शनिवार, 4 अप्रैल 2015

हिन्दू राष्ट्र,गाय व मुसलमान---भाग.2

सन 1966 के आसपास, हिन्दू राष्ट्रवादियों ने गाय के मुद्दे पर एक बार फिर अपना ध्यान केन्द्रित किया। तत्समय नवगठित विश्व हिन्दू परिषद ने गौवध.विरोधी आंदोलन शुरू कर, हिन्दुओं को लामबंद करने की कोशिश की, यद्यपि यह प्रयास अधिक सफल न हो सका। सन 1967 में हजारों साधुओं ने संसद पर प्रदर्शन कर गौवध को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की मांग की। शनैः.शनैः, गाय और बोतलबंद गंगाजल, हिन्दू राष्ट्रवादी संगठनों के मुसलमानों को गौहत्यारा बताने के अभियान के स्थायी प्रतीक बन गए। गाय को पवित्र और ईश्वरीय दर्जा दिया जाने लगा। गौमूत्र और गाय के गोबर का जबरदस्त महिमामंडन किया गया और उन्हें कई रोगों का रामबाण इलाज बताया जाने लगा। लाखों की संख्या में ऐसे पोस्टर देश भर में लगाये गए, जिनमें विभिन्न देवताओं का वास, गाय के शरीर में बताया गया था। सन 2010 में दो प्रतिष्ठित समाचारपत्रों में यह खबर छपी कि आरएसएस से जुड़े 'गौ विज्ञान अनुसंधान केंद्र'  ने गौमूत्र से एक ऐसी दवा बनाई है,जिससे कैंसर ठीक हो सकता है और इस दवा का अमरीका में पेटेंट भी करा लिया गया है।    
विभिन्न राज्यों में बड़ी संख्या में गौशालाएं स्थापित हो गयीं और सरकारी धन से बूढ़ी गायों की देखभाल का प्रबंध होने लगा। हरियाणा में ऐसी बहुत.सी गौशालाएं हैं, जिन्हें राज्य सरकार से अनुदान प्राप्त होता है और दान के रूप में भी भारी.भरकम राशि मिलती है। परंतु फिर भीए बूढी गायों को न तो भरपेट भोजन मिलता है और ना ही उनकी उचित देखभाल की जाती है। यही हालत, कुछ अपवादों को छोड़कर, देश के सभी हिस्सों में चल रहीं गोशालाओं की है। इन गोशालाओं के संचालकों के लिएए अधिक संख्या में गायों का अर्थ होता है ज्यादा अनुदान। जाहिर है कि उनकी रूचि इसी में रहती है की गौवध पर पूर्ण प्रतिबन्ध लग जाए और इसलिए ही वे बूढी गायों की उपयोगिता का अतिश्योक्तिपूर्ण प्रचार करते हैं।
गौरक्षक दल और हिन्दू राष्ट्रवादी
विभिन्न प्रदेशों में 4.6 सदस्यीय गौरक्षक दल गठित हो गए हैं। इनकी संख्या, भाजपा.शासित राज्यों में ज्यादा है, जहाँ उनका मजबूत जाल है और उन्हें अनौपचारिक रूप से सरकार का संरक्षण प्राप्त है। ये दल सड़कों पर डेरा जमाये रहते हैं और मवेशी ले जा रहे ट्रकों को रोक लेते हैं। ये ट्रक सामान्यतः केवल मवेशियों को विक्रेता से क्रेता तक पहुंचाने का काम कर रहे होते हैं। अगर ट्रक का ड्राईवर या मालिक मुसलमान हो, तब तो उनकी खैर नहीं। अगर वाहन में सभी जरूरी कागजात उपलब्ध हों तब भी ये लोग ड्राईवर की बेतहाशा पिटाई लगाते हैं और अगर उन्हें मुंहमांगी रकम नहीं दी जाती तो वे मवेशियों पर कब्जा कर लेते हैं। ड्राईवर को मीडिया के सामने प्रस्तुत किया जाता है ताकि मुसलमानों को गौहत्यारा बताया जा सके। बाद में ड्राईवर को पुलिस के हवाले कर दिया जाता है। पुलिस, गौरक्षक दल के सदस्यों की बजाए, ड्राईवर पर मुकदमा कायम कर देती है।
