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रविवार, 6 मई 2012

कार्ल मार्क्स:जन्मदिन

कार्ल मार्क्स (1818-1883) मार्क्सवाद और प्रबल राजनीतिक विज्ञान के संस्थापक , जिसके विचारों ने उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दियों के इतिहास को नये आयाम दिए.

५ मई १८१८ को पश्चिम जर्मनी के ट्रायर में कार्ल मार्क्स का जन्म हुआ. उसके पिता एक कामयाब वकील थे, जिन्हें प्रशिया के कानूनानुसार अपने व्यवसाय को चलाने के लिए यहूदी से ईसाई धर्म अपनाना पड़ा.

सत्रह वर्ष की आयु में कानून की विद्या हासिल करने के लिए मार्क्स बोन विश्वविद्यालय में पंजीकृत हुए. वहाँ उनकी गिनती तेज-तरार विद्यार्थियों में नहीं होती थी. फिक्रमंद पिता ने उनका स्थानांतरण कठोर अनुशासन के लिए विख्यात बर्लिन के विश्वविद्यालय में करवा दिया. अपने अध्ययन के दौरान नौजवान मार्क्स रेडिकल विचारों और दर्शन की ओर झुकते गये. एक बार तो वे ‘यंग हेगल्स’ नामक विद्यार्थियों के एक समूह से जुड़ गये जो हेगल के विचारों को अस्वीकार कर चुके थे.

१९ जून १८४३ को उनका विवाह प्रशिया के नवाब की सुशिक्षित सपुत्री जेनी वोन वेस्टफालें से संपन्न हुआ. शादी के तुरंत बाद सरकार की सेंसरशिप, जिसका रवैया वामपंथी आन्दोलनकारियों के प्रति दिन-प्रतिदिन कठोर से कठोरतम होता जा रहा था, ने उन्हें देश छोड़कर पेरिस जाने के लिए मजबूर कर दिया.

१८४० का पेरिस उस ज़माने के क्रांतिकारियों की सबसे प्रिय कर्मस्थली थी. यहाँ मार्क्स की मुलाकात बहुत से क्रांतिकारियों से हुई जिनमे फ्रेडरिक एंगेल्स आगे चलकर उनके जीवनभर के वैचारिक मित्र बन गये.

१८४४ में एंगेल्स बहुत ही प्रभावशाली पुस्तक ‘Conditions of the Working-Class in England ‘ लिख चुके थे. इस पुस्तक ने मार्क्स के सर्वहारा वर्ग द्वारा संपन्न किये जानेवाली क्रांति के विचार को विकसित करने में मदद की. इसी पुस्तक से प्रेरणा पाकर मार्क्स ने Economic and Philosophic Manuscripts नामक अपनी पहली पुस्तक की रचना की. पूंजीवाद के अधीन श्रम के अलगाव से मुक्ति के लिए साम्यवाद की जीत की अवश्यम्भाविता के पक्ष में तर्क के कारण इस पुस्तक का एक नैतिक और दार्शनिक महत्व रहा है.

दार्शनिकों ने अलग-अलग अंदाज़ से इस दुनिया का केवल वर्णन किया है. लेकिन मसला इसे बदलने का है.

मार्क्स की दिलचस्पी इतिहास के विकास और परिवर्तन में भी थी, जो समाज में नैसर्गिक रूप से चलता रहता है. अपने इस विचार को उन्होंने इतिहास की भौतिकवादी समझ बताया. मार्क्स का विश्वास दिन-प्रतिदिन इस सच्चाई की ओर दृढ होता गया कि सर्वहारा वर्ग की क्रांति न केवल वांछनीय है बल्कि ऐतिहासिक आवश्यकता के कारण अवश्यंभावी है.

इसी समय मार्क्स और एंगेल्स ने अपना सबसे प्रसिद्ध पंफलेट ‘कम्युनिस्ट घोषणापत्र’ लिखा.

“कम्युनिस्ट अपने विचारों और उद्देश्यों को छिपाना अपनी शान के खिलाफ समझते हैं. वे खुलेंआम एलान करते हैं कि उनके लक्ष्य पूरी वर्तमान सामाजिक व्यवस्था को बलपूर्वक उलटने से ही सिद्ध किये जा सकते हैं. कम्युनिस्ट क्रांति के भय से शासक वर्ग को कांपने दो. सर्वहारा के पास खोने के लिए अपनी बेड़ियों के सिवा कुछ नहीं है. जीतने के लिए उनके सामने सारी दुनिया है.

