बुधवार, 13 अप्रैल 2011

जलियावाला बाग़ कांड आज ही के दिन हुआ था, आज भी जारी है....


जलिया वाला हत्याकांड को अमृतसर के सैन्य प्रशासक डायर द्वारा किया गया और पंजाब के गवर्नर माइकल ओ डायर द्वारा अनुमोदित घटना मानकर ही नही छोड़ा जा सकता |इसे ब्रिटिश साम्राज्यी ताकत द्वारा हिंदुस्तान जैसे पिछड़े राष्ट्र पर प्रभुत्व थोपने के बर्बर प्रयास के अभिन्न अंग के रूप में देखा व समझा जाना चाहिए |ब्रिटेन ,फ़्रांस ,जर्मनी ,जापान और अब सबसे बढकर अमेरिका के ऐसे प्रयास खत्म नही हो गये है | बल्कि वे आज भी जारी हैं |कंही ज्यादा तेजी के साथ जारी है |
अपने को सर्वाधिक सुसभ्य जनतांत्रिक कहने वाले ब्रिटिश साम्राज्यवाद के इस बर्बर हत्याकांड के साथ दुनिया की इन सुसभ्य ताकतों द्वारा ऐसी बर्बर कार्यवाही का सिलसिला चलता रहा है |
ऐसी बर्बर एवं आतंकी कार्यवाही इन ताकतों के विश्वव्यापी प्रभुत्व का अनिवार्य हिस्सा हैं |
इन कार्यवाहियों में इनके एशियाई ,अफ़्रीकी व दक्षिण अमेरिकी देशो के लोगो के प्रति बैठी नस्ल रंग की उपेक्षा व घृणा का वहशियाना प्रदर्शन भी होता रहा हैं |वर्तमान दौर में इसकी अगुवाई सर्वाधिक ताकतवर राष्ट्र अमेरिका कर रहा है |ब्रिटेन .फ़्रांस जैसी साम्राज्यी ताकते उसकी सहयोगी बनी हुई हैं |
बताने की जरूरत नही कि वर्तमान दौर की अमेरिकी साम्राज्य के आतंकी हमलो की कार्यवाही आज उसके पिछलग्गू बने छोटे साम्राज्यवादी जापान पर एटमी धमाको के साथ आगे बढ़ी थी |
उसके जरिए उसने निरपराध जापानी नागरिको को मारकर और अपंग अपाहिज तथा रोग ग्रस्त बनाकर अपने एटमी ताकत दिखाने और उससे दुनिया को आतंकित करने का काम किया था |फिर ३० सालो तक वियतनाम पर किये जाते रहे अपने बर्बर बमबारी से उसे तबाह बर्बाद करने का काम आगे बढ़ाया | दुनिया की सुसभ्य साम्राज्यी ताकते उसका आमतौर पर प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष समर्थन करती रही |
