मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

राजनीतिक भँवर में अपने वजूद को ढूंढता मुसलमान

तीसरे उनके धार्मिक विद्वान् जो मस्जिदों के अहातों,मजारो की खानकाहों और मदरसों की मसनद से निकलकर अपने फतवे जारी करके मुसलमानों को उनके गडे मुर्दे याद दिलाकर उनके दिमाग पर धार्मिक भावनाओ की अफीम का नशा चढा देते है। इन सब के बीच मुस्लमान अपने रोजी- रोटी ,नौकरियों व विकास के मुद्दों को ताक पर रखकर केवल अपनी सुरक्षा की नकारात्मक भावना से ओत -प्रोत होकर तितर -बितर हो जाता है। और इस पूरी साजिश के पीछे साम्राज्यवादी,सांप्रदायिक एवं फासिज़्म की सोंच वाली शक्तियों का हाथ रहता है जिसका रिमोट विदेश में बैठे उनके आकाओ के पास है वही से उन्हें दिशा - निर्देश व आर्थिक सहायता मिलती है और नियंत्रित भी किया जाता है।
जब तक मुसलमान अपने मतभेद मिटाकर अपने भीतर मिल्ली एकता पैदा नही करेंगे और उनके सियासी लीडरों में पहले अपने अन्दर इस्लामी व्यक्तित्व बाद में सियासी व्यक्तित्व की भावना नही पैदा होगी तब तक राजनेता मंडी का माल समझ कर उन्हें खरीदते व बेचते रहेंगे । मुसलमानों के सामने अनेक उदाहरण देश में उन्ही के अपने अल्पसंख्यक भाइयो ,सिख ,ईसाई , यहूदी , जैन व पारशी लोगो के है जो अपनी धार्मिक पहचान पर गर्व करते है परन्तु आज मुसलमान अपनी तहजीब अपना इस्लामी किरदार अपनी जुबान सबसे दूर हो चला है उसके अन्दर से आकिबत का खौफ निकल गया है या इस पर उसका ईमान ढुलमुल हो चला है तभी तो उसके अन्दर शोक दुनिया हावी हो गई है और खौफे खुदा कमजोर। अंतर्राष्ट्रीय सतह से लेकर देश को मुसलमानों में ऐसोआरम की प्रवृत्ति ने उन्हें मज़ाहिद के स्थान पर अय्याश व एशपरस्त बना दिया है उनकी इसी कमजोरी का लाभ कभी बुश उठाता है तो कभी मुलायम तो कभी मायावती तो कभी सोनिया गाँधी और यहाँ तक मोसाद भी। मुसलमान अपने शानदार अतीत में इतिहास का अध्ययन करके झांक कर जरा देखे तो जब इज्जत दौलत हुकूमत सभी उनके पास थी क्योंकि वह धर्म के सच्चे अनुयाई थे और वह ईसाई auर यहूदी जिन का समाज अन्ध्विश्वशो व धार्मिक कट्टरता के कारण बर्बाद हो गया इस्लामी हुक्मरानों को संपर्क में आने को बाद उन्होंने अपनी दुनिया ही बदल डाली । अफसोस की हमारी विरासत उनके पास चली गई और गिलाजत हमारे पास ॥
तारिक खान
(समाप्त)

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