दुनिया के मजदूरों, एक हो ! “

मार्क्स की ज्यादातर रचनाओं के विपरीत मार्क्स की यह कृति संक्षिप्त और प्रासंगिक होने के साथ-साथ अग्निमय और प्रेरणादायक भाषा के प्रयोग द्वारा क्रांति की इच्छा पैदा करने की क्षमता रखती है.

“अभी तक आर्विभूत समस्त समाज का इतिहास वर्ग संघर्षों का इतिहास रहा है.” – कम्युनिस्ट घोषणा पत्र, प्रथम अध्याय.

क्रांतियों, जिन्होंने १८४८ में समस्त यूरोप को अपनी आगोश में ले लिया था, ने मार्क्स को फ़्रांसिसी और बेल्जियन अधिकारिओं की नज़रों में संदिग्ध बना दिया . उन्हें लंदन में शरण लेनी पड़ी और उनका शेष रचनात्मक जीवन वहीँ बीता.

कम्युनिस्ट लहर की इस तरुणावस्था में मार्क्स इसके साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़ते गये. प्रथम कम्युनिस्ट इंटरनेशनल में अराजकतावादी बकुनिन के विरुद्ध उन्होंने प्रबल और प्रभावशाली तर्क रखे.

एक और प्रबल घटना १८७१ का पेरिस कम्यून की स्थापना थी जिसे सर्वहारा वर्ग दो महीने के संघर्ष के बाद हार गया. मार्क्स ने इसका पुरजोर मूल्यांकन किया और इसे भविष्य की कम्युनिस्ट क्रांतियों के अग्रदूत की उपाधि प्रदान की.

मार्क्स अपना अधिक से अधिक समय ब्रिटिश लायब्रेरी में राजनीतिक अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए बिताते थे. इसी के परिणामस्वरूप उनकी मास्टरपीस रचना ‘पूँजी’ (दास कैपिटल) का जन्म हुआ. यह पुस्तक पूंजीवादी समाज और अर्थशास्त्र की गतिकी के नियमों का सघन और विस्तृत संकलन हैं.

“पहली दृष्टि में पण्य बहुत मामूली सी और आसानी से समझ में आनेवाली चीज मालूम होता है. किन्तु उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वास्तव में वह एक बहुत अजीब चीज है, जो आधिभौतिक सूक्ष्मताओं और धर्मशास्त्रीय बारीकियों से ओतप्रोत है. जहाँ तक वह उपयोग मूल्य है, वहां तक, चाहे हम उसपर इस दृष्टिकोण से विचार करें कि वह अपने गुणों से मानव आवश्यकताओं को पूरा करने में समर्थ है” – पूंजी, अध्याय १, प्रथम खंड

अपने निरन्तर विकसित होते हुए मार्क्सवादी दृष्टिकोण अनुसार मार्क्स ने जीवन के हर पहलू पर लिखा. अक्सर पूंजीपतियों के तलुयाचाट बुद्धिजीवी मार्क्स के “धर्म लोगों के लिए अफीम है” को सन्दर्भ से तोड़कर एक फिकरे के रूप में प्रयोग करते रहे हैं. वर्गीय समाज के अस्तित्व में आने की ऐतिहासिक भौतिकवाद की समझ के अनुसार उत्पादन की प्रक्रिया ने समाज के एक छोर पर मुट्ठीभर अमीर जबकि दूसरे छोरे पर कंगाली का समुद्र पैदा किया. आत्मिक उत्पादन में एक तरफ दर्शन, सौंदर्यशास्त्र, साहित्य,गीत और संगीत पैदा हुआ तो दूसरी और धर्म. दिखने में धर्म गरीबों को मुफ्त का तोहफा लगता रहा हो लेकिन शोषक वर्ग के सच्चे सेवादार के रूप में इसने गरीब जनता को पैरों के नीचे रौंधने का ही काम किया.

