बुधवार, 2 सितंबर 2026

संघी पूरी सोच से भी मुक्ति चाहिए, केवल कुर्सी से मुक्ति नहीं, उस पूरी सोच से मुक्ति चाहिए जो इनकी है-अमरजीत कौर

सबको मेरा लाल सलाम, उनको भी जो नहीं पहुंच पाए हैं। आना चाहते थे लेकिन गाड़ियों में जगह नहीं मिली। हमारे हिसाब से साथी इन तीनों हॉल में भरे हुए हैं। पिछले हॉल के अंदर भी जो अर्ली मॉर्निंग आए हैं, लेट नाईट आए हैं, उधर बैठे हैं। इस साइड के अंदर भी जो कैंप लगा है, अभी उसमें भी साथी इस माइक के जरिए से सुन रहे हैं। अभी जत्थे के जत्थे आ रहे हैं, वालंटियर्स की सूचना है कि कुछ ट्रेन्स जो लेट हैं उनमें भी साथी हैं। तो एक सैलाब यहाँ पर पहुंचा है रामलीला ग्राउंड में इस बदलाव रैली के लिए, सब साथियों को मेरा सलाम। आंदोलन करना तो हमारा काम रहा है। नीचे के स्तर से ले के अपने राजधानियों में और फिर हिंदुस्तान की राजधानी में, से ही तो हमने अपने देश की आजादी जीती थी। लेकिन मौजूदा सरकार जो बैठी है, उसने आंदोलन करने वालों को आंदोलनजीवी बोल दिया। कुछ और आंदोलन चले तो परजीवी बोल दिया। और आगे बढ़े तो फिर टेररिस्ट बोल दिया। और आंदोलन आगे बढ़े तो देशद्रोही बोल दिया। और आगे बढ़े तो कह दिया अर्बन नक्सल है। फिर भी नहीं हटे तो अभी लाल किले के ऊपर से प्रधानमंत्री ने बोल दिया दिमागी नक्सल है। तो आंदोलन तो हम करते आए हैं। और बदलाव रैली जो हमने की है, केवल इसलिए तो नहीं की है कि एक रैली करना है रामलीला ग्राउंड में। हम बहुत सीरियस हैं, बहुत संजीदा हैं। क्योंकि हम बहुत दुखी हैं, हम बहुत परेशान हैं, हम बहुत उलझन में भी हैं। लेकिन हम जोश-खरोश में भी हैं, हम होश में भी हैं, क्योंकि हम ये समझ रहे हैं ये जो सत्ता आज कुर्सी पे बैठी है, वो बहुत खतरनाक है। किनके लिए? पूरे आवाम के लिए, पूरे देश के लिए, हमारी सांझी विरासत के लिए, हमारी सोच के लिए, हमारे वैज्ञानिक रास्ते के लिए, हमारे समाज के हर हिस्से के लिए। इसलिए हम बहुत संजीदा हैं। ये केवल बदलाव रैली यहाँ रामलीला ग्राउंड पे नहीं है। मैं मीडिया के साथियों को भी कहना चाहती हूँ, ये यूँ ही नहीं आए हैं। गांव-गांव में पदयात्रा की है, साइकिल जत्था निकाले हैं, लोगों के बीच घूमे हैं। वहां पर्चे बांटे हैं, लोगों का दुख सुना है, उनके साथ दुख बांटा है। और उनको ये कहते हुए कि हम दिल्ली जा रहे हैं, ये कहने के लिए मांग के लिए नहीं। इस सरकार से किसी मांग के पूरा होने की उम्मीद नहीं है। और इसलिए हम केवल बिगुल बजाने जा रहे हैं। और बिगुल वही है कि देश बदलाव चाह रहा है, लेकिन वो क्यों जरूरी है? बदलाव चाहिए, देश मांग रहा है, जनता मांग रही है, मजदूर मांग रहा है, किसान मांग रहा है, महिलाएं मांग रही, आदिवासी मांग रहे हैं। और जिनको जात-पात के नाम पे आप लोगों ने दबा के रखा, century old, वो सब बदला मांग रहे हैं। जब पहली बार नरेंद्र मोदी कुर्सी पर बैठे 2014 में, हमारी पार्टी की पहली प्रतिक्रिया थी, ये मात्र सत्ता परिवर्तन नहीं है, ये कुछ बुनियादी परिवर्तन हुआ है, ये खतरनाक परिवर्तन हुआ है। ये खतरे की घंटी पूरे देश