गुरुवार, 31 मार्च 2011

हिन्दुत्व का ‘असीम’ आतंक भाग 2

अपनी युवावस्था से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता रहे असीमानन्द का यह कबूलनामा, जिसके अन्तर्गत उसने अपने तमाम अपराधों को कबूला है और संघ के शीर्षस्थ नेताओं की सहभागिता के बारे में भी बताया है। पिछले दिनों पंचकुला की अदालत में असीमानन्द ने यह भी बताया कि गुजरात के मोडासा बम धमाके को भी संघ के कार्यकर्ताओं ने अंजाम दिया था।
ध्यान रहे कि मालेगाँव के 2008 के बम धमाके के दिन और लगभग उसी वक्त मोडासा के मुस्लिमबहुल इलाके में बम फटा था जिसमें दो निरपराध मारे गए थे। नांदेड़ बम धमाका, मालेगाँव बम ब्लास्ट, अजमेर, मक्का मस्जिद बम धमाका, समझौता एक्सप्रेस में बम रखना आदि तमाम आतंकी काण्डों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की संलिप्तता के पुख्ता प्रमाण अब जाँच एजेंसियों के पास हैं और अगर मुल्क की कानूनी मशीनरी ने ठीक से काम किया तो अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि संघ के तमाम शीर्षस्थ नेता सलाखों के पीछे पहुँच सकते हैं।
अपने कबूलनामे में भारत के राष्ट्रपति एवं पाकिस्तान के राष्ट्रपति को भेजे गए एक ही किस्म के पत्रों में असीमानन्द ने बताया है कि किस तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने योजना बना कर मालेगाँव के 2006 एवं 2008 के बम धमाकों को, अजमेर शरीफ एवम् मक्का मस्जिद के बम विस्फोटों को तथा समझौता एक्सप्रेस के बम विस्फोट को अंजाम दिया। दरअसल असीमानन्द के इस बयान को नेट पर भी पढ़ा जा सकता है (www.tehelka.com)जो उसने दिल्ली की अदालत में हिन्दी में लिख कर दिया है। इन तथ्यों को जानना इसलिए जरूरी है कि संघ परिवार के लोग इस मसले को लेकर घर-घर जाकर प्रचार कर रहे है। उनका कहना यह होता है कि यह सब किसी साजिश का हिस्सा है।
अगर संघ के कार्यकर्ताओं से साबिका पड़े तो उनसे पहला सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि आखिर अहिल्याबाई होलकर के कार्यों एवं बलिदानों से इन्दौर-मालवा का जो इलाका रौशन रहा है, जिनके सामाजिक कार्यों की आज भी लोग तारीफ करते हैं, वह इलाका अचानक हिन्दुत्व आतंक की नर्सरी क्यों बन गया? इसी से जुड़ा मसला है कि ऐसा क्यों हो रहा है कि भारत में आतंकी घटनाओं में जहाँ हिन्दुत्ववादी संगठनों के शामिल होने की बात सामने आती है, उसके अधिकतर सूत्र इसी इलाके से जुड़े दिखते हैं। सोचने की बात है कि इन दिनों फरार चल रहा बम विशेषज्ञ रामजी कलासांगरा या संदीप डांगे हों, जिनके लिए 10 लाख का इनाम सरकार ने घोषित किया है या 2002 से अलग-अलग आतंकी घटनाओं में रहा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का प्रचारक सुनील जोशी हो, या सुनील जोशी की हत्या में शामिल रहे संघ के कार्यकर्ता हों, या देश में अलग-अलग स्थानों पर आतंकी घटनाओं को अंजाम देने के लिए इस इलाके के विभिन्न स्थानों पर आयोजित की गई मीटिंग्स हों, आखिर इस इलाके का यह रूपान्तरण क्यों हुआ? यह अकारण नहीं कि असीमानन्द के कबूलनामे में इस इलाके का और यहाँ के संघ के कई कार्यकर्ताओं का जिक्र बार-बार आता है।
इस बात पर भी कम लोगों ने गौर किया है कि संघ के सुप्रीमो मोहन भागवत ने खुद कुछ दिन पहले यह स्वीकृति दी थी कि कुछ अतिवादी हमारे यहाँ पल रहे थे, जिन्हें हमने निकाल दिया है? लोगों से यह जाना जा सकता है कि क्या इसकी कोई फेहरिस्त संघ ने जारी की। तीसरा अहम सवाल उनसे यह पूछा जाना चाहिए कि जिस तरह असीमानन्द ने अपने
