गुरुवार, 23 अप्रैल 2009

राजनितिक भँवर में अपने वजूद को ढूंढता मुसलमान 01

आजकल मुसलमान मुलायम सिंह यादव से नाराज चल रहा है इससे पूर्व वह कांग्रेस से नाराज होकर मुलायम सिंह के पास सिमट गया था । बहुजन समाज पार्टी की ओर अब उसकी दोस्ती की पींगे बढती नजर आ रही है । कुल मिलकर मुसलमानों ने अपने राजनैतिक फैसले भावुक होकर करने की अपनी नादानी से अपने को आज उस मुकाम पर ला कर खड़ा किया है की उसके ऊपर किसी राजनैतिक दल को विश्वाश नही रह गया है और यदि यूं कहा जाए तो बेवजह न होगा की बार-बार पाला बदलने से मुसलमान ने अपनी राजनितिक पॉवर को खोखला कर डाला है ।
देश की आज़ादी के बाद विभाजन के इल्जाम का दंश झेलते रहे मुसलमानों सदैव अपने आत्मविश्वाश को पाने की ज़द्दोज़हद करते रहे सांप्रदायिक शक्तियों ने उनकी देश भक्ति पर सदैव शक की नजर रखी और उन्हें पाकिस्तान की नार्मगोषा रखने वाली भारतीय कौम की संज्ञा दी । देश के विभाजन के बाद फूटे सांप्रदायिक दंगो ने न केवल उसकी संपत्ति का नुकसान किया बल्कि उसके आत्मसम्मान पर भी गहरा अघात पहुचाया पाकिस्तान ने अपना सब कुछ लुटाकर आने वाले हिन्दुओ को तो देश में सर आँखों पर बिठाया गया परन्तु भारत से पलायन की गलती करने वाले मुसलमानों को पाकिस्तान के लोगो ने कभी भी अपने दिल में सम्मान जनक स्थान नही दिया।
इस प्रकार की मानसिक स्तिथियों से जूझते मुसलमानों को सहारा उस वक़्त कांग्रेस के वरिष्ट मुस्लिम नेता मौलाना अब्दुल कलाम आजाद से मिला उन्होंने उनके जख्मो पर मरहम रखा । उन्ही के कारण मुसलमान कांग्रेस के खेमे में सत्तर के दशक के अंत तक रहा परन्तु कांग्रेस का दामन उसने आपातकाल में नसबंदी के नाम पर हुई ज्यादतियों के खिलाफ रुष्ट होकर झटक दिया और उस जनता पार्टी में शामिल हो गए जिसमे लाल कृष्ण अडवाणी, अटल बिहारी बाजपेयी के साथ सोसलिस्ट मधुलिमये , मधुदंङवते थे तो मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और कई क्षेत्रिय पार्टिया भी उसमें सम्मिलित थि ।
परन्तु जनता पार्टी से उसकी दोस्ती अधिक दिन नही चली और वह वापस कांग्रेस में लौटा तो मगर अपनी साख व विश्वसनीयता को खोकर ।

तारिक खान
(क्रमश :)

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