फिर इधर इराक ,अफगानिस्तान ,में भी जलियावाला बाग़ हत्याकांड को दोहराया बढ़ाया जाता रहा है |अब लीबिया को नया जलियावाला बनाने का सिलसिला शुरू किया जा रहा हैं |
यह तो प्रत्यक्ष साम्राज्यी फौजी हुकूमतों, कार्यवाहियों द्वारा आमलोगों के सामूहिक कत्त्लेआम के उदाहरण हैं |
इसके अलावा भारत में भोपाल गैस काण्ड में साम्राज्यी उपेक्षा पूर्ण बद- इन्तजामी से हजारो लोगो को मारने का काम कर दिया गया |
फिर अब लाखो किसानो बुनकरों ,दस्तकारो ,मजदूरों द्वारा की जा रही आत्महत्याए भी साम्राज्यी आर्थिक हमलो से बढती रही जनसमस्याओ के अप्रत्यक्ष उदाहरण है |
बदकिस्मती यह है कि अगर उस समय के रौलट कमेटी में दो हिन्दुस्तानी मौजूद थे तो आज साम्राज्यी नीतियों ,प्रस्तावों कानूनों को समर्थन देने में ,उनकी हमलावर कार्यवाहियों का प्रत्यक्ष एवं परोक्ष समर्थन करने व सहयोग देने में लगभग सभी पिछड़े देशो की हुकूमते साम्राज्यी ताकतों के प्रमुखत्व की विश्व कमेटी में शामिल की जा रही हैं |संयुक्त राष्ट्रसंघ ,सुरक्षा परिषद में बैठकर उनका अनुमोदन कर रही है |
जबकि पिछड़े देशो की शासित व शोषित जनता पर आर्थिक ,सामाजिक सांस्कृतिक व सैन्य हमले तेज़ होते जा रहे है | व्यापक पैमाने पर उनकी परोक्ष व प्रत्यक्ष हत्याए सरेआम की जा रही हैं |............यह सब इस बात के सबूत हैं कि जलियावाला हत्याकांड जारी हैं |
खासकर पिछड़े देशो के जनसाधारण लोगो की हत्याए और जघन्य हत्याए जारी हैं |पिछड़े देशो के हुक्मरानों के सहयोग से जारी हैं |इसे देश दुनिया के जनसाधारण को ही समझना हैं |फिर उसे ही उन हत्याकांडो में देश के धनाढ्य अपराधियों और उनके हिमायतियो, सिपहसालारो की ताकत को तोड़ने का फैसला भी सुनाना हैं | उसे ही फैसलों को लागू करने और अंजाम तक पहुचाने का काम करना हैं | ...............जलियावाला हत्याकांड की पीड़ित आत्माये। वियतनाम ,इराक ,की पीड़ित आत्माए देश दुनिया के जनसाधारण से शोषित जनों से आज भी फैसले की मांग कर रही है |

