रविवार, 26 अप्रैल 2009

राजनितिक भँवर में अपने वजूद को ढूंढता मुसलमान-4

इस घटना ने देश के मुसलमानों को तोड़ कर रख दिया उनके अस्तित्व का सावल उठ खड़ा हुआ बल्कि यूं कहा जाए तो बेजा न होगा की बाबरी मस्जिद ध्वस्तिकरण कांड ने वास्तव में देश को दो कौमों हिंदू व मुसलमान के बीच बाँट दिया जो काम विभाजन न कर सका था वह नरसिम्हा राव ने भाजपा के साथ मिलकर दिखा दिया। संकट की इस घड़ी में केवल मुलायम सिंह का हाथ आगे बढ़ा और उन्होंने आतंकित मुसलमानों को सहारा दिया वरना बाबरी मस्जिद आन्दोलन में आगे-आगे चलने वाले और आदम सेना बनाकर उसकी रक्षा करने वाले सब बिल में दुबक के बैठे रहे।
जिस वक्त देश भर में 6 दिसम्बर 1992 की रात्रि शौर्य दिवस मनाया जा रहा था और शंखनाद हो रहा था मुसलमानों की अग्रिम पंक्ति कर सियासी नेता व धार्मिक लीडरों का कही पता नही था।
मुलायम सिंह को मुसलमानों ने अपना मसीहा मानकर कांग्रेस से अपना दामन झटक लिया नतीजे में कांग्रेस कमजोर होते ही केन्द्र में भाजपा के नेतृत्व वाली राजग सरकार का गठन एक नही तीन -तीन बार हुआ । मुस्लिम धार्मिक नेताओं ने तब अटल बिहारी बाजपेई के कसीदे पढने शुरु कर दिए । इससे पूर्व यही लोग नरसिम्हा राव के सर पर कभी लाल, कभी नीली, कभी हरी बांधा करते थे।
मुलायम सिंह मुस्लिम बहुमत को पाकर और दलित लीडर कांशीराम की बहुजन समाज पार्टी को साथ लेकर सांप्रदायिक शक्तियों से सीधी टक्कर लेने निकल पड़े परन्तु उनकी बहुजन समाज पार्टी के साथ दोस्ती अधिक दिन नही चली । काशीराम का दाहिना हाथ मायावती नाम का एक गुमनाम राजनीतिक चेहरा अचानक उत्तर प्रदेश की राजनीतिक पटल पर उभर कर सामने आया । मायावती की महात्वाकांक्षाओं की उड़ान में पर लगते हुए सांप्रदायिक शक्तियों ने मुलायम व माया के बीच कडुवाहट घोलनी शुरू कर दी जिसका नतीजा गेस्ट हाउस कांड के रूप में सामने आया और मुलायम सिंह की काशीराम व मायावती कर साथ दोस्ती हमेशा कर लिए रंजिश में बदल गई । यह पहली कामयाबी मिली सांप्रदायिक शक्तियों को जब उन्होंने न केवल मुस्लिम ,पिछडा दलित गठजोड़ को टुकड़े टुकड़े कर दिया बल्कि मुस्लिम वोट बैंक को भी विभाजित करने की दाग बेल डाल दी। तदोपरांत मायावती ने चंद मुस्लिम लीडरों को साथ लेकर सपा के मुस्लिम वोट बैंक पर डोरे डालने शुरू किए परन्तु उन्हें कामयाबी न मिल सकी ।
मायावती ने भाजपा के साथ तीन बार राजनीतिक विवाह किया और हर बार समय पूरा होने से पूर्व तलाक़ हो गई।
उधर कांग्रेस नरसिम्हा राव को हाशिये पर डालने के बावजूद मुसलमानों की नाराजगी को दूर न कर सकी और मुस्लिम कांग्रेस को अछूत मानकर हमेशा उससे दूर ही रहा । मायावती कल्याण सिंह विवाद फिर मायावती कलराज मिश्र विवाद व मायावती राजनाथ सिंह विवाद के बीच मायावती की राजनैतिक किश्ती आगे तो नही बढ़ सकी परन्तु भाजपा के सहारे उनकी वर्ष 2002 की सरकार में सवर्णों को उत्पीङितकर कर भाजपा से उन्हें दूर करने में विशेष भूमिका अदा की।
तारिक खान
(क्रमश :)

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