गुरुवार, 18 जून 2015

हिन्दुत्ववादी सरकार में दलित नरसंहार

 राजस्थान का जाट बाहुल्य नागौर जिला जिसे जाटलैंड कह कर गर्व किया जाता है, आधिकारिक रूप से अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए एक ‘अत्याचारपरक जिला‘ है। यहाँ के दलित आज भी दोयम दर्जे के नागरिक की हैसियत से ही जीवन जीने को मजबूर है। दलित अत्याचार के निरंतर बढ़ते मामलों के लिए कुख्यात इस जाटलैंड का एक गाँव है डांगावास, जहाँ पर तकरीबन 16 सौ जाट परिवार रहते हैं। इस गाँव को जाटलैंड की राजधानी कहा जाता रहा है। यहाँ पर सन 1984 तक तो दलितों को वोट डालने का अधिकार तक प्राप्त नहीं था, हालाँकि उनके वोट पड़ते थे, मगर नाम उनका और मतदान कोई और ही करता था। यह सिर्फ वोटों तक सीमित नहीं था, जमीन के मामलों में भी कमोबेश यही हालात हैं। जमीन दलितों के नाम पर और कब्जा दबंग जाटों का। राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 42 (बी) भले ही यह कहती हो कि किसी भी दलित की जमीन को कोई भी गैर दलित न तो खरीद सकता है और न ही गिरवी रख सकता है, मगर नागौर सहित पूरे राजस्थान में दलितों की लाखों एकड़ जमीन पर सवर्ण काबिज हैं, डांगावास में ही ऐसी सैंकड़ों बीघा जमीन है, जो रिकॉर्ड में तो दलित के नाम पर दर्ज है, लेकिन उस पर अनधिकृत रूप से जाट काबिज हैं।
    डांगावास के एक दलित दौलाराम मेघवाल के बेटे बस्तीराम की 23 बीघा 5 बिस्वा जमीन पर चिमनाराम नामक दबंग जाट ने 1964 से कब्जा कर रखा था, उसका शुरू-शुरू में तो यह कहना था कि यह जमीन हमारे पास 1500 रुपये में गिरवी है, बाद में दलित बस्ती राम के दत्तक पुत्र रतना राम ने  न्यायालय की मदद ले कर अपनी जमीन से चिमनाराम जाट का कब्जा हटाने की गुहार करते हुए एक लम्बी लड़ाई लड़ी और अभी हाल ही में नतीजा उसके पक्ष में आया। दो माह पहले मिली इस जीत के बाद दलित रतना राम मेघवाल ने अपनी जमीन पर एक छोटा सा घर बना लिया और वहीं परिवार सहित रहना प्रारम्भ कर दिया। यह बात चिमनाराम जाट के बेटों ओमाराम तथा कानाराम जाट को बहुत बुरी लगी, उसने जे0सी0बी0 मशीन लाकर उक्त भूमि पर तालाब बनाना शुरू कर दिया और खेजड़ी के हरे पेड़ काट डाले। इस बात की लिखित शिकायत रतना राम मेघवाल की ओर  से 21 अप्रैल 2015 को मेड़ता थाने में की गई, लेकिन नागौर जिले के पुलिस महकमे में जाट समुदाय का प्रभाव ऐसा है कि उनके विरुद्ध कोई भी अधिकारी कार्यवाही करना तो दूर की बात है, सोच भी नहीं सकता है, इसलिए कोई कार्यवाही नहीं की गई। इसके बाद दलितों को जान से खत्मकर देने की धमकियाँ मिलने लगीं और यह भी पता चला कि जाट शीघ्र ही गाँव में एक पंचायत बुलाकर दलितों से जबरन यह जमीन खाली करवाएँगे अथवा मारपीट कर सकते हंै, तो इसकी भी लिखित में शिकायत 11 मई को रतना राम मेघवाल ने मेड़ता थाने को देकर अपनी जान माल की  सुरक्षा की गुहार की, फिर भी पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की।
    14 मई 2015 की सुबह 9 बजे के आस पास डांगावास गाँव में जाट समुदाय के लोगों ने अवैध पंचायत बुलाई, जिसमें ज्यादातर वे लोग बुलाये गए, जिन्होंने दलितों के नाम वाली जमीनों पर गैरकानूनी कब्जे कर रखे हैं, इस हितसमूह ने तय किया कि अगर रतना राम मेघवाल इस तरह अपनी जमीन वापस ले लेगा तो ऐसे तो सैंकड़ांे बीघा जमीन और भी है जो हमें छोड़नी पड़ेगी, अतः हर हाल में दलितों का मुँह बंद करने का सर्वसम्मत फैसला करके सब लोग हमसलाह होकर हथियारों, लाठियों, बंदूकांे, लोहे की सरियों इत्यादि से लैश होकर तकरीबन 500 लोगों की भीड़ डांगावास गाँव से 2 किमी दूरी पर स्थित उस जमीन पर पहँुची, जहाँ पर रतना राम मेघवाल और उसके परिजन रह रहे थे। उस समय खेत पर स्थित इस घर में 16 दलित महिला पुरुष मौजूद थे, जिनमें पुरोहित वासनी पादुकला के पोखर राम तथा गणपत राम मेघवाल भी शामिल थे। ये दोनों रतना राम की पुत्रवधू के सगे भाई हैं, अपनी बहन से मिलने आए हुए थे। दलितों को तो गाँव में हो रही पंचायत की  खबर भी नहीं थी कि अचानक सैंकड़ों लोग ट्रैक्टरों और मोटर साईकिलों पर सवार होकर आ धमके और वहाँ मौजूद लोगों पर धावा बोल दिया। उन्होंने औरतों को एक तरफ भेज दिया, जहाँ पर उनके साथ ज्यादती की गई तथा विरोध करने पर उनके हाथ पाँव तोड़ दिए गए, दो महिलाओं के गुप्तांगों में लकडि़याँ घुसेड़ दी गईं, वहीं दूसरी ओर दलित पुरुषों पर आततायी भीड़ का कहर टूट पड़ा। उन्हें ट्रैक्टरों से कुचल-कुचल कर मारा जाने लगा, लाठियों और लोहे के सरियों से हाथ पाँव तोड़ दिए गए, रतना राम के पुत्र मुन्ना राम पर गोली चलायी गई, लेकिन उसी समय किसी ने उसके सिर पर सरिये से वार कर दिया जिससे वह गिर पड़ा और गोली भीड़ के साथ आये रामपाल गोस्वामी को लग गई, जिसने मौके पर ही दम तोड़ दिया।
    जाटों की उग्र भीड़ ने मजदूर नेता पोखर राम के ऊपर ट्रैक्टर चढ़ाया तथा उनकी आँखों में जलती हुई लकडि़याँ डाल दीं, लिंग नोंच लिया। उनके भाई गणपत राम की आँखों में आक वृक्ष का दूध डाल कर आँखंे फोड़ दी गई। इस तरह एक पूर्व नियोजित नरसंहार के तहत पोखर राम, रतना राम तथा पांचाराम मेघवाल की मौके पर ट्रैक्टर से कुचल कर हत्या कर दी गयी तथा गणपत राम एवं गणेश राम सहित 11 अन्य लोगों को अधमरा कर दिया गया। मौत का यह तांडव दो घंटे तक जारी रहा, जबकि घटनास्थल से पुलिस थाना महज साढ़े तीन किमी दूरी पर स्थित है, लेकिन दुर्भाग्य से अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपाधीक्षक तथा मेड़ता थाने का थानेदार तीनों ही जाट होने के कारण उन्होंने सब कुछ जानते हुए भी इस तांडव के लिए पूरा समय दिया और जब सब खत्म हो गया तब मौके पर पहँुच कर सबूत मिटाने और घायलों को हटाने के काम में लगे। मनुवादी गुंडों की दादागिरी इस स्तर तक थी कि जब उन्हें लगा कि कुछ घायल जिंदा बचकर उनके विरुद्ध कभी भी सिर उठा सकते है तो उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में मेड़ता अस्पताल पर हमला करके वहाँ भी घायलों की जान लेने की कोशिश की। अंततः घायलों को अजमेर उपचार के लिए भेज दिया गया और मृतकों का पोस्टमार्टम करवा कर उनके अंतिम संस्कार कर दिए गए।
