सोमवार, 13 अप्रैल 2009

घर जला रहे है



बुझानी थी आग जिनको वही घर जला रहे है।
निभानी वफ़ा थी जिनको वही घर जला रहे है।


हसरत थी आसमां को छु लेंगे झूमकर
परवाज खो चुके जो वही घर जला रहे है ॥


एक घर की आग से ही जलती है बस्तियां,
मेरे रफीक फ़िर भी मेरा घर जला रहे है॥

अहले हयात ख्वाहिशों में यूँ सिमट गई
हमराज हमसफ़र मेरा घर जला रहे है ॥

4 टिप्‍पणियां:

समयचक्र - महेन्द्र मिश्र ने कहा…

बुझानी थी आग जिनको वही घर जला रहे है
निभानी वफ़ा थी जिनको वही घर जला रहे है.
वाह बहुत सुन्दर.

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया गज़ल है।बधाई।

Dev ने कहा…

आपको और आपके पुरे परिवार को वैशाखी की हार्दिक शुभ कामना !

नीरज गोस्वामी ने कहा…

हसरत थी आसमां को छु लेंगे झूमकर
परवाज खो चुके जो वही घर जला रहे है
बेहतरीन ....वाह.
नीरज