शनिवार, 25 अगस्त 2012

आदर्श के लिए जीना


आदर्श मरना नही आदर्श के लिए जीना ...भगत सिंह


आतंकवाद के चुभते सवाल के बारे में हमें बहुत साफ़ विचार रखने चाहिए | बम का यह रास्ता काफी पुराना है | 1905 से चल रहा है | यह क्रांतिकारी भारत पर दुखद: टिप्पणी है की वे अभी तक यह भी नही जान पाए की इसमें लाभ -- हानि क्या है ? आतंकवाद इस चीज का पाश्चाताप है की जनता से अभी तक क्रांतिकारी भावनाए नही पनपी है | इस तरह से इससे हमारी अपनी असफलता की स्वीकारोक्ति होती है | शुरू शुरू में इसका कुछ लाभ जरुर था , क्योंकि इसकी मदद से राजनितिक नैतिकता के साथ जुड़े डर को भगाया गया | नौजवान बुद्धिजीवियों की कल्पनाओं को जगाया गया | उनके स्वंय के बलिदान करने के उत्साह को बढाया गया | दुनिया और दुश्मनों के सामने उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन की शक्ति और सत्य का प्रदर्शन किया , लेकिन अपने आप में यह काफी नही , क्योंकि हर देश में चाहे फ्रांस हो या रूस , बाल्कन देश हो या जर्मनी हो या स्पेन हो या कही और आतंकवाद का इतिहास एक पराजय का इतिहास है | इसके अन्दर ही इसको खाकर नष्ट कर जाने के कीटाणु मौजूद रहते है | साम्राज्यवादी जानते है की तीस करोड़ लोगो पर राज करने के लिए वे हर साल तीस कर्मचारियों की कुर्बानी देते है | राज करने की ख़ुशी तो बम या पिस्तौल से बर्बाद की जा सकती है , पर अपनी लूट के वास्तविक लाभ को तो वे अपने राज के साथ पूरी तरह चिपकाए रखेंगे | जितने हथियार हम चाहते है अगर वे हमें मिल जाए और उनका हम खूब अच्छी तरह इस्तेमाल भी कर ले तो आतंकवाद साम्राज्यवादी शक्ति और पार्टी को समझौते तक ही लेकर जा सकता है | ऐसे समझौते कम हो या ज्यादा , पूर्ण स्वराज के उद्देश्य तक नही पहुच पायेंगे | आतंकवाद उसी चीज की आशा करता है जो की गांधी वाद प्राप्त करना चाहता है -- यानी की समझौता , सुधारों की एक किस्त और दिल्ली से सफेद राज को हटाकर भूरे राज को ले आये , क्योंकि ऐसा राज लोगो के जीवन से टूटा हुआ होगा और एक बार राज प्राप्त करके अत्याचारी राज में बदलने का खतरा बना रहेगा |
आयरलैंड की समानता में हमारे देश का समाज नही चल सकता है , इसकी मैं चेतावनी देना चाहता हूँ | आयरलैंड में इक्का -- दुक्का गतिविधिया नही थी , बल्कि वह एक राष्ट्र व्यापी विद्रोह की न्यायिक बगावत थी | वह बंदूकधारी से पार्टी के जनसाधारण सिपाही की मात्र हमदर्दी से पैदा हुई घटनाए नही थी | अमेरिकी , आयरिश लोगो की मदद से हथियार उनको आसानी से मिल जाते थे | आयरलैंड की भौगोलिक रचना ऐसे युद्ध के लिए मददगार भी थी | परन्तु इन सबके वावजूद आयरलैंड को अधूरी प्राप्ति से ही संतुष्ट हो जाना पडा | उनकी जंजीरे ढीली तो पद गयी थी लेकिन आयरलैंड का मजदूर देशी और विदेशी पूंजीपति से मुक्त न हो पाया | आयरलैंड भारत के लिए एक सबक है -- एक चेतावनी है की राष्ट्रवादी आदर्शवाद , जिसमे क्रांतिकारी राजनैतिक सामाजिक आधार न हो , हालात पक्ष में होते हुए भी साम्राज्यवाद से समझौते के कीचड़ में फंस जाता है | क्या भारत को अब भी आयरलैंड की नकल करनी चाहिए | एक तरह से गांधीवाद भी क्रान्ति विरोधी चुप्पी साधे रहने के सिद्धांत के वावजूद इंकलाबी विचारों के नजदीक पहुंचता है , क्योंकि वह पीछे जन कार्यवाही में विश्वास रखता है | हालाकि वह जनता के लिए नही होती , उन्होंने मजदूर क्रान्ति के लिए रास्ता बनाया है | क्योंकि लोगो को उन्होंने अपने स्वार्थो से जगाने का राजनितिक कार्यक्रम बनाया है | क्रान्तिकारियो को अहिंसा के फरिश्ते का इसके लिए सत्कार करना चाहिए | आतंकवाद के शैतान के साथ कोई सदभावना दिखाने की जरूरत नही है | आतंकवादियों ने बहुत कुछ सिखाया है और शायद अब भी उसका कुछ लाभ हो सकता है बशर्ते की हम अपने तरीको में कोई भ्रान्ति न होने दे | बहुत ही कष्टों के साथ अच्छे प्रचार के लिए आतंकवादी कारवाई की जा सकती है | यह तो सिर्फ पटाखे चलाने का काम ही होगा | किसी क्रांतिकारी को इस दूषित चक्र में जहा लक्ष्यहीन बगावत है , चक्कर काटने की जरूरत नही | साधारण कार्यकर्ता के लिए प्रेरक आदर्श मरना नही होना चाहिए , बल्कि आदर्श के लिए जीना -- वह भी लाभदायक और उपयुक्त ढंग से |''
-सुनील दत्ता
साभार .
'' ड्राफ्ट आफ रिवोल्यूशनरी प्रोग्राम '' का एक अंश ''