हत्याकांड की पृष्ठभूमि ..........

जलियावाला बाग़ काण्ड को जानने समझने के लिए उस समय की ,पूरे देश की त्तथा खासकर पंजाब की राजनीतिक ,सामाजिक परिस्थितियों को समझने का प्रयास जरुर किया जाना चाहिए |१९१४ -१५ से लेकर १९१९ -२० तक का दौर ,पूरे विश्व में भारी उथल -पुथल का दौर था |अमृतसर के जलियावाला बाग़ के निर्मम व् जघन्य हत्याकांड से पहले समूचा विश्व दो प्रमुक घटनाओं का साक्षी बना |इसमें एक तो था प्रथम विश्व युद्ध ,जो १९१४ से लेकर १९१८ तक चलता रहा और दूसरा था १९१७ में रूस में सफलता पूर्वक सम्पन्न हुई मजदूर क्रांति ,जिसके फलस्वरूप १९१७ में वंहा मजदूरों किसानो के हितो वाली समाजवादी सत्ता -सरकार की स्थापना हुई | इन दोनों घटनाओ ने विश्व के सभी देशो को खासकर हिंदुस्तान जैसे पिछड़े देशो को गहराई से प्रभावित किया |जंहा विश्व युद्ध ने इस देश के लोगो के जीवन व् जीविका के संकटो को गहरा कर दिया था ,वंही अक्टूबर १९१७ कि क्रांति ने देश -दुनिया के जन साधारण को अपनी समस्या से स्वयं मुक्ति पाने का गम्भीर क्रन्तिकारी संदेश सुना दिया था |देश की आम जनता को ब्रिटिश साम्राज्यवाद के शोषण लूट व् प्रभुत्व से स्वतंत्र होकर जनहित में क्रन्तिकारी जन -राज्य बनाने का भी संदेश दिया था |
पूरे देश में ब्रिटेन की गुलामी के विरुद्ध पहले से चलते रहे आंदोलनों ,संघर्षो को इन दोनों घटनाओ ने तीव्रता प्रदान कर दी |
इसी के साथ गदर पार्टी द्वारा तथा देश के आम मध्यवर्गीय क्रांतिकारियों द्वारा देश की स्वतंत्रता के लिए किये जाते रहे सशस्त्र प्रयासों ने भी इन संघर्षो को नया आवेग प्रदान कर दिया था |
आम जनता में ब्रिटिश शासन के प्रति भारी विरोध बढ़ता जा रहा था |
देश के धनाढ्य व्यापारियों द्वारा प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अग्रेज व्यापारियों के साथ मिलकर भारी लाभ उठाया गया था | उनका ब्रिटिश व्यापारियों शासको के साथ सहयोग करके उद्यौग व्यापार के लिए और अधिक छूटों की मांग भी बढने लगी थी | इसी तरह देश के उच्च पढ़े -लिखे हिस्सों में भी और ज्यादा पद -प्रतिष्ठा पाने के लिए मांगे भी ज्यादा तेज होने लगी थी |
पंजाब में इन आंदोलनों का प्रभाव और भी गहरा था |इसकी ख़ास वजह यह थी कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सरकार द्वारा पंजाबी नौजवानों को सेना में भर्ती करने के लिए खासी जोर जबरदस्ती की ज़ाती रही थी |युद्ध के लिए भारी टैक्स भी किसानो से वसूले जा रहे थे |टैक्स न दे पाने के एवज में भी उन्हें स्वयं या अपने बच्चो को फौज में भेजना पड़ता था |इसके अलावा गदर पार्टी के ज्यादातर लोग पंजाब से जुड़े हुए थे |इनके पकड़े जाने के साथ -साथ उनके साथियों ,सम्बन्धियों एवं ग्रामवासियों को प्रताड़ित किया जा रहा था |इसके फलस्वरूप भी पंजाब में किसानो से लेकर पढ़े -लिखे नौजवानों में संघर्ष की गतिविधिया जोर पकड़ने लगी थी |समूचे देश व् पंजाब की इन्ही खास परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटेन के हाईकोर्ट के न्यायाधीश रौलेट की अध्यछता में रौलेट कमेटी का गठन किया |इसका प्रमुख उद्देश्य हिंदुस्तान में क्रन्तिकारी गतिविधियों का अध्धयन व विवेचना करने के साथ -साथ उसके समाधान के उपाय प्रस्तुत करना था | इस कमेटी में जस्टिस रौलेट के अलावा बाम्बे के मुख्य न्यायाधीश बासिल स्काट, बोर्ड आफ रेवेन्यु के मेम्बर बर्नी लोवेट ,मद्रास हाईकोर्ट के जज सी .वी. कुमार स्वामी शास्त्री तथा कलकत्ता हाईकोर्ट के वकील प्रभात चन्द्र मित्र शामिल थे |
