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मंगलवार, 27 मार्च 2012

बाजार की गिरफ़्त में मीडिया

बाजार की एक वस्तु

आज पूरी दुनियाँ पर बाजारवाद का संकट गहराता जा रहा है। बाजार बहुत ही तेजी के साथ समस्त संसाधनों पर अपना कब्जा जमाता जा रहा है। चाहे वह प्राकृतिक संसाधन हो या गैर प्राकृतिक हो। उत्पादन शक्ति से लेकर उत्पादित वस्तु तक सभी बाजार की गिरफ़्त में आ गए हैं यहाँ तक की इंसान भी बाजार की एक वस्तु मात्र बनकर रह गया है।
पूँजीवादी सभ्यता ने साहित्य, कला, संस्कृति यहाँ तक की ज्ञान को भी बाजार की वस्तु बनाकर रख दिया है। दुनिया के सामने सच की तस्वीर रखने का दावा करने वाली हमारी मीडिया, समाचार पत्र भी आज बाजार की गिरफ्त में आ गए हैं। कभी-2 तो ऐसा लगता है जैसे पत्रकारिता पत्रकारिता न होकर पूँजीपतियों और सरकारों की चाटुकारिता करती नजर आती है। खास तौर से भारत की पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा शोषकों और साम्राज्यवादी ताकतों की ही वकालत करता दिखाई देता है। ऐसा हो भी क्यों न क्योंकि आज की पत्रकारिता इन्हीं पूँजीपतियों, भ्रष्टाचारियों और जमाखोरों के विज्ञापन के बलबूते जीवित है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि आज का प्रकाशक, सम्पादक और पत्रकार जनसेवक नहीं अपितु वह देश के बड़े अमीरों की कतार में खड़ा होना चाहता है। आज का प्रकाशक, सम्पादक व मीडिया कर्मी यह पूरी तरह से भूल गया है कि पत्रकारिता के मायने क्या होते हैं और पत्रकारिता किसे कहते हैं।
भूमण्डलीकरण के इस वर्तमान दौर में भारतीय पत्रकारिता ने बाजार की शक्तियों के सामने घुटने टेक दिए हैं वैसे तो भारतीय पत्रकारिता का दायरा बहुत बड़ा है। यही नहीं भारत में तो मीडिया को लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ भी कहा जाता है। इसके बावजूद भी भारतीय पत्रकारिता पूरी ईमानदारी के साथ जनहित में खड़ी होती नजर नहीं आती। पूरा मीडिया जगत जनसरोकारों की जगह बाजार से सरोकार रखने लगा है। अंग्रेजी पत्रकारिता तो तमाम सामाजिक सरोकारांे और नैतिक मूल्यों से पल्ला झाड़कर सीधे-2 बाजार से जुड़ गई है। लेकिन वर्तमान समय में हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं के बहुसंस्करणीय अखबार भी अंग्रेजी पत्रकारिता के नक्शेकदम पर चल पड़े हैं और इसके चलते उनकी अपनी कोई पहचान नहीं रह गई है। भूमण्डलीकरण और साम्राज्यवादी नीतियों के चलते भारत के आम आदमी का जीवन कष्टों का पर्याय बन गया है। इससे इनका कोई नाता नहीं है। साम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ संघर्षरत श्रमिकों, किसानों व जन सामान्य के कष्टों से उदासीन हमारे भारतीय भाषाओं के बड़े कहे जाने वाले अखबार आम जनता के संघर्ष से कहीं भी जुड़े हुए दिखाई नहीं देते। सत्तासीन राजनैतिक पार्टियों के जोड़-तोड़ की राजनीति में ही मशगूल हैं। जनता के दर्द से इनका कोई भी लेना देना नहीं रह गया है।
