विरूद्ध वातावरण था और इसका असर मुसलमानों पर भी पड़ा। जैसा कि आंकड़ों से स्पष्ट हैए खासी मुस्लिम आबादी वाले इन तीन राज्यों में मुसलमानों में कांग्रेस की पैठ तेजी से कम हुई।
मुसलमान बहुत तेजी से कांग्रेस से दूर खिसकने लगे क्योंकि पार्टी उन्हें सुरक्षा प्रदान करने में तो असफल रही ही थी, शासन व्यवस्था और आर्थिक संपन्नता में भी उन्हें उनका वाजिब हक नहीं दिलवा सकी थी। कांग्रेस का जोर केवल उनकी विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने पर थाए जिसकी मांग पितृसत्तात्मक व्यवस्था में विश्वास रखने वाले देवबंदी उलेमा करते थे। धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने के बदलेए राजनैतिक समर्थन पाने की कोशिशों के उदाहरण थे सलमान रूशदी के उपन्यास 'सेटेनिक वर्सेस' पर रोक और शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलटने के लिए नए कानून का निर्माण आदि।
सन् 1992 में बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद,मुसलमानों का कांग्रेस से पूरी तरह मोहभंग हो गया। इस घटना से मुसलमानों को यह लगने लगा कि कांग्रेस उनकी विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान को सुरक्षित रखने में भी सक्षम नहीं है।
पिछड़े मुसलमान
जहां देववंदी उलेमाओं के लिए मुसलमानों की विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान का मुद्दा केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ, उर्दू व अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इर्दगिर्द घूमता था, वहीं पिछड़े मुसलमानों, जो कि कुल आबादी के 85 फीसदी से ज्यादा थे, की सांस्कृतिक पहचान की परिभाषा भिन्न थी। वे जातिगत ऊँचनीच और भेदभाव का सामना कर रहे थे। जहां इस्लाम उन्हें समान दर्जा और न्याय का वायदा करता था वहीं अशरफ मुसलमान.जो कि या तो ऊँची जातियों के हिंदुओं से धर्मपरिवर्तन कर मुसलमान बने थे या दावा करते थे कि उनकी रगों में बादशाहों का खून बह रहा है.पिछड़े मुसलमानों को अपने बराबर दर्जा देने के लिए तैयार नहीं थे। अजलफ ;नीची जातियों से धर्मपरिवर्तन कर बने मुसलमान, जिन्हें पसमांदा भी कहा जाता है, सांस्कृतिक दृष्टि से स्वयं को हिंदू नीची जातियों के सदस्यों के अधिक नजदीक पाते थे। उन्हें इस्लाम और बिरादरी की संस्कृति, दोनों विरासत में प्राप्त हुए थे। पसमांदाओं को लामबंद करने के लिए सामाजिक न्याय और सामाजिक समावेश के मुद्दों का इस्तेमाल किया गया। पिछड़े मुसलमानों को उर्दू से कोई विशेष प्रेम नहीं था और ना ही उन्हें दूरदराज स्थित एक विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक चरित्र से कोई लेनादेना था, विशेषकर तब, जबकि उनके बच्चो के लिए पड़ोस के स्कूल में दाखिला पाना भी एक संघर्ष था। उन्हें वहाबी.देववंदी परिवार संहिता से भी कोई मतलब नहीं था। उनका जोर इस बात पर था कि उन्हें दो वक्त की रोटी मिल सके और उनके बच्चे पढ़ लिख सकें। दक्षिण भारतए विशेषकर तमिलनाडु और कर्नाटक व तेलगांना के ग्रामीण इलाकों में, मुसलमान अपनी द्रविड़ पहचान और सामाजिक न्याय के आंदोलनों से अधिक जुड़े हुए थे।

सुरक्षा का मुद्दा
बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बादए मुसलमान मतदाता कांग्रेस से दूर होते गए क्योंकि कांग्रेस उनके धार्मिक.सांस्कृतिक प्रतीकों की रक्षा करने में असफल रही थी। सन् 1990 के दशक में सुरक्षा का मुद्दा,धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान के मुद्दे से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बन गया। उत्तरप्रदेश में समाजवादी पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल मुसलमानों को यह आश्वासन देकर अपनी ओर खींचने में सफल रहे कि वे उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। यहां यह महत्वपूर्ण है कि मुस्लिम राजनैतिक नेतृत्व ने उच्चतम न्यायालय के उन कई फैसलों पर कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं कि जिनके द्वारा मुसलमानों के धार्मिक.सांस्कृतिक चरित्र पर अतिक्रमण किया जा रहा था। उदाहरणार्थ,सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का कोई विरोध नहीं हुआ कि अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की स्थापना राज्य द्वारा की गई है और इसलिए उसे अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान नहीं माना जा सकता। इसी तरह,सलमान रूशदी और तस्लीमा नसरीन को वीजा दिए जाने का विरोध टीवी स्टूडियों में तो हुआ परंतु सड़कों पर नहीं। मुस्लिम महिला ;तलाक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1986,जिसे संसद ने शाहबानो प्रकरण में निर्णय को पलटने के लिए बनाया था, की उच्चतम न्यायालय ने इस तरह व्याख्या की कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं का अपने पूर्व पतियों से मुआवजा पाने का अधिकार और मजबूत हो गया। इस निर्णय का भी कोई विरोध नहीं हुआ। ऐसे अनेक धार्मिक.सांस्कृतिक मुद्दे हैंए जिनमें राज्य या न्यायालयों द्वारा हस्तक्षेप किया गया परंतु उन देववंदी उलेमाओं व अन्यों ने उनका कोई विरोध नहीं कियाए जो ये दावा करते थे कि वे मुसलमानों की विशिष्ट धार्मिक.सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करेंगे।