इस कमेटी की रिपोर्टो ,सुझावों के आधार पर ब्रिटिश सरकार ने रौलेट कानून लागू किया |
इसका पूरा नाम ( एनाक्रियल एंड रिवोल्यूशनरी एक्ट १९१९ हैं ) इसके अंतर्गत सरकार ने आम हिन्दुस्तानी को नाम मात्र के मिले नागरिक अधिकारों को भी खत्म कर दिया |
इसके तहत किसी भी व्यक्ति को शक के आधार पर गिरफ्तार करने ,बिना मामला मुकदमा चलाए ही लम्बे दिनों तक नजरबंद रखने ,किसी को भी पुलिस स्टेशन पर बुलाकर उसे रोजाना हाजिरी देने ,उसकी कंही भी आवाजाही को प्रतिबंधित करने का अधिकार सरकार को मिल गया था |
ब्रिटिश सरकार ने इन क़ानूनी प्रावधानों को ब्रिटिश राज और उसके अंतर्गत शांति व्यवस्था के लिए तथा जीवन व् सम्पत्ति की रक्षा के लिए अनिवार्य बताया |यह कानून देश में मार्च १९१९ में लागू कर दिया गया | इसके साथ ही प्रांतीय गवर्नरो तथा पुलिस बल के अधिकार व् ताकत को भी बढ़ा दिया गया |
पूरे देश में (रौलेट कानून )का व्यापक विरोध शुरू हुआ |देश के नेताओं द्वारा इसे .....कानून को खतम करने वाला कानून ....का नाम दिया गया |
कांग्रेस पार्टी के अन्य नेताओं के साथ दक्षिण अफ्रीका से चार साल पहले लौटे गांधी जी ने भी इसका सख्त विरोध किया | इस कानून को वापस लेने का अनुरोध करने और न वापस
लेने पर एक दिन का सावर्जनिक शांतिपूर्ण हड़ताल करने का एक पत्र भी गाँधी जी ने वायसराय को भेजा था |उस पत्र का कोई जबाब या आश्वासन न मिलने पर कांग्रेस कमेटी ने एक दिन के व्यापक सत्याग्रही हड़ताल का निर्णय लिया |
पहले इसके लिए ३० मार्च की तारीख रखी गयी बाद में उसे बदल कर ६ अप्रैल कर दिया गया |६ अप्रैल को पुरे देश में हड़ताल हुई और वह लगभग शांति पूर्ण ही रही |लेकिन दिल्ली में पुलिस व् पब्लिक के बीच जगह -जगह झडपे भी हुई पंजाब में हड़ताल का असर जोरदार रहा ,खासकर अमृतसर में वंहा यह हड़ताल पूर्व सूचना के अनुसार ३० मार्च को और फिर बाद में ६ अप्रैल को भी हुई |
पंजाब के कांग्रेसियों ने गाँधी जी को पंजाब आने का निमंत्रण भी दिया ,लेकिन अग्रेजो ने उन्हें दिल्ली से बाम्बे रवाना कर दिया |खबर उडी कि गाँधी जी को अग्रेजो ने गिरफ्तार कर लिया हैं |फलस्वरूप गाँधी जी के बाम्बे पहुचने से पहले ही अहमदाबाद , नाडिया और पंजाब में गाँधी जी की गिरफ्तारी को लेकर भी आन्दोलन तेज़ हो गया | परिणाम स्वरुप आंदोलित जनता ने कई जगहों पर सरकारी सम्पत्ति की तोड़फोड़ भी की |उसी के साथ उस पर सरकारी दमन भी तेज़ हो गया |
गाँधी जी ने बम्बई पहुचने के बाद सारा समाचार सुना उन्होंने तोड़फोड़ को जनता का हिंसात्मक कदम बताकर उसकी निन्दा की और यह भी कहा कि उन्होंने सत्याग्रही हड़ताल के लिए जनता का आह्वान करके भारी गलती की है | इसके वावजूद आम जनता ने विरोध जारी रखा और सरकारी दमन के बावजूद विरोध आमतौर पर शांत रहा | पंजाब में यह विरोध ज्यादा तीव्र रहा |इसका प्रमुख कारण वंहा पर पहले से चल रहे सरकारी दमन और उसमे आई तीव्रता रही |
लाहौर ,गुजरावाला , और अमृतसर इसके प्रमुख केंद्र रहे |

