सोमवार, 16 जनवरी 2012

मार्क्सवाद और नई चुनौतियाँ-3

पितृसत्ता-

पितृसत्ता सभी किस्म की सत्ताओं पर शासन करती रही है। उसके सामने सत्ता और शक्ति के सभी विमर्श बौने हैं। पितृसत्ता के साथ सामंजस्य बिठाना और तदनुरूप सामाजिक तानेबाने का निर्माण करना प्रत्येक सत्ता की मजबूरी रही है। पितृसत्ता का शोषण मानव सभ्यता का सबसे पुराना और सबसे नया शोषण है। पितृसत्ता के बिना न पूँजीवाद रह सकता है और न समाजवाद।
पितृसत्ता के ताने-बाने और वैचारिक प्रपंच में इस कदर लोच है कि अब तक की समस्त शोषणकारी विचारधाराएँ उसी की ओर जाने को अभिशप्त हैं। सच यह है कि पितृसत्ता ने हमारी साँसों, शरीर, शारीरिक हरकतों, अंग-प्रत्यंग के सभी रूपों को प्रभावित किया है। पितृसत्ता मानव सभ्यता और खासकर स्त्री के शोषण का सबसे खतरनाक और मीठा हथियार है। यह वर्चस्व, मुनाफे और सत्ता के अधिकार विस्तार का बुनियादी हथियार है। पितृसत्ता ऐसी भूल-भुलैय्या है जिसमें एकबार फँसने के बाद निकलने का रास्ता नहीं मिलता। यह मीठा ज़हर है। वर्चस्व की विचारधारा है।
फ्रेडरिग एंगेल्स ने ‘‘परिवार, राज्य और व्यक्तिगत संपत्ति’’ नामक पुस्तक में लिखा ‘‘मातृसत्ता का विनाश नारी जाति की विश्व ऐतिहासिक महत्व की पराजय थी। अब घर के अंदर भी पुरुष ने अपना आधिपत्य जमा लिया। नारी पदच्युत कर दी गई।वह जकड़ दी गई। वह पुरुष की वासना की दासी, संतान उत्पन्न करने का एक यन्त्र बनकर रह गई। बाद में धीरे-धीरे तरह-तरह के आवरणों में ढककर, सजाकर और आंशिक रूप में थोड़ी नरम शक्ल देकर उसे पेश किया जाने लगा, पर वह कभी दूर नहीं हुई।
‘‘पितृसत्ता के आने के बाद ही एकल परिवार, एकनिष्ठ विवाह, पतिव्रत धर्म आदि का जन्म हुआ। चूँकि पितृसत्ता की धुरी है लिंगभेद, अतः एकल परिवार के आने के बाद भी स्त्री के प्रति असमान रवैय्ये में कोई बदलाव नहीं आया। इसके विपरीत ऐतिहासिक विकास क्रम में स्त्री की दासता, सामाजिक वैषम्य और उत्पीड़न में तेजी से इजाफा हुआ। एंगेल्स के शब्दों में ‘‘इतिहास का पहला वर्ग -विरोध, एकनिष्ठविवाह के अंतर्गत पुरुष और नारी के उत्पीड़न के साथ-साथ प्रगट होता है। इतिहास की दृष्टि से एकनिष्ठ विवाह आगे की ओर एक बहुत बड़ा कदम था, परंतु इसके साथ-साथ वह एक ऐसा कदम भी था जिसने दास-प्रथा और धन-संपदा के साथ मिलकर उस युग का श्रीगणेश किया, जो आज तक चला आ रहा है और जिसमें प्रत्येक अग्रगति साथ ही सापेक्ष रूप से पश्चात् गति भी होती है, जिसमें एक समूह की भलाई और विकास दूसरे समूह को दुख देकर और कुचलकर सम्पन्न होते हैं। एकनिष्ठ विवाह वह कोशिका रूप है जिसमें हम उन तमाम विरोधों और द्वंद्वों का अध्ययन कर सकते हैं जो सभ्य समाज में पूर्ण विकास प्राप्त करते हैं।’’
एंगेल्स का मानना है कि एकनिष्ठ विवाह पुरुष वर्चस्व को बनाए रखने की ऐतिहासिक घटना है। एंगेल्स के शब्दों में इस परिवार में पति बुर्जुआ होता है, पत्नी सर्वहारा की स्थिति में होती है। इसी अर्थ में माक्र्सवादी मानते हैं कि लिंगीय प्रश्न वर्गीय प्रश्न है। लिंगीय शोषण वर्गीय शोषण है। एंगेल्स का मानना था, ‘स्त्रियों की मुक्ति की पहली शर्त यह है कि पूरी जाति फिर से सार्वजनिक उत्पादन में प्रवेश करे और इसके लिए आवश्यक है कि समाज की आर्थिक इकाई होने का वैयक्तिक गुण नष्ट कर दिया जाए। साथ ही स्त्री और पुरुष कानून की नजर में समान मान लिए जाएँ।’
एंगेल्स
का मानना था कि स्त्री-पुरुष में असमानता मूलतः आर्थिक उत्पीड़न का परिणाम है। जिस एकल परिवार को बुर्जुआजी ने आदर्श परिवार के रूप में लोकप्रिय बनाया, उसके बारे में एंगेल्स की राय थी कि ‘आधुनिक वैयक्तिक परिवार नारी की खुली या छिपी हुई घरेलू दासता पर आधारित है।’
