शुक्रवार, 18 जून 2010

अमेरिकी साम्राज्यवाद का रूप व एशिया - 1

आज इस भूमण्डलीयकरण के युग में जहाँ विश्व को एक ग्राम के रूप में देखने की बात स्वीकारी जा रही है वहीं इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता कि विभिन्न देशों में सामाजिक स्थिरता, समरसता और अखण्डता को तोड़ने हेतु साम्राज्यवादी शक्तियाँ भिन्न-भिन्न हथकण्डों का प्रयोग कर रही हैं। जहाँ वे एक ओर जन कल्याण की नई-नई सुविधाओं और स्कीमों का प्रचार प्रसार कर रही हैं वहीं दूसरी ओर अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु इसी जन के शोषण को घिनौना रूप देती द्रष्टव्य होती हैं। हम इस बात से भली-भाँति परिचित हैं कि अमेरिका ही इन सब रणनीतियों व षडयंत्रों का सूत्रधार है। वस्तुतः आज विश्व धरातल पर अमेरिका की जो छवि बनी हुई है उसे सुधारने हेतु व अपने घिनौने कार्यों पर पर्दा डालने हेतु ही इन जन कल्याण की सुविधाओं का छद्म रचा जा रहा है। वास्तविकता यह है कि अमेरिका अपनी इन्हीं रणनीतियों की आड़ में अपने वर्चस्व को कायम रखने का जो षडयंत्र रच रहा है, वह आतंकवाद का असल जनक है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि उसके निशाने पर एशिया व अफ्रीका के देश ही प्रमुख रूप से हैं, जिसका प्रमुख कारण इन देशों के प्राकृतिक संसाधन व माल बेचने हेतु उपलब्ध बाजार का होना मान लिया जाए तो कदाचित् यह गलत न होगा।
बीसवीं सदी में बहुत ही नाटकीय ढंग से एशिया के कई देशों में घटनाएँ घटित हुईं हैं, जिसने न केवल एशिया बल्कि सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित किया है। जिसके अन्तर्गत विश्व सभ्यताओं के टकराव की बात को तूल देकर मुस्लिम समाज को आतंकी घोषित करने का प्रयास भी प्रमुख रूप से सम्मिलित है। वास्तव में अमेरिका अपनी निश्चित रणनीति के अन्तर्गत भिन्न-भिन्न देशों में वहाँ की सरकारों को अस्थिर करने के प्रयास करता है और इस प्रयास को सफल बनाने हेतु वह धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा, सम्प्रदाय व नस्ल आदि का सहारा लेकर कई प्रकार के दुष्प्रचारों को फैलाता है ताकि मनोवैज्ञानिक ढंग से उस देश के वातावरण में खण्डित होने की भावना को बढ़ावा दिया जा सके और उसकी अस्थिरता का लाभ उठाया जा सके। अमेरिका के साम्राज्यवादी नीतिकार पहले पहल इन देशों में आर्थिक, सामाजिक व पिछड़ेपन पर विशेष रूप से फोकस करते हैं, फिर उसमें छिपी संभावनाओं को एक हथियार की तरह प्रयोग करते हैं और इन्हीं देशों को धन, हथियार आदि देकर अपना काम निकलवाते हैं तथा फिर अपने ही प्रचार तंत्र द्वारा इन्हें बदनाम कर सुधारने का ठेका अपने जिम्मे ले लेते हैं। नोम चोमस्की के आलेख इस संबन्ध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध करवाते हैं। यह मात्र एक रणनीति है परन्तु ऐसी ही कई अन्य रणनीतियाँ भी हैं जो अमेरिका अपना हित साधने हेतु प्रयोग में लाता है।
आज यदि एशिया पटल पर दृष्टिपात किया जाए तो ज्ञात होता है कि अमेरिका के निशाने पर जो देश हैं उनमें मुस्लिम देशों की संख्या अधिक है। यह सत्य है कि इराक को तबाह करने के पश्चात् भी अमेरिका अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल नहीं हो पाया है परन्तु हाँ इस बात को कतई नहीं नकारा जा सकता कि इराक से युद्ध के बहाने अमेरिका ने एशिया के कई हिस्सों में अपनी सेना की संख्या कई गुना बढ़ा ली है। वहीं पश्चिम एशिया पर दृष्टिपात किया जाए तो ज्ञात होता है कि यहाँ के कुछ देशों में अमेरिका परस्त सरकारें ही कार्यरत हैं और ये देश अमेरिका की हर बुरी हरकत में बराबर के साझीदार हंै। ‘‘इज्राइल, कुवैत, जाॅर्डन और सऊदी अरब में पहले से ही अमेरिका परस्त सरकारें मौजूद थीं, लेबनान के प्रतिरोध को अमेरिकी शह पर इज्राइल ने बारूद के गुबारों से ढाँप दिया है और सीरिया, ओमान, जाॅर्जिया, यमन जैसे छोटे देशों की कोई परवाह अमेरिका को है नहीं, भले ही तुर्क जनता में अमेरिका द्वारा इराक पर छेड़ी गई जंग का विरोध बढ़ा है लेकिन अपनी राजनैतिक, व्यापारिक, व भौगोलिक स्थितियों की वजह से तुर्की की सरकार यूरोप और अमेरिका के खिलाफ ईरान के साथ खड़ी होगी, इसमें संदेह ही है। कुवैत में अमेरिकी पैट्रियट मिसाइलें तनी हुई हैं, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के पानी में अमेरिका नौसेना का पाँचवा बेड़ा डाले हुए है। कतर ने इराक और अफगानिस्तान पर हमलों के दौर में अमेरिकी वायुसेना के लिए अपनी जमीन और आसमान मुहैय्या कराये ही थे।’’
यदि एशिया की विगत कुछ दशकों की स्थितियों का मूल्यांकन किया जाए और भविष्य सम्बंधी अमेरिका की रणनीति की बात को उससे मिलाकर देखा जाए तो ज्ञात होता है कि इराक और फिलिस्तीन की साम्राज्यवाद विरोधी नीतियों को कुचलने के पश्चात अब अमेरिका के निशाने पर ईरान ही है। छद्म रूप में विश्व से आतंकवाद मिटाने का संकल्प लेने वाला अमेरिका अपनी सूची में ईरान और उत्तर कोरिया को प्रमुख रूप से शामिल किये हुए हैं। 9/11 के पश्चात अमेरिकी व पश्चिमी मीडिया ‘इस्लामी आतंकवाद’ का मिथ खड़ा कर, इन मुस्लिम देशों में नरसंहार को अपने मनमाने ढंग से क्रियान्वित करना चाहता है परन्तु ईराक को उसकी बेगुनाही के पश्चात भी लाशों के आवरण में ढकने का जो कार्य अमेरिका ने किया है वह विश्व पटल पर अमेरिका के झूठ, छद्म व उसकी खतरनाक नीतियों की कलई खोलकर रख देता है। उत्तरी कोरिया ने अमेरिकी रणनीतियों को पहचान लिया था, जिससे बचने हेतु उसने स्वयं को एक परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया परन्तु ईरान ऐसा नहीं कर सका। अब अमेरिका का विशेष ध्यान ईरान पर है। इसी कारण पाकिस्तान, अफगानिस्तान, सऊदी अरब और इराक आदि में अमेरिकी सेना की उपस्थिति को बनाये रखा गया है।

-डा0 विकास कुमार
मोबाइल: 09888565040

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