अमृतसर और जलियावाला काण्ड

अमृतसर में ३० मार्च और ६ अप्रैल के दिन व्यापक आम हड़ताल में कोई उल्लेखनीय घटना नही घटी , लेकिन ९ अप्रैल को वंहा के प्रशासक माइकल -ओ -डायर ने वंहा के दो प्रमुख स्थानीय नेताओं डॉ .किचलू एवं डॉ सतपाल मलिक को गिरफ्तार करके देश से निकाले जाने की सज़ा सुना दिया |इसके विरोध में आंदोलनकारियो द्वारा वंहा तुरंत हड़ताल व् प्रदर्शन की घोषणा कर दी गयी |लोग समूहबद्ध होकर गलियों व् सडको पर आ गये |हाल गेट ब्रिज पर इकट्ठी जनता को भगाने के लिए पुलिस ने गोलीबारी शुरू कर दी | १५ - २० लोग मारे गये और उससे भी बड़ी तादाद में घायल हए | प्रतिक्रिया स्वरूप गुस्साए लोगो ने पांच यूरोपीय बैंक अधिकारियो को एक बैंक में घुस कर मारा तथा एक मिशनरी लेडी डाक्टर को घायल कर दिया दो बैंको और अन्य कई सरकारी संस्थाओ को भी क्षतिग्रस्त कर दिया ११ अप्रैल तक सब कुछ शांत हो चुका था |तभी ब्रिटिश सरकार ने ब्रिगेडियर जनरल डायर को शहर का प्रशासक बनाकर भेजा |उसने १२ तारीख को लोगो को शहर में इकट्ठा होने और पब्लिक मीटिंग करने आदि पर रोक लगा दी और मार्शल ला जैसी स्थिति खड़ी कर दी |हालाकि मार्शल ला जैसी कोई विधिवत घोषणा १५ अप्रैल को हुई |जलियावाला बाग़ काण्ड की जाच कर रही हंटर कमेटी का भी मानना था कि १२ तारीख की शाम को हुई घोषणा की जानकारी बहुत कम लोगो तक ही जा पाई थी |फिर १३ अप्रैल को पूरे पंजाब में वैसाखी का त्यौहार बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है |
बताते हैं कि इसकी परम्परा तीसरे सिख गुरु अमरदास के जमाने से या उससे पहले से चली आ रही हैं | किसानो के रबी की फसल पकने के साथ जुडी बैसाखी का त्यौहार का एक बड़ा धार्मिक महत्त्व भी हें| बैसाखी के ही दिन अन्तिम गुरु गोविन्दसिंह ने पंचप्यारो को आगे कर के खालसा पंथ की नीव डाली थी |
पंजाब के इस त्यौहार और उसमे लोगो को इकट्ठा होने -मनाने की इस परम्परा के बाद जनरल डायर ने लोगो को इकट्ठा न होने का आदेश दे दिया साथ ही उसकी सूचना भी लोगो तक नही पहुचने दी |
डॉ किचलू और डॉ सत्यपाल की सज़ा के विरोध में १३ अप्रैल को जलियावाला बाग़ में शाम ४. ३० बजे आम सभा बुलाई गयी थी | इस मीटिंग को रोकने का भी जनरल डायर द्वारा कोई प्रयास नही किया गया | बल्कि लोगो को वंहा इकट्ठा होने दिया गया |उनकी कुल संख्या १० हजार से उपर थी |मीटिंग शुरू होने के बाद डायर ने अपने ५० रायफल धारियों को बाग़ के प्रवेश द्वार पर तैनात कर दिया और बिना रुके गोलिया चलाने का आदेश दे दिया |सभा में भगदड़ मच गयी | लोग भागते जा रहे थे और घायल होकर गिरते -मरते जा रहे थे |बाग़ के तंग दरवाजो (चार या पांच दरवाजो )पर भी लगातार गोलिया दागी जा रही थी |बाग़ की दीवारों और निकासी के दरवाजो पर मरे हुए लोगो का ढेर लग गया था |गोलिया दस मिनट तक चली |इतने समय में १६५० राउण्ड गोलिया चल गयी थी | इस घटना क्रम में १००० हजार से उपर लोग मारे गये और इससे भी बड़ी संख्या में घायल हुए |इतनी बड़ी तादात में मृतको को हटाने -हटवाने का भी काम प्रशासन ने नही किया |उलटे कर्फ्यू जैसी प्रशासनिक कार्यवाही द्वारा आम लोगो को भी यह काम करने से रोक दिया गया | गर्मी के मौसम में कई दिनों तक लाशे सूखती सडती रही | पूरे देश में इस हत्याकांड का व्यापक विरोध हुआ इंग्लैंड में विरोधी पार्टियों को भी सत्तासीन पार्टी के विरोध का हथकंडा मिला |इस विरोध के फलस्वरूप तथा इस देश में बिगड़ रहे जनमत को ब्रिटिश राज के समर्थन में मोड़ने के लिए भी ब्रिटेन की सरकार ने जलियावाला बाग़ काण्ड की न्यायिक जांच के लिए हंटर कमेटी की नियुक्ति कर दी |कमेटी के ९ सदस्यों में ६ यूरोपीय तथा ३ हिन्दुस्तानी थे |
