शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026
आगजनी - तोडफ़ोड़ के बीच से निकला लोकतंत्र कितना विनाशकारी होगा
आगजनी - तोडफ़ोड़ के बीच से निकला लोकतंत्र कितना विनाशकारी होगा
जेन- जी आन्दोलन की आड़ में लोकतन्त्र को रौंद रही है नव-निर्वाचित नेपाल सरकार
क्या नेपाल के नव-निर्वाचित प्रधानमंत्री बालेन शाह के हालिया कदम इस देश को फिर से अराजकता की गिरफ्त में धकेल सकते हैं? क्या बालेन शाह की ताजपोशी से नेपाल के लोगों में जगा उत्साह जल्द ठंडा पड़ने जा रहा है? क्या उनके द्वारा उठाए गये कदम ‘जेन जी’ की अपेक्षाओं के अनुकूल हैं? या वे पूर्वाग्रह और बदले की भावनाओं से की गयी कार्यवाहियाँ हैं? क्या बालेन शाह के काम करने का तरीका साम्राज्यवादी व तानाशाही भरा है? क्या बालेन शाह के नेत्रत्व में नेपाल हिन्दू राष्ट्र के लक्ष्य की ओर बढ़ेगा? क्या वहाँ सांप्रदायिकता और दक्षिणपंथ हावी होने जा रहे? क्या उनके द्वारा पैदा की जा रही स्थितियां राजशाही की वापसी के लिये उठ रही आवाजों को मजबूती प्रदान करेंगी? आदि अनेक प्रश्न हैं जो बालेन शाह सरकार के शैशवकाल में ही उभर कर सामने आ गये हैं।
बालेन शाह ने नेपाल के प्रधानमंत्री का पद संभालने के महज 24 घंटे के भीतर पूर्व प्रधानमंत्री और नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीक्रत, मार्क्सवादी- लेनिनवादी) के नेता केपी शर्मा ‘ओली’ को गिरफ्तार करवा लिया। उन्हें जघन्य अपराधी की तरह हथकड़ियां पहना कर जेल भेजा गया। उनकी सरकार में गृहमन्त्री रहे रमेश लेखक को भी गिरफ्तार कर लिया गया। जेन- जी आंदोलन के बाद वजूद में आयी सुशीला कार्की की कार्यवाहक सरकार द्वारा आन्दोलन के कथित दमन की जांच के लिये गठित गौरी बहादुर कार्की आयोग की सिफ़ारिशों को आधार बना कर दोनों नेताओं को गिरफ्तार किया गया है।
इसी आन्दोलन के दमन में कथित भूमिका के लिये काठमांडो के पूर्व मुख्य जिलाधिकारी (सीडीओ) छवि रिसाल को भी गिरफ्तार किया गया है। व्यापक रूप से हिंसक बने जेन जी आन्दोलन में दो दर्जन युवाओं सहित 76 लोग मारे गये थे। नेपाल पुलिस के अनुसार, रिजाल उन उच्च अधिकारियों की सूची में शामिल हैं जिन्हें इस आन्दोलन को दबाने के लिये कथित रूप से जिम्मेदार ठहराया गया है। अतएव आरोपित कई अन्य नेताओं और अधिकारियों की गिरफ्तारी की संभावनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता।
बालेन शाह यहीं नहीं रुके। उनके आदेशानुसार प्राधिकारियों ने धन- शोधन को लेकर तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों के खिलाफ जांच तेज कर दी है।
‘ओली’ और ‘लेखक’ की गिरफ्तारी से देश के सियासी गलियारों में भूचाल आगया है। जनता गुस्से में है और सड़कों पर उतर आयी है। नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी- एकीक्रत, मार्क्सवादी-लेनिनवादी (सीपीएन- यूएमएल), उसके सहयोगी संगठनों और छात्र इकाई के हजारों कार्यकर्ताओं ने उग्र प्रदर्शन प्रारम्भ कर दिये हैं। सीपीएन- यूएमएल इसे राजनैतिक प्रतिशोध और अवैध कार्यवाही बता रही है। गनीमत है कि शुरू में इन प्रदर्शनों में वरती गयी उग्रता एक हद तक शान्त हुयी है। मगर प्रतिरोध- पोस्टरबाजी और नारेबाजी अभी भी जारी हैं, जिनमें ‘केपी ओली को तुरन्त रिहा करो’ और ‘बदले की राजनीति बन्द करो’ जैसे नारे प्रमुख हैं।
