शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

गांधी के अहिंसक जादू ने सारी दुनिया को प्रभावित किया


गौतम बुद्ध के बाद यदि किसी भारतीय ने विश्व के चिंतन को प्रभावित किया है तो उसका नाम है मोहनदास करमचन्द गांधी। जहां गौतम बुद्ध के दर्शन और चिंतन का प्रभाव एशिया महाद्वीप के देशों तक सीमित था वहीं महात्मा गांधी ने दुनिया के सभी महाद्वीपों को प्रभावित किया है। महात्मा गांधी के विचारों ने एशिया के अलावा अफ्रीका, यूरोप और अमरीका को भी प्रभावित किया।
इस तथ्य को अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने अपने भारत प्रवास के दौरान भी स्वीकारा। उन्होंने बार-बार कहा कि मैं दो महान व्यक्तियों से प्रभावित हूं-एक महात्मा गांधी और दूसरे अमरीका के डाॅ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर। डाॅ. मार्टिन लूथर किंग जूनियर स्वयं भी महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित थे। उन्होंने अमरीका में गांधी की अहिंसक रणनीति के अनुरूप अश्वेतों के साथ होने वाले भेदभाव के विरूद्ध आंदोलन किया था।
महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर नेल्सन मंडेला ने भी दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासियों को वहां के गोरे शासकों की जंजीरों से मुक्त कराया था। उसी तरह अमरीका के डाक्टर मार्टिन लूथर किंग ‘जूनियर’ ने गांधी की अहिंसक रणनीति को अपनाकर वहां के काले लोगों को नागरिकता के वे सब अधिकार दिलाये थे, जो उन्हें प्राप्त नहीं थे। यूरोप के अनेक देशों के अनेक चिंतकों ने यह महसूस किया है कि शान्ति और अहिंसा के रास्ते पर चलकर ही इंसान सुकून का जीवन जी सकता है।
मेरे पास एस किताब है जिसका शीर्षक है
“Mahatma Gandhi as Germans see him” (महात्मा गांधी जर्मनों की नजर में)। यह किताब महात्मा गांधी की जन्म शताब्दी (अक्टूबर 2, 1969) के अवसर पर प्रकाशित हुई थी। किताब में जर्मनी के 10 जाने माने विद्वानों के विचार शामिल किए गए हैं। किताब की भूमिका पश्चिमी जर्मनी के तत्कालीन चांसलर (चांसलर का पद हमारे देश के प्रधानमंत्री के समकक्ष है) ने लिखी है। विद्वानों के लेखों के साथ किताब में उन ग्रन्थों की सूची प्प्रकाशित की गई है जो गांधी के बारे में जर्मन भाषा मेंप्रकाशित हुए हैं। जर्मन भाषा में गांधी जी के बारे में 112 ग्रन्थ प्रकाशित हुए हैं। सूची के प्रारंभ में लिखा गया है कि सूची में प्रमुख ग्रन्थों को ही शामिल किया गया है।
चांसलर कुर्टजर्ग किसिंगर लिखते हैं ‘‘गांधी दुनिया के उन महान लोगों में से एक हैं जिनने मानव मात्र की सेवा की है और राष्ट्रों के शांतिपूर्ण ढंग से स्वतंत्र रहने के अधिकार के लिये संघर्ष किया है। बुरी तरह से विभाजित यूरोप गांधी के विचारों से प्रभावित है। हम जर्मनी के निवासी, महात्मा गांधी पर उतनी ही श्रद्धा करते हैं जितनी की भारतवासी करते हैं।’’