जहाँ तक क्षेत्रीय अखबारों का प्रश्न है वे अपनी साधन हीनता के चलते अपने अस्तित्व को ही बचाने में लगे रहते हैं लेकिन अब इन अखबारों के प्रकाशकों के अंदर भी बाजारवादी मानसिकता घर करने लगी है जो कभी परिवर्तन कामी आन्दोलनकारी भूमिका निभाने की इच्छा रखते थे। अब यह भी बाजार के रंग में रंगने लगे हैं। वर्तमान समय में इन अखबारों के प्रकाशक और पत्रकार स्थानीय व्यापारियों, माफियाओं, सांसदों, मंत्रियों, और छुट-भइये नेताओं के विज्ञापन के नाम पर मोटी रकम काटने के चक्कर में इनकी दलाली व चापलूसी करते फिरते हैं। स्थानीय स्तर पर फूट रहे जन-आन्दोलनों और संघर्षों की रिर्पोटिंग न के बराबर ही करते हैं। यदि करते भी हैं तो आलोचनात्मक रिर्पोटिंग करते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि यह जन आन्दोलनों को उत्साहित करने की जगह हतोत्साहित करते नजर आते हैं। भारत जैसे देश में, जिसे कृषि प्रधान देश कहा जाता है, जिस देश की 60 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर करती है उस देश में लगभग 40 हजार किसानों ने पिछले एक दशक के अंदर आत्महत्याएँ कर लीं। बेरोजगारी की मार से आज का शिक्षित युवा वर्ग आत्महत्या करने को विवश है, आई।टी. जैसे संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थी आत्महत्या करने को मजबूर हैं। आज देश में शिक्षा का निजीकरण दिनोदिन बढ़ता जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों का व्यक्तिगत क्षेत्र में विलय होता जा रहा है लेकिन वर्तमान समय में पूरे देष की मीडिया मौन खड़ी है। आज जनता शासक वर्ग के खिलाफ दिनों दिन हथियार उठाती जा रही है। केन्द्र सरकार व राज्य सरकारें अपने दमनात्मक अभियानों से उन जन आन्दोलनों को कुचलने का असफल प्रयास कर रही हैं। फिर भी ये जन आन्दोलन दिनो दिन बढ़ते ही जा रहे हैं। यह बात जुदा है कि आज का जन आंदोलन संगठित न होकर अनेक धाराओं में बँटा हुआ है और जनता का भारी समर्थन जुटाने में असफल है। इसके पीछे शासक वर्ग द्वारा मीडिया के माध्यम से किया जा रहा दुष्प्रचार, ज्यादा कारगर साबित हुआ, क्योंकि मीडिया का सबसे बड़ा हिस्सा, केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों, पूँजीपतियों व साम्राज्यवादी ताकतों से संचालित होता है और शासक वर्ग यह कभी नहीं चाहता है कि उसके खिलाफ खड़ा हो रहा कोई भी जन आन्दोलन मजबूत हो और उनकी शोषण परक व्यवस्था को नेस्तानाबूद कर जनता के लिए एक शोषण विहीन शासन व्यवस्था का निर्माण करे इसके लिए देश में जन सरोकारी मीडिया की अत्यन्त आवश्यकता है जो बाजार के चंगुल से मुक्त हो, जो जनता के अधिकारों के लिए काम करे, जो मानवीय संस्कृति, साहित्य, कला और शिक्षा का निर्माण करे और व्यापक जनता के पक्ष में खड़ी होकर जनपक्षधरता की बात करे, एक जनसंस्कृति के निर्माण में अपनी भूमिका अदा करे। सही मायने में वही पत्रकारिता एक श्रेष्ठ पत्रकारिता होगी जो वास्तव में मानव द्वारा मानव के शोषण को समाप्त कर एक समाजवादी व्यवस्था का निर्माण करने में अपनी महती भूमिका अदा करेगी।
-लाल प्रकाश ‘राही’
मो.09451160161