आरजेडी का बिहार में 15 साल का शासन दंगा मुक्त रहा। उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव के मुख्यमंत्रित्व काल में भी सांप्रदायिक दंगों की संख्या और उनकी भयावहता में जबरदस्त गिरावट आयी। परंतु समाजवादी पार्टी व आरजेडी दोनों ने ही पूरे मुस्लिम समुदाय के प्रवक्ता के रूप में केवल अशरफ नेतृत्व को गले लगाना ही बेहतर समझा। उनकी निगाहों में मुसलमान एकसार धार्मिक.सांस्कृतिक समुदाय थे। यह धारणा उनके द्वारा प्रस्तावित एम.वाय गठजोड़ से भी जाहिर होती है। मुलायम सिंह यादव ने तो यहां तक घोषणा कर दी थी कि स्कूलों के मुस्लिम विद्यार्थियों को रविवार की जगह शुक्रवार को साप्ताहिक अवकाश मिला करेगा। परंतु इस निर्णय का मुसलमानों द्वारा ही इतना विरोध किया गया कि उसे वापस लेना पड़ा। अगले अंक में जारी
-इरफान इंजीनियर

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

सन् 1917 की अक्टूबर क्रांति के मौके पर - साधारण मनुष्य की महानता का महाख्यान

मैं निजी तौर पर जिस उमंग,उत्साह और वैचारिक गर्मजोशी के साथ दीपावली मनाता हूँ, दुर्गापूजा के सार्वजनिक समारोहों में शामिल होता हूँ। ठीक उसी उत्साह और उमंग के साथ मार्क्सवादियों और उदारमना लोगों के राजनीतिक -साहित्यिक जलसों में भी शामिल होता हूँ। मेरे अंदर जितना उत्साह होली को लेकर रहता है वही उत्साह 7 नबम्वर 1917 की अक्टूबर क्रांति को लेकर भी है।
     आनंद और क्रांति के बीच,मनोरंजन और क्रांति के बीच,जीवंतता और क्रांति के बीच गहरा संबंध है। आप जितने जीवंत होंगे।बृहत्तर सामाजिक सरोकारों में जितना व्यापक शिरकत करेंगे। उतना ही ज्यादा क्रांतिकारी परिवर्तनों को मदद करेंगे। जीवन में जितना रस लेंगे,आनंद लेंगे,आराम करेंगे उतने ही क्रांति के करीब होंगे।
     समाजवादी विचारों और सामाजिक क्रांति से हमारी दूरी बढ़ने का प्रधान कारण है सामाजिक जीवन और निजी जीवन से आनंद और सामाजिकता का उठ जाना। हम अब प्रायोजित आनंद में घिर गए हैं। स्वाभाविक आनंद को हम भूल ही गए हैं कि कैसे स्वाभाविक ढ़ंग से आनंद और रस की सृष्टि की जाए। जीवन का नशा गायब हो गया है। जीवन में जो स्वाभाविक नशा है उसकी जगह हर मेले ठेले में दारू की बोतल आ गयी है। बिना बोतल के हमारे समाज में लोगों को नशा ही नहीं आता,आनंद के लिए उन्हें नशे की बोतल की जरूरत पड़ती है।
    आनंद ,उत्सव, उमंग और जीवतंता के लिए दारू की बोतल का आना इस बात का संकेत है कि हमने प्रायोजित आनंद के सामने घुटने टेक दिए हैं। हमें देखना चाहिए विगत 60 सालों में भारत में दारू की खपत बढ़ी है या घटी है ? आंकड़े यही बताते हैं कि दारू की खपत बढ़ी है। इसका अर्थ है जीवन में स्वाभाविक आनंद घटा है। स्वाभाविक आनंद की बजाय प्रायोजित आनंद के सामने हमारा समर्पण इस बात का भी संकेत है कि हमें जश्न मनाने की तरकीब नहीं आती।
     हमने जन्म तो लिया लेकिन खुशी और आनंद का पाठ नहीं पढ़ा। आनंद से कैसे रहे हैं। इसके लिए वैद्य,हकीम,योगी,बाबा,नेता आदि के उपदेशों या उसके योग शिविरों में जाने की जरूरत नहीं है। हमारी आसपास की जिन्दगी और बृहत्तर सामाजिक दुनिया के प्यार में आनंद छिपा है।
    जीवन में आनंद का ह्रास तब होता है जब स्वयं से प्यार करना बंद कर देते हैं,दूसरों से प्यार करना बंद कर देते,स्वार्थवश प्यार करने  लगते हैं। मुझे सोवियत क्रांति इसलिए अच्छी लगती है कि उसने पहलीबार सारी दुनिया को वास्तव अर्थों में प्यार करने का पाठ पढ़ाया। सोवियतों के साथ प्यार करना सिखाया। मजदूरों -किसानों को महान बनाया ।शासक बनाया।
    सोवियत अक्टूबर क्रांति इसलिए अच्छी लगती है कि मानव सभ्यता के इतिहास में पहलीबार शासन अपने सिंहासन से उतरकर गरीब के घर पहुँचा था। गरीबों को उसने जीवन की वे तमाम चीजें दीं जिनका मानव सभ्यता सैंकड़ों सालों से इतजार कर रही थी।
   सारी दुनिया में एक से बढ़कर एक शासक हुए हैं। बड़े यशस्वी और प्रतापी राजा हुए हैं, बड़े दानी राजा हुए हैं। लेकिन सोवियत क्रांति के बाद जिस तरह की शासन व्यवस्था का उदय हुआ और सोवियतों के काम ने सोवियत संघ और सारी दुनिया को बगैर किसी युद्ध,दबाब और दहशत के जिस तरह प्रभावित किया वैसा इतिहास में देखने को नहीं मिलता।
    आज हमारे पास इंटरनेट है, सैटेलाइट टीवी है, रेडियो है, प्रेस है, हवाई जहाज हैं, दुनिया की शानदार उपभोक्ता वस्तुओं का संसार है। खाते पीते घरों में वस्तुओं का ढ़ेर लगा है। हम किसी भी चीज को आसानी से पा सकते हैं। बैंकों का समूह कर्ज देने के लिए हमारे दरवाजे पर खड़ा है। विचारों,सामाजिक सरोकारों और सामाजिक जिम्मेदारी के पैराडाइम से निकलकर हम वस्तुओं और भोग के महासमुद्र में डूबते-उतराते रहते हैं। आए दिन नामी-गिरामी लोगों को टीवी और मीडिया में देखते रहते हैं,उनके विचार सुनते रहते हैं, लेकिन हमें याद नहीं है कि इन नामी-गिरामी लोगों के विचारों का सारी दुनिया या भारतवर्ष पर कितना असर हो रहा है। आज मीडिया है उनके जयकारे हैं, वे मीडिया के भोंपू हैं ,और सुंदर-सुंदर एंकर से लेकर हीरोइनें हैं जिनके पासएक भी सहेजने लायक विचार नहीं है। ये लोग सबके मिलकर उपभोग का वातावरण बना रहे हैं। जिस व्यक्ति को हम मीडिया में रोज देखते और सुनते हैं उसके विचारों का कोई असर नहीं हो रहा।
   इसके विपरीत अक्टूबर क्रांति के समय न तो टीवी था, न रेडियो था, और न कोई खास प्रचार सामग्री थी वितरित करने लिए। इसके बावजूद सोवियत संघ और उसके बाहर सारी दुनिया में क्रांति के विचार की चिंगारी कैसे फैल गयी ?