    पीडि़त दलितों के मौका बयान के आधार पर पुलिस ने बहुत ही कमजोर लचर सी एफ0आई0आर0 दर्ज की तथा दूसरी ओर रामपाल गोस्वामी की गोली लगने से हुई मौत का पूरा इलजाम दलितों पर डालते हुए गंभीर रूप से घायल दलितों सहित 19 लोगों के खिलाफ हत्या का बेहद मजबूत जवाबी मुकदमा दर्जकर लिया गया। इस तरह जालिमों ने एक सोची समझी साजिश के तहत कर्ताधर्ता दलितों को तो जान से ही खत्म कर दिया, बचे हुओं के हाथ पाँव तोड़ कर सदा के लिए अपाहिज बना दिया और जो लोग उनके हाथ नहीं लगे या जिनके जिंदा बच जाने की सम्भावना है, उनके खिलाफ हत्या जैसी संगीन धाराओं का मुकदमा लाद दिया गया, इस तरह डांगावास में दबंग जाटों के सामने सिर उठा कर जीने की हिमाकत करने वाले दलितों को पूरा सबक सिखा दिया गया। राज्य की वसुंधरा राजे की सरकार ने इस निर्मम नरसंहार को जमीनी विवाद बताकर इसे दो परिवारों की आपसी लड़ाई घोषित कर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। हालाँकि पुलिस, प्रशासन और राज्य सरकार के नुमाइंदों के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि दो पक्षों के खूनी संघर्ष में सिर्फ एक ही पक्ष के लोग क्यों मारे गए तथा घायल हुए हैं, दूसरे पक्ष को किसी भी प्रकार की चोट क्यों नहीं पहँुची है और जब दलितों के पास आत्मरक्षा के लिए लाठी तक नहीं थी तो रामपाल को गोली मारने के लिए उनके पास बन्दूक कहाँ से आ गई और फिर सभी दलित या तो घायल हो गए अथवा मार डाले गए तब वह बन्दूक कौन ले गया। जिससे गोली चलायी गई थी। मगर सच यह है कि दलितों की स्थिति गोली चलाना तो दूर की बात, वे थप्पड़ मारने का साहस भी अब तक नहीं जुटा पाए हैं। 23 मई को एक और घायल गणपत राम ने भी दम तोड़ दिया है, जिसकी लाश को लावारिस बता कर गुपचुप पोस्टमार्टम कर दिया गया।
    नागौर जिला दलित समुदाय के लोगों की कब्रगाह बन गया है, यहाँ पर विगत एक साल में अब तक दर्जनों दलितों की हत्याएँ हो चुकी हैं, इसी डांगावास गाँव में जून 2014 में जाटों द्वारा मदन मेघवाल के पाँव तोड़ दिए गए थे, जनवरी 2015 में मोहन मेघवाल के बेटे चेनाराम की हत्या कर दी गई, बसवानी गाँव की दलित महिला जड़ाव को जिंदा जला दिया गया, उसका बेटा भी बुरी तरह से झुलस गया। मुंडासर की एक दलित महिला को ज्यादती के बाद ट्रैक्टर के गर्म सायलेंसर से दाग दिया गया, लंगोड़ में एक दलित को जिंदा ही दफना दिया गया, हिरड़ोदा में दलित दूल्हे को घोड़ी से नीचे पटक कर जान से मारने का प्रयास किया गया। इस तरह नागौर की जाटलैंड में दलितों पर कहर जारी है और राजस्थान का दलित लोकतंत्र की नई नीरो, चमचों की महारानी, प्रचंड बहुमत से जीत कर सरकार चला रही वसुंधराराजे के राज में अपनी जान के लिए भी तरस गया है। राज्य भर में दलितों पर अमानवीय अत्याचार की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं और राज्य के आला अफसर और सूबे के वजीर विदेशों में ‘ रिसर्जेंट राजस्थान‘ के नाम पर रोड शो करते फिर रहे हंै। कोई भी सुनने वाला नहीं है, राज्य के गृह मंत्री तो साफ कह चुके हैं कि उनके पास कोई जादू की छड़ी तो है नहीं जिससे अपराधियों पर अंकुश लगा सकें।  पुलिस अपराधियों में भय और आम जन में विश्वास’ के अपने ध्येय वाक्य के ठीक विपरीत ’आम जन में भय और अपराधियों में विश्वास’ कायम करने में सफल होती दिखलाई पड़ रही है। जाटलैंड का यह निर्मम दलित संहार संघ के कथित हिन्दुराष्ट्र में दलितों की स्थिति पर सवाल खड़ा कर रहा है।
 -भंवर मेघवंशी
मोबाइल: 09571047777
लोकसंघर्ष पत्रिका के जून2015 अंक प्रकाशित

2 टिप्‍पणियां:

निर्मला कपिला ने कहा…

अभी तो और आगे आगे देखिये क्या होता है।

निर्मला कपिला ने कहा…

अभी तो और आगे आगे देखिये क्या होता है।