” धार्मिक पीड़ा, एक ही समय में, वास्तविक पीड़ा की ही अभिव्यक्ति है और वास्तविक पीड़ा के खिलाफ प्रतिरोध है. दबे-कुचले जीव की सिसकारी है धर्म, निर्दयी दुनिया का हृदय, और आत्माविहीन परिस्थितियों की आत्मा. यह लोगों के लिए अफीम है.”
— (Contribution to the Critique of Hegel\’s Philosophy of Right)

अपने समय के सर्वाधिक घृणा पाने वाले व्यक्ति कार्ल मार्क्स, जिन पर सबसे अधिक कीचड उछाला गया, के रोशन दिमाग ने १८८३ को हमेशा के लिए काम करना बंद कर दिया. निरंकुश और गणतंत्रीय, दोनों प्रकार की सरकारों ने उन्हें अपने राज्य से खदेड़ा. बुर्जुआजी, चाहे वह अनुदार रही हो चाहे अति जनवादी, मार्क्स के प्रति लान्छनात्मक शब्दों का प्रयोग करने में आपस में होड़ करती हुई नजर आई. वे इसे इस प्रकार हटा देते थे जैसे यह कोई मकड़ी का जाला हो. पूर्ण लापरवाही के साथ, जब बहुत जरूरी आवश्यकता उन्हें विवश करती, वे तभी जवाब देते. उनकी मृत्यु उनके चहेते करोड़ों क्रांतिकारी मेहनतकश साथियों के लिए एक आघात थी. साईबेरिया से कैलिफोर्निया, यूरोप और अमेरिका के सभी भागों और जैसाकि फ्रेडरिक एंगेल्स लिखते हैं “मैं साहस के साथ कह सकता हूँ कि बेशक उनके बहुत से विरोधी रहे हों, लेकिन उनका कोई व्यक्तिगत शत्रु नहीं था।”


sabhar

बुधवार, 14 मार्च 2012

खेती में दिखता पलायन का चेहरा-4


विडंबना यह है कि खेती में मज़दूर तो सरप्लस हैं लेकिन ज़मीन घट रही है। मज़दूरों की कमी को मशीनों से पूरा करने वालों के पास भी अभी भारत जैसे अन्न मुख्य आहार वाले देश में खेती के लिए ज़मीन का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए ग्रामीण आबादी के पलायन और खेती पर निर्भर आबादी की चिंता में ज़मीन को बचाने की चिंता भी अनिवार्य तौर पर शामिल होगी।
पूरी अर्थव्यवस्था को बदलने की ज़रूरत
एक खेत जितना एक या दो पीढ़ी के लिए पैदा कर सका, उसकी क़ीमत से कई गुना ज्यादा का उछाल उससे बग़ैर फसल लिए काॅलोनाइजर हासिल कर लेता है। आप एक एकड़ वाले किसान को या भूमिहीन मज़दूर को भला कैसे यह समझा सकते हैं कि अपनी छोटी जोत में खेती करते हुए अभी आधापेट खाकर रहो और अगली पीढ़ी को एक-चैथाई पेट खाने की आदत डालो लेकिन ज़मीन मत छोड़ो, खेती मत छोड़ो, क्योंकि लंबे समय में तुम्हारे लिए और इस संसार की खाद्य सुरक्षा के लिए यही ठीक है। यह हरगिज़ नहीं चल सकता। और अनेक बार हमने देखा कि यह नहीं चला। भूख और जीने की ज़रूरत को किसी भी ‘कृषिप्रधान देश की संस्कृति की दुहाई’ से नहीं ढका जा सकता, बल्कि इसके लिए ऐसे ठोस उपाय करने की ज़रूरत होगी जिससे खेती में लगे लोगों को सम्मानजनक रोज़गार और जीवन-सुरक्षा मिल सके। वरना बाज़ार और बाज़ार के मातहत चल रहा राज्य खेती में लगे लोगों के लिए वही विकल्प उपलब्ध करवाता रहेगा जैसे उसने विदर्भ या वारंगल और अनेक अन्य किसान आत्महत्या वाले इलाक़़ों के किसानों को दिए हैं।
बेशक एक जगह से जाकर दूसरी जगह बस जाने का लोगों का हर देश में हजारों वर्षों पुराना इतिहास है। कभी वे प्राकृतिक आपदाओं के चलते सुरक्षित जगहों की तलाश में गए, कभी सामाजिक-आर्थिक कारणों से। पंजाब से लोग कनाडा और इंग्लैंड गए, तमिलनाडु और आँध्रप्रदेश से कम्बोडिया, थाइलैंड और वियतनाम, केरल के लोग पहले बर्मा, श्रीलंका, सिंगापुर गए और बाद में जर्मनी, अमरीका और खाड़ी के देश। इसी तरह गुजरात के लोग भी अफ्रीका और यूरोप के अनेक देशों तक पहुँचे। उड़ीसा के लोग जावा-सुमात्रा पहुँचे तो भोजपुरी लोग फिजी, माॅरीषस, सूरीनाम, त्रिनिडाड, युगांडा तक। वे देषों की सरहदों के भीतर घूमते-भटकते रहे और उन्होंने पर्वतों-समुंदरों को भी लाँघा। अनेक दफ़ा वे गु़लाम मज़दूरों की तरह काम करने के लिए दुनिया के कोने-कोने में ले जाए गए।
पूँजीवाद का पूरा इतिहास संपत्ति संचय के लिए श्रम के शोषण और उसे एक जिंस की तरह इस्तेमाल करने का रहा है। जहाँ पूँजीवाद को ज़रूरत होती है वह उस दिशा में श्रम को पलायन पर मजबूर करता है। संभव हुआ तो ज़ंजीरों में जकड़कर, नहीं तो मोटी तनख़्वाह पर। दोनों ही तरह के पलायन और विस्थापन अंततः पूँजीवादी डिजाइन के ही हिस्से होते हैं जिसका मक़सद मुनाफ़ा होता है - किसी भी क़ीमत पर, और जब श्रम की ज़रूरत ख़त्म हो जाती है तब वह श्रम को अपने आप मरने मिटने के लिए छोड़ देता है। ज़ाहिर है हमारे लिए जो हल स्वीकार्य होगा उसमें मेहनतकश लोग केन्द्र में होंगे। हालाँकि हर जनसंघर्ष और उससे हासिल उपलब्धि का महत्त्व है लेकिन इस परिस्थिति से निपटने के लिए केवल खेती में नहीं बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था में ही आमूलचूल परिवर्तन की ज़रूरत है, और अर्थव्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन अर्थव्यवस्था से नहीं, बल्कि राजनीति से होते हैं।
-विनीत तिवारी
मो. 09893192740

