सरस्वती शक्ति वन्दन - अवधी भाषा
रहते किये दंभ है देवता या नटि कर्म की ओर निहारते है।।
विश्वास है घात किया करते जजमान को रोवाव डारते है।।
नत्र मस्तक घेसदा वक्त रहें, रहते नये जे अपना नही दुतकारते है।।
कल्याण सदा ही करें तारते है नाउ वारत है।।
करें काज कसाई हितू बनिकै वृद्ध के संग बालिका कोवर दें।
गृह उच्च के ताथै बताते रहे मतिको गीत مر 2 34 सो भनि को हरि दें।। परे धोरे दरेर तहाँ नक शीश कदावि दरै दरखें ।।
नहु रूप कला से दिखाय को मला को रसातल के तल दे धरखें।।
अवधी भाषा के कवि स्वर्गीय जगजीवन सिंह 'सरस'
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सुमन
लोकसंघर्ष