शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

वैश्वीकरणवादी नीतियों के बीस साल

1991 में लागू नयी आर्थिक नीतियों को वैश्वीकरणवादी नीतिया भी कहा जाता हैं | क्योंकि ये नीतिया वैशिवक आर्थिक संबन्धो को बढाने वाली , उसमे राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय स्तर पर लगी रोक को हटाने वाली नीतिया हैं |उदारीकरणवादी नीतियों की तरह ही वैश्वीकरणवादी नीतियों को केवल इस देश में ही नही बल्कि विश्व के अन्य देशो में भी लागू किया जाता रहा हैं | उसे प्रस्तुत करने वैशिवक स्तर पर लागू कराने का काम भी अन्तराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे संगठनों द्वारा तथा विश्व पर अपनी पूंजी तकनीक , उत्पादन , विनिमय मुद्रा , बाज़ार के जरिये सर्वाधिक पहुच रखने वाले अमेरिका , इंग्लैण्ड जैसे साम्राज्यी देशो द्वारा किया जाता रहा हैं | हां , इस देश में और अन्य पिछड़े देशो में उसे लागू करवाने का काम इन देशो के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों तथा सरकारों द्वारा किया जाता रहा | दरअसल भारत और अन्य पिछड़े विकासशील देशो की धनाढ्य कम्पनियों , उच्च तबको और सरकारों के लिए ये अन्तराष्ट्रीय सम्बन्ध नये नही है , बल्कि पुराने हैं | अंग्रेजो के समय से चले रहे है | इन्ही संबंधो में देश के धनाढ्य तबके आधुनिक उद्योग , व्यापार के आधुनिक मालिक बने | इनकी पूंजियो , परिसम्पतियो में निरंतर वृद्धिया होतीरही | लेकिन 1989 -90 तक विदेशी पूंजी तकनीक के आयात पर विदेशी व्यापार , विदेशियों के साथ सहयोग साथ - गाठ पर कुछ कुछ रोक या नियंत्रण लगा हुआ था | अब वैश्वीकरणवादी नीतियों के तहत इन वैश्विक आर्थिक संबंधो में अब तक लगी रही रोक को हटाकर उसे और ज्यादा बढाने या कहिये खुल्लम - खुल्ला बढाने का काम देश की सरकारों द्वारा किया जाता रहा हैं |
1991 में इन नीतियों को लागू किए जाने के बाद विदेशी कम्पनियों पर विदेशी पूंजी व तकनीक पर विदेशी व्यापार पर थोड़ी बहुत लगी रोक को हटाकर उन्हें इस देश की धनाढ्य कम्पनियों जैसी छूटे व अधिकार मिलते रहे | देश की अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र में उद्योग व्यापार कृषि यातायात , संचार आदि सभी क्षेत्रो में अधिकाधिक घुसने की छूट व अधिकार दिए जाते रहे | यह काम आज भी जारी हैं |
देश की समूची अर्थव्यवस्था को अन्तराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के साथ खासकर अमेरिकी अर्थव्यवस्था के साथ और उसके अन्तराष्ट्रीय नियमन व संचालन के साथ जोड़ा जाता रहा | लेकिन इसका नतीजा देश के व्यापक जनसाधारण के लिए क्षेत्रीय व स्थानीय स्तर पर भी अपना अस्तित्व बचाने के बढ़ते संकट के रूप में आता रहा | उन्ही वैश्विक संबंधो को बढाने के लिए लागू किए गये डंकल - प्रस्ताव के अंतर्गत किसानो की परम्परागत बीजो से होने वाली आत्म निर्भर खेती को उजाड़ा जाता रहा। उन्हें विदेशो से आयातित बीजो को अपनाने के लिए मजबूर किया जाता रहा | फिर अब उन्हें भूमि अधिग्रहण के जरिये खेतियो का मालिकाना हक छोड़ने के लिए भी मजबूर किया जा रहा हैं | देश में खाद्यान्नो के उत्पादन को बढावा देने की जगह विदेशो से खाधान्नो के आयात को बढावा दिया जा रहा हैं |इसी तरह से लघु एवं कुटीर उद्योगों के उत्पादकों के इस देश के बाज़ार को विदेशी मालो , सामानों से पाटकर उन उद्योगों के देशी मालिको को भी अपने उद्योग व्यापार छोड़ने - तोड़ने के लिए मजबूर किया जाता रहा है | पहले के उनके उत्पादन , व्यापार बाज़ार के आरक्षित अधिकारों को वैश्वीकरणवादी नीतियों के अंतर्गत काटा - घटाया जाता रहा | बहुतेरे मालो के आयात पर दशको से प्रतिबंधो को हटाया जाता रहा | वैश्वीकरणवादी नीतियों के अंतर्गत जहा देश में विदेश के धनाढ्य एवं उच्च हिस्सों के लिए राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर फैलने बढने में लगी हर तरह की रोक या अवरोध को हटाकर उन्हें अधिक धनाढ्य व उच्च बनने के अवसर दीये जाते रहे , वही आम किसानो , दस्तकारो एवं छोटे उद्योगों व कारोबारियों को स्थानीय स्तर पर भी टिके रहने में हर तरह की अडचन , अवरोध खड़े करके उनसे जीने का बुनियादी अवसरों तक को छिना जाता रहा | यह प्रक्रिया निरंतर जारी हैं |वैश्वीकरणवादी नीतियों की यह दोहरी और परस्पर विरोधी सच्चाई एकदम नग्न रूप में हमारे सामने आ रही हैं | स्वाभाविक है की देश के धनाढ्य व उच्च हिस्से अपने स्वार्थो में वैश्वीकरणवादी नीतियों का पुरजोर समर्थन कर रहे है और करेंगे भी | वही देश के व्यापक जनसाधारण के हित में जनसाधारण किसानो , मजदूरों एवं छोटे कारोबारियों द्वारा इनका विरोध किया जाना एकदम आवश्यक व अनिवार्य हैं ।

