सोमवार, 26 दिसंबर 2011

मध्यम वर्गीय समाज में सामाजिक जनतंत्र के प्रति बढती उपेक्षा और उसका दायित्व

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यह जिम्मेदारी समाज के आम मध्यम वर्गीय समाज के साथ - साथ समाज के निचले हिस्से और उनके प्रबुद्ध तबको पर आ गयी है | अब यह उसी का एतिहासिक दायित्व है कि वह आम समाज को आधुनिक युग कि मांगो , आवश्यकताओ के अनुरूप जागृत करे | उनमे एकता , भाईचारगी और बराबरी को खड़ा करे |

धनाढ्य एवं उच्च वर्गीय समाज का रुख - रवैया आम समाज के प्रति उपेक्षापूर्ण हैं | इस हिस्से ने आम समाज में उठने - बैठने , रहने - सहने से अपने आप को कब से अलग कर लिया है और अलग करता जा रहा है |यहा तक कि जन प्रतिनिधि कहे जाने वाले विधायको , सांसदों तक का अपने क्षेत्र की जनता से मिलना जुलना बहुत कम हो गया है
इन सभी का जीवन स्तर ,रहन - सहन तथा शिक्षा - संस्कृति आदि का आम समाज से अब वस्तुत:कोई सम्बन्ध नही रह गया हैं |सम्बन्ध है तो उच्च वर्गीय स्वार्थ का आम जन की श्रम सम्पत्ति के इस्तेमाल का या फिर उनमे राष्ट्रीय व धार्मिक , जातीय या इलाकाई भावनाओं आदि के इस्तेमाल का | जाहिर सी बात है की , राष्ट्र व समाज के इस हिस्से से आम समाज में आधुनिक युग की बराबरी , भाचार्गी और एकता को बढावा देने के प्रति अर्थात सामाजिक जनतंत्र के प्रति किसी सक्रिय सकारात्मक भूमिका की अब कोई अपेक्षा नही की जा सकती | हां उसके विरोध की अपेक्षा जरुर की जा सकती हैं |
समाज के उच्च संभ्रांत वर्ग से आये लोगो की सक्रिय भूमिकाये अब इतिहास का विषय बन चूकि हैं | अपने ही देश में ब्रिटिश दासता के काल में बड़े व सम्भ्रांत घरो से आये - राजाराम मोहन राय , सर सैयद अहमद और बाद के दौर में बहुतेरे राष्ट्रवादी , जनतंत्रवादियों का जैसा नेतृत्त्व अब आम समाज के आधुनिक पुनर्जागरण के लिए आने वाला नही है | क्योंकि पुराना पडा रह गया या नया बनता उच्च वर्गीय हिस्सा अब आमतौर पर पैसे - पूंजी , पद - प्रतिष्ठा का दास बन चुका है | उससे अलग होकर या उसका विरोध करके अब यह हिस्सा समाज के पुनर्जागरण के लिए खड़ा होने वाला नही हैं | स्वाभाविक रूप से अब यह जिम्मेदारी समाज के आम माध्यम वर्गीय समाज के साथ - साथ - समाज के निचले हिस्से और उनके प्रबुद्ध तबको पर आ गयी है | अब यह उसी का एतिहासिक दायित्व है कि वह आम समाज को आधुनिक युग की मांगो , आवश्यकताओ के अनुरूप जागृत करे | उनमे एकता , भाईचारगी और बराबरी को खड़ा करे | लेकिन समाज का यह पढ़ा - लिखा मध्यम वर्गीय हिस्सा अपने इस एतिहासिक दायित्व को सोचने - समझने तक के प्रति उपेक्षा व तटस्थता का रवैया अपनाए हुए हैं | उसकी चिन्ताए मुख्यत: उसकी निजी व पारिवारिक जीवन की चढत - बढत तक ही सीमित हो गयी हैं | आम समाज के प्रति , सामाजिक समस्याओं के प्रति तथा आम समाज को जागृत करने के प्रति , वह भी उच्च वर्गियो की तरह का ही रवैया अपनाए हुए है | धन - पैसा , पद -प्रतिष्ठा की अंधी दौड़ में लगे रहने के साथ - साथ समाज की घोर दकियानूसी परम्पराओं का वाहक भी