बुधवार, 5 फ़रवरी 2014

‘आप‘ क्रांति

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अपने शानदार प्रदर्शन से आम आदमी पार्टी (आप) ने पूरे देश में उत्साह की एक नई लहर का सृजन किया है। यद्यपि आप को बहुमत नहीं मिल सका और वह सबसे बड़े दल के रूप में भी नहीं उभरी परंतु उसे दिल्ली में अपनी सरकार बनानी पड़ी। कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने आप को सरकार बनाने पर मजबूर कर दिया। कांग्रेस ने आप सरकार को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा कर दी और भाजपा ने यह तय किया कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद, वह विपक्ष में बैठेगी।
आप ने दिल्ली की जनता से कई वायदे किए थे। उसने कहा था कि दिल्ली के निवासियों को 700 लीटर पानी मुफ्त प्रदाय किया जाएगा और बिजली की दर में 50 प्रतिशत की कमी की जाएगी। भाजपा और कांग्रेस, दोनों को यह उम्मीद थी कि आप अपने वायदे पूरे नहीं कर पाएगी। परंतु आप ने इस चुनौती को अवसर के रूप में परिवर्तित कर दिया और अपने कुछ वायदों को पूरा भी किया। कांग्रेस के बाहर से समर्थन की मदद से सरकार बनाने का निर्णय लेने के पहले, आप ने मोहल्ला सभाओं के जरिए जनमत संग्रह किया। ऐसा कदम भारत में शायद ही किसी राजनैतिक दल ने पहले कभी उठाया हो। मोहल्ला सभा की अवधारणा, मतदाताओं और अन्य राजनैतिक दलों के लिए नई थी। आप के प्रवक्ता यह दावा कर रहे हैं कि जहां भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे के विकल्प हैं वहीं आप, सभी राजनैतिक दलों का विकल्प है। अरविंद केजरीवाल की पुस्तक ‘स्वराज’ गरम पकोड़ों की तरह बिक रही है।
जमायत-ए-इस्लामी और अन्य कई छोटे दलों ने आप को समर्थन देने की घोषणा की। जल्दी ही आप में शामिल होने की होड़ मच गई। कुछ अखबारों के अनुसार, केवल तीन दिनों में तीन लाख लोगों ने आप की सदस्यता ली। मल्लिका साराभाई और उद्योगपति मीरा सान्याल जैसी कुछ जानीमानी हस्तियां भी आप में शामिल हो गईं।
इस बीच, आप के सदस्यों में कई मुद्दों पर अस्पष्टता और यहां तक कि विरोधाभास सामने आए। मीरा सान्याल विदेशी निवेश और बाजार पर कम से कम नियंत्रण की हामी हैं और वे कई बार सार्वजनिक रूप से यह कह चुकी हैं कि भारत में विदेशी निवेश में तेजी से वृद्धि होनी चाहिए। दूसरी ओर, उदारीकरण और वैश्वीकरण के कई घोषित विरोधियों ने भी आप की सदस्यता ली है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य और प्रसिद्ध विद्वान कमल मित्रा चेनॉय भी आप में शामिल हो गए हैं। जहां मल्लिका साराभाई, जिन्होंने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ा था, ने आप की सदस्यता ली है वहीं आप के एक प्रमुख नेता कुमार विश्वास ने नरेन्द्र मोदी की प्रशंसा की है और वे अमेठी में राहुल गांधी को पराजित करने के लिए प्रचार कर रहे हैं। पार्टी में विभिन्न मुद्दों पर अस्पष्टता का कारण यह है कि पार्टी केवल एक मुद्दे-भ्रष्टाचार-पर केंद्रित है। लगभग सभी विचारधाराओं के अनुयायी, भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं और इसलिए मीरा सान्याल व वैश्वीकरण-विरोधी कार्यकर्ता, दोनों आप की ओर आकर्षित हो रहे हैं। पूरे देश में आप का सदस्यता अभियान जोरशोर से चल रहा है और जाहिर है कि सदस्यता लेने वालों की पृष्ठभूमि आदि की जांच करने का किसी को समय नहीं है। पार्टी की सदस्यता ऑनलाइन भी दी जा रही है। जहां दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ईमानदारी, सादगी और सत्यनिष्ठा की बात कर रहे हैं वहीं इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आप की सदस्यता लेने वालों में से कई महत्वाकांक्षी होंगे।
आप ‘क्रांति‘ क्यों हुई?