दरअसल नई सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट बैठक में ही कार्की जांच आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने का निर्णय ले लिया। सरकार का तर्क है कि यह उन युवाओं को न्याय दिलाने की कोशिश है, जिन्होने पिछले साल के आंदोलन में अपनी जान गंवाई थी। लेकिन सवाल उठने लगे हैं कि ऐसा करने से पूर्व क्या उन्हें इसकी अदालत से मंजूरी नहीं लेनी चाहिये थी। खासतौर पर इसलिए भी कि यह जांच आयोग जेन जी आंदोलन के उपरान्त बनी कार्यवाहक सरकार द्वारा गठित किया गया था, लोकतान्त्रिक प्रक्रिया से चुनी सरकार के द्वारा नहीं।
विपक्षियों को प्रताड़ित करने की ये कार्यवाहियाँ जेन जी को न्याय दिलाने के नाम पर की जा रही हैं। पर क्या जेन जी इससे खुश है? उत्तर है नहीं। जेन जी के कई नेता भी इन कार्यवाहियों पर सवाल खड़े कर रहे हैं। हरक सपांग जो जेन जी के प्रमुख नेताओं में से एक हैं का कहना है कि बालेन का काम करने का तरीका साम्राज्यवादी व तानाशाहीपूर्ण है। अपने कथन की पुष्टि में वे कहते हैं- वालेन शाह लोगों पर हुक्म चलाना चाहते हैं। उन्होने हर मंत्री को अलग से व्यक्तिगत निर्देश दिये हैं, और ठीक परिणाम न मिलने पर उन पर कार्यवाही करने की चेतावनी भी दी है। तमाम सरकारी कर्मचारियों को भी इसी तरह की कार्यवाहियों की जद में लाने के प्राविधान किये गये हैं।
पब्लिक डोमेन में यह सवाल भी तैर रहा है कि यदि कोई आंदोलन अप्रत्याशित रूप से हिंसक हो जाये और सार्वजनिक संपत्तियों के विनाश और लोगों की जान लेने पर उतर आये तो क्या किसी सरकार को हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना चाहिये अथवा जनता की संपत्तियों और जीवन की रक्षा करनी चाहिये? क्या ऐसी कार्यवाही पूरी तरह से अहिंसक हो सकती है? यदि नहीं, तो क्या जानमाल की हानि होने दी जानी चाहिये? ऐसे प्रश्नों पर गहरे सामाजिक चिन्तन की जरूरत है। पर सार्थक चिन्तन की जगह नवेली सरकार 72 जानों की कीमत पर अपना ‘रोड- रौलर’ दौड़ा रही है।
पर यहां प्रमुख सवाल जेन जी आंदोलन के दौरान हुयी हिंसा नहीं है, अपितु बालेन शाह की कार्यशैली है। 2025 के सितंबर माह में भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुये थे। इनमें सरकार, संविधान अथवा व्यवस्था बदलने जैसी कोई बात नहीं थी। पर प्रशासनिक कार्यवाही अमल में आने के बाद आंदोलन अनियंत्रित हिंसा- आगजनी में परिवर्तित हो गया था।
सत्ता संभालने के तत्काल बाद प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपनी कैबिनेट की पहली बैठक में जो फैसले लिये उनमें कई ऐसे भी हैं जो जनता की अपेक्षाओं को ध्यान में रख लिये गये हैं। इनमें से एक चरमराई अर्थव्यवस्था में जान फूंकने वाला फैसला भी है। लेकिन विश्वविद्यालयों और सरकारी तंत्र में राजनैतिक हस्तक्षेप को कम करने के उपायों संबंधी फैसला तो जेन जी के पर कतरने वाला ही साबित होगा। सभी जानते हैं कि युवाओं का वोट बालेन की जीत का मुख्य आधार है। प्रशासन के कर्मचारियों की बात दीगर हो सकती है, लेकिन मजदूर संगठनों के अधिकारों में कटौती बताती है कि वे मेहनतकशों के परिश्रम की कीमत पर अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना चाहते हैं। जिन तबकों ने उन्हें जिताया वे उन्हीं के पर कतरना चाहते हैं।
ऐसी ही वजहों से जेन जी आंदोलन से जन्मे कई नेता बालेन शाह के साथ कदम नहीं मिला पा रहे हैं। कई एक ने तो मंत्री बनने से भी इंकार कर दिया है। जबकि कई मंत्री अमेरिका समर्थित एनजीओ’ज से जुड़े हैं। गृहमंत्री उनमें से एक हैं।
19 वीं सदी में राजनीति का फोकस वर्गीय आंदोलनों पर था। मजदूर वर्ग की विचारधारा- मार्क्सवाद लेनिनवाद से प्रेरित आंदोलनों ने समाजवाद का मार्ग प्रशस्त किया था। वैज्ञानिक और वस्तुगत कार्यक्रम पर आधारित आन्दोल्न शोषणविहीन समाज के निर्माण की राह प्रशस्त करते हैं। व्यवस्था परिवर्तन का औज़ार बनते हैं। पर इस तरह के कार्यक्रम से रहित कोई आन्दोलन कुर्सी पर नए चेहरे तो बैठा सकता है, व्यवस्था परिवर्तन नहीं कर सकता। हमारे देश में गत शताब्दी के आठवें दशक में गुजरात से शुरू युवा आन्दोलन जिसकी परिणति जेपी आन्दोलन और अन्ततः जनता पार्टी की सरकार के रूप में हुयी, का हश्र हम सबके सामने है। छात्र- युवाओं के आसाम आंदोलन का भी कुछ ऐसा ही हश्र देखने को मिला।
हाल ही में भारत के इर्द गिर्द तीन बड़े युवा आन्दोलन- श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में हुये जिन्हें जेन जी की संज्ञा दी गयी। श्रीलंका में चूंकि वामपंथी शक्तियाँ सशक्त और साजग थीं, तो वहाँ वामपंथी सरकार निर्वाचित हुयी। बंगलादेश में धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील परम्पराओं को रौंद कर कट्टरपंथी ताक़तें सत्ता पर काबिज हो गईं। लेकिन आम चुनावों में जनता ने उन्हें नकार दिया। इससे सबक लेते हुये बंगलादेश नेशनलिस्ट पार्टी से प्रधानमंत्री बने तारिक रहमान ने अपनी प्रतिद्वंदी अवामी लीग की स्वस्थ परंपराओं को जारी रखा। उन्होने आक्रामक नीति अपनाने के बजाय, सबको साथ लेकर चलने का प्रयास किया है। इससे बंगलादेश में पुनः स्थिरता का नया दौर शुरू हुआ है।
प्रतिरोध की ताकत को समाप्त कर निष्कंटक राज चलाने कि ललक हमेशा कारगर नहीं होती। 1977 में पर्याप्त बहुमत से सत्ता में आयी जनता पार्टी लोक कल्याण में जुटने के बजाय श्रीमती इंदिरा गांधी को नेस्तनाबूद करने में जुट गयी। अपने वैचारिक अंतर्विरोधों और बदले की भावना से की गयी कार्यवाहियों के परिणामस्वरूप पार्टी और सरकार न केवल बिखर गयी अपितु श्रीमती गांधी की अपार बहुमत से सत्ता में पुनः वापसी हुयी।