इस लेखक ने गुजरात के कच्छ इलाके में कई ऐसी घटनाओं की जांच और राजस्थान के मेवात और मध्यप्रदेश के अनेक शहरों में हुईं इस तरह की घटनाओं की विस्तृत जानकारी एकत्रित की है। अकेले अहमदाबाद में कम से कम 64 ऐसे दल हैं। मीडिया में लगातार मुसलमानों को कसाईयों के रूप में प्रस्तुत किए जाने और सोशल मीडिया साईटों पर फोटोशॉप इत्यादि का इस्तेमाल कर रूपांतरित किये गये फोटो अपलोड करने के नतीजे में,देश में कई स्थानों में सांप्रदायिक दंगे हुए हैं। अहमदाबाद में सन् 1969 में सांप्रदायिक हिंसा इस अफवाह के बाद शुरू हुई कि मुसलमानों द्वारा बेरहमी से गायों की पिटाई की जा रही है। महाराष्ट्र के धुले में 5 अक्टूबर 2008 को दंगे तब शुरू हुए जब हिंदू रक्षक समिति ने शहर में बड़ी संख्या में ऐसे पोस्टर चिपकाये जिनमें मुस्लिम टोपी पहने एक दाढ़ी वाला आदमी, बड़ी क्रूरता से एक गाय को काट रहा है। पुलिस के जिस डीएसपी से हमने बात की उसने बताया कि पोस्टर में जो चित्र लगाया गया थाए वह बम धमाके में मारी गई एक गाय का था। पोस्टर में अत्यंत भड़काऊ और आपत्तिजनक बातें थीं परंतु पुलिस ने पूरे पोस्टर को हटाने की बजाए केवल उस हिस्से पर कागज की पर्चियां चिपकवा दीं।
हिंदू राष्ट्रवादी, गाय के प्रतीक का इस्तेमाल मवेशियों को ढोने वाले ट्रांसपोटरों से अवैध वसूली करने,मुस्लिम समुदाय के विरूद्ध घृणा फैलाने और सांप्रदायिक दंगे करवाने के लिए तो करते ही हैं, वे इसका इस्तेमाल अपने एक वृहद राजनैतिक लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भी करते हैं और वह है ऊँची जातियों के हिंदुओं और ओबीसी के एक हिस्से को एकसूत्र में बांधना। ऊँची जातियां, हिंदू आबादी का 15 प्रतिशत से भी कम हैं। गौरक्षा के नाम पर चलाए जा रहे अभियान का इस्तेमालए अलग.अलग दलों से जुड़ी ऊँची जातियों व ओबीसी के एक हिस्से को एक करने और उन्हें कांग्रेस व क्षेत्रीय पार्टियों से दूर करने के लिए किया जाता है। इससे ऊँची जातियों के सांस्कृतिक व राजनैतिक वर्चस्व को बनाए रखने में मदद मिलती है और तथाकथित 'हिंदू संस्कृति' को बढ़ावा देकर, दलितों और आदिवासियों की संस्कृति व खानपान की उनकी परंपरा को हाशिए पर पटकने की कोशिश की जाती है। गाय को गौमाता मानने और उसकी पूजा करने की प्रथा को पूरे देश पर लादने की कोशिश, सांस्कृतिक विविधता को नकारने का प्रयास है। हमारे देश में अलग.अलग धार्मिक विश्वास व आचरण प्रचलित हैं। गौमाता के नाम पर सांस्कृतिक वर्चस्व स्थापित करने का उद्देश्य, दरअसल, गौमाता के पूजकों का राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करना है। यह उन वर्गों का सांस्कृतिक.राजनैतिक दमन करने का प्रयास है जो गाय को माता नहीं मानते और जिन्हें गौमांस से परहेज नहीं है।
आश्चर्य नहीं कि हरियाणा के गोहाना में पांच दलितों को तब क्रूरतापूर्वक मौत के घाट उतार दिया गया था जब वे एक मरी हुई गाय की खाल उतार रहे थे। यह उनका पारंपरिक पेशा था। उन पर यह झूठा आरोप मढ़ा गया कि वे जिंदा गाय की खाल उतार रहे थे.ठीक उसी तरह,जिस तरह मुसलमान ट्रक मालिकों और ड्रायवरों पर यह झूठा आरोप लगाया जाता है कि वे गायों को बूचड़खाने पहुंचाने का काम करते हैं। इन सब का उद्देश्य गाय की रक्षा करना नहीं वरन् दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों पर सांस्कृतिक और राजनैतिक वर्चस्व स्थापित करना है। इस अर्थ में मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के गौवध निषेध कानून, राजनैतिक लक्ष्य की पूर्ति के लिये लाए गए लगते हैं। अगर किसी दंगे में सैंकड़ों मुसलमान भी मर जायें तब भी हत्यारों को सजा मिलने की संभावना बहुत कम होती है। मुसलमानों से कहा जाता है कि वे दंगों को भूल जायें,दंगाइयों को माफ कर दें और अपना जीवन आगे बढ़ायें। एफआईआर या तो दर्ज ही नहीं की जातीं या उनमें जानबूझकर कमियां छोड़ दी जाती हैं। अगर ठीक.ठाक एफआईआर दर्ज कर भी ली जाती है, तो जांच ठीक से नहीं होती और प्रकरणों में खात्मा लगा दिया जाता है। जिन मामलों में मुकदमा चलता है, वहां भी न्याय का मखौल ही होता है। गोहाना की दलित.विरोधी हिंसा के दोषियों को सजा मिलने की संभावना न के बराबर है। दलित.विरोधी हिंसा की अन्य घटनाओं में भी यही होता आया है, उन चंद मामलों को छोड़कर,जिनमें दलित और मानवाधिकार संगठनों ने दोषियों को सजा दिलवाने के लिए अभियान चलाया। 'अनुसूचित जातिए जनजाति ;अत्याचार निवारण अधिनियम' के तहत जितनी सजा का प्रावधान किया गया है,वह गौवध के लिए निर्धारित सजा से कम है। गौवध करने वाले को सात साल तक की कैद हो सकती है। गौवध निषेध अधिनियम के अंतर्गत पुलिस और प्रशासन को तलाशी लेने और संदेहियों को गिरफ्तार करने के बहुत व्यापक अधिकार दे दिये गये हैं और स्वयं को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी, आरोपियों पर डाल दी गई है। महाराष्ट्र में इस विधेयक के कानून बनने के तुरंत बाद, हिंदू राष्ट्रवादियों द्वारा मुसलमानों पर हमले की अनेक घटनाएं हुईं। यह अनापेक्षित नहीं था। इस कानून का उद्देश्य गाय की रक्षा या उसके प्रति श्रद्धा को बढ़ावा देना नहीं बल्कि मुसलमानों को परेशान करना और हिंदुओं को भाजपा के साथ लाना है। संघ परिवार को दलितों, आदिवासियों और मुसलमानों की जान से ज्यादा गाय की जान प्यारी है।
सांस्कृतिक राज्य
एक ऐसा राज्य, जो गाय को, हाशिए पर पड़े समुदायों के मनुष्यों से ज्यादा संरक्षण देता है, एक ऐसा राज्य जिसके लिए गाय और उसके तथाकथित रक्षकों की सुरक्षा, समाज के कमजोर तबकों.जिनमें महिलाएं भी शामिल हैं.की सुरक्षा से ज्यादा महत्वपूर्ण है,ऐसा राज्य न्यायपूर्ण नहीं कहा जा सकता। धर्मशासित राज्य की तरहए सांस्कृतिक राज्य भी प्रजातंत्र विरोधी होता है। वह जरूरतमंदों को दो जून की रोटी और रोजगार उपलब्ध करवाने की बजाए, सेना और पुलिस पर अपना धन खर्च करता है। वह राज्य, नागरिकों के रसोईघरों और बेडरूमों में झांकना चाहता हैए वह राज्य यह तय करना चाहता है कि महिलाएं कौनसे कपड़े पहनें, वह राज्य यह तय करना चाहता है कि कौनसा नाटक मंचित होए कौनसी फिल्म दिखाई जाए और कौनसी किताब छपे। उसे इस बात की कतई फिक्र नहीं होती कि उसके नागरिकों को स्वास्थ्य व शिक्षा की सुविधाएं उपलब्ध हो रही हैं या नहीं और ना ही वह सभी के समान विकास के प्रति फिक्रमंद होता है। सांस्कृतिक राज्य अपने नागरिकों की स्वतंत्रताओं को सीमित करता हैए असमानताओं को बढ़ाता है व इस तरह, अस्थिरता का वाहक बनता है।

गांधीजी का मत
गौरक्षा,गांधीजी का एक महत्वपूर्ण मिशन था और अहिंसा के सिद्धांत में उनकी आस्था का हिस्सा था। वे सभी पशुओं के खिलाफ हिंसा के विरूद्ध थे। 'गाय करूणा की कविता है', गांधीजी ने लिखाए 'इस सौम्य पशु की आंखों में करूणा झलकती है। वह लाखों भारतीयों के लिए माता है। गौरक्षा का अर्थ है ईश्वर द्वारा रचित सभी मूक प्राणियों की रक्षा .ईश्वर द्वारा रचित संसार के निचले दर्जे के प्राणियों की रक्षा अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि वे बोल नहीं सकते ;यंग इंडिया, 6 अक्टूबर 1921,पृष्ठ 36.गाय मनुष्येत्तर प्राणियों में सबसे पवित्र है। वह सभी मनुष्येत्तर प्राणियों की ओर से हमसे यह अपील करती है कि उसे मनुष्य.जो जीवित प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ है.के हाथों न्याय मिलना चाहिए। वह मानो अपनी आंखों से हमसे कहती है, 'तुम हमारे ऊपर इसलिए नहीं हो कि तुम हमें मारो और हमारा मांस खाओ या अन्य तरीकों से हमारे साथ दुर्व्यवहार करो वरन् तुम हमारे ऊपर इसलिए हो ताकि तुम हमारे मित्र और अभिभावक बनो' ';यंग इंडिया 26 जून 1924, पृष्ठ 214।
