शनिवार, 21 अगस्त 2010

जाति आधारित जनगणना एवं अन्य बातें




(“क्लास कास्ट रिजर्वेशन एंड स्ट्रगल अंगेस्ट कास्टिज्मकिताब का दूसरा संस्करण इस सप्ताह आने वाला है। किताब के लेखक .बी. बर्धन ने दूसरे संस्करण की प्रस्तावना लिखी है जो कुछ उन मुद्दों के बारे में है जिन पर जाति आधारित जनगणना सहित जाति और वर्ग को लेकर अभी बहस चल रही है। हम इस प्रस्तावना को छाप रहे हैं जिससे इन मुद्दों पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दृष्टिकोण को समझने में मदद मिलेगी - संपादक)
क्लास कास्ट रिजर्वेशन एंड स्ट्रग्ल अंगेंस्ट कास्टिज्मकिताब पहले 1990 में प्रकाशित हुई थी। इनमें उन लेखों एवं दस्तावेजों को शामिल किया गया है जो 1980 के दशक में लिखे गये थे जबकि मंडल कमीशन की सिफारिशों के आने और वी.पी. सिंह सरकार द्वारा उन पर अमल की घोषणा से पहले और बाद में आरक्षण के पक्ष और विपक्ष में जबर्दस्त बहस और आंदोलन चला था।
इन लेखों और दस्तावेजों में केवल आरक्षण एवं मंडल आयोग की सिफारिशों और उनको लागू करने के जटिल मुद्दों पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के दृष्टिकोण को व्यक्त किया गया बल्कि वर्ग, जाति आरक्षण और जातिवाद के विरूद्ध संघर्ष के बारे में तथा जातियों को समाप्त करने और अन्यायपूर्ण जाति प्रथा को मिटाने के बारे में सैद्धांतिक पक्ष को पेश करने का प्रयास किया गया। ये सभी प्रश्न आज भी, अधिक नहीं तो समान रूप से, प्रासंगिक बने हुए हैं। वे देश के राजनीति एवं सामाजिक एजेंडे से गायब नहीं हो गये हैं। इसलिए हम सब किताब का दूसरा संस्करण निकाल रहे हैं जो आशा है उपयोगी साबित होगा।
जाति आधारित जनगणना की मांग की गयी है तथा यह मांग संसद के समक्ष है। हमने इस विषय पर अपने दृष्टिकोण के साथ पूर्व मुख्य न्यायाधीश राजिन्दर सच्चर के एक लेख को भी शामिल किया है।
लोगों की बहुपक्षीय सामाजिक पहचान है- जैसे वर्ग पहचान, जाति पहचान, धार्मिक पहचान, भाषाई पहचान, एथनिक पहचान (नृजातीय पहचान) और अन्य। यहां हम खासकर हमारे बहुसंख्यक लोगों की वर्ग पहचान और जाति पहचान की बात करेंगे। मार्क्सवादी होने के नाते हमने हमेंशा भारत में वर्गों एवं जातियों दोनों के अस्तित्व के सामाजिक यथार्थ को स्वीकार किया है।
लेकिन यह सच है कि हमने हमेशा अपने आंदोलनों और संघर्षों के आधार के रूप में वर्ग पहचान पर ही जोर दिया है। यह उनकी जाति पहचान को लगभग अलग रखकर किया गया है। अक्सर यह चूक हो जाती कि मजदूर वर्ग एवं मेहनतकश किसानों की एकता को उनके जाति भेदों की अनदेखी करके हासिल करना और उसे बनाये रखना कठिन होता है।
यह वर्ग भेद शोषक वर्गो में, चाहे वे पूंजीपति हों या जमींदार कोई भूमिका अदा नहीं करता है, लेकिन विभिन कारणों से, यह जातिभेद शोषित वर्गाें में, उन्हें एकताबद्ध करने में कभी-कभी बाधा उत्पन्न करता है या कुछ कठिनाइयां पैदा करता है।
शहर और देहात में जो लोग आर्थिक रूप से शोषित वर्ग के होते हैं, उसके साथ ही साथ वे आमतौर पर सबसे ज्यादा सामाजिक रूप से भी शोषित जातियों के लोग होते हैं। वे राजनीतिक रूप से भी सबसे अधिक वंचित वर्ग हैं।
इसलिए मेहनतकश जनता के बीच एकता कायम करने तथा शोषकों के खिलाफ वर्ग संघर्ष विकसित करने के दौरान यह जरूरी है कि सभी प्रकार के जाति भेदभावों एवं शत्रुता का दृढ़ता से विरोध किया जाये और दलितों तथा तथाकथित निम्न जातियों के खिलाफ होने वाले हर तरह के अत्याचार एवं अन्याय के खिलाफ संघर्ष किया जाये और जातिवाद के खिलाफ सतत वैचारिक, राजनीतिक एवं व्यवहारिक संघर्ष चलाया जाये। ये सभी संघर्ष के विभिन्न पहलू हैं।