     आज जो लोग हिन्दुत्व की हिमायत कर रहे हैं और मार्क्सवाद पर हमले कर रहे हैं, वे जरा जबाब दें कि हिन्दुत्व का विचार आधुनिक प्रचार माध्यमों के जोर जोर से नगाड़े बजाने के बाबजूद भारत में मात्र 20-22 प्रतिशत लोगों को प्रभावित कर पाया है। भारत में कम्युनिस्ट संख्या में कम हैं,उनके पास बड़े संसाधन नहीं हैं। मैनस्ट्रीम मीडिया आए दिन उन पर हमले करता रहता है। इसके बाबजूद सामाजिक और राजनीतिक जीवन में कम्युनिस्टों का प्रभाव बहुत ज्यादा है। कम्युनिस्टों की राजनीतिक साख है। समाजवाद की प्रतिष्ठा है। उनका दल छोटा है। महत्व बड़ा है।
      अक्टूबर क्रांति ने समाजवाद के विचार को महान बनाया। बगैर मीडिया समर्थन के समाजवाद के विचार को एकही झटके में सारी दुनिया में संप्रेषित कर दिया। दूसरा महान कार्य यह किया कि पहलीबार सारी दुनिया को यह विश्वास दिलाया कि वंचित लोग,शोषित लोग शासन में आ सकते हैं। 
   सोवियत क्रांति के पहले यही मिथ था कि सत्ता हमेशा ताकतवर लोगों के हाथ में रहेगी चाहे जैसी भी शासन व्यवस्था आए। तीसरा संदेश यह था शासकों और जनता में बगैर किसी भेदभाव और असमानता के जी सकते हैं। शासकों और जनता के बीच के महा-अंतराल को अक्टूबर क्रांति ने धराशायी कर दिया था।
       सात नबम्बर 1917 को सोवियत संघ में दुनिया की पहली समाजवादी क्रांति हुई। यह सामान्य सत्ता परिवर्तन नहीं था। यह महज एक देश का राजनीतिक मसला भी नहीं था। लेनिन,स्टालिन आदि मात्र एक देश के नेताभर नहीं थे। आज जिस तरह का घटिया प्रचार क्रांतिविरोधी ,समाजवाद विरोधी ताकतें और कारपोरेट मीडिया कर रहा है उसे देखकर यही लगता है कि अक्टूबर क्रांति कोई खूंखार और बर्बर सत्ता परिवर्तन था। एक शासक की जगह दूसरे शासक का सत्ता संभालना था। जी नहीं।
    अक्टूबर क्रांति विश्व मानवता के इतिहास की विरल और मूलगामी सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों को जन्म देनी वाली विश्व की महान घटना थी। कहने के लिए अक्टूबर क्रांति सोवियत संघ में हुई थी लेकिन इसने सारी दुनिया को प्रभावित किया था। हमें गंभीरता के साथ इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि ऐसा क्या हुआ इस क्रांति के साथ जिसने सारी दुनिया का राजनीतिक पैराडाइम ही बदल दिया।
   सारी दुनिया में सत्ताओं का परिवर्तन अमीरों के लिए खुशहाली लेकर आता रहा है,खजानों से शासकों के ऐशो आराम की चीजें खरीदी गयी हैं। लेकिन सोवियत संघ में एकदम विलक्षण मिसाल कायम की गई। ऐसी मिसाल मानव सभ्यता के इतिहास में नहीं मिलती। सोवियत खजाने से पहला भुगतान एक सामान्य घोड़े वाले को किया गया। 
संक्षेप में वाकया कुछ इस प्रकार है- फरवरी क्रांति के ठीक पहले 1917 में जार के जमाने में एक बूढ़े घोडेवाले के घोड़ों को युद्ध के कामों के लिए जारशासन ने जबर्दस्ती ले लिया था। उसे घोड़ों की अच्छी कीमत का वायदा किया गया था ,लेकिन समय बीतता गया और उस बूढ़े को अपने घोड़ों के पैसों का भुगतान नहीं हुआ। वह बूढ़ा पैत्रोग्राद आया और उसने अस्थायी सरकार के सभी दफ्तरों में चक्कर काटे। दफ्तर के बाबू उसे एक ऑफिस से दूसरे ऑफिस में टरकाते रहे , वह बेहद परेशान हो गया था। उसका सारा पैसा और धैर्य खत्म हो गया था। जार का शासन धराशायी हो गया लेकिन उसका कोई पैसा देने वाला नहीं था। इसी भागदौड़ में उस बूढ़े को किसी ने बताया कि तुम बोल्शेविकों से मिलो वे मजदूरों और किसानों की वे सारी चीजें लौटा रहे हैं जो जार के जमाने में जमीदारों और जार शासन ने छीन ली थीं। किसी ने यह भी कहा कि उसके लिए उसे सिर्फ लेनिन की एक चिट्ठी की जरूरत है। वह बूढ़ा किसी तरह लेनिन के पास पहुँच गया और सुबह होने के पहले ही उसने लेनिन को जगा दिया और उनसे चिट्ठी लेने में सफल हो गया। और सीधे वह चिट्ठी लेकर अलेक्सान्द्रा कोल्लोन्ताई के घर पर जा पहुँचा। दरवाजे पर पहुँचते ही उसने घंटी बजायी। कोल्लोन्ताई ने दरवाजा खोला और पूछा किससे मिलना है तो उसने कहा मुझे कोल्लोन्ताई से मिलना है, मैं उनके सबसे बड़े बोल्शेविक लेनिन की चिट्ठी देना चाहता हूँ। कोल्लान्ताई ने उसके हाथ चिट्टी लेकर देखी तो पाया कि वह सचमुच में लेनिन का पत्र था।  लिखा था- ‘‘ उसके घोड़े की कीमत का भुगतान सामाजिक सुरक्षा कोष से कर दीजिए।’’ कोल्लान्ताई ने उस बूढ़े से कहा चिट्ठी दे दो। उसने कहा ‘‘ पैसा मिल जाने पर ही मैं आपको यह चिट्टी दूंगा। तब तक मैं इसे अपने पास ही रखूंगा।’‘