आप की लोकप्रियता में अभूतपूर्व वृद्धि के पीछे के कारणों को समझना मुश्किल नहीं है। अगर हम थोड़ा पीछे चलें तो देश में एक के बाद एक घोटालों का पर्दाफाश हो रहा था। इनमें शामिल थे राष्ट्रमंडल खेल घोटाला, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला व कोल ब्लाक आवंटन घोटाला। टीम अन्ना, भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन चला रही थी और उसकी निगाह में भ्रष्टाचार की समस्या का एकमेव हल था जनलोकपाल। इस आंदोलन से जनता की कुंठा और गुस्सा फूट पड़ा और लोग बड़ी संख्या में सड़कों पर उतर आए। टीम अन्ना भ्रष्टाचार से निपटने के लिए केवल और केवल जनलोकपाल को सक्षम मानती थी। इस जनलोकपाल के अधिकार क्षेत्र में प्रधानमंत्री, न्यायपालिका और सभी श्रेणियों के लाखों सरकारी कर्मचारी होते और जनलोकपाल का सीबीआई व केन्द्रीय सतर्कता आयोग पर भी नियंत्रण होता। टीम अन्ना, जिसमें केजरीवाल शामिल थे, जनलोकपाल को असीमित अधिकार देने की हामी थी और इसे किसी के प्रति जवाबदेह बनाने को तैयार नहीं थी।
मीडिया और आमजनों को इस बात से कोई खास मतलब नहीं था कि जनलोकपाल से भ्रष्टाचार की समस्या समाप्त होगी या नहीं। वे तो इस आंदोलन का समर्थन इसलिए कर रहे थे क्योंकि इसके केन्द्र में भ्रष्टाचार का मुद्दा था। जहां भाजपा, कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करना चाहती थी वहीं टीम अन्ना सभी राजनीतिज्ञों और संसद व न्यायपालिका सहित सभी प्रजातान्त्रिक संस्थाओं को कलंकित बता रही थी। यह आंदोलन अराजकता की ओर बढ़ रहा था और अत्यंत शक्तिशाली जनलोकपाल को सभी समस्याओं के एकमात्र हल के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। आंदोलन पर बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद की छाया स्पष्ट नजर आ रही थी और भारत माता के प्रतीक का जमकर इस्तेमाल हो रहा था। मध्यम वर्ग हमेशा से राजनीतिज्ञों को हेय दृष्टि से देखता आया है। वह उन्हें ‘कम पढ़ालिखा‘, ‘कम बुद्धिमान‘, ‘देहाती‘  और ‘पिछड़ी मानसिकता वाला‘ मानता है। आश्चर्य नहीं कि मध्यमवर्ग ने अन्ना के आंदोलन को जबरदस्त समर्थन दिया। इस आंदोलन के गर्भ से निकली आप। शुरूआत में आप हर प्रकार की प्रजातांत्रिक संस्थाओं का विरोध करती थी परंतु उसके पास किसी वैकल्पिक व्यवस्था का खाका नहीं था। इस कारण वह अराजकतावादी प्रतीत होती थी। परंतु चुनाव के बाद उसने प्रजातांत्रिक व्यवस्था को एक तरह से स्वीकार कर लिया है।
मोहल्ला सभाएं और आत्मत्याग
आप के मुख्यतः दो यूएसपी हैं। पहला है अरविन्द केजरीवाल और उनकी टीम की सादगी, उनकी साधारण सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि और उनके द्वारा पद के साथ मिलने वाली सुविधाओं जैसे विशाल निवास, कारें, सुरक्षा आदि का त्याग। आम जनता को यह आत्मत्याग इसलिए सुखद लगता है क्योंकि वह मानती है कि जो व्यक्ति उसे मिलने वाली सुविधओं को स्वयं त्याग रहा है वह भ्रष्ट नहीं होगा। ऐसा आवश्यक नहीं है। यह देखना अभी बाकी है कि सत्ता में आने के बाद, आप के कितने सदस्य धन की लिप्सा पर नियंत्रण रख सकेंगे।