कुर्टजर्ग अपनी भूमिका में कहते हैं कि कुछ समय पहले जवाहरलाल नेहरू ने टेगौर की जन्मशती के अवसर पर प्रकाशित किताब में लिखा था कि गांधी एक चमकदार प्रकाशपुुंज की तरह भारत के आकाश में चमके थे और उनके प्रकाश से सारे भारतवासी जाग्रत हो उठे थे। वे गांधी की तुलना टैगोर से करते हैं। गांधी का प्रभाव वैसा नहीं था जैसा भूकंप का होता है वरन् उनका प्रभाव वैसा था जैसे पहाड़ों के पीछे से सूर्याेदय का होता है। सच पूछा जाए तो यदि टैगोर एक चिंतक थे तो गांधीजी एक मैदानी व्यक्ति थे। जहां टैगोर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के प्रतीक थे वही गांधी त्याग और सादगी के जीते जागते उदाहरण थे। परन्तु दोनों सच्चे अर्थों में भारतीय थे। ये शब्द एक ऐसे व्यक्ति के हैं जो गांधी के उत्तराधिकारी बने। नेहरू, गांधी के महानतम शिष्य होने के बावजूद अनेक मुद्दों पर गांधी से सहमत नहीं होते थे और विरोधी विचार रखते थे। गुरू-शिष्य का यह नाता भी अद्भुत था। वैसे गांधी ने यूरोप के इतिहास पर तूफानी प्रभाव नहीं डाला था परन्तु उनके विचारों ने यूरोप में एक ऐसी ज्योति जलाई है जो सदियों तक प्रकाश देती रहेगी’’। इस किताब में जर्मनी के महान चिंतकों के विचार शामिल किए गए हैं। इन सब चिंतकों ने गांधी को अपने-अपने नजरिए से समझने और पहचानने का प्रयास किया है। जैसे एक धार्मिक मामलों के विद्वान ने गांधी के व्यक्तित्व के धार्मिक पहलुओं को भारत की उच्च धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं के संदर्भ में समझने का प्रयास किया है। राजनीतिक विषयों के विशेषज्ञ ने गांधी के राजनीतिक विचारों की अपने ढंग से मीमान्सा की है। समाज शास्त्रियों ने जनता पर गांधी के जादुई प्रभाव का विष्लेषण किया है। गांधी के व्यक्तित्व के उस रूप को समझने का प्रयास किया है जो आम लोगों को गांधी के तरफ चुंबक के समान खींचता था। आध्यात्मिक विषयों के ज्ञाता ने पूरे विश्व पर गांधी के आध्यात्मिक प्रभाव को समझाने का ईमानदार प्रयास किया है। किताब में उन बातों को समझने का प्रयास किया गया है जिसके चलते दुनिया ने शांति के लिए एक नया रास्ता खोजने की आवश्यकता महसूस की। लेखकांे ने गांधी को एक आदर्शवादी महानायक के रूप में नहीं समझा परन्तु एक व्यवहारिक आदर्शवादी व्यक्ति माना। इस व्यक्ति को पैदा हुए सौ साल बीत गए हैं। अपने लंबे जीवन में वे जिन समस्याओं से जूझे हैं उनने भी नया रूप धारण कर लिया है। एक दुबले पतले व्यक्ति, जो हमेशा अपने आधे शरीर को सफेद कपड़े से ढंके रहते थे, उससे एक अजीब असाधारण ज्योति निकलकर आम आदमी में नई चेतना का संचार करती रही। उनके विचारों से विश्व  भिन्न-भिन्न तरीकों से प्रभावित हुआ है।
अब इस बात की कल्पना असंभव है कि ताकत से दुनिया की समस्याएं हल हो सकती हैं। एक लंबे अंतराल और अनुभव के बाद विश्व इस नतीजे पर पहुंचा है। जंगल के कानून के दिन लद गए हैं। अनेक पीढि़यों के प्रभावशाली प्रयासों के कारण आम आदमी की दैहिक ताकत अब अप्रासंगिक हो गई है। मानव की इस सोच के विकास में गांधी की अद्भुत भूमिका है। जहां आम आदमी ने गांधी के इस संदेश को अपना लिया है वहीं राष्ट्रों ने अभी तक इसे पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है। शायद कुछ समय लगेगा जब राष्ट्रों के चिंतन से ‘ताकत’ के उपयोग की बात पूरी तरह से समाप्त हो जायेगी, भले ही ऐसी स्थिति के निर्माण में समय लगे। जर्मनी समेत यूरोप का आम आदमी अब गांधी के इस विचार को आत्मसात करने लगा है। सुकरात ने अपने विचारों की प्रासंगिकता अपनी मृत्यु से सही सिद्ध की थी। उसी तरह गांधी जी ने भी अपनी ‘‘मृत्यु’’ (हत्या) से अपने विचारों की उपयोगिता और प्रासंगिकता सिद्ध कर दी थी।
किताब में शामिल अन्य लेखों के शीर्षक हैं बुद्ध से गांधी, भारत की महान आत्मा, महात्मा गांधी का भारत के धार्मिक इतिहास में स्थान, महात्मा और सविनय आन्दोलन, इतिहास में गांधी की भूमिका और स्थान, गांधी के आध्यात्मिक संदेश की प्रकृति और प्रभाव एवं गांधी जी की धरोहर।
जर्मनी, जिसने दो विश्व महायुद्धों की विभीषिका की त्रासदी भुगती है, शांति और अहिंसा का मतलब समझने लगा है। जर्मनी ने दुनिया के सबसे ज्यादा क्रूर व्यक्ति (हिटलर) के काले कारनामे भुगते हैं। वहां के लोग अब अपने बीच एक और हिटलर पैदा नहीं होने देना चाहते हैं। हिटलर ने जर्मनी को वैचारिक रूप से बांट दिया था। हिटलर ने यहूदियों के प्रति जबरदस्त घृणा पैदा की थी। इतिहास का सबक है कि घृणा पर आधारित मनुष्य और राष्ट्र ज्यादा दिनों तक जिन्दा नहीं रह सकते हैं। जर्मनी के नागरिक जीना चाहते हैं। इसलिये वे गांधी की तरफ देख रहे हैं। जर्मनी के महान नागरिक अलबर्ट आइंस्टाईन, जिन्हें जर्मनी से इसलिये भागना पड़ा था क्योंकि वे यहूदी थे, ने गांधी की मृत्यु पर कहा था ‘‘आने वाली पीढि़यां विश्वास नहीं करेंगी कि हाडमांस का ऐसा आदमी कभी पैदा हुआ था।’’
गांधी का प्रभाव अफ्रीका महाद्वीप पर अद्भुत था। अफ्रीका के महानतम नागरिक नेल्सन मंडेला सच्चे अर्थों में गांधी के शिष्य थे। दक्षिण अफ्रीका पर मुट्ठीभर गौरों का राज था। ये गोरे शासक वहां के मूल निवासियों पर तरह-तरह के जुल्म करते थे। गोरे शासक इन मूल नागरिकों को इंसान नहीं समझते थे। उनके साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में भेदभाव होता था। गांधी जी ने स्वयं उनके हकों के लिये आंदोलन किया था। बाद में वहां पर अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस की स्थापना हुई। इसके नेतृत्व में वहां के मूल निवासियों, जिन्हें काले कहा जाता था, ने एक लंबा संघर्ष किया। इस संघर्ष के प्रमुखतम नेता नेल्सन मंडेला थे। उनका फैसला था कि देश की आततायी सरकार के विरूद्ध अहिंसा के रास्ते से लड़ा जाएगा। एक लंबे समय तक मंडेला और उनका संगठन अहिंसक तरीके से संघर्ष करता रहा। परन्तु जब उनने देखा कि वहां की सरकार दिन प्रतिदिन और क्रूर होती जा रही है और तरह-तरह की ज्यादतियां करती जा रही है तो मजबूर होकर मंडेला को अहिंसा का रास्ता त्यागना पड़ा। ऐसा करने के पहले उनने बापू से क्षमा मांगी थी। अहिंसा का रास्ता त्यागने के बाद उन्होंने कहा था कि वे भले ही अहिंसा का रास्ता त्याग रहे हैं परन्तु उनके नये आंदोलन का स्वरूप ऐसा