शुक्रवार, 6 जनवरी 2017

प्रधान मंत्री नहीं कार्पोरेट जगत का सेवक हैं

मोदी सरकार हो या पहले  की सरकारे आम आदमी के छोटे  मोटे कर्ज के  बकाएदारो की सूची  ब्लॉक  तहसील व  सार्वजनिक  स्थलों पर तथा  अखबारों में प्रकाशित कर उनकी  बेइज्जती की  जाती रही  है  जिससे  वह  बकाया कर्जा  अदा करे             किन्तु  कार्पोरेट जगत  के  बड़े  बकाएदारो  से  वसूली  के समय यह लोग  चुप्पी साध जाते हैं    वहीं  विजय माल्या पर विभिन्न भारतीय बैंकों का 9000 करोड़ रुपये कर्ज है और वह भाग गया  मोदी  व उनकी  सरकार  चुप्पी  साधे  रही है 

उच्चतम न्यायालय  ने बकाएदारों के यहां फंसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लाखों करोड़ रुपए की वसूली में ढि़लाई को लेकर साल के पहले हफ्ते में ही सख्ती दिखाई। न्यायालय ने  चार हफ्ते में उन सभी कर्जदारों की सूची सार्वजनिक करने के लिए कहा है जिन पर 500 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम बकाया है। इसके बावजूद इस पर केंद्र सरकार या रिजर्व बैंक की ओर से अब तक कोई हलचल नजर नहीं आ रही है। 

न्यायालय   ने अक्तूबर में कहा था कि सिर्फ 57 डिफाॅल्टर कर्जदारों के यहां बैंकों के 85 हजार करोड़ रुपए बाकी हैं। याद रहे कि कर्जदारों की सूची रिजर्व बैंक आॅफ इंडिया ने मुहरबंद लिफाफे में अदालत को सौंपी दी है। पर जानकार सूत्रों के अनुसार रिजर्व बैंक और केंद्र सरकार उस सूची को जगजाहिर करने को भी तैयार नहीं । मोदी सरकार  अगर  सूची  जारी कर देती है तो  कार्पोरेट जगत  को दबाव में आकर  कर्जा  वापस  करना पड सकता है  तब मोदी की  नौकरी  खतरे में पड़  सकती है  यह लोग अघोषित  रूप से  कार्पोरेट जगत के  नौकर  होते हैं और उन्हें उनके  इशारे पर  कठपुतली की तरह नाचना पड़ता है  कार्पोरेट जगत से  सबसे ज्यादा  रूपए  मोदी एण्ड कंपनी ने लिए है इसलिए यह सबसे  कमजोर  प्रधानमंत्री है  

उच्चतम न्यायालय को  चाहिए कि  वह  बड़े  बकाएदारो  की  सूची  प्रकाशित  करावे  तथा  सरकार को आदेशित करे  कि वह शीघ्र  से शीघ्र  बकाया  रुपये वसूल करे

इस कार्य  से  चुनाव  सुधार  भी होगा और भ्रष्टाचार पर भी अंकुश लगेगा 

सुमन 

लोकसंघर्ष 



1 टिप्पणी:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (07-01-2017) को "पढ़ना-लिखना मजबूरी है" (चर्चा अंक-2577) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
नववर्ष 2017 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'