शुक्रवार, 12 अक्तूबर 2012

तो अब हो जायेगा भूमि सुधार

हकीकत यह है कि देश में उत्तरआधुनिक उपभोक्ता संस्कृति और पूंजी के वर्चस्व के बावजूद सत्ता वर्ग आज भी सामंती है और ज्यादातर जमीन पर उसीका कब्जा है। उत्पादन प्रणाली ध्वस्त हो गयीए पर उत्पादन संबंधों का सामंती ढांचा आज भी जस का तस है। जातियों में बंटे समाज में राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व इन्हीं सामंती ढांचे के​ ​ मुताबिक हैंए जो भारत के ज्ञात इतिहास में कभी बदला नहीं है। पूंजी वर्चस्व और सामंती समाज की दोहरी चुनौती का मुकाबला करते हुए​ ​ एक कारपोरेट सरकार भूमि सुधार कार्यक्रम कैसे लागू करती है, जिसे कायदे से बंगाल में पैंतीस साल राज करने के बावजूद, तेभागा आंदोलनकी गौरवशाली विरासत के  बावजूद वामपंथी तक नहीं लागू कर पाये, यह देखना सचमुच दिलचस्प है। जो किसान सत्याग्रह अश्वमेध यज्ञ ​​रोकने की दिशा में सही पहल हो सकता था, भाजपाई सलवाजुड़ुम समर्थक एक मुख्यमंत्री के समर्थन के बाद अचानक समझौते में निष्णात हो गयी, हो गयी, इससे तो यह तेलंगना और श्रीकाकुलम, ढिमरी ब्लाक किसान विद्रोह की याद ताजा हो रही है।एक और समझौता संपन्न हो गया। क्या इस समझौते से देश में भूमि सुधार लागू हो जायेगा क्या राज्यों की सहमति हैक्या कारपोरेट लाबिइंग के खिलाफ जाकर केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण कानून बनायेगा क्या भूमि अधिग्रहण कानून बदल जाने से भूमि सुधार लागू हो जायेगा विकास के लिए विस्थापन रुक जायेगा क्या संविधान की पांचवीं और छठीं अनुसूची को लागू किये बिना जल जंगल जमीन के हक हकूक मिल जायेंगे धूसरे चरण के आर्थिक सुधार और विदेशी पूंजी के वर्चस्व, सरकार की आर्थिक नीतियों के बावजूद भूमि सुधार संभव है,ये सारे सवाल अभी अनुत्तरित है। भूमि और संसाधनों का समता और सामाजिक न्याय के सिद्धांत के आधार पर बंटवारा करने के लिए क्या कारपोरेट सरकार तैयार है?
 बंगाल में वामपंथी सरकार ने बाकायदा भूमि सुधार कार्यक्रम लागू किया था। ज्योति बसु की सरकार को बर्खास्त करने वाले बंगाल के पूर्व​ ​ राज्यपाल स्वर्गीय धर्मवीर जैसे लोग भूमि सुधार कार्यक्रम को ही बंगाल में वामपंथियों के जनाधार की नींव मानते रहे हैं। पर किसानों,​​ भूमिहीनों और आदिवासियों को इस कार्यक्रम से अगर जल जंगल जमीन के हक हकूक मिल गये होते, तो नक्सलवादी माओवादी ​​आंदोलन की गुंजाइश ही नहीं बनती। कहा जाता है कि भूमि सुधार कार्यक्रम की चुनौती की अभिज्ञता के मद्देनजर इस कार्यभार को टालने ​​के लिए ही बंगाल के माकपाई केंद्र सरकार में शामिल होने का हमेशा विरोध करते रहे हैं। हकीकत यह है कि देश में उत्तरआधुनिक उपभोक्ता संस्कृति और पूंजी के वर्चस्व के बावजूद सत्ता वर्ग आज भी सामंती है और ज्यादातर जमीन पर उसीका कब्जा है। उत्पादन प्रणाली ध्वस्त हो गयी, पर उत्पादन संबंधों का सामंती ढांचा आज भी जस का तस है। जातियों में बंटे समाज में राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व इन्हीं सामंती ढांचे के​ ​ मुताबिक हैं, जो भारत के ज्ञात इतिहास में कभी बदला नहीं है। पूंजी वर्चस्व और सामंती समाज की दोहरी चुनौती का मुकाबला करते हुए​ ​ एक कारपोरेट सरकार भूमि सुधार कार्यक्रम कैसे लागू करती हैए जिसे कायदे से बंगाल में पैंतीस साल राज करने के बावजूद, तेभागा आंदोलनकी गौरवशाली विरासत के  बावजूद वामपंथी तक नहीं लागू कर पाये,यह देखना सचमुच दिलचस्प है। जो किसान सत्याग्रह अश्वमेध यज्ञ ​​रोकने की दिशा में सही पहल हो सकता था, भाजपाई सलवाजुड़ुम समर्थक एक मुख्यमंत्री के समर्थन के बाद अचानक समझौते में निष्णात हो गयी, हो गयी, इससे तो यह तेलंगना और श्रीकाकुलमए ढिमरी ब्लाक किसान विद्रोह की याद ताजा हो रही है।