के लिए है। इसलिए पार्टी ने अपनी पोंडिचेरी की कॉन्फ्रेंस में 2015 में विश्लेषण किया था। जो हमने पांडिचेरी में कहा, वो सब सच साबित होता हमें कोलम की कॉन्फ्रेंस में पहुंचते-पहुंचते दिखा। जब तक हम विजयवाड़ा पहुंचे, देश बहुत गहरे संकट में धंस चुका था। समाज के हर हिस्से के ऊपर हमले बढ़ चुके थे। हमारी शिक्षा पे, हमारे बुद्धिजीवियों पे, हमारे कलाकारों पे, हमारे सांस्कृतिक कर्मियों पे सबके ऊपर हमले थे। जो आदिवासियों में, जो दलितों में काम करने वाले लोग थे, उनको जेलों में ठूंसा गया। हमने कहा हालात और बिगड़ रहे हैं, और लड़ने की जरूरत है, और आंदोलन की जरूरत है। साथियों, हिंदुस्तान दुनिया के मुल्कों में एक बहुत बड़ी तादाद वाला मुल्क है। अठारहवीं और उन्नीसवीं शताब्दी में हमारे देश के ऊपर जो व्यापार करने के नाम पे आए, उन्होंने हमारे देश में बांटने की राजनीति को आगे बढ़ाया। उन्होंने अपने को कंपनी बहादुर का दर्जा दे लिया, उसके बाद हमारे देश की रियासतों को आपस में लड़ा के हमारे मुल्क के ऊपर कब्ज़ा करना शुरू किया। हिंदुस्तान जो व्यापार में पचास फीसदी शेयर रखता था। साथियों, मैं आपको कहना चाहती हूँ, अपने देश की ताकत पहचानिए। उस हिंदुस्तान की तरफ लार लपका के अंग्रेज भी आए थे, जर्मन भी आए थे, फ्रांसीसी भी आए थे, पुर्तगाली भी आए थे। उस समय वो जो कंपनी बहादुर थी, वो आहिस्ता-आहिस्ता बाद में सीधे महारानी विक्टोरिया का राज बन गया। कंपनी बहादुर के टाइम पे हमारे किसानों पे हमले हुए, उनकी जमीनें छीनी गईं। हमारे जल, जंगल, जमीन के ऊपर आदिवासियों का अधिकार था, उनको वहाँ से हटाकर हमारी संपदा को लूटने का रास्ता बनाया। हमारे आदिवासी लड़े, बड़े-बड़े आदिवासी नेता हुए, जिसमें बिरसा मुंडा का नाम सबसे ज्यादा जाना जाता है। किसानों ने लड़ा, मजदूर ने लड़ा — चौदह घंटे, पंद्रह घंटे, सोलह घंटे, अठारह घंटे पीसने वाला, फिर भी घर में रोटी नहीं पकती। ये समाज के तीन हिस्से बहुत बड़े पैमाने पे अंग्रेजों को ललकारने के लिए मैदान में उतरे। यही जो लाल किला है, जहाँ पे बहादुर शाह जफर के पास सब लोग पहुंचे थे और कहा था आप देश के राजा हैं, आप हाँ भरिए, पूरे देश में स्वतंत्रता आंदोलन चलना चाहिए। उसके बाद हमारे देश के अंदर आजादी के आंदोलनों में मजदूरों, किसानों, आदिवासियों के साथ हमारे विद्यार्थी जुड़ गए, हमारे युवा जुड़ गए। चौदह साल, तेरह साल, बारह साल की उम्र में बच्चे सड़कों पे आना शुरू हुए। ये आजादी के आंदोलन में कम्युनिस्टों का खून बहा है, हमारे मजदूर और किसानों का खून बहा है। उसमें हमारे युवाओं ने फांसियों के तख्ते चूमे हैं, उन्होंने गोलियां खाई हैं सीने में। वो भगत सिंह हो, सुखदेव हों, राजगुरु हों, चंद्रशेखर आजाद हों, रामप्रसाद बिस्मिल हो कि अशफाकउल्ला हो। जब कम्युनिस्ट पार्टी बनी, इस पृथ्वी पर एक देश समाजवादी देश के रूप में उतरा, सोवियत क्रांति का जिक्र किया गया। उसके बाद पूरी दुनिया में मजदूरों, किसानों और कम्युनिस्ट आंदोलनों को बहुत ताकत मिली। जब इस देश के जांबाज मजदूर और किसान