नव्य साम्राज्यवाद के नए दौर में पितृसत्तात्मक नजरिए को नई शक्ल प्रदान की जा रही है। संसदीय जनतंत्र और स्वतंत्रता के माध्यम से पितृसत्ता के हमले तेज हुए हैं। नए किस्म के शारीरिक अनुशासन और नियंत्रण को स्त्रियों पर थोपा जा रहा है। यह कार्य शिक्षा संस्थाओं, जनतांत्रिक संस्थाओं और मीडिया के जरिए हो रहा है। इस हमले ने स्त्रियों के लिए नए किस्म की मुश्किलें पैदा कर दी हैं। स्त्री अपना कौन सा शरीर दिखाए, किस अंग को कैसे चमकाए, उसका वजन कितना हो, कद कितना, किस तरह चले, कार से उतरे तो कैसे पैर बाहर रखे, सार्वजनिक स्थानों पर जाए तो क्या पहने और उसके शरीर का कौन सा अंग कितना दिखाई दे। वह किस तरह देखे, कितना खाए, कौन-कौन सी चीजें न खाए, कब खाए, शरीर के प्रत्येक अंग का साइज क्या हो, हाव-भाव कैसे हों इत्यादि चीजों के बहाने पितृसत्तात्मक नजरिया स्त्री को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है। इस प्रक्रिया में विशिष्ट किस्म का अनुशासन स्त्रियों के ऊपर थोपा जा रहा है। आज बुर्जुआजी ने स्त्री के शरीर या बॉडी को नए रूप में नियोजित, नियमित और नियंत्रित करने के नए तरीके खोज निकाले हैं। इसके लिए ऐसी पद्धति अपनाई गई है कि स्त्रियाँ अपने आप वह सब करें जो पितृसत्ता चाहती है। ऐसे शरीर के निर्माण के बारे में कहा जा रहा है जो आज्ञापरायण और विनीत हो। आज स्त्री के शरीर के बारे में व्यापक मात्रा में चीजें नजर आ रही हैं, इनमें स्त्री के शरीर के बारे में बदली हुई अभिरुचि और घृणा को देखा जा सकता है। आज स्त्री शरीर का कसा हुआ,तना हुआ,छोटे स्तनों वाला, छोटे कूल्हे, और पतले शरीर को महिमामंडित किया जा रहा है। आज सामान्य औरत के लिए डाइट के तरह-तरह के तरीके सुझाए जा रहे हैं। स्त्रियों को नए साँचे में ढाला जा रहा है। उन्हें पतला होने की रणनीति, चर्बी घटाने के उपाय, गर्मी में शरीर कैसा रखें और जाड़े में कैसा रखें। औरतों को सलाह दी जा रही है कि वे अपने डाइट डाक्टर से मिलें। स्त्री के शरीर को डाइटिंग के अनुशासन में लाने की कोशिशें तेज हो गई हैं। डाइटिंग इण्डस्ट्री ने आज स्त्री को उसके शरीर का शत्रु बना दिया है। आज इसने संक्रामक बीमारी का रूप धारण कर लिया है। आज स्त्री अपने को पतला रखने के नाम पर पागलपन की हद तक चली गई है।
विश्व विख्यात सौन्दर्य विशेषज्ञ एम.जे. सेफरॉन ने बारह किस्म की फेसियल एक्सरसाइज का मूल्यांकन किया है। जिनका मीडिया में वर्षों से हल्ला है। इनमें मशीनी कसरत के बजाय चेहरे की वर्जिस के बहाने चेहरे की रेखाओं या झुर्रियों को घटा देने या खत्म कर, शरीर के विभिन हिस्सों की मांसपेशियों को सुडौल बनाने, स्तनों का आकार बढ़ाने, बढ़ी हुई मांसपेशियों को घटाने के नुस्खे शामिल हैं। टी0वी0 पर टेली शॉपिंग में ऐसी मशीनों और दवाओं का अहर्निश प्रचार हो रहा है जिनके माध्यम से कोई भी महिला शरीर का कोई भी अंग घटा या बढ़ा सकती है । विज्ञान की नजर में यह समूचा कार्य- व्यापार ही गलत है। अवैज्ञानिक है। शरीर का कौन सा हिस्सा किस आकार का होगा यह जेनेटिकली तय होता है। यह किसी डाक्टर द्वारा तय नहीं किया जा सकता। इस समूची प्रक्रिया में स्त्री की स्वाभाविक पाचन क्रिया और शारीरिक गठन पर जो दुष्प्रभाव पड़ते हैं उससे औरतें बेखबर हैं, यह भी कह सकते हैं कि उन्हें सही जानकारी नहीं दी जा रही।

-जगदीश्वर चतुर्वेदी
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