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रविवार, 1 नवंबर 2009

कैसे सैनिटेशनयुक्त हो यह देश ?

इक्कीसवीं सदी में महाशक्ति में शुमार होने के लिए आतुर हिन्दोस्तां के कर्णधारों ने कमसे कम यह उम्मीद नहीं की होगी कि वह एक ऐसे ढेर पर बैठे मिलेंगे जिसमें एक बड़ी त्रासदी के बीज छिपे होंगे।
यूनिसेफ-विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक ताजी रिपोर्ट (Saddest stink in the world, TheTelegraph, 16 Oct 2009) इस बात का विधिवत खुलासा करती है कि किस तरह दुनिया भर में खुले में शौच करनेवाले लोगों की 120 करोड़ की संख्या में 66.5 करोड़ की संख्या के साथ हिन्दोस्तां ‘अव्वल नम्बर’ पर है। प्रस्तुत रिपोर्ट अनकहे हिन्दोस्तां की हुकूमत द्वारा अपने लिए निर्धारित इस लक्ष्य की लगभग असम्भव्यता की तरफ इशारा करती है कि वह वर्ष 2012 तक खुले में शौच की प्रथा को समाप्त करना चाहती है। लोगों को याद होगा कि अप्रैल 2007 में यूपीए सरकार के प्रथम संस्करण में ही ग्रामीण विकास मंत्रालय ने यह ऐलान किया था कि हर घर तक टायलेट पहुंचा कर वह पूर्ण सैनिटेशन के लक्ष्य को 2012 तक हासिल करेगी।
अपने पड़ोसी देशों के साथ भी तुलना करें तो हिन्दोस्तां की हालत और ख़राब दिखती है। वर्ष 2001 में संयुक्त राष्ट्रसंघ के विकास कार्यक्रम के तहत मानवविकास सूचकांक की रिपोर्ट ने इस पर बखूबी रौशनी डाली थी। अगर स्थूल आंकड़ों के हिसाब से देखें तो हिन्दोस्तां में 1990 में जहां 16 फीसदी आबादी तक सैनिटेशन की व्यवस्था थी वहीं 2000 आते आते यह आंकड़ा आबादी के महज 28 फीसदी तक ही पहुंच सका था। पाकिस्तान, बांगलादेश और श्रीलंका जैसे अपने पड़ोसियों के साथ तुलना करें तो यह आंकड़ें थे 36 फीसदी से 62 फीसदी तक ; 41 फीसदी से 48 फीसदी तक तथा 85 फीसदी से 94 फीसदी तक।
यह अकारण नहीं मलविसर्जन/सैनिटेशन की ख़राब व्यवस्था, पीने के अशुद्ध पानी, और हाथों के सही ढंग से न धो पाने से अधिक गम्भीर शक्ल धारण करने वाली दस्त/डायरिया जैसी बीमारी से हर साल दुनिया भर में मरनेवाले 15 लाख बच्चों में से तीन लाख 60 हजार भारत के होते हैं। (विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ की एक अन्य ताजा रिपोर्ट से)
कोई यह प्रश्न पूछ सकता है कि खुले में मलविसर्जन में भारत को हासिल ‘अव्वल’ नम्बर क्या अत्यधिक आबादी के चलते है ? भारत से अधिक आबादी वाले चीन के साथ तुलना कर हम इसे जान सकते हैं। मालूम हो कि यूनिसेफ-विश्व स्वास्थ्य संगठन की वही रिपोर्ट बताती है कि खुले में मलविसर्जन करनेवालों की तादाद चीन में है महज 3 करोड 70 लाख है और दस्त/डायरिया से मरनेवाले बच्चों की संख्या है चालीस हजार।
सैनिटेशन जिसे पिछले दिनों एक आनलाइन पोल में विगत डेढ़ सौ से अधिक साल के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण चिकित्सकीय प्रगति कहा गया था, उसके बारे में हमारे जैसे मुल्क की गहरी उपेक्षा क्यों ? दिलचस्प है कि उपरोक्त मतसंग्रह में 11 हजार लोगों की राय ली गयी थी, जिसने एण्टीबायोटिक्स, डीएनए संरचना और मौखिल पुनर्जलीकरण तकनीक (ओरल रिहायडेªशन थेरेपी) आदि सभी को सैनिटेशन की तुलना में कम वोट मिले थे। (टाईम्स न्यूज नेटवर्क, 22 जनवरी 2007)।
