शनिवार, 25 अप्रैल 2009

राजनितिक भँवर में अपने वजूद को ढूंढता मुसलमान-3

इससे पूर्व कांग्रेस की जीत में मुस्लिम मतदाताओं की गिनती की जाती थी । मुस्लिम कार्ड के स्थान पर हिंदू कार्ड खेलने की रणनीति ,यही से बनी और फिर वर्ष 1984 में वर्षों से तालाबंद पड़ी बाबरी मस्जिद का ताला तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह व प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी के कार्यकाल में फैजाबाद जिला ज़ज़ के आदेश से खोल दिया गया। उसके बाद सांप्रदायिक शक्तियों का उदय और कांग्रेस के पतन का प्रारम्भ हुआ। यदि यूं कहा जाए तो उचित रहेगा की मुसलमानों से काग्रेसी लीडरशिप को नाराज करने के षड़यंत्र में जहाँ एक और अहम् भूमिका भीतर संघी सोच के हिंदू काग्रेसी ने निभाई तो वहीं मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने अपनी बयानबाजी से मुसलमानों का बहुत नुकसान किया।पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की 31 अक्टूबर 1984 में उन्ही के सुरक्षा गार्ङो के हत्या करने के पश्चात् उनके पायलट बेटे राजीव गाँधी को नेहरू परिवार की राजनीति विरासत की डोर थामनी पड़ी राजीव गाँधी की अनुभवहीनता का लाभ उठाकर अयोध्या में बाबरी मस्जिद राम जन्म भूमि विवादित परिसर में कांग्रेस में मौजूद संघ के लोगो ने यह कहकर शीलन्यास करा दिया कि इससे भाजपा कमजोर होगी । 1991 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का चुनावी अभियान राम की नगरी अयोध्या से प्रारम्भ कर के हिंदू मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश की गई की हिंदू कार्ड खेलने में कांग्रेस भाजपा से पीछे नही है । चुनाव में तो कांग्रेस को जीत मिली परन्तु उत्तर प्रदेश व बिहार में वह कमजोर हो गई और इसके विपरीत भाजपा को हिंदुत्व का टॉनिक मिल गया और उसने मन्दिर आन्दोलन और तेज किया । फिर राम मन्दिर का ज्वर पूरे देश पर ऐसा चढा की लाल कृष्ण अडवाणी ने सोमनाथ से यात्रा निकालकर पूरे देश में साम्प्रदायिकता का विष घोल डाला । उधर कांग्रेस से मुसलमानों की नाराजगी बढती गई और शाह बानो केस के निर्णय ने जो सुप्रीम कोर्ट से हुआ आग में घी का काम कर गया । पूरा मुस्लिम समुदाय उठ खड़ा हुआ और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का गठन कर किया अली मियाँ ने आन्दोलन की कमान संभाली । राजीव गाँधी को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने लोकसभा में बिल पेश कर के मुसलमानों के गुस्से को थोड़ा शांत किया और मुसलमानों का विश्वाश कांग्रेस में लौट रहा था 1991 के आम लोकसभा चुनाव के बीच ही जब ऐसा लग रहा था की राजीव गाँधी की अपार बहुमत से सरकार बन जायेगी तो उनकी हत्या कर दी गई और देश कांग्रेस की कमान नरसिम्हा राव के हाथो में आ गई । जिन्होंने बाबरी मस्जिद की ईंट से ईंट बजा कर उसे जड़ से समाप्त कर दिया और उस पर अस्थायी मन्दिर का निर्माण कराने के बाद विवादित परिसर के अधिग्रहण एवं उसकी सुरक्षा की व्यवस्था सुद्रढ़ कर के ही दम लिया ।
तारिक खान
(क्रमश :)

1 टिप्पणी:

Sachi ने कहा…

लगता है कि मुसलामानों के पास तालीम, रोज़गार जैसे मुद्दे नहीं हैं.. उनके लिए बस यही मुद्दे बचे हैं कि कौन सरकार उन्हें महफूज़ रख सकती है.., और सब पार्टियों ने इसका खूब फायदा उठाया.

लेकिन जब वे जागेंगे तो नेताओं और नेताओं की हाँ में हाँ मिलाने वालों के पास जवाब नहीं होगा.