शनिवार, 3 मार्च 2012

मैंने इस आवाज़ को मर -मर पाला है फिराक.......................


आज है पुण्यतिथि
मैंने इस आवाज़ को मर -मर पाला है फिराक
आज जिसकी नर्म लव है समय मेहरावे हयात .....फिराक

कहाँ का दर्द भरा था तेरे फँसाने में
फिराक दौड़ गई सह सी जमाने में
शिव का विषपान सुना होगा
मैं भी ऐ दोस्त रात पी गया आंसू
इस दौर में जिन्दगी बसर की
बीमार रात हो गई .....फिराक ने उर्दू अदब की शायरी और साहित्य को वो मुकाम दिया जो दुनिया की अन्य भाषाओं से काफी आगे नजर आता है |फिराक ने अपने उर्दू शायरी से एक नया फलसफा दी जमाने को उर्दू के मशहूर शायर फिराक ने एक बार कहा था ......हासिले जिन्दगी तो कुछ यादे हैं ....याद रखना फिराक को यारो ......लेकिन यह बात कहने में मुझे जरा भी संकोच नही है की ऐसे अजीमो शक्सियत को जमाना अपने स्मृति पटल से भुलाता जा रहा है .फिराक गोरखपुर में पैदा हुए थे |गोरखपुर -लखनऊ राज मार्ग संख्या 28 के पास एक सडक है जो रावत पाठशाला होते हुए घंटाघर की तरफ जाता है |इसी पाठशाला के करीब वह लक्ष्मी भवन है जिसमे फ्रिआक ने आँखे खोली थी और यही रावत पाठशाला जहा उन्होंने शिक्षा आरम्भ की थी और यही से उस उर्दू अदब के शायर ने अपने विचारों और दर्शन को उर्दू शायरी में ढालने का काम किया और उर्दू अदब को एक नया मुकाम दिया |लक्ष्मी भवन उनके जिन्दगी में बिक गया और अब फिराक के नाम पर इस शहर में न तो कोई पार्क है और न ही भवन और न ही कोई शिक्षण संस्थान |बस एक चौराहे पर उनकी प्रतिमा लगी हुई है जिससे लगता है की शहर से इस शायर का कोई रिश्ता था |फिराक का जन्म 1898 में हुआ था और 3 मार्च 1982 को फिराक इस दुनिया से रुखसत हुए थे |फिराक बचपन से ही मेधावी रहे इसीलिए उन्होंने आई. सी. एस. की नौकरी छोडकर और महात्मा गांधी से प्रभावित होकर आज़ादी की जंग में कूद पड़े |उनके पिता ईश्वरीय प्रसाद बड़े वकील थे और पंडित जवाहर लाल नेहरु से उनके व्यक्तिगत रिश्ते थे |फिराक उच्च शिक्षा के लिए इलाहाबाद गये और वहा आनद भवन के सम्पर्क में आये |उन्होंने स्वतंत्रता आन्दोलन में हिस्सा लिया तो घर की आर्थिक स्थिति बिगने लगी |पंडित नेहरु को उनकी स्थिति को भापने में देर नही लगी |उन्होंने फिराक को कांग्रेस कार्यालय का सचिव बना दिया लेकिन फिराक को तो साहित्य की दुनिया में उंचाइयो पर पहुचना था इसीलिए वे वहा पर भी साहित्य सृजन के क्रम को आगे बढाते रहे |वह पहले कानपुर फिर आगरा के एक महाविद्यालय में अंग्रेजी के प्रवक्ता नियुक्त हुए और बाद में इलाहाबाद विश्व विद्यालय में अंग्रेजी के प्रोफ़ेसर बने |फिराक और हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हरिबंश राय बच्चन में एक समानता थी |दोनों इलाहाबाद विश्व विद्यालय में अंग्रेजी के शिक्षक थे |श्री बच्चन यदि हिन्दी में लिखते थे तो फिराक का शौक उर्दू लेखन में था अंग्रेजी भाषा का भरपूर ज्ञान ,भारतीय संस्कृति और संस्कृत साहित्य की अच्छी समझ , गीता के दर्शन और उर्दू भाषा से लगाव ने फिराक को हिमालय बना दिया |फिराक ने उर्दू गजल और शायरी को उस नाजुक वक्त में नई जिन्दगी बक्शी जब की नारेबाजी और खोखली शायरी गजल की प्रासंगिकता को समाप्त कर देगी |लेकिन उन्होंने गजल में आम हिन्दुस्तानियों का दर्द भर दिया और बोल पड़े
शामे -गम कुछ उस निगाहें नाज़ की बाते करो
बेखुदी बढती चली है राज की बाते करो
ये सकू ते नाज़ -ए -दिल की रगों का टूटना
खामोशी में कुछ शिकस्ते साज़ की बाते करो
कुछ कफस की तीलियों से छन रहा है नूर सा
कुछ फजा कुछ हसरते परवाज की बाते करो
वह आवाज़ जिसमे एक जादू था खामोश हो गयी |लेकिन फिराक ने जिस आवाज़ को मर -मर पाला था वह आज साहित्य की दुनिया में सुनाई दे रही है |उन्होंने लिखा की मैंने इस आवाज़ को मर -मर पाला है फिराक ,आज जिसकी नर्म लव है समय मेहरावे हयात .........|

-सुनील दत्ता
पत्रकार
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