रविवार, 10 फ़रवरी 2013

सलेक्टिव जस्टिस

‘सलेक्टिव जस्टिस’ सांप्रदायिक राज्य की पहचान है, लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था की नहीं



शमशाद इलाही ”शम्स“पहले अजमल कस्साब नवम्बर 21 (2012) अभी अफज़ल गुरू ( फरवरी 9,2013) को भारतीय राज्य द्वारा दी गयी फाँसियाँ राज्य के उत्तरोत्तर ‘हिन्दू चरित्र’ को ही प्रतिस्थापित करती हैं न कि क़ानून के किसी विधि सम्मत राज्य को। न्याय ‘चूज़ एंड पिक’ के ज़रिये स्थापित नहीं होता, उसके लिए कानूनों का समान रूप से सभी अपराधियों पर लागू होना पहली शर्त है। मंद से मंद बुद्धि व्यक्ति भी वर्तमान सरकार की मंशा को भाँप सकता है। दोनों फाँसियाँ सिर्फ न्याय का विषय नहीं बल्कि उन्हें एक राजनैतिक फैसले की तरह देश के अवाम के सामने रखा गया जिसके अपने लक्ष्य और उद्देश्य हैं।
यदि देश में न्याय नाम कि कोई चीज होती तो ठीक इसी तरह कई दरिंदो को 1984 में दिल्ली के हुए सिख नरसंहार के मामले में फाँसियाँ दी जा चुकी होतीं, लेकिन वो न केवल ज़िंदा है बल्कि आज़ाद भी हैं। गुजरात के दंगो के लिए नरेंद्र मोदी पर उन्ही धाराओं के तहत मुक़दमा चलता जिनके तहत अफ़ज़ल गुरू को फांसी दी गयी और उसका हश्र भी वही होना चाहिए था, लेकिन नहीं यह अपराधी न केवल खुला है बल्कि चीफ मिनिस्टर गुजरात है। अभी वह देश का भावी प्रधानमंत्री बताया जा रहा है। प्रज्ञा ठाकुर और असीमानंद जो हिन्दुत्व आतंकवाद के प्रतीक बने हुए हैं, जिनके कुकृत्यों के कारण दर्जनों बेक़सूर मुसलमान अब भी जेलों में सड़ रहे हैं, उन्हें मानवता के प्रति अपराध जैसे आरोपों के तहत फाँसी देने में कोई न्यायप्रिय सरकार/ राज्य कभी देरी नहीं करता।।। लेकिन नहीं। इस प्रकार के अनन्त उदाहरणों से ये बात आगे कही जा सकती है।
आज देश को फाँसियों की जिस बयार से सुसज्जित किया जा रहा है, राजनीति को केन्द्र में रख कर जो ‘सलेक्टिव न्याय’ के निर्णय लिए जा रहे हैं उससे जो प्रतिध्वनि और ऊर्जा निकल रही है वह बेहद नकारात्मक है जिसकी आँच में न लोकतंत्र सुरक्षित रह पायेगा और न उसके चार स्तम्भ जिसमें पुलिस/ न्याय व्यवस्था पहले ही ढह चुकी है। मैं अगर देश के ढाँचे, उसके संविधान उसकी व्यवस्था से अगर असहमत हूँ, तब उसके द्वारा निर्णयों पर कैसे सहमति व्यक्त कर सकता हूँ ? जाहिर है, मौजूदा हकूमत अपने राजनीतिक स्वार्थों के हित में, अपने ढाँचे और संविधान के अनुरूप ही कोई निर्णय लेगी। कश्मीर एक राजनैतिक प्रश्न है जिसे राजनीतिक रूप से हल किये बिना समस्या हल न होगी। एक अफज़ल गुरु दस और गुरु घंटालो को पैदा करेगा।क कस्साब को मारने से कोई ये नहीं कह सकता कि दूसरा कस्साब अभी उसी फैक्ट्री में बनना बंद हो गया हो जहाँ खुद उसका निर्माण हुआ था?
एक सबसे महत्वपूर्ण तथ्य जिसे बेहूदा छद्म देशभक्ति की नुमाइश के चलते सामने ही नहीं लाया जा रहा और न उस पर तवज्जो दी जा रही है; वह यह कि आज़ाद भारत में अभी तक 3000 से 4300 (सही आँकड़ा मानवाधिकार संगठनों के पास भी नहीं है) लोगो को फांसी दी जा चुकी है, इतनी बड़ी संख्या इस नतीजे पर पहुँचने के लिए काफी है कि फाँसी लगाना या जान से मारना किसी अपराध की पुनरावृत्ति रोकने में समर्थ नहीं है। दुनिया में जिन देशों के समाजों ने अपने आतंरिक अंतर्विरोध काफी हद तक हल कर लिए हैं, वहाँ का समाज फाँसी मुक्त हो चुका है। भारतीय राज्य अभी इन तथ्यों को जाँचने और परखने की न तो योग्यता रखता है और न वह इतना सक्षम है, इसी कारण अभी बर्बर युग के कानूनों का मिश्रण उसके संविधान में मौजूद है।
-शमशाद इलाही शम्स
 साभार
http://hastakshep.com/

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