लाल झंडा थाम रहे थे, तब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति ले के चल रहा था। मैं आज कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के पोडियम से कहना चाहती हूँ, मिस्टर मोदी, मिस्टर अमित शाह और मोहन भागवत जी सुन लीजिए। ये आपका आपके पहले फाउंडर गुरु की जुबानी है कि आप हिटलर को मानते हो, आप नाजीवाद को मानते हो, आप फासीवाद को मानते हो, आप हिंदुस्तान के अंदर केवल हिंदू राज को मानते हो। अंग्रेजों की बांटो और राज करो की नीति को आरएसएस ने चलाया। अभी जब मैं आपसे बात कर रही हूँ, मेरी आँखों को बहुत सुकून मिल रहा है, क्योंकि अभी भी जत्थे के जत्थे चले आ रहे हैं। रेलवे स्टेशनों से खबर आ रही है, ट्रेनें लेट हैं, लेकिन लोग आते चले जाएंगे और ये रामलीला ग्राउंड छोटा पड़ रहा है। हम केवल रैली करने नहीं आए, बदलाव क्यों जरूरी है, ये समझने और पूरे देश को समझाने के लिए निकल पड़ेंगे। हम सिर के ऊपर कफ़न बांध के निकलेंगे, हम अपने शहीदों की कुर्बानियों से रास्ता ले के निकलेंगे। इसीलिए मैं हैरान थोड़ी हूँ कि ये शिक्षा का सत्यानाश कर रहे हैं, कि इनको गधे चाहिए, इनको फूहड़ चाहिए। इनको चाहिए यहाँ भुस भरा हो, जो अंधभक्त बने रह सके। ये नहीं चाहते कोई किंतु करे, कोई परन्तु करे, कोई सवाल करे, कोई जिज्ञासा रखे, कोई विज्ञान की सोच रखे। क्योंकि वो हिंदुस्तान को सदियों पुरानी मनुस्मृति के दौर में फेंकना चाहते हैं। इसलिए ये आवाम में बताना जरूरी है कि ये लोग क्यों खिलाफ हैं हमारे विद्यार्थियों के और शिक्षा के, क्यों विरुद्ध हैं हमारे शिक्षकों के, क्यों विरुद्ध हैं सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं के। ये हिंदुस्तान को आगे ले जाने की बजाय सदियों पीछे फेंकना चाहते हैं। और इसीलिए याद रखें, जब पूरा देश आजादी का आंदोलन तेज हुआ, चंद्र सिंह गढ़वाली ने कहा मैं हिंदुस्तानियों पे गोली नहीं चलाऊंगा, बंदूक फेंक दी। जब हमारी नेवी जंग के मैदान में उतर गई, RIN Mutiny, उसके ऊपर एक मुस्लिम लीग का झंडा था, एक तिरंगा था और एक कम्युनिस्टों का झंडा था। कहाँ थी आरएसएस तब? ये देश को दो हिस्सों में कर दो, चाहे कई हिस्सों में कर दो, लेकिन हमें अपना हिंदू राज बनाना है, ये 1925 में आरएसएस ने बनते वक्त कहा था। भाईचारा, दोस्ती, सांझी विरासत, गंगा-जमुनी तहजीब इनकी डिक्शनरी में नहीं है। हेडगेवार से पूछा गया, आप अंग्रेजों से लड़ोगे? उन्होंने कहा नहीं। तो आपकी लड़ाई किससे है? उन्होंने कहा मुसलमानों से है, ईसाइयों से है और लाल झंडे से है। मिस्टर नरेंद्र मोदी ने तीन साल पहले अपनी बीजेपी की टॉप लीडर मीटिंग में बोला था कि ये कम्युनिस्ट खतरनाक होते हैं, ये लाल झंडे वाले खतरनाक होते हैं। मिस्टर नरेंद्र मोदी, हम तो शुरू से जानते हैं कि तुम किसको निपटाना चाहते हो, आज हम कहने के लिए आए हैं, तुमको निपटा डालेंगे। लाल झंडे को चुनौती दे रहे हो, तिरंगे झंडे को पैरों के नीचे कुचलते रहे थे, उसको जलाते रहे थे। इसलिए कभी अर्बन नक्सल बोलते हो, कभी दिमागी नक्सल बोलते हो। अरे