जल, जंगल और जमीन पर अधिकार की मांग को लेकर गांधी जयंती के दिन ग्वालियर से शुरू हुई जन सत्याग्रह पदयात्रा को बीच रास्ते में ही मंजिल मिल गई। 40 हजार से अधिक भूमिहीनों का नेतृत्व कर रहे राजगोपाल पीवी ने केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की ओर से प्रस्तुत समझौते को स्वीकार करते हुए गुरुवार को उस पर हस्ताक्षर कर दिए। केंद्र सरकार ने सत्याग्रहियों की सभी दस मांगें मान ली हैं। राजगोपाल ने पदयात्रा स्थगित करने की घोषणा करते हुए कहा कि यदि छह महीने में करार पर अमल न हुआ तो आगरा से ही दिल्ली कूच होगा। केंद्र सरकार समझौता कर भूमिहीन आदिवासियों को मनाने में भले ही सफल हो गई होए लेकिन अब उसकी राह और कठिन हो गई है। राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति तैयार करने पर सहमति तो बन गई हैए लेकिन जमीन संबंधी मसलों को सुलझाने के लिए राज्यों को ही आगे आना होगा। समझौता.पत्र में दर्ज मांगों में ज्यादातर का ताल्लुक राज्यों से हैए जिन्हें पूरा कर पाना अकेले केंद्र के बस की बात नहीं है। जो काम केंद्र सरकार अब तक नहीं कर पाई, उसे अगले छह महीने में पूरा करना होगा।आगरा के समझौता.पत्र में सभी 10 मांगों को पूरा करने के लिए समयबद्ध कार्यक्रम निश्चित किया गया है। इसी निर्धारित समय में केंद्र सरकार राज्यों को मनाएगी भी। गैर कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री और उनकी सरकारें भला केंद्र की मंशा कैसे पूरा होने देंगी इससे आने वाले दिनों में राजनीतिक रार के बढ़ने के आसार हैं। हालांकि भाजपा शासित मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक दिन पहले ही भूमिहीन आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोगों की मांगों को पूरा करने के लिए तमाम वायदे कर चुके हैं। समझौते के मुताबिक अधिकतर मांगों पर राज्यों को ही काम करना है। एकता परिषद के नेता पीवी राजगोपाल का स्पष्ट कहना है कि केंद्र सरकार इन मांगों के लिए राज्यों पर दबाव बनाए। इसके लिए राज्य के मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री और उनके आला अफसरों के साथ विचार.विमर्श करे।
आगरा समझौते के मुख्य बिंदु
 राष्ट्रीय भूमि सुधार नीति का छह माह में मसौदा तैयार होगा।
.भूमि सुधार संबंधी कार्यदल का केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री की अध्यक्षता में गठन। 17 अक्टूबर को होगी विशेष बैठक।
कृषि एवं आवासीय भूमि के वैधानिक अधिकार रू हर भूमिहीन को कृषि और रहने के लिए भूमि की गारंटी होगी।
.वास भूमि  इंदिरा आवास योजना के अंतर्गत रहने के लिए लगभग 4350 वर्ग फुट जमीन।
गरीबों,सीमांत किसानों और भूमिहीनों के लिए भूमि उपलब्धता और भूमि अधिकारों में बढ़ोतरी।.भूमि के मामलों में न्याय के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन।