शनिवार, 27 अगस्त 2011

क्या आधुनिक बाज़ार व्यवस्था जनसाधारण की विरोधी नही है ?

हम आधुनिक युग में जी रहे है | आधुनिक युग की बाज़ार व्यवस्था में जी रहे है | क्योंकि हमारे भोजन - वस्त्र , घर - मकान , सिक्षा - इलाज़ की सभी बुनियादी जरूरते बाज़ार से जुड़ने पर ही मिल पाती है और फिर छोटे - बड़े लाभ - मुनाफे कमाना तो बाज़ार व्यवस्था का अपरिहार्य हिस्सा है और यही बाज़ार व्यवस्था का वास्तविक लक्ष्य भी है | वर्तमान सामाजिक - व्यवस्था को बाज़ार व्यवस्था क्यों कहा जा रहा है ? इसका एकदम सीधा जबाब है की इस सामाजिक व्यवस्था में राष्ट्र व् समाज के सभी लोगो को खरीद - बिक्री की प्रक्रिया से जुड़ना लाजिमी है | कुछ भी पाने के लिए कुछ बेचना और खरीदना जरूरी है | कुछ बेचे बिना कोई भी कुछ खरीद नही सकता | उदाहरण के लिए मजदूर को अपना भोजन , कपड़ा खरीदने के लिए अपनी श्रमशक्ति को बेचना जरूरी है .अपरिहार्य है | किसानो को अपनी खेती के लियेतथा अपने कपड़े -लत्ते तथा दूसरी जरुरतो के लिए अपने कृषि उत्पाद को या अपने किसी सदस्य की श्रम शक्ति को बेचना जरूरी है | येही स्त्थिति तमाम छोटे उत्पादकों की है |
इसके अलावा, चिकित्सा , शिक्षा तथा कानून व न्याय के क्षेत्र के लोगो के लिए भी जरूरी है की वे पहले अपनी बौद्धिक क्षमता को बेचने लायक बने| इसके लिए विभिन्न क्षेत्रो का सिक्षा ज्ञान हासिल करे | फिर अपने शिक्षा ज्ञान का बिक्री - व्यापार करे | चाहे उसका नौकरी के जरिये वेतन आदि के रूप में मूल्य पाए या फिर अपने निजी काम धंधे के जरिये उसका व्यापार करे| अपनी सेवा का कम या ज्यादा मूल्य पाए और फिर उससे अपने जीवन को संसाधनों , सुविधाओं को खरीदे |व्यापारियों , उद्योगपतियों के मालो , सामानों की बिक्री से लाभ - मुनाफे के लिए आवश्यक ही है की वे अपने मालो , सामानों की बिक्री बाज़ार बढाये | इसी लक्ष्य से उत्पादन विनिमय को संचालित करे| यही वह हिस्सा है , जो बाज़ार - व्यवस्था का प्रबल हिमायिती है | उसका संचालक है |इसे आप इस तरह भी कह सकते है कि जंहा व्यापारी , उद्योगपति नही है या छोटे स्तर के है तो वंहा बाज़ार व्यवस्था नही है |अगर कंही व्यापारी व उद्योगपति अत्यंत छोटे स्तर के है तो इस बात का सबूत है कि अभी वंहा छोटे - मोटे बाज़ार तो है , पर बाज़ार व्यवस्था भी नही है | उदाहरण ---- आज से 100 - 200 साल पहले भारतीय समाज में खासकर ग्रामीण समाज में लोगो के आवश्यकताओ कि पूर्ति ग्रामीण समाज में कौजुद श्रम विभाजन से ही पूरी हो