क्या यह कहना उचित नहीं होगा कि दरअसल सैनिटेशन की सुविधा महज एक चैथाई आबादी तक पहुंचने का कारण भारतीय समाज में जड़मूल वर्णमानसिकता है, जिसके चलते प्रबुद्ध समुदाय भी इसके बारे में मौन अख्तियार किए हुए हैं। इसका एक प्रतिबिम्बन आज भी बेधड़क जारी सर पर मैला ढोने की प्रथा में मिलता है, जिसमें लगभग आठ लाख लोग आज भी मुब्तिला हैं जिनमें 95 फीसदी महिलाएं हैं और जो लगभग स्वच्छकार समुदाय कही जानेवाली वाल्मीकि, चूहड़ा, मुसल्ली आदि जातियों से ही आते हैं। और यह स्थिति तब जबकि वर्श 1993 में ही इस देश की संसद ने एक कानून पूर्ण बहुमत से पारित करवाया था जिसके अन्तर्गत मैला ढोने की प्रथा को गैरकानूनी घोषित करवाया है अर्थात इसमें शामिल लोगों को या काम करवानेवालों को दण्ड दिया जा सकता है। आखिर कितने सौ करोड़ रूपयों की आवश्यकता होगी ताकि आबादी के इस हिस्से को इस अमानवीय, गरिमाविहीन काम से मुक्ति दिलायी जाए।
दरअसल शहर में सैनिटेशन एवम सीवेज की आपराधिक उपेक्षा की जड़ें हिन्दु समाज में मल और ‘प्रदूषण’ के अन्तर्सम्बन्ध में तलाशी जा सकती हैं, जो खुद जाति विभेद से जुड़ा मामला है। सभी जानते हैं कि मानव मल तमाम रोगों के सम्प्रेषण का माध्यम है। जाहिर है मानव मल के निपटारे के उचित इन्तज़ाम होने चाहिए। दूसरी तरफ भारत की आबादी के बड़े हिस्से में मल को अशुद्ध समझा जाता है और उसकी वजह से उससे बचने के उपाय ढूंढे जाते हैं। मलविसर्जन के बाद नहाना एक ऐसाही उपाय है। वर्णसमाज में तमाम माता-पिता अपनी सन्तानों को यही शिक्षा देते हैं कि वे मलविसर्जन के बाद ही नहाएं। और चंूकि मल से बचना मुश्किल है इसलिए इस ‘समस्या’ का निदान ‘छूआछूत’ वाली जातियों में ढंूढ लिया गया है जो हाथ से मल को हटा देंगी। कुल मिला कर देखें तो मैला हटाने से लेकर सैनिटेषन की कमी का खामियाजा भुगतने का काम चन्द दलित जातियों को ही झेलना पड़ता है, इसलिए शेष प्रबुद्ध समुदाय को इनकी कमी का कोई खामियाजा भुगतना नहीं पड़ता और समय बदलने के बाद भी यथास्थिति बनी रहती है।
एक तरह से कह सकते हैं कि सैनिटेशन की कमी के चलते अचानक हैजा या ऐसी ही अन्य बीमारियों की जकड़ में तमाम लोग आ सकते हैं। इसकी वजह यह है कि भारत में इस कमी को दूर करने के नाम पर लोग खुली नालियों को टायलेटों के रूप में इस्तेमाल करते हैं। और सिर्फ शहर की ही बात करें तो सभी शहरों में एकत्रित जल-मल का 70 फीसदी हिस्सा ठीक से डिस्पोजल न होने के कारण रिस-रिस कर नीचे पहुंचता है और जमीनी पानी को उल्टे प्रदूषित कर रहा है।
सैनिटेशन के मामले में आधुनिक भारत की दुर्दशा के बरअक्स मोहनजोदारो एवं हरप्पा संस्कृतियों अर्थात सिन्धु घाटी की सभ्यता का अनुभव दिखता है। सभी जानते हैं सिंधु घाटी के तमाम शहर उस दौर में शहर नियोजन प्रणाली का उत्कृष्ट नमूना थे। इनमें सबसे अधिक सराही जाती रही है यहां मौजूद भूमिगत डेªनेज (निकासी) प्रणाली। एक अन्य विशिष्टता रही है कि आम लोगों के घरों में भी स्नानगृहों का इन्तज़ाम था और ऐसे निकासी के इन्तज़ाम थे जिसके तहत घर का तमाम अवशिष्ट एवं गन्दा पानी नीचे अवस्थित भूमिगत जारों में पहुंचाया जाता था।
इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि उस सभ्यता में आज से लगभग पांच हजार साल पहले आम आदमी को केन्द्र में रख कर जल-मल निकासी और सार्वजनिक स्वास्थ्य की योजना को वरीयता मिली थी, वहीं आज हम बहुत विपरीत स्थिति पा रहे हैं।
सुभाष गाताडे,
एच 4 पुसा अपार्टमेण्ट, रोहिणी सैक्टर 15, दिल्ली 110089



रविवार, 7 जून 2009

अजमेर शरीफ के बम धमाके -1

अभिनव भारत , मालेगाव बम धमाके में शामिल इस हिंदू आतंकवादी संगठन ने ही शायद अजमेर शरीफ बम धमाके को अंजाम दिया है। राजस्थान के आतंकवाद निरोधी दस्ते का कहना है की अजमेर दरगाह में वर्ष 2007 में हुए धमाके की जांच सूत्र अभिनव भारत के सदस्यो तक पहुँचते दिख रहे है

एनड़ीटीवी को दिए गए एक विशेष साक्षात्कार में राजस्थान एटीएस के प्रमुख कपिल गर्ग ने इस बात को स्वीकारा है की अभिनव भारत अब हमारे निशाने पर है पिछले दिनों राजस्थान पुलिस की एक विशेष टीम ने मुंबई जाकर मालेगाव धमाके कि मास्टरमाइंङ लेफ्टिनेंट कर्नल एस पी पुरोहित अन्य अभियुक्तों का नार्को परीक्षण और ब्रेन मैपिंग टेस्ट से जुड़े बयानों और एवं रिपोर्टो को एकत्रित किया।

पुलिस सूत्रों का कहना है कि लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित पर किए गए नार्को टेस्ट तथा ब्रेन मैपिंग टेस्ट ने इस बात को उजागर किया कि एक अन्य सदस्य दयानंद पाण्डेय , जो मालेगाव का आरोपी है ,उसने अजमेर धमाके की योजना बनाई थी जिसमें दो लोग मारे गए और लगभग 20 लोग अक्टूबर 2007 में घायल हुए

(एनड़ीटीवी , 'अभिनव भारत अंडर स्कान्नेर फॉर 07 अजमेर ब्लास्ट' राजन महान , मंगलवार ,14 अप्रैल 2009 ,जयपुर )

डेढ़ साल से अधिक वक़्त गुजर गया जब अजमेर शरीफ के बम धमाको में 42 वर्षीय सैयद सलीम का इंतकाल हुआ था महान सूफी संत ख्वाजा मोईनुद्दीन चिस्ती की इस दरगाह पर 11 अक्टूबर 2007 को बम विस्फोट में जो दो लोग मारे गए थे उनमें वह भी शामिल था हालात बता सकते है की सैयद सलीम की मौत बहुत दर्दनाक ढंग से हुई जैसा की बताया जा चुका है इस धमाके में तमाम लोग बुरी तरह घायल भी हुए जब वह प्रार्थना करने की मुद्रा में थे
सैयद सलीम की पत्नी ही उनके दो बच्चे और ही भाई बहनों का उसका लंबा -चौडा कुनबा, किसी ने भी इस बात की कल्पना नही की होगी की इतने मृदुभाषी शख्स की मौत इतनी पीड़ा दायक स्तिथि में होगी उसके दोस्तों को आज भी याद है ख्वाजा मोईनुद्दीन चिस्ती -जिन्हें गरीब नवाज भी कहा जाता है - उनके प्रति अपने अगाध सम्मान के चलते ही सलीम ने अजमेर में रहने का फ़ैसला किया था, और वहां पर सौन्दर्य प्रसाधन का बिज़नेस शुरू किया था इतनी लम्बी -चौडी कमाई नही थी की बार-बार अजमेर से हैदराबाद आना मुमकिन होता, लिहाजा साल में एक दफा वह जरूर आते

गौरतलब है की सैयद सलीम के आत्मीय जानो के लिए उसकी इस असामयिक मौत से उपजे शोक के साथ-साथ एक और सदमे से गुजरना पड़ा जिसकी वजह थी पुलिस एवं जांच एज़ेंसियों का रूख जिन्हें यह लग रहा था कि सैयद सलीम ख़ुद इस हमले के पीछे थे मक्का मस्जिद बम धमाके और अजमेर के बम धमाके के बीच की समरूपता को देखते हुए राजस्थान की पुलिस टीम ने आकर इस बात की छानबीन की कहीं सैयद सलीम ख़ुद आतंकवादी तो नही था ऐसे घटनाओ को सनसनीखेज अंदाज में पेश करने वाले मीडिया के एक हिस्से ने भी यह ख़बर उछाल दी कि मृत व्यक्ति के जेब से कुछ '' संदेहस्पद वस्तु '' बरामद हुई (डीएनए,13 अक्टूबर 2007 )

अपने इस दावे- कि इस घटना को हुजी से जुड़े आतंकवादियो ने ही अंजाम दिया है - को बिल्कुल हकीकत मान रही राजस्थान पुलिस ने इस सिलसिले में छः लोगो को भी हिरासत में ले लिया था जिसमें दो बांग्लादेशी भी शामिल थे। पुलिस के मुताबिक सिम कार्ड लगाये एक मोबाइल टेलीफोन के जरिये विस्फोट को अंजाम दिया गया। तत्कालिन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने यह भी कहा की बम धमाके 'सरहद पार दुश्मनों के इशारे पर हुए है'।

हम अंदाजा लगा सकते है की मामले की तहकीकात कर रही राजस्थान पुलिस की टीम ने सैयद सलीम के परिवारजनों के साथ क्या व्यवहार किया होगा। माता-पिता , भाई बहिन ,पत्नी सभी को खाकी के डर से रूबरू होना पड़ा होगा । ऐसे अनुभवों को देखते हुए हम सहज ही अंदाजा लगा सकते है की समूचे परिवार को 'आतंकवादी' के परिवार के तौर पर लोगो के ताने सुनने पड़े होंगे।

अब जबकि सच्चाई से परदा हटने को है और ख़ुद पुलिस यह कह रही है की अभिनव भारत के आतंकवादियो ने अजमेर बम धमाके को अंजाम दिया है, ऐसे में यह पूछना क्या ज्यादती होगा की पुलिस को चाहिए की वह सैयद सलीम के परिवारवालों के नाम एक ख़त लिखे और जो कुछ हुआ उसके लिए माफ़ी मांगे ।

-सुभाष गाताडे

लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार है

लोकसंघर्ष पत्रिका के जून अंक में प्रकाशित

क्रमश :

शुक्रवार, 5 जून 2009

पानी के लिए युद्घ ?