इन सभी को सकारात्मक कार्रवाई के साथ एक साथ जोड़ना होगा ताकि नीचे के तबकों को, जो अब तक समाज के शोषित, वंचित एवं पिछड़े तबके रहे हैं तथाकथित उच्च वर्गांे के बराबर लाया जा सके। ऐसे संघर्ष एवं जातियों को समाप्त करने तथा जाति प्रथा को मिटाने के संघर्ष के बीच एक द्वंद्वात्मक आंतरिक संबंध है। इसी वास्ते तो आरक्षण है, जो सकारात्मक कार्रवाई का एक तरीका है। लेकिन केवल यही एक अकेला तरीका नहीं है। सकारात्मक कार्रवाई के कई अन्य तरीके हैं जिनमें भूमि सुधार, कमजोर एवं वंचित वर्गांे के नीचे से ऊपर तक सशक्तीकरण शामिल हैं। बुर्जुआ सरकार का जमींदारों एवं बड़े भूस्वामियों के साथ संबंध है, वह उन तरीकों को कभी नहीं लागू करेगी। इसके लिए संयुक्त संघर्ष एवं सक्रिय हस्तक्षेप जरूरी है।
सोशलिस्ट और कम्युनिस्ट आंदोलन के प्रवर्तक यह अच्छी तरह समझते थे। इसलिए वे मजबूत आधार तैयार कर सके और अनेक क्षेत्रों एवं राज्यों में इन मजबूत आधारों के निर्माण में उन्होंने दलित और पिछड़ी जातियों को अपने साथ लामबंद किया। उन्होंने उचित ही कमजोर वर्गों के आर्थिक शोषण के खिलाफ संघर्ष को उनकी आकांक्षाओं तथा सामाजिक न्याय, गरिमा और बराबरी के लिए संघर्ष के साथ जोड़ा। लेकिन बाद के वर्षों में खामियों के कारण तथा हमारी समझदारी और व्यवहार में विफलता से दलितों एवं पिछड़ी जातियों पर आधारित पार्टियों को उनका शोषण करने और सामाजिक न्याय के नाम पर उनकी खास-खास मांगों को आगे बढ़ाने का मौका मिला। इस प्रकार उन पार्टियों ने कुछ राज्यों में हमारे जनाधार का क्षरण किया। उदाहरण के लिए बिहार में जहां राज्य पार्टी अपेक्षाकृत मजबूत थी तथा उत्तर प्रदेश एवं अन्य जगह में भी, ये पार्टियां इन तबकों के कुछ हिस्से को कम्युनिस्ट प्रभाव से हटाकार अपनी ओर लाने और उन्हें अपना वोट बैंक बनाने में सफल रही हैं।
उनका यह दावा कितना सच है कि वे सामाजिक न्याय की पार्टियां हैं या वे दलितों एवं पिछड़ी जातियों की भलाई के लिए लड़ रही हैं, भूमि सुधार के मुद्दे पर इनमें से अधिकांश पार्टियों के नेतृत्व के रवैये से पता चल जाता है कि वे कहां खड़े हैं। उदाहरण के लिए वे बिहार में भूमि सुधार आयोग की सिफारिशों का विरोध करने के लिए एकजुट हो गये हैं। आयोग ने भूमिहीनों को अतिरिक्त भूमि का वितरण करने, जिनके पास मकान नहीं है ऐसे खेत मजदूर परिवारों को मकान बनाने के लिए 10 डिसमिल जमीन देने, बटाईदारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने आदि की सिफारिशें की हैं। इन कदमों से सबसे गरीब लोगों तथा उनमें से सबसे पिछड़ों को भला होता है और उन्हें अपने जीवन में सुरक्षा एवं गरिमा प्राप्त होती है। ये वही लोग हैं जो दलित और अत्यंत पिछड़ी जाति के हैं। पर जाति पर आधारित पार्टियां इन सिफारिशों का विरोध कर रही हैं। जब भूमि सुधार की बात आती है तो इन जाति आधारित पार्टियों का यह दावा निरर्थक साबित होता है कि वे सामाजिक न्याय के लिए काम कर रही हैं।
खाप पंचायतेें और तथाकथितऑनर किलिंगकेवल सगोत्र विवाह के खिलाफ नहीं है बल्कि वे ऐसी मिश्रित जातियों के विवाह के भी खिलाफ है जिसमें निम्न जाति का एक पार्टनर ऊंची जाति के पार्टनर के साथ शादी करता है। ये खासतौर पर घिनौने किस्म की सोच-विचार कर की गयी हत्याएं हैं। सख्त कार्रवाई करके इन्हें खत्म करने की जरूरत है।
आरक्षण केवल सरकारी और अर्धसरकारी नौकरियों के लिए लागू है बल्कि सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों की नौकरियों के लिए भी लागू है। सरकार अब सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों के निजीकरण की ताबड़तोड़ कोशिश कर रही है। इससे आरक्षित श्रेणियों के लिए उपलब्ध रोजगार प्रभावित होंगे। इसलिए निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग पूरी तरह न्यायोचित है, हालांकि कुछ मामलों में वैध एवं खास कारणों से छूट हो सकती है।