अपराधों की स्वीकृति दी, उस किस्म की स्वीकृति देने का नैतिक साहस कितने संघ कार्यकर्ताओं के पास आज है या वे भी इन्द्रेश कुमार की तरह बच-बच कर फिरने में ही यकीन रखते हैं?
जाहिर सी बात है कि दिल्ली की अदालत में पिछले दिनों असीमानन्द नामक इस शख्स ने जो लिखित इकबालिया बयान दिया, उससे संघ परिवार का जो आतंकी चेहरा सामने आया है, उससे वे सभी लोग भी स्तब्ध हैं, जो हिन्दुत्व के विचारों के हिमायती बताए जाते हैं।
साफ है कि अजमेर बम धमाके में राजस्थान आतंकवाद निरोधी दस्ते द्वारा दाखिल चार्जशीट में संघ के वरिष्ठ नेता इन्द्रेश कुमार का नाम आने के बाद उभरी परिस्थिति से निपटने में मुब्तिला संघ परिवारजनों ने शायद यह सपने में भी नहीं सोचा था कि संघ का अन्य पूर्णकालिक कार्यकर्ता नव कुमार सरकार जिसे ‘स्वामी असीमानन्द’ के नाम से गुजरात के आदिवासी बहुल डाँग जिले में काम करने के लिए भेजा गया था, वह देश के कई अहम बम
धमाकों में संघ परिवार से जुड़े राष्ट्रव्यापी आतंकी माॅड्यूल की जानकारी सार्वजनिक करेगा और उन अपराधों में अपनी संलिप्तता को भी कबूल करेगा। मालूम हो कि नवम्बर माह के मध्य में असीमानन्द को हरिद्वार से गिरफ्तार किया गया था, जहाँ वह एक आश्रम में नाम बदल कर रह रहा था।
दिल्ली के मेट्रोपाॅलिटन मैजिस्टेªट की अदालत में भारत के दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के तहत दिए गए इस ‘कन्फेशन’ (अपराधस्वीकृति) को देने के पहले पदासीन मजिस्टेªट दीपक डबास ने यह सुनिश्चित किया कि अभियुक्त किसी दबाव के तहत तो बयान नहीं दे रहा है। इसलिए 16 दिसम्बर को जब कन्फेशन देने का उसका इरादा जाँच अधिकारी के मार्फत पता चला, तब मैजिस्टेªट ने असीमानन्द को दो दिन का समय विचार करने के लिए देकर भेजा ताकि वह ठीक से सोच कर आए। कन्फेशन देने के पहले असीमानन्द को यह स्पष्ट बताया गया कि अदालत में जब मुकदमा चलेगा तो इस बयान का उसके खिलाफ इस्तेमाल हो सकता है।
असीमानन्द की अपराधस्वीकृति और इसमें संघ परिवार के वरिष्ठ नेताओं की सहभागिता के बारे में दिए गए बयान के बाद संघ परिवार में जबरदस्त हड़बड़ी मची है। चन्द रोज पहले ही संघ सुप्रीमो मोहन भागवत ने सफाई के अन्दाज में यह बयान भी दे दिया कि संघ के कुछ कार्यकर्ता अतिवादी हरकतों में शामिल थे, जिन्हें निकाल दिया गया है। दूसरी तरफ संघ परिवार ने 26 जनवरी से पूरे देश में एक अभियान चलाने का निर्णय लिया है, जो बजट सत्र तक चलेगा। इस अभियान में संघ कार्यकर्ता घर-घर जाकर यह बताने की कोशिश करेंगे कि यह सब ‘कांग्रेस का षड्यंत्र है तथा हिन्दू समाज को बदनाम करने की कोशिश है।’ वैसे बयान में स्वीकृति और कार्रवाई के स्तर पर विरोध, यह विरोधाभास संघ के उसी अन्तद्र्वंद्व को उजागर करता है, जिसमें वह आतंकवाद के मसले पर खुद को फँसा पा रहा है।

- सुभाष गाताडे
क्रमश:

3 टिप्‍पणियां:

पद्म सिंह ने कहा…

बकवास !
NICE= Non Indian Cad Effrontery

Suresh Chiplunkar ने कहा…

सुभाष जी, पुरानी-सुरानी बातें उठा लाये हैं, साध्वी प्रज्ञा को अब तक खामखा बिना किसी केस-मुकदमे के जेल में ठूंस रखा है और अत्याचार जारी हैं, इसी प्रकार असीमानन्द ने भी कह दिया है कि वह बयान उससे जबरदस्ती दबाव डालकर लिखवाया है…

तहलका का रेफ़रेंस दिया गया है, जबकि तरुण तेजपाल की खुद की विश्वसनीयता संदेह के घेरे में है…

ajeet ने कहा…

इसमें तहलका शब्द ही इसे ना पढने के लिए काफी है.तहलका का रिफरेन्स यानी एकदम झूठ, बकवास,
तहलका ने हिन्दुओं को बदनाम करने का ठेका ले रखा है. जहां भी तहलका का रिफरेन्स हो सभी पाठक
बंधुओं से आग्रह है वे लेख का पूर्ण बहिष्कार करे उस समाचार, लेख पर ध्यान ना दे.