आप का दूसरा यूएसपी है अपने समर्थकों से संवाद करने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल। जिस बेहतरीन ढंग से यह किया गया, वैसा करने की पारंपरिक पार्टियां कभी कल्पना भी नहीं कर सकती थीं। आप ने दिल्ली में सरकार बनाने के मुद्दे पर जो ‘जनमत संग्रह‘ किया, उससे भी आमजन बहुत प्रभावित हुए। आप ने यह संदेश दिया कि उसके निर्णय लेने की प्रक्रिया में केवल पार्टी के नेता या कोई काकस शामिल नहीं होगा बल्कि उसमें आमजनों की भी भागीदारी होगी। इनमें पार्टी के साधारण सदस्य और मोहल्ला सभाएं शामिल हैं।
परंतु यहां कई प्रश्न उपजते हैं। मोहल्ला सभाओं के सदस्य कौन होंगे? उनके निर्णय लेने की प्रक्रिया क्या होगी? सामान्य बहुमत? तीन चैथाई या अधिक बहुमत? या सर्वसम्मति? वे कौनसे मुद्दे होंगे जिनपर निर्णय लेने की जिम्मेदारी मोहल्ला सभाओं को सौंपी जाएगी? कई ऐसे मसले हैं जिन पर निर्णय मोहल्ला सभाओं पर नहीं छोड़ा जा सकता। उदाहरणार्थ ऐसे मुद्दे जो संविधान में निहित स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व और व्यक्ति की गरिमा के विरूद्ध हैं। क्या मोहल्ला सभाओं को यह अधिकार दिया जा सकता है कि वे दलितों, आदिवासियों व अल्पसंख्यकों की बेहतरी के लिए उठाए जाने वाले सकारात्मक कदमों पर निर्णय लें? क्या होगा यदि खाप पंचायतें यह निर्णय करेंगी कि महिलाओं को कितनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए?
निःसंदेह, मोहल्ला सभाओं को यह निर्णय लेने का हक दिया जा सकता है कि उनके क्षेत्र के लिए आवंटित विकास निधि का उपयोग किस तरह हो। परंतु यहां भी यह खतरा है कि मोहल्ला सभाओं का प्रभुत्वशाली वर्ग, दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों आदि जैसे समाज के हाशिए पर पड़े सामाजिक समूहों को विकास की धारा से अछूता रखें। यही कारण है कि डाक्टर बाबा साहब अम्बेडकर को गांधीजी की ग्राम स्वराज की अवधारणा के संबंध में कई आपत्तियां थीं। स्वायत्त ग्राम स्वराज, दलितों के दमन का हथियार बन सकता था और छुआछूत की व्यवस्था को संस्थागत स्वरूप दे सकता था। इसलिए डाक्टर अम्बेडकर, मजबूत केन्द्र सरकार के हामी थे। यह उम्मीद की जा सकती थी कि केन्द्र में बैठा समाज का श्रेष्ठि, प्रबुद्ध वर्ग संविधान की भावना के अनुरूप, संवैधानिक व कानूनी उपायों से जातिगत दमन का उन्मूलन करने का प्रयास करेगा। परंपराओं में जकड़े व धर्मभीरू ग्रामीणों की पंचायत से ऐसी उम्मीद करना बेकार था।
दिल्ली में आप की अनापेक्षित सफलता के पीछे उसका घर-घर जाकर चलाया गया चुनाव अभियान भी था। वह मध्यम वर्ग से लेकर झुग्गी निवासियों तक को अपने पक्ष में मोड़ने में सफल रही। भाजपा, कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों से आजिज़ आ चुकी जनता को आप में आषा की एक किरण दिखलाई दी। आप ने यह वायदा किया है कि वह अधिक प्रजातांत्रिक व समावेशी होगी। युवा वर्ग सोशल मीडिया के इस्तेमाल में सिद्धहस्त है और उसका दीवाना भी। जो पार्टी अपने प्रशंसकों और अनुयायियों से संपर्क बनाए रखने के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करेगी उसकी लोकप्रियता युवा वर्ग में बढ़ना अवश्यम्भावी है।
आप की ताकत
