शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

बुत हम को कहें काफिर, अल्लाह की मर्जी है

हंगामा है क्यूं बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है

ना तजरुबे-कारी से वाएज़ की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने पूछो तो कभी पी है !

उस मय से नहीं मतलब दिल जिससे है बेगाना
मक़सूद है उस मय से दिल ही में जो खींचती है

ऐ शौक़ वही मय पी, ऐ होश ज़रा सो जा
मेहमान नज़र इस दम एक बर्क-ए-तजल्ली है

वां दिल में की सदमे दो, याँ जी में कि सब सह लो
उन का भी अजब दिल है मेरा भी अजब जी है

हर ज़र्रा चमकता है, अनवार-ए-इलाही से
हर सांस ये कहती है हम हैं तो खुदा भी है

सूरज में लगे धब्बा फितरत के करिश्मे हैं
बुत हम को कहें काफिर, अल्लाह की मर्जी है

-अकबर इलाहाबादी

कोई टिप्पणी नहीं: