शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

तालिबानी हिन्दू बनाने की मुहिम --10

खुद को खत्म कर देने का ख़याल
मैंने सर संघचालक को जो चिटठी लिखी, उसका कोई जवाब नहीं आया, मैं हर स्तर पर जवाब माँगता रहा, लड़ता रहा लेकिन हर स्तर पर एक अजीब सी चुप्पी थी, हर तरफ से निराशा ही हाथ लगी, कोई भी इस घटना की गंभीरता को समझने को तैयार नहीं था, सबको लगता था कि यह एक बहुत ही सामान्य घटना है, ऐसा तो होता ही रहता है, इसमें क्या बड़ी बात है, जिससे मुझे इतना नाराज और तनावग्रस्त होना चाहिए। मैंने इतनी पीड़ा कभी नहीं महसूस की थी पहले, जितनी उन दिनों कर रहा था, वे दिन वाकई बेहद दुखद थे, मैं अक्सर खुद को किंकर्तव्यविमूढ़ पाता था, कुछ भी करने और सोचने की शक्ति नहीं बची थी, मैं अवसाद की स्थिति में जा रहा था, मुझे कहीं भी सुना नहीं जा रहा था, जो बात मेरे अन्दर इतनी उथल पुथल मचाए हुए थी, उससे लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ा, दुनिया तो वैसे ही चल रही थी, जैसी पहले चलती थी। मैं इतना निराश था कि मेरे दिमाग में खुद को खत्म कर देने के खयाल आने लगे, मैंने खुदकशी के बारे में सोचा, मैंने मरने की कईं तरकीबें सोची, कुएँ में कूद जाना, फाँसी लगाना या जहर खा कर मुक्त हो जाना, कुछ तो करना ही था, इसलिए विषपान का विकल्प ही मुझे सर्वाधिक उपयुक्त जान पड़ा, घर में चूहे मारने की दवा मौजूद थी, एक रात खाने के साथ ही मैंने उसे खा लिया और सो गया, मुझे नींद का आभास हो रहा था, मुझे लग रहा था कि अब मेरी जिन्दगी की फिर कोई सुबह नहीं होगी। मैं सोया हुआ था, शायद नींद में था या जग रहा था मैं जी रहा था या मैं मर रहा पेट में दर्द की एक भयंकर लहर सी उठी। उल्टी करने की अदम्य इच्छा और जरूरत ने मुझे झकझोर दिया, मैं दर्द के मारे दोहरा हो रहा था, मैं उठ बैठा और उल्टियाँ करने को बाहर भागा उल्टियों के चलते बुरा हाल था, कलेजा मुँह को आने लगा, अंतडि़याँ खिंची चली आती थी, सिर चकराता था और बेहोशी जारी थी, अचानक बिगड़ी तबियत से परिजन चिंतित हो उठे, बड़े भाईसाहब को तुरंत बुलाया गया, वे आए तब तक मेरी आँखें बंद होने लगी, भाईसाहब ने पूछा कि अचानक क्या हुआ, मैं बामुश्किल सिर्फ इतना बता पाया कि मैंने चूहे की दवा खायी। बाद में मुझे बताया गया कि भाईसाहब गाँव से डॉक्टर को लेने को भागे, डॉ0 सुरेश शर्मा तुरंत भागते हुए आ पहुँचे, उन्होंने ग्लूकोज में कई सारे इंजेक्शन डाले और इलाज प्रारंभ किया, चूँकि पुलिस और अन्य लोगों तक बात नहीं पहँुचे इसलिए अगले कई घंटों तक घर में ही गुपचुप इलाज    चलाया गया, मेरे बड़े भाई बद्री जी भाईसाहब का इतना बड़प्पन रहा कि उन्होंने कभी भी किसी को इस घटना का जिक्र नहीं किया, मैं उनकी सक्रियता और डॉ0 शर्मा के त्वरित इलाज की वजह से बच गया पर ऐसी बातें अंततः बाहर आ ही जाती है, डॉ0 साहब ने गोपनीयता भंग कर दी, बात आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई, मैं स्वस्थ तो हो गया पर लज्जा और ग्लानि से भर गया, मैं उन दिनों हर जगह असफलता का सामना कर रहा था, आत्महत्या