सियाशी पार्टियों द्वारा वोट बटोरने के लिए की गई हवाई तलवारबाजी के दौर के पूरा हो जाने के बाद अब सूबा मध्यप्रदेश अलग तरह की समरभूमि बना हुआ किया , जिसके केन्द्र में आम जन है और यह संघर्ष पानी की भारी कमी के चलते पनपा है भोपाल के नजदीक के गांव कंसया में सरपंच गोकुल सिंह एवं उसके सहयोगियों के हमले में हुई एक युवक की मौत इसका ताजा उदाहरण बनी है अकेले भोपाल जिले में लोगो के बीच ऐसे हिंसक झड़पों में चार लोग मारे गए है और अगर पूरे सूबे के आंकडो को देखें तो विभिन्न पुलिस थानों में दर्ज मामलो की संख्या जहाँ 45 है वहीं पूरे सूबे में सात लोगो की जान जा चुकी है और कई लोग घायल है।

भोपाल के शाहजहानाबाद इलाके का सात साल का ब्रजेश पानी के लिए मचे इस हाहाकार का एक प्रतीक बन कर उभरा है जिसने ऐसे ही एक संघर्ष में अपने माता-पिता एवं बड़े भाई को खोया है। हँसता -खेलता उसका परिवार ,जहाँ सबसे छोटा होने के नाते वह सबका दुलारा था ,इस तरह अचानक उज़ड़ गया, जब 13 मई को पड़ोसियों द्वारा किए गए हमले में तीनो मारे गए, जब वह गली में अपने दोस्तों के साथ खेल रहे था ।

पानी के साथ संकट का आलम यह है की भोपाल से महज 40 किलोमीटर दूर सिहोरे शहर में चार दिन में एक बार पानी पहुँचता है तो बाकी अस्सी नगरो में दो दिन में एक बार पहुँचता है । पानी की इस सीमित आपूर्ति पर दबंगों का कब्जा न हो इसलिए मध्यप्रदेश सरकार ने पानी कार्ड की भी योजना बनाई है ताकि पानी की राशनिंग की जा सके एवं उसके समान बंटवारे को सुनिश्चित किया जा सके । इतना ही नही भोपाल से सागर ड़िवीज़न जा रही 122 किलोमीटर लम्बी पानी की पाइपलाइन के इर्दगिर्द सरकार ने अपराध दंड सहिंता के अर्न्तगत धारा 144 लगा रखी है ताकि कोई उसे नुकसान न पहुँचा सके ।


मध्यप्रदेश के इस ताजा सूरतेहाल में हम भविष्य की दुनिया की तस्वीर देख सकते है ।

संयुक्त राष्ट्र संघ का आकलन है की पानी की कमी विभिन्न देशो या समुदायों के अन्दर नए विवादो का सबब बनेगी और जिसके लिए नई रक्षा रणनीतियाँ बनाने की आवश्यकता होगी। संयुक्त राष्ट संघ की चौबिस एजेंसियो द्वारा संग्रहित आंकडो के आधार पर तैयार रिपोर्ट को देखें तो पानी के घटते श्रोत्रो , तथा प्रदूषण , आबोहवा में बदलाव और तेजी से बढती आबादी के चलते समूची दुनिया का भविष्य अंधकारमय दिख रहा है । पानी की कमी का असर आर्थिक विकास पर भी पड़ता दिख रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक दुनियाभर में शहरीकरण की प्रक्रिया में जो तेजी आई है और जिस तरह आबादी में बढोतरी दिखती है वह पानी की कमी को और प्रभावित करेगा। स्थूल अनुमान के हिसाब से देखें तो हर साल दुनिया की आबादी आठ करोड़ से बढती है जिसका बहुलांश शहरो में ही दिखता है । इसका अर्थ यही होगा की आनेवाले समय में शहरो में ऐसे लोगो की तादाद बढेगी जिन्हें पहले से कम हो रहे जल संस्थानों पर गुजरा करना पड़ेगा।

एक तरफ़ जहाँ पानी के स्त्रोतों पर खतरा उत्पन्न होता दिख रहा है, वहीं बढ़ते औधयोगीकरण , लगातार बढती जीवन का स्तर और बदलते आहारो ने भी पानी की मांग बढती दिखती है । यह सिलसिला इसी तरह चलता रहा तो रिपोर्ट के मुताबिक आनेवाले बीस सालो के अन्दर अर्थात 2030 तक दुनिया के लगभग आधे हिस्से की आबादी गंभीर पानी संकट से गुजरती दिखाई देगी ।