इस समय यह बहस चल रही है कि 2010 की जनगणना में क्या जाति की गणना को शामिल किया जाना चाहिए या नहीं। क्या ऐसा करना संविधान की भावना के विपरीत नहीं होगा? इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह सवाल उठता है कि क्या इससे जात-पात की भावना को फिर से हवा नहीं मिलेगी तथा जातिवाद के खिलाफ लड़ने और उसे समाप्त करने के लिए हमारे प्रयास कमजोर नहीं होंगे?
जाति एक सामाजिक यथार्थ है। इसके अस्तित्व से इंकार करके इससे बचा नहीं जा सकता। हम देख चुके हैं कि भारतीय समाज में जाति प्रथा का कितना बुरा प्रभाव पड़ा है। अनुसूचित जातियों, जिन्हें अछूत माना जाता है, के अलावा सामाजिक एवं शैक्षिणक रूप से पिछड़े वर्गों के निर्धारण में निम्न जातियों को ऐसे समूहों एवं वर्गों के रूप में रखना पड़ा जिनकी स्पष्ट पहचान हो सके। 1931 की जनगणना के आधार पर यह अनुमान लगाया गया था कि ये अन्य पिछड़े वर्ग, ओबीसी करीब 52 प्रतिशत हैं। उन्हें 27 प्रतिशत आरक्षण दिया गया ताकि कुल आरक्षण 50 प्रतिशत को पार कर जाये।
लेकिन अनेक अदालतों में यह सवाल उठाया गया है कि इस आंकड़े पर कैसे पहंुचा गया। इसलिए यह उपयोगी रहेगा कि ताजा जनगणना करके हम किसी आंकड़े पर पहुंचे। इन वर्गों के कल्याण के लिए बनायी जाने वाली अनेक योजनाएं भी ताजा आंकड़ों पर आधारित की जा सकती हैं।
लेकिन जाति आंकड़ों में हेरफेर करने और लाभ पाने या समाज में बेहतर हैसियत प्राप्त करने के उद्देश्य से जनगणना के समय जाति को बदलकर बताने-इन दो खतरों से हमें सावधान रहना होगा।
केवल ओबीसी के रूप में गणना नहीं हो सकती क्योंकि सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधारपर किस जाति को इसमें शामिल किया जाये, किसको नहीं, यह एक खुला प्रश्न है।
लोगों का एक बड़ा हिस्सा है जो जाति या यहां तक कि धर्म के आधार पर अपनी पहचान नहीं कराना चाहता। जनगणना के दौरान इन लोगों को अधिकार है कि वे अपनी जाति या धर्म बताने से इंकार कर सकते हैं। इस वर्ग की संख्या बढ़ रही है और इसे नोट किया जाना चाहिए। निश्चय ही आज जाति एक राजनीतिक मुद्दा बन गयी है। यह खतरा है कि जाति आधारित जनगणना में ऐसी स्थिति पैदा हो सकती है जिसमें जाति पहचान राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्र में अन्य तमाम बातों पर हावी हो जाये तथा अन्य की तुलना में किसी जाति भेद एवं जाति द्वेष बढ़ाने के लिए किया जाये। राजनीतिक नेतृत्व एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को इसके प्रति सावधान रहना होगा। हमारा उद्देश्य स्पष्ट रहना चाहिए। हम जातिविहीन एवं वर्गविहीन समाज के पक्षधर हैं जो केवल एक पूर्ण विकसित समाजवादी समाज में ही सुनिश्चित हो सकता है। हमें ऐसे क्रांतिकारी बदलाव के लिए संघर्ष करना है, लड़ाई लड़नी है।

- .बी.बर्धन
लेखक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव हैं।

4 टिप्‍पणियां:

Surendra Singh Bhamboo ने कहा…

आपके ब्लॉग को जोड़ दिया गया है।
अपनी नई पोस्ट इस एगरीकेटर ब्लॉग पर देख सकतेहै।
ब्लाग जगत की दुनिया में आपका स्वागत है। आप बहुत ही अच्छा लिख रहे है। इसी तरह लिखते रहिए और अपने ब्लॉग को आसमान की उचाईयों तक पहुचइये मेरी यही शुभकामनाएं है आपके साथ
हमारे ब्लॉग पर आपका स्वागत है।
मालीगांव
साया
आपकी पोस्ट यहा इस लिंक पर भी पर भी उपलब्ध है। देखने के लिए क्लिक करें
लक्ष्य

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

लेख अच्छा है!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

लेख अच्छा है!

हास्यफुहार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।