इसे संयोग कहें या प्रयोग जिस समय बालेन शाह नेपाल के कम्युनिस्ट नेताओं को जेल के सींखचों के पीछे भेज रहे थे, भारत सरकार के गृहमंत्री अमित शाह देश की आजादी की लड़ाई में प्रमुख भूमिका निभाने वाली और शहीदे आजम भगत सिंह के आदर्शों पर चलने वाली पार्टी- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी पर भोंडे हमले बोल रहे थे। इससे पहले स्वयं प्रधानमंत्री कम्युनिस्टों की विचारधारा को ‘खतरनाक’ करार दे चुके हैं। बालेन शाह और मोदी- शाह का ये वैचारिक साम्य बहुत कुछ कह जाता है।
विपक्ष के दमन की इन कार्यवाहियों के अतिरिक्त अल्पावधि में बालेन शाह ने कई ऐसे कदम उठाये हैं जो नेपाल को दक्षिणपंथ की ओर धकेलते नजर आरहे हैं। वह तमाम धार्मिक अनुष्ठानों को पूरा कर रहे हैं जो नेपाल को ‘हिन्दू राष्ट्र’ बनाने की आकांक्षा से ओत- प्रोत जान पड़ते हैं। नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाने का सपना तो शायद ही पूरा हो, पर इससे वहां सांप्रदायिक विभेद बढ़ने की पर्याप्त संभावनायें हैं।
सांप्रदायिक विभेद से लोकतन्त्र कमजोर होता है, जो नेपाल में अभी शैशवावस्था में है और भारी उथल पुथल से गुजर रहा है। राजशाही समर्थक ताक़तें इसका लाभ उठा सकती हैं। सभी जानते हैं कि नेपाल में आरएसएस हिन्दू स्वयंसेवक संघ (HSS) के नाम से काम कर रहा है। उसका उद्देश्य वहां हिन्दू राष्ट्र तथा राजशाही की पुनर्स्थापना है। अच्छी बात यह है कि वहाँ की जनता न तो राजशाही को पसंद करती है, न ही धर्माधारित राज्य को।
बालेन शाह को समझना होगा कि नेपाल का लोकतन्त्र अभी संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। वहां इतिहास की विरासत, वर्तमान की राजनैतिक प्रतिस्पर्धा और बाहरी ताकतों का दबाव तीनों काम करते हैं। नेपाल की लोकतान्त्रिक संस्थायें अभी परिपक्व नहीं हुयी हैं। सत्ता संघर्ष अभी भी व्यक्ति केन्द्रित है। ऐसे में बाहरी प्रभाव और आन्तरिक असंतोष अस्थिरता को बढ़ा सकते हैं। और जिन्हें वे आज जेलों में डाल रहे हैं, उनके समर्थक जेन जी जैसा आन्दोलन खड़ा कर सकते हैं। और यदि उस आन्दोलन के परिणामस्वरूप वे पुनः सत्ता में आते हैं तो क्या बालेन शाह चाहेंगे कि वे भी बदले की भावना से काम करें? यह पुनः एक भयावह त्रासदी होगी।
किसी भी सरकार को न्याय को अपनी नीति के केन्द्र में रखना चाहिये। बालेंदु शाह को भी यह हक हासिल है। पर न्याय की एक तार्किक परिणति होती है, जिसका सिद्धान्त है- ‘न्याय न केवल होना चाहिये, बल्कि होता हुआ दिखना भी चाहिये’। अतएव नेपाल सारकर को फूँक फूँक कर कदम उठाना चाहिये। विपक्षियों से निपटने में उसकी हड़बड़ाहट उस पर भारी पड़ सकती है। नेपाल के लोकतन्त्र को संकट में डाल सकती है।
मशहूर शायर मुज़फ्फ़र रज़्मी कैरानवी का प्रसिद्ध शेर हमें आगाह करता है-
ये जब्र भी देखा है तारीख की नजरों ने,
लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पाई
-डा॰ गिरीश
लेखक- राष्ट्रीय सचिव भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी
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