सोमवार, 20 अप्रैल 2009


प्यास बढ़कर आज खंजर सी लगे है ।
कांच की दीवार पत्थर सी लगे है ॥

उस परी की निगाहों की कसम -
पुतलियों की शाम सुंदर सी लगे है ॥

है दरख्तों को बहुत उचाईयों का गम -
बंदिशों की फांस अन्दर सी लगे है॥

इंसान जो ईमान हक़ सचाइयो पर है -
पर्वतो की राह कंकर सी लगे है ॥

डॉक्टर यशवीर सिंह चंदेल ' राही '

2 टिप्‍पणियां:

irdgird ने कहा…

क्‍या खूब कहा है...बंदिशों की फांस अंदर सी लगे है

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना है।बधाई।