शुक्रवार, 24 अप्रैल 2009

राजनितिक भँवर में अपने वजूद को ढूंढता मुसलमान-2

वास्तव में मुसलमानों को कांग्रेस ने नाराज करने में मुस्लिम राजनितिक लीङरों से अधिक उनके धार्मिक नेताओं का हाथ था क्योंकि मुस्लमान हमेशा से अपने राजनैतिक फैसले धार्मिक भावनाओ से ओत-प्रोत होकर करने का आदि रहा । इसी का लाभ उठाते हुए उसके विरोधी उसी के अपने भाइयो को खरीदकर उसे बरगलाकर उसके वोट बैंक को हमेशा विभाजित करते रहे। कांग्रेस से मुस्लिम नाराजगी को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने में जहाँ एक ओर दिल्ली जमा मस्जिद का इमाम मौलाना अब्दुल्ला बुखारी पेशो- पेश रहे जो कांग्रेस का उस समय का युवराज संजय गाँधी के सताए हुए थे तो वही दूसरी और रायबरेली की एक अहम् शख्सियत व नदवा के मौलाना अबुल हसन अली नदवी उर्फ़ अली मियाँ भी इंदिरा गाँधी हुकूमत के तौर तरीको से खिन्न थे। मौलाना अब्दुल बुखारी को तो व्यक्तिगत नुकसान संजय गाँधी ने दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके और जमा मस्जिद के आस पास के इलाको में अतिक्रमण हटाने की कार्यवाही के रूप में बुलडोज़र चला कर किया था क्योंकि इन दुकानों को संरक्षण व उनकी तहबाजारी मौलाना बुखारी ही वसूलते थे। मगर मौलाना अली मियाँ की नाराजगी का कारण कभी खुल न सका । मौलाना अली मियाँ ने वर्ष 1980 के लोकसभा चुनाव में खुलेआम R.S.S की प्रवक्ता रही और जनता पार्टी के टिकट पर इन्द्र गाँधी के विरुद्ध चुनाव लड़ रही राजमाता विजया राजे सिंधिया के समर्थन का ऐलान किया । यह बात और है कि अपने इस धार्मिक विद्वान की बात को नकारते हुए मुसलमानों ने इंदिरा गाँधी के पक्ष में मतदान किया ,परन्तु उनकी गिनती कांग्रेस खेमे में नही की गई ,यानि चिडिया ,अपनी जान से गई और खाने वाले को मजा भी न मिला।
परिणामस्वरूप तेजी से उभर रहे नेता वीर बहादुर सिंह और अरुण नेहरू ने इंदिरा गाँधी को यह समझाने में सफलता हासिल कर ली की मुसलमानों का वोट उनके पक्ष में न होने के बावजूद केवल हिंदू मतदाताओं के बल पर उन्हें सफलता मिली है।
तारिक खान
(क्रमश :)

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