   उल्लेखनीय है यह लेनिन की पहला सरकारी आदेश था। लेकिन उस समय मंत्रालयों में भयानक अराजकता छायी हुई थी,नौकरशाही असहयोग कर रही थी। खजाने में हंगामा और अराजकता का माहौल था। बोल्शेविकों का अभी तक सभी मंत्रालयों पर कब्जा हुआ नहीं हुआ था। उस समय कम्युनिस्टों के सामने समस्या थी कि मंत्रालयों पर जोर-जबर्दस्ती कब्जा करें या प्यार से ? नौकरशाही परेशान थी कि कम्युनिस्टों के शासन में उन सबकी नौकरियां चली जाएंगी। लेकिन लेनिन ने आदेश निकाला कि जो जहां जिस पद पर काम कर रहा है वह वहीं पर काम करता रहेगा। इससे मामला थोड़ा शांत हुआ लेकिन खजाने में अभी भी अशांति और अराजकता बनी हुई थी। खजाने के कर्मचारी, टाइपिस्ट, क्लर्क आदि खजाने का सामान लेकर भागे जा रहे थे,कोल्लान्ताई अपने साथ कुछ मजदूरों और तकनीकी जानकारों की एक टोली लेकर खजाने पर पहुँची और देखा कि लोग सामान लेकर भाग रहे हैं। खजाने की चाभियां नहीं मिल नहीं थीं, वे कहीं छिपा दी गयी थीं अथवा कोई उन्हें लेकर चला गया था,कुछ भी पता नहीं चल रहा था। अराजकता का आलम यह था कि बैंक के सारे कागज कर्मचारियों ने नष्ट कर दिए थे, बैंक के बाहर भीड़ लगी थी। यह भी परेशानी थी कि खजाने के ताले लगे रहेंगे तो अन्य विभागों का पैसे के बिना काम कैसे चलेगा। वह घोड़े वाला किसान कई दिन से लेनिन की चिट्ठी लिए घूम रहा था अपना भुगतान पाने के लिए वह रोज सुबह ही आ जाया करता था कि मेरा भुगतान कब होगा। दो दिनबाद तिजोरियों की कुंजियां हाथ लगीं और जब खजाना खुला तो उससे समाजवादी क्रांतिकारी शासन के द्वारा पहला भुगतान उस घोड़ों के मालिक बूढ़े किसान को किया गया। इस पहले भुगतान ने मानव सभ्यता के नए इतिहास का आरंभ किया। साधारण आदमी को महान बनाया और  सत्ता को उसका सच्चे अर्थ में सेवक बनाया।
------- जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

शनिवार, 1 नवंबर 2014

मोदी सरकार का असली एजेण्डा



भारत का सांस्कृतिक रूपांतरण

हालिया चुनाव में भाजपा की भारी जीत के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि मोदी के नेतृत्व वाली सरकार,सबसे पहले जनता से जुड़े उन मुद्दों पर ध्यान देगी जिनके कारण वह सत्ता पर काबिज हो सकी है। परंतु नई सरकार की 100 दिन की हनीमून अवधि पूरी होने के पहले ही यह साफ हो गया है कि आमजनों से जुड़े मुद्दे सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं हैं। बजट और ब्रिक्स शिखर बैठक की बैनर हैडलाईनें और सुशासन व अर्थव्यवस्था में मूलभूत सुधार के नारे सब को दिखाई और सुनाई पड़ रहे हैं। परंतु पर्दे के पीछे से मोदी और उनकी टीम यह स्पष्ट संकेत दे रही है कि उनका असली एजेण्डा भारत के सामाजिक.सांस्कृतिक.राजनैतिक स्वरूप को रूपांतरित करना है।
मोदी के नेतृत्व में भाजपा के सत्ता में आने के पीछे कई कारक व व्यक्तित्व थे। इनमें शामिल थी धार्मिक ध्रुविकरण की प्रक्रिया, जिसकी शुरूआत सन् 2002 के गुजरात कत्लेआम से हुई और जो सन् 2013 के मुजफनगर ;उत्तरप्रदेश दंगों तक जारी रही। इसके अतिरिक्त,कारपोरेट घरानों ने मोदी का खुलकर समर्थन किया। मोदी ने गुजरात में बड़े औद्योगिक समूहों को मनमानी करने की खुली छूट दे दी थी और सन् 2007 से ही मोदी द्वारा उपकृत औद्योगिक घरानों ने यह अनवरत जाप प्रारंभ कर दिया था कि मोदी को ही देश का प्रधानमंत्री होना चाहिए। गुजरात के विकास का मिथक, मीडिया मैनेजमेंट और सत्ताधारी कांग्रेस की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाने में सफलता ने भी मोदी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परंतु इन सब कारकों के बावजूद भी मोदी यह चुनाव नहीं जीत पाते यदि उन्हें सात लाख से अधिक आरएसएस कार्यकर्ताओं का समर्पित सहयोग न मिला होता। मोदी के नेतृत्व वाली सरकार और अमित शाह के नेतृत्व वाली भाजपा.दोनों को यह पता है कि आरएसएस के बिना सफलता असंभव होती। और अब,पितृसंगठन आरएसएस, अपने सहयोग की कीमत वसूलने पर आमादा है।
