रविवार, 30 मार्च 2014

बांग्लादेश : साम्राज्यवादी शक्तियों की नयी करतूत

 एशिया में चीन और ईरान उसके मुख्य प्रतिद्वन्दी हैं, ईरान को साम्राज्यवादी शक्तियों ने चारों तरफ से घेर रखा है और अब वह चीन को बुरी तरह से घेरने के प्रयास में है, लेकिन बांग्लादेश में शेख हसीना व सेना प्रमुख ने जिस लोकतांत्रिक तरीके से बी0डी0आर0 साजिश को असफल कर दिया है जिससे साम्राज्यवादी ताकतों के मंसूबे पूरे नही हो पाये। मुख्य सवाल यह भी है कि दुनिया के आतंकियों को हथियार और पैसा कौन उपलब्ध करा रहा है?
    सीधा सा जवाब है कि यह सब साम्राज्यवादी देशों का ही खेल है और इस खेल के प्रमुख खिलाड़ी कि भूमिका में वही साम्राज्यवादी शक्तियाँ है जो समय-समय पर अपने खेल के मैदान को बदलती रहती है बस आवश्यकता इस बात की है कि समय रहते उनकी साजिश को समझने की जरूरत है। साम्राज्यवादी शक्तियाँ भाषा, क्षेत्र जाति, आर्थिक असमानता, सामाजिक असमानता को भड़का कर गरीब मुल्कों में अपनी कठपुतली सरकारें कायम करने का कार्य करती है और जब उनकी कठपुतली सरकारें कायम हो जाती हैं, तब वह वहाँ की प्राकृतिक सम्पदा और अन्य तरीके से लूट घसोट करती हैं। आज बांग्लादेश में घटी घटना में यह बात सामने आ रही है कि इस विद्रोह का मुख्य उद्देश्य प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलटना था और बांग्लादेश सेना प्रमुख मोइन अहमद को भी खत्म करना था। विश्व मंे लोकतांत्रिक जनपक्षधर सरकारों अस्थिर करने का काम अमरीका की खुफिया एजेन्सी सी0आई0ए0 तथा उसकी जोड़ीदार मोसाद दोनों मौजूद हैं, बहाना चाहे बांग्लादेश राइफल्स के जवानों के विद्रोह का हो या मुम्बई आतंकी घटना अमरीकी साम्राज्यवादियों का मुख्य उद्देश्य अस्थिरता पैदा करों और अपने पिट्ठू आतंकी संगठन के माध्यम से या फिर इन देशों पर अपनी अप्रत्यक्ष रूप से हुकूमत कायम करो।
    सन् 1971 में बांग्लादेश बनवाने में अहम भूमिका निभाने वाली साम्राज्यवादी शक्तियों ने अपने को उस समय सबसे ज्यादा अपमानित महसूस किया जब शेख मुजीब-उर-रहमान व जुल्फिकार अली भुट्टो ने इजराइल के विरूद्ध 1975 के युद्ध में लामबंदी कर ली और पेट्रोलियम का प्रयोग साम्राज्यवादी शक्तियों के विरूद्ध पहली बार सफलता के साथ प्रयोग में लाया गया। इस बात से तिलमिलाकर उस अपमान का बदला उन्होनें बांग्लादेशी क्रान्ति के नायक शेख मुजीब-उर-रहमान की हत्या कर अपनी कठपुतली सरकार कायम कर ली और आज जब बांग्लादेश में लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत निर्वाचित सरकार से शेख हसीना की सरकार का तख्ता पलट करने की कोशिश की गई वह भी इस बात का उदाहरण है कि कहने को तो अमरीका अपने को लोकतंत्र का हितैषी और संरक्षक कहता है और धर्म को भी आधार बनाकर वामपंथियों या सामन्तवादियों पर प्रहार करता रहा है, परन्तु इतिहास गवाह है कि संसार के देशों में जहाँ भी शान्तिपूर्ण ढंग से लोकतांत्रिक सरकारें चलती हालत में जुदा हुई हैं। सदैव इन्हीं साम्राज्यवादियों के षड़यंत्र के कारण। इसी प्रकार धर्म एवं मानवाधिकार की रक्षक होने का दावा भी इन शक्तियों का उस समय खोखला नज़र आता है, जब अबू ग़रीब जेल का सच सामने आता है।
    बांग्लादेश राइफल्स के जवानों ने वेतन, खाना और तरक्की के लिए विद्रोह कर दिया यह बात कुछ समझ में आने वाली नहीं है। जिस तरह से बी0डी0आर0 निदेशक मेजर जनरल शकील अहमद समेत सौ से ज्यादा अधिकारियों व उनके परिवार जनों की हत्या कर सामूहिक कब्रें बना कर दफना देना, किसी बड़ी साजिश का संकेत है। बांग्लादेश में अभी इस विद्रोह की जाँच शुरू हुई है और समाचार पत्रों के माध्यम से जो खबरें आ रही हैं कि यह एक बहुत बड़ी साजिश थी, जो असफल हो गयी और बांग्लादेश राइफल्स की वर्दी पहन कर बाहरी तत्वों ने भी विद्रोह में हिस्सा लिया। वह कौन सी बाहरी ताकतें हैं? जो हमारे देश को भी चारों तरफ से घेरना चाहती हैं। निष्पक्ष विश्लेषण से यह आभास होता है कि साम्राज्यवादी शक्तियाँ इस पूरे क्षेत्र को अस्थिर करके अपने मुख्य व्यवसायिक प्रतिद्वन्दी व सभी बातों का जवाब देने में सक्षम चीन को घेरना चाहती हैं। बांग्लादेश के बहाने साम्राज्यवादी शक्तियाँ हमारे देश को भी गिरफ्त में लेने के प्रयास में हैं और उनके लेखक, पत्रकार साम्राज्यवादी शक्तियों के पक्ष में माहौल बनाने में लगे हुए हैं।

           -आनन्द प्रताप सिंह


लोकसंघर्ष  पत्रिका मार्च २००९ से

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