मार्च महीने में तुर्की की राजधानी इस्तांबुल में हुए अन्तार्राष्टीय सम्मलेन में दुनिया के पीनेयोग्य पानी के बारे में अब तक पेश समग्र आकलन में यही तस्वीर पेश की गई थी । रिपोर्ट के मुताबिक आज की तारीख में पानी प्रबंधन संकटों के चलते दुनिया के अधिकतर हिस्सों में संकट पैदा होता दिख रहा है। नवम्बर 2006 की एक तारीख का उस रिपोर्ट में विशेष उल्लेख है जब 14 अलग देशो से-जिनमें कनाडा, सन्युक्त राज्य अमेरिका या आस्ट्रलिया के कुछ हिस्से भी शामिल थे - पानी की कमी से जुड़े समाचार प्रकाशित हुए थे।

कृषि का मौजूदा स्वरूप भी पानी के संकट में बढोतरी करेगा। मोटा- मोटा आकलन यही है की लोगो द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले ताजे पानी का 70 फीसदी हिस्सा फसलो को उ़गाने और अपने जानवरों के रख रखरखाव पर खर्च होता है । ग्लोबल वार्मिंग के चलते आनेवाले 30-40 सालो में जितने बड़े पैमाने पर आबादी का विस्थापन होगा ऐसे शरणार्थियो के पुनर्वास के लिए भी नए पानी और सैनिटेशन का इंतजाम करना पडेगा ।

पानी के इस संकट का दूसरा पहलु विदर्भ के आत्महत्या से पीड़ित जिलो में सामने आ रहा है जहाँ लगातार दोहन से जलस्तर काफ़ी नीचे चला गया है। कई इलाको में न यह पीनेलायक रहा है और न ही सिंचाई योग्य । विदर्भ के इन जिलो में पानी में नाइटेट के साथ फ्लोराइड़ , कैल्शियम ,मैग्नेसियम जैसे घातक रसायनों की अधिकता पायी गई है । जानकार बताते है की पानी में नाइटेट की मात्रा अधिक हो जाए तो यह शरीर में आक्सीजन ग्रहण करने की क्षमता को प्रभावित करता है जिससे सांस से जुड़ी बीमारियाँ पैदा होती है तथा पानी में फ्लोराइड़ बढ़ना भी शरीर के लिए घातक साबित होता है।

भले ही यह सच्चाई हो की पृथ्वी के दो तिहाई से अधिक हिस्से पर पानी है, मगर इसका केवल ढाई फीसदी का 75 फीसदी ग्लेसियरो में बर्फ में ढंका है। पानी के इस अत्यधिक दोहन की कड़वी वास्तविकता जानना हो तो असम के चेरापूंजी जा सकते है जो कभी विश्व में सबसे ज्यादा बारिश के लिए जाना जाता है अब औसत बारिश के लिए भी तरसता दिखता है ।

अपने मुल्क के अन्दर भी हम तमिलनाडु , कर्नाटक जैसे सूबों के बीच कावेरी नदी के जल के बंटवारे को लेकर समय - समय पर होने वाले विवादो में उसकी झलक देख देख सकते है । संयुक्त राष्ट्र संघ का आकलन है की इस्राइल -फिलिस्तीन , श्रीलंका ,हैती, कोलंबिया , बांग्लादेश जैसे कई मुल्क जो पहले से ही विभिन्न आतंरिक कारणों से अस्थिरता के दौर से गुजर रहे है , वहां पानी से पैदा ऐसे विवाद अधिक जटिलता भी पैदा करेंगे । क्या आनेवाली पीढियां इक्किशवीं सदी को पानी के लिए होने वाले युद्धों के लिए याद करेंगी या हमारा सचेत एवं संगठित हस्तक्षेप इस सम्भावना को खारिज करेगा, यह मसला भविष्य के गर्भ में छिपा दिखता है।

सुभाष गाताडे
लेखक सुप्रसिद्ध पत्रकार है

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