होगा जिसमें शत्रु तक की हत्या नहीं की जायेगी और न ही किसी इंसान को पीड़ा पहुंचाई जाएगी। उन्होंने लगभग बापू से माफी मांगते हुए कहा कि हिंसक आंदोलन के चार प्रकार हो सकते हैं-पहला तोड़फोड़, दूसरा गुरिल्ला युद्ध, आतंकी गतिविधियां और खुली क्रांति। इनमें से हम सिर्फ तोड़फोड़ का रास्ता अपनाएंगे और कोशिश रहेगी कि एक बूँद खून न बहे। मंडेला अपने वचन पर कायम रहे। वैसे तो जब वे शांतिपूर्ण आंदोलन करते थे तब उनकी और उनके समर्थकों की आयेदिन गिरफ्तारी होती थी। परन्तु आंदोलन का रूप बदल देने के कारण मंडेला और उनके समर्थकों पर जुल्मांे का पहाड़ टूट पड़ा। अपने अनेक समर्थकों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। दक्षिण अफ्रीका की गोरी सरकार ने उन्हें 27 वर्ष तक जेल में रखा। जेल में उन पर तरह-तरह के जुल्म किये गये। उन्हें अनेक बार जेल से छोड़ने का प्रलोभन दिया गया परन्तु वे हमेशा कहते थे कि जब पूरा दक्षिण अफ्रीका एक तरह का जेल है तो अकेले मेरी मुक्ति से क्या होगा। जब तक दक्षिण अफ्रीका पर से गोरी सरकार का साया नहीं हटता है तब तक मेरी मुक्ति बेमानी है। और वे अंततः जेल के बाहर उस समय आए जब पूरे देश  की सत्ता वहां के मूल निवासियों के हाथ में सौंपने का निर्णय हुआ।
इसी तरह, अमरीका के महान नेता डाक्टर मार्टिन लूथर किंग ‘‘जूनियर’’ तो सौ प्रतिशत गांधी के शिष्य थे। वर्षों पूर्व अब्राहम लिंकन ने वहां के काले नागरिकों को गुलामी के अभिशाप से मुक्त कर दिया था उसके बावजूद अमरीका में काले निवासियों के साथ भेदभाव किया जाता था। बसों में, दफ्तरों, सिनेमा हाल में, कारखानों में, ऐसी कोई जगह नहीं थी जहां भेदभाव नहीं होता था। बसों में कुछ सीटों पर लिखा रहता था ‘‘सिर्फ गोरों के लिये’’। एक दिन एक काली महिला गोरों के लिए आरक्षित सीट पर बैठ गई और धमकियों के बावजूद, पुलिस द्वारा ताकत का प्रयोग करने के बाद भी बार-बार उस सीट पर बैठती रही। उसके बाद अमरीका में एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन प्रारंभ हो गया। उस आंदोलन का नेतृत्व किया डा. किंग ने। आज से 50 वर्ष पूर्व डा. किंग के नेतृत्व में अमरीका की राजधानी वाशिनगटन में एक विशाल प्रदर्शन हुआ था। इस प्रदर्शन में लगभग 2 लाख लोगों ने भाग लिया। विशाल जनसमुदाय को संबोधित करते हुए जो भाषण डा. किंग ने दिया था, उसने दुनिया के इतिहास में स्थान बना लिया है। वह भाषण ‘‘आई हेव ए ड्रीम’’ (मेरा एक सपना है) के शीर्षक से सारी दुनिया में प्रसिद्ध है। महात्मा गांधी, डा. किंग के प्रेरणा पुरूष थे। महात्मा गांधी के संदेश को समझने और उसे आत्मसात करने के लिये डा. किंग ने अपनी पत्नी और कुछ प्रमुख सहयोगियों के साथ भारत की यात्रा की थी। अमरीका से रवाना होने के पूर्व उन्होंने कहा था कि मैंने अनेक देशों की यात्रा की है पर मैंने इन सभी देशों की यात्रा एक पर्यटक की हैसियत से की थी, परन्तु भारत मेरे लिये एक तीर्थस्थान है। भारत इसलिए तीर्थस्थल है क्योंकि वह महात्मा गांधी की जन्मभूमि और कर्मभूमि है। इसलिए