बना हुआ है | धर्म व संस्कार के नाम पर न केवल हर पुराने एवं गैर जरूरी रीति - रिवाजो व कर्मकांडो को अपनाए हुए हैं , बल्कि उसको आधुनिक बाज़ार एवं भोगवादी संस्कृति से जोडकर महिमामंडित भी करता जा रहा है | इस संदर्भ में आप हिन्दू धर्म के धर्मिक - सामाजिक सुधार का एक उदाहरण देखिये - 19 वी शताब्दी के अन्तिम दशको में शुरू हुए आर्य समाज आन्दोलन में हिन्दू धर्म की कई पुरातन पंथी धार्मिक , सामाजिक कर्मकांडी रीतियों की न केवल निर्मम व तार्किक आलोचना की , बल्कि उनको सरल व नई धार्मिक , सामाजिक रीतियों व पद्धतियों के रूप में बदल भी दिया | लेकिन उस आन्दोलन और उसके जरिये होने वाले समाज - सुधार को आम पढ़े - लिखे , जानकार मध्यम वर्गीय समाज के व्यापक हिस्से ने उस समय भी अपेक्षा से कही कम महत्व दिया |फिर आज तो उस पर या उस जैसे अन्य सुधारों पर और भी कम या कहिये न के बराबर ध्यान दिया जाता हैं , जबकि अब नई युग की सोच के अनुसार उसमे और ज्यादा सुधार करने का समूचा दायित्व ही निम्न मध्यम वर्गीय और निम्न समाज पर आ पडा हैं |
इसका एक दुसरा सबूत यह भी है कि छोटी एवं निम्न जातियों में भी खासकर उनके पढ़े - लिखे और थोड़ा - बहुत भी सम्पन्न हिस्सों में अब वे सारे पुराने कर्मकांड खड़े होने एवं बढने लग गये है , जो पहले आमतौर पर बड़ी जातियों में खासकर ब्राह्मणों , क्षत्रियो और बाद में किसी हद तक वैश्यो, कायस्थों में ही प्रचलित थे | फिर इन्ही का एक हिस्सा इन क्र्म्कान्दो
के विरोध कि अगवाई करते हुए ब्रम्हसमाज से आर्य समाज तक के आन्दोलनो का नेतृत्त्व किया था | लेकिन आज स्तिथि उलट सी हो गयी है | आम प्रबुद्ध समाज कर्मकान्डो और ज्यादा अपनाता जाता हैं | यह समाज के आम प्रबुद्ध माध्यम वर्गीय हिस्से में प्रगतिशील विचार व व्यवहार के बढने का नही , अपितु उससे पीछे हटने का सबूत हैं | समाज को आगे बढाने में सहायक बनने का नही बल्कि उसे पीछे ढकेलने में लग जाने का सबूत है |आवश्यकता है कि आम समाज खासकर उसका पढ़ा लिखा हिस्सा अब आम समाज में सुधार लाने बढाने के लिए अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल करे | व्यापक समाज के लिए आवश्यक आधुनिक पुनर्जागरण के एतिहासिक दायित्व का निर्वहन करे |अपनी तर्क बुद्धि और प्रबुद्धता को पुराने युग कि सड़ी-गली रीतियों का सही औचित्य ठहराने में लगाने कि जगह , सुसंगत वैज्ञानिक तर्को के साथ नये विचार - व्यवहार को पनपाने बढाने में लगाये | आधुनिक पुनर्जागरण में योगदान दे चुके राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय विभूतियों व आन्दोलनो से प्रेरणा ग्रहण करे |आने वाले दिनों में टूटकर सम्पत्तिहीन कंकर वर्गीय स्थिति में समाहित हो जाने की दशा - दिशा का आकलन करते हुए अपने एतिहासिक दायित्व को संभालने के लिए आगे आये |समाज के उच्च वर्ग के साथ नही बल्कि निम्न वर्ग के साथ जनतांत्रिक एकता बनाये.
-सुनील दत्ता

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पत्रकार
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