आप से हम सबको बहुत सी आशाएं हैं। इसका एक कारण यह है कि वह अपने समर्थक जुटाने के लिए जाति, क्षेत्र, धार्मिक समुदाय, भाषा, नस्ल आदि जैसी किसी संकीर्ण पहचान का उपयोग नहीं कर रही है। वह व्यवस्था में पारदर्शिता का मुद्दा उठाकर लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। चूंकि सत्ताधारी श्रेष्ठि वर्ग को छोड़कर, समाज के सभी अन्य वर्ग, जिनमें उद्योग समूह शामिल हैं, पारदर्शी व भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था चाहते हैं इसलिए बड़ी संख्या में लोग आप में शामिल हो रहे हैं। आप, लोगों को हिन्दू या मुसलमान, उत्तर भारतीय या दक्षिण भारतीय के रूप में न देखकर उन्हें केवल नागरिक के रूप में देख रही है। अगर आप इसी राह पर चलती रही और उसे आगे भी सफलता मिलती रही तो साम्प्रदायिक और जातिवादी राजनीति का इस देश से अंत हो जाएगा। परंतु यह आसान नहीं है। इसका कारण यह है कि आप में हर तरह के लोग शामिल हो गए हैं। उनमें वैश्वीकरण विरोधियों से लेकर मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के झंडाबरदार तक सभी शामिल हैं। आप के उदय के पीछे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन था और कम से कम अब तक इस पार्टी का नेतृत्व साधारण लोगों के हाथों में है।
समस्याएं
आप की सबसे बड़ी समस्या और चुनौती यह है कि उसकी कोई विचारधारा नहीं है और ना ही उसका कोई राजनैतिक कार्यक्रम या दिशा है। पार्टी अभी बहुत नई है और उसने कई उलझे हुए राजनैतिक मुद्दों पर अपना मन नहीं बनाया है। उसके नेता कश्मीर में सेना की उपस्थिति से लेकर कुंडाकुलम परमाणु परियोजना तक के मुद्दों पर परस्पर विरोधाभासी बातें कर रहे हैं। कुमार विश्वास मोदी के गुण गा रहे हैं तो कुछ अन्य नेता उनसे घोर असहमत हैं। अनेक महत्वपूर्ण मुद्दों पर अरविन्द केजरीवाल चुप्पी साधे हुए हैं। पार्टी में अलग-अलग विचारधाराओं वाले लोग प्रवेश कर रहे हैं। जाहिर है कि जब भी पार्टी विभिन्न मुद्दों पर अपनी स्पष्ट राय सामने रखेगी तब असहमत लोग उससे अलग होने लगेंगे और इससे पार्टी की साख को धक्का लगेगा। यह भी साफ है कि विचारधारा और नीति के स्तर पर अस्पष्टता से पार्टी अनिर्णय के भंवर में फंस सकती है।
पार्टी का राष्ट्रीय स्तर पर सुस्पष्ट ढांचा भी नहीं है। तेजी से बड़ी हो रही पार्टी में हर तरह के लोग घुसे चले आ रहे हैं-वामपंथी और दक्षिणपंथी, ईमानदार और अवसरवादी, मीरा सान्याल व मल्लिका साराभाई जैसे प्रसिद्ध व्यक्त्तिव और जमीन से जुड़े कार्यकर्ता आदि। इसका अंतिम नतीजा क्या होगा यह कहना मुश्किल है। परंतु इतना तो साफ है कि भारत के राजनैतिक क्षितिज पर आप के उदय और उसकी बढ़ती ताकत ने भाजपा के सामने एक बड़ी चुनौती उपस्थित कर दी है। केजरीवाल ने यह साबित कर दिया है कि जनता ऐसे लोगों को पसंद करती है जो सुविधाओं और विशेषाधिकारों के पीछे नहीं भागते। इसके मुकाबले, मोदी अपने चुनाव अभियान में पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं। वे हवाई जहाजों और हेलीकाप्टरों में यात्रा करते हैं, उनकी आम सभाओं के मंच बहुत बड़े और बहुत भव्य होते हैं और वे लोगों को इकट्ठा करने और उन्हें मंत्रमुग्ध करने के प्रयास में टेक्नोलाजी पर भी भारी धनराशि खर्च कर रहे हैं। आप का सादगीपूर्ण, द्वार-द्वार जाकर प्रचार करने का माडल मोदी का एक आकर्षक विकल्प बनकर उभरा है। हाल में चार राज्यों में हुए चुनावों में कांग्रेस की करारी हार से भाजपा कार्यकर्ताओं का मनोबल आसमान छूने लगा था। परंतु आप को मीडिया में मिल रही तरजीह और उसके आकार में तेजी से हो रही वृद्धि से भाजपा चिंतित है। केवल यही आप के अस्तित्व का औचित्य सिद्ध करने के लिए काफी है! जय हो!
-इरफान इंजीनियर