के प्रयास में भी सफल नहीं हो पाया, हर जगह की तरह यहाँ भी मैं हार गया था, मौत हार गई, जिन्दगी जीत गई थी, मुझे लगता था कि हर गाँव वासी को मेरी इस नादानी के बारे में जानकारी है इसलिए मैं मारे शर्म के कई महीनों तक लोगों का सामना नहीं कर पाता था, मैं वापस भीलवाड़ा चला गया। शहर आकर मैंने सोचना शुरू किया, खुद से ही पूछने लगा कि मैं क्यों मर रहा था और किनके लिए मर रहा था, किस बात के लिए? मेरे मर जाने से किसको फर्क पड़ने वाला था? ठन्डे दिमाग से सोचा तो अपनी तमाम बेवकूफियों पर सिर पीट लेने को मन करने लगा, मरने को तो मैं पहले भी उनके प्यार में राजी था अयोध्या जाकर और मरने को तो मैं बाद में भी तैयार हो गया था उनके नफरत भरे व्यवहार के कारण पर दोनों ही स्थिति मंे मरना तो मुझे ही था, कभी हँसते-हँसते तो कभी रोते-रोते क्या वे मेरी जिन्दगी के मालिक हैं? क्या मेरे जीने के लिए आरएसएस का प्यार या नफरत जरुरी है? मुझे क्यों मरना चाहिए, मुझे उनसे क्यों सर्टिफिकेट चाहिए, वे कौन होते हैं मेरे जीवन और सोच को नियंत्रित करने वाले? मैं अब तक भी उनके साथ क्यों बना हुआ हूँ? मैं ऐसे घटिया और नीच सोच विचार और पाखंडी व्यवहार वाले लोगों के साथ क्यों काम करना चाहता हूँ,जो मेरे घर पर बना खाना तक नहीं खा सकते हैं! मैं ऐसे लोगों का हिन्दू राष्ट्र क्यों बनाना चाहता हूँ? मैं एक ऐसा धार्मिक राष्ट्र बनाने का आकांक्षी क्यों था जिसमें मेरे साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार होने वाला है आखिर क्यों?
    ऐसे ही जलते हुए सैंकड़ों सवालों ने मुझे जकड़ लिया था  खूब अन्तद्र्वन्द्व मनन चिंतन और थक जाने की स्थिति तक मंथन के पश्चात मैंने तय किया कि मैं आरएसएस को न केवल पूरी तरह नकार दूँगा बल्कि उनके द्वारा मेरे साथ किए गए जातिगत भेदभाव को भी सबके समक्ष उजागर करूँगा, इस दोगले हिन्दुत्व और हिन्दुराष्ट्र की असलियत से सबको वाकिफ करवाना मेरा आगे का काम होगा। मैंने संकल्प कर लिया कि संघ परिवार के चेहरे से समरसता के नकाब को नोंचकर इनका असली चेहरा मैं लोगों के सामने लाऊँगा। मैंने अपनी तमाम सीमाओं को जानते हुए भी निश्चय कर लिया था कि मैं संघ परिवार के पाखंडी हिन्दुत्व को बेनकाब करूँगा और मैं अपनी पूरी ताकत के साथ अकेले ही आरएसएस जैसे विशालकाय अर्धसैनिक सवर्ण जातिवादी संगठन से दो-दो हाथ करने निकल पड़ा। मैंने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा और अपमान को निजी दुश्मनी बनाने के बजाए सामाजिक समानता, अस्मिता एवं गरिमा की सामूहिक लड़ाई बनाना तय किया और एक भीम प्रतिज्ञा की कि मैं अब हर तरीके से संघ और संघ परिवार के समूहों तथा उनके विघटनकारी विचारों की मुखालिफत बोलकर, लिखकर और अपने क्रियाकलापों के जरिये करूँगा, यह जंग जारी रहेगी।
   
 -भँवर मेघवंशी
मो-09571047777
क्रमश   :
लोकसंघर्ष पत्रिका में प्रकाशित
 (लेखक की शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा: हिन्दू तालिबान’ का पहला भाग)      
    मोबाइल: 09571047777

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