बुधवार, 27 मई 2009

'छद्म' 'पूँजी बनाम वास्तविक पूँजी -2

19 वी सदी में यूरोप के देशो में ज्वाइंट स्टाक कंपनियाँ और फ़िर शेयर बाजार पैदा हुए। उद्योगों और प्रौधोगिकी तथा यातायात के विकास के साथ औधोगिक समाज एवं कल कारखाने फैलने लगे । 1870 में इस्पात बनाने के लिए 'बेसीमर कन्वर्टर' नमक नै किस्म की धमन भट्ठियों का आविष्कार किया गया। यहाँ से इस्पात युग शुरू होता है जिसने औद्योगिक और पूंजीवादी समाज को बदल डाला ।
इन घटनाओ के फलस्वरूप पूँजी और मुनाफे का उत्पादन बड़े पैमाने पर होने लगा। पूँजी एवं धन पूरे बाजार तथा अर्थतंत्र में चलायमान हो गई और उसने स्वतन्त्र रूप धारण कर लिया । शेयरों ,स्टाको ,बांङो,प्रतिभूतियों और बैंको की अलग प्रणाली अस्तित्व में आ गई। अब उद्यमी और कारोबारी कारखानों में ही नही बल्कि ,स्टॉक एवं शेयर बाजारों तथा वित्तीय संस्थाओ में अपने पैसे लगाने लगे । शेयर बाजार एक नई किस्म का बाजार था जहाँ पूँजी के टुकड़े (शेयर,स्टॉक) खरीदने ,बेचे जाने इसे ,ही मार्क्स vashtuvein ।
hi marks ने छद्म पूँजी कहा है। छद्म क्यों ? क्योंकि कारोबारी या उद्यमी लोग (पून्जिपति० कारखानों में पैसे नही लगते है जहाँ वाश्तुवें बनती है। वे स्टॉक बाजार ,वित्तीय संस्थाओ और बांको में धन लगाकर मुनाफा कमाने लगते है । धीरे-धीरे वे यह समझने लगते है कि उन्हें इन्ही बाजारों से मुनाफा मिलता है। या बांको से मुनाफा मिलता है । लेकिन आखिर बांको और वित्तीय संस्थाओ में 'मुनाफा 'यानी अतिरिक्त धन (पूँजी) कहाँ से आती है? वह कल कल्खानो से आती है।
स्टॉक और बांड या शेयर आखिरकार वस्तु ,उत्पादन का ही प्रतिनिधितिव करते है । लेकिन औद्योगिक पूँजीवाद क विकास से उत्पादन से इतनी दूर चले जाते है कि उनका उससे सम्बन्ध टूट जाता है और लोग यह समझ बैठते है कि उनका मुनाफा स्टॉक बाजार में पैदा होता है।

अनिल राजिमवाले

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