मंगलवार, 5 जून 2012

सब्सिडी में भी कटौती



केंद्र सरकार ने पोटाश और फास्फोरस पर आधारित खादों के दुलाई सब्सिडी को घटाने का फैसला किया है |
सरकार यूरिया , ड़ी.ए. पी . तथा एन .पी . के समेत सभी मिश्रित खादों पर ड़ी जाती रही मूल्य -- सब्सिडी को पहले ही घटा चुकी है |
खाद दुलाई की यह सब्सिडी अभी तक खाद को रेल यार्ड से जिला मुख्यालय तक पहुचाने के लिए ड़ी जाती थी |इसे खाद की दुलाई का दूसरा चरण कहा जाता है | इसके लिए केंद्र सरकार 300 रूपये प्रति टन के हिसाब से सब्सिडी देती आ रही थी |अब मूल्य घटाने के साथ इस दुलाई सब्सिडी को खत्म करने का फैसला कर लिया गया है |हालाकि केंद्र सरकार के प्रवक्ता ने यह भी कहा है की पहाड़ी क्षेत्र एवं दुर्गम स्थलों के लिए यह सब्सिडी जारी रहेगी |
सरकार के इस निर्णय से खादों के दामो का और ज्यादा बढना तय है | वैसे मूल्य -- सब्सिडी घटाए जाने और यूरिया के अलावा अप्रैल 2010 से दूसरे खादों के मूल्य को सरकारी नियंत्रण से हटाकर बाजार के हवाले किए जाने के बाद पोटेशियम और फास्फेट खादों के दाम में दूने से अधिक वृद्धि पहले ही हो चुकी है |
खादों की बढती कमी किल्लत और दोगुनी से ज्यादा बढती महगाई न केवल किसानो की खेती के लागत की कीमत बढा दिया है , बल्कि समय पर खाद न मिलने के कारण कृषि उत्पादकता को भी घटा दिया है |फिर पोटाश व डाई की महगाई व कमी ने खेतो की उर्वरा शक्ति को भी नुक्सान पहुचाया है और पहुचाती भी जा रही है |
इसके वावजूद देश की केन्द्रीय व प्रान्तीय सरकारे यह काम बेखटके और बेझिझक होकर कर रही है | पिछले 15 सालो से करती आ रही है | विदेशी कम्पनियों से लेकर देश की बड़ी औद्योगिक व्यापारिक कम्पनियों को छूट व प्रोत्साहन के रूप में लाखो करोड़ो की रकम देती रही है | यह देश दुनिया के धनाढ्यो को दी जाने वाली सब्सिडी है | उनके लाभ -- मुनाफे को बढाने की सब्सिडी है | पर किसानो को उनके खेती की आवश्यक -- आवश्यकताओ की पूर्ति के लिए ड़ी जाने वाली सब्सिडी को अर्थव्यवस्था पर बोझ बताकर घटाते जाने और अब खत्म करने का काम कर रही है यह सरकार | इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है की विदेशी व देशी कम्पनिया न केवल धनाढ्य एवं ताकतवर है बल्कि मजबूती के साथ संगठित है | चुनावी वोट में अत्यंत अप्ल्संख्या होने के वावजूद वे धन -- पूंजी की ताकत के इस्तेमाल के साथ सरकारों पर अपने संगठनों के दबाव के जरिये अपनी बाते मनवा लेने का काम करती आ रही है | नीतिगत सुधारों बदलावों से लेकर अन्य तमाम छूटो सहूलियतो प्रोत्साहनो को हासिल करने काम निरंतर करती रही है | जबकि खेती किसानी के बुनियादी मुद्दों पर भी किसान पूरी तरह से असंगठित है | इसीलिए चुनावी वोट की बड़ी ताकत होने के वावजूद वे सरकारों पर कोई दबाव नही डाल पाते | अपनी इस कमजोरी को समझने और उसे दूर करके स्वंय को संगठित करने का काम अब किसानो को ही करना होगा | दुसरा कोई रास्ता नही है -
तू बता ये देश भइये किस तरह आज़ाद है।
जब कि इसका हर बशर मेरी तरह नाशाद है।

अब भी नंगा नाच घर-घर मुफ़लिसी का हो रहा,
आज भी रोटी यहाँ पर चन्द का अनुवाद है।

गर्दिशों में कर दिया था जिसने अपना सब हवन,
देख ले इन खण्डहरों में वो सदी आबाद है।

बोलने की छूट है तो बोलकर उसको दिखा,
काट लेगा वो जीभ तेरी वो बड़ा ज़ल्लाद है।

दिन-दहाड़े हो रहे अगवा हमारे हैसले,
मेरे सीने में यही तो दर्द है, असवाद है।

-अश्वघोष


-सुनील दत्ता

पत्रकार

9415370672

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