सोमवार, 3 सितंबर 2012

सारा खेल बिगाड़े मैना ना

जब भी गोरख की लिखी यह कविता मेरे आँखों के सामने से गुजरती है सोचने पर मजबूर कर देती है की व्यवस्था में बैठे लोग अपनी नस्लों को राज करने का तरीका सिखाने के लिए  कहा तक गिर सकते है | एक आम इंसान कि कीमत उनकी नजरो में कुछ नही |

 मैना
 
एक दिन राजा मरले ... आसमान में उडत मैना
बानिह के घर ले अइले मैना ना |
एकरे पिछले जन्म के करम
कइली हम शिकार के धरम

राजा कहै कुअर से अब तू ले के खेल मैना
देख केतना सुन्दर मैना ना |

खेले लगले राज कुमार
उनके मन में बसल शिकार
पहिले पाखि कतरि के कहले
अब तू उडी जा मैना
मेहनत कै के उडिजा मैना ना |
पाखि बिना के उड़ पाय
कुअर के मन में गुस्सा छाय
तब फिर टांग तोड़ी के कहले अब तू नाच मैना
ठुमकि-- ठुमकि के नाच मैना ना |
पाँव बिना के नाचे पाय
कुअर गइले अब बउराय 
तब फिर गला दबा के कहले अब तू गाव मैना
प्रेम से मीठा गाव मैना ना |
मरिके कइसे गावे पाय
कुअर राजा के बुलवाय
कहले बड़ा दुष्ट बा एको बाति न माने मैना
सारा खेल बिगाड़े मैना ना |
जबले खून पिअल ना जाय
तबले कवनो काम न आय
राजा कहे कि सीख कइसे चूसल जाई मैना
कइसे स्वाद बढाई मैना ना || 
-गोरख पांडे

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