सन् 1999 में जब भाजपा के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ;एनडीए की सरकार बनी थी तब उसके पास लोकसभा में सामान्य बहुमत भी नहीं था। इस कारण भाजपा ने अपने हिंदुत्व एजेण्डे को अस्थायी तौर पर त्याग दिया था। इस एजेण्डे में शामिल हैं समान नागरिक संहिता, बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर का निर्माण और संविधान के अनुच्छेद 370 की समाप्ति। अब भाजपा के पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है और कोई कारण नहीं कि वह अपने हिंदुत्व एजेण्डे को लागू न करे। मोदी की एकाधिकारवादी मानसिकता अभी से सामने आ रही है। विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों से कहा गया है कि वे सीधे उन्हें रिपोर्ट करें और मोदी ने अपनी अनुपस्थिति में केबिनेट की बैठक आयोजित करने की मनाही कर दी है। जाहिर है कि यह प्रधानमंत्री के हाथों में सत्ता के केंद्रीयकरण की प्रक्रिया की शुरूआत है।
आरएसएस.भाजपा.मोदी सरकार का अंतिम उद्देश्यए भारतीय संविधान के प्रजातांत्रिक मूल्यों, जिनके कारण जातिगत व लैंगिक सामाजिक रिश्तों में बदलाव संभव हो सका है, को कुचलकरए देश में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना करना है।

अच्छे दिन
भाजपा के सफल चुनाव अभियान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था 'अच्छे दिन' लाने का वायदा। आमजन,बढ़ती  कीमतों से परेशान थे और भाजपा ने उन्हें यह सपना दिखाया कि मोदी के नेतृत्व में उनके अच्छे दिन आयेंगे। परंतु मोदी के सत्ता में आने के बाद भी कीमतों का बढ़ना बदस्तूर जारी है और इस कारण मोदी सरकार से कुछ हद तक लोगों का मोहभंग भी हुआ है। ऐसा लगने लगा है कि निरंतर प्रचार के जरिए जो बड़ी.बड़ी आशाएं लोगों के मन में जगाई गई हैं, वे आशाएं ही रहेंगी.यथार्थ नहीं बनेंगी। कुछ लोग कहते हैं कि अभी मोदी सरकार की कार्यक्षमता व कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करना बहुत जल्दबाजी होगी। परंतु यह सरकार देश को किस दिशा में ले जाना चाहती है, यह अभी से स्पष्ट हो रहा है। खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की सीमा एक झटके में 26 से बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दी गई है। यही भाजपा जब विपक्ष में थी,तब वह खुदरा व्यापार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का कड़ा विरोध करती थी। स्पष्टतः यह निर्णय अवसरवादी राजनीति का उदाहरण है। ऐसी आशंका है कि नई सरकार सार्वजनिक क्षेत्र का बड़े पैमाने पर निजीकरण करने का प्रयास भी करेगी। हाल ही में संशोधित भू.अधिग्रहण अधिनियम में कुछ और संशोधन प्रस्तावित हैं और इन से किसानों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वर्तमान में यह प्रावधान है कि किसानों के बहुमत की स्वीकृति के बगैर,भू.अधिग्रहण नहीं किया जा सकता। इस प्रावधान को समाप्त करने की कवायद चल रही है।
संप्रदायवादी सोच
कई बार हम कुछ बोलकर अपनी बात दूसरों तक पहुंचाते हैं और कई बार चुप रहकर। पुणे के आईटी उद्योग में कार्यरत मोहसिन शेख की हत्या, जिसके लिए तथाकथित तौर पर हिन्दू जागरण सेना को जिम्मेदार बतलाया जा रहा है,समाज का सांप्रदायिकीकरण करने के योजनाबद्ध प्रयास का हिस्सा है। उत्तरप्रदेश के सहारनपुरए रामपुर और कुछ अन्य हिस्सों में हुई हिंसा और मध्यप्रदेश के कुछ भागों में भड़के दंगे यह बताते हैं कि जिन भी राज्यों में विधानसभा के चुनाव या उपचुनाव होने वाले हैं, वहां समाज का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने का हर संभव प्रयास किया जा रहा है। प्रधानमंत्री इन सब मुद्दों पर चुप हैं और इससे जनता में कोई बहुत अच्छा संदेश नहीं जा रहा है।