निजीकरणवादी नीतियों को यह कह कर लागू किया गया था कि देश में अब तक सरकार के मालिकाने में चलते सार्वजनिक उद्योग व लाभ के बजाए घाटे का सौदा बन गये हैं | देश कि अर्थव्यवस्था पर बोझ बनकर उसका विकास अवरुद्ध कर रहे हैं | अत: अब इन सार्वजनिक उद्योगों के मालिकाने व प्रबन्धन , संचालन को सक्षम उद्यमियों को सौप देना चाहिए | ताकि वे उसे घाटे से उबारकर लाभकारी बना दें |देश की अवरुद्ध होती अर्थव्यवस्था को गतिमान कर दें | इसे आगे करके राष्ट्र की समस्त जनता के श्रम व धन से खड़े किए गये सार्वजनिक उद्योगों को निजी क्षेत्र के धनाढ्य मालिको को , धनाढ्य एवं विशाल कम्पनियों को देना शुरू किया गया | यह क्रिया 1991 से आज तक निरंतर जारी है | उसी के साथ अब तक सरकारों के मालिकाने व नियंत्रण में चलते रहे सार्वजनिक शिक्षा , चिकित्सा जैसे क्षेत्रो को निजीकरण के तहत निजी मालिको को सौपने या फिर जनहित के इन क्षेत्रो में निजी मालिकाने को बढावा देने का काम किया जाता रहा हैं | साथ ही यह प्रचार भी आता रहा कि सरकार का काम उद्योग व्यापार बैंक चलाना नही बल्कि देश की सत्ता सरकार शासन - प्रशासन चलाना हैं | कानून बनाना और उसे लागू करना हैं | अत:सरकार को सरकारी क्षेत्र के आर्थिक संसाधनों को तथा शैक्षिणक व चिकित्सकीय सेवाओं संस्थानों को चलाने से अपना हाथ खीच लेना चाहिए | उस पर सरकारी खजाने के राष्ट्रीय धन को खर्च करने की जगह उसे निजी मालिको को सौप देना चाहिए |


सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672


2 टिप्‍पणियां:

"जाटदेवता" संदीप पवाँर ने कहा…

अच्छी प्रस्तुति जानकारी से भरपूर

चंदन कुमार मिश्र ने कहा…

फिर भी समर्थन में कई लोग हैं…सब लुटेरे…