सोमवार, 27 अप्रैल 2009

राजनितिक भँवर में अपने वजूद को ढूंढता मुसलमान-5

उधर मुलायम सिंह ने राज्य मे मुख्यमंत्री के तौर पर और केन्द्र में रक्षामंत्री के तौर पर सत्तासीन होने के बाद अपनी सौगातों का पिटारा केवल यादवो के लिए ही खोला । इस बात का लाभ उठाकर सपा विरोधी पार्टियों ने मुसलमानों को मुलायम विरुद्ध शनेः शनेः बरगलाना शुरू किय नतीजे में मुसलमानों कर भीतर मुलायम के विरुद्ध नाराजगी में इजाफा होता चला गया और मुसलमान एक बार फिर वही गलती दोहराने लगे,अर्थात मुलायम में भी उसी प्रकार कीडा नजर आने लगे जैसे की कांग्रेस में उन्हें मिलते थे। वास्तव में सांप्रदायिक शक्तियों का पहला लक्ष्य मुसलमानों की वोट पॉवर को छिन्न भिन्न करना था वह नही चाहती थी की मुस्लिम एक राजनितिक छतरी के नीचे रहे । उनके इस कार्य में उन्हें भरपूर सहायता उन्ही के सोच से उपजा साम्राज्यवाद का पौधा अमर सिंह नाम के एक राजनेता ने दी। अमर सिंह ने मुलायम सिंह के समाजवादी चरित्र को एकदम धोकर रख दिया और मुलायम के ऊपर अमर प्रेम का ऐसा नशा चढा की समाजवाद व मुस्लिम प्रेम अमर सिंह के ग्लामौर की चकाचौंध में फीका पड़ता चला गया । के उत्तर प्रदेश k uttar pradesh विधान सभा चुनाव में काफी संख्या में मुस्लमान मायावती की पार्टी बहुजन के पक्ष में अपना वोट देकर उन्हें स्पष्ट बहुमत से नवाजा परन्तु फिर वाही कहानी?उनकी गिनती कम और पंडितो की अधिक आज कल्याण सिंह के साथ मुलायम सिंह की दोस्ती ने उन्हें कही का नही छोडा है साम्प्रदयिक शक्तियों व मौका परस्तो की तो किस्मत खुल गई है। मीडिया में भी कल्याण मुलायम दोस्ती और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप मुस्लिम नाराजगी को खूब बढ़ा चढा व चटखारे लगा के पेश किया जा रहा है उन्हें अब कल्याण सिंह को बाबरी मस्जिद गिरवाने का दोषी और आजम खान को मुस्लिम हीरो बताने में कोई हर्ज नही दिखलाई दे रहा है।वरना यही मीडिया जब कल्याण सिंह भाजपा के वफादार थे तो उनके कसीदे पढ़ा करती थी और आजम खा को सर फ्हिरा कट्टरपंथी मुस्लिम लीडर मन करती थी। उधर वह मुस्लिम धर्मावलम्बी जो पहले मुलायम चलीसा पढ़ा करते थे आज मायावती के दरबार की रौनक बनकर नंगे पैर खड़े नजर आते है। मुलायम सिंह पर सांप्रदायिक शक्तियों के साथ हाथ मिलाने का आरोप लगते वक्त उलेमा व कथित मुस्लिम लीडर मायावती का मोदी प्रेम कितनी आसानी से भूल जाते है । कल्याण सिंह व नरसिम्हा राव को यदि बाबरी मस्जिद का ध्वस्तीकरण का जिम्मेदार कहा जा सकता है तो ढाई हजार मुसलमानों का नरसंहार व उनकी करोडो की संपत्तियों को बर्बाद करने वाले भगवा हिंदुत्व के अग्रीणी लीडर नरेंद्र मोदी के हक में प्रचार करने वाली मायावती को सांप्रदायिक शक्तियों का समर्थक क्यों नही कहा जा सकता जो तीन बार केन्द्र में राजग सरकार से हाथ मिला चुकी है ।
वास्तव में मुसलमानों की दुर्दशा के असल जिम्मेदार तीन लोग है एक मुसलमान स्वयं जो सियासत के मैदान में जहाँ उन्हें भावनाओ के स्थान पर अपने दिमाग का इस्तेमाल करना चाहिए तह वह भावनाओ में बहकर कभी माया में अपना मसीहा ढूंढते है तो कभी मुलायम में दूसरे वह कथित मुस्लिम लीडर जो अपना स्वार्थ साधने के लिए उनके वोटो का सौदा गुप्त रूप से करतें है
तारिक खान
(क्रमश :)

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