मैं भारत एक तीर्थ यात्री के रूप में जा रहा हूँ। डा. किंग ने काले लोगों के अधिकारों के लिये अनेक आंदोलन किए। ऐसे ही एक आंदोलन की सफलता के बाद डा. किंग के एक सहयोगी ने कहा कि वे भारत की यात्रा पर क्यों नहीं जाते और स्वयं इतिहास के उन क्षणों को नहीं जीते हैं जिन क्षणों में महात्मा गांधी ने भारत की आजादी की लड़ाई लड़ी। सुझाव के अनुसार वे भारत की यात्रा पर निकल पड़े और 9 फरवरी 1959 को बम्बई पहुंचे। बम्बई से वे दिल्ली पहुंचे, जहां प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनके सम्मान में एक भोज का आयोजन किया। नेहरू के साथ भोज के बाद डा. किंग ने चार घंटे बिताए। भारत के भ्रमण के दौरान हमारे यहां के गरीबों की स्थिति देखकर उनका मन दुःखी हो उठा। उन्हें बताया गया था कि करीब पांच लाख लोग बारह महीने बंबई में खुली आसमान के नीचे सड़कों पर सोते हैं। भारत के लोगों की स्थिति देखकर उन्होंने कहा कि यहां हालत भी बदतर हैं। डा. किंग भारत के दलितों की स्थिति देखकर काफी दुःखी हुए थे। वे एक ऐसे स्कूल में गए थे जहां दलित बच्चे पढ़ते थे। जब वे स्कूल में पहुंचे तो स्कूल के प्राचार्य ने उनका परिचय इन शब्दों में किया था ‘‘ये अमरीका में रहने वाले अछूत हैं’’।
भारत प्रवास के दौरान वे गुजरात में स्थित साबरमती आश्रम गए और वहां कुछ दिन बिताए। वे अनुभव करना चाहते थे कि इस स्थान से कैसे गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े आजादी के आंदोलन का नेतृत्व किया। वे अपने प्रवास के दौरान राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद से मिले। इसके अतिरिक्त उन्होंने प्रसिद्ध गांधीवादी आचार्य कृपलानी से भी भेंट की। साबरमती आश्रम के बारे में उन्होंने लिखा है कि उनने उस स्थान पर एक महान आध्यात्मिक भावना का अनुभव किया। डा. किंग को बताया गया कि कैसे गांधी ने 322 किलोमीटर की पदयात्रा की थी। गांधी जी की इस महान ऐतिहासिक मार्च की चर्चा करते हुए डा. किंग ने अपने सहयोगियों को बताया कि गांधी जी ने मार्च में शामिल अन्य लोगों से कहा था ‘‘यदि तुम्हें पीटा जाता है तो भी पीटने वाले पर हमला न करो। यदि तुम्हारे ऊपर बंदूक चलाई जाती है तो भी कभी हथियार न उठाओ। यदि वे तुम्हें गाली देते हैं तो चुपचाप सुनो। इस सबके बावजूद चलते रहो, हो सकता है मंजिल पर पहुंचने के पहले हम में से कुछ मर जाएं, हम में से अनेकों को जेल भेज दिया जाए। इस सबके बाद भी हम चलते रहें और डा. किंग अंत में कहते हैं, कि वे (गांधी) चलते रहे।
डा. किंग की जीवनगाथा के लेखक लिखते हैं कि भारत की तीर्थयात्रा के बाद वे अनेक गांधीवादियों से ज्यादा गांधीवादी बन गए। वे भारत, गांधी जी के बारे में सब कुछ जानने के लिए आए थे। भारत की यात्रा के दौरान उन्होंने जो भी सुना, देखा, पढ़ा उसके बाद वे महान गांधीवादी बन गए।
-एल.एस. हरदेनिया

1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (31-01-2015) को "नये बहाने लिखने के..." (चर्चा-1875) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'