परंतु गांधीजी गौरक्षा के लिए मानव हत्या के खिलाफ थे। उन्होंने लिखा ;यंग इंडिया,18 मई 1921ए पृष्ठ 156 'मैं किसी गाय की रक्षा के लिए किसी मनुष्य को नहीं मारूंगा,ठीक उसी तरह,जैसे मैं किसी मनुष्य की रक्षा के लिए गाय का वध नहीं करूंगा। 'गांधीजी ऐसे सभी लोगों को,जो जानवरों का वध करते हैं और मांस खाते हैं,इस बात के लिए राजी करना चाहते थे कि वे मांसाहार त्याग दें और अहिंसा का सिद्धांत अपना लें। उनके लिए गाय किसी को घृणा का पात्र बनाने का उपकरण नहीं थी.उस कसाई को भी वे घृणा का पात्र नहीं मानते थे,जो गाय को काटता है। वे गाय की रक्षा इसलिए करना चाहते थे क्योंकि वे अहिंसा में विश्वास करते थे और चाहते थे कि हम सभी प्राणियों के प्रति करूणा,प्रेम और दया का भाव रखें। गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन कर मुसलमानों के एक बड़े हिस्से को इस बात के लिए राजी कर लिया था कि वो गौवध नहीं करेगा। कोई भी सरकार अपने कानूनों,जेलों और पुलिस का डर दिखाकर भी उतना नहीं कर सकती जितना गांधीजी ने केवल एक अपील के जरिये कर दिखाया था।'हरिजन';15 सितंबर 1946, पृष्ठ 310 में उन्होंने लिखा, 'गौवध कभी कानून के जरिये नहीं रोका जा सकता। केवल ज्ञान, शिक्षा और गाय के प्रति दया का भाव जाग्रत कर ही यह संभव हो सकता है।' चंपारण में दिये गये उनके एक भाषण,जिसकी रपट'यंग इंडिया' के 29 जनवरी 1925 के अंक में छपी, गांधीजी ने कहा 'दुर्भाग्यवश, आज हम में से कुछ लोग यह मानते हैं कि गौरक्षा के लिए एक ही काम करना जरूरी है और वह है गैर.हिंदुओं,विशेषकर मुसलमानों,को गौवध करने और गौमांस खाने से रोकना। यह सोच, मेरी दृष्टि मेंए मूर्खतापूर्ण है। परंतु इससे इस निष्कर्ष पर कोई न पहुंचे कि जब कोई गैर.हिंदू गाय का वध करता है तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता या मैं गौवध को सहन कर सकता हूं.पर मैं कर क्या सकता हूं? क्या मुझे अपने धर्म का पालन स्वयं करना है या दूसरे से करवाना है.मान लीजिये मैं स्वयं गौवध न भी करूं तो क्या यह मेरा कर्तव्य है कि मैं मुसलमानों को भी, उनकी इच्छा के विरूद्ध, ऐसा ही करने के लिए मनाऊं? मुसलमानों का दावा है कि इस्लाम उन्हें गाय का वध करने की इजाजत देता है। ऐसी परिस्थिति में अगर किसी मुसलमान को बल प्रयोग के जरिये गौवध करने से रोका जाए तो यह, मेरे विचार में, उसे जबरदस्ती हिंदू बनाने जैसा होगा। जब भारत में स्वराज आ जायेगा तब भी, मेरे विचार से, हिंदू बहुसंख्यकों के लिए यह अनुचित व मूर्खतापूर्ण होगा कि वे कोई कानून बनाकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को इस बात के लिए मजबूर करें कि वो गौवध न करें. मेरा धर्म मुझे यह सिखाता है कि मैं अपने व्यक्तिगत आचरण के द्वारा उन लोगों, जिनके इस संबंध में अलग विचार हैं, को यह विश्वास दिलाऊं कि गौवध करना पाप है और इसलिए उसे बंद कर दिया जाना चाहिए। मैं तो चाहूंगा कि गौवध पूरी दुनिया में बंद हो जाए परंतु उसके लिए आवश्यक यह है कि मैं मस्जिद में दिया जलाने के पहले अपने घर में दिया जलाऊं।'
-इरफान इंजीनियर

कोई टिप्पणी नहीं: