शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

क्रांतिकारी कन्हाई लाल दत्त


कन्हाई लाल दत्त बंगाल के क्रान्तिकारियो द्वारा गठित '' अनुशीलन समिति '' नाम के संगठन के सदस्य थे | उन क्रान्तिकारियो के उद्देश्य को हम इस समिति की स्थापना के समय जारी घोषणा पत्र से समझ सकते है | घोषणा  पत्र में यह स्पष्ट कहा गया कि '' अनुशीलन की कल्पना के समाज में अनपढ़  गरीब लोग नही होंगे , कायर व दुष्ट लोग नही होंगे और अस्वस्थ लो भी नही होंगे | ऐसे समाज के निर्माण के लिए सभी प्रकार के विषमताओ को समाप्त करना होगा | विषमता के बीच मानव की मानवता नही विकसित हो सकती | मानव समाज से धन की विषमता , सामाजिक विषमता , साम्प्रदायिक विषमता और प्रादेशिक विषमता दूर कर सभी मनुष्यों में समानता लानी होगी | केवल राष्ट्रीय सरकार द्वारा ऐसा किया जाना संभव है | पराधीनता की दशा में अनुशीलन के स्वपन के समाज की स्थापना संभव नही है | इसलिए अनुशीलन पराधीनता के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा करती है | अनुशीलन भारत की पूर्ण स्वतंत्रता चाहती है | ''

इसे आप कम्यूनिस्टो की घोषणा न समझ बैठे | क्योकि 1902 तक बंगाल में या पूरे भारत में कम्युनिज्म का नाम लेने  वाले नही थे | अनुशीलन समिति धर्म को साथ लेकर चलने वाले राष्ट्रवादी क्रांतिकारियों का संगठन था | कन्हाई लाल दत्त ने अनुशीलन समिति के इन्ही उद्देश्यों को अपनाकर क्रांतिकारी संघर्ष के रास्ते पर अपना प्राण उत्सर्ग किया |

आज भी राष्ट्र की बहुसंख्यक जनता हर तरह की विषमताओ की शिकार है | राष्ट्र व राष्ट्र के जनगणपर ( विदेशी व देशी ) प्रभाव , प्रभुत्व धन पूंजी का प्रभाव प्रभुत्व बढ़ता जा रहा है ऐसी स्थिति में इस राष्ट्र के जनगण के लिए अनुशीलन की घोषणा -- पूर्ण स्वतंत्रता के साथ राष्ट्र व समाज में हर तरह  की समानता की स्थापना की -- घोषणा को सुनना अपनाना और उसके लिए वांछित प्रयास करना आज भी आवश्यक है , अपरिहार्य है |
निश्चित रूप से यह आवश्यकता इस राष्ट्र में हर तरह की विषमता झेल रहे जनसाधारण समाज की है , न कि इस राष्ट्र के धनाढ्य एवं उच्च वर्गीय समाज की | इसलिए कन्हाई लाल दत्त जैसे क्रान्तिकारियो को याद करना भी उसी कर्तव्य है |