देश भर में हुई कई घटनाएंए मोदी सरकार के असली एजेण्डे की ओर इशारा कर रही हैं। नई सरकार की कार्यप्रणाली का एक कुटिलतापूर्ण पक्ष यह है कि विशाल संघ परिवार के अलग.अलग सदस्य, अलग.अलग भाषा में अलग.अलग बातें कर रहे हैं। परंतु वे सभी असल में इस सरकार के कट्टर समर्थक हैं। उदाहरणार्थ,जब टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा को नवगठित तेलंगाना राज्य का ब्रांड एम्बेसेडर नियुक्त किया गया तब एक स्थानीय भाजपा नेता ने उन्हें 'पाकिस्तान की बहू' बताया जबकि एक केन्द्रीय मंत्री ने उन्हें 'देश के गौरव' की संज्ञा दी। यह समझना भूल होगी कि ये परस्पर विरोधी बातें,संघ परिवार में किसी प्रकार की मतविभिन्नता की ओर इशारा करती हैं। सच यह है कि संघ परिवार के सभी सदस्यों का असली उद्देश्य एक ही है।
शिक्षा
नई सरकार जो कुछ कर रही है या करने की योजना बना रही है, उनमें से सबसे चिंतजनक है शिक्षा के क्षेत्र में प्रस्तावित परिवर्तन, जिनका उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों की मानसिकता और सोच को बदलना है। लक्ष्य है ब्राह्मणवादी मूल्यों को पुनर्स्थापित करना, वैज्ञानिक सोच को निरूत्साहित करना और दकियानूसी,मध्यकालीन परंपराओं को प्रोत्साहन देना। पिछली एनडीए सरकार ने समाजविज्ञान और इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में परिवर्तन किए थे। सरकार की कोशिश यही थी कि पाठ्यपुस्तकों में वही विभाजनकारी इतिहास पढ़ाया जाए जो आरएसएस की शाखाओं में पढ़ाया जाता है अर्थात सांप्रदायिक इतिहास.वह इतिहास, जिसमें राजाओं और बादशाहों को केवल धर्म के चश्मे से देखा जाता है। इस देश में इतिहास का सांप्रदायिकीकरण सबसे पहले हमारे ब्रिटिश शासकों ने किया था ताकि वे फूट डालो और राज करो की अपनी नीति को लागू कर सकें। इतिहास का यही सांप्रदायिक संस्करण, मुस्लिम लीग व हिन्दू महासभा.आरएसएस के उदय का आधार बना। इस इतिहास में 'हमारे' हिन्दू राजाओं का महिमामंडन किया जाता है और जाति व लैंगिक पदानुक्रम पर आधारित सामंती मूल्यों को प्रोत्साहित किया जाता है। भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए सन् 2004 के चुनाव में पराजित हो गया और इस तरह, तार्किक व राष्ट्रीय इतिहास लेखन की फिर से वापसी संभव हो सकी।
 अब ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि आरएसएस हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करना चाहता है। उसका इरादा इतिहास और समाजविज्ञान की पाठ्यपुस्तकों को पूरी तरह से बदल डालना है। इस सरकार के सत्ता में आने के पहले.जिस दौर में मोदी का राजनीति के आकाश में उदय हो रहा था और ऐसी मान्यता प्रबल हो रही थी कि वे ही देश के अगले प्रधानमंत्री होंगे.से ही दक्षिणपंथी संगठनों ने स्वतंत्र सोच वाले व बौद्धिक दृष्टि से ईमानदार बुद्धिजीवियों पर हमले शुरू कर दिये थे।
दीनानाथ बत्रा के दबाव में पैंग्विन ने वेण्डी डोनिगर की विद्ववतापूर्ण पुस्तक 'द हिन्दूज  एन आलटरनेट हिस्ट्री' ;हिन्दू: एक वैकल्पिक इतिहास को जारी नहीं किया। पौराणिक कथाओं के विश्लेषण के जरिये यह पुस्तकए अत्यंत संवेदनशीलता से हमारे समाज में जाति व लिंग से जुड़े मुद्दों को समझने की आवश्यकता प्रतिपादित करती है। डोनिगर जिस इतिहास पर जोर देती है वह आरएसएस की पदानुक्रम पर आधारित सोच के खिलाफ है। बत्रा, आरएसएस के अनुषांगिक संगठन 'शिक्षा बचाओ अभियान समिति' व 'शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास' का कई दशकों से नेतृत्व कर रहे हैं। सन् 2001 में बत्रा एनसीईआरटी में सलाहकार नियुक्त किए गए और उनके नेतृत्व में गठित एक दल ने पाठ्यपुस्तकों से वे हिस्से हटा दिये जो हिन्दू धर्म के ऐसे पक्षों को उजागर करते थे, जिन्हें संघ दुनिया से छुपाना चाहता है। इनमें शामिल हैं प्राचीन हिन्दू समाज की दमनकारी जाति प्रथा, अछूत प्रथा व वैदिक युग में हिन्दुओं द्वारा गौमांस भक्षण। जो भी व्यक्ति इन परिवर्तनों का विरोध करता था या उनके खिलाफ था उसे 'राष्ट्र द्रोही' करार देने में जरा भी देरी नहीं की जाती थी। अब बत्रा स्वयं लेखक बन गये हैं और उनके द्वारा लिखित 9 पुस्तकों के एक सेट का गुजराती में अनुवाद कर उन्हें राज्य के 42ए000 स्कूलों में पढ़ाया जाने लगा है 
बत्रा के लेखन के नमूने इस प्रकार हैं:
1    अमेरिका स्टेम सेल अनुसंधान के अविष्कार का श्रेय लेना चाहता है परंतु सच यह है कि भारत के डॉक्टर बालकृष्ण गणपत मातापुरकर को पहले ही शरीर के अंगों का फिर से निर्माण करने का पेटेंट मिल चुका है तुम्हें यह जानकर आश्चर्य होगा कि यह अनुसंधान नया नहीं है और डॉक्टर मातापुरकर को इसकी प्रेरणा महाभारत से मिली थी। कुंती का सूर्य के समान तेजस्वी एक पुत्र था। जब गांधारी,जो दो वर्षों बाद गर्भधारण कर सकीं थीं,का गर्भपात हो गया। उनके गर्भ से मांस का एक बड़ा लोथड़ा बाहर आया। ऋषि द्वैपायन व्यास को बुलवाया गया। उन्होंने मांस के इस कड़े लोथड़े का ध्यानपूर्वक अवलोकन किया। उसके बाद उन्होंने उसे कुछ विशिष्ट दवाओं के साथ एक ठंडी टंकी में सुरक्षित रख दिया। कुछ समय पश्चात इस लोथड़े को सौ भागों में विभाजित किया और हर भाग को घी से भरी सौ टंकियों में दो साल के लिए रख दिया। दो साल बाद इन टंकियों से सौ कौरव निकले। यह पढ़ने के बाद डॉक्टर मातापुरकर को यह समझ में आया कि स्टेम सेल उनका अविष्कार नहीं है। भारत में यह हजारों वर्ष पूर्व था ;पृष्ठ 92.93।
;2  भारतीय ऋषि अपनी योग विद्या से दिव्य दृष्टि हासिल कर लेते थे। इसमें कोई संदेह नहीं कि टेलीविजन का अविष्कार इसी दिव्य दृष्टि से हुआ महाभारत में संजय हस्तिनापुर के एक महल में बैठकर दिव्य शक्ति के जरिए महाभारत के युद्ध का दृष्टिहीन धृतराष्ट्र के लिए'लाईव टेलीकास्ट' किया करते थे। ;पृष्ठ 64
;3  जिसे हम आज मोटरकार कहते हैं वह वैदिक युग में अस्तित्व में थी। उसे 'अनश्व रथ' कहा जाता था। सामान्यतः रथ को घोड़े खींचते थे परंतु अनश्व रथ का अर्थ था ऐसा रथ जो बिना घोड़ों के चलता था। इसे 'यंत्र रथ' भी कहा जाता था। इसी यंत्र रथ को अब हम मोटरकार कहते हैं। ;पृष्ठ 60
यह शायद एक पायलट प्रोजेक्ट है जिसे बाद में पूरे राष्ट्र में लागू किया जायेगा। भाजपा के पूर्व अध्यक्ष और वर्तमान में केन्द्रीय मंत्री एम. वेंकैय्या नायडू ने पिछले वर्ष ;23 जून 2013 ही स्पष्ट शब्दों में कह दिया था कि 'अगर भाजपा सत्ता में आई तो पाठ्यपुस्तकों व पाठ्यक्रम में परिवर्तन करेगी।' बत्रा को यह कहते हुए उद्धृधृत किया गया है कि देश में राष्ट्रवादी शिक्षा व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता है ताकि हिन्दुत्व व राष्ट्रवाद के प्रति प्रतिबद्ध युवा पीढी़ तैयार की जा सके। आरएसएस ने 'भारतीय शिक्षा नीति आयोग' नामक एक सलाहकार संस्था का गठन कर दिया है, जिसके जरिये वह राष्ट्रीय शिक्षा व्यवस्था में सुधार लाने व उसका भारतीयकरण करने' का दबाव मोदी सरकार पर बनायेगा।
जाति व लिंग
पाठ्यपुस्तकों में प्रस्तावित परिवर्तनए इस सरकार के असली एजेण्डे को उजागर करते हैं। इस सरकार के पास अपने पितृसंगठन आरएसएस द्वारा जारी दिशानिर्देशों का पालन करने के अलावा कोई चारा नहीं है। प्रोफेसर वाई सुदर्शन राव की भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ;आईसीएचआर के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह राष्ट्रीय संस्थानए इतिहास के क्षेत्र में शोध का नेतृत्व करता है। प्रोफेसर राव की इतिहास लेखन के क्षेत्र में कोई अकादमिक उपलब्धि अब तक सामने नहीं आई है। अपने साथी विद्वानों द्वारा अपने शोधपत्रों की आलोचनाध्विश्लेषण करवाने की बजाए वे अपने तर्क मुख्यतः ब्लॉगों के जरिए प्रस्तुत करते रहे हैं। इन ब्लॉगों को पढ़ने से ऐसा लगता है कि प्रोफेसर राव का इतिहास मुख्यतः काल्पनिक है और यह हिन्दू राष्ट्र व जाति व्यवस्था की पुनर्स्थापना के एजेण्डे से प्रेरित है।
अपने एक ब्लॉग में वे जोर देकर कहते हैं कि समाज में जाति व्यवस्था की भूमिका सराहनीय रही है और उसके खिलाफ कभी कोई शिकायत सामने नहीं आई। 'भारतीय समाज में व्याप्त जिन सामाजिक रस्मों.रिवाजों पर अंग्रेजीदां भारतीय बुद्धिजीवियों और पश्चिमी विद्वानों ने प्रश्न उठाए हैं, उन सभी की जड़ें उत्तर भारत में लगभग सात शताब्दियों तक चले मुस्लिम शासन में खोजी जा सकती हैं', वे लिखते हैं। उनका तर्क है कि 'प्राचीनकाल में ;जातिद्ध व्यवस्था सुचारू रूप से काम कर रही थी और इससे किसी को कोई शिकायत नहीं थी।' इस बात में कोई दम नहीं है। सच यह है कि जाति व्यवस्था और उसका दमनकारी स्वरूप तथाकथित हिन्दू धर्मग्रंथों, वेदों ;ऋग्वेद पुरूषसूक्त व उपनिषदों, जिन्हें ईसा पूर्व लिखा गया था, का हिस्सा हैं। मनुस्मृति पहली या दूसरी सदी ईस्वी के आसपास लिखी गई थी। इन स्थापित तथ्यों के विरूद्ध प्रोफेसर राव कहते हैं कि जाति आधारित भेदभाव देश में मुस्लिम राजाओं के आगमन के बाद से शुरू हुआ। अब तक वे महाभारत की ऐतिहासिकता साबित करने की परियोजना पर काम करते रहे हैं। यह दिलचस्प है कि संघ परिवार रामायण के केवल एक संस्करण को लोगों के सामने प्रस्तुत करता है जबकि सच यह है कि रामायण के 400 से अधिक विभिन्न स्वरूप उपलब्ध हैं। अक्टूबर 2011 में हिंदुत्व संगठनों के दबाव में ए.