कमेटी के सामने बयान देते हुए डायर ने कहा कि -गोली चलाने का उसका मकसद शहर में कानून व् व्यवस्था के प्रति लोगो में भय खड़ा करना था |प्रशासन की उपेक्षा करने वालो को सबक सिखाना था ......... हमारा काम यह देखना नही था कि कितने लोग मारे जा रहे और कितने घायल हो रहे हैं ...........हमारा काम कानून और व्यवस्था को सरक्षित करने का था और इस काम को हमने गौरवपूर्ण ढंग से सम्पन्न किया |
डायर के इस जघन्य काण्ड के लिए ब्रिटिश शासन द्वारा अक्तूबर १९१९ में उसे एक ब्रिगेड की स्थायी कमान सौपकर डायर को पुरस्कृत भी किया गया |
हालाकि बाद में हिन्दुस्तानियों और ब्रिटेन की विरोधी पार्टियों आदि के भारी दबाव के चलते डायर की सैन्य सेवा समाप्त कर दी गयी |लेकिन उसके प्रति अग्रेजो के खासे बड़े हिस्से में तथा हिंदुस्तान के एंग्लो-इन्डियन हिस्से में प्रशंसा व गर्व का भाव बना रहा |
पंजाब के गवर्नर माइकल -ओ -डायर ने हंटर कमेटी के सामने डायर की कार्यवाही का पूरा समर्थन किया |इसे पंजाब में विद्रोह के दमन का निर्णायक कदम बताया |हंटर कमेटी के हिन्दुस्तानी सदस्यों ने अपने निर्णय में डायर को बर्बर मनोवृति का व्यक्ति बताया और उसे सर्वथा निन्दनीय समझा |परन्तु कमेटी के यूरोपीय सदस्यों ने उसकी आलोचना करते हुए अपेक्षा कृत अत्यधिक नरमी दिखाई |उसके द्वारा किये गये हत्याकांड को महज अनुचित एवं विवेकहीन बताकर छुट्टी कर दी | बाद के दौर में ब्रिटेन की पार्लियामेंट में हुई बहस के बाद डायर को सेवानिवृत्त कर दिया गया |पर जलियावाला हत्याकांड और पंजाब में इस दौरान अत्याचारों पर ब्रिटिश संसद में कोई चर्चा -बहस नही हुई |न ही हिंदुस्तान की ब्रिटिश हुकूमत ने उनकेलिए सम्वेदना का कोई गम्भीर कदम ही उठाया |हां ,अमृतसर में मारे गये ५ यूरोपीय लोगो ,घायल हुई लेडी डाक्टर तथा सरकारी प्रतिष्ठानों में हुए तौड़ -फोड़ के लिए २१८ लोगो को सजा जरुर दे दी गयी | इसमें ५१ लोगो को फांसी तथा १६ लोगो को कालेपानी की सज़ा दी गयी |इसके अलावा ९ अप्रैल की घटना के बाद से लोगो को सरेआम कोड़े मारने सडक पर घुटनों के बल चलने आदि की पुलिसिया सज़ा तो हफ्तों तक चलती रही |.
जबकि डायर को सेवानिवृत्त किये जाने के बाद उसे उस कुकृत्य के लिए पुरस्कृत किया गया |उसके नाम पर एक कोष स्थापित किया गया उसमे २६००० पौण्ड की रकम तो आनन् -फानन में इकट्ठी हो गयी ,जिसका एक तिहाई हिस्सा हिंदुस्तान के एंग्लो -इन्डियन हिस्से से गया था |
.

प्रस्तुति:
सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672

3 टिप्‍पणियां:

blogtaknik ने कहा…

सत्य वचन अमिरिका दादागिरी करता हें. और वर्तमान समय में पेट्रोल के कुवो को आपने कब्जे में करने के लिया अपनी बर्बरता चालू हें . आपका लेख भूतकाल से लेकर वर्तमान और भविष्य की गटना को समजकर विकसित देश द्वारा मानवता पर दोहरा मापदंड अपनाने की स्पस्ट जांकी कराता हें.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

13 अप्रैल 1919 के स्वनामधन्य शहीदों को नमन!

sunil kumar ने कहा…

sandar dost kam se kam logo ko fir se yaad to dilya aap ne