 पंचायत अधिनियम का प्रभावी कार्यान्वयन।
.वन अधिकार अधिनियम 2006 का प्रभावी कार्यान्वयन।
.वन तथा राजस्व सीमा विवाद रू वन एवं राजस्व विभागों के संयुक्त दल का गठन।
.सामुदायिक संसाधनों का सर्वेक्षण एवं नियंत्रण
सफर सत्याग्रह का
वर्ष 2006 रू 500 सत्याग्रहियों की दिल्ली तक पदयात्रा।
.वर्ष 2007 रू 25 हजार सत्याग्रहियों की दिल्ली तक पदयात्रा।

.वर्ष 2010 रू 12500 सत्याग्रहियों का संसद के बाहर तीन दिन धरना।
.वर्ष 2011 रू देश में 80 हजार किमी यात्रा कर जागरूकता अभियान।
.वर्ष 2012 रू चालीस हजार सत्याग्रहियों के साथ ग्वालियर से दिल्ली कूच। आगरा में समझौता।

व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई के नायक जयप्रकाश नारायण की जयंती पर आगरा के सीओडी मैदान में 26 प्रांतों के भूमिहीनों के सामने केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश और कांग्रेस सांसद राज बब्बर ने सभी मांगें मानने की घोषणा की। इनमें हर भूमिहीन को घर और खेती की जमीन के अधिकार की बात शामिल है। दस्तखत होते ही वातावरण में जय जगत के नारे गूंजने शुरू हो गए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के हस्तक्षेप के बाद वार्ता सफल हुई।
गुरुवार दोपहर लगभग 12ण्15 बजे जयराम रमेश मसौदा लेकर आगरा पहुंचे। उसके बाद गांधीवादी नेता व एकता परिषद के अध्यक्ष राजगोपाल पीवी ने समझौते के सभी दस बिंदुओं की जानकारी मंच से दी। सत्याग्रहियों ने समझौते को स्वीकार करके हां की आवाज बुलंद कीए तब राजगोपाल व जयराम रमेश ने मसौदे पर हस्ताक्षर किए।
राजगोपाल ने कहा कि झंडा लहराकर जीत का जश्न मना लें, क्योंकि यह आसानी से नहीं मिली। आंदोलन की सफलता के पीछे गरीबों के भूखे रहने, नंगे पैर चलने, खुले आसमान के नीचे सोने की शक्ति है। यह कमजोरी नहींए बल्कि वह ताकत है जो देश की तस्वीर बदलेगी। जयराम रमेश ने कहा कि आज ऐतिहासिक दिन है। हम ग्वालियर में ही समझौता करना चाहते थे, लेकिन कुछ कारणों से नहीं हो सका। यह हस्ताक्षर तो छोटा सा मुकाम है। अब आगे बहुत काम करना है। समझौते के तहत जो कार्य दल बनाया गया हैए उसकी पहली बैठक 17 अक्टूबर को होगी, जिसमें रोडमैप तैयार होगा। अब आगे आंदोलन की जरूरत नहीं पड़ेगी। जयराम यह कहने से नहीं चूके कि राजगोपाल ने सिर्फ केंद्र सरकार को निशाना बनाया, जबकि संविधान के अनुसार भूमि सुधार का जिम्मा राज्य सरकारों का है। राजगोपाल राज्यों पर भी दबाव बनाएं।
समझौते के वक्त मंच पर प्रख्यात गांधीवादी एन सुब्बाराव, जलपुरुष राजेंद्र सिंह, बंधुआ मुक्ति मोर्चा के संयोजक स्वामी अग्निवेश, बिहार विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी, पूर्व सांसद संतोष भारती, समाजसेवी डॉ. देव हरडे, ज्योति बहन और बाल विजय भी मौजूद थे।
मौजूदा नियम व कानूनों को धता बताकर बड़ी संख्या में आदिवासियों की जमीनों पर गैर आदिवासियों के कब्जे को हटाकर उन्हें उनका हक दिलाना एक बड़ी समस्या है। अनुसूचित जातियों और आदिवासियों को आवंटित जमीनों का हस्तांतरण करना भी राज्यों के अधिकार क्षेत्र का मसला है। उद्योगों को लीज अथवा अन्य विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहीत जमीनों का बड़ा हिस्सा सालों.साल से उपयोग नहीं हो रहा है। खाली पड़ी इन जमीनों को दोबारा भूमिहीनों में वितरित करना होगा और आदिवासी और अनुसूचित जाति के लोगों की परती और असिंचित भूमि को मनरेगा के माध्यम के उपजाऊ बनाने पर जोर देना होगा।


-एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास

1 टिप्पणी:

Madan Mohan Saxena ने कहा…

बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही भावनामई रचना.बहुत बधाई आपको

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