के. रामानुजम के रामायण के विविध स्वरूपों पर केन्द्रित लेख को दिल्ली विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम से हटा लिया गया था और प्रकाशक को मजबूर होकर संबंधित पुस्तक को बाजार से हटाना पड़ा। अब तक हाशिए पर पड़े कट्टरपंथी समूह सक्रिय हो उठे हैं। वे हिन्दू धर्मग्रन्थों को राष्ट्रीय स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहते हैं। जस्टिस ए.आर. दवे गीता को पाठ्यक्रम में शामिल करवाना चाहते हैं तो कुछ अन्य लोग रामायण को। ये दोनों पुस्तकें जातिवादी हैं। गीता में कृष्ण कहते हैं कि जब.जब धर्म.या वर्णाश्रम धर्म.खतरे में पड़ेगा वे धरती पर अवतरित होंगे। रामायण में राम, शम्बूक नामक एक शूद्र को इसलिए मार देते हैं क्योंकि वह तपस्या कर रहा था, जो कि शूद्रों के लिए प्रतिषिद्ध थी।
कट्टरपंथी तत्व या श्रम विभाजन
विहिप के मुखिया और आरएसएस के सदस्य अशोक सिंघल ने मोदी को 'आदर्श स्वयंसेवक' बताया है और जोर देकर यह घोषणा की है कि मुसलमानों को हिन्दू संस्कृति की भावनाओं का सम्मान करना होगा। उन्होंने यह धमकी भी दी है कि 'हिन्दुओं का विरोध कर वे लंबे समय तक बच नहीं पायेंगे'। उन्होंने मुसलमानों से अयोध्या,मथुरा व काशी पर अपना दावा छोड़ने के लिए भी कहा है। जाहिर है कि संघ परिवार का उद्देश्य मुसलमानों को दूसरे दर्जे का ऐसा नागरिक बनाना है जिनके न कोई अधिकार होंगे और ना ही पात्रता,। संघ परिवार के जहर उगलने वाले एक और नेता विहिप के प्रवीण तोगड़िया ने सिंघल की बात का समर्थन करते हुए कहा कि हो सकता है कि मुसलमान 2002 के गुजरात दंगे भूल चुके हों परंतु वे पिछले साल के मुज़फ्फरनगर दंगे नहीं भूले होंगे।
गोवा के उपमुख्यमंत्री फ्रांसिस डिसूजा ने अपनी इस टिप्पणी के लिए क्षमायाचना कर ली है कि 'भारत तो पहले से ही हिन्दू राष्ट्र है'। यह रणनीति का भाग है। डिसूजा साहब ने पहले फरमाया था कि सभी भारतीय हिन्दू हैं। उनके अनुसार वे ईसाई हिन्दू हैं। गोवा के एक अन्य भाजापाई मंत्री दीपक धावलीकर ने कहा है कि मोदी के नेतृत्व में भारत एक हिन्दू राष्ट्र बनेगा। आरएसएस.भाजपा.मोदी का अंतिम स्वप्न यही है कि धार्मिक अल्पसंख्यक, ब्राह्मणवादी हिन्दू मानदंडों को अपना लें। यही कारण है कि संघ परिवार चाहता है कि वे ईसाई हिंदू, अहमदिया हिंदू जैसे शब्दों का प्रयोग करें। फिर आगे चलकर उनसे कहा जायेगा कि चूंकि तुम हिन्दू हो इसलिए हिन्दू आचार.व्यवहार का पालन करो।
आरएसएस.भाजपा.मोदी सरकार का दीर्घावधि एजेण्डा क्या है,यह आरएसएस के दक्षिण भारत के तत्कालीन मुखिया यादवराव के निम्न कथन से स्पष्ट है 'इस समय आरएसएस और हिन्दू समाज इतना ताकतवर नहीं है कि वह मुसलमानों और ईसाईयों से स्पष्ट शब्दों में कह सके कि अगर तुम्हें भारत में रहना है तो हिन्दू बनना होगा.या तो धर्म परिवर्तन करो या अपनी जान गंवाओ। परंतु जब हिन्दू समाज और आरएसएस ताकतवर हो जायेंगे तो हम उनसे कहेंगे कि अगर तुम्हें इस देश में रहना है और अगर तुम इस देश से प्यार करते हो तो यह स्वीकार करो कि कुछ पीढ़ियो पूर्व तक तुम्हारे पूर्वज हिन्दू थे और हिन्दू धर्म में वापस आ जाओ।'
इस प्रकार मोदी सरकार के शुरूआती कुछ हतों के कार्यकाल में ही यह साफ हो गया है कि हम किस दिशा में जा रहे हैं। अपने हिंदुत्ववादी एजेण्डे को सरकार दबे .छुपे ढंग से लागू करेगी परंतु संघ परिवार के अन्य सदस्य, हिन्दू राष्ट्र के अपने एजेण्डे के बारे में खुलकर बात करेंगे.उस हिन्दू राष्ट्र के बारे में जहां धार्मिक अल्पसंख्यक और कुछ जातियां दूसरे दर्जे के नागरिक बना दी जायेंगी ताकि संघ परिवार की चार वर्णों की व्यवस्था के सुनहरे युग की एक बार फिर शुरूआत हो सके।
-राम पुनियानी