जाती थी | किसी ख़ास सामान के लिए ही उन्हें बाज़ार जाना पड़ता था |लेकिन आधुनिक बाज़ार व्यवस्था के आगमन के साथ बाज़ार का यानी खरीद - बिक्री केंद्र का विकास नगर , शहर , कस्बे से होता हुआ हर चट्टी - चौराहे तक फ़ैल गया है | हर आदमी खरीद - बिक्री कि प्रक्रिया से जुड़ गया है और अधिकाधिक जुड़ता जा रहा है |आधुनिक युग कि बाज़ार व्यवस्था ने हर किसी कि महत्ता महानता को चीन लिया है , कयोंकि हर तरह का हुनर , ज्ञान , अनुभव , बिकाऊ माल बन गया है | उसे पाने का लक्ष्य मालो , सामानों कि तरह ही उसकी खरीद - फरोख्त बन गया है |आज कोई आश्चर्य नही कि , मनुष्य का मूल्य उसके गुणों के आधार पर नही बल्कि खरीद - बिक्री कि क्षमता के आधार पर किया जा रहा है |इस बाज़ार व्यवस्था का अनिवार्य फ्लू यह भी है कि यदि किसी के पास बेचने के लिए कुछ भी नही है या जिसका श्रम - सामान बिकाऊ नही है तो उसके जीने का अधिकार भी नही है |फिर तो वह किसी के सहारे या फिर भीख - दान अथवा ठगी , चोरी के जरिये ही जीवन जी सकता है |बाज़ार व्यवस्था के वर्तमान दौर के विकास में यही हो रहा है |आधुनिक आर्थिक व तकनिकी विकास के दौर में साधारण श्रम और साधारण उत्पादन कि बाज़ार में मांग घटी जा रही है | या तो उनकी बिक्री ही नही हो पा रही है , या फिर उनका मूल्य इतना कम है कि उससे न तो उपभोग के सामानों को खरीदकर श्रम शक्ति का पुनरुत्पादन किया जा सकता है और न ही बढ़ते लागत के चलते उन साधारण मालो , सामानों का ही पुन: उत्पादन किया जा सकता है | साधारण मजदूरों , किसानो सीमांत व छोटे किसानो, दस्तकारो तथा छोटे कारोबारियों कि येही स्थिति है| वे बाज़ार में टूटते जा रहे है |
चूँकि वर्तमान दौर कि बाज़ार व्यवस्था विश्व - बाज़ार व्यवस्था का एक अंग है | इसका संचालन व नियंत्रण देश - दुनिया के धनाढ्य एवं उच्च हिस्से कर रहे है | उसे वे अपने जैसे लोगो के लिए या फिर अपने सेवको के लिए बाज़ार व्यवस्था को बदल रहे है |आम आदमी को उससे भाहर करते जा रहे है |बेकार , बेरोजगार , संकटग्रस्त होकर जीने और मरने के लिए छोड़ते जा रहे है |क्या यह बाज़ार व्यवस्था जनसाधारण के जीवन- यापन कि उसके बुनियादी हितो कि विरोधी नही है ? क्या जनहित में देश व समाज कि व्यवस्था में जनसाधारण कि आवश्यकतानुसार बदलाव अनिवार्य , अपरिहार्य नही हो गया है ?क्या इस देश के लोगो को इस्पे सोचना नही चाहिए ..............!!

सुनील दत्ता
पत्रकार
09415370672
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