क्रान्ति युग का कन्हाई अर्थात कन्हाई लाल दत्त का जन्म जन्माष्टमी की कालीअधेरी रात में अपने मामा के घर चन्दनंनगर में हुआ था | कदाचित इसी से उनकानाम कन्हाई पडा हो | यद्दपि उनका आरम्भिक नाम सर्वतोष  था | चन्दन नगर तब फ्रांसीसी उपनिवेश था | वास्तव में तो उनका पैत्रिक घर बंगाल के ही  श्रीराम पुर में था | कन्हाई जब चार वर्ष के थे तब उनके पिता उनको लेकर  बम्बई चले गये थे | पांच वर्ष बम्बई में रहने के बाद नौ वर्ष की आयु में वह वापस चन्दन नगर आ गये थे और वही उनकी प्रारम्भिक से लेकर विश्वविद्यालय तक की शिक्षा हुई | चन्दन नगर के डुप्ले कालेज से उन्होंने स्नातक की परीक्षा दी थी | उसी कालेज के एक प्राध्यापक चारु चन्द्र राय से गहनता के कारण  कन्हाई को क्रान्ति पथ का परिचय प्राप्त हुआ था | स्वभाव से कन्हाई दयालू  और कृपालु थे | इसका उदाहरण है '' टोखा '' नामक निर्धन छात्र की खाने --  पीने  और वस्त्रादि से लेकर उसकी पढ़ाई तक की व्यवस्था उन्होंने अपने ही घर  पर अपने व्यय  से की थी | चन्दन नगर में सर्वप्रथम क्रान्ति की योजना बनाने  वाले थे , संध्या '' के सम्पादक ब्रम्हबाधव उपाध्याय | कन्हाई उनके सम्पर्क में भी अपने प्राध्यापक के माध्यम से ही आये थे | स्नातक की परीक्षा देने  के उपरांत कन्हाई कलकत्ता आ गये और '' युगांतर '' कार्यालय में कार्य करने  लगे | कलकत्ता की अनुशीलन समिति से जब उनका सम्पर्क हो गया तो न केवल वह  उसके सदस्य बने अपितु उन्होंने अपने घर ही उसकी एक शाखा भी स्थापित की तथा  बाद में अपने क्षेत्र में पांच अन्य शाखाओं की भी स्थापना की थी | इन  शाखाओं में व्यायाम तथा लाठी आदि चलाने की शिक्षा दी जाति थी | बाहर से  देखकर उन्हें कोई भी विप्लवी समिति की शाखा नही समझ सकता था | स्वंय कन्हाई ने विप्लवी बनने की दीक्षा अमावस्या की रात्री में एक बट -- वृक्ष के तले
ली थी | खुदीराम बोंस द्वारा किये गये मुजफ्फरपुर बम -- काण्ड के उपरान्त अंग्रेजी राज्य की रातो की नीद हराम हो गयी थी | सारा अंग्रेजी शासन चौकन्ना हो हो गया था | चारो ओर संदिग्ध लोगो की खोज आरम्भ कर दी गयी थी | खूब दौड़ -- धुप के बाद पुलिस को पता चला कि इन क्रान्तिकारियो का अड्डा मानिकतल्ला के एक बगीचे में है | यह बगीचा अरविन्द घोष के भाई सिविल सर्जन डाक्टर वारींद्र घोष का था | गुप्तचर विभाग वह से क्रान्तिकारियो की गतिविधि पर दृष्टि रखने लगे | दुर्भाग्य से क्रान्तिकारियो गुप्तचर विभाग की इस कारस्तानी से सर्वथा अनभिज्ञ रहे | इसका परिणाम क्रान्तिकारियो के लिए भारी संकटकारी  साबित हुआ | गुप्तचर विभाग को इससे सफलता मिली और उसने देश के सर्वप्रथम '' बम षड्यंत्र '' का पर्दाफाश कर दिया | इसमें बगीचे के मालिक वारींद्र घोष उनके भाई अरविन्द घोष , नलिनी कन्हाई लाल दत्त समेत लगभग 35
 देशभक्त लोगो को बन्दी बनाने में पुलिस सफल हो गयी |
इन सब बन्दियो को अलीपुर कारागार में रखा गया था और वही पर इन  क्रान्तिकारियो पर अभियोग चलाया गया | इसी कारण इस अभियोग का नाम '' अलीपुर षड्यंत्र '' रखा गया था | कन्हाई लाल दत्त के साथ -- साथ उसके प्रेरक  प्रोफ़ेसर चारु चन्द्र राय भी बन्दी बनाई गये थे | सब पर अभियोग चला ,  किन्तु चारू चन्द्र राय  को फ्रांसीसी सरकार की बस्ती का नागरिक होने के  कारण रिहा कर दिया गया |
जयचंदों की किसी युग में कमी नही रही | मीरजाफर के ये जातिबांधव हर युग  में जन्म लेते रहे है |अलीपुर अभियोग में भी नरेन्द्र गोस्वामी रूपी जयचंद बन्दी बनाया गया था | उसने सरकारी गवाह बनना स्वीकार कर लिया | उसके इस देशद्रोह से क्रान्तिकारियो के रहे - सहे प्रयत्नों पर पर पानी  फिर जाने की आशका होने लगी | यद्धपि नरेन्द्र के इस  कुकृत्य  की देशभक्त समुदाय द्वारा चारो ओर भर्त्सना होती रही किन्तु इससे अभियोग में तो किसी प्रकार की सहायता  मिलने  की संभावना थी ही नही | यहाँ तक कि अभियोग के दौरान ही एक दिन भरी अदालत में किसी अभियुक्त ने उसको लात तक मार दी थी | उसका परिणाम यह हुआ कि एक   तो वह इन बन्दियो के सामने आने से सदा बचता रहा और दूसरे सरकार ने भी उसके लिए सुरक्षा की व्यवस्था कर दी | उसको दो सरकारी अंगरक्षक दिए गये |
वीर यदि निश्चय कर ले तो कठिनाइयो का पर्वत  उनके लिए टीला  हो जाता है | निश्चय ही प्रबल चट्टान के सम्मुख कठिनाई हो अथवा परिस्थिति की प्रतिकूलता उनका टिक पाना संभव नही होता | अब जेल में ही कन्हाई लाल दत्त और सत्येन्द्र बसु ने इस देशद्रोही को सबक सिखाने की एक अदभुत योजना बना डाली | उन्होंने निश्चय किया कि नरेंद्र अपना ब्यान पूरा करे उससे पूर्व ही उसको इस संसार से प्रयाण कर लेना चाहिए |
जबसे नरेंद्र के चूतडो पर लात पड़ी थी तबसे विशेषता उसको अन्य बन्दियो से पृथक , बड़ी सुरक्षा में रखा जाने लगा था | उसकी रक्षा के लिए दो सशत्र पहरेदार सदा तत्पर रहते थे |  कन्हाई लाल दत्त और सत्येन्द्र की बुद्धि निरंतर कार्य कर रही थी | उन्होंने सबसे पहले जेल के वाडरो से घनिष्टता  बढाई उन्हें बहुत हद तक प्रभावित  कर लिया | उसके फलस्वरूप जेल के भीतर लाये जाने वाले कठहल -  मछली के भीतर रखी दो पिस्तौल को प्राप्त करने में वो सफल हो गये | उसमे किसी प्रकार की बाधा उपस्थित नही हुई | वे पिस्तौल किन वाडरो द्वारा आयोजित किये गये और किसने बाहर से भेजे थी , इस तथ्य को बाह्य जगत कभी नही जान पाया | क्योकि इस नाटक के केवल दो पात्रो को उस घटना के बाद किसी से मिलने से पूर्व ही स्वर्ग की सीढियों की ओर रवाना कर दिया गया था | इसके बाद दोनों क्रांतिकारी अपने उद्देश्य की ओर आगे बढने लगे | कुछ ही दिनों बाद इतने अस्वस्थ हुए कि उनको अस्पताल में भर्ती करना पडा | अस्पताल पहुचने पर कन्हाई लाल दत्त ने कुछ ऐसा व्यवहार किया मानो अब यहाँ उनका अंतिम समय आने वाला है | उन्हें इस संसार से अब किसी प्रकार का मोह नही रह गया है | अर्थात जीवन से सर्वथा निराश होने वाले व्यक्ति की भांति उन्होंने सरल सादा और मिलनसार व्यवहार किया |