भाई दिमाग होता तो कुछ बनेंगे ना। इसीलिए साथियों, ये कामयाब नहीं हुए, देश के बंटवारे की सियासत चलाई। लेकिन जब हम इसके बावजूद भी इतना गरीब, इतनी अनपढ़ता, इतनी अज्ञानता, शिक्षा भी कम, रोज़गार भी नहीं, कारखाने भी नहीं, बुरी हालतें, infrastructure भी नहीं और ऊपर से लाखों लोग शरणार्थी यहाँ पर पहुंचे, उनको बसाना, फिर से अपने देश को आजाद हिंदुस्तान को एक दिशा देना। तब क्या कहा आरएसएस, बीजेपी ने? इन्होंने कहा पब्लिक सेक्टर नहीं चाहिए, सरकार को कोई शिक्षा में, स्वास्थ्य में, पीने का पानी देने में, सड़क देने में कुछ नहीं करना चाहिए। जो बेघर हैं उनको छत देने की जरूरत नहीं है, जो भूमिहीन हैं उनको जमीन देने की जरूरत नहीं है। इन्होंने पब्लिक सेक्टर का विरोध किया, पब्लिक सर्विसेज का विरोध किया, भूमि सुधार का विरोध किया। आज मैं कहना चाहती हूँ, जो सीनियर कॉमरेड्स आए हैं, बताइए अपनी नई पीढ़ी को, कम्युनिस्टों ने जो सरकार की फाजिल जमीनें थीं, इसी लाल झंडे को ले के जाकर उन जमीनों पर कब्जा किया और भूमिहीनों को बांटा। ये लाल झंडा संघर्षों का है। इसलिए बदलाव जरूरी है। ऐसी दकियानूस सरकार, संप्रदायवादी सरकार और फिर से वर्ण व्यवस्था को इस देश में स्थापित करने की कोशिश में लगी सरकार, हमारे सारे पब्लिक सेक्टर को नेस्तनाबूद करने की योजना से निकली सरकार, और इस के अंदर फिर से हजारों वर्षों की सोच को लाने वाली और वैज्ञानिक सोच को खत्म करने का आइडिया रखने वाली सरकार, ये नहीं रहनी चाहिए। बहुत साथियों ने बोलना है, मुझे भी सीमा रखनी है, मैं बंद करना चाहूंगी, पर आपसे कहना चाहती हूँ, हम जवान हिंदुस्तान हैं, सत्तर फीसदी आबादी पैंतीस साल से नीचे है। हिंदुस्तान जवान है, ये हमारी पूंजी भी है, हमारी ताकत भी है, हमारी इकॉनमी में चार चाँद लगा सकती है। लेकिन अगर इनको पढ़ने नहीं दिया जाए, कुछ बनने नहीं दिया जाए, इनको रोजगार नहीं मिले तो ये बारूद का ढेर है। इसीलिए आज इस देश की इतनी बड़ी नौजवानों की जो ताकत है, वो सही दिशा में जा सके, बदलाव किस डायरेक्शन में है, वहां जा सके, इसलिए ये रैली है। आखिर में मैं ये कहूँगी कि ये तो समझ गए कि सब लोग बदलाव चाह रहे हैं। आप भी कहते हुए आए कि बदलाव रैली में जा रहे हैं, अब आज के बाद बैठने का नहीं है। कम्युनिस्ट पार्टी को फक्र है, हिंदुस्तान में सबसे पहले कम्युनिस्ट आंदोलन जब शुरू हुआ, 1925 में बनी आरएसएस, 25 में बनी हमारी, तब से टक्कर है इनके साथ। आप अपनी ताकत पहचानो, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को आज मजबूत करने की जरूरत है और जन संगठनों को मजबूत करने की जरूरत है। तो उस पूरी सोच से भी मुक्ति चाहिए, केवल कुर्सी से मुक्ति नहीं, उस पूरी सोच से मुक्ति चाहिए जो इनकी है। इसलिए बदलाव रैली सोच के साथ, वैज्ञानिक रास्ते के लिए और जितनी मांगों के नारे आप दोहराते हो, वो सब पूरी हो सके, उस नई व्यवस्था में, समाजवादी व्यवस्था में, उसकी तरफ बढ़ने का रास्ता है। बदलाव जरूरी है।

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