शुक्रवार, 4 सितंबर 2015

लखानी-वरदान ग्रुप के प्रबंधन के खिलाफ श्रमिकों का सतत संघर्ष और कामयाबी का पड़ाव

इंदौर।  लखानी फुट केयर उद्योग, इंदौर में कार्यरत ३०० से अधिक मजदूर कर्मचारियों ने जून 2014 से प्रबंधन की अवैधानिक तालाबंदी और अवैध छँटनी के विरुद्ध प्रभावी व सतत आंदोलनात्मक कार्यवाही जारी रखकर श्रमिको के हौसले को बनाये रखा है। एक वर्ष से शांतिपूर्ण तरह से जारी आंदोलन के तहत श्रमिक लगातार गेट पर रहकर  प्रबंधन की गतिविधियों पर निगाह बनाये रहते हैं और साथ ही धरने, प्रदर्शन, जुलूस, ज्ञापन, पत्र-व्यवहार आदि सभी प्रकार के जायज़ तरीकों को अपनाकर अपनी न्यायसंगत आर्थिक हक हासिल करने की लड़ाई  जारी रखे हैं।

इंदौर में यह उद्योग विगत 33 वर्षो से सतत लाभदायक उत्पादन कर रहा था। इसके द्वारा अर्जित लाभो के आधार पर लखानी कंपनी प्रबंधन ने देश के अन्य स्थानो पर यथा रुद्रपुर, हरिद्वार, फरीदाबाद में इसकी इकाइयां स्थापित की और देश भर में अपने उत्पादन की विश्वसनीयता स्थापित कर अकूत लाभ अर्जित किये। अपने कारोबार के नई उचाइयां छूने के बाद प्रबंधन ने  कपटपूर्ण तरीके से एक के बाद दूसरी इकाईयो में तालाबंदी व् ले-ऑफ अर्थात अवैध छँटनी कर हज़ारो मजदूर परिवारो के समक्ष रोजी-रोटी के संकट के साथ उनका भविष्य ही अन्धकार में कर दिया। प्रबंधन की इस कार्यवाही से श्रमिको के सभी हक़-अधिकारों पर डाका पड़ गया क्योंकि उन्हें  इस अवधि में न केवल वेतन से वंचित होना पड़ा, बल्कि भविष्य में प्राप्त होने वाले भविष्य निधि लाभ, बीमा व् अन्य आर्थिक लाभ भी खतरे में पड़ गए। ऐसी स्थिति में मज़दूरों का संगठित होना काम आया।  दरअसल लखानी की इंदौर इकाई के मज़दूर २००४ से कारखाना मज़दूर संगठन, एटक इंदौर से जुड़े हुए थे। जब मज़दूरों की रोज़ी रोटी पर हमला हुआ तो एटक ने मज़दूरों से संघर्ष का आह्वान किया और एटक के मार्गदर्शन व मज़दूरों के कंधे से कन्धा मिलाकर किये गए सहयोग का सुपरिणाम ये रहा कि श्रमायुक्त मध्यप्रदेश ने लखानी प्रबंधन द्वारा की गयी तालाबंदी व छँटनी को एक साल लम्बे चले संघर्ष के बाद हाल में १७ जुलाई २०१५ को अवैधानिक घोषित कर दिया | ये बेशक अंतिम जीत नहीं है लेकिन मज़दूर विरोधी नीतियों और मज़दूर विरोधी शासनों के दौर में ये जीत आगे लड़ने का हौसला और प्रेरणा देती है। 

नई आर्थिक नीति आने के बाद प्राय: देखा जा रहा है कि वर्षो तक मुनाफा कमाने वाले पुराने उद्योगो में अचानक घाटा दिखाकर उनके 55 फीसदी शेयर रखकर उन्हें बीमार घोषितकर बंद किया जाने लगा है | उद्योगपति उद्योग कारखाने चालू रखकर चलाने के बजाय बंद करने पर ज्यादा चाँदी काट रहे हैं| इन उद्योगो को बंद करने के पूर्व जालसाजी करके, बोगस बैलेंस शीट बनाकर शासन व बैंको से भारीभरकम क़र्ज़ हासिल किया जाता है | इकाई के लाभों व क़र्ज़ राशि को प्रबंधन अपने निजी खातों  में स्थानांतरित कर लेता है | इस प्रकार सारा का सारा अवैधानिक कृत्य  क़ानूनी औपचारिकताएँ पूरी कर क़ानूनी छिद्रो की आड़ में किया जाता है | यह सारा अपराध समाज के सफ़ेदपोश अपराधियों, सरकारी अधिकारियों, बैंकों व अन्य वित्तीय संस्थानो के जिम्मेदार पदाधिकारियों की साँठगाँठ से किया जाता है। इसके बाद मजदूरों, बैंको, वित्तीय संस्थानों, सरकारी जमीनो आदि सब हजम करके उद्येाग में घाटा दर्शा दिया जाता है। लेकिन असल में मालिको की दौलत में भारी इजाफा हो चुका होता है। मजदूर सड़क पर आ जाता है और बैंक कर्ज डूबत खाते में चला जाता है।

यही प्रकिया लखानी उद्येाग  में अपनाई गयी जिसके चलते प्रबंधन ने अपनी सभी यूनिटें बंद कर दीं, तथा मजदूर के वेतन, भविष्य निधि, बीमा व अन्य लाभों का भुगतान बंद हो गया और बैंक का क़र्ज़ अधर में लटक गया| इंदौर इकाई बंद होने क़े बाद से कारखाना मजदूर संगठन (एटक) क़े महासचिव साथी मोहन निमजे ने हर मोर्चे पर प्रभावी हस्तक्षेप व पत्राचार किया। वे नियमित रूप से कारखाने के गेट पर जाकर सभा  कर मजदूरों में एकजुटता बनाये रखने में सफल रहे। उन्होंने कारखाने में पहल से तैयार रखे उत्पादों की बिक्री करवाकर मजदूरो को आंशिक भुगतान दिलवाया जिससे मज़दूरों को बहुत राहत मिली। दूसरी ओर शासन और श्रमायुक्त से लगातार पत्र व्यवहार कर प्रबंधन की अवांछित गतिविघियो की ओर ध्यान आकर्षित किया | सतत पत्राचार का परिणाम यह हुआ कि पहले प्रबंधन ने जो कपटपूर्ण  झूठ बोलकर ले -ऑफ़ का सशर्त कानूनी अधिकार हासिल कर लिया था उसे सबूत  देकर  समाप्त कराया गया। यूनियन की ओर से शासन, प्रशासन, श्रम मंत्रालय, भारत सरकार पुलिस हर स्तर पर कार्यवाही की गई | इस सूझबूझभरी लड़ाई ने मजदूरो  को न टूटने दिया न बिखरने दिया।

प्रबंधन ने अनेक बैंको से कर्ज लेकर घाटा बताकर अचानक तालाबंदी व ले ऑफ़ की प्रकिया अपना ली थी। इससे मजदूर परेशान अवश्य हुए किन्तु  डटे रहे।  इस ताज़ा फैसले से मज़दूरों में उत्साह फैला है और उनका हौसला मज़बूत हुआ है। हालांकि लखानी कंपनी की इन बंद पड़ी इकाइयों की जमीनो पर बैंको  द्वारा भी कब्जे क़े कायर्वाही प्रकिया हो चुकी है लेकिन कानूनी रूप से भुगतान का  पहला अधिकार मजदूरो का बनता है। अपने हक़ के लिए वे लड़ेंगे।

- एस. के. दुबे

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