योजना अनुसार कुछ दिनों बाद किसी बड़े रोग के बहाने सत्येन्द्र को ऐसी भयंकर उदर पीड़ा हुई कि उसकी जोर से कराह निकल गयी | अस्पताल की नर्स घबरा गयी  किन्तु कन्हाई लाल को विदित हो गया कि सत्येन्द्र भी पास के कमरे में आ गया है | उसको सूचना देने के लिए यह पीड़ा उठी थी | दोनों ने अस्पताल में रहते
हुए जीवन से निराश का व्यवहार किया ही , साथ ही यह सन्देश पहुचा दिया कि वे इस नारकीय जीवन से उब गये है और नरेन्द्र की भाँती वे भी सरकारी गवाह बनना  चाहते है |
अपने व्यवहार से दोनों ने अस्पताल के अधिकारियों को एक  प्रकार से इतना आश्वस्त कर दिया था कि अधिकारी उन पर विश्वास करने लगे  |उनको लगा कि एक तो सरकारी बन ही गया है , इन दोनों के गवाह के भी बन जाने  से उनको क्रान्तिकारियो की सारी  जानकारी मिल जायेगी क्योकि ये  तो अधिक महत्व
के व्यक्ति थे | इससे वे क्रान्तिकारियो का सफाया करने में सफल होंगे |  नरेन्द्र को जब इनका पता चला तो उसे बड़ी प्रसन्नता हुई | कुछ दिनों के बाद  परस्पर मिल -- बैठ कर योजना बनाने का अवसर भी मिलने लगा और अवसर मिलते ही  तीनो अदालत में दिए  जाने वाले स्वीकृति के वक्तव्य  पर विचार -- विमर्श
करने के लिए पर्याप्त समय एक साथ बैठने लगे | नरेन्द्र उनसे घुल मिल गया था | इसी विचार -- विमर्श के चलते सितम्बर माह की तिथि निकट आ गयी जिस तिथि को  नरेन्द्र को अपना वक्तव्य देना निर्धारित किया गया था | उस तिथि से पूर्व ही दोनों को उसको मौन कर देना था | नरेन्द्र नियमित रूप से प्रतिदिन सत्येन्द्र
और कन्हाई लाल के पास मिलने के लिए आता था | 31 अगस्त  1909 के दिन भी वह अपने समय पर उनके पास पधारा | वह खड़े -- खड़े अभी बात कर ही रहा था कि उसके अंगरक्षक भी बीडी पिने के लिए एक ओर को चले गये थे | तभी सत्येन्द्र ने अपने सिरहाने रखी पिस्तौल से नरेन्द्र पर वार किया गोली उसके पैर में लगी
किन्तु वह उससे गिरा नही | सत्येन्द्र ने तभी दूसरी गोली चलाई तब तक नरेन्द्र भागने लगा था | एक अंग्रेज अंगरक्षक ने यह देख लिया था और उसने सत्येन्द्र का हाथ पकड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढाया ही था कि सत्येन्द्र की तीसरी गोली उसका हाथ घायल कर दिया | वह सामने से हट गया और नरेन्द्र प्राण  बचाने के लिए वहा  से भगा | कन्हाई  लाल दत्त भी तब तक अपनी पिस्तौल लेकर पहुच गये | उन्होंने और सत्येन्द्र ने नरेन्द्र का पीछा किया | नरेन्द्र ने शोर मचाना आरम्भ कर दिया पकड़ो ,, बचाव और दौड़ता भी गया | जेल में कोहराम --सा मच गया | जेलर भी अपनी भरी -- भरकम देह लेकर उस स्थान की ओर चला | तब कन्हाई और सत्येन्द्र पिस्तौल ताने नरेन्द्र के पीछे -- पीछे दौड़े नरेन्द्र उस कारागार कक्ष से दूसरे कारागार कक्ष की ओर जाते हुए गेट के बाहर निकल कर आँखों से ओझल होने लगा था | दोनों पिस्तौल ताने दौड़े तो गेट के सिपाही ने न
केवल उन्हें रास्ता दिया अपितु संकेत से बता दिया |कि वह किस दिशा में गया है | दोनों ने उसके निकट पहुचकर उसे गोलियों से छलनी कर दिया |  कारागार में खतरे की घंटी बजाकर जेलर को भय सताने लगा और स्वंय को बचाने के लिए वह किसी तिपाई के नीचे घुस गया था | नरेन्द्र जब धरती पर गिर गया तो उसे अपने पैरो से ठोकर मारकर दोनों  क्रांतिकारी अपने स्थान पर  आ  गये | यह समाचार वन की आग की भाँती सारे कारागार में ही नही अपितु नगर में फ़ैल गया और दूसरे दिन प्रात: काल के समाचार -- पत्रों ने इस समाचार को मुख्य पृष्ठ पर प्रकाशित  कर प्रसारित कर दिया | सारा संसार घटना से परिचित हो गया |


दोनों क्रांतिकारी अपना कार्य सम्पन्न कर  प्रसन्नता का अनुभव करते हुए शांत बैठ गये तो उन्हें फिर हथकड़ी पहनाना पुलिस के लिए सरल हो गया | सरकारी तामझाम अपने अगले नाटक के लिए तैयार हो गया | अदालत , अभियोग साक्षी , वाद -- विवाद और अंत में दण्ड -- विधान अर्थात प्राण दण्ड | कन्हाई को 10 नवम्बर 1909 को फांसी देने का दिन तय किया गया | सत्येन्द्र को दो दिन बाद प्राण दण्ड दिया गया | दोनों को अपने कार्य की सफलता की इतनी प्रसन्नता थी कि अभियोग चलने में फांसी पर जाने से एक दिन पूर्व तक उन दोनों का कारागार में रहते हुए 16 पौंड वजन बढ़ गया था | फांसी लगने से पूर्व जब कन्हाई के भाई उनसे मिलने के लिए कारागार में आये तो तो उसी दिन का बी . ए . का परीक्षा परिणाम भी निकला था | जिसमे वे अच्छे अंको से पास हुए थे | भाई ने जब इस  परिणाम चर्चा की तो कन्हाई ने कहा '' उस उपाधि -- पत्र को भी मेरे साथ फांसी पर लटकवा देना |

कन्हाई को जब विदित हुआ कि तो माँ भी मिलने आ रही है तो उन्होंने भाई से कहा '' यदि माँ उस समय आँसू न बहाए तो मैं तभी उनसे मिलूंगा | ''
कन्हाई की शव यात्रा बंगाल के इतिहास में चिरस्मरणीय  बन गयी | लाखो नर -- नारी इस  यात्रा में सम्मलित हुए थे |कन्हाई की इस अंतिम यात्रा की शोभा अंग्रेजो के लिए आशय हो गयी | अत: सत्येन्द्र बसु को जब प्राण दण्ड दिया गया तो उनकी पार्थिव देश को बहार नही जाने दिया गया और उनके परिजनों को विवश किया कि यही कारागार के अहाते में ही उनकी अन्त्येष्ठी की जाय | फांसी से पूर्व जब सत्येन्द्र बसु की पत्नी उनसे मिलने आई तो उन्होंने उनको अनेक प्रकार से ढाढस बंधाया और वीरागना ने आजीवन उनके उपदेशो को शिरोधार्य कर अपना जीवन भारत माता के चरणों में अर्पित कर दिया ...........

-सुनील दत्ता .
पत्रकार


                            
                              ( अशोक कौशिक द्वारा संपादित '' क्रान्ति की चिनगारिया '' नाम की पुस्तक से साभार )

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